होमComparing Section 6(A) and 43 of the Transfer of Property Act in light of the case of Jumma Masjid Mercara v. Kodi Maniandra Deviaजुम्मा मस्जिद मर्करा बनाम कोडी मणिंद्रा देविया के मामले के आलोक में...

जुम्मा मस्जिद मर्करा बनाम कोडी मणिंद्रा देविया के मामले के आलोक में संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 6(a) और 43 की तुलना

जुम्मा मस्जिद मर्करा बनाम कोडी मणिंद्रा देविया के मामले के आलोक में संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 6(a) और 43 की तुलना

यह लेख आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी, देहरादून की Srestha Nandy ने लिखा है। यह एक विस्तृत लेख है जो भारतीय कानूनों के तहत विशेष उत्तराधिकार (स्पेस सक्सेशनिस) और विबंधन (एस्टोपल) से संबंधित मुद्दों से संबंधित है। इस लेख का संपादन Sanjana Jain और Jannat ने किया है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

परिचय

एक कानूनी संदर्भ में, शब्द “संपत्ति” अधिकारों के एक संग्रह को संदर्भित करता है जो आनंद, विनाश या संवितरण (डिस्बर्समेंट) के लिए व्यक्तिगत रूप से, सामूहिक रूप से, या व्यक्तियों के समूह द्वारा स्वामित्व में हो सकता है। ब्लैकस्टोन ने संपत्ति को ‘एकमात्र और पूर्ण प्रभुत्व के रूप में परिभाषित किया है, जिसे एक व्यक्ति दूसरों के बहिष्करण के लिए दुनिया की चीजों पर दावा करता है।’ शब्द ‘संपत्ति’ का अंग्रेजी शब्द प्रॉपर्टी, लैटिन शब्द ‘प्रोप्रियस’ से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है “अपना।” लेकिन यह जरूरी नहीं है कि संपत्ति कुछ भौतिकवादी (मेटेरियलिस्टीक) हो, यह आभासी (वर्चुअल) भी हो सकती है।

एक कानूनी माहौल में, इसके अंतरण और अस्तित्व से संबंधित संपत्ति के विभिन्न प्रावधान मौजूद होते हैं। नतीजतन, संपत्तियों को विशिष्ट विशेषताओं वाली विभिन्न श्रेणियों में भी अलग किया जाता है। विशिष्ट होने के लिए, संपत्ति दो प्रकार की, यानी चल और अचल होती है। अचल संपत्ति के मामले में अधिकारों, कब्जे और स्वामित्व की वास्तविक आवाजाही होती है। संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 3 के तहत, ‘अचल संपत्ति’ शब्द को अलग से परिभाषित नहीं किया गया है। यह धारा अचल संपत्ति की अवधारणा देती है जिसमें कहा गया है कि खड़ी इमारती लकड़ी, उगती घास, अचल संपत्ति नहीं है। जबकि जनरल क्लॉज एक्ट (साधारण खंड अधिनियम) 1897 में कहा गया है कि अचल संपत्ति जमीन से जुड़ी कोई चीज, या जमीन से मिलने वाला फायदा है। परिभाषा अधिनियम की धारा 3 खंड 26 के तहत दी गई है। साथ ही, पंजीकरण अधिनियम 1908 की धारा 2 खंड 6 के तहत दी गई परिभाषा में अन्य कण शामिल हैं जैसे कि वंशानुगत भत्ते (हेरेडिटरी एलाउंस), रास्तों, प्रकाश, घाट, मत्स्य पालन (फिशरीज) के अधिकार, या वे जो पृथ्वी से जुड़े हैं।

दिया गया मामला अचल संपत्ति से संबंधित है जिसमें विबंधन के पहलू और वे शर्तें शामिल हैं जिनके तहत संपत्ति को आंतरित नहीं किया जा सकता है। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि अक्सर यह गलत समझा जाता है कि विशेष उत्तराधिकार और विबंधन विरोधाभासी हैं, लेकिन यह सच नहीं है। एक विशेष उत्तराधिकार द्वारा किसी भी धोखाधड़ी के अंतरण के मामले में, आंतरिति (ट्रांसफरी) विबंधन के आधार पर अपने योग्य हिस्से का दावा कर सकता है जहां उसने सद्भावना में प्रतिफल (कंसीडरेशन) प्रदान किया है और गलत बयानी से अनजान था।

संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 6(a) और धारा 43 का अवलोकन

संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 6(a)

यह एक अलग विचार है जिसे विशेष उत्तराधिकार या स्पेस सक्सेशनिस का सिद्धांत कहा जाता है। यह उस व्यक्ति के अधिकार को बताता है जो वर्तमान में एक उत्तराधिकारी है और जो मालिक की मृत्यु के बाद संपत्ति प्राप्त करेगा। यह सिद्धांत इस संभावना को दर्शाता है कि उत्तराधिकारी स्पष्ट रूप से इच्छा या उत्तराधिकार से संपत्ति में सफल होने की उम्मीद करता है।

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 6(a) इस अवधारणा को परिभाषित करती है।

संपत्ति की अंतरणीयता एलिनेशन राई प्रीफर्टर जूरी एक्रीसेंडी पर केंद्रित है। यह कहावत संपत्ति के संचय (एलिनेशन) से बेहतर अलगाव को बताती है। विशेष उत्तराधिकार उस साधारण उत्तराधिकार को दर्शाता है जो पैतृक संपत्ति, स्व-अर्जित संपत्ति में मौजूद होता है, जहां संपत्ति मालिक की मृत्यु के मामले में उत्तराधिकारी के पास जाती है। लेकिन इसकी विशेषता अंतरण का समय है, यदि मालिक जीवित है, तो किसी के उत्तराधिकारियों का संपत्ति पर केवल अधिकार होता है कि उनपर भविष्य में स्वामित्व का अधिकार होगा, लेकिन वर्तमान में संपत्ति को आंतरित करने के लिए कोई अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि C का किराना का छोटा व्यवसाय है। उसका बेटा D, C की इकलौती संतान है। D को एक प्रमोटर से एक प्रस्ताव मिलता है कि अगर वह उसे जमीन और दुकान बेचता है तो बदले में उसे एक अपार्टमेंट मिलेगा। D इसके लिए सहमत है और C की सहमति के बिना संपत्ति के कार्यों को सौंप देता है। C को इस अंतरण के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह अंतरण शुरू से ही शून्य होगा, क्योंकि C को अपनी संपत्ति को आंतरित करने का एकमात्र अधिकार है। यहां D को अंतरण का अधिकार केवल तभी होगा जब संपत्ति उसके पास या तो कानूनी रूप से या तो उसके पिता की मृत्यु के बाद आएगी या इससे पहले वह इसे अपने पिता से उपहार के रूप में प्राप्त करे।

लताफत हुसैन और अन्य बनाम हिदायत हुसैन और अन्य के मामले में, वादी के पति और पति के भाई का एक संपत्ति पर समान हिस्सा था। जब भाई की मृत्यु हो जाती है, तो संपत्ति का उसका हिस्सा (⅛ हिस्सा) उसकी माँ को जाता है। माँ ने संपत्ति वादी के पति के बेटे को उपहार में दे दी। वादी फसाहत हुसैन की दूसरी पत्नी थी। फसाहत ने वादी को मुतवली के रूप में नियुक्त किया जो केवल अपने बेटे की संपत्ति का कब्जा प्राप्त करता है। इससे पहले भी, उसने दहेज छोड़ दिया था और अपने पति की संपत्ति से उत्तराधिकार का दावा किया था। फसाहत हुसैन की मृत्यु के बाद, वादी ने अपने पति की विरासत के रूप में ⅛ हिस्से के लिए दावा किया। इस पर, अदालत ने कहा कि वह केवल मुतावली के रूप में संपत्ति का कब्जा बनाए रखेगी और कोई दावा नहीं किया जाएगा क्योंकि पहले उसने विरासत से खुद को त्याग दिया था।

