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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत शून्य समझौते

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत शून्य समझौते
Void Agreements Law Insider

यह लेख भारती विद्यापीठ, न्यू लॉ कॉलेज पुणे में बीबीए-एलएलबी की द्वितीय वर्ष की छात्रा Isha द्वारा लिखा गया है। यह लेख अनिश्चित समझौतों के विशेष उल्लेख के साथ भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत धारा 29 और 30 के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 29 के तहत एक समझौता शून्य है जब इसकी शर्तें अस्पष्ट और अनिश्चित हैं, और इसे स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए: X एक टन तेल का व्यापार करने के लिए सहमत है। यह समझौता अनिश्चितता के लिए अप्रवर्तनीय (अनइंफ़ोर्सिबल) है क्योंकि यह अनिश्चित है, क्योंकि इच्छित वर्गीकरण (इंटेंडेड क्लासिफिकेशन) का पता नहीं लगाया जा सकता है।

धारा 29 एक समझौते का अर्थ बताती है जो इसके प्रकट होने पर पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) होना चाहिए, जैसा कि कोवुरु कलप्पा देवारा बनाम कुमार कृष्ण मित्तर मामले में समझाया गया है, लेकिन संविदा को प्रभाव प्रदान किया जा सकता है यदि इसका आवेदन उचित स्पष्टता के साथ पाया जाता है। यदि यह संभव नहीं है तो संविदा लागू करने योग्य नहीं होगा। समझने में थोड़ी सी कठिनाई को अस्पष्ट नहीं माना जाएगा।

आवेदन को एक पक्ष के रूप में व्यक्त किया जा सकता है जो एक संविदा के उल्लंघन के लिए अदालत से राहत चाहता है, दायित्व (ऑब्लिगेशन) उपाय को सही ठहराने के लिए पर्याप्त सटीकता के साथ दायित्व की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। इस प्रकार कहा गया कानून अधिक लचीला (इलास्टिक) है, और स्वीकार करता है कि उपायों के लिए आश्वासन के विभिन्न स्तरों की आवश्यकता हो सकती है।

सहमत होने या बातचीत करने के लिए समझौता

एक समझौते की शर्तों पर बातचीत करने के लिए एक संविदा, उपस्थिति या पदार्थ में, “सहमति के लिए समझौता” नहीं है। यदि उनके वास्तविक प्रयासों के बावजूद, पक्ष प्रभावी शर्तों पर एक अंतिम समझौते पर पहुंचने में विफल रहते हैं, तो बातचीत के संविदा को निष्पादित (परफ़ॉर्म्ड) माना जाता है और पक्षों को उनके दायित्वों से मुक्त कर दिया जाता है। पहचानने में विफलता अपने आप में बातचीत के संविदा का उल्लंघन नहीं है। एक पक्ष केवल तभी जिम्मेदार होगी जब अंतिम समझौते को प्राप्त करने में विफलता उस पक्ष के सद्भाव में बातचीत करने के दायित्व के उल्लंघन से उत्पन्न हुई हो।

“सहमत होने के लिए समझौते” व्यवसायों के लिए जीवन का एक वित्तीय तथ्य है, विशेष रूप से संविदाों की सतत अवधि (परपेचुअल टर्म) में शामिल हैं, जैसे कि जीवन समाजशास्त्र या औद्योगिक क्षेत्रों में विकास और अनुसंधान (रिसर्च) समझौते, कई प्रौद्योगिकी संविदा, या संसाधन और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था।

अक्सर कंपनियां एक समझ के स्रोत (चाहे व्यक्त या निहित) पर एक समझौते में आती हैं कि आगे की व्यवस्था किसी निर्धारित समय पर की जाएगी, जब उस आगे के समझौते के लिए वाणिज्यिक आधार (कॉमर्शियल ग्राउंड) और प्रस्तावित शर्तें अधिक स्पष्ट हो सकती हैं। 

परिणामस्वरूप, प्राथमिक संविदा के बिंदु पर उनके प्रस्तावित द्वितीयक समझौते पर बातचीत करने के बजाय, दोनों पक्ष इस बात से थोड़ा सहमत हैं कि उस समझौते की कुछ या सभी संविदात्मक शर्तें भविष्य में निर्धारित की जाएंगी।

