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आई.पी.सी. की धारा 149

आई.पी.सी. की धारा 149

यह लेख गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से संबद्ध (एफिलिएटेड) फेयरफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी की छात्रा Simran Mohanty द्वारा लिखा गया है। इस लेख में विभिन्न न्यायिक पूर्व निर्णयों (प्रिसिडेंट) की मदद से भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149 पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

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परिचय

धारा 149, भारतीय दंड संहिता, 1860 के अध्याय आठ में प्रदान की गई है जो सार्वजनिक शांति के खिलाफ सभी अपराधों का वर्णन करती है। यह धारा, विशेष रूप से, एक सामान्य उद्देश्य को आगे बढ़ाने में किए गए अपराध की दोषी गैरकानूनी सभा के प्रत्येक सदस्य के दायित्व से संबंधित है। न्यायालयों ने यह माना है कि यह प्रावधान एक गैरकानूनी सभा के सदस्यों द्वारा किए गए अपराध में संयुक्त दायित्व या प्रतिवर्ती (वाइकेरियस) दायित्व बनाता है।

संक्षेप में आई.पी.सी. की धारा 149 

जब किसी व्यक्ति पर कुछ व्यक्तियों के समूह द्वारा हमला किया जाता है, तो अपराध करने के दौरान प्रत्येक सदस्य द्वारा निभाई गई भूमिका को स्थापित करना मुश्किल होता है। ऐसे मामलों में, सभी आरोपी व्यक्तियों पर धारा 149 का आरोप लगाया जा सकता है। इस प्रावधान की जड़ यह है कि एक गैर-कानूनी सभा का प्रत्येक सदस्य जो एक समान उद्देश्य साझा करता है, समूह द्वारा किए गए अपराध के लिए उत्तरदायी होगा। वे भी दोषी होंगे यदि वे जानते थे कि अपराध किए जाने की संभावना है और उन्होंने इसमें सक्रिय (एक्टिव) रूप से भाग लिया। उदाहरण के लिए, A, B और C ने Z को पकड़ लिया जबकि D और E ने Z को बांस की डंडियों से पीटा। यहां भले ही A, B और C, D और E की तरह Z को नहीं मार रहे थे, लेकिन वे सभी भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149 के तहत उत्तरदायी होंगे क्योंकि सभी आरोपियों का पीड़ित पर शारीरिक हमला करने का सामान्य उद्देश्य था।

इस प्रकार, यह प्रावधान समाज की शांति बनाए रखने के लिए और उन अपराधियों को रोकने के लिए अधिनियमित (इनैक्ट) किया गया था जो सामान्य उद्देश्य के आधार पर धारा 149 के तहत निर्दोष लोगों पर हमला करने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

ब्रिटिश काल में आई.पी.सी. की धारा 149 की उत्पत्ति

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149 का इतिहास औपनिवेशिक (कोलोनियल) काल में खोजा जा सकता है। वर्तमान भारतीय दंड संहिता, 1860 ब्रिटिश युग के मसौदा (ड्राफ्ट) दंड संहिता पर आधारित है जिसे मैकाले कोड भी कहा जाता था। दंड संहिता के मसौदे में धारा 149 जैसा प्रावधान नहीं था, लेकिन इसमें दंगा करने के लिए 5 साल की कैद का प्रावधान था। जब अंग्रेजों द्वारा भारतीय दंड संहिता 1860 को अधिनियमित किया गया था, तो भारत के लोगों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी विद्रोह को दबाने के लिए धारा 149 डाली गई थी। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने देखा कि भारतीयों में आजाद होने की उत्सुकता जगी है और वे दमनकारी (ऑपरेसिव) ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं। इसने अंग्रेजों को परेशान किया और बाद में उन्होंने विद्रोहियों को दबाने और उन्हें हिरासत में लेने के लिए धारा 149 का सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया ताकि आम जनता उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने से डरे। इस प्रकार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उक्त प्रावधान का मूल उपयोग दमनकारी प्रकृति का था लेकिन भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, अदालतों ने क़ानून की सख्त व्याख्या की है ताकि सामान्य उद्देश्य के नाम पर किसी भी गलत सजा को रोका जा सके।  

