होमconstitution of India 1950भारत संघ बनाम संकल चंद हिम्मतलाल शेठ (1977)

भारत संघ बनाम संकल चंद हिम्मतलाल शेठ (1977)

भारत संघ बनाम संकल चंद हिम्मतलाल शेठ (1977)

यह लेख Mohd Atif Zakir द्वारा लिखा गया है। इस व्यापक लेखन संरचना में उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्थानांतरण (ट्रांसफर) से संबंधित मुद्दे पर स्पष्ट तरीके से चर्चा की गई है। यह मामला एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के कार्यकारी निर्णय के विरुद्ध उत्पन्न संघर्ष को दर्शाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के ऐसे स्थानांतरण करने से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का वर्णन करने वाले प्रावधानों की व्याख्या निर्धारित की हैं। इसके अलावा, यह विस्तृत लेख उठाए गए विरोधाभासी मुद्दों को तय करने के संदर्भ में कई ऐतिहासिक निर्णयों पर प्रकाश डालता है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ (1977) में , सर्वोच्च न्यायालय के व्यापक फैसले को विस्तार से शामिल किया गया है और उसकी जांच की गई है। इस मामले में, न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक स्थानांतरण पर कार्यकारी (एग्जीक्यूटिव) नियंत्रण के मुद्दे उठाए गए थे।

इस मामले में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ जो स्थानांतरण किया गया था, वह राष्ट्रपति के आदेश के तहत लाया गया था, जिसके बारे में उनका दावा है कि यह उनकी सहमति के बिना जारी किया गया था और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222(1) का उल्लंघन है । यह अनुच्छेद दोहराता है कि यह आवश्यक है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ पूर्व चर्चा के बाद सहमति से किया जाए।

इस रिट याचिका में कई अनुच्छेदों और पूर्ववर्ती उदाहरणों (प्रेसिडेंट्स) की संवैधानिकता को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति और हस्तांतरण का संक्षिप्त अर्थ बताया जिसे भारत के संविधान के जनक द्वारा संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत तैयार किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने  दोनों पक्षों के बीच विवादों का फैसला करते हुए  शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य 1974 जैसे कई फैसलों का हवाला दिया ।

एसपी गुप्ता बनाम भारत के राष्ट्रपति, 1981 का मामला , जिसे “न्यायाधीशों के स्थानांतरण” मामले के रूप में भी जाना जाता है, चर्चा का विषय बन गया, जिसने इस बात की विस्तृत व्याख्या की ,कि कैसे सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के बीच न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए कार्यकारी (एग्जीक्यूटिव) निकायों (बॉडीज) की शक्ति के विरुद्ध संघर्ष पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखा। इसके अलावा, इस मामले ने उन सीमाओं को निर्धारित किया है जिनकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने तब की है जब उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए कार्यकारी के अधिकार से संबंधित प्रश्न उठे थे।

मामले का विवरण

  1. मामले का नाम: भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ (1977)
  2. समतुल्य उद्धरण: (1977) 4 एससीसी 193
  3. न्यायालय: भारत का माननीय सर्वोच्च न्यायालय
  4. पीठ: न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएन भगवती, न्यायमूर्ति वीआर कृष्णय्यर, न्यायमूर्ति एनएल उंटवालिया और न्यायमूर्ति सैयद मुर्तजा फजलाली
  5. याचिकाकर्ता: भारत संघ
  6. प्रतिवादी: संकलचंद हिम्मतलाल शेठ
  7. फैसले की तारीख: 19 सितंबर, 1977

मामले के तथ्य

भारत सरकार ने अपने विधि एवं न्याय मंत्रालय, और निगमित (कॉरपोरेट) मामलों के न्याय विभाग के माध्यम से एक अधिसूचना जारी की, जिसमें संकेत दिया गया कि “भारत के राष्ट्रपति, भारत के संविधान के अनुच्छेद 222 के खंड (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत, भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद, गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री संकलचंद हिम्मतलाल शेठ को उनके पदभार ग्रहण करने की तिथि से आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करते हैं।”

न्यायमूर्ति संकलचंद ने स्थानांतरण आदेश को स्वीकार कर लिया और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल लिया, लेकिन ऐसा करने से पहले, उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दायर की , जिसमें अधिसूचना (नोटिफिकेशन) की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गई कि स्थानांतरण बिना सहमति बैठक के किया गया था और भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को ध्यान में नहीं रखा गया था।

रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि स्थानांतरण का निर्णय उसकी सहमति के बिना लिया गया था, और सहमति लेना अनिवार्य है क्योंकि यह अनुच्छेद 222(1) के तहत निहित है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बिना सहमति के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में स्थानांतरण कानून के निर्धारित प्रावधान से परे है।

इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि इस स्थानांतरण ने 1963 में भारत के विधि मंत्री ए.के. सेन द्वारा किए गए वचनबद्ध (प्रोमिसरी) विबंधन (एस्टॉपल) का उल्लंघन किया है, जिसके अनुसार जब तक सहमति नहीं दी जाती, तब तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण नहीं किया जाएगा, और इसलिए भारत सरकार वचनबद्ध विबंधन के अधीन है। इसके बाद, स्थानांतरण आदेश से जनहित प्रभावित हुआ।

