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आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत निर्णय

आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत निर्णय

यह लेख डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ की छात्रा Nishtha Pandey (बैच 2023) के द्वारा लिखा गया है। यह लेख आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत दिए गए निर्णयों पर प्रकाश डालता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

“लोगों का अच्छा कानून ही सर्वोच्च कानून है” – सिसरो

निर्णय हमारे दैनिक जीवन में उपयोग किया जाने वाला एक बुनियादी शब्द है। आम तौर पर, इसका अर्थ है एक निश्चित स्थिति का विश्लेषण करना और उसके बाद एक धारणा बनाना। कानूनी अर्थ में, निर्णय न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों को सुनने के बाद दिया गया निर्णय है, जिसमें ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचने के कारण शामिल होते हैं। इस प्रकार निर्णय कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। एक दोषपूर्ण निर्णय से देश में कानूनी न्याय प्रणाली की नींव ख़राब होने की संभावना है। इसलिए न्यायिक दृष्टिकोण से निर्णय के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना आवश्यक है।

उद्देश्य और दायरा

सीआरपीसी, 1973 का अध्याय XXVII, निर्णय से संबंधित है। हालाँकि संहिता में “निर्णय” की कोई परिभाषा मौजूद नहीं है, लेकिन इसे न्यायालय के अंतिम आदेश के रूप में समझा जाना चाहिए। इस्माइल अमीर शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में, यह माना गया कि निर्णय, निर्णय देने का कार्य है। यह बताया गया कि निर्णय में एक तर्क को स्वीकार करने और दूसरे को अस्वीकार करने के कारण का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आपराधिक कार्यवाही में “निर्णय” से संबंधित विभिन्न प्रावधानों पर प्रकाश डालता है।

यह अध्याय सम्पूर्ण भारत में लागू होता है।

धारा 353 के तहत निर्णय का प्रारूप और सामग्री

एक निर्णय में निर्णय का औचित्य (रेशियो डिसीडेंडी) और आनुषंगिक उक्‍ति (ओबिटर डिक्टा) एक अभिन्न अंग बनते हैं। निर्णय का औचित्य, निर्णय में बाध्यकारी कथन है और आनुषंगिक उक्‍ति न्यायाधीश द्वारा दी गई “वैसे” टिप्पणी है जो मौजूदा मामले के लिए आवश्यक नहीं है। ये दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये कानूनी सिद्धांतों को परिभाषित करते हैं जो कानून के लिए उपयोगी हैं।

अगर निर्णय दोषमुक्ति का है-

  • क्या अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष के साक्ष्य अभियुक्त के अपराध को साबित करने में पूरी तरह विफल रहे या उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहे।
  • यदि वह कार्य या चूक जिससे दायित्व उत्पन्न हो सकता है, अस्तित्व में नहीं है।

यदि निर्णय दोषसिद्धि का है-

  • अभियुक्त द्वारा किए गए अपराध के आवश्यक तत्व और हस्तक्षेप करने वाली परिस्थितियाँ जिनके कारण यह अपराध हुआ।
  • मुख्य अपराधी, या सहयोगी या सहायक के रूप में अभियुक्त की भागीदारी।
  • अभियुक्त पर जो जुर्माना लगाया जाता है।

निर्णय की भाषा और सामग्री

  1. सीआरपीसी की धारा 354 के तहत, यह कहा गया है कि प्रत्येक निर्णय निम्नलिखित तरह से होना चाहिए:
  • अदालत की भाषा में
  • इसमें निर्धारण के बिंदु और उसका कारण शामिल होना चाहिए।
  • अपराध निर्दिष्ट किया जाना चाहिए और उसका कारण भी बताया जाना चाहिए। इस प्रकार किए गए अपराध का उल्लेख आईपीसी या किसी अन्य कानून में किया जाना चाहिए जिसके तहत अपराध किया गया है और सजा दी गई है।
  • यदि अपराधी को दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो जिस अपराध के लिए उसे दोषमुक्त किया गया था, उसका कारण और यह निर्दिष्ट किया जाना चाहिए कि व्यक्ति अब एक स्वतंत्र व्यक्ति है।

