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भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 के तहत शून्य समझौते

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 के तहत शून्य समझौते

यह लेख नोएडा के सिम्बायोसिस लॉ स्कूल की छात्रा Diva Rai ने लिखा है। इस लेख में वह भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 29 में अनिश्चितता के कारण शून्य समझौतों के बारे में चर्चा करती है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 29 के तहत एक समझौता शून्य है जब इसकी शर्तें अस्पष्ट और अनिश्चित हैं, और इसे स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। उदाहरण: A एक टन तेल का व्यापार करने के लिए सहमत है। यह समझौता अनिश्चितता के लिए शून्य है क्योंकि किस तरह के तेल का इरादा है, उसका पता नहीं लगाया जा सकता है।

निश्चितता की आवश्यकता

एक समझौता अनिश्चित हो सकता है क्योंकि इसमें शर्तें अस्पष्ट हैं या क्योंकि यह अधूरा है। सामान्य नियम यह है कि यदि किसी समझौते की शर्तें अस्पष्ट या अनिश्चित हैं जिन्हें पक्षों के इरादे की उचित निश्चितता के साथ पता नहीं लगाया जा सकता है, तो कानून द्वारा लागू करने योग्य कोई संविदा नहीं है।

धारा 29 एक समझौते का अर्थ बताती है जो इसके प्रकट होने पर पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) होना चाहिए, जैसा कि कोवुरु कलप्पा देवारा बनाम कुमार कृष्ण मित्तर के मामले में समझाया गया है, लेकिन संविदा को प्रभाव प्रदान किया जा सकता है यदि इसका अर्थ उचित स्पष्टता के साथ पाया जाता है। यदि यह संभव नहीं है तो संविदा लागू करने योग्य नहीं होगा। समझने में थोड़ी सी कठिनाई को अस्पष्ट नहीं माना जाएगा। सिद्धांत को एक पक्ष के रूप में व्यक्त किया जा सकता है जो एक संविदा के उल्लंघन के लिए अदालत से राहत चाहता है, दायित्व को उपाय को सही ठहराने के लिए पर्याप्त सटीकता के साथ दायित्व की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। इस प्रकार कहा गया कानून अधिक लचीला है, और स्वीकार करता है कि उपायों के लिए आश्वासन के विभिन्न स्तरों की आवश्यकता हो सकती है।

निष्कर्ष निकाला हुआ संविदा

जैसा की कहा गया है कि पक्षों को अपना संविदा करना चाहिए और अदालत पक्षों के लिए संविदा का निर्माण नहीं करेगी जब शर्तें अनिश्चित या अस्थिर हों। अदालत को कुछ शर्तें बनाने की मांग करने से पहले संतुष्ट होना चाहिए कि पक्षों के पास एक निष्कर्ष निकाला हुआ संविदा है।

निश्चित होने में सक्षम है

जैसा कि बहादुर सिंह बनाम फुलेश्वर सिंह  के मामले में दिया गया है, एक संविदा शून्य नहीं है यदि इसकी शर्तें निश्चित करने में सक्षम हैं। संविदा का अर्थ अनिश्चित नहीं होना चाहिए और आगे, यह दिखाने की आवश्यकता है कि यह निश्चित करने में सक्षम नहीं है। केवल अस्पष्टता या अनिश्चितता जिसे उचित व्याख्या द्वारा आसानी से हटाया जा सकता है, एक संविदा को शून्य नहीं बनाती है। यहां तक कि मौखिक समझौतों को अस्पष्ट नहीं माना जाएगा यदि इसकी शर्तें सटीकता के साथ पता लगाने योग्य हैं।

