होमAnimus’ and ‘Corpus’: requisites for possession of immovable property under Specific Relief Act 1963‘एनिमस' और 'कॉर्पस': विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के तहत अचल संपत्ति के...

‘एनिमस’ और ‘कॉर्पस’: विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के तहत अचल संपत्ति के कब्जे के लिए आवश्यक शर्तें

‘एनिमस’ और ‘कॉर्पस’: विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के तहत अचल संपत्ति के कब्जे के लिए आवश्यक शर्तें

यह लेख दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय की छात्रा Anamika Mishra द्वारा लिखा गया है। यह लेख ‘एनिमस’ और ‘कॉर्पस’: विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के तहत अचल संपत्ति के कब्जे के लिए आवश्यक शर्तें के बारे में बताता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

कानूनी स्थिति: विश्लेषण और निर्णय

हल्सबरी के इंग्लैंड के कानून में “कब्जे” शब्द का उपयोग विभिन्न संदर्भों और वाक्यांशों में किया जाता है। हालांकि, परंपरागत रूप से, कब्जा एक आदमी और एक वस्तु के बीच तथ्यात्मक भविष्यवाणी है, जिसके तहत, एक आदमी तथ्यात्मक रूप से एक वस्तु को धारण कर सकता है जो उसके पास है भी नहीं है। यह एक पहचान योग्य संपत्ति के दावे में एक वास्तविक अभ्यास है और स्वामित्व के लिए एक साथी है। कब्जा वास्तव में वह है जो स्वामित्व कानून में या उस चीज़ पर लागू करने योग्य है। निर्णायक रूप से, कानूनी इशारे में, कानून में कब्जा नौ बिंदु है।

यह देखा गया कि “कब्जे” का अर्थ है कॉर्पस का अधिकार और एनिमस का तथ्य; आनंद लेने का अधिकार संपत्ति के अधिकार और वास्तविक इरादे के तथ्य की सराहना करता है। “आनंद” शब्द बिना किसी हस्तक्षेप के संपत्ति पर भौतिक नियंत्रण है। यहां, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, संपत्ति का अधिकार (कॉर्पस पजेशनसीस) और संपत्ति रखने का वास्तविक इरादा (एनिमस पोसिडेंडी) कब्जे के मैट्रिक्स को बताने के लिए आवश्यकताएं हैं। दूसरे शब्दों में, चित्रात्मक रूप से, बाहरी सर्कल में आंतरिक सर्कल कब्जे का तथ्य होगा और बाहरी सर्कल स्वामित्व का तथ्य होगा। स्वामित्व कब्जे, बेदखली और यहां तक कि किसी की अपनी संपत्ति के विनाश के अधिकार का कुल योग है। जबकि कब्जा वास्तव में एक शर्त है, अर्थात्, हर आदमी को जो कुछ भी मिला है उसे रख सकता है, जब तक कि कोई और बेहतर शीर्षक साबित न कर दे।

अब्दुल रहीम बनाम एसके अब्दुल जबर मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संक्षेप में दी गई कानूनी स्थिति निम्नानुसार है:

“एक व्यक्ति को किसी वस्तु या अचल संपत्ति के कब्जे में कहा जाता है, जब उसे इसके संदर्भ में इस तरह रखा जाता है कि वह उस पर अनन्य नियंत्रण कर सकता है, इससे ऐसा लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से जो वह प्रतिपादन (रेंडरिंग) करने में सक्षम है या जैसा कि आमतौर पर इससे प्राप्त होता है।

सांविधिक प्रवचन (डिस्कोर्स)

इस पर 1963 के विशिष्ट राहत अधिनियम (इसके बाद, एसआरए) में विस्तार से चर्चा की गई है। इस अधिनियम का उद्देश्य एक्स ऐक्यावो एट बोनो, अर्थात्, समानता और अच्छा विवेक की तर्ज (लाइन्स) पर है। यह न्यायविद, नाथन रोस्को पाउंड के न्यायिक सार के साथ उन्मुख (ओरिएंटेड) है, अर्थात, कानून का उद्देश्य सामाजिक स्तरीकरण (लेवेल्लिंग) की प्रक्रिया में तेजी लाना है, अर्थात, उद्देश्य बड़े पैमाने पर समाज में रुचि को संतुलित करना है। इसे सोशल इंजीनियरिंग का सिद्धांत भी कहा जाता है, जिसमें विवाद से बचने के लिए समाज के हित को सुसंगत बनाया जाता है। एसआरए का न्यायिक सार पाउंड के सिद्धांत का दर्पण है, अन्य बातों के साथ-साथ, मूल कानून एक उपाय प्रदान करता है, अर्थात्, यूबी जुस इबी रीमीडियम, जहां अधिकार है, वहां एक उपाय है, लेकिन हितों का संतुलन बनाने के लिए, एसआरए अन्य संविदात्मक कानूनों के तहत प्रदान किए गए उपायों के अलावा “पर्याप्त” उपाय, अतिरिक्त और स्वतंत्र उपचार प्रदान करता है। 

