होमAbrogation of Article 370 : a socio-legal conundrumअनुच्छेद 370 को निरस्त करना: एक सामाजिक-कानूनी पहेली

अनुच्छेद 370 को निरस्त करना: एक सामाजिक-कानूनी पहेली

अनुच्छेद 370 को निरस्त करना: एक सामाजिक-कानूनी पहेली

यह लेख लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रेजोल्यूशन में डिप्लोमा कर रहे Naman Verma द्वारा लिखा गया है और Shashwat Kaushik द्वारा संपादित किया गया है। इस लेख में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

परिचय

जम्मू-कश्मीर राज्य की संवैधानिक स्थिति में बदलाव करके उसे पुनर्गठित करने के भारत सरकार के फैसले ने आलोचना और मूल्यांकन दोनों को समान रूप से आमंत्रित किया। आलोचना मुख्य रूप से ऐसा करने की संवैधानिकता और उसके बाद के परिणामों के आधार पर थी, और मूल्यांकन इस आधार पर था कि एक कथित ऐतिहासिक गलती को सुधारा गया था।

न तो बहुसंख्यकवादी या लोकप्रिय दृष्टिकोण से संबंधित और न ही इसकी आलोचना से, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की संवैधानिक वैधता और यहां तक ​​कि विधेयक (बिल) को पेश करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को पूरी तरह से कानूनी आधार पर आंकने की जरूरत है। हालाँकि कई साल हो गए हैं और सर्वोच्च न्यायालय अभी तक अपने फैसले पर नहीं आया है। इस बीच, बड़े पैमाने पर समाज, कानूनी उलझनों से अनभिज्ञ होने के कारण, अपनी प्रवृत्ति को नैतिक और राष्ट्रवादी आधार पर आधारित करता है। ऐसे पहलुओं को किसी की राय में शामिल करना गलत नहीं होगा, लेकिन इसे कायम रखने के लिए निश्चित रूप से तर्कसंगत आधार की आवश्यकता होती है। जबकि कुछ अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या और कैसे, उनमें से अधिकांश के लिए धूल जम चुकी है। चूँकि इस मामले पर अभी भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय लिया जाना है, कानूनी बिरादरी इसकी संवैधानिकता को लेकर उत्सुक बनी हुई है।

भले ही यह संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं, इसका एक महत्वपूर्ण पहलू वह परिणाम था जिसका जम्मू और कश्मीर के लोगों को सामना करना पड़ा, जिसने नागरिक राज्य संबंधों और शासन से संबंधित कुछ गंभीर सवाल उठाए। अचानक और कठोर कदम की अंतरराष्ट्रीय जांच और आलोचना भी हुई और भारत इसे एक आंतरिक मामला होने के तर्क पर वापस लौट आया, और यह सही भी है। हालाँकि, हमें यह समझना चाहिए कि प्रक्रिया की वैधता पर अलग-अलग विचार और राय हो सकती हैं, लेकिन जिस तरीके से इसे लागू किया गया और इस प्रक्रिया के दौरान जो अधिकार कम किए गए, उन्हें भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

ऐतिहासिक पूर्वनिरीक्षण (रेट्रोस्पेक्शन)

माउंटबेटन योजना को अंतिम रूप देते हुए, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 लागू किया गया, जिसमें दो स्वतंत्र प्रभुत्वों, यानी, भारत और पाकिस्तान के विचार को शामिल किया गया, जहां अन्य रियासतें जो सीधे ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अंतर्गत नहीं आती थीं, उन्हें स्वतंत्र रहने या दोनों प्रभुत्वों में से किसी एक में शामिल होने का विकल्प दिया गया। कई अन्य रियासतों की तरह, जम्मू और कश्मीर भी तब भारत में शामिल हो गया जब राजा हरि सिंह ने, दो प्रभुत्वों के बीच उतार-चढ़ाव के बाद, अंततः 27 अक्टूबर, 1947 को विलय (एक्सेशन) के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।

हालाँकि, जम्मू और कश्मीर को बलपूर्वक हासिल करने में पाकिस्तानी सैनिकों की भागीदारी के कारण, इसके परिणामस्वरूप एक युद्ध हुआ जो तभी समाप्त हुआ जब संयुक्त राष्ट्र ने 1 जनवरी, 1949 को हस्ताक्षरित एक प्रस्ताव के माध्यम से हस्तक्षेप किया। इसने यथास्थिति बनाए रखने के लिए युद्धविराम की मांग की। इसके अलावा, इसने लोगों की इच्छा जानने के लिए जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का मार्ग प्रशस्त किया, जो संभव लग रहा था। हालाँकि, चूँकि पाकिस्तान ने अपनी पहली शर्त कभी पूरी नहीं की, जिसके तहत उसे पाकिस्तान अधिकृत (ऑक्यूपाईड) कश्मीर क्षेत्र से सेना वापस बुलानी पड़ी, इसलिए अन्य शर्तों को पूरा करना संभव नहीं था।