एक संविदा जिसमें एक से अधिक अर्थ निर्मित होते हैं, तो इसके प्रयोग में एक से अधिक परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं, वो अनिश्चितता के लिए शून्य नहीं होगा। एक संविदा अनिश्चितता के लिए केवल तभी शून्य होगा जब इसकी आवश्यक शर्तें अनिश्चित या अधूरी हों जब तक कि अनिश्चित हिस्सा आवश्यक नहीं है, जिससे समझौते का संतुलन बरकरार रहता है। यह पता लगाने के लिए कि क्या आवश्यक है और क्या नहीं, किसी को पक्षों के इरादे को देखना चाहिए। कोई निष्कर्ष निकाला हुआ संविदा नहीं है जब एक आवश्यक या महत्वपूर्ण शर्त को स्पष्ट रूप से पक्षों के भविष्य के समझौते द्वारा तय करने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा, एक बाध्यकारी संविदा नहीं होगा जहां भाषा अस्पष्ट है और किसी भी निश्चित अर्थ में असमर्थ है।

एक समझौता जो पक्षों द्वारा या किसी तीसरे पक्ष द्वारा भविष्य में कीमत के निर्धारण के लिए प्रदान करता है, निश्चित होने में सक्षम है और धारा 29 के तहत मान्य है। इस तरह का संविदा अनिश्चितता के लिए शून्य नहीं होगा।

अनिश्चितता को हल करना

अदालतें ब्राउन बनाम गोल्ड के मामले में दिए गए किसी भी प्रावधान की अनिश्चितता के लिए एक संविदा शून्य रखने के लिए अनिच्छुक हैं। इस बात पर जोर दिया गया है कि यह हमेशा इस तरह से होना चाहिए कि मामलों को संतुलित किया जा सके कि, आवश्यक सिद्धांतों का उल्लंघन किए बिना, मनुष्य के व्यवहार को यथासंभव प्रभावी ढंग से व्यवहार किया जाए और कानून पर सौदेबाजी को नष्ट करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है।

लेकिन अदालतें दोषों की आपूर्ति करने या अस्पष्टताओं को दूर करने का कार्य नहीं करेंगी कि क्या उचित है क्योंकि यह पक्षों द्वारा संविदा को लागू करने के लिए नहीं बल्कि उनके लिए एक नया संविदा बनाने के लिए होगा।

जैसा कि लॉर्ड राइट ने स्कैममेल बनाम एस्टन  के मामले में कहा था, अदालत का उद्देश्य पक्षों के बीच न्याय करना है और यदि यह संतुष्ट है कि संविदा करने का एक निश्चित और निर्धारित इरादा था तो प्रभाव फॉर्म को देखने वाले इरादे को दिया जाएगा, न कि केवल फॉर्म को।

शर्तें लागू करना

एक संविदा जो बाध्यकारी होने का इरादा रखता है, लागू करने योग्य हो सकता है, भले ही कुछ शर्तों पर ठीक से सहमति न हो यदि शर्तों की प्रकृति को निहितार्थ (इम्प्लीकेशन) द्वारा पता लगाया जा सकता है। अदालतें व्यावसायिक समझौतों को निष्पक्ष और व्यापक रूप से मानती हैं और उस हद तक शर्तों को दर्शाती हैं जो लेनदेन को व्यावसायिक प्रभावकारिता देने के लिए आवश्यक हैं।

वाणिज्यिक समझौते

वाणिज्यिक (कमर्शियल) दस्तावेजों को कभी-कभी भाषा में व्यक्त किया जाता है जिसका स्पष्ट अर्थ नहीं होता है। यह धनराजमाल गोबिंदराम बनाम शामजी कालिदास एंड कंपनी  के मामले में देखा गया था। वाणिज्यिक संविदाों के मामले अलग-अलग हैं क्योंकि वाणिज्यिक रिवाज और प्रथा के मानक हैं जो यह तय करने में अपील करते हैं कि कौन सी शर्तें उचित हैं। व्याकरणिक (गरमाटिक्ल) रूप से अर्थहीन शब्दों को व्यापारिक अर्थों में  प्रथा किया जा सकता है और तदनुसार निर्मित किया जा सकता है। केवल यह तथ्य कि एक वाणिज्यिक संविदा की व्याख्या करना मुश्किल है, घातक नहीं है, न ही कठिनाई अस्पष्टता का पर्याय है जब तक कि कोई निश्चित अर्थ निकाला जा सकता है। एक संविदा आवश्यक रूप से अप्रभावी नहीं है क्योंकि यह एक से अधिक अर्थों के लिए खुला है यदि इच्छित अर्थ का पता लगाया जा सकता है।