एसआरए के भाग-II के अध्याय-I में संपत्ति के कब्जे की वसूली के लिए विशिष्ट राहत का प्रावधान है। धारा 5 और धारा 6 अचल संपत्ति के कब्जे की वसूली की राहत प्रदान करती है। सामान्य खंड अधिनियम 1897 की धारा 3 के परिभाषा खंड 26 के प्रावधान के अनुसार, “अचल संपत्ति” में भूमि, भूमि से उत्पन्न होने वाले लाभ, और पृथ्वी से जुड़ी चीजें, या स्थायी रूप से पृथ्वी से जुड़ी किसी भी चीज से बंधी हुई चीज़े शामिल होंगी।

एसआरए की धारा 5 

यह केवल एक घोषणात्मक प्रावधान है जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (इसके बाद, ‘सीपीसी’) की धारा 9 द्वारा विनियमित एक पहचान योग्य संपत्ति के कब्जे के “हकदार” पक्ष को राहत का अधिकार प्रदान करती है। सीपीसी की धारा 9 सिविल मुकदमेबाजी का प्रवेश द्वार है। यदि एसआरए में धारा 5 नहीं डाली गई होती, तब भी राहत मांगने वाले पक्ष सीपीसी की धारा 9 के तहत राहत की मांग कर सकते थे। एसआरए की धारा 5 के अनुसार, सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के संबंध में कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया जाना चाहिए।

“हकदार” शब्द का एक व्यापक दायरा है। इसमें स्वामित्व शीर्षक और कब्जे का शीर्षक  दोनों शामिल हैं।

उदाहरणात्मक व्याख्या

माना जाता है, (X) संपत्ति का मालिक, विक्रेता (A) खरीदार (B) को बेचने के लिए सहमत है। बिक्री विलेख (सेल डीड) तब संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, (ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट) 1882 की धारा 54 और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 17 के अनुसार पंजीकृत किया जाता है। नतीजतन, खरीदार अब उक्त संपत्ति के मालिक के रूप में ‘हकदार’ है और स्वामित्व अधिकार, हित और शीर्षक के साथ संपन्न है। स्वामित्व शीर्षक में स्वामित्व अधिकार, बेदखल अधिकार और यहां तक कि विनाशकारी अधिकार भी शामिल हैं। यह विषय वस्तु संपत्ति में किसी भी अधिकार, हित और शीर्षक को बनाने, घोषित करने, नियुक्त करने, सीमित करने या समाप्त करने का इरादा और संचालन करता है। 

माना जाता है, बंधककर्ता (मोर्टगेजर) (A) बन्धकग्रहीता (मोर्टगेजी) (B) से अपनी बंधक संपत्ति के बदले में पैसा उधार लेता है और उसे विषय वस्तु संपत्ति रखने का अधिकार प्रदान करता है। यह फलोपभोगी (यूसुफ्रक्चुरी) बंधक का मामला है। इसमें, बन्धक -ग्रहीता के पास संपत्ति पर अधिकार, हित, शीर्षक होगा जब तक कि बंधककर्ता द्वारा उधार दिए गए धन को पुनर्प्राप्त नहीं किया जाता है। बंधककर्ता बन्धक -ग्रहीता को बेदखल नहीं कर सकता है क्योंकि उसके कब्जे के अधिकारों में उस मालिक के विरुद्ध भी जो व्यक्ति के कब्जे के अधिकारों में बाधा डालता है और उसे बेदखल कर देता है, कब्ज़ा रखने और बेदखल करने का अधिकार शामिल है। 

धारा 5 को परिसीमा अधिनियम, 1963 (इसके बाद, ‘अधिनियम, 1963’) के अनुच्छेद 64 और अनुच्छेद 65 के साथ पढ़ा जाना चाहिए

