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सीआरपीसी, 1973 की धारा 389

सीआरपीसी, 1973 की धारा 389

यह लेख ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, देहरादून के कानून के छात्र Monesh Mehndiratta द्वारा लिखा गया है। यह लेख दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 389 की अनिवार्यताओं (एसेंशियल्स) की व्याख्या करता है। यह प्रासंगिक कानूनी मामले और इससे संबंधित अन्य धाराओं को भी प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय

क्या आप जानते हैं कि निचली अदालत द्वारा दोषी पाए जाने और सजा दिए जाने के बाद एक अभियुक्त (एक्यूज़्ड) क्या करता है?

इसका उत्तर यह है कि बचाव पक्ष का वकील उच्च न्यायालय में अपील दायर करता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि जिस अपराधी को सजा मिल जाती है उसका क्या होता है? क्या वह जेल जाता है या सार्वजनिक रूप से बाहर रहता है? और अगर वह जेल में है, तो क्या उसकी सजा जारी रहती है या उसे तब तक के लिए निलंबित (सस्पेंड) कर दिया जाता है जब तक कि उसके बचाव पक्ष के वकील द्वारा की गई विशेष अपील में निर्णय की घोषणा नहीं हो जाती?

रुकिए, इन सवालों के जवाब खोजने के लिए आपको घबराने या चिंता करने की जरूरत नहीं है। इस लेख के अंत में आप इन सभी सवालों का जवाब पा सकेंगे।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 53 के तहत पांच प्रकार के दंड हैं, जो किसी भी अपराधी पर लगाए जा सकते हैं। सजा उनमें से ही एक है और इसमें कारावास भी शामिल है, जो सरल या कठोर हो सकता है। जब भी किसी अपराधी को सजा दी जाती है तो उसे अपनी सजा के कई साल जेल में काटने पड़ते हैं। यदि वह न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो उसे उच्च न्यायालयों में अपील करने का अधिकार होता है। लेकिन जब तक अपीलय अदालत में अपील लंबित है, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अध्याय XXIX के तहत धारा 389 के अनुसार उसकी सजा को निलंबित (सस्पेंड) किया जा सकता है। यह लेख आगे इस धारा की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) की व्याख्या करता है और विभिन्न कानूनी मामलों को प्रदान करता है।

सजा का निलंबन

निलंबन का अर्थ है किसी को वह काम जारी रखने से रोकना जो वह पहले से कर रहा है या उन्हें उनके पद से अस्थायी रूप से हटाना। जब किसी अपराधी की सजा अस्थायी रूप से निलंबित कर दी जाती है और उसे जेल से रिहा कर दिया जाता है, भले ही उसकी कारावास की अवधि अभी समाप्त न हुई हो, तो उसे सजा का निलंबन कहा जाता है। सीआरपीसी की धारा 389 में प्रावधान है कि अगर सजा काट रहा अपराधी अपीलीय अदालत में अपील दायर करता है, तो उचित औचित्य और कारणों पर उसकी सजा को निलंबित किया जा सकता है। लेकिन निलंबन से पहले, ऐसी अपीलीय अदालतों को लिखित में कारणों को दर्ज करना होता है, और यदि अपराधी को जेल में रखा जाता है, तो उसे जमानत पर या अपने बॉन्ड के आधार पर रिहा किया जा सकता है।

हालांकि, यदि अपराधी को आजीवन कारावास, मृत्यु, या ऐसे कारावास से दंडित किया जाता है जो 10 वर्ष से कम नहीं है, तो लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) को अपीलीय अदालत में अपील लंबित रहने के दौरान अपराधी को रिहा न करने के कारण पेश करने का अवसर दिया जाएगा। वह उन मामलों में जमानत रद्द करने के लिए आवेदन भी दायर कर सकता है जहां अपराध गंभीर प्रकृति का था।

यह धारा निचली अदालत को अपराधी को जमानत पर रिहा करने की शक्ति देती है, यदि आवेदन द्वारा, वह अदालत को संतुष्ट करता है कि वह उच्च न्यायालय में अपील दायर करने का इच्छुक है। अदालत को उसे तब तक रिहा करना होगा जब तक कि ऐसा न करने के कोई विशेष कारण न हों। इस संबंध में अपीलीय अदालत द्वारा कोई आदेश प्राप्त होने तक, ऐसे व्यक्ति की सजा निलंबित रहेगी। निलंबन की यह अवधि उसकी वास्तविक सजा अवधि से हटा दी जाएगी।

