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भारत में पेटेंट से संबंधित उभरते मुद्दों का अवलोकन

भारत में पेटेंट से संबंधित उभरते मुद्दों का अवलोकन

यह लेख लॉसिखो से यूएस इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉ और पैरालीगल अध्ययन में डिप्लोमा कर रहे Tanchok Limboo  द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारत में पेटेंट से संबंधित उभरते मुद्दों के अवलोकन के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

भारत वर्तमान में एक परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। 2013-2014 के वित्तीय वर्ष (फिस्कल ईयर) में दिए गए और पंजीकृत 4,227 पेटेंट से, भारतीय पेटेंट आवेदनों में भी वृद्धि हुई और अनुमानित वृद्धि 31.6% थी। इसने वित्तीय वर्ष 2023-2024 में लगभग दस गुना अधिक और खुद को पीछे छोड़ दिया, जिसमें लगभग 41,010 पेटेंट दिए गए और 15 नवंबर, 2023 तक पंजीकृत किए गए। पेटेंट के महत्व को भारतीय आविष्कारकों, रचनाकारों और डिजाइनरों के बीच पहचाना जा रहा है। फिर भी, भारत में पेटेंट कानूनों में भारत में पंजीकृत इतनी बड़ी संख्या में पेटेंटों का पर्यवेक्षण करने के लिए निरंतर सुधार की आवश्यकता है। लगभग पांच करोड़ बैकलॉग अदालती मामलों के लंबित होने के कारण, दस्तावेज़ प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) में देरी और आम लोगों और उद्यमियों (एंटरप्रेन्योर्स) के बीच जागरूकता की कमी का हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है या विकास दर धीमी हो सकती है।

भारतीय पेटेंट प्रणाली के भीतर के मुद्दों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है आंतरिक मुद्दे और बाहरी मुद्दे, भारत में पेटेंट कानून की संचालन (ऑपरेटिव) प्रकृति से संबंधित आंतरिक मुद्दे और उन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है क्योंकि कानूनों को वर्तमान सरकार की नीतियों, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर विचार करते हुए सुधार की आवश्यकता है। पेटेंट संरक्षण का दायरा और इसे प्रभावित करने वाले कारक, और तकनीकी विकास जैसे एआई, स्थानिक (स्पेशियल) कंप्यूटिंग और डिजिटल प्रगति जिनकी भारत में पेटेंट प्रणाली से संबंधित अपनी विशिष्ट समस्याएं हैं।

भारत में पेटेंट कानून

पेटेंट की परिभाषा

एक अधिकार जो व्यक्तिगत रूप से सरकार द्वारा आयोजित और प्रदान किया जाता है, जो विशेष रूप से अधिकार धारक / आविष्कारक को दूसरों को उत्पाद या एक प्रक्रिया का उपयोग करने से प्रतिबंधित करने की अनुमति देता है जो अभिनव है और मौजूदा समस्याओं का समाधान प्रदान करता है, एक विशेष अधिकार है जो उत्पाद का उत्पादन, निर्माण और बिक्री करने के लिए पेटेंट के आविष्कारक को अधिकृत करता है। पिछले आविष्कारों में सुधार के लिए भी एक पेटेंट दिया जाता है। पेटेंट प्रदान किए जाने के पश्चात्, पेटेंट धारक को आवेदन की तारीख से 20 वर्ष की अवधि प्रदान की जाती है। 

पूर्व कला

कोई भी उत्पाद या प्रक्रिया जो पहले से ही अस्तित्व में है और किसी भी समय दुनिया में कहीं भी भौतिक या व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हो सकती है, और किसी भी ऐसे व्यक्ति के साथ जिसने पहले से ही ऐसे अस्तित्व की व्याख्या या वर्णन किया है, जो अस्तित्व के किसी भी निर्मित आविष्कार के साथ उपयोग में समान है, पूर्व कला है, और इस तरह, यह साबित करता है कि ऐसा आविष्कार पहले से मौजूद था।