आई.पी.सी. की धारा 149 के तहत परिभाषित अपराध की प्रकृति

प्रारंभ में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय का विचार था कि उक्त धारा एक विशिष्ट अपराध बनाती है। यह लालजी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1989) में आयोजित किया गया था। लेकिन लगभग तीन दशक बाद विन्नुभाई रणछोड़भाई पटेल बनाम राजीवभाई दुदाभाई पाटे (2018) में, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय की एक बड़ी पीठ ने माना कि यह प्रावधान एक अलग अपराध नहीं है, बल्कि यह उन सभी सदस्यों के लिए प्रतिवर्ती दायित्व पैदा करता है जिनके पास एक गैरकानूनी सभा में अपराध करने के लिए एक सामान्य उद्देश्य होता है। कई अदालतों ने देखा है कि धारा 149 की नींव रचनात्मक (कंस्ट्रक्टिव) दायित्व में है।

आई.पी.सी. की धारा 149 के आवश्यक तत्व

धारा 149 के तहत व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए निम्नलिखित को संतुष्ट करने की आवश्यकता है:

  1. एक गैर-कानूनी सभा होनी चाहिए।
  2. गैरकानूनी सभा के किसी भी सदस्य के द्वारा अपराध किया जाना चाहिए 
  1. किया गया अपराध सभा के सामान्य उद्देश्य को आगे बढ़ाने में होना चाहिए या सदस्यों को अपराध होने के बारे में जानकारी होनी चाहिए। 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विजय पांडुरंग ठाकरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2017) में पारित निर्णय के अनुसार, धारा 149 के लागू होने के लिए, आवश्यक आपराधिक इरादे से अपराध में व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए या गैरकानूनी सभा के लिए साझा करने के लिए एक सामान्य उद्देश्य होना चाहिए  अन्यथा, उक्त धारा के तहत व्यक्ति को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

आई.पी.सी. की धारा 141 के तहत गैरकानूनी सभा

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 141 गैरकानूनी सभा को परिभाषित करती है जो उक्त संहिता की धारा 149 के तहत सदस्यों के संयुक्त दायित्व को स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। धारा 141 के अनुसार, यदि पांच या अधिक व्यक्तियों के पास निम्नलिखित सामान्य उद्देश्य हैं-

  1. आपराधिक बल से भयभीत होना
  • केंद्र सरकार, या राज्य सरकार, या विधानमंडल (लेजिस्लेचर), या
  • वैध शक्ति के प्रयोग में कोई लोक सेवक;

2. कानून या कानूनी प्रक्रिया के निष्पादन (एग्जिक्यूशन) का विरोध करने के लिए;

3. शरारत (मिस्चीफ), आपराधिक अतिचार (ट्रेसपास), या कोई अन्य अपराध करना;

4. आपराधिक बल द्वारा-

  • किसी संपत्ति के कब्जे को लेने या प्राप्त करने के लिए, या
  • किसी भी व्यक्ति को किसी भी समावेशी (इनकॉर्पोरियल) अधिकार से वंचित करने के लिए, या
  • किसी भी अधिकार या कथित अधिकार को लागू करने के लिए;

5. किसी भी व्यक्ति को बाध्य करने के लिए आपराधिक बल का प्रयोग-

  • वह कराने के लिए करना जिसके लिए वह कानूनी रूप से बाध्य नहीं है, या 
  • वह न करना जिसके लिए कानूनी रूप से बाध्य है। 

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क्या प्रत्येक सदस्य की ओर से एक प्रत्यक्ष कार्य आवश्यक है

यूनिस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2002) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भले ही आठ आरोपियों में से एक द्वारा कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं किया गया हो, फिर भी वह अपराध करने के स्थान पर उपस्थित होने के कारण आई.पी.सी. की धारा 149 के तहत उत्तरदायी होगा। इसके विपरीत, मध्य प्रदेश राज्य बनाम मिश्रीला (2003) के मामले में उसी अदालत ने कहा कि जहां व्यक्ति अपराध करने में किसी भी भागीदारी के बिना खड़ा है, तो केवल उसकी उपस्थिति धारा 149 को आकर्षित नहीं करेगी। इसलिए, अदालत ने माना कि वह व्यक्ति गैर कानूनी सभा का सदस्य नहीं है और उसकी सजा की अनुमति नहीं है।

