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जनहित याचिका

जनहित याचिका

यह लेख जनहित याचिका के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय 

अंग्रेज़ी में जनहित याचिका को पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन कहते है इस शब्द को अमेरिकी न्यायशास्त्र से उधार लिया गया है, जहां इसे गरीबों, नस्लीय अल्पसंख्यकों, असंगठित उपभोक्ताओं, नागरिकों जैसे पहले से अप्रतिनिधित्व वाले समूहों को कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जो पर्यावरण के मुद्दों के बारे में भावुक थे, आदि।

पीआईएल ने हमारी कानूनी प्रणाली में बहुत महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है। इस शब्द को किसी भी क़ानून के तहत स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। अर्थ विभिन्न निर्णयों से विकसित हुआ है। इसका सीधासा अर्थ है कि कोई भी सार्वजनिक उत्साही व्यक्ति याचिका दायर करके सार्वजनिक कारण या सार्वजनिक हित या सार्वजनिक कल्याण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। इस संदर्भ में अक्सर यह सवाल उठता है कि “जन हित” के रूप में क्या माना जा सकता है? जाहिर है, “जनता के लाभ के लिए कोई भी कार्य जन हित में है।

भारत में, पहली जनहित याचिका वर्ष 1976 मुंबई कामगार सभा बनाम मेसर्स अब्दुलभाई फैजुल्लाभाई और अन्य [1976 (3) एससीसी 832] के मामले में दायर की गई थी। जनहित याचिका का बीज न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने इस ऐतिहासिक फैसले के माध्यम से बोया था। इसके बाद, न्यायमूर्ति भगवती के प्रयासों से, पीआईएल की अवधारणा काफी हद तक प्रस्तुत और विकसित हुई है। उन्हें वास्तव में भारत में पीआईएल के चैंपियन के रूप में जाना जाता है।

दूसरी ऐतिहासिक जनहित याचिका कैदियों के अधिकारों के लिए हुसैनारा खातून एवं अन्य बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य के मामले में दायर की गई थी। कई लोगों ने इस मामले को भारत में पहली जनहित याचिका के रूप में भी माना है। इस मामले में अदालत का ध्यान बिहार में विचाराधीन कैदियों जिन पर आरोप लगाए गए अपराधों के लिए अधिकतम सजा से कहीं अधिक समय तक मुकदमा लंबित रहने तक हिरासत में रखा गया था, की अविश्वसनीय स्थिति की ओर आकर्षित किया गया था। अदालत ने न केवल त्वरित सुनवाई के अधिकार को मामले का केंद्रीय मुद्दा बनाया, बल्कि लगभग 40,000 विचाराधीन कैदियों की सामान्य रिहाई का आदेश पारित किया, जो इतनी अधिकतम अवधि से अधिक हिरासत में थे।

जनहित याचिका क्या है?

जनहित याचिका सामान्य मुकदमेबाजी से अलग है। इसमें एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति के खिलाफ अधिकारों का प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) शामिल नहीं है। बल्कि, इस प्रकार का मुकदमा समाज के वंचित वर्गों को न्याय प्रदान करने के लिए दायर किया जाता है। यह एक सहयोगी प्रयास है जिसमें याचिकाकर्ता, अदालत और सरकार शामिल हैं। यह देखना सराहनीय है कि अदालतों ने सार्वजनिक उत्साही व्यक्तियों और यहां तक कि गैर सरकारी संगठनों को उन लोगों की ओर से याचिका दायर करने की अनुमति देने के लिए सभी संभव उपाय किए हैं जो अदालत से संपर्क नहीं कर सकते हैं।

भारत में एक बहुत ही प्रमुख जनहित याचिका कार्यकर्ता श्री एमसी मेहता हैं जो पेशे से एक वकील और पसंद से एक प्रतिबद्ध पर्यावरणविद् (कमिटेड एनवायरोएंटेलिस्ट) है। उनके द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं से ऐसा लगता है कि जीवन में उनका मिशन पर्यावरण की रक्षा करना था। उन्होंने अकेले ही पर्यावरण अपराधियों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय से लगभग 40 ऐतिहासिक फैसले और कई आदेश प्राप्त किए हैं। उनके द्वारा दायर जनहित याचिकाओं से उत्पन्न कुछ ऐतिहासिक निर्णय इस प्रकार हैं:

कुछ महत्त्वपूर्ण मामलो के नाम है।

सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं में विभिन्न आदेशों और निर्णयों को पारित करके न्यायिक सक्रियता (जुडिशल एक्टिविज्म) का प्रदर्शन किया है। “न्यायिक सक्रियता” शब्द अनिश्चित कानूनों या किसी दिए गए बिंदु पर किसी भी कानून की अनुपस्थिति की स्थिति में परस्पर विरोधी प्रश्नों को निपटाने के लिए एक नया नियम तैयार करके पीड़ित व्यक्ति के लिए एक उचित उपाय खोजने के लिए अदालतों की चिंता को दर्शाता है।

जनहित याचिका कैसे दायर करें

भारत में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों में जनहित याचिका दायर की जा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न कदम उठाए हैं जिससे जनहित याचिका को बढ़ावा मिला है। अन्य सामान्य याचिकाओं को दायर करने की तुलना में प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं बहुत आसान और शिथिल हैं। यहां तक कि जनहित में काम करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को संबोधित पत्र, पोस्ट कार्ड, समाचार पत्र की रिपोर्ट या ईमेल को भी याचिका के रूप में स्वीकार किया गया है। किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह  जो गरीबी, विकलांगता, सामाजिक पिछड़ेपन और इसी तरह अन्य कारण के कारण सीधे अदालत से संपर्क नहीं कर सकते है, के खिलाफ कानूनी चोट की शिकायत करने वाली अदालत द्वारा प्राप्त कोई भी सरल जानकारी, को जनहित याचिका के रूप में माना जा सकता है। अदालतें समझती हैं कि ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति से खर्च करने और सामान्य मुकदमेबाजी के माध्यम से अदालत का दरवाजा खटखटाने की उम्मीद करना अनुचित होगा।

डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में एक ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने एक पत्र याचिका पर कार्रवाई की, जिसने पश्चिम बंगाल में हिरासत में मौतों की बार-बार होने वाली घटनाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। अदालत ने आगे कहा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के एक रिश्तेदार को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए। यह स्पष्ट किया गया कि इस निर्देश का पालन करने में विफलता अदालत की अवमानना (कंटेम्प्ट) के रूप में दंडनीय होगा। शुरुआती जनहित याचिकाओं में मानवाधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को अदालत द्वारा मुआवजा दिए जाने की बात कही गई थी। पत्रों के आधार पर कार्यवाही शुरू करने की इस प्रथा को अब सुव्यवस्थित किया गया है और इसे ‘एपिस्टलरी अधिकार क्षेत्र’ के रूप में वर्णित किया गया है।

साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका दायर करते समय अधिकार के नियम में ढील दी है। लोकस स्टैंडी का अर्थ होता है, किसी व्यक्ति की अदालत से संपर्क करने की क्षमता जिसका उस मामले से पर्याप्त संबंध हो। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति जिसे वास्तव में कानूनी नुकसान हुआ है, उसके पास उपाय की मांग करने के लिए अदालत से संपर्क करने की क्षमता है। हालांकि, जनहित याचिका के मामले में, कोई भी सार्वजनिक व्यक्ति, जो कानूनी नुकसान से सीधे प्रभावित नहीं हो सकता है, एक उपाय की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक बार जनहित याचिका दायर होने के बाद, इसे वापस नहीं लिया जा सकता है। अदालतें जनहित से जुड़े मामलों पर स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो कॉग्निजेंस) भी ले सकती हैं। स्वत: संज्ञान लेते हुए अदालत को किसी पक्ष के खिलाफ अपने प्रस्ताव से कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है।

हालांकि, जनहित याचिका दायर करने की प्रक्रिया एक रिट याचिका के समान है।

उच्च न्यायालय में प्रक्रिया 

यदि उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जाती है, तो याचिका की दो प्रतियां दायर करनी होती हैं। साथ ही, याचिका की एक अग्रिम (एडवांस) प्रति प्रत्येक प्रतिवादी, यानी विपरीत पक्ष को दी जानी चाहिए, और तामील (सर्विस) का यह प्रमाण याचिका पर चिपकाया जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय में प्रक्रिया 

यदि सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की जाती है, तो (4) + (1) (यानी 5) याचिका के सेट विपरीत पक्ष को दायर किए जाते हैं, प्रति केवल नोटिस जारी होने पर ही दी जाती है।

न्यायालय का शुल्क

याचिका पर प्रति प्रतिवादी 50 रुपये का न्यायालय शुल्क (यानी विपरीत पक्ष की प्रत्येक संख्या के लिए, 50 रुपये का न्यायालय शुल्क) लगाया जाना चाहिए।

