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कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न 

कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न 

यह लेख लॉसिखो से सर्टिफिकेट कोर्स इन एडवांस्ड क्रिमिनल लिटिगेशन एंड ट्रायल एडवोकेसी कर रही Shivani Jain द्वारा लिखा गया है। यह लेख कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न के बारे में आपको जो कुछ जानने की आवश्यकता है उसके बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

आम आदमी के शब्दों में, उत्पीड़न भेदभाव के एक रूप को दर्शाता है जिसमें किसी भी अवांछित और अनिष्ट (अनलक्की) शारीरिक या मौखिक व्यवहार शामिल होता है, जो आसानी से किसी व्यक्ति को ठेस पहुँचा सकता  है या अपमानित कर सकता है। इस प्रकार के कार्यों को नैतिक और सामाजिक तर्कसंगतता के संदर्भ में उनकी असंभाव्यता के माध्यम से विशिष्ट रूप से पहचाना जाता है और यह उस व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक कल्याण दोनों को परेशान करने में सक्षम होते हैं। 

इसके अलावा, कानूनी भाषा में, ये ऐसे व्यवहार हैं जो परेशान करने वाले, धमकी देने वाले या आकुल करने वाले लगते हैं और भेदभावपूर्ण आधार से उन्नत होते हैं। इन कृत्यों का न केवल किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों का लाभ लेने से वंचित करने या निरस्त करने का प्रभाव पड़ता है, बल्कि यदि बार बार किया जाता है तो इसे बदमाशी भी कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि दोहराव की निरंतरता और एक खतरनाक, परेशान करने वाली या धमकी देने वाली प्रकृति जैसी अवधारणाएं, उत्पीड़न के कार्य को आश्चर्य या केवल अपमान से अलग करती हैं।

उत्पीड़न के सामान्य प्रकार 

उत्पीड़न के सामान्य प्रकार इस प्रकार हैं:

  1. मानसिक उत्पीड़न;
  2. शारीरिक उत्पीड़न;
  3. भेदभावपूर्ण उत्पीड़न;
  4. यौन उत्पीड़न;
  5. जाति, नस्ल, लिंग या धर्म के आधार पर उत्पीड़न;
  6. भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न;
  7. साइबरबुलिंग या ऑनलाइन उत्पीड़न।

इस लेख में, हम कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न से संबंधित धारणा से निपटेंगे।

मानसिक उत्पीड़न किसे कहा जा सकता है?

मानसिक उत्पीड़न शब्द को भारतीय कानूनों के तहत कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एल नागराजू बनाम सिंडिकेट बैंक और अन्य मामले में माननीय आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मानसिक उत्पीड़न शब्द की व्याख्या की और “तटीय दक्षिण भारत में एक अनुभागीय अध्ययन अध्ययन” लेख में “इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन” (निवारक और सामाजिक चिकित्सा का आधिकारिक प्रकाशन) को उद्धृत किया, जिसमें “कार्यस्थल उत्पीड़न” को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया गया था, अतः

“उत्पीड़न कोई भी अनुचित और अवांछित आचरण है जिसे यथोचित रूप से किसी अन्य व्यक्ति के लिए अपराध या अपमान का कारण माना जा सकता है। उत्पीड़न शब्दों, इशारों या कार्यों का रूप ले सकता है जो परेशान करने वाले होते हैं, भय-संकेत करते हैं, दुर्व्यवहार करते हैं, नीचा दिखाते हैं, डराते हैं, अनादर करते  दिखाते हैं, अपमानित करते हैं या दूसरे को शर्मिंदा करते हैं या जो एक भयभीत, शत्रुतापूर्ण या आक्रामक कार्य वातावरण बनाते हैं।”