सामान्य उद्देश्य 

महाराष्ट्र राज्य बनाम काशीराव और अन्य (2003) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “‘उद्देश्य’ शब्द का अर्थ इरादा रखना है और इसे ‘सामान्य’ बनाने के लिए, इसे सभी द्वारा साझा किया जाना चाहिए।” अदालत ने आगे कहा कि आपसी सहमति से एक सामान्य उद्देश्य बनाया जा सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है। उक्त निर्णय का विश्लेषण करके हम कह सकते हैं कि गैर-कानूनी सभा के सदस्यों को एक ही उद्देश्य को आवश्यक आपराधिक इरादे से साझा करना चाहिए ताकि एक सामान्य उद्देश्य का गठन किया जा सके।

इस प्रकार, उद्देश्य वह लक्ष्य है जिसे पूरा करने के लिए सभा के सदस्य कार्य करते हैं।

यदि सभी सदस्यों का एक ही लक्ष्य है और उद्देश्य सभी सदस्यों द्वारा साझा किया जाता है, साथ ही वे इसे प्राप्त करने के तरीके पर सहमत होते हैं, तो इसे गैरकानूनी सभा का सामान्य उद्देश्य माना जाएगा।

धारा 149 के संबंध में ‘सामान्य उद्देश्य’ को प्रावधान को निम्नलिखित दो भागों में तोड़कर समझा जा सकता है-

  • भाग A: ‘यदि उस सभा के सामान्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए गैरकानूनी सभा के किसी सदस्य द्वारा अपराध किया जाता है।’ 
  • भाग B: ‘उस सभा के सदस्य उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कार्य होने की संभावना जानते थे।’

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उस सभा के सामान्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कार्य करना

इसका अर्थ है कि यह कार्य गैरकानूनी सभा के सामान्य उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया जाता है। सतबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009) में, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘सामान्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए’ अभिव्यक्ति की ‘सामान्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए’ के ​​रूप में सख्ती से व्याख्या की।

उपर दी गई अभिव्यक्ति का अर्थ ‘सभा के सामान्य उद्देश्य के दौरान’ नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि किया गया अपराध सभा के सामान्य उद्देश्य से संबंधित था।

विट्ठल भीमशाह कोली बनाम महाराष्ट्र राज्य (1982) के मामले में, गैरकानूनी सभा के सदस्यों ने पीड़ित पर हमला करने के लिए खुद को समूहों में विभाजित कर लिया और भले ही वे अपराध करने से पहले एक जगह पर नहीं मिले, लेकिन हमला काफी व्यवस्थित लग रहा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही प्रारंभिक चरण में सामान्य उद्देश्य का विकास नहीं किया गया था, यह मौके पर विकसित हो सकता है और एक सामान्य उद्देश्य के रूप में गठित किया जाएगा। जबकि सूरतलाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1982), में एक आरोपी ने पीड़ित को सिर्फ पीटने की प्रारंभिक योजना से अलग, चाकू निकाला और पीड़ित को चाकू मार दिया। अदालत ने माना कि चूंकि प्रारंभिक योजना जो सदस्यों द्वारा पारस्परिक रूप से तय की गई थी, पीड़ित को कोई घातक चोट नहीं पहुंचानी थी और यह केवल एक आरोपी था जिसने पीड़ित की हत्या का अचानक फैसला किया था। इसलिए, पीड़ित की हत्या करने वाला आरोपी जिम्मेदार था न कि बाकी सदस्य क्योंकि सामान्य उद्देश्य हत्या करना नहीं था।

जब एक अपराध स्थल पर कई व्यक्ति होते हैं, तो उन्हें अपराध के लिए उत्तरदायी बनाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए, सभा के सदस्यों को अपराध के लिए उत्तरदायी बनाने के लिए एक सामान्य उद्देश्य की स्थापना करना बहुत महत्वपूर्ण है।

सभा के सदस्य उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कार्य होने की संभावना को जानते थे