2. यदि निर्णय आईपीसी के तहत पारित किया गया है और न्यायाधीश निश्चित नहीं है कि अपराध किस धारा के तहत या धारा के किस भाग के तहत किया गया है तो न्यायाधीश को निर्णय में इसे निर्दिष्ट करना चाहिए और दोनों वैकल्पिक स्थितियों में आदेश पारित करना चाहिए।

3. यदि यह आजीवन कारावास की सजा है तो निर्णय में दोषसिद्धि का उचित कारण बताया जाएगा और मौत की सजा के मामले में विशेष कारण देना होगा।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 355 के तहत दिया गया निर्णय

सीआरसीपी की धारा 355 के तहत, यह उल्लेख किया गया है कि न्यायाधीश उपर्युक्त तरीके से निर्णय देने के बजाय, इसे संक्षिप्त संस्करण (वर्जन) में दे सकते है जिसमें शामिल होगा-

  • मामले की क्रम संख्या,
  • अपराध घटित होने की तिथि,
  • शिकायतकर्ता का नाम,
  • अभियुक्त व्यक्ति का नाम, उसके माता-पिता और निवास,
  • अपराध की शिकायत की गई या साबित किया गया,
  • अभियुक्त की दलील और उसका परीक्षण,
  • अंतिम आदेश,
  • आदेश की तारीख,
  • ऐसे मामलों में जहां अपील अंतिम आदेश से संबंधित है, निर्णय के कारणों का एक संक्षिप्त विवरण।

सजा के बदले में दोषसिद्धि के बाद के आदेश

दोषसिद्धि के बाद की दुविधा

संहिता की धारा 357 के तहत, यदि निर्णय दोषसिद्धि का है तो न्यायालय अभियुक्त को उसे दिए गए जुर्माने या कारावास की सजा के अलावा मुआवजा देने का आदेश दे सकता है। न्यायालय अपराधी को मुआवज़ा देने के लिए कह सकता है।

इसके अलावा, धारा 358 के तहत, अदालत उस व्यक्ति को मुआवजा देने का आदेश दे सकती है, जिसे झूठी गिरफ्तारी कराने वाले व्यक्ति द्वारा आधारहीन रूप से गिरफ्तार किया गया है। मुआवज़ा जुर्माने के रूप में वसूला जाता है और व्यक्ति के समय के नुकसान और धन के नुकसान की भरपाई के लिए दिया जाता है।

इसके अलावा, संहिता की अनुसूची 1 के तहत गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराधों के मामले में, और न्यायाधीश को उसी के बारे में एक निजी शिकायत मिलती है, तो न्यायाधीश अभियुक्त को दोषी ठहराने के बाद अभियोजक को अभियोजन की प्रक्रिया में आवश्यक राशि और खर्च का भुगतान करने के लिए कह सकता है।

संहिता की धारा 360 के तहत, दोषसिद्धि के बाद के आदेश के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराया जाता है, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उसकी स्वतंत्रता पर कुछ प्रतिबंध लगाते हुए मुक्त कर दिया जाता है।

दोषी को अच्छे आचरण या चेतावनी पर रिहा किया जाना

सीआरपीसी की धारा 360 में एक प्रावधान का उल्लेख है जिसमें किसी व्यक्ति को अच्छे आचरण पर या चेतावनी के बाद रिहा किया जा सकता है। इसमें, यदि कोई व्यक्ति 21 वर्ष से कम आयु का नहीं है और उसे किसी ऐसे अपराध का दोषी ठहराया गया है, जिसमें जुर्माना या सात वर्ष या उससे कम की सजा हो सकती है। इसके अलावा यदि कोई व्यक्ति 21 वर्ष से अधिक उम्र का है या कोई महिला किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी है, जो मौत की सजा या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है और उस व्यक्ति के खिलाफ कोई पूर्व दोषसिद्धि नहीं है, तो यदि न्यायालय अपराधी की उम्र, चरित्र, पूर्ववृत्त (एंटीसेडेंट) और उस परिस्थिति के अनुसार उचित समझता है जिसके तहत ऐसा अपराध किया गया था, तो व्यक्ति को अच्छे आचरण पर रिहा करना सही है और अदालत उसे दंडित करने के बजाय उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दे सकती है या नहीं, जैसा कि न्यायालय के अनुसार है। ऐसे व्यक्ति को 3 वर्ष से अधिक नहीं की सजा पाने के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा और इस बीच शांति और अच्छे व्यवहार का पालन करना होगा।