इसके अलावा, माननीय आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आगे कहा कि, “अंत में, हम इस प्रकार कार्यस्थल उत्पीड़न को निम्नानुसार बता सकते हैं या परिभाषित कर सकते हैं: कार्यस्थल उत्पीड़न नियोक्ता या उसकी ओर से किसी भी कर्मचारी के प्रति किसी भी प्रकार की अवांछित कार्रवाई है जो सौंपे गए कार्यों को करने में कठिनाई का कारण बनता है या कर्मचारी को यह महसूस करने का कारण बनता है कि वह शत्रुतापूर्ण वातावरण में काम कर रहा है। उत्पीड़न जाति, लिंग, संस्कृति, आयु, यौन अभिविन्यास (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) या धार्मिक वरीयता (परेफरेंस) जैसे कारकों पर आधारित हो सकता है।”

एक सामान्य अर्थ में, कार्यस्थल उत्पीड़न के रूप में एक कार्य का गठन करने के लिए, कई पहलू मौजूद होने चाहिए। एक अधिनियम में उपस्थित होने के लिए आवश्यक पहलुओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है: 

  1. सबसे पहले, आचरण को कर्मचारी के लिए अवांछित और आपत्तिजनक और आक्रामक होना चाहिए; 
  2. दूसरा, उक्त कर्मचारी ने व्यवहार पर आपत्ति के रूप में अपनी आवाज उठाई होगी;
  3. तीसरा, कर्मचारी को अपमानजनक व्यक्ति या व्यक्तियों को अपने कार्यस्थल व्यवहार को संशोधित करने की अनुमति देनी चाहिए;
  4. अंत में, उक्त आचरण या किया गया कार्य ऐसी प्रकृति का होना चाहिए जो कर्मचारी की अपने कर्तव्यों को कुशल, प्रभावोत्पादक और जिम्मेदार तरीके से पूरा करने की क्षमता पर प्रभाव डालता हो।

कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न का कानूनी विश्लेषण

कुछ अधिकार एक इंसान से अविच्छेद्य (इनेलिएनेबल) और निर्विवाद दोनों हैं और उन्हें जन्म से गारंटी दी जाती है। इन अधिकारों को मानव अधिकार के रूप में जाना जाता है। मानवाधिकार शब्द को मानवाधिकार अधिनियम 1993 के तहत परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है जीवन, स्वतंत्रता, समानता और किसी व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकार।

इसके अलावा, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत में, मानव अधिकारों की अवधारणा भारत के संविधान और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय वाचाओं दोनों द्वारा गारंटीकृत है। इसलिए, गरिमा के साथ जीने का अधिकार एक मानव अधिकार है और किसी भी उत्पीड़न का परिणाम इसका उल्लंघन होगा। 

इसके अलावा, उत्पीड़न के विभिन्न रूपों से निपटने वाले विभिन्न कानूनों को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013

यह पहला कानून था जो विशेष रूप से महिलाओं को कार्यस्थल में होने वाले यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया था। यौन उत्पीड़न शब्द को अधिनियम की धारा 2 के प्रावधानों के तहत परिभाषित किया गया है। यह बताते हुए एक समावेशी अर्थ देता है कि यौन उत्पीड़न में नीचे उल्लिखित अवांछित कार्यों या व्यवहार में से कोई एक या अधिक शामिल हो सकते है:

  1. शारीरिक संपर्क और अग्रगमन; 
  2. किसी भी यौन अनुकूलता के लिए मांग या अनुरोध; 
  3. यौन अत्युक्त (रंगीन) टिप्पणी करना; 
  4. अश्लील साहित्य (पोर्नोग्राफी) दिखा रहा है;
  5. यौन प्रकृति का कोई अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण।

इसके अलावा, कानून कुछ नियमों और प्रथाओं को अनिवार्य करता है जो हर कार्यस्थल को यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए पालन करना चाहिए। इसके अलावा, शिकायतों के निवारण के लिए प्रत्येक संगठन द्वारा बनाए जाने वाले तंत्र हैं।

