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हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी और अन्य (1976)

हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी और अन्य (1976)

यह लेख Harshit Kumar द्वारा लिखा गया है। यह हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी एवं अन्य (1976) मामले का विस्तृत विश्लेषण है। इस मामले में एक ऐसी संपत्ति के अविभाजित हिस्से के उपहार (मुशा) की वैधता पर चर्चा की गई है जो विभाज्य है। लेख में उन कारकों पर चर्चा की गई है जो इस मामले में शामिल थे और जो मुशा के उपहार को वैध बनाते हैं। इसमें रेस  जुडिकाटा के सिद्धांत पर आगे चर्चा की गई है और इस बात पर भी चर्चा की गई है कि किस कारण से बॉम्बे उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि यह मामला रेस जुडिकाटा के अंतर्गत नहीं आता है। अंत में, यह इस मामले में उजागर किये गए प्रमुख सिद्धांतों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

मुस्लिम कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को वैध रूप से उपहार में दे सकता है या वसीयत के माध्यम से उसे हस्तांतरित कर सकता है, जो उसकी मृत्यु के बाद प्रभावी होती है। प्रथम उदाहरण को अंतरजीवित प्रबंध (डिस्पोजिशन) के रूप में जाना जाता है, तथा दूसरे उदाहरण को वसीयती प्रबंध के रूप में जाना जाता है। एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी सम्पूर्ण संपत्ति दान कर सकता है, जबकि वसीयत के माध्यम से केवल ⅓ भाग ही दान किया जा सकता है। ‘हिबा’ या साधारण उपहार अंतर-जीव का शाब्दिक अर्थ है ‘किसी ऐसी चीज का उपहार जिससे दानकर्ता को लाभ मिल सके’। तकनीकी अर्थ में, इसे ” बिना शर्त के एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को तुरंत और बिना विनिमय के और दूसरे व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से स्वीकार किया गया संपत्ति का हस्तांतरण” के रूप में परिभाषित किया जा सकता है (हेदया के तहत परिभाषित)। भारत में हिबा को उपहार के समतुल्य समझा जाता है और दोनों में बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति का हस्तांतरण शामिल है। हालाँकि, उपहार का अर्थ हिबा से कहीं अधिक व्यापक है। 

मुशा का सिद्धांत (हिबा-बिल-मुशा) अविभाजित संपत्ति से बना एक प्रकार का उपहार है। इस सिद्धांत को मुस्लिम कानून के दो स्कूलों द्वारा स्वीकार किया जाता है, जो शाफ़ेई और इथना अशरिया शिया हैं। उनके अनुसार, अविभाजित संपत्ति का दान वैध रूप से किया जा सकता है; ऐसे मामले में, दानकर्ता (डोनर) को संपत्ति का कब्जा प्राप्तकर्ता (डोनी) को देना होगा। हिदाया के अनुसार, किसी वस्तु के उस भाग का दान, जिसे विभाजित किया जा सकता है, तब तक वैध नहीं होता, जब तक कि उस भाग को विभाजित न कर दिया जाए, लेकिन अविभाजित संपत्ति का दान वैध होता है। 

हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी एवं अन्य (1976) का मामला अविभाजित हिस्से के उपहार विलेख की वैधता से संबंधित है। यह मामला हयातुद्दीन (याचिकाकर्ता) द्वारा लाया गया था, जिसमें उपहार विलेख की घोषणा की मांग की गई थी, जिसे पिछले मालिक ने उसके पक्ष में निष्पादित किया था। अदालत ने पाया कि मकबूलबी (पूर्व मालिक) का हिस्सा अविभाजित था। लेकिन अदालत ने आगे फैसला दिया कि उपहार वैध है क्योंकि इसे बाद में विभाजित किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि उपहार अनियमित या अपूर्ण हो सकता है लेकिन शून्य नहीं हो सकता है। अदालत इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची, इस पर आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी। 

मामले के तथ्य

लालमिया की मृत्यु 1948 में हुई और वे अपने पीछे घर की संपत्ति छोड़ गए थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं जिनका नाम मकबूलबी और रशीदबी था, और एक बहन थी जिसका नाम अमनबी था। लालमिया की मौत के बाद तीनों को मकान की संपत्ति में हिस्सा मिला, अमनबी को 12 आने, मकबूलबी और रशीदबी को 2-2 आने मिले। 