यदि पहले अपराधी को द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराया जाता है तो मजिस्ट्रेट को उस आशय की अपनी राय दर्ज करनी होती है और इसे प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को सौंपना होता है। प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट मामले की सुनवाई उसी तरह करेगा जैसे कि वह अपराधी मूल रूप से उसके न्यायालय में आया था और यदि उसे लगता है कि ऐसा करना आवश्यक है तो वह आगे की जांच का आदेश दे सकता है। वह साक्ष्य रिकार्ड करने का आदेश दे सकता है या स्वयं ऐसा कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति को आईपीसी के तहत चोरी, हेराफेरी, धोखाधड़ी या किसी अन्य अपराध का दोषी ठहराया जाता है, और दो साल से अधिक कारावास या जुर्माने से दंडनीय है। इस मामले में, व्यक्ति को पहले किसी अन्य अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है, यदि न्यायालय उचित समझे तो व्यक्ति को उसकी उम्र, पूर्ववृत्त, मानसिक और शारीरिक स्थिति, चरित्र, अपराध की तुच्छ प्रकृति या किसी भी परिस्थिति के आधार पर रिहा कर सकता है। उचित चेतावनी के बाद न्यायालय उसे रिहा कर सकता है। इस धारा के तहत एक आदेश अपीलीय न्यायालय या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण (रिवीजन) की अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए दिया जा सकता है।

न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराधी और उसके जमानतदारों को रहने की जगह और न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट अवलोकन का नियमित व्यवसाय मिलना चाहिए।

अपराधी के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना सजा देने में न्यायिक विवेक का प्रयोग

वर्तमान में, भारत में संरचित सजा दिशानिर्देश नहीं हैं। मार्च 2003 में, मलिमथ समिति ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें सजा देने में अनिश्चितता को कम करने के लिए सजा दिशानिर्देश पेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

2008 में, माधव मेनन समिति ने वैधानिक सजा दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, सरकार न्यायाधीशों द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों को दूर करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के अनुरूप एक “समान सजा नीति” स्थापित करने के लिए काम कर रही है।

सजा प्रक्रिया सीआरपीसी के तहत स्थापित की गई है, जो न्यायाधीशों को व्यापक विवेकाधीन सजा की शक्तियां प्रदान करती है। कई लेखकों द्वारा इस बात पर जोर दिया गया है कि, पर्याप्त सजा नीति के अभाव में यह निर्णय करना न्यायाधीशों पर निर्भर करता है कि किन कारकों को ध्यान में रखा जाए और किसे नजरअंदाज किया जाए। इसके अलावा, व्यापक विवेक निर्णय तय करने के लिए न्यायाधीशों के व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के लिए बहुत जगह देता है।

जहां अपराधी का पता नहीं लगाया गया है या उसकी पहचान नहीं की गई है, लेकिन पीड़ित की पहचान कर ली गई है, और जहां कोई वाद नहीं हुआ है, पीड़ित या उसके आश्रित मुआवजे के लिए राज्य या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (अथॉरिटी) को आवेदन कर सकते हैं। ऐसी सिफारिशें या आवेदन प्राप्त होने पर, राज्य या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण उचित जांच के बाद दो महीने के भीतर जांच पूरी करके पर्याप्त मुआवजा दे सकते है।

दण्ड के सम्बन्ध में निर्णय

सज़ा देने में न्यायिक विवेक

न्यायिक विवेक का अर्थ है कि न्यायपालिका को कुछ मामलों को तदनुसार तय करने के लिए कुछ विवेक दिया गया है। शक्ति पृथक्करण (सेपरेशन) के सिद्धांत के तहत यह न्यायिक स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है।

न्यायिक विवेक का मुख्य भाग सीआरपीसी की धारा 360 के तहत मौजूद है जो न्यायाधीशों को दोषियों को परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर रिहा करने की शक्ति देता है। लेकिन यह शक्ति केवल कुछ शर्तों तक ही सीमित है:

  • जहां दोषी एक महिला है और उसे आजीवन कारावास या मौत की सजा नहीं दी गई है,
  • जहां दोषी की उम्र 21 वर्ष से अधिक है और उसे 7 वर्ष से अधिक की सजा नहीं दी गई है,
  • जहां दोषी की उम्र 21 वर्ष से कम है और उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जाती है।