भारतीय दंड संहिता, 1860

यह बताना प्रासंगिक होगा कि “मानसिक उत्पीड़न” शब्द को भारतीय दंड संहिता 1860 के तहत कहीं भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, हालांकि, उत्पीड़न की धारणा की व्याख्या क्रूरता या यातना के संदर्भ में की जा सकती है। संबंधित धाराएं निम्नानुसार हैं:

  1. धारा 294 के तहत अश्लील हरकतें और गाने;
  2. धारा 354 के तहत महिला का शील भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग;
  3. धारा 354A के तहत यौन उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न के लिए सजा;
  4. धारा 509 के तहत किसी महिला की लज्जा का अपमान करने के इरादे से शब्द, इशारा या कार्य;

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 का उद्देश्य सभी ऑनलाइन लेनदेन को कानूनी मान्यता देना है और विभिन्न ऑनलाइन कार्यों और अपराधों को भी नियंत्रित करना है:

  1. धारा 67 के तहत इलेक्ट्रॉनिक रूप में किसी भी अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए सजा;
  2. धारा 67A के तहत इलेक्ट्रॉनिक रूप में यौन रूप से स्पष्ट कार्य आदि वाली किसी भी सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण के लिए सजा;

कार्यस्थल पर उत्पीड़न के लिए ऐतिहासिक पूर्व निर्णय

किसी भी उत्पीड़न के लिए ऐतिहासिक निर्णय विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य, एआईआर 1997 एससी 3011 है। 

उक्त मामले का निर्णय माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया है और यह यौन उत्पीड़न से संबंधित मामले में ऐतिहासिक निर्णय के रूप में कार्य करता है। यौन उत्पीड़न शब्द का अर्थ है किसी एक व्यक्ति या लिंग से दूसरे व्यक्ति या लिंग के प्रति यौन पक्षपात या इशारों से संबंधित कोई भी अवांछित कार्य, जो उस व्यक्ति को नाराज, अपमानित और नीचा दिखाने में सक्षम है, या यहां तक कि मानसिक शांति को भी परेशान करता है।

यौन उत्पीड़न शब्द का अर्थ है एक व्यक्ति या लिंग से दूसरे व्यक्ति या लिंग के प्रति यौन पक्षपात या इशारों से संबंधित कोई भी बिन बुलाए/अवांछित कार्य, जो उस व्यक्ति को नाराज, अपमानित और अपमानित महसूस कराने में सक्षम है, या यहां तक कि मानसिक शांति को भी परेशान कर सकता है।

इसके अलावा, समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा किसी न किसी तरह से यौन उत्पीड़न का नियमित शिकार बन जाता है। इसलिए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14[2], 19[3](1)(g), और 21[4] के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकार स्पष्ट रूप से बताते हैं कि, प्रत्येक पेशे, व्यापार या व्यवसाय को अपने कर्मचारियों को एक सावधान और सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना चाहिए। साथ ही, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रत्येक कर्मचारी की बुनियादी आवश्यकता है, इसलिए कार्यस्थल पर एक सुरक्षित और संरक्षा कार्य वातावरण की उपलब्धता होनी चाहिए। 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से स्वतंत्रता प्रत्येक कर्मचारी का मौलिक अधिकार है। इसी मामले में, इसने नियोक्ताओं के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी सामने रखे ताकि उनका पालन किया जा सके और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों से बचा जा सके। 

इसके अलावा, अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि उन मामलों के कार्यान्वयन और निष्पादन के लिए उचित तकनीक और तंत्र होना अनिवार्य है, जहां कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होता है। 

इसके अलावा, फैसले को पारित करने के पीछे सर्वोच्च नियालय का मुख्य उद्देश्य एक संगठन में काम करने वाले लोगों के बीच लैंगिक समानता सुनिश्चित करना था और यह भी पुष्टि करना था कि उनके कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों के प्रति कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