प्रारंभिक वार्ता (प्रिलिमीनरी नेगोशिएशन) निश्चित आकार लेते हुए

हमारे आम कानून (कॉमन लॉ) ने मूल रूप से संविदा निर्माण के मामले के रूप में प्रारंभिक वार्ता देयता के मुद्दे पर विचार किया है। जहां पीड़ित पक्ष विचार, प्रस्ताव और स्वीकृति, निश्चितता और बंधे रहने के इरादे के मानदंडों को पूरा करने में सक्षम है। संविदा कानून में संविदा से पहले उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने में सक्षम कई उपकरण हैं। 

फलस्वरूप, यह लेख अधिक विवादास्पद स्थिति को संबोधित करेगा जहां वादी संविदा गठन के नियमों को पूरा करने में विफल रहा है। उदाहरण के लिए, अनिश्चितता या अपूर्णता के कारण या क्योंकि पक्षें निश्चित शर्तों और अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाती हैं। 

लेन-देन और समझौतों के व्यापक वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) को बनाते और सौंपते समय प्रारंभिक समझौते सामने आते हैं। वे कई बाजार सहभागियों से युक्त हैं और सबसे अच्छे रूप में, दूसरों द्वारा सहन किए जाते हैं। वे मुकदमेबाजी का कारण रहे हैं। जब सटीक रूप से मसौदा तैयार किया जाता है, तो एक प्रारंभिक समझौता एक अनुशंसित लेनदेन के लिए महत्वपूर्ण लाभ प्रदान कर सकता है। यह अक्सर बातचीत के शुरुआती चरणों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। 

जिस अवधि के दौरान एक प्रारंभिक समझौता लागू होता है वह एक क्षण भी हो सकता है जब संगठन और वार्ता दल एक कार्य संबंध प्राप्त करते हैं जो बातचीत की प्रक्रिया में विश्वास में सुधार करता है और एक अंतिम समझौते की दिशा में काम करने के लिए पक्षों की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। दिए गए मामले गौरव मोंगा बनाम प्रीमियर इन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अन्य 2017 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक बातचीत के पैरामीटर की व्याख्या की।

निश्चित होने में सक्षम

जैसा कि बहादुर सिंह बनाम फुलेश्वर सिंह के मामले में दिया गया है, एक संविदा वैध है यदि इसकी शर्तें निश्चित होने के योग्य हैं। संविदा का सार अनिश्चित नहीं होना चाहिए और आगे, यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह निश्चित होने के लिए सक्षम नहीं है। केवल अनिश्चितता या अस्पष्टता जिसे उचित व्याख्या द्वारा सहजता से दूर किया जा सकता है, संविदा को अप्रवर्तनीय नहीं बनाती है। यहां तक ​​कि मौखिक समझौतों को भी अनिश्चित या अस्पष्ट नहीं माना जाएगा यदि उनकी शर्तों को सटीकता के साथ सुनिश्चित किया जा सकता है। 

यदि एक से अधिक अर्थ का कोई संविदा, गठित होने पर, अपने उद्देश्य में एक से अधिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, तो ऐसे संविदा अनिश्चितता के कारण शून्य नहीं होंगे। एक संविदा अनिश्चितता के लिए तभी शून्य हो जाता है जब इसकी प्राथमिक शर्तें अनिश्चित या अपूर्ण हों। जब कोई संविदा बनता है जिसमें कुछ हिस्से अनिश्चित होते हैं और कुछ संभव होते हैं, तो उस संविदा के अनिश्चित हिस्से ही शून्य होंगे। यह निर्धारित करने के लिए कि क्या आवश्यक है और क्या नहीं, पक्षों के उद्देश्य की ओर देखना चाहिए। 

ऐसा कोई समाप्त संविदा (टर्मिनेटेड कॉंट्रैक्ट) नहीं है जब पक्षों के भविष्य के समझौते से स्पष्ट रूप से एक आवश्यक या महत्वपूर्ण क्षेत्र तय किया जाना बाकी है। इसके अलावा, वहाँ एक अनिवार्य संविदा नहीं होगा जहाँ भाषा जटिल है और जहाँ किसी निश्चित अर्थ की कमी है।

