यह लेख वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान की छात्रा Pratibha Bansal द्वारा लिखा गया है। उन्होंने मुस्लिम कानून के तहत तलाक की अवधारणा, मुस्लिम कानून के तहत तलाक के विभिन्न तरीकों और मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 के तहत विवाह के विच्छेदन (मैरिज डेजोल्यूशन) पर चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।
परिचय
विवाह-विच्छेद की विधियों को समझने के लिए पहले देखें कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत विवाह क्या है क्योंकि मुस्लिम कानून के अंतर्गत तलाक के लिए केवल विवाह ही आवश्यक है। विवाह के विच्छेदन को तलाक के रूप में जाना जाता है।
अलग-अलग धर्म विवाह को अलग-अलग तरीके से परिभाषित करते हैं, जैसे:-
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार विवाह एक धार्मिक संस्कार है।
- मुस्लिम कानून के तहत, विवाह दो पक्षों के बीच एक संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) संबंध है। एक अनुबंध के लिए आवश्यक सभी आवश्यक चीजें मुस्लिम विवाह के तहत मौजूद हैं। यहां एक प्रस्ताव (ऑफर), स्वीकृति, सहमति, प्रतिफल (कंसीडरेशन), पक्षों की क्षमता आदि है। इस तरह के विवाह का उद्देश्य हैं:
- संभोग (इंटरकोर्स) को वैध बनाना।
- सन्तानोत्पत्ति (प्रोक्रिएशन)।
शोहरत सिंह बनाम जाफरी बेगम के मामले में, प्रिवी काउंसिल ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत शादी एक धार्मिक समारोह है। इस्लाम के तहत शादी को समाज का आधार माना जाता है। विवाह एक ऐसी संस्था है जो मनुष्य को उसके उत्थान (अपलिफ्टमेंट) की ओर ले जाती है और जो मानव जाति की निरंतरता का साधन भी है।
तलाक एक वैवाहिक रिश्ते का अंत है, क्योंकि मुस्लिम कानून के तहत शादी के विच्छेदन के लिए दो तरीके दिए गए हैं-
- डायवोर्स
- तलाक
दैनिक जीवन में, इन दो शब्दों का वैकल्पिक (अल्टरनेटिव) रूप से उपयोग किया जाता है, लेकिन मुस्लिम कानून के तहत, यदि कोई व्यक्ति “डायवोर्स” चाहता है, तो वह मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 के विवाह विच्छेदन के प्रावधानों द्वारा शासित (गवर्न्ड) होगा। जबकि, “तलाक” की कार्यवाही मुस्लिमों के व्यक्तिगत कानून द्वारा शासित होती है।
विवाह विच्छेदन का वर्गीकरण
यहां मुस्लिम कानून के तहत विवाह के विच्छेदन के लिए विभिन्न प्रकार के तरीकों के बारे में संक्षिप्त जानकारी प्रदान करती है।
पति द्वारा
विवाह के विच्छेदन के लिए पति के सामने चार तरीके उपलब्ध हैं :
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तलाक-उल-सुन्नत
तलाक का यह रूप पैगंबर द्वारा स्थापित परंपराओं के अनुसार प्रभावी है । इसे पुनः दो भागों में बांटा गया है:-
1. अहसन
इसे तलाक के सबसे अच्छे तरीके के रूप में जाना जाता है। पति द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया इस प्रकार है –
- उसे एक ही वाक्य में तलाक का उच्चारण करना होता है, ऐसा उच्चारण शुद्ध अवस्था (जब स्त्री मासिक धर्म से मुक्त हो) में करना चाहिए।
- एक पति को इद्दत अवधि (शुद्धता की अवधि एक मुस्लिम महिला विवाह के विच्छेदन के बाद, अपने पति की मृत्यु या तलाक के द्वारा पालन करने के लिए बाध्य है) के दौरान किसी भी प्रकार के संभोग में शामिल नहीं होना चाहिए और यदि वह ऐसा करता है, तो इसे तलाक का निहित निरसन (इंप्लाइड रिवोकेशन) माना जाएगा। यह ध्यान रखना उचित है कि एक बार इद्दत की अवधि समाप्त हो जाने के बाद, तलाक अपरिवर्तनीय (इरेवोकेबल) हो जाता है।