पूर्वोक्त अभिव्यक्ति में ‘जानता’ शब्द का अर्थ “संभावना” से अधिक है और इसके दायरे में यह शामिल नहीं हो सकता है कि ‘हो सकता है’ की आरोपी कार्य के बारे में जानता हो। सामान्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किया गया अपराध आम तौर पर वह अपराध होगा जो सभा के सदस्यों को पता था कि इस किए जाने की संभावना है। यह न्यायालय द्वारा गंगाधर बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (2002) में देखा गया था। 

राजेंद्र शांताराम टोडनकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2003) में, न्यायालय ने कहा कि जब कोई कार्य किया जाता है और सभा के सदस्यों को सामान्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपराध की संभावना का ज्ञान होता है, तो सदस्य धारा 149 के तहत प्रतिवर्ती रूप से उत्तरदायी होंगे। अपराध करने का ज्ञान हालांकि कठिन परिस्थितियों से अनुमान लगाया जा सकता है जैसे कि घटना की पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड), मकसद, सभा की प्रकृति और सभा के सदस्यों द्वारा उठाए गए हथियार, उनका सामान्य उद्देश्य, और अपराध के वास्तविक कार्य पर या उसके तुरंत पहले सदस्यों का व्यवहार।

आई.पी.सी. की धारा 149 के भाग A और भाग B के बीच अंतर

चंदा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2003) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा के दोनों हिस्सों में अंतर किया।

धारा के पहले भाग में कहा गया है कि अपराध सामान्य उद्देश्य को पूरा करने की दृष्टि से किया जाना चाहिए। अपराध के पहले भाग के अंतर्गत आने के लिए, उस अपराध का उस गैरकानूनी सभा के सामान्य उद्देश्य से तत्काल या सीधा संबंध होना चाहिए, जिसका आरोपी सदस्य था।

जबकि अपराध को दूसरे भाग के अंतर्गत आने के लिए अदालत ने माना कि अपराध ऐसा होना चाहिए कि सदस्यों को पता हो कि इसके किए जाने की संभावना है। 

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सामान्य उद्देश्य की पहचान

विन्नुभाई रणछोड़भाई पटेल बनाम राजीवभाई दुदाभाई पटेल (2018) में अदालत ने कहा कि गैरकानूनी सभा के सदस्यों की मानसिक स्थिति का आकलन करके सामान्य उद्देश्य की पहचान की जा सकती है। कोई ऐसा स्थापित नियम नहीं है, लेकिन सबसे अधिक संभावना है कि परिस्थितिजन्य (सरकमस्टेंशियल) साक्ष्य और सभा की प्रकृति को देखते हुए मानसिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि लोगों का एक समूह देर रात सार्वजनिक स्थान पर खतरनाक हथियारों के साथ इकट्ठा होता है और किसी पर हमला करता है, तो गैरकानूनी सभा का कोई भी सदस्य मूर्ख होगा यदि उसे यह नहीं पता था कि उनके कार्यों से घातक चोट लग सकती है।

आई.पी.सी. की धारा 149 के तहत सजा

जैसा कि पहले इस लेख में चर्चा की गई है, धारा 149 एक अलग अपराध को परिभाषित नहीं करती है। इसलिए धारा 149 के तहत किए गए अपराध के समान ही सजा होगी। यहां तक ​​कि अपराध को जमानती/गैर-जमानती या संज्ञेय (कॉग्निजेबल)/गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) के रूप में वर्गीकृत करने के उद्देश्य से, यह किए गए अपराध के अनुसार होगा उदाहरण के लिए, यदि गैरकानूनी सभा द्वारा किया गया अपराध दंगा है जो भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 147 के तहत दंडनीय है तो गैरकानूनी सभा के सभी सदस्यों को दंगा के लिए जिम्मेदार सामान्य उद्देश्य के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जो दो साल तक का हो सकता है या जुर्माना या दोनों हो सकता है। 

