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आईपीसी की धारा 468

आईपीसी की धारा 468

यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, नोएडा में कानून की छात्रा Panya Sethi द्वारा लिखा गया है। इस लेख में भारतीय दंड संहिता की धारा 463 के तहत जालसाजी (फॉर्जरी) के अर्थ, आवश्यक तत्व जो जालसाजी को शामिल करते है, जिसमें नकली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को बनाना, जनता के किसी भी सदस्य को नुकसान पहुंचाने का इरादा, और जालसाजी के उदाहरणों को समझाने के लिए उदाहरण और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 468 के तहत इसी के लिए सजा को शामिल किया गया है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

जालसाजी को भारतीय दंड संहिता, 1860 के अध्याय 18 के तहत एक अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। लिखित या डिजिटल रिकॉर्ड के मिथ्याकरण से जुड़े मामलों को धारा 463 से 477-A में संबोधित किया गया है। ऐसा ही एक कानून भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 468 में है। इस लेख में धारा 463 के तहत जालसाजी की परिभाषा और इसके लिए दंड की पूरी तरह से जांच की गई है। इसके अलावा, मेरे शोध (रिसर्च) ने मुझे यह निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित किया है कि जालसाजी के चरम उदाहरण (धारा 466–469) भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, धोखाधड़ी के इरादे से जालसाजी (धारा 468), धब्बा लगाने के इरादे से जालसाजी (धारा 469), आदि। लेख के अंतिम खंड में मामलो का हवाला दिया गया है और उनकी जांच की गई है, जिसमें धारा 472 से लेकर 477-A तक शामिल हैं।

जालसाजी की परिभाषा 

धोखा देने या धोखे से पैसे या संपत्ति प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ एक दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उद्देश्यपूर्ण निर्माण या परिवर्तन जालसाजी के रूप में जाना जाता है, जो एक गंभीर अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 463 के अनुसार, यह गैरकानूनी आचरण एक गंभीर अपराध के रूप में योग्य है। नकली कागजों के उपयोग से होने वाले संभावित नुकसान को देखते हुए, इस तरह के कपटपूर्ण व्यवहार को रोकने, पता लगाने और दंडित करने के लिए सख्त तरीकों को लागू करना महत्वपूर्ण है।

आईपीसी की धारा 468 के तहत किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने के उद्देश्य से किए गए जालसाजी के अपराध के लिए सजा निर्धारित है। जालसाजी किसी भी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जो जनता या किसी व्यक्ति को नुकसान या चोट पहुंचाने के इरादे से, या किसी दावे या शीर्षक का समर्थन करने के लिए, या किसी भी व्यक्ति को संपत्ति से अलग करने के लिए, या किसी व्यक्त या निहित अनुबंध में प्रवेश करने के लिए, या धोखाधड़ी करने के इरादे से या धोखाधड़ी की संभावना के साथ, झूठे दस्तावेज या झूठे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, या दस्तावेजों या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के हिस्से बनाता है।

निम्नलिखित उदाहरण हैं:

  • किसी दस्तावेज़ को बेईमानी से या धोखाधड़ी से बनाने, हस्ताक्षर करने, मुहर  करने या अन्यथा निष्पादित (एग्जिक्यूट) करने के इरादे से ऐसा प्रतीत होना जैसे कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के अधिकार द्वारा बनाया गया, हस्ताक्षरित, मुहर किया हुआ या अन्यथा निष्पादित किया गया हो, जिस पर निर्माता के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं था और फिर उस आशय के किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्रेषित (ट्रांसमिट) करना है।
  • हर बार एक व्यक्ति, या तो अकेले या सहायता से, लिखित या डिजिटल रिकॉर्ड का उपयोग करके बेईमानी या धोखाधड़ी की गतिविधि में संलग्न होता है।
  • जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर, मुहर, निष्पादन, या संशोधन करके बेईमानी या धोखाधड़ी करता है, जबकि वह व्यक्ति नशे, मानसिक दुर्बलता, या बेईमानी के कारण ऐसा नहीं कर सकता है।

आईपीसी की धारा 463 के तहत, जालसाजी को “किसी भी जाली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाने” के रूप में परिभाषित किया गया है।