- जब साथी ने उपभोग नहीं किया है, तो तलाक-ए-अहसन की उच्चारण तब भी किया जा सकता है, जब पत्नी अपने मासिक धर्म में हो।
2. हसन
हसन का अरबी अर्थ अच्छा है, इसलिए हसन प्रकार के माध्यम से तलाक का उच्चारण अहसन में उच्चारित एक अच्छा लेकिन कम मूल्य का है। तलाक के लिए पति को लगातार तीन बार उच्चारण करना पड़ता है।
- मासिक धर्म वाली पत्नी के मामले में, ऐसे तीन उच्चारण लगातार तीन तुहर (शुद्धता की स्थिति) में किए जाने चाहिए।
- मासिक धर्म न होने वाली पत्नी के मामले में, 30 दिनों के लगातार तीन अंतराल पर उच्चारण किया जाना चाहिए।
- तीन उच्चारणों की इन अवधियों के दौरान कोई संभोग नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा कार्य होता है तो तलाक की प्रक्रिया को रद्द कर दिया जाएगा।
- तलाक़ हसन इद्दत की अवधि के बावजूद तीसरे उच्चारण पर अपरिवर्तनीय हो जाता है।
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तलाक-उल-बिद्दत
कानून की सख्ती से बचने के लिए “उमैयद” द्वारा तलाक का यह रूप पेश किया गया है। यह तलाक का एक पापपूर्ण (सीनफूल) रूप है, क्योंकि इसे हनफियों में मान्यता प्राप्त है। सुन्नी कानून तलाक की इस विधी को मान्यता देता है, हालांकि इसके द्वारा भी इसे पापपूर्ण माना जाता है। जबकि शिया और मलिकी इस विधि को मान्यता प्राप्त नहीं होती है।
- एक ही तुहर में या तो एक ही वाक्य में या अलग-अलग वाक्यों में तीन उच्चारण किए जाते हैं। “तलाक, तलाक, तलाक” या ” मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं।”
- एकल उच्चारण स्पष्ट रूप से एक विवाह को भंग करने के इरादे को इंगित करता है और इसे अपरिवर्तनीय बनाता है । इसे आमतौर पर इस रूप में उच्चारित किया जाता है – ” मैं तुम्हें अपरिवर्तनीय रूप से तलाक देता हूं”।
तीन तलाक के माध्यम से अलग हुए साथी महिला की किसी अन्य पुरुष से शादी करके उससे तलाक होने की औपचारिकता के बिना पुनर्विवाह नहीं कर सकते, इस प्रक्रिया को निकाह हलाला कहा जाता है।
शायरा बानो बनाम भारत संघ और अन्य के हाल के फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया कि तीन तलाक की प्रथा असंवैधानिक है, क्योंकि तलाक का यह रूप भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
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इला (संयम का व्रत (वो ऑफ कॉन्टिनेंस))
जिस स्थिति में एक पति जो स्वस्थ दिमाग का है और वयस्कता (मेजोरिटी) की उम्र प्राप्त कर चुका है, वह भगवान के नाम की कसम खाता है कि वह अपनी पत्नी के साथ संभोग नहीं करेगा और इद्दत का पालन करने के लिए उसे छोड़ देगा, उसे इला बनाना कहा जाता है।
पति यदि पत्नी द्वारा पालन किए जा रहे इद्दत की अवधि के दौरान फिर से संभोग शुरू करता है, तो यह इला को रद्द कर देगा यह ध्यान देने योग्य है कि भारत में इला का पालन नहीं किया जाता है।
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ज़िहार (हानिकारक आत्मसात (इंज्यूरियस एसिमिलेशन))
विवाह के विच्छेदन के इस विधी का उपयोग करने के लिए पात्र होने के लिए एक पति का दिमाग स्वस्थ होना चाहिए और उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए। यदि वह अपनी पत्नी की तुलना अपनी माँ या किसी भी महिला से निषिद्ध (प्रोहिबीटेड) डिग्री के भीतर करता है, तो पत्नी को उसके साथ संभोग करने से इंकार करने का अधिकार है। इस तरह के इनकार को तब तक स्वीकार किया जा सकता है जब तक कि उसने खुद को कानून द्वारा निर्धारित तपस्या (पेनांस) से मुक्त नहीं कर लिया हो। मुता विवाह (शियाओं के बीच प्रचलित है) जो स्वीकार करता है कि किसी अन्य प्रकार के तलाक को ज़िहार द्वारा भंग नहीं किया जा सकता है। तलाक का ऐसा रूप अब उपयोग में नहीं है।
