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आयकर अधिनियम 1961 की धारा 194Q

आयकर अधिनियम 1961 की धारा 194Q

यह लेख जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज की छात्रा Upasana Sarkar ने लिखा है। इस लेख का उद्देश्य आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194Q की समझ प्रदान करना है। यह माल की खरीद पर टीडीएस का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

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परिचय

आयकर का मतलब उस कर से है जो सरकार किसी व्यक्ति की आय पर लगाती है। ‘व्यक्ति’ शब्द का अर्थ एक प्राकृतिक व्यक्ति के साथ-साथ एक न्यायिक व्यक्ति दोनों से है। इसका अर्थ है अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) के भीतर व्यक्तियों और निगमों द्वारा उत्पन्न आय पर सरकार द्वारा लगाया गया कर। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194Q को वित्त अधिनियम (फाइनेंस एक्ट), 2021 में पेश किया गया था। यह 1 जुलाई, 2021 को प्रभावी हुई थी। यह धारा माल की खरीद पर स्रोत (सोर्स) पर कर कटौती (टीडीएस) से संबंधित है। यह भारत के बाहर रहने वाले आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) से होने वाली आयात खरीद पर लागू नहीं होती है।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q

आयकर अधिनियम, 1962 की धारा 194Q, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा पेश की गई थी। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने दिशानिर्देशों का एक सेट जारी किया जो स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) और स्रोत पर एकत्रित कर (टीसीएस) पर इस धारा से संबंधित है। 25 नवंबर, 2021 को, बोर्ड ने एक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी की, जो 1 जुलाई, 2021 से प्रभावी हो गई। इस धारा का उद्देश्य माल की खरीद पर टीडीएस को प्रत्यायोजित (एप्लीकेबल) करना है, जहां वर्तमान वित्तीय वर्ष में राशि पचास लाख रुपये से अधिक है और पिछले वित्तीय वर्ष में दस करोड़ रुपये है। यह धारा कुछ हद तक आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 206(1H) के समान है। धारा 206(1H) को खरीदार से कर एकत्र करने के लिए विक्रेता पर एक दायित्व लगाने के लिए पेश किया गया था, जबकि धारा 194Q को एक दायित्व लगाने के लिए पेश किया गया था, जहां विक्रेता को भुगतान करते समय खरीदार को कर काटना होगा। टीडीएस की दर 0.1% है, जो बहुत कम है।

धारा 194Q के अनुसार ‘खरीदार’ की परिभाषा

धारा 194Q की उप-धारा (1) के अनुसार, ‘खरीदार’ का अर्थ उस व्यक्ति से है, जिसकी कुल बिक्री, टर्नओवर, या सकल प्राप्तियां (ग्रॉस रिसिप्ट) पिछले वित्तीय वर्ष (पीपीवाई) से ठीक पहले के वित्तीय वर्ष के दौरान उसके व्यवसाय से दस करोड़ से अधिक हैं, जिसमें की माल की खरीदी हो गई है। वे व्यक्ति स्रोत पर कर काटने और बिक्री या भुगतान के समय, जो भी पहले हो, विक्रेता के खाते में जमा करने के लिए उत्तरदायी हैं।

धारा 194Q की उप-धारा (2) के अनुसार, खरीदार उप-धारा (1) में निर्दिष्ट राशि को किसी भी विक्रेता के खाते में जमा करने के लिए जिम्मेदार है, जिसमें सस्पेंस खाता भी शामिल है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि खरीदारों को उस राशि के लिए कर काटना चाहिए जो केवल भारतीय निवासी विक्रेताओं को देय है न कि उन विक्रेताओं को जो देश के बाहर से हैं।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q किस पर लागू होती है

यह धारा निम्नलिखित मामलों में एक खरीदार पर लागू होती है:

  • एक खरीदार जिसका कारोबार या बिक्री या सकल प्राप्ति ठीक पिछले वित्तीय वर्ष में दस करोड़ से अधिक है, और
  • खरीदार एक विशेष राशि का भुगतान करने के लिए निवासी विक्रेता के लिए जिम्मेदार है, और
  • माल की खरीद के लिए भुगतान तब किया जाना है जब उनका मूल्य पचास लाख रुपये से अधिक हो।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q की प्रयोज्यता

आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत टीडीएस की प्रयोज्यता

आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत, टीडीएस केवल उन भुगतानों के लिए लागू होता है जो ठेकेदारों और उपठेकेदारों को कार्य अनुबंध उद्देश्यों के लिए किए जाते हैं। भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को ठेकेदार या उप-ठेकेदार से एक स्थायी खाता संख्या (पैन) प्राप्त करनी चाहिए और इसे कर अधिकारियों को प्रस्तुत करना चाहिए। उसे त्रैमासिक (क्वार्टरली) टीडीएस रिटर्न भी दाखिल करना चाहिए और सरकार के पास टीडीएस राशि जमा करनी चाहिए। यह त्रैमासिक के अंत के 7 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q और धारा 206C(1A) की प्रयोज्यता

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धारा 194Q उन सामानों पर लागू होती है जिन्हें धारा 206C(1A) के तहत छूट दी गई है

  • आयकर अधिनियम की धारा 206C (1A) कोयला, स्क्रैप और लौह अयस्क (आयरन ओर) जैसे कुछ विशिष्ट सामानों के लिए कर संग्रह से छूट देती है, बशर्ते खरीदार एक घोषणा जारी करता है कि सामान का उपयोग चीजों के निर्माण और उत्पादन के लिए किया जाना है।
  • आयकर अधिनियम की धारा 206C की उप-धारा (1H), धारा 206C की उप-धारा (1A) में उल्लिखित वस्तुओं के अलावा अन्य सभी वस्तुओं की बिक्री पर कर संग्रह का प्रावधान करती है।
  • धारा 194Q के तहत, उन सामानों की खरीद पर कर लागू होगा जो धारा 206C(1A) के तहत अन्यथा छूट प्राप्त करते हैं।

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धारा 194Q निगमों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स) और विशिष्ट सरकारी विभागों पर लागू होती है

  • आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत, सरकारी विभाग द्वारा कर की कटौती की जानी चाहिए, बशर्ते –
    • ऐसा सरकारी विभाग एक व्यावसाय या वाणिज्यिक (कमर्शियल) गतिविधि का संचालन कर रहा है, और
    • ऐसे व्यवसाय या वाणिज्यिक गतिविधि से इसकी कुल बिक्री या टर्नओवर या सकल प्राप्ति पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान दस करोड़ से अधिक है।
  • आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत, एक राज्य सरकार या केंद्र सरकार को टीडीएस की कटौती के उद्देश्यों के लिए विक्रेता के रूप में नहीं माना जाएगा।
  • आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत, सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या निगमों को टीडीएस काटने की आवश्यकता होगी।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q का पालन न करने का प्रभाव

धारा 194Q का पालन न करने या उल्लंघन करने पर दंड और जुर्माना देना होगा। जहां कोई व्यक्ति जो भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है, टीडीएस काटने में विफल रहता है या किसी विशेष समय अवधि के भीतर सरकार के पास टीडीएस जमा करने में विफल रहता है, वह टीडीएस की राशि के बराबर ब्याज का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हो सकता है, जिसे उसने काटा या जमा नहीं किया है। चरम स्थितियों में, उसे अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) का सामना करना पड़ सकता है।