इसके अलावा यदि किया गया अपराध इस प्रकार का है कि दी जाने वाली सजा 2 वर्ष से अधिक या साधारण जुर्माना नहीं हो सकती है, तो दोषी से जुड़े विभिन्न कारकों पर विचार करते हुए, अदालत दोषी को बिना सजा के चेतावनी देकर छोड़ सकती है। यदि कोई व्यक्ति रिहाई के समय इस धारा के तहत निर्धारित नियमों का पालन नहीं करता है तो न्यायालय उस स्थिति में भी कदम उठाता है जैसे कि व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करना। इन प्रावधानों के तहत रिहाई के लिए, यह आवश्यक है कि या तो दोषी या जमानतदार न्यायालय के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) में नियमित रूप से निवास कर रहा हो या उपस्थित हो।

धारा 361 के माध्यम से संहिता, जहां भी संभव हो धारा 360 की प्रायोज्यता (एप्लीकेशन) को आवश्यक बनाती है और ऐसे मामलों में जहां अपवाद हो, स्पष्ट कारण बताना आवश्यक है। न्यायाधीश को सज़ा देने के लिए विशेष कारण बताने चाहिए जो देश के संबंधित कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम से कम हो। विशेष कारण दर्ज न करना एक अनियमितता है और न्याय की विफलता के आधार पर पारित सजा को रद्द किया जा सकता है। अपराधियों की परिवीक्षा अधिनियम, 1958 सीआरपीसी की धारा 360 के समान है। यह इस अर्थ में अधिक विस्तृत है कि यह स्पष्ट रूप से रिहाई आदेश, पर्यवेक्षण आदेश, प्रभावित पक्ष को मुआवजे का भुगतान, परिवीक्षा अधिकारी की शक्तियों और कठिनाइयों और अन्य विवरणों की शर्तों को प्रदान करता है जो क्षेत्र के दायरे में आ सकते हैं। इसके अलावा, धारा 360 का उन राज्यों या हिस्सों में कोई प्रभाव नहीं रहेगा जहां अपराधी परिवीक्षा अधिनियम लागू है।

मौत की सज़ा

1898 की पुरानी संहिता में हत्या करने वाले व्यक्ति के लिए सामान्य सज़ा मौत थी और आजीवन कारावास इसका अपवाद था। इसका प्रभाव यह हुआ कि न्यायालय के पास मृत्युदंड या आजीवन कारावास दोनों में से किसी एक को देने का विवेकाधिकार था। हालाँकि, 1973 की नई संहिता में, जो वर्तमान परिदृश्य के अनुसार बनाई गई है, अब हत्या करने वाले को आजीवन कारावास की सज़ा दी जाएगी और असाधारण मामले में मौत की सज़ा दी जाएगी। मृत्युदंड तभी दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास की सजा अपर्याप्त लगे। हालाँकि, पीड़ितों की संख्या से मामला दुर्लभतम नहीं बनेगा।

जहां किया गया अपराध प्रतिशोधात्मक (विंडिक्टिब) हो और पूर्व नियोजित तरीके से किया गया हो। यदि अपराध ठंडे दिमाग से किया गया है तो यह एक अपराध की श्रेणी में आएगा जो कि दुर्लभ से दुर्लभतम मामला है। मृत्युदंड केवल वहीं दिया जाना चाहिए जहां पूरा समाज न्यायपालिका से मृत्युदंड की अपेक्षा करता है। मृत्युदंड देते समय कुछ शर्तों को ध्यान में रखना चाहिए:

  • हत्या करने का तरीका,
  • हत्या करने का उद्देश्य,
  • हत्या की असामाजिक प्रकृति 
  • पीड़ित का व्यक्तित्व (अधिक)

कारावास की सजा

सीआरपीसी की धारा 354 के तहत, जब दोषसिद्धि आजीवन कारावास या कुछ वर्षों के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए होती है, तो फैसले में दी गई सजा के कारण बताए जाएंगे, और, मौत की सजा के मामले में, इसके विशेष कारण बताए जाएंगे। इसके अलावा, जब दोषसिद्धि एक वर्ष या उससे अधिक अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए होती है, लेकिन न्यायालय तीन महीने से कम अवधि के कारावास की सजा देता है, तो वह इसके लिए कारण दर्ज करेगा, जब तक कि सजा एक मामूली सजा अर्थात  बहुत कम समय तक के लिए कारावास न हो या मामले का संक्षेप में वाद न हो जाए।

