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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30: क्या यह निरपेक्ष है?

यह लेख Aastha Verma द्वारा लिखा गया है, जो कलिंग विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ से बीए एलएलबी कर रही हैं। इस लेख में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों (माइनोरिटी) के अधिकारों और अल्पसंख्यक समुदाय में सरकार की भूमिका को शामिल किया गया है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30

अल्पसंख्यक शब्द को भारतीय संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। इसका अंग्रेज़ी शब्द “माइनोरिटी” लैटिन शब्द ‘माइनर’ और प्रत्यय (सफिक्स) ‘इटी’ से बना है जिसका अर्थ कम संख्या में होना है। अनुच्छेद 30 भारतीय संविधान के भाग III के तहत परिभाषित किया गया है जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को परिभाषित करता है जो उसे उसके धर्म, जाति, और लिंग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के दिए जाते है। इसे ‘शैक्षिक अधिकारों का चार्टर’ भी कहा जाता है। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक समुदायों को उनकी पसंद के शिक्षण संस्थान की स्थापना और प्रशासन करने के अधिकारों की पुष्टि करता है। यह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुनिश्चित करता है जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। भारतीय समाज विभिन्न समुदायों का मिश्रण है और इसकी विविधता (डायवर्सिटी) ही इसकी ताकत है। हमारा संविधान अल्पसंख्यक समुदाय को इन अधिकारों की गारंटी देता है ताकि देश की विविधता को संरक्षित किया जा सके और उनकी संस्कृति का प्रचार किया जा सके। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सभी के लिए समानता के सिद्धांत के द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों की रक्षा करता है। यह अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को उनकी भाषा में शिक्षा देने का अधिकार भी देता है।   

अल्पसंख्यकों को केवल भाषाई आधार पर सीमित करने के लिए संविधान सभा में एक बहस हुई थी और यह तर्क दिया गया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) राज्य है और इसे धर्म के आधार पर वर्गीकृत नहीं किया जाना चाहिए। विधानसभा के एक अन्य सदस्य ने प्रस्तावित किया कि अल्पसंख्यक आबादी के अधीन अपनी भाषा और लिपि में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। संविधान सभा ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और अल्पसंख्यकों को दो भागों में विभाजित कर दिया:

  • धार्मिक अल्पसंख्यक- धार्मिक अल्पसंख्यक, समुदाय की संख्यात्मक ताकत से तय होते हैं। भारत में, हिंदू बहुसंख्यक हैं और सरकार के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना महत्वपूर्ण है। चूंकि भारत एक बहु-धार्मिक देश है, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (कमीशन) 1992 की धारा 2(c) के तहत छह समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है। वे हैं- मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी। यह अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए स्थापित किया गया है। 
  • भाषाई अल्पसंख्यक- जिन लोगों की मातृभाषा बहुसंख्यक समूह से भिन्न होती है, उन्हें भाषाई अल्पसंख्यक माना जाता है। भारतीय संविधान सभी के लिए समानता के सिद्धांत द्वारा इन अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350A, शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर भाषा को मातृ भाषा में अनुवादित करने के लिए पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करने के लिए राज्य पर एक दायित्व लगाता है।   

टी.एम.ए.पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 से संबंधित दिशा-निर्देश निर्धारित किए थे। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों का निर्धारण हर राज्य के अनुसार किया जाएगा और न कि राष्ट्रीय स्तर पर। उचित कामकाज, छात्रों और शिक्षकों की भलाई के संबंध में विनियमन सरकार द्वारा लगाया जा सकता है। सरकार मानक नियम लागू कर सकती है, लेकिन उन्हें संस्था के अल्पसंख्यक चरित्र को नष्ट नहीं करना चाहिए और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान में सरकार का हस्तक्षेप बहुत सीमित होना चाहिए।   

अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान तीन प्रकार के होते हैं-

  1. संस्थाएं जो राज्य से मान्यता और सहायता की मांग करती हैं।
  2. संस्थाएं जो राज्य से मान्यता की मांग करती हैं न कि सहायता की।
  3. संस्थाएं जो न तो मान्यता की मांग करती हैं और न ही राज्य से सहायता मांगती हैं।

जो संस्थाएं राज्य से मान्यता की मांग करती हैं और राज्य से सहायता प्राप्त करती हैं या नहीं भी करती, तो वे राज्य के नियमों का पालन करने के लिए बाध्य हैं और ये नियम शिक्षण कर्मचारियों के रोजगार, अनुशासन, शैक्षणिक मानकों और स्वच्छता आदि से संबंधित हैं। और संस्थान जो न तो राज्य से मान्यता और न ही सहायता की मांग करते हैं, वह उनके नियमों को लागू करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उन्हें श्रम कानून, संविदा (कॉन्ट्रेक्ट), औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) कानून आदि जैसे सामान्य कानूनों का पालन करना होगा। इसके अलावा, इन संस्थानों को राज्य द्वारा निर्धारित पात्रता मानदंड का पालन करना होगा। वे तर्कसंगत प्रक्रिया से ही शिक्षकों की नियुक्ति करने के लिए स्वतंत्र हैं। 

अनुच्छेद 30 पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज बनाम टी. जोस और अन्य (2006) के मामले में दिए गए निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को दिया गया अधिकार बहुसंख्यक के साथ समानता सुनिश्चित करना है, जिसका मतलब यह नहीं है कि यह अल्पसंख्यकों को लाभप्रद स्थान देने के लिए हैं और इसलिए सामान्य कानून सभी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होंगे। साथ ही, एक मुद्दा उठाया गया था कि अनुच्छेद 30A भगवत गीता, वेद, पुराण आदि के शिक्षण को प्रतिबंधित करता है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद 30A नहीं है।  

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा– भारत सरकार के लिए क्यों ज़रूरी है?

भारत सरकार ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के साथ भेदभाव करने वाले कानूनों और नीतियों को अपनाया है। दिल्ली में सांप्रदायिक (कम्यूनल) हिंसा के दौरान कुल 53 लोग मारे गए थे, जिनमें से 40 मुसलमान थे। जांच करने के बजाय, भाजपा नेताओं ने हिंसा और भड़काई और कार्यकर्ताओं और विरोध आयोजकों (ऑर्गनाइजर्स) को निशाना बनाया था।

नवंबर 2020 में, जब सिख कृषि बिलों का विरोध कर रहे थे, तो सरकार ने विरोध का जवाब दिया और उनके आरोपों की जांच की। 8 फरवरी को, प्रधान मंत्री ने संसद में किसानों के शांतिपूर्ण विरोध के लिए भारत में बढ़ते अधिनायकवाद (ऑथोरिटेरियन) की अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का आह्वान किया था।

दिसंबर 2019 में सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 पारित किया जो नागरिकता प्रदान करते समय मुस्लिम धर्म के साथ भेदभाव करता है। सरकार ने एकमात्र मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य को दी गई संवैधानिक स्वायत्तता (ऑटोनोमी) को रद्द कर दिया और लोगों के मूल अधिकारों के उल्लंघन में प्रतिबंध लगा दिए। नेताओं और समर्थकों ने मुसलमानों के खिलाफ राष्ट्रीय हितों के खिलाफ साजिश रचने का विरोध किया।          

म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों (रिफ्यूजीस) को अपनी जान और सुरक्षा का खतरा था और भारत सरकार ने उन्हें धमकी दी और उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। राज्य मुस्लिम पशु व्यापारियों पर मुकदमा चलाने के लिए गोहत्या के खिलाफ कानून का इस्तेमाल करते हैं और अफवाहें फैलाते हैं कि उन्होंने गोमांस के लिए गायों को मार डाला है। कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किए हैं जो हिंदू महिलाओं से शादी करने वाले मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ उपयोग किए जाते हैं।

सरकार के कार्यों ने समाज में एक सांप्रदायिक नफरत पैदा की है और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अधिकारियों के भय और अविश्वास को जन्म दिया है। इसलिए, सरकार को भेदभावपूर्ण कानूनों, नीतियों को वापस लेना होगा और अल्पसंख्यकों के खिलाफ दुर्व्यवहार के लिए न्याय सुनिश्चित करना होगा। 

अनुच्छेद 30 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में राज्य कब हस्तक्षेप कर सकता है?

प्रत्येक संस्थान को संस्था के प्रबंधन के लिए नियमित जांच की आवश्यकता होती है ताकि कोई भी उन्हें दी गई शक्ति का दुरुपयोग न कर सके। सरकार शैक्षणिक स्थिति की जांच करने और संस्थान के लिए आवश्यक मानक बनाए रखने की कोशिश करती है। उनके पास शक्ति का दुरुपयोग होने पर कार्रवाई करने की शक्ति है और वे संस्था में कार्यरत शिक्षकों या कर्मचारियों को नियंत्रित भी कर सकते हैं। वे उन्हें संस्था के नियमों और विनियमों का पालन करने के लिए भी कह सकते हैं। नियमों और विनियमों के प्रभावी कामकाज के लिए इन संस्थानों को देखने के लिए राज्य जिम्मेदार है। राज्य को निर्देशात्मक नीतियां (डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स) बनाने का अधिकार है और वह संगठनों के कल्याण के लिए कार्रवाई कर सकता है। लेकिन यह आयोजित किया गया था कि सरकार संस्था के कामकाज पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती क्योंकि यह अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन है। और एक पूर्ण निर्णय के बाद, यह निर्धारित किया गया था कि सरकार निजी संगठनों के लिए नियम और कानून निर्धारित करती है और वही इन अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी लागू होगी।   

अनुच्छेद 30 की सीमा में धन और वित्त (फाइनेंस) के मामले में राज्य से मदद लेने का अधिकार, प्रबंधन निकायों (मैनेजमेंट बॉडीज) और कर्मचारियों को चुनने का अधिकार भी शामिल है। इसके अलावा, ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं। अनुच्छेद 30(1) के पीछे का मकसद अल्पसंख्यक संस्थानो को अस्तित्व में लाना, अपने नियम और शर्तें बनाना और परीक्षाएं कराना और डिग्री और डिप्लोमा प्रदान करना है।               

अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक संस्थान

जनवरी 2017 में, सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने माना कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को केवल वरिष्ठता (सिनियोरिटी) के आधार पर ही नहीं, बल्कि कार्य अनुभव के आधार पर भी योग्य प्रिंसिपल नियुक्त करने का पूर्ण अधिकार है। नियुक्ति उचित है या नहीं और यह जांचने के लिए कि क्या किसी उम्मीदवार के अधिकार का उल्लंघन किया गया है या नहीं, यह उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करके किया जाता है।     

दोहरा परीक्षण मानदंड

रेव. सिद्धर्जभाई (1963) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थान तभी मान्य होगा जब वह दोहरे परीक्षण को पूरा करता है जो अल्पसंख्यक संस्थान को अल्पसंख्यक शिक्षा के लिए अधिक प्रभावी बनाता है। केरल शिक्षा विधेयक मामले (1957) में यह कहा गया था की, अनुच्छेद 30 के तहत प्रमुख शब्द ‘विकल्प’ है। इस प्रकार, प्रत्येक अल्पसंख्यक, सरकार के साथ संबंधों के आधार पर विकल्प कर सकता है और उचित प्रतिबंधों के तहत न्यूनतम योग्यता निर्धारित कर सकता है। योग्यता और अनुभव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) (यू.जी.सी.) के समान ही लागू होंगे लेकिन सरकार अपनी पसंद के शिक्षकों के चयन को लागू नहीं कर पाएगी।        

अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकार

अल्पसंख्यक समुदायों को अपना शिक्षण संस्थान स्थापित करने का अधिकार है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं होना चाहिए। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि अल्पसंख्यकों के अधिकार पूर्ण नहीं होने चाहिए क्योंकि यह राज्य के कानूनों में बाधा करता है जो धर्मनिरपेक्ष उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए बनाए जाते हैं और इसमें शामिल है कि यदि अनुच्छेद 30 पूर्ण है तो सरकार हस्तक्षेप नहीं कर पाएगी, भले ही संस्था अलगाव (सिसेशन) या सशस्त्र क्रांति सिखा रहा है। किसी को भी ऐसा कुछ करने का अधिकार नहीं है जो सिर्फ अपने धर्म का प्रचार करने के लिए सार्वजनिक नीतियों के विरुद्ध हो। संविधान के अनुच्छेद 19(6) के तहत, यह कहा गया था कि सरकार को इस पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। साथ ही, अल्पसंख्यक संस्थान जो पूरी तरह से राज्य द्वारा वित्त पोषित हैं, वह अनुच्छेद 30 के तहत दिए गए अधिकारों के बावजूद इसे प्रशासित करने का अधिकार खो देते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 (1) और 30 (1) अल्पसंख्यक अधिकारों को स्थापित करने और अपने स्वयं के शिक्षण संस्थान को प्रबंधित करने की सुविधा प्रदान करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अनुच्छेद 29(1) यह परिभाषित करने की कोशिश करता है कि अल्पसंख्यक समुदाय कौन हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज बनाम गुजरात राज्य, (1974) के मामले में यह कहा गया था कि दोनों अनुच्छेद परस्पर अनन्य (म्यूचुअली एक्सक्लूसिव) नहीं हैं। भारतीय संविधान अल्पसंख्यक समुदायों को सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार प्रदान करता है ताकि वे अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा और लिपियों को संरक्षित करने में सक्षम हो सकें। 

1978 के 44वें संविधान संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी से हटा दिया है, लेकिन यह सुनिश्चित किया है कि यह अल्पसंख्यक समुदाय के अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत, उन्हें अपनी पसंद का संस्थान स्थापित करने के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए राज्य के साथ औपचारिक सहयोगात्मक (फॉर्मल कोलेबोरेटिव) समझौता होना चाहिए।

निष्कर्ष

धर्म और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की ताकत है। अनुच्छेद 30 शैक्षिक संस्थानों में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को सुनिश्चित करता है और उनके खिलाफ भेदभाव को रोकता है। यह अनुच्छेद जाति, धर्म और लिंग के भेदभाव के बिना अल्पसंख्यकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। संविधान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की गारंटी देता है ताकि देश की विविधता को संरक्षित किया जा सके और पिछड़े हुए लोगों सहित सभी समूहों को उनकी संस्कृति की रक्षा और संरक्षण के लिए अवसर प्रदान किया जा सके। अल्पसंख्यकों को दो समूहों में बांटा गया है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यकों को परिभाषित किया गया है, और भाषाई अल्पसंख्यक ऐसे व्यक्तियों के समूह हैं जिनकी मातृभाषा बहुसंख्यकों से भिन्न है। टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इन अल्पसंख्यक समुदायों के लिए दिशा-निर्देश दिए और कहा कि अल्पसंख्यकों का फैसला राज्य के आधार पर और आबादी के अनुसार किया जाएगा, न कि राष्ट्रीयता के आधार पर। संस्था के नियमों और विनियमों (रेगुलेशन) के प्रभावी कामकाज के लिए सरकार को इन संस्थानों पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। कई बार सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के साथ भेदभाव करती है, इसलिए उन्हें भेदभावपूर्ण कानून वापस लेना पड़ता है और उन्हें न्याय सुनिश्चित करना पड़ता है, क्योंकि यह समाज में सांप्रदायिक असंतुलन पैदा कर रहा है।         

संदर्भ

प्रोबेशन और पैरोल का तुलनात्मक अध्ययन

यह लेख तिरुवनंतपुरम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज की छात्रा Adhila Muhammed Arif ने लिखा है। यह लेख भारतीय कानूनी प्रणाली में प्रोबेशन और पैरोल के प्रावधानों की तुलना करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है। 

परिचय 

आपराधिक कार्यों में लगे लोगों के लिए सजा देना आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण कार्य है। अपराधियों को क्यों और कैसे दंडित किया जाता है, इसके बारे में विभिन्न सिद्धांत हैं। सजा के मुख्य सिद्धांत प्रतिशोधी (रेट्रीब्यूटिव) सिद्धांत, निरोधक (प्रीवेंटिव) सिद्धांत, निवारक (डिटरेंट) सिद्धांत और सुधारात्मक (रिफॉर्मेटिव) सिद्धांत हैं। कारावास, सजा का सबसे लोकप्रिय रूप है और इसे निरोधक और निवारक दोनों कहा जाता है। हालांकि, हम सजा के प्रति समाज के दृष्टिकोण (एप्रोच) में बदलाव देख रहे हैं। अब, कई विद्वानों का मत है कि दंड का एक सुधारात्मक मॉडल आवश्यक है, क्योंकि हमारा प्राथमिक उद्देश्य अपराधियों का सुधार और पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) होना चाहिए। कई शिक्षाविदों और न्यायविदों की राय है कि शारीरिक दंड और कारावास छोटे अपराधियों, विशेष रूप से पहली बार अपराध कर रहे अपराधियों के दिमाग को कठोर कर देते हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि कुछ मामलों में, अपराधियों को खुद को छुड़ाने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। पैरोल और प्रोबेशन दोनों को भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार और पुनर्वास के तरीकों के रूप में मान्यता प्राप्त है। 

प्रोबेशन का अर्थ

प्रोबेशन यानी ‘प्रोबेशन’ शब्द लैटिन शब्द ‘प्रोबरे’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘परीक्षा करना’ या कुछ साबित करना’। यह सुधार का एक वैकल्पिक तरीका है जो हिरासत में रखने के बिना है। यदि यह स्थापित हो जाता है कि कैद अपराधी के लिए उपयुक्त नहीं है, तो अपराधी को जेल जाने के बजाय प्रोबेशन अधिकारियों की देखरेख में उसके समुदाय में छोड़ा जा सकता है। 

भारत में, भारतीय कानूनी प्रणाली में प्रोबेशन से संबंधित प्रावधान मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और अपराधियों के प्रोबेशन अधिनियम (प्रोबेशन ऑफ़ ऑफेंडर्स एक्ट), 1958 के तहत प्रदान किए जाते हैं । प्रारंभ में, सी.आर.पी.सी., 1898 की धारा 562 में प्रोबेशन का प्रावधान दिया गया था। कई संशोधनों के बाद, वर्तमान में धारा 360 द्वारा इसका प्रावधान प्रदान किया गया है । 1973 में संशोधित सी.आर.पी.सी. के लागू होने से पहले भारत की संसद ने 1958 में अपराधियों की प्रोबेशन अधिनियम को अधिनियमित किया था, जिसमें सी.आर.पी.सी. द्वारा कवर नहीं किए गए कुछ प्रावधान शामिल थे। 

दंड प्रक्रिया संहिता

सी.आर.पी.सी. में, प्रोबेशन से संबंधित प्रावधान धारा 360 और 361 में प्रदान किए गए हैं । धारा 360(10) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धारा 360 और 361 के प्रावधान अपराधी प्रोबेशन अधिनियम या बाल अधिनियम, 1960 या ऐसे किसी भी कानून के प्रावधानों की वैधता को प्रभावित नहीं करते हैं। 

अच्छे आचरण के लिए प्रोबेशन पर रिहाई

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 360(1) प्रोबेशन से संबंधित है। इस धारा के अनुसार, यदि 

  1. कोई भी व्यक्ति जो 21 वर्ष से कम उम्र का नहीं है और किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है जिसके लिए सजा या तो सात साल की कैद या जुर्माना है, 
  2. या 21 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति या कोई महिला, किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराए गए हैं जो आजीवन कारावास या मृत्युदंड से दंडनीय नहीं है और अपराधी को अतीत में दोषी नहीं ठहराया गया है, 
  3. और अदालत के सामने पेश होते है, तो अदालत अच्छे व्यवहार या अच्छे आचरण के वादे पर, तुरंत कोई दंडादेश देने के बजाय निदेश दे सकता है कि उसे प्रतिभुओं (सिक्योरिटीज) सहित या उसके बिना, उसके द्वारा एक बॉन्ड लिख देने पर छोड़ दिया जाएगा, कि वह एक निश्चित अवधि के दौरान, जितनी अदालत निदिष्ट करे, उसे बुलाए जाने पर हाजिर होगा। 

फूल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (1979) के मामले में, न्यायालय ने कहा कि अच्छे आचरण के आधार पर प्रोबेशन किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं दी जा सकती, जिसने बलात्कार जैसा जघन्य (हीनियस) अपराध किया हो। 

सम्यक् भर्त्सना (एडमोनिशन) के बाद रिहा करना

धारा 360(3) के अनुसार, निम्नलिखित शर्तों के पूरा होने पर अपराधी को रिहा किया जा सकता है: 

  1. अपराधी को पहले कभी दोषी नहीं ठहराया गया है। 
  2. जिस अपराध के लिए उसे दोषी ठहराया गया है वह चोरी, किसी भवन में चोरी या बेईमानी से हेराफेरी या आई.पी.सी. के तहत कोई भी अपराध है, जो दो साल से अधिक के कारावास या केवल जुर्माने से दंडनीय है। 

अहमद बनाम राजस्थान राज्य (2000) के मामले में, अदालत ने कहा कि यह प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू नहीं हो सकता जिसने सांप्रदायिक (कम्युनिटी) तनाव लाने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल किया हो। 

प्रोबेशन न देने के विशेष कारण

धारा 361 के अनुसार, यदि न्यायालय प्रोबेशन प्रदान नहीं करता है, तो अपराधी को प्रोबेशन प्रदान नहीं करने का कारण निर्णय में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए, चाहे वह सी.आर.पी.सी., अपराधियों की प्रोबेशन अधिनियम, बाल अधिनियम या ऐसा कोई भी कानून हो। 

अपराधियों की प्रोबेशन अधिनियम, 1958 

इस अधिनियम में, सम्यक् भर्त्सना पर रिहाई का प्रावधान धारा 3 द्वारा प्रदान किया गया है और अच्छे आचरण पर प्रोबेशन का प्रावधान धारा 4 द्वारा प्रदान किया गया है, और शर्तें वही हैं जो सी.आर.पी.सी. की धारा 360 में प्रदान की गई हैं। 

अधिनियम की धारा 5, अदालत को अनुमति देती है, यदि यह उपयुक्त पाया जाता है, तो वह अपराधी को पीड़ित को हुए नुकसान या हानि या कानूनी कार्यवाही की लागत के लिए मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दे सकता है। 

अधिनियम की धारा 6, 21 वर्ष से कम आयु के अपराधियों से संबंधित है। इस धारा में निम्नलिखित कहा गया है: 

  • अदालत को पहले यह देखना होगा कि 21 साल से कम उम्र के अपराधी के लिए अधिनियम की धारा 3 या धारा 4 लागू होगी या नहीं। इसके लिए अदालत को प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट मांगनी होगी, जो अनिवार्य है।  
  • रिपोर्ट मिलने पर, अदालत तय कर सकती है कि प्रावधान लागू होंगे या नहीं। 
  • यदि अदालत प्रोबेशन प्रदान नहीं करती है, तो उसे ऐसा नहीं करने के कारणों को स्पष्ट रूप से बताना होगा।

अधिनियम की धारा 7 में कहा गया है कि प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट गोपनीय होती है। ऐसी रिपोर्ट केवल 21 वर्ष से कम आयु के अपराधियों से निपटने के दौरान अनिवार्य है। 

सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन (हार्मोनीयस कंस्ट्रक्शन) का सिद्धांत

भले ही नई सी.आर.पी.सी. को अपराधियों के प्रोबेशन अधिनियम के बाद अधिनियमित किया गया था, यह अधिनियम की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) को प्रभावित नहीं करता है, खासकर जब धारा 360(10) अधिनियम की वैधता को स्पष्ट रूप से मान्यता देती है। इसलिए, हम कह सकते हैं कि अपराधी सी.आर.पी.सी. और अपराधियों की प्रोबेशन अधिनियम दोनों के लाभों के हकदार हैं। सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धांत के अनुसार, विधायिका खुद को अनुबंधित करने का इरादा नहीं रखेगी। इस प्रकार, नई संहिता का अधिनियमन, उपरोक्त अधिनियम की प्रयोज्यता को नष्ट नहीं करेगा। 

गुण और दोष (मेरिट्स एंड डीमेरिट्स)

प्रोबेशन की विधि द्वारा प्रस्तुत गुण निम्नलिखित हैं: 

  1. यह पहली बार अपराध कर रहे अपराधियों को जेल में रह रहे अपराधियों से प्रभावित होने से रोकने में मदद करता है। 
  2. यह किशोर अपराधियों की सुरक्षा और पुनर्वास करता है। 
  3. यह जेलों को अधिक भीड़भाड़ से बचाने में मदद करता है। 
  4. यह अपराधी को समाज में सामान्य रूप से कार्य करने का दूसरा मौका प्रदान करता है।  

प्रोबेशन प्रणाली के दोष निम्नलिखित हैं: 

  1. यह अपराधियों को कानूनी परिणामों से खुद को मुक्त करने की अनुमति देता है। 
  2. यह अपराध करने का इरादे रखने वाले लोगों को एक बुरा संदेश भेजता है कि वे मुक्त होकर बाहर निकल सकते हैं।  

पैरोल का अर्थ

पैरोल शब्द, फ्रांसीसी वाक्यांश ” जे डोने मा पैरोल” से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ “मैं अपना शब्द देता हूं” है। प्रोबेशन की तरह, पैरोल का उद्देश्य कैदी को खुद को छुड़ाने की अनुमति देना है। लेकिन पैरोल रिहाई का एक रूप है जो केवल उन अपराधियों के लिए लागू होता है जो अपनी जेल की सजा काट रहे हैं।

भारत में, पैरोल से संबंधित नियम जेल अधिनियम, 1894 और कैदी अधिनियम, 1900 द्वारा प्रदान किए जाते हैं । हालांकि, भारत में पैरोल का पूरी तरह से एक समान कानून नहीं है क्योंकि राज्य सरकारें पैरोल के लिए अपने स्वयं के कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। पैरोल के दिशा-निर्देशों में एक राज्य से दूसरे राज्य में मामूली बदलाव होते हैं। 

पैरोल से इंकार करना

निम्नलिखित प्रकार के अपराधी हैं जिन्हें पैरोल नहीं दी जा सकती: 

  • जो भारत के नागरिक नहीं हैं। 
  • जिन्हे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है। 
  • जिन्हे राज्य के खिलाफ अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है। 
  • जिन्होंने जेल में अनुशासनात्मक नियमों का उल्लंघन किया है। 

पैरोल के प्रकार

पैरोल मुख्यतः दो प्रकार की होती है, जो कस्टडी पैरोल और नियमित पैरोल हैं। 

कस्टडी पैरोल 

कस्टडी पैरोल को आपातकालीन पैरोल भी कहा जाता है। यह 14 दिनों के लिए परिवार के करीबी सदस्यों जैसे दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, बच्चों, जीवनसाथी आदि की मृत्यु, परिवार के किसी सदस्य की शादी जैसे भाई-बहन या बेटे या बेटी आदि की शादी के लिए दी जाती है। 

नियमित पैरोल

नियमित पैरोल अधिकतम एक महीने की अवधि के लिए दी जाती है, आमतौर पर उन अपराधियों के लिए जिन्होंने अपनी सजा के कम से कम एक वर्ष को पूरा कर लिया है। यह निम्नलिखित कारणों के लिए दी जाती है: 

  • परिवार के कोई सदस्य के गंभीर रूप से बीमार होने के कारण। 
  • परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु या दुर्घटना। 
  • जब दोषी की पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया हो। 
  • पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए।
  • जब किसी प्राकृतिक आपदा से उनके परिवार को जान-माल की गंभीर क्षति हुई हो। 
  • विशेष अनुमति याचिका दायर करने के लिए। 

प्रक्रिया 

पैरोल के लिए याचिका दायर करने पर, आमतौर पर जेल अधीक्षक (सुपरिटेंडेंट) उस थाने से रिपोर्ट का अनुरोध करता है जिसने दोषी को गिरफ्तार किया था। रिपोर्ट, पैरोल के अनुरोध और अधीक्षक की सिफारिश के औचित्य (जस्टिफिकेशन) के लिए आवश्यक सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ, उप सचिव (डेप्युटी सेक्रेटरी), गृह (सामान्य), राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत की जाती है, और वह तय करता है कि दोषी को पैरोल दी जानी चाहिए या नहीं। 

