होमCompanies Act 2013हितधारक संबंध समिति: शासन और प्रबंधन 

हितधारक संबंध समिति: शासन और प्रबंधन 

हितधारक संबंध समिति: शासन और प्रबंधन 

 यह लेख Rahena Anandraj द्वारा लिखा गया है, जो स्किल आर्बिट्रेज से पर्सनल ब्रांडिंग प्रोग्राम फॉर कॉरपोरेट लीडर्स कर रही हैं। इस लेख में हम हितधारक (स्टेकहोल्डर) संबंध समिति और उसके शासन और प्रबंधन के विषय पर चर्चा करेंगे। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

हितधारक कौन होता है

‘हितधारक’ वह व्यक्ति, व्यक्तियों का समूह या संगठन होता है, जिसका किसी व्यवसाय की सफलता में वित्तीय/अन्य किसी प्रकार का निहित हित होता है। दूसरे शब्दों में, हितधारक वे होते हैं जो किसी कंपनी की संचालन प्रक्रियाओं से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं या जिनकी क्रियाएं कंपनी के कार्यों को प्रभावित कर सकती हैं। हितधारकों में निवेशक, मालिक, शेयरधारक, कर्मचारी, ग्राहक, मुवक्किल (क्लाइंट), आउटसोर्सिंग सहभागी/विक्रेता, अनुचर (रिटेनर), आपूर्तिकर्ता (सप्लायर), आम जनता, स्थानीय समुदाय, सरकारें, सांविधिक (स्टेच्यूटरी)/नियामक निकाय और व्यापार संघ शामिल होते हैं। हालांकि, एक हितधारक हमेशा शेयरधारक नहीं होता। इसलिए, एक हितधारक संगठन के भीतर या बाहर का कोई भी व्यक्ति हो सकता है।  

हितधारक का कंपनी के प्रदर्शन में हित होता है, जो केवल स्टॉक प्रदर्शन या मूल्याकंन से अधिक होता है और हितधारक का कंपनी की सफलता और समृद्धि में गहरा हित और आवश्यकता होती है। हितधारक किसी भी कंपनी की रीढ़ के जैसे और जोखिम उठाने वाले होते हैं। हितधारक सहभागिता और उनकी सक्रिय भागीदारी के माध्यम से ही कोई कंपनी उनके शासन, रणनीति, कंपनी प्रक्रियाओं, नीतियों और प्रदर्शन को लेकर उनकी अपेक्षाओं को समझने का प्रयास करती है। प्रभावी हितधारक सहभागिता कंपनी की सतत दीर्घकालिक वृद्धि, मजबूत संबंध विकसित करने और कंपनी के भीतर विश्वास बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा, कंपनी के संचालन में हितधारकों की भागीदारी उन्हें कंपनी की सुचारू कार्यप्रणाली के लिए सूचित रणनीतिक और परिचालनात्मक (ऑपरेशनल) बदलाव करने में सक्षम बनाती है।  

हितधारक कंपनी के आंतरिक या बाहरी हो सकते हैं। जहां आंतरिक हितधारक वे व्यक्ति होते हैं, जो रोजगार, स्वामित्व या निवेश के माध्यम से कंपनी से सीधे जुड़े होते हैं, वहीं बाहरी हितधारक वे व्यक्ति होते हैं, जो सीधे कंपनी से संबंधित नहीं होते लेकिन फिर भी व्यवसाय के कार्यों और परिणामों से प्रभावित होते हैं। आंतरिक हितधारकों के उदाहरण कर्मचारी, शेयरधारक, निवेशक आदि हैं, जबकि बाहरी हितधारकों के उदाहरण आपूर्तिकर्ता, लेनदार, जनहित समूह, सांविधिक/नियामक निकाय आदि हैं। 

शासन और प्रबंधन क्या है और इनमें क्या अंतर है 

डिक्शनरी और साधारण समझ के अनुसार, ‘शासन’ का अर्थ है राज्य, लोग, संगठन आदि का शासन करने की प्रक्रिया या तरीका। वहीं, डिक्शनरी और सामान्य समझ के अनुसार, ‘प्रबंधन’ का अर्थ है चीजों, लोगों आदि को नियंत्रित करने या उनके साथ व्यवहार करने की प्रक्रिया।  

अब, ‘शासन’ और ‘प्रबंधन’ शब्दों को अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है और समान संदर्भों या परिस्थितियों में एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है। हालांकि, इनमें यह अंतर है कि शासन का तात्पर्य प्रक्रियाओं, नीतियों, नियमों और विनियमों को तय करना है, जबकि प्रबंधन का तात्पर्य इन तय की गई प्रक्रियाओं, नीतियों, नियमों और विनियमों को लागू करना है।  

