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कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8

कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8

यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, नोएडा की छात्रा Anushka Singhal द्वारा लिखा गया है। यह लेख कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8 पर प्रकाश डालता है और इसकी निगमन (इनकॉरपोरेशन) प्रक्रिया, फायदे, नुकसान आदि की व्याख्या करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

शब्द ‘कंपनी’ को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(20) के तहत “इस अधिनियम के तहत या किसी पिछले कंपनी कानून के तहत निगमित कंपनी” के रूप में परिभाषित किया गया है। कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत कई प्रकार की कंपनियों का उल्लेख किया गया है।

निम्नलिखित प्रकार की कंपनियाँ हैं जो कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत (रजिस्टर) हो सकती हैं: –

  • निजी कंपनी, 
  • एक व्यक्ति कंपनी,
  • छोटी कंपनी, 
  • सार्वजनिक कंपनी। 

उपर्युक्त कंपनियों को इस रूप में शामिल किया जा सकता है – 

  1. सीमित देयता (लिमिटेड लायबिलिटी) कंपनियां, और
  2. असीमित देयता कंपनियां। 

सीमित देयता कंपनियां निम्नलिखित के रूप में हो सकती हैं-

  1. शेयरों द्वारा सीमित कंपनियाँ;
  2. गारंटी द्वारा सीमित कंपनियाँ;
  3. गारंटी के साथ-साथ शेयरों द्वारा सीमित कंपनियां। 

उपरोक्त वर्गीकरण के अलावा, कंपनियों को आगे निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • सांविधिक (स्टेच्यूटरी) कंपनियां;
  • पंजीकृत कंपनियाँ; 
  • मौजूदा कंपनियां; 
  • गैर-लाभकारी संघ (एसोसिएशन); 
  • सरकारी कंपनियां; 
  • विदेशी कंपनियां; 
  • होल्डिंग और सहायक कंपनियां।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 क्या है

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8, संघों और गैर-लाभकारी संगठनों पर चर्चा करती है। इस धारा के तहत आने वाली कंपनियां आमतौर पर ‘धारा 8 कंपनियों’ के रूप में जानी जाती हैं और लाभ कमाने के बजाय यह धर्मार्थ (चेरिटेबल) उद्देश्य के लिए बनाई जाती हैं। धारा 8 कंपनियां, कंपनी अधिनियम के तहत कुछ लाभों का आनंद लेती हैं और उन्हें कुछ अनुपालनों (कंप्लायंस) से छूट दी जाती है। 

धारा 8 कंपनी के लिए आवश्यक शर्तें

धारा 8 कंपनी होने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा-

  1. इस धारा के तहत स्थापित कंपनी को व्यापार, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, अनुसंधान (रिसर्च), सामाजिक कल्याण, धर्म, दान, पर्यावरण संरक्षण, या ऐसी किसी अन्य वस्तु को बढ़ावा देना चाहिए।
  2. इसका लक्ष्य, अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किसी कमाई या अन्य राजस्व (रिवेन्यू) का उपयोग करना है; और
  3. यह अपने सदस्यों के किसी भी लाभांश (डिविडेंड) के वितरण को प्रतिबंधित करने का इरादा रखता है।

उपरोक्त शर्तों को पूरा करने पर, एक कंपनी केंद्र सरकार द्वारा धारा 8 के तहत पंजीकृत हो जाती है। ऐसी कंपनी के नाम में “लिमिटेड” या “प्राइवेट लिमिटेड” शब्द नहीं जोड़े जाते हैं। ऐसी कंपनियों के नामों में कंपनी (निगमन) नियमों 2014 के नियम 8 (7) के अनुसार “परिषद,” “फोरम,” “ट्रस्ट,” “फाउंडेशन,” “फेडरेशन,” “चेम्बर्स,” आदि जैसे प्रत्यय शामिल होने चाहिए। जिमखाना क्लब और दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) धारा 8 कंपनियों के कुछ उदाहरण हैं। इन कंपनियों को आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कई तरह के कर लाभ भी दिए जाते हैं। उन्हें आयकर का भुगतान करने से छूट दी गई है, और मालिकों को कई कर लाभ हैं। 

