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मो.अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985)

यह लेख Shifa Qureshi द्वारा लिखा गया,और आगे Debapriya Biswas द्वारा अद्यतन किया गया है। यह लेख मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) के ऐतिहासिक मामले के विश्लेषण से संबंधित है। इस मामले में उठाए गए मुद्दों और उन्हें संबोधित करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों पर चर्चा की गई है। अंत में, लेख फैसले के महत्व के साथ-साथ वर्तमान समय में भी इसके निहितार्थों का पता लगाता है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा  किया गया है। 

परिचय

विवाह और तलाक समाज के अभिन्न अंग हैं जो इसमें शामिल दोनों पक्षों के लिए कानूनी रूप से कई अधिकारों और दायित्वों से बंधे हैं। ऐसा ही एक अधिकार है भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार, जिसका दावा एक पति-पत्नी जो दूसरे पर निर्भर है, अपने अलगाव के दौरान या तलाक के बाद भी कर सकते हैं। यह अधिकार शुरू में तलाक के दौरान पति-पत्नी के बीच सामाजिक न्याय बनाए रखने के लिए पेश किया गया था, खासकर यदि एक पति-पत्नी आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर है या उसके पास बच्चों की कस्टडी है और वह अकेले उनका भरण-पोषण करने में असमर्थ है। इस प्रकार, वित्तीय दुरुपयोग या अलगाव की संभावना को कम किया जा सकता है।

हालांकि, मुस्लिम कानून के तहत, तलाक के बाद भरण-पोषण की कोई अवधारणा नहीं है, जिसके कारण मुस्लिम महिलाओं और अन्य तलाकशुदा महिलाओं के बीच अधिकारों में असमानता पैदा हुई। मो. अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) के वर्तमान मामले में, भरण-पोषण के अधिकार की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, खासकर इसलिए क्योंकि मुस्लिम कानून तलाक के तीन महीने बाद पूर्व पत्नी को भरण-पोषण का प्रावधान नहीं करता है।

मामले का विवरण

मामले का नाम: मो. अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य

फैसले की तारीख: 23 अप्रैल 1985

याचिकाकर्ता:  मो. अहमद खान

प्रतिवादी: शाहबानो बेगम और अन्य

उद्धरण: 1985 एआईआर 945, 1985 एससीआर (3) 844, एआईआर 1985 एससी 945, 1985 (2) एससीसी 556, 1985 स्केल (1) 767, (1985) एससी सीआरआर 294, 1985 (87) बीओएम एलआर 435

अदालत: भारत का सर्वोच्च न्यायालय

न्यायाधीश: माननीय मुख्य न्यायाधीश वाई.वी चंद्रचूड़, माननीय न्यायाधीश मिश्र रंगनाथ, माननीय न्यायाधीश डी.ए देसाई, माननीय न्यायाधीश ओ चिन्नापा रेड्डी, माननीय न्यायाधीश ई.एस वेंकटरामैयाह

मामले की पृष्ठभूमि

जबकि भारतीय संविधान का प्रस्तावना देश के धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करता है, लेकिन जब देश के नागरिक कानूनों की बात आती है तो ऐसा नहीं होता है। इसमें विवाह, तलाक, गोद लेने या यहां तक ​​कि संपत्ति के कानून भी शामिल हैं। प्रत्येक धर्म के अपने रीति-रिवाज और सिद्धांत होते हैं और प्रत्येक नागरिक के अपने धर्म का पालन करने के अधिकार को बनाए रखने के लिए, प्रत्येक धर्म के अपने व्यक्तिगत कानून होते हैं जो सरकार द्वारा संहिताबद्ध (कोडिफाइड) या असंहिताबद्ध होते हैं। 

मुस्लिम कानून के तहत, इसके अधिकांश सिद्धांत असंहिताबद्ध हैं क्योंकि कुरान के सिद्धांतों का या तो सीधे पालन किया जाता है या विद्वानों और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या के आधार पर किया जाता है। हालांकि, उनके स्रोत स्वयं कुरान की पुस्तक होने के बावजूद, मुस्लिम कानून के तहत अभी भी विभिन्न संप्रदाय और विचारधाराएं हैं। 

मुस्लिम कानून के दो प्रमुख संप्रदाय शिया और सुन्नी हैं, जिन्हें आगे चार स्कूलों में विभाजित किया गया है: शफ़ी, हनफ़ी, मलिकी और हमाबिल विचारधारा। इन सभी अलग-अलग स्कूलों और संप्रदायों के परिणामस्वरूप मुस्लिम कानून के तहत विवाह और तलाक के संबंध में अलग-अलग रीति-रिवाज और कानून बनते हैं। हालांकि,हनफ़ी स्कूल भारत में सबसे आम है, इसलिए देश में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (व्यक्तिगत  कानून ) ज्यादातर उसी पर आधारित है। 

मुस्लिम कानून के तहत विवाह की प्रकृति अधिकतर संविदात्मक होती है और इसके उल्लंघन में शामिल दोनों पक्षों की सहमति की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, मुस्लिम कानून के तहत तलाक के लिए केवल पति की सहमति और अनुमति की आवश्यकता होती है, जिसके बिना पत्नी शादी नहीं तोड़ सकती। यह पति के पक्ष में है, ठीक उसी तरह जैसे संपत्ति के बंटवारे से संबंधित कानूनों सहित बाकी मुस्लिम कानून भी हैं।

हालांकि यह सच है कि पति से पत्नी के लिए स्त्रीधन या ‘मेहर’ की अवधारणा विवाह में पत्नी को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के लिए बनाई गई है, मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  के तहत तलाक की बाकी प्रक्रिया अपेक्षाकृत पति के अधीन है। ज्यादातर मामलों में, पत्नी के पास पति को तलाक देने की शक्ति नहीं होती है जब तक कि वह उसे ऐसा करने की शक्ति पहले ही नहीं सौंप देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पत्नी अपने पति से अलग नहीं हो सकती और अपने वैवाहिक घर से दूर नहीं रह सकती। 

मेहर, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, विवाह के दौरान पति द्वारा पत्नी को उसके और उनके बीच विवाह अनुबंध के सम्मान के संकेत के रूप में भुगतान की जाने वाली एक प्रथागत राशि है। यह मुस्लिम विवाह की अनिवार्यताओं में से एक है, जिसके बिना मुस्लिम कानून के तहत विवाह वैध नहीं माना जाएगा।

एक और अवधारणा जो पत्नी के पक्ष में है वह मुस्लिम कानून के तहत इद्दत अवधि है। इद्दत अवधि आमतौर पर तलाक या पति की मृत्यु के बाद तीन महीने की अवधि होती है। यह विवाह से किसी भी संभावित गर्भावस्था के पितृत्व के लिए एक अवलोकन अवधि के रूप में कार्य करता है। हालांकि, इस अवधि की अवधि इस बात पर भिन्न हो सकती है कि कोई मुस्लिम कानून के शिया संप्रदाय या सुन्नी संप्रदाय का पालन करता है। 

सुन्नी क़ानून

सुन्नी कानून के तहत, इद्दत अवधि महिलाओं के लिए तीन मासिक धर्म चक्र या तीन चंद्र महीने तक चलती है, जिन्हें अब मासिक धर्म नहीं होता है। यदि पत्नी गर्भवती है, तो इद्दत की अवधि बच्चे के जन्म तक बढ़ जाएगी, भले ही बच्चा पति का न हो और व्यभिचार के कारण पैदा हुआ हो। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, पति व्यभिचार की परवाह किए बिना इस अवधि के दौरान अपने जीवनसाथी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है। 

इसके अलावा, यदि पति की मृत्यु हो जाती है, तो इद्दत की एक नई अवधि शुरू हो जाएगी, भले ही पति-पत्नी तलाक-ए-मुगल्लाज़ा या अपरिवर्तनीय (इरेवोकेबल) तलाक के कारण दोनों के बीच किसी भी पुनर्विवाह को रोकते हो।

अन्य प्रकार के भरण-पोषण के मामले में, सुन्नी कानून निर्दिष्ट करता है कि बच्चों का नैतिक दायित्व है कि वे अपने माता-पिता की कमाई करने की क्षमता की परवाह किए बिना उन्हें आर्थिक रूप से समर्थन दें। सुन्नी कानून के तहत बच्चों को अपने माता-पिता की ऋण सुरक्षा या संपार्श्विक (कोलैटरल) भी बनाए रखना होता है। 

शिया कानून

सुन्नी कानून के विपरीत, शिया कानून में इद्दत अवधि उन महिलाओं के लिए तीन मासिक धर्म चक्र या 78 दिनों तक रहती है, जिन्हें मासिक धर्म नहीं होता है। यदि पत्नी गर्भवती है, तो इद्दत अवधि भी गर्भावस्था के अंत तक होगी। इस अवधि के दौरान कोई भी विवाह शिया कानून के तहत शून्य माना जाएगा और पति को इद्दत अवधि के अंत तक तलाकशुदा पत्नी को आर्थिक रूप से समर्थन देना होगा। हालांकि,यदि गर्भ धारण किया हुआ बच्चा व्यभिचार से हुआ है, तो इद्दत अवधि केवल तीन महीने तक ही रहेगी।

इसके अलावा, शिया कानून के तहत नई इद्दत की कोई अवधारणा नहीं है, खासकर यदि पति-पत्नी पहले ही तलाक ले चुके हो।

माता-पिता के भरण-पोषण के मामले में शिया कानून बच्चों पर ऐसा कोई नैतिक दायित्व नहीं डालता, खासकर यदि वे अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं। इसमें माता-पिता की प्रतिभूतियों (सिक्यूरिटीज) या संपार्श्विक का रखरखाव भी शामिल है।

वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता द्वारा मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 पर चर्चा और गौर किया गया है, जो मुस्लिम कानून के शिया संप्रदाय का पालन करता है। इस प्रकार, मुस्लिम कानून के तहत तलाक के बाद पत्नी के भरण-पोषण के दायरे के साथ-साथ शिया कानून के अनुसार इद्दत अवधि के साथ-साथ मेहर के दौरान भरण-पोषण की अवधारणा पर भी चर्चा की जाएगी, जिसका इद्दत अवधि को छोड़कर स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।

मामले के तथ्य

मोहम्मद अहमद खान (याचिकाकर्ता) जो पेशे से वकील थे, उन्होंने 1932 में शाह बानो बेगम (प्रतिवादी) से शादी की और उनकी शादी से उनके तीन बेटे और दो बेटियां थीं। प्रतिवादी अपनी शादी के पूरे 43 वर्षों तक एक गृहिणी थी। 1975 में, जब शाहबानो की उम्र 62 वर्ष थी, तब उनके पति ने उन्हें बेदखल कर दिया और बच्चों सहित उनके वैवाहिक घर से बाहर निकाल दिया गया। बेदखली बिना किसी पूर्व सूचना या चेतावनी के की गई थी और याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी और उनके बच्चों की वित्तीय सहायता के लिए कोई और मुआवजा नहीं दिया।

अप्रैल 1978 में, प्रतिवादी ने अपने पति के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी), इंदौर की अदालत के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (इसके बाद सीआरपीसी के रूप में संदर्भित) की धारा 125 के तहत एक याचिका दायर किया। याचिका में प्रतिवादी ने तर्क दिया कि वह 200 प्रति माह जो उसे डिफ़ॉल्ट रूप से भरण-पोषण के लिए उसे मिलना था, उससे वंचित है। उसने मजिस्ट्रेट से प्रार्थना की कि अपीलकर्ता उसे धारा 125 के तहत वह भरण-पोषण दे जिसकी वह हकदार है। उसने यह भी मांग की कि प्रति माह 200 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये प्रतिमाह कर दिया जाए क्योंकि याचिकाकर्ता की आय लगभग 60,000 रुपये प्रति वर्ष थी। यह भी विचार किया जाना था कि उस समय सभी पांच बच्चे उसके साथ रह रहे थे और याचिकाकर्ता की हिरासत में नहीं थे।

इस याचिका के बाद, याचिकाकर्ता ने 6 नवंबर, 1978 को अपरिवर्तनीय तीन तलाक द्वारा प्रतिवादी को तलाक दे दिया और इसे उसे गुजारा भत्ता न देने के बचाव के रूप में इस्तेमाल किया क्योंकि तलाक के बाद पति पर गुजारा भत्ता देने की कोई बाध्यता नहीं है। अपीलकर्ता ने यह भी तर्क दिया था कि उसने पहले ही प्रतिवादी को दो साल का भरण-पोषण भुगतान कर दिया था और इद्दत की अवधि के दौरान अदालत को मेहर के रूप में 3,000 रुपये जमा कर दिए थे।

मजिस्ट्रेट ने अगस्त 1979 में पति को भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 25 रु.रुपये की राशि प्रतिवादी को भुगतान करने का निर्देश दिया। 1980 में, प्रतिवादी ने प्रतिमाह भुगतान किए जाने वाले भरण पोषण की राशि को और बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में एक पुनरीक्षणीय आवेदन दायर किया। उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले के प्रतिवादी के पक्ष में आदेश पारित किया और भरण पोषण की राशि बढ़ाकर लगभग 179 रुपये प्रतिमाह कर दी।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर, याचिकाकर्ता द्वारा एक विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान अपील दायर की गई थी।

उठाए गए मुद्दे

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाए गए मुद्दे इस प्रकार थे:

  1. क्या ‘पत्नी’ शब्द की परिभाषा सीआरपीसी के धारा 125(1) के अंतर्गत एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी शामिल है?
  2. क्या सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  को खत्म कर सकती है?
  3. क्या तलाक के बाद भी पति द्वारा गुजारा भत्ता देने की बाध्यता को लेकर मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  और सीआरपीसी की धारा 125 के बीच कोई विरोधाभास है?
  4. क्या तलाक पर मेहर का भुगतान पति को सीआरपीसी के धारा 127(3)(b) भरण-पोषण का भुगतान करने के दायित्व से मुक्त कर सकता है ?

कानूनों पर चर्चा हुई 

वर्तमान मामले के विश्लेषण में चर्चा किए गए कानूनी प्रावधानों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125(1) उन लोगों को संबोधित करती है जो भरण-पोषण का दावा करने के पात्र हैं, जिनमें शामिल हैं:

  1. पत्नी अपने पति से, 
  2. अपने पिता से वैध या नाजायज नाबालिग बच्चा, 
  3. अपने पिता से विकलांग बच्चा,
  4. पिता और/या माता अपने बच्चे से।

इस धारा के तहत भरण-पोषण देने की आवश्यक शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  1. भरण-पोषण के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं: जिस व्यक्ति को भरण-पोषण देना है उसके पास देने के साधन होने चाहिए।
  2. भरण-पोषण की मांग के बाद भरण-पोषण की उपेक्षा करना या इंकार करना: यदि व्यक्ति भरण-पोषण प्रदान करने में चूक करता है यदि वह भरण-पोषण के अपने दायित्व से इनकार करता है तो यह क्रमशः उपेक्षा या इंकार के समान होगा। 
  3. भरण-पोषण का दावा करने वाला व्यक्ति अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ होना चाहिए: केवल तभी जब व्यक्ति अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।
  4. रखरखाव की मात्रा: जीवन स्तर के आधार पर।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता का प्राथमिक तर्क यह था कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून  के तहत, इद्दत अवधि के बाद पूर्व पत्नी को भरण-पोषण की कोई अवधारणा नहीं है, जो तलाक के केवल तीन महीने बाद तक चलती है। इस प्रकार, याचिकाकर्ता को प्रतिवादी को किसी भी रखरखाव का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, खासकर जब से वह पहले ही अलगाव के पिछले दो वर्षों में हर महीने 200 रु.रुपये का भुगतान कर चुका है।

याचिकाकर्ता ने आगे तर्क दिया कि उसने मेहर को इद्दत अवधि के दौरान ही अदालत में जमा कर दिया था, जिसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून  के तहत रखरखाव के प्रतिस्थापन के रूप में गिना जाना चाहिए। 

यह तर्क दिया गया कि सिविल अदालतों के पास मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के तहत मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण देने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कुरान की किताब इद्दत अवधि के बाद मेहर को छोड़कर किसी भी तरह के भरण-पोषण का आदेश नहीं देती है। जिसे उन्होंने पहले ही अदालत में जमा कर दिया था। 

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सीआरपीसी की धारा 125 प्रकृति में विरोधाभासी है क्योंकि इसमें तलाक के बाद भी माता-पिता, बच्चों और पत्नियों के लिए भरण-पोषण की बात की गई है, जो मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के विपरीत है। 

प्रतिवादी

प्रतिवादी की दलीलें मुख्य रूप से इस तर्क के इर्द-गिर्द घूमती रहीं कि सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों का खंडन नहीं करती है। चूंकि मुस्लिम कानून इद्दत की अवधि के बाद भी तलाकशुदा पत्नियों को भरण-पोषण देने पर रोक नहीं लगाता है, इसलिए दोनों कानूनों की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या के साथ समझौता किया जा सकता है। 

प्रतिवादी ने तर्क दिया कि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के बीच सामंजस्य पूर्ण व्याख्या तलाक से गुजर रही मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित कर सकती है, जबकि वे पूरी तरह से आर्थिक रूप से अपने पतियों पर निर्भर हैं। 

इसके अलावा, प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि मेहर भरण-पोषण से पूरी तरह से अलग है। इस प्रकार, भरण-पोषण के भुगतान के लिए याचिकाकर्ता के दायित्व को बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह तथ्य जो भरण-पोषण की आवश्यकता को उजागर करता है, कि प्रतिवादी की उम्र भी साठ के आसपास है और पांच बच्चों की देखरेख भी करने की जिम्मेदारी है ।

मामले का फैसला

फैसले के पीछे अनुपात निर्णय

सीआरपीसी की धारा 125 पारिवारिक कानून में महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों में से एक है, क्योंकि यह किसी भी धर्म पर लागू होती है। वर्तमान मामले में,सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इसमें शामिल पक्षों या पति-पत्नी का धर्म अप्रासंगिक है क्योंकि धारा में  ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। यह एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है जिसकी व्याख्या किसी भी अन्य धर्म और उसके व्यक्तिगत कानून के साथ की जा सकती है।

अदालत के अनुसार, इसके लिए यह तर्क था कि धारा 125 सीआरपीसी का हिस्सा थी, न कि नागरिक कानूनों का। इस प्रकार, नागरिक कानून पति-पत्नी के धर्म से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के तहत अधिकारों और दायित्वों द्वारा शासित हो सकते हैं, सीआरपीसी के मामले में ऐसा नहीं है। इसके अलावा, यह भी देखा गया कि धारा 125 उन याचिकाकर्ताओं के लिए त्वरित और संक्षिप्त उपाय प्रदान करने के लिए बनाई गई थी जो आर्थिक रूप से खुद का समर्थन करने में सक्षम नहीं हैं और दूसरे पक्ष पर निर्भर हैं।

न्यायालय ने जागीर कौर और अन्य बनाम जसवन्त सिंह (1963) के मामले का हवाला देकर इस बात पर जोर दिया कि धारा 125 का उद्देश्य सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति करना है, जिसमें आर्थिक रूप से निर्भर पति या पत्नी और उनके बच्चों की सुरक्षा शामिल है, भले ही पति-पत्नी तलाकशुदा न हों। यह एक ऐसा प्रावधान है जो तलाकशुदा और अभी भी विवाहित दोनों पति-पत्नियों पर लागू होता है, जैसा कि उक्त मामले में परिस्थिति थी। 

धारा 125 के व्यापक प्रभाव के संदर्भ में, न्यायालय ने कहा कि कैसे मुस्लिम कानून चार पत्नियों से विवाह करके बहुविवाह की कुख्यात अनुमति देता है। हालांकि, वही इस्लामी सिद्धांत पत्नी को यह अधिकार भी देता है कि यदि वह अपने पति की अन्य शादियों से असंतुष्ट है, चाहे वह एक या चार हो, तो वह उसे मना कर सकती है। इस प्रकार, इससे पता चला कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में, धारा 125 व्यक्तिगत कानून को खत्म कर देती है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पति द्वारा अपनी तलाकशुदा पत्नी को केवल इद्दत अवधि तक भरण-पोषण देने की बाध्यता के संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया तर्क त्रुटिपूर्ण है। ऐसा तभी होना चाहिए जब पत्नी आर्थिक रूप से स्थिर हो या खुद का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त सक्षम हो, यदि ऐसा नहीं है, तो तलाकशुदा पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कानूनी सहायता की हकदार है। 

तलाक की अवधि के दौरान भरण-पोषण प्रदान करने के पति के दायित्व के संबंध में मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  और धारा 125 के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  पति को इद्दत अवधि के लिए भरण-पोषण प्रदान करने के लिए बाध्य करता है जबकि धारा 125 यह अनिवार्य करती है जब पत्नी अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो। मुस्लिम महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए दोनों को एक साथ लागू किया जा सकता है।

क्या मेहर का भुगतान या गवाही पत्नी को गुजारा भत्ता के रूप में गिना जाने के लिए पर्याप्त है, अदालत ने इस सवाल पर बाई ताहिरा ए बनाम अली हुसैन फिस्सली चोथिया (1979) मामले में दिए गए फैसले पर जोर दिया। इस मामले में,पक्षों ने एक सहमति डिक्री के माध्यम से तलाक ले लिया, जिसके अनुसार पति मेहर को भुगतान करने और उस फ्लैट को स्थानांतरित करने के लिए सहमत हुआ था जिसमें वे और उनका बेटा इस शर्त पर रह रहे थे कि पत्नी द्वारा कोई और दावा नहीं किया जा सकता है। जब पत्नी अपने और अपने बेटे के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए अदालत में गई, तो शुरू में उसे बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि मुस्लिम कानून में तलाक के बाद गुजारा भत्ता की अवधारणा नहीं थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय में आगे की अपील पर, उसकी याचिका मंजूर कर ली गई और यह माना गया कि प्रत्येक तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह न होने तक भरण-पोषण का अधिकार पाने की हकदार है। मेहर जैसी भ्रामक रकम के भुगतान को भरण पोषण के लिए राशि में कमी के लिए माना जा सकता है, लेकिन पूर्ण प्रतिस्थापन के लिए नहीं, जब तक कि राशि इस तरह विचार करने के लिए पर्याप्त उचित न हो। 

इसके अलावा,हमीरा बीबी, अमीना बीबी और अन्य बनाम जुबैदा बीबी और अन्य (1916) द्वारा स्थापित उदाहरण का विश्लेषण करते समय न्यायालय ने कहा कि पति की मृत्यु के बाद भी, पत्नी को अपने पति की संपत्ति से मेहर या ‘मेहर-ऋण’ का दावा करने का अधिकार है।

इस बात को सैयद साबिर हुसैन बनाम एस.फरजंद हसन (1937) मामले में दोहराया गया था। जहां बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि मेहर मुस्लिम कानून के तहत विवाह की स्थिति का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह शादी से पहले तय की गई राशि है और पत्नी की मृत्यु के बाद भी, उसके कानूनी उत्तराधिकारी उसके पति से इसका दावा कर सकते हैं। यह पति का दायित्व है कि वह पत्नी या उसकी अनुपस्थिति में उसके उत्तराधिकारियों को मेहर दे।

इन तर्कों के आधार पर, वर्तमान मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मेहर कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे तलाक के दौरान पत्नी को भुगतान किया जाना है, बल्कि शादी के दौरान दिया जाना है। इस प्रकार, यह उस भरण-पोषण का स्थान नहीं ले सकता जिसकी तलाकशुदा पत्नी धारा 125 के तहत हकदार है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियाँ

उपरोक्त तर्क के मद्देनजर, सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि धारा 125 प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है और इस प्रकार, सभी पति-पत्नी पर लागू होगी चाहे उनका धर्म कुछ भी हो और वे जिस व्यक्तिगत कानून का पालन करते हों। ऐसा विशेष रूप से इसलिए है क्योंकि उपरोक्त धारा में स्पष्ट रूप से किसी भी धर्म का उल्लेख नहीं है और यह जिस संहिता से संबंधित है वह नागरिक कानून के बजाय आपराधिक कानून के तहत है। इस प्रकार, यह भारत के क्षेत्र में रहने वाली सभी महिलाओं पर लागू होता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में धारा 125 की व्याख्या करते हुए बाई तिहारी मामले और  फ़ुज़लुनबी बनाम के.खादर वली और अन्य (1980) जैसे अन्य मामलों पर भी ध्यान दिया। फ़ुज़लुनबी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने पहले स्पष्ट किया था कि सीआरपीसी की धारा 127(3)(b) को सीआरपीसी के साथ-साथ व्यक्तिगत कानून के तहत रखरखाव के दोहरे भुगतान से बचने के लिए अधिनियमित किया गया था। यह तलाकशुदा महिला के लिए भरण-पोषण के अधिकार का दावा करते समय अवरोधक के रूप में कार्य नहीं करता है।

इस प्रकार, उपरोक्त दो मामलों में लिए गए दृष्टिकोण के अनुसार, यह सहमति हुई कि धारा 125 का प्रभाव मुसलमानों पर भी लागू होगा। अदालत ने यह भी नोट किया कि धारा 127(3)(b) मुस्लिम कानून को खत्म नहीं करती है, जैसा कि  मुस्लिम व्यक्तिगत  कानून  (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 के तहत देखा जा सकता है, जो कहता है कि मुस्लिम कानून के तहत तलाक से संबंधित सभी मामलों को उपरोक्त अधिनियम द्वारा शासित किया जाएगा। हालाँकि, अधिनियम केवल इद्दत अवधि तक भरण-पोषण का उल्लेख करता है लेकिन उस अवधि के बाद भरण-पोषण के भुगतान को प्रतिबंधित नहीं करता है।

इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी देखा कि सीआरपीसी की धारा 125(1)(b) के तहत, ‘पत्नी’ शब्द की परिभाषा सीमित नहीं है क्योंकि इसमें स्पष्ट रूप से केवल उस पत्नी का उल्लेख है जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है। इसलिए, इसकी व्याख्या तलाकशुदा पत्नी या पूर्व पत्नी के रूप में भी की जा सकती है। इसके अलावा, ‘पत्नी’ शब्द का इस्तेमाल धर्म की परवाह किए बिना किया जाता है। इस प्रकार, यह किसी भी धर्म की महिलाओं पर तब तक लागू रहेगा जब तक कि उनका पुनर्विवाह न हो जाए।

सर्वोच्च न्यायालय  का फैसला

  • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया और अपील खारिज कर दी। 
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 अपने धर्म से स्वतंत्र सभी नागरिकों पर लागू होती है और परिणामस्वरूप, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) बिना किसी भेदभाव के मुसलमानों के लिए भी प्रासंगिक है। अदालत ने आगे कहा कि अगर दोनों के बीच कोई टकराव है तो धारा 125 व्यक्तिगत  कानून को खत्म कर देती है। यह स्पष्ट करता है कि धारा 125 के प्रावधानों और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के उन प्रावधानों के बीच कोई विवाद नहीं है, जो मुस्लिम पति पर अपनी तलाकशुदा पत्नी, जो खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, उसके भरण-पोषण प्रदान करने के दायित्व से संबंधित है।
  • न्यायालय ने माना कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत स्थापित कानून के नियम के बावजूद, यह सच है कि मुस्लिम कानून में इद्दत अवधि के बाद तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण की किसी भी अवधारणा का उल्लेख नहीं है। हालांकि, यदि पत्नी आर्थिक रूप से अपना समर्थन करने में असमर्थ है, तो मुस्लिम पति का यह दायित्व है कि वह इद्दत अवधि के बाद भी अपनी तलाकशुदा पत्नी का भरण-पोषण करे। न्यायालय की ओर से आगे कहा गया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक यह नियम गलत और मानवता के खिलाफ है क्योंकि यहां एक तलाकशुदा पत्नी अपना भरण-पोषण करने की स्थिति में नहीं है। 
  • तलाक पर पति द्वारा मेहर का भुगतान उसे पत्नी को गुजारा भत्ता देने से छूट देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • एक लंबी अदालती प्रक्रिया के बाद, सर्वोच्च न्यायालय  ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि यदि तलाकशुदा पत्नी अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है तो पतियों की कानूनी देनदारी समाप्त हो जाएगी। हालांकि, ऐसे मामले में जब पत्नी इद्दत अवधि के बाद अपना भरण-पोषण करने की स्थिति में नहीं होगी, तो वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत रखरखाव या गुजारा भत्ता पाने की हकदार होगी।

फैसले का विश्लेषण

शाह बानो मामले को भारत में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के आधारशिला के रूप में देखा गया है, खासकर तलाक और भरण-पोषण कानूनों के संदर्भ में। जबकि यह मामला इद्दत अवधि के बाद भी मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार से संबंधित है, इसने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे तलाक-उल-बिद्दत या तीन तलाक (जिसे तलाक का अधिक अस्वीकृत या पाप पूर्ण रूप माना जाता है) मुस्लिम महिलाओं को उनके भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है।

यह मामला एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को भी दर्शाता है जो उन सभी नागरिक कानूनों में एकरूपता ला सकता है जो वर्तमान में धार्मिक रीति-रिवाजों और उन पर आधारित व्यक्तिगत कानूनों के कारण अलग-अलग हैं। इस अलगाव ने विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच असमानता पैदा कर दी है; विशेषकर महिलाओं के लिए, जिनके साथ अभी भी गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक मान्यताओं के कारण सबसे अधिक भेदभाव किया जाता है। समान नागरिक संहिता के सुझाव के साथ-साथ मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर दिया गया यह सुधारात्मक कदम जनता को अच्छा नहीं लगा। 

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय  के वर्तमान फैसले को मुस्लिम समुदाय और विद्वानों की कड़ी आलोचना के साथ-साथ बहुत सारे विरोध और सांप्रदायिक अशांति का सामना करना पड़ा। अधिकांश लोगों द्वारा उठाई गई मुख्य आलोचना यह थी कि यह फैसला मुस्लिम पुरुषों के साथ भेदभाव कर रहा था और उन्हें कुरान और उनके धर्म के सिद्धांतों का पालन करने की अनुमति नहीं दे रहा था। 

दूसरी ओर, यह तर्क दिया गया कि उच्चतम न्यायालय ने इसका इलाज किया, पति-पत्नी के धर्म की परवाह किए बिना भरण-पोषण के लिए किसी अन्य याचिका की तरह ही यह मामला भी लागू होगा। यह फैसला अपने आप में काफी धर्मनिरपेक्ष था, यह देखते हुए कि धारा 125 आपराधिक प्रक्रिया संहिता का एक हिस्सा है, न कि नागरिक या व्यक्तिगत कानूनों का। इससे भरण-पोषण कानूनों में एकरूपता लाने में मदद मिली, जो विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो शादी के बाद किसी पेशेवर करियर की कमी के कारण अक्सर अपने पतियों पर निर्भर हो जाती हैं। 

हाल ही में पेश की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बाद में बीएनएसएस के रूप में संदर्भित) ने 1973 के आपराधिक प्रक्रिया संहिता की जगह ले ली है, जिसमें रखरखाव के आदेशों और उनके प्रवर्तन के लिए एक पूरा अध्याय समर्पित किया गया है। बीएनएसएस के अध्याय X की धारा 144 पक्षों के धर्म की परवाह किए बिना किसी व्यक्ति की पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से संबंधित है।  यह सीआरपीसी की धारा 125 का प्रत्यक्ष प्रतिस्थापन है और साथ ही यह निर्दिष्ट करता है कि आश्रितों (पत्नियों, बच्चों या माता-पिता) का उपेक्षा या इनकार करने पर एक महीने के कारावास के साथ जुर्माना भी हो सकता है। इस खंड में ‘पत्नी’ शब्द का अर्थ भी स्पष्ट किया गया है, जिसमें तलाकशुदा महिलाएं भी शामिल हो सकती हैं जो अभी तक पुनर्विवाह नहीं की है।

अंत में, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि तलाकशुदा महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने के लिए पहले कदम के रूप में, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, इस फैसले ने न्यायिक इतिहास में एक मिसाल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

मामले का महत्व और परिणाम

शाह बानो मामला अभी भी एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में है जो भारत में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए एक आधारशिला के रूप में कार्य करता है क्योंकि इस मामले ने नागरिक कानून के संदर्भ में विभिन्न धर्मों की महिलाओं के अधिकारों में असमानता को उजागर किया। भारतीय संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में, राज्य को भारत के पूरे क्षेत्र में एक समान नागरिक संहिता प्रदान करने का निर्देश दिया गया है। वर्तमान निर्णय देते हुए मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने इसके कार्यान्वयन की आवश्यकता बताई।

उनके अनुसार, संविधान के पीछे की विचारधारा को बेहतर तरीके से लागू करने के साथ-साथ राष्ट्रों के कानूनों को एकीकृत करने के लिए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता थी। नागरिक कानूनों को धर्म के आधार पर अलग-अलग करने के कारण, लोगों के अधिकार उनके द्वारा पालन किए जाने वाले व्यक्तिगत कानून के अनुसार भिन्न होते हैं और इससे असमानता और परस्पर विरोधी विचार उत्पन्न हुए हैं। रखरखाव और तलाक से संबंधित कानून ऐसी असमानता के महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक हैं। इस फैसले में उनके विचार ने भारत में समान नागरिक संहिता पर बहस को प्रेरित किया।

बाद के घटनाक्रम

शाह बानो के मामले के फैसले की कई मुसलमानों, विशेषकर मुस्लिम विद्वानों ने आलोचना की। इससे मुस्लिम समुदाय में कई विरोध प्रदर्शन और संघर्ष हुए। उन्होंने इस फैसले को कुरान और इस्लामी कानूनों/इस्लाम के नियमों के विपरीत माना। इसके बाद, 1986 में भारत की संसद ने मुस्लिम भीड़ को खुश करने के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के प्रयास में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 को पारित करने का निर्णय लिया।

तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं या जिनका अपने पतियों से तलाक हो चुका है, उनके अधिकारों की रक्षा करना इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य था। इस अधिनियम के तहत:

  • मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं को इद्दत अवधि तक भरण-पोषण की पर्याप्त और उचित राशि की हकदार होनी चाहिए। 
  • जब एक तलाकशुदा महिला के पास तलाक से पहले या बाद में पैदा हुए अपने बच्चे की कस्टडी होती है, तो पूर्व पति पर 2 साल की अवधि के लिए बच्चे के लिए भरण-पोषण प्रदान करने का कानूनी दायित्व होता है।
  • महिलाओं को “मेहर” प्राप्त करने और उन सभी संपत्तियों को वापस पाने का भी अधिकार है जो उन्हें उनके अभिभावकों, साथियों, रिश्तेदारों, पतियों या पतियों के दोस्तों द्वारा दी गई है।

अधिनियम की वैधता को चुनौती

हालाँकि, इस अधिनियम की प्रमुख आलोचना यह थी कि इसने शाह बानो मामले को कमजोर कर दिया क्योंकि जनता द्वारा काफी हद तक माना जाता था कि यह अधिनियम सीआरपीसी की धारा 125 को खत्म कर देता है। हालांकि, भारतीय न्यायपालिका ने अपने कई फैसलों में स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है और दोनों कानून का सामंजस्यपूर्ण रूप से व्याख्या किया जा सकता है, जैसा कि डेनियल लतीफी और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2001 मामले में देखा जा सकता है। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे शाह बानो मामले का हवाला दिया और मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम,1986 की संवैधानिकता को बरकरार रखा। अदालत के अनुसार, तलाकशुदा पति इद्दत अवधि के लिए और इद्दत अवधि के भीतर ही पत्नी के शेष जीवन के लिए उचित और सही राशि प्रदान करने के लिए बाध्य था। हालांकि अदालत ने सीआरपीसी की धारा 125 की स्थिति को स्पष्ट नहीं किया, लेकिन यह कहा गया था कि अधिनियम ने उपरोक्त धारा के तहत प्रदत्त अधिकारों को समाप्त नहीं किया ।

मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य (2024) के हालिया फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामले को एक न्यायिक मिसाल के रूप में देखते हुए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को फिर से बरकरार रखा। इस मामले में, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986, सीआरपीसी की धारा 125 पर हावी है। हालांकि, न्यायालय ने यह कहते हुए असहमति जताई कि एक महिला संबंधित कानूनी प्रावधान द्वारा प्रदान किए गए उपायों के बीच चयन कर सकती है और दोनों में से कोई भी दूसरे पर हावी नहीं होता है।

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए पेश किया गया एक अन्य कानून मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 है, जिसने शायरा बानो बनाम भारत संघ और अन्य (2017) के बाद ट्रिपल तलाक या ‘तलाक-उल-बिद्दत’ को शून्य और असंवैधानिक घोषित किया। ट्रिपल तलाक के माध्यम से अपनी पत्नी को तलाक देने वाले किसी भी व्यक्ति को तीन साल तक की कैद हो सकती है या न्यायपालिका के अनुसार जुर्माना भरना पड़ सकता है।

अंत में, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 ने राज्य को नागरिकों के बीच बेहतर एकता को बढ़ावा देने के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि, शाह बानो मामले में भरण-पोषण में समान अधिकारों के सरल कार्यान्वयन से इस तरह के राजनीतिक और सामाजिक अशांति हुई कि इस तरह के समान कानून पेश करने का प्रयास बहुत बाद तक स्थगित कर दिया गया जब सांप्रदायिक तनाव कम हो गया। अब के लिए, बीएनएसएस की धारा 144 सीआरपीसी की धारा 125 की जगह लेने के बाद पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण के लिए एक धर्मनिरपेक्ष कानूनी प्रावधान के रूप में कार्य करती है।

निष्कर्ष 

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय को अपील खारिज करने के निर्णय पर पहुंचने में लंबा समय लगा, फिर भी फैसले को बहुत ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि यह न्यायपालिका में व्यक्तियों की सच्चाई और विश्वास को बनाए रखता है। इस फैसले ने भरण-पोषण के महत्व को चिह्नित किया है, जो तलाकशुदा महिलाओं को दिया जाना चाहिए, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, जो कमाने या खुद का भरण-पोषण करने की स्थिति में नहीं हैं।

शाह बानो मामले के फैसले ने मुस्लिम समुदाय और अधिकारियों से बहुत विरोध और अशांति खींची क्योंकि यह फैसला इस्लामी कानून के प्रावधानों के खिलाफ था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्पक्ष फैसला सुनाने में  संकोच नहीं किया और अंत में, इसने नागरिकों का न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखा। इसके कारण मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 का अधिनियमन हुआ, जिसने मुस्लिम महिलाओं को इद्दत की अवधि के दौरान अपने पति से एक बड़ा, एकमुश्त भुगतान दिया, अधिकतम मासिक भुगतान ₹500 – एक ऊपरी सीमा जिसे तब से हटा दिया गया है, क्योंकि पैसे का मूल्य हर गुजरते साल के साथ बदलता रहता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

बीएनएसएस की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए कौन पात्र है?