पत्नी द्वारा तलाक
पति द्वारा प्रत्यायोजित (डेलिगेटेड) शक्ति के तहत पत्नी द्वारा दिया गया तलाक।
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तलाक-ए-तफ़वीज़
यह एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा एक महिला अपने पति को तलाक दे सकती है, हालांकि तलाक देने की ऐसी शक्ति केवल पति द्वारा प्रत्यायोजित करने की आवश्यकता है। यह शादी से पहले या बाद में किए गए एक समझौते का एक रूप है, जिसमें यह प्रावधान है कि पत्नी को अपने पति से तलाक के माध्यम से निर्दिष्ट शर्तों के तहत अलग होने का विशेषाधिकार होगा: –
- यदि पति दूसरी पत्नी से शादी कर लेता है।
- पति एक निर्दिष्ट अवधि के लिए उसका भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
- कोई अन्य शर्त जो सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए।
यदि पति द्वारा समझौते में सहमत शर्तों का उसके द्वारा अच्छी तरह से पालन किया जाता है, तो पत्नी बिना किसी पूर्वाग्रह (प्रेजुडिस) के कानून के अपने वैवाहिक संबंधों को भंग कर सकती है।
तथ्य यह है कि पति पत्नी को शक्ति प्रत्यायोजित करता है, उसे उसके सही उच्चारण तलाक से वंचित नहीं करता है।
आपसी सहमति से तलाक
हालाँकि आपसी सहमति से तलाक देने की प्रथा को मुस्लिम कानून में मान्यता नहीं दी गई थी, लेकिन यह मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 के अधिनियमन के बाद ही मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध थी।
1. खुला
खुला का शाब्दिक अर्थ कानून के सल्लल्लल्लमक्ष “नीचे झुकना” है। पति अपनी पत्नी पर अपना अधिकार रखता है। यह पत्नी द्वारा उसके पति को उसकी संपत्ति में से दिए गए मुआवजे के बदले में एक वैवाहिक संबंध को विच्छेदन करने की व्यवस्था को दर्शाता है, वह सब कुछ जो दहेज के रूप में दिया जा सकता है।
खुला आपसी सहमति से और पत्नी के कहने पर तलाक है जिसमें वह अपने पति को कुछ मुआवजा देने के लिए सहमत होती है। यह मूल रूप से विवाह के अनुबंध का “मोचन (रिडेंप्शन)” है।
अनिवार्यताएं
- पत्नी की ओर से कोई प्रस्ताव आना चाहिए।
- प्रस्ताव को पति द्वारा इसके लिए दिए जानेवाले प्रतिफल के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए ।
- इद्दत की अवधि का पालन आवश्यक है।
शिया कानून के तहत, पति द्वारा इसे एक बार स्वीकार किए जाने के बाद तलाक को रद्द नहीं कर सकता है, जबकि पत्नी को इद्दत अवधि के दौरान प्रतिफल को पुनः प्राप्त करने की शक्ति दी गई है।
2. मुबारत
यह वैवाहिक बंधन से आपसी मुक्ति का प्रतीक है। सबसे आवश्यक तत्व यह है कि विवाह के विच्छेदन के संबंध में दोनों साथी की आपसी सहमति आवश्यक है।
तलाक के इस तरीके में-
- प्रस्ताव दोनों ओर से दिया जा सकता है।
- प्रस्ताव की स्वीकृति तलाक को अपरिवर्तनीय बनाती है।
- इद्दत जरूरी है।
शिया कानून के तहत, पक्ष अपनी शादी का विच्छेदन मुबारत के जरिए कर सकते हैं, अगर उनके लिए अपनी शादी को जारी रखना संभव नहीं है।
विवाह के विच्छेदन के लिए एक अंतिम तरीका न्यायिक पृथक्करण (ज्यूडिशियल सेपरेशन) के माध्यम से है।
मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 के तहत विवाह का विच्छेदन
इसके अलावा, दो ओर तरीके हैं-
1. लियान