धारा 8 कंपनियों का इतिहास

कंपनी अधिनियम, 1913, “लिमिटेड” और “प्राइवेट लिमिटेड” शब्दों का उपयोग किए बिना कुछ कंपनियों को धर्मार्थ उद्देश्यों के साथ स्थापित करने का प्रावधान करता है। बाद में, जब कंपनी अधिनियम, 1956 लागू हुआ, तो उक्त अधिनियम की धारा 25 के तहत इन कंपनियों को शामिल किया गया। भाभा समिति की सिफारिश के कारण इस नए अधिनियम की स्थापना हुई। बाद में, वर्ष 2013 में धारा 8 को जोड़ा गया। यह ध्यान रखना उचित है कि भारतीय संविधान की अनुसूची VII के तहत, ‘ट्रस्ट और ट्रस्टी’ को समवर्ती (कंकर्रेंट) सूची में प्रविष्टि संख्या 10 में उल्लेख मिलता है, और ‘धर्मार्थ और धर्मार्थ संस्थान, धर्मार्थ और धार्मिक बंदोबस्ती, और धार्मिक संस्थान’ को समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 28 के तहत स्थान मिलता है। इसलिए, केंद्र और राज्य दोनों धर्मार्थ संगठनों के कानून बनाने और विनियमित (रेगुलेट) करने के लिए सक्षम हैं।

निगमन की प्रक्रिया

धारा 8 कंपनी को निगमी करने की प्रक्रिया निम्नलिखित है-

वांछित (डिजायर्ड) नाम के लिए आवेदन

एक बार जब यह निर्णय लिया जाता है कि एक धारा 8 कंपनी की स्थापना की जानी है, तो कंपनी के नाम को आरक्षित करने के लिए एसपीआईसीई+ (कंपनी इलेक्ट्रॉनिकली प्लस को शामिल करने के लिए सरलीकृत (सिंपलीफाइड) प्रोफार्मा) फॉर्म भरना होगा। प्रस्तावित व्यावसायिक गतिविधि के साथ दो नए नामों को चुना और दर्ज किया जाना चाहिए।

डिजिटल हस्ताक्षर के लिए आवेदन

किसी कंपनी का निगमन पूरी तरह से ऑनलाइन प्रक्रिया है। इसलिए, डिजिटल हस्ताक्षर ऑनलाइन प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा। इसके बाद डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट) जारी किया जाएगा। इन हस्ताक्षरों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि सदस्य और निदेशक (डायरेक्टर्स) मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की सदस्यता ले सकें। 

निगमन के लिए आवेदन

नाम के आरक्षण के लिए दाखिल करने के बाद, निगमन के लिए आवेदन दाखिल करना होगा। फाइल करने के लिए कई दस्तावेज होते हैं, लेकिन एसपीआईसीईई+ की मदद से, ये सभी फॉर्म अब एक में मिल गए हैं। नाम आरक्षण, निगमन, डीआईएन (निदेशक पहचान संख्या) के लिए आवेदन, टैन (कर कटौती और संग्रह खाता संख्या), और पैन (स्थायी खाता संख्या) आवेदन, ईपीएफओ ​​(कर्मचारी भविष्य निधि (एंप्लॉयी प्रोविडेंट फंड) संगठन) पंजीकरण, ईएसआईसी (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) पंजीकरण, और जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) पंजीकरण अब एक ही फॉर्म में किया जाता है। फिर, एक मेमोरेंडम और आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार किया जाता है, जिसे ग्राहकों द्वारा सब्सक्राइब किया जाता है, और फिर उनकी तस्वीरें प्रत्यय (सफिक्स) लगाई जाती हैं। धारा 8 कंपनियों के लिए विशेष रूप से, सदस्यों और गवाहों द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एमओए मसौदा की भौतिक (फिजिकल) प्रति होनी चाहिए: सदस्यों और गवाहों द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एओए मसौदे की भौतिक प्रति होनी चाहिए। किसी पेशेवर द्वारा एक घोषणा -14 दायर की जानी चाहिए। फॉर्म 14 में घोषणा एक चार्टर्ड एकाउंटेंट, लागत लेखाकार (कॉस्ट अकाउंटेंट), या कंपनी सचिव द्वारा दायर की जानी चाहिए, जिसे फॉर्म नंबर आईएनसी-14 में एक घोषणा संलग्न (अटैच) करनी होगी कि धारा 8 के तहत आवश्यकताओं का अनुपालन किया गया है। ग्राहक अगले तीन वर्षों में कंपनी द्वारा किए जाने वाले आय और व्यय (एक्सपेंडिचर) का अनुमान लगाएंगे और उन स्रोतों को भी बताएंगे जिनसे आय होगी। फिर एक घोषणा निदेशकों और ग्राहकों और मुद्रांकित (स्टैंपड) कागजात द्वारा अधिकृत (ऑथराइज) की जाएगी। 

व्यवसाय शुरू करने का प्रमाण पत्र

एक बार जब कंपनी के निगमन के लिए आवेदन को मंजूरी दे दी जाती है और आरओसी निगमन का प्रमाण पत्र जारी कर देता है, तो कंपनी को अपने निगमन के 180 दिनों के भीतर परिचालन (ऑपरेशन) शुरू करने के लिए अनुमोदन के लिए फाइल करना होगा।

