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भारत में टॉर्टस का डिसचार्ज करना

भारत में टॉर्टस का डिसचार्ज करना
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यह लेख इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के तीसरे वर्ष के छात्र Parshav Gandhi द्वारा लिखा गया है। यह लेख मुख्य रूप से इस बात पर चर्चा करता है कि कैसे टॉर्ट का डिसचार्ज किया जाता है अर्थात कैसे एक टॉर्ट के वाद में पक्ष का अधिकार/दायित्व समाप्त हो जाता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

टॉर्ट का अर्थ

“टॉर्ट” शब्द फ्रांसीसी शब्द “टॉर्टम” से लिया गया है जिसका अर्थ “ट्विस्टेड” है।

टॉर्ट एक ऐसा कार्य / आचरण है जो घुमाया हुआ है। इसका अर्थ है दूसरे व्यक्ति के किसी कार्य के द्वारा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन, यानी दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन।

टॉर्ट एक नागरिक गलत है, लेकिन सभी नागरिक गलत टॉर्ट के दायरे में नहीं आते हैं। यदि एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई नागरिक गलत करता है, और वह गलत टॉर्ट के दायरे में आता है, तो जिस व्यक्ति के खिलाफ गलत किया गया है, वह असीमित (अनलिक्विडेटेड) हर्जाने के रूप में उपचार पाने का हकदार है।

लेकिन टॉर्ट का कानून उन विभिन्न तरीकों की भी चर्चा करता है जिनके द्वारा टॉर्ट के कार्य का डिसचार्ज  हो जाता है।

टॉर्ट का डिसचार्ज  करना

सात अलग-अलग तरीके हैं जिनके माध्यम से टॉर्ट का डिसचार्ज  किया जाता है और टॉर्ट के लिए कोई उपाय नहीं होगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से टॉर्ट समाप्त हो जाता है। एक अपराधी अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं रहता है।

टॉर्टस के डिसचार्ज  के तरीके निम्नलिखित हैं:

पक्षों की मौत

यहां कहावत ‘एक्शियो पर्सनलिस मोरिटर कम पर्सोना’ लागू होती है, जिसका अर्थ है कि यदि व्यक्ति मर जाता है तो उसके साथ उसकी कार्रवाई का व्यक्तिगत अधिकार भी ख़त्म हो जाता है।

‘एक्शियो पर्सनलिस मोरिटर कम पर्सोना’ यह महत्वपूर्ण कहावत है, इसका मतलब है कि यदि वह व्यक्ति जो टॉर्ट करता है या जिस व्यक्ति के खिलाफ टॉर्ट किया जाता है, उसकी मृत्यु हो जाती है, तो व्यक्तिगत अधिकार या क्षति प्राप्त करने का अधिकार या कार्रवाई का अधिकार व्यक्ति के साथ खत्म हो जाता है।

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ऐसी दो स्थितियाँ हैं जहाँ यह कहावत लागू होती है

  • उस व्यक्ति की मृत्यु जिसके खिलाफ टॉर्ट किया गया था अर्थात याचिकाकर्ता (पेटिशनर)

जब जिस व्यक्ति के खिलाफ टॉर्ट किया गया था यानी वादी जिसने अदालत का दरवाजा खटखटाया और मुकदमा दायर किया, उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसके व्यक्तिगत कार्रवाई का अधिकार उसके साथ ही खत्म हो जाता है।

चित्रण (इलस्ट्रेशन)

यदि A, B द्वारा किए गए टॉर्ट के खिलाफ मामला दर्ज करता है। यदि ट्रायल के दौरान A की मृत्यु हो जाती है और मामला अभी भी अदालत के समक्ष लंबित है। तो A की मृत्यु के कारण, टॉर्ट डिसचार्ज  हो जाता है, क्योंकि A की कार्रवाई का अधिकार उसके साथ ही खत्म हो जाता है।

याचिकाकर्ता के संबंध में ‘एक्शियो पर्सनलिस मोरिटर कम पर्सोना’ के सिद्धांत के अपवाद