बीएनएसएस की धारा 144 के अनुसार, निम्नलिखित लोग भरण-पोषण के लिए पात्र हैं:

  • व्यक्ति की पत्नी, जो आर्थिक रूप से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है;
  • व्यक्ति के बच्चे, गोद लिए हुए, वैध या नाजायज और उनकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना;
  • व्यक्ति के मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे (दत्तक, वैध या नाजायज), जो आर्थिक रूप से उस पर निर्भर हैं, जब तक कि वे विवाहित बेटी न हों;
  • उस व्यक्ति की माता और/या पिता जो आर्थिक रूप से अपना समर्थन करने में सक्षम नहीं हैं।

भरण पोषण क्या है?

भरण-पोषण, जैसा कि शब्द से पता चलता है, उन दावेदारों का कानूनी अधिकार है जो भोजन, कपड़े, आश्रय, शिक्षा और चिकित्सा व्यय सहित अपनी हर बुनियादी जरूरत के लिए दूसरे पक्ष पर आर्थिक रूप से निर्भर है। यह आमतौर पर अलगाव की स्थिति में आश्रितों या परिवार के सदस्यों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता का एक रूप है।

क्या पति भरण-पोषण का दावा कर सकता है?

हां, पति भी  हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 और धारा 25 के तहत रखरखाव का दावा कर सकता है। इसके अलावा, निव्या वीएम बनाम शिवप्रसाद एनके (2014) और रानी सेठी बनाम सुनील सेठी (2011) जैसे मामलों में, यह माना गया था कि यदि पति की स्वतंत्र आय नहीं है, तो उसे उस रखरखाव के अधिकार से वंचित करना अनुचित है जो पत्नी को प्राप्त होता यदि वह समान वित्तीय स्थिति में होती। हालांकि, ऐसा कोई संहिताबद्ध प्रावधान नहीं है जो स्पष्ट रूप से मुस्लिम पतियों के लिए गुजारा भत्ता प्रदान करता है। 

तलाक पर कितना गुजारा भत्ता दिया जाता है?

सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की राशि तय नहीं है। इसके बजाय, इसकी गणना कमाई करने वाले पति/पत्नी की आय के आधार पर की जाती है। उनकी वार्षिक आय और अन्य परिस्थितियों (जिसके पास बच्चों की कस्टडी है, किसकी आय अधिक है, आदि) के आधार पर, मजिस्ट्रेट हर महीने भुगतान की जाने वाली रखरखाव की उचित राशि का निर्धारण करेगा।

क्या कामकाजी पत्नी भरण-पोषण का दावा कर सकती है?

हां, एक कामकाजी पत्नी भरण-पोषण का दावा कर सकती है यदि उसकी आय उसकी बुनियादी जरूरतों, जैसे भोजन और आश्रय के खर्चों को वहन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। भरण-पोषण दिया जाना है या नहीं और कितनी राशि का यह निर्धारित करते समय न्यायालय तलाक के दौरान दोनों पति-पत्नी की आय और व्यय पर विचार करता है।

संदर्भ

 

मुस्लिम कानून का इतिहास

यह लेख Himanshu Dhaked द्वारा लिखा गया है और Sneha Arora द्वारा इसका अद्यतन किया गया है। यह लेख मुस्लिम कानून के इतिहास, उत्पत्ति और स्रोतों पर गहराई से चर्चा करता है, तथा इसके सिद्धांतों की विस्तृत खोज करता है। लेख का पहला भाग मुस्लिम कानून के उद्भव और ऐतिहासिक विकास को शामिल करता है। इसके अलावा, यह इस्लामी धार्मिक कानून के आवधिक विकास (पीरियॉडिकल इवोल्यूशन) का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। मुस्लिम कानून से संबंधित कई शब्दावली पर विस्तार से चर्चा की गई है, साथ ही मुस्लिम कानून में विकसित रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और परंपराओं के स्रोतों पर भी चर्चा की गई है। यह लेख मुसलमानों की संस्कृति और परंपराओं से संबंधित है, जो मानव निर्मित भी हैं और समय के साथ धीरे-धीरे विकसित हुई हैं, जो इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों में निहित हैं और इस्लाम से पहले की परंपराओं और विविध संस्कृतियों से लगातार प्रभावित है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय

मुस्लिम कानून पारिवारिक कानून का हिस्सा है। पिछले दशकों में, इस्लामी संस्था शरिया के बारे में कई बहसें हुई हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘पथ’ या ‘रास्ता’, जो इस्लामी कानूनी प्रणाली का औपचारिक नाम है। इस गहन धर्म के केंद्र में कुरान है, ईश्वर का दिव्य वचन जो उन सभी के लिए मार्गदर्शक शक्ति के रूप में कार्य करता है जो इसकी शिक्षाओं का पालन करते हैं। इसने सदियों से मुसलमानों के जीवन का मार्गदर्शन किया है और विभिन्न रीति-रिवाजों और प्रथाओं को प्रभावित करना जारी रखा है। पृथ्वी पर अब तक जितने भी धर्म समृद्ध हुए हैं, उन्होंने अपने अनुयायियों (फॉलोवर्स) को उनके जीवन जीने के लिए एक पवित्र कार्य-पद्धति का प्रचार किया है। इस्लाम ईश्वर का कार्य है, जहाँ ‘कुरान’ उन सभी लोगों के जीवन के केंद्र में है जो पवित्र केंद्र की ओर एक अभिकेन्द्रीय शक्ति (सेंट्रिपेटल फोर्स) के रूप में कार्यों का पालन करते हैं। इस्लाम के संस्थापक एक ईश्वर में विश्वास करते थे, जिन्होंने रहस्योद्घाटन (रिवीलेशन) के माध्यम से अपने अनुयायियों के मानवीय आचरण का मार्गदर्शन और विनियमन किया। इस्लाम एक एकेश्वरवादी (मोनोथेइस्टीक) धर्म है; इसके अनुयायी केवल एक ईश्वर (अल्लाह) जो दुनिया का निर्माता है, के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। अल्लाह सर्वव्यापी, सर्वज्ञ है और दुनिया में हस्तक्षेप करता है। ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ है ‘ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण’। इस्लाम के अनुयायियों को मुसलमान कहा जाता है। इस्लाम समय की कसौटी पर खरा उतरा है और इसकी तुलना अन्य धर्मों की मान्यताओं से की गई है। इस्लाम वह दिशा है जो ईश्वर कुरान की पवित्र पुस्तक और उसके दूत, पैगंबर मुहम्मद के माध्यम से मनुष्य को देता है। यह लेख मुस्लिम कानून में ऐतिहासिक विकास और घटित घटनाओं से संबंधित विकास, इतिहास और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। 

मुस्लिम कानून का ऐतिहासिक विकास

इस्लामी कानून, जिसे पारंपरिक रूप से ईश्वरीय प्रेरणा (अर्थात ईश्वर या देवता से आने वाला) माना जाता था, उसे इस धारणा से मुक्त कर दिया गया है। ईश्वर ने इसे पैगंबर मुहम्मद को बताया, जिन्होंने इसे कुरान में निर्धारित किया। इस्लाम एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है “ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण”। यह समर्पण एक निष्क्रिय कार्य नहीं है, बल्कि अल्लाह द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करने का एक सक्रिय विकल्प है। यह “सलाम” शब्द से विकसित हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “शांति”। पैगंबर मुहम्मद इस्लाम में एक अग्रणी (पायनियरिंग) व्यक्ति हैं। माना जाता है कि वे अब्राहम, मूसा, नूह और जीसस जैसे दूतों की लंबी पंक्ति में अंतिम थे। बहुत अधिक जोर इस तथ्य पर आधारित है कि, हम कह सकते हैं, इस्लाम के पिरामिड की आधारशिला पैगंबर मुहम्मद ने रखी थी। पैगंबर मुहम्मद का जीवन इस्लाम को समझने के लिए अनिवार्य है। पैगंबर मुहम्मद का जन्म मक्का शहर में हुआ था, जो 570 ईस्वी के आसपास कुरैश की एक शक्तिशाली जनजाति का घर था। पैगंबर को उनके जीवन के शुरुआती दिनों में एक व्यापारी के रूप में उनकी वफादारी के कारण अल-अमीन, यानी भरोसेमंद माना जाता था। वह आध्यात्मिक रूप से बहुत ही जिज्ञासु व्यक्ति थे और अक्सर मक्का के पास माउंट हिरा की एक गुफा में ध्यान करते थे। ऐसे ही एक खास मौके पर, उन्हें महादूत जिब्रील द्वारा “अपने प्रभु के नाम पर” भजन गाने का निर्देश दिया गया था। 

ये रहस्योद्घाटन कुरान की मूल संरचना बनाने वाले ढेरों रहस्योद्घाटनों में से पहला था। इन रहस्योद्घाटनों ने इस्लाम-पूर्व बहुदेववादी (पॉलीथिईस्टिक) मान्यताओं का खंडन किया और एकेश्वरवादी विश्वास के अस्तित्व को बढ़ावा दिया। यह परिवर्तन उनकी पत्नी खदीजा से शुरू हुआ, क्योंकि वह इस्लाम में पहली बार शामिल हुई थीं। उनकी सलाह पैगंबर के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वह हमेशा पैगंबर को प्रेरित करती थीं कि अल्लाह उन्हें उदास नहीं होने देगा। 619 ई. में उनकी मृत्यु के बाद, पैगंबर ने फिर से आठ शादियाँ कीं, जिनमें से सभी ने अल्लाह की शिक्षाओं को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुहम्मद को अगले 23 वर्षों में गेब्रियल से कई रहस्योद्घाटन प्राप्त हुए, जिन्हें उनके लेखकों ने दर्ज किया। परिणामस्वरूप 114 सूरह (या अध्याय) कुरान में संकलित किए गए।

अपने समृद्ध इतिहास के दौरान, इस्लाम ने कई चुनौतियों का सामना किया है और अपने आस-पास की बदलती दुनिया को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे और पर्याप्त रूप से विकसित हुआ है। अरब प्रायद्वीप (पेनिनसुला) में अपने शुरुआती दिनों से लेकर सदियों से अपने वैश्विक प्रसार तक, इस्लाम लाखों लोगों के लिए आशा और मार्गदर्शन की किरण बना हुआ है। मुस्लिम कानून के विकास को पाँच अवधियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। 

प्रथम काल (570-632 ई.)

यह अवधि 570 ई. में पैगम्बर मुहम्मद के जन्म से शुरू होती है और 8 जून, 632 ई. को उनकी मृत्यु के साथ समाप्त होती है। इस समय के दौरान पैगम्बर अपने वयस्क जीवन में अक्सर ध्यान करते थे, इस दौरान कुरान की रचना की गई और अधिकांश अहादीस अस्तित्व में आए। 610 ई. में 40 वर्ष की आयु में उन्हें अपना पहला रहस्योद्घाटन मिला और उन्हें एएच-1 कहा गया। शुरुआत में बस, केवल उनकी पत्नी और साथ ही कुछ अन्य लोग ही उनके उपदेशों पर विश्वास करते थे। 622 ई. में पैगम्बर मुहम्मद के मदीना प्रवास के बाद, जिसने हिजरी युग की शुरुआत को चिह्नित किया, वे 632 ई. में अपनी मृत्यु तक लगभग 10 वर्षों तक वहाँ रहे। 632 ई. में उनकी मृत्यु के बाद, मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने के लिए खिलाफत की अवधारणा पेश की गई थी।

  • प्रथम खलीफा: अबू बक्र (632-634 ई.
  • दूसरा खलीफा: उमर (634-644 ई.) 
  • तीसरा खलीफा: उस्मान (644-656 ई.) 
  • चौथा खलीफा: अली (656-661 ई.) 

पैगम्बर मुहम्मद और उनके अनुयायियों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और वे मदीना भाग गए, यह घटना इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण महत्व रखती है क्योंकि यह इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक है।

पैगंबर मुहम्मद के अंतिम 10 वर्षों को मुस्लिम कानून के विकास के इतिहास में सबसे फलदायी और गौरवशाली अवधि माना जाता है। इस समय अवधि के दौरान, कुरान की सभी आयतें रची गईं और साथ ही अहादीस के अस्तित्व में क्रमिक वृद्धि हुई। इस शासन के दौरान कुरान मुस्लिम कानून का प्राथमिक स्रोत था, और इसे पैगंबर मुहम्मद को बताए गए ईश्वर के शाब्दिक शब्द माना जाता है। जबकि अहादीस में पैगंबर के कथन और कार्य शामिल हैं, यानी अप्रत्यक्ष रहस्योद्घाटन (पैगंबर मुहम्मद द्वारा अल्लाह से सीधे संचार के अलावा अन्य माध्यमों से प्राप्त मार्गदर्शन या दिव्य निर्देश), कुरान में ईश्वर के सीधे शब्द और कानून और प्रथा शामिल हैं जो मुसलमानों के व्यवहार का मार्गदर्शन करते हैं, जिसमें पूजा, नैतिकता और सामाजिक संबंधों के नियम शामिल हैं। 

द्वितीय काल (661-750 ई.) 

पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद, खिलाफत की संस्था स्थापित की गई, और कुरान का संग्रह और संस्करण शुरू किया गया। इस अवधि में सुन्नियों और शियाओं सहित कानून के पहले विचारधाराओं का विकास हुआ। सुन्नियों का मानना था कि खिलाफत चुनाव के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए, जबकि शियाओं का मानना था कि खिलाफत को वंशानुगत उत्तराधिकार (हैरीडेटरी सक्सेशन) के सिद्धांत पर लागू किया जाना चाहिए। 

इस अवधि में कुरान और अहादीस की अलग-अलग व्याख्याएँ भी सामने आईं, जो अंततः कानून के विभिन्न विचारधाराओं के विकास की ओर ले गईं। यह इस अवधि के दौरान था कि ग्रंथों का संग्रह और संस्करण शुरू किया गया और पूरा किया गया। कुरान का अंतिम संकलन खलीफा उथमान के शासनकाल के दौरान हुआ था और कुरान के उनके संस्करण को सबसे प्रासंगिक ग्रंथों में से एक माना जाता है, जो कि किसी भी तरह के जोड़-तोड़ से मुक्त है। इसलिए, इस अवधि में क्रमिक और महत्वपूर्ण परिवर्तन और विकास हुए, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन के रूप में कानून के विचारधाराओं और कुरान की स्थापना शामिल है। 

तीसरी अवधि (300 एएच)

यह अवधि अली की मृत्यु से 300 ई. तक का महत्व दर्शाती है और शियाओं और सुन्नियों के बीच मुस्लिम दुनिया के विभाजन को उजागर करती है। इस दौरान सुन्नी और शिया स्कूल स्थापित किए गए, और परंपराओं को एकत्र करने के लिए एक व्यवस्थित अभियान चलाया गया। अली की मृत्यु के बाद, उनके पहले बेटे हसन, मौविया द्वारा शासित उमय्यद राजवंश में शामिल हो गए। इसके अलावा, उनके दूसरे बेटे हुसैन ने विद्रोह किया और वह कर्बला में लड़ते हुए मारे गए। इसके अलावा, शियाओं और सुन्नियों के बीच विभाजन एक व्यापक प्रभाव के साथ सामने आया, जिसने एक अंतिम और स्थायी विभाजन स्थापित किया। शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच विभाजन इस्लामी इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति 632 ई. में पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के तुरंत बाद हुई थी। यह विभाजन मुख्य रूप से पैगंबर मुहम्मद के सही उत्तराधिकारी पर असहमति में निहित था। सुन्नियों का मानना था कि समाज को अपना प्रमुख व्यक्ति सोच समझकर चुनना चाहिए और अबू बकर का अनुयानन करना चाहिए। इसके विपरीत, शियाओं का मानना है कि पैगंबर मुहम्मद ने अपने चचेरे भाई और दामाद अली-इब्न-अबी तालिब को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। नेतृत्व को लेकर इस प्रमुख और बुनियादी असहमति ने विभाजन का आधार तैयार किया। 

चौथा काल (13वीं-19वीं शताब्दी)

यह काल अब्बासिद के शासनकाल के दौरान लगभग 962 ई. से शुरू होता है। अब्बासिद पहले खुद को “इमाम” यानी सर्वोच्च नेता शब्द से निरूपित (डिनोट) करते थे। सुन्नियों के अनुसार, इमाम को उनका सर्वोच्च नेता माना जाता है, लेकिन कानून इमाम सहित सभी पहलुओं से श्रेष्ठ है। जबकि, शिया में यह माना जाता है कि इमाम सर्वोच्च निकाय और कानून निर्माता है। प्रत्येक स्कूल के विभिन्न न्यायविदों के प्रयासों से मुस्लिम कानून के संबंध में विभिन्न कानून तैयार किए गए। इसके अलावा, मुस्लिम कानून को विभिन्न न्यायविदों के विद्वानों द्वारा विस्तार से समझाया गया था। 300 एएच से खिलाफत (कैलिफेट) के उन्मूलन (एबोलिशन) तक, इज्तिहाद (स्वतंत्र तर्क) और तकलीद (स्थापित सिद्धांतों का पालन) के सिद्धांतों का विकास और स्थापना हुई। 

न्यायविदों (ज्यूरिस्ट) द्वारा विधि के विकास हेतु प्रयास

इस्लामी कानून का विकास कई जटिलताओं से भरा हुआ है। मुस्लिम कानूनों को विकसित करने के लिए, विभिन्न विचारधाराओं के न्यायविदों ने मुस्लिम कानून और इसके विकास की दक्षता को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। मुस्लिम न्यायशास्त्र (उसुल-अल-फ़िक़ह) का प्रारंभिक विकास मुख्य रूप से प्राथमिक स्रोतों, कुरान और सुन्नत (पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं और सिद्धांतों) से कानूनी सिद्धांतों को प्राप्त करने के लिए आधारभूत सिद्धांतों और पद्धतियों की स्थापना पर केंद्रित था। 

यह समय अवधि 816-1058 ई. के बीच है, जो विशेषज्ञ न्यायविदों के युग के दौरान थी। इस दौरान इस्लामी न्यायशास्त्र के चार प्रमुख स्कूल (हनफ़ी, मालिकी, हनबली और शफीई) स्थापित किए गए थे, जिनमें से प्रत्येक के पास कानूनी फैसलों की पाठ्य व्याख्या और निष्कर्षण (एक्ट्रेक्शंस) के लिए अपने विशिष्ट सिद्धांत और पद्धतियाँ थीं। इस्लामी न्यायशास्त्र के शिया संप्रदाय के स्कूल सुन्नी स्कूल की तुलना में बाद में विकसित होने लगे। प्रमुख शिया स्कूल, जाफ़री स्कूल (ट्वेल्वर शिया शाखा से जुड़ा हुआ), 10वीं शताब्दी ई. के आसपास उभरा। जबकि सुन्नी स्कूल 8वीं और 10वीं शताब्दी ई. के बीच स्थापित किए गए थे, लगभग उसी अवधि में शिया जाफ़री स्कूल बाद में विकसित हुआ। इस युग के दौरान, औपचारिक शैक्षणिक विषयों में सुन्नत के संकलन और संरक्षण के साथ-साथ इस्लामी कानूनी परंपरा का अत्यधिक विकास, परिशोधन (रिफाइनमेंट) और संहिताकरण (कोडिफिकेशन) हुआ। 

इसके अलावा, बेहतर स्थापना और विकास के लिए, मुख्य न्यायिक नियम और सिद्धांत स्थापित और विकसित किए गए, जैसे कि क़ियास (समान तर्क), इज्मा (सर्वसम्मति), और इज्तिहाद (योग्य न्यायविदों द्वारा स्वतंत्र तर्क)। अन्य न्यायविदों द्वारा कई अन्य तरीके भी अपनाए गए, जैसे कि इस्तिहसन (न्यायिक वरीयता (ज्यूरिस्टिक प्रिफरेंस)) और मसलाह (सार्वजनिक हित का विचार), ताकि न्यायविदों को कड़ी सादृश्य (एनालॉजी) से विचलित होने में मदद मिल सके, अगर इससे अधिक न्यायसंगत समाधान निकालने में मदद होती हो तो।

इज्तिहाद और तक़लीद

अरबी में “इज्तिहाद” का मतलब “प्रयास” होता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा विभिन्न विचारधाराओं के न्यायविद कुरान की समझ के साथ न्यायिक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र ज्ञान और अनुभव का उपयोग करते हैं। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘जिहाद’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है “संघर्ष करना”। कुरान और सुन्नत के रूप में संदर्भित स्रोतों के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के समय इसका रहस्योद्घाटन पूरा हो गया था। हालाँकि, इज्तिहाद इस्लामी कानून के तहत सभी नए मुद्दों और समस्याओं से निपटने के लिए एक स्रोत, पद्धति या प्रक्रिया रहा है। कुरान और सुन्नत के बाद आने वाले सभी अन्य स्रोत जैसे इज्मा, क़ियास इस्तिहसन, आदि इज्तिहाद के दायरे में आते हैं। इस प्रकार, इज्तिहाद, अपने मूल अर्थ में, शरीयत के विस्तार और विकास में मानवीय तर्क का उपयोग करता है। 

इज्तिहाद का प्राथमिक उद्देश्य कानून निर्माता, सर्वशक्तिमान की सच्चाई और इरादे की खोज करना और नए कानूनी मुद्दों का नया समाधान खोजना है। इसलिए, इज्तिहाद शब्द खुद को एक ऐसे स्रोत के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी विषय-वस्तु इस्लाम के अन्य स्रोतों में उपलब्ध नहीं है। उदाहरण के लिए, बैंकों में नौकरी, टेस्ट ट्यूब बेबी, अंग दान आदि के मामले इज्तिहाद के तहत निपटाए जाते हैं। इसलिए, इज्तिहाद एक योग्य इस्लामी न्यायविद द्वारा किए गए स्वतंत्र तर्क और व्याख्या का एक अनुप्रयोग या प्रक्रिया है। पहली पाँच इस्लामी शताब्दियों के दौरान, सुन्नी मुसलमानों के बीच इज्तिहाद का सैद्धांतिक (थ्योरीटिकली) और व्यावहारिक रूप से प्रथा किया गया था। 

आधुनिक युग में, इस्लामी सुधारकों ने अंधी अनुरूपता को त्यागने और इस्लामी मूल की ओर लौटने के रूप में इज्तिहाद पर जोर देने का आह्वान किया है। इज्तिहाद को इस्लामी विद्वानों के लिए एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। जो लोग शरिया को विस्तार से जानते हैं, लेकिन स्रोतों से सीधे नियम नहीं निकाल सकते, उन्हें फकीह कहा जाता है। 

इस्लामी कानून में “तकलीद” का अर्थ है किसी और द्वारा लिए गए कानूनी निर्णयों को बिना किसी सवाल के स्वीकार करना, भले ही निर्णय की नींव के बारे में जानकारी न हो। दूसरे शब्दों में, इसका अर्थ है किसी और का अनुसरण करना, नकल करना। इस्लामी दर्शन में, तकलीद का अर्थ मुस्लिम कानून में मुजतहिद का अनुसरण करना है। मुजतहिद वह व्यक्ति होता है जो मुस्लिम कानून या इस्लामी न्यायशास्त्र का विद्वान होता है। आम तौर पर, इस्लामी कानून में, तकलीद करने वाले व्यक्ति को मुजतहिद के रूप में जाना जाता है। 

तक़लीद की अवधारणा आम तौर पर इज्तिहाद के उपयोग को बंद कर देती है, ऐसी स्थिति में हर मुसलमान को मुजतहिद के सिद्धांतों या चार मूल विचारधाराओं में से किसी एक के सिद्धांतों का पालन करना होता है। तक़लीद शब्द का इस्तेमाल सुन्नी इस्लाम और शिया इस्लाम दोनों में किया जाता है। सुन्नी इस्लाम में तक़लीद का तात्पर्य एक आम आदमी द्वारा किसी योग्य व्यक्ति या विद्वान और उनकी व्याख्याओं का अनुसरण करना है। इस्लामी कानून में यह अवधारणा आम मुसलमानों के लिए प्राथमिक स्रोतों, कुरान और हदीस से सीधे कानूनी फैसले लेने के लिए अधिक जटिल और अव्यावहारिक हो गई। सुन्नी इस्लाम में तक़लीद का तात्पर्य हनफ़ी, मालिकी, शफ़ी या हनबली जैसी सबसे प्रसिद्ध विचारधाराओं के विद्वानों की विशेषज्ञता पर एक निश्चित हद तक भरोसा और विश्वास है। कुछ आलोचकों का तर्क है कि तकलीद स्वतंत्र तर्क को हतोत्साहित करके बौद्धिक ठहराव का कारण बन सकता है; इसे आम तौर पर यह सुनिश्चित करने के लिए एक व्यावहारिक विधि के रूप में देखा जाता है कि उनके कार्य इस्लामी कानून के अनुरूप हों।

शिया इस्लाम में, तक़लीद गैर-मुजतहिदों की मुजतहिदों के प्रति सामान्य अनुरूपता है, बिना किसी नकारात्मक अर्थ के। शिया मुसलमान मुजतहिदों की शिक्षाओं का पालन करते हैं, जिन्हें विद्वान माना जाता है और वे स्वतंत्र तर्क और मुस्लिम कानूनों की व्याख्या करने में सक्षम हैं। शिया इस्लाम में तक़लीद को धार्मिक प्रथा का एक आवश्यक और सकारात्मक पहलू माना जाता है, जो सुनिश्चित करता है कि अनुयायी मुस्लिम कानून की सटीक और समकालीन व्याख्या का पालन करें। शिया मुसलमान अक्सर जीवित मरजा का चयन करते हैं और दैनिक जीवन और धार्मिक प्रथा के मामलों में कानूनी राय का पालन करते हैं। यह विसंगति इमामतों या सुन्नी इमामों पर अलग-अलग विचारों से उपजी है। “अल-जुरजानी” नामक एक दार्शनिक (फिलॉसफर) ने तक़लीद को एक व्यक्ति द्वारा दूसरों के शब्दों और कार्यों का अनुसरण करने के रूप में परिभाषित किया है

फ़िक़्ह

फ़िक़्ह को आम तौर पर इस्लामी न्यायशास्त्र माना जाता है और इसे शरिया की मानवीय ज़रूरतों, प्रथाओं और आवश्यकताओं की बुनियादी समझ के रूप में वर्णित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, फ़िक़्ह का अर्थ है इस्लामी फ़ैसलों के बारे में उनके स्रोत के अनुसार ज्ञान। कुरान और सुन्नत में वर्णित दिव्य समझ के अनुसार, फ़िक़्ह कुरान और शरिया की व्याख्याओं के माध्यम से शरिया का विस्तार और विकास करता है जो इज्तिहाद है। आम तौर पर, फ़िक़्ह को परिवर्तनशील माना जाता है और इसे न्यायविदों के अनुसार बदला जा सकता है, यह आम तौर पर इस्लाम के अनुष्ठानों, नैतिकता और परंपराओं के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था से संबंधित है। फ़िक़्ह अध्ययनों को आम तौर पर उसुल-अल-फ़िक्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांत) में विभाजित किया जाता है। आधुनिक युग में, फ़िक़्ह आम तौर पर सुन्नी प्रथा के भीतर फ़िक़्ह के चार प्रमुख विचारधाराओं (मधहब) और शिया प्रथा के भीतर दो विचारधाराओं से जुड़ा हुआ है। 

पांचवीं अवधि (19वीं शताब्दी ई. से वर्तमान तक) 

फ़ाइज़ी के अनुसार, ख़िलाफ़त के उन्मूलन के बाद, मुस्लिम कानून का विकास धीमा हो गया, और यह कानून मुख्य रूप से विधायिका के माध्यम से लागू किया गया। इस अवधि के दौरान, मुस्लिम कानूनों की स्थिरता और सहज प्रतिक्रिया कमजोर और अनियमित थी। कानून के विकास के लिए प्रमुख प्रयास मुख्य रूप से इज्मा और क़ियास द्वारा संचालित थे। विचारधाराओं के न्यायविदों को कानून और नियम बनाने की अनुमति नहीं थी। इस अवधि के दौरान, ख़िलाफ़त और सल्तनत का उन्मूलन पहले से ही था, इसलिए भारत सहित अन्य देशों की तरह, कानून बनाने वाली एकमात्र संस्था कानून थी। इस प्रकार, यह अवधि मुख्य रूप से पश्चिमी औपनिवेशिक कानून (कोलोनियल लॉ) और शक्तियों और शरिया के भीतर पश्चिमी शैली के कानूनों के अनुकूलन से प्रभावित थी। इस एकीकरण का अर्थ अक्सर यह होता है कि शरिया को नए शुरू किए गए पश्चिमी शैली के कानूनों के साथ तालमेल बिठाना होगा और एक मिश्रित कानूनी प्रणाली का निर्माण करना होगा जो पारंपरिक इस्लामी न्यायशास्त्र और आधुनिक विधायी प्रथाओं दोनों को प्रतिबिंबित करेगा। 

यह अवधि मुस्लिम शासन के पतन (डेक्लाइन) के तुरंत बाद ब्रिटिश शासन की स्थापना के साथ शुरू हुई, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक युग की पूर्ण स्थापना हुई। कुछ विषय सामान्य कानून प्रणालियों में शामिल हैं और कुछ कानूनों को पारिवारिक कानून में प्रथागत कानूनों के रूप में छोड़ दिया गया है। इसके अलावा, मुस्लिम कानून में मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) अधिनियम 1937 (शरीयत अधिनियम) को उन व्यक्तियों पर सख्त नियंत्रण रखने के लिए पारित किया गया था जो खुद को मुसलमान मानते थे। इस अवधि के दौरान प्रमुख सुधार मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 था, जिसने मुस्लिम पत्नियों को विशिष्ट आधारों पर तलाक के लिए मुकदमा करने का अधिकार दिया। 

इस्लाम के प्रमुख स्रोत 

कुरान और हदीस 

मुस्लिम कानून की उत्पत्ति अल-कुरान से हुई है, जिसके बारे में मुसलमानों का मानना है कि यह अनंत काल से अस्तित्व में है। कुरान इस्लाम की उत्पत्ति और प्राथमिक स्रोत भी है। मुस्लिम सिद्धांतों के अनुसार इसका महत्व आध्यात्मिक और पवित्र है। कुरान का हर शब्द ईश्वर का है, जो गैब्रियल के माध्यम से पैगंबर मुहम्मद तक पहुँचाया गया था। प्रत्येक शब्द को टुकड़ों में प्रदान किया गया था, जो 23 वर्षों की अवधि में फैला हुआ था। कुरान इस्लामी सिद्धांतों को आकार देने में अपना प्रभाव डालता है, हालांकि व्यावहारिक रूप से नहीं बल्कि धार्मिक रूप से, मुसलमानों के लिए ‘नियमों की एक संहिता’। कुरान को अल-फुरकान माना जाता है जिसका अर्थ है सत्य को झूठ से अलग करना या सही को गलत से अलग करना। मुस्लिम आस्था की परंपरा में, पवित्र कुरान ईश्वर की अंतिम पुस्तक है जो पैगंबर मुहम्मद पर प्रकट हुई, जो पृथ्वी पर ईश्वर के अंतिम पैगंबर थे, प्रतीकात्मक रूप से “खतम-अन-ए-नबीयन ” (पैगंबरों की मुहर), जिसके बाद ईश्वर द्वारा कोई अन्य पैगंबर नहीं भेजा गया था, या कभी नहीं भेजा जाएगा। कुरान ने यह विचार दिया कि कानून ईश्वर का प्रत्यक्ष आदेश है। उसका कानून ‘एकल संपूर्ण’ होना चाहिए। सामान्य तौर पर, कुरान में कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं है, और कुरान के संदर्भ को इसमें बदला नहीं जा सकता क्योंकि इसे अचूक माना जाता है। 

क़ुरान में लगभग 6,000 ‘आयतें’ हैं। आयतों का कानूनी महत्व यह है कि उनमें कानून और प्रवर्तन से संबंधित लगभग 200 आयतें हैं, जबकि पारिवारिक कानून और राज्य नीति से संबंधित केवल 80 आयतें हैं। इसका महत्व राजनीतिक, सामाजिक, भावनात्मक, धार्मिक आदि है। पैगंबर मुहम्मद को सभी रहस्योद्घाटन मदीना में हुए। कुरान पवित्र पैगंबर (पीबीयूएच) के रहस्योद्घाटन प्रदान करता है। इसका पहला रहस्योद्घाटन 40 वर्ष की आयु में हुआ था। सूरह अल-अलक को सबसे पहले पवित्र पैगंबर पीबीयूएच पर कुरान की इस आयत के बाद उतारा गया था “भगवान के नाम पर पढ़ें, जिसने एक आदमी को एक थक्के में बनाया।”

जैसे-जैसे इस्लाम समय की रेत के साथ आगे बढ़ता गया, मुस्लिम कानून न्यायशास्त्र की एक अद्भुत प्रणाली को समाहित करता गया, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के कानून की सभी शाखाएँ शामिल हैं, और इसमें आपराधिक कानून (जिनायत), शासन, न्याय प्रशासन, लेन-देन (मुअमालत), व्यक्तिगत स्थिति और मानवाधिकार (हुकूक-उल-इबाद) सहित सभी कानूनी विषय शामिल हैं। ईश्वर में इसकी उत्पत्ति होने के कारण, यह व्यापक रूप से माना जाता है कि मुसलमानों को बदला नहीं जा सकता है और ऐसे बदलने के प्रयासों की निंदा की जानी चाहिए; इस प्रकार, समान नागरिक संहिता के अनुरूप विधायिका के कार्यों की बहुत आलोचना की जाती है। 

कुरान, इस्लामी कानून के प्राथमिक स्रोत के रूप में, मुसलमानों के दिलों में पनपा और आज भी दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा अपनाए जाने वाले रीति-रिवाजों और प्रथाओं के लिए एक कसौटी है। इसके अलावा, जैसा कि कुरान पहले के पैगम्बरों द्वारा दिए गए शब्दों को स्पष्ट और प्रकट करता है, यह उन लोगों का मार्गदर्शन करना जारी रखेगा जो सच्चे दिल से ईश्वर की ओर मुड़ते हैं।

हदीस को मुस्लिम कानून का एक और प्राथमिक स्रोत माना जाता है। ये आम तौर पर रस्मों और परंपराओं का संग्रह है जिसमें पैगंबर मुहम्मद की दैनिक दिनचर्या के विषय शामिल हैं; ये कुरान के बाद मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन का प्रमुख स्रोत हैं। हदीस की उत्पत्ति पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद शुरू हुई। जो लोग उन्हें जानते थे, उन्होंने पैगंबर मुहम्मद के जीवन से संबंधित कहानियों और शब्दों को साझा और संग्रहित किया। कुछ कहानियों और शब्दों के संग्रह के तुरंत बाद, न्यायविदों और विद्वानों ने कहानियों की समीक्षा की, संभवतः उनकी मृत्यु के बाद दूसरी शताब्दी के बाद। हदीस के सबसे प्रामाणिक संग्रहों में सहीह बुखारी, सुनन अबू दाऊद और सहीह मुस्लिम शामिल हैं। हदीस शब्द अरबी मार्ग एच-डी-टीएच से लिया गया है जिसका अर्थ है “होना”, “घटित होना” या “किसी चीज़ के घटित होने के लिए कोई घटना होना”।

मुस्लिम समुदाय की प्रथागत प्रथाओं को समझने के लिए मुसलमानों ने हदीस का इस्तेमाल किया। हदीस इतिहास, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, सूफीवाद, कविता, साहित्य और सुंदर साहित्य सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को भी बढ़ावा देता है। इसलिए, मुस्लिम कानून के स्रोत के रूप में हदीस, इस्लामी न्यायशास्त्र को आकार देने में महत्वपूर्ण अधिकार और प्रासंगिकता रखती है। इसमें पैगंबर मुहम्मद द्वारा दिए गए मुस्लिम कानून के कथन, कार्य, शब्द और अनुमोदन शामिल हैं, जिससे नैतिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों पर व्यावहारिक मार्गदर्शन मिलता है। कुरान के बाद, हदीस, कानूनी, सामाजिक और नैतिक तौर-तरीकों पर मुसलमानों को स्पष्टता, दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करती है। हदीस के सावधानीपूर्वक प्रमाणीकरण वाले विद्वान इसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं, जिससे यह इस्लामी कानून बनाने में आधारशिला बन जाती है। हदीस का दायरा और इसकी प्रयोज्यता (एप्लिकेबिलिटी) मुस्लिम समुदाय के भीतर न्याय, नैतिकता और सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने में इसके महत्व को रेखांकित करती है। 

इस्लाम के अन्य सर्वोपरि स्रोत

इस्लाम अपने कानून और रीति-रिवाज कई सर्वोच्च स्रोतों से प्राप्त करता है, जिनमें से प्रत्येक मुसलमानों को मार्गदर्शन देने के लिए अपने ढांचे में एक विशिष्ट और अलग तरीके से योगदान देता है। जैसा कि पहले ही ऊपर चर्चा की जा चुकी है, कुरान मुस्लिम कानून के मार्गदर्शन के लिए एक प्राथमिक स्रोत के रूप में खड़ा है, और हदीस कुरान के बाद एक आधारभूत ग्रंथ के रूप में खड़ा है। कुरान की आयतों में धर्मशास्त्र, नैतिकता और कानूनी सिद्धांतों सहित दिव्य शिक्षाएँ शामिल हैं। इसके अलावा, इस्लामी न्यायशास्त्र भी अपने कानून और रीति-रिवाजों को सुन्ना, इज्मा और क़ियास जैसे विभिन्न अन्य स्रोतों से प्राप्त करता है। इनमें से प्रत्येक पर नीचे चर्चा की गई है।   