एक समझौता जो पक्षों या किसी तीसरे पक्ष द्वारा भविष्य के विचार के निर्धारण के लिए उपयुक्त है, निश्चित होने के लिए सक्षम है और धारा 29 के तहत मान्य है। इस तरह के संविदा को अनिश्चित होने के लिए शून्य नहीं माना जाएगा।

दाँव के माध्यम से समझौता

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 30 में प्रावधान है कि दाँव के माध्यम से किया गया समझौता शून्य है। दाँव शब्द आने वाले भविष्य की अनिश्चित घटना, जैसे कि घुड़दौड़, या किसी भूतपूर्व या वर्तमान घटना से संबंधित तथ्य के निर्धारण पर कुछ उपयोगिता को दाँव पर लगाना है। 

यूके में, सभी व्यवस्थाएं या संविदा, चाहे लिखित रूप से या पैरोल में, गेमिंग या दाँव के माध्यम से, अप्रवर्तनीय और शून्य होंगे; और किसी भी दाँव पर प्राप्त होने की पुष्टि की गई धन या मूल्यवान वस्तु की किसी भी राशि को छुड़ाने के लिए किसी भी कानून या न्याय की अदालत में कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी या कायम नहीं रखी जाएगी। 

भारतीय संविदा अधिनियम 1860 में बाजी के समझौते को परिभाषित नहीं किया गया है। थैकर बनाम हार्डी में कॉटन, एलजे ने कहा: “दाँव और जुआ खेलने का सार यह है कि एक पक्ष को जीतना है और दूसरे को एक आगामी घटना (अपकमिंग इवेंट) पर हारना है जो उस संविदा के समय एक अनिश्चित प्रकृति का है, यानी, अगर भविष्य की घटना एक तरह से सेट हो जाती है तो A हार जाएगा, लेकिन अगर यह दूसरे तरीके से निकलता है, तो वह जीत जाएगा।”

कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी के मामले में, यह माना गया था कि “दाँव संविदा के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक पक्ष इसके तहत या तो जीत या हार सकती है, चाहे वह जीते या असफल हो, घटना के मुद्दे पर निर्भर रहता और इसलिए उस मुद्दे के ज्ञात होने तक दोनों पक्ष अज्ञात होते है। यदि दोनों में से कोई भी पक्ष जीतता है लेकिन ज़रूरी नहीं कि दूसरी पक्ष हारे, तो यह बाजी लगाने का संविदा नहीं है।” 

इस मामले में, प्रतिवादियों ने उनके द्वारा निर्मित स्मोक बॉल का उपयोग करने के बाद इन्फ्लूएंजा से पीड़ित किसी को भी 100 पाउंड का भुगतान करने का आश्वासन दिया। यह माना गया था कि यह एक खतरा नहीं है क्योंकि यदि उपयोगकर्ता को इन्फ्लूएंजा नहीं होता है, तो वह कुछ भी खो नहीं रहा था। यहां ध्यान देने वाली आवश्यक विशेषताएं यह हैं कि व्यक्तियों के पास लाभ या हानि का उचित मौका होना चाहिए और यह एक अनिश्चित घटना के बारे में होना चाहिए। दाँव की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक पक्ष के जीतने या हारने का मौका होता है।

घुड़सवारी के लिए पुरस्कार: अपवाद (एक्सेप्शन) 

अधिक बार, राज्य सरकार कुछ घुड़दौड़ प्रतियोगिता को मंजूरी दे सकती है यदि प्रांतीय कानून (प्रोविंशियल लॉ) इसे अधिकृत करते हैं और यदि लोग घुड़दौड़ के विजेता को दी जाने वाली पुरस्कार राशि के लिए रुपये 500 या उससे अधिक की राशि का योगदान करके भाग लेते हैं तो यह एक दाँव का समझौता नहीं माना जाएगा।