रिवाज और व्यापार प्रथा

जैसा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872  के मामले में दिया गया है, संविदा के चेहरे पर स्पष्ट अस्पष्टता को रिवाज़ या व्यापार प्रथा के संदर्भ में हल किया जा सकता है। अमेरिकी कपास (कॉटन) की बिक्री और खरीद के लिए एक वाणिज्यिक संविदा अस्पष्टता या अनिश्चितता जो एक खंड के कारण था जो ‘सामान्य बल के अधीन’ था, के कारण शून्य नहीं था।

एशबर्न एंस्टाल्ट बनाम अर्नोल्ड के मामले में, एक प्रमुख स्थान पर एक दुकान को पट्टे (लीज) पर देने का एक समझौता अनिश्चित नहीं था क्योंकि यह विशेषज्ञ साक्ष्य द्वारा निर्धारित किया जा सकता है क्योंकि वाक्यांश आमतौर पर विशेष संपत्ति व्यापार में  प्रथा किया जाता है।

लेन-देन का पिछला क्रम 

लानी मिया बनाम मुहम्मद ईसिन मिया के मामले में, प्रतिज्ञापत्र (कॉवेनेंट) के नवीकरण के लिए एक संविदा जिसमें अवधि या किराए को निर्दिष्ट नहीं किया गया था, को उसी अवधि के लिए और किराए को मूल पट्टे के रूप में माना जाना चाहिए और अनिश्चितता के लिए शून्य नहीं होगा।

तर्कसंगतता

जहां लेन-देन करने का इरादा स्पष्ट है, जो खरीदने और बेचने का इरादा है, शर्तों को उचित मानक द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। इसे कानून द्वारा अधिनियम की धारा 46 के रूप में निहित किया जा सकता है। जब माल को किसी कीमत का नाम दिए बिना बेचा जाता है, तो समझौते को उचित मूल्य के देय के लिए समझा जाता है। जहां सेवा के संविदा में पारिश्रमिक  (रेमनेरशन) नियोक्ता द्वारा तय किया जाना था, संविदा लागू करने योग्य था और दर क्या उचित है के आधार पर तय की गई थी। लेकिन मोटर वैन की खरीद के लिए दो साल की अवधि में किराए की खरीद शर्तों पर आंशिक रूप से भुगतान करने की शर्त को स्कैममेल बनाम एस्टटन के मामले में एक बाध्यकारी संविदा का गठन करने के लिए अनिश्चित रूप से बहुत अस्पष्ट माना गया था, यह माना गया था कि जहां एक संविदा सेवा में पारिश्रमिक नियोक्ता द्वारा तय किया जाना था, संविदा लागू करने योग्य था, और दर क्या उचित है के आधार पर तय की गई थी।

निष्पादित प्रदर्शन 

दायित्वों को बनाने के लिए आवश्यक निश्चितता की डिग्री इस बात के अनुसार भिन्न होती है कि क्या लेनदेन पूरी तरह से निष्पादक (एक्सेक्यूटरी) रहता है या पक्ष का गठन किया गया है या उस पर कार्रवाई की गई है। चाहे कथित समझौते को पूरी तरह से या आंशिक रूप से निष्पादित किया गया हो जो किसी भी पक्ष द्वारा किया जाता है, प्रदर्शन के निष्पादित होने के तथ्य से ही यह निष्कर्ष निकल सकता है कि समझौता बाध्यकारी है जैसा कि हार्ट बनाम हार्ट के मामले में कहा गया था।

उदाहरण के लिए कई वाणिज्यिक संविदाों के मामले में दो पक्ष प्रदर्शन पर टिप्पणी करने के बाद एक-दूसरे को जवाबी – प्रस्ताव (काउंटर ऑफ़र) भेजना जारी रखते हैं। एक न्यायालय यह निर्णय ले सकता है कि निम्नलिखित स्थानों में से एक संविदा है-