अंत में, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह आदेश भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ उचित चर्चा किए बिना जारी किया गया था क्योंकि अनुच्छेद 222(1) के तहत चर्चा के लिए महत्वपूर्ण परामर्श की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान मामले में नहीं हुआ, जिसके कारण यह आदेश निरस्त हो गया।

गुजरात उच्च न्यायालय ने स्थानांतरण आदेश को शून्य (नल), अवैध (इंवेलिड), निरर्थक (वाइड) और अधिकार-बाह्य (अल्ट्रा वायरस) घोषित कर दिया। इसके बाद, भारत संघ ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए निर्णय के विरुद्ध भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।

मामले में उठाए गए मुद्दे

  • क्या संविधान का अनुच्छेद 222(1) किसी न्यायाधीश को भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने से पहले उसकी “सहमति” को एक पूर्व शर्त के रूप में दर्शाता है?
  • क्या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का उनकी सहमति के बिना स्थानांतरण असंवैधानिक है?
  • संविधान के अनुच्छेद 222(1) के तहत “स्थानांतरण” शब्द का दायरा और प्रभाव क्या है?
  • अनुच्छेद 222(1) के तहत “परामर्श” का क्या अर्थ है?

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता

विद्वान महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) ने न तो इस बात से इनकार किया कि न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखा जाना चाहिए, न ही उन्होंने उस कठिनाई के मुद्दे को संबोधित किया जो आमतौर पर स्थानांतरण में अनुभव की जा सकती है। हालाँकि, ये तर्क न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं।

  • अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 222(1) में ‘स्थानांतरण’ शब्द अस्पष्ट नहीं है और कहा कि अनुच्छेद में ‘सहमति’ की पूर्व शर्त को पढ़ने का कोई कारण नहीं है। साथ ही, अगर हम यह मान लें कि किसी न्यायाधीश को उस उच्च न्यायालय में पदभार ग्रहण करने से पहले नई शपथ लेनी चाहिए, जहाँ उसका स्थानांतरण किया गया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे फिर से शुरू करना होगा क्योंकि उसे एक नए धारक के रूप में नियुक्त किया जा रहा है। इसलिए, आपको उसे एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए न्यायाधीश से अनुमति मांगने की आवश्यकता नहीं है।
  • अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि ऐसा करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना अनिवार्य नहीं है। केंद्र सरकार का सुझाव मनमाने तबादलों के खिलाफ एक प्रभावी सुरक्षा उपाय हो सकता है।

प्रतिवादी

प्रतिवादी ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत उल्लिखित प्रावधान के पक्ष में अपने तर्क व्यापक रूप से प्रस्तुत किए।

  • प्रतिवादी ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 222(1) का अधिदेश (मैंडेट), जो कहता है कि भारत के राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना चाहिए, इस मुद्दे को हल नहीं करता है क्योंकि भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ आगे परामर्श ही एकमात्र आवश्यकता नहीं है; बल्कि, अंतिम निर्णय हमेशा कार्यपालिका के पास रहता है।
  • संविधान की तीसरी अनुसूची के खंड VIII के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को जो शपथ लेनी होती है कि वह अपना काम “बिना किसी भय या पक्षपात के” करेगा , वह न केवल निरर्थक हो जाएगी, बल्कि इसे पूरा करना भी असंभव हो जाएगा, जब तक कि किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने से उसे होने वाली क्षति का भय दिखाकर उससे अनुग्रह (फेवर) प्राप्त करना विधायिका या कार्यपालिका की शक्ति से बाहर नहीं कर दिया जाता।
  • भले ही हमें राष्ट्रीय एकीकरण की बेहतरी के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने की आवश्यकता हो, लेकिन लोगों के लिए स्वतंत्र न्यायाधीशों का होना महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसे देश में अभिन्न रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका संविधान संघीय या अर्ध-संघीय है, जैसा कि हमारे पास भारत में है। यदि हितों का आपस में टकराव होता है, तो स्वतंत्रता के सिद्धांत को बेहतर राष्ट्रीय एकीकरण के विचार पर हावी होना चाहिए।
  • यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 222(1) द्वारा प्रदत्त शक्ति अनिवार्य रूप से इस शर्त के अधीन है कि जिस न्यायाधीश को स्थानांतरित किया जाना है, उसे अपने स्थानांतरण के लिए सहमति देनी होगी। कई मामलों में, न्यायाधीश के स्थानांतरण से उसे व्यक्तिगत क्षति होती है।
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 222(1) के तहत ‘स्थानांतरण’ की अवधारणा पूरी तरह से अलग है, और इसे न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए चुने गए विभिन्न संवैधानिक उपायों के अनुसार पढ़ा जाना चाहिए। इसके बाद, बिना सहमति के किया गया स्थानांतरण कार्यपालिका को उस न्यायाधीश को दंडित करने का एक शक्तिशाली साधन देता है जो प्रशासन के उद्देश्यों का पालन करने से इनकार करता है।