भारतीय दंड संहिता की धारा 294A प्रभावित नहीं होती

इस खंड में, घुड़दौड़ से संबंधित किसी भी लेन-देन को मंजूरी देने के लिए कुछ भी मान्यता नहीं दी जाएगी, जिसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 294A की शर्तें लागू होंगी।

समझौता लागू करने में सक्षम नहीं है

जब एक संविदा लागू करने योग्य होता है तो इसे अधिनियम की धारा 10 द्वारा कानून के तहत संविदा में एक समझौता माना जाता है। यह दायित्वों की प्रवर्तनीयता से संबंधित है। इस धारा के अनुसार, यदि समझौता कुछ प्रतिफल के लिए किया जाता है तो इसे उन पक्षों के बीच एक संविदा माना जाता है जो स्वतंत्र सहमति से और एक वैध उद्देश्य के लिए संविदा करने के लिए सक्षम हैं।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (j) के अनुसार, कानून की अदालत में लागू नहीं होने वाला समझौता शून्य है और “कानून द्वारा लागू नहीं होने वाला समझौता शून्य कहा जाता है”। एक शून्य समझौते को भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(g) के तहत परिभाषित किया गया है जो कहता है कि कानून की अदालत में इसे एक वैध संविदा के रूप में समाप्त किया जाता है। 

शून्य होने पर एक संविदा अस्तित्व में नहीं है। कानून किसी भी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं लगाया जाता है क्योंकि जहां तक ​​​​संविदाों का संबंध है, वे किसी भी पक्ष विशेष रूप से शिकायत करने वाले व्यक्ति को कानूनों की सुरक्षा के लिए सशक्त नहीं हैं। एक समझौते द्वारा किया गया एक गैरकानूनी कार्य एक शून्य समझौते या शून्य संविदा का एक उदाहरण है। 

उदाहरण:– तस्कर या ड्रग डीलरों और खरीदारों के बीच एक संविदा केवल एक शून्य संविदा है क्योंकि संविदा की शर्तें अवैध हैं। ऐसे मामले में किसी भी पक्ष को संविदा के क्रियान्वयन (एक्सीक्यूशन) के लिए अदालत जाने की अनुमति नहीं है।

शून्य समझौते के प्रकार

शून्य समझौते दो प्रकार की हो सकती है: 

  1. वॉइड ऐब इनिशियो: इसका अर्थ है वह संविदा जो प्रारंभ से ही अप्रवर्तनीय है। लैटिन शब्द ‘वॉइड ऐब इनिशियो’ का अर्थ है “शुरुआत से शून्य”। संविदा के पक्ष अवैध रूप से उस पर आधारित हैं जो समझौते में लिखा गया था क्योंकि जारी किया गया समझौता कभी भी वैध नहीं था। हालाँकि, इसके कुछ अपवाद लागू होते हैं। इस प्रकार का समझौता कभी भी शून्य नहीं हो सकता क्योंकि यह कभी भी एक कानूनी संविदा नहीं था, जिसे शुरू किया जा सके। 
  2. इसके निष्पादन की अव्यावहारिकता (इंप्रैक्टीकैलिटी) शून्य है:- एक संविदा इसके निष्पादन की असंभवता के कारण भी शून्य हो सकता है। उदाहरण के लिए: यदि दो पक्षों X और Y के बीच एक संविदा बनता है, लेकिन संविदा के निष्पादन के दौरान संविदा का उद्देश्य करना अव्यावहारिक हो जाता है (संविदा पक्षों के अलावा किसी और के कारण), तो संविदा कानून की अदालत में लागू नहीं किया जा सकता है और इस प्रकार शून्य है। शिखा मिश्रा और अन्य बनाम एस कृष्णमूर्ति, 2014 का हवाला (साइट) दिया गया मामला एक शून्य संविदा का एक उदाहरण है।

तालाबंदी समझौता (लॉकआउट एग्रीमेंट)

