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आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 115BAC

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 115BAC

यह लेख देहरादून के ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी के लॉ के छात्र Monesh Mehndiratta मोनेश ने लिखा है। यह लेख आयकर अधिनियम की धारा 115BAC और इससे संबंधित अन्य धाराओं का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 115BAC को हाल ही में वित्त अधिनियम 2020 द्वारा सम्मिलित किया गया है। यह करदाताओं (टैक्सपेयर) को किसी भी निर्धारित छूट या कटौती पर विचार किए बिना रियायतों (कंसेशन) और वास्तविक कर दरों के साथ नई कर दरों के बीच चयन करने का विकल्प प्रदान करता है। यह कर्मचारियों को यह भी स्पष्ट करता है कि क्या उन्हें अपने वेतन से करों को रोकते समय नई कर व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए या नहीं। 2020 के केंद्रीय बजट ने इस धारा को पेश किया था। इस धारा के प्रमुख लाभों में से एक यह है कि यह पुरानी कर व्यवस्थाओं की तुलना में कम कर दरें प्रदान करता है और करदाता के पास यह चुनने का विकल्प होता है कि वह किस कर व्यवस्था का पालन करना चाहते है। यह करदाताओं को दो योजनाओं के बीच बदलने की अनुमति देता है।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी)

यह धारा निर्धारण (असेसमेंट) वर्ष 2021-22 से निम्नलिखित लोगों पर लागू होती है:

  • व्यक्तियों
  • निवासी और अनिवासी सहित हिंदू अविभाजित परिवार

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC की विशेषताएं

  • यह धारा उन कटौतियों को हटा देती है जिनका लाभ पुरानी कर व्यवस्था में लिया जा सकता है।
  • इस धारा की प्रमुख विशेषता यह है कि यह वैकल्पिक है और एक व्यक्ति अभी भी पुरानी कर योजना का विकल्प चुन सकता है और दोनों के बीच बदल सकता है।
  • यह व्यावसायिक आय पर लागू नहीं होती है।
  • अधिभार (सरचार्ज) और उपकर (सेस) की दरें पुरानी या मौजूदा कर योजनाओं के समान ही हैं।
  • यदि धारा के तहत दी गई शर्तों को पूरा नहीं किया जाता है, तो इस योजना को चुनने का विकल्प उस वित्तीय वर्ष के लिए अमान्य हो जाएगा।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC के अनुसार कौन पात्र हैं?

धारा में प्रावधान है कि व्यक्ति और अविभाजित हिंदू परिवार इस धारा के अनुसार कर का भुगतान कर सकते हैं लेकिन उनकी आय/वेतन को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना चाहिए:

  • इसमें कोई व्यावसायिक आय शामिल नहीं होनी चाहिए।
  • इसकी गणना अधिनियम के प्रावधानों के तहत बिना किसी प्रकार की कटौती या छूट के की जानी चाहिए।
  • किसी भी कटौती के कारण पहले के नुकसान को शामिल नहीं किया जाना चाहिए और इसे सेट ऑफ किया जाना चाहिए।
  • वेतन या आय की गणना करते समय अधिनियम की धारा 32 के अनुसार किसी मूल्यह्रास (डेप्रिसिएशन) का दावा नहीं किया जाना चाहिए।
  • भत्तों से संबंधित किसी भी छूट को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC के तहत छूट और कटौती

धारा में निम्नलिखित विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत किसी भी प्रकार की छूट या कटौती का विवरण दिया गया है:

वेतन

वेतन के मामले में, कुल आय की गणना अधिनियम के निम्नलिखित प्रावधानों के तहत किसी भी छूट या कटौती को ध्यान में रखे बिना की जानी चाहिए:

  • धारा 10(5) और धारा 10 (13A) यानी छुट्टी यात्रा रियायतें और मकान किराया भत्ता क्रमशः।
  • धारा 10(14) लेकिन निम्नलिखित चीजों को छोड़कर-
  1. दिव्यांग या शारीरिक रूप से अक्षम कर्मचारियों को दिया जाने वाला भत्ता,
  2. वाहन भत्ता,
  3. यात्रा के लिए भत्ता,
  4. कर्मचारियों द्वारा किए गए दैनिक शुल्क।
  • सांसदों या विधायकों के लिए धारा 10(17) के तहत भत्ता।
  • अधिनियम की धारा 16 के तहत व्यावसायिक कर, मानक (स्टैंडर्ड) भत्ता आदि।

