होमAdam Smith's theory on canons of taxationएडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर सिद्धांत 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर सिद्धांत 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर सिद्धांत 

यह लेख Amber Kotnala द्वारा लिखा गया है और Moiz Akhtar द्वारा इसका अद्यतन किया गया है। यह लेख प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ द्वारा प्रतिपादित कराधान के सिद्धांतों पर प्रकाश डालता है और विस्तार से चर्चा करता है कि ये सिद्धांत आज भी कितने प्रासंगिक हैं। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय 

भारत जैसे देशों में, कर बुनियादी ढांचे, विकास और सरकार द्वारा संचालित जनहित योजनाओं का आधार बनते हैं। कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में कार्य करते हैं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, सड़कें, खाद्य सुरक्षा आदि जैसी जन-केंद्रित सुविधाएं सरकार द्वारा संचालित और वित्त पोषित (फंडेड) होती हैं। भारत सरकार रेलवे, परिवहन, मालवाहक गलियारे (फ्राइट कॉरिडोर्स), ऊर्जा बुनियादी ढांचे, स्वदेशी फार्मा उत्पादन, विभिन्न ऑटोमोबाइल घटकों के स्वदेशी निर्माण, और इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उपकरणों के निर्माण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विशाल योजनाएं चलाती है। इन सभी विकास कार्यों में, भारतीय सरकार ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से एकत्र की गई धनराशि का निवेश किया है।  

कर लगाने की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 265 द्वारा दी गई है। अनुच्छेद 265 कहता है कि केवल कानून के अधिकार से ही कर लगाया और एकत्रित किया जा सकता है। इसलिए, प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह कर का भुगतान करे। कर से प्राप्त आय भारत के समेकित कोष (कंसोलिडेटेड फंड) में जाती है, जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 में किया गया है।  

कर का भुगतान (सरकार की आय) नागरिकों पर बोझ नहीं माना जाता है। जैसा कि अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमुर्ति होम्स ने सही कहा था, “कर सभ्यता की कीमत हैं।” अब समय आ गया है कि कर को बोझ न मानकर सभ्यता की कीमत समझा जाए। इसके लिए, सरकार को कर संग्रह को इतना सरल बनाना होगा कि नागरिक इसे लेकर परेशान या बोझिल महसूस न करें।  

आइए, एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर चर्चा करने से पहले समझते हैं कि कराधान का वास्तव में क्या अर्थ है।  

कराधान क्या है?

कराधान एक अनैच्छिक (इन्वॉलंटरी) भुगतान है, जिसे प्रशासन/सरकार अपने नागरिकों पर अनिवार्य बनाती है। आमतौर पर, कराधान के लिए करदाता की सहमति आवश्यक नहीं होती है, और कर के बदले में प्रशासन द्वारा करदाताओं को कोई प्रत्यक्ष सेवा प्रदान नहीं की जाती है। यदि देश का कानून इस संग्रह को वैध ठहराता है, तो सरकार/प्रशासन द्वारा कर लगाना या एकत्र करना वैध माना जाता है। सरकारों को अपने नागरिकों से विभिन्न प्रकार के कर लगाने और एकत्रित करने का अधिकार और शक्ति होती है। प्राचीन काल से ही कर भूमि, आवास जैसी भौतिक संपत्तियों और वस्तुओं की बिक्री और लेन-देन पर लगाए जाते रहे हैं।  

कराधान का अर्थ समझने के बाद, आइए जानें कि पूरी दुनिया में कर लगाने की आवश्यकता क्यों होती है।  

कर लगाने की आवश्यकता 

21वीं सदी तकनीकी प्रगति और वित्तीय सुधारों का युग है, जिसके कारण विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में तेजी आई है। किसी राज्य द्वारा अपनाई गई राजकोषीय सतर्कता (फिसकल प्रूडेंस) और पारदर्शी कर नीतियां सरकार के आर्थिक दर्शन को दर्शाती हैं। भारत में कर संग्रह और कर लगाना कोई नई अवधारणा नहीं है; यह प्राचीन काल से अस्तित्व में है। कराधान एक राजकोषीय उपकरण है, जिसका उपयोग सरकार सदियों से राज्य की प्रशासनिक तंत्र को चलाने के लिए करती आ रही है। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य को संसाधनों और साधनों की आवश्यकता होती है। नागरिकों से एकत्र किया गया कर सरकार के लिए संसाधन के रूप में कार्य करता है।  

कराधान के सिद्धांतों की विशेषताएँ

एक अच्छा कराधान प्रणाली किसी भी अर्थव्यवस्था का उत्पादक आधार होती है। एक अच्छी कराधान प्रणाली को प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण प्रतिबिंबित करना चाहिए। कर कानूनों को तैयार करते समय, कराधान तंत्र के निर्माताओं को समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए और उसी के अनुसार कानून बनाना चाहिए। एक अच्छी कर प्रणाली को सभी के लिए न्यायसंगत और निष्पक्ष होना चाहिए ताकि देश के नागरिकों पर कर का भार समान रूप से विभाजित हो। निष्पक्ष वितरण का अर्थ समान वितरण नहीं बल्कि न्यायोचित वितरण होता है।  

हालाँकि, कराधान के सिद्धांतों की कई विशेषताएँ हैं, इनमें से कुछ नीचे दी गई हैं:  