सामान्य अर्थ में तालाबंदी का अर्थ है “कर्मचारियों को उनके नियोक्ता (एम्प्लॉयर) द्वारा उनके कार्यस्थल से तब तक बाहर करना जब तक कि कुछ शर्तों पर सहमति नहीं हो जाती है।” तालाबंदी समझौता एक विरोधाभासी (कंट्राडिक्टरी) बयान है। तालाबंदी या विशिष्टता (एक्सक्लूसिविटी) समझौते एक विक्रेता को किसी अन्य पक्ष के साथ विशिष्टता के दौरान या तालाबंदी अवधि के दौरान संचारण को रोकने की कोशिश करते हैं । 

हालांकि, इस बात पर जोर देना आवश्यक है कि तालाबंदी समझौते न तो विक्रेता को बेचने के लिए और न ही खरीदार को खरीदने के लिए सुरक्षित करते हैं। वे विक्रेता को लॉकआउट अवधि के अंत में किसी अन्य को संपत्ति बेचने से नहीं रोकते हैं। बिक्री और खरीद के संदर्भ में तालाबंदी समझौते अधिक सामान्य हैं, लेकिन उन्हें पट्टे के अनुदान या संविदा के साथ-साथ अन्य अचल संपत्ति लेनदेन के लिए भी लागू किया जा सकता है।

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तालाबंदी की प्रवर्तनीयता (इंफोर्सिबिलिटी)

  1. प्रकृति में नकारात्मक (नेगेटिव इन नेचर): विक्रेता को दूसरों के साथ समझौते पर बातचीत नहीं करने के लिए बाध्य होना चाहिए। संभावित क्षमता के साथ विक्रेता पर बातचीत करने के लिए खरीदार के लिए एक सकारात्मक प्रतिबद्धता (पॉज़िटिव कमिटमेंट) अप्राप्य (अनइंफ़ोर्सिबल) होने की संभावना नहीं है। 
  2. एक निश्चित समय अवधि के लिए: एक “उचित समय” के भीतर समझौते को शून्य माना जाएगा क्योंकि वे अनिश्चित हैं। 
  3. भुगतान या “प्रतिफल”: एक विलेख (डीड) के रूप में इसे समझौते के लिए निष्पादित किया जाना चाहिए। हालांकि, लागत हासिल करना खरीदार की जिम्मेदारी है। उदाहरण के लिए, उचित ध्यान देने के लिए अपने सॉलिसिटरों का मार्गदर्शन करने में कानूनी लागत या सर्वेक्षण करने में सर्वेक्षकों की लागत प्रतिफल कहा जा सकता है।

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तालाबंदी समझौते के उल्लंघन के उपाय

  • यदि तालाबंदी अवधि के दौरान विक्रेता द्वारा समझौते का उल्लंघन किया जाता है और किसी और को बेच दिया जाता है, तो अंतर्निहित खरीदार केवल अपनी खोई हुई या व्यर्थ लागतों को पुनर्प्राप्त करने में सक्षम होगा। उदाहरण के लिए- कानूनी फीस या सर्वेयर की फीस। संभावित खरीदार को विशिष्टता अवधि के दौरान विक्रेता को किसी और को बेचने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने की बहुत संभावना नहीं है क्योंकि खरीदार को बिक्री की आवश्यकता के लिए कोई शक्ति नहीं थी। 
  • एक निषेधाज्ञा (इंजनक्शन) संभव नहीं है और नुकसान सीमित होगा; इसलिए यदि किसी विक्रेता को विशिष्टता अवधि के दौरान किसी और से बढ़ा हुआ प्रस्ताव मिलता है तो वह तालाबंदी समझौते को भंग करने का निर्णय ले सकता है, दूसरे पक्ष के साथ आगे बढ़ सकता है और उल्लंघन के लिए न्यूनतम नुकसान का भुगतान कर सकता है। 
  • सहमत भरपायी (एग्रीड डैमेज़) के लिए, कुछ समझौते स्पष्ट रूप से एक निर्दिष्ट उच्च स्तर पर विक्रेता को समझौते को भंग करने से पहले दो बार सोचने के लिए प्रदान करते हैं। विक्रेता इस तरह के नुकसान के प्रावधान को अनुदान देता है या नहीं, यह पक्षों की सौदेबाजी की ताकत और विशिष्टता की अवधि पर निर्भर करेगा। पूर्व निर्धारित नुकसान का स्तर नुकसान का उचित पूर्व अनुमान होना चाहिए। यदि वे बहुत अधिक हैं, तो उन्हें “दंड” माना जा सकता है, जो लागू करने योग्य नहीं है।