भारत में ऐसे कानून हैं जो उपरोक्त कहावत के अपवाद का गठन करते हैं जैसे;

  • कानूनी प्रतिनिधि वाद अधिनियम (लीगल रिप्रेजेंटेटिव सूट एक्ट), 1885

इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का कानूनी प्रतिनिधि या निष्पादक (एग्जिक्यूटर), उसकी मृत्यु के बाद, कानून की अदालत में मृत व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

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यदि A की मृत्यु न्यायालय के ट्रायल की प्रक्रिया के दौरान हो जाती है। उसका कानूनी उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि कानून की अदालत में उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है।

इसी तरह, विभिन्न कानूनों/अधिनियमों जैसे घातक दुर्घटना अधिनियम, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, कामगार मुआवजा अधिनियम आदि में वादी का प्रतिनिधि कानून की अदालत में उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है।

  • टॉर्ट करने वाले की मृत्यु अर्थात प्रतिवादी

इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध टॉर्ट का कार्य करता है अर्थात प्रतिवादी, यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है।

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यदि राम गीता के विरुद्ध टॉर्ट करता है, और गीता राम के विरुद्ध शिकायत करती है, लेकिन ट्रायल के दौरान राम की मृत्यु हो जाती है, तो उसके साथ उसका कार्यवाही का अधिकार भी समाप्त हो जाता है अर्थात् टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है।

प्रस्ती बनाम मोहंती के मामले में, प्रतिवादी ने तथ्य की गलत बयानी के कारण कुछ राशि प्राप्त की, लेकिन प्रतिवादी की मृत्यु हो गई। उड़ीसा के उच्च न्यायालय ने माना कि जहां एक व्यक्ति के खिलाफ डिक्री धारक से प्राप्त राशि के संबंध में एक धन डिक्री पास की गई थी, तो तथ्यों की गलत बयानी से, दायित्व व्यक्तिगत होगा और कानून में उसके बेटे तक विस्तारित नहीं किया जा सकता है, जैसा कि एक डिक्री धारक के पास पिता के खिलाफ जो भी राहत होती है, वह पिता की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है।

प्रतिवादी के संबंध में ‘एक्शियो पर्सनलिस मोरिटर कम पर्सोना’ की कहावत के अपवाद

भारत में ऐसे कई कानून हैं जो उपरोक्त कहावत के अपवाद हैं जैसे;

  • कानूनी प्रतिनिधि वाद अधिनियम, 1885

इस अधिनियम के अनुसार, यदि किसी भी प्रकार के टॉर्शियस कार्य में शामिल किसी व्यक्ति की मृत्यु ट्रायल के दौरान हो जाती है, तो कार्रवाई का अधिकार उस व्यक्ति के कानूनी प्रतिनिधि को जाता है।

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यदि A अतीत में B के खिलाफ सामान के लिए अतिचार (ट्रेसपास) का कार्य करता है। अब यदि A की मृत्यु हो जाती है और यह साबित हो जाता है कि वह B के सामान को नुकसान पहुंचाने के लिए उत्तरदायी था। तो B के सामान को नुकसान पहुंचाने के लिए नुकसान का भुगतान उसके कानूनी प्रतिनिधि को करना होगा।

इसी तरह, विभिन्न कानूनों/अधिनियमों जैसे घातक दुर्घटना अधिनियम, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, कर्मकार मुआवजा अधिनियम आदि में प्रतिवादी के प्रतिनिधि को कानून की अदालत में उसका प्रतिनिधित्व करना होता है।

छूट द्वारा

टॉर्ट का डिसचार्ज  करना का दूसरा तरीका छूट है। छूट की अवधारणा तब होती है जब किसी व्यक्ति के पास उसके लिए एक से अधिक उपाय उपलब्ध होते हैं, परिणामस्वरूप, उसे उनमें से एक को चुनना होता है। वह मानहानि और हमले के मामले को छोड़कर दोनों उपचारों के लिए आवेदन नहीं कर सकता।