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ (1977) में चर्चित कानून

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 222

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत भारतीय राष्ट्रपति को उच्च न्यायालयों के बीच न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने का अधिकार है। यह खंड न्याय के प्रभावी कामकाज के लिए आवश्यक होने पर न्यायाधीशों को स्थानांतरित करना आसान बनाने के लिए जोड़ा गया था। जैसा कि अनुच्छेद 222 के तहत कहा गया है, भारत के राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद किसी न्यायाधीश को स्थानांतरित कर सकते हैं।

मामले का फैसला

न्यायमूर्ति मुर्तजा, न्यायमूर्ति कृष्णय्यर और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बहुमत की राय दी, जबकि न्यायमूर्ति पीएन भगवती और न्यायमूर्ति एनओ उंटवालिया ने अपने विरोधी विचार प्रस्तुत किए।

इस मामले में प्रस्तुत बहुमत की राय

परामर्श का प्राथमिक महत्व सबसे पहले न्यायमूर्ति कृष्णय्यर ने इस राय में प्रस्तुत किया था, जिन्होंने यह भी कहा था कि विधायी शर्तों की व्याख्या पारंपरिक होने के कारण कठोरता के बजाय व्यापक और रचनात्मक तरीके से की जानी चाहिए। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि संवैधानिक खंडों की व्याख्या करते समय विधायी इतिहास का उपयोग सहायता के रूप में किया जा सकता है, हालांकि इसका व्यापक अध्ययन नहीं किया जाना चाहिए।

यह व्यापक निर्णय इस बात पर जोर देता है कि न्यायाधीशों को कानून का मसौदा (ड्रॉफ्ट) तैयार करने के बजाय उसे यथावत घोषित करके संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करनी चाहिए; यह सामान्य प्रथा है जिसका पालन किया जाना चाहिए। यह दर्शाता है कि अनुच्छेद 222(1) में सहमति को पढ़ना मुश्किल है। यह कहा गया है कि, “अनुच्छेद 222 में ‘सहमति’ शब्द की व्याख्या केवल अनुच्छेद की स्पष्ट और सीधी भाषा के आधार पर नहीं की जा सकती”।

मुद्दा नं.1 पर चर्चा करते समय, जिसमें कहा गया था कि क्या विवादित प्रावधान में शामिल करने के लिए सहमति व्यक्त की जा सकती है, यह देखा गया कि ए.के. सेन के साक्ष्य और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण पर वर्तमान करार (कन्वेंशन), संवैधानिक प्रावधान के दायरे में नहीं आती है और न ही आनी चाहिए।

हालांकि इस परंपरा में उस न्यायाधीश की अनुमति की आवश्यकता हो सकती है जिसका स्थानांतरण मांगा जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर स्थानांतरण करने के लिए यह संवैधानिक रूप से आवश्यक नहीं है। अगर न्यायाधीश तबादले का विरोध करता है और जनहित की मांग होती है तो सरकार अनुच्छेद 222 की शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है। मुद्दे  नं. 2 का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति कृष्णय्यर और न्यायमूर्ति मुर्तजा ने अपनी ओर से लिखते हुए कहा कि सहमति के बिना किया गया स्थानांतरण असंवैधानिक नहीं है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 का उपयोग केवल “अपवादस्वरूप, सार्वजनिक हित में, तथा जहां यह सार्वजनिक हित में समीचीन (एक्सपीडिएंट) और आवश्यक हो” किया जा सकता है। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि मजबूत सार्वजनिक हित को न्यायिक स्वतंत्रता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

अनुच्छेद 217 जैसे तुलनीय अनुच्छेदों पर चर्चा करते समय यह उल्लेख किया गया था कि अनुच्छेद 217(1)(c) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 222 के तहत न्यायाधीशों के स्थानांतरण से भिन्न है। अनुच्छेद 217(1)(c) के तहत स्थानांतरण के लिए सहमति की आवश्यकता नहीं है; इसलिए, सिद्धांत रूप में, स्थानांतरित न्यायाधीश को नई शपथ लेने की आवश्यकता नहीं है।

मुद्दे 4 के लिए, यह निर्णय लिया गया कि इस संदर्भ में “सरकार द्वारा सीजेआई के समक्ष प्रस्तुत की गई पूर्ण और उचित सामग्री के आधार पर वास्तविक, पर्याप्त और प्रभावी परामर्श” को ही समझा जाना चाहिए। राष्ट्रपति को अनुच्छेद 222 के अनुसार किसी भी सामग्री के बारे में पहले सीजेआई को सूचित करना होगा।

मुख्य रूप से, भारत के मुख्य न्यायाधीश को आवश्यक जानकारी एकत्र करनी होती है और फिर भारत के राष्ट्रपति को अपनी कार्रवाई योग्य सलाह देनी होती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश को अनौपचारिक रूप से यह पता लगाना होता है कि भावी स्थानांतरित न्यायाधीश अपनी राय देने से पहले किसी विशेष व्यक्तिगत कठिनाई से गुजर रहा है या नहीं। भले ही सरकार सीजेआई द्वारा की गई चर्चा का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन आम तौर पर ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है क्योंकि अनुच्छेद 222(1) सरकार को अपने अधिकार का मनमाने ढंग से या अनुचित तरीके से उपयोग करने से रोकता है।

