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वचन विबंधन और अनुबंध कानून का विकास

वचन विबंधन और अनुबंध कानून का विकास

यह लेख लॉसिखो में इंट्रोडक्शन टू लीगल ड्राफ्टिंग: कॉन्ट्रैक्ट, पेटिशन, ओपिनियन और आर्टिकल्स में सर्टिफिकेट कोर्स कर रहे Lalremruatfeli Pulamte द्वारा लिखा गया है, और Shashwat Kaushik द्वारा संपादित (एडिट) किया गया है। इस लेख में भारतीय अनुबंध अधिनियम के विकास और उसमे वचन विबंधन (प्रॉमिसरी एस्टॉपल) की अवधारणा पर चर्चा करते है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत में, भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, 25 अप्रैल, 1872 (1872 का 9) को अधिनियमित किया गया था, और यह 1 सितंबर, 1872 को लागू हुआ। यह अधिनियम विभिन्न संशोधनों और चरणों से गुजर रहा है क्योंकि यह उस रूप में आया है जिसे हम आज देखते हैं। ऐसे परिदृश्य पर विचार करें जिसमें एक वादा, अनुबंध की सख्त औपचारिकता की कमी के बावजूद, पक्षों को नैतिक और कानूनी रूप से बांधने की शक्ति रखता है। यहीं पर वचन विबंधन तस्वीर में प्रवेश करती है। पारंपरिक संविदात्मक सिद्धांत के विपरीत, जिसके लिए अक्सर प्रतिफल और आपसी सहमति की आवश्यकता होती है, वचन विबंधन इन औपचारिकताओं के बिना किए गए वादों की रक्षा करता है। यह इस धारणा का प्रतीक है कि यदि किसी वादे पर किसी के नुकसान के लिए भरोसा किया जाता है, तो उसे न्याय की नजर में बरकरार रखा जाना चाहिए, भले ही अनुबंध को बनाने के पारंपरिक तत्व अनुपस्थित हों।

अनुबंध कानून का विकास

प्राचीन भारत में अनुबंध कानून

कानूनी प्रणालियों का विकास किसी समाज की जटिल सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिशीलता का प्रतिबिंब है। जैसे-जैसे हम प्राचीन भारत में वापस जाते हैं, हम कानूनी सिद्धांतों और संविदात्मक प्रथाओं के एक समृद्ध समूह को उजागर करते हैं जिसने अनुबंध कानून की आधुनिक अवधारणा की नींव रखी। वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक, प्राचीन भारतीय कानूनी परिदृश्य हमें समझौतों, दायित्वों और नैतिक प्रतिफल (कंसीडरेशन) के जटिल जाल की एक झलक प्रदान करता है जो पारस्परिक संबंधों और वाणिज्य (कॉमर्स) को नियंत्रित करता है। धर्मशास्त्र, प्राचीन भारतीय कानूनी ग्रंथ, नैतिक और कानूनी मार्गदर्शन के व्यापक स्रोत के रूप में उभरे। उदाहरण के लिए, मनुस्मृति में विभिन्न प्रकार के समझौतों और इसमें शामिल पक्षों के संबंधित कर्तव्यों की रूपरेखा दी गई है। उपहारों के आदान-प्रदान से लेकर बिक्री लेनदेन तक, अनुबंधों को अक्सर उनकी प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था।

अनुबंध के कानून के मूल तत्व प्राचीन भारत में मौजूद थे, और उन्हें हिंदू कानूनों के तहत अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त थी। प्राचीन काल में, अनुबंध का कानून सत्य के पालन पर आधारित था, और यह हमेशा समाज की धार्मिक धारणाओं से जुड़ा हुआ था। किसी समझौते से पहले प्रस्ताव और स्वीकृति के सिद्धांत को हिंदू कानून के तहत मान्यता दी गई थी। यह भी माना गया कि बिक्री या ऋण के अनुबंध में प्रतिफल होना चाहिए, जबकि उपहार के लिए किसी प्रतिफल की आवश्यकता नहीं है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि अनुबंध के कानून के मूल तत्व प्राचीन भारत में मौजूद थे।