सुन्ना

“सुन्ना” एक अरबी शब्द है जो पैगंबर मुहम्मद और उनके पूर्वजों के जीवन के तरीके को दर्शाता है। इस्लाम में, सुन्ना को “सुन्नत” भी लिखा जाता है। सुन्नत आम तौर पर पैगंबर मुहम्मद की एक प्रथा और परंपरा है जो मुसलमानों को कुछ रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और परंपराओं का पालन करने के लिए मार्गदर्शन करती है। सुन्नत शब्द का शाब्दिक अर्थ है “चलने वाला मार्ग।” इसे एक ऐसे मार्ग के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें पैगंबर मुहम्मद द्वारा निर्धारित प्रथाओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं का समावेश होता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि जब कुरान में सहायक और प्रामाणिक मार्गदर्शन की कमी होती है, तो पैगंबर के कार्यों और उनके कथनों को सुन्नत के रूप में सहायक तत्वों के रूप में लिया जाता है। सुन्नत में दो रहस्योद्घाटन, प्रकट (ज़हीर) और आंतरिक (बातिन) शामिल हैं और इसमें कुरान में शामिल ईश्वर के सीधे शब्द शामिल हैं। इसके विपरीत, आंतरिक रहस्योद्घाटन में पैगंबर के शब्द शामिल हैं, जो अल्लाह द्वारा प्रेरित थे और गेब्रियल के माध्यम से प्रेषित नहीं किए गए थे, लेकिन दिव्य मार्गदर्शन को दर्शाते हैं। इसके अलावा, सुन्नत न केवल बुनियादी मुस्लिम कानून के लिए बल्कि इस्लाम में बुनियादी कानूनों और अनुष्ठानों के लिए भी एक माध्यम प्रदान करता है, जैसे कि नमाज कैसे अदा करे। इसलिए, सुन्नत, जिसका मूल अर्थ ‘पूर्व-इस्लामी समय में अभिनय का तरीका’ था, पैगंबर मुहम्मद के जीवन जीने के तरीके के साथ विकसित हुआ। समय के साथ, अल-शफी जैसे विद्वानों के तहत, सुन्नत पैगंबर मुहम्मद के उदाहरण का पर्याय बन गया, जैसा कि हदीस द्वारा किए गए विवरणों में प्रलेखित (डॉक्यूमेंटेड) है। 

इज्मा

इज्मा शब्द का शाब्दिक अर्थ है “किसी चीज़ पर दृढ़ संकल्प, संकल्पबद्धता (रेजोल्यूशन) और सहमति।” इस्लामी कानून में, इसका शाब्दिक अर्थ है “पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद उनके समुदाय के मुजतहिदों की एक निश्चित समय अवधि में सहमति। सरल शब्दों में, इस्लाम में इज्मा का अर्थ है किसी विशेष कानूनी मामले या मुद्दे पर विद्वानों की सर्वसम्मति या सहमति। इज्मा मुस्लिम समुदाय को इस्लामी और मुस्लिम शिक्षाओं की व्याख्या करने और उन्हें नई स्थितियों या मुद्दों पर लागू करने का एक तरीका प्रदान करता है, जिन्हें निश्चित रूप से संबोधित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इज्मा को इस्लामी नियमों को बनाने के लिए एक मजबूत और बाध्यकारी आधार माना जाता है, जो कुरान और सुन्नत के बाद दूसरे स्थान पर है। इज्मा का महत्व इस्लामी नियमों और कानून के प्राथमिक स्रोतों में निश्चित रूप से शामिल नहीं की गई नई चुनौतियों और मामलों को संबोधित करने में मार्गदर्शन और स्थिरता प्रदान करने की इसकी योग्यता और क्षमता में निहित है। मुस्लिम कानून के तहत किसी इज्मा को निष्पक्ष और वैध माने जाने के लिए, कुछ शर्तों को पूरा करना होगा, जैसे कि उसी समय अवधि और क्षेत्र के ज्ञात और मान्यता प्राप्त विद्वानों द्वारा आम सहमति बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप या व्यवधान के विभिन्न प्रकार के इज्मा इस प्रकार हैं: 

  • पैगम्बर मुहम्मद के साथियों की सहमति और स्वीकृति।
  • सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय की सर्वसम्मति।
  • योग्य मुजतहिद विद्वानों की सहमति। 

अंततः, इज्मा इस्लामी न्यायशास्त्र की एकता और सुसंगति को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है, क्योंकि यह मुस्लिम समाजों की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित होता है। 

क़ियास

इस्लामी कानून में क़ियास को कानून में तर्क का एक व्यवस्थित रूप माना जाता है। क़ियास को शरिया के चौथे स्रोत में एक अनुरूप निष्कर्ष माना जाता है। यह न्यायविदों और इस्लामी विद्वानों द्वारा इस्लामी कानून के प्राथमिक स्रोतों के अंतर्गत स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किए गए नए या विशिष्ट मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए उपयोग की जाने वाली अनुरूप तर्क की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। क़ियास मुस्लिम समुदाय को इन विकासों पर लागू होने वाले सिद्धांतों की स्थापना करके नई परिस्थितियों में बदलाव के लिए विकसित और अनुकूल होने में सक्षम बनाता है। क़ियास के सही और वैध होने के लिए, नए मामले में मूल मामले के समान ही प्रभावी कारण होना चाहिए, और निर्णय कुरान, सुन्नत या विद्वानों की आम सहमति का खंडन नहीं करना चाहिए। अरबी में, क़ियास शब्द का अर्थ है “माप।” क़ियास को स्थिरता के लिए निर्णय माना जाता है और वे मौजूदा कानूनों के अनुरूप हैं। सुन्नी के सभी चार स्कूल क़ियास को कानून के स्रोत के रूप में स्वीकार करने पर सहमत हुए लेकिन क़ियास के दायरे पर अलग-अलग थे। शिया लोग क़ियास को कानून के स्रोत के रूप में मान्यता नहीं देते हैं। इसके अलावा, क़ियास को इज्तिहाद का एक रूप माना जाता है, जो मौलिक और विचारशील है।

इस्लाम के द्वितीयक स्रोत

मुस्लिम कानून के प्राथमिक स्रोत कुरान और सुन्नत हैं, हालांकि, कुछ माध्यमिक स्रोत भी हैं जो मुसलमानों का मार्गदर्शन और निर्देशन करते हैं और प्राथमिक स्रोतों की व्याख्या करने में मदद करते हैं। इन स्रोतों का उपयोग इस्लामी न्यायविदों द्वारा जीवन के विशिष्ट नियमों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, इस्लामी कानून भी अपने कई नियम, समझ और शिक्षाएँ माध्यमिक स्रोतों से लेता है, जैसा कि नीचे चर्चा की गई है: 

रीति रिवाज

मुस्लिम कानून में रीति-रिवाजों को “उर्फ” के नाम से भी जाना जाता है। रीति-रिवाज दिन-प्रतिदिन की गतिविधियाँ और मामले हैं जिन पर लोगों का समुदाय सहमत होता है। इस्लामी कानून के आगमन से पहले, मुस्लिम कानून, परंपराओं, धर्म और अनुष्ठानों के प्रथा के संबंध में रीति-रिवाज ही एकमात्र स्रोत थे। हालाँकि रीति-रिवाजों को आधिकारिक तौर पर प्राथमिक स्रोत के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, लेकिन मुस्लिम कानून में उनका योगदान उन्हें इस्लामी कानूनी सिद्धांतों के भीतर एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है। पैगंबर मुहम्मद का मानना था कि जब तक रीति-रिवाज मुस्लिम कानून के खिलाफ़ नहीं होते, तब तक उन्हें मुस्लिम कानून के तहत एक स्रोत माना जा सकता है। इस्लाम के अरब दुनिया पर कब्ज़ा करने से पहले कानून के स्रोत के रूप में रीति-रिवाज प्रचलित थे। पैगंबर ने बुरे या दुष्ट माने जाने वाले रीति-रिवाजों को खत्म कर दिया, जबकि उन्होंने अपनी स्वीकृति और प्रतिबंधों के माध्यम से अन्य को मंजूरी दी। न्यायविदों ने भी रीति-रिवाजों के आधार पर अपना सर्वसम्मत निर्णय बनाया। आज, रीति-रिवाज इस्लाम में कानून की एक ताकत हैं, जिसमें उत्तराधिकार, महिलाओं की विशेष संपत्ति, विवाह, मेहर, तलाक, भरण-पोषण, संरक्षकता, उपहार, वक्फ और न्यास (ट्रस्ट) से संबंधित मामले शामिल नहीं हैं, जो शरीयत अधिनियम, 1937 के दायरे में शासित होते हैं। इसके अलावा, रीति-रिवाजों का शरिया के विकास और निर्माण पर महत्वपूर्ण जोर और प्रभाव है। विद्वानों और न्यायविदों के अनुसार, एक रीति-रिवाज को निम्नलिखित विशेषताओं को पूरा करना चाहिए।

  • यह तर्कसंगत और सामान्य प्रकृति का होना चाहिए। 
  • इसका पालन अद्यतन के अनुसार ही किया जाना चाहिए तथा यह बहुत पुराना नहीं होना चाहिए। 
  • इसमें कुरान और सुन्नत के सिद्धांतों का खंडन नहीं होना चाहिए। 
  • रीति रिवाज़ों का समय पर अद्यतन किया जाना चाहिए और निरंतर और उन्हें ध्यान देने योग्य होना चाहिए। 
  • रीति रिवाज क्षेत्रीय होना चाहिए
  • इसे सार्वजनिक नीतियों का विरोध नहीं करना चाहिए। 

न्यायिक मिसालें

न्यायिक निर्णय उन सिद्धांतों, विधियों और प्रक्रियाओं को संदर्भित करते हैं जिनके द्वारा न्यायाधीश किसी निष्कर्ष पर पहुंचने या चल रही कार्यवाही को निर्देशित करने के लिए समान तथ्यों के साथ पहले से स्थापित मामलों का उपयोग करते हैं। इसे एक स्रोत के रूप में उपयोग करने के पीछे का विचार “स्टेयर डेसीसिस” अर्थात, “जो पहले ही घोषित किया जा चुका है उसके अनुरूप होना” शब्द पर आधारित है। ब्रिटिश शासन ने न्यायिक मिसालों को मुस्लिम कानून का हिस्सा बनाया। वे मूल रूप से कभी भी इस्लाम का हिस्सा नहीं थे। फतवे इस्लामी कानून का हिस्सा थे, और काजी उनका पालन करने के लिए बाध्य नहीं थे। स्वतंत्रता के बाद, न्यायिक मिसाल के सिद्धांत को अदालतों और भारत के संविधान द्वारा समर्थित और कार्यान्वित किया गया। अदालतों ने कानून के प्रश्न पर व्याख्या प्रदान की जहां समाधान प्रदान करने में प्रावधान अस्पष्ट थे। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले उस समय लागू होने वाले बाध्यकारी मिसाल के रूप में काम करते थे। अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), बेगम सुबानु उर्फ सायरा बानू और अन्य बनाम एएम अब्दुल गफूर (1987), आदि कुछ ऐतिहासिक मामले हैं जो अदालतों में तर्कसंगत संबंध (रीज़नेबल नेक्सस)’ और सुगम भिन्नता (इंटेलिजिबल डिफरेंशिया)’ का आधार रखते हैं।

विधान

विधान का अर्थ है संसद द्वारा बनाए गए कानून। विधान एक और सिद्धांत है जो ब्रिटिश शासन की देन है। इस्लाम में, कुरान के अलावा ईश्वर के अलावा हर दूसरे स्रोत को अस्वीकार किया जाता है, लेकिन बहस के विशेष मामलों से निपटने के लिए कानून बनाए जा रहे हैं। इस्लामी समुदाय किए गए बदलावों या दिए गए नए कानून को स्वीकार करने में अनिच्छुक है, जिससे कभी-कभी समुदाय और सरकार के बीच टकराव होता है। शरीयत अधिनियम, 1937, मुसलमानों पर कानून बनाने वाला ऐसा ही एक कानून है। 1913 का मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम ऐसे कानून का एक और उदाहरण है। मुस्लिम कानून में, पैगंबरों को अंतिम अधिकारी माना जाता था, और उनकी शिक्षा को किसी भी अन्य से बढ़कर सर्वोपरि माना जाता था। 

इस्लामी कानूनी सिद्धांतों का विकास और आधुनिक प्रभाव

समानता और पूर्ण भलाई के सिद्धांत को भी मुस्लिम कानून के स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह न्याय और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है, जैसा कि अंग्रेजी सामान्य कानून में उपयोग किया जाता है। इस्लाम में पाया जाता हैं कि इस्लाम का उद्देश्य मनुष्यों को धर्म, नैतिकता और अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों में मार्गदर्शन करना है, जो प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न हुए हैं। अबू हनीफा, जिन्हें सुन्नी संप्रदाय का संस्थापक (फाउंडर) माना जाता है, उन्होंने सादृश्य पर आधारित कानून के शासन के सिद्धांत की शुरुआत की, जिसे न्यायविदों की उदार पसंद (लिबरल प्रिफरेंस) में निर्णय के विकल्प पर अलग रखा जा सकता है। मुसलमानों के इन सिद्धांतों को इस्तिहान के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है न्यायविदों की उदार पसंद। इस शब्द का इस्तेमाल महान न्यायविद ‘अबू हनीफा’ ने स्वतंत्रता को व्यक्त करने और विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए किया है। इसके अलावा, मुस्लिम कानून के कई क्षेत्रों को भी भारत में बदलती परिस्थितियों को पूरा करने के लिए संशोधित किया गया था, जैसे कि व्यक्तिगत कानून, वक्फ कानून, संपत्ति कानून, आपराधिक कानून और कई अन्य।

इस्लामी कानून के आधुनिक स्कूल

पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम में इस बात को लेकर मतभेद हो गया कि अगला नेता कौन होगा। अधिकांश लोगों ने मुहम्मद की चौथी पत्नी आयशा बेगम के पिता अबू बकर का समर्थन किया। यह गुट अंततः सुन्नी संप्रदाय के रूप में जाना जाने लगा, जिसमें अबू बकर पहले खलीफा के रूप में सेवा कर रहे थे। असहमत संप्रदायों ने मुहम्मद की बेटी (फातिमा) के पति अली को अपना नेता चुना, यह संप्रदाय बाद में शिया संप्रदाय के रूप में जाना जाने लगा और अली इसके पहले इमाम थे। दोनों संप्रदाय सर्वोच्च स्रोत की व्याख्या के आधार पर आगे विभाजित होते हैं। इसलिए, इस्लामी कानून के आधुनिक स्कूल संप्रदायों में विभाजित हैं: 

सुन्नी स्कूल

हनफ़ी स्कूल (699 ई.-767 ई.) 

हनफ़ी स्कूल मुस्लिम कानून में पहला और सबसे लोकप्रिय स्कूल है। पहले, इस स्कूल को ‘कुफ़ा स्कूल’ के नाम से जाना जाता था, जो इराक के लोकप्रिय शहर कुफ़ा के नाम पर आधारित था। बाद में, यह स्कूल अपने संस्थापक ‘अबू हनीफ़ा’ पर आधारित हो गया। यह अदृश्य रीति-रिवाजों पर कम निर्भरता पर आधारित है और कुरान के पाठ के माध्यम से सत्यापित अनुरूप निष्कर्षों पर ज़ोर देता है साथ ही कानून में मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं के उपयोग के बारे में बताता है। उन्होंने बदलते समय की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कानूनी सिद्धांतों के विकास के रूप में इस्तिहसन की स्थापना की और इज्मा की भी वकालत की। इस्लाम के स्रोतों के दायरे में अपनी उदार सोच के कारण ये स्कूल मुसलमानों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए। संस्थापक, ‘इमाम अबू हनफ़ी’ के अलावा, उनके दो और शिष्य हैं, अबू यूसुफ़ और इमाम मुहम्मद। हनफ़ी स्कूल को भारत के अधिकांश हिस्सों में पसंद किया जाता था। इस शैक्षिक मॉडल को चीन, पाकिस्तान, तुर्की और अफ़गानिस्तान में अपनाया गया था। इसने एक सीधी-सादी पद्धति अपनाई और इसे किसी भी अन्य स्थापित प्रणाली की तुलना में अधिक कठोर माना जाता था। हनफ़ी स्कूल के अंतर्गत इस्तेमाल किए जाने वाले मुख्य प्रावधान विवाह, उत्तराधिकार और तलाक थे। हनफ़ी स्कूल को मुख्य रूप से लैंगिक समानता की कमी और कानूनी फैसलों में असंगति के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा। हनफ़ी स्कूल के एक महत्वपूर्ण मामले, मुहम्मद यूनुस बनाम मुहम्मद इशाक खान (1921) में, अदालत में दूसरी अपील में हनफ़ी कानून के तहत वक्फ की वैधता पर तर्क दिया गया, जिसमें कहा गया कि निचली अदालतों ने हनफ़ी कानूनी सिद्धांतों की गलत व्याख्या की है। 

अपील में हनफ़ी विद्वानों के बीच असहमति के मामलों में काजी यूसुफ की राय के अधिकार पर जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त, यह सुन्नी मुस्लिम कानून के तहत वक्फ के वैध होने की आवश्यकता को संबोधित करता है। यह मामला कानूनी कार्यवाही में वक्फ संपत्तियों के संबंध में हनफ़ी और सुन्नी कानूनी सिद्धांतों की व्याख्या और अनुप्रयोग को रेखांकित करता है। इसी तरह, अबुल कलाम बनाम अख्तरी बीबी (1987) के मामले में, मोहम्मदन कानून के हनफ़ी स्कूल द्वारा शासित एक नाबालिग बेटे की अभिरक्षा (कस्टडी) को लेकर विवाद था। मां ने संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट) की धारा 25 के तहत अभिरक्षा की मांग की, जो हिरासत के फैसलों में बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता देने की अनुमति देता है। अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत, पिता प्राकृतिक अभिभावक है; इसलिए यह धारा 25 दृढ़ता से लागू नहीं होती है। हालाँकि, उड़ीसा उच्च न्यायालय ने हिरासत के मामलों में बच्चे के सर्वोत्तम हित पर जोर देते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया।

मालिकी स्कूल (711 ई.-795 ई.) 

इस स्कूल की स्थापना इमाम मलिक ने की थी। इस स्कूल का नाम मदीना के मुफ़्ती मलिक-बिन-अनस के नाम पर पड़ा। इस अवधि के दौरान, ‘कुफ़ा’ को मुस्लिम ‘खलीफ़ा’ की राजधानी माना जाता था, जहाँ ‘इमाम अबू हनीफ़ा’ और उनके शिष्य हनफ़ी स्कूल के साथ विकसित हुए। स्कूल परंपराओं में बहुत विश्वास करता था और उन्हें उचित महत्व देता था, भले ही वे एक ही तरह की हों। कानून के स्रोत के रूप में इस्तिहसन की स्थापना में स्कूल का बहुत बड़ा योगदान था, हालाँकि इसे केवल तभी रिपोर्ट किया जाना चाहिए जब अन्य स्रोतों पर आधारित निर्णय में अस्पष्टता हो। पैगंबर के साथियों और मदीना की परंपराओं को बहुत सम्मान दिया जाता है। विचारधाराओं में संपत्ति में महिलाओं के अधिकारों का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं किया गया था, क्योंकि उनकी संपत्ति हमेशा उनके पति के अधीन रहनी चाहिए, क्योंकि वह अपनी संपत्ति की देखभाल अकेले नहीं कर सकती हैं। स्कूल के अनुयायी ज़्यादातर उत्तरी अफ्रीका और स्पेन में रहते हैं। मलिक स्कूल के मुख्य प्रावधान विवाह, तलाक और विरासत थे, जो प्रथा रीति रिवाजगत “उर्फ” के सिद्धांतों पर आधारित थे। मलिकी स्कूल की व्याख्या में कठोरता और अनुप्रयोग के सीमित दायरे के लिए आलोचना की गई है।

शैफ़ी का स्कूल (767 ई.-820 ई.) 

अबू अब्द अल्लाह मुहम्मद इब्न इदरीस अल-शफीई ने इस स्कूल की स्थापना की थी। वे मदीना के इमाम मलिक के छात्र थे। अल-शफीई शिक्षाएँ सीरिया, मिस्र, लेबनान और इराक, ईरान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावशाली हो गईं। इस्लामी न्यायशास्त्र में उनका सबसे मूल्यवान योगदान कानूनी तर्क की एक विधि, इस्तिदलाल की नींव रखना था। उन्होंने कानून के स्रोतों के रूप में इस्तिहसन (न्यायिक वरीयता) और इस्तिसलाह (सार्वजनिक हित) के अनुप्रयोग को अस्वीकार कर दिया। कुरान, रीति-रिवाजों और सुन्ना के बाद ही स्रोत के रूप में क़ियास पर ज़ोर दिया गया। स्कूल की सबसे बड़ी कमी महिलाओं के विवाह करने का अधिकार था, जो कि उनके वयस्क होने के बाद भी उनके अभिभावक की सहमति के अधीन था। शफी स्कूल कुरान और सुन्ना के सिद्धांतों और शिक्षाओं पर मुख्य जोर देते हैं, जो पैगंबर मुहम्मद द्वारा दिए गए थे। इस स्कूल को सीमित लचीलेपन और क्षेत्रीय विविधताओं के मुद्दों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। इस स्कूल के अनुसार, न्यायविदों ने इज्मा को मुस्लिम कानून का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना। मुस्लिम कानून में इस स्कूल का मुख्य योगदान क़ियास और सादृश्यता (एनालॉजी) का था।

हनबली स्कूल (780 ई.-855 ई.) 

इमाम अबू अब्दुल्ला अहमद इब्न मुहम्मद हनबल इस स्कूल के संस्थापक थे, जिसकी स्थापना 9वीं शताब्दी की शुरुआत में हुई थी। हनबल को परंपरावादी माना जाता था और वह परंपराओं पर बहुत ज़ोर देते थे, साथ ही हदीसों के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अटल था। स्कूल में मानवीय तार्किक तर्क (लॉजिकल रीजनिंग) पर बहुत कम ज़ोर दिया जाता है और इज्मा और क़ियास को भी कम महत्व दिया जाता है। पैगंबर के साथियों के इज्मा को तभी स्वीकार किया जाता था जब उसमें कुरान और सुन्नत के साथ कोई विरोधाभास न हो। स्कूल के अनुयायी सऊदी अरब और कतर में मौजूद हैं। 

शिया स्कूल

इमामिया स्कूल 

इस स्कूल को ” इथना अशरीस” के नाम से भी जाना जाता है। अरबी में ‘इमामिया’ शब्द का अर्थ बारह वर्ष का होता है। इसके 12 इमाम थे। यह स्कूल एकमात्र ऐसा स्कूल है जो ‘मुता’ विवाह या ‘अस्थायी विवाह’ की अनुमति देता है। इस विचारधारा को आगे अखबारी और उसुली में विभाजित किया गया है। अखबारी धर्म के उत्साही अनुयायी हैं और उसुली कुरान के सिद्धांतों को जीवन की यथार्थवादी अराजकता (रियलिस्टिक क्याेस) में लागू करते हैं। शिया इस स्कूल में बहुसंख्यक हैं। स्कूल के अनुयायी मुख्य रूप से ईरान, इराक, पाकिस्तान और भारत में पाए जाते हैं। इस स्कूल को शिया मुस्लिम समुदाय में सबसे प्रभावशाली स्कूल माना जाता है। “इथना अशरीस” स्कूल का पालन करने वाले लोगों का मानना था कि अंतिम इमाम गायब हो गए थे और मेहदी (मसीहा) के रूप में वापस आ रहे थे। यह स्कूल दो मुख्य उप-संप्रदायों में विभाजित था: 

  1. अखबारी : ये बहुत रूढ़िवादी माने जाते थे और वे सभी रीति-रिवाजों का कठोर और ठोस तरीके से पालन करते थे।
  2. उसुली : उसुली को दैनिक जीवन की वास्तविक समस्याओं के संबंध में कुरान के पाठ के दुभाषिया (इंटरप्रेटर) और व्याख्याकार माना जाता था। दूसरे शब्दों में, यह स्कूल कुरान की शिक्षाओं और सिद्धांतों की व्यावहारिक व्याख्या करता है।

इस्माइलिया स्कूल

इमाम जाफ़र के निधन के बाद स्कूल की स्थापना हुई, जब अल्पसंख्यकों ने मूसा-अल-काज़िम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इस्माइल का अनुसरण करना शुरू कर दिया। ‘सबिया’ या सेवनर्स नाम केवल सात इमामों को स्वीकार करने के लिए है। उन्हें आगे खोजा और बोहरा में विभाजित किया गया है। बॉम्बे के इस्माइलिया (मुंबई, भारत में एक इस्लामी संस्था) या तो खोजा या बोहरा हैं। खोजा वे लोग हैं जो आगा खान को 49वां इमाम मानते थे और बोहरा मुख्य रूप से व्यापारी हैं। मिस्र में फ़ातिमी शासन में स्कूल का प्रचलन देखा गया और यह दक्षिण अरब, सीरिया, पाकिस्तान, मध्य एशिया और पूर्वी अफ़्रीका में प्रचलित है। इस्माइली न्यायशास्त्र कुरान और हदीस से प्राप्त सिद्धांतों पर ज़ोर देकर अपने कानूनी और नैतिक प्रथाओं का मार्गदर्शन करता है। इमामत के नेतृत्व में, विशेष रूप से आगा खान विकास नेटवर्क के माध्यम से, इस्माइली नैतिक रूप से पूरे मुस्लिम समुदाय में शिक्षा, सामाजिक कल्याण, समाजवाद और सतत विकास को बढ़ावा देते हैं। इस स्कूल का एक अनूठा पहलू यह था कि इसके सिद्धांतों में सुन्नत के कुछ दर्शन भी शामिल थे। इस्माइलिया स्कूल के महत्वपूर्ण मामलों में से एक है आयकर आयुक्त-III (एस) बनाम दाऊदी बोहरा मस्जिद और कब्रिस्तान (2011)। यह मामला संपत्ति के स्वामित्व और विरासत पर दाऊदी संपत्ति कानून के तहत विवादों को हल करने के बारे में है, इस्माइली स्कूल के भीतर एक वर्ग, बोहरा समुदाय के भीतर विवाद को हल करने के लिए इस्लामी सिद्धांतों को लागू करना। अदालत ने इस्माइली सिद्धांतों का पालन किया। विवाद को हल करने के लिए, सुहास ने संपत्ति के स्वामित्व और विरासत से संबंधित समुदाय की अनूठी प्रथाओं और परंपराओं पर ध्यान केंद्रित किया। 

जैदिया स्कूल

चौथे इमाम के बेटों में से एक, ज़ैदी ने इस स्कूल की स्थापना की। स्कूल की खासियत यह है कि इसमें सुन्नी संप्रदाय के कुछ सिद्धांत हैं। संप्रदायों का मानना था कि चुनाव का आधार चुनाव की अवधारणा पर आधारित है और इमाम को “सही मार्गदर्शक” माना जाता है। शिया स्कूल के इस क्षेत्र को पूरे यमन में प्रमुख विचारधाराओं में से एक माना जाता था। इस स्कूल के अनुयायियों को राजनीतिक कार्यकर्ता माना जाता है। वे अक्सर बारहवीं सदी के शिया दर्शन के सिद्धांतों की अवहेलना करते हैं। यह स्कूल सुन्नी इस्लाम के तत्वों को शामिल करने के लिए उल्लेखनीय है, विशेष रूप से नेतृत्व और शासन के प्रति इसके दृष्टिकोण में, जहाँ इमाम को चुनाव के सिद्धांतों के अनुसार चुना जाता है और उसे “सही मार्गदर्शित” नेता के रूप में देखा जाता है। ऐतिहासिक रूप से, यमन में केंद्रित, इस स्कूल ने क्षेत्र की राजनीतिक और धार्मिक गतिशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज के ज़ैदी समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान और मान्यताओं को बनाए रखते हैं, समकालीन चुनौतियों का सामना करते हुए व्यापक इस्लामी दुनिया के भीतर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हैं। 

मुताज़िला संप्रदाय 

इस संप्रदाय के अनुयायी लोकप्रिय संप्रदाय की उपेक्षा करते थे और मूल रूप से शिया संप्रदाय के भगोड़े थे। अता-अल-ग़ज़ल इस स्कूल के संस्थापक थे। आमतौर पर, इस स्कूल के अनुयायी अल्पसंख्यक समूहों में पाए जाते हैं और ईरान में पाए जा सकते हैं। क़ुरानिस्ट, या “अल-क़ुरानिया”, का मानना है कि कुरान धार्मिक मार्गदर्शन और कानून का एकमात्र स्रोत है, जो ‘हदीस’ और ‘सुन्नत’ के अधिकार को अस्वीकार करता है। उनका तर्क है कि कुरान अपने आप में पूर्ण और स्पष्ट है। इस आंदोलन में अपने समय में विभिन्न हस्तियाँ शामिल हुई हैं और यह ईरान सहित कई देशों में मौजूद है, जहाँ वे आम तौर पर अल्पसंख्यक हैं। वे हदीस को धार्मिक अधिकार के स्रोत के रूप में स्वीकार न करके मुख्यधारा के सुन्नी और शिया मुसलमानों से अलग हैं। इस स्कूल की शुरुआत मामून के शासनकाल के दौरान हुई थी। इस संप्रदाय के उपासकों का मानना है कि वे शिया और सुन्नी समुदायों से असहमत थे। कुरान उनके सिद्धांतों का एकमात्र आधार है। यह स्कूल आम तौर पर उन प्रथाओं का पालन करता है, जो एक दूसरे से काफी भिन्न हो सकती हैं, लेकिन प्रत्येक प्रथा के पीछे का उद्देश्य एक ही सत्य और उसकी शिक्षाओं में विश्वास रखना है।

प्रमुख सुन्नी और शिया संप्रदायों के अलावा, इस्लामी कानून के भीतर कई अन्य स्कूल भी हैं। इबादी स्कूल कुरान को अधिक प्राथमिकता देता है और वे सुन्नत को अधिक महत्व नहीं देते हैं। इस स्कूल के अनुयायी ओमान में हैं। इस स्कूल के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक यह है कि कुरान के अलावा, इसने इज्तिहाद (व्यक्तिगत तर्क) को मुख्य रूप से महत्व दिया है, जिसे सुन्नियों ने आंशिक रूप से स्वीकार किया है और शियाओं ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। सूफीवाद, इस्लाम का एक रहस्यमय आयाम है, जो ध्यान और जप जैसे आध्यात्मिक प्रथाों के माध्यम से ईश्वर के व्यक्तिगत अनुभव की तलाश करता है, जिसकी तुर्की, ईरान, दक्षिण एशिया, उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया में महत्वपूर्ण उपस्थिति है। जबकि सभी इबादियों ने ऐतिहासिक रूप से सूफीवाद को खारिज कर दिया, कुछ इबादी विद्वानों ने कुछ रहस्यमय तत्वों को शामिल किया, हालांकि यह इस्लाम के भीतर विवादास्पद है जो प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव पर जोर देता है, इबादी इस्लाम के अधिक कानूनी और धार्मिक अभिविन्यास (ओरियंटेशन) के विपरीत।

भारत में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद द्वारा 19वीं शताब्दी में स्थापित अहमदिया आंदोलन, इस्लाम की शांतिपूर्ण व्याख्या पर ज़ोर देता है और अहमद को वादा किए गए मसीहा और महदी के रूप में देखता है। यह आंदोलन नैतिक सुधार और इस्लाम के वैश्विक प्रचार को बढ़ावा देता है, मानवाधिकारों और सहिष्णुता (टॉलरेंस) की वकालत करता है। इसकी एक मज़बूत तंत्र परंपरा है और यह 210 से ज़्यादा देशों में फैल चुका है, जिसके लगभग 10-20 अनुयायी हैं। समुदाय वर्तमान में मिर्ज़ा मसरूर अहमद के नेतृत्व में एक खिलाफ़त प्रणाली के तहत संगठित है। अहमद की शिक्षाओं में पैगम्बरत्व की निरंतरता में विश्वास शामिल है, जो मुख्यधारा के मुसलमानों के बीच विवादास्पद है।

संविधान-पूर्व और संविधान-पश्चात युग में इस्लाम का विकास

भारत में संविधान से पहले और बाद के युगों में इस्लाम के विकास को विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी कारकों द्वारा आकार दिया गया है। मुगल शासन के दौरान, इस्लाम फला-फूला, और व्यक्तिगत कानूनों को समाज के व्यापक वर्ग में प्रचारित किया गया। ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में न्याय, समानता और अच्छे नैतिक ज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित एक नई कानूनी प्रणाली की शुरुआत हुई। भारत में इस्लाम का विकास एक सतत और क्रमिक प्रक्रिया रही है, जो कई ऐतिहासिक, सामाजिक और कानूनी कारकों से प्रभावित है। इस्लामी कानून के संविधान से पहले और बाद के काल की चर्चा नीचे की गई है। 

संविधान-पूर्व युग 

मुगलों के समय में इस्लाम फला-फूला, उनके निजी कानूनों का समाज के व्यापक वर्ग में प्रचार-प्रसार किया गया। हालाँकि, हमारे लिए यह निराशाजनक था कि इस्लाम के नाम पर गैर-मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न भी मुगल शासनकाल के दौरान लोगों द्वारा सामना की जाने वाली एक कठोर वास्तविकता थी। चार्ल्स द्वितीय के शासनकाल के दौरान 1661 के चार्टर ने कंपनी को ब्रिटिश साम्राज्य के कानूनों के अनुसार न्याय के प्रशासन में अपने नियंत्रण में कुछ स्थानों पर प्रशासन करने के लिए अधिकृत किया। आधिपत्य (हेगमोनिक) के दावों ने भारतीय जीवन के सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी विभिन्न पहलुओं को प्रभावित किया। शासन के दौरान शिक्षित लोगों का एक नया वर्ग बनाया गया, जिसने तर्क और अवलोकन के इस्लामी सिद्धांतों को कमजोर कर दिया। इससे धर्मतंत्र के मोर्चे पर इस्लामी प्रभाव में गिरावट आई। ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय कानूनी प्रणाली में बदलाव आया और इसके साथ ही निजी कानून भी बदल गए। ये परिवर्तन भारत को न्याय, समानता और अच्छे विवेक के सिद्धांतों पर आधारित प्रणाली विकसित करने में काफी हद तक सहायक थे। कई कारणों से, अंग्रेजों ने सीधे इस्लामी कानूनों को बदलने में भाग नहीं लिया।

संविधान-पूर्व युग को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है: 

  1. प्रारंभिक प्रसार और स्थापना 
  2. क्षेत्रीय विविधताएँ 
  3. सामाजिक राजनीतिक संरचनाएं

प्रारंभिक प्रसार और स्थापना 

आधुनिक काल के आरंभ में, ओटोमन तुर्की, तिमुरीद साम्राज्य, मुगल भारत और सफ़विद ईरान जैसे राज्य वैश्विक शक्तियों के रूप में उभरे। हालाँकि, 19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक, मुस्लिम दुनिया का अधिकांश हिस्सा यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभाव या नियंत्रण में आ गया। तब से स्वतंत्रता प्राप्त करने और आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की स्थापना के प्रयासों ने कश्मीर, फिलिस्तीन, झिंजियांग, मध्य अफ्रीका, बोस्निया, चेचन्या और म्यांमार जैसे क्षेत्रों में निरंतर संघर्षों को जन्म दिया है। इसके अलावा, तेल उछाल ने खाड़ी सहयोग परिषद के राज्यों को पूंजीवाद, पर्यटन और मुक्त व्यापार पर ध्यान केंद्रित करते हुए प्रमुख वैश्विक तेल उत्पादकों और निर्यातकों के रूप में आगे बढ़ाया। 

मुस्लिम कानूनों का विकास मुस्लिम बहुल (मेजॉरिटी) क्षेत्रों में राजनीतिक परिवर्तनों, वैश्वीकरण के रुझानों (ग्लोबलाइजेशन ट्रेंड्स) और आर्थिक परिवर्तनों से व्यापक रूप से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, जीसीसी राज्यों द्वारा भागीदारी और मुक्त व्यापार समझौतों ने शरिया सिद्धांतों के तहत कानूनी सामंजस्य और व्यावसायिक प्रथाओं के मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) को बढ़ावा दिया है। यह एकीकरण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विनियमों और आर्थिक एकीकरण को समायोजित करने और समेकित (कंसोलिडेटेड) करने के लिए इस्लामी कानूनी ढांचे के अनुकूलन पर प्रकाश डालता है। कुल मिलाकर, ये गतिशीलता दर्शाती है कि कैसे समकालीन भू-राजनीतिक और आर्थिक रुझान मुस्लिम कानूनों के चल रहे विकास को आकार देते हैं, जिससे इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हुए वैश्विक चुनौतियों का जवाब दिया जाता है।

खिलाफत की भूमिका 

खलीफाओं, यानी रशीदुन, उमय्यद और अब्बासिद खलीफाओं ने मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में इस्लाम के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके नेतृत्व में, इस्लाम सांस्कृतिक प्रभाव, विजय और व्यापार मार्गों के माध्यम से फैला। पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद स्थापित रशीदुन खलीफा ने अबू बकर, उमर उथमान और अली जैसे खलीफाओं के तहत तेजी से विस्तार देखा। 

मुआविया द्वारा स्थापित उमय्यद खलीफा ने स्पेन, मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम शासन को आगे बढ़ाया। इसके अलावा, अब्बासिद खलीफा, जिसे आमतौर पर इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान सांस्कृतिक और वैज्ञानिक व्यवस्थाओं के लिए जाना जाता है, इसने इस्लाम को गणित, चिकित्सा और खगोल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में समेकित किया। सामूहिक रूप से, इन खलीफाओं ने इस्लाम के शुरुआती प्रसार और स्थापना को आकार दिया, जिससे वैश्विक इतिहास और सभ्यता पर एक स्थायी प्रभाव पड़ा। इस युग के दौरान सांस्कृतिक और वैज्ञानिक योगदान अत्यंतः महत्वपूर्ण था। 8वीं से 14वीं शताब्दी तक की अवधि को विज्ञान, चिकित्सा और साहित्य के लिए स्वर्ण युग माना जाता था, जिसमें इस्लामी कानून के विद्वानों का महत्वपूर्ण योगदान था।

