होमBreach of contract in the gig economy: legal remedies and worker protectionगिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध के उल्लंघन: कानूनी उपचार और श्रमिक संरक्षण 

गिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध के उल्लंघन: कानूनी उपचार और श्रमिक संरक्षण 

गिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध के उल्लंघन: कानूनी उपचार और श्रमिक संरक्षण 

यह लेख Shivam Srivastava द्वारा लिखा गया है, जो लॉसीखो के डिप्लोमा इन एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रेज़ॉल्यूशन पाठ्यक्रम का अध्ययन कर रहे हैं। इस लेख में हम गिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध के उल्लंघन, उसके कानूनी उपचार और श्रमिक संरक्षण के विषय पर चर्चा करेंगे। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

गिग अर्थव्यवस्था क्या है?  

एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो कुशल और अकुशल श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा देती है, जिससे वे स्वतंत्र ठेकेदारों या स्वच्छंद (फ्रीलांस) श्रमिकों के रूप में, गैर-स्थायी आधार पर, अल्पकालिक अवधि के लिए, चाहे वह अनुबंध के आधार पर हो या परियोजना के आधार पर, अपनी आजीविका अर्जित कर सकें, उसे गिग अर्थव्यवस्था कहा जा सकता है। गिग अर्थव्यवस्था का विचार क्षेत्रीय नहीं है और यह वैश्विक बाजारों को शामिल करता है। कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार, गिग अर्थव्यवस्था को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: “काम करने का एक ऐसा तरीका जो इस आधार पर होता है कि लोग अस्थायी नौकरियां करते हैं या काम के अलग-अलग हिस्से करते हैं, और हर एक के लिए अलग-अलग भुगतान किया जाता है, बजाय इसके कि वे किसी नियोक्ता के लिए काम करें।” 

“गिग” शब्द का पहली बार 1915 में एक जैज़ संगीतकार द्वारा उपयोग किया गया था, जो प्रदर्शन के आधार पर अपनी कमाई कर रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता ने व्यवसायों और अन्य संगठनों को अल्पकालिक अवधि के लिए अस्थायी रोजगार की ओर झुकने के लिए मजबूर कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका में, इस वैकल्पिक रोजगार और आजीविका का विकास 1900 के दशक में शुरू हुआ। अमेज़न, एयरबीएनबी, अपवर्क्स, और उबर जैसे व्यापारसंघो द्वारा 1999 से 2010 के बीच उठाए गए कदमों ने गिग की अवधारणा और मांग को बढ़ावा दिया।  हालांकि, भारत की बात करें तो हमें याद करना चाहिए कि पुरानी लाइसेंसिंग, सार्वजनिक क्षेत्र नियंत्रण, और सरकारी नियंत्रण नीति (जिसे एलपीजी नीति के नाम से जाना जाता है) ने 1991 में नई आर्थिक नीति की शुरुआत से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण को सीमित कर दिया था।  भारतीय अर्थव्यवस्था का निजीकरण (प्राइवेटाइजेशन) और वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) की ओर उदार रवैया, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार संचालन और कानूनी प्रक्रियाओं के आउटसोर्सिंग के लिए विभिन्न देशों के व्यापारसंघो के भारत में आने के साथ, अनुबंध आधारित या गैर-स्थायी रोजगार में योगदान दिया। हालांकि, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल बुनियादी ढांचे के समर्थन की कमी के कारण यह प्रक्रिया बहुत धीमी और कम प्रगतिशील रही।  

2010 के बाद और विशेष रूप से 2014 के आम चुनाव के बाद, भारतीय सरकार के दृष्टिकोण और दृष्टि में कौशल विकास, आत्मनिर्भर भारत और डिजिटल इंडिया मिशन की ओर बदलाव, साथ ही संचार क्षेत्र में क्रांतिकारी 4जी, 5जी और फाइबर ऑप्टिकल सेवाओं की शुरुआत ने भारत को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी गिग अर्थव्यवस्था के रूप में तेजी से उभरने में मदद की। वर्तमान में भारत में, 15 मिलियन से अधिक गिग श्रमिक प्लेटफ़ॉर्म-आधारित और गैर-प्लेटफ़ॉर्म-आधारित स्वतंत्र पेशे में सेवा दे रहे हैं, जो वैश्विक गिग अर्थव्यवस्था का 40% है। आर्थिक विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि 2025 तक 350 मिलियन से अधिक फ्रीलांसिंग या स्वतंत्र ठेकेदार नौकरियां उत्पन्न होंगी। 