1970 का भारतीय पेटेंट अधिनियम भारत में पेटेंट को नियंत्रित करने वाले मौलिक कानूनी ढांचे के रूप में कार्य करता है। यह पेटेंट देने, बौद्धिक संपदा अधिकारों (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) की सुरक्षा और देश में तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने के लिए मानदंड और शर्तें स्थापित करता है। अधिनियम के कई प्रमुख धारा एक आविष्कार की पेटेंट योग्यता का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण प्रासंगिकता रखते हैं। इन धाराओं में शामिल हैं:

  1. धारा 2 (1) (j): यह धारा एक आविष्कार की परिभाषा प्रदान करती है, जिसमें कोई भी नया उत्पाद या प्रक्रिया (या कोई सुधार) शामिल है जिसमें एक आविष्कारशील कदम शामिल है और औद्योगिक अनुप्रयोग में सक्षम है।
  2. धारा 3: यह धारा पेटेंट के अनुदान के लिए शर्तों की रूपरेखा तैयार करती है, जिसमें नवीनता, आविष्कारशील कदम (गैर-स्पष्टता), और औद्योगिक अनुप्रयोग जैसी आवश्यकताएं शामिल हैं।
  3. धारा 13: यह धारा गैर-पेटेंट योग्य विषय वस्तु से संबंधित है, कुछ ऐसे आविष्कारों की पहचान करता है जो पेटेंट संरक्षण के लिए योग्य नहीं हैं, जैसे वैज्ञानिक सिद्धांत, गणितीय तरीके और साहित्यिक, नाटकीय, संगीत या कलात्मक कार्य।
  4. धारा 29: यह धारा एक पेटेंट की अवधि निर्धारित करती है, जो आम तौर पर पेटेंट आवेदन दाखिल करने की तारीख से 20 साल तक रहती है।
  5. धारा 30: यह धारा पेटेंटकर्ता को प्रदत्त अधिकारों को संबोधित करती है, जिसमें भारत के क्षेत्र के भीतर पेटेंट किए गए आविष्कार को बनाने, उपयोग करने, बेचने और वितरित करने का विशेष अधिकार शामिल है।
  6. धारा 32: यह धारा पेटेंट के अनुदान के विरोध के आधार से संबंधित है, जिससे तीसरे पक्ष को पूर्व कला या अन्य आपत्तियों के आधार पर किसी आविष्कार की पेटेंटयोग्यता को चुनौती देने की अनुमति मिलती है।
  7. धारा 34: यह धारा एक पेटेंट के निरसन (रिवोकेशन) का प्रावधान करती है यदि यह अमान्य पाया जाता है या यदि कुछ शर्तें पूरी नहीं होती हैं, जैसे कि रखरखाव शुल्क का भुगतान करने में विफलता।

पेटेंट योग्यता का परीक्षण तीन आधारों पर किया जाता है, जिसे एनयूएन परीक्षण के रूप में भी जाना जाता है:

  1. नवीनता- उत्पाद या प्रक्रिया का ऐसा कोई अस्तित्व नहीं है, उत्पाद या प्रक्रिया का नवीन होना आवश्यक है।
  2. उपयोगिता- आविष्कार को व्यावहारिक उपयोगिता प्रदान करनी है या समस्या का समाधान प्रदान करना है, आविष्कार को किए गए दावे के अनुसार प्रदर्शन करना आवश्यक है; हालांकि, सट्टा या अस्पष्ट प्रदर्शन व्यावहारिक अनुप्रयोग के दायरे में नहीं है।
  3. गैर-स्पष्ट प्रकृति – कोई भी आविष्कार जो पूर्व कला या उत्पाद या सेवा पहले से मौजूद नहीं है।