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यदि A ने B के खिलाफ मामला दायर किया है कि B ने A के खिलाफ एक टॉर्ट किया है। यदि A को एक से अधिक उपाय प्राप्त करने का अधिकार है तो उसे उनमें से किसी एक को चुनना होगा, यानी यदि उसके पास टॉर्ट और अनुबंध कानून दोनों में उपाय है, तो उसे उनमें से किसी एक को चुनना होता है।

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छूट के सिद्धांत में निहित मुख्य दो सिद्धांत हैं:

  • व्यक्ति को कोई एक उपाय चुनना होता है।
  • यदि व्यक्ति अपने द्वारा चुने गए उपाय को प्राप्त करने में विफल रहता है, तो कानून की अदालत उसे वैकल्पिक उपाय पर वापस जाने की अनुमति नहीं देती है।

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यदि A, Z के खिलाफ मामला दर्ज करता है और उसके पास दो उपाय हैं जिसके लिए वह कानून की अदालत में जा सकता है। यदि वह पहला उपाय चुनता है और मामला हार जाता है। A वैकल्पिक उपचार अर्थात उपचार संख्या 2 के लिए न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है।

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छूट को निहित या व्यक्त किया जा सकता है

व्यक्त छूट में, व्यक्ति कानून की अदालत में अपनी पसंद के बारे में स्पष्ट रूप से बताता है।

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यदि A मामला दर्ज करता है और उसके पास अनुबंध और टॉर्ट दोनों में उपाय है। जब अदालत उससे कहती है तो उसे अदालत को अपनी पसंद के बारे में बताना होता है।

छूट के निहित रूप में, व्यक्ति निहित रूप से अपनी पसंद के बारे में बताता है कि वह किस उपाय के लिए आवेदन कर रहा है।

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यदि A के पास दो उपचार उपलब्ध हैं जैसे एक अनुबंध के तहत और एक टॉर्ट के तहत। यदि वह अनुबंध के लिए आवेदन करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अनुबंध के तहत उपाय का चुनाव करता है।

सहमति (एकॉर्ड) और संतुष्टि

सहमति की अवधारणा का अर्थ है जब टॉर्ट के पक्ष अर्थात वह व्यक्ति जो अपराध करता है और वह व्यक्ति जिसके खिलाफ टॉर्ट किया गया है, एक सहमति पर आते हैं और विवाद को सुलझाते हैं। इस तरह के समझौते को सहमति के रूप में जाना जाता है। सामान्य शब्दों में, इसका अर्थ है कार्रवाई के अधिकार के बदले कुछ प्रतिफल (कंसीडरेशन) स्वीकार कर मामले को सुलझाना।

संतुष्टि का अर्थ दोनो व्यक्ति अर्थात वह व्यक्ति जो एक टॉर्ट करता है और वह जिसके विरुद्ध टॉर्ट किया जाता है, के द्वारा सहमति व्यक्त करके प्रतिफल का वास्तविक भुगतान करना है ।

जब सहमति और संतुष्टि दोनों एक बार पूरी हो जाती हैं, तो इसका परिणाम टॉर्ट का डिसचार्ज  होता है और विवाद अदालत में आगे नहीं बढ़ता है।

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यदि A की मृत्यु B की कार से लगी चोट के कारण होती है। यदि A का परिवार एक समझौते पर आता है कि B उन्हें मुआवजे के रूप में 1,50,000 रुपये का भुगतान करेगा यही सहमति की स्थिति है। जब उन्हें B से 1,50,000 रुपये का वास्तविक भुगतान प्राप्त हुआ तो यह संतुष्टि की स्थिति है। इसलिए, इस मुद्दे को सुलझाने और कुछ प्रतिफल स्वीकार करने से A के परिवार ने कार्रवाई का अधिकार खो दिया और टॉर्ट का डिसचार्ज  हो गया।

सहमति और संतुष्टि की अवधारणा में एकमात्र शर्त यह है कि पक्ष की सहमति मुक्त होनी चाहिए न कि धोखाधड़ी, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव से प्रभावित होनी चाहिए।