धारा 8 कंपनी में निदेशकों की संख्या

सार्वजनिक और निजी कंपनियों के विपरीत, धारा 8 कंपनी में निदेशकों की संख्या पर कोई अधिकतम या न्यूनतम सीमा नहीं है। इन कंपनियों को स्वतंत्र निदेशक रखने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, उनके पास न्यूनतम एक निवासी निदेशक होना आवश्यक है, यानी, एक निदेशक जो पिछले कैलेंडर वर्ष के भीतर कम से कम 182 दिन (एक सौ बयासी दिन) या उससे अधिक समय तक भारत में रहा हो। ऐसी कंपनियों में न्यूनतम निदेशक पद का कोई प्रावधान नहीं है। 

धारा 8 कंपनी के लिए वार्षिक, त्रैमासिक (क्वार्टरली) और मासिक अनुपालन

एक लेखा परीक्षक (ऑडिटर) की नियुक्ति

कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 139 के तहत, तीस दिनों के भीतर एक लेखा परीक्षक नियुक्त किया जाना है।

वैधानिक रजिस्टर बनाना 

कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8 के अनुसार, कंपनी को अपने सदस्यों, प्राप्त ऋणों, किए गए शुल्कों, निदेशकों और अन्य का वैधानिक रजिस्टर रखना आवश्यक है।

बोर्ड बैठक 

बोर्ड की बैठक हर छह महीने में बुलानी होती है।

सांविधिक लेखा-परीक्षा (ऑडिट)

चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा हर साल खाते की किताबों का ऑडिट किया जाना होता है।

आम बैठक का नोटिस

हर आम बैठक से पहले 21 दिनों का नोटिस देना होता है। 

वार्षिक आम बैठकें

वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने के भीतर वार्षिक आम बैठक वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है। हालाँकि, पहली वार्षिक आम बैठक के मामले में, कंपनी पहले वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के नौ महीने से कम समय में ए.जी.एम. आयोजित कर सकती है।

बोर्ड की रिपोर्ट

बोर्ड की रिपोर्ट हर साल तैयार और जमा करनी होती है। 

कर रिटर्न 

हर साल 31 मार्च तक कर रिटर्न फाइल करना होता है। 

टैक्स लेखा परीक्षा 

फॉर्म 10B धर्मार्थ या धार्मिक ट्रस्ट या संस्था द्वारा दायर किया जाएगा जो धारा 12A के तहत नामांकित है या फॉर्म 10A दाखिल करके पंजीकरण के लिए आवेदन दायर किया है।

डीआईएन केवाईसी

वित्तीय वर्ष के 31 मार्च को डीआईएन प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अगले वित्तीय वर्ष के 30 सितंबर को या उससे पहले अपना केवाईसी जमा करना होता है।

जीएसटी रिटर्न

कर रिटर्न की तरह हर साल जीएसटी रिटर्न फाइल करना होता है। जीएसटी अनुपालन होना चाहिए जो मासिक और त्रैमासिक आधार पर किया जाता है। ये मासिक और त्रैमासिक अनुपालन हैं। 

धारा 8 कंपनी के लिए अतिरिक्त अनुपालन

धारा 8 कंपनियों के लिए अतिरिक्त अनुपालन निम्नलिखित हैं-

  1. निदेशक को एक अनुमोदन (अप्रूवल) फॉर्म प्राप्त करना होता है और इस तरह के अनुमोदन के 30 दिनों के भीतर कार्यालय में शामिल होना होता है।
  2. प्रबंध निदेशक (मैनेजिंग डायरेक्टर), प्रबंधक, या अन्य प्रमुख प्रबंधकीय पोस्टिंग की नियुक्ति के 60 दिनों के भीतर रिटर्न फॉर्म दाखिल किया जाना चाहिए।
  3. अगर ऐसी कंपनी में आठ से ज्यादा कर्मचारी हैं तो उसे अनिवार्य रूप से अपने कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) का सदस्य बनाना होगा। 
  4. ऐसी कंपनियों द्वारा प्राप्त दान करों से मुक्त हैं। ऐसी कंपनियों को आयकर अधिनियम की धारा 80G और 12A के तहत नामांकन करना चाहिए। 

मेमोरेंडम और आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन में परिवर्तन