क्षेत्रीय विविधताएँ 

8वीं शताब्दी में, मुस्लिम सेनाओं ने मिस्र पर विजय प्राप्त की और उत्तरी अफ्रीका में फैल गईं। उमय्यद और अब्बासिद खलीफाओं ने इस क्षेत्र में नियंत्रण मजबूत किया और व्यापार और सांस्कृतिक विस्तार के माध्यम से इस्लाम के प्रसार को सुगम बनाया। 711 ई. में, मुस्लिम सेनाएँ स्पेन में घुस गईं, जिससे अल-अंडालस की अवधि शुरू हुई। 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लास्ट) में रिकोनक्विस्टा तक कॉर्डोबा जैसे शहर शिक्षा के केंद्र बन गए। इसके अलावा, 7वीं और 8वीं शताब्दी के दौरान सैन्य विजय और व्यापार के समर्थन के माध्यम से इस्लाम फारसी साम्राज्य और मध्य एशिया में भी फैल गया, जिससे फारसी संस्कृति और इस्लामी प्रथाओं का एक महत्वपूर्ण विलय (मर्जर) हुआ। 

भारतीय उपमहाद्वीप में, 8वीं शताब्दी की शुरुआत में पहला हमला उमय्यद खलीफा द्वारा किया गया था, विशेष रूप से मोहम्मद बिन कासिम के अधीन। 1206 ई. में स्थापित दिल्ली सल्तनत और 1526 ई. में स्थापित मुगल साम्राज्य बाद में आए और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और स्थापत्य (आर्किटेक्चरल) विकास को बढ़ावा देने में सहायक रहे। इसके अलावा, दक्षिण-पूर्व एशिया में, इस्लाम 13वीं और 15वीं शताब्दी में व्यापार और विस्तार के माध्यम से फैला, जिसके कारण इंडोनेशिया, दक्षिणी फिलीपींस और मलेशिया में एक महत्वपूर्ण मुस्लिम आबादी बन गई। उप-सहारा अफ्रीका ने 8वीं से 12वीं शताब्दी तक इस्लाम का प्रसार और विस्तार देखा। माली और शोंगहाई के पश्चिम-अफ्रीकी साम्राज्यों ने इस्लाम को अपनाया और टिम्बकटू जैसे शिक्षा के केंद्र स्थापित किए। ओटोमन साम्राज्य (14वीं-20वीं शताब्दी) ने बाल्कन और ग्रीस सहित पूर्व यूरोप में इस्लामी शासन और संस्कृति का प्रसार किया। इस विस्तार को सुविधाजनक बनाने वाले प्रमुख कारकों में व्यापार मार्ग, सैन्य विजय और सांस्कृतिक एकीकरण शामिल थे।

संविधान-पश्चात युग

संविधान के बाद के इस्लामी कानून के युग में कई बदलाव और विकास हुए, जो औपनिवेशिक युग से निरंतरता और बदलाव दोनों के लिए चिह्नित थे। इस्लामी कानून को पश्चिमी कानूनी अवधारणाओं के साथ समेटने के कई प्रयास हुए, लेकिन संबंध जटिल रहे। उत्तर-औपनिवेशिक राज्य संप्रभुता राजनीतिक अधिकारियों और न्यायविदों के बीच पूर्व-औपनिवेशिक संतुलन के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित थी, जिससे राज्य सियासत को शरिया सीमाओं से मुक्त होकर काम करने की अनुमति मिली। सियासत की अवधारणा महत्वपूर्ण हो गई, जिससे सरकारों को पारंपरिक शरिया सीमाओं से परे न्यायिक और कानूनी नियंत्रण का विस्तार करने की अनुमति मिली। इसके अलावा, कानूनी बहुलवाद उभरा, जिसमें इस्लामी कानून सिविल और रीति रिवाजगत कानूनों के साथ-साथ मौजूद थे, खासकर पारिवारिक और व्यक्तिगत स्थिति के मामलों में। हालाँकि, न्यायिक सुधार अलग-अलग थे, कुछ देशों ने इस्लामी सिद्धांतों पर जोर दिया और अन्य ने अधिक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) स्थिति बनाए रखी। यह युग आधुनिक शासन में लैंगिक समानता, मानवाधिकारों और इस्लामी कानून पर बहस से आकार ले रहा है, जो धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष कानूनी सिद्धांतों के बीच जटिल और विकसित होते संबंधों को उजागर करता है। स्वतंत्रता के बाद, विभिन्न धर्मों के सभी व्यक्तिगत कानूनों को समान नागरिक संहिता के बैनर तले एकीकृत करने का प्रयास किया गया। संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति के अनुरूप व्यक्तिगत कानूनों को संरेखित करने और समाज की सामान्य जरूरतों से सदियों पुराने कानूनों को समाप्त करने के प्रयास में, भारत के संविधान में अनुच्छेद 25 डाला गया था, जो किसी भी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। केंद्र और राज्य सरकारों ने व्यक्तिगत कानूनों में सुधार करने का प्रयास किया लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों से महत्वपूर्ण आंदोलन का सामना करना पड़ा। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) (केरल संशोधन) अधिनियम, 1963, मेघालय मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 1974, जम्मू और कश्मीर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 2007” ऐसे कुछ कानून हैं जो इस दिशा में एक कदम थे। मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 कानून को अक्षरशः (लेटर) लागू किया गया था लेकिन कोई महत्वपूर्ण बदलाव लाने में विफल रहा। मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 कानून तलाक के बाद महिलाओं को रखरखाव प्रदान करने में विफल रहा।

मुस्लिम कानून में प्रमुख प्रथाएँ 

यह शीर्षक मुस्लिम कानून की प्रमुख प्रथाओं तीन तलाक, हलाला और भरण-पोषण से संबंधित है। मुस्लिम कानून की इन प्रथाओं का भारत में मुसलमानों के व्यक्तिगत और कानूनी जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मुस्लिम कानून के संविधान-पूर्व युग में निम्नलिखित प्रथाओं का विकास हुआ, जैसे कि तीन तलाक, जिसे शरीयत अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 के माध्यम से संविधान-पूर्व युग के दौरान विकसित किया गया था। यह अधिनियम भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों पर लागू हुआ, जिसमें तीन तलाक जैसी प्रथाओं को मुस्लिम कानून का हिस्सा माना गया। 

तीन तलाक 

प्राचीन काल के लगभग सभी देशों में, तलाक को वैवाहिक अधिकारों का एक स्वाभाविक परिणाम माना जाता था। रोमन, हिब्रू, इजराइली, आदि सभी में एक या दूसरे रूप में तलाक था। हालाँकि तलाक के प्रावधान को सभी धर्मों में मान्यता प्राप्त है, लेकिन इस्लाम शायद दुनिया का पहला धर्म है जिसने तलाक के माध्यम से विवाह को समाप्त करने को स्पष्ट रूप से मान्यता दी है। इंग्लैंड में, तलाक की शुरुआत केवल 100 साल पहले हुई थी। भारत में, हिंदुओं के बीच, इसे केवल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 द्वारा अनुमति दी गई थी। अधिनियम के पारित होने से पहले, हिंदू कानून द्वारा तलाक को मान्यता नहीं दी गई थी। 

अमीर अली के अनुसार, पैगम्बर मोहम्मद के सुधारों ने पूर्वी कानून के इतिहास में एक नया मोड़ दिया। पैगम्बर मोहम्मद ने तलाक की शक्ति पर रोक लगाई और महिलाओं को उचित आधार पर अलग होने का अधिकार दिया। पैगम्बर ने कहा है, “अगर किसी महिला को शादी से कोई पूर्वाग्रह है, तो उसे शादी तोड़ देनी चाहिए।”

हालाँकि, विवाह विच्छेद और तलाक में अंतर है। तलाक शब्द का इस्तेमाल दो अर्थों में किया जाता है 

  • सीमित अर्थ : यह पति द्वारा कुछ उपयुक्त शब्दों के प्रयोग से होने वाले अलगाव तक सीमित है। 
  • व्यापक अर्थ : इस श्रेणी में पति से उत्पन्न कारणों से होने वाले सभी अलगाव शामिल हैं। 

तीन तलाक, जिसे “तलाक-ए-बिदत” के नाम से भी जाना जाता है, उस प्रथा को संदर्भित करता है, जहां एक पति अपनी पत्नी को तीन बार एकसाथ तलाक कहकर तलाक दे सकता है। इस प्रथा की जड़ें इस्लामी न्यायशास्त्र में हैं और यह विद्वानों के बीच बहस का विषय रही है। यह प्रथा कुरान और हदीस से ली गई है, जहाँ तलाक की अनुमति है लेकिन इसे नियंत्रित किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से, विभिन्न इस्लामी विचारधाराओं (हनफ़ी, मालिकी, शफीई और हनबली) ने तलाक से जुड़े नियमों की अलग-अलग और भिन्न व्याख्या की है, जिसके कारण समय के साथ भिन्नताएं और प्रथाएं आई हैं। जहां तक भारत में न्यायपालिका का सवाल है, उसने अब तक, कुछ अपवादों को छोड़कर, तीन तलाक को बर्दाश्त किया है। पाठ्यक्रमों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला सामान्य वाक्यांश यह है कि तलाक-ए-बिदत।

तीन तलाक को भारतीय न्यायपालिका द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसका समर्थन किया जाता है। साराबाई बनाम रबियाबाई (1905) में मुंबई उच्च न्यायालय ने तीन तलाक और साथ ही अपरिवर्तनीय आधार को मान्यता दी। हाजी आदम सिद्दीकी पर भारतीय स्टैंड मामला, दो गवाहों के साथ, काजी के पास गया और उसके सामने, उसने अपनी पत्नी की अनुपस्थिति में तलाक सुना दिया। काजी द्वारा तलाकनामा तैयार किया गया और उसी पॉली पर सभी संबंधितों द्वारा हस्ताक्षर किए गए, तलाक के संचार के साथ उसे इद्दत भत्ता सौंपने के लिए कदम उठाए गए। लेकिन वह ऐसा करने में कामयाब रही। हाजी आदम की बहुत जल्द मृत्यु हो गई। उनकी तलाकशुदा पत्नी ने खुद को हाजी आदम की पत्नी मानते हुए भरण-पोषण और निवास के लिए मुकदमा दायर किया, लेकिन मुंबई उच्च न्यायालय ने उनकी दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उपर्युक्त संदर्भित तलाक को अपरिवर्तनीय आधार पर माना गया। इसी तरह, सैय्यदा रशीद अहमद बनाम एमएसटी. अनीसा खातून (1931) में प्रिवी काउंसिल ने तीन तलाक को वैध रूप से प्रभावी माना।

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती नाजिया बेगम बनाम शोएब अहमद (2019) मामले में कहा कि मुस्लिम पति द्वारा तीन बार तलाक कहकर तलाक देना उस समय संभव है जब उसकी पत्नी वहां मौजूद नहीं थी। पति ने गवाहों की व्यवस्था की और अपनी पत्नी को पत्र के माध्यम से बताया कि तलाक, तलाक, तलाक कहने के बाद उसे तलाक दे दिया गया है। 

शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) मामले में, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (2017) द्वारा बरकरार रखा गया था, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रथा को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। न्यायालय ने लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।

हलाला

निकाह हलाला, इस्लामी कानून में निहित है, इस्लाम में एक विवादास्पद प्रथा है जिसके तहत तीन तलाक से तलाक होने के बाद एक महिला को दूसरे पुरुष से शादी करनी होती है, शादी को पूरा करना होता है और फिर अपने पूर्व पति से दोबारा शादी करने के लिए तलाक लेना होता है। यह प्रथा कुरान की आयतों से ली गई है जो तलाक की प्रक्रियाओं को रेखांकित करती हैं, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि तीन तलाक के बाद, एक महिला अपने पति के पास तब तक नहीं लौट सकती जब तक कि वह पहले किसी दूसरे पुरुष से शादी न कर ले। ऐतिहासिक रूप से, इसका उद्देश्य आवेगपूर्ण (इंपल्सिव) विवाह विच्छेदन को रोकना और यह सुनिश्चित करना था कि विवाह को गंभीरता से लिया जाए, लेकिन यह एक विवादास्पद प्रथा बन गई है जो समकालीन समाज में महिलाओं के अधिकारों और स्वायत्तता (ऑटोनोमी) के बारे में महत्वपूर्ण नैतिक चिंताओं को जन्म देती है। 

इस्लामी कानून के अनुसार, एक पति अपनी पत्नी को केवल तलाक़ घोषित करके तलाक़ दे सकता है। तलाक़ की प्रारंभिक घोषणा प्रतीक्षा अवधि (इद्दत) के दौरान रद्द की जा सकती है, जो तीन मासिक धर्म चक्रों तक चलती है। यदि पति तीसरी बार अपनी पत्नी को अस्वीकार करता है, तो यह एक अपरिवर्तनीय “प्रमुख” तलाक़ को जन्म देता है, जिसके बाद दंपत्ति किसी अन्य व्यक्ति से पत्नी द्वारा विवाह किए बिना दोबारा विवाह नहीं कर सकते। 

इस तरह के बीच के विवाह को निकाह हलाला या तहलील विवाह कहा जाता है। हालाँकि, हदीस में संकेत मिलता है कि तलाक के इरादे से तहलील विवाह में प्रवेश करना ताकि मूल पति-पत्नी फिर से शादी कर सकें, यह हराम है। 

निकाह हलाला का इस्तेमाल आमतौर पर मुस्लिम समुदाय के छोटे अल्पसंख्यक समूहों द्वारा किया जाता है, मुख्य रूप से पाकिस्तान, भारत और ईरान जैसे देशों में। निकाह हलाला को रद्द करने की मांग करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर की गई हैं क्योंकि इसे मुस्लिम महिलाओं के समानता, गैर-भेदभाव और सम्मान के अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। ऑल इंडिया मुस्लिम व्यक्तिगत कानून बोर्ड निकाह हलाला का विरोध करता है और उसे लगता है कि इसका उपयोग “दुर्लभतम परिस्थितियों” तक ही सीमित होना चाहिए। 

समीना बेगम बनाम भारत संघ (2018) में, निकाह हलाला और बहुविवाह की प्रथा को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि वे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इन प्रथाओं के संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अन्य निकायों को नोटिस जारी किए।

भरण-पोषण

भरण-पोषण का अर्थ है भोजन, आवास और आजीविका के लिए अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति। ‘भरण-पोषण का कर्तव्य’ एक दायित्व है जिसके तहत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को भोजन, आवास, कपड़े आदि प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है। इस्लाम से पहले के अरब में, माता-पिता की ओर से अपने बच्चों का भरण-पोषण करने की कोई बाध्यता नहीं थी। इसी तरह, बच्चे भी अपने बुज़ुर्ग और बीमार माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य नहीं थे। मुस्लिम कानून में भरण-पोषण, जिसे ” नफ़्का” कहा जाता है, इसमें वह वित्तीय सहायता शामिल है जो एक पति अपनी पत्नी, बच्चों और अन्य आश्रितों को प्रदान करने के लिए बाध्य होता है। मुस्लिम कानून के तहत, एक व्यक्ति को निम्नलिखित आधार पर दूसरे व्यक्ति द्वारा भरण-पोषण पाने का अधिकार हो सकता है: 

  1. विवाह 
  2. रक्त संबंध

विवाह के कारण पत्नी को अपने पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है और यह अधिकार पूर्ण है; पति पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है, चाहे उसे इसकी आवश्यकता हो या न हो। भरण-पोषण पाने के हकदार व्यक्तियों की दूसरी श्रेणी में रक्त-संबंधी शामिल हैं, जिनमें छोटे बच्चे, जरूरतमंद माता-पिता और निषिद्ध डिग्री वाले अन्य रिश्तेदार शामिल हैं। इस प्रकार, मुस्लिम कानून के तहत, निम्नलिखित व्यक्ति भरण-पोषण पाने के हकदार हैं: 

  1. पत्नी, 
  2. छोटे बच्चे,
  3. आवश्यक माता-पिता और 
  4. निषिद्ध डिग्री के भीतर अन्य आवश्यक संबंध।

ऐतिहासिक रूप से, यह दायित्व कुरान के सिद्धांतों पर आधारित है, जो भोजन, कपड़े और आश्रय सहित अपने परिवार के भरण-पोषण को सुनिश्चित करने के लिए पति के कर्तव्य पर जोर देता है। 

कानूनी ढांचे में प्रमुख विकासों में  मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो मामला (1985) शामिल है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला ‘इद्दाह’ अवधि से परे भरण-पोषण की हकदार है यदि वह खुद की सुरक्षा करने में असमर्थ है। इसके परिणामस्वरूप मुस्लिम महिला (तलाक में अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 को लागू किया गया, जिसने भरण-पोषण दायित्वों को ‘इद्दाह’ अवधि तक सीमित कर दिया, लेकिन अगर आगे समर्थन की आवश्यकता हो तो वक्फ बोर्ड के रिश्तेदारों से दावे की अनुमति दी। डैनियल लतीफी और अन्य बनाम भारत संघ (2001) ने पुष्टि की कि पतियों को ‘इद्दाह’ से परे उचित भरण-पोषण प्रदान करना चाहिए, जो मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में महिलाओं के अधिकारों और चल रही कानूनी बहस को उजागर करता है। 

यह जानना महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार का निर्धारण न केवल व्यक्तिगत कानून के तहत बल्कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भी किया जाता है। इस अधिनियम के तहत भरण-पोषण के लिए पत्नी का दावा एक स्वतंत्र वैधानिक अधिकार है और यह उसके व्यक्तिगत कानून से प्रभावित नहीं होता है। 

एक ऐतिहासिक मामले, बेगम सुबानू उर्फ सायरा बानो बनाम एएम अब्दुल गफूर (1987) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि एक मुस्लिम पति के दूसरे विवाह के अनुबंध के अधिकार के बावजूद, उसकी पहली पत्नी भरण-पोषण का दावा करने की हकदार होगी। इस मामले में, पति ने दूसरी पत्नी से शादी की और पहली पत्नी घर छोड़कर अलग रहने लगी। अलग रहते हुए, उसने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा किया। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (3) के स्पष्टीकरण के प्रावधानों पर विस्तार से बताते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उपेक्षित पत्नी के दृष्टिकोण से, उन लाभों के लिए जो स्पष्टीकरण प्रदान किया गया है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि अपने पति के वैवाहिक जीवन में दखल देने वाली महिला कानून के तहत शादी करने की अनुमति वाली दूसरी पत्नी है और रखैल नहीं है। अदालत ने माना और कहा कि स्पष्टीकरण को पत्नी के वैवाहिक अधिकारों पर चोट के दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए, न कि पति के दोबारा शादी करने के अधिकार के संबंध में।

हाल ही में मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य (2024) के मामले में यह स्थापित किया गया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए भरण-पोषण का मामला 10 जुलाई, 2024 को सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले से आकार ले चुका है। अदालत ने पुष्टि की कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं, जिससे उनके अधिकारों को इद्दत अवधि से आगे बढ़ाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में इस बात पर जोर दिया गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के प्रावधान व्यक्तिगत कानूनों की परवाह किए बिना सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं और मुस्लिमों सहित सभी विवाहित महिलाओं के लिए भरण-पोषण के अधिकारों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करते हैं। 

ऑल इंडिया मुस्लिम व्यक्तिगत कानून बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने इस फैसले को चुनौती देने की योजना बनाई है और तर्क दिया है कि यह इस्लामी कानून के विपरीत है, जो पारंपरिक रूप से भरण-पोषण दायित्वों को ‘इद्दत अवधि’ तक सीमित करता है। 

निष्कर्ष

इस्लाम का उज्ज्वल वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) आध्यात्मिकता, धर्म और एकेश्वरवादी प्रकृति की समृद्धि को दर्शाता है। जब हमने कुरान के रूप में इसकी उत्पत्ति का पता लगाया, तो हमने खुद को बहुत सारे रहस्योद्घाटनों से समृद्ध किया, जहाँ ईश्वर ने मनुष्यों को आत्म-अनुशासन, पवित्रता और ईश्वर के साथ एकता के लिए अनुसरण करने का मार्ग दिया। पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद विभिन्न विचारधाराओं में हुए विकास ने हमें कुरान के सिद्धांतों पर विकसित विचारों की स्वतंत्र प्रकृति दिखाई। हदीस, शरिया कानून और फ़िक़्ह द्वारा निभाई गई भूमिका ने भी इस्लाम को पुरातन अल्पविकसित विचार प्रक्रिया से बचाकर इसके विकास पर सकारात्मक प्रभाव डाला। समय की रेत के साथ तालमेल रखने के लिए बहुत कुछ किया गया है, और न्यायपालिका भी इस्लामी कानूनों को भारत के संविधान के अनुरूप लाने की कोशिश कर रही है, जिसे शाह बानो और शायरा बानो के मामलों के माध्यम से देखा जा सकता है। शरिया कुरान और पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं के साथ 7वीं शताब्दी से शुरू हुआ, जो विद्वानों की व्याख्याओं के माध्यम से विकसित हुआ। इसके अलावा, हनफ़ी, मालिकी और शफ़ी जैसे प्रमुख विचारधाराओं ने इस्लामी कानून पर विविध दृष्टिकोण प्रदान किए। समय के साथ चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, शरिया मुस्लिम कानून में कानूनी और नैतिक मार्गदर्शन का एक महत्वपूर्ण घटक बना हुआ है, इसलिए समय के साथ इसके स्थायी प्रभाव और अनुकूलनशीलता (एडॉप्टिबिलिटी) को दर्शाता है। यह नैतिक आचरण को दर्शाता है, न्याय, अधिकारों और साथ ही सामाजिक कर्तव्यों पर निर्णयों को आकार देता है। शरिया निष्पक्षता और नैतिक अखंडता के इस्लामी सिद्धांतों को कायम रखते हुए बदलते संदर्भों के अनुकूल होता है, जिससे दुनिया भर के मुस्लिम समुदायों पर इसका स्थायी प्रभाव सुनिश्चित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

शरिया कानून के बारे में गलतफहमियां क्या हैं? 

शरिया कानून के बारे में आम गलतफहमियों में यह विश्वास शामिल है कि यह एक एकल, कठोर कानूनी संहिता है, जबकि वास्तव में यह एक जटिल संरचना है जिसमें विविध प्रणाली और विभिन्न व्याख्याएँ हैं। शरिया कानून की एक अन्य अवधारणा में कठोर दंड शामिल है, लेकिन इसमें नैतिक और कानूनी सिद्धांतों की एक विस्तृत श्रृंखला भी शामिल है।

इस्लामी विद्वान शरिया के माध्यम से आधुनिक मुद्दों को कैसे संबोधित करते हैं? 

इस्लामी विद्वानों ने आधुनिक विश्व से संबंधित समकालीन मुद्दों को संबोधित करने के लिए  इज्तिहाद और मकसद-अल-शरिया जैसे सिद्धांतों का उपयोग किया, जिसका उद्देश्य इस्लामी मूल्यों के साथ आदर्श प्रथाओं को संरेखित करना था।

मुस्लिम बहुल देशों में शरिया का अनुप्रयोग किस प्रकार भिन्न है? 

शरिया का अनुप्रयोग विभिन्न देशों में व्यापक है क्योंकि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारकों से प्रभावित है। कुछ देश शरिया को व्यापक रूप से लागू करते हैं, जबकि अन्य शरिया के तत्वों को धर्मनिरपेक्ष कानूनी ढांचे के भीतर चुनिंदा और विशिष्ट रूप से शामिल करते हैं। शरिया इस्लाम का नैतिक और कानूनी संहिता है, जो कुरान, हदीस और अन्य इस्लामी ग्रंथों से लिया गया है। यह अनुष्ठान, पारिवारिक जीवन, व्यवसाय, अपराध और नैतिकता सहित कई पहलुओं को कवर करता है। शरिया का अनुप्रयोग गतिशील और विविधतापूर्ण है, जो कई कारकों से प्रभावित है। जबकि कुछ देश इसे व्यापक रूप से लागू करते हैं, अन्य इसे धर्मनिरपेक्ष कानूनी ढांचे के भीतर चुनिंदा रूप से एकीकृत करते हैं। यह विविधता शौर्य के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों की अनुकूलनशीलता को दर्शाती है

मुस्लिम कानून में सादृश्यात्मक तर्क (क़ियास) कैसे कार्य करता है?

सादृश्यात्मक तर्क में मौजूदा कानूनों, जैसे कि कुरान और हदीस के साथ समानांतर और समानताएं खींचकर नई स्थितियों के लिए कानूनी निर्णय प्राप्त करना शामिल है। यह कानून प्राथमिक स्रोतों में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किए गए मुद्दों को संबोधित करने में मदद करता है। सादृश्यात्मक तर्क कुरान, हदीस और आम सहमति के साथ इस्लामी न्यायशास्त्र के चार मुख्य स्रोतों में से एक है। क़ियास का उपयोग कुरान और हदीस में पाए गए सिद्धांतों को नई स्थितियों और संदर्भों में विस्तारित करने के लिए किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इस्लामी कानून समय के साथ प्रासंगिक और लागू रहे। क़ियास की प्रक्रिया में कई चरण शामिल हैं: 

  1. मूल मामले की पहचान (एएल)
  2. नये मामले की पहचान (फार’)
  3. इल्लाह की समानता (प्रभावी कारण) 
  4. निर्णय की व्युत्पत्ति (डेरिवेशन)

संदर्भ 

 

स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन का परिचय

यह लेख Sarita Sah द्वारा लिखा गया है, जो स्किल आर्बिट्रेज से ट्रेनिंग प्रोग्राम ऑन यूसिंग एआई फॉर बिज़नेस ग्रोथ कोर्स कर रही हैं, और Koushik Chittella द्वारा संपादित किया गया है। यह लेख स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन के परिचय के बारे में चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

आधुनिक स्वास्थ्य सेवा में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीए) वह प्रक्रिया है जिसमें दवाओं, उपकरणों और चिकित्सा प्रक्रियाओं जैसे स्वास्थ्य उपकरणों का व्यवस्थित मूल्यांकन शामिल है। आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन एचटीए द्वारा चिकित्सालय में विश्लेषण किया जाता है जो मूल रूप से स्वास्थ्य के क्षेत्र में निर्णय लेने में मार्गदर्शन करने में आवश्यक भूमिका निभाते हैं। यह पत्र एचटीए का परिचय: इसके मूल मूल्य, कार्यप्रणाली और निर्णय लेने में भूमिका को प्रदान करता है। यह लेख आज भारत में एचटीए की स्थिति तथा भारत में स्वास्थ्य नीति और स्वास्थ्य अभ्यास के परिदृश्य को बदलने की इसकी आगामी क्षमता पर प्रकाश डालता है।

फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरणों, और नवीन, अधिक परिष्कृत (सोफिस्टिकेटेड) उपचार, प्रक्रियाओं या वितरण के तरीकों जैसे नए नवाचारों के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र लगातार बदल रहा है। लागत-लाभ अनुपात और इन सभी पहलुओं की सुरक्षा का गहन मूल्यांकन आवश्यक है। अधिकांश भाग के लिए, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी आकलन (एचटीए) का उद्देश्य स्वास्थ्य प्रणालियों में निर्णय निर्माताओं द्वारा कार्रवाई की जा सकने वाली जानकारी बनाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी की विशेषताओं का मूल्यांकन करना है।

इतिहास

एचटीए 1970 के दशक के दौरान अमेरिका और यूरोप में शुरू हुआ और स्वास्थ्य सेवा उद्योग के भीतर निर्णय लेने के लिए एक महत्वपूर्ण विचार बना हुआ है। नीति निर्माता, स्वास्थ्य प्रदाता और अन्य हितधारक एचटीए का उपयोग स्वास्थ्य देखभाल प्रौद्योगिकियों के मूल्यांकन और व्यापक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में उनके एकीकरण के लिए एक उपयुक्त उपकरण के रूप में कर सकते हैं। यह मूल्यांकन प्रक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण घटक रहा है क्योंकि यह देखभाल को सूचित करने के लिए संसाधन उपयोग और परिणामों पर आधारित है। इस प्रकार, यह भारत में तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करने, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेते समय दुर्लभ संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने, या नीति-निर्माण प्रक्रियाओं के आसपास साक्ष्य-आधारित बहस बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

प्रमुख घटक

एचटीए के मुख्य घटकों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • चिकित्सीय प्रभावशीलता: चिकित्सीय प्रभावशीलता एक उपचार के रूप में सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षित परिणाम देने के लिए एक स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी की क्षमता है। चिकित्सीय प्रभावशीलता एचटीए के तत्वों में से एक है, जो यह जांचता है कि क्या कोई प्रौद्योगिकी वर्तमान में उपलब्ध कराई जा रही प्रौद्योगिकी की तुलना में अच्छे स्वास्थ्य में अपेक्षित लाभ प्राप्त करती है। चिकित्सीय प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए तीन बुनियादी पद्धति डिजाइन हैं: यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स), अवलोकन अध्ययन और व्यवस्थित समीक्षा। 

उदाहरण के लिए, एक नए एंटीडायबिटिक की प्रभावशीलता यह साबित करके निर्धारित की जाएगी कि यह मानक उपचार की तुलना में कम शर्करा के स्तर (शुगर लेवल्स) को बनाए रखता है।

  • सुरक्षा: सुरक्षा एचटीए का आंतरिक घटक है। यह स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी से जुड़े संभावित जोखिमों को संदर्भित करता है। उदाहरण के लिए, मूल्यांकन प्रतिकूल घटनाओं, लंबी अवधि में सुरक्षा प्रोफ़ाइल, लाभ और जोखिम तुलना निर्धारित करता है। बहुत सारे सुरक्षा डेटा अक्सर पोस्ट-मार्केटिंग निगरानी और फार्माकोविजिलेंस की प्रणालियों के माध्यम से एकत्र किए जाते हैं, जो निगरानी करते हैं कि बाजार में पहले से ही एक बार प्रौद्योगिकियां कैसे प्रदर्शन करती हैं। 

उदाहरण के लिए, कुछ दर्द दवाओं से संबंधित कार्डियोवैस्कुलर जोखिम निगरानी थी, जिसके कारण बाजार परिसंचरण (सर्कुलेशन) से कुछ दवाओं को निलंबित कर दिया गया था।

  • लागत-प्रभावशीलता: लागत-प्रभावशीलता विश्लेषण (सीईए) में वैकल्पिक तरीकों के साथ एक निश्चित स्वास्थ्य परिणाम की लागत की तुलना करके स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के आर्थिक मूल्य का माप शामिल है जो समान परिणाम दे सकते हैं। एचटीए का यह हिस्सा कम-संसाधन सेटिंग में सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें कम से कम लागत पर बेहतर स्वास्थ्य के लिए किस हस्तक्षेप की पहचान पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 

उदाहरण के लिए, सीईए करने के लिए उपयुक्त मेट्रिक्स की कुछ महत्वपूर्ण श्रेणियाँ प्रति गुणवत्ता प्राप्त करने के मामले में लागत हैं। उदाहरण के लिए, एक नई कैंसर रोधी दवा का मूल्यांकन जीवन उत्पन्न करने की इसकी क्षमता और जीवन की गुणवत्ता को रोकने में इसकी लागत-प्रभावशीलता के आधार पर किया जा सकता है।

  • नैतिक, कानूनी और सामाजिक प्रभाव: एचटीए प्रक्रिया किसी भी स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के नैतिक, कानूनी और सामाजिक पहलुओं की जांच करती है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, पहुंच, समानता और रोगी एजेंसी के मुद्दे शामिल हैं। उदाहरण के लिए, आनुवंशिक (जेनेटिक) परीक्षण आनुवंशिक जानकारी होने के कारण गोपनीयता, सहमति या भेदभाव से संबंधित मुद्दों को उठा सकते हैं। एचटीए नई प्रौद्योगिकियों के बारे में सोचते समय सामाजिक विचारों की अनुमति देता है।

एक नई स्वास्थ्य तकनीक की शुरूआत न केवल देखभाल बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के संगठन में भी बदलाव लाती है। एचटीए उन तकनीकों का अनुसरण करता है जो स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर उनके प्रभाव के संदर्भ में स्वास्थ्य सेवा में लागू होती हैं, जो बुनियादी ढांचे की मांग, एचसीपी के प्रशिक्षण और चिकित्सीय वर्कफ़्लो के संगठन को संदर्भित करती हैं। उदाहरण के लिए, टेलीमेडिसिन सेवाओं के कार्यान्वयन का मतलब है कि उपकरण में वित्तीय निवेश, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए प्रशिक्षण और रोगियों के प्रवाह में बदलाव होना चाहिए।

पद्धतियाँ/तरीके

एचटीए के तरीकों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण: व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण एचटीए में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पद्धति बनाते हैं क्योंकि वे एक निश्चित तकनीक पर कई अध्ययनों से साक्ष्य एकत्र करते हैं। एक व्यवस्थित समीक्षा एक प्रक्रिया है जिसका उपयोग सभी प्रासंगिक शोधों की पहचान, मूल्यांकन और संश्लेषण (सिंथेसिस) में किया जाता है, जबकि एक मेटा-विश्लेषण सांख्यिकीय रूप से ऐसे अध्ययनों के परिणामों को जोड़ता है ताकि एक प्रौद्योगिकी के लिए निर्धारण का अधिक सटीक प्रभावशीलता/सुरक्षा स्तर बनाया जा सके। उदाहरण के लिए, एक नए टीके की प्रभावशीलता पर एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षणों से डेटा पूल करने के लिए किया जा सकता है।
  • आर्थिक मूल्यांकन: मूल्यांकन लागत-प्रभावशीलता विश्लेषण, लागत-उपयोगिता विश्लेषण और लागत-लाभ विश्लेषण में होता है। मूल्यांकन के इन तरीकों में, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों के आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जाता है, जिससे परिणामों के साथ लागत की तुलना की जाती है। उदाहरण के लिए, लागत प्रभावशीलता के लिए मूल्यांकन की गई स्वास्थ्य तकनीक बेहतर रोगी परिणामों के लिए अस्पतालों में रोगियों के प्रवेश को कम करने के लिए पुरानी बीमारी में लागू टेलीमेडिसिन है।
  • स्वास्थ्य परिणाम अनुसंधान: स्वास्थ्य परिणामों पर शोध स्वास्थ्य देखभाल हस्तक्षेपों के अंतिम परिणामों को मापने में मदद करता है, जिसमें जीवन की गुणवत्ता, जीवित रहने की दर और रोगी कितने संतुष्ट हैं। स्वास्थ्य देखभाल या स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के अंतिम परिणाम रोगियों और प्रदाताओं के अनुभव में कारक के लिए समायोजित किए गए हैं, यह निर्धारित करने में सहायता कर सकते हैं कि स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियां कैसे निकलती हैं। उदाहरण के लिए, विशेषज्ञ कैंसर के इलाज का मूल्यांकन इस आधार पर कर सकते हैं कि क्या यह अधिक रोगियों को जीवन की बेहतर गुणवत्ता के साथ लंबे समय तक जीने में मदद करता है। एचटीए दीर्घकालिक परिणामों और लागतों के लिए स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों का अनुकरण करने के लिए मार्कोव मॉडल और निर्णय ट्री जैसे निर्णय विश्लेषण मॉडल का उपयोग करता है। ये मॉडल भविष्यवाणी करने की कोशिश करते हैं कि वर्तमान साक्ष्य के आधार पर प्रौद्योगिकियां भविष्य को कैसे प्रभावित करेंगी। उदाहरण के लिए, हींग ने टीकाकरण से संबंधित दीर्घकालिक लाभों और लागतों की भविष्यवाणी करके मानव पेपिलोमावायरस टीकाकरण कार्यक्रमों की लागत-प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए निर्णय मॉडल का उपयोग किया।
  • वास्तविक दुनिया के साक्ष्य: वास्तविक दुनिया के साक्ष्य (आरडब्ल्यूई) पारंपरिक चिकित्सीय परीक्षण के दौरान एकत्र नहीं किए गए डेटा से प्राप्त किसी भी जानकारी को संदर्भित करता है – उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड, मानक-देखभाल रजिस्ट्रियों और विषम रूप से आयोजित अवलोकन अनुसंधान से आना। ये नियमित चिकित्सीय अभ्यास के तहत स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन पर अंतर्दृष्टि प्रदान करेंगे। उदाहरण के लिए, आरडब्ल्यूई व्यापक रूप से रोगी आबादी को प्रभावित करने में दवाओं के प्रदर्शन को समझने के लिए ऑन्कोलॉजी दवा प्रभावशीलता स्थापित करने के लिए एक सामान्य दृष्टिकोण है।