निगमित शासन और प्रबंधन

कंपनी पर लागू होने वाले कई कानून, नियम, विनियम, दिशानिर्देश, अधिसूचनाएं, पूर्ववर्ती निर्णय और परिपत्र (सर्कुलर) (जिन्हें आगे “लागू आवश्यकताएँ” कहा जाएगा) हैं। निगमित शासन और प्रबंधन कुछ और नहीं, बल्कि इन लागू आवश्यकताओं को कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कार्यों में मानक संचालन प्रक्रिया और नीतियों के माध्यम से तैयार करना, ढांचा बनाना और लागू करना है। इसी निगमित शासन और प्रबंधन के द्वारा कंपनी अपने मूल्यों, प्रतिष्ठा/ख़्याति (गुडविल) और समग्र कल्याण को एक समग्र तरीके से बनाए रख पाती है।  

निगमित शासन और इसका प्रबंधन केवल कंपनी के निदेशक मंडल द्वारा प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि निदेशक मंडल, जो कि अच्छी तरह से योग्य, अनुभवी और सूचित होते हैं, स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।  

हमेशा विकसित होते रहने वाला निगमित शासन न केवल कंपनी के लिए, बल्कि समाज और इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र के विकास के लिए भी आवश्यक है। निगमित शासन और हितधारक की एकता को निगमित सामाजिक जिम्मेदारी (‘सीएसआर’) का एक महत्वपूर्ण तत्व माना गया है। यह एक निश्चित तरीका है, जो दीर्घकालिक और स्थिरता प्राप्त करने का सुनिश्चित तरीका है।  

भारतीय कंपनी अधिनियम, 2013 में हितधारक संबंध समिति का विचार कैसे आया 

कंपनियों अधिनियम, 2013 लागू होने से पहले, कंपनियों को शेयरधारक शिकायत समितियाँ गठित करने की आवश्यकता थी। यह समिति केवल एक प्रकार के हितधारक, यानी शेयरधारकों की शिकायतों को देखती और सुलझाती थी, और ये शिकायतें केवल लाभांश की न प्राप्ति, वार्षिक रिपोर्ट की न प्राप्ति, पते में परिवर्तन की जानकारी जैसी होती थीं, और अक्सर संचालन, श्रम, पर्यावरण स्थिरता, सेवा गुणवत्ता, निगमित सामाजिक जिम्मेदारी, और कंपनी के अन्य दिन-प्रतिदिन के मामलों से संबंधित अन्य शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता था।  

यह इस कारण था कि शेयरधारक सार्वजनिक कंपनी का एक हिस्सा स्टॉक के शेयरों के माध्यम से रखते हैं, और इसलिए शेयरधारकों का हित स्टॉक की कीमतों की गति और इसके मूल्य में वृद्धि पर निर्भर करता है। शेयरधारकों को कंपनी पर दीर्घकालिक दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता नहीं होती है और वे कभी भी स्टॉक को बेच सकते हैं। इस प्रकार, शेयरधारक आमतौर पर किसी भी समय बाहर निकल सकते हैं और अपनी हानियों को कम कर सकते हैं।  

हालांकि, इसने शेयरधारकों के अलावा विभिन्न हितधारक के हितों की असंगति की स्थिति उत्पन्न कर दी, और इसके परिणामस्वरूप हितों का टकराव हो सकता है क्योंकि एक शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी के मूल्य को बढ़ाने और अधिकतम करने की कोशिश करता है, और यह श्रमिक लागत, कंपनी की सेवाओं की कमी या समाप्ति के रूप में हो सकता है।

सबसे प्रभावी कंपनियाँ अपने सभी हितधारकों के हितों और अपेक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रबंधन करती हैं, जबकि सामान्य समझ यह होती है कि कंपनियाँ केवल शेयरधारकों की संपत्ति को अधिकतम करने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यहीं पर ‘हितधारक पूंजीवाद (कैपिटलिज़म)’ का विचार सामने आया। इसके आगमन के साथ, कंपनियों को अब अपने सभी हितधारक के हितों की सेवा करने की आवश्यकता है, केवल अपने शेयरधारकों के नहीं।  