किरायेदारी के नवीनीकरण (रिन्यूअल) का विकल्प

एक वित्तीय समझौता एक नवीनीकरण विकल्प में एक खंड है जो एक मूल समझौते को नवीनीकृत या विस्तारित करने की शर्तों को रेखांकित करता है। उन्हें किसी भी प्रकार के वित्तीय समझौते में शामिल किया जा सकता है जिसमें एक इकाई (एंटिटी) के लिए लंबी अवधि के लिए समझौते का विस्तार करना फायदेमंद होता है। चाहे आप किराएदार हों या मकान मालिक, संविदा या पट्टे पर बातचीत करते समय विचार करने के लिए महत्वपूर्ण शर्तों में से एक नवीनीकरण खंड है। 

नवीनीकरण का खंड किरायेदार की प्रारंभिक अवधि की समाप्ति के बाद एक निश्चित अवधि के लिए लगातार विकल्प प्रदान करता है। एक मकान मालिक के लिए, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि नवीनीकरण अवधि के दौरान और एक परेशानी वाले किरायेदार को नवीनीकरण करने के विकल्प को निष्पादित करने की क्षमता से इनकार करने के लिए नवीनीकरण खंड को देय किराए को अधिकतम करने के लिए तैयार किया गया है। इसके विपरीत, एक किरायेदार या गृहस्वामी यह सुनिश्चित करना चाहता है कि नवीकरण किराए पर यथोचित बातचीत की जा सकती है और यह कि पट्टे (लीज़) के तहत मामूली उल्लंघनों के लिए नवीनीकरण का विकल्प रद्द नहीं किया जा सकता है।

रेखांकन (इलस्ट्रेशन)

धारा 29 अनिश्चितता के समझौतों को बताती है, जिसका अर्थ निश्चित नहीं है, या निश्चित किए जाने में सक्षम नहीं है, और शून्य हैं। 

  • X, Y को “सौ टन गेहूं” बेचने के लिए सहमत होता है। यह दिखाने के लिए कुछ भी तर्कसंगत (रेशनल) नहीं है कि किस प्रकार का गेहूँ अभिप्रेत (इंटेंडेड) था। अनिश्चितता के कारण समझौता शून्य है। 
  • X, Y को निर्दिष्ट विवरण के एक सौ टन ईंधन (फ्यूल) को बेचने के लिए अनुदान देता है, जिसे वाणिज्य के एक लेख के रूप में जाना जाता है। समझौते को शून्य बनाने के लिए कोई अनिश्चितता या खंड नहीं है। 
  • I, जो सूती कपड़ों का व्यापारी है, केवल H को “एक सौ सूती कपड़े” बेचने के लिए सहमत है। I व्यापार की प्रकृति शब्दों का एक निहितार्थ प्रदान करती है और I ने एक सौ सूती कपड़ों के सौदे के लिए एक संविदा किया है। 
  • X, Y को “रामनगर में मेरे अन्न भंडार के सभी उपकरण” बेचने के लिए सहमत है। इस प्रकार, इस मामले में समझौते को शून्य करने की कोई अनिश्चितता नहीं है।

निष्कर्ष

जिन समझौतों का उद्देश्य या अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किए जाने के लिए अक्षम हैं, वे प्रकृति में शून्य हैं। एक समझौता अनिश्चित हो सकता है क्योंकि इसमें अस्पष्ट या अनिश्चित शर्तें हैं या क्योंकि यह अपर्याप्त है। सार्वभौमिक नियम (यूनिवर्सल रूल) यह है कि यदि किसी समझौते की शर्तें अनिश्चित हैं, जिसे पक्षों के इरादे की उचित निश्चितता के साथ निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो कानून संविदा को लागू नहीं करता है।

संदर्भ

  • भारतीय संविदा अधिनियम 1872 (बेयर एक्ट)

 

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