कंपनी अधिनियम 2013 के तहत अन्य कंपनियों के विपरीत, गैर लाभकारी संघ अपने मेमोरेंडम या आर्टिकल्स को बदल नहीं सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है। यही एनसी बख्शी बनाम भारत संघ (2012) के मामले में आयोजित किया गया था, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा दी गई संस्था के आर्टिकल्स को बदलने की मंजूरी को रद्द कर दिया गया था क्योंकि याचिकाकर्ता के प्रतिनिधित्व पर विचार नहीं किया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार को सभी आवश्यक कारकों पर विचार करने के बाद अनुमति देनी चाहिए। इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं को निर्णय देने के बाद यह निर्धारित करने के लिए सुनवाई की गई कि क्या परिवर्तन कंपनी अधिनियम के उल्लंघन में था। 

धारा 8 कंपनी का किसी अन्य प्रकार की कंपनी में रूपांतरण (कन्वर्जन)

ऐसी कंपनियां आम बैठक में एक विशेष प्रस्ताव पारित करके खुद को किसी अन्य प्रकार की कंपनियों में परिवर्तित कर सकती हैं। फिर भी, कंपनी (निगमन) नियम, 2014 के नियम 21 का पालन करना होगा। परिवर्तन का नोटिस देते समय, एक स्पष्टीकरण देना चाहिए कि कंपनी को क्यों परिवर्तित किया जा रहा है। इसके अलावा, रूपांतरण की तिथि, उद्देश्य और प्रभाव जैसे अन्य प्रासंगिक विवरण भी बताए जाने चाहिए। 

कंपनी (निगमन) नियम, 2014 के नियम 21

नियम 21, धारा 8 कंपनी को दूसरी कंपनी में बदलने की प्रक्रिया बताता है-

  1. ऐसी कंपनी को रूपांतरण के लिए एक विशेष प्रस्ताव पारित करना होता है।
  2. एक व्याख्यात्मक विवरण के साथ एक नोटिस भेजा जाना चाहिए कि ऐसा रूपांतरण क्यों होना चाहिए-
  1. मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन में निर्धारित उद्देश्य;
  2. रूपांतरण के कारण;
  3. रूपांतरण के बाद परिवर्तित उद्देश्य और ऐसे परिवर्तन के कारण;
  4. ऐसी कंपनी द्वारा प्राप्त विशेषाधिकार और छूट; और
  5. रूपांतरण के परिणामस्वरूप सदस्यों को प्राप्त होने वाले किसी भी लाभ सहित कंपनी के सदस्यों पर प्रस्तावित रूपांतरण के प्रभाव का विवरण।
  1. नोटिस की ऐसी प्रमाणित (सर्टिफाइड) प्रति रजिस्ट्रार के पास दाखिल करनी होगी। 

धारा 8 कंपनियों को दी गई छूट

  1. कंपनियों के लिए कंपनी सचिव नियुक्त करना अनिवार्य नहीं है। 
  2. अन्य कंपनियों के विपरीत, जिनमें बैठकें केवल व्यावसायिक घंटों के दौरान आयोजित की जाती हैं और कभी भी राष्ट्रीय अवकाश के दिन नहीं होती हैं, ऐसी कंपनियों को व्यावसायिक घंटों के पहले या बाद में और यहां तक ​​कि राष्ट्रीय अवकाश के दिन भी बैठकें आयोजित करने की अनुमति होती है। निदेशक मंडल को पहले से तारीख, समय और स्थान तय करना चाहिए।
  3. वार्षिक आम बैठक आयोजित करने के लिए 21 दिनों के नोटिस के जनादेश (मैंडेट) के विपरीत, ये कंपनियां एजीएम के लिए 14 दिनों का नोटिस दे सकती हैं।
  4. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 118 के अनुसार ये कंपनियाँ अपनी बैठकों के कार्यवृत्त (मिनट) तैयार करने के लिए बाध्य नहीं हैं। हालाँकि, बैठक के 30 दिनों के भीतर कार्यवृत्त दर्ज किए जाने चाहिए, जब आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन ऐसा प्रदान करते हैं।
  5. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 149 के तहत अधिकतम और न्यूनतम संख्या में निदेशक नियुक्त करने का कोई आदेश नहीं है।
  6. वे स्वतंत्र निदेशक नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
  7. एक वर्ष में चार बोर्ड बैठकों के बजाय, इन कंपनियों को छह महीने के भीतर केवल दो बैठकें करने की अनुमति है। 
  8. अन्य कंपनियों के विपरीत, ऐसी कंपनियां 20 निदेशकों की सीमा का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। 
  9. नियुक्ति के 30 दिनों के भीतर आरओसी के पास दर्ज कराने के लिए उस स्थिति में कार्य करने के लिए निदेशक की सहमति की आवश्यकता वाला प्रावधान, जैसा कि धारा 152(5) द्वारा आवश्यक है, ऐसा गैर लाभकारी संघों पर लागू नहीं होगा।
  10. बोर्ड की बैठकों के लिए कोरम आठ सदस्यों या इसकी कुल शक्ति का 25%, जो भी कम हो, होगा, बशर्ते कि यह कुल शक्ति के एक तिहाई या दो निदेशकों, जो भी अधिक हो, के विपरीत दो से कम न हो।
  11. निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) की धन उधार लेने, व्यापार नकद निवेश करने, ऋण देने, गारंटी प्रदान करने, या ऋण के लिए सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता का प्रयोग बोर्ड द्वारा बैठक के बजाय संचलन द्वारा किया जा सकता है।