शीला सेबेस्टियन बनाम आर. जवाहरराज और अन्य (2018) के मामले में, आईपीसी की धारा 463 और 464 दोनों पर चर्चा की गई थी। जालसाजी को धारा 463 में परिभाषित किया गया है, और धारा 464 इस परिभाषा का समर्थन करते हुए समझाती है कि कब एक जाली कागज या डिजिटल रिकॉर्ड को धारा 463 में परिभाषित जालसाजी करने के इरादे से बनाया गया माना जा सकता है। हालाँकि, धारा 464, जालसाजी के केवल एक प्रमुख घटक को संबोधित करती है, अर्थात्, नकली दस्तावेज़ का निर्माण। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी फैसला सुनाया कि जालसाजी का आरोप किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं लगाया जा सकता जो जाली दस्तावेज़ का मूल निर्माता नहीं था।

टी.एन रगमिनी बनाम सी. अच्युता मेनन (1990), में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि, किसी भी चीज़ के लिए आवेदन करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के नाम का उपयोग करना आईपीसी की धारा 464 के तहत जालसाजी नहीं है।

उदहारण 

  • B को एक संपत्ति बेचने और B से खरीद धन प्राप्त करने के लिए, A ने Z से A को संपत्ति के हस्तांतरण (ट्रांसफर) का दावा करते हुए एक जाली दस्तावेज तैयार किया और Z की अनुमति के बिना दस्तावेज पर Z की मुहर लगा दी। A ने दस्तावेजों की जालसाजी की है।
  • Z के साथ काम पाने के लिए, A ने B की जानकारी या सहमति के बिना A के अच्छे नैतिक चरित्र को प्रमाणित करने वाले पत्र पर B के जाली हस्ताक्षर कर दिए। इस हद तक कि A ने Z को सेवा के लिए एक स्पष्ट या निहित अनुबंध में प्रवेश करने के इरादे से नकली प्रमाण पत्र दिया, A ने जालसाजी की है।

आईपीसी की धारा 463 के तहत जालसाजी का अपराध करने के लिए, एक व्यक्ति को नकली दस्तावेज तैयार करके और हस्ताक्षर करके किसी अन्य व्यक्ति को चोट या क्षति पहुंचाने के लिए बेईमानी या धोखाधड़ी से व्यवहार करना चाहिए।

जालसाजी के आवश्यक तत्व 

जालसाजी के अपराध का अनिवार्य तत्व, जैसा कि आईपीसी की धारा 463 द्वारा परिभाषित किया गया है, “किसी अन्य व्यक्ति या जनता को नुकसान पहुंचाने या घायल करने के इरादे से एक झूठे दस्तावेज़ या उसके हिस्से का जानबूझकर निर्माण; किसी भी दावे या शीर्षक का समर्थन करना; संपत्ति के हस्तांतरण को प्रेरित करना; एक निहित या व्यक्त अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करना; या धोखाधड़ी करना या भविष्य में धोखाधड़ी होने की संभावना होना, है।

जालसाजी की प्रस्तुति 

जालसाजी  के अपराध के लिए आपराधिक दायित्व स्थापित करने के लिए आवश्यक प्राथमिक तत्व एक नकली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का निर्माण है। धारा 464 के अनुसार अभियुक्त व्यक्ति वह है जो जाली दस्तावेज बनाता है। धारा 464 उन कार्यों को परिभाषित करती है जो एक कपटपूर्ण दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के निर्माण का गठन करते हैं। धोखाधड़ी प्रभावी होने के लिए इसे किसी वास्तविक व्यक्ति के नाम से प्रकाशित या तैयार करने की आवश्यकता नहीं है; यह केवल वैध होना है।

एक व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि उसने एक नकली दस्तावेज तैयार किया है, जैसा कि मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009), में सर्वोच्च न्यायालय ने नोट किया है कि उन्होंने किसी और के रूप में हस्ताक्षर किए या उस पर किसी और के हस्ताक्षर के किए है; एक आधिकारिक रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की है, या झूठ बोलकर या किसी नशे में धुत व्यक्ति को धोखा देकर एक दस्तावेज प्राप्त किया है।