  • कर प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति से उसकी कमाई और खर्च करने की क्षमता के अनुसार कर लिया जाए। कम आय अर्जित करने वाले व्यक्ति पर कम दरों से कर लगाया जाना चाहिए।  
  • कर भुगतान का तरीका सरल और सुविधाजनक होना चाहिए। इसे अधिक तकनीकी और प्रक्रियात्मक जटिलताओं से मुक्त रखा जाना चाहिए।
  • कर देयता की गणना (कंप्यूटेशन) का तरीका सरल और आसान होना चाहिए। जितनी सरल गणना की प्रक्रिया होगी, लोग कर नीति के कार्यप्रणाली के प्रति उतने ही जागरूक होंगे। 
  • कर ढाँचा इतना लचीला (फ्लेक्सिबल) होना चाहिए कि विभिन्न परिस्थितियों में अपवादों को समायोजित कर सके। जैसे कोविड-19 महामारी के दौरान, जब देश की अर्थव्यवस्था गिरावट की ओर थी, ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए कर संरचना लचीली होनी चाहिए।  
  • एक अच्छी कर प्रणाली की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह देश में कर संग्रह के लिए विविध तरीके अपनाती है। कर संरचना जितनी विविध होगी, लोगों को कर भुगतान का बोझ उतना ही कम महसूस होगा।  
  • कर संरचना का प्राथमिक उद्देश्य ऐसे कर कानून और नीतियाँ बनाना होना चाहिए जो सामान्य रूप से अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिए प्रतिकूल न हों।  
  • यदि कर खरीद और खर्च के आधार पर लगाया जाए, तो कर संरचना अधिक व्यापक और विस्तृत हो जाएगी।  
  • व्यक्तियों पर उनकी आय के आधार पर कर लगाना न्यायसंगत और कराधान क्षेत्र में एक उन्नत दृष्टिकोण है। अधिकांश देश आयकर वसूलते हैं और मानते हैं कि आय कर किसी व्यक्ति की कर भुगतान क्षमता का आधार होना चाहिए।  
  • कर प्रणाली करदाताओं के लिए तार्किक होनी चाहिए। बिना किसी कारण या उद्देश्य के मनमाने तरीके से लगाया गया कर, कर के रूप में अर्ह (क्वालीफाई) नहीं हो सकता। किसी भी अनुचित कर का जनता द्वारा तीव्र विरोध होगा।  
  • एक अच्छी कर प्रणाली लागत प्रभावी होनी चाहिए और कर संग्रह की लागत, एकत्रित कर राशि की तुलना में नगण्य (मिगर) होनी चाहिए।  

अब, कराधान के अर्थ और आवश्यकता को समझने के बाद, लेख के अन्य हिस्सों को समझना हमारे लिए आसान होगा।  

आइए अब मुख्य विषय की ओर बढ़ते हैं, जो एडम स्मिथ द्वारा दिए गए कराधान के सिद्धांत हैं।  

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत

विभिन्न प्रकार के कराधान के सिद्धांतों को समझने से पहले, आइए जानें कि एडम स्मिथ कौन थे।  

एडम स्मिथ कौन थे?

एडम स्मिथ एक स्कॉटिश दार्शनिक (फिलॉसफर) थे, जिनके विचार और सिद्धांत स्कॉटिश प्रबोधन (एनलाइटेंमेंट) की कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका जन्म 1723 में हुआ था और वे शास्त्रीय उदारवाद (लिब्रेलिज्म) के प्रमुख समर्थकों में से एक माने जाते हैं। उनके आर्थिक और राजनीतिक दर्शन से संबंधित विचारों ने वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाला, विशेष रूप से 1776 में प्रकाशित उनकी पुस्तक “द वेल्थ ऑफ नेशंस” के बाद। एडम स्मिथ ने ग्लासगो विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड के बैलिओल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। उनके द्वारा प्रतिपादित विचारों को लगभग सभी आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों द्वारा अंततः स्वीकार किया गया।  

उनके दो मुख्य विचार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था और अदृश्य हाथ के सिद्धांत थे। उनके अनुसार, बाजार और व्यापार के क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए ताकि बाजार स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके और विकास किसी भी सरकारी नीति द्वारा सीमित न हो। उनका मानना था कि किसी देश की अर्थव्यवस्था बेहतर तरीके से तब काम करती है जब उस पर राजनीतिक व्यवस्था का हस्तक्षेप न्यूनतम या शून्य हो।   

उनके अदृश्य हाथ के सिद्धांत का सार यह था कि बाजार और लोगों की भावनाएं ही वस्तुओं की कीमतें निर्धारित करने और समग्र अर्थव्यवस्था के विकास का एहसास कराने के लिए पर्याप्त हैं। लोगों की अपनी जरूरतों को पूरा करने और अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने से बाजार में ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जो समग्र रूप से अर्थव्यवस्था और समाज के लिए लाभदायक होती है।  

अपनी पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ में उन्होंने कराधान के सिद्धांतों का भी वर्णन किया है, जो आधुनिक कर प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य विशेषताएं हैं। इन सिद्धांतों को भारत सहित कई आधुनिक कराधान अर्थव्यवस्थाओं ने अपनाया और कार्यान्वित किया है।  

कराधान के सिद्धांत का अर्थ

कराधान के सिद्धांत वे विशेषताएँ हैं जो एक अच्छी कर प्रणाली में होनी चाहिए। एक अच्छी कर प्रणाली कहलाने के लिए, कर में समानता, निश्चितता, सरलता, और सुविधा जैसी विभिन्न विशेषताएँ आवश्यक हैं। जब कोई सरकार अपने राष्ट्र के लिए एक विस्तृत कराधान प्रणाली तैयार करती है, तो उसे इन सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए।  

इन सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वाले व्यक्ति के बारे में जानने के बाद, हम एडम स्मिथ द्वारा दिए गए चार प्रमुख कराधान के सिद्धांतों को समझेंगे।  

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत  

कराधान के सिद्धांत कर संग्रह प्रणाली को प्रभावी और कार्यात्मक बनाने के लिए मार्गदर्शक नियम और सिद्धांत हैं। सरकार को एक ऐसी संरचना बनानी होती है जो कर संग्रह को सरल और प्रभावी बना सके। इसके लिए कुछ नियमों और सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है। लेकिन कोई भी सिद्धांत पूर्ण और अंतिम नहीं हो सकता, क्योंकि समाज की प्रकृति गतिशील (डायनामिक) है।  

एक प्रगतिशील समाज में हमेशा परिवर्तन होते रहते हैं, और इन परिवर्तनों को सरकार को अपनाना होता है ताकि कर संग्रह तंत्र प्रभावी और कुशल बना रहे। एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वेल्थ ऑफ नेशंस’ में चार सिद्धांत दिए थे। इन्हें एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत भी कहा जाता है। 

ये चार सिद्धांत निम्नलिखित हैं:  

  • समानता का सिद्धांत 
  • निश्चितता (सर्टेनिटी) का सिद्धांत
  • सुविधा का सिद्धांत  
  • अर्थव्यवस्था का सिद्धांत

अब हम इन प्रत्येक सिद्धांतों को विस्तार से समझेंगे।  

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समानता का सिद्धांत  

समानता का अर्थ है सभी को समान रूप से देखना, लेकिन यहां समानता का तात्पर्य उनकी भुगतान करने की क्षमता से है। सभी को समान मानने का मतलब होगा कि कम आय वाले वर्ग को अधिक कर देना पड़ेगा, या उच्च आय वर्ग को कम कर देना पड़ेगा। इसलिए, कर लगाते समय सरकार को यह समझना चाहिए कि व्यक्ति किस आय वर्ग से संबंधित है और उसी के अनुसार कर लगाया जाना चाहिए।  