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यदि A, एक सफल व्यवसायी का बेटा, अपने नौकर में से एक को बेरहमी से मारता है, अर्थात शरीर पर अतिचार करता है और यदि A अपने नौकर पर किसी प्रकार के अनुचित प्रभाव का उपयोग करके अपने नौकर को राजी करने का प्रयास करता है। उस प्रभाव के कारण, नौकर ने अपनी सहमति दी, इसे स्वतंत्र सहमति नहीं माना जाता है और सहमति और संतुष्टि मान्य नहीं होगा।

रिहाई

रिहाई का मतलब है कार्रवाई का अधिकार छोड़ना। इसका अर्थ है कि जब कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से टॉर्ट का डिसचार्ज  करता है। यह अधिकार केवल उसी व्यक्ति को प्रदान किया जाता है जिसके विरुद्ध गलत किया गया हो।

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स्थिति 1: A वह व्यक्ति है जिसके खिलाफ B टॉर्ट का कोई कार्य करता है और यदि A, अपनी स्वतंत्र सहमति से B को दायित्व से रिहा करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है।

स्थिति 2: A वह व्यक्ति है जिसके खिलाफ B और C दोनों ने टॉर्ट का कार्य किया और A ने अपनी पसंद से B को दायित्व से रिहा कर दिया, इसका मतलब यह नहीं है कि C भी अपने दायित्व से रिहा हो गया है।

रिहाई स्वैच्छिक होनी चाहिए और घायल व्यक्ति की स्वतंत्र सहमति से दी जानी चाहिए। यदि सहमति जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव, या किसी अन्य गैरकानूनी तरीके से ली गई है, तो उस रिहाई को रिहाई के रूप में नहीं गिना जाना चाहिए और टॉर्ट का डिसचार्ज  नहीं किया जाना चाहिए।

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यदि कोई व्यक्ति पुलिस निरीक्षक (स्पेक्टर) है, और वह किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध टॉर्ट का कार्य करता है। वह अपनी स्थिति का उपयोग करके और धमकी देकर, घायल व्यक्ति की सहमति लें लेता और खुद को दायित्व से रिहा कर देता, वह रिहाई एक वैध रिहाई नहीं है।

निर्णय

इस तरीके में, न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से टॉर्ट का डिसचार्ज  होता है। यदि एक बार जब न्यायालय मामले पर निर्णय दे देता है, तो टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है, कानून की अदालत में एक ही उपाय के लिए उसी टॉर्ट के लिए कोई अपील का दावा नहीं किया जा सकता है।

टॉर्ट का डिसचार्ज  करने के इस तरीके की अवधारणा रेस-जुडिकाटा के कानूनी सिद्धांत पर आधारित है, इसका मतलब है कि यदि अदालत द्वारा पहले से तय की गई कार्रवाई का कोई कारण है, तो अदालत द्वारा दो बार कार्रवाई का एक ही कारण नहीं माना जाना चाहिए।

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यदि A को अदालत के फैसले से, पहले उसके द्वारा की गई दुर्घटना के लिए B के खिलाफ उपाय मिलता है। बाद में उन्होंने पाया कि उसे एक और ऑपरेशन से गुजरना होगा। वह फिर से कानून की अदालत में उसी के लिए एक और उपाय का दावा नहीं कर सकता।

फिटर बनाम वील (1701 12 एमओडी. आरईपी. 542) के मामले में, वादी प्रतिवादी के खिलाफ एक मामला दायर करता है और प्रतिवादी द्वारा किए गए हमले के खिलाफ हर्जाने की मांग करता है और अंत में उसे प्रतिवादी से उपाय मिलता है क्योंकि कानून की अदालत उसे उपाय की अनुमति देती है। बाद में उन्हें पता चला कि उन्हें कई और सर्जरी से गुजरना है। उन्होंने प्रतिवादी के खिलाफ एक और याचिका दायर कर अदालत में फिर से हमले के कार्य के खिलाफ और अधिक उपाय की मांग की।

अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि, यदि एक बार अदालत मामले पर फैसला दे देती है, तो अदालत में उसी तरह के टॉर्ट के लिए कोई और अपील दायर नहीं की जा सकती है, क्योंकि टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है।