गिग श्रमिकों के बारे में हमें क्या जानना चाहिए  

गिग श्रमिक वर्तमान युग के श्रमिक बल हैं, जिन्हें विभिन्न शोधों में भविष्य के लिए सबसे लोकप्रिय (ट्रेंडिंग) रोजगार स्वरूप के रूप में देखा जा रहा है। सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2020 के अनुसार, “गिग श्रमिक” वह है जो किसी कार्य को अंजाम देता है या कार्य व्यवस्थाओं में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से स्वतंत्र रूप से कमाई करता है। सरल शब्दों में, गिग श्रमिक अल्पकालिक, परियोजना-आधारित, गैर-स्थायी श्रमिक होते हैं जो आमतौर पर किसी अनुबंध संबंध के तहत काम करते हैं।  वे मालिक-नौकर संबंध के दायित्वों का पालन करते हैं, लेकिन अपने रोजगार के दौरान उन्हें पूर्णकालिक (फुलटाइम) कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलता। प्लेटफ़ॉर्म आधारित और गैर-प्लेटफ़ॉर्म आधारित स्वच्छंद श्रमिक भारत में लंबे समय से काम कर रहे हैं। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि केवल 2020 में सामाजिक सुरक्षा संहिता के माध्यम से “गिग श्रमिक” को श्रमिक बल के रूप में कानूनी रूप से मान्यता दी गई। इस संहिता से पहले, स्वच्छंद श्रमिकों की उपस्थिति केवल कुछ अधिनियमों, जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005, और अनुबंध श्रम अधिनियम, 1970, में ही पहचानी जाती थी। ये अधिनियम अनुबंध श्रमिकों के अधिकारों को पहचानते थे लेकिन उतनी प्रभावी रूप से नहीं। गिग श्रमिकों के रोजगार का स्वरूप कुशल और अकुशल दोनों प्रकार के श्रमिक बलों को शामिल करता है। स्वतंत्र श्रमिक, जैसे कलाकार, सामग्री लेखक (कंटेंट राइटर), कोच, व्यापार प्रक्रिया आउटसोर्सिंग (बीपीओ) या कानूनी प्रक्रिया आउटसोर्सिंग (एलपीओ) में शामिल ठेकेदार, ऑनलाइन शिक्षण संकाय, और सोशल मीडिया समुदाय के श्रमिक, जैसे यूट्यूबर्स, अन्य स्वच्छंद वीडियो ब्लॉगर, डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ, और एसईओ विशेषज्ञ, गिग कार्य संरचना में लगे कुछ कुशल श्रमिकों के उदाहरण हैं।  

दूसरी ओर, मनरेगा, 2005 के तहत काम करने वाले श्रमिक और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से काम करने वाले डिलीवरी बॉय जैसे श्रमिक, अकुशल श्रमिकों के उदाहरण हैं।

गिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध का उल्लंघन  

भारतीय अनुबंध कानून न्याय, समानता और सद्भावना के सिद्धांतों पर आधारित है और यह सभी श्रमिकों, चाहे वे कर्मचारी हों या गिग श्रमिक, जो अनुबंधों के माध्यम से अपने रोजगार संबंध स्थापित करते हैं, को निष्पक्ष सुरक्षा प्रदान करता है। जैसा कि हम जानते हैं, गिग वर्किंग एक असंगठित रोजगार का रूप है, इसलिए इसमें नियमित रोजगार की तुलना में अनुबंध उल्लंघन के मामले अधिक देखने को मिलते हैं। जैसे, रोजगार लाभों की अनुपलब्धता (उचित बोनस, आनुतोषिक (ग्रेच्युटी) भुगतान, बीमा लाभ और भविष्य निधि), और नौकरी से संतुष्टि की कमी, नौकरी बदलने की उच्च दर या प्लेटफ़ॉर्म बदलने के प्रमुख कारण हैं। ज्यादातर मामलों में, ये बार-बार नौकरी बदलने की प्रवृत्ति अनुबंध के तहत अनुबंधात्मक दायित्वों के उल्लंघन की ओर ले जाती है। दूसरी ओर, कई सेवा प्रदाता, जो गिग श्रमिकों को काम पर रखते हैं, अक्सर अनुबंधों की शर्तों के तहत कुछ चतुर चालें चलने की कोशिश करते हैं ताकि वे गिग श्रमिकों को अपने तय वेतन और शर्तों पर बनाए रख सकें। जैसा कि हम जानते हैं, ताली एक हाथ से नहीं बज सकती, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि गिग कार्य अर्थव्यवस्था पिरामिड के निचले हिस्से में मौजूद लोगों की कीमत पर समृद्धि का आनंद लेने जैसी स्थिति है। आइए अनुबंध अधिनियम, 1872, और विशिष्ट अनुतोष (रिलीफ) अधिनियम, 1963, के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा करें, जो गिग अर्थव्यवस्था में अनुबंध उल्लंघन के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:  