निजी क्षेत्र के कर्मचारियों पर लागू कानून

हालांकि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी का रोजगार पूरी तरह से रोजगार अनुबंध या सेवा स्तर समझौते के तहत उसके द्वारा परिभाषित और हस्ताक्षरित नियमों और शर्तों पर आधारित है। हालांकि, विभिन्न श्रम कानून हैं जो निजी क्षेत्र पर भी लागू होते हैं। लागू श्रम कानून निम्नानुसार हैं:

  1. बोनस भुगतान अधिनियम;
  2. समान पारिश्रमिक (रेमनेरशन) अधिनियम;
  3. उपदान संदाय (ग्रेच्युटी भुगतान) अधिनियम;
  4. कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध (एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिसलेनियस) अधिनियम;
  5. कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम;
  6. मातृत्व लाभ अधिनियम

इसके अलावा, यह ध्यान दिया जाएगा कि प्रत्येक निजी क्षेत्र उस राज्य के दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम द्वारा शासित और विनियमित होता है। उदाहरण के लिए, कोई भी निजी कंपनी जो लाभ के लिए काम कर रही है और उत्तर प्रदेश के किसी भी हिस्से में काम कर रही है, तो वह यूपी दुकान और वाणिज्य शिक्षण अधिनियम 1962 के दायरे में आती है।

निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के आवश्यक अधिकार

यहां निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी को विभिन्न कानूनों और विनियमों के तहत प्रदान किए गए आवश्यक और बुनियादी अधिकारों की एक सूची दी गई है।

रोजगार का विस्तृत अनुबंध

निजी क्षेत्र में, कंपनी और कर्मचारी के बीच हस्ताक्षरित एक रोजगार अनुबंध निपटान के लिए महत्वपूर्ण आधार के रूप में कार्य करता है, इसलिए यह प्रकृति में व्यापक और विस्तृत होना चाहिए। इसका मतलब है कि मुआवजा, सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट), काम करने का स्थान, इस्तीफा, कार्य पदनाम, पदोन्नति, हस्तांतरण, अधिकार और दायित्व, गोपनीय जानकारी का खुलासा न करना, व्यापार रहस्य, भविष्य निधि और समय पर भुगतान जैसे सभी विवरण। साथ ही, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उक्त अनुबंध में प्रभावी विवाद समाधान के लिए एक तंत्र भी शामिल होना चाहिए। 

6 महीने का अनिवार्य मातृत्व लाभ

मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के प्रावधान, एक प्रतिष्ठान में काम करने वाली महिला कर्मचारी के प्रसवपूर्व (प्रीनेटल) और प्रसवोत्तर चरण दोनों के लिए लाभ प्रदान करते हैं। 

2017 में संशोधन के बाद, गर्भवती महिला कर्मचारी के लिए मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई है। उक्त अवकाश में 8 सप्ताह के प्रसवोत्तर भुगतान अवकाश भी शामिल हैं।

इसके अलावा, यदि कोई महिला कर्मचारी जटिल गर्भावस्था, समय से पहले जन्म, प्रसव या चिकित्सा समाप्ति से गुजरती है, तो, उस स्थिति में, वह 1 महीने के भुगतान अवकाश की हकदार है। इसके अलावा, नलिका-उच्छेदन (टूबेक्टॉमी) प्रक्रिया के मामले में, महिला कर्मचारी आगे 2 सप्ताह के अतिरिक्त भुगतान अवकाश के लिए पात्र होगी।

हालांकि, यदि कोई नियोक्ता मातृत्व लाभ कानून के प्रावधानों और उसके तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस स्थिति में, वह सजा के लिए उत्तरदायी है। उल्लंघन शब्द का अर्थ है गर्भवती महिला कर्मचारी को गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के बाद की बीमारी के कारण अनुपस्थित रहने के लिए अवकाश देना। इसके विपरीत, एक नियोक्ता मातृत्व लाभ को रद्द कर सकता है, केवल उस मामले में जहां एक महिला कर्मचारी ने दिए गए लाभ की अवधि के दौरान अपनी नौकरी बदल दी है।