आई.पी.सी. की धारा 149 और धारा 34 के बीच अंतर

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 34 और धारा 149 के बीच अंतर के मानदंड (पैरामीटर) का अनुमान दोनों धाराओं के सादे पठन से लगाया जा सकता है। जहां धारा 149 में दायित्व ‘सामान्य उद्देश्य’ पर आधारित है, वहीं धारा 34 में दायित्व ‘सामान्य इरादे’ पर आधारित है। भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 34 को आकर्षित करने के लिए कई व्यक्तियों को एक कार्य करना चाहिए और साथ ही उक्त कार्य को करने का इरादा होना चाहिए। यह प्रावधान तब लागू नहीं होगा जहां कई व्यक्ति एक कार्य करने का इरादा रखते हैं, लेकिन उनमें से कुछ मूल उद्देश्य से अलग हो जाते हैं और एक पूरी तरह से अलग कार्य करते हैं। ऐसे मामले में मामले के तथ्यों की सावधानीपूर्वक जांच करके धारा 149 लागू की जा सकती है।

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने रोहतास बनाम हरियाणा राज्य (2020) में दोनों शब्दो के बीच अंतर को स्पष्ट किया है। इस मामले में, पीड़ित एक कृषि प्लाट के लिए जा रहा था, जब अपीलकर्ता ने तीन अन्य आरोपियों के साथ पीड़ित के शरीर पर कुल्हाड़ियों से वार करना शुरू कर दिया, जिससे उसके पैर, हाथ और सिर पर गंभीर चोटें आईं। इस बीच, लोगों के एक अन्य समूह ने भी पीड़ित को पीटना शुरू कर दिया और उसे जान से मारने की धमकी भी दी। अदालत ने कहा कि भले ही दोनों धाराएं समूह के सदस्यों पर प्रतिवर्ती दायित्व पैदा करते हैं, लेकिन उन दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं। जबकि धारा 34 में सक्रिय भागीदारी और मन की पूर्व सहमति की आवश्यकता होती है, धारा 149 के तहत दायित्व गैरकानूनी सभा में सदस्यता के आधार पर बनाया जाता है। अदालत ने आगे कहा कि आम तौर पर सदस्यों के कार्य से अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट) रूप से ‘सामान्य इरादे’ का अनुमान लगाया जाता है।

नीचे दो प्रावधानों के बीच संक्षेप में अंतर है: 

आई.पी.सी. की धारा 34  आई.पी.सी. की धारा 149
कानून में कहीं भी सामान्य इरादे को परिभाषित नहीं किया गया है। धारा 149 के उद्देश्य के लिए आई.पी.सी. की धारा 141 के तहत सामान्य उद्देश्य को परिभाषित किया गया है।
यह धारा आई.पी.सी. के अध्याय II के तहत है। यह धारा आई.पी.सी. के आठवें अध्याय के तहत आती है जो सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराधों से संबंधित है।
एक सामान्य इरादा साझा करने के लिए न्यूनतम संख्या में व्यक्तियों की कोई आवश्यकता नहीं है। धारा 149 के लिए आवश्यक है कि कम से कम 5 या अधिक व्यक्ति होने चाहिए।
दायित्व का आधार सामान्य इरादा है। दायित्व का आधार सामान्य उद्देश्य है।
कार्य की योजना में सदस्यों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। सामान्य उद्देश्य स्थापित किया जा सकता है यदि व्यक्ति एक गैरकानूनी सभा के सदस्य हैं।

आई.पी.सी. की धारा 302 धारा 149 के साथ पठित

भारतीय दंड संहिता की धारा 302 में हत्या की सजा प्रदान की गई है। जब लोगों के एक समूह के पास किसी अन्य व्यक्ति को मारने का एक सामान्य उद्देश्य होता है, तो उन पर धारा 302 के साथ धारा 149 के तहत आरोप लगाया जा सकता है। नानक चंद बनाम पंजाब राज्य (1955) के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाया गया मुद्दा था कि क्या धारा 302 के तहत अपराध के लिए सजा हो सकती है, जबकि आरोप आई.पी.सी. की धारा 302 के साथ पठित धारा 149 के तहत अपराध के लिए था। यह माना गया कि चूंकि केवल धारा 302 के तहत अपराध के लिए कोई अलग आरोप नहीं है और आई.पी.सी. की धारा 302 के साथ पठित 149 के तहत आरोप लगाया गया था, धारा 302 के तहत अपराध के लिए दोषसिद्धि कायम नहीं होगी। 