स्वास्थ्य देखभाल निर्णय लेने में एचटीए की भूमिका

स्वास्थ्य देखभाल निर्णय लेने में एचटीए की भूमिका में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • नीति निर्माता: एचटीए को स्वास्थ्य नीति निर्णयों को सूचित करने में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य-आधारित भूमिका निभाने के लिए कहा जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियां उचित मूल्य प्रदान करती हैं। नीति निर्माताओं को कुशलतापूर्वक संसाधनों का आवंटन करना चाहिए और उन हस्तक्षेपों पर मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए जो रोगी आबादी को सबसे अधिक लाभान्वित करते हैं। इसके अलावा, जहां तक सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित स्वास्थ्य प्रणालियों में इस मुद्दे का संबंध है, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • स्वास्थ्य सेवा पेशेवर: स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के लिए, एचटीए इस बारे में मार्गदर्शन प्रदान करता है कि चिकित्सा ​​अभ्यास में कौन सी प्रभावी और कुशल तकनीक शामिल की जाएगी। जब एचटीए प्रदान किया जाता है, तो चिकित्सक एक उपचार विकल्प का चयन करने में सक्षम होते हैं जो लागत और सुरक्षा पर विचार करने के बाद सर्वोत्तम परिणाम प्रदान करेगा। इस उदाहरण में सर्वोत्तम परिणामों के साथ नई शल्य (सर्जरी) चिकित्सा प्रक्रिया एक चिकित्सक को इसे लागू करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है जब ऐसे परिणाम कम लागत पर प्राप्त किए जाते हैं।
  • रोगी: एचटीए रोगियों को विभिन्न स्वास्थ्य उपचारों के फायदे और नुकसान के बारे में स्पष्ट जानकारी देकर मदद करता है। यह जानकारी उन्हें बेहतर निर्णय लेने और विभिन्न उपचार विकल्पों के मूल्य को समझने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, एक एचटीए रिपोर्ट दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले रोगियों के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि यह बताती है कि ये उपचार कितनी अच्छी तरह काम करते हैं और उनकी लागत क्या है।
  • उद्योग: एचटीए एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग दवा और चिकित्सा उपकरण कंपनियां सरकारी एजेंसियों, बीमा कंपनियों और डॉक्टरों को अपने उत्पादों का मूल्य दिखाने के लिए करती हैं। यदि एक सकारात्मक एचटीए उत्पाद बेचने और बीमा कवरेज प्राप्त करने की बेहतर संभावना की ओर जाता है, तो यही कारण है कि नए उत्पादों को बनाने में एचटीए बहुत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, कोई कंपनी जो नई दवा विकसित करती है, वह अपने एचटीए का उपयोग यह दिखाने के लिए करेगी कि उसका उत्पाद समान लागत वाली अन्य दवाओं की तुलना में बेहतर काम कर सकता है।
  • स्वास्थ्य बीमाकर्ता: स्वास्थ्य बीमाकर्ता एचटीए पर भरोसा करते हैं कि यह निर्धारित करने के लिए कि कौन सी नई तकनीकों को शामिल करना है और किन परिस्थितियों में। आम तौर पर, एचटीए उन लाभों के खिलाफ कवरेज की लागत को संतुलित करने की अनुमति देता है जो संभावित रूप से सदस्यों के स्वास्थ्य और कल्याण के साथ-साथ संसाधनों के प्रभावी उपयोग की ओर से प्राप्त होने वाले हैं। बीमाकर्ता, एचटीए की मदद से, एक बीमारी के इलाज की प्रक्रिया में लागत उपयोगिता और रोगी के परिणाम का विश्लेषण करेगा, जो बदले में एक बीमाकर्ता द्वारा एक नई उपचार कवरेज योजना देगा।

भारत में एचटीए की स्थिति 

एचटीए की वर्तमान स्थिति को निम्नलिखित में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • उद्भव (एमर्जेन्स) और विकास: भारत में एचटीए स्वास्थ्य देखभाल परिणामों में सुधार और संसाधन उपयोग को अनुकूलित करने के लिये एक मूल्यवान दृष्टिकोण के रूप में मान्यता प्राप्त कर रहा है। इस लक्ष्य का समर्थन करने के लिए, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के तहत भारत में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी आकलन (एचटीएइन) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया गया है। एचटीए नीतियों को आकार देने में मदद करने के लिए तैयार है, साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य जानकारी के उपयोग के लिए धन्यवाद, विशेष रूप से विविध, असमान और कम-संसाधन स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में।
  • प्रमुख हितधारक: भारतीय एचटीए परिदृश्य में प्रमुख हितधारकों में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र और कई राज्य स्वास्थ्य विभाग शामिल हैं। ये निकाय भारतीय परिवेश के अनुरूप संशोधित एचटीए पद्धतियों के विकास और अनुप्रयोग में अंतर्राष्ट्रीय एचटीए एजेंसियों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करते हैं। उदाहरण के लिए, एचटीएआईएन भारत में इसके उपयोग के लिए एचटीए में सर्वोत्तम प्रथाओं को प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय निर्णय समर्थन पहल (आईडीएसआई) के साथ काम करता है।

  • एचटीए के अनुप्रयोग: एचटीए को भारत में नई दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के मूल्यांकन में लागू किया गया है। एक हालिया उदाहरण का उल्लेख करें तो, भारतीय राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के एक भाग के रूप में रोटावायरस टीकाकरण शुरू करने की लागत-प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया, जिससे संसाधन आवंटन और क्रियान्वित किए जाने वाले विभिन्न टीकाकरण कार्यक्रमों के विकल्प तय करने में मदद मिली।
  • कार्यान्वयन में चुनौतियाँ: भारत में एचटीए के बढ़ते महत्त्व के साथ कई चुनौतियाँ भी हैं। डेटा की उपलब्धता और गुणवत्ता काफी बाधाएं पेश करती है, क्योंकि व्यापक और भरोसेमंद डेटा आसानी से सुलभ नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, प्रभावी एचटीए के लिए आवश्यक तकनीकी कौशल में सुधार के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके अलावा, विभिन्न नियामक और प्रक्रियात्मक मुद्दे स्वास्थ्य देखभाल निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में एचटीए के सहज एकीकरण में बाधा डालते हैं। एचटीए के लिए भारत में अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिए इन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है।

भारत में एचटीए का भविष्य

भारत में एचटीए का भविष्य हो सकता है:

  • नीति और व्यवहार में एचटीए का विस्तार: भारत में एचटीए का भविष्य राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इसके व्यापक अनुप्रयोग में निहित है। जैसा कि अधिक राज्य एचटीए से निपटने वाली इकाइयों की स्थापना करते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं के भीतर एकीकरण पर इसका प्रभाव पड़ता है, स्वास्थ्य देखभाल नीति और अभ्यास पर एचटीए का अंतिम प्रभाव बोर्ड भर में महसूस किया जाएगा। यह वृद्धि तेजी से बदलते स्वास्थ्य देखभाल वातावरण में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण की मांग से प्रेरित होगी।
  • क्षमता निर्माण के अवसर: भारत में बढ़ते एचटीए प्रयास को वापस करने के लिए स्वास्थ्य पेशेवरों, नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं जैसे अन्य हितधारकों को प्रशिक्षित करने और एचटीए गतिविधियों का समर्थन करने वाले संस्थागत ढांचे के निर्माण के संदर्भ में सक्षम क्षमता में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है। एचटीए क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ संबंधों में ज्ञान हस्तांतरण शामिल है और एचटीए में अपनी क्षमता के विकास के लिए भारत को कई फायदे और लाभ प्रदान करते हैं।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) के साथ एकीकरण: भारत में यूएचसी प्राप्त करने की दिशा में प्रमुख घटकों में से एक होने के नाते, एचटीए जानबूझकर आबादी में अधिकतम स्वास्थ्य लाभ के साथ हस्तक्षेपों की प्राथमिकता को सूचित करेगा। यूएचसी ढांचे में एचटीए प्रणालियों के एकीकरण से राष्ट्र को उन हस्तक्षेपों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी जो अधिकतम स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेंगे और जनसांख्यिकीय के सभी क्षेत्रों के लिए समान और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के अपने लक्ष्य के करीब जाएंगे।
  • नवाचार और सहयोग की संभावना: भारत में एचटीए का उपयोग बढ़ रहा है, नए और रचनात्मक तरीके विकसित किए जा रहे हैं। डिजिटल स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों, डेटा विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस) में सुधार एचटीए को बेहतर और अधिक सटीक रूप से काम कर सकता है। सरकारी विभागों, निजी क्षेत्र, स्कूलों और व्यवसायों के साथ मिलकर काम करने से एचटीए के लिए नए तरीके और उपयोग बनाने में मदद मिल सकती है।
  • समानता और पहुँच: भारत में एचटीए के लिए भविष्य के प्रमुख संभावित अवसरों में से एक यह है कि यह स्वास्थ्य सेवा तक समानता और पहुँच के सवाल को संबोधित करेगा। एचटीए द्वारा आबादी के विभिन्न मुश्किल से पहुँचे समूहों पर स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों के प्रभाव का व्यवस्थित मूल्यांकन यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि स्वास्थ्य सेवा हस्तक्षेप संयुक्त रूप से वितरित किए जाएँ और उस आबादी में हाशिए पर हों जो वह देखभाल प्राप्त करती है जिसके वे हकदार हैं।

निष्कर्ष

यह सुनिश्चित करके स्वास्थ्य नीति के निर्माण के लिए एक प्रभावशाली मार्गदर्शक होने के नाते कि नई प्रौद्योगिकियां प्रभावशीलता, सुरक्षा और पैसे के मूल्य के मामले में सार्थक हैं, एचटीए भारत में धीरे-धीरे स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा है क्योंकि यह संसाधनों पर सीमाओं के साथ बेहतर स्वास्थ्य परिणामों की सेवा करने के प्रयास को आकार देता है। भारत में एचटीए के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान करने से न केवल स्वास्थ्य में बल्कि देश के अन्य डोमेन में नीतियों और प्रथाओं को बदलने में इस तरह के अभ्यासों की क्षमता से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए और रास्ते खुलेंगे।

डॉ. अतुल गवांडे के विनम्र शब्दों में, “बेहतर संभव है। इसके लिए प्रतिभा की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए परिश्रम की आवश्यकता है। इसके लिए नैतिक स्पष्टता की आवश्यकता है। इसके लिए सरलता की आवश्यकता है। और सबसे बढ़कर, इसके लिए प्रयास करने की इच्छा की आवश्यकता है।” इसी तरह भारत में एचटीए का भविष्य भी होगा, जो एक स्वास्थ्य सेवा मॉडल को अधिक प्रभावी, न्यायसंगत और डिजाइन द्वारा टिकाऊ बनाएगा।

संदर्भ

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44

यह लेख Sakshi Kuthari द्वारा लिखा गया है। इसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, महत्व और अनुच्छेद 44 से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की गई है। ऐतिहासिक निर्णयों के साथ समान नागरिक संहिता को लागू करने में शामिल फायदे और चुनौतियां भी निहित है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है। 

परिचय

भारत के  संविधान में 395 अनुच्छेद शामिल हैं (संविधान में किए गए 106 संवैधानिक संशोधनों के बाद अब संख्या में 448 अनुच्छेद हैं) जिनमें से प्रत्येक का अपना महत्व और भारतीय आबादी की सेवा में विशिष्ट भूमिका है। भारतीय संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है और विभिन्न प्रक्रियाओं की रूपरेखा तैयार करता है जिनका अधिकारियों को पालन करना होता है। उनमें से, अनुच्छेद 44 यह एकमात्र ऐसा प्रावधान है जो आज तक बिना किसी व्यावहारिक अनुप्रयोग के पूरी तरह से सैद्धांतिक बना हुआ है। अनुच्छेद 44 पूरे देश में एकरूपता का लक्ष्य रखते हुए सभी भारतीय नागरिकों के लिए लागू समान नागरिक संहिता का प्रावधान करता है। 

यह अनुच्छेद भारत की विविध संस्कृति के बीच सुसंगत मानक बनाने के लिए विरासत (इन्हेरिटन्स), विवाह (मैरिज), तलाक (डिवोर्स) और गोद (कस्टडी) लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों से संबंधित कानूनों को मानकीकृत करने के लिए डाला गया था। अनुच्छेद 44 कई दशकों तक भारतीय संविधान का हिस्सा होने के बावजूद, समान नागरिक संहिता अभी तक लागू नहीं की गई है। इस लेख में अनुच्छेद 44 के महत्व पर चर्चा की गई है, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि इसका कार्यान्वयन कैसे समानता पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है और धार्मिक पूर्वाग्रह और भेदभाव को कम कर सकता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 क्या है? 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 का भाग IV यह आदेशित करता है कि राज्य पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता स्थापित करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 44 का उद्देश्य जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के अधिकारों और प्रथाओं की रक्षा करना है। समान नागरिक संहिता सभी व्यक्तियों के लिए, उनकी धार्मिक मान्यताओं या सामुदायिक संबद्धताओं की परवाह किए बिना, विवाह, तलाक, विरासत और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले कानूनों का एक एकल, सुसंगत नियम बनाने का प्रयास करती है। यह राज्य द्वारा विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए किए गए प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है जो वर्तमान में भारत के विभिन्न धार्मिक समुदायों, जिनमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदायों के बीच मौजूद हैं। समान नागरिक संहिता भारत की धर्म और संस्कृति में समृद्ध विविधता को स्वीकार करती है और अपने सभी नागरिकों के लिए समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में देश की प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालती है। विभिन्न धार्मिक समूहों पर लागू होने वाले विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण राज्य को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये अलग-अलग कानून कानूनी अधिकारों में  खासकर परिवार से संबंधित मामलों में विसंगतियां (इनकंसिस्टेंसी) पैदा कर सकते हैं।

समान नागरिक संहिता का इतिहास

समान नागरिक संहिता की अवधारणा औपनिवेशिक काल से चली आ रही है, जिसकी शुरुआत ‘स्थानीय कानून’, जिसका अनुवाद होता है ‘कानून की भूमि’ के सिद्धांत से हुई थी। 1840 में, लेक्स-लोसी रिपोर्ट के नाम से जानी जाने वाली एक रिपोर्ट में अनुबंध, विवाह, अपराध और साक्ष्य से संबंधित भारतीय कानूनों के एक एकीकृत संहिता (कोड) की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इस संहिताकरण से बाहर रखा जाना चाहिए। 1840 की रिपोर्ट और 1859 की रानी की उद्घोषणा ने यह कहकर इस रुख को मजबूत किया कि धार्मिक मामलों को संहिताबद्ध नहीं किया जाएगा, और व्यक्तिगत कानूनों को धार्मिक और समुदाय-विशिष्ट नियमों द्वारा शासित होना जारी रहना चाहिए। इस समय के दौरान, पूरे देश के लिए आपराधिक कानूनों को संहिताबद्ध किया गया। 1828 में, भारत के पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने हिंदू धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किया। 4 दिसंबर, 1829 को, उन्होंने सती प्रथा को अवैध और अदालतों द्वारा दंडनीय घोषित करते हुए विनियमन (रेग्युलेशन) XVII जारी किया। इसके अतिरिक्त, कन्या भ्रूण हत्या को अवैध बना दिया गया। बाद में लॉर्ड डलहौजी और ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पास किया। 

स्वतंत्रता के बाद कई धर्मनिरपेक्ष कानून पेश किए गए, जिन्हें विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों पर प्राथमिकता दी गई और बहुसंख्यक आबादी से व्यापक स्वीकृति मिली। इनमें शामिल थे विशेष विवाह अधिनियम, 1954; दहेज निषेध अधिनियम, 1961; गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971; किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000; और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006। हालाँकि, इन कानूनों ने एक व्यापक नागरिक संहिता नहीं बनाई और केवल सीमित श्रेणी के नागरिक मुद्दों को संबोधित किया।

संविधान के अनुच्छेद 44 का निर्माण

23 नवंबर, 1948 को, भारत की संविधान सभा में अनुच्छेद 44 के मसौदे के संबंध में एक आकर्षक बहस हुई, जो समान नागरिक संहिता का प्रावधान करती थी। चर्चा और उसके बाद मतदान के दौरान प्रावधान के समर्थकों और विरोधियों दोनों ने विस्तृत तर्क प्रस्तुत किये। यह स्पष्ट था कि कई मुस्लिम सदस्य गहराई से आशंकित दिखाई दिए, जिसने संभवतः इस ओर संकेत किया कि प्रावधान का विरोध करने वाले मुख्य रूप से मुस्लिम पृष्ठभूमि से थे। उन्होंने तर्क दिया कि समान नागरिक संहिता धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगी, संभावित रूप से मुस्लिम समुदाय के भीतर सद्भाव को बाधित करेगी, और यह व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करेगी।

प्रावधान के समर्थकों द्वारा यह तर्क दिया गया कि समान नागरिक संहिता महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह राष्ट्रीय एकता बनाए रखेगी और संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखेगी। मसौदा समिति के एक सदस्य का तर्क था कि इस प्रावधान का प्रभाव न केवल मुस्लिम समुदाय पर बल्कि हिंदू समुदाय पर भी पड़ेगा। इस बात पर भी जोर दिया गया कि समान नागरिक संहिता के बिना महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करना संभव नहीं होगा।

बहस के समापन पर, यह स्पष्ट किया गया कि समान नागरिक संहिता पूरी तरह से एक नई अवधारणा नहीं थी; भारत में पहले से ही समान नागरिक संहिता थी। प्रस्तावित संहिता केवल विवाह और विरासत तक अपना दायरा बढ़ाएगा, जिन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दिया गया है। बहस के दौरान नोक-झोंक के बावजूद, मसौदा अनुच्छेद को बिना किसी संशोधन के उसी दिन अपनाया गया।

समान नागरिक संहिता का महत्व और कार्यान्वयन

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता में विभिन्न पृष्ठभूमियों के व्यक्ति शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक की अलग-अलग मान्यताएँ और प्रथाएँ हैं। इस विविधता के बीच स्थिरता हासिल करना महत्वपूर्ण है और समान नागरिक संहिता को लागू करना इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सभी नागरिकों के लिए एक सुसंगत कानूनी ढांचा बनाकर, समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के दायरे में निहित धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को मजबूत करती है और राष्ट्रीय एकता में योगदान देती है। वर्तमान में, कई निर्वाचन क्षेत्र धार्मिक और सामुदायिक आधार पर बंटे हुए हैं, जिससे धर्म के आधार पर वोट-बैंक की राजनीति हो रही है। समान नागरिक संहिता की शुरूआत से ऐसी धार्मिक-आधारित राजनीतिक प्रथाओं में कमी आ सकती है। 

समान नागरिक संहिता वर्ष 1950 में लागू की गई थी; इसका वास्तविक कार्यान्वयन भारत की प्रगति में एक बड़ी प्रगति का प्रतिनिधित्व करेगा, जिससे राष्ट्र निर्माण में धार्मिक और अन्य बाधाओं को दूर करने में मदद मिलेगी। भारतीय नागरिकों और कानून निर्माताओं दोनों के लिए यह समझना आवश्यक है कि अनुच्छेद 44 को पूरी तरह से लागू करने से देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा मिलेगा। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करना या उन पर प्रतिबंध लगाना नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए लागू कानूनों का एक सुसंगत  नियम स्थापित करना है, जो किसी भी व्यक्ति के धर्म के बावजूद समान व्यवहार सुनिश्चित करता है। इसके अतिरिक्त, समान नागरिक संहिता न्यायिक प्रणाली खासकर धार्मिक मामलों से संबंधित विवादों को सुलझाने में दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ा सकती है।

वर्तमान में, व्यक्तिगत कानूनों में अक्सर ऐसे प्रावधान शामिल होते हैं जो महिलाओं के अधिकारों को कमजोर करते हैं या लैंगिक असमानताएं पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए, मुस्लिम परंपरा का पर्दा प्रथा,मोहम्मडन कानून के अनुसार 15 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की शादी और उत्तराधिकार अधिकारों में असमानताएं जैसी प्रथाएं महिलाओं को नुकसान पहुंचाती हैं। समान नागरिक संहिता लागू होने से इन असमानताओं को दूर किया जा सकेगा, जिससे महिलाओं को समाज में, विशेषकर कठोर प्रथाओं वाले समुदायों में समान दर्जा और अधिकार मिलेंगे।

अनुच्छेद 44 से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976, एक महत्वपूर्ण शब्द, “धर्मनिरपेक्षता” (सेक्यूलरिज़म) पेश किया। भारतीय सांस्कृतिक विविधता और भारत में मौजूद विभिन्न धार्मिक प्रथाओं के कारण लोगों को अपनी पसंद के किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देना आवश्यक हो जाता है। हालांकि, भारतीय संविधान ‘कानून के समक्ष समानता’ का भी प्रावधान करता है। ऐसे देश में जहां भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ धार्मिक अभ्यास की गारंटी दी जाती है, विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग कानूनों और नियमों का अस्तित्व समान नागरिक संहिता पर सवाल उठाता है। समान नागरिक संहिता में भारतीय संविधान का भाग III के कई प्रमुख प्रावधान शामिल हैं , जो निम्नलिखित है:

धर्म आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत राज्य को केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी भी कारक के आधार पर भारत के किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव करने से प्रतिबंधित किया गया है। परिवार से संबंधित मामलों में, भारत में व्यक्तिगत कानूनों की एक प्रणाली है, यानी, हिंदुओं के लिए हिंदू कानून, मुसलमानों के लिए मुस्लिम कानून इत्यादि। हिंदुओं के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i)., एकपत्नी विवाह के लिए एक कानून प्रदान करता है, लेकिन मुस्लिम व्यक्तिगत कानून मुस्लिम पुरुषों को किसी भी संख्या में पत्नियों से शादी करने की अनुमति देता है। इसे केवल ‘धर्म’ के आधार पर भेदभाव के आरोप के संबंध में बरकरार रखा गया था। श्रीनिवास अय्यर बनाम सरस्वती अम्मल (1952) के मामले में माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने बताया कि हिंदू लंबे समय से हिंदू धर्मग्रंथों पर आधारित अपनी स्वदेशी प्रणाली का उसी तरह आनंद ले रहे हैं, जिस तरह मुसलमान अपने निजी कानूनों के अधीन थे।

तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 में कहा गया है कि एक ईसाई पति अपनी पत्नी द्वारा किए गए व्यभिचार के आधार पर अपनी पत्नी से तलाक ले सकता है। दूसरी ओर, एक ईसाई पत्नी को अपने पति से तलाक लेने के लिए न केवल अपने पति के व्यभिचार को साबित करना होगा, बल्कि कुछ और भी साबित करना होगा, जैसे अनाचार, द्विविवाह, बलात्कार, क्रूरता, या विच्छेद। श्रीमती प्रगति वर्गीस और आदि बनाम सिरिल जॉर्ज वर्गीस और आदि (1997) के मामले में माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 10 लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण प्रकृति की है और इस प्रकार,अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघनकारी है। इसके अलावा, एक ईसाई महिला क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक नहीं मांग सकती है, जबकि हिंदू कानून हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत महिलाएं तलाक की मांग  (क्रूरता के आधार पर) और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ib)(परित्याग के आधार पर) कर सकती हैं। यह भेदभाव महज धर्म के आधार पर है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है।

डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ (2001) के मामले में, मुस्लिम महिला (अधिकारों और तलाक का संरक्षण अधिनियम), 1986, की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह अधिनियम, जब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125, की तुलना में किया जाता है, तो मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है। हालांकि, माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस दावे को खारिज कर दिया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि दोनों कानूनों का उद्देश्य एक ही है, यानी ऐसी स्थितियों का समाधान करना जहां एक तलाकशुदा महिला के बेघर और भिखारी होने की संभावना हो। मोहम्मडन कानून मुस्लिम महिला अधिकारों और तलाक संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 3(1)(a) के तहत गुजारा भत्ते से संबंधित प्रावधानों को संहिताबद्ध और विनियमित करता है। यह प्रदान करता है कि इद्दत अवधि के दौरान मुस्लिम पत्नी को मेहर और गुजारा भत्ते के हकदार होने के अलावा, पति भी ‘उचित और निष्पक्ष प्रावधान’ करने के दायित्व में है। ‘उचित और निष्पक्ष प्रावधान’ का अर्थ है तलाकशुदा महिला की जरूरतें, पति के साधन और विवाहित जीवन के दौरान महिला द्वारा अनुभव किया गया जीवन स्तर। व्यक्तिगत कानून विभिन्न धार्मिक प्रथाओं और रीतियों के आधार पर स्थापित किए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए नियमों और विनियमों के अलग-अलग सेट होते हैं, भले ही वे सभी भारत के हिस्से हों।

संविधान के अनुच्छेद 15 और 44 दोनों ही लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की ओर झुके हुए हैं। अनुच्छेद 15 का उद्देश्य व्यक्तिगत विशेषताओं के आधार पर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करना है और अनुच्छेद 44 विविध व्यक्तिगत कानूनों के सह-अस्तित्व से उत्पन्न होने वाली संभावित असमानताओं को संबोधित करता है। समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन का उद्देश्य इन विविध नियमों को कानूनों के एक समूह में एकीकृत करना है, यह सुनिश्चित करना कि सभी नागरिक अपने धर्म का पालन करने के अधिकार का सम्मान करते हुए समान नियमों का पालन करें। यह अनुच्छेद 15 में उल्लिखित समानता और गैर-भेदभाव सिद्धांतों का भी पूरक होगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि व्यक्तिगत कानून उनके धर्म या समुदाय के आधार पर व्यक्तियों के साथ असमान व्यवहार नहीं करेंगे।

धर्म का पालन करने या मानने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 25 व्यक्तियों की धार्मिक मान्यताओं की रक्षा करता है, लेकिन उन प्रथाओं की रक्षा नहीं करता है जो सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता के साथ टकराव में हो सकती हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(1) प्रत्येक व्यक्ति को,चाहे वह भारतीय नागरिक हो या विदेशी सबको, ‘विवेक की स्वतंत्रता’ और ‘धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने का अधिकार’ की गारंटी देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और मौलिक अधिकारों से संबंधित अन्य प्रावधानों के अधीन है। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25(2)(a) के तहत, यह प्रावधान है कि राज्य किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को विनियमित या प्रतिबंधित करने वाला कोई कानून बनाने से प्रतिबंधित नहीं है जो धार्मिक अभ्यास से जुड़ा हो सकता है। अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत, राज्य को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या हिंदुओं के सभी वर्गों और समूहों के लिए सार्वजनिक चरित्र के हिंदू धार्मिक संस्थानों को खोलने के लिए कोई कानून बनाने से नहीं रोका गया है।

इस प्रकार, यह ध्यान दिया जा सकता है कि अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों और धार्मिक संप्रदायों को दिए गए अधिकार पूर्ण नहीं हैं। वे सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव आदि के अधीन हैं। अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों और धार्मिक संप्रदायों के धार्मिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं। यह सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के रखरखाव के अधीन है।

भारत, एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के बावजूद, अभी भी विभिन्न समुदायों के लिए नागरिक मामलों के संबंध में अलग-अलग व्यक्तिगत कानून हैं, जो अनुच्छेद 14 के तहत निहित समानता के सिद्धांतों का खंडन करता है। समान नागरिक संहिता लागू करने से सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानूनों के एक समान सेट को लागू करके समानता को बढ़ावा मिलेगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, यह सुनिश्चित करना कि सभी को कानून के समक्ष समान माना जाता है। अनुच्छेद 25 और 44 के बीच का संबंध एक सामान्य कानूनी ढांचे की आवश्यकता को विभिन्न धार्मिक प्रथाओं के संबंध में समेटने से संबंधित है। 

धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। इस लेख में, ‘धार्मिक संप्रदाय’ शब्द का अर्थ एक धार्मिक संप्रदाय है जिसका एक समान विश्वास और संगठन है और जिसे एक विशिष्ट नाम से नामित किया गया है। अनुच्छेद 26 में प्रावधान है कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को इसका अधिकार है:

  1. धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थानों की स्थापना और रखरखाव; 
  2. अपने धार्मिक मामलों का संचालन स्वयं करें; 
  3. चल और अचल संपत्ति का स्वामित्व और अधिग्रहण; और 
  4. ऐसी संपत्ति का प्रशासन कानून के अनुसार करें।

यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को विशेष अधिकारों की गारंटी देता है, और अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों या उसके किसी अनुभाग तक ही सीमित है। इस प्रकार अनुच्छेद 26 धर्म की सामूहिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

धार्मिक संप्रदाय बनाने के लिए तीन शर्तों को पूरा करना होगा:

  1. यह उन व्यक्तियों का एक समूह है जिनके पास विश्वासों की एक प्रणाली है जिसे वे अपनी भलाई के लिए उपयोगी मानते हैं;
  2. उनका एक साझा संगठन है; और
  3. इन व्यक्तियों का संग्रह एक विशिष्ट नाम बनता है।

अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों और संस्थानों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। 

अनुच्छेद 44 का उद्देश्य समान नागरिक संहिता के माध्यम से व्यक्तिगत कानूनों का मानकीकरण (स्टैंडर्डडाइज)   करना है। समान नागरिक संहिता लागू करने से समानता के सिद्धांतों का पालन करते हुए विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों को व्यवस्थित करके विभिन्न धर्मों में मौजूद विभिन्न धार्मिक प्रथाओं का समाधान किया जाएगा।

समान नागरिक संहिता लागू करने के फायदे और चुनौतियां

समान नागरिक संहिता लागू करने के फायदे

भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने के कुछ फायदे:

  1. सभी भारतीय आबादी, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या जनजाति के हों, उनको एक समान नागरिक संहिता के तहत लाने से राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। यह सुनिश्चित करके राष्ट्रीय एकता में योगदान देता है कि भारत के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाए, विविध व्यक्तिगत कानूनों आदि को प्रतिस्थापित किया जाए;
  2. यह वोट बैंक की राजनीति के प्रभाव को कम करने में मदद करता है जो विभिन्न राजनीतिक दल चुनावों के दौरान करते हैं। समान नागरिक संहिता कानूनों का मानकीकरण करेगी, जिससे राजनेताओं द्वारा किए गए किसी भी प्रकार के लक्षित वादे की गुंजाइश कम हो जाएगी और राजनेताओं के लिए वोट हासिल करने के लिए व्यक्तिगत कानून-आधारित अपील का उपयोग करना कठिन हो जाएगा;
  3. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं के लिए विशेष कानून बनाने की अनुमति देता है क्योंकि, आज तक, पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों और अनुचित कानून के कारण व्यक्तिगत कानूनों का अभी भी ज्यादातर दुरुपयोग किया जाता है। अनुच्छेद 25 के तहत किसी भी धर्म को मानने और अभ्यास करने की स्वतंत्रता किसी भी तरह से महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों के उल्लंघन को उचित नहीं ठहरा सकती। विभिन्न समुदायों के बीच विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत से संबंधित कई व्यक्तिगत कानून महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण बने हुए हैं। इन लिंगवादी कानूनों के अस्तित्व के कारण पुरुष-प्रधान समाज द्वारा महिलाओं के साथ गलत व्यवहार किया जाता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा, उनके अधिकारों की रक्षा होगी और भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत कानूनों का खात्मा होगा। यह बदले में लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा और पूरे भारत में महिलाओं के लिए समान अधिकारों के लक्ष्य को आगे बढ़ाएगा।
  4. भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करती है। पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन यह सुनिश्चित करता है कि सभी भारतीय नागरिक, चाहे वे हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म या बौद्ध धर्म का पालन करते हों, नागरिक कानूनों के समान नियम द्वारा शासित हो। इससे धार्मिक भेदभाव को खत्म करने और धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों के साथ जुड़ने में भी मदद मिलेगी। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि समान नागरिक संहिता व्यक्तियों की अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करेगी बल्कि धर्म के आधार पर भेदभाव को खत्म करने और सभी नागरिकों को एक ही नागरिक कानूनी ढांचे के तहत एक साथ लाने में मदद करेगी। 
  5. किसी भी धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार प्रत्येक धर्म को अपने व्यक्तिगत मामलों को स्वतंत्र रूप से प्रबंधित करने की अनुमति देता है। हालांकि, यह धर्म-आधारित वर्गीकरण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार का खंडन करता है। समान नागरिक संहिता लागू करने से सभी नागरिकों पर, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, नागरिक कानूनों का एक सुसंगत नियम लागू करके समानता को बढ़ावा मिलेगा, जिससे कानून के समक्ष समान व्यवहार सुनिश्चित होगा;
  6. विभिन्न समुदायों के विभिन्न व्यक्तिगत कानून असमानताएं पैदा करके भारत को कमजोर कर रहे हैं। ये अलग-अलग और अक्सर परस्पर विरोधी व्यक्तिगत कानून असमानताओं में योगदान करते हैं। समान नागरिक संहिता लागू करने से इन संघर्षों और विसंगतियों का समाधान होगा, भारत के भीतर राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा और “एक राष्ट्र, एक ध्वज और एक कानून” की अवधारणा का समर्थन होगा;
  7. किसी भी धर्म के व्यक्तिगत कानून धार्मिक प्रथाओं द्वारा शासित पारंपरिक नियम हैं, जिनमें कई मौजूदा कानून हैं जो सदियों पहले उत्पन्न हुए थे और रूढ़िवादी चरित्र रखते हैं। इनमें से कई कानून पुराने हो चुके हैं और समकालीन समाज के अनुरूप नहीं हैं। समान नागरिक संहिता लागू करने से इन पुराने कानूनों को खत्म करने या प्रतिबंधित करने से संबंधित मुद्दों का समाधान होगा, जिससे हमारी नागरिक कानून प्रणाली का आधुनिकीकरण होगा।

समान नागरिक संहिता लागू करने में चुनौतियाँ

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 विभिन्न चुनौतियों के कारण अभी भी लागू नहीं हो पाया है, जो इस प्रकार हैं:

  1. भारत की विविधता में धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, जो समान नागरिक संहिता को लागू करने में एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश करती है। चुनौती एक सतत कानूनी ढांचा प्रदान करते हुए इस विविधता को संतुलित करने में है। इस प्रकार, एक मानक कानून स्थापित करना जो इन सभी विविध समूहों को एक साथ लाता है, समाज के हर वर्ग की मान्यताओं और भावनाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है;
  2. भारत में बहुत से लोगों में समान नागरिक संहिता के बारे में समझ की कमी है और अक्सर डरते हैं कि इसके कार्यान्वयन से उनकी धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन होगा और धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगेगा। समान नागरिक संहिता का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करके समानता को बढ़ावा देना है कि सभी भारतीय नागरिकों के साथ समाज में समान व्यवहार किया जाए;
  3. केंद्रीय अधिकारियों के लिए एक प्रमुख चुनौती प्रत्येक धार्मिक समूह और समुदाय को आश्वस्त करना है कि समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन अल्पसंख्यकों पर बहुमत की इच्छा थोपे बिना, अच्छे विश्वास और नेक इरादे से किया जाएगा;
  4. भारत में धर्मों की विविधता अक्सर इस मुद्दे के राजनीतिकरण की ओर ले जाती है, जिससे आवश्यक परिवर्तनों को लागू करने के प्रयास जटिल हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप समान नागरिक संहिता को लागू करने की प्रक्रिया में कई बाधाएँ आती हैं;
  5. सभी समुदायों और धर्मों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने से, कुछ राजनीतिक दलों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, जो निस्संदेह समान नागरिक संहिता के सुचारू विकास और कार्यान्वयन को सीमित कर देगा;
  6. भारत में समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन के लिए विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता होगी। इस प्रक्रिया के लिए पर्याप्त राजनीतिक सहमति और प्रयास की आवश्यकता होगी, जिसे प्राप्त करना कठिन हो सकता है;
  7. एक व्यापक समान नागरिक संहिता बनाना जो निष्पक्षता और समानता सुनिश्चित करते हुए विवाह, तलाक, विरासत और अन्य मामलों से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों को संबोधित करता है, कानूनी रूप से एक जटिल कार्य है;
  8. समान नागरिक संहिता का एक प्रमुख लक्ष्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। हालांकि, इस उद्देश्य को विभिन्न समुदायों में स्थापित पारंपरिक और पितृसत्तात्मक मानदंडों के कारण विरोध का सामना करना पड़ सकता है;
  9. भले ही समान नागरिक संहिता लागू हो जाए, लेकिन इसके प्रभावी प्रवर्तन और कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, विशेष रूप से दूरदराज और सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी क्षेत्रों में, एक चुनौतीपूर्ण और लंबी प्रक्रिया हो सकती है;
  10. चूँकि भारत विभिन्न मानवाधिकार सम्मेलनों का हस्ताक्षरकर्ता है, यह सुनिश्चित करना कि समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन इन अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप हो, जटिलता की एक और परत जोड़ता है;
  11. व्यक्तिगत कानून के मानकीकृत होने से कानूनी विवादों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। भारत में मामलों के मौजूदा महत्वपूर्ण बैकलॉग को देखते हुए, इससे स्थिति बिगड़ सकती है।

क्या समान नागरिक संहिता की जरूरत है

समान नागरिक संहिता लागू करने की आवश्यकता भारतीय संविधान की प्रस्तावना के सिद्धांतों में निहित है, जो भारत के लोगों को समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता सुनिश्चित करने का प्रावधान करती है। विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोगों द्वारा की जाने वाली विभिन्न धार्मिक प्रथाएँ असमानताएँ और भेदभाव लाती हैं, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ। समान नागरिक संहिता विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त सभी प्रकार की असमानताओं को समाप्त कर देगी और सभी नागरिकों के लिए समानता सुनिश्चित करेगी। इससे भारत को मानवाधिकारों और लैंगिक समानता के संबंध में अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। भारत की संसद ने वर्ष 2019 में एक विधेयक पेश करके भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रयास किया।

समान नागरिक संहिता विधेयक, 2019

समान नागरिक संहिता विधेयक, 2019 25 अक्टूबर, 2019 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक पूरे भारत में समान नागरिक संहिता की तैयारी और कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय निरीक्षण और जांच समिति बनाने और स्थापित करने का प्रयास करता है। विधेयक की धारा 4 राष्ट्रीय निरीक्षण और जांच समिति का प्रावधान करती है। समिति पूरे भारतीय क्षेत्र में समान नागरिक संहिता के संहिताकरण और कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कोई भी उपाय करने के लिए जिम्मेदार होगी। समिति निम्नलिखित सुनिश्चित करेगी:

  1. समान नागरिक संहिता विधेयक, 2019 का उद्देश्य पूरे भारत में लागू करना है;
  2. विधेयक बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, संरक्षकता और भूमि और संपत्ति के विभाजन से संबंधित कानूनों को समान रूप से नियंत्रित करता है;
  3. इसका उद्देश्य अनुच्छेद 14 के तहत गारंटीकृत समानता के अधिकार को बरकरार रखना है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में उल्लिखित धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाना है; और
  4. इसके अतिरिक्त, विधेयक मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों, जो धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित हैं,जो समान नागरिक संहिता से बदलने का प्रयास करता है।