सीआरपीसी की धारा 389 की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी)

सीआरपीसी की धारा 389 को केवल निम्नलिखित शर्तों के तहत लागू किया जा सकता है:

  • धारा के तहत दी गई शक्ति केवल तभी लागू की जा सकती है जब अभियुक्त को अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाता है।
  • उप-धारा (3) के तहत दी गई शक्ति का प्रयोग केवल एक दोषी अदालत या निचली अदालत द्वारा किया जा सकता है, और उन मामलों में कारावास की अवधि जहां निचली अदालत को इस शक्ति का प्रयोग करना है, वह 3 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • अपील या उच्च न्यायालय में अपील करने का इरादा होना चाहिए।
  • इस धारा में यह भी आवश्यक है कि दोषसिद्ध (कन्विक्टेड) व्यक्ति को अपील करने का अधिकार हो और तभी उसकी सजा को निलंबित किया जा सकता है और उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है।

मयूराम सुब्रमण्यम श्रीनिवासन बनाम सीबीआई (2006) के मामले में भी इन शर्तों का उल्लेख किया गया था।

सीआरपीसी की धारा 389 की विशेषताएं

सीआरपीसी की धारा 389 में निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

  • यह धारा दोषसिद्ध व्यक्ति को जमानत का अधिकार प्रदान नहीं करती है, लेकिन यदि सरकारी वकील द्वारा कोई आपत्ति नहीं की जाती है और अदालत संतुष्ट है कि उसे रिहा करने पर कोई खतरा नहीं होगा, तो वह जमानत पर रिहा होने का पात्र हो सकता है।
  • निचली अदालत के पास रिहाई और निलंबन से इंकार करने की शक्ति है यदि ऐसा करने के लिए उनके पास विशेष कारण हैं।
  • इस धारा का उद्देश्य यह है कि जब कोई दोषसिद्ध व्यक्ति निचली अदालत के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता है तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
  • धारा कोई अधिकतम सीमा प्रदान नहीं करती है जिस तक व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। लेकिन केवल यह प्रावधान करता है कि इस संबंध में उच्च न्यायालय से आदेश प्राप्त होने तक उसे रिहा किया जाए।
  • धारा की उप-धारा (3) में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा के निलंबन को ‘निलंबन माना गया (डीम्ड)’ माना जाता है।
  • जब कोई अपराधी या दोषसिद्ध व्यक्ति जमानत पर रिहा होता है, तो इसका अर्थ यह भी होता है कि उसकी सजा उस समय के लिए निलंबित कर दी जाती है।

दोषसिद्ध व्यक्तियों का अर्थ

‘दोषसिद्ध व्यक्तियों’ शब्द में कोई भी व्यक्ति शामिल है जिसे किसी अपराध के लिए दंडित किया गया है और जेल में रखा गया है। जब सत्र (सेशन) न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष इजाजत से अपील दायर की जाती है, तो ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय को व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने की शक्ति दी जाती है। हालाँकि, धारा में प्रयुक्त ‘हो सकता है’ जैसे शब्द प्रदान करते हैं कि किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करना अनिवार्य नहीं है।

अनुराग बैठा बनाम बिहार राज्य, 1987 के मामले में यह निर्धारित किया गया था कि यदि उच्च न्यायालय किसी भी कारण से उचित समय सीमा के भीतर अपील की सुनवाई करने में सक्षम नहीं होता है, तो उसे अभियुक्त को जमानत पर रिहा करना चाहिए यदि अपील की जाती है जब एक पर्याप्त अपील और शुल्क अभी भी लंबित हैं।

अपील के दौरान जमानत प्रदान करना

यह धारा की उप-धारा (3) के तहत दिया गया है और उप-धारा (1) के तहत दी गई बातों के विपरीत है। दोनों उपखण्ड एक दूसरे से भिन्न हैं। उप-धारा (3) में दी गई सभी शर्तों को ध्यान में रखते हुए अदालत के लिए दोषी व्यक्ति को जमानत देना अनिवार्य बनाता है जो अपील दायर करने के लिए तैयार है और अदालत उसके आवेदन से संतुष्ट है।

