होमDi minimus non curet lexडी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स

डी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स

डी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स

यह लेख ग्रेटर नोएडा के लॉयड लॉ कॉलेज की छात्रा Sonali Chauhan द्वारा लिखा गया है। इस लेख में उन्होंने कानूनी कहावत ‘डी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स’ पर चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

लैटिन कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स का संक्षिप्त रूप, “कानून का छोटी-छोटी बातों से कोई सरोकार नहीं है”, है। एक कानूनी सिद्धांत है जिसके द्वारा एक अदालत तुच्छ चीजों पर विचार करने से इनकार करती है। डी मिनिमिस का कानूनी इतिहास पंद्रहवीं शताब्दी का है।

एक मुकदमे में, न्यायिक जांच के योग्य नहीं होने वाले तुच्छ मामलों को हल करने से बचने के लिए अदालत द्वारा डी मिनिमिस सिद्धांत लागू किया जाता है। इसका प्रयोग कभी-कभी एक कार्रवाई को खारिज करने की ओर ले जाता है, खासकर जब मांगा जाने वाला एकमात्र निवारण एक मामूली राशि के लिए होता है, जैसे कि एक डॉलर। जब उपयुक्त हो, अपीलीय अदालतें भी डी मिनिमिस सिद्धांत का उपयोग कर सकती हैं।

यह सामान्य कानून का एक सिद्धांत है जो यह निर्धारित करता है कि न्यायाधीश निर्णय में नहीं बैठेंगे या कानून के अत्यंत मामूली उल्लंघनों पर ध्यान नहीं देंगे। इस कहावत के अनुसार, तर्कसंगत (रीजनेबल) नागरिक तुच्छ मामलों की अपील को समय और संसाधनों (रिसोर्सेज) की पूरी बर्बादी मानेंगे। इससे न्याय व्यवस्था की बदनामी होगी।

एक कानूनी शब्द है जिसका अर्थ ध्यान में रखने के लिए बहुत छोटा या सारहीन है। नीति के मामले में, कानून पक्षों को कानूनी कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है जहां उल्लंघन का प्रभाव नियमों या समझौतों के तकनीकी उल्लंघनों के लिए नगण्य (नेगलिजिबल) है। अनुबंधों या अन्य प्रतिबंधों के उपयोग को सीमित करने के लिए डी मिनिमिस अपवादों को आमतौर पर अनुबंधों में शामिल किया जाता है ताकि वे उन परिस्थितियों में लागू न हों जहां प्रतिबंध का पालन करने में विफलता का प्रभाव नगण्य हो।

इस कहावत को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 95 द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।

चित्रण

  • A ने B से वादा किया कि वे रविवार को एक साथ एक फिल्म देखने जाएंगे। A थिएटर में दिखाई नहीं दिया, हालाँकि, B को मानसिक आघात और पीड़ा का सामना करना पड़ा। B ने A पर नुकसान के लिए मुकदमा दायर किया। अदालत यहां B की अपील को खारिज कर देगी क्योंकि कानून तुच्छ मुद्दों को ध्यान में नहीं रखता है।
  • X धूल भरी सड़क पर तेज गति से गाड़ी चलाता है और उसके गाड़ी के पहिये की वजह से एक पैदल यात्री Y के कपड़े पर  धूल चली जाती हैं। यहां X, कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स के आधार पर, टॉर्ट के लिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि मामला प्रकृति में तुच्छ है।
  • X पहली बार Y की सहमति के बिना उसकी भूमि के माध्यम से भूमि को कोई नुकसान पहुंचाए बिना जाता है। यदि एक बार के लिए, यह एक तुच्छ मामला है, और कहावत उसकी रक्षा करेगी, लेकिन यदि X बार-बार, Y की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए दोहराता है, तो यह एक तुच्छ मामला नहीं रहेगा, और यह एक टॉर्ट बन जाएगा और कहावत X की रक्षा नहीं करेगी।

मामलो का संदर्भ 

  • पीपल बनाम डरहम, 915 एनई 2डी 40 (2009) में, इलिनोइस अपीलीय अदालत के न्यायमूर्ति रॉबर्ट स्टीगमैन के सामने डेनियल डरहम थे, जो अपने द्वारा कमाए गए ट्रैफिक प्रशस्ति पत्र को पसंद नहीं करते थे और $5 के मुआवजे की मांग करते थे:

इस तरह के मुकदमे न्यायपालिका को बदनाम करते हैं। तर्कसंगत नागरिक (कानून से जुड़े नहीं) इस अपील को समय और संसाधनों की पूरी बर्बादी मानेंगे। इस अपील में पहले ही खर्च हो चुका समय और पैसा संसाधनों की बर्बादी है। हम और बर्बादी का हिस्सा नहीं होंगे।

“कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स इलिनोइस के मामले में पूरी तरह से लागू होती है। यह कहावत संवैधानिक दावों पर भी लागू होती है, और इसका कार्य कानूनी राहत के दायरे से बाहर रखना है, जो इतनी छोटी चोटें हैं कि उन्हें संघीय मामला बनाने के बजाय समाज में रहने की कीमत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

  • कवर्ड बनाम बेड़ले, 1859 के प्रमुख मामले में एक दर्शक ने एक इमारत के दूसरे हिस्से जिसमें आग लगी थी पर अपना ध्यान आकर्षित करने के लिए एक फायरमैन की बांह को छुआ। फायरमैन द्वारा बैटरी के लिए दायर एक मुकदमे पर, अदालत ने कहा कि कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स के आधार पर, पास खड़े लोग बैटरी के लिए उत्तरदायी नहीं होते है।
  • हेलफोर्ड बनाम बेली (1849) 18 एल.जे.क्यू.बी. 109, में एक विशेष जल निकाय में, वादी को पानी में मछली पकड़ने का विशेष अधिकार था। प्रतिवादी जाल डालता है और पानी से जाल को बाहर निकालता है। वादी ने अतिचार (ट्रेसपास) के लिए एक याचिका दायर की। वादी की दलील थी कि उसके पास विशेष अधिकार था, और प्रतिवादी ने अतिचार किया और फिर मछली पकड़ने के माध्यम से उसके अधिकार का उल्लंघन किया। इस बात का कोई सवाल ही नहीं है कि उसने कोई मछली पकड़ी या नहीं। प्रतिवादी ने इस प्रकार वादी के खिलाफ टॉर्ट का कार्य किया है और यदि यह भविष्य में दोहराया जाता है, तो प्रतिवादी मछली पकड़ने के अधिकार स्थापित करने की ओर अग्रसर होगा। अदालत ने माना कि वादी का दृष्टिकोण सही है, और यद्यपि यह एक तुच्छ कार्य था, फिर भी अदालत ने इसे एक टॉर्टियस कार्य माना और प्रतिवादी को दोषी करार दिया।
  • 2004 में, कहावत केंद्र स्तर पर भी थी, कैनेडियन फ़ाउंडेशन फ़ॉर यूथ बनाम अटॉर्नी जनरल में कनाडा के सर्वोच्च न्यायालय का यह फ़ैसला जहाँ स्वर्गीय न्यायमूर्ति बी. विल्सन ने असहमति व्यक्त करते हुए समझाया कि:

“मुख्य न्यायाधीश अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष के विवेक पर भरोसा करने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक हैं, जो अभियोजन और सजा के लिए अयोग्य हैं। तुच्छ मामलों को समाप्त करने में अभियोजकों का अच्छा निर्णय आवश्यक है, लेकिन आपराधिक कानून के कामकाज के लिए पर्याप्त नहीं है। सजा के अयोग्य आचरण के लिए सजा के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। न्यायिक प्रणाली आचरण के महत्वहीन मुकदमों की भीड़ से ग्रस्त नहीं है जो केवल “अपराध” (उदाहरण के लिए, एक पैसे की चोरी) की तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं क्योंकि अभियोजन पक्ष का विवेक प्रभावी है और डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स का सामान्य कानून बचाव (कानून छोटे या तुच्छ मामलों से संबंधित नहीं है) न्यायाधीशों के लिए उपलब्ध है। 

दूसरे व्यक्ति पर कुछ बल का प्रयोग करना हमेशा एक आपराधिक हमले का सुझाव नहीं देता है। इसके विपरीत, आकस्मिक (इंसीडेंटल) स्पर्श के कई उदाहरण हैं जिन्हें आपराधिक आचरण नहीं माना जा सकता है।

“डी मिनिमिस नॉन क्यूरट लेक्स की सामान्य कानून अवधारणा “अवॉर्ड” (1818) में व्यक्त की गई थी कि:

‘नियमों को लागू करने में, न्यायालय एक साथ कठोर और सख्ती से बाध्य नहीं है। कानून उस योग्यता की अनुमति देता है जो प्राचीन कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरैट लेक्स का तात्पर्य है। जहां बहुत मामूली अनियमितताएं हैं, वहां यह इरादा नहीं है कि दंड कठोर होना चाहिए। यदि विचलन मात्र एक तुच्छ था, जो व्यवहार में जारी रहने पर सार्वजनिक हित पर बहुत कम या कुछ भी वजन नहीं करेगा, तो इसे उचित रूप से अनदेखा किया जा सकता है।