पहले, भारतीय स्टॉक विनिमय (एक्सचेंज) की प्रविष्टि (लिस्टिंग) समझौते के तहत खंड 49 (जो 31 दिसंबर 2005 से लागू हुआ) को सभी सूचीबद्ध कंपनियों में निगमित शासन में सुधार के लिए तैयार किया गया था। इस खंड 49 के तहत, एक समिति का गठन किया जाता था, जो एक गैर-कार्यकारी निदेशक की अध्यक्षता में होती थी और अन्य सदस्य कंपनी के मंडल द्वारा निर्धारित किए जाते थे, जो विशेष रूप से प्रतिभूति (सिक्योरिटीज) धारकों, यानी शेयरधारकों, प्रतिज्ञापन धारकों (डिबेंचर होल्डर) और अन्य प्रतिभूति धारकों की शिकायतों के निवारण के लिए होती थी। यह समिति प्रतिभूति धारकों की शिकायतों को देखती और शेयरों के हस्तांतरण, तुलन पत्र (बैलेंस शीट) की न प्राप्ति आदि से संबंधित शिकायतों का समाधान करती थी। इस खंड 49 को समय-समय पर संशोधित किया गया था।  

यह महत्वपूर्ण है कि यह प्रावधान पहले के कंपनी अधिनियम, 1956 में लागू नहीं किया गया था, हालांकि, कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत, उस समय की आवश्यकता को देखते हुए शेयरधारकों की शिकायत समिति (एसजीसी) की शुरुआत की गई थी। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, एसजीसी केवल शेयरधारकों पर केंद्रित थी। यह दृष्टिकोण अब भौतिक वास्तविकताओं में बदलाव के कारण विकसित हुआ है। कंपनियाँ अब शेयरधारकों के बजाय हितधारकों (यानी, हितधारकों पूंजीवाद, जो शेयरधारक पूंजीवाद के विपरीत है) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं; इस समिति का नाम कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 178(5) (यहां के संक्षिप्त रूप में ‘अधिनियम’ कहा जाएगा) के माध्यम से बदलकर हितधारक संबंध समिति (एस.आर.सी) किया गया। इस अधिनियम ने ‘एसजीसी’ में ‘शेयरधारक’ और ‘शिकायत’ शब्दों को ‘हितधारक’ और ‘संबंध’ शब्दों से बदल दिया है। इसके अलावा, एस.आर.सी ने सेबी (प्रविष्टि आवश्यकताएँ और प्रकटीकरण नियमावली) नियमों, 2015 (“सेबी  एल.ओ.डी.आर”) के नियम 20 में अपनी जगह बनाई है, जो समय-समय पर संशोधित होते रहते हैं ।

हितधारक संबंध समिति : शासन और प्रबंधन 

हितधारकों संबंध समिति (एस.आर.सी) चार अनिवार्य मंडल समितियों में से एक के रूप में अस्तित्व में आई है। अधिनियम की धारा 178 का उद्देश्य यह है कि कोई भी कंपनी, चाहे वह सार्वजनिक हो या निजी, बेहतर शासन और प्रबंधन के लिए एस.आर.सी का गठन कर सके। एस.आर.सी हितधारकों के हितों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की निगरानी करता है।  

एस.आर.सी कंपनी के मंडल स्तर पर बनाई जाती है, और निदेशक मंडल की स्वीकृति के तहत एस.आर.सी का गठन किया जाता है। किसी कंपनी के निदेशक मंडल को, जिसमें किसी वित्तीय वर्ष के दौरान एक हजार से अधिक शेयरधारक, प्रतिज्ञापन धारक, जमा धारक और अन्य प्रतिभूति धारक हों, एस.आर.सी का गठन करना अनिवार्य है। ऐसी समिति का अध्यक्ष एक गैर-कार्यकारी निदेशक होना चाहिए और वार्षिक आम बैठक में उपस्थित रहना चाहिए ताकि प्रतिभूति धारकों के प्रश्नों का उत्तर दिया जा सके (जैसा कि कंपनियां अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित है)।  

एस.आर.सी में न्यूनतम तीन निदेशक होने चाहिए, जिसमें कम से कम 01 स्वतंत्र निदेशक हो (यदि यह एक सूचीबद्ध कंपनी है और उसके पास आउटस्टैंडिंग प्रतिभूति प्राप्त इक्विटी शेयर हैं, तो एस.आर.सी के दो-तिहाई सदस्य स्वतंत्र निदेशक होंगे) (सेबी  (एल.ओ.डी.आर) विनियमन, 2015 के प्रावधानों के अनुसार)। एस.आर.सी को साल में कम से कम एक बार बैठक करनी होती है।  