इसे एक चेतावनी के रूप में मानते हुए, 1954 में भारत ने जनमत संग्रह का विचार छोड़ दिया, और भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू और जम्मू-कश्मीर के प्रधान मंत्री, शेख अब्दुल्ला के बीच बातचीत के माध्यम से, संविधान (जम्मू और कश्मीर में लागू होने के लिए) आदेश, 1954, को लागू किया गया, जिसे संविधान के अनुच्छेद 370(1) के अनुसार बनाया गया था। इसका परिणाम यह हुआ कि इसने भारतीय संविधान में अनुच्छेद 35-A जोड़ा, जिसमें राज्य में स्थायी निवास के प्रावधानों का वर्णन करने के अलावा, ऐसे निवासियों के लिए कुछ विशेष विशेषाधिकारों की भी बात की गई।

दोनों देशों के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ और पूर्वी पाकिस्तान के संबंध में 1971 के युद्ध और 1999 में कारगिल जैसी घटनाओं के बाद द्विपक्षीय समझौतों, अर्थात् 1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणापत्र, दोनों को 1948 के संयुक्त राष्ट्र के संघर्ष विराम विनियमन के अंदर बरकरार रखा गया। और तब से, उग्रवाद (मिलिटेंसी) में वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर सशस्त्र विद्रोह होते हैं।

संवैधानिक वैधता की पहेली

19 अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य को दिया गया विशेष दर्जा हटाते हुए संविधान में एक संशोधन लाया। जिस तरह से इस संशोधन की मांग की गई थी, उस पर तब से सवाल उठ रहे हैं। संशोधन ने न केवल अनुच्छेद 35-A को ख़त्म कर दिया बल्कि अनुच्छेद 370 के प्रभाव को भी पूरी तरह से ख़त्म कर दिया।

इसकी शुरुआत राज्यसभा द्वारा संविधान के असंशोधित अनुच्छेद 370(1)(d) के अनुसार संविधान (जम्मू और कश्मीर में लागू होने के लिए) आदेश 2019 लाने से हुई, जिसमें प्रावधान किया गया था कि संविधान के अन्य प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे, जिसे राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्दिष्ट कर सकते हैं। हालाँकि, इसमें ऐसा आदेश राज्य सरकार की सहमति से होने का प्रावधान है, जिसका प्रावधान उक्त अधिसूचना में किया गया है।

आदेश प्रदान करता है: सबसे पहले, ‘जम्मू और कश्मीर सरकार की सहमति से, समय-समय पर संशोधित संविधान के सभी प्रावधान, जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में लागू होंगे।’ दूसरे, चूंकि सरकार अन्य प्रावधानों को निरस्त करने के लिए अनुच्छेद 370(3) पर भरोसा नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने अनुच्छेद 370(1) के तहत शक्तियों का उपयोग करके अनुच्छेद 367, जो कि व्याख्या खंड है, में संशोधन करने की मांग की। इस प्रकार किए गए संशोधन ने अनुच्छेद 370 में “राज्य सरकार [जम्मू और कश्मीर]” वाक्यांश को बदलकर “जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल” कर दिया। तीसरा, अनुच्छेद 370(3) में “संविधान सभा” शब्द को बदलकर “राज्य की विधान सभा” कर दिया गया। यह आदेश 1954 के पिछले राष्ट्रपति आदेश का स्थान लेता है, इसलिए अनुच्छेद 35-A को भी निरस्त करता है।

अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से रद्द करने या खत्म करने की दिशा में एक और बड़ा कदम तब था जब अनुच्छेद 370 (3) के माध्यम से राष्ट्रपति को दी गई शक्तियों का प्रयोग करके उच्च सदन में एक वैधानिक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें प्रावधान किया गया था कि अनुच्छेद 370 के सभी खंड, खंड (1) को छोड़कर, लागू नहीं होंगे। और अंततः, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 संसद द्वारा पेश और पारित किया गया, जिसने अंततः जम्मू और कश्मीर राज्य को क्रमशः दो केंद्र शासित प्रदेशों कश्मीर और लद्दाख में पुनर्गठित किया।