ब्रिटिश काल के तहत अनुबंध कानून

ब्रिटिश औपनिवेशिक (कोलोनियल) शासन के तहत भारत की कानूनी प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव आया, जिसमें अनुबंध कानून का क्षेत्र भी शामिल था। जैसे ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर अपना प्रभाव और शासन स्थापित किया, उसने एक नया कानूनी ढांचा पेश किया जिसने संविदात्मक संबंधों, वाणिज्यिक लेनदेन और क्षेत्र के व्यापक सामाजिक-आर्थिक ढांचे को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद, कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे के प्रांत में अठारहवीं शताब्दी के चार्टर्स द्वारा अंग्रेजी सामान्य कानून पेश किए गए थे। ऐसे मामले में जहां एक पक्ष हिंदू और दूसरा मुस्लिम था, प्रतिवादी का कानून लागू किया जाना था। इस प्रकार, जो हिंदू, मुस्लिम शासन के दौरान, मुस्लिम अनुबंध कानून द्वारा शासित थे, वे अब हिंदू कानून द्वारा शासित थे। हिंदू और इस्लाम अपने संबंधित कानूनों और प्रथाओं द्वारा शासित थे। यह प्रथा भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के पारित होने तक जारी रही।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872

तीसरे विधि आयोग की दूसरी रिपोर्ट अनुबंध के कानून को समर्पित थी। विधि आयुक्तों ने 28 जुलाई, 1866 को एक मसौदा प्रस्तुत किया, जिसे कई संशोधनों के बाद अंततः 1872 में विधानमंडल द्वारा भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के रूप में अपनाया गया। भारतीय अनुबंध अधिनियम, जिसमें 266 धाराएं शामिल हैं, जो समझौते के संबंध में मूल बातें बताती हैं- जैसे एक वैध अनुबंध क्या होता है, अनुबंध कैसे बनते हैं, पक्षों के अधिकार और दायित्व, और उल्लंघन के मामले में उपलब्ध उपचार क्या है। कानूनी शब्दजाल से परे, यह अधिनियम मानवीय इरादों, विश्वास और वादे निभाने की जटिलताओं को उजागर करता है।

वचन विबंधन

विबंधन क्या है

विबंधन जिसे अंग्रेजी में एस्टोपल कहा जाता है वह फ्रांसीसी शब्द ‘एस्टोउपे’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘रोकने वाला’। विबंधन का नियम इस कहावत पर आधारित है “एलेगन्स कॉन्ट्रारिया नॉन एस्ट ऑडिएंडस”, जिसका अर्थ है कि बार बार विपरीत तथ्यों बोलने वाले व्यक्ति को नहीं सुना जाना चाहिए। यह शब्द अंग्रेजी न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) से अपनाया गया था, जिसने इसे अपना एक विशेष और तकनीकी अर्थ दिया है। विबंधन का उद्देश्य ईमानदारी और सद्भाव को बढ़ावा देकर धोखाधड़ी को रोकना और पक्षों के बीच न्याय सुरक्षित करना है।

1872 का भारतीय साक्ष्य अधिनियम धारा 115, 116 और 117 में विबंधन के विषय से संबंधित है। हम भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 में “विबंधन” देख सकते हैं। वहां इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है – “जब एक व्यक्ति ने अपनी घोषणा के द्वारा, कार्य या चूक, जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को किसी बात को सच मानने के लिए उकसाया या अनुमति दी और ऐसे विश्वास पर कार्य किया; तो ऐसे में न तो उसे और न ही उसके प्रतिनिधि को अपने और ऐसे व्यक्ति या उसके प्रतिनिधि के बीच किसी मुकदमे या कार्यवाही में उस बात की सच्चाई से इनकार करने की अनुमति दी जाएगी।