एडम स्मिथ ने तर्क दिया कि कर आय के अनुपात में होना चाहिए, यानी नागरिकों को अपनी आय के अनुसार कर चुकाना चाहिए, जो वे राज्य की सुरक्षा के तहत अर्जित करते हैं। उनका मानना था कि यह सिद्धांत अमीर और गरीब के बीच के  अंतर को कम करेगा। यदि ऐसा सिद्धांत न हो, तो समय के साथ अमीर और गरीब के बीच का अंतर और बढ़ता जाएगा। सरल शब्दों में, किसी व्यक्ति पर उसकी भुगतान क्षमता के अनुसार कर लगाने से अर्थव्यवस्था में धन का समान वितरण होता है।  

एडम स्मिथ के इस सिद्धांत के आधार पर सरकार ने विभिन्न कर स्लैब बनाए हैं, ताकि व्यक्तियों द्वारा किए गए वित्तीय बलिदान का भार समान हो। समानता का यह सिद्धांत एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के कराधान दर्शन को आधार प्रदान करता है।  

एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था में एक ऐसा कराधान तंत्र होना चाहिए जो न्यायपूर्ण और तर्कसंगत हो, यहां तक कि आय की पंक्ति में खड़े सबसे अंतिम व्यक्ति के लिए भी। कराधान प्रणाली में समानता समाज के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है। भारत एक 5 ट्रिलियन डॉलर की नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी) की ओर बढ़ रहा है, और जल्द ही इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा।  

किसी देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के विकास के लिए कैसी नीतियां अपनाता है। भारत में कर लगाने और संग्रह करने के लिए करदाताओं को वार्षिक आय के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक आय श्रेणी के लिए अलग-अलग कर स्लैब निर्धारित किए गए हैं। इन स्लैब के तहत व्यक्ति को अपनी वार्षिक आय के अनुसार कर का एक निश्चित प्रतिशत देना होता है। आय जितनी अधिक होगी, कर स्लैब और कर प्रतिशत उतना ही अधिक होगा।  

व्यक्तियों को विभिन्न कर श्रेणियों में वर्गीकृत करना भारत के आयुपरि (प्रॉपर्शनल) कराधान प्रणाली को सही ठहराता है। हालांकि, उच्च स्तरीय लेखा सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण, अक्सर निम्न आय वर्ग को अधिक कर देना पड़ता है। भारत में उच्च और निम्न कर स्लैब के निवासियों की क्रय शक्ति समान हो सकती है, लेकिन उनके पास बची हुई व्यय योग्य आय असमान रहती है।

भारत में करों के प्रकार

 

भारत में करों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:  

प्रत्यक्ष कर 

प्रत्यक्ष कर वे कर हैं जो सरकार द्वारा व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थाओं पर लगाए जाते हैं, जिनका बोझ और दायित्व पूरी तरह से करदाता पर ही होता है। यह कर व्यक्ति द्वारा देश में आय अर्जित करने के आधार पर लगाया जाता है। यह प्रणाली इस तरह से डिज़ाइन की गई है कि कर स्लैब प्रगतिशील रूप में तय किए गए हैं, जिससे जैसे-जैसे आय बढ़ती है, कर की दर भी बढ़ती जाती है, जैसे कि व्यक्तिगत आय कर।  

प्रत्यक्ष करों को केंद्र सरकार सीधे एकत्र करती है और इनका नियमन केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा किया जाता है।  

प्रत्यक्ष करों के उदाहरण: आय कर, निगमित (कॉर्पोरेट) कर, प्रतिभूति (सिक्योरिटीज) लेनदेन कर, पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) कर, उपहार कर, संपत्ति कर है। भारत में आय कर की दरें हर आगामी वर्ष के लिए सरकार द्वारा तय की जाती हैं और इन्हें बजट में घोषित किया जाता है। पिछले वर्ष की तुलना में कर दरों में संशोधन, आय कर अधिनियम, 1961 में संशोधन करके और नए वित्तीय अधिनियमों तथा सर्कुलर के माध्यम से किया जाता है।  

संशोधित और अद्यतन कर व्यवस्थाएं और छूटें नए वित्तीय अधिनियम में उल्लिखित होती हैं, और नया अधिनियम पिछले अधिनियमों को प्रतिस्थापित करता है। आय कर अधिनियम, 1961 और संबंधित कानूनों में पूरे वर्ष संशोधन किए जाते हैं ताकि कर प्रणाली को उन्नत और अद्यतन बनाया जा सके।  

वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए आय कर की अद्यतन दरें वार्षिक बजट 2024-25 और वित्त (संख्या 2) अधिनियम 2024 के आधार पर वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए लागू आय कर की दरें निम्नलिखित हैं:  

आय कर स्लैब (रु. में) आय कर दर (%)
0 से 3,00,000 तक 0%
3,00,001 से 7,00,000 तक 5%
7,00,001 से 10,00,000 तक 10%
10,00,001 से 12,00,000 तक 15%
12,00,001 से 15,00,000 तक 20%
15,00,001 और उससे अधिक 30%

यह ऊपर की तालिका से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे किसी व्यक्ति की आय बढ़ती है, वैसे-वैसे कर दर भी बढ़ती है। इसके अलावा, ये कर उन लोगों पर लागू होते हैं जो आय उत्पन्न करने वाली आयु (18-60 वर्ष) में आते हैं। वरिष्ठ नागरिक समूह अर्थात् 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग और सुपर वरिष्ठ नागरिक समूह अर्थात् 80 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग अलग-अलग कर दरों और छूटों के पात्र होते हैं।  

अप्रत्यक्ष कर 

अप्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जो सरकार द्वारा वस्त्रों और सेवाओं की बिक्री और खरीद पर लगाए जाते हैं। यह कर हस्तांतरणीय होता है क्योंकि इसे आसानी से कर प्रणाली की श्रृंखला में किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को आसानी से उत्पाद के अंतिम उपभोक्ता को हस्तांतरित किया जा सकता है और उपभोक्ता को कर चुकाने की जिम्मेदारी होती है। जी एस टी को भारतीय कर प्रणाली का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है और इसने अगस्त 2024 में 1.50 लाख करोड़ रुपये का राजस्व (रेवेन्यू) उत्पन्न किया, जो अगस्त 2023 में संग्रहित 1.41 लाख करोड़ रुपये से 6.5% अधिक था।  