धारा 8 कंपनियां और दिवाला (इंसोलवेंसी) एवं शोधन अक्षमता  (बैंकरप्टसी) कोड, 2016

दिवाला एवं शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी), 2016, धारा 8 कंपनियों पर लागू होता है। उन्हें आईबीसी के तहत कॉर्पोरेट व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्राप्त है और या तो वे अपने लेनदारों द्वारा शुरू की गई दिवाला प्रक्रियाओं के अधीन हो सकते हैं या शुरू कर सकते हैं। जब वे आईबीसी के तहत दिवाला के लिए फाइल करते हैं, तो उन्हें यह दिखाने में सक्षम होना चाहिए कि वे दिवालिया हैं और अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ हैं। जब दिवाला कार्यवाही शुरू की जाती है, तो फर्म के मामलों को संभालने और कंपनी को पुनर्गठित (रीऑर्गेनाइज) या पुनर्जीवित करने के लिए एक समाधान योजना विकसित करने के लिए एक समाधान विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाता है। इसी तरह, लेनदार भी दिवालिया कार्यवाही शुरू कर सकते हैं यदि ऋण बकाया हैं। विशेषज्ञों ने कहा है कि आईबीसी के तहत नियमित दिवालिएपन की कार्यवाही को गैर लाभकारी संघों के धर्मार्थ उद्देश्य को देखते हुए उन पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। 

समामेलन (अमलगमेशन) और समापन

धारा 8 कंपनी को केवल स्वयं के प्रकार की कंपनी के साथ समामेलित किया जा सकता है। इसे निजी या सार्वजनिक कंपनी की तरह किसी अन्य कंपनी के साथ समामेलित नहीं किया जा सकता है। भले ही दो एकीकृत कंपनियों के उद्देश्य पूरी तरह समान न हों लेकिन हल्के बहुत ही समान हों, वे दोनों समामेलित हो सकते हैं। किन्हीं भी दो धारा 8 कंपनियों के उद्देश्यों का एक जैसा होना जरूरी नहीं है। वाक्यांश “समान उद्देश्य वाले” की संकीर्ण (नैरो) रूप से व्याख्या नहीं की जानी चाहिए।

धारा 8 कंपनी किसी अन्य कंपनी की तरह समापन के लिए आवेदन कर सकती है। ऐसी कंपनी का नाम कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 248 के तहत स्वप्रेरणा (सुओ मोटो) से कंपनियों के रजिस्टर से हटाया जा सकता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत प्रावधानों का उल्लंघन

धारा 8 के तहत प्रावधानों के उल्लंघन के परिणाम निम्नलिखित हैं-

  1. स्टेट्स का निरसन (रेवोकेशन)- एक गैर लाभकारी कंपनी को एक सार्वजनिक या निजी कंपनी के लिए परिवर्तित किया जा सकता है, और ‘लिमिटेड’ या ‘प्राइवेट लिमिटेड’ शब्दों के मामले में जोड़ा जा सकता है।
  2. समान उद्देश्यों वाली कंपनी के साथ समामेलन
  3. परिसमापन आदेश
  4. कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत दंड का आरोपण (इंपोजिशन) – कंपनी पर दस लाख से कम और एक करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और निदेशक को तीन साल तक की कैद या कम से कम 25000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है जो 25 लाख रुपये तक या दोनों के साथ हो सकता है। 

यदि कंपनी के कार्यों को कपटपूर्ण तरीके से संचालित किया जाता है, तो कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 447 लागू हो सकती है। यह छह महीने से कम अवधि के लिए कारावास की सजा निर्धारित करता है, जिसे 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है, और धोखाधड़ी में शामिल राशि से कम जुर्माना नहीं होगा, जिसे धोखाधड़ी में शामिल राशि से तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है।

कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर)