कर्मचारी भविष्य निधि का भुगतान

भारत में, कर्मचारी भविष्य निधि एक सेवानिवृत्ति लाभ योजना है जो कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम द्वारा शासित है और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन नामक एक राष्ट्रीय स्तर के संगठन द्वारा प्रबंधित की जाती है। 

उक्त योजना उस संगठन पर लागू होगी जो 20 से अधिक कर्मचारियों को रोजगार देता है। नतीजतन, उन्हें ईपीएफओ के साथ पंजीकरण के लिए आवेदन करना होगा। 

एक नियोक्ता और कर्मचारी को कर्मचारी भविष्य निधि में मासिक मूल वेतन का कुल 12% और 10% जमा करने की आवश्यकता होती है।

हालांकि, ऐसे मामले हैं जिनमें एक नियोक्ता कर्मचारी भविष्य निधि का भुगतान करने से खुद को बचा लेता है। ऐसा ही अलग-अलग लोगों के नाम पर बहुत सारी शेल कंपनियों और सहायक कंपनियों को शुरू करके और उनमें मुख्य कंपनी के नियुक्त कर्मचारियों को वितरित करके किया जाता है ताकि 20 कर्मचारियों की गिनती तक न पहुंच सके।

इसके अलावा, यदि कोई नियोक्ता अपने हिस्से का भुगतान नहीं करता है या केवल कर्मचारी के वेतन से पूरे 12% हिस्से की कटौती करता है, तो, उस स्थिति में, उसे निवारण के लिए भविष्य निधि अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) में ले जाया जा सकता है।

उपदान का भुगतान

श्रम कानून, उपदान संदाय (ग्रेच्युटी भुगतान) अधिनियम, 1972 एक कर्मचारी को एक वैधानिक अधिकार प्रदान करता है, जो एक संगठन में 5 साल से अधिक समय से काम कर रहा है। यह फिर से एक सेवानिवृत्ति लाभ है, जिसमें एक कर्मचारी को उसकी सेवा के लिए कृतज्ञता के संकेत के रूप में नियोक्ता द्वारा एकमुश्त भुगतान दिया जाता है। इसके अलावा, देय उपदान की राशि सेवा के वर्षों की संख्या में वृद्धि के साथ बढ़ेगी।

हालांकि, दूसरी ओर, यदि किसी कर्मचारी को अराजक या अव्यवस्थित आचरण के लिए बर्खास्त कर दिया जाता है, तो उसका वैधानिक अधिकार जब्त कर लिया जाता है।

समय पर और उचित वेतन

किसी भी संगठन में सेवाएं प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य, चाहे वह सार्वजनिक हो या निजी, बदले में उचित और उचित पारिश्रमिक प्राप्त करना है। इसके अलावा, मजदूरी भुगतान अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम और भारत के संविधान के अनुच्छेद 39(d) जैसे कानून, प्रत्येक नियोक्ता को अपने कर्मचारियों को उचित और समय पर वेतन प्रदान करने का आदेश देते हैं। 

हालांकि, यदि किसी कर्मचारी को हस्ताक्षरित रोजगार समझौते के अनुसार पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है, तो उस स्थिति में, वह श्रम आयुक्त से संपर्क कर सकता है या वेतन में बकाया के लिए सिविल मुकदमा भी दायर कर सकता है। 

साथ ही, यह बताना प्रासंगिक है कि श्रम कानून के अनुसार, एक कर्मचारी को कानूनी रूप से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी या वेतन नहीं दिया जा सकता है। 

उचित काम के घंटे और ओवरटाइम भुगतान

कारखाना अधिनियम और दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम (अलग अलग राज्यों के अनुसार) के प्रावधान पर्याप्त काम के घंटे और ओवरटाइम भुगतान जैसे मुद्दों को नियंत्रित करते हैं। दुकान और स्थापना अधिनियम निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और कारखाना अधिनियम पर लागू होगा। 