व्यवसाय या पेशा

किसी भी व्यवसाय या पेशे से उत्पन्न कुल आय की गणना करने के प्रावधान हैं:

  • धारा 32 के तहत अतिरिक्त मूल्यह्रास,
  • धारा 32 AD के तहत पिछड़े क्षेत्रों के लिए नए संयंत्र (प्लांट) या मशीनरी में किसी भी प्रकार का निवेश,
  • धारा 33AB के तहत चाय, कॉफी, 
  • धारा 35 के तहत अनुसंधान संघों (रिसर्च एसोसियएशन), विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं आदि को भुगतान,
  • धारा 35AD के तहत कटौती के साथ जुड़ा कोई भी निवेश,
  • धारा 35CCC के तहत कृषि परियोजनाओं पर कोई खर्च,
  • धारा 57 के तहत पारिवारिक पेंशन में की गई कटौती,
  • किसी भी नुकसान को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा जिसे सेट ऑफ नहीं किया गया है।
  • नाबालिग की आय।
  • धारा 10AA के तहत एसईजेड इकाइयाँ।

गृह संपत्ति

कर के उद्देश्य के लिए गृह संपत्ति से उत्पन्न आय की गणना करने के प्रावधान हैं:

  • अधिनियम की धारा 24(b) के तहत स्व-अर्जित (सेल्फ एक्वायर्ड) संपत्ति पर ब्याज,
  • गृह संपत्ति के कारण होने वाली आय की हानि को सेट ऑफ किया जा सकता है,
  • 30% कटौती और भुगतान किए गए नगरपालिका करों की अनुमति है लेकिन उधार ली गई पूंजी पर कोई ब्याज नहीं है।

अध्याय IV A के तहत कटौती

  • धारा 80CCD के तहत पेंशन फंड में नियोक्ता (एंप्लॉयर) द्वारा योगदान,
  • अतिरिक्त कर्मचारी लागत की धारा 80JJAA के अनुसार कटौती की जानी चाहिए,
  • धारा 80LA के अनुसार अपतटीय (ऑफशोर) बैंकिंग इकाइयों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) में कटौती।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC के लिए आवश्यक शर्तें

धारा को चुनने और न चुनने के लिए पूरी की जाने वाली शर्तें इस बात पर निर्भर करती हैं कि आय किसी व्यवसाय/पेशे से उत्पन्न हुई है या नहीं। ये हैं:

  1. किसी व्यवसाय या पेशे से कोई आय नहीं – यदि किसी व्यवसाय या पेशे से कोई आय नहीं है, तो कोई व्यक्ति रिटर्न दाखिल करने की नियत तारीख से पहले इस धारा को चुन सकता है।
  2. व्यवसाय या किसी पेशे से आय – यदि आय किसी व्यवसाय या पेशे से उत्पन्न हुई है, तो वह रिटर्न दाखिल करने से पहले चुन सकता है, लेकिन एक बार जब वह इस धारा को चुन लेता है, तो वह जीवन भर के लिए बाध्य होता है और यही समान चीज तब भी लागू होती है जब वह इस धारा को नहीं चुनता है।

हालांकि, इस धारा का चयन करने वाले और व्यवसाय या पेशे से आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति को इस धारा का लाभ लेने के लिए फॉर्म 10IE भरना होगा। जिन व्यक्तियों की आय की गणना उनके वेतन से की जाती है, उन्हें इस फॉर्म को भरने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यह उन लोगों के लिए अनिवार्य है जिनकी आय किसी व्यवसाय या पेशे से उत्पन्न होती है। फॉर्म को रिटर्न की नियत तारीख से पहले विधिवत भरा जाना चाहिए और विफलता के परिणामस्वरूप धारा 115BAC के तहत योजना की अनुपलब्धता होगी।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC के तहत कर की दरें

निम्न तालिका (टेबल) विभिन्न आय पर लागू धारा के अनुसार कर पर दरें प्रदान करती है:

आय सीमा लागू कर
2,50,000 रुपये तक कोई कर नहीं 
2,50,001 रुपये – 5,00,000 रुपये 5%
रु. 5,00,001 – रु. 7,50,000 10%
रु 7,50,001 – रु 10,00,000 15%
रु. 10,00,001 – रु. 12,50,000 20%
रु. 12,50,001 – रु. 15,00,000 25%
15,00,000 रुपये से ज्यादा 30%