निर्णय दो पहलुओं पर आधारित था, पहला, जब किसी के पास केवल कब्जा होता है, तो व्यक्ति उस पर कोई अधिकार या दावा नहीं कर सकता है, और दूसरा विबंधन पर, या सरल शब्दों में जब किसी ने किसी चीज के लिए वादा किया है तो भविष्य में उससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

एक प्रसिद्ध कहावत ‘निमो डेट क्वॉड नॉन हैबिट‘ है जिसका अर्थ है ‘कोई भी वह नहीं दे सकता है, जो उसके पास नहीं है। विशेष रूप से, इस कहावत का अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से कुछ खरीदता है जिसके पास स्वयं उसका स्वामित्व अधिकार नहीं है, तो यह क्रेता को स्वामित्व का अधिकार प्राप्त करने से रोकता है। तो सरल शब्दों में, संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 43 में कहा गया है कि कोई अचल संपत्ति किसी भी व्यक्ति द्वारा आंतरित नहीं की जा सकती है, जो ऐसा करने के लिए अधिकृत (ऑथराइज) नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के पास संपत्ति का अंतरण करने का अधिकार नहीं है और वह संपत्ति को दूसरे को आंतरित करता है, तो इसे शून्य माना जाएगा।

संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 43

इस संदर्भ को ‘विबंधन द्वारा अनुदान देना (फीडिंग द ग्रांट बाई एस्टॉपल)’ के रूप में भी जाना जाता है।

धारा 43 दो पहलुओं पर आधारित है, एक है ‘विबंधन का सिद्धांत’ और दूसरा है ‘न्यायसंगत विबंधन’। यह सिद्धांत दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति एक से अधिक संपत्ति के लिए वादा करता है, तो उसे अपना वादा पूरा करना होता है, जब वह वास्तव में एक संबंधित अचल संपत्ति का अधिग्रहण (एक्वायर) करता है।

राम भवन सिंह बनाम जगदीश के मामले के फैसले ने बताया कि सिद्धांत बिक्री, बंधक (मॉर्गेज), पट्टा (लीज), विनिमय (एक्सचेंज) और भार पर लागू होता है। इसके अलावा, यह सिद्धांत तब लागू नहीं होता है जब अंतरणकर्ता का अर्जित हित संबंधित संपत्ति का नहीं बल्कि किसी अन्य अचल संपत्ति का विषय हो। अदालत ने यह भी कहा कि, जब ब्याज का बड़ा हिस्सा अंतरणकर्ता के पास आता है, तो यह स्वचालित रूप से अंतरिति को चला जाता है, जिसे पहले अंतरणकर्ता की संपत्ति के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था।

दो प्रावधानों के बीच तुलना की आवश्यकता

एक पतली रेखा है जो दोनों पहलुओं को एक दूसरे से अलग बनाती है। इस तरह के अंतर का अस्तित्व तथ्य और मामले के निर्णय को उचित बनाता है क्योंकि अन्यथा मालिक और उत्तराधिकारियों के बीच उत्तराधिकार के अधिकारों में विरोधाभास होगा। इसके अलावा, इसके बिना, कपटपूर्ण प्रथाओं और गलतबयानी को बढ़ावा मिलेगा और कोई निश्चित न्याय नहीं मिलेगा।

विचार करने के लिए अन्य प्रमुख बिंदु यह है कि विबंधन केवल अचल संपत्तियों के लिए अंतरण के पीछे प्रतिफल के साथ लागू होता है जबकि धारा 6 (a) या विशेष उत्तराधिकार दोनों चल और अचल संपत्तियों पर लागू होते हैं। धारा 6 (a) के तहत आंतरण शुरू से ही शून्य हैं, लेकिन विबंधन के लिए, अनुबंध तब तक अस्तित्व में होना चाहिए जब तक कि अंतरणकर्ता सक्षमता प्राप्त नहीं कर लेता।

विशिष्ट उत्तराधिकार के मामले में, दोनों पक्ष संपत्तियों के अस्तित्व और उत्तराधिकार के नियमों के बारे में जानते हैं। लेकिन विबंधन के मामले में, गलत बयानी और धोखाधड़ी की प्रथाओं की संभावना अधिक होती है इसलिए तथ्यों के आधार पर उन आधारों की पहचान करना आसान हो जाता है जहां मामला चल रहा होता है।