कुछ राज्यों में, उपर्युक्त दस्तावेज जेल के महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जेनरल) को भेजे जाते हैं और फिर वह उन्हें जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजते हैं। जिला मजिस्ट्रेट, राज्य सरकार के परामर्श पर, यह तय करता है कि पैरोल दी जानी है या नहीं। 

गुण और दोष

जैसा कि बुद्धि बनाम राजस्थान राज्य (2005) और चरणजीत लाल बनाम राज्य (1985) के मामलों में स्थापित किया गया था, पैरोल के प्रावधान के कुछ उद्देश्य हैं। निर्णयों के अनुसार पैरोल के प्रावधान के गुण या उद्देश्य निम्नलिखित हैं: 

  1. यह कैदियों को उनके परिवार और समुदाय के संपर्क में रहने में सक्षम बनाता है। 
  2. यह उन्हें अपने परिवार से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों में शामिल होने में मदद करता है, और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को भी हल करता है। 
  3. यह उन्हें जेल में रहने के दुष्परिणामों से थोड़े समय के लिए राहत देता है। 
  4. यह कैदी के पुनर्वास और सुधार के उद्देश्य को प्राप्त करता है। 
  5. यह कैदियों को जेल में अच्छा आचरण बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

पैरोल के प्रावधान के दोष निम्नलिखित हैं: 

  1. कारावास के दौरान अच्छा आचरण होना, रिहाई के बाद अच्छे आचरण होने की गारंटी नहीं देता है। 
  2. राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना बहुत अधिक है। राजनीतिक संबंध रखने वाले विशेषाधिकार (प्रिविलेज) प्राप्त कैदियों को पैरोल प्राप्त करना आसान होता है।  

प्रोबेशन और पैरोल के बीच का अंतर

  1. अपराधियों को प्रोबेशन तब दी जाती है, जब उन्हे कैद किए जाने के बजाय, कड़ी निगरानी के तहत उनके समुदाय में छोड़ दिया जाता है। लेकिन पैरोल कैदियों के लिए एक अस्थायी रिहाई है और इसमें कुछ शर्ते होती हैं जिनका पालन कैदी को उस अवधि के दौरान करना होता है। 
  2. भारत में, प्रोबेशन दंड प्रक्रिया संहिता और अपराधियों की प्रोबेशन अधिनियम द्वारा शासित होती है। लेकिन हम पैरोल के लिए नियमों और विनियमों (रेगुलेशन) का एक समान और ठोस सेट नहीं ढूंढ सकते हैं। हालांकि इसे जेल अधिनियम और कैदी अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त है, राज्य सरकारें अपने स्वयं के पैरोल दिशा-निर्देश जारी करने के लिए अधिकृत हैं, जिससे पूरे देश में पैरोल दिशानिर्देशों में भिन्नता होती है। 
  3. प्रोबेशन का मतलब अदालत द्वारा दोषियों को दिए गए फैसले से है। इस बीच, पैरोल कैदियों की अस्थायी रिहाई की व्यवस्था है। 
  4. प्रोबेशन कारावास के बजाय दी गई सजा का एक वैकल्पिक रूप है, लेकिन पैरोल कारावास के दौरान दी जाती है। पैरोल कारावास का विकल्प नहीं है। 
  5. प्रोबेशन अदालत द्वारा सुनाया जाता है। प्रोबेशन प्रकृति में न्यायिक है। भारत में पैरोल आमतौर पर राज्य के गृह मंत्रालय के उप सचिव या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाती है। पैरोल ज्यादातर अर्ध-न्यायिक (क्वासी ज्युडिशल) प्रकृति की होती है। 
  6. कैदी को कारावास से गुजरने से पहले प्रोबेशन दी जाती है और कैदी को कारावास की न्यूनतम अवधि से गुजरने के बाद पैरोल दी जाती है। 
  7. उन अपराधियों को प्रोबेशन प्रदान नहीं की जाती है जो पहले कैद या दोषी ठहराए जा चुके हैं। कारावास से गुजर रहे किसी भी अपराधी को पैरोल दी जाती है। 
  8. जब एक अपराधी जो प्रोबेशन पर रिहा किया गया है, प्रोबेशन की किसी भी शर्त पर चूक करता है, तो उसे एक विशेष अवधि के लिए जेल में बंद कर दिया जाता है। लेकिन पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने वाले को मूल फैसले के आधार पर कारावास को फिर से शुरू करने के लिए जेल में वापस भेज दिया जाता है। 
  9. प्रोबेशन एक अपराधी की सुधार प्रणाली में पहला चरण है। लेकिन अपराधी को सजा की अवधि से गुजरने के बाद पैरोल अंतिम चरण होता है।
  10. प्रोबेशन के दौर से गुजर रहे व्यक्ति के लिए कम कलंक है क्योंकि उसे जेल की सजा नहीं दी जाती हुई है। लेकिन जब कोई कैदी पैरोल पर छूटता है तो उसे समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 

निष्कर्ष

संक्षेप में, पैरोल और प्रोबेशन दोनों भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में पुनर्वास और सुधार के कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त तरीके हैं, हालांकि इन्हें ‘अधिकार’ के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। यह दोषियों पर कारावास के दुष्प्रभाव को कम करने में मदद करता है और अन्य दोषियों के मन में कठोर अपराधियों के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है। हालांकि, यह दुर्भावनापूर्ण इरादों वाले कई लोगों पर यह धारणा बना सकता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली उदार (लीनिएंट) है और उन्हें कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा। 

संदर्भ

 

आई.पी.सी. की धारा 353: लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल करना

यह लेख नोएडा के सिम्बायोसिस लॉ स्कूल के छात्र Ayush Tiwari ने लिखा है। इस लेख का उद्देश्य, भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत लोक सेवकों पर हमले (असॉल्ट) और आपराधिक बल (क्रिमिनल फोर्स) और साथ ही उसके दंड के बारे में सभी जानकारी प्रदान करना है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत जैसे देश में, हम हमेशा आक्रमण, हमला, आदि जैसे अपराधों के बारे में खबरें देखते हैं; इस तरह के अपराध हमारे देश में बहुत आम हैं और लगभग हर एक दिन होते हैं। आजकल लोक अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है, लोक सेवकों को अक्सर अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण खतरों का सामना करना पड़ता है, और कानून, कानून का उल्लंघन करने वालों पर अत्यधिक निवारक (डिटरेन्ट) प्रतिबंध लगाकर उन्हें विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 (आई.पी.सी.) की धारा 353 इस समस्या से संबंधित है और यह लेख उसी को स्पष्ट करता है, धारा 353 को समझने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि बल और हमला क्या है जिसके कारण लोक सेवक अपने कर्तव्य का पालन करने में सक्षम नहीं होता हैं।

बल 

बल को आई.पी.सी. की धारा 349 के तहत परिभाषित किया गया है। यह एक अपराध का गठन नहीं करता है; बल्कि, यह बल शब्द के अर्थ को स्पष्ट करता है। यह इंगित करता है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को गति, गति में परिवर्तन, या गति की समाप्ति करित करता है, तो उस व्यक्ति को बल का प्रयोग करने वाला माना जाता है। इसके अलावा, गति शुरू करने वाला व्यक्ति नीचे वर्णित तीन तरीकों में से एक का उपयोग करता है:

  1. सबसे पहले, उसकी शारीरिक शक्ति के उपयोग के साथ।
  2. दूसरा, किसी भी सामग्री का इस तरह से निपटान करके कि उसके या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से कोई अतिरिक्त कार्य किए बिना गति, परिवर्तन या गति की समाप्ति होती है।
  3. अंत में, किसी जानवर को गति में ला कर, उसकी गति को समायोजित (एडजस्ट) करके, या उसकी गति को रोक कर।

एक व्यक्ति को ऊपर सूचीबद्ध तीन तरीकों में से किसी एक में बल का प्रयोग करने के लिए कहा जाता है, भले ही ऐसा, वह किसी जानवर को गति में ला कर या दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को प्रभावित करके करता हो। आरोपी वह होगा जो जानवर को गति में लाने के लिए प्रेरित करता है। अपराध करने वाले व्यक्ति से सीधे संपर्क में आने की आवश्यकता नहीं होती है; इसके बिना भी ऐसा किया जा सकता है।

बाहरी वातावरण में गति या परिवर्तन का कारण बनने वाली ऊर्जा (एनर्जी) या शक्ति के प्रयास को बल के रूप में जाना जाता है। शब्द “बल” जैसा कि इस धारा में परिभाषित किया गया है, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे मानव पर लगाए गए बल को संदर्भित करता है। यह निर्जीव वस्तुओं के खिलाफ हिंसा के उपयोग को शामिल नहीं करता है। नतीजतन, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाए बिना गति, गति में परिवर्तन, या गति-प्रेरित संपत्ति की समाप्ति को इस प्रावधान के तहत बल का उपयोग नहीं माना जाता है।

आपराधिक बल

जो कोई भी व्यक्ति, अपराध कारित करने के आशय से किसी अन्य व्यक्ति पर उसकी अनुमति के बिना बल का प्रयोग करता है, इस उद्देश्य से की उस व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ (इरीटेशन) के रूप में हानि हो, तो ऐसा कहा जाता है की उसने अन्य व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है। यह आई.पी.सी. की धारा 350 के तहत दंडनीय है।

आपराधिक बल की अनिवार्यता

धारा 349 में निर्दिष्ट बल एक आपराधिक बल में बदल जाता है जब धारा 350 की अनिवार्यताएं संतुष्ट हो जाती हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • किसी के खिलाफ जानबूझकर बल का प्रयोग: बल का प्रयोग जानबूझकर किया जाना चाहिए।
  • सहमति के बिना: एक व्यक्ति जो किए जा रहे कार्य की प्रकृति को नहीं समझता है, उसके लिए यह नही माना जा सकता है कि वह इससे सहमत है क्योंकि उसने इसे स्वीकार कर लिया है। जब दावा किए गए हमले में अवैध आचरण शामिल हो, तो सहमति का उपयोग बचाव के रूप में नहीं किया जा सकता है। इस कानून के कुछ अपवाद हैं, जैसे कि मित्रतापूर्ण खेल प्रतियोगिताओं के दौरान की गई हड़तालें, लेकिन इन्हें अपवादों के तहत मान्यता नहीं दी जाती है।
  • बल का प्रयोग अपराध करने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ पहुंचाने के लिए किया होना चाहिए।

हमला करना

भारतीय दंड संहिता की धारा 351 में हमले को परिभाषित किया गया है, “जो कोई भी संकेत या तैयारी इस आशय से करता है, या यह जानते हुए करता है कि ऐसे संकेत या तैयारी करने से किसी उपस्थित व्यक्ति को यह आशंका हो जाएगी कि जो वैसा संकेत या तैयारी करता है, वह उस व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करने ही वाला है, तो उसे हमला करना कहते हैं।”

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार हमला “एक ऐसा कार्य है जो किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति की धमकी देता है (चाहे वास्तविक नुकसान हुआ हो या नहीं)”। यह एक ऐसा शब्द है जिसे समझना आसान है लेकिन परिभाषित करना थोड़ा कठिन है। एक साधारण खतरे को हमले के रूप में देखा जा सकता है। अपराध का सार मनोवैज्ञानिक प्रभाव है, जो पीड़ित के लिए खतरा है।

केवल कहे हुए शब्दों से ही हमले का गठन नहीं किया जाता है। हालाँकि, एक व्यक्ति जो शब्द बोलता है, वह उसके कार्यों या तैयारियों को ऐसा अर्थ दे सकते है कि वे एक हमला बन जाए।

हमले की अनिवार्यताएं

  • संकेत या तैयारी करना: आरोपी को गैर कानूनी बल का प्रयोग करने के लिए संकेत या तैयारी करनी चाहिए।
  • ऐसी तैयारी या संकेतों को उस व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए जिसके संबंध में यह किया जाता है।
  • ऐसा कार्य, क्षति या हानि का डर पैदा करने के लक्ष्य के साथ किया होना चाहिए;
  • कार्य ने पीड़ित को भयभीत कर दिया कि किसी अन्य व्यक्ति के कार्यों के परिणामस्वरूप उसे हानि हो सकती है।

हमला एक गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराध है, जिस पर आरोप लगाया जा सकता है, जमानत दी जा सकती है और शमनीय (कंपाउंडेबल) है। कोई भी मजिस्ट्रेट मामले की सुनवाई कर सकता है।

हमले और आपराधिक बल के लिए सजा

जब आई.पी.सी. की धारा 353 से 358 में निर्दिष्ट कोई गंभीर परिस्थितियाँ नहीं हैं, तो धारा 352 के तहत हमला या आपराधिक बल का प्रयोग दंडनीय है।

जब कोई बिना उकसाए दूसरे पर हमला करता है या आपराधिक बल का प्रयोग करता है, तो उस व्यक्ति को तीन महीने की जेल, 500 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है। धारा 352 इसे परिभाषित करती है।

आई.पी.सी. की धारा 353 

यह धारा तब लागू होती है जब सार्वजनिक कर्मचारियों पर उनके कानूनी रूप से अनिवार्य आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए हमला किया जाता है।

एक लोक सेवक कौन होता है

इस अधिनियम के तहत किसी भी कार्य को निष्पादित (एग्जीक्यूट) करते समय या किसी कर्तव्य को निष्पादित करते समय, सक्षम प्राधिकारी (अथॉरिटी), प्रत्येक मध्यस्थ (अर्बिट्रेटर), और केंद्र सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिकृत किसी भी अधिकारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत एक लोक सेवक माना जाएगा। 

आई.पी.सी. की धारा 353 क्या है  

धारा 353 हमें बताती है कि, “जो भी किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो लोक सेवक हो, उस समय जब लोक सेवक के नाते वह अपने कर्तव्य का निष्पादन (एग्जीक्यूट) कर रहा हो, या उस व्यक्ति को लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य के निर्वहन से निवारित (प्रीवेंट) या रोकने के आशय से, या लोक सेवक के नाते उसके अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में किए गए या किए जाने वाले किसी कार्य के परिणामस्वरूप हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करेगा, तो उसे दंडित किया जाएगा।”

एक सार्वजनिक कर्मचारी को अक्सर अपने आधिकारिक कार्यों के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण खतरों का सामना करना पड़ता है, और कानून उन लोगों के लिए असाधारण रूप से निवारक दंड प्रदान करके उनकी रक्षा करता है, जो कानून का उल्लंघन करते हैं। हालांकि, केवल एक प्राधिकारी जो आधिकारिक कार्यों को करने के लिए बाध्य है, वह सुरक्षा का हकदार है। एक समय-सीमा समाप्त वारंट के तहत, कब्जे का आत्मसमर्पण करने की मांग करने वाले एक आयुक्त (कमिश्नर) को भी निष्पादन का विरोध करने वाले पक्ष की भूमि में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। यह खंड उन लोगों को छूट देता है जो अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) से प्रतिरोध (रेसिस्ट) की पेशकश करते हैं। एक सार्वजनिक कर्मचारी, अपने से ऊंचे पद के अधिकारी के तहत एक गैरकानूनी निर्देश का पालन करते हुए धारा 353 की वकालत नहीं कर सकता, भले ही वह इसकी अवैधता से अनजान ही क्यों न हो।

आई.पी.सी. की धारा 353 की अनिवार्यताएं

इस धारा का उपयोग करने के लिए, निम्नलिखित अनिवार्यताओं को पूरा करना होगा: –

  1. एक लोक सेवक पर हमला किया जाना चाहिए या उसे आपराधिक बल के अधीन किया जाना चाहिए; तथा
  2. इसका प्रयोग एक लोक सेवक पर किया जाना चाहिए-
  • जब वह अपनी जिम्मेदारियों को निभा रहा था, या
  • उसे अपने कर्तव्यों को करने से रोकने या हतोत्साहित करने के लक्ष्य के साथ, या
  • अपने कर्तव्यों को करने के दौरान उसने जो कुछ भी किया है उसके परिणामस्वरूप।

आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत सजा

यह एक गैर-संज्ञेय, जमानती और गैर-शमनीय (नॉन कंपाउंडेबल) अपराध है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा इसका विचारण किया जा सकता है। इस प्रावधान के तहत दोषी पाए जाने वाले आरोपी को दो साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत विचारण की प्रक्रिया

यदि धारा 353 के तहत अपराध किया जाता है, तो मुकदमा उसी तरह आगे बढ़ेगा जैसे आई.पी.सी. में निर्दिष्ट किसी अन्य अपराध पर किया जाता है। धारा 353 के तहत किसी अपराध की सुनवाई के लिए प्रक्रिया के विभिन्न चरण हैं, जो धारा 353 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने से शुरू होकर अदालत के फैसले के साथ समाप्त होता है। आइए एक नजर डालते हैं कि नीचे दिए गए चरणों का पालन करके इस धारा के तहत लाए गए मामले को अदालत में कैसे संभाला जाता है।

प्राथमिकी दर्ज करना

पुलिस द्वारा आरोपी के पकड़े जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।

पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट

आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1974 की धारा 173 के तहत, पुलिस को अपराध की जांच (सी.आर.पी.सी.) पूरी करने के बाद अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करनी होती है। यह रिपोर्ट जांच एजेंसी की जांच को अंतिम रूप से प्रस्तुत करने का काम करती है। यदि कोई मामला आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत लाया जाता है, तो अंतिम रिपोर्ट में पुलिस द्वारा मौके पर हासिल किए गए सभी मौजूद सबूत शामिल होंगे, जो यह निर्धारित करने में अदालत की सहायता करते हैं की तत्वों को पूरा किया गया है या नहीं।

चार्जशीट में मामले के तथ्यों के साथ-साथ पुलिस जांच की सभी विशिष्ट शामिल होती हैं। पूछताछ के दौरान आरोपी द्वारा की गई कोई भी टिप्पणी इसमें शामिल होती है और प्राथमिकी की एक प्रति चार्जशीट के साथ जोड़ी जाती है। चार्जशीट दाखिल होने पर मजिस्ट्रेट सी.आर.पी.सी. की धारा 190 के तहत मामले का संज्ञान लेते हैं। अदालत के पास चार्ज शीट को खारिज करने और आरोपी को आरोपमुक्त करने या उसके अपराध को स्वीकार करने और मामले को सुनवाई के लिए निर्धारित करने के लिए आरोप तय करने का विकल्प है।

अभियोजन पक्ष द्वारा की जाने वाली कार्रवाई

अभियोजन पक्ष यह घोषणा करेगा कि चार्ज शीट में आरोपी के खिलाफ आरोपों में मौखिक दुर्व्यवहार और जानबूझकर अपमान शामिल है जैसा कि आई.पी.सी. की धारा 353 द्वारा परिभाषित किया गया है। अभियोजक को संबंधित नियम के तहत आरोपी को दोषी साबित करने के लिए आरोपी के खिलाफ प्राप्त साक्ष्य और गवाहों से दर्ज की गई गवाही के साथ अपने बयान को मजबूत करना आवश्यक है। हालांकि, सी.आर.पी.सी. की धारा 227 के तहत, धारा 353 के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को यह साबित करने का अधिकार है कि मुकदमे को जारी रखने के लिए उसके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे और/ या बेहद अशक्त (वीक) हैं।

अंतिम तर्क

सी.आर.पी.सी. की धारा 314 के अनुसार, कार्यवाही में कोई भी पक्ष अपने सबूत को पेश करने के बाद संक्षिप्त मौखिक तर्क दे सकता है, और फिर मौखिक तर्क समाप्त करने से पहले, वह अदालत को एक ज्ञापन (मेमोरेंडम) प्रस्तुत कर सकता है जिसमें उसके समर्थन में तर्कों की घोषणा स्पष्ट रूप से और अलग-अलग शीर्षकों के तहत की जा सकती है, और ऐसा प्रत्येक ज्ञापन रिकॉर्ड का हिस्सा होगा। विरोधी पक्ष को इसकी एक प्रति तुरंत दी जानी चाहिए।

निर्णय

दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद, न्यायाधीश मामले पर निर्णय करते है और दोषसिद्धि (कनविक्शन) या दोषमुक्ति (एक्विटल) का निर्णय जारी करते है, जैसा भी मामला हो।

मामले

दुर्गाचरण नाइक और अन्य बनाम उड़ीसा राज्य, (1966)

इस मामले में, शिकायतकर्ता को राहत देते हुए आरोपी के खिलाफ डिक्री सुनाई गई थी। उन्होंने उस आदेश के निष्पादन में चल संपत्ति की कुर्की (अटैचमेंट) का अधिग्रहण (एक्वायर) किया, यदि 952.10 रुपये की डेक्रेटल राशि का भुगतान नहीं किया गया तो। जब अदालत का चपरासी, कुर्की वारंट लेकर पहुंचे और कुछ चल संपत्ति को जब्त करने जा रहे थे, तो आरोपी ने लाठियों से उनका विरोध किया।

इसके बाद, शिकायतकर्ताओं ने पुलिस सुरक्षा की मांग की और उसी दिन आरोपी के घर चले गए। आरोपी वहां नहीं था। आरोपी के पिता, जो निर्णय का एक हिस्सा भी थे, ने 952.10 रुपये का भुगतान किया। जब शिकायतकर्ता का पूरा समूह वापस आया तो आरोपी दस-बारह लोगों के साथ पहुंचा और कहा कि पैसा उसे दे दिया जाए। कुछ अन्य लोगों के बीच-बचाव करने पर, आरोपी मौके से फरार हो गया। आरोपी को आई.पी.सी.की धारा 353 के तहत दोषी पाया गया, लेकिन सी.आर.पी.सी. की धारा 195, के तहत लिखित शिकायत की कमी के कारण आई.पी.सी. की धारा 186  के तहत बरी कर दिया गया। आरोपी की ओर से तर्क दिया गया था की धारा 353 के तहत आरोप, आई.पी.सी. की धारा 186 के तहत आरोप के समान तथ्यों पर स्थापित किया गया था। 

चूंकि धारा 186 के तहत अपराध का कोई संज्ञान सी.आर.पी.सी. की धारा 195 में निर्धारित प्रक्रिया को पूरा किए बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है, समान परिस्थितियों के आधार पर आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत एक सजा, सी.आर.पी.सी. की धारा 195 के प्रतिबंधों को दूर करने का प्रयास होगा। इस तर्क को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। यह निर्णय लिया गया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 186 और 353 के तहत अपराध दो अलग-अलग अपराध हैं। धारा 353 एक अपराध है, जबकि धारा 186 नहीं है। ऐसे मामले में जब आरोपी किसी लोक सेवक को उसकी आधिकारिक जिम्मेदारियों के प्रयोग में जानबूझ कर बाधा डालता है, तो धारा 186 लागू होती है। हालांकि, जब सरकारी अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है, तो हमले या आपराधिक बल के उपयोग का तत्व आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि दोनों अपराध काफी अलग थे। नतीजतन, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 195 एक आरोपी को उसी परिस्थितियों के आधार पर एक अलग अपराध के लिए मुकदमा चलाने से नहीं बल्कि उस प्रावधान के दायरे से बाहर करती है। नतीजतन, आरोपी को आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत दोषी पाया गया था।

पी. रामा राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (1983)

इस मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के अनुसार, धारा 353 का मूल एक सार्वजनिक अधिकारी के खिलाफ हमला है, ताकि उसके कार्य में बाधा डाली जा सके। इस मामले में एक सब-इंस्पेक्टर ने आरोपी को सड़क किनारे रोक लेने का अनुरोध किया। मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर वह कार को रोकने के लिए भागा और वह कार मोटरसाइकिल के मडगार्ड से टकरा गई, जिस पर सब-इंस्पेक्टर पीछे बैठा था। अदालत ने निर्धारित किया कि मामले के तथ्य आई.पी.सी. की धारा 353 के आवेदन को उचित नहीं ठहराते है। जब सरकारी कर्मचारी अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन कर रहा हो, तब हमला होना आवश्यक नहीं है। भले ही वह एक सार्वजनिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी जिम्मेदारियों के दौरान जो कुछ भी करता है, और उसके “परिणाम में” घायल हुआ हो, तो धारा 353 लागू हो सकती है।

निष्कर्ष 

हमले को इस डर के रूप में परिभाषित किया गया है कि दूसरा व्यक्ति घायल हो सकता है। यह आपराधिक बल का उपयोग करके दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रतिबद्ध है। इससे सरकारी अधिकारियों समेत लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। नतीजतन, यह अपरिहार्य (अनअवॉयडेबल) था कि हमले और आपराधिक बल से संबंधित कड़े नियमों को अधिनियमित किया जाए और पर्याप्त रूप से क्रियान्वित (इंप्लीमेंट) किया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति जो आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए आपराधिक बल का सामना करता है, उसे कानून द्वारा संरक्षित किया जाए। भारतीय दंड संहिता के अनुसार, जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति पर आपराधिक बल से हमला करता है, उसे दंडित किया जा सकता है या जुर्माना या दोनों हो सकता है।

संदर्भ

  • PSA Pillai’s Criminal Law 14th Ed.
  • KD Gaur’s textbook on Indian Penal Code 6th Ed.