इस धारा की मुख्य सामग्रियां निम्नलिखित हो सकती हैं:

  1. एक पक्ष को दूसरे पक्ष के समक्ष कुछ प्रतिनिधित्व करना चाहिए;
  2. प्रतिनिधित्व उस पर कार्रवाई करने के इरादे से किया जाना चाहिए;
  3. दूसरे पक्ष को प्रतिनिधित्व पर भरोसा करना चाहिए; और
  4. प्रतिनिधित्व से उत्पन्न कोई कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए।

अंग्रेजी कानून के अंतर्गत इस सिद्धांत को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

  • रिकॉर्ड के मामले में विबंधन;
  • विलेख (डीड) या लेखन द्वारा विबंधन; और
  • आचरण द्वारा विबंधन।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अलावा अन्य अधिनियमों में भी विबंधन का उल्लेख है; वे हैं:

  1. धारा 234, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872;
  2. धारा 18, विशिष्ट राहत अधिनियम, 1877 ;
  3. धारा 40, 41, और 43, संपत्ति हस्तांतरण (ट्रांसफर) अधिनियम, 1882 ;
  4. धारा 27 और 53, भारतीय माल विक्रय अधिनियम, 1930 ;
  5. भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 28; और
  6. धारा 120, 121, और 122, परक्राम्य लिखत (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट) अधिनियम, 1881।

वचन विबंधन का सिद्धांत

वचन विबंधन के सिद्धांत को ‘नया विबंधन’, ‘न्यायसंगत विबंधन’ या ‘अर्ध-विबंधन’ भी कहा जाता है। यह सिद्धांत न्याय, निष्पक्षता और अच्छे विवेक के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है। कानूनी शब्दकोष के अनुसार, वचन विबंधन वह सिद्धांत है जो यह प्रदान करता है कि यदि कोई भी पक्ष किसी अनावश्यक वादे पर भरोसा करते हुए कोई कार्य करके या कोई कार्य करने से मना करके अपनी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव करते है, तो वह पक्ष वादे को लागू कर सकते है, भले ही उसमे एक अनुबंध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हो।

वचन विबंधन के सिद्धांत के आवश्यक तत्व हैं:

  • एक पक्ष को अपने शब्द या आचरण से दूसरे पक्ष को एक स्पष्ट और समझ में आने वाला वादा या आश्वासन देना चाहिए।
  • वादे, प्रतिनिधित्व या आश्वासन का उद्देश्य पक्षों के कानूनी संबंधों को प्रभावित करना और उसके अनुसार कार्य करना था।
  • वास्तव में वादा करने वाले ने ऐसे वादे पर अमल किया है।

वचन विबंधन और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 में उल्लिखित विबंधन का सिद्धांत अलग-अलग है। डॉ. अशोक कुमार माहेश्वरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (1998) में, यह माना गया कि, वचन विबंधन के सिद्धांत को तब भी लागू किया जा सकता है, जहां कोई मामला भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 में निहित विबंधन की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। भले ही वादा औपचारिक अनुबंध के रूप में दर्ज नहीं किया गया था, फिर भी सरकार के प्रतिनिधित्व पर भरोसा करने वाले पक्ष के लिए यह दावा करना संभव होगा कि सरकार को उसके द्वारा किए गए वादे को बनाए रखने के लिए बाध्य होना चाहिए। 

मेसर्स श्री सिद्धबली स्टील्स लिमिटेड और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2011) में, यह उल्लेख किया गया था कि कानून के विपरीत किए गए वादे को लागू करने के लिए विबंधन के सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि किसी को भी क़ानून के खिलाफ कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। एम. देव नारायण रेड्डी और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश सरकार और अन्य (2004), में यह माना गया कि विबंधन का सिद्धांत अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) निर्णय पर लागू नहीं होता है।