बाद में, 10/06/1952 को, रशीदबी और अमनबी (दानकर्ताओं) द्वारा एक उपहार विलेख निष्पादित किया गया, जिसमें 1000/- रुपये मूल्य की उनकी घर की संपत्ति हयातुद्दीन (दान प्राप्तकर्ता) को उपहार में दी गई, यह एक अविभाजित घर का हिस्सा था। उपहार विलेख में उल्लेख किया गया था कि मकबूलबी का हिस्सा पहले ही अलग करके उसे दे दिया गया था। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि मकान की संपत्ति का कब्जा विलेख के निष्पादन के तुरंत बाद हयातुद्दीन को सौंप दिया गया था, और उसे पूरे हिस्से का मालिक घोषित किया गया था तथा उसे संपत्ति का अपनी इच्छानुसार उपयोग करने का पूरा अधिकार था। 

अमनबी, रशीदबी और हयातुद्दीन ने 1955 में एक दीवानी मुकदमा दायर किया, जिसमें हयातुद्दीन को उपहार में दी गई संपत्ति का मालिक घोषित करने और संपत्ति को अलग करने की प्रार्थना की गई। इस मुकदमे में मुख्य प्रतिवादी मकबूलबी थी, जिसने तर्क दिया कि यह उपहार विलेख उसके 2 आने हिस्से पर बाध्यकारी नहीं था। महबूलबी, जिन्होंने लालमिया की विधवा होने का दावा किया था, ने भी प्रतिवादी के रूप में मुकदमा लड़ा। जनवरी 1956 में न्यायालय ने पाया कि उपहार से पहले कोई विभाजन नहीं हुआ था; संपत्ति के एक हिस्से का उपहार वैध था, लेकिन यह मकबूलबी की 2 आना संपत्ति पर बाध्यकारी नहीं था। न्यायालय ने एक आदेश पारित कर संपत्ति का विभाजन करने तथा 7/8 भाग को अलग करने का निर्देश दिया, बशर्ते कि मकबूलबी को मेहर का भुगतान किया जाए। लालमिया की विधवा होने के महबूलबी के दावे को खारिज कर दिया गया। 

हयातुद्दीन को कोई राहत नहीं दी गई; इसलिए, रशीदबी और हयातुद्दीन द्वारा एक और मुकदमा दायर किया गया जिसमें हयातुद्दीन को उपहार संपत्ति का मालिक घोषित करने की प्रार्थना की गई। यह तर्क दिया गया कि उपहार विलेख की तारीख से ही उपहार में दी गई संपत्ति पर उनका कब्जा था और उन्होंने किरायेदार भी रखे थे। प्रतिवादी अमनबी ने तर्क दिया कि हेतुद्दीन की दलील को पिछली अदालत ने खारिज कर दिया था और उपहार विलेख शून्य था। उन्होंने तर्क दिया कि पिछली अदालत का निर्णय ‘रेस जुडिकाटा’ के समान है। विचारण न्यायालय ने अमनबी की दलील को खारिज करते हुए कहा कि उपहार विलेख वैध था और हियातुद्दीन उपहार में दी गई संपत्ति का एकमात्र मालिक था। यह भी पाया गया कि पिछली अदालत का निर्णय ‘रेस जुडिकाटा’ नहीं था और अमनबी का उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था। 

मामला निचली अपीलीय अदालत में ले जाया गया। न्यायालय ने विचारण न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया और उपहार विलेख की वैधता पर सवाल उठाया। यह पाया गया कि हयातुद्दीन ने उपहार में दी गई संपत्ति का भौतिक कब्जा उस समय नहीं लिया था जब वह उसे उपहार में दी गई थी और चूंकि उस समय संपत्ति का विभाजन नहीं हुआ था, इसलिए उसके पास संपत्ति के किसी हिस्से का स्वामित्व नहीं है। हालाँकि, न्यायालय ने इस बात पर विचार किया कि 1955 में पारित न्यायालय का निर्णय रेस जुडिकाटा नहीं था। 

इसके बाद यह मामला निचली अपीलीय अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपील के रूप में लाया गया था। 

हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी एवं अन्य (1976) में उठाए गए मुद्दे

इसमें तीन मुख्य मुद्दे उठाए गए, जो इस प्रकार हैं: 