जनहित याचिका की आलोचना

जनहित याचिकाएं हाल के दिनों में काफी आलोचना का विषय रही हैं। मुख्य आलोचनाओं में से एक यह है कि जनहित याचिकाओं पर विचार करके और न्यायिक सक्रियता का प्रयोग करके, अदालतें विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों को हड़पने की कोशिश कर रही हैं। न्यायमूर्ति भगवती ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ [एआईआर 1984 एससी 802]  के फैसले में यह बात कही कि उपरोक्त कार्रवाइयों को करके अदालतें केवल न्यायपालिका के संवैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता कर रही हैं और विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों को हड़प नहीं रही हैं।

एक और आलोचना लोकस स्टैंडी के सिद्धांत को कमजोर करने की है। यह तर्क दिया गया है कि इस तरह के कमजोर पड़ने से उन तुच्छ मामलों के लिए दरवाजे खुल गए हैं जो या तो वादी के निजी हितों से जुड़े हैं, या न्याय मांगने के बजाय प्रचार पाने के लिए, या अपने राजनीतिक उद्देश्यों का मंचन करने के लिए है। ऐसे मामलों में, याचिकाओं को खारिज कर दिया गया है और अदालतों द्वारा भारी जुर्माना लगाया गया है। यह भविष्य में इस तरह की जनहित याचिका दायर करने से लोगों के लिए एक निवारक के रूप में कार्य करता है।

पिछले एक साल में दायर की गई कुछ दिलचस्प जनहित याचिकाएं

  1. मई 2013: दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर कहा गया कि भारत के प्रधानमंत्री के फेसबुक पेज पर राष्ट्रीय ध्वज की विकृत तस्वीर दिखाई गई है।
  2. मई 2013: आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग घोटाले की एसआईटी जांच की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई।
  3. अप्रैल 2013: सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर सरकारी अधिकारियों को फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने की मांग की गई।
  4. मार्च 2013: सर्वोच्च न्यायालय में एक वकील ने जनहित याचिका दायर कर पोर्नोग्राफी देखने के अपराध को गैर-जमानती अपराध बनाने का आदेश देने की मांग की।
  5. फरवरी 2013: रैपर यो यो हनी सिंह के खिलाफ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में उनके विभिन्न गीतों के आपत्तिजनक और अश्लील बोल के लिए जनहित याचिका दायर की गई।
  6. अप्रैल 2012: दिल्ली उच्च न्यायालय में दो जनहित याचिकाएं दायर की गईं जिनमें केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय पर एक विशेष उम्मीदवार के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया गया, एक अन्य में तर्क दिया गया कि यूजीसी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शीर्ष नौकरियों के लिए जिन उम्मीदवारों के नाम पर विचार किया जा रहा है, वे या तो अयोग्य हैं या अक्षम हैं।
  7. अप्रैल, 2012: गुजरात उच्च न्यायालय ने पुल की सुरक्षा और रखरखाव के लिए स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की, जहां से महात्मा गांधी ने 1930 में अपना ऐतिहासिक दांडी मार्च शुरू किया था।
  8. मार्च 2012: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ में जनहित याचिका दायर कर कावेरी और कोलिडैम नदियों में सैन उत्खनन को रोकने की मांग की गई ताकि इन नदियों के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जा सके।
  9. मार्च 2012: सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल की नियुक्ति पर सवाल उठाने वाली और मुख्यमंत्री की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए राज्य लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए उन्हें हटाने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी।
  10. जनवरी, 2012: सेना प्रमुख की उम्र विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई।

निष्कर्ष

जनहित याचिका विशेष रूप से उन लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक उपकरण है जो स्वयं अदालतों में जाने में असमर्थ हैं। वे मुकदमेबाजी के सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले रूपों में से एक हैं, खासकर पर्यावरणीय मामलों में। अदालतों ने जनहित याचिकाओं से संबंधित नियमों को सरल बनाने का प्रयास किया है ताकि सार्वजनिक हित में और गरीबों, विकलांगों या वंचित वर्गों के व्यक्तियों की ओर से जनहित याचिकाएं दाखिल करने को हतोत्साहित न किया जा सके। हालाँकि, ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें लोगों ने जनहित याचिकाओं की आड़ में अपने निजी हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इस प्रकार, अदालतों को यह सुनिश्चित करने के लिए बेहद सतर्क रहना चाहिए कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग न हो।

 

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