जुर्माने की सजा

संहिता की धारा 357 के तहत, जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा देता है या ऐसी सजा देता है जिसमें जुर्माना भी शामिल है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय वसूले गए जुर्माने की पूरी राशि या उसके कुछ हिस्से का निम्नलिखित तरीके में प्रयोग करने का आदेश दे सकता है:

  • अभियोजन के दौरान किए गए खर्चों को चुकाने में।
  • अपराध के कारण हुई किसी हानि या चोट के लिए मुआवजे के रूप में किसी व्यक्ति को भुगतान करने में, जब मुआवजा सिविल न्यायालय में वसूली योग्य हो।
  • जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के लिए किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है या उसने ऐसे अपराध को करने के लिए प्रोत्साहित किया है, तो उसे उन व्यक्तियों को मुआवजा देना होगा, जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 के तहत ऐसी मौत से हुए नुकसान के लिए सजा पाए व्यक्ति से हर्जाना वसूलने के हकदार हैं।
  • जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक हेराफेरी, आपराधिक विश्वासघात (ब्रीच ऑफ ट्रस्ट), या धोखाधड़ी, या चोरी की संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना या बनाए रखना, या चोरी की गई संपत्ति को जानते हुए या विश्वास करते हुए उसके निपटान में स्वेच्छा से सहायता करना, तो यदि ऐसी संपत्ति हकदार व्यक्ति के कब्जे में बहाल कर दी जाती है, तो ऐसी संपत्ति के वास्तविक खरीदार को उसके नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए।

यदि जुर्माना ऐसे मामले में लगाया गया है जो अपील योग्य है, तो अपील प्रस्तुत करने के लिए दी गई अवधि समाप्त होने से पहले ऐसा कोई भुगतान नहीं किया जाएगा, या यदि कोई अपील प्रस्तुत की जाती है तो अपील का निर्णय आने से पहले नहीं किया जाएगा।

इसके अलावा, जब कोई अदालत सजा सुनाती है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो अदालत फैसला सुनाते समय अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि के मुआवजे के रूप में जिसे उस कार्य के कारण कोई हानि या चोट हुई हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा दी गई है। पुनरीक्षण की अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक आदेश अपीलीय न्यायालय या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा भी दिया जा सकता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि समान विषय वस्तु से संबंधित किसी भी सिविल वाद में मुआवजा देते समय, न्यायालय इस धारा के तहत मुआवजे के रूप में भुगतान की गई या वसूल की गई किसी भी राशि पर विचार करेगा।

एहतियाती (प्रिकॉशनरी) एवं निवारक आदेश

कुछ आदतन अपराधियों को अपना ठिकाना सूचित करना आवश्यक है

सीआरपीसी, 1973 की धारा 356 के तहत, जब किसी व्यक्ति को भारत में किसी न्यायालय द्वारा आइपीसी, 1860 की धारा 215, धारा 489A, धारा 489B, धारा 489C या धारा 489D या धारा 506 के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, या आईपीसी के अध्याय XII या अध्याय XVII के तहत दंडनीय किसी अपराध के लिए भारत की अदालत द्वारा तीन साल या उससे अधिक की अवधि के कारावास के साथ दोषी ठहराया गया हो और उसे द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट के अलावा किसी अन्य न्यायालय द्वारा तीन साल या उससे अधिक की अवधि के कारावास के साथ उपर्युक्त धाराओं या अध्यायों में से किसी के तहत दंडनीय किसी भी अपराध के लिए फिर से दोषी ठहराया गया है तो ऐसा न्यायालय, यदि वह उचित समझे, ऐसे व्यक्ति को कारावास की सजा सुनाते समय, यह भी आदेश दे सकता है कि उसके निवास और रिहाई के बाद ऐसे निवास में किसी भी बदलाव, या अनुपस्थिति को ऐसी सजा की समाप्ति की तारीख से पांच साल से अधिक नहीं की अवधि तक अधिसूचित किया जाएगा। ये प्रावधान ऐसे अपराध करने की आपराधिक षड्यंत्र और ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण (एबेटमेंट) और उन्हें करने के प्रयासों पर भी लागू होते हैं। हालाँकि, यदि अपील या अन्यथा दोषसिद्धि को रद्द कर दिया जाता है तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।