  • क्या 7/8 अविभाजित हिस्से का उपहार वैध था, भले ही अपीलकर्ता (हयातुद्दीन) के पास उपहार विलेख के निष्पादन के बाद कोई भौतिक कब्जा नहीं था और 1952 में उपहार विलेख के निष्पादन के समय संपत्ति अविभाजित थी? 
  • क्या 1955 में न्यायालय द्वारा पारित डिक्री हयातुद्दीन के मुकदमे के विरुद्ध रेस जुडिकाटा के रूप में संचालित हुई, भले ही उस समय उपहार की वैधता पर सीधे तौर पर निर्णय नहीं लिया गया था? 
  • क्या 1955 के मुकदमे में 1955 के मुकदमे के वादी (रशीदबी, अमनबी और हयातुद्दीन) को 1955 के मुकदमे के प्रतिवादी (मकबूलबी) के विरुद्ध राहत प्रदान करने के लिए उपहार की वैधता का पता लगाना आवश्यक था? 

पक्षों के तर्क

अपीलकर्त्ता

  • 7/8 अविभाजित हिस्से का उपहार वैध था, भले ही अपीलकर्ता (हतियातुद्दीन) के पास उपहार में दी गई संपत्ति का कोई भौतिक कब्जा नहीं था और भले ही यह उपहार विलेख के निष्पादन के बाद और उसके दौरान अविभाजित था। 
  • 1955 में न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को रेस जुडिकाटा नहीं माना जा सकता, क्योंकि उस मामले में न्यायालय द्वारा उपहार विलेख की वैधता पर चर्चा नहीं की गई थी। 
  • 1955 के मुकदमे के वादी (रशीदबी, अमनबी और हयातुद्दीन) को 1955 के मुकदमे के प्रतिवादी (मकबूलबी) के विरुद्ध राहत प्रदान करने के लिए 1955 के मुकदमे में उपहार की वैधता तय करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 

प्रतिवादी

  • 7/8 अविभाजित हिस्से का उपहार अवैध था, क्योंकि अपीलकर्ता (हयातुद्दीन) के पास उपहार में दी गई संपत्ति का कोई भौतिक कब्जा नहीं था और इसलिए भी कि यह उपहार विलेख के निष्पादन के बाद और उसके दौरान अविभाजित था। 
  • 1955 में न्यायालय द्वारा पारित आदेश ‘रेस जुडिकाटा’ कहलाता है, क्योंकि विलेख की वैधता के मुद्दे पर पहले ही निचली अदालत में चर्चा हो चुकी थी। 
  • 1955 के मुकदमे के प्रतिवादी (मकबूलबी) के विरुद्ध 1955 के मुकदमे के वादी (रशीदबी, अमनबी और हयातुद्दीन) को राहत प्रदान करने के लिए 1955 के मुकदमे में उपहार की वैधता का निर्णय करना आवश्यक था। 

इस मामले में शामिल कानून/अवधारणाएँ

मुशा (अविभाजित हिस्सा)

‘मुशा’ एक अरबी शब्द है जो ‘सायु’ से बना है जिसका अर्थ है “संपत्ति में अविभाजित हिस्सा”। इस्लामी कानून के तहत, मुशा का तात्पर्य संयुक्त या सह-स्वामित्व वाली संपत्ति के अविभाजित हिस्से से है। इसके अंतर्गत, भले ही संपत्ति का कोई भौतिक विभाजन या बंटवारा न हुआ हो, लेकिन उस संपत्ति के मालिक का संपूर्ण संपत्ति में अविभाजित हित होता है। 

यह मामला रशीदबी और अमनबी द्वारा हयातुद्दीन को दिए गए मुशा के उपहार की वैधता पर चर्चा करता है, भले ही उपहार विलेख के निष्पादन के दौरान संपत्ति को विभाजित नहीं किया गया था, लेकिन यह विभाज्य था। 

अविभाजित हिस्से का विभाजन और कब्ज़ा

इस्लामी कानून के अनुसार, विभाज्य संपत्ति के अविभाजित हिस्से (मुशा) का दान अनियमित (फासीद) है, न कि शून्य (बतिल)। ऐसे उपहार को वैध बनाने के लिए, संपत्ति का विभाजन होना चाहिए और उस संपत्ति का कब्जा दानकर्ता को दिया जाना चाहिए। हालाँकि, यदि संपत्ति अविभाज्य है, तो उपहार वैध रहेगा और अनियमित नहीं होगा। 

इस मामले में मुशा के उपहार की वैधता तय करने के लिए इस पर चर्चा की गई थी।

रेस जुडिकाटा

रेस जुडिकाटा की अवधारणा पर सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 11 के अंतर्गत चर्चा की गई है। इसका अर्थ यह है कि किसी ऐसे मामले पर पुनः मुकदमा नहीं चलाया जा सकता जिस पर पहले ही सक्षम न्यायालय द्वारा निर्णय दिया जा चुका हो। 