 

सामंजस्यपूर्ण निर्माण का सिद्धांत 

यह लेख कोलकाता के एमिटी लॉ स्कूल के छात्र Aashutosh Sinh ने लिखा है। यह लेख कई मामलों के उपयोग के साथ सामंजस्यपूर्ण निर्माण (हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन) के सिद्धांत की व्याख्या करता है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय

एक कानूनी सिद्धांत एक सिद्धांत या एक स्थिति है जिसे आमतौर पर अदालतों द्वारा लागू और बरकरार रखा जाता है। न्यायपालिका द्वारा विभिन्न न्यायिक व्याख्याओं के आधार पर भारतीय संवैधानिक कानून में समय के साथ विभिन्न न्यायिक सिद्धांत विकसित हुए हैं। ये कानूनी अवधारणाएं एक बार में नहीं बनाई गई है, लेकिन वे असहमति, अशांति, बहस और विधायी समाधानों का परिणाम हैं, और इसमें सुधार की आवश्यकता है। ये स्थितियाँ तब उत्पन्न होती हैं जब क़ानून में अस्पष्टता के कारण क़ानून और उनके प्रावधानों की एक से अधिक व्याख्याएँ होती हैं। क़ानून के अधिनियमित होने के बाद, विधायिका कार्यकारिणी (फंक्टस ऑफिशियो) (अब अधिकार क्षेत्र नहीं है) बन जाती है। कानून के दुभाषिए (इंटरप्रेटर्स) तब सवाल करने में असमर्थ होते हैं या विधायिका के पास वापस जाकर कानून की सटीक व्याख्या का अनुरोध करने में असमर्थ होते हैं, जब वे इसे बना रहे थे। कभी-कभी कानून निर्माताओं ने किसी भी क़ानून का मसौदा तैयार करते समय परिस्थितियों की इतनी विस्तृत श्रृंखला पर इतना विचार नहीं किया होगा। किसी भी क़ानून की व्याख्या के लिए थंब रूल तब सामंजस्यपूर्ण निर्माण का नियम है।

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का पालन तब किया जाता है जब दो या दो से अधिक विधियों या किसी विशेष क़ानून के अनुभागों के बीच असंगति (इनकंसिस्टेंसी) उत्पन्न होती है। इस सिद्धांत के पीछे मूल सिद्धांत है, एक क़ानून का एक कानूनी उद्देश्य होता है जिसे पूरी तरह से पढ़ा जाना चाहिए और उसके बाद, उस क़ानून के सभी प्रावधानों के अनुरूप व्याख्या का उपयोग किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में जहां सभी खंडों में सामंजस्य स्थापित करना संभव नहीं है, तब ऐसे समय उस प्रावधान पर अदालत के फैसले को प्राथमिकता दी जाती है। 

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत के पीछे का इतिहास

सामंजस्यपूर्ण निर्माण का सिद्धांत विभिन्न मामलों में विभिन्न क़ानूनों की कई अलग-अलग अदालती व्याख्याओं के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया है। समय-समय पर, न्यायपालिका ने उन मामलों का फैसला किया है, जिनमें दो अलग-अलग प्रावधानों के बीच विरोध शामिल था। यह सिद्धांत पहले सेंट्रल प्रोविएन्स और बरार अधिनियम (1939) के मामले में सुलह के नियम के रूप में सामने आया था, जहां शामिल अदालत ने भारतीय संविधान में सूची I की प्रविष्टि (एंट्री) और सूची II की प्रविष्टि के बीच विसंगति (डिस्क्रिपेंसी) को हल किया और उनकी सामंजस्यपूर्ण व्याख्या की थी। 

ऊपर बताए हुए मामले में, सवाल यह था कि क्या एक प्रांतीय विधायिका द्वारा तेल की बिक्री पर कर इसे बनाने वाले व्यक्ति द्वारा इस आधार पर लगाया गया था कि यह वास्तव में एक उत्पाद शुल्क था। फिर, एक प्रांतीय विधायिका द्वारा बिक्री कर लगाया जा सकता था, और उत्पाद शुल्क केवल संघ विधायिका द्वारा लगाया जा सकता था। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह अजीब होगा यदि संघ के पास खुदरा (रिटेल) बिक्री पर कर लगाने की अनन्य शक्ति होती है, जब प्रांत के पास व्यापार और वाणिज्य, इसके उत्पादन और आपूर्ति (सप्लाई) और माल के वितरण के संबंध में कानून बनाने की कार्यकारी शक्ति होती है लेकिन वह इसकी सीमाओं के भीतर होती है। इसलिए, यह एक बिक्री कर था और अधिनियम अल्ट्रा वायर्स नहीं था। न्यायालय ने कहा कि दो प्रविष्टियों में कोई अतिव्यापी (ओवरलैपिंग) या संघर्ष नहीं था, जिसकी वजह से एक गैर-बाधा खंड लागू किया जा सकता है। 

श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ (1951) के ऐतिहासिक निर्णय में, सिद्धांत की अवधारणा को भारत के संविधान के पहले संशोधन, 1951 में सभी तरह से ट्रैक किया जा सकता है। जो भारत के संविधान के मौलिक अधिकारों (भाग III) और निदेशक सिद्धांतों (भाग IV) के बीच असहमति के मामले का विषय थी। संवैधानिक कानून मुख्य रूप से तीन महान अंगों के निर्माण और उनके बीच सरकारी शक्तियों के वितरण से संबंधित है, जो कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका है।

इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम का उपयोग किया और माना कि मौलिक अधिकार राज्य के खिलाफ दिए गए हैं और उन्हें केवल कुछ परिस्थितियों में रद्द किया जा सकता है और यहां तक ​​कि संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने के लिए संसद द्वारा संशोधित भी किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों को प्राथमिकता देते हुए कहा कि मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और उनका एक साथ काम करना उनके लिए फायदेमंद होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि मौलिक अधिकार विधायिका और कार्यकारी शक्ति दोनों पर सीमा लागू करते हैं। वे पवित्र नहीं हैं और संसद उन्हें निदेशक सिद्धांतों के अनुरूप लाने के लिए उनमें संशोधन कर सकती है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने रे केरल एजुकेशन बिल केस (1957) मामले में सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत को स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के बीच कोई अंतर्निहित संघर्ष नहीं था और वे एक साथ एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य के लिए एक एकीकृत योजना और एक व्यापक प्रशासनिक और सामाजिक कार्यक्रम का गठन करते हैं। न्यायालय ने उन्हें एक-दूसरे का पूरक (सप्लीमेंट) बताया है। इसलिए, उन्हें सामंजस्यपूर्ण ढंग से समझने का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि अदालतें मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों के बीच किसी भी संघर्ष से बच सकें। वे मूल रूप से एक दूसरे के समानांतर चलते हैं और कोई भी एक दूसरे के अधीनस्थ (सबॉर्डिनेट) नहीं है।

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का दायरा और उद्देश्य

न्यायपालिका और न्यायालयों का उद्देश्य कानून को समग्र रूप से देखना होना चाहिए। कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए कि यह इस्तेमाल किए जा रहे क़ानून के विभिन्न वर्गों या भागों के बीच भ्रम या असंगति को रोके। जब भी दो या दो से अधिक विधियों या किसी क़ानून के विभिन्न खंडों या वर्गों के बीच कोई विसंगति उत्पन्न होती है, तो सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए। यह सीधे सिद्धांत पर आधारित है कि प्रत्येक क़ानून का एक कानूनी उद्देश्य होता है और इसे समग्रता में पढ़ा जाना चाहिए। व्याख्या ऐसी होनी चाहिए कि वह अटल हो और क़ानून के सभी प्रावधानों का उपयोग भी किया जाना चाहिए। इस घटना में कि दो या दो से अधिक विधियों या किसी क़ानून के अलग-अलग खंड या अनुभागों का सामंजस्य संभव नहीं है, इस प्रावधान पर अदालत के फैसले को प्राथमिकता दी जाएगी। 

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत से संबंधित लैटिन मैक्सिम्स

जनरलिया स्पेशलिबस नॉन डेरोगंट

इस लैटिन मैक्सिम का अर्थ है कि जब भी प्रावधान खतरे में होते हैं, तो अदालतें सामान्य आवेदन के प्रावधानों के लिए विशिष्ट प्रावधानों को प्राथमिकता देती हैं। दूसरे शब्दों में, दो विधियों के बीच संघर्ष के मामले में पालन किया जाने वाला सामान्य नियम यह है कि नया आया हुआ प्रावधान पिछले वाले को वापस ले लेता है। कोई भी उस पिछले या विशेष विधान को अप्रत्यक्ष रूप से निरस्त (रीपील), परिवर्तित (अल्टर) या ऐसा करने के विशेष इरादे के किसी भी सुझाव के बिना, केवल ऐसे सामान्य शब्दों के उपयोग से इसे डेरोगंट नहीं मान सकता है। इसका मतलब यह है कि एक पूर्व विशेष कानून बाद के सामान्य कानून में बदल जाएगा यदि निम्नलिखित में से दो शर्तें पूरी होती हैं, तो बाद का कानून, भले ही सामान्य हो, लेकिन प्रबल होगा यदि:

  • दोनों प्रावधान एक दूसरे के विरोधी हैं।
  • पिछले अधिनियम के बाद के विधान में कुछ स्पष्ट संदर्भ है।

जनरलीबस स्पेशलिया डेरोगंट

जनरलीबस स्पेशलिया डेरोगंट भारत में सामंजस्यपूर्ण निर्माण नियम के संबंध में इस्तेमाल किए जाने वाली एक और कानूनी कहावत है। इसका मूल रूप से मतलब है कि विशेष चीजें सामान्य चीजों से अलग हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में, यदि किसी विशेष विषय पर विशेष प्रावधान किया जाता है, तो उससे संबंधित मामलो को सामान्य प्रावधानों से बाहर रखा जाता है। इस नियम को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने विनय कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य विद्युत बोर्ड (2003) के अपने फैसले में कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 351 भारत में हिंदी के विकास के संबंध में एक सामान्य प्रावधान है। अनुच्छेद 348 दूसरी ओर, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के संबंध में एक विशिष्ट प्रावधान है। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 351 की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) पूरी तरह से रोकी गई है। 

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत

आयकर आयुक्त बनाम मेसर्स हिंदुस्तान थोक वाहक (2000) एक ऐतिहासिक मामला है जहां सर्वोच्च न्यायालय ने पांच मुख्य सिद्धांत निर्धारित किए जो सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम को नियंत्रित करते हैं, जो नीचे दिए गए हैं:

  • न्यायालयों को प्रतीत होता है कि विवादित प्रावधानों के टकराव से बचने की कोशिश करनी चाहिए और विवादित प्रावधानों को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि उनमें सामंजस्य बनाया जा सके।
  • एक खंड के प्रावधान का उपयोग दूसरे खंड में शामिल प्रावधान को उखाड़ फेंकने के लिए नहीं किया जा सकता है जब तक कि अदालत अपने सभी प्रयासों के बावजूद अपने मतभेदों को सुलझाने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ लेती है। 
  • ऐसी स्थिति में जब अदालत को असंगत प्रावधानों में मतभेदों को पूरी तरह से सुलझाना असंभव लगता है, ऐसे समय में अदालतों को उनकी व्याख्या इस तरह करनी चाहिए कि जहां तक ​​संभव हो दोनों प्रावधानों को प्रभाव दिया जा सके।
  • न्यायालयों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि व्याख्या जो एक प्रावधान को अनावश्यक और बेकार बनाती है, वह सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सार के खिलाफ है।
  • दो परस्पर विरोधी प्रावधानों में सामंजस्य स्थापित करने का अर्थ है किसी भी वैधानिक प्रावधान को नष्ट न करना या इसे अप्रभावी बनाना।

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का अनुप्रयोग

न्यायालयों ने कई मामले कानूनों की समीक्षा के बाद पूर्वोक्त सिद्धांत की उचित प्रयोज्यता के लिए कुछ प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया है। वे इस प्रकार हैं:

  • दोनों परस्पर विरोधी प्रावधानों को समान महत्व देना, और इस प्रकार उनकी असंगति को कम करना।
  • जो प्रावधान मौलिक रूप से असंगत या एक-दूसरे के प्रतिकूल (रिपग्नेंट) हैं, उन्हें उनकी संपूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए, और पूर्ण अधिनियम को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • दो विरोधाभासी (कॉन्ट्रेडिक्टिंग) प्रावधानों की व्यापक पहुंच वाले प्रावधान पर विचार किया जाना चाहिए।
  • व्यापक और संकीर्ण (नैरो) प्रावधानों की तुलना करते हुए, अदालतों को यह देखने के लिए व्यापक कानून का विश्लेषण करना चाहिए कि क्या कोई अन्य चिंताएं हैं। यदि परिणाम उचित हो तो और अधिक विचार करने की आवश्यकता नहीं है और दोनों खंडों को अलग-अलग भार देकर सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि विधायिका उस स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ थी, जिससे वे प्रावधानों को अधिनियमित करते समय संबोधित करने का प्रयास कर रहे थे, और इसलिए अपनाए गए सभी प्रावधानों को पूर्ण प्रभाव दिया जाना चाहिए।
  • जब अधिनियम के एक प्रावधान का उल्लंघन होता है, तो दूसरे अधिनियम द्वारा दिए गए शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। 
  • यह महत्वपूर्ण है कि अदालत उस डिग्री को स्थापित/ साबित करे, जिसकी वजह से विधायिका एक प्रावधान को दूसरे पर अधिभावी (ओवरराइडिंग) अधिकार देना चाहती थी। 

सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत के आवेदन की व्याख्या करने वाले मामले

कुछ प्रसिद्ध भारतीय मामले निम्नलिखित हैं, जहां अदालतों ने सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम को लागू करने की सहायता से कुछ विधियों की व्याख्या करने का प्रयास किया है। 

श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति बनाम सिद्ध मठ और अन्य (2015)

इस मामले में, श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम, 1955 और उड़ीसा संपदा उन्मूलन अधिनियम, (ओईए) 1951 के प्रावधान जांच में आए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उड़ीसा संपदा उन्मूलन अधिनियम, 1951 की धारा 2 (oo) और श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम, 1955 की धारा 5 और धारा 30 के बीच एक स्पष्ट संघर्ष उत्पन्न हुआ है। अदालत ने कहा कि यह भी स्पष्ट है कि दोनों दिए गए वैधानिक उपरोक्त अधिनियमों के प्रावधान एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम का उपयोग करते समय यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जब दो विधियों के प्रावधान असंगत हों, तो यह तय करना होगा कि किस प्रावधान को प्रभावी किया जाना चाहिए। 

इस मामले में, उड़ीसा संपदा उन्मूलन अधिनियम की धारा 2(oo) अपनी संपूर्णता में श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर रही थी। यह प्रावधान का केवल पहला भाग था जो जगन्नाथ मंदिर अधिनियम का खंडन कर रहा था। यदि प्रावधान के उस भाग को लागू करना जारी रखा जाता है तो जगन्नाथ मंदिर अधिनियम की धारा 5 और धारा 30, जिसके द्वारा पुरी में जगन्नाथ मंदिर की सम्पदा को मंदिर समिति को सौंपा जाता है, अपना अर्थ खो देगी। न्यायालय ने आगे बताया कि उड़ीसा संपदा उन्मूलन अधिनियम की धारा 2(oo) के प्रावधान को समाप्त करने से दोनों प्रावधान लागू होंगे। जब भी एक ही मामले में विशिष्ट और सामान्य कानूनों के लागू होने के बारे में कोई प्रश्न आता है, तो मामले की प्रकृति और मुद्दों की संबंधित अदालत द्वारा जांच की जानी चाहिए। यदि, दो कानून पूर्ण संघर्ष में हैं, तो विधायिका द्वारा लगाई गई सीमाओं और अपवादों पर एक जांच होनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में जगन्नाथ मंदिर अधिनियम के विशेष प्रावधान प्रबल होंगे, और इस प्रकार, जनरलिया स्पेशलिबस डेरोगेंट के सिद्धांत को लागू किया जाएगा।

वेंकटरमन देवरु बनाम मैसूर राज्य (1957)

इस मामले में, श्री वेंकटरमण के एक प्राचीन, प्रसिद्ध मंदिर के ट्रस्टियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 92 के तहत एक मुकदमा दायर किया, जिसमें प्राधिकरण अधिनियम (1947 का मद्रास V) के पारित होने के बाद मद्रास मंदिर प्रवेश के बाद हरिजनों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। ट्रस्टियों ने सरकार को एक प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) दिया कि मंदिर निजी था और विशेष रूप से गौड़ा सारस्वथ ब्राह्मणों के लिए स्थापित किया गया था, और इसलिए, मद्रास मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम के संचालन के बाहर था। हालांकि, सरकार ने उस स्थिति को स्वीकार नहीं किया और माना कि उक्त अधिनियम मंदिर पर लागू होता है।

ट्रस्टियों ने तर्क दिया कि मद्रास मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम की धारा 2 (2) के तहत मंदिर को परिभाषित नहीं किया गया था और अधिनियम की धारा 3 शून्य थी क्योंकि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 26 (b) के लिए अपमानजनक था। इस प्रकार, निचली अदालत में अपील की गई, जिसने अपीलकर्ताओं के खिलाफ फैसला सुनाया। लेकिन मद्रास के उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में एक सीमित डिक्री पारित करते हुए कहा कि हालांकि आम तौर पर जनता, मंदिर में पूजा करने की हकदार थी, अपीलकर्ताओं को कुछ समारोहों के दौरान आम जनता को बाहर करने का अधिकार था, जिसमें केवल अकेले गौड़ा सारस्वत ब्राह्मणों के सदस्य भाग लेने के हकदार थे। इस विवाद से निपटना कि मद्रास मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम की धारा 3 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 (b) का उल्लंघन है, संविधान का अनुच्छेद 25 (2) (b) लागू होगा, और इसलिए, हिंदुओं के सभी वर्गों को पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार था।

न्यायालय ने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25(1) व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित है और अनुच्छेद 26(b) धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों से संबंधित है। हालाँकि, अनुच्छेद 25(2) एक बहुत व्यापक आधार को शामिल करता है और दोनों अनुच्छेद को नियंत्रित करता है। इसलिए अनुच्छेद 26(b) को संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) को ध्यान में रखते हुए पढ़ा जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने मद्रास मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम (1947 के V) की धारा 2 (2) और धारा 3 की व्याख्या में अड़चनों को स्पष्ट करते हुए धर्म के मामले और उत्पन्न होने वाली अनियमितताओं के सामंजस्य से संबंधित अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) और अनुच्छेद 26(b) की व्याख्या के समय सर्वोच्च न्यायालय ने अपील और अपील के लिए विशेष अनुमति के आवेदन दोनों को खारिज कर दिया।

राजस्थान राज्य बनाम गोपी किशन सेन (1992)

इस मामले में प्रतिवादी को, 1972 में राजस्थान में एक अप्रशिक्षित शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। राजस्थान राज्य, जो अपीलकर्ता है, उन्होंने इस मामले में रुपये 160-360/- प्रति माह के वेतनमान पर उसके वेतन के दावे को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद प्रतिवादी ने राजस्थान के उच्च न्यायालय में भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक आवेदन किया, जिसे आक्षेपित निर्णय द्वारा अनुमति दी गई थी। हालांकि वेतनमान रु. 160-360/- प्रति माह केवल प्रशिक्षित शिक्षकों को ही दिया जाता था। प्रतिवादी एक प्रशिक्षित शिक्षक नहीं था और इसलिए, उसे रुपये 130/- प्रति माह के निश्चित वेतन पर नियुक्त किया गया था, जब तक कि वह प्रशिक्षित नहीं हो जाता, जो राजस्थान सिविल सेवा (नए वेतनमान) नियम, 1969 के प्रावधानों के अंतर्गत आता है, जिसे राजस्थान शिक्षा अधीनस्थ सेवा नियम, 1971 के साथ पढ़ा जाता है। 

हालांकि बाद में वेतनमान में संशोधन किया गया है। प्रति माह रुपये 130/- की राशि अप्रशिक्षित शिक्षक के वेतन के रूप में निर्धारित की गई थी और इस प्रावधान को अवैध भेदभाव मानते हुए उच्च न्यायालय द्वारा आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया था। तदनुसार, अपीलकर्ता को प्रतिवादी को 1972 से 1982 की अवधि के लिए उच्च दर पर उसका वेतन देने के लिए कहा गया था और इसे अपीलकर्ता की ओर से त्रुटिपूर्ण के रूप में चुनौती दी गई थी।

जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा, तो न्यायालय ने देखा कि प्रतीत होता है कि विरोधाभासी वैधानिक प्रावधानों के सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम को अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त है, जहां तक ​​​​संभव हो, सभी प्रावधानों को बनाए रखने और प्रभावी बनाने और व्याख्या से बचने के लिए जो किसी को भी शक्तिहीन बना सकता है। 

वेतनमान में वृद्धि से संबंधित राजस्थान सेवा नियम, 1951 का नियम 29 सामान्य शब्दों में है, जबकि राजस्थान सिविल सेवा (नया वेतनमान) नियम, 1969 की अनुसूची में अप्रशिक्षित शिक्षकों की देखरेख का एक विशेष प्रावधान है। इस प्रकार यह मामला अधिकतम ‘जनरलिबस स्पेशलिया डेरोगंट’ को आकर्षित करता है क्योंकि जब किसी निश्चित विषय पर विशेष प्रावधान किया जाता है, तो उस विषय को सामान्य प्रावधान से बाहर रखा जाता है। 

उन्नी कृष्णन, जेपी, आदि बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (1993)

उन्नी कृष्णन का मामला भारत में शिक्षा के अधिकार के संबंध में महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए ‘जीवन के अधिकार’ के प्रश्न को चुनौती दी थी। अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय के सामने जो मुद्दे आए, वे थे, क्या किसी नागरिक के पास चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि जैसी व्यावसायिक डिग्री के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार है और क्या हमारा संविधान अपने सभी नागरिकों को शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है।

एक रिट याचिका दायर की गई थी जिसमें चुनौती दी गई थी कि क्या अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन का अधिकार’ भारत के सभी नागरिकों को शिक्षा के अधिकार में शामिल करता है और गारंटी देता है, और यहां शिक्षा के अधिकार में व्यावसायिक शिक्षा या डिग्री भी शामिल है।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इसमें बुनियादी शिक्षा के अधिकार का अनुमान लगाया गया था: जैसे की शिक्षा पर निर्देशक सिद्धांत (डायरेक्टिव प्रिंसिपल) के अनुच्छेद 41 के साथ पढ़े जाने पर अनुच्छेद 21 के तहत दीया गया जीवन का अधिकार। न्यायालय ने अनुच्छेद 45 का भी उल्लेख किया और अनुमान लगाया कि अनुच्छेद 21 से निकलने वाली पेशेवर डिग्री के लिए शिक्षा का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (डायरेक्टिव प्रिंसिपल ऑफ़ स्टेट पॉलिसी) (डीपीएसपी) पर मौलिक अधिकारों के प्रसार के मुद्दे पर, न्यायालय ने टिप्पणी की कि भाग तीन और भाग चार के प्रावधान एक दूसरे के पूरक हैं और मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों की व्याख्या सामंजस्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए क्योंकि वे भारतीय संविधान के सामाजिक विवेक (सोशल कॉन्सिएंस) का निर्माण करते हैं।

सिरसिल्क बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (1963)

इस मामले में सिरसिल्क कंपनी का आंध्र प्रदेश सरकार और उनके कर्मचारियों से विवाद हो गया था। विवाद को औद्योगिक न्यायाधिकरण (इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल) में भी ले जाया गया। इस पर निर्णय लेने के बाद, प्राधिकरण ने सितंबर 1957 में अपना निर्णय दिया जिसके बाद इसे आंध्र प्रदेश सरकार के आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाना था। लेकिन निगम (कॉर्पोरेशन) और कर्मचारियों ने संयुक्त रूप से निर्णय को प्रकाशित नहीं करने के लिए कहा क्योंकि उन्होंने पहले ही अपनी असहमति को मित्रतापूर्ण ढंग से सुलझा लिया था। सरकार ने पक्षों की अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया जिसके बाद पक्षों ने एक प्रकाशन में निर्णय के मुद्दे को प्रकाशित करने से रोकने के लिए सरकार को एक आदेश जारी करने के लिए उच्च न्यायालय के साथ एक रिट आवेदन दायर किया। उच्च न्यायालय ने रिट आवेदन को खारिज कर दिया और कहा कि यह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 17 के तहत अनिवार्य और औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा सरकार को सौंपे गए निर्णय के पारित होने पर रोक नहीं लगानी चाहिए। तब सिरसिल्क कंपनी के पक्षों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गई थी। 

निगम और कर्मचारियों ने प्रस्तुत किया कि चूंकि दोनों पक्षों ने एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 18 (1) के तहत उनके लिए बाध्यकारी है, धारा 17 (1) के तहत सरकार का निर्णय, समूह के लिए चुनौतीपूर्ण है और इसलिए इन्हें जारी नहीं किया जाना चाहिए। पक्षों द्वारा सहमती से दिए गए संकल्प (आइडिया) का पालन किया जाना चाहिए और औद्योगिक शांति बनाई रखी जानी चाहिए। दूसरी ओर, सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 17 (1) की अनिवार्य प्रकृति के बारे में बताते हुए कहा कि निर्णय प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर उसे जारी किया जाना था। न्यायाधिकरण के संदर्भ का उद्देश्य विवादों का निपटारा करना है और जब पक्षों के बीच एक समाधान हो जाता है तो न्यायाधिकरण द्वारा जारी प्रकाशन के लिए निर्णय का प्रश्न अतार्किक (इल्लॉजिकल) प्रतीत होता है और इसका कोई सार नहीं है क्योंकि न्याधिकरण के निर्णय द्वारा प्रदान किए गए हल का कोई संघर्ष अब बचा नहीं है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि अधिनियम की धारा 17 और धारा 18 के बीच मतभेद है और एक उपाय खोजना महत्वपूर्ण है, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्राथमिक स्पेक्ट्रम को संरक्षित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इस तरह के मामले के दो विरोधाभासी खंडों को हल करने का एकमात्र तरीका सरकार को निर्णय के प्रकाशन को वापस लेने की अनुमति देना और पक्षों को अपने संकल्प को जारी रखने की अनुमति देना है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जबकि अधिनियम की धारा 17 और धारा 18 अनिवार्य थी, इस तथ्य के बावजूद पक्षों ने पहले ही समझौते से अपने विवाद को मित्रतापूर्ण ढंग से सुलझा लिया है, लेकिन वर्तमान मामले में, कोई भी विवाद प्रकाशन द्वारा हल नहीं किया गया है। और इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को अधिनियम 17(1) के अनुपालन में निर्णय को प्रकाशित न करने का निर्देश दिया और अपील को मंजूरी दे दी गई। 

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय इस बात का एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे एक प्रावधान के नियम कानून के दूसरे प्रावधान को अर्थहीन या अप्रचलित किए बिना लागू किए जा सकता है। 

के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1961)

यह भारतीय कानूनी इतिहास में सबसे प्रसिद्ध मामलों में से एक है और भारत में इस मामले के बाद जूरी ट्रायल को समाप्त कर दिया गया था। एक नौसेना कमांडर के. एम. नानावती पर अपनी पत्नी के गुप्त प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या का आरोप लगाया गया था, और परिणामस्वरूप, भारतीय दंड संहिता की  धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया था।

उन पर आईपीसी की धारा 302 और धारा 304 के तहत आरोप लगाया गया था और एक सत्र न्यायाधीश, बॉम्बे द्वारा मुकदमा चलाया गया था और विशेष जूरी ने उन्हें आईपीसी के तहत शामिल दोनों धाराओं के तहत दोषी नहीं ठहराया था। हालांकि, सत्र न्यायाधीश जूरी के फैसले से असंतुष्ट थे क्योंकि उन्हें लगा कि मामले के सबूतों को ध्यान में रखते हुए यह तार्किक निर्णय नहीं था। इसलिए, वह आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 307 के तहत मामले को अपने विचारों का कारण देते हुए बॉम्बे के उच्च न्यायालय में ले गए। उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायाधीश के तर्क को मंजूरी दी। उच्च न्यायालय ने कहा कि मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपराध को हत्या से गैर इरादतन हत्या में शामिल नहीं किया जा सकता, जो कि हत्या की श्रेणी में नहीं आता है। उच्च न्यायालय ने नानावती को हत्या के अपराध का दोषी ठहराया और इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में आगे चुनौती दी गई। इस बीच, बॉम्बे के गवर्नर ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत निहित शक्ति का उपयोग करके नानावती के निलंबन (सस्पेंशन) का आदेश पारित किया।  

राज्यपाल के फैसले पर सवाल उठाया गया था क्योंकि जब निलंबन का आदेश दिया गया था, तो मामला सर्वोच्च न्यायालय के अधीन विचाराधीन (सब जुडिस) था। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच उत्पन्न हुए संघर्ष को सुलझाने के लिए सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत को लागू करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 161 और राज्यपाल द्वारा निलंबन तब लागू नहीं होता जब मामला विचाराधीन हो।

कलकत्ता गैस कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1962)

ओरिएंटल गैस कंपनी अधिनियम, 1960 पश्चिम बंगाल की राज्य विधान सभा द्वारा पारित किया गया था। इस मामले में, अपीलकर्ता ने इस अधिनियम की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि राज्य विधान सभा को राज्य के प्रवेश 24 और प्रविष्टि 25 (भारत का संविधान, सूची II) के तहत ऐसा अधिनियम पारित करने की कोई शक्ति नहीं थी क्योंकि सरकार कंपनी के प्रबंधन को संभालना चाहती थी। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि संसद पहले ही उद्योग विकास और विनियमन अधिनियम, 1951 को संघ सूची/ सूची I की प्रविष्टि 52 के तहत अधिनियमित कर चुकी है, जो उद्योगों से संबंधित है।

राज्य सूची में संपूर्ण उद्योग प्रविष्टि 24 के अंतर्गत आते हैं, और प्रविष्टि 25 केवल गैस उद्योग तक ही सीमित है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम का इस्तेमाल किया और कहा कि यह स्पष्ट था कि गैस उद्योग पूरी तरह से राज्य सूची की प्रविष्टि 25 द्वारा कवर किया गया था, जिस पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण था। इसलिए, राज्य के पास इस संबंध में कानून बनाने की शक्ति थी। इसलिए, सामंजस्यपूर्ण निर्माण के नियम की मदद से, सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्त किया कि गैस उद्योग प्रविष्टि 25 के अंतर्गत आता है जो राज्य सूची का एक हिस्सा है, और यह राज्य को इस पर पूर्ण नियंत्रण देता है।