इसके अलावा, इस धारा के तहत एक आदेश अपीलीय न्यायालय या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण की अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है। राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, रिहा किए गए दोषियों के निवास स्थान में परिवर्तन या अनुपस्थिति की अधिसूचना से संबंधित इस धारा के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है। ऐसे नियमों में उनके उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान हो सकता है और ऐसे किसी भी नियम के उल्लंघन के आरोप वाले किसी भी व्यक्ति पर उस जिले में सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट द्वारा वाद चलाया जा सकता है जिसमें उसके द्वारा अंतिम बार उसके निवास स्थान के रूप में अधिसूचित स्थान स्थित है।

मुआवज़ा और लागत

दोषी व्यक्ति को पीड़ित को मुआवजा देना और अभियोजन की लागत का भुगतान करना

सीआरपीसी की धारा 357A के तहत, प्रत्येक राज्य सरकार को केंद्र सरकार के साथ समन्वय (कॉर्डिनेशन) करना होगा और पीड़ित या उसके आश्रितों जिन्हें अपराध के परिणामस्वरूप हानि या चोट लगी हो और साथ ही पुनर्वास आवश्यकता हो, को मुआवजे के उद्देश्य से धन उपलब्ध कराने के लिए एक योजना तैयार करनी होगी।

जब भी न्यायालय द्वारा मुआवजे के लिए कोई सिफारिश की जाती है, तो जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण या राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण योजना के तहत दिए जाने वाले मुआवजे की मात्रा तय करेगा।

राज्य या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण, जैसा भी मामला हो, पीड़ित की पीड़ा को कम करने के लिए, पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के पद से नीचे के पुलिस अधिकारी या सम्बंधित मजिस्ट्रेट के प्रमाण पत्र पर तत्काल प्राथमिक चिकित्सा सुविधा या चिकित्सा लाभ निःशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश या कोई अन्य अंतरिम राहत जो उचित प्राधिकारी उचित समझे दी जाएगी।

इसके अलावा, धारा 357B के तहत राज्य सरकार द्वारा धारा 357A के तहत देय मुआवजा आईपीसी की धारा 326A, 376AB, 376D, 376DA, 376DB के तहत पीड़ित को जुर्माने के अतिरिक्त होगा।

धारा 357C में, सभी अस्पताल, निजी या सार्वजनिक, चाहे वे केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय निकायों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चलाए जा रहे हों, आईपीसी की धारा 326A, 376, 376A, 376AB, 376B, 376C, 376D, 376DA, 376DB या धारा 376E के तहत उल्लिखित किसी भी अपराध के पीड़ितों को मुफ्त में प्राथमिक चिकित्सा या चिकित्सा उपचार प्रदान करेंगे और तुरंत ही घटना के बारे में पुलिस को सूचित करेंगे।

धारा 359 के तहत गैर-संज्ञेय मामलों में सफल शिकायतकर्ता को लागत प्राप्त होगी

संहिता की धारा 359 के तहत, यह माना जाता है कि जब भी अदालत किसी गैर-संज्ञेय अपराध में अपराधी को दोषी ठहराती है, तो अपराध की सजा के साथ, वह शिकायतकर्ता द्वारा वहन किए गए खर्चों के भुगतान का आदेश दे सकती है, इन खर्चों में गवाह की फीस, वकील की फीस या कोई अन्य शुल्क जो न्यायालय उचित समझे शामिल होगा। भुगतान पूर्ण या किश्तों में किया जा सकता है। ऐसे भुगतान में चूक के मामले में, मजिस्ट्रेट अधिकतम तीस दिन की कैद का आदेश दे सकता है।