भारतीय आईपी कानूनों पर ट्रिप्स समझौते का प्रभाव

भारत 1 जनवरी, 1995 से विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बन गया और ट्रिप्स समझौते का एक पक्ष बन गया। इसके बाद, समझौते को अपनाने के बाद, भारत ने 1970 के पेटेंट अधिनियम में कई संशोधन पेश किए, जिसमें प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण 2005 और 2002 का पेटेंट कानून संशोधन अधिनियम था।

  • पेटेंट अवधि – 1970 के पेटेंट अधिनियम की धारा 53 के तहत दाखिल करने की तारीख के बाद पेटेंट अवधि को बढ़ाकर 20 साल करना।
  • उत्पाद पेटेंट संरक्षण- फार्मास्युटिकल उत्पादों के लिए पेटेंट की सुरक्षा शुरू की।
  • अनिवार्य लाइसेंसिंग – अनिवार्य लाइसेंसिंग तीसरे पक्ष द्वारा आवश्यक है और सरकार द्वारा पेटेंट आविष्कार का उपयोग करने के लिए दी जाती है।
  • फार्मास्युटिकल और बायोटेक पेटेंट- पेटेंट अधिनियम की धारा 3 (d) के तहत, रसायनों (केमिकल्स), बायोटेक, खाद्य प्रसंस्करण, दवाओं और फार्मास्यूटिकल्स का पेटेंट संभव है।

पेटेंट संरक्षण से संबंधित चुनौतियाँ 

अनुदान में देरी और प्रक्रिया 

अनुदान की प्रक्रिया की सुस्त या धीमी प्रकृति – आवेदन प्रक्रिया की तारीख से 2 से 6 साल के भीतर पेटेंट अनुदान की देरी – एक चार-चरणीय प्रक्रिया है। प्रक्रिया की शुरुआत आवेदन दाखिल करने और प्रकाशन के साथ शुरू होती है, जिसमें 18 महीने तक का समय लग सकता है, जैसा कि 1970 के पेटेंट अधिनियम की धारा 11 A के तहत उल्लेख किया गया है। कई प्रकार के आवेदन हैं, जैसे साधारण पेटेंट आवेदन, पीसीटी राष्ट्रीय चरण पेटेंट आवेदन आदि।

फिर, दूसरा, पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 11B के अंतर्गत उल्लिखित खोज और परीक्षण का अनुरोध करने की प्रक्रिया, जिसे पेटेंट दाखिल करने की तारीख/प्राथमिकता की तारीख के 48 महीनों के भीतर दायर किया जाना होता है। पेटेंट की परीक्षण एक परीक्षक द्वारा आयोजित किया जाता है, जो आपत्तियों वाली परीक्षण रिपोर्ट जारी करने के लिए विवेक का प्रयोग करता है।

तीसरा चरण परीक्षक द्वारा जारी परीक्षण रिपोर्ट में उठाई गई आपत्तियों के खिलाफ प्रतिक्रिया दर्ज करना है। परीक्षण रिपोर्ट जारी होने की तारीख के 12 महीने के भीतर दर्ज करनी होगी। इस प्रक्रिया को पेटेंट अभियोजन भी कहा जाता है। परीक्षण रिपोर्ट पर सभी आपत्तियों का उत्तर दिए जाने के बाद, यदि परीक्षक प्रतिक्रियाओं से संतुष्ट है, तो वह पेटेंट के अनुदान के लिए एक आदेश आगे रख सकता है।

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पेटेंट कानूनों की जटिलता 

पेटेंट कानून अलग-अलग देशों में भिन्न होते हैं, और उनकी व्याख्या नेविगेट करने के लिए जटिल और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यह जटिलता आविष्कारकों और व्यवसायों के लिए पेटेंट प्राप्त करने और बनाए रखने की आवश्यकताओं को समझना और उनका पालन करना मुश्किल बना सकती है, संभावित रूप से छूटे हुए अवसरों या कानूनी जटिलताओं का कारण बन सकती है।