एक व्याख्यात्मक नोट पर, राष्ट्रपति के आदेश सी.ओ. 272 ने अनुच्छेद 367 में संशोधन करने के लिए अनुच्छेद 370(1) का उपयोग किया, जिसने अनुच्छेद 370(3) में संशोधन किया, जो “संविधान सभा” शब्द का स्थान लेता है। यह वह संशोधन है जिसने वैधानिक संकल्प को जन्म दिया जिसके द्वारा राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान से अनुच्छेद 370 को हटा दिया। जो लोग यह कह रहे हैं कि यह संवैधानिक रूप से वैध नहीं है, उनका प्रस्ताव है कि अनुच्छेद 370(1)(c) इसे पेटेंट कराता है कि “अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद (370) के प्रावधान उस राज्य के संबंध में लागू होते हैं,” जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति के पास संशोधन करने की शक्ति है। जम्मू और कश्मीर से संबंधित प्रावधान अनुच्छेद 1 और अनुच्छेद 370 तक विस्तारित नहीं हैं। इसके अलावा, चूंकि अनुच्छेद 3 के प्रावधान में राष्ट्रपति को अपनी स्थिति में बदलाव करने से पहले राज्य विधायिका से परामर्श करने की आवश्यकता है, इसलिए यह तर्क दिया गया है कि चूंकि राज्य 2019 की शुरुआत से राष्ट्रपति शासन के अधीन है, इसलिए वास्तव में यह राज्य के बजाय राज्यपाल की सहमति थी। विधान सभा, और राज्यपाल को राज्य में केंद्र का प्रतिनिधि माना जाता है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार ने संशोधन के साथ आगे बढ़ने के लिए अपनी सहमति दी।

लोगों के संवैधानिक अधिकारों पर संशोधन का प्रभाव

जब से संशोधन को लागू किया गया है, सरकार ने संविधान द्वारा लोगों को दिए गए अधिकारों पर कई तरह की रोक लगा दी है। एक, सरकार ने जम्मू-कश्मीर में प्रमुख राजनीतिक नेताओं को घर में नजरबंद करने में संकोच नहीं किया, जिससे आंदोलन की स्वतंत्रता प्रतिबंधित हो गई। इसके अलावा, राज्य में इंटरनेट सेवाओं और संचार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, और बहुत बाद में, सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद, उन्हें बहाल किया गया था। अत: इस प्रक्रिया में प्रेस की स्वतंत्रता भी छीन ली गई थी। दूसरा, सरकार ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973) की धारा 144 लगा दी, जिससे राज्य में लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सभी कार्यालय, सार्वजनिक समारोह, स्कूल आदि बंद कर दिये गये।

तो, एक तरह से, संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत गारंटीकृत सभी स्वतंत्रताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा और उचित प्रतिबंधों की आड़ में समाप्त कर दिया गया। इस तरह के प्रतिबंध उचित थे या नहीं, यह निश्चित रूप से कुछ लोगों के लिए बहस का विषय हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जब कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध थे, तो एक ही बार में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बजाय, भारत के संविधान के अन्य प्रावधानों को लागू किया जा सकता था, और इसे धीरे-धीरे लागू किए जाए जैसा कि अतीत में किया जाता रहा है। साथ ही, इंटरनेट की पहुंच के अधिकार को अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में रखा गया है। मिनर्वा मिल्स लिमिटेड और अन्य बनाम भारत संघ  और अन्य (1980), में यह माना गया है कि मौलिक अधिकारों को असामान्य परिस्थितियों में निलंबित किया जा सकता है, और ऐसा निलंबन मानव स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

यह वास्तव में समय की मांग थी कि जम्मू-कश्मीर को शेष भारत के लिए अधिक सुलभ बनाने के लिए अनुच्छेद 35-A में बदलाव किया जाना चाहिए था, लेकिन इसे और अधिक रचनात्मक बनाने के लिए, मजाकिया संशोधन करने के बजाय कानून में कमियां ढूंढकर एक संगठित रणनीति अपनाई जा सकती थी। एक कल्याणकारी राज्य का अपने नागरिकों के प्रति उनके अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व है और उसे अपने नागरिकों की कीमत पर केवल अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अनुचित उपायों का सहारा नहीं लेना चाहिए।

निष्कर्ष

संविधान में भारत को राज्यों का संघ बताया गया है। संविधान निर्माताओं ने ‘संघ’ शब्द का प्रयोग करने से परहेज किया। ‘संघ’ शब्द को प्राथमिकता दी गई क्योंकि इससे इस विचार को बल मिला कि भारत का संघ पुराने प्रांतों के बीच हुए समझौते का परिणाम नहीं है, इसका परिणाम यह हुआ कि उनके लिए अपनी इच्छा से संघ से अलग होना संभव नहीं था।