निष्कर्ष

भारत में न्यायपालिका और अदालतें एक उपकरण के रूप में सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का उपयोग करके भारतीय संविधान के हर प्रावधान के उद्देश्य की रक्षा और रखरखाव के लिए सभी प्रयास कर रही हैं। सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत का उपयोग करते हुए, भारतीय न्यायपालिका ने विभिन्न विधियों को बनाने के लिए संविधान निर्माताओं के इरादे या उद्देश्य को समझाने की कोशिश की है। इस लेख में विभिन्न मामलों के विश्लेषण के माध्यम से, यह कहा जा सकता है की सामंजस्यपूर्ण निर्माण का नियम विभिन्न परस्पर विरोधी प्रावधानों के बीच एकरूपता (यूनिफॉर्मिटी) लाता है ताकि उनमें से कोई भी शक्तिहीन या मृत-अक्षर न हो क्योंकि उन्हें बनाने में विधायिका द्वारा काफी विचार किया जाता है। 

संदर्भ

 

दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जमानत के प्रावधान

यह लेख Santosh Bhagwan Waghmare द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से कानूनी प्रारूपण के परिचय: अनुबंध, याचिकाएं, राय और लेख में सर्टिफिकेट कोर्स कर रहे हैं। यह लेख भारत के दंड प्रक्रिया संहिता में दिए गए जमानत के प्रावधान पर चर्चा करता है। लेख का संपादन प्रशांत बाविस्कर (एसोसिएट, लॉसिखो) और जिगिशु सिंह (एसोसिएट, लॉसिखो) ने किया है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीने के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है, जो बदले में हमें किसी भी कानून प्रवर्तन प्राधिकरण (लॉ एनफोर्समेंट अथॉरिटी) द्वारा गिरफ्तार किए जाने पर जमानत मांगने का अधिकार देता है।

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (इसके बाद सीआरपीसी या आपराधिक प्रक्रिया संहिता के रूप में संदर्भित) के तहत अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) का प्रावधान धारा 438 में पेश किया गया था। यह भारत के विधि आयोग की सिफारिश पर आधारित है, जिसने अपनी 41वीं रिपोर्ट में अग्रिम जमानत के प्रावधान को शामिल करने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि “अग्रिम जमानत देने की आवश्यकता मुख्य रूप से इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि कभी-कभी प्रभावशाली व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वियों (राइवल) को बदनाम करने के उद्देश्य से या अन्य उद्देश्यों के लिए उन्हें जेल में बंद करके झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश करते हैं। झूठे मामलों के अलावा, जहां यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के फरार होने की संभावना नहीं है, या अन्यथा वह जमानत पर रहते हुए अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करता है, वहां उसे पहले हिरासत में लेने की आवश्यकता का कोई औचित्य नहीं लगता है और वह कुछ दिनों के लिए जेल में रह कर फिर जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। ”

‘जमानत’ का प्रावधान, विशेष रूप से अग्रिम जमानत, “निर्दोषता की धारणा (प्रिजंप्शन ऑफ इनोसेंस)” के कानूनी सिद्धांत पर आधारित है, अर्थात किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। यह एक मौलिक सिद्धांत है जिसका उल्लेख मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स) के तहत अनुच्छेद 11 में किया गया है।

जमानत का अर्थ

जमानत‘ कुछ अपराधों के आरोपित व्यक्ति की रिहाई की प्रक्रिया को अदालत में सुनवाई के लिए अदालत में उसकी भविष्य की उपस्थिति सुनिश्चित करने और उसे अदालत के अधिकार क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर करने की प्रक्रिया को दर्शाता है।

ब्लैक लॉ डिक्शनरी के अनुसार जमानत की परिभाषा यह है कि – “जमानत में कैदी की रिहाई के लिए अदालत द्वारा आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाती है, जिसे भविष्य में अदालत में पेश होना होता है।” गिरफ्तारी का उद्देश्य आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश कर न्याय दिलाना है। हालांकि, अगर बिना किसी गिरफ्तारी के एक ही उद्देश्य हासिल किया जा सकता है, तो उसकी स्वतंत्रता का उल्लंघन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए आरोपी व्यक्ति को सशर्त रिहाई (कंडीशनल रिलीज) के लिए जमानत दी जा सकती है।

जमानत की कानूनी स्थिति

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत ‘जमानत’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। केवल ‘जमानती अपराध’ और ‘गैर-जमानती अपराध’ शब्द को सीआरपीसी की धारा 2 (a) के तहत परिभाषित किया गया है। जमानत और जमानत बांड से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436-450 के तहत किया गया है।

जमानत की श्रेणियाँ

जमानत के उद्देश्य से, अपराधों को जमानती और गैर-जमानती अपराधों में वर्गीकृत किया जाता है जिनकी चर्चा नीचे की गई है:

जमानती अपराध

सीआरपीसी की धारा 2 (a) के अनुसार जमानती अपराध का मतलब ऐसा अपराध है जिसे संहिता की पहली अनुसूची में जमानती के रूप में वर्गीकृत किया गया है, या जिसे किसी अन्य कानून के तहत जमानती के रूप में वर्गीकृत किया गया है। एक आरोपी जमानत का दावा अधिकार के रूप में कर सकता है यदि उस पर जमानती अपराध करने का आरोप है। यदि आरोपी जमानत देने के लिए तैयार है तो पुलिस अधिकारी या किसी अन्य प्राधिकारी को जमानत खारिज करने का कोई अधिकार नहीं है। सीआरपीसी 1973 की धारा 436 के तहत, बिना वारंट के किसी भी समय गिरफ्तारी के दौरान और कार्यवाही के किसी भी चरण में जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा होने का अधिकार है।

गैर-जमानती अपराध

एक गैर-जमानती अपराध को किसी भी अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है जो जमानती अपराध नहीं है। गैर-जमानती अपराध का आरोपी व्यक्ति जमानत का दावा अधिकार के रूप में नहीं कर सकता। गैर-जमानती अपराधों के आरोपी व्यक्ति को जमानत दी जा सकती है, बशर्ते आरोपी निम्नलिखित शर्तों को पूरा नहीं करता है:

  • यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि उसने मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध किया है।
  • यह कि आरोपी ने संज्ञेय अपराध किया है और उसे पहले मौत, आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक के कारावास या यदि आरोपी को संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और गैर-जमानती अपराध के दो या अधिक मामलों में दोषी ठहराया गया है, या उसे दंडनीय अपराध का दोषी ठहराया गया है।

ऐसे असाधारण मामले भी होते हैं, जिनमें कानून उन मामलों के पक्ष में विशेष ध्यान देता है जहां आरोपी नाबालिग, महिला, बीमार व्यक्ति आदि है। [धारा 437 (1) सीआरपीसी]।

विभिन्न प्रकार की जमानत

नियमित जमानत (रेगुलर बेल)

इसके माध्यम से न्यायालय गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत के रूप में एक राशि का भुगतान कर पुलिस हिरासत से रिहा करने का आदेश देता है। एक आरोपी सीआरपीसी की धारा 437 और धारा 439 के तहत नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

अंतरिम जमानत (इंटरिम बेल)

यह अदालत का सीधा आदेश है कि आरोपी को तब तक अस्थायी (टेंपररी) और अल्पकालिक (शॉर्ट टर्म) जमानत दी जाए जब तक कि उसकी नियमित या अग्रिम जमानत की अर्जी अदालत के समक्ष लंबित (पेंडिंग) न हो। सर्वोच्च न्यायालय ने रुक्मणी महतो बनाम झारखंड राज्य में आरोपी द्वारा अंतरिम जमानत के दुरुपयोग पर ध्यान दिया था।

अग्रिम जमानत

यह किसी अपराध के आरोपी को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने के लिए सत्र या उच्च न्यायालय का सीधा आदेश है। जब व्यक्ति को गिरफ्तार होने की आशंका हो तो वह व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। कभी-कभी, अग्रिम जमानत के लिए एक आवेदन व्यक्ति के खिलाफ जा सकता है, क्योंकि यह एक जांच एजेंसी को उस व्यक्ति के अपराध में शामिल होने के बारे में सचेत कर सकता है।

भारत में अग्रिम जमानत देते समय इन महत्वपूर्ण कारकों पर विचार किया जाना चाहिए

सीआरपीसी की धारा 438 (1) के आधार पर, सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत का फैसला करते समय विचारों की एक विस्तृत सूची की गणना की है। वे इस प्रकार हैं:-

  • गिरफ्तारी से पहले अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका को समझना चाहिए।
  • गैर जमानती अपराध के संबंध में दोषसिद्धि पर किसी भी कारावास के अभियुक्तों के पिछले रिकॉर्ड की जांच की जानी चाहिए।
  • संभावना है कि आवेदक न्याय से भाग जाएगा।
  • समान या अन्य अपराधों की पुनरावृत्ति (रिपीटिशन) की संभावना।
  • आरोप लगाने के पीछे की मंशा यह है कि आवेदक को गिरफ्तार करके उसे चोट पहुंचाई जाए या अपमानित किया जाए।
  • आरोपी की सटीक भूमिका पर विचार करें।
  • सबूतों, गवाहों के साथ छेड़छाड़ और शिकायतकर्ता को धमकी देने की उचित आशंका।

अग्रिम जमानत देते समय मानक शर्तें (स्टैंडर्ड कंडीशंस)

  • आरोपी को जब कभी भी पेश होने के लिए कहा जाए तो उसे जांच कार्यालय द्वारा पूछताछ के लिए खुद को पेश करना चाहिए।
  • आरोपी को प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) या परोक्ष (इंडिरेक्टली) रूप से मामले से संबंधित किसी भी व्यक्ति को, जो मामले के तथ्यों को जानता है, उसे प्रेरित करने, धमकी देने या वादा करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, ताकि उसे अदालत या जांच अधिकारी के सामने तथ्य का खुलासा करने से रोका जा सके।
  • आरोपी को न्यायालय की पूर्व अनुमति से देश नहीं छोड़ना चाहिए।
  • कोई अन्य शर्त जो माननीय न्यायालय उचित समझे।

जमानत रद्द करना

सीआरपीसी की धारा 437 (5) के तहत, जिस अदालत ने जमानत दी है, वह कुछ शर्तों के तहत आवश्यक पाए जाने पर इसे रद्द कर सकती है। धारा 439 (2) के अनुसार, सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय, या सर्वोच्च न्यायालय, आरोपी को दी गई जमानत को स्वत: रद्द कर सकता है और आरोपी को हिरासत में स्थानांतरित कर सकता है। धारा 389 (2) के अनुसार, एक अपीलीय अदालत भी आरोपी की जमानत रद्द कर सकती है और आरोपी को गिरफ्तार कर हिरासत में भेजने का आदेश दे सकती है।

नए मामले

  1. रे: दिगेंद्र सरकार – सीआरपीसी की धारा 438 के तहत, अग्रिम जमानत के लिए आवेदन, प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ आई आर) दर्ज होने से पहले ही किया जाता है। इसलिए, प्रथम सूचना रिपोर्ट अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने के लिए एक शर्त नहीं हो सकती है।
  2. सुरेश वासुदेव बनाम राज्य – धारा 438 (1) केवल गैर-जमानती अपराधों पर लागू होती है।
  3. सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य – सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अग्रिम जमानत एक निश्चित अवधि के लिए नहीं होनी चाहिए, लेकिन अगर कोई विशेष शर्त आवश्यक हो तो अग्रिम जमानत के कार्यकाल को सीमित करने के लिए अदालत का दरवाज़ा खुला है।
  4. गुरबक्ष सिंह सिब्बिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य – सर्वोच्च न्यायालय ने राय दी:
  • गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत देने की समय सीमा के संबंध में सीआरपीसी में कोई प्रावधान नहीं है।
  • संबंधित अदालत के पास आवश्यक विशेष परिस्थितियों पर विचार करने के अधीन, सीमित अवधि की सुरक्षा आदि सहित अग्रिम जमानत देने के लिए शर्तें लगाने का विवेकाधिकार (डिस्क्रिशन) है।

मौलिक अधिकार के रूप में अग्रिम जमानत

भारत के संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 21 हमारे संविधान में निहित है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना नहीं है। चूंकि कोई व्यक्ति अपने मामले को सलाखों के पीछे से मुकदमे के लिए तैयार नहीं कर सकता है, इसलिए कानून में जमानत का प्रावधान प्रदान किया जाता है, ताकि उनके मामले को हर संभव उपायों से लड़ने का उचित मौका दिया जा सके। इसके अलावा चूंकि एक आरोपी को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है, किसी भी रूप में कैद व्यक्ति को बदनाम करता है और उसे अपने दैनिक मामलों में जाने से रोकता है। इसलिए ऐसी कठिनाइयों से बचने के लिए, एक व्यक्ति को अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने का उपाय प्रदान किया जाता है।

खंड 4 को धारा 438 में आपराधिक संशोधन विधेयक (क्रिमिनल अमेंडमेंट बिल), 2018 के माध्यम से जोड़ा गया था। विधायिका ने धारा 438 के तहत चार खंड जोड़े। संशोधन के अनुसार, 16 साल से कम, 12 साल से कम, 16 साल से कम उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार और 12 साल से कम उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार उम्र की महिला से बलात्कार करने के अपराध के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती है। यह भारतीय दंड संहिता (बलात्कार की सजा) 1860 की धारा 376 (3), धारा 376 AB, धारा 376 DA और धारा 376 DB के तहत दंडनीय है। 

बलात्कार एक जघन्य अपराध है और दोषी को दंडित करने के लिए कानून के तहत सख्त प्रावधान होने चाहिए। हालाँकि, एक आरोपी और एक दोषी घोषित किए जाने के बीच अंतर है। एक मुकदमे के बाद एक आरोपी के बरी होने की उच्च संभावना है और इसलिए जमानत के अधिकार से इनकार करना पूरी तरह से न्याय की भावना के खिलाफ है। बलात्कार एक गंभीर अपराध है लेकिन आजकल लोग बदला लेने के लिए या किसी भी व्यक्ति को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं, इसलिए बलात्कार के झूठे मामले दर्ज करने के मामले भी बढ़ रहे हैं। इसलिए, यह संशोधन अन्यायपूर्ण रूप से अग्रिम जमानत पाने के अधिकार को प्रतिबंधित करता है।

निष्कर्ष

धारा 438 को अधिनियमित करने का उद्देश्य किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। अग्रिम जमानत की आवश्यकता मुख्य रूप से तब उत्पन्न होती है जब किसी व्यक्ति के पास यह मानने का कारण होता है कि उसे गैर-जमानती अपराध करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है। अग्रिम जमानत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है और उनकी बेगुनाही मानती है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ की अगुवाई (लेड) वाली पांच जजों की सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य के मामले में कहा था कि धारा 438 (1) की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 21 के आलोक में की जानी है। जबकि न्यायालयों ने बार-बार व्यक्तियों की स्वतंत्रता को बनाए रखने और उन्हें मनमानी गिरफ्तारी से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया है, यह याद रखने की जरूरत है कि अग्रिम जमानत अन्य प्रकार की जमानत की तरह अधिकार का मामला नहीं है।

संदर्भ

 

सामाजिक संविदा सिद्धांत

यह लेख पंजाब के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की छात्रा Nidhi Bajaj ने लिखा है। इस लेख में, उन्होंने सामाजिक संविदा (सोशियल कॉन्ट्रैक्ट) का अर्थ समझाया है और तीन राजनीतिक दार्शनिकों (पॉलिटिकल फिलोसॉफर्स): हॉब्स, लॉक और रूसो द्वारा प्रतिपादित (प्रोपाउंडेड) सामाजिक संविदा के सिद्धांतों पर भी चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय 

एक ‘सामाजिक संविदा’, समाज और राज्य की उत्पत्ति की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किए गए एक काल्पनिक समझौते को दर्शाता है। राज्य और सरकार के बनने से पहले मनुष्य प्रकृति की स्थिति में रहता था। सामाजिक संविदा सिद्धांतकारों ने एक संगठित सरकार के लाभों की तुलना प्रकृति की स्थिति में प्राप्त लाभों के साथ की और तर्क दिया कि पुरुषों को स्वेच्छा से सरकार को स्वीकार और पालन क्यों करना चाहिए। इस अभ्यास के निष्कर्ष ने राज्य के प्रति नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करते हुए एक सामाजिक संविदा का गठन किया था। हालांकि एक सामाजिक संविदा के विचार पर पहले चर्चा की गई थी, यह अवधारणा मुख्य रूप से अंग्रेजी दार्शनिक थॉमस हॉब्स और जॉन लोक और फ्रांसीसी दार्शनिक जीन जैक्स रूसो से जुड़ी हुई है। 

इस लेख में, लेखक ने हॉब्स, लॉक और रूसो द्वारा प्रतिपादित सामाजिक संविदा के सिद्धांत की चर्चा की है।

सामाजिक संविदा का अर्थ

एक सामाजिक संविदा, शासन कर रहे दो लोगों या शासन कर रहे व्यक्ति और शासित हो रहे लोगों  के बीच एक वास्तविक या काल्पनिक समझौते को संदर्भित करता है, यह प्रत्येक के अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है। प्रकृति की स्थिति में पैदा होने वाले व्यक्ति, अपने तर्क और सामूहिक प्रयोग से एक समाज और एक सरकार बनाने के लिए सहमत होते हैं। सामाजिक संविदा को प्रकृति की स्थिति से बचने के साधन के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार, एक सामाजिक संविदा दो रूपों से हो सकता है:

  1. सबसे पहले, एक संविदा जिसके कारण राज्य की उत्पत्ति हुई थी: यह संविदा केवल लोगों की इच्छा को राज्य के संप्रभु (सोवरेन) के रूप में स्थापित करने को व्यक्त करता है।
  2. सरकार का संविदा या प्रस्तुत करने का संविदा: यह संविदा राज्य या समाज की स्थापना के बाद के क्रम से संबंधित है। यह शासन के नियमों और शर्तों के बारे में बताता है और इसमें शासन करने वाले व्यक्ति और शासित हो रहे लोगों की ओर से पारस्परिक (रिसिप्रोकल) दायित्व और वादे शामिल होते हैं। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण नागरिकों द्वारा की गई आज्ञाकारिता (ओबेडिएंस) का वादा और नागरिकों की सुरक्षा और राजा/शासक/राज्य द्वारा किए गए सुशासन का पारस्परिक वादा है।

सामाजिक संविदा लोगों की कुछ स्वतंत्रताओं, जो उन्होंने अपने शेष अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था के रखरखाव के बदले में प्रकृति की स्थिति में प्राप्त की थी, को छोड़ने के लिए व्यक्त या निहित सहमति पर आधारित है।

सामाजिक संविदा का सिद्धांत

प्रारंभ में, सामाजिक संविदा का सिद्धांत दो बातों की व्याख्या करता है:

  1. संप्रभु शक्ति की ऐतिहासिक उत्पत्ति।
  2. उन सिद्धांतों की नैतिक (मॉरल) उत्पत्ति जो संप्रभु प्राधिकरण (अथॉरिटी) की वैधता को स्थापित करते हैं।

सामाजिक संविदा का सिद्धांत सामाजिक संविदा के गठन से संबंधित है और राज्य के अस्तित्व में आने से पहले जीवन की प्रकृति और सामाजिक संविदा के गठन के कारणों या परिस्थितियों आदि के बारे में सवालों का जवाब देता है।

संगठित समाजों या सरकारों के अस्तित्व में आने से पहले के जीवन को ‘प्रकृति की स्थिति’ कहा जाता है। प्रकृति की स्थिति में मनुष्य की स्थिति और उनके जीवन का विभिन्न राजनीतिक विचारकों द्वारा अलग-अलग वर्णन किया गया है। कुछ प्रकृति की स्थिति में जीवन को आनंदमय बताते हैं और अन्य इसे क्रूर और कठोर बताते हैं। प्रकृति की स्थिति में होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए निम्नलिखित दो समझौते बनाए गए थे:

  1. पैक्टम यूनियोनिस: इस समझौते के माध्यम से लोग अपने जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की मांग करते है। इससे ऐसे समाज का निर्माण हुआ जिसमें सभी को शांति और सद्भाव से रहना था।
  2. पैक्टम सब्जेक्शनिस: इस समझौते का उद्देश्य प्रारंभिक संविदा को लागू करना था। इस समझौते के माध्यम से, लोगों ने सामूहिक रूप से अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों, जो उन्हे एक दूसरे के खिलाफ दिए गए थे, को प्रकृति की स्थिति में एक प्राधिकरी के पक्ष में छोड़ दिया था, जो बदले में उनके जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने के लिए सहमत हुआ था।

विशेषताएं 

  • सामाजिक संविदा के सिद्धांत अक्सर प्राकृतिक और कानूनी अधिकारों के बीच के संबंध के बारे में बात करते हैं।
  • 17वीं सदी के मध्य से लेकर 19वीं सदी की शुरुआत तक, यह सिद्धांत राजनीतिक वैधता के प्रमुख सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध था।
  • यह सिद्धांत आमतौर पर बिना राजनीतिक व्यवस्था, यानी प्रकृति की स्थिति में रह रहे मानव के जीवन की परीक्षा और चर्चा से शुरू होते हैं।
  • यह सिद्धांत बताता है कि तर्कसंगत (रैशनल) व्यक्ति राजनीतिक व्यवस्था के पक्ष में अपने प्राकृतिक अधिकारों को छोड़ने के लिए क्यों सहमत होते हैं।
  • सामाजिक संविदा के सिद्धांत का कहना है कि कानून और राजनीतिक व्यवस्था मनुष्य की रचनाएं हैं।

सामाजिक संविदा के प्रमुख सिद्धांत

विभिन्न राजनीतिक दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित सामाजिक संविदा सिद्धांतों की चर्चा के साथ आगे बढ़ने से पहले, यह ध्यान रखना उचित है कि सभी सामाजिक संविदा के सिद्धांतों का उद्देश्य समान नहीं है। कुछ सिद्धांत एक संप्रभु की उत्पत्ति/शक्ति को न्यायोचित (जस्ट) ठहराने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि कुछ एक शक्तिशाली संप्रभु के उत्पीड़न से व्यक्तियों की सुरक्षा से संबंधित हैं।

हॉब्स का सामाजिक संविदा का सिद्धांत

थॉमस हॉब्स पहले आधुनिक दार्शनिक थे जिन्होंने एक विस्तृत सामाजिक संविदा के सिद्धांत को सामने रखा। हॉब्स मनुष्य के स्वभाव को अहंकारी और स्वार्थी बताते हैं। उनके अनुसर, मनुष्य एक लालची इच्छाओं के साथ एक अलग प्राणी है, जो लगातार सुख की तलाश करते है और दुख से बचना चाहते है। 

प्रकृति की स्थिति

चूँकि प्रकृति की स्थिति में रहने वाले मनुष्य निराशावादी और क्रूर थे, इसलिए प्रकृति की स्थिति उदास और लोभी (सोर्डिड) थी। एकमात्र नियम जो प्रचलित था वह यह था “यदि आपके पास शक्ति है तो उसे ले लो और तब तक इस शक्ति को बनाएं रखो जब तक आप बना सकते हो”। प्रकृति की स्थिति में पुरुष एक-दूसरे के प्रति शंकालु (सस्पीशियस) और शत्रुतापूर्ण थे। कोई कानून नहीं था, सही और गलत की कोई धारणा नहीं थी। केवल धोखाधड़ी और बल मौजूद था। प्रकृति की स्थिति में चल रही जीवन की परिस्थितियों ने इसे सभ्य कार्यों के लिए अनुपयुक्त बना दिया था। जब तक मनुष्य को प्रकृति की स्थिति में रहना है, तब तक कोई समाज नहीं हो सकता है और उसका जीवन छोटा, खराब और एकान्त होगा।

हालांकि, प्रकृति की स्थिति में, मनुष्य को पूर्ण स्वतंत्रता और एक दूसरे के शरीर के अधिकार सहित हर चीज का प्राकृतिक अधिकार था। हॉब्स के अनुसार, प्राकृतिक नियम केवल एक व्यक्ति के अच्छे की पूर्ति के लिए मौजूद थे। 19 प्राकृतिक नियम थे, उनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं:

  • शांति की तलाश करें और उसका पालन करें।
  • चीजों के प्राकृतिक अधिकार का त्याग करें।
  • व्यक्तियों को अपने संविदा का सम्मान करना चाहिए।

सामाजिक संविदा 

शांति, आत्म-संरक्षण और आत्म-रक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका राज्य की स्थापना के लिए एक संविदा में प्रवेश करना था। व्यक्ति संविदा के माध्यम से अपनी शक्तियों को किसी तीसरे पक्ष को सौंप देते हैं, जो संविदा का पक्ष नहीं था। 

संविदा का रूप

मैं इस शर्त पर, इस व्यक्ति को, या पुरुषों की इस सभा को, अपने आप पर शासन करने का अधिकार देता हूं कि आप उसको, उसके अधिकार देंगे, और उसके सभी कार्यों को उसी तरह अधिकृत करेंगे।

इस प्रकार, हॉब्सियन संविदा का आधार सामूहिक इच्छा नहीं थी। यह एक दूसरे के साथ एक संविदा था जिसमें प्रत्येक व्यक्ति तीसरे पक्ष के पक्ष में अपना अधिकार छोड़ने के लिए सहमत थे, अन्य व्यक्तियों द्वारा उसी तरह से अपने अधिकारों को छोड़ने पर विचार किया गया था। संविदा के परिणामस्वरूप, एक तीसरा पक्ष (संप्रभु) अस्तित्व में आया। तीसरा पक्ष एक कृत्रिम (आर्टिफिशियल) व्यक्ति था जो प्राकृतिक व्यक्तियों से अलग था। 

प्रजा निम्नलिखित कारणों से संप्रभु का पालन करने के लिए बाध्य थी:

  1. संप्रभु की अवज्ञा करने पर दंड मिलेगा।
  2. एक नैतिक विचार था कि व्यक्तियों को अपने संविदा का सम्मान करना चाहिए।
  3. संप्रभु सभी व्यक्तियों का विधिवत अधिकृत प्रतिनिधि था और व्यक्तियों ने उसे अपनी ओर से कार्य करने के लिए अधिकृत किया था। 
  4. सहमति के आधार पर पालन करने का नैतिक दायित्व होना चाहिए।
  5. शांति और व्यवस्था के लिए व्यक्तियों की इच्छा होनी चाहिए।
विशेषताएं 
  • हॉब्स का संविदा एक सामाजिक और राजनीतिक संविदा था, जिसने नागरिक समाज और राजनीतिक अधिकार का निर्माण किया था। 
  • संविदा ने राज्य और सरकार को एक साथ बनाए रखा था।
  • व्यक्ति नियमों के एक सेट के लिए सहमत हुए थे और बदले में, उन्हें बुनियादी समानता की गारंटी दी गई थी।
  • संप्रभु को न्याय और कर लगाने के मामलों में सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।
  • संप्रभु सभी शक्तियों का अधिकारी होगा और एक नश्वर भगवान की तरह होगा।
  • संविदा स्थायी (परपेचुअल) और अपरिवर्तनीय था।
  • संप्रभु की शक्ति असीमित, अविभाज्य, स्थायी और निरपेक्ष (एब्सोल्यूट) है। इसका मतलब यह नहीं था कि राजा के पास दैवीय अधिकार थे, लेकिन यह शक्ति एक संविदा के माध्यम से वैध रूप से और स्वेच्छा से सहमत हुई थी। व्यक्तियों को सरकार के रूप को बदलने का कोई अधिकार नहीं था।
  • चूंकि संविदा व्यक्तियों द्वारा एक-दूसरे के साथ किया गया था न कि संप्रभु के साथ, इसलिए संप्रभु की अधीनता से कोई बच नहीं सकता था। प्रजा का कर्तव्य था कि वह सब संप्रभु का पालन करें।
  • संप्रभु कोई भी कानून बना सकता था जिसे वह उचित समझता था और ऐसे कानून वैध थे। कानून संप्रभु का आदेश था और संप्रभु सर्वोच्च और कानून से भी ऊपर था।
  • एक नागरिक समाज बनाकर, व्यक्ति अपनी इच्छा से अपनी स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए सहमत होते हैं।
  • हॉब्स के अनुसार, संविदा के लाभार्थी यानी तीसरे पक्ष को एक सम्राट (मोनार्क) होना चाहिए। 