नवाचार और प्रतिस्पर्धा को संतुलित करना 

पेटेंट प्रणाली का उद्देश्य बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाना है। हालांकि, इस संतुलन को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि अत्यधिक व्यापक या प्रतिबंधात्मक पेटेंट नवाचार को रोक सकते हैं और बाजार में नए प्रतिस्पर्धियों के प्रवेश में बाधा डाल सकते हैं। एक स्वस्थ और गतिशील नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए सही संतुलन खोजना महत्वपूर्ण है।

पेटेंट योग्यता मानदंड 

यह निर्धारित करना कि क्या कोई आविष्कार पेटेंट योग्यता के मानदंडों को पूरा करता है, जैसे नवीनता, गैर-स्पष्टता और औद्योगिक प्रयोज्यता (इंडस्ट्रियल  ऍप्लिकेबिलिटी), व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। पेटेंट परीक्षकों को कारकों की एक विस्तृत श्रृंखला का मूल्यांकन करना चाहिए और तकनीकी विशेषज्ञता और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है और इसके परिणामस्वरूप पेटेंट की वैधता पर असंगत निर्णय या विवाद हो सकते हैं।

पेटेंट उल्लंघन और प्रवर्तन (एनफोर्समेंट)

पेटेंट अधिकारों को लागू करना एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है, खासकर सीमा पार उल्लंघन के मामलों में। उल्लंघनकर्ताओं का पता लगाने, जांच करने और कानूनी कार्रवाई करने की प्रक्रिया महंगी और समय लेने वाली हो सकती है। इसके अतिरिक्त, पेटेंट प्रवर्तन की प्रभावशीलता क्षेत्राधिकार और पेटेंट धारकों के लिए उपलब्ध संसाधनों के आधार पर भिन्न हो सकती है।

पेटेंट ट्रोल

पेटेंट ट्रॉल्स का उदय, ऐसी संस्थाएं जो केवल मुकदमों में दूसरों के खिलाफ जोर देने के उद्देश्य से पेटेंट प्राप्त करती हैं, एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन गई हैं। पेटेंट ट्रोल अक्सर आक्रामक मुकदमेबाजी रणनीति में संलग्न होते हैं, यहां तक कि वैध व्यवसायों के खिलाफ, निपटान या लाइसेंस शुल्क निकालने के लिए। यह अनिश्चितता का माहौल बना सकता है और नवाचार को रोक सकता है, क्योंकि कंपनियां पेटेंट ट्रॉल्स द्वारा लक्षित होने के डर से नई तकनीकों में निवेश करने के लिए अनिच्छुक हो सकती हैं।

धारा 3(k) के तहत कंप्यूटर से संबंधित आविष्कार 

1970 के पेटेंट अधिनियम (जिसे इसके बाद पेटेंट अधिनियम कहा जाएगा) की धारा 3 (k) के तहत, गणित, व्यावसायिक विधियों या कंप्यूटर प्रोग्राम या एल्गोरिथ्म से संबंधित आविष्कार को पेटेंट योग्य होने से रोक दिया गया है। यह धारा कठोर और अकर्मण्य (इंडोलेंट) है और स्पष्ट रूप से इस बात को अस्वीकार करती है कि पेटेंट अधिनियम की धारा 3 (k) के तहत उल्लिखित पेटेंट योग्यता का कोई अपवाद नहीं है। कंप्यूटर से संबंधित आविष्कारों (सीआरआई) की जांच के लिए दिशानिर्देशों के अनुसार।

दिशानिर्देश पेटेंट प्रदान करने के लिए इन कारकों को महत्वपूर्ण मानते हैं। इन आविष्कारशील कदमों-तकनीकी उन्नति, नवाचार, और व्यावहारिक अनुप्रयोग-पेटेंट किया जा सकता है। धारा 3 (के) द्वारा पेटेंट योग्यता को रोकने का कारण एक ही तथ्य है कि धारा के तहत दावों में पेटेंट योग्यता के एक या सभी कारकों की कमी है। पेटेंट मैनुअल की धारा 09.03.05.10 पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 3 (के) की व्याख्या करती है, जिसमें, सबसे विशेष रूप से, उपधारा 1 से 4 धारा 3 (k) के तहत उठाए गए दावे के विभिन्न उदाहरणों में दिशानिर्देश प्रदान करते हैं:

  • गणितीय तरीके – उप-धारा 1 के तहत, जिसमें, गणितीय विधियों (मैथमेटिकल मेथड्स) के मामले में, समीकरण के निर्माण (फार्मूलेशन ऑफ़ एक्वेशन्स) के साथ बौद्धिक या अमूर्त (एब्स्ट्रैक्ट) विधि का कोई भी रूप, वर्गमूल और घनमूल खोजना (फाइंडिंग स्क्वायर रूट्स एंड क्यूब रूट्स) पेटेंट योग्य नहीं है। गणितीय तरीकों के पेटेंट योग्य होने के लिए, दावा व्यावहारिक रूप से लागू होना चाहिए; केवल गणितीय सूत्रों को प्राथमिक विषय नहीं होने से पेटेंट योग्यता खारिज नहीं होगी
  • व्यापार के तरीके- पेटेंट मैनुअल की धारा 09.03.05.10 की उप-धारा 2 के तहत, वाणिज्यिक और औद्योगिक उद्यमों और वस्तुओं और सेवाओं के लेनदेन से संबंधित गतिविधियां, दावा की गई विषयवस्तु, यदि यह आविष्कार के लिए आंशिक रूप से या पूरी तरह से तकनीकी प्रक्रिया निर्दिष्ट करती है, तो परीक्षा के लिए विचार किया जा सकता है, या फिर एक व्यावसायिक विधि के लिए दावा, व्यापार, लेन-देन या वाणिज्यिक गतिविधि पेटेंट योग्य नहीं है, जैसा कि व्यावसायिक विधियों के रूप में माना जाएगा। बौद्धिक संपदा बोर्ड (इसके बाद आईपीएबी के रूप में संदर्भित) ने याहू बनाम कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स एंड रिडिफकॉम इंडिया लिमिटेड (2009) में माना कि दायर किया गया आवेदन पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 3 (k) के तहत पेटेंट योग्य नहीं था। आईपीएबी ने माना कि ऐसा आविष्कार धारा 3(k) के बहिष्करण के अंतर्गत आता है और पेटेंट योग्य नहीं है।
  • एल्गोरिदम – उप-धारा 3 के तहत – स्व-व्याख्यात्मक (पेटेंट मैनुअल की धारा 09.03.05.10 की उप-धारा 3 देखें)
  • उपधारा 4 आविष्कार के तहत कंप्यूटर प्रोग्रामों को पेटेंट योग्यता के लिए अस्वीकृत नहीं माना जाएगा; हालांकि, इस श्रेणी के अनुभाग के अनुसार, किसी भी कंप्यूटर प्रोग्राम / निर्देशों / दिनचर्या का सेट और / या सबरूटीन और संबंधित उत्पाद, डेटाबेस, आदि, पेटेंट देने के लिए अभिप्रेत नहीं हैं।

माइक्रोसॉफ्ट टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग, एलएलसी बनाम पेटेंट और डिजाइन के सहायक नियंत्रक (2023) के मामले में, जिसमें माइक्रोसॉफ्ट ने “नेटवर्क स्थान के उप-स्थान के लिए उपयोगकर्ता के प्रमाणीकरण के लिए तरीके और सिस्टम” से संबंधित अपने आविष्कार के पंजीकरण के लिए आवेदन किया था नियंत्रक ने पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 3(k) के तहत पेटेंट योग्य दावे को खारिज करते हुए धारा 15 के तहत आवेदन को भी खारिज कर दिया।