धारा 194Q के उल्लंघन के परिणाम बहुत गंभीर हैं। इसके परिणाम इस प्रकार हैं-

  • यदि कोई खरीदार धारा 194Q के तहत सामान की खरीद पर टीडीएस काटने में विफल रहता है, तो धारा 40a(ia) आकर्षित होगी। यह धारा बताती है कि किसी भी खरीद लेनदेन का 30% जिस पर टीडीएस नहीं काटा गया है, व्यय (एक्सपेंडिचर) के रूप में अस्वीकृत हो जाएगा।
  • उपरोक्त धारा का अर्थ है कि 30% को खरीदार की आय के रूप में माना जाएगा। इसे आयकर रिटर्न में बताए गए शुद्ध आय के साथ जोड़ा जाएगा और वह उस 30% राशि पर कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा।
  • खरीद का समर्थन करने वाले बिलों को लेनदेन मूल्य के 30% की सीमा तक नामंज़ूर किया जा सकता है, यदि टीडीएस नहीं काटा जाता है।

ठेकेदारों और उपठेकेदारों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वे प्राप्त भुगतानों का उचित रिकॉर्ड रखें। यह सुनिश्चित करने के लिए टीडीएस काटा जाना चाहिए कि वे अपने आयकर रिटर्न पर टीडीएस के लिए क्रेडिट का दावा कर सकते हैं। उन्हें टीडीएस स्टेटमेंट का उचित अपडेट रखना चाहिए और टीडीएस राशि को अपने खाते में जमा राशि के साथ मिलाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि टीडीएस सरकार के पास जमा हो गया है। सरकार ने हाल के वर्षों में टीडीएस से संबंधित प्रावधानों के प्रवर्तन को बढ़ाने के लिए विभिन्न नीतियां लागू की हैं। इससे कर चोरी भी कम होगी। इलेक्ट्रॉनिक टीडीएस स्टेटमेंट के कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) और आधार के साथ पैन (स्थायी खाता संख्या) को जोड़ने से सरकार के लिए टीडीएस अनुपालन को ट्रैक करना और यह पता लगाना आसान हो गया है कि कौन से व्यक्ति और निगम करों से बच रहे हैं।

आयकर अधिनियम की धारा 194Q के तहत टीडीएस पर छूट

जहां खरीदार विक्रेता से सामान खरीदने के लिए स्रोत पर कर कटौती के लिए जिम्मेदार नहीं होता है, वहां कुछ छूट प्रदान की जाती हैं।