धारा 11 की व्याख्या IV में स्पष्ट किया गया है कि कोई मामला जो किसी पूर्ववर्ती वाद में आक्रमण या बचाव का आधार बन सकता है या बन सकता था, वह मामला प्रत्यक्षतः या बाद में वर्तमान वाद में विवाद्यक विषय बन जाएगा। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई मामला पिछले मामले में मुद्दा हो सकता था, लेकिन उसे उठाया या चर्चा नहीं की गई, तो उस मामले को इस प्रकार माना जाएगा जैसे कि उस पर पहले ही चर्चा हो चुकी थी और पिछले मामले में निर्णय हो चुका था। 

इस मामले में, प्रतिवादी पक्ष (अमनबी) का तर्क था कि यह मामला ‘रेस जुडिकाटा’ का गठन करता है, क्योंकि यह पहले ही विचारण न्यायालय द्वारा पहले के मुकदमे में तय किया जा चुका है। न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और निर्णय दिया कि यह मामला रेस जुडिकाटा नहीं है। 

मामले में संदर्भित प्रासंगिक कानून

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने दो महत्वपूर्ण मामलों का उल्लेख किया: 

  • हामिद उल्लाह बनाम अहमद उल्लाह (1936): हामिद उल्लाह बनाम अहमद उल्लाह (1936) का मामला दाता द्वारा निष्पादित उपहार विलेख की वैधता के इर्द-गिर्द घूमता है, जो संपत्ति पर भौतिक रूप से नहीं बल्कि रचनात्मक कब्जे में था, जिसमें छह घर और जमीन के तीन टुकड़े शामिल थे। उपहार विलेख दानकर्ता द्वारा निष्पादित किया गया था, जिसने कहा था कि संपत्ति पर उसका मालिकाना कब्जा है और वह उसी कब्जे को दान प्राप्तकर्ता को हस्तांतरित कर रही है तथा उसे जब भी वह चाहे संपत्ति हस्तांतरित करने का पूर्ण अधिकार है। अदालत ने उपहार को वैध माना, क्योंकि दानकर्ता ने उपहार प्राप्तकर्ता को कब्जा हस्तांतरित करने के लिए हर संभव कदम उठाया था और संपत्ति उस समय उपहार प्राप्तकर्ता के कब्जे में थी। 
  • शेख मोहम्मद मुमताज अहमद बनाम जुबैदा जान (1889): शेख मोहम्मद मुमताज अहमद बनाम जुबैदा जान (1889) का मामला एक संपत्ति में अविभाजित हिस्से (मुशा) के उपहार की वैधता के इर्द-गिर्द घूमता है। सर बार्न्स पीकॉक ने प्रिवी काउंसिल की ओर से बोलते हुए कहा कि मुशा के उपहार से संबंधित प्राधिकारियों को एकत्रित किया गया है तथा सैयद अमीर अली द्वारा 1884 के टैगोर व्याख्यान में उन पर टिप्पणी की गई है। इन अधिकारियों ने यह दिखाने के लिए उल्लेख किया कि अमान्य मुशा के तहत लिया गया कब्ज़ा शिया और सुन्नी दोनों ही संप्रदायों के सिद्धांतों के अनुसार संपत्ति को हस्तांतरित करता है। यह भी देखा गया कि मुशा के उपहार की अमान्यता से संबंधित सिद्धांत एक प्रगतिशील समाज के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त है और इसे सख्त नियमों के भीतर सीमित रखा जाना चाहिए। 

हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी एवं अन्य (1976) में निर्णय

न्यायालय ने निर्णय दिया कि: 

  • जब उपहार विलेख निष्पादित किया गया था, तब अपीलकर्ता (हयातुद्दीन) पहले से ही संपत्ति के एक हिस्से में रह रहा था और संपत्ति में किरायेदार रहते थे, जिन्हें बताया गया था कि रशीदबी और अमनबी ने हयातुद्दीन को घर का मालिक बना दिया है और सभी किराए का भुगतान उसे किया जाना है। इसके अलावा, उपहार विलेख में यह घोषित किया गया था कि कब्जा उपहार प्राप्तकर्ता को दे दिया गया है तथा किरायेदारों को मौखिक रूप से धमकाया गया था। इससे पता चला कि दानकर्ताओं ने दान को प्रभावी बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया था; इसलिए, पूर्व विभाजन के अभाव के बावजूद 7/8 अविभाजित हिस्से का दान वैध था। 