इस तथ्य के बावजूद कि धारा 8 कंपनियाँ स्वयं धर्मार्थ कार्यों में शामिल हैं, उन्हें अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की भी आवश्यकता है। कॉर्पोरेट कानून समिति की रिपोर्ट के अनुसार, धारा 135 धारा 8 कंपनियों सहित प्रत्येक कंपनी पर लागू होती है। कंपनी को जिस कार्य में वह पहले से ही लगी हुई है उससे अलग कार्य में खर्च करना पड़ता है, कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के लिए व्यय ऐसी कंपनी और उसके कर्मचारियों के लाभ के लिए नहीं होना चाहिए। 

धारा 8 कंपनियों के लाभ

अलग पहचान

यह एक अलग इकाई है जिसका अपना अस्तित्व है। क्योंकि व्यवसाय और उसके सदस्य दोनों कानून की दृष्टि से स्वतंत्र व्यक्ति हैं, सदस्यों की कंपनी के दायित्वों के लिए कोई जवाबदेही नहीं है। नतीजतन, एक कॉरपोरेट एक अलग कानूनी व्यक्तित्व वाला एक कृत्रिम (आर्टिफिशियल) व्यक्ति है।

सीमित दायित्व

किसी कंपनी के दायित्वों के लिए केवल एक निश्चित राशि तक कानूनी रूप से जवाबदेह होने की स्थिति को “सीमित देयता” कहा जाता है। कंपनी के गलत कार्यों के लिए कंपनी के सदस्य व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं हैं। 

कोई न्यूनतम पूंजी नहीं

ऐसी कंपनियों के लिए न्यूनतम पूंजी रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

कम स्टैंप ड्यूटी

धारा 8 कंपनी बनाते समय न्यूनतम स्टैंप शुल्क देय होती है। सरकार व्यवसाय निगमन पर धारा 8 को लाभ देती है। इसलिए, यह निगमन पर कम स्टैंप शुल्क लेती है।

कर लाभ

धारा 8 कंपनियों को आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कर लाभ मिल सकता है, यदि वे आईटी अधिनियम की धारा 80G और 12AA के तहत पंजीकृत हैं।

धारा 8 कंपनियों के नुकसान

कम कार्य क्षेत्र

धारा 8 कंपनियां अपने संचालन में प्रतिबंधित हैं और उन्हें लाभ कमाने की अनुमति नहीं है। उनके संचालन के दायरे को सीमित करते हुए, उन्हें अपने सदस्यों को लाभ का भुगतान करने से भी रोक दिया गया है।

जटिल अनुपालन

महत्वपूर्ण कानूनी लाभों के बावजूद, धारा 8 कंपनियों को कई कानूनी और नियामक (रेगुलेटरी) प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए। अनुपालन प्रक्रिया समय लेने वाली और कठिन हो सकती है, जिससे उनके लिए धर्मार्थ गतिविधियों को करना मुश्किल हो जाता है। 

बढ़ी हुई जांच

गैर-लाभकारी संगठनों के रूप में, धारा 8 कंपनियां नियामकों और जनता द्वारा जांच के अधीन हैं। किसी भी वित्तीय अनियमितता (ईररेगुलेरिटीज) या कुप्रबंधन के परिणाम, कंपनी की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता के लिए गंभीर हो सकते हैं।

सीमित नियंत्रण

धारा 8 कंपनियों के लिए न्यूनतम दो निदेशकों की आवश्यकता होती है, और निदेशक मंडल कंपनी के मामलों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होता है। हालाँकि, कंपनी के सदस्यों का कंपनी के संचालन पर सीमित नियंत्रण होता है और वे बोर्ड के निर्णयों को सीधे प्रभावित नहीं कर सकते हैं।

धन जुटाने की सीमित क्षमता

धारा 8 कंपनियों को इक्विटी शेयर जारी करके धन जुटाने से प्रतिबंधित किया गया है। वे केवल दान, अनुदान और गैर-इक्विटी पूंजी के अन्य रूपों के माध्यम से धन जुटा सकते हैं। यह कंपनी की पूंजी जुटाने और अपने परिचालन का विस्तार करने की क्षमता को सीमित कर सकता है।

ध्यान देने योग्य बिंदु

शेयर प्रमाण पत्र जारी करने पर स्टैंप शुल्क भुगतान में छूट 

भारतीय स्टैंप अधिनियम, 1899, शेयर प्रमाणपत्र जारी करने पर स्टैंप शुल्क लगाने को नियंत्रित करता है। धारा 8 कंपनी द्वारा शेयर प्रमाण पत्र जारी करने पर देय स्टैंप शुल्क के लिए किसी भी राज्य ने स्टैंप शुल्क छूट की विशेष दर प्रदान नहीं की है। इसी तरह, शेयरों के हस्तांतरण पर देय स्टैंप शुल्क को धारा 8 कंपनियों के लिए छूट नहीं दी गई है। हालांकि, अन्य कंपनियों की तरह, डीमैट मोड में किए गए धारा 8 कंपनी के शेयरों के हस्तांतरण (ट्रांसफर) पर कोई स्टैंप शुल्क देय नहीं है।