  1. चूक या असहमति के सभी क्षेत्रों को भरने के लिए प्रदान की जा रही उचित शर्तों के बारे में न्यायालय के विचार से सहमत शर्तें;
  2. न्यायालय को जो लगता है उस पर बनाया जा रहा संपूर्ण संविदा उचित है, जिन शर्तों पर पक्ष सहमत हुए हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि परिस्थितियों में क्या उचित है।

निर्धारण के लिए तंत्र 

एक संविदा अस्पष्ट नहीं होगा यदि यह एक शर्त का पता लगाने के लिए तंत्र प्रदान करता है। दमोधर तुकाराम मंगलमूर्तिऔर बनाम बॉम्बे राज्य के मामले में, नवीकरण खंड (रिन्यूअल क्लॉज़) में एक प्रावधान शामिल था जिसमें कहा गया था कि “इस तरह के निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रवर्तन (इक्वीटाब्ले एनफोर्समेंट) जैसा कि पट्टेदार (लेस्सर) निर्धारित करेगा के अधीन है”। खंड को अस्पष्ट या अनिश्चित नहीं ठहराया गया था। टैलबोट बनाम टैलबोट के मामले में, वसीयत में लाभार्थियों को उन खेतों को खरीदने का विकल्प देने का प्रावधान लागू करने योग्य था, जिनमें वे उचित मूल्यांकन पर रहते हैं।

हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय ने हॉल बनाम बुस्ट में बहुमत से कहा कि मूल्यह्रास (डेप्रिसिएशन) को शामिल करने के लिए उचित शब्द अनिश्चित है और इसलिए लागू करने योग्य नहीं हैं। मिल्नेस बनाम गेरी में, उचित मूल्यांकन पर बेचने का एक समझौता भी अनिश्चित माना गया था।

अनिश्चित भाग का विच्छेद

जहां सभी महत्वपूर्ण शर्तों पर सहमति है, अदालत इस आधार पर एक सहायक शर्त की उपेक्षा कर सकती है कि यह अर्थहीन है जैसा कि निकोलीन लिमिटेड बनाम सिममंड्स में कहा गया था। लेकिन इस नियम को एक प्रमुख शर्त, जो किंग्सले एंड कीथ, लिमिटेड बनाम ग्लिन ब्रदर्स (केमिकल्स), लिमिटेड में देखा गया था, या युद्ध खंड (वार क्लॉस) के अधीन या अप्रत्याशित परिस्थितियों (फ़ोर्स मेजोर कंडीशंस) को मजबूर करने के लिए, या सहमत होने वाली शर्तों पर एक विकल्प, पर लागू नहीं किया जा सकता है।

समझौते जिन्हें निश्चित निर्धारित किया गया था

एस.आर. वरदराजा रेडडियार बनाम फ्रांसिस जेवियर जोसेफ पेरियारिया के मामले में, यह माना गया था कि जहां दोनों पक्ष समझौते के तहत बताई जाने वाली संपत्ति की पहचान से पूरी तरह अवगत थे, समझौता केवल इसलिए अनिश्चित नहीं होगा क्योंकि समझौते में सटीक सीमाओं, सर्वेक्षण संख्या (सर्वे नंबर) या स्थान का उल्लेख नहीं किया गया था, अगर संपत्ति की पहचान उचित रूप से पता लगाई जा सकती है। मिठू खान बनाम पिपरिया वाली मामले में, भूमि के नाम के साथ भूमि की बिक्री के लिए एक समझौता, लेकिन इसके सर्वेक्षण संख्या के बिना या उसके पास अनिश्चितता के लिए शून्य नहीं था।