हालाँकि, यह केवल उन मामलों में लागू होता है जहाँ दोषी व्यक्ति को अपील करने का अधिकार है। उदाहरण के लिए, संविधान का अनुच्छेद 136 अधिकार के रूप में अपील करने का कोई अधिकार प्रदान नहीं करता है। यह सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी मामले में अपील करने के लिए विशेष अनुमति देने का विवेकाधिकार देता है और इसलिए एक दोषसिद्ध व्यक्ति को जमानत नहीं दी जा सकती है जब इस तरह की अपील सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वयं इस अनुच्छेद (बी. सुब्बैया बनाम कर्नाटक राज्य, 1992) के तहत की जाती है। एक अन्य मामले में अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां हत्या जैसा गंभीर अपराध किया जाता है, अभियुक्त को जमानत देते समय प्रासंगिक सिद्धांतों पर विचार किया जाना चाहिए (विजय कुमार बनाम नरेंद्र, 2002)।

अपीलीय न्यायालय की अन्य शक्तियाँ

संहिता की धारा 386 अपीलीय अदालत को विभिन्न शक्तियां देती है। जब भी किसी मामले का कोई पक्ष न्यायालय के निर्णय से असंतुष्ट होता है, तो उन्हें उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार होता है। यह उच्च न्यायालय, जहाँ अपील की जाती है, अपीलीय न्यायालय कहलाता है और उसके पास निम्नलिखित शक्तियाँ होती हैं:

  • यह दोषमुक्ति (एक्विटल) का आदेश जारी कर सकता है, आदेश को उलट सकता है, और मामले की जांच का निर्देश दे सकता है।
  • यह किसी मामले को फिर से मुकदमा चलाने और सजा सुनाने का आदेश भी दे सकता है।
  • अगर सजा के बाद अपील की जाती है, तो यह हो सकता है
    • सजा को उलट दें, अभियुक्त को बरी कर दें या रिहा कर दें, या किसी सक्षम अधीनस्थ (सबोर्डिनेट) न्यायालय को उसके खिलाफ फिर से मुकदमा करने का आदेश दें,
    • निचली अदालतों के निष्कर्षों को बदलें,
    • एक निर्णय की प्रकृति या सीमा बदलें।
  • यदि सजा या दंड को बढ़ाने के लिए अपील की जाती है, तो यह निष्कर्ष को उलट सकता है, सजा की प्रकृति या सीमा को बदल सकता है या निष्कर्ष को बदल सकता है।
  • यदि किसी अन्य आदेश के विरुद्ध अपील की जाती है, तो वह ऐसे आदेश को बदल या उलट सकता है।
  • यह आदेशों में संशोधन भी कर सकता है या परिणामी (कंसीक्वेंशियल) या आकस्मिक (इंसीडेंटल) आदेश पारित कर सकता है।

कानूनी मामले

नवजोत सिंह सिद्धू बनाम पंजाब राज्य (2007)

6
मामले के तथ्य

इस मामले में, अपीलकर्ता संसद सदस्य (सांसद) था और उसे एक अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था जो उसने सांसद बनने से पहले किया था। जैसे ही उन्हें दोषी ठहराया गया, उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, अपने कार्यालय या स्थिति का लाभ नहीं उठाया और परिणाम भुगतने के लिए तैयार थे। मामले में सबूत उनके पक्ष में थे और सांसद के पद से इस्तीफा देने के उनके कार्य को एक नैतिक कार्य माना गया था।

5
मामले में मुद्दे

मुद्दों में से एक यह था कि क्या अपील के दौरान उनकी सजा को निलंबित कर दिया जाएगा।

4
मामले में फैसला

इस मामले में अदालत ने उनकी अपील के दौरान उनकी सजा को निलंबित कर दिया था, यह देखते हुए कि अगर उनकी सजा को निलंबित नहीं किया गया होता तो उन्हें अपूरणीय क्षति (इररिपेयरेबल इंजरी) होती। अदालत ने यह भी कहा कि यह अपीलकर्ता का दायित्व है कि वह अदालत का ध्यान उन परिणामों की ओर आकर्षित करे जो उसकी दोषसिद्धि को निलंबित नहीं किए जाने पर उसे भुगतना पड़ सकता है। यह माना गया था कि मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए दुर्लभ मामलों में निलंबन की ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। अपील के हर मामले में दोषसिद्धि के निलंबन का आदेश देना अनिवार्य नहीं है।