विदेशों या अनिवासियों से योगदान प्राप्त करना

धारा 8 कंपनी द्वारा विदेशों/भारत के बाहर के अनिवासियों से योगदान या दान स्वीकार करने से पहले, विदेशी योगदान और विनियमन अधिनियम, 2010 के तहत विशेष आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए। उपर्युक्त अधिनियम के प्रावधान कंपनी अधिनियम के अतिरिक्त हैं।

धारा 8 कंपनी के तहत विदेशी कंपनी का पंजीकरण

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत एक विदेशी कंपनी का पंजीकरण नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ऐसी कंपनी की परिभाषा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(42) के तहत दी गई विदेशी कंपनी की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आती है। लेकिन अगर विदेशी मुद्रा प्रबंधन (फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट) अधिनियम, 1999 के तहत पंजीकृत हैं, तो भारत के बाहर शामिल ऐसी गैर-लाभकारी कंपनियां या निकाय भारत में धारा 8 कंपनी को एक अलग इकाई के रूप में बढ़ावा और पंजीकृत कर सकते हैं।

हाल के विकास

पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाना

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) ने हाल ही में एसपीआईसीईई+ नामक एक वेब-आधारित फॉर्म बनाकर धारा 8 कंपनी पंजीकरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया है। इसने धारा 8 कॉर्पोरेट्स बनाने की प्रक्रिया को गति दी है और सुधार किया है।

अनुपालन आवश्यकताओं में छूट

एमसीए ने धारा 8 फर्मों के लिए कई अनुपालन आवश्यकताओं को भी सरल बना दिया है, जैसे वार्षिक आम बैठक (एजीएम) आयोजित करना और धारा 8 छोटी कंपनियों के लिए एक लेखा परीक्षक नियुक्त करना।

कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से व्यय

500 करोड़ रुपए या उससे अधिक के निवल मूल्य (नेट वर्थ) वाली कंपनियां, 1,000 करोड़ रुपए या अधिक का कारोबार, या 5 करोड़ रुपए या अधिक का निवल लाभ, कंपनी अधिनियम, 2013 के लिए आवश्यक है कि वे कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) गतिविधियों पर पिछले तीन वित्तीय वर्षों में अपने औसत (एवरेज) निवल लाभ का कम से कम 2% खर्च करें। सीएसआर पहल के लिए धारा 8 कंपनियां भी इन कॉर्पोरेट से नकद प्राप्त करने के लिए पात्र हैं।

विदेशी संस्थाओं से योगदान

विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2020 ने सभी धारा 8 कंपनियों के लिए विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के तहत पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया है, यदि वे विदेशी योगदान प्राप्त करते हैं।

ऐतिहासिक निर्णय

मोहनराम शास्त्री बनाम स्वधर्म स्वराज्य संघ (1995)

इस मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि क्योंकि “गैर लाभकारी कंपनी” का उद्देश्य पूरी तरह से धर्मार्थ है, कोई भी सदस्य या निदेशक यह दावा नहीं कर सकता है कि दान करते समय उसकी उपेक्षा की गई थी। एक सदस्य केवल यह सुनिश्चित कर सकता है कि गतिविधियों को अपने अधिकारों का प्रयोग करके धर्मार्थ उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निर्देशित किया जाता है। ऐसी कंपनी के मामले में सदस्यों के व्यक्तिगत हितों पर विचार नहीं किया जाता है। सदस्य यह तर्क दे सकते हैं कि कंपनी का कुप्रबंधन किया जा रहा है क्योंकि धर्मार्थ उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा रहा है। 

वित्तीय योजना पर्यवेक्षी फाउंडेशन बनाम सेबी (2015)

इस मामले में, अदालत ने कहा कि धर्मार्थ संघ केवल तभी कर छूट का दावा कर सकते हैं, जब वे कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 (वर्तमान में कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8) के तहत पंजीकृत हों। जैसा कि दिए गए मामले में कंपनी संबंधित धारा के तहत पंजीकृत नहीं हुई, उसे सेबी के तहत लाभ नहीं मिल सका। 