  • 1955 के मुकदमे में उपहार विलेख की वैधता पर चर्चा और निर्णय नहीं किया गया था; इसलिए, इस मुद्दे पर पुनः चर्चा नहीं की गई थी; इसलिए, यह मामला रेस जुडिकाटा गठित नहीं करता है। 
  • 1955 के मुकदमे में, अपीलकर्ता और प्रतिवादियों (जो उस मुकदमे में वादी थे, अमनबी, रशीदबी और हयातुद्दीन) को राहत प्रदान करने के लिए उपहार विलेख की वैधता पर निष्कर्ष आवश्यक नहीं था, क्योंकि पक्षों के बीच कोई हितों का टकराव नहीं था 
  • हयातुद्दीन की अपील स्वीकार कर ली गई थी। 

इस निर्णय के पीछे तर्क

  • संपत्ति के अविभाजित हिस्से पर उपहार विलेख की वैधता पर न्यायालय का निर्णय हामिद उल्लाह बनाम अहमद उल्लाह (1936) और शेख मोहम्मद मुमताज अहमद बनाम जुबैदा जान (1889) के मामलों का संदर्भ देते हुए किया गया था। 
  • न्यायालय द्वारा यह घोषित करने का निर्णय कि मामला रेस जूडीकेटा नहीं है तथा अपीलकर्ता और प्रतिवादियों को राहत प्रदान करने के लिए उपहार विलेख की वैधता का निष्कर्ष आवश्यक नहीं है, सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV के प्रावधान पर आधारित है। 

मामले का विश्लेषण

हयातुद्दीन बनाम अब्दुल गनी एवं अन्य (1976) मामले में विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई, जो इस प्रकार हैं: 

अविभाजित हिस्से (मुशा) के उपहार की वैधता

इस्लामी न्यायशास्त्र पर भरोसा करते हुए, जो बताता है कि विभाज्य संपत्ति के अविभाजित हिस्से (मुशा) का उपहार अनियमित (फासीद) है और शून्य (बतिल) नहीं है और इस तरह के उपहार को वैध बनाने के लिए, संपत्ति को विभाजित किया जाना चाहिए और हर संभव कदम उठाकर कब्जे को पूरी तरह से दानकर्ता को हस्तांतरित किया जाना चाहिए, अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि दानकर्ता (अमनबी और रशीदबी) ने दानकर्ता (हयातुद्दीन) को संपत्ति का कब्जा हस्तांतरित करने के लिए हर संभव कदम उठाया और इस तरह उपहार वैध था। 

रेस जुडिकाटा

इस मामले में न्यायालय ने उन तत्वों पर गौर किया जो किसी मामले को रेस जुडिकाटा के सिद्धांत के अंतर्गत लाने के लिए आवश्यक हैं, जो दलीलें दी गई थीं कि उपहार विलेख की वैधता पर पुनः चर्चा की जा रही है, वह वर्तमान मामले मे अनुपस्थित है। न्यायालय ने कहा कि 1955 के मुकदमे में इस मुद्दे पर चर्चा नहीं की गई थी, इसलिए यह मामला रेस जुडिकाटा गठित नहीं करता है।

कोई हितों का टकराव नहीं

न्यायालय को मामले में पक्षकारों के बीच कोई हितों का टकराव नहीं मिला; इसलिए, प्रतिवादी और वादी (जो 1955 के मुकदमे में वादी थे) को राहत देने के लिए उपहार विलेख की वैधता पर निर्णय की आवश्यकता नहीं थी। 

दानकर्ताओं के आशय पर जोर

न्यायालय ने दानकर्ताओं (रशीदबी और अमनबी) द्वारा उपहार में दी गई संपत्ति का कब्जा दान प्राप्तकर्ता (हयातुद्दीन) को हस्तांतरित करने के लिए उठाए गए हर संभव कदम पर गौर किया और इसलिए निष्कर्ष निकाला कि उपहार वैध था और कब्जा पूरी तरह से दान प्राप्तकर्ता के हाथ में था। 

निष्कर्ष

यह मामला दर्शाता है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने दानकर्ताओं के कार्यों के साक्ष्य के आधार पर उपहार विलेख की वैधता को बरकरार रखने और उपहार में दी गई संपत्ति के कब्जे को हस्तांतरित करने में इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर विचार करते हुए एक लचीला और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया, और रेस जुडिकाटा के तर्क को भी खारिज कर दिया। इससे पता चला कि कानूनों की व्याख्या ऐसे तरीके से भी की जा सकती है जो पूरी तरह से सैद्धांतिक न हो। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

हिदाया क्या है?