संप्रभु के अधिकार और कर्तव्य

  • नीति (पॉलिसी) का संचालन करना;
  • विघटन (डिसोल्यूशन) से नागरिक समाज की सुरक्षा करना;
  • अभिव्यक्ति के अधिकार पर सीमाएं लगाना;
  • संघर्षों को हल करना; 
  • मंत्रियों का चयन करना;
  • सम्मान प्रदान करना;
  • अन्य राज्यों आदि के साथ युद्ध और शांति बनाना।

आलोचना 

  • शासक संविदा का पक्ष नहीं है। 
  • हॉब्स की सरकार की प्रमेय (थियोरम) कृत्रिम थी। उन्होंने सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त मानकों के बिना पूर्ण अधिकार प्रदान किया था।
  • आलोचकों ने प्रकृति की स्थिति की हॉब्सियन वास्तविकता को यह कहकर नकार दिया कि यदि मनुष्य इतने असामाजिक और बुरे होते, तो वे कभी भी समाज या राज्य बनाने के लिए एक साथ नहीं आते।
  • हॉब्स का, प्रकृति की स्थिति का चित्रण जिसे विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है, असत्य और भ्रामक है।
  • हॉब्सियन संविदा स्थायी था। अत्याचारी सरकार से बचने का कोई रास्ता नहीं था। 
  • हॉब्सियन संविदा के अनुसार, स्वतंत्रता एक अधिकार के बजाय संप्रभु द्वारा दिया गया उपहार था। 
  • होब्सियन राज्य में नागरिक स्वतंत्रता प्रतिबंधित थी।

लॉक का सामाजिक संविदा का सिद्धांत

लॉक का सामाजिक संविदा का सिद्धांत बताता है कि वैध राजनीतिक अधिकार लोगों की सहमति से प्राप्त किए गए थे और यदि व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन किया जाता है तो ऐसी सहमति वापस ली जा सकती है।

प्रकृति की स्थिति

लॉक ने प्रकृति की स्थिति में पुरुषों को स्वतंत्र, और समान माना था। उन्होंने प्रकृति की स्थिति को पूर्ण समानता के रूप में वर्णित किया जहां सभी मनुष्यों को जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार था। लॉक की प्रकृति की स्थिति हॉब्स की प्रकृति के बिल्कुल विपरीत थी। यहाँ, कोई व्यक्ति उतना क्रूर और स्वार्थी नहीं था जितना कि हॉब्स ने वर्णन किया था। प्रकृति की स्थिति युद्ध की स्थिति नहीं थी बल्कि “शांति, सद्भावना, पारस्परिक सहायता और संरक्षण” की स्थिति थी। लॉक की प्रकृति की स्थिति पूर्व-सामाजिक व्यवस्था के बजाय पूर्व-राजनीतिक व्यवस्था की बात करती है। प्रकृति की स्थिति में मनुष्य प्रकृति के नियम द्वारा शासित होते है। भगवान ने सब कुछ जीवन निर्वाह करने के लिए बनाया है न कि बर्बादी के लिए। इसलिए, मनुष्य को अपनी या दूसरों की जान लेने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि मानव जीवन को भी ईश्वर ने एक भरोसे के रूप में दिया था।

सामाजिक संविदा

लॉक के अनुसार, व्यक्ति एक स्वतंत्र और तर्कसंगत प्राणी था जो अपनी स्वतंत्र पसंद से एक राजनीतिक विषय बन गया था। नागरिक समाज के गठन के पीछे का उद्देश्य स्वतंत्रता की रक्षा और विस्तार करना था। प्रकृति की स्थिति समानता और स्वतंत्रता की थी लेकिन इसमें सुरक्षा का अभाव था। प्रकृति की स्थिति में शांति सुरक्षित नहीं थी और कुछ अपमानित पुरुषों की दुष्टता से लगातार परेशान रहती थी। प्रकृति की स्थिति में निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण तत्वों का अभाव था:

  • एक स्थापित, व्यवस्थित और ज्ञात कानून,
  • एक जाने माने और सामान्य न्यायाधीश,
  • न्यायसंगत निर्णयों को लागू करने के लिए एक कार्यकारी (एग्जीक्यूटिव) शक्ति।

इस प्रकार, लॉक ने यह समझाने की कोशिश की कि प्रकृति के नियमों का अधिक से अधिक पालन सुनिश्चित करने, निर्णय लेने और नियमों के कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) में निष्पक्षता लाने और शांति सुनिश्चित करने के लिए पुरुषों ने राजनीतिक प्राधिकरण की स्थापना के लिए सहमति व्यक्त की है। लोगों ने अपने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की सुरक्षा के लिए सामाजिक संविदा में प्रवेश किया है।

यह कहा जा सकता है कि लॉकि के सिद्धांत में, सामाजिक संविदा के दो पहलू हैं:

  1. व्यक्तियों ने एक-दूसरे के साथ संविदा किया था, कि वे बहुमत के शासन को प्रस्तुत करेंगे और जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की सुरक्षा के लिए खुद को एक नागरिक समाज के रूप में संगठित करेंगे। व्यक्तियों ने अपने सभी प्राकृतिक अधिकारों को नहीं छोड़ा बल्कि प्रकृति के कानून की व्याख्या और निष्पादन करने और अपनी शिकायतों को बहाल करने का अधिकार दिया है। कानूनों को लागू करने के ये तीन विशिष्ट अधिकार अब पूर्ण रूप से समुदाय में निहित थे।
  2. नागरिक या राजनीतिक समाज की स्थापना के बाद, दूसरा कार्य एक ऐसी सरकार नियुक्त करना था जो प्राकृतिक कानून की घोषणा और निष्पादन करेगी। व्यक्तियों ने कुछ निश्चित उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए एक “न्यायिक शक्ति” की प्रकृति में एक न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए एक सरकार की स्थापना की थी।

सरकार की स्थापना के बाद भी, समुदाय ने सर्वोच्च शक्ति बरकरार रखी, जिसका अर्थ है कि यदि सरकार समाज को संरक्षित करने में विफल रही या यदि उसका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था, तो लोग सरकार बदलने के लिए कदम उठा सकते थे। इस प्रकार, सरकार को वैध रूप से बदला, या भंग किया जा सकता है।

लॉक के संविदा और राजनीतिक प्राधिकरण की विशेषताएं

  • नागरिक समाज और सरकार के बीच का संबंध विश्वास पर आधारित होता है। यदि सरकार समुदाय द्वारा उसमें रखे गए भरोसे के विपरीत कार्य करती है, तो लोगों के पास सरकार बदलने की शक्ति होती है।
  • राजनीतिक सत्ता तब तक वैध होती है जब तक वह लोगों की सहमति पर आधारित होती है। 
  • सरकार संविदा की पक्ष नहीं है।
  • सरकार के तीन भाग थे:
  1. विधायिका: इसे कानून बनाने की शक्ति थी। विधायिका सरकार के भीतर सर्वोच्च निकाय (बॉडी) थी। 
  2. कार्यपालिका: कानून को लागू करने की शक्ति कार्यपालिका में निहित थी। कार्यपालिका में न्यायिक शक्ति भी शामिल थी। कार्यपालिका अधीनस्थ (सबोर्डिनेट) थी और विधायिका के प्रति जवाबदेह थी।
  3. फेडेरेटिव: फेडेरेटिव विंग के पास संधियां (ट्रीटी) बनाने और बाहरी संबंध संचालित करने की शक्ति थी।
  • लॉक का विचार था कि पूर्ण राजनीतिक शक्ति कानून के विपरीत है और उन्होने एक सीमित संप्रभु राज्य का पक्ष लिया था। राज्य उन लोगों के लिए अस्तित्व में था जिन्होंने इसे बनाया था और इसके विपरीत नहीं। राज्य को संविधान और कानून के शासन के अधीन लोगों की सहमति पर आधारित होना चाहिए था।
  • संप्रभु सीमित था क्योंकि यह समुदाय/लोगों से एक प्रत्ययी क्षमता (फिडुशियरी कैपेसिटी) में शक्ति प्राप्त करता था।
  • सरकार का पालन करने के लिए लोगों का दायित्व सरकार द्वारा किसी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार की सुरक्षा पर सशर्त था।
  • राज्य राजनीतिक मामलों से निपटने के लिए है और कहीं और हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। राज्य और समाज, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच एक द्वंद्व (डिक्टोमी) था। राज्य की स्थापना के बाद भी, एक व्यक्ति को बिना किसी हस्तक्षेप के निजी क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का अधिकार है।
  • सरकार का उद्देश्य प्राकृतिक अधिकारों, विशेष रूप से जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार की रक्षा करना और उसे बनाए रखना है।

आलोचना 

  • लॉक ने यह मान लिया था कि अल्पसंख्यक सभी बातों में बहुमत से शासन करने के लिए सहमत होंगे।
  • सरकार संविदा का एक पक्ष नहीं है।
  • लोगों को कानून की अवहेलना करने का विकल्प नहीं दिया जा सकता है।
  • लॉक की प्रकृति की स्थिति में मौजूद मामलों की स्थिति असत्य है और उस पर विश्वास करना कठिन है।
  • ऐसा लगता है कि लॉक लोगों को विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

रूसो का सामाजिक संविदा का सिद्धांत

प्रकृति की स्थिति

रूसो के अनुसार, प्रकृति की स्थिति में मनुष्य एकान्त किन्तु सुखी, स्वस्थ और स्वतंत्र था। मनुष्य आत्म-संरक्षण और करुणा (कंपैशन) की प्रवृत्ति (इंस्टिंक्ट) द्वारा निर्देशित थे। मनुष्य अन्य जानवरों से अलग थे क्योंकि उसके पास पूर्णता की इच्छा थी। वह निर्दोष और स्वतंत्र था और किसी भी अधिकार, प्रतिशोध (वेंजेंस), हितों से अनजान था। रूसो का मानना था कि मनुष्य तर्क के साथ पैदा नहीं हुआ है। यह एक ऐसा गुण था जो तब तक निष्क्रिय रहा जब तक इसकी आवश्यकता की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। मनुष्य बिना कारण या सोच के खुश था। कारण की उत्पत्ति ने मनुष्यों की चाहतों और जरूरतों में वृद्धि की है। नतीजतन, मनुष्य ने खुश रहना बंद कर दिया और उसका जीवन दुखी और शांतिपूर्ण से दूर हो गया। रूसो ने प्रकृति की स्थिति से प्रस्थान को “एक घातक दुर्घटना” कहा है। उन्होंने प्रकृति की स्थिति को एक बहुमूल्य अतीत के रूप मे बताया है जिसे वापिस नही लाया जा सकता है।

रूसो के लिए, निम्नलिखित कारणों से प्रकृति की स्थिति का अध्ययन करना महत्वपूर्ण था:

  1. मानव जाति की मूल प्राचीन स्थिति को समझने के लिए;
  2. मनुष्य की मूल अवस्था में मानव स्वभाव के गुणों और विशेषताओं की पहचान करना;
  3. प्रकृति की नई स्थिति, अर्थात, वर्तमान समाज का वर्णन और मूल्यांकन करने के लिए ;

नागरिक समाज: छलपूर्ण सामाजिक संविदा

जैसे-जैसे लोग एक साथ रहने लगे, उन्होंने ने महसूस किया कि वे पारस्परिक हित के कुछ मामलों में दूसरों पर भरोसा कर सकते हैं या उन पर निर्भर हो सकते हैं। फिर, जैसे ही वह आदमी व्यक्ति परिवार के साथ अलग रहने लगा, उसने प्यार और सुंदरता की खोज की और सहज रूप से नहीं बल्कि तर्कसंगत रूप से कार्य करना शुरू कर दिया। छोटे समुदायों का विकास हुआ। श्रम विभाजन (डिस्ट्रिब्यूशन) पेश किया गया। पुरुषों ने खोज और आविष्कार करना शुरू कर दिया और अपने ख़ाली समय में उन्होंने दूसरों के साथ तुलना की। इसने ईर्ष्या, गर्व और अवमानना ​​​​(कंटेंप्ट) की भावनाओं को विकसित किया। एक बार जब वे एक समाज में रहने लगे, तो मनुष्य मनोवैज्ञानिक रूप से परिवर्तित हो गए। समाज में प्रवेश करते ही एक व्यक्ति निर्भरता के चरण में प्रवेश करता है। निजी संपत्ति के निर्माण और श्रम विभाजन ने धन, शक्ति और स्थिति में अंतर उत्पन्न किया। इस एक दूसरे पर निर्भर रहने की अवधारणा ने असमानता को जन्म दिया। एक व्यक्ति जिसे अधिक स्वतंत्र होना चाहिए था, वह अपनी स्वतंत्रता खोकर एक जगह ही बंध गया था। यही कारण है कि रूसो ने समाज के उद्भव और प्रकृति की स्थिति से प्रस्थान को एक घातक दुर्घटना कहा है। कुछ विशेषाधिकार (प्रिविलेज) प्राप्त लोगों की संपत्ति की रक्षा के लिए नागरिक समाज अस्तित्व में आया। इसका गठन शांति की रक्षा और उन लोगों की संपत्ति के अधिकार की रक्षा के लिए किया गया था, जिनके पास संपत्ति थी। इसने वास्तविक स्वामित्व को सही स्वामित्व में बदल दिया और गरीबों को किसी भी संपत्ति से बेदखल कर दिया गया। हालांकि, एक बात स्पष्ट थी कि एक बार नागरिक समाज के उभरने के बाद प्रकृति की स्थिति में वापस नहीं जाना था। 

समाधान: वास्तविक सामाजिक संविदा

स्वतंत्र होने के लिए, प्रत्येक व्यक्ति को अपने सभी अधिकारों को पूरे समुदाय के लिए छोड़ देना चाहिए, सभी के लिए समान परिस्थितियों का निर्माण करना चाहिए और इस प्रकार समानता का निर्माण करना चाहिए। रूसो ने पहले समाज के बजाय एक सही समाज के निर्माण की बात की। उनके अनुसार, पुरुष “सामूहिक इच्छा” के अधीन हैं जो जनता की भलाई के लिए मौजूद है। सहमति राजनीतिक अधिकार का आधार है। बल कभी भी राजनीतिक सत्ता स्थापित करने का आधार नहीं हो सकता। साथ ही, समाज कोई प्राकृतिक घटना नहीं है। मनुष्य अपनी इच्छा और पसंद से समाज (अन्य पुरुषों के साथ संबंध) में प्रवेश कर सकता है। एक उच्च संगठन एक ऐसी राजनीति होगी जो अपने सदस्यों के सामान्य हितों की देखभाल करेगी। सही प्रकार का समाज मानव स्वतंत्रता को बढ़ाएगा। सामाजिक संविदा का उद्देश्य अधिकार के साथ स्वतंत्रता को समेटना था।

रूसो ने कहा है कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है और हर जगह बंधा रहता है”। एक समुदाय जो सभी सहमति वाले व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा से सामूहिक इच्छा को प्रस्तुत करने के द्वारा गठित किया गया था, वह स्वतंत्र पैदा हुए व्यक्तियों के विरोधाभास (पैराडॉक्स) का समाधान था, जो फिर भी बंधा हुआ है।

रूसो के संविदा और राजनीतिक अधिकार की विशेषताएं

  • हर मानवीय गतिविधि राजनीति से जुड़ी हुई थी।
  • उत्पीड़न से कभी भी समाज का निर्माण नहीं हो सकता।
  • सहमति समाज का आधार है। 
  • रूसो ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की आवश्यकता के साथ-साथ समुदाय की सामूहिक इच्छा को महत्व दिया। उन्होंने एक समुदाय के दावों को व्यक्ति के दावों के साथ और सत्ता के दावों को स्वतंत्रता के दावों के साथ समेटने का प्रयास किया है। 
  • संप्रभुता सामूहिक इच्छा का अभ्यास है। सभी व्यक्तिगत अधिकार सामूहिक इच्छा के अधीन हैं।
  • समुदाय के निर्माण से व्यक्ति का नैतिक परिवर्तन होता है।
  • एक आदर्श गणतंत्र सद्गुणों का समुदाय होगा। 
  • रूसो ने प्राचीन ‘स्पार्टा’ और ‘रोम’ को अपने आदर्श गणराज्य के मॉडल के रूप में वर्णित किया है।  
  • ‘सामूहिक इच्छा’ सभी कानूनों का स्रोत होगी। कार्यकारी इच्छा सामूहिक इच्छा नहीं हो सकती। केवल विधायी इच्छा जो संप्रभु थी वह सामूहिक इच्छा हो सकती है। 
  • राज्य को एक सहमति और भागीदारी वाला लोकतंत्र होना चाहिए। रूसो के अनुसार, प्रत्यक्ष लोकतंत्र विधायी इच्छा को समाविष्ट (एंबॉडी) करता है। 
  • कानून के निर्देशों का पालन करके मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र हो सकता है।
  • रूसो ने शक्तियों को पूर्ण तरह से छोड़ने के विचार को खारिज कर दिया जिसने व्यक्ति को संप्रभु के अधीन कर दिया।
  • संप्रभुता अपरिहार्य (इनएलियनेबल) और अविभाज्य थी।
  • संप्रभुता उत्पन्न होते ही, लोगों के पास रही। 
  • रूसो ने सरकार को सामूहिक इच्छा का एजेंट बताया है।
  • जैसा कि रूसो ने संप्रभु के अत्याचारी बनने की कोई संभावना नहीं देखी, उन्होंने ऐसी स्थिति के खिलाफ कोई सुरक्षा उपाय नहीं दिए।
  • रूसो के लिए स्वतंत्रता सबसे बड़ी संतोषजनक चीज़ थी। 
  • संपत्ति नैतिक भ्रष्टाचार और अन्याय का मूल कारण थी।

आलोचना

  • रूसो का सामूहिक इच्छा का विचार बहुत अस्पष्ट है। 
  • रूसो अपने सामाजिक संविदा का व्यावहारिक उदाहरण देने में विफल रहा।
  • उनका सिद्धांत विरोधाभासी है यह मानते हुए कि समाज ने मानव जाति को भ्रष्ट कर दिया है, वह इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक और सामाजिक संविदा तैयार करता है।
  • अमूर्त सामूहिक इच्छा एक निरपेक्ष शासन प्रतीत होती है।

नए सिरे से सामाजिक संविदा की आवश्यकता

जबकि पारंपरिक सामाजिक संविदा के सिद्धांत राज्य और समाज की उत्पत्ति से संबंधित हैं, सामाजिक संविदा के सिद्धांतों के आधुनिक संस्करण (वर्जन) और पुनः प्रवर्तन इससे संबंधित नहीं हैं। सामाजिक संविदा जिस पर वर्तमान में समाज आधारित है, युद्ध के बाद की समस्याओं से निपटने के साधन के रूप में उभरा है। सामाजिक संविदा को परिस्थितियों में बदलाव के साथ बदला और अपडेट किया जाना चाहिए। दुनिया ने 2020 में जो महामारी देखी और अभी भी देख रहे है, उसने एक नए सामाजिक संविदा की आवश्यकता का आह्वान किया है। संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.) ने “अवर कॉमन एजेंडा-रिपोर्ट ऑफ सेक्रेटरी-जनरल” के भाग II में सामाजिक संविदा के नवीनीकरण (रिन्यूअल) का प्रस्ताव दिया है। नए सामाजिक संविदा की नींव इस प्रकार है:

  1. विश्वास: लोगों और संस्थाओं और समाज के विभिन्न समूहों के बीच विश्वास बनाने और अविश्वास को वापस बनने के लिए, रिपोर्ट निम्नलिखित प्रस्ताव बनाती है:
  • उन संस्थाओं की स्थापना जो ऐसी परेशानियों को सुनती हों: सरकारों को राष्ट्रीय सुनवाई करनी चाहिए और भविष्य के अभ्यासों की कल्पना करनी चाहिए और लोगों की परेशानियां सुनने के लिए बेहतर तरीके स्थापित करने चाहिए।
  • सेवाएं: सरकारों से सार्वजनिक प्रणालियों (सिस्टम) और सेवाओं में निवेश करने और गुणवत्तापूर्ण लोक सेवकों को सुनिश्चित करने का आग्रह किया जाता है।
  • न्याय और कानून का शासन: सचिव (सेक्रेटरी) ने कानून की एक नई दृष्टि को बढ़ावा दिया और न्याय को सामाजिक संविदा के एक अनिवार्य तत्व के रूप में मान्यता दी है।
  • कराधान (टैक्सेशन): सरकारों को धन में असमानताओं को कम करने के लिए कराधान का उपयोग करने पर विचार करना चाहिए।
  • भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।
  • डिजिटल स्पेस में सूचना : एक वैश्विक आचार संहिता जो सार्वजनिक सूचना में अखंडता को बढ़ावा देती है, संयुक्त राष्ट्र द्वारा सहायता प्राप्त राज्यों, मीडिया आउटलेट्स और नियामक निकायों के साथ मिलकर खोज की जा सकती है

2. समावेश (इंक्लूजन), संरक्षण और भागीदारी

  • यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज सहित सामाजिक सुरक्षा प्रणालियाँ
  • शिक्षा और आजीवन सीखना
  • सभ्य काम 
  • केंद्र में महिलाएं और लड़कियां, घर में शांति
  • पर्याप्त आवास डिजिटल समावेशिता (इंक्लूसिविटी)

3. लोगों और ग्रह के लिए जो मायने रखता है उसे मापना और उसका मूल्यांकन करना

  • प्रगति के उपाय खोजना जो जी.डी.पी. के पूरक (कॉम्पलमेंट) हों 
  • पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन (सिस्टम ऑफ़ एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक अकाउंटिंग) (एस.ई.ई.ए.) की हालिया प्रणाली को लागू करना
  • जी.डी.पी. के विकल्पों को ध्यान में रखते हुए, जैसे मानव विकास इंडेक्स, समावेशी (इंक्लूसिव) धन इंडेक्स, वास्तविक प्रगति इंडेक्स, बहुआयामी (मल्टिडाइमेंशनल) गरीबी इंडेक्स और असमानता-समायोजित मानव विकास इंडेक्स। 
  • देखभाल और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (इनफॉर्मल इकोनॉमी) को मान्य करने के तरीके खोजना जैसे कि अवैतनिक देखभाल कार्य का मूल्यांकन करना, आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के हिस्से के रूप में गुणवत्तापूर्ण भुगतान देखभाल में निवेश करना।

इस प्रकार, रिपोर्ट ने सरकारों और उनके नागरिकों के बीच और समाजों के भीतर भी सामाजिक संविदा के नवीनीकरण के महत्व को मान्यता दी है। यह विश्वास के पुनर्निर्माण और मानवाधिकारों के व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने का समय है।

निष्कर्ष

उपर्युक्त सामाजिक संविदा सिद्धांतों को कुछ राजनीतिक समस्याओं को समझने और स्पष्ट करने के लिए काल्पनिक व्यवस्था के रूप में वर्णित किया गया है। सामाजिक संविदा के सिद्धांतों से निकाला जाने वाला एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कानून और राजनीतिक व्यवस्था प्राकृतिक नहीं है, बल्कि मनुष्यों द्वारा बनाई गई है। एक सामाजिक संविदा, नागरिक स्वतंत्रता, कानून और व्यवस्था और शांति के संरक्षण के रूप में सभी व्यक्तियों के अधिकतम लाभ के लक्ष्य को प्राप्त करने का एक साधन मात्र है। यह उन कानूनों और नियमों पर लोगों द्वारा एक प्रकार का समझौता है जिसके द्वारा उन्हें शासित किया जाना है। 

संदर्भ

  • A History of Political Thought: Plato to Marx, Subrata Mukherjee, Sushila Ramaswamy, Second Edn.

 

सरशीयोररी की रिट

यह लेख डॉ. बी.आर. अम्बेडकर राष्ट्रीय कानून, विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा Neha Dahiya ने लिखा है। यह लेख सरशीयोररी की रिट, अन्य देशों में रिट के प्रावधान और सरशीयोररी और निषेध (प्रोहिबिशन) के बीच अंतर की व्याख्या करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

सरशीयोररी की रिट के इतिहास का पता कई साल पहले से लगाया जा सकता है जब इसे गलतियों के लिए निर्णयों की समीक्षा (रिव्यू) करने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इसका आधुनिक रूप भी इससे अलग नहीं है। उच्च अधिकारियों द्वारा कानून की गलतियों वाले या अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को पार करने वाले निचले अधिकारियो द्वारा दिए गए निर्णयों को रद्द करने के लिए इसका लगातार उपयोग किया जाता है। भारतीय कानून के तहत, संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 में क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के रिट अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के प्रावधान हैं।

रिट का संक्षिप्त परिचय

एक रिट मूल रूप से प्रशासनिक या न्यायिक शक्तियों वाले कानूनी प्राधिकरण (अथॉरिटी) द्वारा जारी एक औपचारिक (फॉर्मल) आदेश है। भारतीय संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के रिट अधिकार क्षेत्र की गारंटी क्रमशः अनुच्छेद 32 और 226 द्वारा दी गई है। मसौदा (ड्राफ्टिंग) समिति के अध्यक्ष डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा अनुच्छेद 32 को भारतीय संविधान का “दिल और आत्मा” कहा गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भाग III में उल्लिखित मौलिक अधिकार संविधान का सार हैं। हालांकि, उल्लंघन किए जाने पर उन्हें लागू करने का कोई सहारा लिए बिना, कोई उद्देश्य पूरा नहीं किया जाता है। इस प्रकार, अनुच्छेद 32 हमें वह सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 226 एक संवैधानिक प्रावधान है और उच्च न्यायालयों को व्यापक विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है।

अनुच्छेद 32(2) के अनुसार विभिन्न प्रकार की रिट

अनुच्छेद 32(2) विभिन्न रिटों को निम्नानुसार सूचीबद्ध करता है-

बन्दी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) 

इसका शाब्दिक अर्थ “आपके पास शरीर होना” है। यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है और जब भी इसे अवैध रूप से भंग किया जाता है तो इसे लागू किया जा सकता है। यह आमतौर पर अदालतों द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखने और एक कैदी को अदालत के समक्ष पेश करने के मामलों में जारी की जाती है। ऐसा कोई भी व्यक्ति, स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से रिट याचिका दायर कर सकता है।

परमादेश (मैंडेमस)

मैंडेमस “वी कमांड” के लिए एक लैटिन शब्द है। यह आमतौर पर एक उच्च न्यायिक अदालत द्वारा निचली अदालत, न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल), या सार्वजनिक प्राधिकरण को एक विशेष कार्य करने के लिए निर्देश देने के लिए जारी की जाती है। इसे तब लागू किया जाता है जब कोई सार्वजनिक प्राधिकरण उसे सौंपे गए कार्यों को करने में विफल रहता है। इसलिए जब प्राधिकरण विफल हो जाता है, तो यह रिट उन्हें कानून द्वारा आवश्यक कार्य करने के लिए आदेश देने के लिए जारी की जा सकती है।

निषेध 

निचली अदालत या निकाय को अपनी शक्तियों की सीमाओं का उल्लंघन करने से रोकने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा इसका आह्वान किया जाता है। इसे केवल कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान ही पारित किया जा सकता है।

क्यो वारंटो

इसका शाब्दिक अर्थ है “किस अधिकार से आपने आदेश दिया है”। यह किसी व्यक्ति को उस सार्वजनिक पद का प्रभार लेने से रोकने के लिए लागू की जाती है जिसका वह हकदार नहीं है। यह अवैध रूप से ऐसे पद धारण करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच है जिसके लिए वे उपयुक्त नहीं हैं।

सरशीयोररी

मूल रूप से इसका अर्थ है “प्रमाणित होना”। यह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत द्वारा पहले से पारित आदेश को रद्द करने के लिए जारी की जा सकती है। इसका उपयोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी विशेष मामले को या किसी अन्य वरिष्ठ (सुपेरियर) न्यायिक अधिकारी को विचार के लिए स्थानांतरित (ट्रांसफर) करने के लिए भी किया जा सकता है।