अवकाश पाने का अधिकार

प्रत्येक कर्मचारी जो सेवाएं प्रदान कर रहा है, उसे भुगतान सार्वजनिक अवकाश और अन्य वार्षिक अवकाश प्राप्त करने का अधिकार है, जैसे आकस्मिक अवकाश, विशेषाधिकार अवकाश, बीमार अवकाश, और अन्य अवकाश। इसके अलावा, प्रत्येक 240 कार्य दिवसों के लिए, एक कर्मचारी वार्षिक अवकाश के रूप में 12 दिन प्राप्त करने के लिए योग्य है। इसके अलावा, एक कार्यकर्ता के मामले में, एक वयस्क कार्यकर्ता को हर 20 दिनों में एक अर्जित अवकाश मिल सकता है, जबकि, उक्त कार्यकाल एक युवा कार्यकर्ता के लिए 15 दिनों तक कम हो जाता है। 

इसके अलावा, नोटिस अवधि के दौरान भी, एक कर्मचारी आपात स्थिति के लिए अवकाश लेने के लिए पात्र है, बशर्ते कि उसका रोजगार समझौता उस पर रोक न लगाए।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 वह कानून है जो महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाता है। भारतीय दंड संहिता के प्रावधान यौन उत्पीड़न के लिए सजा का सुझाव देते हैं, जो जुर्माने के साथ या बिना, तीन साल तक की कैद का है।

इसके अलावा, 10 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक संगठन के लिए यौन उत्पीड़न के पीड़ितों की सहायता और लाभ के लिए एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना अनिवार्य है। 

साथ ही, कानून कहता है कि ऐसे संगठनों में एक शिकायत निवारण तंत्र और नीति होनी चाहिए। उक्त नीतियों को यह रेखांकित करना चाहिए कि सभी कार्यों में यौन उत्पीड़न, निवारण (रेड्रेसल) तंत्र, दंड आदि का गठन हो सकता है। 

उक्त समिति में एक सदस्य के रूप में एक वरिष्ठ महिला, एक गैर-सरकारी सदस्य और दो अन्य कर्मचारी सदस्य के रूप में शामिल होने चाहिए।

कर्मचारियों पर कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न के प्रभाव

कर्मचारियों पर कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न के प्रभावों को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

  1. कम सक्रिय या सफल होना;
  2. अपने काम में कम विश्वास होना;
  3. भय, तनाव, चिंता, घृणा या अवसाद (डिप्रेशन) की भावना विकसित करना;
  4. उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करना, जैसे कि पढ़ाई और रिश्ते;
  5. दूर रहना चाहते हैं या काम से छोड़ना चाहते हैं;
  6. ऐसा महसूस करना कि वे अपने प्रबंधक पर भरोसा नहीं कर सकते; 
  7. उन लोगों से खुद को अलग करना जिनके साथ वे काम करते हैं;
  8. अपने काम और खुद के बारे में आत्मविश्वास और खुशी खोना;
  9. तनाव के शारीरिक संकेतों से पीड़ित, जैसे सिरदर्द, पीठ दर्द और लगातार नींद की समस्याएं।

कानूनी उपाय का पालन किया जाना चाहिए

कानूनी सहारा लेने का सवाल केवल इस बात पर निर्भर करता है कि किसी कर्मचारी को उसके कार्यालय में किस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया गया है।

काम की समाप्ति

यदि किसी कर्मचारी को गलत तरीके से या आधारहीन तरीके से उसकी सेवाओं से समाप्त कर दिया गया है, तो उस स्थिति में, वह बिना किसी वैध कारण या उचित आधार के, उस स्थिति में, वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है और पिछली तारीख़ से मजदूरी प्राप्त करने की अनुमति के साथ बहाली का आदेश प्राप्त कर सकता है। 