आशीष विधवानी बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) (2022)

3
मामले के तथ्य

इस मामले में, अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया गया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। एक अपील में, अपीलकर्ता ने प्रस्तुत किया कि निचली अदालत अभियोजन पक्ष के सोशल मीडिया ब्लॉग के बारे में सबूतों पर विचार करने में विफल रही, जहां उसने उल्लेख किया कि वह विवाह की संस्था में विश्वास नहीं करती है और वह यह भी जानती है कि अपीलकर्ता विवाहित थी और उसके दो बच्चे थे, इस तरह शादी के वादे की कथित कहानी को झूठा बना दिया गया था।

2
मामले में मुद्दे

क्या अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे थे और क्या उसे अपील के दौरान जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए?

1
मामले का फैसला

अपीलीय अदालत ने अपीलकर्ता की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि उनके बीच यौन संबंध स्वैच्छिक था और मामले के तथ्यों और सबूतों की गहराई से जांच करने की आवश्यकता थी। सभी सबूतों का पुनर्मूल्यांकन (रीअसेसमेंट) किया जाना चाहिए और इस स्तर पर सजा के निष्पादन (एग्जिक्यूशन) पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने अपीलकर्ता की सजा को 25,000/- रुपये के दो ज़मानतदार और कुछ शर्तों के साथ निजी बॉन्ड पर जब तक अपील का निपटारा नहीं हो जाता, निलंबित करने का भी आदेश दिया।

निष्कर्ष

धारा 389 अपीलीय अदालत को दोषसिद्ध व्यक्ति को अंतरिम जमानत देने की शक्ति देती है जब तक कि अदालत इस संबंध में कोई आदेश पारित नहीं करती। धारा की उप-धारा (3) आरोपी को दोषी ठहराने के लिए निचली अदालत को प्रतिबंधात्मक (रिस्ट्रिक्टिव) शक्ति देती है कि वह अपनी सजा को निलंबित कर सकती है और उसे जमानत दे सकती है। यह उसे एक उच्च न्यायालय में अपील करने और अपने बचाव पक्ष के वकील की मदद से अपना मामला पेश करने का अवसर देने के लिए किया जाता है। यह तब भी लागू हो सकता है जब दोषी व्यक्ति जमानत पर है, उसे अधिकतम 3 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई है, या उसके द्वारा किया गया अपराध जमानती है और वह जमानत पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ.ए.क्यू.)

सजा के निलंबन के संबंध में अपील के दौरान सामान्य नियम क्या है?

धारा के तहत सामान्य नियम यह है कि जब दोषी व्यक्ति द्वारा की गई अपील लंबित होती है या वह निचली अदालत को संतुष्ट करता है कि वह अपील करना चाहता है, तो उसकी सजा अदालत द्वारा निलंबित कर दी जाती है। निचली अदालत को उसे तब तक जमानत देनी होगी जब तक कि उसके पास ऐसा न करने के कुछ विशेष कारण न हों (धारा 389 की उपधारा 3)।

क्या उच्च न्यायालयों के पास नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट 1985 के तहत किसी अपराध के लिए सजा को निलंबित करने की शक्ति है?

उच्च न्यायालयों को इस अधिनियम की धारा 36B के तहत ऐसे मामलों में दोषसिद्ध व्यक्ति की सजा को निलंबित करने की शक्ति दी गई है, जो अधिनियम की धारा 37 के तहत विभिन्न शर्तों और सीमाओं के अधीन है।

क्या हत्या के मामले में सजा निलंबित की जा सकती है?

आम तौर पर, हत्या जैसे गंभीर अपराधों में सजा को निलंबित नहीं किया जाता है, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। एक मामले में, आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया गया था और उसकी अपील लंबित रहने तक उसकी सजा निलंबित कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने इसके लिए कोई कारण दर्ज नहीं किया, इसलिए आदेश को रद्द कर दिया गया और निलंबन की अनुमति नहीं दी गई (रामजी प्रसाद बनाम रतन कुमार जायसवाल, 2002)।

संदर्भ

 

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