सरशीयोररी की रिट

सरशीयोररी के लिए आधार और व्यक्ति जिनके विरुद्ध सरशीयोररी का गठन किया जा सकता है

सरशीयोररी मूल रूप से न्यायिक नियंत्रण और संयम का एक उपकरण है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, यह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा किसी निचली न्यायालय, न्यायाधिकरण, या अर्ध-न्यायिक (क्वासी ज्यूडिशियल) प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश को रद्द करने या जब भी प्राधिकरण अपनी शक्ति से अधिक कार्य करता है, या अपेक्षित अधिकार क्षेत्र के बिना, या  प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो उसे रोकने के लिए यह जारी की जाती है। यह प्रकृति में सुधारात्मक है और इसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों द्वारा अांगे बढ़ने को रोका है।

सरशीयोररी की रिट के लिए आवश्यक शर्तें

सरशीयोररी रिट जारी करने के लिए, निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होता है:

  1. लोगों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले मामलों पर निर्णय लेने के लिए कानून के अनुसार न्यायिक अधिकार रखने वाले एक अधिकारी या न्यायाधिकरण का अस्तित्व में होना।
  2. ऐसे अधिकारी या न्यायाधिकरण ने अवश्य ही ऐसा कार्य किया हो जो-
  • न्यायिक शक्ति से अधिक, या
  • अपेक्षित अधिकार क्षेत्र के बिना, या
  • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो।

3. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह रिट विशुद्ध रूप से प्रशासनिक कार्यों के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती है। इसका तात्पर्य यह है कि इसे केवल उन स्थितियों में लागू किया जा सकता है जहां संबंधित प्राधिकारी का कर्तव्य है कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद और बिना किसी बाहरी विचार के विवेकपूर्ण तरीके से कार्य करे। हालांकि, बाद के फैसलों में, इस विचार को खारिज कर दिया गया है। इसलिए भले ही किसी निर्णय पर आने से पहले दोनों पक्षों को सुनने के लिए प्राधिकरण की आवश्यकता न हो लेकिन फिर भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। इस प्रकार, प्रशासनिक मामलों में भी सरशीयोररी की रिट जारी की जा सकती है।

4. कहा जाता है कि एक निकाय ने निम्नलिखित मामलों में अपने अधिकार क्षेत्र से परे कार्य किया है:

  • जहां मामले पर विचार करने वाली अदालत का गठन कानून के अनुसार ठीक से नहीं किया गया है, जैसे सदस्यों की आवश्यकता आदि।
  • जहां जांच की विषय वस्तु कानून के अनुसार निकाय की शक्तियों के दायरे से बाहर है।
  • जब अधिकार क्षेत्र अधिकारिता तथ्यों की गलत धारणा पर आधारित हो।
  • जब प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन या धोखाधड़ी, मिलीभगत या भ्रष्टाचार जैसे तत्वों की उपस्थिति के कारण न्याय की विफलता होती है।
  • भले ही निकाय ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर अच्छी तरह से काम किया हो, लेकिन अगर कोई स्पष्ट त्रुटि प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेशी) हो तो निर्णय को रद्द किया जा सकता है। यहाँ त्रुटि का अर्थ, कानून की त्रुटि है।

इस प्रकार, उपरोक्त सभी मामलों में, सरशीयोररी की एक रिट जारी की जा सकती है।

सरशीयोररी की रिट दाखिल करने की प्रक्रिया

सरशीयोररी के लिए रिट दाखिल करने की प्रक्रिया किसी भी रिट याचिका को दाखिल करने के समान है।  किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अनुच्छेद 32 के तहत या उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका या तो सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जा सकती है। याचिका दायर करने के लिए कोई विशिष्ट समय सीमा प्रदान नहीं की गई है।  हालांकि, उचित देरी के लिए जगह है। इसे एक अधिकार के उल्लंघन के बाद उचित समय के भीतर दायर किया जाना चाहिए।

सबसे पहले, एक पीड़ित व्यक्ति को सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ पहले एक वकील या किसी संगठन से संपर्क करना होगा। इसके बाद वकील द्वारा याचिका का मसौदा तैयार किया जाता है। मसौदे में पीड़ित के बारे में सभी आवश्यक विवरण और उसके अधिकारों के उल्लंघन के बारे में तथ्य शामिल होंगे। इसके बाद अदालत में याचिका दायर की जाती है। फिर अदालत सुनवाई के लिए एक निश्चित तारीख तय करती है। अदालत द्वारा दूसरे पक्ष को नोटिस भेजा जाता है। इसके बाद दोनों पक्ष अदालत में पेश होते है और अपनी दलीलें रखते है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश फैसला सुनाते हैं। किसी भी अन्य रिट की तरह, याचिका में पालन किए जाने वाले रिट के लिए एक उचित निर्धारित प्रारूप है।

सरशीयोररी की रिट से संबंधित मामले

सरशीयोररी के रिट से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मामले निम्नलिखित हैं:

सैयद याकूब बनाम के.एस.  राधाकृष्णन और अन्य (1964)

तथ्य

इस मामले में राज्य परिवहन प्राधिकरण ने मोटर वाहन अधिनियम, 1939 के तहत एक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) के माध्यम से दो चरणों वाले कैरिज परमिट के अनुदान (ग्रांट) के लिए आवेदन मांगे थे। कई आवेदन प्राप्त करने के बाद, आवेदकों में से एक को पहला परमिट दिया गया था, जबकि दूसरे परमिट के लिए नए आवेदनों को बुलाया गया था। इसके बाद अपीलार्थी ने राज्य परिवहन अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील की थी। न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में पहले परमिट की पुष्टि की और दूसरे में उसने अपीलकर्ता की अपील की अनुमति दी और कहा कि यह उसे दिया जाना चाहिए। इसके बाद प्रतिवादी सरशीयोररी की रिट के लिए उच्च न्यायालय चले गए। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि न्यायाधिकरण ने कई भौतिक विचारों की अनदेखी की थी। जब पिछले आदेश की पुष्टि की गई, तब अपीलकर्ता ने एक विशेष अनुमति याचिका के तहत सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

मुद्दा

क्या उच्च न्यायालय ने सरशीयोररी की रिट जारी करके अपने अधिकार क्षेत्र को पार किया था?

निर्णय

यह माना गया कि उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले में सरशीयोररी की रिट जारी करके अपने अधिकार क्षेत्र को पार किया है। यह देखा गया कि यह रिट उन मामलों को ठीक करने के लिए जारी की जाती है जहां एक अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र को पार किया हो। रिट द्वारा दी गई शक्तियों के तहत, अदालत अपील की अदालत के रूप में कार्य नहीं कर सकती है या तथ्य की त्रुटि की जांच नहीं कर सकती है। इसका उपयोग उन मामलों में किया जा सकता है जहां कानून की त्रुटि है, या जब यह दिखाया जा सकता है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। लेकिन केवल तथ्य की त्रुटि के आधार पर नहीं। हालांकि, ऐसी कोई त्रुटि हुई है या नहीं यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।

हरि विष्णु कामथ बनाम सैयद अहमद इशाक (1954)

तथ्य

इस मामले में, अपीलकर्ता और प्रतिवादी दोनों लोक सभा के चुनाव के लिए होशंगाबाद निर्वाचन क्षेत्र (कांस्टीट्यूएंसी) से दो चुनावी उम्मीदवार थे। जब परिणाम सामने आया, तो प्रतिवादी को अपीलकर्ता से अधिक मत प्राप्त हुए और रिटर्निंग अधिकारी ने प्रतिवादी को विजेता घोषित किया। फिर अपीलकर्ता ने चुनाव को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की और इसे रद्द करा दिया गया क्योंकि प्रतिवादी के पक्ष में चिह्नित 301 मतपत्र वैध नहीं थे क्योंकि उनके पास नियम 28 के अनुसार विशिष्ट चिह्न नहीं थे। चुनाव न्यायाधिकरण ने याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि मतों की गलत स्वीकृति से परिणाम प्रभावित नहीं हुआ। इसके बाद अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय का सरशीयोररी की रिट के लिए रुख किया ताकि चुनाव न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश को इस आधार पर रद्द कर दिया जाए कि यह अमान्य था और न्यायाधिकरण ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकार क्षेत्र को पार किया था।

मुद्दा

क्या उच्च न्यायालय के पास चुनाव न्यायाधिकरण के निर्णय के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने का अधिकार क्षेत्र था?

निर्णय

यह माना गया कि याचिका विचारणीय थी और न्यायाधिकरण का निर्णय उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र में आया था। चुनाव न्यायाधिकरण के फैसले को भी रद्द कर दिया गया था।

इसके अलावा, इसने निम्नलिखित सिद्धांतों को स्थापित किया गया था:

  1. निचली अदालतों द्वारा की गई अधिकार क्षेत्र की त्रुटियों को ठीक करने के लिए रिट जारी की जा सकती है।
  2. यह न्यायालय के पर्यवेक्षी (सुपरवाइजरी) अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है न कि अपीलीय अधिकार क्षेत्र का है। यदि कानून किसी विशेष मामले में अपील की अनुमति नहीं देता है, तो इसे सरशीयोररी की रिट के माध्यम से उपाय देना कानून के उद्देश्य को विफल करने के बराबर है।
  3. यहाँ उद्देश्य मामले की फिर से सुनवाई करना और तथ्यों पर एक बार फिर से विचार करना नहीं है। इसे केवल कानून की त्रुटि के मामलों में ही लागू किया जा सकता है।

राधेश्याम और अन्य बनाम छबी नाथ और अन्य (2015)

तथ्य

इस मामले में सिविल अदालत द्वारा पारित एक अंतरिम (इंटरिम) आदेश के खिलाफ, प्रतिवादी ने मुकदमे के लंबित रहने के दौरान उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता के पक्ष में पारित कर दिया। तब अपीलकर्ता ने विशेष अनुमति याचिका के तहत सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और कहा कि उच्च न्यायालय के पास आदेश पारित करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और सिविल अदालत द्वारा पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ कोई रिट याचिका नहीं हो सकती है।

मुद्दा

क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिविल अदालत के आदेश के खिलाफ रिट दायर की जा सकती है?

निर्णय

न्यायालय ने अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में अंतर किया। यह देखा गया कि अनुच्छेद 226 न्यायालय को रिट अधिकार क्षेत्र देता है, जबकि दूसरी ओर अनुच्छेद 227 पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र देता है। ये दोनों अपने कार्यक्षेत्र और न्यायालय को दी गई शक्तियों की प्रकृति में भिन्न हैं। अनुच्छेद 227 के अनुसार, न्यायालय न केवल किसी आदेश को रद्द कर सकता है, बल्कि उसे अपनी राय या निर्णय से प्रतिस्थापित (सब्स्टीट्यूट) भी कर सकता है। लेकिन अदालत अनुच्छेद 226 के तहत ऐसा नहीं कर सकती है। इस प्रकार, यह माना गया कि सिविल अदालतों के न्यायिक आदेश, सरशीयोररी की रिट के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

अन्य देशों में सरशीयोररी के लिए प्रावधान

निम्नलिखित रूपों में देश भर में सरशीयोररी की रिट जारी है:

अमेरीका

निचली अदालतों के निर्णयों की समीक्षा करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में अक्सर सरशीयोररी की रिट का उपयोग किया जाता है। कोई पक्ष अधिकार के मामले में सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील नहीं कर सकता है। इस प्रकार, इसे निचली अदालत से मामले की समीक्षा करने के लिए सरशीयोररी का उपयोग करना पड़ता है। सरशीयोररी के लिए एक याचिका पर विचार करने के लिए, कम से कम चार न्यायाधीशों को समीक्षा सुनने के लिए सहमत होना चाहिए। इसे ‘सरशीयोररी देना’ कहते हैं। ‘सरशीयोररी से इनकार’ तब होता है जब न्यायाधीश समीक्षा को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। अमेरिका में “सेर्ट पूल” में भाग लेना एक आम बात है। इस प्रथा में न्यायाधीशों के विधि लिपिक (क्लर्क) सामूहिक रूप से आपस में सरशीयोररी के लिए याचिकाओं को सौंपने में शामिल होते हैं। वे उनका विश्लेषण करते हैं और न्यायाधीशों को यह अनुशंसा करने के लिए ज्ञापन (मेमोरेंडम) तैयार करते हैं कि न्यायाधीशों को सरशीयोररी की रिट देनी चाहिए या नहीं। यूएस सर्वोच्च न्यायालय नियम सूची के नियम 10 में सरशीयोररी प्रदान करने के मानदंड (क्राइटेरिया) शामिल हैं। यह भी घोषित करता है कि यह एक विवेकाधीन शक्ति है जो सर्वोच्च न्यायालय के पास है। रिट को इनकार करने का मतलब यह नहीं है कि अदालत निचली अदालत के फैसले से सहमत है। तथ्यात्मक त्रुटियों या कानून के दुरूपयोग के मामलों में, रिट शायद ही कभी दी जाती है।

यूके

यूके में, रिट का उपयोग न्यायिक विवेक पर किया जाता है, इसे केवल तभी दिया जाता है जब कोई अधिकार क्षेत्र की त्रुटि हो। यह ब्रिटिश संविधान की धारा 75(v) के तहत उच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध है। यह न्यायपालिका अधिनियम, 1903 की धारा 39B(1) के अनुसार संघीय (फेडरल) न्यायालय के पास भी उपलब्ध है। यह सीमित प्रकृति में राज्य की अदालतों के पास भी है। यहाँ रिट की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसे हमेशा सहायक राहत के रूप में दिया जाता है। यह तभी जारी की जा सकती है जब कोई अन्य संवैधानिक उपाय स्थापित हो। एक अदालत रिट के स्थान पर निषेधाज्ञा (इनजंक्शन) या घोषणा जैसे न्यायसंगत उपाय भी दे सकती है।

फ्रांस

निम्नलिखित मामलों में कोर्ट डी कैसेशन द्वारा सरशीयोररी की रिट जारी की जा सकती है:

  1. जब पिछली अदालत के पास निर्णय देने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।
  2. जब प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।
  3. यदि दिया गया तर्क प्रासंगिक नहीं था।
  4. यदि निर्णय कानूनी ढांचे के अनुकूल नहीं था।

अदालत एक याचिका को खारिज कर सकती है यदि वह इसे बेबुनियाद पाती है और ऐसा करने के कारणों को दर्ज कर सकती है।

ऑस्ट्रेलिया

ऐतिहासिक रूप से, न्यायिक समीक्षा की शक्ति, जिसे पहले निचला अधिकार क्षेत्र कहा जाता था, 1824 में वैन डायमन्स लैंड और न्यू साउथ वेल्स में पहले सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के साथ ऑस्ट्रेलिया में आई थी। इस प्रकार, सरशीयोररी जो एक सामान्य कानून की शक्ति थी, न्यायालयों द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से बनाई गई अधिकारिता की शक्ति थी। वहां पालन किए जाने वाले सामान्य कानून में, न्यायिक समीक्षा विभिन्न विशेषाधिकार रिटों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है और सरशीयोररी उनमें से एक है। सरशीयोररी कानून के विपरीत दिए गए निर्णय को रद्द कर देती है। इसके साथ ही, संविधान की धारा 75(v) भी ‘न्यायिक समीक्षा का एक मजबूत न्यूनतम प्रावधान’ प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका अधिनियम, 1903 की धारा 39B(1) ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र को संघीय न्यायालय तक विस्तारित करती है।

सरशीयोररी और निषेध की रिट के बीच अंतर

सरशीयोररी की रिट

जैसा कि ऊपर बताया गया है, इसका उपयोग उच्च न्यायालय द्वारा निचले न्यायिक प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश को रद्द करने के लिए किया जाता है। यह उन मामलों में जारी की जाती है जहां निर्णय में कानून की प्रथम दृष्टया त्रुटि होती है, प्राधिकरण ने अपनी शक्तियों से अधिक आदेश दिया हो, या जब प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।

निषेध की रिट

सरशीयोररी के रिट के समान, निषेध की रिट भी एक उच्च न्यायिक प्राधिकारी द्वारा निचले प्राधिकारी को जारी किया जाता है ताकि उसे अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ने से रोका जा सके। यह एक तरह का ‘स्टे ऑर्डर’ है, जहां उच्च अधिकारी निचले वाले को आगे की कार्यवाही करने से ‘निषिद्ध’ करते हैं। हालांकि, इसे केवल न्यायिक निकायों के खिलाफ पारित किया जा सकता है, न कि प्रशासनिक निकायों के खिलाफ। यह न्यायिक पदानुक्रम (हायरार्की) के उल्लंघन और दक्षता (एफिशिएंसी) के लिए विषयों को अलग करने के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है। इसे केवल कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान ही पारित किया जा सकता है।

मामले जिन में निषेध की रिट जारी की जा सकती है

जिन तीन मुख्य मामलों में इसे जारी किया जा सकता है, वे निम्नलिखित हैं:

  1. जब किसी प्राधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र को पार कर लिया हो,
  2. जब मामले से निपटने के लिए प्राधिकारी के पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था,
  3. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है।

दोनों रिट यह सुनिश्चित करती हैं कि न्यायिक कार्यों को स्थापित नियमों के उल्लंघन के बिना कानून के अनुसार किया जा रहा है। ये दोनों यह सुनिश्चित करती हैं कि न्यायिक अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण न करें। हालांकि, ये समान नहीं हैं। इनके बीच अंतर इस प्रकार हैं:

सरशीयोररी निषेध
अदालत द्वारा अपने आदेश को रद्द करने का निर्णय देने के बाद सरशीयोररी की रिट जारी की जाती है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा पहले से पारित किसी आदेश के विरुद्ध रिट दाखिल करना चाहता है, तो यह सरशीयोररी की रिट होनी चाहिए। निषेध रिट तब जारी की जाती है जब कार्यवाही चल रही हो और आदेश अभी तक नहीं दिया गया हो। इसलिए यदि कोई कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान रिट दायर करना चाहता है, तो यह निषेध की रिट होनी चाहिए।
यह प्रकृति में सुधारात्मक है। यह प्रकृति में निवारक है।
वैकल्पिक उपाय की उपस्थिति सरशीयोररी के मामले में अधिक प्रासंगिक होती है। क्योंकि बेहतर होगा कि किसी निचली अदालत द्वारा पूरे आदेश को रद्द कर दिया जाए। वैकल्पिक उपाय की उपस्थिति निषेध की रिट पर पूर्ण रोक नहीं है।

निष्कर्ष

निचली अदालतों द्वारा पारित आदेशों को रद्द करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा सरशीयोररी रिट का उपयोग किया गया है, जब उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र को पार किया है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, या कानून की त्रुटि की है। अदालतों ने कई फैसलों में आवश्यकताओं को स्पष्ट किया है। रिट अधिकार क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 32 और उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 226 में दिया गया है। सरशीयोररी की रिट अन्य देशों में भी इसी तरह से पाई जाती है। सरशीयोररी और निषेध बहुत समान तर्ज पर चलते हैं। हालांकि, वे दोनों अपने सार में काफी भिन्न हैं।

संदर्भ

  • डी.डी.  बसु, भारत के संविधान का परिचय (22वां संस्करण 2011)।

 

 

भारत में आपराधिक न्यायालयों की शक्तियाँ और पदानुक्रम

यह लेख गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली से संबद्ध विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की छात्रा Aparajita Balaji ने लिखा है। उन्होंने अदालतों की रचना और शक्तियों के साथ-साथ भारत में आपराधिक न्यायालयों का पदानुक्रम (हाइरार्की) क्या है, इस पर चर्चा की है। इसके अलावा, यह लेख सभी को न्याय प्रदान करने के लिए अदालतों के इतने बड़े पदानुक्रम के महत्व और आवश्यकता को स्पष्ट करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

भारतीय न्यायपालिका दुनिया की सबसे कुशल न्यायिक प्रणालियों में से एक है। न्यायपालिका भारत के संविधान से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करती है। विधायिका या कार्यपालिका (एग्जिक्यूटिव) द्वारा प्रदान की गईप्रदान की हुई शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायालयों के अस्तित्व की आवश्यकता है। भारतीय न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक (गार्डियन) होने के साथ-साथ भारत के संविधान की संरक्षक भी है।

न्यायपालिका काफी लंबी और जटिल अदालतों के पदानुक्रम के साथ अच्छी तरह से स्थापित है। न्यायिक व्यवस्था इस तरह से स्थापित की गई है कि यह देश के प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करती है। भारत में न्यायिक व्यवस्था एक पिरामिड के रूप में है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय पदानुक्रम में सबसे ऊपर है। पदानुक्रम इस तरह से बनाया गया है कि एक दूरस्थ (रिमोट) क्षेत्र से भी एक व्यक्ति के लिए अपने विवादों को हल करने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना संभव है। यह प्रणाली संघ के मुद्दों के साथ-साथ राज्य के कानूनों से निपटने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित है।

आपराधिक न्यायालयों का पदानुक्रम

भारत में आपराधिक न्यायालयों का पदानुक्रम इस प्रकार है:

  • भारत का सर्वोच्च न्यायालय – भारत का सर्वोच्च न्यायालय, सर्वोच्च होने के नाते, भारत के संविधान के भाग V और अध्याय IV के अनुच्छेद 124 के तहत स्थापित किया गया था।
  • भारत के उच्च न्यायालय- उच्च न्यायालय पदानुक्रम के दूसरे स्तर पर हैं। वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 द्वारा शासित होते हैं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से बाध्य हैं।
  • भारत के निचले न्यायालयों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है।
  1. मेट्रोपॉलिटिन न्यायालय
  2. सत्र (सेशन) न्यायालय
  3. चीफ मेट्रोपॉलिटिन मजिस्ट्रेट
  4. प्रथम श्रेणी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट
  5. जिला न्यायालय
  • सत्र न्यायालय
  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट
  • द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट
  • कार्यकारी मजिस्ट्रेट

भारत में आपराधिक न्यायालयों की रचना

  1. सत्र न्यायाधीश– सीआरपीसी की धारा 9 सत्र न्यायालय की स्थापना के बारे में बात करती है। राज्य सरकार सत्र न्यायालय की स्थापना करती है जिसकी अध्यक्षता, उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है। उच्च न्यायालय अतिरिक्त और साथ ही सहायक सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करता है। सत्र न्यायालय आमतौर पर उच्च न्यायालय के आदेशानुसार ऐसे स्थान या स्थानों पर बैठता है। लेकिन किसी विशेष मामले में, यदि सत्र न्यायालय की राय है कि उसे पक्षों और गवाहों की सुविधा को पूरा करना होगा, तो वह अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) और आरोपी की सहमति के बाद किसी अन्य स्थान पर अपनी बैठकों की अध्यक्षता करेगा। सीआरपीसी की धारा 10 के अनुसार, सहायक सत्र न्यायाधीश सत्र न्यायाधीश के प्रति जवाबदेह होते हैं।
  2. अतिरिक्त/सहायक सत्र न्यायाधीश- इन्हें किसी विशेष राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किया जाता है। वे सत्र न्यायाधीश की अनुपस्थिति के मामले में हत्या, चोरी, डकैती, जेबकतरे और ऐसे अन्य मामलों से संबंधित मामलों को देखते हैं।
  3. न्यायिक मजिस्ट्रेट- प्रत्येक जिले में, जो मेट्रोपॉलिटिन क्षेत्र नहीं है, प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट कितने भी हो सकते है। पीठासीन (प्रेसिडिंग) अधिकारियों की नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा की जाएगी। प्रत्येक न्यायिक मजिस्ट्रेट सत्र न्यायाधीश के अधीनस्थ (सबोर्डिनेट) होगे।
  4. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट- मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र को छोड़कर, प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया जाएगा। केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में नामित किया जा सकता है।
  5. मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट- ये मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों में स्थापित होते हैं। उच्च न्यायालयों के पास पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति करने की शक्ति है। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया जाएगा। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सत्र न्यायाधीश के निर्देशों के तहत काम करेगे।
  6. कार्यकारी मजिस्ट्रेट- प्रत्येक जिले में और प्रत्येक मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में धारा 20 के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की जाएगी और उनमें से एक जिला मजिस्ट्रेट बन जाएगा।

आपराधिक न्यायालयों की शक्तियां

  1. सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक प्रणाली में सबसे ऊपर का न्यायालय है। हमारे देश में इसका सर्वोच्च न्यायिक अधिकार है।

  • संघीय (फेडरल) न्यायालय– अनुच्छेद 131 केंद्र और राज्यों के बीच या दो राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवाद को हल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) की शक्ति देता है।
  • संविधान की व्याख्या- संविधान से संबंधित किसी भी मुद्दे के आधार पर किसी प्रश्न को देखने की शक्ति केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
  • न्यायिक समीक्षा (रिव्यू) की शक्ति (अनुच्छेद 137) – सभी अधिनियमित कानून न्यायपालिका द्वारा जांच के अधीन हैं।
  • अपील की अदालत – सर्वोच्च न्यायालय भारत में अपील के लिए न्यायालय है। यह हमारे देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में पड़े सभी मामलों की अपील सुनने की शक्ति रखता है। कानून के प्रश्न से जुड़े उच्च न्यायालय के सभी मामलों के किसी भी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 132(1), 133(1) और 134 के अनुसार अनुदान का एक प्रमाण  पत्र प्रदान किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय में अपील निम्नलिखित श्रेणियों के अंतर्गत की जा सकती है:-
  • संवैधानिक मामले
  • सिविल मामले
  • आपराधिक मामले
  • विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी)

2. उच्च न्यायालय

  • मूल अधिकार क्षेत्र- कुछ मामलों में, मामला सीधे उच्च न्यायालयों में दायर किया जा सकता है। इसे उच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। जैसे, मौलिक अधिकारों, विवाह और तलाक के मामलों से संबंधित मामले।
  • अपीलीय अधिकार क्षेत्र- निचली अदालत से आने वाले मामलों के लिए उच्च न्यायालय अपीलीय न्यायालय है।
  • पर्यवेक्षी (सुपरवाइजरी) अधिकार क्षेत्र- यह सभी अधीनस्थ न्यायालयों के मामलों पर उच्च न्यायालय के सामान्य अधीक्षण की शक्ति को संदर्भित करता है।

भारत के संविधान में विभिन्न न्यायालयों की शक्तियों पर प्रकाश डाला गया है। इन अदालतों के अलावा, अधीनस्थ आपराधिक अदालतों की शक्ति और कार्य दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत प्रदान किए गए हैं, जैसा कि धारा 6 के तहत उल्लेख किया गया है।

  • सत्र न्यायालय
  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट और, किसी भी मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट
  • द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट
  • कार्यकारी मजिस्ट्रेट

दंड प्रक्रिया संहिता के तहत धारा 2635 से विभिन्न अधीनस्थ न्यायालयों की शक्ति का उल्लेख किया गया है, जिसका वर्णन नीचे किया गया है।

धारा 26 में उन न्यायालयों की सूची का उल्लेख है जो अपराधों की सुनवाई करते हैं – धारा 26 के अनुसार, भारतीय दंड संहिता के तहत उल्लिखित किसी भी अपराध पर मुकदमा किया जा सकता है:

  • उच्च न्यायालय द्वारा
  • सत्र न्यायालय द्वारा
  • दंड प्रक्रिया संहिता की पहली अनुसूची में निर्दिष्ट किसी अन्य न्यायालय द्वारा

हालांकि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376, धारा 376A, धारा 376B, धारा 376C, धारा 376D और धारा 376E के तहत किए गए किसी भी अपराध पर एक महिला न्यायाधीश द्वारा मुकदमा चलाया जता है।

3. सत्र न्यायालय

राज्य सरकार सत्र न्यायालय की स्थापना करती है जिसकी अध्यक्षता उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है। उच्च न्यायालय अतिरिक्त और साथ ही सहायक सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। सत्र न्यायालय आमतौर पर उच्च न्यायालय के आदेशानुसार ऐसे स्थान या स्थानों पर बैठता है।

4. मजिस्ट्रेट न्यायालय

मजिस्ट्रेट न्यायाधीशों की नियुक्ति आमतौर पर उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है।

  • किशोरों के मामले में अधिकार क्षेत्र (धारा 27)- कोई भी व्यक्ति जो 16 वर्ष से कम आयु का है, जो किशोर है, उसे मृत्युदंड और आजीवन कारावास की सजा से छूट दी गई है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, या कोई अन्य न्यायालय जिसे विशेष रूप से बाल अधिनियम, 1960 (1960 का 60) या किसी अन्य कानून के तहत विशेष रूप से सशक्त बनाया गया है, जो युवा अपराधियों के उपचार, प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) और पुनर्वास के लिए प्रदान करता है, इस तरह के मामले का विचारण करने के लिए पात्र हैं।