जनता के किसी सदस्य को चोट या नुकसान पहुँचाना

दूसरी आवश्यकता यह है कि जालसाजी किसी को या किसी चीज़ को नुकसान पहुँचाने के विशिष्ट इरादे से की गई हो। संजीव रतनप्पा बनाम एंपरर (1932) के मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक पुलिस अधिकारी जो अपनी डायरी को यह दर्शाने के लिए बदल देता है कि उसने विशेष लोगों को निगरानी में नहीं रखा, वह जालसाजी के अपराध का दोषी नहीं होगा क्योंकि किसी अन्य व्यक्ति को खतरे में नहीं डाला गया था। नतीजतन, अगर किसी को चोट नहीं लगती है, तो आईपीसी की धारा 463 के तहत कोई आरोप नहीं लगाया जाएगा।

किसी पद या शीर्षक के प्रमाण के रूप में

धारा 463 संपत्ति के स्वामित्व को साबित करने के लिए जाली कागजात बनाना अवैध बनाती है और ऐसा करने के लिए किसी को भी दोषी ठहराती है। उदाहरण के लिए, D ने वादा किया है कि उनकी मृत्यु के बाद मेरी संपत्ति A, B और C के बीच तीन तरीकों से विभाजित होगी और A जानबूझकर B का नाम विलेख (डीड) से मिटा देता है ताकि वह और C पूरी संपत्ति को विभाजित कर सकें। A जालसाजी का दोषी है और आईपीसी की धारा 463 के तहत सजा के अधीन है।

किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति का कब्जा देने के लिए मजबूर करना

तथ्य यह है कि जाली दस्तावेज तैयार किए जाने के समय प्रश्नगत संपत्ति पहले से मौजूद थी, अगर जालसाजी किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने, नुकसान पहुंचाने या घायल करने के उद्देश्य से की गई थी तो यह अप्रासंगिक है।

यहाँ एक उदाहरण दिया गया है: मान लें कि A ने B को उसके लिए सोफा बेड बनाने के लिए कमीशन दी है, लेकिन तब C, B के आदेश को पूरा करने से पहले, B को D को सोफा बेड भेजने के लिए अधिकृत (ऑथराइज्ड) करने का दावा करने वाले पत्र पर A के हस्ताक्षर बनाता है। यह धोखाधड़ी का गठन करेगा।

कपटपूर्ण इरादा 

किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है यदि वह किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने के उद्देश्य से एक कपटपूर्ण दस्तावेज़ बनाता है। यहाँ धोखाधड़ी होने के लिए बेईमानी का इरादा होना चाहिए।

यहाँ एक उदाहरण दिया गया है: B एक पेंटिंग बनाता है और उस पर एक प्रसिद्ध कलाकार के नाम से हस्ताक्षर करने का नाटक करता है। वह नीलामी के लिए उसी तस्वीर को रखता है जिसे C ने अंततः खरीदा था। C को यह विश्वास दिलाने से कि कलाकृति एक प्रसिद्ध कलाकार द्वारा बनाई गई थी, जबकि वास्तव में, यह B द्वारा बनाई गई थी, B जालसाजी के अपराध का दोषी होगा। भले ही किसी ने कलाकृति नहीं खरीदी हो, फिर भी B पर जालसाजी का आरोप लगाया जा सकता है यदि उसने जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से इसे बाजार में उजागर किया था।

जालसाजी के परिणाम

जालसाजी एक अपराध है जिसके लिए आईपीसी की धारा 465 में उल्लिखित दंड का प्रावधान है। जैसा कि इस धारा में कहा गया है, जालसाजी अधिकतम 2 साल की सजा, जुर्माना या दोनों से दंडनीय है। किसी व्यक्ति को धारा 468 के दायरे में दोषी ठहराए जाने के लिए यह साबित करना होगा कि उसने उस व्यक्ति या अन्य संस्था को धोखा देकर गलत लाभ कमाया है। यह आवश्यक है कि दूसरों को धोखा देने वाले व्यक्ति द्वारा किसी प्रकार का लाभ उठाया जाए।

इस धारा के तहत अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त वास्तव में धोखाधड़ी का अपराध करे; यहाँ जो मायने रखता है वह इरादा है, या हम यह भी कह सकते हैं कि जालसाजी  का ऐसा कार्य करने वाले व्यक्ति का उद्देश्य क्या है।