आक्रामक व्यवहार 

यदि किसी कर्मचारी को मानसिक उत्पीड़न के परिणामस्वरूप हिंसा का सामना करना पड़ा है या उसे लगता है कि उसकी शांति प्रभावित हुई है, तो उसे शिकायत दर्ज करनी चाहिए या प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज करनी चाहिए और सजा के बाद संबंधित नियोक्ता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना चाहिए।

देर से मजदूरी या कोई मजदूरी नहीं 

यदि कोई नियोक्ता बिना मजदूरी, देर से मजदूरी, या यहां तक कि दूसरों की तुलना में अपर्याप्त मजदूरी के रूप में मानसिक उत्पीड़न का कारण बनता है, तो कर्मचारी औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) विवाद अधिनियम 1947 या मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 के प्रावधानों के तहत श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। 

साथ ही, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक नियोक्ता कर्मचारियों को पूर्व सूचना के बिना वेतन में कोई कटौती नहीं कर सकता है। 

विकलांग व्यक्ति के खिलाफ भेदभाव

मानसिक उत्पीड़न एक बड़ा शब्द है और इसमें विकलांग लोगों के खिलाफ भेदभाव भी शामिल है। विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 विकलांग लोगों को भेदभाव और नस्लवाद (रेसिस्म) से बचाता है और उनकी रक्षा करता है।

गर्भवती महिलाओं का आधारहीन निर्वहन (डिस्चार्ज) या समाप्ति 

आजकल, बहुत सारे नियोक्ता हैं जो गर्भवती महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश और लाभ प्रदान करने के बजाय उन्हें अवकाश देना पसंद करते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण उस अवधि के लिए वेतन का भुगतान करने की देयता से बचना है जब वह गर्भवती महिला काम नहीं कर रही है। 

हालांकि, भारतीय श्रम कानून, विशेष रूप से मातृत्व लाभ अधिनियम 1961, गर्भवती महिलाओं का समर्थन करता है और उन्हें इस तरह की अनुपस्थिति के कारण अनैतिक निर्वहन या आधारहीन बर्खास्तगी के खिलाफ श्रम न्यायालय के समक्ष एक सिविल मामला दायर करने का अधिकार देता है।

इसके अलावा, यदि कोई नियोक्ता अपनी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से इनकार करता है, तो उस स्थिति में, श्रम न्यायालय उसे भारत में मातृत्व अवकाश के प्रावधानों के आधार पर 3 महीने के कारावास, या 5000 रुपये का जुर्माना, या दोनों के लिए उत्तरदायी ठहरा सकता है। 

ओवरटाइम के घंटो का भुगतान न करना

निजी संगठनों के लिए कारखाना अधिनियम और दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम (अलग अलग राज्यों के अनुसार) के प्रावधानों के आधार पर, यदि कोई नियोक्ता अपने कर्मचारियों को रोजगार समझौते में निर्धारित घंटों से अधिक काम करने के लिए कह रहा है, तो, उस स्थिति में, उसे एक कर्मचारी को ओवरटाइम वेतन का भुगतान करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक ओवरटाइम वेतन की गणना एक घंटे के लिए वेतन के दोगुने के रूप में की जाती है। इसका मतलब है कि प्रत्येक अतिरिक्त घंटे के लिए नियोक्ता को कर्मचारी को दोगुनी राशि का भुगतान करने की आवश्यकता होती है।

यौन उत्पीड़न

उत्पीड़न के सबसे आम रूपों में से एक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न है, जिसका सामना विशेष रूप से महिला कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 और भारतीय दंड संहिता जैसे कानूनी प्रावधान, पीड़ितों को उपचार, आरोपी को सजा और कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षित, स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बनाए रखने के लिए संगठन पर दायित्व प्रदान करते हैं।

