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वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण का एक अवलोकन

वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण का एक अवलोकन

यह लेख Rupsa Chattopadhyay द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से इंट्रोडक्शन टू लीगल ड्राफ्टिंग: कॉन्ट्रैक्ट्स, पेटिशंस, ओपिनियन एंड आर्टिकल में सर्टिफिकेट कोर्स कर रही हैं और Shashwat Kaushik द्वारा संपादित किया गया है। इस लेख में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

परिचय

वैवाहिक बलात्कार और हम जिस समाज में रहते हैं, उस पर इसके प्रभाव के बारे में एक मौजूदा बहस है। एक तरफ, यह धारणा है कि अगर हमें एक सभ्य समाज में रहना है जहां महिलाओं को अपने ऊपर बुनियादी स्वायत्तता (ऑटोनोमी) प्रदान की जाती है तो वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का जोरदार विरोध हो रहा है। इस लेख में वैवाहिक बलात्कार के प्रति दृष्टिकोण के साथ-साथ इसे अपराध मानने की व्यापक अनिच्छा पर चर्चा की गई है।

वैवाहिक बलात्कार क्या है?

वैवाहिक बलात्कार विवाह संस्था के भीतर किया गया बलात्कार है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह एक पति या पत्नी द्वारा दूसरे का बलात्कार है। वैवाहिक बलात्कार एक पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ बल प्रयोग द्वारा या जब सहमति स्वतंत्र रूप से नहीं दी गई हो, अवांछित यौन संबंध है। यह समाज के लिए अपमान है जिसने कानूनी प्रणाली में महिलाओं के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। ऐसे लोगों की एक बड़ी आबादी मौजूद है जो वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने में विफलता से प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। वैवाहिक बलात्कार को घरेलू हिंसा का एक पहलू माना जाता है। घरेलू हिंसा एक व्यक्ति के विरुद्ध उसी घर में रहने वाले व्यक्ति द्वारा की गई हिंसा है।

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है कि “यौन शोषण” के साथ-साथ “मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार” को घरेलू हिंसा में शामिल किया गया है। वैवाहिक बलात्कार स्पष्ट रूप से दोनों द्वारा शामिल किया गया है।

विश्व बैंक के अनुसार, 100 से अधिक देशों ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित कर दिया है। भारत उन 36 देशों में शामिल है, जिन्होंने वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना है। हालाँकि भारत के बलात्कार कानूनों में कई बार संशोधन किया गया है, लेकिन वैवाहिक बलात्कार भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के तहत बलात्कार की परिभाषा का अपवाद बना हुआ है।

वैवाहिक बलात्कार का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (पर्सपेक्टिव)

वैवाहिक बलात्कार बुनियादी मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। ऐतिहासिक रूप से, महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति माना गया है। दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं के बलात्कार को पुरुषों की संपत्ति की बर्बरता के रूप में देखा जाता था।

कवरचर का सिद्धांत विवाहित महिलाओं की पहचान के प्रति दृष्टिकोण की व्याख्या करता है। कवरचर का सिद्धांत एक कानूनी सिद्धांत था जिसमें एक विवाहित महिला की पहचान उसके पति के समान ही मानी जाती थी, और इसमें कोई भेद नहीं था। शादी के बाद, एक महिला के कानूनी अधिकार उसके पति द्वारा शामिल किए जाते हैं। एक विवाहित महिला का मूल रूप से कोई अलग कानूनी अस्तित्व नहीं था।

कानूनी परिप्रेक्ष्य

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375, सामूहिक बलात्कार और नियोक्ता द्वारा बलात्कार सहित बलात्कार के प्रावधानों को शामिल करती है। हालाँकि, वैवाहिक बलात्कार को धारा 375 के अपवाद 2 के तहत छूट दी गई है। इसमें कहा गया है कि किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन गतिविधियों को तब तक बलात्कार नहीं माना जाएगा जब तक कि पत्नी पंद्रह वर्ष से कम उम्र की न हो।

2013 में निर्भया बलात्कार मामला के बाद बनी न्यायाधीश वर्मा समिति ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की सिफारिश की थी। हालाँकि, इस विचार को अस्वीकार करने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए गए:-

  • वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण विवाह संस्था को अस्थिर कर देगा।
  • विवाह यौन संबंध के लिए निहित सहमति देता है।
  • अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मनुष्य पर सबूत का बोझ बहुत बड़ा हो जाता है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 को लोकसभा में एक विधेयक के रूप में पेश किया गया है। विधेयक में कुछ बदलाव किये गये हैं जो प्रगति का वादा करते हैं। धारा 63, जो बलात्कार को परिभाषित करती है, अभी भी वैवाहिक बलात्कार से छूट देती है, हालाँकि उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है।

इससे पता चलता है कि 2023 में भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की जरूरत संसद को महसूस नहीं हो रही है।

इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य (2017) का मामला एक सिविल रिट याचिका के रूप में दायर किया गया था। इस मामले में, बाल अधिकार संगठन इंडिपेंडेंट थॉट ने धारा 375 के अपवाद 2 की वैधता को चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 15-18 वर्ष की आयु के बीच एक पुरुष और उसकी पत्नी के बीच सहमति के बिना यौन संबंध बलात्कार के समान होगा। इस प्रकार, सहमति की उम्र 15 से बढ़ाकर 18 कर दी गई। हालाँकि, वैवाहिक बलात्कार से संबंधित कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं लाया गया; केवल सहमति की उम्र बदली गई।

निमेशभाई भरतभाई देसाई बनाम गुजरात राज्य (2018) के मामले में, यह दोहराया गया कि आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार के अपराध के लिए पति पर मुकदमा चलाना संभव नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375, वैवाहिक बलात्कार को शामिल नहीं करती है। धारा 375 के अपवाद 2 में कहा गया है कि किसी पुरुष की 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन गतिविधियां बलात्कार की श्रेणी में नहीं आतीं है।

खुशबू सैफी बनाम भारत संघ और अन्य (2021) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने वैवाहिक बलात्कार पर खंडित फैसला सुनाया। न्यायाधीशों में से एक, न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने धारा 375 के अपवाद 2 को असंवैधानिक ठहराया।

न्यायमूर्ति सी. हरि ने कहा कि विवाहित और अविवाहित जोड़ों के बीच अंतर नहीं किया जा सकता है क्योंकि किसी महिला को उन यौन कृत्यों से बचाने के उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध की कमी है जिसके लिए वह सहमति नहीं देती है।

वैवाहिक बलात्कार का अपवाद इस तरह के संबंध को पूरा करने में विफल रहता है। यहां, अपराधी को केवल पीड़ित के साथ उसके रिश्ते के कारण बचाया जाता है। ऐसे संबंध के आधार पर महिलाओं के खिलाफ गैर-सहमति वाले यौन कृत्यों के बीच मनमाना अंतर किया जाता है। न्यायमूर्ति हरि ने दोहराया कि वैवाहिक बलात्कार के लिए अपवाद खंड भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने में विफलता महिलाओं के खिलाफ उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का कारण बनती है। इसलिए, वैवाहिक बलात्कार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करता है।

इसके अलावा, न्यायमूर्ति शकधर ने उल्लेख किया कि धारा 375(2) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन है, जो भारत के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे अधिकारों में यौन स्वायत्तता के साथ-साथ एजेंसी का अधिकार भी शामिल है।

बलात्कार की शिकार अविवाहित महिला आपराधिक कानूनों के तहत शिकायत कर सकती है। हालाँकि, वैवाहिक बलात्कार की शिकार एक विवाहित महिला के पास ऐसे अधिकार का अभाव है। यह सरासर अन्याय है। अपराध वही रहता है, चाहे अपराधी कोई भी हो। किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने का महिला का अधिकार उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। इससे पता चलता है कि वैवाहिक बलात्कार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है। उन्होंने उल्लेख किया कि यह अन्यायपूर्ण है कि यौनकर्मियों को यौन कृत्यों से इनकार करने का अधिकार है, लेकिन एक विवाहित महिला के पास ऐसा अधिकार नहीं है। वैवाहिक बलात्कार, जो धारा 375(2) के तहत दिया गया है, को ख़त्म करना होगा। इससे पता चलेगा कि समाज शादी की आड़ में पति द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ बिना सहमति के यौन कृत्यों को नजरअंदाज नहीं करता है।