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अपवाद

  • यदि याचिका एक ही पक्ष के बीच थी, लेकिन अलग-अलग उपाय या किसी अन्य अधिकार के उल्लंघन के संबंध में की गई कार्रवाई के लिए है। तब याचिका को अनुमति दी जा सकती है।

ब्रंसडेन बनाम हम्फ्री के मामले में, वादी एक कैब ड्राइवर था और अपनी कैब को हुए नुकसान के लिए पहले ही मुआवजा प्राप्त कर चुका था। बाद में पता चला कि हादसे में लगी चोट के कारण उनके हाथ में फ्रेक्चर हो गया है। उसे अपने शरीर पर अतिचार के खिलाफ उपाय के लिए आवेदन करने का भी अधिकार है।

  • यदि वह व्यक्ति जो पहले इस कार्य के लिए उत्तरदायी है, वही कार्य दूसरी बार करता है।

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यदि A पहले B के खिलाफ अतिचार का टॉर्ट करता है और कानून की अदालत द्वारा उत्तरदायी ठहराया जाता है। यदि वह फिर से B के खिलाफ वही अपराध करता है और एक दलील से यह बचाव लेता है कि अदालत उसे एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित नहीं कर सकती है तो बचाव मान्य नहीं होगा क्योंकि इस मामले मे इसे नया माना गया था।

रज़ामंदी

इस तरीके में, वादी की स्वयं की अक्षमता के कारण टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है अर्थात यदि उसके पास अदालत जाने का समय नहीं है, अदालत की फीस का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं हैं, या कोई अन्य अक्षमता है। जब कोई व्यक्ति अपने अधिकार को लागू करने का हकदार होता है, और वह लंबे समय तक अपने अधिकार को लागू नहीं करता है, तो यह दूसरे पक्ष को उसके दायित्व से मुक्त कर देता है।

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यदि A अपने अधिकार को B के खिलाफ लागू करने का हकदार है और A लंबे समय तक अपने अधिकार को लागू करने की उपेक्षा (नेगलेक्ट) करता है, तो यह स्वचालित (ऑटोमेटिकली) रूप से B को अपने दायित्व से मुक्त कर देता है।

परिसीमा का कानून (लॉ ऑफ़ लिमिटेशन)

इस तरीके के तहत परिसीमा के कारण टॉर्ट खारिज हो जाता है यानी जब मामला दायर करने की निर्धारित समय सीमा समाप्त हो जाती है, तो इस स्थिति में टॉर्ट खारिज हो जाता है और कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार को लागू करने का हकदार नहीं होता है।

जैसे, झूठे कारावास या परिवाद (लिबेल) के मामले में मुकदमा दायर करने की सीमा 1 वर्ष है, अचल संपत्ति के अतिचार के मामले में निर्धारित सीमा 3 वर्ष है, इसलिए समय सीमा समाप्त होने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार को लागू नहीं कर सकता है।

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यदि A के खिलाफ B द्वारा संपत्ति के अतिचार का टॉर्ट किया गया है, अगर A कानून की अदालत में 3 साल के भीतर इसके खिलाफ आवेदन करने में विफल रहता है, तो वह आवेदन नहीं कर सकता क्योंकि उसने सीमा के कारण आवेदन करने का अपना अधिकार खो दिया था।

निष्कर्ष

टॉर्ट एक ऐसा कार्य / आचरण है जो घुमा हुआ है। इसका अर्थ है दूसरे व्यक्ति के कार्य द्वारा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन यानी दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन। लेकिन पक्ष की कार्रवाई का अधिकार कुछ शर्तों में छूट सकता है जैसे कि किसी भी पक्ष की मृत्यु, छूट से, सहमति और संतुष्टि से, रिहाई से, या कानून की अदालत के फैसले से। उपरोक्त तरीकों से टॉर्ट का डिसचार्ज  हो जाता है और टॉर्ट का कोई उपाय नहीं रह जाता है।

 

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