कानूनी नोटिस भेजने और सिविल मुकदमा दायर करने के लिए एक कर्मचारी द्वारा आवश्यक दस्तावेज 

मामले के तथ्यों के आधार पर बहुत सारे दस्तावेज, मेल, नीतियां हैं, जिन्हें एक कर्मचारी को अपने भविष्य के संदर्भ के लिए संभालकर रखना चाहिए, लेकिन कानूनी नोटिस भेजने और नियोक्ता के खिलाफ सिविल मुकदमा दायर करने के लिए एक कर्मचारी द्वारा आवश्यक प्राथमिक दस्तावेज निम्नानुसार हैं:

  1. रोजगार अनुबंध;
  2. नियुक्ति पत्र;
  3. भत्तों और अतिरिक्त लाभों के बारे में विवरण देने वाले दस्तावेज;
  4. भुगतान किए गए वेतन के बारे में बैंक विवरणों की प्रति।

एक स्वस्थ कॉर्पोरेट वातावरण बनाए रखने के लिए युक्तियाँ

अपने संगठन और कार्यालय परिसर को उत्पीड़न-मुक्त बनाने के लिए, प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नीचे उल्लिखित कार्य या तो नहीं होते हैं या कार्यस्थल पर काफी कम हो जाते हैं: 

  1. एक कर्मचारी को दूसरों की तुलना में अधिमान्य उपचार;
  2. किसी कर्मचारी की अग्रगमन या प्रयास अनदेखी है;
  3. कर्मचारी द्वारा निर्णयों पर लगातार सवाल उठाना;
  4. किसी कर्मचारी को लक्षित करना या सूक्ष्म रूप से प्रबंधन (माइक्रोमैनेज) करना;
  5. वरिष्ठ (सीनियर) द्वारा समाप्ति की धमकी;
  6. गलत के खिलाफ आवाज उठाने पर एक कर्मचारी को बर्खास्त कर देना;
  7. एक कर्मचारी को सामाजिक रूप से अलग करना;
  8. विकलांगता के आधार पर भेदभाव;
  9. कोई मार्गदर्शन नहीं लेकिन वरिष्ठों से अनावश्यक आलोचनाएं;
  10. अनुचित बाधाओं को प्रस्तुत करना;
  11. कोई प्रेरणा नहीं केवल निवारक;
  12. गैर-पहुंच योग्य प्रबंधन (नॉन-अप्प्रोचेबल मैनेजमेंट);
  13. कर्मचारियों के लिए कमजोर शिकायत निवारण तंत्र;
  14. वेतन भुगतान में देरी;
  15. ओवरटाइम घंटों के लिए भुगतान न करना;
  16. गर्भवती महिला कर्मचारी की निराधार अवकाश।

निष्कर्ष 

संक्षेप में, प्रत्येक नियोक्ता को कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार और कर्मचारियों को मानसिक उत्पीड़न की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और इसे रोकने के लिए सख्त नियमों को लागू करना चाहिए। साथ ही, उन्हें उन लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए जो अपने कनिष्ठ (जूनियर्स) के साथ इस तरह के कृत्य करते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार एक कर्मचारी, विशेष रूप से महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का एक महत्वपूर्ण कारण है।

इसके अलावा, मानवाधिकारों के साथ-साथ विभिन्न भारतीय कानून हैं जो सभी प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ एक कर्मचारी की रक्षा और रक्षा करते हैं और नियोक्ताओं को उनके लिए एक स्वस्थ कॉर्पोरेट वातावरण बनाए रखने के लिए अनिवार्य करते हैं। 

इसके अलावा, एक कर्मचारी नियोक्ता के खिलाफ अपने कानूनी उपायों को सुलझाने के लिए उचित अदालत से संपर्क कर सकता है, क्योंकि सिर्फ नौकरी न खोने के लिए उत्पीड़न का सामना करना समस्या का समाधान नहीं है। 

संदर्भ

 

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