विली स्लेनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955) में संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट रूप से समझाया कि जब एक आरोपी को धारा 302 के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, जब प्रारंभिक आरोप आई.पी.सी. की धारा 302 के साथ पठित धारा 149 के तहत था। पीठ ने कहा कि भले ही आरोप धारा 302 के साथ पठित धारा 149 के तहत है, लेकिन तथ्य बताते हैं कि एक विशेष आरोपी द्वारा किए गए कार्य के कारण मौत हुई है। सुनवाई के दौरान सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि पीड़ित की मौत के लिए विशेष आरोपी का कार्य जिम्मेदार था, तो उसे धारा 302 के तहत अलग से दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही उसके खिलाफ कोई अलग आरोप न हो।

हाल ही में 18 जनवरी 2022 को मोहम्मद शोएब @ छुटवा बनाम राज्य (2022) में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि आई.पी.सी. की धारा 302 के साथ पठित धारा 149 के तहत एक आरोपी को दोषी ठहराने के लिए गैरकानूनी सामान्य उद्देश्य की प्रकृति के संबंध में एक स्पष्ट निष्कर्ष की आवश्यकता है और यदि ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है, तो सामान्य उद्देश्य को साबित करने के लिए केवल आरोपी की उपस्थिति पर्याप्त नहीं होगी। इस प्रकार, धारा 302 के साथ पठित धारा 149 के तहत दोषसिद्धि अस्पष्ट साक्ष्य और सामान्य आरोपों पर आधारित नहीं हो सकती है। 

इसलिए, उपरोक्त निर्णयों का विश्लेषण करके यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जहां गैर-कानूनी सभा के किसी सदस्य द्वारा हत्या की गई है, बाकी सदस्यों पर धारा 302 के तहत आरोप नहीं लगाया जा सकता है। धारा 302 के साथ पठित धारा 149 तब लागू होगी जब सभा का सामान्य उद्देश्य पीड़ित को मारना था।

आई.पी.सी. की धारा 149 का दुरुपयोग

जब भी किसी अपराध स्थल पर 5 से अधिक व्यक्तियों की उपस्थिति होती है, तो अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष यांत्रिक (मेकेनिकली) रूप से भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149 को आई.पी.सी. के अन्य प्रावधानों के साथ पढ़ता है। इससे क़ानून का दुरुपयोग हुआ है। एक मामले में, एक व्यक्ति को हत्या के लिए धारा 149 के तहत दोषी ठहराया गया था। बाद में अपील में, उन्हें बरी कर दिया गया क्योंकि उन्होंने पीड़ित की हत्या करने वाली भीड़ को पीड़ित के स्थान का खुलासा किया था। यदि न्यायालय ने तथ्यों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण नहीं किया होता तो एक निर्दोष व्यक्ति उस अपराध के लिए जेल में रह सकता था जो उसने किया ही नहीं था। यह धारा अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता पूर्व युग में डाली गई थी और इसलिए इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि ग्रामीण अक्सर काम के लिए कुल्हाड़ी जैसे कृषि उपकरण अपने साथ ले जाते हैं और कभी-कभी ऐसा तब होता है जब किसी गांव में कोई घटना होती है, उन्हें धारा 149 के तहत आरोपित किया जाता है क्योंकि वे सशस्त्र थे। इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के कारण उनके साथ अन्याय हुआ था। 

हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने संथु @ संतोष पुजारी बनाम कर्नाटक राज्य (2020) के मामले में कहा कि “जांच एजेंसी के लिए यह उचित समय है कि जब भी धारा 149 के प्रावधानों को अन्य प्रावधानों के साथ लागू किया जाता है, तो वह उचित जांच करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 , 19 और 21 के तहत नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होना चाहिए और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि निर्दोष लोगों को फंसाया नहीं जाना चाहिए। आई.पी.सी. की धारा 149 के प्रावधानों को लागू करते हुए, जांच एजेंसी जांच के बाद पुष्टि करेगी कि क्या ऐसे व्यक्तियों ने वास्तव में अन्य सह-आरोपियों के साथ अपराध किया है, यदि कोई हो। अन्यथा, प्रतिद्वंद्वी (राइवल)/ईर्ष्या/प्रेरित/इच्छुक दल निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए उत्सुक हैं, कभी-कभी स्थानीय राजनेताओं के प्रभाव से भी। अदालत ने आगे कहा कि न्यायालय को सामाजिक माता-पिता के रूप में कार्य करना चाहिए और आई.पी.सी. की धारा 302 के साथ पठित 149 के तहत अभियोजन से निपटने के दौरान किसी को भी दोषी ठहराने से पहले सबूतों का ठीक से विश्लेषण करना चाहिए। जब एक आरोपी ने कथित अपराध किया है तो गैरकानूनी सभा के अन्य सदस्यों को अनावश्यक रूप से आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जानी चाहिए, बिना सामान्य उद्देश्य के अन्य सदस्यों के योगदान के अलावा, ऐसे सदस्यों को छोटे अपराधो अर्थात भारतीय दंड संहिता, 1860 की   धारा 143, 147, 148, 323, 341 और 504 आदि के तहत अपराध के लिए अलग से दंडित किया जा सकता है ।