हिदाया एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है “मार्गदर्शन।” इस्लामी कोशकार के अनुसार, इमाम रागिब अल-इस्फानी का अर्थ है सौम्य और दयालु तरीके से रास्ता दिखाना या लक्ष्य की ओर ले जाना। हिदाया एक दिशानिर्देशक की तरह है जो लोगों को सही रास्ता दिखाती है। इसमें मुस्लिम कानून के सभी पहलू शामिल हैं, जिनमें अनुष्ठान, पारिवारिक कानून, व्यक्तिगत आचरण आदि शामिल हैं। यह एक प्रभावशाली पाठ है जो कानूनी व्यवहार और सिद्धांतों को आकार देता है। 

शाफ़ेई और इथना असरिया शिया स्कूल क्या हैं?

शाफ़ेई चार प्रमुख सुन्नी स्कूलों में से एक है; यह मुस्लिम कानून के प्राथमिक स्रोतों के रूप में कुरान, सुन्नत (पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाएं), इज्मा (विद्वानों की आम सहमति) और क़ियास (सादृश्यात्मक (एनालॉजिकल) तर्क) पर ध्यान केंद्रित करता है। 

इथना असरिया शिया स्कूल शिया स्कूल की सबसे बड़ी शाखा है, जिसका अनुसरण दुनिया भर के लगभग 85% शिया मुसलमान करते हैं। इस स्कूल के अनुसार कानून के प्रमुख स्रोत कुरान, सुन्नत (बारह इमामों की शिक्षाएं), इज्मा (शिया विद्वानों की आम सहमति) और अक़्ल (बुद्धि) हैं। 

उपहार विलेख क्या है?

उपहार विलेख एक कानूनी दस्तावेज है जो किसी संपत्ति का स्वामित्व उसके मालिक से किसी अन्य व्यक्ति को, बिना किसी मौद्रिक विनिमय के, हस्तांतरित करता है। यह स्वामी द्वारा संपत्ति के स्वैच्छिक हस्तांतरण तथा दूसरे व्यक्ति द्वारा उपहार के रूप में स्वीकृति को दर्शाता है। 

दानकर्ता और उपहार प्राप्तकर्ता कौन हैं?

जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उपहार के रूप में संपत्ति देता है, वह दानकर्ता है और जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से उपहार के रूप में संपत्ति स्वीकार करता है, वह प्राप्तकर्ता है। 

डिक्री क्या है?

डिक्री किसी भी आधिकारिक निकाय, जैसे राज्य के प्रमुख या न्यायाधीश द्वारा पारित कानूनी रूप से बाध्यकारी आदेश है। इसमें कानूनी बल होता है और इसे संविधान, अन्य विधानों या प्रथागत कानूनों के तहत स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जारी किया जाता है। कानूनी दृष्टि से, डिक्री, निर्णय के समान ही किसी मामले में कानूनी मुद्दे का समाधान करती है, लेकिन इसमें कुछ प्रमुख अंतर होते हैं। 

सी.पी.सी. की धारा 11 के अंतर्गत रेस जुडिकाटा के तत्व क्या हैं?

सी.पी.सी. की धारा 11 के अंतर्गत रेस जुडिकाटा के तत्व इस प्रकार हैं:

  • पहले भी इन्हीं पक्षों के बीच मुकदमा चल चुका था।
  • पिछले मुकदमे में मामला सक्षम न्यायालय द्वारा तय किया गया था और निर्णय मामले के गुण-दोष के आधार पर था।
  • पिछले मुकदमे का निर्णय अंतिम निर्णय था।
  • बाद के मुकदमे में पक्षकार पिछले मुकदमे के समान ही हैं।
  • बाद के मामले में मामला पिछले मामले जैसा ही है। 

दहेज ऋण क्या है?

दहेज ऋण मेहर की वह राशि है जो विवाह के समय पति द्वारा पत्नी को दी जाती है। 

संदर्भ

  • Aqil Ahmed, Mohammedan Law (Central Law Agency, Lucknow, 27th edn., 2021).
  • C.K Takwani, Civil Procedure (CPC) (EBC Publishing Pvt. Ltd., Lucknow, 9th edn., 2023).

 

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