मुद्दे नं.1 पर आगे बढ़ते हुए, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि कोई प्रावधान विशिष्ट और स्पष्ट है, तो बाद में इसका कोई वैकल्पिक अर्थ होने की संभावना नहीं है। इसलिए, यह तर्क देना असंभव है कि अनुच्छेद 222(1) के लिए सहमति की आवश्यकता है। इसके अलावा, यह कहा गया है कि कानूनों की व्याख्या करना रचनाकारों के वास्तविक विधायी अर्थ को निर्धारित करने की प्रक्रिया है। यदि किसी अधिनियम की भाषा अस्पष्ट है, तो एक सामंजस्यपूर्ण (हार्मोनियस) निर्माण तक पहुँचने के लिए सामान्य अर्थ को लागू किया जाना चाहिए जो प्रावधान की परस्पर विरोधी व्याख्याओं को संतुलित करने में मदद करता है।

इसके अलावा, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने प्रतिवादी के इस दावे पर भी ध्यान दिया कि संविधान में कई प्रावधानों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को दृढ़ता से संरक्षित करने का इरादा है।

इसके अलावा, इन प्रावधानों के साथ, संविधान निर्माताओं ने भाग VI के अध्याय VI को “अधीनस्थ न्यायपालिका” शब्द के अंतर्गत जोड़ा।

अधीनस्थ न्यायपालिका प्रशासनिक अधिकार के अधीन थी, यही कारण है कि इस शब्द को जोड़ा गया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता का आवश्यक सिद्धांत, जो इन नियमों की नींव को विकसित करता है, को तोड़ा नहीं जा सकता है और यह अनुच्छेद 222(1) के तहत न्यायाधीशों की अनुमति के बिना उनका स्थानांतरण करने के प्रशासनिक अधिकार के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाता है।

उन्होंने आगे कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले संविधान के उपर्युक्त खंड, संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सहमति के बिना किए गए स्थानांतरण से निरस्त नहीं होंगे।

मुद्दे 4 का वर्णन करते हुए, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने के लिए प्राधिकरण को अनुमति देना जनहित में है। हालाँकि यह कहा गया है कि इस सत्तावादी शक्ति का उपयोग न्यायाधीशों को दंडित करने के लिए एक उपकरण के रूप में नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे अनुच्छेद 222(1) में ऐसे शब्द जोड़कर भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है जो न्यायाधीश को स्थानांतरित करने से पहले सहमति मांगता है। इसलिए, एक न्यायाधीश को न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का अपमान नहीं सहना चाहिए।

यह उल्लेख किया गया कि अनुच्छेद 222(1) के तहत, मुख्य न्यायाधीश से परामर्श एक पूर्व शर्त है; यदि ऐसा परामर्श नहीं किया जाता है और स्थानांतरण होता है, तो स्थानांतरण असंवैधानिक है, भले ही सहमति ऐसी पूर्व शर्त न हो। इसके बाद, यह उल्लेख किया गया कि न्यायाधीशों की तुलना स्वामी-सेवक संबंध से नहीं की जा सकती क्योंकि वे सरकार के कर्मचारी नहीं बल्कि संवैधानिक रूप से नियुक्त किए जाते हैं। परिणामस्वरूप, सरकार अपने आप न्यायाधीशों को स्थानांतरित या नियुक्त करने का निर्णय नहीं ले सकती।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह भी बताया कि अनुच्छेद 222(1) में अंतर्निहित सीमाएँ हैं। सबसे पहले, सत्ता के इस्तेमाल से केवल जनहित ही पूरा होगा। दूसरे, राष्ट्रपति का कर्तव्य है कि वह मुख्य न्यायाधीश से चर्चा करें और मुख्य न्यायाधीश के समक्ष आवश्यक जानकारी प्रस्तुत करने से पहले सभी प्रासंगिक सूचनाओं की समीक्षा करें। अंत में, राष्ट्रपति को राय प्रस्तुत करते समय, मुख्य न्यायाधीश को सभी प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है। अंत में, राष्ट्रपति के पास मुख्य न्यायाधीश के साथ गहन परामर्श के बाद निर्णय लेने का विकल्प होता है।

यद्यपि यह भारत के राष्ट्रपति के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, फिर भी मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर विचार किया जाना चाहिए, और यदि राष्ट्रपति अपने स्थानांतरण निर्णय में इससे अलग होने का निर्णय लेते हैं तो न्यायालय को न्यायिक समीक्षा का अधिकार है।

मुद्दा नं.3 बताते हुए, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अनुच्छेद 217 (C) पर प्रकाश डाला, जो उच्च न्यायालय की नियुक्तियों के बारे में बात करता है, और इस बात पर जोर दिया कि यह खंड न्यायाधीशों के स्थानांतरण और नियुक्तियों के बीच अंतर करता है। नतीजतन, संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधानों के अनुच्छेद 222 (1) को एक साधारण सम्मेलन या प्रक्रिया द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है।