इस धारा के तहत किया गया अपराध संज्ञेय (कॉग्निजेबल), गैर-जमानती और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (ट्राइएबल) है। सजा की अवधि में कारावास शामिल है जिसे मामले के आधार पर 7 साल तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना या दोनों के साथ दंडनीय है।

मामले 

भारतीय दंड संहिता की धारा 468 के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐतिहासिक निर्णय डॉ. विमला बनाम दिल्ली प्रशासन (1962) के मामले में दिया गया था। डॉ. विमला ने अपनी नाबालिग बेटी के नाम पर एक पावर कार खरीदी और पॉलिसी अपनी बेटी के नाम पर हस्तांतरित कर दी। बाद में, कार की दो दुर्घटनाएँ हुईं, और डॉ. विमला ने बीमा पॉलिसी के खिलाफ लगातार दो दावे दायर किए।

डॉ. विमला ने नलिनी (उनकी पुत्री) के रूप में दावा पत्रों पर हस्ताक्षर किए और रसीदों की पावती (एक्नोलेजमेंट) भी दी। यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित किया गया था कि अभियुक्त, विमला आईपीसी की धारा 468 के तहत अपराध की दोषी नहीं थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि उक्त धोखे से न तो उसे दावा राशि का लाभ मिला और न ही बीमा कंपनी को किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान हुआ।

उड़ीसा राज्य बनाम बिष्णु चरण मुदुली (1985), के मामले में बस के चालक और क्लीनर को वाहन की लाइसेंस प्लेट को बदलने और मिलान करने के लिए पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) पुस्तिका को बदलने के बाद दुर्घटना करने का दोषी पाया गया। दोनों को उड़ीसा उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 477-A के उल्लंघन का दोषी ठहराया गया था।

मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “एक व्यक्ति को एक झूठा दस्तावेज़ बनाने के लिए कहा जाता है यदि उसने किसी और के होने या किसी और द्वारा अधिकृत होने का दावा करते हुए एक दस्तावेज़ बनाया या निष्पादित किया, दस्तावेज़ को बदल दिया या उससे छेड़छाड़ की या धोखे करके दस्तावेज़ प्राप्त किया है।

संजीव रतनप्पा बनाम एंपरर (1932) में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि “एक पुलिस अधिकारी जो अपनी डायरी में कोई बदलाव करता है ताकि यह दिखाया जा सके कि उसने कुछ व्यक्तियों को निगरानी में नहीं रखा था, वह जालसाजी के अपराध के लिए उत्तरदायी नहीं होगा क्योंकि किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान या चोट का कोई खतरा नहीं हुआ था।”

शीला सेबेस्टियन बनाम आर. जवाहरराज (2018) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया कि एक व्यक्ति जो जालसाजी का निर्माता नहीं है, उसे जालसाजी का आदेश नहीं दिया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी फैसला सुनाया कि धारा 463 के तत्वों के बिना जालसाजी का अपराध अधूरा है। इसलिए, केवल धारा 464 की अनिवार्यताओं के आधार पर किसी व्यक्ति को धारा 465 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

गुरु बिपिन सिंह बनाम चोंगथम मनोहर सिंह (1996) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने जालसाजी की अनंतिम व्याख्या के एक और पहलू की पड़ताल की। भारतीय दंड संहिता की धारा 468 में बड़ी हद तक धोखा देने के इरादे से जालसाजी पर चर्चा की गई है और सात साल तक की जेल की सजा है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि इस मामले में जालसाजी प्राथमिक दावा है और धोखाधड़ी एक माध्यमिक प्रभाव है। नतीजतन, अगर जालसाजी प्रासंगिक नहीं है, तो धोखाधड़ी भी नहीं है। धारा 468 जालसाजी के अधिक उग्र (एग्रावेटेड) रूप की बात करती है।