समान नागरिक संहिता विधेयक, 2019 के फायदे

  1. विधेयक यह सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिक समान कानूनी ढांचे द्वारा शासित हों, यानी समानता और निष्पक्षता को बढ़ावा देना;
  2. विधेयक में कानूनों का एक ही समूह शामिल है। इससे कानूनी प्रक्रिया सरल हो जाएगी, जिससे कई व्यक्तिगत कानूनों की प्रथाओं के कारण उत्पन्न होने वाली जटिलता और भ्रम कम हो जाएगा;
  3. यह विधेयक विभिन्न समुदायों के बीच की खाई को पाटता है, राष्ट्रीय पहचान और एकता की भावना लाता है;
  4. यह विधेयक लैंगिक समानता को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है।

समान नागरिक संहिता विधेयक, 2019 के नुकसान

  1. गहरी जड़ें जमा चुके व्यक्तिगत कानूनों और परंपराओं वाले समुदायों का विरोध उक्त विधेयक के प्रावधानों का आसानी से पालन नहीं कर सकता है;
  2. व्यक्तिगत कानूनों में सामंजस्य स्थापित करने में शामिल जटिलताएँ चुनौतीपूर्ण हैं क्योंकि इसके लिए महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक परिवर्तनों की आवश्यकता होगी। इससे कानूनी अस्पष्टताएं पैदा हो सकती हैं;
  3. विधेयक सभी समुदायों की विविध आवश्यकताओं और प्रथाओं को पूरी तरह से समायोजित नहीं करता है;
  4. विधेयक एक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है, जिससे ध्रुवीकृत (पोलराइज्ड) बहस हो सकती है।

पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867

गोवा राज्य में एक समान नागरिक संहिता है जो पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 पर आधारित है। गोवा में, हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के संबंध में समान एकरूप कानूनों के अधीन हैं। गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम,1962,1961 में गोवा के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अधिनियमित किया गया था, ने पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 को गोवा में लागू करने का अधिकार दिया, जिसमें संबंधित विधायी प्राधिकरण द्वारा संशोधन और निरसन का प्रावधान था।

पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 की विशेषताएं

गोवा की समान नागरिक संहिता में निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

  1. गोवा का समान नागरिक संहिता पति-पत्नी और उनके बच्चों के बीच, उनके लिंग की परवाह किए बिना, धन और आय के समान वितरण की अनुमति देता है;
  2. प्रत्येक व्यक्ति के जन्म, विवाह और मृत्यु का पंजीकरण करना अनिवार्य है। यह तलाक से संबंधित विभिन्न प्रावधानों को भी निर्धारित करता है;
  3. जिन भारतीय मुसलमानों की शादियां पंजीकृत हैं, उन पर बहुविवाह और तीन तलाक का चलन प्रतिबंधित है;
  4. विवाह के समय पति-पत्नी में से किसी एक द्वारा अर्जित की गई सभी संपत्ति संयुक्त संपत्ति मानी जाती है। तलाक के बाद, प्रत्येक पति या पत्नी संपत्ति का आधा हिस्सा प्राप्त करने का हकदार है। मृत्यु की स्थिति में, जीवित पति या पत्नी को मृतक की संपत्ति का आधा हिस्सा मिलता है;
  5. माता-पिता को उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए पूरी तरह से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। बच्चों को अपने माता-पिता की संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा विरासत में देने के पक्ष में एक कानून मौजूद है, जिसमें विरासत में मिली संपत्ति उनके बीच समान रूप से विभाजित की जाती है।

पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 के दोष

गोवा समान नागरिक संहिता के तहत कुछ सीमाएँ मौजूद हैं। वे इस प्रकार हैं:

  1. गोवा में कैथोलिकों को विशिष्ट विशेषाधिकार प्रदान किए जाते हैं, यानी, विवाह को पंजीकृत करने से छूट और कैथोलिक पादरियों को विवाह को समाप्त करने का अधिकार। कैथोलिक जोड़े सिविल रजिस्ट्रार से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी)’ प्राप्त करके चर्च में अपनी शादी संपन्न कर सकते हैं। इसके विपरीत, गोवा में अन्य धर्मों के व्यक्तियों को अपनी शादी के प्रमाण के रूप में विशेष रूप से नागरिक पंजीकरण पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि कैथोलिक जोड़े के बीच विवाह संपन्न नहीं होता है, तो चर्च न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) इसे अमान्य घोषित कर सकता है। हालांकि, गैर-ईसाइयों को अदालतों के माध्यम से तलाक लेना होगा और तलाक के आधार के रूप में विवाह न करने का उपयोग नहीं कर सकते हैं;
  2. गोवा की समान नागरिक संहिता गोवा में हिंदुओं के लिए बहुविवाह का एक विशिष्ट रूप की अनुमति देती है, लेकिन गोवा में मुसलमानों के लिए शरीयत अधिनियम, 1937 का विस्तार नहीं करती है। बल्कि, मुसलमान पुर्तगाली कानून और शास्त्री हिंदू कानून दोनों द्वारा शासित होते हैं। कानून मुसलमानों सहित किसी भी समूह के लिए द्विविवाह या बहुविवाह की अनुमति नहीं देता है, सिवाय इसके कि एक हिंदू पुरुष को पुनर्विवाह की अनुमति है यदि उसकी पत्नी 21 वर्ष की आयु तक बच्चे को जन्म नहीं देती है या 30 वर्ष की आयु तक पुत्र को जन्म नहीं देती है। चर्च प्राधिकारियों द्वारा दिया गया कोई भी तलाक नागरिक उद्देश्यों के लिए वैध माना जाता है, जबकि गैर-कैथोलिक केवल सिविल अदालत के माध्यम से तलाक प्राप्त कर सकते हैं। पुनर्विवाह के लिए पति को अपनी पत्नी को औपचारिक रूप से तलाक देना आवश्यक है। इसके परिणामस्वरूप मुस्लिम पुरुष गुप्त संबंधों में प्रवेश करने लगे और अपनी आश्रित पत्नियों को छोड़ने लगे। यदि कोई महिला अपने स्वयं के धार्मिक कानून को विवाह और तलाक पर एकमात्र अधिकार मानती है, तो वह खुद को कानूनी प्रणाली से अलग-थलग मान सकती है, क्योंकि उसका तलाक कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं होगा और उसे पुनर्विवाह करने से रोक देगा;
  3. तलाक के मामलों में, पति को अपनी पत्नी को तलाक देने का अधिकार है यदि वह किसी संबंध में पकड़ी जाती है। हालांकि, यह अधिकार पत्नी को नहीं दिया गया है। पत्नी को अपने पति की बेवफाई के कारण अलगाव का दावा करने का अधिकार केवल तभी है, जब इससे सार्वजनिक रूप से बदनामी हुई हो। तलाक केवल पत्नी द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है यदि उसका पति अपनी प्रेमिका को अपने घर लाता है या जब उसका पति उसे छोड़ देता है। ईसाई कैथोलिक जो चर्च में अपनी शादी संपन्न करते हैं, वे नागरिक तलाककानूनों के अधीन नहीं हैं। अन्य धर्मों से संबंधित व्यक्ति किसी भी कारण से तलाक मांग सकते हैं, हिंदुओं को छोड़कर, जो केवल तभी तलाक प्राप्त कर सकते हैं यदि उनकी पत्नी ने व्यभिचार किया हो; और
  4. संपत्ति से जुड़े मामलों में, पति और पत्नी दोनों के पास संपत्ति का संयुक्त स्वामित्व होता है, लेकिन पति को इसका प्रबंधन करना होता है। हालांकि, पति को अभी भी अपनी पत्नी की सहमति के बिना घर बेचने का अधिकार नहीं है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि संपत्ति जोड़े के बीच समान रूप से विभाजित हो, लेकिन यह केवल तभी लागू होता है जब प्रत्येक पति-पत्नी के परिवार के पास संपत्ति हो। यदि पति के पास संपत्ति का मालिकाना हक नहीं है, तो तलाक के दौरान संपत्ति के बंटवारे के परिणामस्वरूप पत्नी को आधा हिस्सा कुछ भी नहीं मिलेगा।

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता, 2024

समान नागरिक संहिता के अंतिम मसौदे को 4 फरवरी, 2024 को उत्तराखंड कैबिनेट द्वारा अनुमोदित किया गया था। 6 फरवरी, 2024 को राज्य विधानसभा उत्तराखंड में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता, 2024 मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रस्तुत किया। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस संहिता के प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 का खंड (25) मे परिभाषित अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होते हैं, न ही उन व्यक्तियों या समूहों को जिनके प्रथागत अधिकार भारतीय संविधान का भाग XXI अंतर्गत संरक्षित हैं। 

अधिनियम को चार भागों में विभाजित किया गया है:

  • पहला भाग विवाह और तलाक से संबंधित कानूनों को संबोधित करता है; 
  • दूसरे भाग में उत्तराधिकार कानून शामिल हैं, जिन्हें आगे निर्वसीयत और वसीयती उत्तराधिकार में विभाजित किया गया है; 
  • तीसरा भाग लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित है; और 
  • चौथा भाग निरसन के प्रावधानों से संबंधित है। यह अधिनियम पूरे उत्तराखंड और उत्तराखंड के बाहर रहने वाले निवासियों पर भी लागू होता है।

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता, 2024 की विशेषताएं

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता, 2024 के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार हैं:

  1. समान नागरिक संहिता बहुविवाह, निकाह हलाला, इद्दत, तीन तलाक और बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है;
  2. यह सभी धर्मों में महिलाओं और पुरुषों के लिए एक समान विवाह योग्य आयु स्थापित करने का प्रावधान करता है। महिला की शादी के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष और पुरुष के मामले में 21 वर्ष है। ऐसी शर्त के उल्लंघन के मामले में 6 महीने की कैद और/या 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है।
  3. संहिता के तहत जोड़े के बीच संपन्न विवाह को शादी के 60 दिनों के भीतर पंजीकृत करना अनिवार्य है,। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद विवाह का पंजीकरण न कराने पर 10,000 रुपये का जुर्माना देना होगा;
  4. समान नागरिक संहिता नियम के उल्लंघन में विवाह विच्छेद (डीससोल्यूसन ऑफ मेरिज) के मामले में, 3 साल तक की कैद की सजा हो सकती है;
  5. लिव-इन कपल्स को एक महीने के भीतर अपने रिश्ते का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। रजिस्ट्रार के पास उनके रिश्ते को कानूनी रूप से मान्य करने का अधिकार है;
  6. लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा;
  7. लिव-इन रिलेशनशिप को ख़त्म करते समय जोड़े के लिए यह नोटिस संबंधित अधिकारियों के पास लाना आवश्यक है;
  8. यदि पुरुष लिव-इन पार्टनर महिला लिव-इन पार्टनर को छोड़ देता है, तो महिला उचित अदालत के माध्यम से भरण-पोषण की मांग कर सकती है;
  9. विवाह के दोनों पक्षों को तलाक की डिक्री के माध्यम से अपनी शादी को समाप्त करने का समान अधिकार दिया गया है, और तलाक केवल अदालत की कार्यवाही के माध्यम से ही दिया जा सकता है;
  10. उत्तराधिकार कानूनों के लिए, समान नागरिक संहिता प्राथमिक उत्तराधिकारियों को माता-पिता, बच्चे और जीवनसाथी के रूप में नामित करती है;
  11. तलाक के समय या दम्पति के बीच घरेलू विवाद के समय, 5 वर्ष तक के बच्चे की कस्टडी हमेशा माँ को दी जाएगी;
  12. नाजायज़ बच्चे, गोद लिए गए बच्चे, सरोगेसी के माध्यम से पैदा हुए बच्चे, और सहायक प्रजनन तकनीक के माध्यम से गर्भ धारण किए गए बच्चे सभी को ‘जैविक बच्चों’ के रूप में मान्यता दी जाती है।

उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता, 2024 से संबंधित चिंताएँ

उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता, 2024 की सीमाएं निम्नलिखित हैं:

  1. उत्तराखंड का समान नागरिक संहिता विशेष रूप से राज्य के उन निवासियों पर लागू होता है जिनकी पहचान पुरुष या महिला के रूप में की जाती है और जो विषमलैंगिक (हेट्रोसेक्शुअल) संबंधों में हैं। यह अधिकतर एलजीबीटीक्यू व्यक्तियों को अपने दायरे से बाहर रखता है;
  2. इसके कार्यान्वयन के लिए संहिता अपराधीकरण पर निर्भर करती है, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की उम्मीद है क्योंकि इसने इन समूहों की विभिन्न धार्मिक और प्रथागत प्रथाओं को गैरकानूनी घोषित कर दिया है;
  3. संहिता में उल्लिखित निगरानी उपायों का संभावित रूप से अंतरधार्मिक और अंतरजातीय संबंधों में जोड़ों को परेशान करने के लिए दुरुपयोग किया जा सकता है;
  4.  घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 यह पहले से ही लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकृत करने की बाध्यता निरर्थक हो जाती है।

समान नागरिक संहिता से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय

सुश्री जॉर्डन डिएंगदेह बनाम एस.एस. चोपड़ा (1985)

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता, मेघालय की खासी जनजाति की सदस्य थी, जिसे प्रेस्बिटेरियन ईसाई के रूप में पाला गया था और भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत थी। उनके पति, एक सिख ने उनसे भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत विवाह किया। 1980 में, याचिकाकर्ता ने अपने पति की नपुंसकता का हवाला देते हुए, भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 18, 19, और 22 के तहत विवाह की अशक्तता (इम्पोटेंस) या न्यायिक पृथक्करण की आदेश का अनुरोध किया। उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने अशक्तता की घोषणा देने से इनकार कर दिया, लेकिन क्रूरता के आधार पर न्यायिक पृथक्करण का आदेश जारी किया। उच्च न्यायालय के फैसले से असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय में विशेष अवकाश याचिका दायर किया। 

उठाए गये मुद्दे

  1. भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों में तलाक कानूनों में एकरूपता का अभाव है;
  2. विभिन्न धार्मिक समुदायों में तलाक के लिए अलग-अलग आधार थे, जिसके परिणामस्वरूप असमानता और संभावित अन्याय हुआ;
  3. सुश्री जॉर्डन डिएंगदेह ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में यह तर्क देते हुए अपील की कि भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 तलाक के लिए केवल सीमित आधार प्रदान करता है और विवाह के अपूरणीय टूटने की धारणा प्रदान नहीं करता है।

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने निम्नलिखित आधारों पर उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा:

  1. भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, विशेष विवाह अधिनियम, 1954, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936, और मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के प्रासंगिक प्रावधानों की जांच से न्यायिक पृथक्करण, तलाक और विवाह के रद्द होने को नियंत्रित करने वाले कानूनों में महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आई हैं।
  2. अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के अनुसार, न्यायिक पृथक्करण की डिक्री दी जा सकती है, और यदि न्यायिक पृथक्करण डिक्री दायर किए जाने के बाद कम से कम एक वर्ष बीत चुका हो तो विवाह विच्छेद की डिक्री का अनुसरण किया जा सकता है। बशर्ते कि इस बीच जोड़े के बीच सहवास (कोहैबिटेशन) फिर से शुरू न हुआ हो। इसके विपरीत, भारतीय तलाक अधिनियम, 1869, समान प्रावधान नहीं है। इसलिए, जो व्यक्ति इस अधिनियम के तहत न्यायिक अलगाव के लिए डिक्री प्राप्त करता है, उसे डिक्री का पालन करना होगा और बाद में किसी भी अवधि के बाद तलाक की मांग नहीं कर सकता है; और
  3. इस मामले में, ऐसा प्रतीत होता है कि विवाह अपरिवर्तनीय रूप से टूट गया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की राय थी कि यदि उच्च न्यायालय के निष्कर्षों को बरकरार रखा जाता है, तो युगल एक-दूसरे से बंधे रहेंगे, क्योंकि न तो आपसी सहमति और न ही विवाह का अपूरणीय टूटना भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 के तहत तलाक का आधार है। एक विवाह जो मौलिक रूप से और अपूरणीय रूप से क्षतिग्रस्त है, उसका कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं है;

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि विधायिका के लिए कार्रवाई करना और विवाह और तलाक के लिए एक समान संहिता स्थापित करना महत्वपूर्ण है, जैसा कि अनुच्छेद 44 के तहत उल्लिखित है। ऐसे कानून बनाने की तत्काल आवश्यकता है जो चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने वाले जोड़ों के लिए समाधान प्रदान करें।

मो. अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम और अन्य (1985)

मामले के तथ्य

इस मामले  में मोहम्मद अहमद खान ने 1932 में 3,000 रुपये की मेहर राशि के साथ शाह बानो से शादी की। उनके तीन बेटे और दो बेटियां थीं। 1978 में, मोहम्मद अहमद खान ने अपनी 40 वर्षीय पत्नी को ‘तीन तलाक’ (तलाक-उल-बिद्दत) कहकर एकतरफा तलाक दे दिया। मोहम्मडन कानून के अनुसार, उसने इद्दत अवधि के दौरान सहमत मेहर का भुगतान किया। शाहबानो को मध्य प्रदेश में उसके वैवाहिक घर से निष्कासित किए जाने के बाद; उसने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125, के तहत उसने भरण-पोषण की मांग करते हुए याचिका दायर किया । प्रारंभ में, मजिस्ट्रेट ने उसे 25 प्रति माह रुपये का भरण पोषण पुरस्कार दिया। इस फैसले से असंतुष्ट शाहबानो ने 1979 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अपील की, जिससे गुजारा भत्ता राशि बढ़कर 179.20 रुपये प्रति माह हो गई। 

1981 में शाह बानो के पूर्व पति ने उच्च न्यायालय के फैसले को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि मोहम्मडन कानून के तहत, तलाक के बाद अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने का पति का दायित्व केवल इद्दत अवधि तक ही बढ़ता है, इस प्रकार आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के प्रावधान खत्म हो जाते हैं।

उठाए गये मुद्दे

  • क्या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान को धर्मनिरपेक्ष प्रावधान माना जाता है?
  • क्या मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में पति के लिए ‘तलाक पर’ अपनी पत्नी को वित्तीय सहायता प्रदान करने की आवश्यकता शामिल है?
  • क्या कानून इतना कठोर है कि इद्दत अवधि के दौरान भरण-पोषण प्रदान करने का पति का दायित्व उसे अपनी पूर्व पत्नी के प्रति किसी भी अन्य जिम्मेदारी से स्थायी रूप से मुक्त कर देता है?

मामले का फैसला

संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 एक धार्मिक तटस्थ प्रावधान है। यह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, पगान या हीथेन सहित सभी धर्मों के व्यक्तियों पर लागू होता है। इस प्रावधान की व्याख्या व्यक्तिगत कानूनों की परवाह किए बिना सार्वभौमिक रूप से लागू करने के लिए की जाती है, और यह एक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति करता है। धारा 125 का प्राथमिक उद्देश्य आश्रितों को ‘आवारापन’ और ‘विनाश’ से बचाना है, और मुसलमानों को इसके आवेदन से बाहर करने का कोई कारण नहीं है।

अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के बीच अंतर करते हुए निष्कर्ष निकाला कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून धारा 125 द्वारा संबोधित स्थितियों शामिल नहीं करते हैं। जबकि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून इद्दत अवधि के दौरान मेहर के भुगतान का प्रावधान करता है। यह उन मामलों को संबोधित नहीं करता है जहां एक तलाकशुदा महिला को इद्दत अवधि समाप्त होने के बाद खुद का समर्थन करने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। सावधानीपूर्वक व्याख्यात्मक तकनीकों को नियोजित करके, अदालत ने धारा 125 के साथ मुस्लिम व्यक्तिगत कानून को सुसंगत बनाया, और कहा कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 को मुस्लिम व्यक्तिगत कानून पर प्राथमिकता दी जाएगी।

माननीय न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि धारा 125 के तहत भरण-पोषण के आदेश रद्द किये जा सकते हैं धारा 127 सिर्फ इसलिए कि पति ने तलाक के समय मेहर का भुगतान किया था। अदालत ने यह भी माना कि मेहर को मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत विशेष रूप से तलाक के लिए भुगतान नहीं माना जाता है। बल्कि, मेहर विवाह के विचार के हिस्से के रूप में पत्नी को देय राशि है और इसे तलाक के लिए भुगतान के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार, यह तथ्य कि विवाह विच्छेद के समय पत्नी को मेहर का भुगतान किया गया था, इसका मतलब यह नहीं है कि यह तलाक के कारण हुआ भुगतान था। मेहर को तलाक के भुगतान के बजाय विवाह भुगतान के रूप में परिभाषित करके, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यह अदालतों को भरण-पोषण देने से नहीं रोकता है।

डेनियल लतीफ़ी और अन्य बनाम भारत संघ (2001)

मामले के तथ्य

इस में मामला डैनियल लतीफी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की, जिसमें मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1986 का अधिनियम कुछ संवैधानिक प्रावधानों का अपमान करने के लिए पारित किया गया था, क्योंकि यह उस पत्नी के जीवन के अधिकार को बरकरार रखने में विफल रहा जो आर्थिक रूप से अपने पति पर निर्भर थी।

उठाए गये मुद्दे

  • क्या मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(1)(A), भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 से असंगत है?
  • क्या मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 संवैधानिक रूप से वैध है?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय दिये:

  1. एक मुस्लिम पति का दायित्व है कि वह अपनी तलाकशुदा पत्नी को उसके भविष्य के लिए उचित और सही मात्रा में भरण-पोषण दे। अधिनियम की धारा 3(1)(a) के अनुसार, यह प्रावधान इद्दत अवधि से आगे बढ़ाया जाना चाहिए और इद्दत अवधि के दौरान पति द्वारा बनाया जाना चाहिए;
  2. अधिनियम की धारा 3(1)(a) के तहत तलाकशुदा मुस्लिम पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने का मुस्लिम पति का दायित्व इद्दत अवधि से परे है और यहीं तक सीमित नहीं है;
  3. एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है और इद्दत अवधि के बाद अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती है, वह अपने रिश्तेदारों से अधिनियम की धारा 4 के तहत भरण-पोषण का अनुरोध कर सकती है। ये रिश्तेदार, जिनमें उसके बच्चे और माता-पिता भी शामिल हैं, मुस्लिम कानून के अनुसार उससे प्राप्त विरासत के अनुपात में उसका समर्थन करने के लिए बाध्य हैं। यदि कोई रिश्तेदार भरण-पोषण देने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट राज्य वक्फ बोर्ड को आवश्यक सहायता प्रदान करने का निर्देश दे सकता है; और
  4. मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन नहीं करता है।

सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995)

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता सरला मुद्गल एक हिंदू महिला थीं, जिनके पति ने इस्लाम धर्म अपना लिया था और बाद में उन्हें कानूनी रूप से तलाक दिए बिना दूसरी महिला से शादी कर ली थी। उसने तर्क दिया कि उसके पति की दूसरी शादी अमान्य थी और वह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत द्विविवाह कर रहा था। 

उठाए गये मुद्दे

  • क्या कोई हिंदू पति, जिसकी शादी हिंदू कानून के तहत हुई हो, इस्लाम अपनाकर दूसरी शादी कर सकता है?
  • क्या ऐसा विवाह उसकी पहली पत्नी के संबंध में वैध होगा, जो हिंदू बनी हुई है, भले ही पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त न हुई हो?
  • चाहे नीचे भारतीय दंड संहिता, 1860 के धारा 494 के अनुसार, धर्मत्यागी पति को द्विविवाह करने का दोषी माना जाएगा?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक हिंदू पति द्वारा अपनी पहली शादी को कानूनी रूप से समाप्त किए बिना इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद की गई दूसरी शादी को अवैध माना जाएगा। यह दूसरी शादी भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 के तहत शून्य मानी जाएगी और पति उस धारा के तहत अपराध का दोषी होगा।

लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000)

मामले के तथ्य

इस मामले  में एक हिंदू पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति ने दूसरा धर्म अपनाकर दूसरी शादी कर ली है। 

उठाए गये मुद्दे

  • क्या एक हिंदू पति, इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद, दूसरी शादी कर सकता है, और क्या ऐसी शादी को अमान्य माना जाएगा यदि धर्म परिवर्तन का उद्देश्य पिछली शादी से बचने का इरादा हो?
  • क्या पहली शादी को कानूनी तौर पर खत्म किए बिना दोबारा शादी करने पर पति को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 के तहत द्विविवाह के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा?
  • क्या ऐसे मुद्दों के समाधान के लिए सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना उचित और आवश्यक है?

मामले का फैसला

  1. यह निर्धारित किया गया था कि जीवित पति/पत्नी के साथ किसी व्यक्ति द्वारा दूसरी शादी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 के तहत अमान्य और रद्द कर दी गई है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। अदालत ने केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से धर्मांतरण को अनुचित माना, क्योंकि ऐसे कार्य विवाह की पवित्रता को कमजोर करते हैं;
  2. अदालत ने कहा कि हिंदू कानून के तहत द्विविवाह के निषेध से बचने के लिए इस्लाम में रूपांतरण धार्मिक सिद्धांतों के साथ असंगत है। यह भी पुष्टि की गई कि भारतीय दंड संहिता की धारा 494 तब लागू होती है जब एक हिंदू पति या पत्नी अपने साथी के खिलाफ शिकायत दर्ज करता है जो पहली शादी को कानूनी रूप से खत्म किए बिना दूसरी शादी करता है। फैसले ने पुष्टि की कि द्विविवाह कानूनों को लागू करना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता है;
  3. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पति का इस्लाम में रूपांतरण और उसके बाद दूसरी शादी अमान्य थी। यह फैसला सुनाया गया कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 और 495, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 17 के साथ, इस मामले में लागू है;
  4. इसके अतिरिक्त, अदालत ने कहा कि विवाह के प्रयोजनों के लिए धर्म परिवर्तन पहली शादी से पति के दायित्वों को समाप्त नहीं करता है और ऐसे कार्य कानूनी रूप से दंडनीय हैं। समान नागरिक संहिता के संभावित लाभों को स्वीकार करते हुए, अदालत ने आगाह किया कि तत्काल कार्यान्वयन से राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ सकती है। इसने सिफारिश की कि विशिष्ट मुद्दों को संबोधित करने, भारत के विविध सामाजिक ताने-बाने का सम्मान करने और विभिन्न धर्मों के बीच एकता को बढ़ावा देने के लिए धीरे-धीरे कानूनी सुधार पेश किए जाएं।

जॉन वल्लामट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003)

मामले के तथ्य

इस मामले  में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118 की वैधानिकता को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की गई थी। यह तर्क देते हुए कि यह धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संपत्ति की वसीयत करने की क्षमता पर अनुचित प्रतिबंध लगाता है। याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दावा किया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118, असंवैधानिक है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि यह धारा धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए व्यक्तिगत संपत्ति दान करने के उनके अधिकार पर मनमानी और अनुचित सीमाएं लगाती है। विशेष रूप से, धारा 118 भतीजों, या अन्य करीबी रिश्तेदारों वाले ईसाइयों को ऐसे दान करने से प्रतिबंधित करती है जब तक कि एक विशेष प्रक्रियात्मक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है।

उठाए गये मुद्दे

  • क्या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है?
  • क्या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118, अन्य धर्मों के अनुयायियों की तुलना में ईसाइयों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 118 का उद्देश्य धार्मिक कारकों के कारण व्यक्तिगत संपत्ति के अनुचित या गुमराह हस्तांतरण को रोकना था। हालांकि, ऐसे प्रतिबंध किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा के अनुसार संपत्ति की वसीयत करने की स्वतंत्रता को काफी हद तक सीमित कर देते हैं, जिससे उनकी मृत्यु के बाद इसके वितरण पर असर पड़ता है। संपत्ति के स्वतंत्र रूप से निपटान का अधिकार स्वामित्व का एक मूलभूत पहलू है, और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925, उम्र, धर्म, जाति या पंथ के बावजूद, हर किसी को इस अधिकार की गारंटी देता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि धारा 118 विशेष रूप से भारतीय ईसाइयों को लक्षित करती है और जनता की भलाई के लिए धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए वसीयतनामा बनाने के लिए किसी व्यक्ति के दायित्व को प्रतिबंधित करने का कोई औचित्य नहीं है।

चूंकि दान धार्मिक होने के बजाय परोपकारी गतिविधि है, धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए वसीयत को सीमित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के रूप में देखा गया था। अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 15 व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित है, न कि समूह अधिकारों से, जो इस मामले में इसे अप्रासंगिक बनाता है। परिणामस्वरूप, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करने के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

सीमा बनाम अश्विनी कुमार (2006)

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता सीमा ने दंपति के बीच चल रहे मतभेदों और बहसों के कारण प्रतिवादी अश्वनी कुमार के खिलाफ हरियाणा की जिला अदालत में मामला दायर किया। कार्यवाही के दौरान, मामला दिल्ली में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। उक्त अदालत द्वारा एक अंतरिम आदेश पारित किया गया और मामले की कार्यवाही रोक दी गई। इसके बाद, उत्पन्न हुए व्यापक मुद्दे, यानी अपंजीकृत विवाह की समस्या, को संबोधित करने के लिए मामले को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया।  

उठाए गये मुद्दे

  1. क्या भारत में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य किया जाएगा?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह घोषित किया गया था कि सभी विवाह, जोड़े के धर्म की परवाह किए बिना, अनिवार्य रूप से पंजीकृत होने चाहिए। यह निर्णय महिलाओं को विवाह के भीतर अपने अधिकारों का दावा करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण लिया गया, जिसमें भरण-पोषण और बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) के दावे भी शामिल हैं। अदालत ने इस फैसले को उन स्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक पाया जहां धोखेबाज पतियों ने अपनी शादी से इनकार कर दिया, और अपने जीवनसाथी को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में छोड़ दिया। इस निर्णय का उद्देश्य समान नागरिक संहिता के लक्ष्य का समर्थन करना और विवाह पंजीकरण की कमी से उत्पन्न होने वाले कई मुद्दों का समाधान करना है। न्यायालय  के इस फैसले के निम्नलिखित प्रभाव होंगे:

  1. बाल विवाह रोकें और विवाह के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित करें;
  2. सुनिश्चित करें कि सभी विवाह दोनों पक्षों की पूर्ण सहमति से आयोजित किए जाएं;
  3. अवैध द्विविवाह और बहुविवाह को संबोधित करना और उस पर रोक लगाना;
  4. विवाहित महिलाओं को वैवाहिक घर में रहने और भरण-पोषण प्राप्त करने के अपने अधिकारों का दावा करने की अनुमति दें;
  5. विधवाओं को अपने पति की मृत्यु के बाद अपने विरासत अधिकारों और अन्य हकों का दावा करने में सक्षम बनाना;
  6. विवाहित पुरुषों द्वारा जीवनसाथी के परित्याग को हतोत्साहित करना; और
  7. माता-पिता या अभिभावकों को शादी के बहाने अपनी बेटियों या युवा लड़कियों को, जिनमें विदेशियों को भी शामिल किया गया है, बेचने से रोकना।

शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017)

मामले के तथ्य

इस मामले  में सुश्री शायरा बानो और श्री रिजवान अहमद, जिन्होंने अप्रैल 2002 में उत्तर प्रदेश में शादी की थी, एक कानूनी विवाद के केंद्र में थे। सुश्री बानो ने आरोप लगाया कि उनके पति ने उनके परिवार पर दहेज देने के लिए दबाव डाला और अतिरिक्त दहेज लेने में विफल रहने के बाद, श्री अहमद और उनके परिवार ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और बीमार होने पर उन्हें छोड़ दिया। अक्टूबर 2015 में, श्री अहमद ने तलाक-उल-बिद्दत, जो कि तत्काल तीन तलाक का एक रूप है, का उपयोग करके सुश्री बानो को तलाक दे दिया। सुश्री बानो ने फरवरी 2016 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर करके तलाक-उल-बिद्दत, बहुविवाह और निकाह-हलाला की संवैधानिकता को चुनौती दी।

उठाए गये मुद्दे

  • क्या तलाक-उल-बिद्दत, जिसमें तत्काल तीन तलाक भी शामिल है, इस्लाम की एक अनिवार्य प्रथा है?
  • क्या तात्कालिक तीन तलाक भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है?
  • क्या तीन तलाक संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है?
  • क्या मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 कानूनी तौर पर तीन तलाक का समर्थन करता है?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन और यूयू ललित ने पाया कि तलाक-उल-बिद्दत, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 द्वारा शासित है। अपनी मनमानी प्रकृति के कारण असंवैधानिक था। न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने तर्क दिया कि तीन तलाक पवित्र कुरान के अनुरूप है और इसमें कानूनी वैधता का अभाव है, उन्होंने कहा, “पवित्र कुरान में जो बुरा माना जाता है वह शरीयत में अच्छा नहीं हो सकता है, और जो धर्मशास्त्र में बुरा है वह कानून में भी बुरा है।” दोनों न्यायाधीशों ने निष्कर्ष निकाला कि तात्कालिक तीन तलाक धार्मिक सिद्धांतों और कानूनी मानकों दोनों के विपरीत है और इसे केवल इसकी व्यापकता के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

इसके विपरीत, मुख्य न्यायाधीश खेहर और न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर ने असहमति जताते हुए तर्क दिया कि यह प्रथा इस्लाम के भीतर एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि तलाक-उल-बिद्दत को धार्मिक अधिकारियों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार और स्वीकृत किया गया है, इसलिए इसे संवैधानिक और आवश्यक दोनों के रूप में बरकरार रखा जाना चाहिए।

मामले की जड़ यह थी कि क्या तलाक-उल-बिद्दत संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है, जो आवश्यक धार्मिक प्रथाओं में राज्य के हस्तक्षेप पर रोक लगाती है। मुख्य न्यायाधीश खेहर ने तर्क दिया कि, अनुच्छेद 25(1) के अनुसार, यह प्रथा संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करती है, क्योंकि शरीयत या मुस्लिम व्यक्तिगत कानून राज्य द्वारा विधायी रूप से अनिवार्य नहीं है।

शबनम हाशमी बनाम भारत संघ (2014)

मामले के तथ्य

इस मामले  में सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार वकील शबनम हाशमी को इस्लामी कानून के कारण अपनी गोद ली हुई बेटी के माता-पिता के रूप में मान्यता प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें माता-पिता की स्थिति के लिए जैविक संबंध की आवश्यकता होती है। उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि मोहम्मदन कानून उन्हें दत्तक बच्चे के माता-पिता के रूप में मान्यता देने की अनुमति नहीं देता है, जबकि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 एक धर्मनिरपेक्ष कानून है, जो किसी भी धर्म के व्यक्तियों द्वारा गोद लेने की अनुमति देता है। उन्होंने आग्रह किया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 41 और केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) दिशानिर्देशों को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा लागू किया जाए और उनका कड़ाई से पालन किया जाए।

उठाए गये मुद्दे

  • क्या बच्चा गोद लेने का अधिकार मौलिक अधिकार माना जाता है?
  • व्यक्तिगत कानून और धर्मनिरपेक्ष कानून के बीच टकराव की स्थिति में कौन सा कानून लागू होता है?
  • क्या जाति, पंथ या धर्म का प्रभाव गोद लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है?

मामले का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि गोद लेना सभी नागरिकों के लिए एक मौलिक अधिकार है, चाहे वे किसी भी जाति, पंथ या धर्म के हों। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत धर्म या जाति के बावजूद गोद लेने की अनुमति है। हालाँकि याचिकाकर्ता ने व्यापक सबूत नहीं दिए, लेकिन अदालत ने गोद लेने के अधिकार को संविधान के भाग III के अंतर्गत आने के रूप में मान्यता देते हुए उसकी याचिका को बरकरार रखा, जो मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को बच्चा गोद लेने का समान अधिकार है, चाहे उनका धर्म, जाति, पंथ या लिंग कुछ भी हो।

अदालत ने यह भी कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून गोद लेने को स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन यह निःसंतान जोड़ों को बच्चे की भावनात्मक और भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने से नहीं रोकता है। किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत, गोद लिए गए बच्चों को कानूनी तौर पर उनके दत्तक माता-पिता के बच्चों के रूप में मान्यता दी जाती है, न कि केवल अभिभावकों के रूप में। यह अधिनियम गोद लेने की अनुमति देता है, भले ही व्यक्तिगत कानून इसे संबोधित न करें। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत गोद लेना, व्यक्तिगत कानूनों की परवाह किए बिना स्वीकार्य है, जिससे अब धार्मिक मान्यताओं के आधार पर गोद लेने में बाधा नहीं आनी चाहिए।

निष्कर्ष

केंद्रीय मुद्दा वर्तमान सरकार के लिए समान नागरिक संहिता को लागू करने की समय-सीमा है, जैसा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने कल्पना की थी। हालांकि विरासत, उत्तराधिकार और विवाह पर पारंपरिक हिंदू व्यक्तिगत कानूनों को 1955-56 में ही संहिताबद्ध कर दिया गया था, एक समान व्यक्तिगत कानून को अपनाने में स्पष्ट कानूनी या तथ्यात्मक औचित्य के बिना देरी का सामना करना पड़ा है। अनुच्छेद 44 इस सिद्धांत पर आधारित है कि आधुनिक समाज में धर्म और व्यक्तिगत कानून को अलग किया जाना चाहिए। जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 44 धर्म को सामाजिक संबंधों और व्यक्तिगत कानून के मामलों से अलग करने का प्रयास करता है। विवाह और उत्तराधिकार जैसे धर्मनिरपेक्ष मुद्दों को अनुच्छेद 25 और 26 द्वारा शासित नहीं किया जाना चाहिए। मुसलमानों और ईसाइयों के समान हिंदू व्यक्तिगत कानूनों की जड़ें पवित्र हैं। सिखों, बौद्धों और जैनियों के साथ-साथ हिंदुओं ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अपनी पारंपरिक प्रथाओं को अलग रख दिया है। हालाँकि, पूरे भारत के लिए “समान नागरिक संहिता” के संविधान के आदेश के बावजूद, अन्य समुदायों ने अभी तक इस उदाहरण का पालन नहीं किया है।

समान नागरिक संहिता की स्थापना की दिशा में न्यूनतम प्रगति के साथ, संविधान का अनुच्छेद 44 काफी हद तक अपरिवर्तनीय रहा है। समान नागरिक संहिता को देशभर में लागू करने से विभिन्न विचारधाराओं पर आधारित परस्पर विरोधी कानूनी प्रणालियों को खत्म करके राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है, और इसे प्राप्त करने के लिए उसके पास विधायी अधिकार है। संविधान की मंशा को साकार करने का सार्थक प्रयास किया जाना चाहिए। जबकि वृद्धिशील न्यायिक उपायों ने व्यक्तिगत कानूनों के बीच विसंगतियों को संबोधित किया है, वे एक व्यापक सामान्य नागरिक संहिता की जगह नहीं ले सकते। समान नागरिक संहिता मामले-दर-मामले के आधार पर मुद्दों से निपटने की तुलना में न्याय के लिए एक अधिक प्रभावी और न्यायसंगत दृष्टिकोण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

नागरिक संहिता क्या है?