हालाँकि, यह कहना गलत होगा कि विलय पत्र पर हस्ताक्षर करना वास्तव में स्वतंत्र रियासतों को दिया गया एक स्वतंत्र विकल्प था। यद्यपि यह विचार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, की धारा 7(1)(c) में निहित है, जिसमें रियासतों को शर्तों के साथ दोनों में से किसी एक उपनिवेश में शामिल होने का प्रावधान है, लेकिन जब यह वास्तव में लागू हुआ, तो दोनों उपनिवेशों ने इन स्वतंत्र राज्यों पर राजनीतिक प्रभाव या बल प्रयोग करने से परहेज नहीं किया। ऐसे कई उदाहरणों में, जूनागढ़ रियासत ने पाकिस्तान के पक्ष में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। जब भारत को एहसास हुआ कि राज्य एक हिंदू बहुसंख्यक राज्य है और पाकिस्तान में शामिल होने से सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा तो उसने जूनागढ़ पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया। ऐसी ही एक और घटना हैदराबाद में हुई थी, जहां हैदराबाद के निज़ाम और भारत सरकार ने राज्य को चुनने के लिए कुछ समय देने के लिए एक वर्ष के लिए स्टैंडस्टिल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते की सीमा अवधि समाप्त होने से पहले ही, भारत ने राज्य का अधिग्रहण करने के लिए अपनी सेनाएँ भेज दीं।

इसी प्रकार, ऐसी कोई राष्ट्रवादी विचारधारा नहीं थी जो किसी भी पक्ष में शामिल होने के लिए राज्यों की पसंद को निर्धारित करती हो। प्रत्येक राज्य ने एक पक्ष चुनने से पहले अपने लाभ और हानि को तौला। उदाहरण के लिए, शुरुआत में जोधपुर का झुकाव बेहतर बदले की भावना के तहत पाकिस्तान में शामिल होने की ओर था। यह तभी हुआ जब भारत द्वारा बेहतर शर्तें प्रदान की गईं कि राज्य भारत के प्रभुत्व में शामिल होने के लिए सहमत हुआ। इसी तरह, भोपाल और त्रावणकोर स्वतंत्र रहना चाहते थे और दोनों देशों में से किसी में भी शामिल नहीं होना चाहते थे, लेकिन केवल ढुलमुल परिस्थितियों और समझौते की बेहतर शर्तों के कारण उन्होंने एक पक्ष चुनने का फैसला किया। इसलिए, ऐसे निर्णयों का चुनाव स्पष्ट रूप से अनुग्रह राशि नहीं था। यह वही था, जिसे आज के समय में हम अनुबंध कहते हैं। कश्मीर में भी ऐसी ही स्थिति थी, जहां एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे और अनुबंध रद्द करने के संदर्भ में अनुबंध कानून का मूल सिद्धांत यह प्रदान करता था कि समझौते के किसी भी उल्लंघन के मामले में, पक्षों को उनकी मूल स्थिति में बहाल किया जाएगा जैसे कि ऐसा कोई अनुबंध कभी हस्ताक्षरित नहीं हुआ था। क्या इसका मतलब यह होगा कि यदि संशोधन माननीय सर्वोच्च न्यायालय की नजर में अनुबंध का उल्लंघन है, तो कश्मीर की स्थिति को उसके नए राज्य, यानी, जम्मू और कश्मीर के स्वतंत्र राज्य में बहाल कर दिया जाएगा?

विचारणीय मुद्दा यह है कि यदि, मौलिक रूप से, सब कुछ दो स्वतंत्र क्षेत्रों के बीच एक अनुबंध के रूप में शुरू किया गया है, परिग्रहण का साधन दो राज्यों के बीच एक संधि है, तो क्या इसके उल्लंघन से कुछ ऐसा हो सकता है जिसके लिए हममें से अधिकांश तैयार नहीं हैं? इसलिए, यदि यह संवैधानिक रूप से अमान्य साबित हुआ, तो क्या माननीय न्यायालय अनुबंध की स्थिति पर निर्णय लेने के लिए आगे बढ़ेगा? लेकिन फिर, यह राष्ट्रवादी कैसे होगा? जो भी हो, लोगों की दुर्दशा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और पृथ्वी पर भूमि के एक टुकड़े की स्थिति के बावजूद, यह बुनियादी मानवाधिकार है जो सबसे ऊपर है। इस संशोधन ने जम्मू-कश्मीर में लोगों के जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है, और यदि क्षेत्रीय पहलू को दुनिया द्वारा अपनाई जाने वाली राजनीतिक चालों के साथ अलग रख दिया जाए, तो कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं कि वहां के जीवन की प्रकृति को बहाल किया जा सके, ताकि प्रभावित लोग और उन्हें इस झगड़े के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करें।

संदर्भ

  • Ministry of Law and Justice, The Constitution (Application to Jammu and Kashmir) Order, 2019, C.O. 272 (Notified on August 5, 2019)

 

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