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सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत रेस ज्यूडिकाटा की अवधारणा

सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत रेस ज्यूडिकाटा की अवधारणा
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इस लेख में, Yash Kansal सीपीसी के तहत रेस ज्यूडिकाटा के प्रावधान पर चर्चा करते हैं। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय

रोमन कानून के तहत, “एक्स कैप्शियो रेस ज्यूडिकाटा” का अर्थ है “एक मुकदमा और एक निर्णय किसी एकल विवाद के लिए पर्याप्त है”। इस सिद्धांत को सभी सभ्य कानूनी व्यवस्था में स्वीकार किया गया है। भारत में, यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 11 के तहत शासित है, जो बताता है कि एक बार जब किसी मामले को एक सक्षम अदालत द्वारा अंतिम रूप से तय किया जाता है, तो बाद में उस मामले को किसी भी पक्ष द्वारा मुकदमे में इसे फिरसे खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सत्यध्यान घोषाल बनाम देओरजिन देबी के मामले में, यह माना गया था कि अदालत द्वारा दिए गए निर्णय को अंतिम रूप देने की आवश्यकता पर रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत आधारित है। इसके अलावा, इस तरह के एक नियम के अभाव में, मुकदमेबाजी का कोई अंत नहीं होगा और पक्षकारों को लगातार परेशानी, तकलीफ और खर्च में डाल दिया जाएगा।

उद्देश्य

यह सिद्धांत तीन कहावतों पर आधारित है: –

  • किसी भी व्यक्ति को एक ही कारण से दो बार अदालत में नहीं लाना चाहिए।
  • मुकदमेबाजी का अंत हो जाना, यह राज्य के हित में है।
  • एक अदालत के निर्णय को सही और अंतिम रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

रेस ज्यूडिकाटा के आवेदन की शर्तें (सीपीसी,1908 की धारा 11)

  • दो मुकदमे होने चाहिए – एक पहले वाला और दूसरा बाद वाला: पहले वाला मुकदमा का मतलब इस मुकदमें से है जिस पर पहले ही निर्णय दिया जा चुका है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुकदमा कब दाखिल किया गया था। यह मायने रखता है की फैसला अदालत द्वारा दिया गया था। उदाहरण के लिए,
मुकदमा दाखिल किया गया मुकदमा का फैसला किया पहला मुकदमा
1/10/2012     10/11/2017 नहीं
1/01/2013 10/11/2017 हां
  • बाद के मुकदमे में सीधे और पर्याप्त रूप से वही मामला: इसका मतलब है कि मामला सीधे ही पहले वाले मुकदमे से संबंधित होना चाहिए। यह संपार्श्विक (कोलेटरल) या मुद्दे के लिए आकस्मिक (इंसीडेंटल) नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, ‘A’ और उसकी मां ने अपने पिता के भाई के खिलाफ अपनी मां की संपत्ति में हिस्से का दावा करने के लिए मुकदमा दायर किया था। शादी के खर्च का सवाल सीधे तौर पर या काफी हद तक मुद्दा नहीं था। अदालत ने बंटवारे के दावे को खारिज कर दिया। हालांकि, रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत ‘A’ को उसके शादी के खर्च के लिए बाद में मुकदमा दायर करने से नहीं रोकता है क्योंकि मामला सीधे रूप से पहले के मुकदमे में नहीं लाया गया था।
  • समान पक्ष होने चाहिए: एक मुकदमे के पक्षकार वे होते हैं जिनका नाम निर्णय के समय मुकदमे के रिकॉर्ड में दर्ज होता है। एक पक्ष जो पीछे हटता है या जिसका नाम उस मामले में अटका हुआ होता है, उसे पक्ष नहीं माना जाता है। इसके अलावा, एक नाबालिग जिसका प्रतिनिधित्व मुकदमे के लिए अभिभावक द्वारा नहीं किया गया है, वह मुकदमे का पक्षकार नहीं होता है। जहां अदालत द्वारा किसी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णय लिया जाता है, तो वह न केवल उस पक्ष को बल्कि उसके कानूनी वारिसो को भी उस निर्णय से बांधता है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति द्वारा कब्जा और मालिकी वापस पाने के लिए एक मुकदमा दायर किया जाता है और अदालत उसके पक्ष में फैसला करती है, तो उसकी मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों को भी पक्षों के रूप में माना जाता है और वहा रेस जूडीकाटा भी लागू होगा।