लियान को अपने पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार (एडल्ट्री) के गलत आरोप के रूप में वर्णित किया जा सकता है। जब भी कोई पति अपनी पत्नी पर झूठा व्यभिचार का आरोप लगाता है, तो पत्नी उस पर मुकदमा कर सकती है और विवाह के विच्छेदन के लिए एक नियमित मुकदमा दायर करके अधिनियम के तहत उसी आधार पर तलाक भी प्राप्त कर सकती है। जफर हुसैन बनाम उम्मत-उर-रहमान के मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि मुस्लिम कानून के तहत एक पत्नी अपने पति के खिलाफ शादी के विच्छेदन के लिए मुकदमा दायर करने की हकदार है और इस आधार पर डिक्री प्राप्त कर सकती है कि उस पर व्यभिचार का झूठा आरोप लगाया गया था।
अनिवार्यताएं
- एक पति को वयस्क और समझदार होना चाहिए।
- वह अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाता है।
- ऐसा आरोप झूठा होना चाहिए।
- झूठे आरोप वास्तव में (उस तथ्य से ही) विवाह का विच्छेदन नहीं करते हैं, यह केवल पत्नी को विच्छेदन करने के लिए न्यायालय में जाने के लिए एक आधार प्रदान करते है।
- विवाह तब तक जारी रहेगा, जब तक कि न्यायालय द्वारा विवाह विच्छेदन की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती।
- लियान के माध्यम से न्यायिक पृथक्करण अपरिवर्तनीय है।
- यह तरीका सिर्फ सहीह शादियों पर लागू होता है न कि फसीदों पर।
मुकदमे की समाप्ति से पहले पति द्वारा यह स्वीकार किया जा सकता है कि उसने अपनी पत्नी के खिलाफ व्यभिचार का आरोप लगाया था और ऐसा आरोप झूठा था।
2. फस्ख
कुरान कहता है कि पति और पत्नी एक दूसरे का सम्मान करने के लिए बाध्य हैं और एक दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं और एक दूसरे के सभी कानूनी आदेशों का पालन करते हैं।
यदि उन दोनों को लगता है कि वे आगे पति-पत्नी के रूप में नहीं रह सकते हैं, तो वे क़ाज़ी से संपर्क कर सकते हैं, जो सावधानीपूर्वक जाँच के बाद उनकी शादी को समाप्त कर सकते हैं।
मुस्लिम विवाह विच्छेदन अधिनियम, 1939 के तहत विवाह विच्छेदन की धारा 2 में नौ आधार बताए गए हैं जिन पर एक मुस्लिम पत्नी तलाक की डिक्री प्राप्त कर सकती है: –
पति की अनुपस्थिति
पिछले चार वर्षों से पति का कोई पता नहीं है। इस आधार पर विवाह विच्छेदन की डिक्री इसके पारित होने की तारीख से छह महीने के बाद प्रभावी (इफेक्टिव) होगी, और उस अवधि के दौरान यदि पति व्यक्तिगत रूप से या किसी प्राधिकृत (ऑथराइज्ड) एजेंट के माध्यम से उपस्थित होता है और यदि न्यायालय उसके द्वारा बताई गई बातो से संतुष्ट होता है तो ऐसे समय पर उक्त डिक्री को अपास्त (सेट एसाइड) कर सकता है।
भरण-पोषण में विफलता
यदि कोई पति अपनी पत्नी को दो साल तक भरण-पोषण प्रदान करने में विफल रहता है। गरीबी, खराब स्वास्थ्य या बेरोजगारी के आधार पर पति के सामने कोई बचाव उपलब्ध नहीं है।
पति को कारावास
यदि पति को सात वर्ष या उससे अधिक की कैद हो।
वैवाहिक कर्तव्यों का पालन करने में विफलता
बिना किसी उचित कारण के, पति तीन साल तक अपने वैवाहिक दायित्वों को निभाने में असमर्थ है ।
पति की नपुंसकता
पति विवाह के समय नपुंसक था और अब भी है। यदि पति नपुंसकता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए पत्नी द्वारा प्राप्त आदेश की तारीख से एक वर्ष के भीतर आवेदन पर न्यायालय को संतुष्ट करता है कि वह नपुंसक नहीं रह गया है। यदि पति न्यायालय को संतुष्ट करता है तो इस आधार पर कोई डिक्री पारित नहीं की जायेगी।
पागलपन, कुष्ठ या यौन रोग (इंसेनिटी, लेप्रोसी, वेनरल डिसीजेस)
यदि पति दो साल की अवधि से पागल है या कुष्ठ रोग से पीड़ित है, या किसी यौन रोग से पीड़ित है, तो पत्नी द्वारा उसी आधार पर न्यायिक तलाक का दावा किया जा सकता है।
पत्नी द्वारा विवाह का विच्छेदन