आई.पी.सी. की धारा 149 के संबंध में प्रासंगिक निर्णय

विन्नुभाई रणछोड़भाई पटेल बनाम राजीवभाई दुदाभाई पटेल (2018)

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तथ्य

11.07.1992 को नाना अंकदिया गांव में एक घटना हुई जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई और पांच लोग घायल हो गए। 15 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल की गई थी।

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मुद्दा 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाया गया मुद्दा आई.पी.सी. की धारा 149 के दायरे के संबंध में था

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निर्णय

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 149 के तहत आरोपी के दायित्व की जांच करने के लिए, पहले न्यायालयों को प्रावधान का विश्लेषण करने की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि धारा 149 का विश्लेषण करने के लिए अभियोजन पक्ष और अदालतों द्वारा दो तत्वों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। यह तत्व इस प्रकार हैं:

  1. धारा 149 के तहत सृजित आयाम (एम्प्लीट्यूट) और प्रतिवर्ती दायित्व; तथा
  2. वे तथ्य जो किसी आरोपी को अपराध के लिए प्रतिवर्ती रूप से उत्तरदायी ठहराने के लिए साबित करने के लिए आवश्यक हैं।

महेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022)

6
तथ्य

इस मामले में, एक गांव से लौटते समय 19-20 लोगों ने शिकायतकर्ताओं पर लाठी और फरसा से हमला किया। हमलावरों ने उनके साथ गाली-गलौज की और मारपीट की। उच्च न्यायालय ने आई.पी.सी. की धारा 325 के साथ पठित धारा 149 के तहत निचली अदालत की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। अपीलकर्ता ने तब सर्वोच्च न्यायालय से अपील की कि आरोप पत्र में शामिल 20 आरोपियों में से 17 को बरी कर दिया गया और 3 आरोपियों को धारा 149 के साथ पठित धारा 325 के तहत दोषी ठहराया गया।

5
मुद्दा

क्या आरोपी को धारा 149 के तहत सही दोषी ठहराया गया था, भले ही आरोप 5 से कम व्यक्तियों के खिलाफ गठित किए गए थे?

4
निर्णय 

खंडपीठ ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें धारा 149 के साथ पठित धारा 325 के तहत आरोपी को दोषी ठहराया गया था और तर्क दिया गया था कि धारा 149 के तहत सजा के लिए 5 या अधिक व्यक्ति होने चाहिए लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि पांच या अधिक व्यक्तियों को अदालत के सामने लाया जाए और दोषी ठहराया जाए। इस प्रकार, धारा 149 के तहत आरोप बनाए रखने योग्य होगा, भले ही यह 5 से कम व्यक्तियों के खिलाफ था और अन्य आरोपियों की पहचान नहीं की जा सकती थी, लेकिन कुल मिलाकर, उनकी संख्या 5 से अधिक होनी चाहिए। हालांकि वर्तमान मामले में कोई अज्ञात आरोपी नहीं था और धारा 149 के तहत केवल तीन व्यक्तियों को दोषी ठहराया गया था, इसलिए आरोप को कायम नहीं रखा जा सकता।

तैजुद्दीन बनाम असम राज्य और अन्य (2021)

3
तथ्य 

इस मामले में भूमि विवाद को लेकर, लाठी, भाले, खंजर आदि से लैस भीड़ ने, पीड़ित पर उसके ही घर में हमला किया था। पीड़ित ने भागकर खुद को भीड़ से बचाने के लिए किसी और के घर में छिपने की कोशिश की लेकिन असफल रहा और अंत में भीड़ द्वारा मारा गया। एक आरोपी ने अपनी सजा के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी।

2
मुद्दा 

यदि कोई व्यक्ति हत्यारों को पीड़ित के स्थान के बारे में बताता है, तो क्या वह भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149 के तहत प्रतिवर्ती रूप से उत्तरदायी होगा?