न्यायालय ने धारा 3(k) और पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत उल्लिखित विषयों के बहिष्कार को ध्यान में रखते हुए समझाया कि कंप्यूटर प्रोग्राम की पेटेंट योग्यता को रोकने के लिए “प्रति से” शब्द जोड़ा गया था; फिर भी, पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने तकनीकी उन्नति, आविष्कारशील कदमों, पूर्व कलाओं आदि जैसे आवश्यक कारकों को लागू किया। कंप्यूटर से संबंधित आविष्कार (सीआरआई) से संबंधित पेटेंट प्रदान करने की अनुमति दी है। 

न्यायालय ने कहा कि नियंत्रक ने धारा 3(k) की गलत व्याख्या की थी और इसलिए पेटेंट की अस्वीकृति के लिए एकमुश्त (लम्प सम) नेतृत्व नहीं किया। एक तकनीकी समस्या के लिए तकनीकी समाधान की दिशा में योगदान देने वाले कंप्यूटर डिवाइस में उपयोग किए जाने वाले एल्गोरिथ्म की संभावना; कंप्यूटर प्रोग्राम तकनीकी समस्या के लिए लागू किए जाने वाले तकनीकी समाधान के लिए सिर्फ साधन है।

क्यूंकि दावा किया गया आविष्कार नकारात्मक कारकों को पार कर गया है जैसे कि केवल एक कंप्यूटिंग डिवाइस के यूजर इंटरफेस के लिए उपयोग किया जा रहा है या पहले से ही ज्ञात उपकरणों और गणितीय तरीकों के लिए केवल एक मानार्थ जोड़ है, लेकिन यह सुरक्षा मुद्दों के समाधान भी प्रदान करता है, क्लाइंट कंप्यूटर की पहुंच के लिए दो अलग-अलग कुकीज़ के उपयोग से उपकरणों के एन्क्रिप्शन के समान दो-स्तरीय प्रमाणीकरण प्रक्रिया, जिसने हैकर्स और संभावित डेटा उल्लंघन से कंप्यूटर उपकरणों को सुरक्षित किया, इसलिए न्यायालय ने नियंत्रक द्वारा पारित आक्षेपित  आदेश को रद्द कर दिया और अन्य संदर्भित पूर्व कलाओं के दायरे में आविष्कारशील कदम, नवीनता और तकनीकी उन्नति से संबंधित परीक्षाओं की पुन: परीक्षा के लिए मामले को वापस भेज दिया।

हालाँकि, यह मुद्दा इस तथ्य में निहित है कि कई आविष्कारों को 1970 के पेटेंट अधिनियम की धारा 3(k) के तहत पेटेंट योग्यता से बाहर रखा जा सकता है। इस प्रकार, दुनिया भर में तकनीकी प्रगति और नवाचार को देखते हुए धारा 3(k) बहिष्करण पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

एआई नवाचार की पेटेंट योग्यता: एआई डीएबीयूएस का विश्लेषण

वैज्ञानिक और तकनीकी नवाचार के समकालीन युग ने उन सीमाओं को धक्का दिया है जहां कंप्यूटर या मशीन अपने आप में स्वायत्त रूप से बना और संचालित कर सकते हैं, भले ही एआई को अभी भी न्यूनतम नियंत्रण, कमांड और दिशा की आवश्यकता होती है। एआई तकनीक एक शरीर में एक अंग की तरह निर्विवाद और महत्वपूर्ण है। एआई मशीनों, कंप्यूटर उपकरणों, कारों, ड्रोन, रोबोट आदि का हिस्सा बनता जा रहा है, लेकिन यह भी लगता है कि यह नए आविष्कार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