एसआरए की धारा 5 को अधिनियम 1963 के अनुच्छेद 64, के साथ पढ़ा जाता है, जिसमें ऐसी स्थिति का प्रावधान है जिसमें राहत मांगने वाला पक्ष तय कब्जे के आधार पर है, न कि शीर्षक पर। राहत मांगने वाले पक्ष को शुरू में अपना शीर्षक उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, बल्कि उसे कब्जे के 12 साल के भीतर विषय वस्तु संपत्ति में अपने स्थापित कब्जे को साबित करना होगा। पूना राम बनाम मोती राम, 2019 में 2 न्यायाधीशों की पीठ में न्यायामूर्ति एमएम शांतनगौदर द्वारा दिए गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित कब्जे के सार पर जोर दिया, ऐसा कब्जा जो पर्याप्त रूप से लंबे समय से अस्तित्व में है और सच्चे मालिक द्वारा स्वीकार कर लिया गया है,यह महज एक भटका हुआ या रुक-रुक कर होने वाला अतिचार (ट्रेसपास) का कार्य नहीं है।

इसे एक प्रभावी कब्जा होना चाहिए और इस तरह के कब्जे में शीर्षक अनावश्यक है। यह भी अच्छी तरह से तय है कि संपत्ति का मालिक भी कानून की उचित प्रक्रिया का सहारा लेकर ही अपना कब्जा वापस पा सकता है। यदि अतिचारी किसी सही मालिक की संपत्ति के स्थापित कब्जे में है, तो सही मालिक उसके कब्जे में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है और कानून को अपने हाथों में लेकर उसे बेदखल नहीं कर सकता है, लेकिन उसे कानून का उचित पालन करके न्याय तंत्र का दरवाजा खटखटाना होगा। चूंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (इसके बाद, आईईए) की धारा 110 के तहत उल्लिखित पूर्व शांतिपूर्ण कब्जा मालिकाना हक का प्रमाण है, अर्थात, कब्जे को प्रथम दृष्टया स्वामित्व का प्रमाण होना और अन्यथा साबित करना, बोझ उस पक्ष पर है जो अन्यथा दावा करता है, अन्यथा, कानून परिसीमन के कानून के अधीन वास्तविक मालिक को भी निषेधाज्ञा (इन्जंक्शन) देकर बेदखल किए गए व्यक्ति की सहायता करेगा

उदाहरणात्मक व्याख्या

मान लें, (A) अपनी खाली संपत्ति अपने भाई (B) को कुछ समय के लिए रहने के लिए देता है। बाद में, (A) की मृत्यु हो जाती है और उसका बेटा (C), अब उत्तराधिकार के माध्यम से मालिक होने के नाते अपने चाचा को अपने पिता द्वारा दी गई उक्त संपत्ति को खाली करने के लिए कहता है। (B) संपत्ति खाली करने से इनकार करता है और परिणामस्वरूप (C) ने उसे बेदखल करने के लिए कानून अपने हाथों में ले लिया। परिणामस्वरूप, (B) एसआरए की धारा 5 के साथ अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 64, के तहत स्थापित कब्जे के आधार पर अचल संपत्ति के कब्जे की वसूली के लिए मुकदमा दायर करता है। इसलिए, चूंकि (B) अपने भाई और प्रतिवादी के पिता द्वारा दी गई विषय वस्तु की संपत्ति के स्थायी कब्जे में था, और बेदखल कर दिया गया था, इसलिए उसे तय कब्जे और उसके कब्जे के आधार पर मालिक के खिलाफ भी राहत का दावा करने का अधिकार है। हालांकि, मुकदमा दायर करते समय, वादी (B) शुरुआत में ही शीर्षक नहीं उठा सकता है, लेकिन तय कब्जे की दलील देने के बाद, प्रतिवादी (C) अपने शीर्षक को बढ़ा सकता है, यानी उत्तराधिकार के माध्यम से स्वामित्व का दावा कर सकता है, और फिर प्रतिवादी द्वारा अपना शीर्षक उठाने के बाद, अब वादी अपना ‘बेहतर शीर्षक’ उठा सकता है। यदि प्रतिवादी वादी के तय कब्जे की दलील पर अपना बेहतर शीर्षक साबित करने में सफल हो जाता है, तो वह निश्चित रूप से मुकदमा खारिज करने में सक्षम होगा।

उद्देश्य किसी व्यक्ति को बल का उपयोग करने से रोकना और ईस्ट इंडिया होटल्स लिमिटेड बनाम सिंडिकेट बैंक में दिए गए कानून के अनुसार कानून के अनुसार सहमति के बिना बेदखल करना है।

अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 65 के साथ पठित एसआरए‌ की धारा 5 पूरी तरह से ‘शीर्षक’ के आधार पर है, अर्थात, स्वामित्व या कब्जे का शीर्षक। जिस क्षण पक्ष एक-दूसरे के प्रति ‘प्रतिकूल’ हो जाते हैं, तो इस खंड के तहत प्रतिवादी द्वारा वादी के प्रतिकूल होने से 12 साल की अवधि के भीतर मुकदमा दायर करने का अधिकार पक्ष को प्राप्त होता है। ऊपर दिए गए उदाहरण को लेते हुए, जिस क्षण (C) अपने चाचा को संपत्ति खाली करने के लिए कहता है, और चाचा (B) खाली करने से इनकार करता है, तो पक्ष एक-दूसरे के प्रतिकूल हो जाते हैं और अधिनियम 1963 के अनुच्छेद 65 के साथ पठित एसआरए की धारा 5 के तहत कब्जा वसूलने का अधिकार (C) को प्राप्त होता है। 

एसआरए की धारा 6 

एसआरए की धारा 6 भी इसी तर्ज पर है। कार्रवाई का कारण, अर्थात्, इस तरह के अधिकार को रखने और अस्वीकार करने का कानूनी अधिकार ऊपर दिए गए अनुच्छेद 64 के साथ धारा 5 के प्रावधान के समान है। अंतर केवल इस तथ्य में निहित है कि धारा 6 के अनुसार, शीर्षक का सवाल किसी भी पक्ष द्वारा नहीं उठाया जा सकता है। यह एक सारांश कार्यवाही का प्रावधान करता है और इसके पीछे विचार यह है कि 6 महीने की सीमा अवधि के भीतर एक व्यक्ति को कब्जे की राहत का दावा करने के लिए एक तत्काल उपाय प्रदान किया जाए, जिसे बेहतर शीर्षक होने के बावजूद किसी भी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से बेदखल कर दिया गया है। कानून किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने और कानून की उचित प्रक्रिया का रास्ता नहीं अपनाने की अनुमति नहीं देता है। 

यहां, भले ही व्यक्ति आकस्मिक कब्जे में हो, फिर भी कानून का सहारा लिए बिना बेदखली की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसी तरह की बात सोपान सुखदेव साबले बनाम चैरिटी कम्मर में भी कही गई थी। कानून वादी को संपत्ति सौंप देगा, भले ही यह मालिक की हो क्योंकि उसने अपील और समीक्षा (रिव्यु) की किसी भी राहत के बिना उसे गैरकानूनी रूप से बेदखल कर दिया है। सीपीसी की धारा 115 के तहत एक संशोधन (रिविज़न) असाधारण परिस्थितियों में दायर किया जा सकता है। हालांकि, प्रतिवादी को एसआरए की धारा 6, के खंड 4 के अनुसार अपने शीर्षक (अधिनियम 1963 के अनुच्छेद 65 के साथ पठित एसआरए की धारा 5) को स्थापित करने के लिए एक नियमित मुकदमा दायर करने का अधिकार है और उसके सफल होने की स्थिति में, वह उक्त कब्जे को पुनर्प्राप्त करने का हकदार होगा। नतीजतन, वादी के पक्ष में डिक्री निष्क्रिय (इनऑपरेटिव) हो जाएगी। एक पक्ष को निष्पक्षता करने के लिए कानून कभी भी दूसरे पक्ष के साथ असमानता नहीं करेगा। इसलिए, यदि कानून कब्जे के मामले में तेजी से उपाय प्रदान करता है, भले ही व्यक्ति के पास कोई शीर्षक न हो, तो कानून धारा 6 के खंड (4) में भी उपाय प्रदान करता है क्योंकि किसी को भी संपत्ति अर्जित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी यदि उन्हें केवल परिसर में अनावश्यक रूप से या कार्यवाहक के रूप में या रिश्तेदार आदि के रूप में रहने की अनुमति दी गई थी।

इन धाराओं के संयुक्त और व्यापक अध्ययन के साथ, विशिष्ट राहत अधिनियम की उत्पत्ति अधिक समझ में आती है, अर्थात, 

  1. जो अदालत में आता है उसे साफ हाथों से आना चाहिए;
  2. जो निष्पक्षता चाहता है, उसे निष्पक्षता करनी चाहिए। और निष्पक्षता कानून का पालन करती है। 

पूर्ण न्याय करने के लिए निष्पक्षता को मौजूदा कानून का पूरक (सप्लीमेंट) होना चाहिए। इसलिए, ऐसे मामलों में जहां समान निष्पक्षता है, कानून लागू होगा।

 

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