जुम्मा मस्जिद मरकारा बनाम कोडी मणिंद्रा देविया

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, तीन भाइयों (B1, B2, B3) ने वर्ष 1900 में, 1900 से 1920 तक के लिए, यानी बीस साल की अवधि के लिए, संपत्ति बंधक रखी थी। अनुबंध की शर्तों में यह उल्लेख किया गया था कि बीस साल पूरा होने के बाद तीनों भाइयों के परिवार को संपत्ति वापस कर दी जाएगी।
  • परिवार में, दो भाइयों की शादी हो चुकी थी, और उनकी पत्नियाँ W1 और W2 थीं, जबकि तीसरा भाई अविवाहित था। इन तीन भाइयों की एक बहन S भी थी, और उसके दो बच्चे और तीन पोते (Gr1, Gr2, और Gr3) थे। सारे भाई मर गए और बहन भी। बस दो पत्नियां और पोते रह गए थे।
  • कानून के मुताबिक, जब तक पत्नियां जीवित हैं, संपत्ति पर उनका ही अधिकार रहेगा। यदि दोनों पत्नियों की मृत्यु हो जाती है तो संपत्ति बहन के पास जाएगी और अंततः पोते के पास जाएगी। विशेष उत्तराधिकार के आधार पर पोते उत्तराधिकारी थे। यह भी उल्लेख किया गया था कि Gr1 को संपत्ति का ½ हिस्सा प्राप्त होगा जबकि अन्य पोते को संपत्ति का ¼ हिस्सा मिलेगा।
  • इस मामले में संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 के तहत, धारा 6(a) अंतरण के पक्ष में नहीं है, जबकि धारा 43 अंतरण के पक्ष में है यदि पहले वादा किया गया हो।
  • ऐसा हुआ कि पोते ने संपत्ति को एक अंतरिती (T) को आंतरित कर दिया और इस तथ्य को गलत तरीके से प्रस्तुत किया कि उनके पास स्वामित्व है। इसके लिए W2 ने पोतों के खिलाफ मामला दायर किया क्योंकि वह अभी भी जीवित थी। यह पहली अपील थी, जहां अदालत ने W1 का पक्ष लिया और मामले को खारिज कर दिया। लेकिन यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि धारा 43 के आधार पर T को अंतरण अभी भी वैध था।
  • इसके बाद द्वितीय अपील से पहले, W2 की मृत्यु हो गई, और संपत्ति पोते के पास चली गई। यहां अंतरिती T ने संपत्ति के लिए दावा किया क्योंकि अंतरण के पीछे प्रतिफल का अस्तित्व था।
  • इसके लिए जुम्मा मस्जिद नाम की एक नई पक्ष ने प्रवेश किया, जिसमें दावा किया गया कि संपत्ति उन्हें W2 द्वारा उपहार विलेख (डीड) के रूप में आंतरित की गई थी, साथ ही Gr1 ने उन्हें अपना हिस्सा यानी ½ हिस्सा 300 रुपये के प्रतिफल के साथ दिया था।

पक्षों के विवाद 

  • इस मामले में दो विवाद हैं। पहले विबंधन के आधार पर अंतरिती T का दावा। जैसा कि भारतीय कानून में, अंतरिती को विबंधन के आधार पर अपने हिस्से के लिए दावा करना पड़ता है।
  • दूसरा जुम्मा मस्जिद का दावा है, जो कि उन्हें प्राप्त उपहार विलेख पर आधारित है और 300 रुपये के बदले में उन्हें Gr1 से प्राप्त संपत्ति का 1/2 हिस्सा है। साथ ही, जुम्मा मस्जिद ने तर्क दिया कि पोते उत्तराधिकारी हैं और विशेष उत्तराधिकार धारा 6(a) के तहत, वे संपत्ति के अंतरण के लिए पात्र नहीं हैं, इसलिए यह धोखाधड़ी और गलत बयानी के अलावा कुछ नहीं है, जिससे पूरे अंतरण को अमान्य कर दिया गया है।