डी मिनिमिस बचाव का मतलब यह नहीं है कि कार्य उचित है; यह गैरकानूनी रहता है लेकिन इसकी तुच्छता के कारण यह अप्रभावित रहता है।

आम तौर पर, एक न्यूनतम बहाने का औचित्य (जस्टिफिकेशन) यह है कि: 

  1. यह गंभीर कदाचार के लिए आपराधिक कानून लागू करने का अधिकार सुरक्षित रखता है;
  2. यह अभियुक्त को एक आपराधिक सजा के कलंक से और अपेक्षाकृत तुच्छ आचरण के लिए कठोर दंड लगाने से बचाता है; और
  3. यह बड़ी संख्या में तुच्छ मामलों से अदालतों को प्रभावित करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।

सिद्धांत आंशिक रूप से इस धारणा पर आधारित है कि अपराध की धारा द्वारा रोकी जाने वाली बुराई वास्तव में घटित नहीं हुई है। यह आपराधिक न्याय के दोहरे बुनियादी सिद्धांत के अनुरूप है कि हानिरहित और दोषरहित आचरण के लिए कोई दोषी नहीं है।

“कनाडाई न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) में, ड्रग की थोड़ी मात्रा से जुड़े मामलों, चोरी के मामलों में जिसमें चोरी की संपत्ति का मूल्य बहुत कम है, या हमले के मामलों में जिसमें बेहद मामूली चोट है या कोई चोट नहीं हुई है में डी मिनिमिस का बचाव लगाया जाता है।

आईपीसी की धारा 95

आईपीसी की धारा 95 स्वयं कहावत डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स (कानून तुच्छ चीजों को ध्यान में नहीं रखता है), पर आधारित है। इस धारा का उद्देश्य नगण्य गलतियों या तुच्छ अपराधों की सजा को रोकना है। क्या कार्य, जो एक अपराध के बराबर है, तुच्छ है निस्संदेह चोट की प्रकृति, पक्ष की स्थिति, ज्ञान या इरादा जिसके साथ एक अपमानजनक कार्य किया जाता है, और अन्य संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इस प्रावधान के तहत, इन मामलों को जनता द्वारा निर्दोष माना जाता है, भले ही वे दंड कानून के अंतर्गत आते है। दूसरे शब्दों में, एक अपराध के परिणामस्वरूप होने वाला नुकसान अगर इतना छोटा और तुच्छ है कि सामान्य ज्ञान और स्वभाव का कोई भी व्यक्ति इस तरह के नुकसान की शिकायत नहीं करेगा।

भारत में डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स

कॉपीराइट उल्लंघन के मामलों में, डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स सिद्धांत को भारत में बचाव के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि क्या डी मिनिमिस सिद्धांत का उपयोग भारतीय कॉपीराइट अधिनियम की धारा 52 के अनुसार उचित उपयोग के बजाय एक अलग बचाव के रूप में किया जा सकता है। इंडिया टीवी इंडिपेंडेंट न्यूज़ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम यशराज प्राइवेट लिमिटेड, में अदालत ने डी मिनिमिस की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) के सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की। इस मामले से पहले प्रयोज्यता के संबंध में स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं थी। मामले के तथ्य यह थे कि पाँच छंदों (स्टेंजा) के एक गीत से पाँच शब्दों की नकल की गई थी। डी मिनिमिस के प्रयोग में अदालतों द्वारा आमतौर पर विचार किए जाने वाले पांच प्रसिद्ध कारकों को लागू करने के बाद, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अपराध तुच्छ है और डी मिनिमिस रक्षा को आकर्षित करता है।

श्रीमती सोमवंती बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1963 एससी 151) में सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि “वे दूसरों द्वारा दोहराए जाने या इस तरह से उपयोग करने का इरादा नहीं रखते हैं कि एक पुस्तक का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स सिद्धांत अभी भी नाटकीय कार्यों में भाग लेने के साथ-साथ एक पुस्तक के एक हिस्से को पुन: प्रस्तुत करने में कथित गलत पर लागू होता है। 

सामान्य कानून का एक सिद्धांत जो कानून के बहुत मामूली अपराधों की अवहेलना करता है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ता सूचना अधिनियम 1978 के तहत एक अपराध का गठन करने के लिए एक विवरण “भौतिक स्तर तक” गलत होना चाहिए।