दूसरी ओर, न्यायमूर्ति सी. हरि ने महसूस किया कि वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण अब संभव नहीं है; कई अन्य कारकों पर विचार किया जाना है, और यह अपराधीकरण विधानमंडल द्वारा किया जाना है।

न्यायमूर्ति राजीव शंकर ने वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण के खिलाफ फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि, भारतीय दंड संहिता के अनुसार, जीवित विवाह के भीतर कोई बलात्कार नहीं हो सकता है। जब विवाह के भीतर गैर-सहमति वाले यौन कृत्यों को विवाह के बाहर से अलग तरीके से व्यवहार किया जाता है तो कोई भेदभाव नहीं होता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का अपवाद 2 एक तर्कसंगत संबंध पर आधारित है जिसे संहिता प्राप्त करना चाहती है। इस प्रकार, यह भारतीय संविधान के भाग III के तहत दिए गए किसी भी अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है। 

माननीय न्यायाधीश के अनुसार, न्यायालय के पास यह सुनिश्चित करने का अधिकार नहीं है कि क्या वस्तु इस तरह के भेद को उचित ठहराती है। प्रश्न से संबंधित रिट भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार की सीमाओं का उल्लंघन करेगी।

इस प्रकार, दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित खंडित फैसले से ऐसा प्रतीत होता है कि समाज में वैवाहिक बलात्कार के संबंध में अलग-अलग विचार हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में हृषिकेश साहू बनाम कर्नाटक राज्य (2018) मामले की सुनवाई तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा की जानी है। इस मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों में से एक भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं- न्यायमूर्ति डी. वाई. चद्रचूड़, भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला हैं। इस मामले में शीर्ष अदालत को इस पर फैसला देना है कि वैवाहिक बलात्कार का अपवाद खंड संवैधानिक है या नहीं।

समाज द्वारा वैवाहिक बलात्कार की धारणा

भारत में महिलाओं को आज भी पुरुषों की संपत्ति माना जाता है। उन्हें उनके पिता या भाइयों की संपत्ति माना जाता है, और उनके विवाह के बाद उनके पतियों की। विवाह के बाद महिलाओं को अपने पति की देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। आम लोग सोचते हैं कि विवाह पति-पत्नी के बीच संभोग का लाइसेंस है और उनके लिए यह समझना मुश्किल है कि ऐसे संभोग के लिए सहमति की आवश्यकता होती है। विधायकों और कई न्यायाधीशों द्वारा भी इसी दृष्टिकोण को बरकरार रखा गया है।

वैवाहिक बलात्कार को अपराध क्यों नहीं माना जाता?

ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं बनाया गया है। भारत में कुछ कारण निम्नलिखित हैं:

जागरूकता की कमी

भारत में सहमति की अवधारणा को लेकर समझ की कमी है। एक पुरुष और उसकी पत्नी के बीच संभोग अपरिहार्य माना जाता है। ऐसी सहमति की आवश्यकता को मात्र औपचारिकता माना जाता है और इसका कोई मूल्य नहीं है। इसलिए, वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती है।

सिद्ध करने में कठिनाई

घरेलू हिंसा और वैवाहिक बलात्कार जैसे अपराध घर की सीमा के भीतर ही किये जाते हैं। दोषसिद्धि के लिए साक्ष्य एकत्र करना कठिन है। अगर पीड़ित बोलना भी चाहें, तो अक्सर उन्हें बात अपने तक ही सीमित रखने और समझौता करने के लिए मना लिया जाता है। सबूत इकट्ठा करना और यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि ऐसे अपराध किए गए थे।

उत्पीड़न के हथियार

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A को एक प्रगतिशील कानून माना जाता था जो प्रताड़ित महिलाओं के अधिकारों को कायम रखता है। हालाँकि, कई मामलों में इसका दुरुपयोग किया गया। यह तलाक के मामलों में पुरुषों और उनके रिश्तेदारों को परेशान करने का एक उपकरण बन गया है। यह अलग हो चुके पतियों से प्रतिशोध का एक साधन बन गया है। यह आशंका है कि वैवाहिक बलात्कार महिलाओं के हाथों में उन्हें दंडित करने और उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाने का एक समान उपकरण बन जाएगा।

सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ (2005) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां घरेलू हिंसा के झूठे मामले किसी गलत मकसद से दर्ज किए गए हैं। ऐसे मामलों में दोषमुक्ति आरोप के काले दाग को मिटाने में विफल रहती है। इसलिए, धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ निवारक उपाय किए जाने चाहिए। विधायकों को यह सुनिश्चित करने का तरीका ढूंढना होगा कि झूठी शिकायतों का उचित निपटारा किया जाए।

मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य (2009) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 478A के तहत शिकायत दर्ज करने के लिए, संबंधित महिला को लगातार अवधि तक या शिकायत से ठीक पहले क्रूरता का शिकार होना होगा। केवल झगड़ा क्रूरता नहीं है।

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के कारण

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के पक्ष में कुछ तर्क निम्नलिखित हैं:

  • महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति माना जाता है- यदि वैवाहिक बलात्कार बलात्कार का अपवाद बना रहता है, तो यह दृष्टिकोण बरकरार रहेगा कि महिलाएं केवल पुरुषों की संपत्ति हैं। यह दृष्टिकोण समानता और लैंगिक न्याय के विचारों के लिए हानिकारक होगा। यह महिलाओं के अस्तित्व के बारे में भी एक प्रतिगामी धारणा है। इस तरह के दृष्टिकोण को खारिज करने के लिए वैवाहिक बलात्कार को अपराधीकरण की आवश्यकता है।
  • अनुच्छेद 14 का उल्लंघन- बलात्कार धारा 375 के तहत एक अपराध है और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 के तहत दंडित किया जाता है। हालांकि, वैवाहिक बलात्कार को छूट है। इससे विवाहित और अविवाहित महिलाओं के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाता है। विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है और उसी अपराध की स्थिति में अविवाहित महिलाओं के लिए उपलब्ध उपायों का अभाव है। इस तरह का भेदभाव भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पति का अपराध का अपराधी होना छूट का आधार नहीं होना चाहिए।
  • अनुच्छेद 21 का उल्लंघन- भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है। वैवाहिक बलात्कार महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है। इससे उनसे बुनियादी गरिमा और सम्मान छीन लिया जाता है। यह उन्हें अत्यंत पतन का जीवन जीने के लिए मजबूर करता है।

निष्कर्ष

वर्तमान में, वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के प्रति व्यापक अनिच्छा है। वैवाहिक बलात्कार, विशेषकर इसके दुरुपयोग के बारे में संदेह के कुछ वैध कारण हैं। इसके अलावा, वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण की आवश्यकता के बारे में जागरूकता की कमी है। विवाहित महिलाओं की पहचान और विवाह को संभोग का लाइसेंस मानने के संबंध में पुरानी धारणाएं हैं।

हालाँकि, वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने में विफलता का वैवाहिक बलात्कार के पीड़ितों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। यह विवाहित बलात्कार पीड़ितों और अविवाहित लोगों के खिलाफ व्यवस्थित भेदभाव का कारण बनता है।

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की दुविधा जटिल है। विवाहित महिलाओं की अलग पहचान और व्यक्तित्व को लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी। पुरुषों को स्वतंत्र सहमति की अवधारणा के बारे में सिखाया जाना चाहिए और यह कि विवाह स्वेच्छा से यौन संबंध बनाने का लाइसेंस प्रदान नहीं करता है।

व्यक्तियों को सिखाया जाना चाहिए कि अपराध के आधारहीन आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए। ऐसे आरोप वास्तविक पीड़ितों की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं। नागरिकों को अपराध के झूठे आरोपों के निहितार्थ के प्रति सचेत किया जाना चाहिए।

सतर्कता और शिक्षा की जरूरत है। सिर्फ कानून बदलने से कोई असर नहीं पड़ता। हालाँकि, सामाजिक परिवर्तन के लिए कानूनों की भी आवश्यकता होती है। वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण ऐसे पूर्ववृत्तों के साथ होना चाहिए।

संदर्भ

 

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