न्यायालय का अवलोकन

  • अदालत ने पाया कि आंतरिती ने वैध होने का दावा किया था। और जुम्मा मस्जिद के दावे को खारिज कर दिया। यह निर्णय विबंधन के नियम को दर्शाता है जो कि एक स्पष्ट पहलू है जबकि धारा 6(a) मूल कानून और यह भी उल्लेख करता है कि इस मामले में दोनों आधारों को जोड़ा नहीं जा सकता है, अन्यथा यह सिद्धांत के उद्देश्य को खो देगा।
  • तो अंतत: अंतरिती T को वह संपत्ति मिल गई जहां उसके दावे को वैध दावा माना गया। अदालत द्वारा यह भी निर्धारित किया गया था कि अगर जुम्मा मस्जिद के दावे पर विचार किया जाता है तो इसका परिणाम यह होगा कि विशेष उत्तराधिकार का प्रावधान अस्पष्ट हो जाएगा और अंतरण का अधिकार गरिमा खो देगा।

मामले का निर्णय देते समय न्यायालय द्वारा संदर्भित पूर्ववर्ती (प्रिसिडेंट) निर्णय

विबंधन पर अंग्रेजी कानून और भारतीय कानून की तुलना में, यह प्रतीत होता है कि किसी व्यक्ति द्वारा संपत्ति के शीघ्र अंतरण के मामले में, जिसके पास स्वामित्व नहीं है, ऐसा होता है कि जब भी व्यक्ति को संपत्ति प्राप्त होती है, संपत्ति अंतरिती की ओर से स्वचालित रूप से प्राप्त होता है और किसी दावे के बिना अंतरिती को आंतरित कर दिया जाता है। लेकिन भारतीय कानून में ऐसा होता है कि विबंधन के आधार पर संपत्ति प्राप्त करने के लिए अंतरिती द्वारा दावा आवश्यक है। इस मामले में अंतरिती T ने पहले ही अपने अंतरण का दावा कर दिया था, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।

अलमनया कुनिगरी नबी सब बनाम मुरुकुती पापियाह के मामले में दिए गए फैसले ने मौजूदा मामले में पूर्ववर्ती के तौर पर काम किया था। इस मामले में, यह माना गया था कि यदि अंतरिती ने अंतरणकर्ता के प्रतिनिधित्व पर कार्य किया है, जो कि एक विशेष उत्तराधिकार है, तो मामला विबंधन के सिद्धांत का समर्थन करेगा, और अंतरिती के पास संपत्ति का अधिग्रहण करने के लिए सभी आवश्यक आधार होंगे।

निष्कर्ष

ऐसे मामलों में जहां न्यायालय का पक्ष लेने के सीमित आधार हैं, वहां कुछ आवश्यक बिंदुओं पर विचार करना आवश्यक है। इनमें दायर की गई याचिकाओं का समय शामिल है, और क्योंकि आधार की वैधता लंबे समय तक नहीं होगी, मामले के सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत के फैसले को प्राप्त करने के लिए अपील के पक्ष में प्रभावी आधार उठाना वास्तव में आवश्यक है। छोटी सी पहल से भी मामला उल्टा पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, यदि अंतरिती ने संपत्ति के अंतरण के लिए दावा नहीं किया, तो जुम्मा मस्जिद को मामले को अपने पक्ष में खींचने के लिए सभी आधार मिलेंगे। इसलिए बाद की अपील के मामले में, तथ्यों का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है क्योंकि एक छोटा सा अंतर बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।

संदर्भ

  1. https://saylordotorg.github.io/text_introduction-to-the-law-of-property-estate-planning-and-insurance/s12-02-personal-property.html 
  2. https://www.srdlawnotes.com/2018/03/theories-of-property-property-law.html
  3. Latafat Husain And Ors vs. Hidayat Husain And Ors 
  4. Nemo dat quod non habet – Academike.
  5. https://lawtimesjournal.in/doctrine-of-feeding-the-grant-by-estoppel/
  6.  Ram Bhawan Singh vs. Jagdish
  7.  Alamanaya Kunigari Nabi Sab v. Murukuti Papiah

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