मामलो का संदर्भ 

  • राज्य (दिल्ली प्रशासन) बनाम पूरन मल, ए.आई.आर. 1985 एस.सी 741 के मामले इस लैटिन कानूनी कहावत पर विचार करते हुए, अदालत ने खाद्य पदार्थों में मिलावट की जांच की और तर्क दिया कि मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त खाद्य पदार्थ को डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स नियम द्वारा शामिल नहीं किया जा सकता है।
  • बिहार राज्य और अन्य बनाम हरिहर प्रसाद देबुका और अन्य, ए.आई.आर. 1989 एस.सी. 1119 के मामले में कहा गया की दस्तावेजों की जांच करना या फॉर्म और रिटर्न भरना और जमा करना, सार्वजनिक तुलाचौकी (वेगब्रिज) पर चक्कर लगाना और इसी तरह की असुविधा हो सकती है और अदालत कहावत ‘डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स’ लागू कर सकती है जब तक कि इसे अनुचित नहीं दिखाया जाता है और सार्वजनिक हित में नहीं है।
  • चुन्नीलाल जेठालाल बनाम अहमदाबाद बरो नगर पालिका, एलक्यू 1939 एचसी 0544 के मामले में विद्वान न्यायाधीश ने ठीक ही कहा है कि “बरो के भीतर उपयोग के लिए रखे गए” शब्दों का अर्थ है कि उन्हें बरो के भीतर सामान्य उपयोग के लिए रखा गया था, और इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहां एक वाहन को सामान्य उपयोग के लिए बरो के बाहर रखा जाता है, बरो के भीतर एक सामयिक उपयोगकर्ता को डी मिनिमिस नॉन क्यूरेट लेक्स के सिद्धांत के आधार पर अस्वीकार किया जा सकता है

निष्कर्ष

कहावत बताती है कि महंगे मुकदमेबाजी से बचने के लिए तकनीकीताओं को व्यावहारिक सामान्य ज्ञान और न्याय के सामने झुकना चाहिए। डी मिनिमिस बचाव कानून का एक समझदार पहलू है, जो कानूनी सिद्धांत की तुलना में कानूनी व्यवहार में अधिक बार दिखाई देता है लेकिन व्यापक विश्लेषण के किसी भी प्रकार में शायद ही कभी प्राप्त होता है। इसने मामलों की एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को जन्म दिया है जहां एक शब्द को प्रथाओं के एक सेट पर लागू किया जाता है, जो कि, सर्वोत्तम रूप से, केवल शिथिल रूप से जुड़े हुए हैं।

यह एक काल्पनिक मामला है जो डी मिनिमस नॉन क्यूरेट लेक्स की अवधारणा की जांच करने की अनुमति देगा। यह भी दिखाया गया है कि यह एक न्यायसंगत उपाय है और यह अभी भी प्रवाह की स्थिति में है। आमतौर पर, इसका उपयोग आगे मुकदमेबाजी और अपीलों की आगे की समीक्षा (रिव्यू) से बचने के लिए किया जाता है। यह एक उचित उपाय है जिसमें विचारणीय (ट्रायल) न्यायाधीश का पूर्ण नियंत्रण होता है, साथ ही इसके उपयोग पर विवेक भी होता है। हालाँकि, व्यक्तिगत न्यायाधीश की व्यक्तिपरक राय के अलावा इसके प्रयोग के लिए कोई विशिष्ट शर्तें नहीं हैं।

सभी अदालतें इस बात से सहमत नहीं हैं कि इस सिद्धांत को कब और कैसे लागू किया जाना चाहिए। “डी मिनिमिस” लागू करने का निर्णय लेने से पहले, अदालतें गलत और इसमें शामिल नुकसान की मात्रा पर विचार करती हैं। कहावत को शुद्ध रूप से “न्यायिक शक्ति का प्रयोग और कुछ नहीं है” कहा जाता है। (राज्य बनाम पार्क), 525 पी2डी 586 (एचएडबल्यू 1974)।

 

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

- Advertisment -Submit articles and win INR 2000*. Also reach our 10 million a year audience.
Advertise on iPleaders Blog

Latest

व्यापार चिह्न अधिनियम 1999 की धारा 59

0
यह लेख Vidushi Kachroo द्वारा लिखा गया है। यह लेख व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 59 के तहत दिए गए पंजीकृत व्यापार चिह्न...