एआई तकनीक इतनी तेज गति से आगे बढ़ी है कि यह नई प्रक्रियाओं को उत्पन्न करती है और अपने आप नए विचारों का निर्माण करती है। 2019 में, स्टीफन थेलर द्वारा ऐसी एआई  तकनीक बनाई गई थी, जिसे डिवाइस फॉर द ऑटोनॉमस बूटस्ट्रैपिंग ऑफ़ यूनिफाइड सेंटेंस (इसके बाद “डेबुस” के रूप में संदर्भित) के रूप में जाना जाता है। दक्षिण अफ्रीका के पेटेंट कार्यालय ने डेबुस एआई को फ्रैक्टल ज्यामिति के आधार पर एक खाद्य कंटेनर उत्पाद से संबंधित आविष्कार के लिए अपना पहला पेटेंट प्रदान किया, जिसे बौद्धिक संपदा आयोग ने भी स्वीकार कर लिया है।

विभिन्न देशों में “डेबुस” पेटेंट आवेदन दर्ज करने से संबंधित अदालती कार्यवाही

पेटेंट सहयोग संधि आवेदन (बाद में पीसीटी आवेदन के रूप में संदर्भित) विभिन्न देशों में दायर किया गया था, जैसे ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, ब्राजील, कनाडा, जर्मनी, यूरोपीय पेटेंट कार्यालय, और कोरिया गणराज्य।

अस्वीकृति के लिए सामान्य आधार हैं:

  1. आविष्कारक- देश के लगभग सभी पेटेंट कानून एक आविष्कारक को एक प्राकृतिक व्यक्ति के रूप में परिभाषित करते हैं, और देश के पेटेंट कानूनों के अनुसार एक आविष्कारक की परिभाषा एआई पर एक आविष्कारक माने जाने पर लागू नहीं होती है।
  2. कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं- देशों के सभी पेटेंट कानूनों ने एआई को एक आविष्कारक के रूप में मान्यता नहीं दी।
  3. पेटेंट प्रोत्साहन- पेटेंट देने के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक आविष्कारक को उपयोग प्रोत्साहन प्रदान करना है; एआई को एक आविष्कारक के रूप में समान प्रदान करना उसी को रद्द कर देगा।
  4. कानूनी क्षमता- एक गैर-मानव इकाई या मशीन के पास पेटेंट अधिकारों या कॉपीराइट के उल्लंघन के किसी भी रूप में आपत्तियां उठाने या मुकदमा दायर करने की कानूनी क्षमता नहीं है; एक एआई न्यायालय में खुद का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है और यदि आवश्यक हो तो सबूत प्रदान भी नहीं कर सकता है।
  5. कानूनी जटिलता- एआई से प्राकृतिक व्यक्ति को पेटेंट अधिकारों का हस्तांतरण प्रदान करने के लिए कोई कानून नहीं है; एआई के पास कोई मौलिक अधिकार नहीं है और न ही यह संविधान द्वारा प्रदान किए गए किसी भी अधिकार का आनंद लेता है।

व्यापार रहस्य : एआई-जनित और आविष्कार के लिए पेटेंट का एक वैकल्पिक समाधान

क्यूंकि एआई आविष्कारक (​​इन्वेंटोरशिप)  को कानून और संशोधनों के माध्यम से नीति निर्माताओं के समर्थन की आवश्यकता होती है, जिसमें कृत्रिम (आर्टिफिशियल) बुद्धिमत्ता की अवधारणा शामिल है, जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, एआई-संचालित नवाचार वर्तमान में देशों के विभिन्न पेटेंट कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं; इसे हल करने के लिए समय की आवश्यकता होती है, और यह मुद्दा 2019 से आज तक लटका हुआ है।

हालांकि, बनाए गए नवाचार की विशिष्टता को संरक्षित करने के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है, जो ट्रेडमार्क रहस्यों के माध्यम से है। ट्रेडमार्क रहस्यों के फायदे यह हैं कि आविष्कार को सार्वजनिक डोमेन में प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है, असीमित समय है, पंजीकरण शुल्क की आवश्यकता नहीं है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एआई आविष्कार की पेटेंट योग्यता की अनिश्चितता से बचा जाता है।