धारा 8 कंपनी के निगमन के बारे में कुछ भ्रामक तथ्य

  1. अक्सर यह माना जाता है कि एओए और एमओए का नोटरीकरण (नोटराइजेशन) अनिवार्य है, लेकिन यह सच नहीं है।
  2. ऐसा माना जाता है कि ऐसी कंपनियों के लिए सरकारी शुल्क अधिक होता है लेकिन यह झूठा है। 
  3. निदेशकों को प्रपत्र संख्या आईएनसी 15 में हलफनामा आवश्यक है। यह भी एक प्रचलित भ्रांति है। 
  4. आईएनसी 33 और 34 की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) के बारे में भी गलत धारणाएँ हैं।

निष्कर्ष

धारा 8 कंपनियां, कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत उल्लिखित कई कंपनियों में से एक हैं। ये गैर-लाभकारी संगठन हैं और इस प्रकार परोपकार के उद्देश्य से बहुत महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई धर्मार्थ कार्य करना चाहता है, तो कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत प्रक्रिया का पालन करके इन कंपनियों की स्थापना की जा सकती है। ऐसी कंपनियों को कुछ छूट दी गई है क्योंकि वे एक नेक काम को बढ़ावा देती हैं, और इन कंपनियों पर अतिरिक्त अनुपालन होता है। धारा 8 कंपनियां कंपनी अधिनियम, 2013 का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत धारा 8 कंपनियां क्या हैं?

धारा 8 कंपनियां अधिनियम की धारा 8 के तहत स्थापित गैर-लाभकारी संगठन हैं। इन कंपनियों का उद्देश्य धर्मार्थ उद्देश्यों, कला, वाणिज्य (कॉमर्स) आदि को बढ़ावा देना है। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत पंजीकृत होने वाली कंपनियों के लिए आवश्यक दस्तावेज क्या हैं?

अधिनियम की धारा 8 के तहत पंजीकृत होने वाली कंपनियों के लिए आवश्यक दस्तावेज हैं:

  • डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र;
  • मेमोरंडम ऑफ असोसीएशन;
  • आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन;
  • पासपोर्ट आकार की तस्वीरें;
  • सदस्यों का आईडी प्रमाण जैसे आधार कार्ड, पासपोर्ट और वोटर आईडी;
  • निदेशक का विवरण (जब सदस्य अन्य कंपनियां/ एलएलपी हों);
  • पते का साक्ष्य; और
  • निदेशक पहचान संख्या;

क्या लेखांकन मानक (अकाउंटिंग स्टैंडर्ड) ऐसी कंपनियों पर लागू होते हैं?

हाँ, लेखांकन मानक ऐसी कंपनियों पर लागू होते हैं।

क्या धारा 8 कंपनियों पर निवेश करने, ऋण देने आदि की कोई सीमा है?

इन कंपनियों को निवेश आदि करते समय धारा 180, 185 और 186 तथा कंपनी अधिनियम की अन्य प्रासंगिक धाराओं का पालन करना चाहिए।

क्या कोई भागीदारी फर्म या सीमित देयता भागीदारी धारा 8 कंपनी की सदस्य बन सकती है?

हां, कंपनी अधिनियम 2013 के तहत, एक साझेदारी फर्म या एलएलपी धारा 8 कंपनी का सदस्य बन सकता है। साझेदारी फर्म या एलएलपी को संबंधित अधिनियमों के प्रावधानों का पालन करना चाहिए, जैसा भी मामला हो।

धारा 8 कंपनियों को लाइसेंस जारी करने के लिए कौन अधिकृत है?

धारा 8 कंपनियों को लाइसेंस जारी करने के लिए केंद्र सरकार की शक्तियों के साथ संबंधित न्यायालयों के कंपनियों के रजिस्ट्रारों को प्रत्यायोजित (डेलीगेट) किया जाता है। 

क्या एक व्यक्ति कंपनी (ओपीसी) को धारा 8 कंपनी के रूप में शामिल या परिवर्तित किया जा सकता है?

नहीं, कंपनी (निगमन) नियम, 2014 का नियम 3 एक व्यक्ति वाली कंपनी को धारा 8 कंपनी के रूप में शामिल करने या धारा 8 कंपनी में परिवर्तित होने से रोकता है।

क्या कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 165 के तहत निर्धारित अधिकतम निदेशकों की कुल संख्या जो की बीस है, की गणना के लिए धारा 8 कंपनी में निदेशक की गणना की जाएगी? 

नहीं, कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 165 के तहत निर्धारित अधिकतम संख्या के संबंध में धारा 8 कंपनियों में निदेशकों को सीमा की गणना के लिए नहीं गिना जाएगा। 

संदर्भ

  • TAXMANN’S COMPANY LAW AND PRACTICE, A Comprehensive Textbook on Companies Act, 2013
  • A Ramaiya: Guide to the Companies Act, 19th Edition – Volume 1

 

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