नागरिक संहिता कानूनों का एक व्यापक संग्रह है जो संपत्ति के अधिकार, पारिवारिक संबंधों और संविदात्मक दायित्वों जैसे निजी मामलों को विनियमित करता है।

क्या भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 न्यायसंगत है?

नहीं, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 न्यायोचित नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 37 निर्दिष्ट करता है कि अनुच्छेद 44 सहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत, कानून की अदालत में लागू नहीं किए जा सकते हैं।

हाल ही में समान नागरिक संहिता किस राज्य में लागू की गई?

7 फरवरी 2024 को, उत्तराखंड राज्य ने समान नागरिक संहिता लागू किया ।

भारतीय संविधान में समान नागरिक संहिता की अवधारणा किसने पेश की?

भारतीय संविधान के प्रारूपण के दौरान, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी.आर. जैसे नेता ने इस अवधरणा को पेश किया। अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता की वकालत की। उस समय धार्मिक समूहों के विरोध और सीमित जन जागरूकता के कारण इसे राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में शामिल किया गया था।

संदर्भ

 

आयकर अधिनियम 1961 के तहत मूल्यह्रास की गणना

यह लेख यूपीईएस स्कूल ऑफ लॉ, देहरादून से तीसरे वर्ष के विधि छात्र Avinash Kumar द्वारा लिखा गया है। इस लेख में, उन्होंने “आयकर अधिनियम 1961 के तहत मूल्यह्रास (डेप्रिसिएशन) की गणना” पर चर्चा की है। वह आयकर अधिनियम के तहत लिखित मूल्य पद्धति और अतिरिक्त (अड़िश्नल) मूल्यह्रास पर भी चर्चा करते हैं। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है। 

परिचय

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32 में मूल्यह्रास की अनुमति का प्रावधान है और इसे आयकर नियमों के नियम 5 के तहत विनियमित किया जाता है। जब निर्धारिती  द्वारा उपयोग की जाने वाली मूर्त (टेंजिबल) या अमूर्त (इनटेंजिबल) संपत्ति (असेट्स) के मूल्य में गिरावट होती है, तो आयकर अधिनियम के तहत कटौती की अनुमति है। जबकि कटौती के समय, आयकर विभाग संपत्ति के जीवन काल में संपत्ति की कुल लागत पर मूल्यह्रास की गणना करता है। एक निर्धारिती  सीधी रेखा विधि या लिखित रेखा विधि (डब्ल्यूएलएम) के तहत मूल्यह्रास के कारण कटौती की गणना कर सकता है। आयकर विभाग लिखित रेखा विधि (डब्ल्यूएलएम) की अवधारणा का उपयोग करता है। हालांकि, मूल्यह्रास काटते समय, बिजली का उत्पादन या वितरण,में कटौती के समय,आयकर विभाग “अतिरिक्त सामान्य विधि” की अवधारणा का उपयोग करता है। कुछ परिस्थितियों में, आयकर अधिनियम खरीद के वर्ष में अतिरिक्त मूल्यह्रास की कटौती की अनुमति देता है।

आयकर अधिनियम के तहत मूल्यह्रास का अर्थ

आयकर अधिनियम 1961 के धारा 32 में मूल्यह्रास के बारे में बात की गई है। मूल्यह्रास को संपत्ति की टूट-फूट के कारण संपत्ति के मूल्य में कमी के रूप में परिभाषित किया गया है। लोग मूल्यह्रास की कटौती का दावा केवल लेखांकन (अकाउंटिंग) या कराधान (टैक्सेशन) के उद्देश्य से करते हैं।

आयकर अधिनियम 1961 मूर्त संपत्ति और अमूर्त संपत्ति के मूल्यह्रास की अनुमति देता है। मूर्त संपत्ति के मामले में, आप भवन, संयंत्र और मशीनरी के खिलाफ कटौती का दावा कर सकते हैं। अमूर्त संपत्ति के मामले में, आप पेटेंट,व्यापार चिन्ह (ट्रेडमार्क), कॉपीराइट, लाइसेंस, फ्रेंचाइजी या समान प्रकृति के किसी अन्य व्यवसाय या वाणिज्यिक अधिकार के खिलाफ कटौती का दावा कर सकते हैं। आप उन संपत्तियों पर मूल्यह्रास पर कटौती का दावा कर सकते हैं जिनका उपयोग निर्धारिती  द्वारा पिछले वर्ष के दौरान व्यवसाय या पेशे के उद्देश्य से किया गया है।

यदि किसी संपत्ति का उपयोग 180 दिनों से अधिक समय तक किया गया है तो उस वर्ष में 50% मूल्यह्रास की अनुमति है। मूल्यह्रास के तहत कटौती के लाभ का लाभ उठाने के लिए, यह अनिवार्य नहीं है कि संपत्तियों का उपयोग पिछले वर्ष में निर्धारिती  द्वारा किया गया हो। यदि किसी संपत्ति को निर्धारिती  द्वारा खरीदा जाता है और फिर पट्टेदार को पट्टे पर दिया जाता है, तो निर्धारिती  आयकर अधिनियम के तहत मूल्यह्रास की कटौती का दावा कर सकता है।  

मूल्यह्रास की दरें

निम्नलिखित संपत्तियों पर मूल्यह्रास की दरें:

  • आवासीय उपयोग के लिए भवन: 5%;  
  • गैर-आवासीय उपयोग के लिए भवन: 10%;
  • फर्नीचर और फिटिंग: 10%;
  • सॉफ्टवेयर सहित कंप्यूटर: 40%;
  • संयंत्र और मशीनरी: 15%;
  • व्यक्तिगत उपयोग के लिए मोटर वाहन: 15%;
  • व्यावसायिक उपयोग के लिए मोटर वाहन: 30%;
  • जहाज: 20%;
  • विमान: 40%;
  • सभी अमूर्त संपत्तियाँ: 25%। 

आप विभिन्न संपत्तियों पर मूल्यह्रास दर के बारे में अधिक जान सकते हैं।

आयकर के तहत मूल्यह्रास का दावा करने की शर्त

मूल्यह्रास पर कटौती का लाभ उठाने के लिए, एक निर्धारिती को कुछ शर्तों को पूरा करना होगा। ये शर्तें इस प्रकार हैं:

  • संपत्ति का वर्गीकरण: मूल्यह्रास का लाभ उठाने के लिए, संपत्ति का मालिक एक निर्धारिती (असेससी) होना चाहिए। संपत्ति मूर्त या अमूर्त हो सकती है। एक मूर्त संपत्ति के संबंध में, संपत्ति एक इमारत, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर होनी चाहिए।अमूर्त संपत्ति के संबंध में, संपत्ति पेटेंट अधिकार, कॉपीराइट, व्यापार चिन्ह, लाइसेंस, फ्रेंचाइजी या किसी समान प्रकृति की होनी चाहिए जो 1.04.1998 को या उसके बाद अर्जित की गई हो। भवन पर मूल्यह्रास की गणना करते समय, आयकर विभाग केवल भवन पर मूल्यह्रास की गणना करता है। वे उस जमीन की कीमत की गणना नहीं करते जिस पर इमारत स्थित है। भवन में भूमि की लागत शामिल न करने के पीछे कारण यह है कि टूट-फूट या उसके उपयोग के कारण भूमि का कोई मूल्यह्रास न हो। 
  • स्वामित्व और पट्टा में अंतर : एक निर्धारिती केवल उन पूंजीगत संपत्तियों पर मूल्यह्रास का दावा कर सकता है जो उसके स्वामित्व में हैं। यदि निर्धारिती भवन के मूल्यह्रास पर कटौती का लाभ उठाना चाहता है तो निर्धारिती को उन भवनों का मालिक होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि निर्धारिती  उस भूमि का स्वामी हो। यदि किसी निर्धारिती ने भवन का निर्माण किया है लेकिन भूमि किसी और की है तो उसे भवनों पर मूल्यह्रास की कटौती का दावा करने का अधिकार है। यदि निर्धारिती किरायेदार है या इमारत का उपयोग कर रहा है तो वह कटौती का दावा नहीं कर सकता है। यदि किसी निर्धारिती ने भूमि का पट्टा लिया है और उस भूमि पर एक भवन का निर्माण किया है, तो वह मूल्यह्रास भत्ते का लाभ उठाने का हकदार है। किराये और खरीद के मामले में, यदि कोई निर्धारिती थोड़े समय के लिए मशीनरी किराए पर लेता है, तो उस स्थिति में, वह कटौती का दावा करने का हकदार नहीं है। लेकिन, खरीद के मामले में, यदि कोई निर्धारिती संपत्ति का अधिग्रहण (एक्वायर) करता है और संपत्ति का मालिक बन जाता है तो वह कटौती का दावा करने का हकदार है।
  • पेशे या व्यवसाय के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाता है: मूल्यह्रास भत्ते का लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि संपत्ति का उपयोग व्यवसाय या पेशे के उद्देश्य से किया गया हो। हालांकि, मूल्यह्रास के लिए भत्ते का लाभ उठाना आवश्यक नहीं है, जिसके लिए एक निर्धारिती को पूरे लेखांकन वर्ष में संपत्ति का उपयोग करना होगा। इस प्रकार, यदि निर्धारिती ने एक लेखांकन वर्ष में छोटी अवधि के लिए संपत्ति का उपयोग किया है तो वह मूल्यह्रास के लिए भत्ते का लाभ उठाने का हकदार है। आप किसी मौसमी कारखाने का उदाहरण ले सकते हैं। आइए चीनी कारखानों का उदाहरण लेते है। चीनी कारखाने पूरे वर्ष नहीं खुलते हैं, लेकिन यदि किसी कारखाने में लेखांकन वर्ष के दौरान किसी भी समय संपत्ति का उपयोग किया गया है तो ऐसी स्थिति में कारखाने के मालिक मूल्यह्रास का दावा करने के हकदार हैं। आयकर अधिनियम 1961 के धारा 38 के अनुसार, आयकर अधिकारी को मूल्यह्रास का आनुपातिक (प्रोपोर्शनेट) भाग निर्धारित करने का अधिकार है।
  • बेची गई संपत्तियों पर कटौती का दावा नहीं कर सकते: एक निर्धारिती मूल्यह्रास योग्य संपत्तियों पर कटौती का दावा नहीं कर सकता है। यदि कोई संपत्ति उसी वर्ष बेची जाती है, नष्ट की जाती है या ध्वस्त की जाती है जब उसे अर्जित किया गया था तो निर्धारिती कटौती का दावा नहीं कर सकता है।
  • यदि किसी संपत्ति का कोई सह-मालिक है तो सह-मालिक भी संपत्ति पर मूल्यह्रास का दावा कर सकता है। 

लिखित मूल्य विधि (ब्लॉकवार)

हर साल संपत्ति का बुक वैल्यू घटता जाता है और संपत्ति के मूल्यह्रास की गणना संपत्ति के बुक वैल्यू पर की जाती है। संपत्ति के मूल्यह्रास की गणना करने के लिए लिखित मूल्य (डब्ल्यूडीवी) विधि सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि मूल्यह्रास राशि समय के साथ घटती रहती है। आयकर अधिनियम 1961 की धारा 32(1) कहता है कि मूल्यह्रास की गणना संपत्ति के डब्लूडीवी पर निर्धारित प्रतिशत पर की जानी चाहिए, जिसकी गणना संपत्ति की वास्तविक लागत के संदर्भ में की जाती है। जब एक निर्धारिती पिछले वर्ष में संपत्ति प्राप्त कर रहा है तो वास्तविक लागत डब्लूडीवी बन जाती है। जबकि पिछले वर्ष में अर्जित संपत्ति डब्लूडीवी अधिनियम के तहत अनुमत मूल्यह्रास को घटाकर वास्तविक लागत के बराबर होगी। 

इसे निम्नलिखित उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है:

1.04.2017 को मूल्यह्रास योग्य संपत्ति जिस पर मूल्यह्रास 25% की समान दर पर उपलब्ध है।

संपत्ति A 3,00,000
संपत्ति B 5,00,000
संपत्ति C 7,00,000
कुल योग  15,00,000
कम: 15,00,000 का 25% मूल्यह्रास (3,75,000)
1. संपत्ति के एक खंड का मूल्य 1.4.2018 को लिखा गया।

योग : 2018-19 के दौरान खरीदी गई संपत्ति की लागत

11,25,000

6,00,000

ii). शेष

वर्ष 2018-19 के दौरान संपत्ति B बेची गई

17,25,000

(6,75,000)

iii) शेष 

कटौती : 2018-19 के लिए रु 10,50,000 का @ 25% मूल्यह्रास।     

10,50,000

(2,62,5000)

1.04.2019 को सभी संपत्तियों का मूल्य लिखा गया 7,87,500

आयकर अधिनियम के तहत अतिरिक्त मूल्यह्रास

आयकर अधिनियम केवल लिखित मूल्य पद्धति की अनुमति देता है। अतिरिक्त मूल्यह्रास पद्धति के अनुसार, आप केवल उन संपत्तियों पर कटौती प्राप्त कर सकते हैं जिनका उपयोग व्यवसाय या पेशे में किया गया है। हालांकि, एक निर्धारिती को कटौती केवल तभी मिल सकती है जब संपत्ति का उपयोग उस वर्ष में किया गया हो जिसमें इसे खरीदा गया था। लेकिन आयकर अधिनियम, 1961 में नए संशोधन के अनुसार, धारा 32(1)(iia) का कहना है कि एक निर्धारिती उन संयंत्रों और यंत्रों पर 20% का मूल्यह्रास प्राप्त कर सकता है जो किसी वस्तु के निर्माण या उत्पादन के व्यवसाय में शामिल रहे हैं। अतिरिक्त मूल्यह्रास के तहत कटौती का लाभ उठाने के लिए खरीद और स्थापना की तारीख 31 मार्च 2005 के बाद होनी चाहिए। एक निर्धारिती विमान और जहाजों पर अतिरिक्त मूल्यह्रास का लाभ नहीं उठा सकता है। इन्हें अतिरिक्त मूल्यह्रास से बाहर रखा गया है। 

आकलन वर्ष 2013-14 से एक नया प्रावधान जोड़ा गया है. इसके अलावा, 2017-18 से, आयकर अधिनियम, 1961 में एक और नया प्रावधान जोड़ा गया है जो कहता है कि जो निर्धारिती सत्ता के पेशे से जुड़े हैं, वे भी अतिरिक्त मूल्यह्रास का लाभ उठा सकते हैं। यदि किसी संपत्ति का उपयोग 180 दिनों से कम समय के लिए किया गया है तो अतिरिक्त मूल्यह्रास की दर के 50% पर अतिरिक्त मूल्यह्रास की अनुमति है।

पिछड़े क्षेत्र में मूल्यह्रास

1 अप्रैल 2016 से, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32(1)(iia) पिछड़े क्षेत्रों में मूल्यह्रास की संभावना की अनुमति देता है। यदि कोई निर्धारिती  किसी पिछड़े राज्य (बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल) में विनिर्माण या उत्पादन का व्यवसाय स्थापित करता है, तो उन निर्धारिती  के लिए उपलब्ध अतिरिक्त मूल्यह्रास 35% है, न कि 20%। शिफ्ट और विमान को अतिरिक्त मूल्यह्रास से बाहर रखा गया है। हालांकि, एक निर्धारिती मशीनरी खरीद और स्थापित कर सकता है।    

अतिरिक्त मूल्यह्रास के लिए कौन पात्र नहीं है?

आयकर अधिनियम, 1961 के धारा 32(1)(iia) के अनुसार, यदि कोई निर्धारिती निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता है, तो वे अतिरिक्त मूल्यह्रास के तहत कटौती का लाभ उठाने के लिए पात्र नहीं हैं:

  • भारत में स्थापित होने से पहले, भारत के बाहर उपयोग किए गए संयंत्रों और यंत्रों पर अतिरिक्त मूल्यह्रास का दावा नहीं किया जा सकता है। 
  • आप उन संयंत्रों और यंत्रों पर कटौती का दावा नहीं कर सकते जो कार्यालय परिसर या आवासीय आवास में स्थापित किए गए हैं। 
  • एक निर्धारिती फर्नीचर, भवन, जहाज, विमान, कार्यालय उपकरण, सड़क परिवहन में प्रयुक्त वाहन, अतिथि गृह (गेस्ट हाउस) की प्रकृति सहित आवासीय आवास जैसी संपत्तियों पर अतिरिक्त मूल्यह्रास के तहत कटौती का दावा नहीं कर सकता है।

बिजली उत्पादन में अतिरिक्त मूल्यह्रास

अतिरिक्त मूल्यह्रास पर कटौती केवल उस निर्धारिती के लिए स्वीकार्य है जो उत्पादन में शामिल है। बिजली उत्पादन करने वाले निर्धारिती द्वारा संघर्ष का मामला उठाया गया है। हालांकि, निर्धारिती को अतिरिक्त मूल्यह्रास की अनुमति देने के लिए संसद द्वारा एक निश्चित संशोधन किया गया है।

निर्धारिती, एक संयुक्त उद्यम कंपनी, जो जल विद्युत संयंत्र (थर्मल पावर प्लांट) में शामिल थी, ने आयकर अधिनियम की धारा 32(1)(iia) के तहत अतिरिक्त मूल्यह्रास पर कटौती का लाभ उठाने के लिए एक दावा उठाया था। हालांकि, एक मूल्यांकन अधिकारी ने इस आधार पर दावे को खारिज कर दिया कि इस प्रकार का लाभ केवल उस निर्धारिती को दिया जाएगा जो किसी वस्तु के उत्पादन में शामिल है और इसमें बिजली का उत्पादन शामिल नहीं है। इसके बाद, आयकर विभाग ने निर्धारिती को आयकर अधिनियम 1962 की धारा 154 के तहत नोटिस जारी किया, निर्धारिती ने आयकर अधिकारी को एक स्पष्टीकरण दिया जिसे निर्धारण अधिकारी द्वारा स्वीकार नहीं किया गया।

2013 में, आयकर अधिनियम की धारा 32(1)(iia) में संशोधन किया गया था और संशोधन के बाद आयकर अधिनियम 1961 ने एक प्रावधान बनाया जिसमें कहा गया है कि बिजली उत्पन्न करने और वितरित करने वाले व्यवसाय में शामिल इकाई को अतिरिक्त मूल्यह्रास दिया जा सकता है। आंध्र प्रदेश राज्य बनाम एनटीपीसी  के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बिजली का संचरण, हस्तांतरण और वितरण किया जा सकता है। इसलिए इस तर्क पर, आयकर अधिकारी एक निर्धारिती को बिजली उत्पादन के लिए अतिरिक्त मूल्यह्रास का दावा करने से इनकार नहीं कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारिती  के पक्ष में फैसला सुनाया और माना कि बिजली उत्पादन करने वाला निर्धारिती आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32 (1) (iia) के तहत अतिरिक्त मूल्यह्रास की कटौती का दावा कर सकता है।

निष्कर्ष  

आयकर अधिनियम, 1961 के धारा 32 मूल्यह्रास के कारण अनिवार्य कटौती की अनुमति देता है। हालांकि, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32 के तहत कटौती का दावा करने के लिए एक निर्धारिती को कुछ शर्तों को पूरा करना होगा। लिखित विधि आयकर अधिनियम के तहत मूल्यह्रास की गणना करने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32(1)(iia) के अनुसार, एक निर्धारिती अतिरिक्त मूल्यह्रास का दावा कर सकता है। मूल्यह्रास निर्धारिती को कई तरह से मदद करता है, कभी-कभी यह वित्तीय प्रबंधन में मदद करता है और कभी-कभी यह कर बचत विकल्प के रूप में कार्य करता है।

संदर्भ

  1. Income Tax Act, 1961.
  2. Tax law book by Taxman.
  3. https://cleartax.in/s/depreciation-income-tax-act

भारत में अनाचार

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यह लेख Barathwaz T द्वारा लिखा गया है और इसे Gauri Gupta द्वारा अद्यतन किया गया है। यह भारत में अनाचार (इंसेस्ट) की वैधता पर प्रकाश डालता है, जो भारत में विभिन्न समुदायों के विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित है। अनाचार एक जटिल मुद्दा है जो विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी कारकों से प्रभावित होता है। यह लेख भारत में अनाचार की अवधारणा के इर्द-गिर्द घूमती अस्पष्टताओं के बारे में चर्चा करता है तथा विभिन्न कानूनों और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की भूमिका पर प्रकाश डालता है, जिन्होंने भारत में अनाचार की अवधारणा को विकसित करने में भूमिका निभाई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत में कई समुदायों के लिए अनाचार एक कठोर वास्तविकता है। यह किसी व्यक्ति के परिवार के सबसे सुरक्षित वातावरण में प्रचलित है। इस मुद्दे पर शायद ही कभी बात की जाती है, जिसके कारण जागरूकता की कमी और गलत के प्रति समझ की कमी होती है। परिणामस्वरूप, कई पीड़ित चुपचाप पीड़ित रहते हैं और उनके लिए दुर्व्यवहार से सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है। कानून में इस अंतर ने अपराधियों को सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया है, जिससे भारतीय घरों में अनाचार के चक्र को तोड़ना कठिन हो गया है। 

अनाचार विभिन्न रूपों में हो सकता है और यह एक वयस्क और बच्चे के बीच, भाई-बहनों के बीच, तथा दो सहमति देने वाले वयस्कों के बीच भी हो सकता है। अनाचार का सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया रूप एक वयस्क और एक बच्चे के बीच होता है और इसे किशोर अनाचार के रूप में भी जाना जाता है। 

प्राचीन काल में अनाचार का विकास एक ही रिश्तेदारी के व्यक्तियों के शाही वंश की रक्षा करने के माध्यम के रूप में हुआ था, ताकि गैर-शाही कुलों में सत्ता का प्रसार रोका जा सके। जल्द ही यह संबंध एक निषिद्ध प्रकार का हो गया, क्योंकि इससे संतानों में बहुआयामी आनुवंशिक विकलांगता उत्पन्न हो गई। 

लेकिन ऐसे रिश्ते की स्थिति क्या है? क्या यह अवैध है? क्या इससे ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जाएगी? ऐसे सभी प्रश्नों पर लेख में विस्तार से चर्चा की जाएगी। 

अनाचार का अर्थ और अवधारणा

अनाचार शब्द लैटिन शब्द “इन्सेस्टस” से लिया गया है जिसका अर्थ है “अशुद्ध”। जोहान जैकब बाचोफेन को उन शुरुआती विद्वानों में से एक माना जाता है जिन्होंने समाज में वर्जित विषय के रूप में अनाचार की उत्पत्ति पर अनेक सिद्धांतों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। इसके अलावा, प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम का दृढ़ विश्वास था कि अनाचार संबंध की अवधारणा का आविष्कार किया गया था और यह मनुष्यों के बीच संगठन का मूल रूप नहीं था। 

1960 के दशक के अंत तक मानवविज्ञानी इस बात को लेकर आश्वस्त हो गए थे कि अनाचार की अवधारणा सार्वभौमिक प्रकृति की नहीं है तथा इसे विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग ढंग से लागू किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि अनाचार की अवधारणा दुनिया भर के विभिन्न देशों की विभिन्न संस्कृतियों और नैतिकताओं के साथ जुड़ी हुई है। हालाँकि, सभी देशों के लिए चिंता का एक कारण समान था, वह था अनाचार से जुड़ा जैविक जोखिम। हालाँकि, समकालीन समय में, विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानून और विभिन्न देशों के राष्ट्रीय कानून, अनाचार की अवधारणा को नियंत्रित कर रहे हैं, और इस तरह के विनियमन को विभिन्न समुदायों के इतिहास, संस्कृति और धार्मिक मूल्यों के प्रकाश में नियंत्रित किया जाता है। 

ब्रुनेई, ईरान, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात और सूडान सहित अधिकांश देशों ने अनाचार संबंधों को अपराध घोषित कर दिया है। ये देश उन सभी लोगों को मृत्युदंड का प्रावधान करते हैं जो अनाचार के अपराध के लिए दोषी पाए जाते हैं। दूसरी ओर, भारत, ब्राजील और जापान जैसे देश भी हैं, जो स्पष्ट रूप से अनाचार संबंधों पर प्रतिबंध नहीं लगाते हैं। 

प्राचीन भारतीय कामुकता और अनाचार मानदंड

प्राचीन भारत में कामुकता को अक्सर बहुआयामी और कभी-कभी विरोधाभासी माना जाता था। भारतीय उपमहाद्वीप उन प्राचीनतम स्थानों में से एक है जहां पुस्तकों और अन्य स्रोतों के माध्यम से कामुकता पर व्यापक रूप से चर्चा की गई है। दक्षिण भारत के कई भागों में तथा कुछ हद तक उत्तर भारत में भी नग्नता को स्वीकार किया गया था, जैसा कि अजंता की गुफाओं तथा कुछ प्राचीन मूर्तियों में दर्शाया गया है। 

भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास समझना बहुत जटिल है क्योंकि इसकी विविधता और जटिल सभ्यता संरचनाएं इसके विकासवादी पहलू पर बहुत अधिक ध्यान देने की मांग करती हैं। ऐसे महत्वपूर्ण भूगोल के लोगों ने कामुकता को बहुत अधिक महत्व दिया है, जो आंतरिक रूप से धर्म से जुड़ी हुई है। बहुत सारे प्राचीन ग्रंथ, कलाएं, खेल और मूर्तियां प्राचीन भारत में कामुकता से जुड़े महत्व को दर्शाती हैं। 

कामासूत्र, एक प्राचीन ग्रंथ जो प्रेमसंपादन, कामुकता (सेक्सुअलिटी) और रोमांटिक रिश्तों पर गहराई से चर्चा करता है, यह अब तक खोजी गई सबसे पुरानी यौन-क्रिया नियमावली में से एक है; यह यौन करने की स्थितियों के बारे में विस्तार से बताता है। अनंग-रंगा एक और महत्वपूर्ण यौन-क्रिया नियमावली है जो पुरुष केंद्रित है और आनंद क्षेत्रों और उत्तेजना बिंदुओं के बारे में विस्तार से बात करता है। 

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है; कामुकता पर विस्तार से चर्चा करने वाला सबसे पुराना ग्रंथ भारत से ही आया था। हिंदू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध और प्राचीन ग्रंथ भारत में कामुकता के शुरुआती स्रोत थे, जिनमें कामुकता, परिवार, रिश्ते और प्रजनन प्रार्थना के नैतिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई थी। ये ग्रंथ हमें प्राचीन हिंदुओं के बहुविवाह और बहुपतित्व संबंधों में शामिल होने का संकेत भी देते हैं। इसका उद्देश्य शाही वंश की रक्षा करना था, तथा शेष लोगों को एकपत्नीत्व तक ही सीमित रखा गया था। 

अधिकांश उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में लोग जलवायु कारणों से अपने ऊपरी शरीर को नहीं ढकते थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह भी पता चलता है कि समाज का धनी वर्ग अपने ऊपरी शरीर को ढकने के लिए सोना और अन्य आभूषण पहनता था, तथा शेष लोग केवल निचले शरीर को ढके हुए खुले धड़ के साथ जीवित रहते थे। 

10वीं और 12वीं शताब्दी के दौरान निर्मित प्राचीन भारतीय कला में कामुकता और प्रेमसंपादन के विचार को खुलकर व्यक्त किया गया। कामासूत्र में वर्णित सभी यौन स्थितियों को दर्शाती मंदिर की मूर्तियां प्राचीन भारत की कामुकता का हिस्सा थीं; विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ये मूर्तियां यौन शिक्षा का हिस्सा थीं। यहां शिक्षा का प्रयोग बहुत ही शिथिलता से किया जाता है, क्योंकि शिक्षा के बारे में हमारी आधुनिक समझ पूरी तरह से अलग है। शेख नेफजौई का परफ्यूम्ड गार्डन इस्लामी धर्म का एक शास्त्रीय  यौन-क्रिया नियमावली है। 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विभिन्न कवियों ने प्रेमसंपादन और यौन की प्रक्रिया का काव्यात्मक वर्णन किया, जिसने श्रोताओं को काफी आकर्षित किया। 

भारतीयों की ऐसी उदार विचारधारा उपमहाद्वीप पर औपनिवेशिक आक्रमण के साथ ही लुप्त होने लगी, जहां कामुकता के सार्वजनिक चित्रण को कलंकित करने की पश्चिमी विचारधारा फैलने लगी। 1857 के विद्रोह के दौरान, जब विक्टोरियन शासन भारत के राजनीतिक क्षेत्र में घुसपैठ कर चुका था, तब कामुकता के प्रति भारतीय उदारीकरण को नापसंद किया गया, उसका उपहास किया गया और उसे निम्न माना गया। उनका उपहास किया जाता है, तथा उन्हें हीन समझा जाता है। विडंबना यह है कि इस नए दृष्टिकोण के कारण महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा मिला और विवाह के भीतर भी कामुकता के प्रति शुद्धतावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है। 

अनाचार एक नैतिक गलती है

मुख्यतः दो कारणों से अनाचार को नैतिक रूप से गलत माना जाता है: 

  • अनाचारपूर्ण संबंध से उत्पन्न होने वाले बच्चे से जुड़ा आनुवंशिक जोखिम, और
  • इस अनाचार के कारण परिवार के सदस्यों के बीच भारी मतभेद उत्पन्न हो सकता है। 

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अनाचारपूर्ण संबंधों से परिवार के भीतर सत्ता का शोषण हो सकता है, क्योंकि ऐसे मामले भी हो सकते हैं जहां अनाचारपूर्ण संबंधों के लिए दी गई सहमति दबाव के कारण हो सकती है। इसका एक उदाहरण यह है कि जहां कोई अधिकारी व्यक्ति, जैसे कि कोई रिश्तेदार जो किसी बच्चे की वित्तीय, शैक्षिक और सामाजिक भलाई का प्रभारी है, अपने प्रभाव का उपयोग करके बच्चे की सहमति लेकर उसके साथ यौन संबंध बनाता है और यदि वह मना करती है तो उसे घर से बाहर निकाल देता है और उसकी शिक्षा शुल्क का भुगतान नहीं करता है। 

सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड भी कौटुम्बिक व्यभिचार को नैतिक रूप से गलत घोषित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लगभग सभी समाजों में अनाचार को वर्जित माना जाता है, मुख्यतः इसलिए कि इससे समाज में रिश्तेदारी की नींव नष्ट होने का खतरा रहता है। अनाचारपूर्ण संबंध व्यक्ति के साथ-साथ पूरे समुदाय के लिए हानिकारक होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अनाचार का समाज की स्थिरता और सद्भाव पर सीधा प्रभाव पड़ता है। 

यह भी तर्क दिया जाता है कि यदि दो व्यक्तियों के बीच सहमति से अनाचारपूर्ण संबंध स्थापित होता है, तो इसे नैतिक रूप से गलत नहीं कहा जा सकता है। इसके पीछे कारण यह है कि यदि दोनों पक्षों को अनाचारपूर्ण संबंध से जुड़े जोखिमों के बारे में पता है और फिर भी वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से और बिना किसी दबाव के ऐसे संबंध में शामिल होते हैं, तो ऐसे संबंध पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

भारत में अनाचार एक अपराध है

कोई कार्य तभी अपराध बन जाता है जब उसे कानून के तहत स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया जाता है, न कि केवल इसलिए कि वह कार्य अनैतिक या सामाजिक रूप से वर्जित है। अभी तक किसी भी कानून के तहत अनाचार अपराध नहीं है। ऐसा कोई विशिष्ट कानून या दंडात्मक प्रावधान नहीं है जो स्पष्ट रूप से अनाचारपूर्ण संबंध को आपराधिक गतिविधि घोषित करता हो, लेकिन वे अन्य यौन अपराधों जैसे कि गुदामैथुन, बलात्कार आदि के लिए प्रावधानों को आकर्षित कर सकते हैं। इसलिए, किसी व्यक्ति को अनाचारपूर्ण संबंध में शामिल होने के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी या दंडनीय नहीं ठहराया जा सकता, भले ही यह सामाजिक रूप से अस्वीकार्य और अप्रिय हो। 

इसलिए, यदि दो वयस्क आपसी सहमति से अनाचारपूर्ण संबंध में शामिल होते हैं तो यह कोई अपराध नहीं है। ऐसा करके वे किसी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करते, लेकिन इससे समाज की भावनाएं आहत हो सकती हैं। इसके अलावा, कुछ व्यक्तिगत कानून एक निश्चित सीमा तक कौटुम्बिक व्यभिचार की निंदा करते हैं। 

भारत में अनाचार पर कानूनों की प्रयोज्यता

2009 में मुंबई में एक घटना हुई जिसमें एक 60 वर्षीय पिता ने अपनी दोनों बेटियों के साथ नौ साल से अधिक समय तक बलात्कार किया, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया हैं। अपराधी पर केवल भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 के तहत बलात्कार का आरोप लगाया गया था (जिसे आगे “आईपीसी” और अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 (f) के रूप में संदर्भित किया गया है, जिसे आगे “बीएनएस” के रूप में संदर्भित किया गया है)। जो व्यक्ति नौ साल से अधिक समय तक अपनी बेटी के साथ जबरदस्ती करता है, उसे कौटुम्बिक व्यभिचार के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि दंड कानून इसे अपराध नहीं मानता है। 

अनाचार जैसे गंभीर मामलों में कानून की उदासीनता ऐसे कृत्य की स्वीकृति का मौन संदेश देगी। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि कानून के प्रति यह उदासीनता समाज की उपेक्षा और यह स्वीकार करने से इनकार का चित्रण है कि अनाचार मौजूद है। स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल है क्योंकि ज़्यादातर मामलों में पारिवारिक मूल्यों की रक्षा के लिए बच्चे के हितों की बलि दे दी जाती है। कई मामले तो रिपोर्ट ही नहीं किए जाते है। हालाँकि, एक हद तक, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की एक रिपोर्ट से पता चला है कि 2020 से 2021 तक, भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में 16.2% की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें दिल्ली 7118 बाल शोषण शिकायतों के साथ सूची में शीर्ष पर है। 

इसके अलावा, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक अन्य रिपोर्ट “भारत में अपराध 2022” के अनुसार हर घंटे सात बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की सूचना मिलती है, जिनमें से 2022 में 4 अपराध बलात्कार के होंगे। 

हालाँकि, ऐसा कोई कानून या प्रावधान नहीं है जो कौटुम्बिक व्यभिचार को दंडित करता हो या अपराध मानता हो। 

भारतीय संसद ने समय-समय पर हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों के अलावा कौटुम्बिक व्यभिचार पर रोक लगाने के लिए कई विधेयक पेश किए हैं। इनमें शामिल हैं: 

  1. अनाचार अपराध विधेयक, 2009: इसे राज्य सभा में पेश किया गया और इसका उद्देश्य अनाचार से उत्पन्न अपराधों को दंडित करना है। 
  2. परिवार में अनाचार और यौन दुर्व्यवहार (अपराध) विधेयक, 2010: इसे भी पेश किया गया जिसका उद्देश्य अनाचार और घरेलू यौन दुर्व्यवहार के अपराधों को परिभाषित करना और अनाचार और घरेलू दुर्व्यवहार के कृत्यों को दंडित करने के लिए एक तंत्र प्रदान करना था। 

हालाँकि, इनमें से कोई भी विधेयक अभी तक संसद द्वारा पारित नहीं किया गया है। इसलिए, भारत में अनाचार अन्य प्रासंगिक प्रावधानों जैसे कि एचएमए की धारा 5 (iv) और (v) द्वारा शासित होता है जो क्रमशः सपिंड और निषेधात्मक संबंधों का प्रावधान करता है। इसके लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत दण्ड का प्रावधान है। 

अनाचार के बारे में कुछ आंकड़े

दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन राही (अनाचार से उबरना और उपचार) ने अपनी एक रिपोर्ट “वॉयसेज फ्रॉम द साइलेंट जोन” में खुलासा किया है कि भारत में मध्यम और उच्च वर्ग के घरों में तीन चौथाई से अधिक महिलाएं अनाचार की शिकार होती हैं। अधिकांशतः अपराधी महिला के चाचा, भाई, घरेलू सहायक या कोई अन्य व्यक्ति होता है, जिसके साथ महिला का विश्वासपात्र संबंध बन जाता है। फर्म के संस्थापक ने यह भी कहा कि “इन वर्जित दुर्व्यवहारों के संबंध में कानून में कमी समाज की अपरिपक्वता को दर्शाती है, जो इसे स्वीकार करने में अपरिपक्व है, और इससे यह संदेश भी जाता है कि ऐसा करना कोई गंभीर अपराध नहीं है। 

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान द्वारा 2018 में आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी और कृष्णा जिलों में बच्चों और वयस्कों के साथ दुर्व्यवहार और सुरक्षा पर किए गए एक अध्ययन से पता चला कि छोटे बच्चों में शारीरिक दंड का डर था। अध्ययन से यह भी पता चला कि लड़कियों को सार्वजनिक और निजी दोनों स्थानों पर यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तथा समर्थन की कमी और सामाजिक कलंक के कारण दुर्व्यवहार का सामना करने वाली ये लड़कियां अलग-थलग पड़ जाती हैं। 