भारत संघ बनाम संकल चंद हिम्मतलाल शेठ (1977) में अल्पमत की राय

न्यायमूर्ति उंटवालिया ने असहमतिपूर्ण निर्णय प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्थानांतरित न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के पद को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, जिस पर उसे शुरू में नियुक्त किया गया था और उसकी सहमति के बिना न्यायाधीश के रूप में नया पद ग्रहण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। बिंदु 1 और 2 का उत्तर देते हुए, उन्होंने सहमति के महत्व के बारे में बहुमत की राय का खंडन किया।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना जनहित में होना चाहिए। न्यायमूर्ति उंटवालिया के अनुसार, स्थानांतरित न्यायाधीश को उसकी सहमति के बिना या न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोई विशिष्ट क़ानून, नियम या प्रक्रिया बनाए जाने तक अपना पद छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, न्यायमूर्ति उंटवालिया न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ से सहमत थे कि स्थानांतरण से पहले सहमति लेनी चाहिए। यह उस तर्क के समान नहीं है कि बिना अनुमति के हुआ स्थानांतरण असंवैधानिक है, यही तर्क न्यायमूर्ति उंटवालिया ने भी स्वीकार किया है।

मुद्दा नं.4 के लिए, यह उल्लेख किया गया कि विवादित प्रावधान के तहत आवश्यक परामर्श प्रक्रिया को केवल अर्थहीन औपचारिकता के बजाय वास्तविक और उत्पादक होना चाहिए। परिणामस्वरूप, यह उल्लेख किया गया है कि न्यायमूर्ति उंटवालिया सीजेआई की राय को स्वीकार करते हैं, लेकिन इस बात पर भी जोर देते हैं कि सरकार उनसे बाध्य नहीं है। यह संदर्भ चंद्रमौलेश्वर प्रसाद बनाम पटना उच्च न्यायालय (1970) के मामले के कानून के संबंध में किया गया था।

अनुच्छेद 222(1) की व्याख्या पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति भगवती ने मुद्दा नं.1 पर कहा कि विधायी विशेषज्ञता वैधानिक या संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा, उन्होंने हेडन के नियम का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि किसी क़ानून की व्याख्या करते समय, किसी को उसकी प्रस्तावना, अन्य क़ानूनों पर विचार करना चाहिए जो “पैरी मैटेरिया” में हैं,  एक सिद्धांत जो मामलों की स्थिति और प्रकृति में समान मामलों की स्थिति और उस समस्या के बारे में विधायिका के इरादे पर विस्तार से बात करता है जिसे क़ानून संबोधित करने का इरादा रखता है।

तीसरे बिंदु का उत्तर देते हुए, न्यायमूर्ति भगवती ने अनुच्छेद 222(1) में “स्थानांतरण” शब्द की दो कारणों से कठोर व्याख्या करने का समर्थन किया। पहला, जैसा कि अनुच्छेद 222(2) में कहा गया है, न्यायाधीशों पर लगाए गए व्यक्तिगत नुकसान को ध्यान में रखते हुए, प्रतिपूर्ति भत्ते का प्रावधान है। दूसरा, न्यायाधीश का करियर प्रभावित होगा और बार-बार तबादलों की वजह से उच्च न्यायालयों में उनकी वकालत सीमित हो जाएगी। इसलिए, उनका मानना ​​था कि स्थानांतरण तभी वैध हो सकता है जब इसे जनहित में किया जाए।

अन्यथा, यदि स्थानांतरण को दंड के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सत्ता का स्पष्ट दुरुपयोग बन जाता है, यदि यह सार्वजनिक हित के लिए नहीं किया जाता है। यह बेहद जोखिम भरा होगा यदि राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करते हुए, न्यायाधीश की सहमति के बिना अनुच्छेद 222(1) द्वारा प्रदत्त अधिकार का उपयोग करने का निर्णय लेते हैं।

मुद्दा नं.1 और 2 पर विचार करते हुए, यह देखा गया कि जबकि शब्द “स्थानांतरण” तटस्थ है और यह जबरन और स्वैच्छिक दोनों तरह के स्थानांतरण को इंगित कर सकता है, अनुच्छेद 222(1) में खंड से “सहमति” शब्द अनुपस्थित है। इस वजह से, इसकी व्याख्या केवल सहमति वाले स्थानांतरण के विशिष्ट संदर्भ में की जानी चाहिए क्योंकि न्यायिक स्वतंत्रता को निर्देशक सिद्धांतों और संवैधानिक नियमों द्वारा समर्थित किया जाता है।

स्थानांतरण के औचित्य (जस्टिफिकेशन) के रूप में जनहित के बारे में, यह नोट किया गया कि अपेक्षाकृत कम मामलों में जनहित ने न्यायाधीश के स्थानांतरण को उचित ठहराया। सामान्य तौर पर, यदि स्थानांतरण बिना सहमति के किए जाते हैं तो न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किया जाएगा। जैसा कि शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1974) में कहा गया है , एक प्रतिकूल न्यायाधीश के स्थानांतरण में जनहित का मूल्यांकन न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के आदर्शों के विरुद्ध किया जाना चाहिए।