विविध शक्तियां

  • शक्तियों को प्रदान करने का तरीका – धारा 32 में कहा गया है कि उच्च न्यायालय या राज्य सरकारों के पास लोगों को उनके खिताब से सशक्त बनाने के आदेश के आधार पर शक्ति है।
  • शक्तियों की वापसी- धारा 33 के अनुसार, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार को इस संहिता के तहत उनके द्वारा प्रदत्त शक्तियों को वापस लेने की शक्ति है।

न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ जिनका प्रयोग उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया जा सकता हैं- धारा 35 के अनुसार, इस संहिता के अन्य प्रावधानों के अधीन, न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया जा सकता है।

सजा जो विभिन्न न्यायालयों द्वारा पारित की जा सकती हैं

  1. सजा जो उच्च न्यायालय और सत्र न्यायाधीश पारित कर सकते हैं (धारा 28)। यह सजा निम्नलिखित है:-
  • कानून द्वारा अधिकृत (ऑथराइज्ड) कोई भी सजा उच्च न्यायालय द्वारा पारित की जा सकती है।
  • एक सत्र या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश को कानून द्वारा अधिकृत किसी भी सजा को पारित करने का अधिकार है। लेकिन, मौत की सजा सुनाते समय उच्च न्यायालय से पूर्व अनुमति की आवश्यकता होती है।
  • एक सहायक सत्र न्यायाधीश के पास कानून द्वारा अधिकृत किसी भी सजा को पारित करने का अधिकार होता है। ऐसा न्यायाधीश मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अधिक कारावास की सजा नहीं दे सकता।

2. मजिस्ट्रेट द्वारा पारित सजा (धारा 29) – मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत मौत की सजा, आजीवन कारावास या सात साल से अधिक के कारावास को छोड़कर कानून द्वारा अनुमोदित (एप्रूव) किसी भी सजा को पारित करने के लिए अधिकृत है।

  • प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट तीन साल से कम की अवधि के लिए कारावास की सजा, या दस हजार रुपये से कम का जुर्माना या दोनों के लिए पात्र है।
  • द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट एक वर्ष से कम की अवधि के लिए कारावास, या जुर्माना या दोनों की सजा दे सकता है। लगाया गया जुर्माना पांच हजार रुपये से अधिक नहीं हो सकता है।
  • मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की शक्तियों के अलावा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के साथ-साथ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की शक्तियां होती हैं।

3. जुर्माने की चूक के लिए सजा (धारा 30)- इस धारा के अनुसार, मजिस्ट्रेट को कानून द्वारा निर्दिष्ट जुर्माने के भुगतान में चूक के लिए कारावास की सजा पारित करने की शक्ति है। लेकिन निम्नलिखित शर्तों को पूरा करने की जरूरत है:-

  • यह शब्द मजिस्ट्रेट की शक्तियों (धारा 29 के तहत) के दायरे से बाहर नहीं जाना चाहिए।
  • यह अवधि कारावास की अवधि के एक-चौथाई से अधिक नहीं होनी चाहिए, जिसे मजिस्ट्रेट केवल तभी प्रदान करने के लिए सक्षम है जब कारावास की सजा, अपराध के लिए दंड के रूप में मूल सजा का एक हिस्सा होता है।
  • इस धारा के तहत सुनाई गई सजा धारा 29 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा दी जाने वाली अधिकतम अवधि के लिए कारावास की मूल सजा के अतिरिक्त हो सकती है।
  • एक मुकदमे में कई अपराधों के मामलों में सजा (धारा 31)- इस धारा के अनुसार, जब एक व्यक्ति को दो या दो से अधिक अपराधों के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो अदालत उसे एक मुकदमे में ऐसे अपराध के लिए सजा दे सकती है।
  • अदालत को कई दंड देने की शक्ति है। कारावास की ऐसी सजाएं अन्य दंडों की समाप्ति के बाद शुरू होती हैं। जब तक अदालतें ऐसा निर्देश नहीं देतीं कि ऐसी सजाएं एक-दूसरे के साथ-साथ चल सकती है। न्यायालय के लिए अपराधी को उच्च न्यायालय के समक्ष भेजना आवश्यक नहीं है। यदि कई अपराधों के लिए सजा अदालत द्वारा दी जाने वाली एक अपराध के लिए सजा उसकी शक्ति से अधिक है। लेकिन :
  • यह कारावास 14 वर्ष की अवधि से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • कुल सजा भी सजा की राशि के दोगुने से अधिक नहीं होगी जिसे न्यायालय एक ही अपराध के लिए देने के लिए सक्षम है।

अपील के लिए, इस धारा के तहत अपराधी के खिलाफ पारित कुल सजा को आम तौर पर एक सजा के रूप में माना जाता है।

न्यायालयों के बीच शक्ति के मौजूदा वितरण में किए जाने वाले परिवर्तन

वर्तमान में, भारत में, आपराधिक मामलों में मौत की सजा जारी करने पर कोई विशेष दिशानिर्देश नहीं हैं। इसके अलावा, अधिकांश अपराधों में या तो अधिकतम या न्यूनतम सजा का ही उल्लेख किया गया है। यह निर्णय करने के लिए न्यायाधीश पर छोड़ दिया गया है कि किसी विशेष परिस्थिति में सजा की सही अवधि क्या होनी चाहिए।

समान परिस्थितियों के मामलों में न्यायाधीशों को विशेष सजा देने के लिए कोई समान प्रक्रिया या प्रदर्शन नहीं है। समान तथ्यों वाले मामलों में भी सजा की मात्रा भिन्न होती है। इसलिए न्यायाधीशों को उन मानदंडों का उल्लेख करते हुए एक संरचित स्थिति में दिया जाना चाहिए जिस पर उन्हें अपने निर्णयों को आधार बनाना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत का संविधान भारत में पूर्ण अधिकार और मूल्य रखता है। इसलिए, इसकी सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपाय प्रदान करना आवश्यक हो जाता है और इसलिए, अदालतों को जांच करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी प्राधिकरण अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करे और दूसरों के अधिकारो पर अतिक्रमण न करे, उन्हें विभिन्न शक्तियों के साथ निहित किया गया है। अदालत वह स्थान हैं जहां लोग अपनी शिकायतें ले जा सकते हैं और सरकार की अन्य प्रणालियों के विफल होने पर अपने विवादों का समाधान करवा सकते हैं।

न्यायालयों का पदानुक्रम इस प्रकार विकसित किया गया है कि इस देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए जब भी कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो उनके लिए न्यायालयों का दरवाजा खटखटाना आसान हो जाता है। यह नागरिकों को उच्च न्यायालयों में अपील करने के लिए एक मंच प्रदान करता है, अगर उन्हें लगता है कि निचली अदालतों ने उन्हें न्याय से वंचित कर दिया है। भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है। इसलिए, इसे न्यायपालिका की इस मौजूदा प्रणाली को समृद्ध करने और इसकी प्रक्रिया को आसान बनाने की आवश्यकता है, ताकि लोग इसे आसानी से प्राप्त कर सकें और इस देश के सभी नागरिकों को न्याय मिल सके।

संदर्भ

  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973
  • आर.वी.  आपराधिक प्रक्रिया पेपरबैक पर केलकर के व्याख्यान – 2018, डॉ के.एन.  चंद्रशेखरन पिल्लै

 

 

कंपनी अधिनियम के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की शक्तियां और कार्य

यह लेख Chandana.L द्वारा लिखा गया है जो तमिलनाडु डॉ अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी (एसओईएल) से बी.कॉम.एलएलबी (ऑनर्स) कर रहे है। यह एक लेख है जो कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण- एनसीएलटी) की विभिन्न शक्तियों और कार्यों से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

परिचय

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल की स्थापना से पहले कंपनी लॉ बोर्ड और बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल कॉरपोरेशन द्वारा कंपनियों की शक्तियों और कार्यों का निर्वहन किया जाता था। केंद्र सरकार ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 408 के तहत एनसीएलटी का गठन किया था। यह 1 जून 2016 को शुरू हुआ, और इसे न्यायमूर्ति एराडी समिति की सिफारिशों के आधार पर स्थापित किया गया था।

एनसीएलटी क्या है?

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) एक अर्ध- न्यायिक निकाय (क्वासि जुडिशियल बॉडी) है, जिसे भारतीय कंपनियों में उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने के लिए स्थापित किया गया था। यह कंपनी लॉ बोर्ड का उत्तराधिकारी है। यह केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा शासित होता है। एनसीएलटी एक विशेष अदालत है जहां सिविल कोर्ट से संबंधित मामलों को अधिकार क्षेत्र से रोक दिया गया है।

एनसीएलटी की शक्तियां और कार्य

वर्ग कार्रवाई (क्लास एक्शन)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 245

  1. कंपनी के सदस्यों द्वारा या जमाकर्ताओं (डेपोसिटर्स) द्वारा या सदस्यों की ओर से ट्रिब्यूनल में एक आवेदन दायर किया जा सकता है, जिसमें कहा जा सकता है कि मामलों को कंपनी के हित के प्रतिकूल तरीके से संचालित किया गया है और सभी या किसी भी मांग का अनुरोध किया जा सकता है:

कंपनी पर रोक लगाई जा सकती (रीस्ट्रेनड) लग सकती है:

  • ऐसा कोई भी कार्य करने से जो एमओए और एओए के दायरे से बाहर हो,
  • एमओए और एओए के प्रावधान का कोई उल्लंघन करने से,
  • और उसके निदेशकों (डायरेक्टर्स) को ऐसे प्रस्तावों पर कार्य करने से,
  • ऐसा कोई कार्य करने से, जो या तो इस अधिनियम के विपरीत हो या कोई अन्य अधिनियम जो कुछ समय के लिए लागू हो,
  • किसी भी प्रस्ताव की घोषणा करने से, जो बदले में एमओए और एओए को बदल देता है और यदि ऐसा प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो यह शून्य हो जाता है।
  • हर्जाने या मुआवजे का दावा करना या किसी अन्य उपयुक्त कार्रवाई की मांग करना।
  • कंपनी या कंपनी के निदेशकों द्वारा उनके द्वारा किए गए किसी भी गैरकानूनी, धोखाधड़ी या गलत कार्य या चूक के लिए।
  • अनुचित या भ्रामक बयानों के लिए कंपनी का ऑडिटर या ऑडिट फर्म।
  • ट्रिब्यूनल से कोई अन्य उपाय मांग सकता है।
  1. जहां जमाकर्ताओं के सदस्य ऑडिट फर्म के खिलाफ नुकसान या मुआवजे या किसी अन्य कार्रवाई का दावा करते हैं, जिसका दायित्व फर्म और प्रत्येक भागीदार पर होगा, जो अनुचित या भ्रामक बयान देने में शामिल था।
  2. ट्रिब्यूनल में आवेदन दाखिल करने के लिए सदस्यों की संख्या:
  • कम से कम एक सौ सदस्य या सदस्य जिनके पास कंपनी में कुल वोटिंग पावर के दसवें हिस्से से कम शेयर नहीं हैं (यदि कंपनी के पास शेयर पूंजी है); या
  • कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में कम से कम एक-पांचवें लोग (यदि कंपनी के पास शेयर पूंजी नहीं है)।
  1. जमाकर्ता कम से कम सौ जमाकर्ता या कुल जमाकर्ताओं के ऐसे प्रतिशत से कम नहीं होंगे।
  2. ट्रिब्यूनल यह देखेगा कि सदस्यों और जमाकर्ताओं ने अच्छे विश्वास के साथ काम किया है जब आदेश की मांग के लिए एक आवेदन किया गया है।
  3. सदस्यों या जमाकर्ताओं द्वारा किए गए आवेदन पर ट्रिब्यूनल सभी सदस्यों और जमाकर्ताओं पर तामील करने के लिए एक सार्वजनिक नोटिस जारी करेगा, जहां अधिकार क्षेत्र से समान आवेदन किया जाता है, ट्रिब्यूनल समेकित करेगा और इसे एक आवेदन और वर्ग के सदस्यों के रूप में विचार करेगा। या जमाकर्ताओं को प्रमुख आवेदक चुनने की अनुमति दी जाएगी, और आवेदन के एक ही कारण के लिए दायर दो वर्ग कार्रवाई आवेदन की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  4. ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश सदस्यों, जमाकर्ताओं, लेखा परीक्षकों के लिए बाध्यकारी होंगे जिसमें ऑडिट फर्म, सलाहकार, विशेषज्ञ या सलाहकार और कंपनी से जुड़े कोई अन्य व्यक्ति शामिल हैं।
  5. यदि कंपनी ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश का पालन करने में विफल रहती है, तो कंपनी को 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा जो कि 25 लाख रुपये तक हो सकता है और डिफ़ॉल्ट के प्रत्येक अधिकारी को 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और जो 1 लाख रुपये तक हो सकता है और तीन साल की कैद के साथ हो सकता है।
  6. यदि ट्रिब्यूनल इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि दायर किया गया आवेदन तुच्छ या परेशान करने वाला पाया जाता है, तो ट्रिब्यूनल आवेदन को अस्वीकार कर देगा और कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा और दूसरे पक्ष को उस लागत का भुगतान करने का आदेश देगा जो 1 लाख रुपये से अधिक नहीं है।

विपंजीकरण ​​(डीरजिस्ट्रेशन)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 7 (7) में कहा गया है कि यदि ट्रिब्यूनल के संज्ञान में आता है कि कंपनी ने कंपनी के निगमन के समय गलत जानकारी प्रस्तुत की है या किसी महत्वपूर्ण तथ्य, सूचना या किसी भी घोषणा को कंपनी द्वारा दायर किया गया है, तो ट्रिब्यूनल नीचे उल्लिखित आदेशों में से कोई एक आदेश पारित कर सकता है:

  • ऐसे आदेश पारित कर सकता है जो वह ठीक समझे।
  • कंपनी के समापन के आदेश पारित कर सकता है।
  • सदस्यों को देयता असीमित करने का निर्देश दे सकता है।

दमन और कुप्रबंधन (ओप्प्रेशन एंड मिसमैनेजमेंट)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 में कहा गया है कि कंपनी का कोई भी सदस्य जिसे अधिनियम, 2013 की धारा 244 के अनुसार ट्रिब्यूनल में शिकायत करने का अधिकार है, वह ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज करेगा कि:

  • कंपनी के मामलों को इस तरह से संचालित किया जाता है जो सार्वजनिक हित के लिए प्रतिकूल (प्रीजुडिशियल) हो या उसके लिए या कंपनी के किसी भी सदस्य के लिए दमनकारी हो या जो कंपनी के लिए प्रतिकूल हो।
  • एक भौतिक परिवर्तन जो कंपनी द्वारा लाया गया है जो कंपनी के लेनदारों, डिबेंचर धारकों, कंपनी के शेयरधारकों के हितों के खिलाफ है और इसने कंपनी के प्रबंधन या नियंत्रण में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है:
  1. निदेशक मंडल में परिवर्तन,
  2. प्रबंधकों का परिवर्तन,
  3. सदस्य का परिवर्तन, या
  4. कोई अन्य कारण।

ऐसे कारणों से, कंपनी के सदस्यों को लगता है कि कंपनी के मामलों को इस तरह से संचालित किया गया है जो उसके हित के प्रतिकूल है।

  • जब केंद्र सरकार की यह राय हो कि कंपनी के मामलों को नीचे उल्लिखित किसी एक तरीके से संचालित किया गया है और उस ट्रिब्यूनल द्वारा यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यह सार्वजनिक हित के लिए या दमनकारी तरीके से प्रतिकूल है:
  1. कंपनी का कोई सदस्य या तो धोखाधड़ी, दुराचार, लगातार लापरवाही, विश्वास के उल्लंघन का दोषी है या कानून के अनुसार दायित्वों और कार्यों को पूरा करने में चूक जाता है; या
  2. कंपनी का प्रबंधन ध्वनि सिद्धांतों या विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रथाओं के अनुसार नहीं किया जाता है; या
  3. जब एक कंपनी का संचालन किया जा रहा है जो व्यापार, उद्योग को गंभीर चोट पहुंचाती है; या
  4. जब किसी कंपनी को लेनदारों, सदस्यों को धोखा देने के एकमात्र उद्देश्य से प्रबंधित किया जा रहा हो, या केवल धोखाधड़ी या गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए प्रबंधित किया जा रहा हो जो सार्वजनिक हित के विरुद्ध हो;

वह उपाय की मांग के लिए ट्रिब्यूनल में एक आवेदन दायर कर सकता है।

जांच शक्तियां

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 213 में कहा गया है:

  • जब ट्रिब्यूनल में आवेदन किया जाता है:
  1. शेयर पूंजी वाली कंपनी: कम से कम सौ सदस्य या सदस्य जिनके पास कंपनी में कुल वोटिंग पावर के दसवें हिस्से से कम शेयर नहीं हैं; या
  2. एक कंपनी जिसकी कोई शेयर पूंजी नहीं है: कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में कम से कम एक-पांचवें लोग।
  • जब कंपनी के सदस्य के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ट्रिब्यूनल में एक परिस्थिति बताते हुए आवेदन किया जाता है:
  1. कंपनी के मामलों का संचालन केवल लेनदारों या सदस्यों या किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने के इरादे से किया गया है।
  2. व्यापार या तो धोखाधड़ी या गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए संचालित किया जा रहा है।
  3. व्यापार इस तरह से संचालित किया जा रहा है कि यह अपने सदस्यों के लिए दमनकारी है।
  4. केवल गैरकानूनी या कपटपूर्ण उद्देश्यों के लिए व्यवसाय का गठन किया जा रहा है।
  5. कंपनी के गठन या कंपनी के मामलों के प्रबंधन में लगे व्यक्ति या तो कंपनी या उसके किसी सदस्य के प्रति धोखाधड़ी, दुर्व्यवहार या कदाचार के दोषी थे।
  6. जब कंपनी के सदस्य कंपनी के मामलों से संबंधित सभी जानकारी कंपनी को देने में विफल रहे हैं, जो उनसे कंपनी के प्रबंध निदेशक, निदेशक या किसी अन्य प्रबंधक को देय कमीशन की गणना से संबंधित जानकारी सहित देने की उम्मीद की जाती है। और पार्टियों को उचित अवसर देने के बाद, ट्रिब्यूनल को लगता है कि कंपनी के मामलों की जांच की जानी चाहिए और ऐसे उद्देश्य के लिए, केंद्र सरकार जांच के लिए एक निरीक्षक नियुक्त करेगी।

बशर्ते जांच के बाद यह साबित हो जाए कि:

  • कंपनी के मामलों का संचालन केवल लेनदारों या सदस्यों या किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने के इरादे से किया गया है, या
  • व्यवसाय या तो कपटपूर्ण या गैर-कानूनी उद्देश्यों के लिए संचालित किया जा रहा है, या
  • व्यवसाय इस तरह से संचालित किया जा रहा है कि यह अपने सदस्यों के लिए दमनकारी है, या
  • केवल गैरकानूनी या कपटपूर्ण उद्देश्यों के लिए व्यवसाय का गठन किया जा रहा है,
  • कंपनी के गठन या कंपनी के मामलों के प्रबंधन में लगे व्यक्ति या तो कंपनी या उसके किसी सदस्य के प्रति धोखाधड़ी, दुर्व्यवहार या कदाचार के दोषी थे।

फिर कंपनी का प्रत्येक अधिकारी जो चूक में है और एक व्यक्ति जो कंपनी के गठन या कंपनी के मामलों के प्रबंधन में लगा हुआ है, धोखाधड़ी के लिए दंडित किया जाएगा।

खातों को फिर से खोलना

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 130 में कहा गया है कि:

  • केंद्र सरकार, आयकर अधिकारियों, सेबी, वैधानिक निकाय के आदेश को छोड़कर, सक्षम अधिकार क्षेत्र या न्यायाधिकरण के न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को छोड़कर कंपनी अपने खाते नहीं खोलेगी या अपने वित्तीय विवरणों को फिर से तैयार नहीं करेगी और ऐसा करने की अनुमति दी जाएगी जब:
  1. पहले फर्जी तरीके से खाते तैयार किए गए थे।
  2. कंपनी के मामलों को गलत तरीके से प्रबंधित किया गया था और वित्तीय विवरणों की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न कर रहा था।
  • ऐसे आदेश पारित करने से पहले, ट्रिब्यूनल संबंधित अधिकारियों को नोटिस देगा।

शेयरों को हस्तांतरण (ट्रांसफर) करने से इनकार

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 58 में कहा गया है:

  • एक निजी कंपनी जो शेयरों द्वारा सीमित है या सार्वजनिक कंपनी जो ट्रांस्फरर के शेयरों के हस्तांतरण को पंजीकृत करने से इनकार करती है, कंपनी हस्तांतरण के तीस दिनों के भीतर इस तरह के इनकार के ट्रांस्फरर और अंतरिती को नोटिस भेजेगी।
  • बदले में ट्रांसफरी नोटिस प्राप्त होने की तारीख से तीस दिनों के भीतर ट्रिब्यूनल में अपील दायर करेगा और अगर कंपनी द्वारा ट्रांसफरी को कोई नोटिस नहीं भेजा जाता है, तो ट्रांसफरी ट्रिब्यूनल में हस्तांतरण होने के 60 दिन के अंदर अपील दायर करेगा।
  • ट्रिब्यूनल आदेशों को सुनेगा और इस तरह के आदेश को सुनने के बाद या तो अपील को खारिज कर देगा या कंपनी को निम्नलिखित आदेश देगा:
  1. एक आदेश के दस दिनों के भीतर शेयरों को हस्तांतरण करने के लिए निर्देश दे सकता है;
  2. रजिस्टर का सीधा सुधार और पीड़ित पार्टी द्वारा किसी भी नुकसान का भुगतान करने का निर्देश भी दे सकता है।
  • यदि कोई व्यक्ति आदेश का उल्लंघन करता है तो उसे कारावास से दंडित किया जा सकता है, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नहीं होगी, लेकिन तीन साल तक की हो सकती है और जुर्माना जो 1 लाख रुपये से कम नहीं होगा, लेकिन 5 लाख रुपये तक हो सकता है।

सार्वजनिक कंपनी का निजी कंपनी में रूपांतरण (कन्वर्जन)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 13 से 18 को कंपनी (निगमन) नियम 2014 के नियम 41 के साथ पढ़ा जाता है, जिसमें कहा गया है कि जब कोई कंपनी सार्वजनिक कंपनी से निजी कंपनी में परिवर्तित होती है तो ऐसे रूपांतरण के लिए एनसीएलटी ट्रिब्यूनल की मंजूरी आवश्यक होती है। ट्रिब्यूनल, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 459 के अनुसार ऐसे नियम और शर्तें लगा सकता है।

वार्षिक आम बैठक (एनुअल जनरल मीटिंग)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 97 और धारा 98 के तहत, यदि कंपनी के सदस्य किसी विशेष समय के भीतर बैठक आयोजित करने में विफल रहते हैं, तब कंपनी का सदस्य ट्रिब्यूनल को इस तरह की बैठक आयोजित करने के लिए एक आवेदन दे सकता है, और ट्रिब्यूनल ऐसी बैठकों को बुलाने की शक्ति रखता है।

कंपनी का समापन (वाइंडिंग अप)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 242 एक कंपनी को ट्रिब्यूनल द्वारा समाप्त किया जा सकता है जब कंपनी के मामलों को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 242 के तहत निर्धारित निम्न में से किसी एक तरीके से संचालित किया गया हो और ट्रिब्यूनल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कंपनी जनहित के प्रतिकूल है या दमनकारी तरीके से कार्य कर रही है।

अतिरिक्त शक्तियां

  1. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 221 कंपनी की संपत्ति को फ्रीज करने के लिए ट्रिब्यूनल की शक्ति।
  2. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(41) पंजीकृत कंपनी के वित्तीय वर्षों को बदलने की शक्ति।

निष्कर्ष

एनसीएलटी, कंपनी लॉ बोर्ड का उत्तराधिकारी (सक्सेसर) है। एनसीएलटी की स्थापना से कंपनी कानून के विवादों का त्वरित समाधान होगा और इसका शीघ्र निपटारा किया जाएगा। एनसीएलएटी को आदेश या निर्णय की प्राप्ति के 45 दिनों की अवधि के भीतर एनसीएलटी द्वारा पारित किसी भी निर्णय या आदेश से पीड़ित पक्ष द्वारा अपील की जा सकती है। इसके अलावा, एनसीएलएटी अपील की प्राप्ति की तारीख से छह महीने के भीतर अपना निर्णय देता है। जिन मामलों में एनसीएलटी और एनसीएलएटी को ऐसा करने का अधिकार है, उन मामलों को तय करने का अधिकार किसी भी सिविल कोर्ट के पास नहीं है।

विभिन्न प्रकार के संविदा

यह लेख नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ओडिशा की कानून की छात्रा Ansruta Debnath द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारत में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के संविदा के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

विभिन्न प्रकार के संविदा होते हैं और उन संविदाओं के विशिष्ट नियम और शर्तें अद्वितीय (यूनिक) होती हैं और उन्हें तैयार करने वाले पक्ष इसकी विशिष्ट आवश्यकताओ को पूरा करते हैं। फिर भी, विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए भी, इनमें कुछ समानताएं पाई जाती हैं। संविदा का वर्गीकरण इस आधार पर किया जा सकता है कि वे कैसे बनते हैं, क्या वे वैध हैं, उनकी प्रकृति के आधार पर और उनके निष्पादन (एग्जिक्यूशन) के आधार पर भी उन्हे वर्गीकृत किया जाता है। इस लेख में उल्लिखित संविदा की श्रेणियां इस अर्थ में एक दूसरे से समान हो सकती हैं क्योंकि ज्यादातर संविदा कई प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक संविदा मौखिक, वैध और एकतरफा हो सकता है। इस प्रकार उल्लिखित श्रेणियां अलग हैं और सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। 

संविदा के गठन के आधार पर संविदा के प्रकार

संविदा कई तरीकों से बनाए जा सकते हैं। निम्नलिखित प्रकार के संविदा हैं जिन्हें उनके गठन के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। 

मौखिक संविदा

मौखिक संविदा वे होते हैं जो मौखिक संचार (कम्युनिकेशन) द्वारा बनते हैं। बहुत समय से संविदा मौखिक रूप से ही किए जा रहे हैं। लेकिन, मौखिक संविदा को अदालतों में साबित करना मुश्किल होता है, इसलिए ये संविदा आमतौर पर अब नहीं बनाए जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि, मौखिक संविदा वैध संविदा होते हैं और कानून द्वारा लागू करने योग्य होते हैं, बशर्ते यह कि वे भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 10 के तहत वैध संविदा की शर्तों को पूरा करते हों । 

नानक बिल्डर्स एंड इन्वेस्टर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम विनोद कुमार अलग (1991) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने देखा कि एक मौखिक समझौता एक वैध और लागू करने योग्य संविदा हो सकता है। नतीजतन, यह जरूरी नहीं है कि एक संविदा को लिखित रूप में होना चाहिए, जब तक कि कानून द्वारा इसकी आवश्यकता न हो या पक्ष अपनी इच्छा से समझौते की शर्तों को लिखित रूप मे रखने का इरादा रखते हैं।

मौखिक प्रस्तावों और स्वीकृति की वैधता परोक्ष (इनडायरेक्ट) रूप से भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 से आती है। धारा 2 (a) के अनुसार, एक व्यक्ति के द्वारा, प्रस्ताव दिया हुआ तब माना जाता है जब वह दूसरे को कुछ करने या न करने की, अपनी इच्छा दर्शाता है। इसके अलावा, धारा 2 (b) में कहा गया है कि प्रस्तावकर्ता (ऑफ़रर) को सहमति देकर स्वीकृति दी जाती है। शब्द ‘दर्शाना’ यह दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि प्रस्ताव और स्वीकृति वास्तव में लिखे बिना दी जा सकती है।