धारा 358 के तहत गलत गिरफ्तारी के लिए मुआवजा

धारा 358 के तहत, यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस को किसी अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए मजबूर करता है, जिसके बारे में मजिस्ट्रेट को लगता है कि ऐसी गिरफ्तारी के लिए कोई आधार नहीं है, तो मजिस्ट्रेट ऐसी गिरफ्तारी का कारण बनने वाले व्यक्ति को 1000 रुपये से अधिक नहीं का मुआवजा देने का आदेश दे सकता है। जुर्माना समय की हानि और व्यय या अन्य मामले के मुआवजे के रूप में दिया जाता है, जैसा न्यायाधीश उचित समझे। यदि इस आधार पर एक से अधिक व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाता है, तो उनमें से प्रत्येक को 100 रुपये से अधिक नहीं का मुआवजा दिया जाना चाहिए, जैसा कि मजिस्ट्रेट उचित समझे। ऐसा मुआवज़ा जुर्माने के रूप में वसूल किया जाएगा और यदि व्यक्ति मुआवज़ा नहीं देता है तो मजिस्ट्रेट उसे अधिकतम 30 दिनों की कैद की सज़ा दे सकता है, जब तक कि मुआवज़ा पहले न चुकाया जाए।

निर्णय की घोषणा

धारा 353 के तहत निर्णय की घोषणा करने के तरीके

सीआरपीसी की धारा 353 के तहत, मूल अधिकार क्षेत्र  वाले किसी भी आपराधिक न्यायालय में प्रत्येक मुकदमा का फैसला सुनवाई की समाप्ति के ठीक बाद या उसके बाद किसी समय पीठासीन अधिकारी द्वारा खुली अदालत में सुनाया जाना चाहिए। उस समय की सूचना पक्षों या उनके वकील को दी जाएगी। निर्णय सुनाने के विभिन्न तरीके हैं:

  • पूरा फैसला सुनाकर
  • पूरा फैसला पढ़कर
  • निर्णय के संचालित भाग को पढ़कर और निर्णय के सार को उस भाषा में समझाकर जो दोषी या उसके वकील द्वारा समझी जाती है।

यदि पूरा निर्णय सुना दिया जाता है तो पीठासीन अधिकारी इसे तुरंत लिख लेगा, जैसे ही यह तैयार हो जाए, प्रतिलेख (ट्रांसक्रिप्ट) और इसके प्रत्येक पृष्ठ पर हस्ताक्षर करेगा, और उस पर खुले न्यायालय में निर्णय सुनाए जाने की तारीख लिखेगा। हालाँकि, व्यवहार में, निर्णय आम तौर पर दिन के अंत में दिए जाते हैं ताकि निर्णय की लिखित प्रति सुबह ही न्यायाधीश को उपलब्ध हो सके।

हालाँकि, जहाँ पूरा निर्णय या उसका संचालित भाग पढ़ा जाता है या जैसा भी मामला हो, उस पर तारीख लिखी जाएगी और खुले न्यायालय में पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे और यदि यह उसके अपने हाथ से नहीं लिखा गया है, तो निर्णय के प्रत्येक पृष्ठ पर उसके हस्ताक्षर होंगे। यह तब भी होता है जब निर्णय शॉर्टहैंड लेखक को निर्देशित किया जाता है।

जहां निर्णय का संचालित भाग धारा के तहत निर्दिष्ट तरीके से सुनाया जाता है, तो संपूर्ण निर्णय या उसकी एक प्रति तुरंत पक्षों या उनके वकील (यदि वे इसके लिए आवेदन करते हैं) को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। जो व्यक्ति हिरासत में है उसे फैसला सुनने के लिए अदालत में लाया जाएगा।

यदि अभियुक्त हिरासत में नहीं है, तो अदालत द्वारा उसे सुनाए गए फैसले को सुनने के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता होगी, सिवाय इसके कि जहां वाद के दौरान उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई है और सजा केवल जुर्माने की है और वह पहले ही बरी हो चुका है। हालाँकि, यदि एक से अधिक अभियुक्त हैं और उनमें से कुछ उपस्थित नहीं हैं, तो न्यायालय अनुचित देरी को दूर करने के लिए उसकी अनुपस्थिति में निर्णय सुना सकता है।

किसी भी आपराधिक न्यायालय द्वारा दिया गया कोई भी निर्णय केवल इस कारण से अमान्य नहीं माना जाएगा कि इसे सुनाने के लिए अधिसूचित दिन या स्थान पर कोई भी पक्ष या उसके वकील अनुपस्थिति थे, या पक्षकारों या उनके वकील, या उनमें से किसी को उस दिन और स्थान की सूचना की तामील करने में कोई चूक, या तामील करने में कोई त्रुटि थी।