अनुच्छेद 222(1) की सटीक व्याख्या के दायरे में, राष्ट्रपति का प्राधिकार भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ पूर्व परामर्श के बिना ऐसे स्थानांतरण करने के लिए अनुकूल नहीं है।

मामले का विश्लेषण

यह मामला, भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ , एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करता है जिसमें कार्यपालिका की शक्ति पर चर्चा की गई है, जिसके तहत वह केवल अधिसूचना जारी करके न्यायाधीशों का स्थानांतरण कर सकती है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को स्थानांतरित करने का यह अधिकार संविधान द्वारा जनहित में दिया गया है, न कि कार्यपालिका को किसी ऐसे न्यायाधीश को दंडित करने का हथियार प्रदान करने के लिए जो किसी नियम या मानक का पालन नहीं करता है या किसी भी कारण से पक्षपाती हो गया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह साबित करने में चुनौतियों को स्वीकार किया कि किसी विशेष मामले में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण मनमाने कारण से किया गया था, लेकिन हमारा संविधान कार्यपालिका को ऐसा कोई अधिकार नहीं देता है। ऐसे मामले में, अधिकार के प्रयोग को कानूनी दुर्भावनाओं से प्रभावित माना जा सकता है।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को स्थानांतरित करने की शक्ति उच्च न्यायालय की न्यायिक प्रणाली को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाने के लिए दी गई थी। इस प्रकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहेगी और प्रशासनिक क्षमता न्यायिक प्रणाली के कार्य को अपने हाथ में नहीं ले पाएगी क्योंकि यह भारत के संविधान के तहत निहित मूल आधार है।

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, राष्ट्रपति को किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की अनुमति देने वाले किसी भी प्रावधान को न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम करने के रूप में नहीं देखा जा सकता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण पर विचार करते समय कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 और संविधान के मूल प्रारूप में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण के लिए प्रावधान की कमी यह दर्शाती है कि संविधान की मूल संरचना में न्यायिक स्थानांतरण को उनकी सहमति तक सीमित करने का इरादा नहीं था। नतीजतन, संविधान के अनुच्छेद 222(1) में न्यायिक स्थानांतरण के लिए एक स्पष्ट प्रावधान शामिल है।

फैसले से पहले और बाद के परिदृश्य (सिनेरियो) का तुलनात्मक विश्लेषण

राष्ट्रपति और कार्यपालिका की संबंधित न्यायाधीश की सहमति के बिना उच्च न्यायालयों के बीच न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने की शक्ति का सार, भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ (1977) के ऐतिहासिक मामले से पहले अस्पष्ट था। एक ओर, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना ​​था कि राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्ति है, जबकि अन्य ने तर्क दिया कि न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए सहमति आवश्यक है।

यह मामला इस मुद्दे पर यह व्याख्या करके दृढ़ता से स्पष्टीकरण देता है कि न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने की राष्ट्रपति की शक्ति सीमित थी और संविधान के मूल तत्वों की सुरक्षा के लिए आपसी सहमति आवश्यक थी। परिणामस्वरूप, 1977 के बाद, स्थानांतरण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण संशोधन हुए। केवल कार्यकारी अधिकार के आधार पर, न्यायाधीशों को अब उच्च न्यायालयों के बीच मनमाने ढंग से स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था। इसके बजाय, स्थानांतरणों को सार्वजनिक हित की रक्षा करनी चाहिए और न्यायपालिका को न्यायिक स्वतंत्रता विनियमों का पालन करने के लिए बाहरी प्रभाव से बचाना चाहिए।

समय के साथ नियमों में बदलाव के कारण स्थानांतरण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और परामर्शी हो गई। स्थानांतरण प्रस्तावों का आकलन करने के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बताई गई बात अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही थी। 1990 के दशक तक, कार्यपालिका अब अलग-थलग होकर काम नहीं कर रही थी; इसके बजाय, अधिकांश वरिष्ठ न्यायाधीशों के पैनल निर्धारित कॉलेजियम प्रणाली के तहत स्थानांतरण की सिफारिश करते थे।

संकलचंद मामले में न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर दिया गया और एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ 1981 के मामले में, जिसमें न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों में पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया गया, ने अधिक मनमानी प्रथा से सहयोगात्मक (कोलेबोरेटिव) प्रणाली की ओर कदम बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। भले ही राष्ट्रपति अभी भी आधिकारिक तौर पर तबादलों की अनुमति देते हैं, लेकिन अब वे स्थापित प्रोटोकॉल के अनुसार किए जाते हैं जिसके लिए न्यायपालिका से मंजूरी की आवश्यकता होती है।

भारत में न्यायिक स्थानांतरण का ऐतिहासिक महत्व

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ के मामले से पहले , भारत की कार्यकारी शाखा के पास भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण पर पर्याप्त शक्ति थी। चूंकि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनकी सहमति पर स्थानांतरित किया जा सकता था, इसलिए इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए ऐसी कोई निर्दिष्ट सीमा नहीं थी।