लिखित संविदा

लिखित और वास्तविक रूप में बनने वाले संविदा लिखित संविदा होते हैं। ये वर्तमान में सबसे प्रचलित प्रकार का संविदा हैं। जब वे धारा 10 की शर्तों को पूरा करते हैं, तो वे वैध संविदा होते हैं। 

व्यक्त संविदा

संविदा प्रस्थापना (प्रोपोजल) या प्रस्तावों और ऐसे प्रस्तावों या प्रस्थापना की स्वीकृति से बनाए जाते हैं। प्रस्ताव और उस की स्वीकृति व्यक्त या निहित (इम्प्लाइड) हो सकती है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 9 के अनुसार, जब शब्दों में प्रस्थापना दी जाती है तो वह एक व्यक्त प्रस्थापना होती है। इस प्रकार, एक व्यक्त संविदा को शब्दों में या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप में किया जाता है। उदाहरण के लिए, A, B से पूछता है कि क्या वह अपना घर X राशि के लिए बेचना चाहता है। B हाँ कहकर सहमत हो जाता है। यह व्यक्त संविदा का एक उदाहरण है। इस प्रकार एक व्यक्त संविदा में, संविदा की शर्तें स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाती हैं।

निहित संविदा

धारा 9 भी निहित संविदा को मान्यता देती है। इसमें कहा गया है कि शब्दों के अलावा किसी अन्य चीज़ के माध्यम से किया गया प्रस्ताव (या स्वीकृति) एक निहित प्रस्ताव (या स्वीकृति) है। एक निहित संविदा शामिल पक्षों के कार्यों, इशारों आदि पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए, एक नीलामी में, ग्राहक द्वारा क्रमांकित (नंबर्ड) पैडल उठाना एक निहित प्रस्ताव है और जब कोई वस्तु बेची जाती है तो नीलामीकर्ता द्वारा गैवेल को अंतिम बार रखना यह दर्शाता है कि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार यह निहित संविदा का एक उदाहरण है। किसी वस्तु पर वारंटी निहित संविदा का एक और उदाहरण है। जब आप कोई वस्तु खरीदते हैं, तो आपको एक वारंटी मिलती है कि यह अपेक्षित और विज्ञापित (एडवर्टाइज्ड) के अनुसार काम करेगी। यह एक निहित संविदा है क्योंकि यह तब से लागू होगा जब कोई एक विशिष्ट कार्य करेगा (यानी एक वस्तु की खरीद), भले ही इसे कहीं और नहीं लिखा गया है।

व्यक्त संविदा की तरह, दोनों पक्षों को समान बातों पर समान अर्थों में सहमत होना चाहिए। जब संविदा के नियमों और शर्तों का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया जाता है तो संविदा में समान बातों पर समान अर्थों में सहमत होने का पता लगाना अधिक कठिन होता है। न्यायालयों ने अक्सर निहित संविदा को मान्यता देने से इनकार किया है, क्योंकि इसमें दोनों की इच्छा को स्पष्टता के साथ सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। 

हरिदास रणछोड़दास बनाम मर्केंटाइल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड (1919) के मामले में, जब किसी बैंक के ग्राहक ने व्यवसाय के सामान्य क्रम के अनुसार चक्रवृद्धि (कंपाउंड) ब्याज दर देने पर आपत्ति नहीं की, तो यह माना गया की उसने नए चक्रवृद्धि ब्याज का भुगतान करने के लिए निहित संविदा किया है।

अर्ध संविदा (क्वासी कॉन्ट्रेक्ट)

कभी-कभी, अधिकार और दायित्व उस संविदा से उत्पन्न नहीं हो सकते हैं जिसमें शामिल पक्षों ने सहमति दी है, बल्कि कानून द्वारा भी उत्पन्न हो सकते है। ये कानूनी संबंध बनाते हैं जो संविदा के समान होते हैं और अर्ध-संविदा कहलाते हैं, “अर्ध” शब्द का अर्थ “प्रतीत होता है”। भारतीय संविदा अधिनियम का अध्याय 5 ‘कुछ संबंध जो संविदा द्वारा बनाए गए संबंध के समान हैं’ के बारे में बात करता है। यह भाग अर्ध-संविदा पर है, भले ही अधिनियम में कहीं भी ‘अर्ध-संविदा’ शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।

अर्ध-संविदा के पीछे मूल तर्क अन्यायपूर्ण संवर्धन (एनरिचमेंट) का सिद्धांत है, हालांकि यह एक स्थापित सिद्धांत नहीं है। यह सिद्धांत एक पक्ष को दूसरे पक्ष की कीमत पर अन्यायपूर्ण रूप से समृद्ध होने से रोकता है। तो बिना संविदा के भी, न्याय और औचित्य (इक्विटी) के नाम पर, दायित्वों को उत्पन्न किया जा सकता है।   

अध्याय 5 धारा 68-72 तक है । धारा 68 में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम नहीं है (जैसे कि एक व्यक्ति A) और फिर उस व्यक्ति या उस व्यक्ति पर निर्भर किसी व्यक्ति को जीवन की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की जाती है, तो वह व्यक्ति (जैसे, एक व्यक्ति B) जो उसकी आपूर्ति कर रहा है, वह अक्षम व्यक्ति की संपत्ति से प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) का हकदार है। इसलिए, भले ही A और B के बीच कोई संविदा नहीं है, B मुआवजे या प्रतिपूर्ति की मांग कर सकता है, ताकि वे नकारात्मक रूप से प्रभावित न हों।

धारा 69, एक व्यक्ति की अनुपस्थिति में गारंटी का संविदा बनाता है। गारंटी का संविदा एक ऐसा संविदा है जिसमें एक व्यक्ति यानी की गारंटर दूसरे व्यक्ति यानी प्रमुख देनदार से वादा करता है कि यदि आवश्यकता हुई तो वह ऋण का भुगतान करेगा। लेकिन, यह धारा गारंटी के संविदा के अभाव में गारंटर के अधिकारों की रक्षा करती है। इसलिए यदि व्यक्ति A, B के ऋण में है और दूसरा व्यक्ति C, A की ओर से B का भुगतान करता है, तो C प्रतिपूर्ति का हकदार होगा, भले ही A और C पहले से सहमत न हों कि C, A के ऋण का भुगतान करेगा।

धारा 70 एक अननुग्रहिक (नॉन ग्रेट्युटियस) कार्य का फायदा उठाने वाले व्यक्ति के दायित्व प्रदान करती है, जबकि धारा 71 माल पाने वाले व्यक्ति के दायित्व के बारे में बात करती है, जिसे उस माल के मालिक को खोजने के लिए पर्याप्त कदम उठाने चाहिए। अंत में, धारा 72 कहती है कि जिस व्यक्ति को गलती या जबरदस्ती से पैसा या कुछ और दिया गया है, तो उसे उसको चुकाना होगा या वापस करना होगा।   

ई-संविदा

शब्द “इलेक्ट्रॉनिक संविदा” एक संविदा को संदर्भित करता है जो ई-कॉमर्स के माध्यम से किया जाता है, जिसमें दोनों पक्ष शायद ही कभी व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं। यह इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्यिक (कमर्शियल) लेनदेन को संदर्भित करता है जिन्हे लिया और पूरे किया जाता है। पैसे निकालने के लिए ए.टी.एम. का उपयोग करने वाला उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक संविदा का एक उदाहरण है। जब कोई व्यक्ति ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के माध्यम से सामान मंगवाता है, तो यह ई-संविदा का एक उदाहरण है। प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) के प्रसार (स्प्रेड) और वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) ने दुनिया भर में ई-कॉमर्स उद्यमों (एंटरप्राइसेज) की उपस्थिति को तेज कर दिया है। ऑनलाइन नीलामी भी आम होती जा रही है, जहां लोग इंटरनेट पर बोली लगाकर वस्तुओं को खरीद और बेच सकते हैं।

भारतीय संविदा अधिनियम स्पष्ट रूप से ई-संविदा को मान्यता नहीं देता है। साथ ही, यह उन्हें प्रतिबंधित भी नहीं करता है। भारतीय अदालतों ने ई-संविदा को मान्यता दी है, लेकिन उन्हें धारा 10 के तहत एक वैध संविदा की अनिवार्यता को पूरा करना होगा, विशेष रूप से स्वतंत्र सहमति की शर्त को, जो अक्सर ई-संविदा में पाई जाती है।  

ई-संविदा का कानूनी आधार कुछ हद तक सूचना प्रौद्योगिकी (इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) अधिनियम, 2000 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 से लिया जा सकता है । आई.टी. अधिनियम मानता है कि प्रस्थापनाओं, स्वीकृति, और प्रस्तावों और स्वीकृति के निरसन (रिवोकेशन), या जैसा भी मामला हो, को इलेक्ट्रॉनिक रूप में या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उपयोग करके व्यक्त किया जा सकता है और इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक रूप या साधनों को लागू करने योग्य केवल इसलिए ही नहीं माना जाएगा, कि इन सब उद्देश्यों के लिए, इलेक्ट्रॉनिक रूप या साधन का उपयोग किया गया था।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम कंप्यूटर आउटपुट को मान्यता प्रदान करता है, जिसे किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में निहित किसी भी जानकारी के रूप में परिभाषित किया गया है, जो कागज पर लिखी गई है, संग्रहीत (स्टोर्ड), रिकॉर्ड की गई है, या कंप्यूटर द्वारा उत्पादित ऑप्टिकल या मैग्नेटिक मीडिया पर पुन: प्रस्तुत की गई है (इसके बाद कंप्यूटर आउटपुट के रूप में संदर्भित है)। सबूत या मूल दस्तावेज को प्रस्तुत किए बिना, धारा 65b के अनुपालन (कंप्लायंस) में किसी भी जानकारी को स्वीकर किया जाएगा, जो किसी भी कार्यवाही में मूल दस्तावेज के किसी भी विषय या उसमें बताए गए किसी भी तथ्य के साक्ष्य, जिसका प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) साक्ष्य स्वीकार्य होगा, के रूप में शामिल होगी।

संविदा की वैधता के आधार पर संविदा के प्रकार

संविदा के साथ अक्सर समस्याएं उत्पन्न होती हैं और अदालतों को यह तय करना चाहिए कि वे वैध हैं या नहीं। विकसित न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) और कानूनों के आधार पर, संविदा वैध हो सकते हैं और कब अमान्य, शून्य (वॉयड), शून्यकरणीय (वॉयडेबल) या शुरुआत से ही शून्य (वॉयड एब इनिशियो) हो सकते हैं।

वैध संविदा

धारा 10 कुछ अनिवार्यताओं को निम्नानुसार प्रदान करती है, जिन्हें वैध माने जाने के लिए सभी संविदा को पूरा करना होता है: 

  1. इसमें शामिल पक्षों के बीच स्वतंत्र सहमति होनी चाहिए।
  2. पक्षों को संविदा करने के लिए सक्षम होना चाहिए।
  3. संविदा का प्रतिफल (कंसीडरेशन) और उद्देश्य वैध होना चाहिए।
  4. संविदा को कानून के तहत शून्य घोषित नहीं किया जाना चाहिए।

यह आवश्यकताएं जब एक संविदा में मौजूद होती हैं तो एक वैध संविदा बनता है। इन अनिवार्यताओं के अलावा, कुछ अन्य चीजों को भी अदालतों द्वारा मान्यता प्राप्त संविदा के लिए पूरा करने की आवश्यकता है। सबसे पहले, इसमें शामिल पक्षों को समान बातों पर समान अर्थों में सहमत होना चाहिए। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि व्यक्ति A, B की घड़ी देखता है और उसे खरीदना चाहता है। घड़ी असली में धातु (मेटल) की है लेकिन इसके डिजाइन के कारण यह लकड़ी की लगती है। A, यह मानते हुए कि यह एक लकड़ी की घड़ी है, इसे खरीदने का प्रस्ताव करता है और B सहमत हो जाता है। इस स्थिति में, B जानता है कि यह एक स्टील की घड़ी है और मानता है कि वह वही बेच रहा है जबकि A का मानना ​​​​है कि वह लकड़ी की घड़ी खरीद रहा है। इस संविदा के उद्देश्य में, दोनों के मन मे एक अलग विचार होता है और इस प्रकार यह एक वैध संविदा नहीं है।

एक और तरीका जहां संविदा में पक्ष, समान बातों पर समान अर्थों में सहमत नहीं होते है, वह यह है जब शर्तें स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं होती हैं और व्याख्या (इंटरप्रेटेशन) के लिए खुली होती हैं। यदि कोई “वांछनीय (डिजायरेबल) राशि” के लिए एक घर खरीदने का प्रस्ताव पेश करता है और मालिक सहमत है, तो कोई संविदा नहीं है क्योंकि “वांछनीय राशि” की अवधारणा बहुत ही व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) और व्याख्या के लिए खुली है। 

एक वैध संविदा तभी बनता है जब कानूनी संबंध बनाने का इरादा होता है। अन्यथा, यह केवल एक समझौता रह जाता है और इसे कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, एक वैध संविदा का प्रदर्शन संभव होना चाहिए। इसलिए मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करने का संविदा वैध संविदा नहीं है। 

शून्य संविदा

धारा 2 (j) कहती है कि एक संविदा जो कानून द्वारा लागू करने योग्य नहीं रहता है, उस क्षण से वह शून्य हो जाता है। कानून में “शून्य” शब्द का अर्थ “कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं” या “अमान्य” है। 

एक संविदा शून्य तब हो जाता है जब वह धारा 10 में उल्लिखित शर्तों को पूरा करने में असमर्थ होता है। इस प्रकार, जब पक्ष संविदा बनाने में अक्षम होते हैं, जैसे नाबालिग या विकृत (अनसाउंड) दिमाग के लोग, तो संविदा शून्य हो जाता है। इसके अलावा, प्रदर्शन की असंभवता भी संविदा को शून्य बना देती है।

उपरोक्त के अलावा, शून्य संविदा की कुछ अन्य शर्तें निम्नलिखित हैं:

  1. धारा 20 में कहा गया है कि समझौते के एक जरूरी पहलू से संबंधित किसी तथ्य की गलती होने पर एक समझौता शून्य हो जाता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कानून की गलती संविदा को शून्य नहीं बनाती है और न ही एकतरफा गलती इसे शून्य बनाती है।
  2. धारा 24 के अनुसार, एक अवैध उद्देश्य या प्रतिफल के साथ एक संविदा शून्य होता है।
  3. धारा 25 में कहा गया है कि बिना प्रतीफल के एक समझौता तब तक शून्य होता है जब तक कि यह लिखित और पंजीकृत (रजिस्टर्ड) न हो, या किसी किए गए कार्य के लिए क्षतिपूर्ति (कंपनसेट) करने का वादा हो या परिसीमा (लिमिटेशन) कानून द्वारा वर्जित ऋण के भुगतान का वादा हो।
  4. धारा 26 कहती है कि विवाह में बाधा डालने वाले समझौते शून्य है।
  5. धारा 27 कहती है कि व्यापार में बाधा डालने वाले समझौते शून्य है। 
  6. धारा 28, एक संविदा को शून्य कर देती है यदि यह कानूनी कार्यवाही के अवरोध (रिस्ट्रेंट) में है।
  7. यदि संविदा का अर्थ निश्चित नहीं किया जा सकता है तो धारा 29 एक संविदा को शून्य बना देती है।

शून्यकरणीय संविदा

शून्यकरणीय संविदा वे संविदा होते हैं जिन्हें किसी एक पक्ष की इच्छा पर शून्य बनाया जा सकता है। इन स्थिति में, आम तौर पर, सहमति स्वतंत्र नहीं होती है और इसे जबरदस्ती (धारा 15), अनुचित प्रभाव (अंड्यू इनफ्लुएंस) (धारा 16), धोखाधड़ी (धारा 17) और गलत बयानी (धारा 18) के तहत प्राप्त किया जाता है। यहां, धोखाधड़ी या अनुचित रूप से प्रभावित पक्ष के पास संविदा को शून्यकरणीय करने का विकल्प होता है। 

प्रारंभ से ही शून्य संविदा

ये एक विशेष प्रकार के शून्य संविदा हैं जिसका अर्थ “शुरुआत से ही शून्य” होता है। संक्षेप में, प्रारंभ से ही शून्य संविदा वे संविदा हैं जो अपने बनने के क्षण से कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। प्रारंभ से ही शून्य संविदा का सबसे आम उदाहरण एक नाबालिग द्वारा किया गया संविदा है। मोहोरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903) में, यह निर्णायक रूप से घोषित किया गया था कि नाबालिग द्वारा संविदा प्रारंभ से ही शून्य होते हैं। 

लागू न करने योग्य संविदा

यदि कोई संविदा लागू न करने योग्य पाया जाता है, तो न्यायालय संविदा की आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहने के लिए एक पक्ष को कार्य करने या दूसरे पक्ष को क्षतिपूर्ति करने का आदेश नहीं देगा। एक लागू करने योग्य संविदा में (प्रस्ताव, स्वीकृति और प्रतिफल) के तत्व सीधे दिखाई देते हैं, यह इसको गंभीर रूप से लागू करने के मानक (स्टैंडर्ड) हैं। एक संविदा को कई कारणों से शून्य घोषित किया जा सकता है, जिसमें हस्ताक्षर से संबंधित परिस्थितियां, समझौते की सामग्री, या संविदा पर हस्ताक्षर करने के बाद होने वाली घटनाएं शामिल हैं।

क्षमता की कमी, दबाव, अनुचित प्रभाव, धोखे, गैर-प्रकटीकरण (नॉन डिस्क्लोजर), अचेतनता (अनकंशनेबिलिटी), सार्वजनिक नीति, गलती, और असंभवता संविदा को लागू करने के लिए सभी विशिष्ट बचाव हैं। यदि ये शर्तें मौजूद हैं, तो एक संविदा जो वैध है, उसे लागू न करने योग्य बनाया जा सकता है। संक्षेप में, इन संविदा को दोनों पक्षों की सहमति से लागू किया जा सकता है लेकिन कानूनी रूप से अदालतों में लागू नहीं किया जा सकता है।

अवैध संविदा

पूरे देश भर में लागू किसी भी कानून का उल्लंघन करने वाले संविदा अवैध संविदा होते हैं। धारा 10 में कहा गया है कि किसी संविदा का उद्देश्य या प्रतिफल अवैध नहीं होना चाहिए। इस प्रकार, धारा 10 अवैध संविदा को प्रतिबंधित करती है। उदाहरण के लिए, हत्या के लिए संविदा द्वारा की गई संविदा हत्याएं (कॉन्ट्रेक्ट किलिंग) अवैध हैं क्योंकि हत्या भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत एक अपराध है।

संविदा की प्रकृति के आधार पर संविदा के प्रकार

संविदा की प्रकृति विविध (डाइवर्स) है और इसमें शामिल पक्षों के लिए विशिष्ट है। व्यापक स्तर पर, उन्हें एकतरफा, द्विपक्षीय, अचेतन, आसंजन (अधेशन), संयोगाधीन (एलिएटरी) और विकल्प प्रकारों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। सभी संविदा इनमें से कम से कम एक व्यापक श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 

एकतरफा संविदा

जैसा कि नाम से पता चलता है, एकतरफा संविदा वे संविदा होते हैं जहां केवल एक पक्ष वादा करता है। दूसरा पक्ष निर्दिष्ट नहीं है और संविदा प्रदर्शन द्वारा पूरा हो जाता है। प्रस्तावकर्ता को तब तक प्रस्ताव को पूरा करने के लिए नहीं कहा जा सकता जब तक कि कोई व्यक्ति प्रदर्शन नहीं करता। किया गया प्रस्ताव एक सामान्य प्रस्ताव होता है। सामान्य प्रस्ताव ऐसे प्रकार के प्रस्ताव होते हैं जो बड़े पैमाने पर दुनिया को दिए जाते हैं और कानून के तहत इसे वैध स्वीकृति के रूप में गठित करने के लिए उनकी स्वीकृति का संचार करने की आवश्यकता नहीं होती है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 8 सामान्य प्रस्तावों को मान्य करती है और इसलिए एकतरफा संविदा के तहत, प्रस्थापना में शर्तों को पूरा करके या प्रतिफल प्राप्त करके स्वीकृति को वैध स्वीकृति माना जाता है। मद्रास उच्च न्यायालय ने ए.टी. राघव चरियार बनाम ओए श्रीनिवास राघव चरियार (1916) में कहा था कि जब शुरू में एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव दिया जाता है, तो संविदा को पूरा करने के लिए दो पक्ष होने चाहिए और दोनों पक्षों को एक ही बात पर एक ही अर्थ में सहमत होना चाहिए।

द्विपक्षीय संविदा

ये ऐसे संविदा हैं जिनमें शामिल पक्षों द्वारा पारस्परिक (रिसिप्रोकल) वादे किए जाते हैं। इस प्रकार, इसमें शामिल होने वाले पक्ष पहले से ही तय होते हैं और संविदा, प्रस्ताव और स्वीकृति के संचार के माध्यम से बनता है। इन्हें दो तरफा संविदा भी कहा जाता है और यह उपयोग में आने वाले सबसे सामान्य प्रकार के संविदा हैं।

अचेतन संविदा

एक अचेतन संविदा वह होता है जो स्पष्ट रूप से एकतरफा होता है और इसमें शामिल पक्षों में से एक, दूसरे के लिए अनुचित होता है और इसलिए इसे कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। यदि एक अनुचित संविदा के खिलाफ मुकदमा लाया जाता है, तो अदालत निश्चित रूप से इसे शून्य घोषित कर देती है। कोई मौद्रिक (मॉनेटरी) हर्जाना नहीं दिया जाता है, लेकिन पक्षों को उनके संविदात्मक कर्तव्यों से मुक्त कर दिया जाता है। यह तय करना अदालतों पर निर्भर होता है कि संविदा अचेतन है या नहीं। वे अक्सर एक संविदा को अचेतन मानते हैं, यदि यह ऐसा संविदा प्रतीत होता है जिस पर कोई मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति हस्ताक्षर नहीं करता, कोई भी ईमानदार व्यक्ति प्रस्थापना नहीं देता, या जो उस क्षेत्राधिकार (ज्यूरिसडिकशन) में अदालत की विश्वसनीयता को खतरे में डाल देता है जहां इसे लागू किया गया था। 

आई.सी.ओ.एम.एम. टेली लिमिटेड बनाम पंजाब राज्य जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड (2019) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ संविदा, जब निजी खिलाड़ियों और राज्य के बीच होते हैं तो वह रद्द करने के लिए उत्तरदायी होते है क्योकि वह अचेतन होते है। हालांकि, इस सिद्धांत में कोई चूक नहीं होती, जहां खिलाड़ी निजी होते हैं और संविदा वाणिज्यिक प्रकृति का होता है, जैसा कि इस मामले में देखा गया था। संविदा को तब एक आसंजन संविदा के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। 

आसंजन संविदा

एक आसंजन संविदा, जिसे कभी-कभी “बॉयलरप्लेट” संविदा या संविदा के “मानक रूप” के नाम से जाना जाता है, ये दो पक्षों के बीच एक संविदा है जिसमें एक पक्ष (अधिक सौदेबाजी की ताकत वाला) संविदा के सभी या ज्यादातर प्रावधानों को स्थापित करता है। विरोधी पक्ष (जिसकी सौदेबाजी की ताकत कम है) के पास स्वीकार्य समझौते तक पहुंचने के लिए बहुत कम या कोई लाभ नहीं है। आसंजन संविदा प्रत्येक ग्राहक के लिए व्यक्तिगत रूप से अनुरूपित (टेलर्ड) संविदा की आवश्यकता को समाप्त करते हैं। हालांकि आसंजन संविदा में दक्षता (एफिशिएंसी) बढ़ाने और खरीद प्रक्रिया को तेज करने की क्षमता है, लेकिन कुछ संभावित लाभों और कमियों के कारण उनका उपयोग विवादास्पद है। गैर-परक्राम्य खंड (नॉन नेगोशिएबल क्लॉज) आसंजन संविदा में शामिल हैं, जो प्रभावी रूप से “इसे लें या छोड़ दें” संविदा हैं। अधिकांश देशों में, आसंजन संविदा वैध हैं, लेकिन लागू होने से पहले अदालतों द्वारा उनकी अक्सर समीक्षा (रिव्यू) की जाती है। संविदा का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करने वाले पक्ष अक्सर इस तरह से ऐसा करते हैं कि जो वस्तुएं खरीदी जा रहीं हैं, तो उनके नुकसान या क्षति से जुड़ी कोई भी लागत खरीदार द्वारा वहन की जाएगी। अदालतों का लक्ष्य सौदेबाजी करने वाले पक्ष को अनुचित या अन्यायपूर्ण परिस्थितियों से बचाना है।

सेंट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम ब्रोजो नाथ गांगुली, (1986) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आसंजन संविदा अचेतन संविदा बन सकते हैं।

संयोगाधीन संविदा

यह एक प्रकार का संविदा है जिसमें शामिल पक्षों को एक विशिष्ट घटना होने तक संविदा करने की आवश्यकता नहीं होती है। ये घटनाएं आम तौर पर वे होती हैं जिन्हें शामिल पक्षों द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। संयोगाधीन संविदा का सबसे आम प्रकार एक बीमा संविदा है। यहां, बीमा प्रीमियम का भुगतान बीमा कंपनी के किसी भी प्रकार के प्रदर्शन के बिना किया जाता है। केवल जब कोई विशिष्ट घटना होती है, जैसे, कार बीमा के संबंध में कार को क्षति होना, तो तभी कंपनी भुगतान करने के लिए बाध्य होगी  कभी-कभी ही ऐसा होता है कि कुल भुगतान किए गए बीमा की प्रीमियम की राशि कंपनी द्वारा भुगतान किए जा रहे बीमा के बराबर नहीं होती है। कभी-कभी बीमा प्रीमियम की राशि उस बीमा की तुलना में बहुत अधिक होती है जो कंपनी भुगतान करती है जबकि अन्य समय में, कंपनी द्वारा भुगतान की जाने वाली बीमा की राशि की तुलना में प्रीमियम बहुत कम होता है।

विकल्प संविदा

विकल्प संविदा एक पक्ष को बाद की तारीख में एक अलग पक्ष के साथ एक नया संविदा करने में सक्षम बनाता है। विकल्प का प्रयोग करने का अर्थ है एक दूसरे संविदा में प्रवेश करना है, और इसका एक सामान्य उदाहरण अचल संपत्ति से है, जहां एक संभावित खरीदार एक विक्रेता को बाजार से एक संपत्ति को हटाने के लिए भुगतान करता है, फिर बाद की तारीख पर अगर वे चाहते हैं तो संपत्ति को सीधा खरीदने के लिए एक नया संविदा बनाया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने वी. पेचिमुथु बनाम गौरम्मल (2001) में कहा कि विकल्प स्पष्ट रूप से संविदा की शर्तों द्वारा दिया जा सकता है या निहित हो सकता है। इसके अलावा, इस मामले में यह भी कहा गया था कि एक विकल्प के आधार पर अधिकार का प्रयोग एकतरफा है और जिस व्यक्ति को अधिकार दिया जा रहा है उसे पक्ष द्वारा उक्त अधिकार का प्रयोग करने का विकल्प देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

संविदा के निष्पादन के आधार पर संविदा के प्रकार

संविदा को तुरंत या कुछ समय की अवधि में निष्पादित या पूरा किया जा सकता है। प्रतिफल के लिए महत्वपूर्ण बात वादे को पूरा करने के लिए समय सीमा है। इस समय सीमा के आधार पर, संविदा कार्यकारी (एग्जीक्यूटरी) या निष्पादित हो सकते हैं।

कार्यकारी संविदा

ये ऐसे संविदा हैं जो प्रकृति में निरंतर हैं। उदाहरण के लिए, एक पट्टा (लीज) समझौता। यहां, संविदा की अवधि के दौरान, मालिक किरायेदार को पूर्व की संपत्ति में रहने की अनुमति देता है और किरायेदार मासिक किराए का भुगतान करता है। 

निष्पादित संविदा

ये ऐसे संविदा हैं जिनका दायित्व पूरा हो गया है। तो किसी उत्पाद या सेवा की खरीद एक निष्पादित संविदा है।

संदर्भ

  • Dr Avtar Singh, Contract and Specific Relief