  1. एक खरीदार जो अनिवासी है – एक खरीदार जो भारत का निवासी नहीं है, उसे टीडीएस काटने की आवश्यकता नहीं है यदि उसके द्वारा खरीदे गए सामान या उत्पाद देश के स्थायी प्रतिष्ठान (एस्टेब्लिशमेंट) से प्रभावी रूप से जुड़े नहीं हैं।
  2. वह वर्ष जिसमें व्यवसाय निगमित (इनकॉरपोरेट) किया गया है – एक व्यवसाय को उस वर्ष में किसी भी टीडीएस की कटौती करने की आवश्यकता नहीं है जिसमें इसे निगमित किया गया है जैसा कि इस धारा में बताया गया है।
  3. ऐसे व्यक्ति से खरीदा गया सामान जिसकी आय को छूट प्राप्त है – जब इस अधिनियम के तहत आयकर से छूट प्राप्त व्यक्ति से सामान खरीदा जाता है, तो विक्रेता को टीडीएस काटने की आवश्यकता नहीं होती है। यह छूट तभी लागू होती है जब विक्रेता की पूरी आय पर छूट हो और उसका कोई हिस्सा न हो।
  4. इस अधिनियम के किसी भी अन्य प्रावधानों के तहत कटौती योग्य – ऐसे मामलों में, जहां आय, आयकर अधिनियम, 1961 के किसी अन्य प्रावधान के तहत कर योग्य है, आय धारा 194Q के तहत कर योग्य नहीं होगी।
  5. जब धारा 206C के तहत कर एकत्र किया जाता है – ऐसे मामलों में जहां धारा 206C (1H) लागू होने वाले लेनदेन के अलावा धारा 206C के तहत कर एकत्र किया जाता है, धारा 194Q के तहत टीडीएस से छूट दी जाएगी।
  6. सरकारी एजेंसियों के लिए स्रोत पर कर कटौती – जब तक एक सरकारी विभाग वाणिज्यिक या व्यावसायिक गतिविधि में शामिल नहीं है, उसे इस धारा के तहत ‘खरीदार’ नहीं माना जाता है। इसलिए अगर राज्य या केंद्र ऐसी एजेंसियों द्वारा कोई खरीदारी की जाती है तो कोई टीडीएस नहीं काटा जाएगा। पीएसयू के किसी भी विभाग या राज्य या केंद्रीय अधिनियम के तहत गठित निगम को इस धारा के तहत टीडीएस काटने की आवश्यकता नहीं है।
  7. लेन-देन जिसमें धारा 194Q और धारा 194-O दोनों लागू होते हैं – जब किसी विशेष लेनदेन पर धारा 194Q और धारा 194-O दोनों लागू होती हैं, तो धारा 194-O के तहत टीडीएस काटा जाना चाहिए। खरीदार को अपने दायित्व से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि कर काटने की जिम्मेदारी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म प्रदाता के पास होगी। लेकिन अगर ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म प्रदाता टीडीएस काटने में विफल रहता है, तो ऐसा करने की जिम्मेदारी खरीदार की होगी।
  8. जहां लेन-देन एक्सचेंजों के माध्यम से किया जाता है – जब कोई मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) में एक समाशोधन निगम (क्लियरिंग कॉर्पोरेशन) प्रतिभूतियों (सिक्योरिटी) या वस्तुओं की खरीद करता है या लेनदेन करता है, तो उसे माल की खरीद पर टीडीएस से छूट मिलेगी। यह प्रावधान सीईआरसी के विनियम 21 के अनुपालन में पंजीकृत बिजली एक्सचेंजों के माध्यम से हस्तांतरित बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) प्रमाणपत्रों और ऊर्जा बचत प्रमाणपत्रों से जुड़े लेनदेन पर टीडीएस की कटौती से छूट देता है।

टीडीएस लेनदेन की सीमा

टीडीएस उन सामानों की खरीद पर लागू होता है जहां लेनदेन की कुल राशि एक कैलेंडर वर्ष में पचास लाख रुपये से अधिक होती है। पचास लाख रुपये की सीमा की गणना करते समय निम्नलिखित तत्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए:

  • खरीदते समय, जीएसटी भाग को शामिल किए बिना राशि ली जाएगी।
  • यदि राशि का अग्रिम (एडवांस) भुगतान किया जाता है, तो जीएसटी सहित पूरी राशि से कर की कटौती करनी होगी। अन्यथा, खरीद राशि से जीएसटी घटक की पहचान करना मुश्किल होगा।
  • माल की खरीद पर लेन-देन के समय विक्रेता द्वारा पैसे वापस किए जाने की स्थिति में, टीडीएस को उसी विक्रेता से बाद में की गई किसी अन्य खरीद के विरुद्ध समायोजित (एडजस्ट) किया जा सकता है।
  • यदि विक्रेता खरीद वापसी को किसी सामान से बदल देता है, तो भविष्य में किसी समायोजन की आवश्यकता नहीं होगी। जैसा कि सामानों के साथ पहले ही किया जा चुका है, उन्हें बदल दिया गया है।

टीडीएस की तिथियां और जमा दर

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194Q के तहत जिन तारीखों पर टीडीएस जमा करना आवश्यक है, वे इस प्रकार हैं –

  • टीडीएस हमेशा उस महीने के बाद वाले महीने के 7वें दिन या उससे पहले जमा किया जाना चाहिए, जिस महीने में टीडीएस काटा जाता है।
  • टीडीएस अगले वित्तीय वर्ष के 30 अप्रैल को या उससे पहले जमा किया जाना चाहिए।

पचास लाख रुपये से अधिक होने पर माल के खरीदार द्वारा लेनदेन राशि पर 0.1% की दर से टीडीएस काटा जाएगा। ऐसे मामलों में जहां विक्रेता खरीदार या कटौतीकर्ता (डिडक्टर) को अपना पैन प्रदान करने में विफल रहता है, टीडीएस की उच्च दर, यानी 5% की दर से कटौती की जाएगी।