अधिनियम और सेबी  एल.ओ.डी.आर (जिसे यहां ‘विधायी प्रावधान’ के रूप में संदर्भित किया गया है) का ध्यान निगमित शासन को मजबूत करने और कंपनी के आंतरिक प्रबंधन को बनाए रखने में सक्षम बनाने पर केंद्रित है। इन विधायी प्रावधानों ने एक अलग समिति (एस.आर.सी) को शामिल करके विशेष रूप से सभी हितधारकों की शिकायतों को संबोधित किया। अब हितधारकों के पास अपनी चिंताओं को व्यक्त करने और कंपनी के प्रबंधन और कार्यों में सुधार के लिए सुधारात्मक उपायों का सुझाव देने के लिए एक मंच है।  

उदाहरण के लिए, एस.आर.सी शिकायतें मांगेगा और उन शिकायतों को हल करने का प्रयास करेगा, जिनमें शेयरों का हस्तांतरण, घोषित लाभांश प्राप्त न होना, वार्षिक रिपोर्ट प्राप्त न होना, ब्याज प्राप्त न होना, शेयर प्रमाणपत्रों का निर्गमन, आम बैठकें आदि शामिल हैं।  

कमियां

हालांकि विधायी प्रावधानों ने अच्छे निगमित शासन और प्रबंधन का प्रयास किया, लेकिन ये यह स्पष्ट नहीं करते कि इसे कैसे लागू किया जाएगा। कोशिश शब्दों के स्थानांतरण तक ही सीमित रही और एस.आर.सी के दायरे में बदलाव नहीं हुआ, जबकि हितधारकों की बढ़ती अपेक्षाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए था।  

एस.आर.सी से उम्मीद की जाती है कि वह शिकायतों का समाधान करने के बजाय संबंध और विश्वास बनाए। यहां तक कि एस.आर.सी की संरचना को भी अच्छे से नहीं सोचा गया और अधिनियम के तहत इसका स्थान भी विशिष्ट और अलग नहीं है, बल्कि यह केवल धारा 178 की एक उप-धारा के रूप में रखा गया है।  

एस.आर.सी, एक समिति होने के नाते, सभी हितधारकों की शिकायतों और हितों की निगरानी करता है, लेकिन यह केवल एक विशेष हितधारक समूह, यानी शेयरधारकों की शिकायतों और हितों को आगे बढ़ाने में लगी रहती है। बाकी हितधारकों, जैसे श्रम संबंधी मुद्दे, ग्राहक सेवाएं, एसओपी/नीतियां आदि, अक्सर उपेक्षित या कम प्राथमिकता के साथ देखे जाते हैं। 

 

निष्कर्ष

हालांकि विधायी प्रावधानों ने “हितधारकों” के सभी हितों को एक छतरी के नीचे लाने में निस्संदेह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, फिर भी सुधार की काफी गुंजाइश बाकी है।  

एस.आर.सी की संरचना में लचीलापन होना चाहिए। एस.आर.सी की भूमिकाओं, जवाबदेही और अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए, और एस.आर.सी को सभी हितधारकों (केवल एक विशेष श्रेणी, जैसे कि शेयरधारकों, तक सीमित न रहते हुए) जैसे कर्मचारियों, विक्रेताओं, ग्राहकों आदि से प्रतिक्रिया सुनने और शिकायतों को हल न करने के मामलों में जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।  

निस्संदेह, एस.आर.सी की भूमिकाओं, जवाबदेही और अधिकारों को स्पष्ट और सुविचारित तरीके से तैयार करने में बदलाव की प्रक्रिया धीरे-धीरे और समय के साथ होगी। फिर भी, यह बदलाव संगठन के समग्र स्वास्थ्य और संपन्नता के लिए प्रारंभ होना चाहिए।  

निगमित शासन और प्रबंधन को उसके शाब्दिक अर्थ में वास्तविकता बनाना संभव नहीं है जब तक कि हितधारकों के लिए संचालन की पारदर्शिता और प्रभावी और कुशल निर्णय लेने को सुगम बनाने के लिए गोपनीयता बनाए रखने के बीच संतुलित दृष्टिकोण न अपनाया जाए। यहीं पर स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।  

संदर्भ

  • Bare Acts: Companies Act, 2013 & SEBI (LODR), 2015

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

- Advertisment -Submit articles and win INR 2000*. Also reach our 10 million a year audience.
Advertise on iPleaders Blog

Latest

व्यापार चिह्न अधिनियम 1999 की धारा 59

0
यह लेख Vidushi Kachroo द्वारा लिखा गया है। यह लेख व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 59 के तहत दिए गए पंजीकृत व्यापार चिह्न...