भारत में अप्रत्यक्ष करों के उदाहरण हैं: वी ए टी, जी एस टी, उत्पाद शुल्क, कस्टम शुल्क आदि। हालांकि भारत में अप्रत्यक्ष करों की विविधताएं हैं, जिनमें जी एस टी प्रमुख है। जी एस टी के लागू होने के बाद, इसने कई केंद्रीय करों को प्रतिस्थापित कर दिया जैसे कि अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, चिकित्सा और शौचालय तैयारी (उत्पाद शुल्क) अधिनियम 1955 के तहत उत्पाद शुल्क और वस्त्र उत्पादों के तहत अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त कस्टम शुल्क, सेवा कर, सरचार्ज और सेस, साथ ही केंद्रीय बिक्री कर।  

जबकि राज्यों द्वारा लगाए गए कर जैसे राज्य वीएटी/विक्रय कर, खरीद कर, मनोरंजन कर, विलासिता कर, प्रवेश कर (सभी रूपों में), लॉटरी पर कर (जुआ और सट्टेबाजी सहित), सरचार्ज/सेस और विज्ञापन पर कर भी जी एस टी द्वारा प्रतिस्थापित किए गए।  

जहां तक अप्रत्यक्ष करों की बात है, 2021-2022 के वित्तीय वर्ष में अप्रत्यक्ष कर संग्रह में पिछले वर्ष के संग्रह की तुलना में 216946 करोड़ रुपये (20%) का इजाफा हुआ। अप्रत्यक्ष करों की वार्षिक वृद्धि दर जो वित्तीय वर्ष-2018 में 5.8% से घटकर वित्तीय वर्ष-2020 में 1.76% हो गई थी, वित्तीय वर्ष-21 और वित्तीय वर्ष-22 में ऊपर की ओर बढ़ी।  

अप्रत्यक्ष करों की वृद्धि ने जी एस टी और कस्टम शुल्क के संग्रह में वृद्धि में योगदान दिया है। 2022 में जी एस टी संग्रह में 27% की वृद्धि हुई और कस्टम शुल्क में वित्तीय वर्ष-21 की तुलना में 48% की वृद्धि हुई।  

कोविड वर्षों के दौरान, अप्रत्यक्ष करों का जी डी पी के अनुपात के रूप में हिस्सा वित्तीय वर्ष-18 में 5.35% से घटकर वित्तीय वर्ष-20 में 4.76% हो गया। हालांकि, वित्तीय वर्ष-21 और वित्तीय वर्ष-22 के दौरान अप्रत्यक्ष करों का जी डी पी अनुपात बढ़कर 5.47% हो गया। अप्रत्यक्ष कर उपभोग आधारित होते हैं और एक अर्थव्यवस्था और बाजार की उपभोग क्षमता पर निर्भर होते हैं।  

उपभोग का निर्भर होना बड़े आर्थिक कारकों जैसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सी पी आई) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यू पी आई) और विभिन्न अन्य कारकों पर होता है। कोविड-19 महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई और भारत ने आर्थिक क्षेत्र में तेजी से सुधार देखा। मजबूत आर्थिक सुधार और कर पालन में सुधार के प्रयासों ने वित्तीय वर्ष-22 में परोक्ष कर संग्रह में वृद्धि की।

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निश्चितता का सिद्धांत 

एडम स्मिथ द्वारा दिया गया एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत निश्चितता का सिद्धांत है। उनके अनुसार, “जो कर एक व्यक्ति को चुकाना है, वह निश्चित और मनमाना नहीं होना चाहिए।” कर की राशि, भुगतान का तरीका, और जिसे यह भुगतान किया जाना है, ये सब निश्चित होना चाहिए ताकि व्यक्ति को पहले से यह जानकारी हो कि उसे कितना कर चुकाना है। यदि कर प्रणाली निश्चित नहीं है, तो यह व्यक्ति के उत्पीड़न का कारण बन सकती है।  

इस निश्चितता के सिद्धांत का यह कहना है कि कर को आयकर अधिकारियों द्वारा मनमाना रूप से तय या लागू नहीं किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कर प्रणाली में निश्चितता की कमी, जैसा कि स्मिथ ने संकेत किया, कर प्रशासन में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इसलिए, एक अच्छे कर प्रणाली में, “व्यक्तियों को उनके वेतन या अन्य आय पर अप्रत्याशित करों से सुरक्षित होना चाहिए; कानून स्पष्ट और विशिष्ट होना चाहिए; कर संग्रहकों को यह निर्णय करने में कम विवेकाधिकार (डिस्क्रिशन) होना चाहिए कि उन्हें करदाताओं का कितना मूल्यांकन करना है; क्योंकि यह एक बहुत बड़ी शक्ति है और इसका दुरुपयोग होने का खतरा होता है।”  

भारतीय कर प्रणाली इस प्रकार से रूपांतरित की गई है कि हर साल का कर स्लैब, चाहे वह प्रत्यक्ष कर जैसे आयकर हो या अप्रत्यक्ष कर जैसे जी एस टी, पहले से ही जुलाई महीने में वार्षिक बजट में घोषित किया जाता है। हालांकि अंतिम केंद्रीय बजट जुलाई महीने में संसद में प्रस्तुत किया जाता है, सरकार का आगामी वित्तीय वर्ष के लिए दृष्टिकोण वाला अंतरिम बजट फरवरी में ही प्रस्तुत किया जाता है।  

बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है और इसे लाइव प्रसारित किया जाता है ताकि नागरिकों को सरकार द्वारा बनाई गई वित्तीय योजना के बारे में जानकारी हो सके और वे विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित नीतियों और निवेश की जानकारी प्राप्त कर सकें, जो कार्यान्वित (एक्जीक्यूट) होने वाली हैं। एक जागरूक नागरिक जानता है कि वह किस आय वर्ग में आता है और वह यह भी देख और गणना कर सकता है कि उसे सरकार को कितने कर का भुगतान करना है। कर संरचना पूरी तरह से समान और स्थिर रहती है और एक बार घोषित किए जाने के बाद पूरे वर्ष के लिए लागू होती है ताकि लोग व्यापार और वित्तीय योजना कर सकें, जैसा कि सरकार द्वारा घोषित कर दरों और स्लैब के आधार पर।  

इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्यक्ति को कर का भुगतान करने में कोई मनमानी नहीं हो। हालांकि, भारत में कर की गणना और आकलन सरल है, कटौती और छूट का दावा करना काफी जटिल है। नागरिकों को अक्सर इन छूटों का दावा करने के लिए कर विशेषज्ञों और पेशेवरों की सहायता की आवश्यकता होती है। कटौती और छूट के विभिन्न प्रकार लोगों को अधिक आय अर्जित करने और अपनी आय पर कर बचाने के लिए प्रेरित करते हैं।  

अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि एक व्यक्ति जो कर चुका रहा है, यदि उसे जटिल तरीके से भुगतान करना पड़ता है, तो यह उसे रोक सकता है क्योंकि उसे कर चुकाने में कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी व्यक्ति को अपने आय से पहले से कटने वाले कर की राशि का पता नहीं होता, तो यह उसे उच्च जोखिम वाले निवेश करने के लिए हतोत्साहित कर सकता है, यदि वह एक व्यवसायी है। इसलिए, कर प्रणाली को निश्चित होना चाहिए और मनमाना नहीं होना चाहिए। अनिश्चितता और मनमानी कर प्रणाली के उद्देश्य को ही नष्ट कर देंगी।

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सुविधा का सिद्धांत  

कराधान का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘सुविधा का सिद्धांत’। जैसा कि शब्द ‘सुविधा’ का अर्थ है इसे आसान, सरल, और आरामदायक बनाना। उनके अनुसार, “हर कर को उस समय या उस तरीके से लिया जाना चाहिए, जब या जिस तरीके से वह योगदानकर्ता के लिए इसे चुकाना सबसे अधिक सुविधाजनक हो।” कर की राशि का भुगतान और भुगतान करने का तरीका उस व्यक्ति के लिए सुविधाजनक होना चाहिए जो इसे चुकता कर रहा है। यदि कर संग्रहण तंत्र जटिल होगा, तो यह योगदानकर्ता को निराशा और असंतोष का कारण बनेगा।  

एक अच्छा कराधान प्रणाली वह है जो योगदानकर्ता के लिए सुविधाजनक हो। आयकर हमेशा निर्धारण वर्ष के पूर्व वर्ष में एकत्र किया जाता है। इसका मतलब है कि कर केवल तभी काटा जाता है जब व्यक्ति द्वारा आय अर्जित की जाती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां कर का बोझ उस योगदानकर्ता पर पड़ेगा, जिसने आय अर्जित नहीं की है।  

आयकर प्राधिकरण उस राशि पर कर नहीं लगा सकता जो अर्जित नहीं की गई है। इससे एक हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां उस राशि पर कर काटा जाए, जो अस्तित्व में नहीं है। इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण पहलू है, आय अर्जित करने के बाद कर संग्रह कैसे किया जाए ताकि यह सुविधाजनक हो। इसका सर्वोत्तम उदाहरण है “स्रोत पर की गई कर कटौती” (टी डी एस)। टी डी एस का मतलब है “कर की कटौती उस स्रोत से, जहां से यह उत्पन्न हुआ हो।”  

यह नियोक्ता की जिम्मेदारी होती है कि वह कर्मचारी के वेतन को उसके खाते में जमा करने से पहले कर की कटौती करें और वह कटौती की गई कर राशि सरकार को समय पर भुगतान करें। यह कर्मचारी को कर चुकाने से मुक्त करता है। प्रौद्योगिकी की तेजी से बढ़ती वृद्धि के कारण, इंटरनेट ने अधिक लोकप्रियता हासिल की है और आजकल यह आसानी से सुलभ है। इसने प्रत्यक्ष करों के ई-भुगतान की शुरुआत की।  

आयकर विभाग कुल लेन-देन की राशि के आधार पर कर की गणना करता है जो एक वित्तीय वर्ष में एक करदाता के स्थायी खाता संख्या (पैन) पर किया जाता है। आजकल सभी बैंक खाते पैन से जुड़े होते हैं और इस कारण आयकर विभाग के कर्मचारियों के लिए यह बहुत आसान हो गया है कि वे किसी व्यक्ति या व्यवसाय पर वित्तीय वर्ष में कुल आय और कर की गणना कर सकें।

व्यक्तियों और व्यवसायों के पास अगर आय के एक से अधिक स्रोत हों तो उन्हें अपनी आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए कर विशेषज्ञों की मदद की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन वेतनभोगी व्यक्तियों के लिए कर की गणना सरल होती है और वे इसे स्वयं दाखिल कर सकते हैं। यदि उन्होंने पिछले वर्ष में अपनी आय वर्ग के आधार पर अपनी कर देनदारी से अधिक कर का भुगतान किया हो, तो वे आयकर रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इस प्रकार, कर का भुगतान और कर रिटर्न दाखिल करना भारत में बहुत सरल हो गया है। इसके अलावा, कर का नियमित रूप से भुगतान करना व्यक्तियों और व्यवसायों की स्वच्छ और विश्वसनीय क्रेडिट पुनर्भुगतान क्षमता को दर्शाता है।  

करों का ई-भुगतान करने के लिए केवल दो चीजों की आवश्यकता होती है, एक इंटरनेट कनेक्शन और एक नेट बैंकिंग सक्षम खाता एक अनुमोदित बैंक में। यदि करदाता के पास नेट बैंकिंग सक्षम खाता नहीं है, तो वह किसी अन्य व्यक्ति के नेट बैंकिंग सक्षम खाते का उपयोग करके ई-भुगतान कर सकता है, लेकिन कर उसके नाम पर ही भुगतान किया जाना चाहिए। जो योगदानकर्ता है, उसे बस आयकर विभाग की वेबसाइट पर लॉगिन करके प्रक्रिया का पालन करना होता है। इन सभी बातों ने कर संग्रहण तंत्र को सुविधाजनक बना दिया है।  

अगर करदाता और आयकर विभाग के बीच कर की गणना और हिसाब को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो वह कर कार्यालय में कर अधिकारी से संपर्क कर सकता है। यदि कर अधिकारी के तहत मामला हल नहीं होता है, तो करदाता के पास कर आयुक्त और फिर अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) तथा उच्च न्यायालय तक जाने का अधिकार होता है। इस प्रकार, सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या व्यवसाय पर लगाए गए कर की राशि अंतिम नहीं होती। इस संदर्भ में संस्थाएं और अदालतें हैं जहाँ कोई भी प्रभावित पक्ष कर संबंधी मामलों के समाधान के लिए अपील कर सकता है और राहत प्राप्त कर सकता है।  