एसोसिएटेड  सिनेमास ऑफ अमेरिका, इन्कारपोरोशन बनाम  वर्ल्ड एम्यूजमेंट कंपनी (1937) 201 मीन 94 (मिनेसोटा एस सी) के प्रमुख मामले में यह स्पष्ट रूप से दोहराया गया कि: “अनुबंध का उल्लंघन तब होता है जब एक पक्ष अपनी देनदारी से इनकार करता है, या अपने कार्य से ऐसा असंभव बनाता है कि वह अपने दायित्व को पूरा कर सके, या पूरी तरह या आंशिक रूप से ऐसे दायित्वों को पूरा करने में विफल रहता है।” यह उल्लंघन पूर्वानुमानित (एंटीसिपेटरी) या वास्तविक हो सकता है। पूर्वानुमानित उल्लंघन के मामले में, पीड़ित पक्ष के पास तुरंत मुकदमा करने या प्रदर्शन के लिए प्रतीक्षा करने का विकल्प होता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि अनुबंध को अस्वीकार करने वाला पक्ष समय आने पर प्रदर्शन करना चुन सकता है, और वचनग्राही को इसे स्वीकार करना होगा। गिग श्रमिकों के संदर्भ में मुख्य चिंता उनकी बार-बार नौकरी बदलने की प्रवृत्ति है। अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 39 के प्रावधान के अनुसार: “जब कोई पक्ष अनुबंध को पूरी तरह से पूरा करने से इनकार करता है या खुद को इसे पूरा करने में अक्षम बनाता है, तो वचनग्राही अनुबंध समाप्त कर सकता है, जब तक कि उसने अपने शब्दों या कार्यों से इसके जारी रहने के प्रति सहमति न दी हो।” हालांकि, भारतीय अनुबंध कानून कुछ विशिष्ट अधिकार सेवा प्रदाताओं या प्लेटफ़ॉर्म मालिकों को भी प्रदान करता है, जैसे धारा 63, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि: “हर वचनग्राही वचन के प्रदर्शन को आंशिक या पूर्ण रूप से माफ कर सकता है, प्रदर्शन के समय को बढ़ा सकता है, या उसकी जगह किसी अन्य संतोषजनक विकल्प को स्वीकार कर सकता है।” यह प्रावधान “छूट के सिद्धांत” पर आधारित है और यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि एक प्लेटफ़ॉर्म मालिक गिग श्रमिक के अनुबंध प्रदर्शन की आवश्यकता को माफ कर सकता है, और यह गिग श्रमिक की ओर से अनुबंध का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। इसी तरह, विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 10 सेवा प्रदाता या प्लेटफ़ॉर्म मालिक के पक्ष में विशिष्ट प्रदर्शन का दावा करने का अधिकार प्रदान करती है, जब कोई अन्य उपयुक्त उपाय हुए नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं होता।  

हालांकि, धारा 16(b) गिग श्रमिकों को यह सुरक्षा प्रदान करती है कि: “यदि सेवा प्रदाता खुद प्रदर्शन करने में अक्षम हो जाता है, अनुबंध की किसी आवश्यक शर्त का उल्लंघन करता है, या जानबूझकर अनुबंध के उद्देश्य को नष्ट करने वाले कार्य करता है, तो ऐसे सेवा प्रदाता को अनुबंध के तहत विशिष्ट प्रदर्शन का अधिकार नहीं होगा।” 