अगर किसी लड़की की शादी उसके पिता या अभिभावक (गार्डियन) द्वारा 15 वर्ष की आयु से पहले कर दी जाती है, तो मुस्लिम कानून के तहत उसे 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद इस तरह के विवाह को अस्वीकार करने का अधिकार प्रदान किया गया है, बशर्ते कि विवाह समाप्त न हुआ हो। वह उसी के लिए तलाक की डिक्री की हकदार है।
मुस्लिम कानून द्वारा मान्यता प्राप्त विच्छेदन के आधार
पत्नी भी कानून के तहत मान्य आधार पर तलाक प्राप्त करने की हकदार है।
पति द्वारा क्रूरता
यदि पति अपनी पत्नी के साथ क्रूरता का व्यवहार करता है, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है और उसी आधार पर न्यायिक अलगाव की डिक्री के लिए दावा कर सकती है।
कुछ तरीके जिनके माध्यम से क्रूरता के आधार का दावा किया जा सकता है।
- शारीरिक हमला।
- मानहानिकारक बयान देना जिससे उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित हो।
- उसे अनैतिक जीवन जीने के लिए विवश करता है।
- उसे उसके धर्म का पालन करने से रोकता है।
- पति की एक से अधिक पत्नियाँ हों और उनके साथ समान व्यवहार नहीं करता है।
तलाकनामा
तलाकनामा लिखित रूप में दिया गया तलाक है। तलाकनामा के माध्यम से तलाक पत्नी की अनुपस्थिति में प्रदान किया जा सकता है और काजी या पत्नी के पिता की उपस्थिति में हस्ताक्षर करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- पति को उचित विलेख (डीड) का निष्पादन (एग्जिक्यूशन) करना चाहिए।
- विलेख में उसका खुदका नाम और उन महिलाओं का नाम होना चाहिए जिन्हें उसने तलाक दिया है।
वैध तलाक के लिए विचार किए जाने वाले बिंदु
- नशे में उच्चारण किए गए तलाक को मुस्लिम कानून के तहत वैध नहीं माना जाता है।
- एक वैध तलाक़ के लिए इरादा एक आवश्यक तत्व नहीं है।
- पति बिना किसी तलाकनामा या विलेख के केवल शब्दों द्वारा तलाक दे सकता है।
बीमारी या मौत के दौरान दिया गया तलाक
- एक बीमार मुस्लिम (आम तौर पर पुरुषों) को तलाक़ का उच्चारण करने की शक्ति दी गई है, सिर्फ इसलिए कि उसकी मृत्यु के बाद विरासत के उसके अधिकार को उसकी पत्नी को स्थानांतरित (ट्रांसफर) करने से रोका जा सके।
- अगर आदमी मौत की बीमारी में अपरिवर्तनीय तलाक का उच्चारण करता है और इद्दत अवधि समाप्त होने से पहले मर जाता है, तो पत्नी अपने हिस्से का दावा करने की हकदार है।
- यदि इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद पति की मृत्यु हो जाती है तो विरासत का कोई अधिकार नहीं है।
तलाक के कानूनी प्रभाव
- विरासत के पारस्परिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
- सहवास अवैध हो जाता है, और ऐसे संभोग के बाद पैदा हुए बच्चे नाजायज होंगे।
- मेहर तुरंत देय हो जाता है।
- पक्ष दूसरी शादी का अनुबंध कर सकते हैं।
- इद्दत की अवधि में पत्नी भरण-पोषण की हकदार है।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय के 2017 के फैसले के बाद तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा दिया गया और मुस्लिम कानून के तहत पति और पत्नी दोनों को अपने वैवाहिक संबंध के विच्छेदन करने का समान अधिकार दिया गया है।
जब दो लोग वैवाहिक संबंध में प्रवेश करते हैं, तो हो सकता है कि वे एक-दूसरे को इतनी अच्छी तरह से न जानते हों, क्योंकि साथ रहने के बाद वे एक-दूसरे को जान पाए। और उसके बाद, अगर दोनों के बीच कोई अनुकूलता (कंपेटेबिलिटी) नहीं है, तो अलग रहना ही सबसे अच्छा विकल्प है।
खराब संबंध दोनों व्यक्तियों के जीवन को खराब कर सकते हैं और मुस्लिम कानून के तहत तलाक एक प्राचीन प्रथा है और इसे हिंदू कानून के विपरीत एक पापपूर्ण कार्य के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है।