ये दरें पुरानी या मौजूदा कर दरों की तुलना में बहुत कम हैं और एक करदाता के पास यह चुनने का विकल्प होता है कि वह कौन सी योजना यानी नई कर योजना या पुरानी कर योजना, चुनना चाहता है। यदि वह एक नई कर व्यवस्था का विकल्प चुनता है, तो उसे आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 115BAC के तहत दी गई सभी शर्तों को पूरा करना होगा।

पुरानी और नई कर व्यवस्था के बीच तुलना

करदाताओं को प्रदान की जाने वाली पुरानी कर व्यवस्था का एक बड़ा लाभ यह था कि बहुत सारी छूट और कटौतियाँ थीं जो नई कर व्यवस्था के तहत उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर, नई कर योजना उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिन्होंने या तो निवेश किया है या भविष्य में ईपीएफ, सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट), जीवन बीमा, पेंशन योजनाओं आदि में निवेश करेंगे। साथ ही, कुल आय के मामले में कटौती या छूट लागू नहीं होती है यदि यह एक व्यक्ति के वेतन पर आधारित है। निम्न तालिका पुरानी कर योजना और नई कर योजना की कर दरों के बीच तुलना दर्शाती है।

कुल आय  नई कर व्यवस्था के अनुसार लागू कर की दर कुल आय  पुरानी कर व्यवस्था के अनुसार लागू कर की दर
2,50,000/- तक कोई कर नहीं 2,50,000/- तक कोई कर नहीं
2,50,001 रुपये – 5,00,000 रुपये 5% 2,50,001 रुपये – 5,00,000 रुपये 5%
रु. 5,00,001 – रु. 7,50,000 10% रु. 5,00,001 – रु. 10,00,000 20%
रु 7,50,001 – रु 10,00,000 15% 30%
रु. 10,00,001 – रु. 12,50,000 20%
रु. 12,50,001 – रु. 15,00,000 25%
15,00,000 रुपये से ज्यादा 30%

इस प्रकार, उपरोक्त तालिका से पता चलता है कि नई कर व्यवस्था पुरानी कर व्यवस्था की तुलना में अधिक कर स्लैब और आय पर कर की कम दरें प्रदान करती है। दोनों के बीच एक और अंतर यह है कि 3,00,000 रुपये – 3,50,000 रुपये का कर स्लैब जो देश के वरिष्ठ नागरिकों द्वारा प्राप्त किया जाता है, यदि वे एक नई कर व्यवस्था चुनते हैं तो उनके द्वारा इसका लाभ नहीं उठाया जा सकता है।

यह भी देखा जा सकता है कि पुरानी कर व्यवस्था उच्च आय और न्यूनतम या बिना निवेश वाले लोगों के लिए फायदेमंद है जबकि नई कर व्यवस्था उन लोगों के लिए सबसे उपयुक्त है जो निवेश करने की योजना बना रहे हैं या विभिन्न निवेशों में निवेश कर चुके हैं और कम आय वाले हैं। इस प्रकार, यह तय करने की कोई प्रक्रिया नहीं है कि करदाता के लिए कौन सा विकल्प सबसे अच्छा है। हालांकि, उसे प्रत्येक लागू विकल्पों और नियमों और शर्तों दोनों के अनुसार कर की गणना करनी चाहिए और फिर विश्लेषण करना चाहिए कि कौन सा विकल्प उनके लिए सबसे अच्छा है और अधिकतम लाभ प्रदान करता है और उन्हें एक नई कर व्यवस्था चुननी चाहिए या नहीं। लेकिन विकल्प चुनने के बाद, कोई व्यक्ति संतुष्ट नहीं है, तो वह दूसरा विकल्प चुन सकता है, लेकिन रिटर्न दाखिल करने की बदली हुई प्रक्रिया के कारण यह थोड़ा समस्याग्रस्त और व्यस्त हो सकता है।