गिग श्रमिकों और सेवा प्रदाताओं के लिए कानूनी उपाय 

भारतीय अनुबंध अधिनियम स्वयं गिग श्रमिकों और सेवा प्रदाताओं के लिए विभिन्न कानूनी उपायों का सुझाव देता है, जो उनके लिए सुरक्षा का एक अच्छा माध्यम हो सकते हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 73 और 74 किसी भी प्रकार के उल्लंघन के खिलाफ सेवा प्रदाताओं को निर्धारित (लिक्विडेटेड) और अनिर्धारित (अनलिक्विडेटेड) हर्जाने के रूप में उपाय प्रदान करती है। इसके अलावा, जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 सेवा प्रदाताओं और प्लेटफ़ॉर्म मालिकों के पक्ष में विशिष्ट प्रदर्शन के अधिकार प्रदान करता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि गिग श्रमिकों के पक्ष में कोई अधिकार नहीं हैं। गिग श्रमिक अपने पक्ष में उपलब्ध किसी भी आधार पर खुद का बचाव कर सकते हैं, जैसा कि विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 9 में स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट है। ये आधार पक्षकारों की अक्षमता, स्वतंत्र सहमति की कमी, विचारो (कंसीडरोशन) की कमी, या विवाह या व्यापार में किसी प्रकार के प्रतिबंध से संबंधित हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 62 गिग श्रमिकों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है:  “यदि अनुबंध में बिना गिग श्रमिकों की सहमति और जानकारी के कोई एकतरफा नवीनता (नावेल्टी) लाई जाती है, तो इसे धारा 62 के प्रावधानों के तहत नवीनता नहीं माना जाएगा।”  

1984 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि: “जहां पक्षकारों ने आपसी सहमति से सिनेमा हॉल किराए पर लेने की दरें तय की थीं, वहां उनमें से किसी एक को बाद में उन्हें एकतरफा रूप से बदलने की अनुमति नहीं दी गई थी।”  

सुझाव और निष्कर्ष  

उपरोक्त चर्चा किए गए तथ्यों और प्रावधानों के आधार पर यह सुझाव और निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत के वाणिज्यिक (कमर्शियल) कानून गिग कार्य रोजगार के पहलुओं को प्रभावी ढंग से संभाल रहे हैं। लेकिन गिग श्रमिकों के लिए अधिक प्रभावी और कुशल सुरक्षा न्याय प्रदान करने के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा कुछ विशिष्ट कानून बनाए जाने चाहिए। इसके अलावा, यदि हम कुछ विशिष्ट क्षेत्रों की बात करें जो तुरंत वैधानिक स्वीकृति की आवश्यकता रखते हैं, तो उनमें गिग श्रमिकों के लिए उनके काम के घंटे, न्यूनतम वेतन, और अन्य रोजगार लाभों जैसे आनुतोषिक और बोनस का भुगतान, साथ ही कर्मचारी मुआवजा को विनियमित करने के लिए श्रम से संबंधित कानून शामिल होने चाहिए। अतिरिक्त रूप से, गिग श्रमिकों के बार-बार रोजगार बदलने की समस्या को हल करने के लिए श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा कुछ निष्पक्ष विनियम और दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए, जो गिग श्रमिकों और सेवा प्रदाताओं दोनों के हितों की रक्षा करें और अनुबंध उल्लंघन की संभावनाओं को कम करें।  

न्यायालय की कार्यवाही का विकल्प प्रदान करने के लिए एक अलग विवाद समाधान तंत्र की आवश्यकता है। इसके साथ ही, गिग श्रमिकों की गैर-कर्मचारी स्थिति की समस्या को हल करने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन या नए कानूनी प्रावधान लाने की जरूरत है, क्योंकि यह मुख्य आधारभूत समस्या है जिसे तुरंत विधायी निकायों द्वारा हल करने की आवश्यकता है। इसलिए, इस लेख में चर्चा किए गए तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर, यह निष्कर्ष निकलता हैं कि गिग श्रमिकों के बीच विश्वास निर्माण और उनके वाणिज्यिक व गैर-वाणिज्यिक मुद्दों को हल करने के लिए विधायी निकायों और सेवा प्रदाताओं दोनों की ओर से कुछ गंभीर और प्रभावी उपायों की तुरंत आवश्यकता है।  

संदर्भ 

  • अवतार सिंह, भारतीय अनुबंध अधिनियम, धारा 62 
  • अवतार सिंह, अनुबंध और विशिष्ट राहत (12वीं संस्करण, 2017)  
  • शेफर्ड और वेलिंगटन, अनुबंध और अनुबंध उपाय (4था संस्करण) 805  

 

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