एक व्यापार रहस्य क्या है

यह सही धारकों के लिए उपलब्ध आईपी अधिकारों में से एक है जो जानकारी को गोपनीय रखता है और सार्वजनिक डोमेन में खुलासा या प्रकाशित नहीं किया जाता है। बेची या लाइसेंस प्राप्त जानकारी को व्यापार रहस्य कहा जाता है। व्यापार रहस्यों को व्यावसायिक रूप से मूल्यवान होना चाहिए; गोपनीय जानकारी केवल लोगों के एक निश्चित समूह के लिए जानी जा सकती है। सूचना की सुरक्षा तकनीकी जानकारी जैसे डिजाइन और फार्मास्युटिकल टेस्ट डेटा दोनों के लिए है। वाणिज्यिक जानकारी जैसे आपूर्तिकर्ताओं और ग्राहकों की सूची, आदि, भी जानकारी का एक संयोजन हो सकती है और इसे रखने से प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलती है।

अनुचित प्रतिस्पर्धा (अनफेयर कम्पटीशन), जासूसी, अनुबंध के उल्लंघन, विश्वास के उल्लंघन आदि के खिलाफ व्यापार रहस्य एक जाने-माने विकल्प हैं, विभिन्न देशों की कई अदालतों में डेबुस मामला, चाहे वह मूल, विशेष या अपीलीय अदालतें हों, सभी का विचार था कि आविष्कारक की परिभाषा केवल एक इंसान या एक प्राकृतिक व्यक्ति को शामिल करेगी जिसने आविष्कार बनाने के लिए अपना दिमाग लगाया है, कुछ समय के लिए यह कानून की तय स्थिति है कि जनरेटिव एआई के उपयोग के साथ गैर-मानव नवाचार के लिए पेटेंट दाखिल करना एक आविष्कारक की परिभाषा के तहत शामिल नहीं किया जाएगा या एक आविष्कारक के रूप में घोषित नहीं किया जाएगा, दक्षिण अफ्रीका एक अपवाद है, हालांकि व्यापार रहस्यों के लिए एक प्राकृतिक व्यक्ति द्वारा बनाए जाने के दायरे में मान्यता प्राप्त होने के लिए एक नवाचार के लिए कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

निष्कर्ष

ट्रिप्स समझौता, नीतियां और कानून सभी नवाचार और उन्नति के लिए तैयार किए गए थे। आविष्कार और तकनीकी उत्कर्ष की सकारात्मक वृद्धि के बावजूद, समकालीन युग बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है, और इस तरह, किसी को आविष्कार के नए तरीकों पर विचार करना चाहिए, चाहे वह एल्गोरिथ्म और प्रोग्रामिंग द्वारा कंप्यूटर डिवाइस से हो या जनरेटिव एआई के माध्यम से। समय ऐसा है कि विकास और आविष्कारकों के लिए अवसरों के व्यापक दायरे के लिए कानूनों में संशोधन करने की आवश्यकता है; शायद एक आविष्कारक का गठन करने की परिभाषा में संशोधन को प्रौद्योगिकी के समग्र विकास पर विचार करते हुए एक बार फिर से जांच करने की आवश्यकता है।

मामलों के बैकलॉग, कार्यवाही में देरी, या पेटेंट अधिकारों द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा के उल्लंघन को छोड़ दिया जाता है यदि नवीनता की अवधारणा का मूल्यांकन नहीं किया जाता है। यद्यपि 1970 का भारतीय पेटेंट अधिनियम कानून है जो इसे नियंत्रित करता है, नवीनता की अवधारणा की भावना को अभी तक अधिनियम में ही आत्मसात नहीं किया गया है। नीति निर्माताओं और पेटेंट कानून विशेषज्ञों को न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में पेटेंट कानूनों को बढ़ाने पर विचार करने की आवश्यकता है।

संदर्भ

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