आयकर अधिनियम की धारा 115BAC का स्पष्टीकरण

जब धारा को शुरू में 2020 के वित्त अधिनियम द्वारा पेश किया गया था, तो विभिन्न पहलुओं से संबंधित कुछ मुद्दे और अस्पष्टताएं थीं, लेकिन प्रमुख समस्या नियोक्ताओं (एंप्लॉयर) द्वारा कर की कटौती थी। इस प्रकार, जनता को स्पष्ट, निश्चित और स्पष्ट प्रावधान प्रदान करने के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने धारा और लोगों द्वारा इससे संबंधित सामना किए जाने वाले मुद्दों के बारे में स्पष्टीकरण दिया। य़े हैं:

  • यदि कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी के लिए टीडीएस काटना चाहता है, तो उसे उसके द्वारा एक पूर्व घोषणा लेनी होगी, जहां कर्मचारी के पास व्यवसाय में लाभ के अलावा अन्य आय है और वह रियायती दर का विकल्प चुनना चाहते है, तो नियोक्ता को बताना होता है और वह इस तरह की घोषणा पर टीडीएस काट लेगा और उसकी आय की गणना अधिनियम की धारा 115BAC के अनुसार करेगा।
  • यदि कर्मचारियों द्वारा ऐसी कोई घोषणा नहीं की जाती है, तो नियोक्ता अधिनियम के अन्य प्रावधानों और पुरानी कर दरों के अनुसार टीडीएस काटेगा, न कि इस धारा के अनुसार।
  • एक कर्मचारी को कोई भी घोषणा देते समय सावधान रहना चाहिए और उसके हर पहलू की जांच करनी चाहिए क्योंकि एक बार घोषणा हो जाने के बाद इसे बदला नहीं जा सकता है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह की घोषणा पहले किसी विशेष वर्ष के लिए होती है और इसे आगे के वर्षों के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है।
  • कर्मचारी के पास रिटर्न दाखिल करते समय चुनी गई कर की योजना को बदलने का विकल्प भी होता है। यदि वह पुरानी कर व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है तो वह नई कर व्यवस्था का विकल्प चुन सकता है और इसके विपरीत भी कर सकता है। अधिनियम की धारा 139 में प्रावधान है कि रिटर्न दाखिल करने के दौरान विकल्प को बदला जा सकता है और जो सूचित किया गया है उससे भिन्न हो सकता है।

आय की रिटर्न दाखिल करने की आवश्यकता कब नहीं होती है?

अधिनियम की धारा 115G में प्रावधान है कि एक अनिवासी भारतीय जिसकी केवल निवेश या दीर्घकालिक पूंजीगत (लॉन्ग टर्म कैपिटल) लाभ के रूप में आय है, जो विदेशी मुद्रा के हस्तांतरण (ट्रांसफर) से उत्पन्न होता है, उसे अधिनियम की धारा 139 के तहत आय का रिटर्न दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, उसके पास अधिनियम की धारा 115-I के अनुसार आय का रिटर्न जमा करने और देय धन वापसी के लिए आवेदन करने का एक और विकल्प है।

निष्कर्ष

यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पुरानी कर व्यवस्था के तहत आय स्लैब अधिक थी लेकिन ऐसे कई तरीके थे जिनसे लोग आसानी से कर का भुगतान करने के लिए अपने दायित्व को कम कर सकते थे। इनसे बहुत से लोगों को करों का भुगतान करने से बचने में मदद मिली और इस प्रकार, एक नई कर योजना की आवश्यकता थी। पुरानी कर व्यवस्था 70 छूट और कटौती प्रदान करती है, जिसका लाभ लोगों को मिलता था और उन्हें कम कर देना पड़ता था। हालाँकि, 2020 के वित्त अधिनियम द्वारा धारा 115BAC को सम्मिलित करने के साथ नई कर व्यवस्था की शुरुआत के साथ, कम और लगभग कोई छूट और कटौती नहीं है, लेकिन यह कम कर दरों के साथ अधिक आय स्लैब प्रदान करता है। हालांकि नई कर योजना के अनुसार कम कटौती है, लेकिन अधिक आय स्लैब के साथ कर की दरें कम हैं, जिसका अर्थ है कि यह उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो कम आय वर्ग की श्रेणी में आते हैं और अधिक निवेश करते हैं।

ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जो किसी व्यक्ति को यह तय करने में मदद करती है कि उसे कौन सा विकल्प चुनना चाहिए। स्पष्ट निर्णय लेने के लिए, उसे दोनों कर योजनाओं के अनुसार अपनी आय की गणना करनी चाहिए और फिर करों की गणना करनी चाहिए। सभी लाभों का विश्लेषण करने के बाद, उसे दोनो विकल्पों में से एक को चुनना चाहिए। यदि वह अपने द्वारा चुने गए विकल्प से संतुष्ट नहीं है, तो वह आसानी से दोनों के बीच बदल सकता है। हालाँकि, यह काफी जटिल लगता है, लेकिन ऑनलाइन रिटर्न दाखिल करने के कारण, प्रक्रिया को आसान और आरामदेह बना दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

1. आयकर अधिनियम, 1961 में धारा 115BAC को किस अधिनियम के तहत पेश किया गया है?

इस धारा को हाल ही में वित्त अधिनियम 2020 द्वारा सम्मिलित किया गया है। यह करदाताओं को किसी भी निर्धारित छूट या कटौती पर विचार किए बिना रियायतों और वास्तविक कर दरों के साथ नई कर दरों के बीच चयन करने का विकल्प प्रदान करता है। यह कर्मचारियों को यह भी स्पष्ट करता है कि क्या उन्हें अपने वेतन से करों को रोकते समय नई कर व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए या नहीं।

2. धारा 115BAC की विशेषताएं क्या हैं?

धारा की विशेषताएं हैं:

  • यह धारा उन कटौतियों को हटा देती है जिनका लाभ पुरानी कर व्यवस्था में लिया जा सकता है।
  • इस धारा की प्रमुख विशेषता यह है कि यह वैकल्पिक है और एक व्यक्ति अभी भी पुरानी कर योजना का विकल्प चुन सकता है और दोनों को बदल सकता है।
  • यह व्यावसायिक आय पर लागू नहीं होती है।
  • अधिभार और उपकर की दरें पुरानी या मौजूदा कर योजनाओं के समान ही हैं।
  • यदि धारा के तहत दी गई शर्तों को पूरा नहीं किया जाता है, तो इस योजना को चुनने का विकल्प उस वित्तीय वर्ष के लिए अमान्य हो जाएगा।

3. यदि कोई नियोक्ता अपने कर्मचारियों का टीडीएस काटना चाहता है तो उसे क्या करने की आवश्यकता है?

  • यदि कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी के लिए टीडीएस काटना चाहता है, तो उसे उसके द्वारा एक पूर्व घोषणा लेनी होगी, जहां कर्मचारी के पास व्यवसाय में लाभ के अलावा अन्य आय है और वह रियायती दर का विकल्प चुनना चाहता है, और नियोक्ता को बताता है और वह इस तरह की घोषणा पर टीडीएस काट लेता है और उसकी आय की गणना अधिनियम की धारा 115BAC के अनुसार करता है।
  • यदि कर्मचारियों द्वारा ऐसी कोई घोषणा नहीं की जाती है, तो नियोक्ता अधिनियम के अन्य प्रावधानों और पुरानी कर दरों के अनुसार टीडीएस काटेगा, न कि इस धारा के अनुसार।
  • कर्मचारी के पास रिटर्न दाखिल करते समय विकल्प बदलने का भी विकल्प होता है। अधिनियम की धारा 139 में प्रावधान है कि रिटर्न दाखिल करने के दौरान विकल्प को बदला जा सकता है और जो सूचित किया गया है उससे भिन्न हो सकता है।

4. धारा की आवश्यक शर्तें क्या हैं?

धारा को चुनने और न चुनने के लिए पूरी की जाने वाली शर्तें इस बात पर निर्भर करती हैं कि आय किसी व्यवसाय या पेशे से उत्पन्न हुई है या नहीं। य़े हैं:

  • किसी व्यवसाय या पेशे से कोई आय नहीं – यदि ऐसा नहीं है, तो कोई व्यक्ति रिटर्न दाखिल करने की नियत तारीख बीतने से पहले इस धारा को चुन सकता है।
  • व्यवसाय या किसी पेशे से आय – यदि आय किसी व्यवसाय या पेशे से उत्पन्न हुई है, तो वह रिटर्न दाखिल करने से पहले चुन सकता है, लेकिन एक बार जब वह इस धारा को चुन लेता है, तो वह जीवन भर के लिए बाध्य होता है और यदि वह इस धारा को नहीं चुनता है तब भी समान नियम लागू होगा।

संदर्भ

 

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