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आर्थिकता का सिद्धांत  

एक अच्छी कर प्रणाली वह है जहाँ कर एकत्र करने की लागत एकत्रित राशि के मुकाबले बहुत कम हो। सरकार हमेशा कर संग्रहण पर होने वाले खर्च को कम करने का प्रयास करेगी ताकि उसके खजाने में बड़ी राशि जमा हो सके। कर संग्रहण का मुख्य उद्देश्य सरकार के लिए राजस्व उत्पन्न करना है, लेकिन जब खर्च बढ़ जाता है, तो यही उद्देश्य विफल हो जाता है। एगडम स्मिथ का कहना है, “हर कर को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि यह लोगों की जेब से जितना संभव हो उतना कम निकाल कर राज्य के सार्वजनिक खजाने में डाले।” 

 

इसलिए, कर संग्रहण के तरीके को अपनाते समय यह आर्थिकता का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। जैसा कि पहले बताया गया, तकनीकी प्रगति के कारण कर का भुगतान करना अब एक सरल कार्य बन गया है। सरकार के दृष्टिकोण से, तकनीकी प्रगति ने उन खर्चों को कम किया है जो अगर तकनीकी का अभाव होता तो कर संग्रहण में होने वाले थे। बिना तकनीकी प्रगति के कर प्रणाली में, हम यह नहीं सोच सकते कि सरकार कर संग्रहण में कितनी बड़ी राशि खर्च कर सकती थी।  

एडम स्मिथ के कर सिद्धांतों के अलावा, अर्थशास्त्री चार्ल्स एफ. बैस्टेबल ने भी हमें आधुनिक कर सिद्धांत दिए हैं। एडम स्मिथ के सिद्धांत कर प्रणाली के मौलिक सिद्धांत थे, जबकि ये बाद में आधुनिक समस्याओं को हल करने के लिए जोड़े गए थे।

आधुनिक कर सिद्धांत  

सरलता का सिद्धांत  

एक साधारण कर संरचना सरकार के लिए अधिक राजस्व उत्पन्न करना चाहिए। जहाँ कर संरचना पूरी तरह से सरल होती है, वहाँ यह भ्रम उत्पन्न नहीं करती और समझने में आसान होती है। कर दरें सरल होनी चाहिए। जहाँ यह जटिल होती है, वहाँ यह भ्रम उत्पन्न कर सकती है और इसके परिणामस्वरूप योगदानकर्ता उस कर का भुगतान करने से बच सकता है।  

सरलता का सिद्धांत अन्य सिद्धांतों के साथ कर प्रणाली के प्रभावी और कुशल संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जीएसटी एक ऐसा उदाहरण है जो लोगों को विभिन्न करों की जटिलताओं में उलझे बिना कर चुकाने के लिए प्रोत्साहित करता है। जीएसटी ने कर संरचना को सरल और उत्पादक बना दिया है।  

उत्पादकता का सिद्धांत  

कर लगाने से उत्पादकता के नियमों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, अर्थात अर्थव्यवस्था में उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए। कर राशि को मनमाने तरीके से तय और लागू नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे लोगों को अर्थव्यवस्था में और निवेश करने से हतोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह कर देश के बड़े प्रभावशाली लोगों के पक्ष में लगाया जाए। सरकार को इस तरह से कर लागू करना चाहिए कि वह उत्पादक हो, यानी पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करे।  

एक देश तभी फलता-फूलता है जब सरकार नागरिकों को उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए निजी संपत्ति बनाने की अनुमति देती है। चूँकि भारत एक कल्याणकारी (वेलफेयर) लोकतंत्र है, यह कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी राज्य के सिद्धांत को बढ़ावा देता है। भारतीय राजनीति-आर्थिक प्रणाली पूंजीवाद और समाजवाद का मिश्रण है। भारत आर्थिक समृद्धि और समाज के समग्र उत्थान के लिए लक्षित है।

लोच (इलास्टिसिटी) का सिद्धांत  

कर संरचना को इस हद तक लचीला होना चाहिए कि यह आर्थिक वृद्धि के साथ साथ चले। जब लोगों की आय में वृद्धि होती है, तो सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा। यह अप्रत्यक्ष करों के मामले में सबसे अच्छा लागू होता है। उदाहरण के लिए, उच्च मूल्य वाले सामान या विलास वस्त्रों और सेवाओं पर उच्च कर लगाना। इसी तरह, जब लोगों की आय में कमी आती है, तो कर भी उसी हिसाब से घटा दिया जाएगा।  

उपरोक्त व्याख्या को भारतीय सरकार की उस पहल से बेहतर तरीके से समर्थन मिलता है जिसमें जुआ, अटकलें और अनियंत्रित क्रिप्टोकरेंसी व्यापार पर 30% कर दर लगाया गया है, बिना किसी कटौती के। विलास कर भी उच्चतम विलास कारों, उच्चतम उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स आदि पर 28% जीएसटी कर स्लैब पर लगाया जाता है। इस प्रकार, जो लोग विलास उत्पादों को वहन कर सकते हैं, उन्हें उच्च कर राशि का भुगतान करना होता है, जो अंततः सरकार के खजाने में जमा होती है।  

विविधता का सिद्धांत  

विविधता का सिद्धांत यह कहता है कि एक ऐसा कर नहीं होना चाहिए जिसकी दरें बहुत उच्च हों, बल्कि कई करों को कम दरों के साथ होना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि उच्च कर चुकाने वाला व्यक्ति कर से बचने का प्रयास करेगा। विविधता का सिद्धांत निवेशों को बढ़ावा देता है और आर्थिक विकास की दिशा में योगदान करता है। मानव मनोविज्ञान के संदर्भ में, एक व्यक्ति एक उच्च दर वाले कर का भुगतान करने से बच सकता है, लेकिन कई कम दर वाले करों का भुगतान करने से नहीं बचता।  

विविधता के नियम का एक अन्य लाभ यह है कि कई कम दर वाले करों को लागू करने से अन्य लोग, जिनकी आय कम है, कर प्रणाली के दायरे में आ सकते हैं, जिससे निम्न आय समूह द्वारा राज्य के खजाने में योगदान होगा।

तत्कालिता (एक्सपीडियंसी) का सिद्धांत  

इस सिद्धांत के अनुसार, करों का निर्धारण राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तत्कालिता के आधार पर नहीं होना चाहिए। कुछ व्यावहारिक विचार होते हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए। करों को सभी क्षेत्रों जैसे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक से स्वीकार्य होना चाहिए। यह सिद्धांत जन स्वीकृति प्राप्त करने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जो कर लगाए जाते हैं, वे अन्यायपूर्ण नहीं होते और देश के लोगों पर बोझ नहीं डालते।  