टीडीएस प्रमाणपत्र

कर कटौती के लिए फॉर्म 16A में कटौतीग्रहिता (डिडक्टी) को टीडीएस प्रमाणपत्र जारी करना कर कटौतीकर्ता की जिम्मेदारी है। कटौतीकर्ता टीआरएसीईएस से फॉर्म डाउनलोड कर सकता है, जिसे वह कटौतीग्रहिता को देगा।

निष्कर्ष

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194Q एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रावधान है जो कर नीति को सुगम बनाता है। यह धारा सुनिश्चित करती है कि ठेकेदारों और उप-ठेकेदारों द्वारा अर्जित धन की राशि पर कर एकत्र किया जाता है। इस धारा ने विक्रेता को भुगतान करने से पहले खरीदार के लिए टीडीएस की कटौती को आसान बना दिया है। हालांकि यह धारा केवल भारत के निवासियों पर लागू होती है, व्यक्तियों के साथ-साथ निगमों को दंड और जुर्माने से बचने के लिए इस प्रावधान की आवश्यकताओं के बारे में पता होना चाहिए। खरीदार कर काटने और फॉर्म 26Q में त्रैमासिक रिटर्न दाखिल करने के लिए जिम्मेदार है। ठेकेदारों और उपठेकेदारों को अपने आयकर रिटर्न में उनके लिए क्रेडिट का दावा करने के लिए टीडीएस स्टेटमेंट ठीक से रखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या धारा 194Q इसकी शुरुआत से पहले किए गए भुगतानों को बाहर करती है?

सभी खरीदार जिन्होंने इस धारा की शुरुआत से पहले भुगतान किया था, वे टीडीएस का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। वित्त अधिनियम, 2021 ने धारा 194Q पेश की, जो 1 जुलाई, 2021 को लागू हुई।

क्या पूंजीगत वस्तुओं की खरीद पर धारा 194Q लागू होती है?

आयकर अधिनियम की धारा 194Q सभी वस्तुओं की खरीद पर लागू होती है, चाहे वह पूंजी या राजस्व (रेवेन्यू) खाते पर हो।

यदि टीडीएस की कटौती या उसे जमा नहीं किया जाता है तो खरीदार को क्या परिणाम भुगतने पड़ते हैं?

यदि खरीदार जो माल की खरीद पर टीडीएस काटने के लिए उत्तरदायी है, ऐसा करने में विफल रहता है, तो वह 1% प्रति माह की दर से ब्याज का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा, वह भी उस तारीख जब कर की कटौती की जानी चाहिए थी, से लेकर जब कर काटा गया है। 

यदि खरीदार लेनदेन राशि पर टीडीएस काटता है लेकिन उसे सरकार के पास जमा नहीं करता है, तो वह कटौती की तारीख से टीडीएस जमा करने की तारीख तक प्रति माह 1.5% की दर से ब्याज का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार होगा।

‘माल’ की किसी भी परिभाषा के अभाव में माल की खरीद के रूप में क्या माना जाएगा?

आयकर अधिनियम, 1961 में ‘माल’ शब्द का वर्णन नहीं किया गया है। अभिव्यक्ति ‘माल’ का व्यापक अर्थ है। यह शब्द माल की बिक्री अधिनियम, 1930 और केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 में परिभाषित किया गया है।

क्या इस धारा के तहत टीडीएस की कटौती करते समय खरीद रिटर्न के संबंध में समायोजन की आवश्यकता है?

समायोजन की आवश्यकता नहीं है यदि विक्रेता उन खरीदों के मामले में खरीद वापसी को माल के साथ बदल देता है जिस पर अधिनियम की धारा 194Q के तहत कर काटा गया था जो बदले गए सामानों के साथ पूरा हो गया है।

संदर्भ

 

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