1
निर्णय

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि किसी व्यक्ति को धारा 149 के तहत केवल इसलिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उसने पीड़ित के छिपाने का खुलासा किया था जिसे बाद में मार दिया गया था। अदालत ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता है कि उक्त व्यक्ति पीड़ित की हत्या करने वाले अन्य आरोपियों के साथ उद्देश्य साझा करता है। अदालत ने आगे कहा कि अदालत को केवल निष्क्रिय (पैसिव) दर्शकों को दोषी ठहराने की संभावना से बचना चाहिए, जिन्होंने गैरकानूनी सभा के सामान्य उद्देश्य को साझा नहीं किया था। यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति इतना बहादुर नहीं हो सकता है कि वह किसी को हथियारबंद व्यक्तियों के समूह से छिपा सके इसलिए, तैजुद्दीन को बरी कर दिया गया।

निष्कर्ष

यह प्रावधान गैर-कानूनी सभा के सदस्यों के लिए एक सामान्य उद्देश्य के अभियोजन में प्रतिवर्ती दायित्व बनाता है जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस तथ्य के बावजूद उत्तरदायी ठहराया जाएगा कि उसने पीड़ित को चोट पहुंचाई है या नहीं क्योंकि वे एक गैरकानूनी सभा के सदस्य थे और उनके सामान्य उद्देश्य के अनुसार एक अपराध किया गया था। गैरकानूनी सभा के सदस्यों को अपराध करने के लिए उत्तरदायी बनाने में यह प्रावधान बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कभी-कभी ऐसे मामले सामने आए हैं जहां इस धारा के तहत निर्दोष लोगों को आरोपित किया गया है। क़ानून की भाषा के कारण, अभियोजन कभी-कभी धारा 149 को एक प्रक्रियात्मक कानून के रूप में लागू करता है जो इसकी मूल प्रकृति से हटकर होता है। इसलिए, सभा में उन व्यक्तियों के लिए जो अपराध में केवल दर्शक थे, गंभीर अपराध करने वाले आरोपियों के साथ समान रूप से दंडनीय होना उचित नहीं है। इसे हाल ही में अदालतों ने संबोधित किया है और उन्होंने इस प्रावधान की सख्त तरीके से व्याख्या की है ताकि किसी भी निर्दोष की सजा को रोका जा सके।   

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. यदि कुछ सदस्य मूल सामान्य उद्देश्य से अलग हो जाते हैं और एक उग्र (एग्रावेटेड) कार्य करते हैं, तो क्या सभी सदस्य कार्य के लिए उत्तरदायी होंगे?

नहीं, सभी सदस्य, कुछ सदस्य जो मूल सामान्य उद्देश्य से अलग हो गए थे के उग्र कार्य के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।

2. क्या किसी व्यक्ति को धारा 149 के तहत दोषी ठहराया जा सकता है यदि वह एक स्वतंत्र लड़ाई में शामिल हो गया है?

स्वतंत्र लड़ाई के मामले में किसी व्यक्ति को धारा 149 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

3. धारा 149 के तहत अपराध किस अदालत के तहत विचारणीय (ट्राइएबल) है?

यह उस न्यायालय द्वारा विचारणीय होगा जिसमें गैर-कानूनी सभा द्वारा किया गया अपराध विचारणीय होगा।

4. धारा 149 कंपाउंडेबल है या नॉन कंपाउंडेबल?

यह नॉन कंपाउंडेबल है।

संदर्भ 

  • Ratanlal and Dhirajlal’s Indian Penal Code, 1860
  • Universal Publications Indian Penal Code, 1860 Bare Act

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