स्वतंत्रता के बाद, कार्यकारी निकाय ने दशकों तक बार-बार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण किया। इस लगातार अभ्यास ने सत्तारूढ़ सरकार को महत्वपूर्ण मामलों और न्यायपालिका पर प्रभाव डालने की क्षमता प्रदान की। हालाँकि, उस समय, न्यायाधीशों के पास इन तबादलों को चुनौती देने के लिए सीमित विकल्प थे।

शिक्षाविदों (एकेडमीशियंनस) में से एक, बीडी दुआ के अनुसार, न्यायाधीशों के स्थानांतरण को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव 1970 के दशक में बढ़ा, जो कि संकलचंद मामले के अस्तित्व में आने से कुछ साल पहले की बात है। यह मामला न्यायपालिका के प्रतिरोध में वृद्धि से लेकर स्थानांतरण के संबंध में कार्यपालिका की असंगत शक्तियों के हिस्से तक विकसित हुआ। अंत में, इसका परिणाम ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के रूप में सामने आया, जिसमें अनुच्छेद 222 के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए गए।

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ (1977) का महत्व

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ मामले का भारत में न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इस निर्णय के अस्तित्व में आने से पहले, संविधान के अनुच्छेद 222 ने कार्यकारी निकाय को उच्च न्यायालयों के बीच न्यायाधीशों की नियुक्ति पर वस्तुतः पूर्ण शक्ति प्रदान की थी। हालाँकि इस मामले में दिए गए निर्णय ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक सीमा निर्धारित की कि न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की कार्यकारी शक्ति का मनमाने ढंग से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, इसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को और भी बरकरार रखा।

परिणामस्वरूप, इस निर्णय ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लगातार स्थानांतरण पर सख्त नीतियां और प्रतिबंध स्थापित किए। इसके अलावा, इसने ऐसे नियम और विनियम भी तैयार किए ताकि न्यायाधीशों को केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए स्थानांतरित न किया जा सके और न ही उन्हें मनमाने ढंग से या न्यायाधीशों की सहमति के बिना स्थानांतरित किया जा सके। नतीजतन, निर्णय ने यह सुनिश्चित किया कि बिना किसी औचित्य के मनमाने ढंग से किए गए स्थानांतरण केवल न्यायपालिका की बिना किसी भय या दबाव के काम करने की क्षमता से समझौता करेंगे।

इस मामले के बाद, नियुक्तियों और तबादलों के मामले में न्यायपालिका की शक्ति पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है। सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1993) जैसे फैसलों की स्थापना के बाद , जिसने उच्च न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम प्रणाली विकसित करने में मदद की, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया। उसके बाद, न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका क्रमिक रूप से विकसित हुई। 

इस निर्णय के बाद, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण केवल उनकी सहमति के आधार पर ही किया जा सकता था, बशर्ते कि अपवादस्वरूप ऐसी परिस्थितियाँ हों जिनमें कदाचार या गैर-पेशेवर घटनाओं के विशिष्ट आरोप हों। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से इस बात पर जोर दिया कि बिना सहमति के होने वाले तबादलों के लिए जनहित से संबंधित ठोस आधार की आवश्यकता होती है। इसके बाद, केंद्र सरकार का विवेकाधिकार काफी हद तक कम हो गया और अंततः न्यायिक स्थानांतरण अपनी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शी और उचित हो गए।

संतुलित न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए, इस मामले ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए अधिक गहन प्रक्रियाएं विकसित की हैं। इसने न्यायाधीश की लिखित सहमति प्राप्त करके नियुक्ति प्रक्रिया पर बहुत अधिक प्रभाव डाला, जिसे केवल बहुत ही असाधारण मामलों में ही दिया जा सकता था। यह निर्णय संवैधानिक सुरक्षा उपायों को बनाए रखने और न्यायालयों को किसी भी कार्यकारी हस्तक्षेप से बचाने के लिए अत्यधिक सराहनीय था। न्यायिक स्थानांतरण पर इस फैसले के प्रभाव आज भी प्रासंगिक हैं।

निष्कर्ष

भारत संघ बनाम संकलचंद हिम्मतलाल शेठ मामले में बनाया गया प्रभाव आज भी उल्लेखनीय है क्योंकि इसने भारत में न्यायपालिका की सामंजस्यपूर्ण स्वतंत्रता के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश स्थापित किए। इस फैसले में सरकारी हस्तक्षेप से न्यायिक स्वतंत्रता को देखते हुए यह नियम बरकरार रखा गया कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनकी सहमति के बिना स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।

इस फैसले ने एक मिसाल कायम की, जो शक्तियों के पृथक्करण को बनाए रखने के लिए उल्लेखनीय है, जहां राष्ट्रपति न्यायाधीशों को मनमाने ढंग से स्थानांतरित नहीं कर सकते। यह फैसला न्यायालय को निष्पक्ष रखता है और इसे राजनीतिक रूप से आरोपित होने से रोकता है। न्यायिक स्थानांतरण और न्यायालयों पर कार्यकारी शक्ति से संबंधित चर्चाएं वर्तमान में संकलचंद हिम्मतलाल शेठ के मामले की शिक्षाओं का संदर्भ देती हैं।