  • एक ही शीर्षक (टाइटल) होना चाहिए: ‘एक ही शीर्षक’ का अर्थ है ‘एक ही क्षमता में’। यह कई मामलों में आयोजित किया गया है कि ‘एक व्यक्ति के खिलाफ एक क्षमता में मुकदमा करने का फैसला उसे दूसरी क्षमता में मुकदमा करने से नहीं रोकेगा’। उदाहरण के लिए, ‘A’ संपत्ति के मालिक के रूप में ‘B’ के खिलाफ मुकदमा दायर करता है और मुकदमा अदालत द्वारा खारिज कर दिया जाता है। बाद में, उसने अपने अधिकार का दावा करने के लिए एक मुकदमा दायर किया क्योंकि गिरवीदार उसे बाद में मुकदमा दर्ज करने से नहीं रोकेगा। इसलिए जहां मुकदमा अलग हैसियत से दायर किया जाता है, वहा इसे एक वैध मुकदमा माना जाता है और फिर वह इस सिद्धांत द्वारा वर्जित (बार) नहीं होता है।
  • निर्णय सक्षम अदालत द्वारा किया जाना चाहिए: पहले वाला निर्णय, मामले पर क्षेत्राधिकार वाले सक्षम अदालत द्वारा दिया जाना चाहिए। यदि बाद में अदालत द्वारा तय किया जाता है कि उस विषय पर उस अदालत का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है, तो वहा रेस ज्यूडिकाटा लागू नहीं होगा। उदाहरण के लिए, अधिनियम के तहत अधिकार का प्रयोग करने वाले रेवेन्यू अदालतों को सीमित क्षेत्राधिकार का अदालत माना जा सकता है और इसके द्वारा दिया गया निर्णय अपनी क्षमता के भीतर निर्णय के रूप में कार्य करेगा।
  • सुना और अंत में किया गया फैसला: बाद के मुकदमे में सीधे और काफी हद तक मुद्दे को सुना जाना चाहिए और अंत में अदालत द्वारा एक पहले वाले मुकदमे में फैसला किया जाना चाहिए। “सुना और अंत में निर्णय लिया” का अर्थ है कि अदालत ने अपने न्यायिक दिमाग का प्रयोग किया है और तर्क और विचार के बाद विवादित मामले पर निर्णय दिया है और यह भी कि मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया गया है। निम्नलिखित मामलों में मामले को अंतिम रूप से गुण-दोष के आधार पर तय माना जाता है, भले ही पहले वाले मुकदमें का निपटारा निम्नलिखित तरीके से किया गया हो:
  1. एक्स पार्टे द्वारा
  2. बर्खास्तगी से
  3. एक निर्णय पर डिक्री द्वारा
  4. भारतीय शपथ अधिनियम, 1873 पर धारा 8 के तहत शपथ निविदा (टेंडर) द्वारा
  5. वादी के कारण बर्खास्तगी द्वारा सुनवाई में साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहने पर।

क्या रेस ज्यूडिकाटा रिट याचिका पर लागू होती है?

दर्यो सिंह बनाम यूपी राज्य के मामले में याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च अदालत में अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दायर की, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उसी राहत और उसी आधार के लिए सर्वोच्च अदालत में रिट याचिका दायर की। सर्वोच्च अदालत ने याचिका को खारिज कर दी और उच्च अदालत की दलील को बरकरार रखा। इसलिए यह सिद्धांत रिट याचिकाओं पर भी लागू होगा।

हालाँकि, यह ध्यान दिया जा सकता है कि रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत “बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस)” के एक रिट पर लागू नहीं होगा।

विदेशी निर्णय

धारा 13 में प्रावधान है कि विदेशी निर्णय निम्नलिखित छह मामलों को छोड़कर रेस ज्यूडिकाटा के रूप में कार्य कर सकते हैं: –

  • जहां सक्षम अदालत द्वारा निर्णय नहीं दिया जाता है।
  • जहां मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं दिया गया है।
  • जहां अंतरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि से निर्णय गलत पाया जाता है।
  • जहां फैसले ने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का विरोध किया है।
  • जहां धोखाधड़ी से निर्णय लिया गया है।
  • जहां फैसला भारत में लागू कानून के उल्लंघन पर पाया गया है।

नोट – रेस ज्यूडिकाटा अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है। इसलिए, इस तरह के निर्णय को इस आधार पर फिर से खोलना, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, और अनुमेय (परमिसिबल) नहीं है।

संदर्भ

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