यह धारा सीआरपीसी की धारा 465 के प्रावधानों की सीमा को सीमित नहीं करेगी।

अदालत धारा 362 के तहत निर्णय में बदलाव नहीं करेगी

धारा 362 के तहत, यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि संहिता में अन्यथा प्रदान किए जाने के अलावा, न्यायालय किसी भी लिपिकीय (क्लेरिकल) या अंकगणितीय (आरिथमेटिकल) त्रुटियों को ठीक करने के अलावा, निर्णय या उसके निपटान के लिए एक बार हस्ताक्षर किए गए आदेश को नहीं बदलेगा।

फैसले की प्रति धारा 363 के तहत अभियुक्त और कुछ अन्य व्यक्तियों को दी जाएगी

सीआरपीसी की धारा 363 में कहा गया है कि जब कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो दोषी को तुरंत फैसले की प्रति निःशुल्क दी जानी चाहिए। यदि अभियुक्त आवेदन करता है, तो निर्णय की प्रति उसकी भाषा में (यदि संभव हो तो) या न्यायालय की भाषा में अनुवादित की जाएगी और उसे हर उस मामले में दी जाएगी जहां ऐसा मामला अपील योग्य है। यह प्रति उसे निःशुल्क दी जानी चाहिए। हालाँकि यदि उच्च न्यायालय अभियुक्त की मौत की सज़ा की पुष्टि करता है, तो उसे फैसले की एक प्रति दी जानी चाहिए, भले ही उसने इसके लिए आवेदन न किया हो। इन मामलों को छोड़कर, अभियुक्त को निर्णय या आदेश की एक प्रति मिलेगी, जो उसे निर्दिष्ट शुल्क के भुगतान पर दी जाएगी, या विशेष मामलों में, जैसा कि अदालत उचित समझेगी, उसे निःशुल्क देगी। इसके अलावा, यदि फैसले की अपील उच्च न्यायालय में है, तो अभियुक्त को उस समय के बारे में सूचित किया जाना चाहिए जिसके भीतर उसे अपील करनी चाहिए, और उसकी अपील को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा, अन्य व्यक्ति जो उच्च न्यायालय के फैसले से प्रभावित नहीं हैं, उन्हें निर्दिष्ट कीमतों का भुगतान करने और उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों में सुनिश्चित की गई कुछ शर्तों का पालन करने के बाद इसकी प्रति मिल जाएगी।

धारा 364 के अंतर्गत निर्णय का अनुवाद

संहिता की धारा 364 में कहा गया है कि निर्णय को कार्यवाही के साथ दाखिल किया जाना आवश्यक है। इसके अलावा, यदि निर्णय उस भाषा में दर्ज किया गया है जो न्यायालय की भाषा और अभियुक्त को भाषा से भिन्न है, तो अभियुक्त को न्यायालय की भाषा में अनुवाद करने की आवश्यकता होती है, तो ऐसे निर्णय का अनुवाद करने की आवश्यकता होती है।

सत्र न्यायालय धारा 365 के तहत निष्कर्ष और सजा की एक प्रति जिला मजिस्ट्रेट को भेजेगा

धारा 365 के तहत, यह कहा गया है कि ऐसे मामलों में जहां कार्यवाही न्यायिक मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश की अदालत में होती है, सभी निष्कर्षों और सजा की प्रति जिला मजिस्ट्रेट को दी जानी चाहिए, जिसके स्थानीय अधिकार क्षेत्र के तहत वाद चल रहा है।

निष्कर्ष

निर्णय किसी भी कानूनी कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, इसमें दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद लिए गए निर्णय और उसके कारण का उल्लेख होता है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय XXVII, आपराधिक मामलों में निर्णय का विस्तृत विवरण देता है और साथ ही इसमें भाषा, सामग्री आदि से संबंधित प्रावधान प्रदान किए गए हैं। मृत्युदंड, जुर्माना या कारावास के मामलों में निर्णय सुनाने के लिए अलग-अलग प्रावधान मौजूद हैं।

संदर्भ

  • Ratan Lal and Dhiraj, Commentary on Code of Criminal Procedure, 1973.

 

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