किशन लाल बनाम राज्य (1989) में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिवादी ने आदाता (पेई) होने का दावा किया जबकी वह नहीं था और वास्तविक आदाता के नाम पर डाक पावती पर हस्ताक्षर किए। अदालत के फैसले के अनुसार, आईपीसी की धारा 467 अपराध के लिए अभियुक्त को जवाबदेह ठहराती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि नंद कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (1992) में प्रतिवादी को सबूतों की कमी के कारण दोषी नहीं पाया गया था, यह दिखाने के लिए कि वह इसके बारे में जानता था और एलआईसी बीमा प्राप्त करने के लिए फर्जी कागजात के लिए सह-अभियुक्त के लिए अपनी स्वीकृति दी थी। अदालत के सामने एकमात्र सबूत उनके खाते में प्रीमियम राशि का जमा होना था, जो धारा 468 के तहत उनकी दोषीता को स्थापित करने के लिए अपर्याप्त था।

निष्कर्ष

जालसाजी को भारतीय कानून के तहत एक गंभीर अपराध माना जाता है, और इसके लिए महत्वपूर्ण दंड का प्रावधान है। आईपीसी की धारा 468 में जालसाजी के दोषी पाए गए व्यक्तियों के लिए अधिकतम सात साल के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। सरल शब्दों में, जालसाजी में दूसरों को धोखा देने या नुकसान पहुँचाने के इरादे से एक झूठे दस्तावेज़ बनाना शामिल है। इसमें कपटपूर्ण दावों का समर्थन करने के लिए झूठे दस्तावेजों का उपयोग करना, किसी को संपत्ति छोड़ने के लिए प्रेरित करना, अनुबंध करना, या अन्य प्रकार की धोखाधड़ी करना शामिल हो सकता है। ऐसी कोई भी कार्रवाई अवैध मानी जाती है और इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

जालसाजी क्या है?

भारतीय दंड संहिता की धारा 463 जालसाजी को किसी भी झूठे दस्तावेज या उसके किसी भी हिस्से को जनता या किसी विशेष व्यक्ति को चोट या क्षति पहुंचाने के मकसद से, किसी भी शीर्षक या दावे का समर्थन करने, किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से अलग करने या किसी निहित या व्यक्त अनुबंध में प्रवेश करने या धोखाधड़ी करने, के रूप में परिभाषित करती है। जाली दस्तावेज़ की परिभाषा भारतीय दंड संहिता की धारा 470 में दी गई है।

वे कौन से आवश्यक तत्व हैं जो धोखा देने के उद्देश्य से जालसाजी का कारण बनते हैं?

भारतीय दंड संहिता की धारा 468 के तहत निम्नलिखित तत्वों को सिद्ध करने की आवश्यकता है:

  • दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जाली है।
  • अभियुक्त ने जाली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाया है।
  • अभियुक्त ने जाली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को इस इरादे से बनाया कि जाली दस्तावेज़ का उपयोग धोखाधड़ी के उद्देश्य से किया जाएगा।

जालसाजी के आरोप के लिए क्या बचाव उपलब्ध हैं?

आमतौर पर, जालसाजी के सबूत की कमी कुछ ऐसी चीज है जिस पर ज्यादातर बचाव पक्ष के वकील भरोसा करते हैं। सामान्य तर्क यह है कि केवल कार्य का लाभार्थी होने के कारण, किसी को जालसाजी के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, अर्थात अपराध का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। संदेह अपराध के वास्तविक प्रमाण को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। आपराधिक मामलों में कानून की सख्त व्याख्या के सिद्धांत का पालन किया जाता है क्योंकि अभियुक्त की बेगुनाही की धारणा का सिद्धांत देखा जाता है।

उपलब्ध बचाव इस प्रकार हैं:

  • अपराधी द्वारा जाली दस्तावेज़ नहीं बनाया गया था;
  • दस्तावेज़ को चोट या क्षति पहुँचाने, शीर्षक या दावे का समर्थन करने, किसी अनुबंध में प्रवेश करने, किसी व्यक्ति को संपत्ति से अलग करने, या धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया था;
  • अभियुक्त ने जो किया उस पर उसका अधिकार था; और
  • अभियुक्त को जबरदस्ती अपराध करने के लिए मजबूर किया गया।

नुकसान साबित करने का भार किस पर है?

नुकसान साबित करने का भार अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष के ऊपर है। जालसाजी के अपराध का सार यह है कि अभियुक्त का पीड़ित को धोखा देने का इरादा उचित संदेह से परे है।

संदर्भ

 

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