दौलत राम राला राम बनाम पंजाब राज्य के मामले में, मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) समझौते में एक खंड जो विवाद को अधीक्षण अभियंता (सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर) को संदर्भित करता है, केवल इसलिए अस्पष्ट नहीं है क्योंकि संदर्भ कुछ समय के लिए पद धारण करने वाले अधिकारी के लिए है। अनुमानित शब्द का  प्रथा एक संविदा को अस्पष्ट नहीं बनाता है क्योंकि इसका मतलब है कि पैसे के मामले में पूर्णांक करना, एक पूर्णांक में आंकड़े के लिए कुछ पाउंड (एडवर्ड्स बनाम स्काईवेज)। न ही पुनर्संवहन (इंडिस्पेंसिबल) के लिए खरीद मूल्य और निष्पादन की लागत के अलावा अन्य आवश्यक और अपरिहार्य खर्चों का भुगतान किया जाना था। एक संविदा केवल इसलिए अनिश्चित नहीं है क्योंकि प्रदर्शन के लिए समय या वितरण की शर्तें, खरीदी जाने वाली वस्तुओं की अधिकतम मात्रा निर्दिष्ट नहीं है।

समझौते जिन्हें अनिश्चित और अस्पष्ट निर्धारित किया गया था

देवजीत बनाम पीताम्बर के मामले में, जहां प्रतिवादियों ने खुद को एक निश्चित स्थान के निवासियों के रूप में बताते हुए, एक बॉन्ड निष्पादित किया और “हमारी संपत्ति, सभी अधिकारों और हितों के साथ” राशि के लिए सुरक्षा के रूप में दृष्टिबंधन किया, दृष्टिबंधन को इतना अनिश्चित ठहराया गया कि उस पर कार्रवाई नहीं की जा सकती थी। केवल यह तथ्य कि प्रतिवादियों ने बॉन्ड में खुद को एक निश्चित स्थान के निवासियों के रूप में वर्णित किया था, उस स्थान पर अपनी संपत्ति को उस संपत्ति के रूप में इंगित करने के लिए पर्याप्त नहीं था जिसे दृष्टिबंधन किया गया था। यदि उन्होंने खुद को कुछ संपत्ति के मालिकों के रूप में वर्णित किया था, तो अनिश्चित अभिव्यक्ति को विवरण में संदर्भित करना उचित होगा।

यह सुझाव दिया गया है कि एक समझौता लागू करने के लिए बहुत अनिश्चित है यदि प्रदर्शन के लिए समय की कोई सीमा व्यक्त नहीं की जाती है या मामले की प्रकृति से अनुमान नही लगाया जा सकता है। यह एक सामान्य प्रस्ताव के रूप में स्वीकार्य नहीं लगता है। एक निश्चित तारीख को या उससे पहले एक निर्दिष्ट राशि का भुगतान करने का वादा करने वाले बैंक के पक्ष में एक दस्तावेज और हर अगले महीने एक समान राशि को वचन पत्र के रूप में नहीं माना जा सकता है (कार्टर बनाम आगरा बचत बैंक लिमिटेड), क्योंकि इसमें उस अवधि को निर्दिष्ट नहीं किया गया था जिसके लिए इसे बना रहना था और कितनी राशि का भुगतान किया जाना था। किसी पक्ष द्वारा दिया गया वचन कि जब तक माल प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक चेक का भुगतान लागू नहीं किया जाएगा, अनिश्चितता के आधार पर शून्य है क्योंकि माल प्राप्त होने की अवधि निर्धारित नहीं की जाती है।

अचल संपत्ति को बेचने के लिए एक समझौते के मामले में, यदि संपत्ति की निश्चितता के साथ पहचान नहीं की जा सकती है और देय मूल्य के संबंध में पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं है, तो फ्लैटों के संभावित खरीदारों और बिल्डरों के बीच कोई निष्कर्ष निकाला हुआ संविदा नहीं हो सकता है।

निष्कर्ष

जिन समझौतों का उद्देश्य या अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किए जाने के लिए अक्षम हैं, वे प्रकृति में शून्य हैं। एक समझौता अनिश्चित हो सकता है क्योंकि इसमें अस्पष्ट या अनिश्चित शर्तें हैं या क्योंकि यह अपर्याप्त है। सामान्य नियम यह है कि यदि किसी समझौते की शर्तें अनिश्चित हैं, जिसे पक्षों के इरादे की उचित निश्चितता के साथ निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो कानून संविदा को लागू नहीं करता है।

संदर्भ

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  • (1875) ILR 1 All 275

 

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