क्या ये करों के सिद्धांत जो एडम स्मिथ द्वारा दिए गए थे, अभी भी भारत के आधुनिक कर प्रणाली में प्रासंगिक हैं? चलिए, इसके उत्तर को जानने के लिए अगले शीर्षक की ओर बढ़ते हैं।  

एडम स्मिथ के करों के सिद्धांतों का आधुनिक भारतीय कर प्रणाली से संबंध  

कोई संदेह नहीं है कि करों के सिद्धांतों ने आधुनिक अर्थव्यवस्था में कई तरीकों से मदद की है। कर प्रणाली को सरल बनाने से लेकर, ताकि अधिक लोग कर चुकाने के लिए तैयार हों, से लेकर, तकनीकी क्षेत्र में प्रगति तक ताकि कर रिटर्न दाखिल करना परेशानी मुक्त और आसान हो सके। भारत में कर प्रणाली में 1991 के बाद महत्वपूर्ण बदलाव आए, जब भारतीय अर्थव्यवस्था एक नियोजित और घरेलू अर्थव्यवस्था से खुली बाजार अर्थव्यवस्था में बदल गई।  

एडम स्मिथ एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के समर्थक थे, जहाँ सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो। भारत में कर प्रणाली को इस प्रकार क्रांतिकारी रूप से बदला गया ताकि यह एक बाजार अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों को पूरा कर सके। भारत में, कर प्रणाली इस तरह से विकसित की गई है कि इसमें एडम स्मिथ द्वारा बताए गए सिद्धांतों की कई विशेषताएँ हैं। योजना और वित्त आयोग ने हमेशा नागरिक केंद्रित कर कानून बनाने की कोशिश की ताकि उन्हें बिना किसी जटिलता के लागू किया जा सके। एक समान कर प्रणाली, उचित और निश्चित कर भुगतान की राशि, कर का ऑनलाइन भुगतान जो आसान भुगतान को बढ़ावा देता है, ये कुछ विशेषताएँ हैं जो एडम स्मिथ के सिद्धांतों में शामिल हैं और जिन्हें भारतीय कर प्रणाली ने अपनाया है।  

अप्रत्यक्ष करों की प्रणाली को सुव्यवस्थित करना और जीएसटी का कार्यान्वयन, कर के परिसंचारी (कैसकेडिंग) प्रभावों को समाप्त करने और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के प्रभावी कार्यान्वयन में मदद करता है। कर नियमों और प्रासंगिक कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो सभी करों के सिद्धांतों को संतुष्ट करता हो, हालांकि नीति निर्माता जितना संभव हो सके कर सिद्धांतों के साथ मेल करने की कोशिश करते हैं। एक अच्छी कर प्रणाली और कर संग्रहण में पारदर्शिता सरकार को अधिक धन प्रदान करती है।  

अधिक धन के साथ सरकार आसानी से देश के बुनियादी ढांचे और प्रशासन की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। इससे अन्य देशों से कर्ज लेने की संभावना कम हो जाती है। यह सरकार के कर्ज पोर्टफोलियो को कम करने में मदद करता है और लंबे समय में अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बना देता है।  

हालांकि एडम स्मिथ ने लगभग 200 साल पहले करों के सिद्धांत दिए थे, ये आधुनिक समय में भी काफी प्रासंगिक हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं वाले देश आज भी स्मिथ द्वारा दिए गए इन कर सिद्धांतों को अपनाते हैं। ये सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगे क्योंकि ये कर प्रणाली के मूलभूत और पारंपरिक गुण हैं।

निष्कर्ष  

ये करों के सिद्धांत सफल कर प्रणाली का असली रहस्य हैं। इनका पालन न करने से पूरी संरचना ध्वस्त हो सकती है और समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं जिनका केवल एक समाधान है, अर्थात् उपर्युक्त सिद्धांतों का पालन करना। लेकिन, हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि ये सिद्धांत समग्र नहीं हैं। समय के साथ, नए सिद्धांतों का विकास हो सकता है जो उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सबसे उपयुक्त होंगे। भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, इसलिए नए सिद्धांतों का विकसित होना स्वाभाविक है।  

चूंकि भारत $5 ट्रिलियन के नाममात्र जीडीपी के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है, विभिन्न तरीकों और कर उपायों के माध्यम से व्यवसाय और आय वर्ग के लोगों का समर्थन न केवल नागरिकों में सकारात्मक भावना उत्पन्न करेगा, बल्कि उन विदेशी निवेशकों के मन में भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा जो भारत में निवेश के अवसर तलाश रहे हैं। पूरी दुनिया भारत को एक संभावित ‘डार्क हॉर्स’ के रूप में देखती है, जो निवेशों पर महत्वपूर्ण लाभ उत्पन्न कर सकता है।  

कर प्रणाली का सरलीकरण और व्यवसाय करने में आसानी के विचारों का पालन करना केवल उस धक्के को बढ़ाएगा जो अर्थव्यवस्था को ऊपर की ओर धकेलता है। हालांकि भारतीय कर प्रणाली ने बहुत बेहतर स्तर तक विकास और उन्नति की है, फिर भी हर समय हो रहे उच्च स्तर के वित्तीय लेनदेन को पूरा करने के लिए बहुत अधिक प्रगति की आवश्यकता है।  

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (एफ ए क्यूस)

कर प्रोत्साहन क्या है?

कर प्रोत्साहन एक वित्तीय उपकरण है जिसका उपयोग सरकार किसी विशेष लेनदेन या व्यापार पर कर दर को घटाने या पूरी तरह से कर से छूट देने के लिए करती है ताकि उसे जनता के बीच बढ़ावा दिया जा सके और उसे प्रोत्साहित किया जा सके। यदि किसी विशेष क्षेत्र/व्यवसाय को करमुक्त कर दिया जाता है, तो उस क्षेत्र के तहत वित्तीय लेनदेन बढ़ेंगे, जो अंततः उस व्यवसाय को बढ़ावा देंगे। कर प्रोत्साहन और छूट भी सरकार द्वारा विशेष उद्योगों को प्रदान की जाती हैं यदि वे गिरावट के कगार पर हों या वर्षों से नकारात्मक राजस्व दिखा रहे हों।

जी एस टी क्या है?