वचन विबंधन के कुछ अपवाद निम्नलिखित हैं:

  • यह नाबालिगों पर लागू नहीं होता है।
  • इसका उपयोग किसी को ऐसा कार्य करने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता जो कानून द्वारा निषिद्ध है।
  • यदि सरकार अपनी संवैधानिक शक्तियों को खतरे में डालती है तो इसका उपयोग सरकार के खिलाफ नहीं किया जा सकता है।
  • इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि दोनों पक्षों को जानकारी न हो।

वचन विबंधन के मौलिक घटक 

सिद्धांत को ठीक से लागू करने के लिए निम्नलिखित पांच घटकों का अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है-

  • वैध संबंध: दोनों पक्षों के बीच एक वैध संबंध या अपेक्षित संबंध का अस्तित्व होना चाहिए। 
  • आश्वासन: यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि दोनों पक्षों के बीच एक वादा किया गया था जिसके कारण अंततः पीड़ित पक्ष को यह मानना पड़ा कि किसी प्रकार की कार्रवाई करने की आवश्यकता है। ऐसा वादा उचित और विश्वसनीय होना चाहिए। 
  • निर्भरता: किए गए वादे पर पीड़ित पक्ष की निर्भरता को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और जिसके कारण पीड़ित पक्ष ने कुछ कार्रवाई की हो।
  • क्षति: पीड़ित पक्ष जिसने दूसरे पक्ष द्वारा किए गए वादे पर भरोसा किया था, उसे कुछ प्रकार की क्षति या हानि उठानी होगी जो अंततः दूसरे पक्ष को सबसे खराब स्थिति में पहुंचा देती है। 
  • अचेतनता (अनकॉन्शियनेबिलिटी): यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि वादा करने वाले के लिए वादा तोड़ना अन्यायपूर्ण था। 

यदि उपर्युक्त सभी घटक मौजूद हैं तो अधिकांश अदालतें इस सिद्धांत को स्थिति पर लागू करेंगी। हालाँकि, कुछ अदालतें अभी भी सिद्धांत को केवल तभी लागू कर सकती हैं जब परिस्थितियाँ वास्तव में इस अवधारणा को जन्म देती हैं। और सटीक स्थिति का ऐसा उदाहरण वास्तविक संपत्ति के संबंध में है।

निष्कर्ष

विबंधन सिद्धांत सभी प्रमुख कानूनी प्रणालियों में न्यायसंगत सिद्धांतों की आधारशिला है। यह अनुचितता और अन्याय के खिलाफ सुरक्षा के रूप में कार्य करता है, लेनदेन, अनुबंध और रिश्तों की स्थिरता को बढ़ावा देता है। जब पक्षों पर निर्भरता रखी गई हो तो उन्हें अपने शब्दों या कार्यों से पीछे हटने से रोककर, विबंधन का सिद्धांत, विभिन्न कानूनी संदर्भों में विश्वास और अखंडता (इंटीग्रिटी) की भावना बनाए रखता है। हम कह सकते हैं कि वचन विबंधन भी विबंधन का ही एक हिस्सा है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्टता है। वचन विबंधन भी कुछ मायनों में उस विबंधन से भिन्न है जिसे हमने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में देखा था।

संदर्भ

  • Contract and Specific Relief Act by Rajesh Kapoor (13th Edition)
  • Law of Contract by Dr Ashok Jain
  • Law of evidence by Mayank Madhaw
  • The Indian Contract Act, 1872
  • lawctopus.com/academike/promissory-estoppel/#:~:text=Doctrine%20of%20Promissory%20Estoppel&text=The%20principle%20is%20that%20when,go%20back%20from%20its%20words  
  • mondaq.com/india/government-contracts-procurement–ppp/1226798/doctrine-of-promissory-estoppel-and-its-application-against-government–an-explainer 
  • The Indian Evidence Act, 1872

 

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