इस मामले ने इस बात पर भी जोर दिया है कि न्यायिक स्थानांतरण को नियंत्रित करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 को किस तरह मान्यता दी गई है। इसके अलावा, इसने सहमति को एक आवश्यक तत्व के रूप में स्थापित करके न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत किया। इस मिसाल के कारण, भारत के राष्ट्रपति एकतरफा स्थानांतरण नहीं कर सकते हैं; इसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करने में योगदान दिया।

कई दशकों के बाद भी, संकलचंद हिम्मतलाल शेठ का मामला अभी भी प्रशासनिक अतिक्रमण से न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाला एक अग्रणी मामला माना जाता है। इस मामले द्वारा स्थापित प्रमुख सिद्धांतों को अभी भी न्यायालयों के अंदर शक्तियों की अखंडता और पृथक्करण (सेप्रेशन) को बनाए रखने के लिए लागू किया जाता है। आखिरकार, इस मामले ने सहमति को एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्थापित किया और न्यायिक हस्तांतरण के संचालन को प्रभावित किया। फिर भी मनमाने हस्तांतरण को रोककर भारत की कानूनी प्रणाली की तटस्थता (न्यूट्रैलिटी) और समानता को बरकरार रखा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण के संबंध में भारतीय संविधान में क्या लिखा है?

  • संविधान के अनुच्छेद 222 के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सहित उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के अधीन राष्ट्रपति द्वारा एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है। 
  • इसमें यह भी निर्दिष्ट (स्पेसिफाई) किया गया है कि स्थानांतरित न्यायाधीश को प्रतिपूरक भत्ता मिलेगा। 
  • इसमें कहा गया है कि किसी भी न्यायाधीश को कार्यपालिका द्वारा स्थानांतरित करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाना चाहिए। 
  • समय-समय पर यह अनुशंसा की जाती रही कि प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक तिहाई न्यायाधीश अन्य राज्यों के होने चाहिए।

न्यायाधीशों का स्थानांतरण विवादास्पद क्यों है?

  • जब लोगों का मानना ​​है कि किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण दुर्भावनापूर्ण (मलीशियस) इरादे से किया गया था, तो स्थानांतरण आदेश विवादास्पद हो जाते हैं।
  • अधिकांश मामलों में न तो सरकार और न ही सर्वोच्च न्यायालय स्थानांतरण का उद्देश्य बताते हैं। 
  • यदि तर्क किसी न्यायाधीश के प्रदर्शन के प्रतिकूल निर्णय पर आधारित है, तो रहस्योद्घाटन (रिविलेशन) से न्यायाधीश की स्वतंत्रता और उस न्यायालय में उसके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ेगा, जहां उसे स्थानांतरित किया गया है।
  • हालांकि, जब कारण नहीं बताया जाता है, तो इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा सकती हैं कि क्या निर्णय न्यायाधीश के खिलाफ की गई शिकायतों के जवाब में लिया गया था या फिर किसी विशिष्ट निर्णय के लिए दंड के रूप में लिया गया था, जिससे कार्यकारी शाखा को परेशानी हुई थी।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को शपथ कौन दिलाता है?

संबंधित राज्य का राज्यपाल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश को शपथ दिलाता है और भारत के राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। इसके अलावा, न्यायपालिका में नियुक्तियों से संबंधित मामलों के लिए मंत्रिपरिषद और सर्वोच्च न्यायालय मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 219 में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति को राज्य के राज्यपाल या राज्यपाल द्वारा अधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होती है। शपथ और प्रतिज्ञान (एफर्मेशन) प्रक्रिया का वर्णन भारतीय संविधान की तीसरी अनुसूची में किया गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 के अंतर्गत सहमति का क्या अर्थ है?

इस अनुच्छेद के अनुसार, जब किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जा रहा हो, तो उसे इस बारे में सूचित किया जाना चाहिए और स्थानांतरण करने से पहले औपचारिक रूप से चर्चा की जानी चाहिए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को स्थानांतरित करने के मामले में कार्यपालिका के पास पूर्ण अधिकार नहीं है। हालाँकि, न्यायाधीश की सहमति कार्यपालिका को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करती है। यदि न्यायपालिका के निष्पक्ष कामकाज को बनाए रखने के लिए जनहित में कोई कारण है, तो कार्यपालिका भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ उचित परामर्श करने के बाद स्थानांतरण कर सकती है।

कॉलेजियम प्रणाली से क्या अभिप्राय है?

भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीश कॉलेजियम प्रणाली पर काम करते हैं, यह एक निकाय है जो न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों के बारे में सिफारिशें करता है। उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए केवल कॉलेजियम प्रणाली का ही उपयोग किया जा सकता है, और जब तक कॉलेजियम न्यायाधीशों का चयन नहीं कर लेता, तब तक सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर सकती।

संदर्भ

 

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

- Advertisment -Submit articles and win INR 2000*. Also reach our 10 million a year audience.
Advertise on iPleaders Blog

Latest

व्यापार चिह्न अधिनियम 1999 की धारा 59

0
यह लेख Vidushi Kachroo द्वारा लिखा गया है। यह लेख व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 59 के तहत दिए गए पंजीकृत व्यापार चिह्न...