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जी एस टी) एक अप्रत्यक्ष कर सुधार (रिफॉर्म) है जिसे भारत सरकार ने केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 के तहत पेश किया। इसे भारत में अधिकांश वस्तुओं और सामग्रियों पर वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) को समाप्त करने और प्रतिस्थापित करने के लिए पेश किया गया था। जी एस टी ने वस्तुओं और सेवाओं के लिए अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बना दिया है और कर की गणना उत्पादन के अंत में किया जाता है जब उपभोक्ता वस्तु को खरीदता है। जी एस टी ने वस्तुओं और सामग्रियों को पांच कर स्लैब्स में विभाजित किया है, अर्थात् 0%, 5%, 12%, 18%, और 28% क्रमशः।

सी बी डी टी क्या है? 

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सी बी डी टी) एक सांविधिक निकाय है जिसे 1963 में केंद्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 के तहत स्थापित किया गया था। यह निकाय आयकर विभाग की संरचना का कार्यक्रम बनाता है, कर संग्रहण और आकलन के उपायों का निर्माण करता है, कर चोरी और कर बचाव की नीतियों को लागू करने को सुनिश्चित करता है, शिकायत समाधान से संबंधित कार्य करता है, और निरीक्षण विभाग आदि का संचालन करता है।

आकलन वर्ष क्या है? 

भारत में, कर संग्रहण की सुविधा के लिए वर्तमान वर्ष की 1 अप्रैल से लेकर अगले वर्ष की 31 मार्च तक का समय अवधि को आकलन वर्ष कहा जाता है। इस अवधि के दौरान जो भी कर देयताएँ व्यवसायों और व्यक्तियों पर बनती हैं, उन्हें एकत्र किया जाता है और उनके संबंधित पैन अपडेट किए जाते हैं। आकलन वर्ष के अंत में, यदि वे पात्र होते हैं, तो व्यक्तियों और व्यवसायों को आयकर रिटर्न दाखिल करने की अनुमति दी जाती है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर है?

प्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जो सरकार व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थाओं पर लगाती है, जिनका बोझ और देयता आकलनकर्ता (असेसी) पर ही होता है। व्यक्ति यह कर इस देश में आय अर्जित करने के कारण चुकाता है। जबकि अप्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जो उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर एकत्र किए जाते हैं और उपयोग किए जाते हैं।

टी ए एन क्या है? 

टी ए एन का मतलब है कर संग्रह और कटौती खाता संख्या, जो आयकर विभाग द्वारा उन व्यवसायों या व्यक्तियों को जारी किया जाता है जो स्रोत पर कर संग्रहण या स्रोत पर कर कटौती के लिए जिम्मेदार होते हैं। टी ए एन एक 10 अंकों का अल्फ़ान्यूमैरिक नंबर होता है, जिसमें चार अक्षर, पाँच अंक और अंत में एक अक्षर होता है। टी ए एन भारत में प्रत्येक कटौतीकर्ता (डिडक्टर) के लिए अनिवार्य है।

पैन क्या है? 

पैन का मतलब है स्थाई खाता संख्या , जो आयकर विभाग द्वारा करदाताओं को जारी किया जाने वाला 10 अंकों का अल्फ़ान्यूमैरिक नंबर है। पैन के माध्यम से आयकर विभाग व्यक्तियों और व्यवसायों द्वारा अर्जित आय पर लगने वाले कर की गणना और आकलन करता है।

अच्छे कराधान के सिद्धांत क्या हैं? 

कराधान एक आधुनिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है, इसके बिना एक देश अपनी सर्वोत्तम क्षमता तक कार्य नहीं कर सकता। अच्छे कराधान प्रणाली के सिद्धांतों के संदर्भ में, संग्रहण की कम लागत, गणना में सरलता, कर का भुगतान सरल, आनुपातिक और प्रगतिशील कराधान, देश के सम्पूर्ण क्षेत्र में दरों का सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) आवेदन, और कर विवादों का सुलझाने के लिए आसान और सुलभ उपाय कुछ ऐसे सिद्धांत हैं जो अच्छे कराधान प्रणाली के होते हैं।

क्या एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत निरपेक्ष हैं? 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि ये सलाहकारी और अनुशंसा स्वरूप होते हैं। ये कर संरचनाओं के निर्माण में शामिल नीति निर्धारण संस्थाओं के लिए एक निर्देशिका के रूप में कार्य करते हैं। ये सिद्धांत नीति निर्माण में इस तरह मदद करते हैं कि करदाताओं को कर का बोझ कम महसूस हो।

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों के अलावा और कौन से कराधान के सिद्धांत हैं? 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों के अलावा, अन्य कराधान के सिद्धांत हैं – सरलता का सिद्धांत, उत्पादकता का सिद्धांत, लचीलापन का सिद्धांत, और विविधता का सिद्धांत। ये सिद्धांत चार्ल्स एफ. बासटेबल द्वारा दिए गए हैं।

कराधान के सिद्धांत किसी भी कर संरचना के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?

कराधान के सिद्धांत किसी भी आधुनिक कराधान प्रणाली का अभिन्न हिस्सा हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि कर प्रणाली सबसे अनुकूल तरीके से काम करे। ये सिद्धांत यह सुनिश्चित करते हैं कि कर प्रणाली इस तरह रूपांतरित की गई हो, जो सरलता, पारदर्शिता, न्यायसंगत, आर्थिक रूप से व्यावहारिक और अंततः उत्पादक हो।

सरलता का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?

सरलता का सिद्धांत कर प्रणाली के ढांचे को रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कर प्रणाली जटिल न हो और कर देयता की गणना करना आसान हो। एक सरल और आसान कर प्रणाली हमेशा एक जटिल और अत्यधिक जटिल कर गणना संरचना से बेहतर मानी जाती है।

विविधता के सिद्धांत का क्या महत्व है?

विविधता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि कर का बोझ एक ही उच्च दर वाले कर पर न डालकर विभिन्न करों में बांटा जाए। एक उच्च दर वाला कर हानिकारक हो सकता है और यह सार्वजनिक भावनाओं को आहत कर सकता है। इसके अलावा, यह व्यक्तिगत करदाताओं पर एकल उच्च कर बोझ के बारे में असंतोष उत्पन्न कर सकता है। इसलिए, यह हमेशा आवश्यक होता है कि कर का बोझ विभिन्न करों में वितरित किया जाए।

संदर्भ

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