चेन्नई स्थित गैर सरकारी संगठन तुलिर-सीपीएचसीएसए (बाल यौन शोषण की रोकथाम और उपचार केंद्र) की संस्थापक विद्या रेड्डी ने बताया कि दुर्व्यवहार करने वाले वे संदिग्ध और असभ्य दिखने वाले लोग नहीं होते हैं जो बाल यौन शोषण के शिकार होते हैं, बल्कि आमतौर पर यह ऐसा व्यक्ति होता है जिस पर बच्चा भरोसा करता है और वह व्यक्ति बिना किसी संदेह या संकोच के उस बच्चे के साथ यौन गतिविधि में लिप्त हो जाता है जिसके साथ बच्चा भरोसेमंद रिश्ता साझा करता है। 

अनाचार और हिंदू विवाह

भारत में विवाह प्रत्येक समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं। हिंदुओं के लिए, ये कानून हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (जिसे आगे “एचएमए” कहा जाएगा) के तहत प्रदान किए गए हैं। धारा 5 के तहत एचएमए वैध विवाह की शर्तें निर्धारित करता है और धारा 5(iv) और धारा 5(v) के तहत कुछ अनाचारपूर्ण विवाहों को भी प्रारंभ से ही शून्य घोषित करता है। प्रावधानों में निषिद्ध स्तर के संबंध और सपिंड संबंध का प्रावधान है, जो दोनों ही प्रकृति में अनाचारपूर्ण हैं और इस प्रकार प्रारम्भ से ही शून्य हैं। 

शून्य विवाह

एचएमए की धारा 5 के तहत, वैध विवाह के कुछ आवश्यक तत्वों को रेखांकित किया गया है। इनमें शामिल हैं: 

  • पक्षकारों का कोई जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए।
  • पक्षकार विकृत मानसिकता के नहीं होने चाहिए।
  • पक्ष प्रमुख होनी चाहिए।
  • पक्षों के बीच संबंध निषिद्ध सीमा के भीतर नहीं होने चाहिए।

यदि इन शर्तों का उल्लंघन किया जाता है तो कानून के अनुसार विवाह अमान्य हो जाता है। 

भारत में अनाचार से संबंधित कानून के निम्नलिखित प्रावधान हैं: 

निषिद्ध संबंध की डिक्री

एचएमए की धारा 5(iv) के तहत, दोनों पक्षों के बीच संबंध निषेधात्मक स्तर के अंतर्गत नहीं होंगे। ऐसे दो व्यक्तियों के बीच विवाह प्रारम्भ से ही शून्य माना जाता है। 

पक्षों को निषिद्ध स्तर के संबंध में माना जाता है यदि वे: 

  • एक दूसरे के रैखिक आरोही। 

उदाहरण: यदि A और B क्रमशः माता और पुत्र हैं।

यदि A और B क्रमशः दादा और पोती हैं।

  • रेखीय पूर्वजों या वंशजों का जीवनसाथी / गर्भाशय रक्त संबंध। 

उदाहरण: यदि A और B क्रमशः सास और दामाद हैं। 

यदि A और B क्रमशः सौतेले पिता और सौतेली पुत्री हैं।

  • भाई-बहन और भाई-बहनों के जीवनसाथी। 

उदाहरण: यदि A और B क्रमशः भाई और बहन हैं।

यदि A और B क्रमशः जीजा और भाभी हैं,

  • वंशानुगत लग्न या वंशजों के भाई-बहन। 

उदाहरण: यदि A और B क्रमशः दादा और पोती के भाई हैं। चाचा और भतीजी; चाची और भतीजा।  

संजीव कुमार महतो बनाम रेखा महतो (2018) के मामले में, झारखंड उच्च न्यायालय को इस मुद्दे से निपटना था कि क्या याचिकाकर्ता का अपनी भांजी से विवाह करना निषिद्ध संबंध की श्रेणी में आएगा। इस मामले में अपीलकर्ता इस आधार पर विवाह को रद्द करने की मांग कर रहा था कि यह संबंध निषिद्ध सीमा के अंतर्गत था। अदालत ने उक्त अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अदालत को इस संबंध में कोई सबूत नहीं दिया गया था। 

हालाँकि, इस धारा का उस समुदाय की स्थापित प्रथा पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा जिसके अंतर्गत पति-पत्नी आते हैं। 

दूसरे शब्दों में, धारा 5(iv) एक अपवाद का प्रावधान करती है, जो किसी पक्ष की सुस्थापित प्रथा है, जो ऐसे अनाचारपूर्ण विवाह की अनुमति देती है। इसका एक उदाहरण शकुंतला देवी बनाम अमर नाथ (1982) का मामला है, जिसमें पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर फैसला दिया था कि क्या दो लोग रिश्ते की निषिद्ध डिक्री के भीतर विवाह कर सकते हैं।

अदालत ने कहा कि यदि दो लोग निषिद्ध रिश्ते के अंतर्गत विवाह कर रहे हैं, तो उन्हें यह दिखाना होगा कि ऐसा करना एक स्थापित प्रथा है। वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता इस आधार पर विवाह को रद्द करना चाहता था कि यह रिश्ते की निषिद्ध डिक्री के अंतर्गत आता है, लेकिन अदालत ने माना कि दोनों पक्ष अरोड़ा समुदाय के अंतर्गत आते हैं, जिनमें पति-पत्नी के बीच निषिद्ध डिक्री के बारे में उदार रुख रखने की प्रथा है। 

सपिंडा अनाचार संबंध

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(v) में प्रावधान है कि दुल्हन और दूल्हे के बीच सपिंड संबंध नहीं होगा। यदि ऐसे पक्ष विवाह कर लेते हैं तो यह एचएमए के तहत अमान्य विवाह होगा। 

सपिंडा सम्बन्ध निम्नलिखित के बीच पाया जाता है:

  • पैतृक पक्ष के वंशानुगत आरोहण से पांच पीढ़ियां, जिनमें पांचवीं पीढ़ी भी शामिल है; तथा
  • मातृ पक्ष के वंशानुगत आरोहण से तीन पीढ़ियाँ, जिसमें तीसरी पीढ़ी भी शामिल है। आमतौर पर, ऊपर की ओर जाने वाली रेखा में शामिल व्यक्ति को पहली पीढ़ी के रूप में माना जाता है। 

उदाहरण: यदि दूल्हा पिता की ओर से पांचवीं पीढ़ी सहित पांच पीढ़ियों के किसी भी वंशज की संतान है, या माता की ओर से तीसरी पीढ़ी सहित तीन पीढ़ियों की संतान है और इसके विपरीत। इस मामले में, विवाह के दोनों पक्षों को “सपिंडा” माना जाता है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत उनका विवाह निषिद्ध है। 

निषिद्ध संबंधों की तरह, सपिंड संबंध में विवाह की भी अनुमति दी जा सकती है, यदि इसके लिए लंबे समय से स्थापित प्रथा मौजूद हो। 

अरुण लक्ष्मणराव नवलकर बनाम मीना अरुण नवलकर (2006) मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष एक मुद्दा यह था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत सपिंडा विवाह को शून्य किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि जब तक सपिंडा विवाह के लिए कोई प्रथा स्थापित नहीं हो जाती, तब तक विवाह शून्य होगा। वर्तमान मामले में, न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह साबित करने का भार पत्नी पर होगा कि उसके समुदाय में सपिंडा विवाह की प्रथा थी। वर्तमान मामले में अदालत पत्नी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से संतुष्ट नहीं हुई तथा उसने माना कि विवाह शून्य होगा। 

नीतू ग्रोवर बनाम भारत संघ एवं अन्य (2024) के मामले में दिल्ली की अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम दो हिंदू वयस्कों के बीच विवाह पर रोक लगाता है, यदि वे एक दूसरे के सपिंडा हों। यह एक अनाचारपूर्ण संबंध है और इसलिए हिंदू कानून के तहत शून्य है। हालाँकि, इसका अपवाद इन पक्षों को नियंत्रित करने वाली प्रथा या प्रचलन है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के विवाह के निर्णय को कानून की सीमाओं और समाज के हितों के साथ संतुलित करना महत्वपूर्ण है। 

इस प्रकार, हिंदू कानून हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(iv) और धारा 5(v) के तहत अनाचार संबंधों को प्रतिबंधित करता है। इसके पीछे तर्क यह है कि पारिवारिक संरचना को संरक्षित रखा जाए, अनाचारपूर्ण संबंधों के शिकार लोगों के शोषण को रोका जाए, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां पीड़ितों पर किसी का प्रभुत्व हो, संतानों में आनुवंशिक विकारों की संभावना को रोका जाए, तथा नैतिक समाज के सांस्कृतिक और नैतिक मानकों को लागू किया जाए। 

मुस्लिम विवाह और अनाचार

मुस्लिम विवाह व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं, जो इस्लाम के भीतर प्रत्येक संप्रदाय, शिया और सुन्नी, के लिए विशिष्ट होते हैं। इन संप्रदायों की राजनीतिक विचारधाराएं अलग-अलग हैं और मुस्लिम न्यायशास्त्र की उनकी व्याख्याएं भी अलग-अलग हैं। इसमें विवाह कानून भी शामिल हैं। इस प्रकार, शिया और सुन्नी दोनों विधि-संप्रदाय अनाचार संबंधों की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, तथा दोनों ही विधि-संप्रदायों में इसे अलग-अलग आधारों पर प्रतिबंधित किया गया है। 

मुस्लिम न्यायशास्त्र के अंतर्गत विवाहों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है: 

  • शाहीह: वैध विवाह।
  • फ़ासिद: विवाह का एक अनियमित रूप।
  • बातिल: शून्य विवाह। 

सुन्नी विचारधारा के विपरीत, शिया विचारधारा अमान्य और अनियमित विवाह के बीच अंतर नहीं करती है। हालाँकि, दोनों विचारधाराओं में जो बात समान है वह है अनाचारपूर्ण संबंधों पर पूर्ण प्रतिबंध। 

शिया कानून के तहत अनाचार संबंधों के निषेध के आधार

शिया विचारधारा ने निम्नलिखित तीन आधारों पर विवाह को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है:

रक्तसंबंध

रक्त-सम्बन्ध से तात्पर्य रक्त सम्बन्ध से है, और यदि वर-वधू एक-दूसरे के रक्त-सम्बन्धी हैं, तो उनका विवाह निषिद्ध है। इसमे शामिल है:

पुरुषों को निम्नलिखित विवाह करने से प्रतिबंधित किया गया है: 

  • उनकी माँ या दादी, चाहे कितनी भी दूर क्यों न हों।
  • उनकी बेटी या पोती, चाहे वह कितनी भी दूर की क्यों न हो।
  • उनकी गर्भाशयी या सजातीय बहन।
  • उनकी भतीजी और पोती
  • उनके माता-पिता या मामा और परमाता। 

आत्मीयता

आत्मीयता से तात्पर्य उन रिश्तों से है जो विवाह से उत्पन्न होते हैं। किसी पुरुष को ऐसी स्त्री से विवाह करने पर प्रतिबन्ध है जो उसकी पत्नी के माध्यम से उससे सम्बन्धित हो। यही बात तब भी लागू होगी जब विवाह व्यभिचार पर आधारित हो या अवैध हो। यही नियम महिलाओं पर भी उनके पतियों के संबंध में लागू होता है।

पुरुषों को निम्नलिखित विवाह करने से प्रतिबंधित किया गया है: 

  • उनकी पत्नी की माँ या दादी। 
  • उनकी पत्नी की बेटी या पोती।
  • उनके पिता की पत्नी या उनके दादा की पत्नी
  • उनके बेटे की पत्नी या पोते की पत्नी।

महिलाओं को निम्नलिखित विवाह करने से रोका गया है:

  • उनके पति के पिता या दादा।
  • उनके पति का बेटा या पोता।

पालन-पोषण

पालन-पोषण एक अनोखा प्रकार का संबंध है जिसे इस्लाम में मान्यता प्राप्त है। यह उस रिश्ते को संदर्भित करता है जिसमें किसी बच्चे को दो वर्ष की आयु से पहले उसकी जैविक मां के अलावा किसी अन्य महिला द्वारा दूध पिलाया जाता है। ऐसे रिश्ते विवाह पर रक्त संबंधों जैसा ही प्रतिबंध लगाते हैं।

पुरुषों को निम्नलिखित विवाह करने से प्रतिबंधित किया गया है:

  • उनकी पालन पोषण करने वाली माँ
  • उनके पालन पोषण करने वाली पुत्र की पत्नी 
  • उनकी पालन पोषण करने वाली बहन

सुन्नी कानून के तहत अनाचारपूर्ण संबंधों के निषेध के आधार

सुन्नी विचारधारा में भी शिया विचारधारा की तरह ही अनाचारपूर्ण विवाह पर प्रतिबंध है। हालाँकि, इसमें पालन-पोषण के नियम में कुछ अपवादों का प्रावधान किया गया है। इसमें प्रावधान है कि एक सुन्नी व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ वैध विवाह कर सकता है: 

  • भाई-बहन का पालन पोषण करने वाली माँ
  • पालन पोषण करने वाली बहन की माँ
  • पालन पोषण करने वाली पुत्री
  • पालन पोषण करने वाली बहन

शिया संप्रदाय इन अपवादों को मान्यता नहीं देता है और पालक-संबंधियों के बीच कोई भी विवाह शून्य है।

विशेष विवाह अधिनियम और अनाचार

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 को उन विवाहों को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अधिनियमित किया गया था, जो विभिन्न प्रकार के धार्मिक रीति-रिवाजों के कारण अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाहों को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। यह अधिनियम, अन्य सभी व्यक्तिगत कानूनों की तरह, रक्त संबंधियों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगाता है। अधिनियम की धारा 4 में कहा गया है कि विवाह करने वाले पक्षों को निषिद्ध रिश्ते की सीमा के भीतर नहीं होना चाहिए। यह निम्नलिखित के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगाता है: 

  • आधे या गर्भाशय के रक्त के साथ-साथ पूर्ण रक्त से संबंध;
  • वैध के साथ-साथ नाजायज रक्त संबंध भी;
  • गोद लेने के साथ-साथ रक्त संबंध भी शामिल है। 

अधिनियम में स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि ऐसे रिश्तेदारों के बीच विवाह अमान्य होगा। निषिद्ध सम्बन्ध की डिग्री की अधिक स्पष्टता और विस्तृत सूची के लिए अधिनियम की अनुसूची I देखें। 

भारत में किशोर अनाचार

किशोर अनाचार का तात्पर्य किसी नाबालिग के साथ यौन संबंध से है। यह बच्चों की सुरक्षा तथा कमजोर वर्ग के लोगों की सुरक्षा के प्रति समाज के आचरण के मुद्दे पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। वर्तमान में भारत में किशोर यौन-संबंध को विनियमित करने वाले कोई कानून नहीं हैं। आपराधिक कानून “हानिकारक सिद्धांत” पर आधारित हैं, जो यह प्रावधान करता है कि जब किसी व्यक्ति के कार्य से दूसरे व्यक्ति को हानि पहुँचती है, तो उसे उपचार के माध्यम से ठीक किया जाना चाहिए। यह उपाय आपराधिक कानूनों के तहत कारावास और जुर्माने के रूप में दंड है। यहां तक कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 भी अनाचार के कारण होने वाले यौन शोषण को मान्यता देने में विफल रहा है। इसके अलावा, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956 की धारा 5 बाल वेश्यावृत्ति में लिप्त होने पर दण्ड का प्रावधान करती है, लेकिन यौन शोषण से संबंधित नहीं है।

दूसरी ओर, लैंगिक अपराधों से बालकों का निवारण अधिनियम, 2012 (पोक्सो) के अंतर्गत, अध्याय II के अंतर्गत नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाना दंडनीय अपराध है। हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि नाबालिग के साथ अनाचारपूर्ण संबंध, नाबालिग के साथ बलात्कार करने से भी अधिक गंभीर और गलत कार्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे मामलों में उनकी व्यक्तिगत गरिमा के विरुद्ध नुकसान और अन्याय की मात्रा और भी अधिक होती है। इसलिए, नाबालिग के साथ अनाचारपूर्ण संबंध को बलात्कार से भी अधिक कठोर दंड दिया जाना महत्वपूर्ण है। 

नाबालिगों को अनाचार से बचाने के लिए कानून बनाने का महत्व न केवल नाबालिगों के साथ अनाचारपूर्ण संबंधों के मामलों की बढ़ती संख्या पर आधारित है, बल्कि बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1989) के अनुच्छेद 19 के तहत भारत के दायित्व पर भी आधारित है। भारत इस अभिसमय पर हस्ताक्षरकर्ता है और इस प्रकार भारत में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है। किशोर अनाचार के दोषी व्यक्तियों को दण्डित करने वाला कानून समाज से अनाचार के अपराध को समाप्त करने तथा पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

अनाचारपूर्ण संबंध से पैदा हुए बच्चों की स्थिति

मुस्लिम कानून

मुस्लिम कानून के तहत, अनाचारपूर्ण संबंध से पैदा हुआ बच्चा नाजायज माना जाता है। यह अवैधता केवल अनाचारपूर्ण संबंधों से ही नहीं, बल्कि विवाह के किसी भी अवैध रूप से उत्पन्न हो सकती है। 

मुस्लिम कानून के तहत अवैध विवाह से पैदा हुए सभी नाजायज बच्चे भरण-पोषण और विरासत के हकदार हैं; मुस्लिम कानून के विभिन्न स्रोतों में इस स्थिति को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया गया है। 

मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के तहत, भरण-पोषण से संबंधित कानून को निम्नलिखित बिंदुओं में संक्षेपित किया जा सकता है:

  • हेदया: इसका अर्थ है “मार्गदर्शन” और यह प्रावधान करता है कि बच्चे को भोजन, आवास, शिक्षा आदि सहित जीवन की आवश्यकताएं प्रदान की जानी चाहिए।
  • फतवा-ए-आलमगीर: इसमें प्रावधान है कि नाजायज बच्चे को जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान की जानी चाहिए। इस्लाम के आधिकारिक ग्रंथों में विरासत की अवधारणा और बच्चों को जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है; हालांकि, व्यवहार में यह केवल सुरक्षित और स्वच्छ भोजन तक ही सीमित है। 
  • “नुलियस फिलियस” का सामान्य कानूनी सिद्धांत, जिसका अर्थ है “किसी का पुत्र नहीं”, एक नाजायज बच्चे को इन बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973): बीएनएसएस की धारा 144 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 125) विरोधाभासी कानूनों में अस्पष्टता को स्पष्ट करती है, जिसमें एक ओर हेदया में प्रावधान है कि पिता को अपनी नाजायज संतान की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होगी और दूसरी ओर कुरान ऐसी बुनियादी आवश्यकताओं को भोजन तक सीमित करता है और नाजायज बच्चों के भरण-पोषण के संबंध में कानून को स्थापित करता है। यह बीएनएसएस की धारा 144 के अंतर्गत पिता पर अपनी नाजायज संतान का भरण-पोषण करने का दायित्व डालता है। 

सुखा बनाम निन्नी (1965) के मामले में, राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या मुस्लिम पिता के साथ भरण-पोषण का अनुबंध प्रवर्तनीय था। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तर्क यह थे कि ऐसा अनुबंध भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 के अंतर्गत शून्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा अनुबंध मुस्लिम कानून के प्रावधानों के विरुद्ध होगा। अदालत ने कहा कि ऐसा अनुबंध मुस्लिम कानून का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दिया जाने वाला भरण-पोषण सार्वजनिक नीति के अनुरूप है। 

उत्तराधिकार के संबंध में कानून की स्थापित स्थिति यह है कि:

  1. शिया कानून: शिया कानून “नुलियस फिलियस” के सिद्धांत का सख्ती से पालन करता है और किसी भी मुस्लिम कानून के तहत किसी भी प्रकार के भरण-पोषण की गुंजाइश नहीं देता है। शिया कानून में, नाजायज संतान को न तो अपनी मां से और न ही अपने पिता से उत्तराधिकार मिल सकता है।
  2. हनफ़ी कानून: हनफ़ी कानून की स्थिति इस अर्थ में इतनी सख्त नहीं है। नाजायज बच्चे को 7 वर्ष की आयु तक मां की देखभाल में छोड़ना होगा। इसके बाद बच्चा अपनी मां की ओर से संपत्ति प्राप्त कर सकता है, लेकिन पिता का बच्चे के प्रति कोई दायित्व नहीं होता है।

हिंदू कानून

हिंदू कानून के तहत विवाह की शर्तों का उल्लंघन करने वाला कोई भी विवाह अमान्य है, तथा ऐसे रिश्ते से पैदा हुआ कोई भी बच्चा नाजायज माना जाता है। ऐसे बच्चे के केवल कुछ अधिकारों को ही मान्यता दी गई है, लेकिन विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976, जिसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 में संशोधन किया, ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह से पैदा हुए सभी बच्चों को वैधता का दर्जा प्रदान किया, भले ही ऐसा बच्चा अमान्य विवाह से पैदा हुआ हो। 

जिनिया केओटिन एवं अन्य बनाम कुमार सीताराम मांझी एवं अन्य (2002) के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 3 में दिए गए शब्द “संपत्ति” के इर्द-गिर्द अस्पष्टता के मुद्दे की जांच की थी। यह तर्क दिया गया कि “संपत्ति” शब्द में माता-पिता की स्वयं अर्जित और पैतृक संपत्ति दोनों शामिल हैं। न्यायालय ने कहा कि “संपत्ति” शब्द में केवल स्वयं अर्जित संपत्ति ही शामिल होगी, पैतृक संपत्ति नहीं, जब बात उत्तराधिकार या बच्चों द्वारा अनाचारपूर्ण संबंध से उत्पन्न उत्तराधिकार की हो। 

रेवनसिद्धप्पा बनाम मल्लिकार्जुन (2023) के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जिनिया केओटिन और अन्य बनाम कुमार सीताराम मांझी और अन्य (2002) के मामले में संकीर्ण व्याख्या का उपयोग करके फैसला किया गया था, जो सही व्याख्या नहीं थी, और माना कि “संपत्ति” शब्द में पैतृक संपत्ति सहित माता-पिता की सभी संपत्ति भी शामिल होगी, क्योंकि यह बच्चे की गलती नहीं है कि वह एक शून्य विवाह से पैदा हुआ था। 

अनाचार कानून की आवश्यकता

पीड़ितों को विश्वास और शक्ति के दुरुपयोग से बचाने के लिए अनाचार पर स्पष्ट नियम और दंड स्थापित करना महत्वपूर्ण है। बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण को बढ़ावा देना तथा उनके अभिभावकों की जवाबदेही को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है। भारत में अनाचार संबंधी कारणों को विनियमित करने के लिए कानून का अभाव है, और निम्नलिखित कारण स्पष्ट रूप से ऐसे कानूनों की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं:

  • अनाचारपूर्ण रिश्ते, विशेषकर परिवारों के भीतर, शक्ति असंतुलन पैदा करते हैं। इससे पीड़ित के साथ जबरदस्ती, छल-कपट और दुर्व्यवहार होता है। अनाचार से जुड़ी वर्जनाओं के कारण परिवारों में विभाजन हुआ है, इसलिए स्थायित्व और सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए इसे अपराध घोषित करने की आवश्यकता है। अनाचार संबंधों के मामलों में जो बात अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है, वह है पीड़ित का भावनात्मक शोषण, जिसमें शर्म, अपराधबोध और आघात शामिल होता है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर आजीवन मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और अधिकांश मामलों में आत्महत्या भी हो जाती है। 
  • अनाचारपूर्ण संबंधों से उत्पन्न संतानों में आनुवंशिक विकार उत्पन्न होने का जोखिम अधिक होता है, क्योंकि उनके डीएनए का प्रतिशत अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप आनुवंशिक उत्परिवर्तन होता है और इस प्रकार बच्चे के जीवन को जन्म दोष और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं सहित गंभीर बीमारियों के खतरे में डाल देता है। 
  • अधिकांश रिश्तों और समुदायों में अनाचार को न केवल एक गैरकानूनी कृत्य माना जाता है, बल्कि यह एक नैतिक या नीतिपरक (एथिकल) गलत कार्य भी है। इस प्रकार, ऐसे समूहों के नैतिक मूल्यों का सम्मान करने तथा भावी पीढ़ियों के लिए नैतिकता को सुदृढ़ करने के लिए, अनाचार पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून बनाना महत्वपूर्ण है। 
  • विश्व भर के अधिकांश देशों में अनाचार पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून हैं। इसलिए, मानवाधिकारों, महिलाओं की सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ संरेखण सुनिश्चित करने के लिए, अनाचार पर कानून लागू करना महत्वपूर्ण है। 

इस प्रकार, व्यक्तियों की सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं के साथ संरेखण सुनिश्चित करने के लिए भारत में अनाचार को प्रतिबंधित करने वाले कानून बनाना समय की मांग है। इसके अलावा, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अपराध के लिए दोषी पाए गए लोगों को सजा दी जाए, जो विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों के अनुरूप होगी, जिसमें कहा गया है कि अनाचारपूर्ण संबंध व्यक्ति के सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है, विशेष रूप से उन मामलों में जहां यह गैर-सहमति से हुआ हो। 

निष्कर्ष

भारतीय कानूनी ढांचे में किसी भी कानून या प्रावधान का प्रावधान नहीं है जो अनाचार को दंडित करता हो या अपराध के रूप में मान्यता देता हो। जहां एक ओर अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे अन्य देशों ने अनाचार के खिलाफ सख्त सजा और कानून बनाए हैं, वहीं भारत में अभी भी ऐसे कानूनों का अभाव है। यूनाइटेड किंगडम में 1980 में ही अनाचार संबंधी कानून लागू कर दिए गए थे। ब्रिटेन में अनाचारपूर्ण संबंध एक अपराध और दंडनीय अपराध है। अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में कारावास की अवधि अलग-अलग है, मैसाचुसेट्स में अधिकतम 20 साल तक की सजा है। हवाई में यह अवधि 5 साल है। 

कुछ देशों ने तो अनाचार के विरुद्ध कानूनों को भी कमजोर कर दिया है; वे इसे उदारीकरण का एक रूप मानते हैं। कई देशों में निकट संबंधियों के साथ यौन क्रियाकलाप अपराध हुआ करता था, जिसके प्रति अब कई देशों ने उदार रुख अपनाया है। नाबालिग के साथ किया गया अनाचार अभी भी उन कई देशों में घृणित माना जाता है, जिन्होंने अनाचार के संबंध में उदार रुख अपनाया है। 

भारत में अनाचार के संबंध में यह दृष्टिकोण है कि अनाचार कभी भी सहमति से नहीं होता; यह प्रायः व्यक्तियों द्वारा बल और प्रभुत्व की अभिव्यक्ति होती है। सत्ता एक ऐसे उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है जो परिवार के भीतर अनाचार को बढ़ावा देती है। जब बात अनाचार की आती है तो इनकार और अविश्वास ही अधिकांशतः सामने आने वाली प्रतिक्रियाएं होती हैं, क्योंकि परिवार की प्रतिष्ठा को बच्चे के हित से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। अब समय आ गया है कि भारत अनाचार को अपराध के रूप में मान्यता दे। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या भारत में अनाचार एक अपराध है?

फिलहाल भारत में अनाचार को नियंत्रित करने के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं हैं। हालाँकि, समकालीन न्यायशास्त्र में, अनाचार को बलात्कार माना जाता है और उसी के समान माना जाता है। नाबालिग के मामले में, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत अनाचारपूर्ण संबंध को दंडित किया जाता है। 

अनाचार के प्रभाव क्या हैं?

अनाचार के शिकार लोग मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं और यह उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। ऐसे पीड़ित विभिन्न मानसिक विकारों जैसे अवसाद, अभिघातजन्य तनाव विकार और जटिल अभिघातजन्य तनाव विकार से पीड़ित हो सकते हैं। वे अनाचार संबंधी अपराधों के कारण नकारात्मक आत्म छवि और अपराध बोध का भी शिकार हो सकते हैं। ऐसे मामले सामने आए हैं जहां पीड़ित को अपने दुर्व्यवहारकर्ता के साथ आघातपूर्ण संबंध विकसित हो सकते हैं और भविष्य में स्वस्थ संबंध बनाने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, उन्हें अनाचार के कारण अलगाव, कलंक और परित्याग की भावनाओं से भी जूझना पड़ सकता है।

दक्षिण भारत में पार चचेरे भाई (क्रॉस-कजिन) विवाह की कानूनी स्थिति क्या है?

दक्षिण भारत में ऐसे समुदायों में आना असामान्य नहीं है जो सगोत्रीय विवाह (ऐसा विवाह जिसमें दो लोग एक दूसरे से रक्त के रिश्ते जैसे चचेरे भाई या करीबी रिश्तेदार) का अभ्यास करते हैं। इन समुदायों में भी कुछ प्रतिबंध प्रचलित हैं, जैसे वे एक ही गोत्र में विवाह नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें अपने चचेरे भाई-बहनों से विवाह करने की अनुमति है। दक्षिण भारतीय समुदायों में चाचा और भतीजी के बीच विवाह भी असामान्य नहीं है। हालाँकि, हिंदू विवाह अधिनियम हिंदुओं में चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगाता है, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ऐसा करना एक क्षेत्रीय प्रथा है।

संदर्भ

 

उपनिधान : अर्थ और परिचय

यह लेख Rachit Garg द्वारा लिखा गया है और Arya Senapati द्वारा अद्यतन किया गया है। यह एक विस्तृत लेख है, जिसका उद्देश्य भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अनुसार उपनिधान (बेलमेंट) की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय देना है। यह उपनिधान के माध्यम से बनाए गए संविदात्मक संबंधों के विभिन्न प्रमुख पहलुओं पर भी प्रकाश डालता है और उपनिधान के आधुनिक रूपों का विश्लेषण करने का प्रयास करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

हमारे दैनिक जीवन में उपनिधान के विभिन्न उदाहरण हैं जो विभिन्न प्रकार के लेनदेन से उत्पन्न होते हैं। उसी का एक सामान्य उदाहरण है जब लोग अपने बिजली के उपकरणों को मरम्मत और रखरखाव के लिए बिजली मिस्त्री की मरम्मत की दुकान पर छोड़ देते हैं। यहां, उपनिधान का उद्देश्य सामान की मरम्मत है, उपनिधानित सामान उपकरण हैं; उपनिधाता (बेलर) वह है जो बिजली उपकरणों का मालिक है और उपनिधानगृहीता (बेली) वह है जो इसे मरम्मत के लिए रखता है। यह एक उदाहरण है कि कैसे उपनिधान का संबंध इस धारणा के साथ बनाया जाता है कि उपनिधान का उद्देश्य पूरा होने के बाद सामान वापस कर दिया जाएगा। 

हमारे दैनिक जीवन में उपनिधान संबंध हर जगह पाए जाते हैं। कूरियर सेवाओं से लेकर, यात्रा के लिए बाइक किराए पर लेने तक, पुस्तकालय से किताब उधार लेने से लेकर बैंकों में सुरक्षित जमा बक्से तक, उपनिधान जैसे रिश्ते आर्थिक विकास और वाणिज्यिक (कमर्शियल) लेनदेन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जिनसे मानव जाति हर दिन गुजरती है।

अर्थ

उपनिधान को अंग्रेजी में बेलमेंट कहते है इस शब्द की उत्पत्ति एक फ्रांसीसी शब्द “बेलर” से हुई है जिसका अर्थ है “वितरित करना”। इसमें, किसी विशेष सामान का कब्ज़ा एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए इस समझ के साथ दिया जाता है कि उद्देश्य पूरा होने के बाद सामान वास्तविक मालिक को वापस कर दिया जाएगा। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 148 उपनिधान को एक निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए उपनिधाता से उपनिधानगृहीता तक सामान के वितरण के रूप में परिभाषित किया गया है और यह समझ है कि एक बार उपनिधान का उद्देश्य पूरा हो जाने पर, इसे वास्तविक मालिक को वापस कर दिया जाएगा।

उपनिधान अनुबंध के पक्ष कौन हैं

आदर्श रूप से, उपनिधान के प्रत्येक अनुबंध में दो पक्ष होते हैं। पक्षों में से एक को उपनिधाता कहा जाता है, जो उपनिधानित सामान का वास्तविक मालिक होता है, तथा दूसरा पक्ष जो उपनिधानित सामान को किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए अपनी अभिरक्षा में रखता है, उपनिधानगृहीता  कहलाता है।

उपनिधान से संबंधित सामान्य नियमों का उल्लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अध्याय IX (धारा 148-181) में किया गया है। एक सामान्य अर्थ में, उपनिधान को एक विशेष अनुबंध के रूप में माना जाता है जिसमें एक वैध अनुबंध की सभी विशेषताएं होती हैं जो अनुबंध को वैध और लागू करने योग्य बनाने के लिए पक्षों के बीच मौजूद होनी चाहिए लेकिन कुछ स्थितियों में, एक समझौते या अनुबंध के अस्तित्व के बिना एक उपनिधान उत्पन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, खोए हुए सामान को खोजने वाला, अर्थात् जब भी कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का सामान पाता है और उसे अपने कब्जे में ले लेता है, तो वह एक उपनिधानगृहीता की भूमिका ग्रहण कर लेता है और उसे सामान की उचित देखभाल तब तक करनी चाहिए जब तक कि वह वास्तविक मालिक को वापस न कर दिया जाए।

किन सामानों का उपनिधान किया जा सकता है

आदर्श रूप से, केवल चल (मूवेबल) संपत्तियों और सामानओं के उपनिधान को वैध माना जाता है। वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार, धन, मुद्रा और कानूनी निविदाओं (टेंडर्स) को उपनिधान के रूप में नहीं माना जा सकता है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति कहीं पैसा जमा करता है, तो यह उपनिधान का संबंध नहीं बनाता है।

उपनिधान की अनिवार्यता

कब्जे का वितरण

उपनिधान की प्राथमिक विशेषताओं में से एक है, उपनिधानित सामान का कब्जा प्रदान करना है। वितरण उपनिधाता द्वारा उपनिधानगृहीता को किया जाता है। वितरण के दौरान, जिस विशिष्ट उद्देश्य के लिए उपनिधान किया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है। कब्जे के वितरण का मतलब है कि उपनिधानगृहीता को एक विशिष्ट अवधि के लिए उपनिधानित सामानों पर विशेष नियंत्रण मिलता है। वह उपनिधानित सामान पर अजनबियों और तीसरे पक्ष के नियंत्रण को समाप्त कर सकता है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 149 उसी के बारे में बात करती है। उपनिधान के संबंध में कब्जे का वितरण वास्तविक वितरण या कब्जे के रचनात्मक वितरण के माध्यम से किया जा सकता है। सामान या तो उपनिधाता द्वारा सीधे उपनिधानगृहीता को दिया जा सकता है, या उपनिधाता कुछ विशिष्ट कार्य कर सकता है जिसके परिणामस्वरूप उपनिधानगृहीता को सामान का नियंत्रण प्रदान किया जाएगा। पहली स्थिति सामान के वास्तविक वितरण की है और दूसरी स्थिति सामान के रचनात्मक वितरण की है। कविता त्रेहन बनाम बलसारा हाइजीन प्रोडक्ट लिमिटेड (1991) के मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार वितरण अनिवार्य है। उपनिधान का संबंध बिना कब्जा दिए संभव नहीं है। कानून के अनुसार, जो किसी सामान का वास्तविक नियंत्रण रखता है, उसे उसके कब्जे में कहा जाता है। 

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति ने कुछ दुर्लभ कलाकृतियों को एक जमा बक्सा में रखा है। यह देखते हुए कि जमा बक्सा वितरित करने के लिए बहुत भारी है, व्यक्ति बस किसी अन्य व्यक्ति को बक्सा की चाबी देता है और इस स्थिति में, कब्जे के रचनात्मक वितरण के माध्यम से उपनिधान का संबंध बनाया जाता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सामान की मात्र अभिरक्षा सामान के कब्जे के बराबर नहीं है। रीव्स बनाम कैपर (1838) में, कॉमन प्लीज़ न्यायालय ने कहा कि यदि कोई नौकर अपने मालिक के सामान को अपने रोजगार की प्रकृति के कारण अपने पास रखता है, तो उसे उपनिधानगृहीता नहीं माना जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि नौकर मालिक के शॉपिंग बैग ले जा रहा है, तो उसे उपनिधानगृहीता नहीं माना जा सकता क्योंकि वह मालिक के साथ अपने रिश्ते की प्रकृति के कारण सामान रखता है।

अनुबंध पर वितरण

एक आदर्श मामले में, एक समझौते या एक लागू करने योग्य अनुबंध का निर्माण करना उपनिधान के संबंध को स्थापित करने के लिए आवश्यक है। अनुबंध की अनुपस्थिति में, उपनिधान को किसी भी तरह से वैध नहीं माना जाता है। 

अपवाद: ऐसे मामले में न्यायालय जिन अपवादों की परिकल्पना करती है, उनमें से एक खोए हुए सामान के खोजने वाला और खोए हुए सामान के वास्तविक मालिक के बीच स्थापित संबंध है। यहां, भले ही उनके बीच कोई अनुबंध मौजूद न हो, खोए हुए सामान का खोजने वाला उपनिधानगृहीता के सभी कर्तव्यों से बंधा होता है यदि वह सामान को स्वेच्छा से अपनी अभिरक्षा में रखता है। 

वितरण किसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए

उपनिधान के अनुबंध में उस उद्देश्य को निर्दिष्ट करना चाहिए जिसके लिए उपनिधाता द्वारा उपनिधानगृहीता को एक सामान का उपनिधान किया जाता है। उदाहरण के लिए: कपड़े धोने, उपकरणों की मरम्मत, उपयोग के लिए किराए से लेना आदि। यदि उद्देश्य का उल्लेख नहीं किया गया है और अनुबंध उद्देश्य की पूर्ति के बाद सामान की वापसी की परिकल्पना नहीं करता है, तो उपनिधान का संबंध नहीं बनाया जाता है। 

सामान की वापसी

उपनिधान समझौते में सबसे महत्वपूर्ण खंड में से एक है सामान को उस उद्देश्य के पूरा होने के बाद वापस करना जिसके लिए उन्हें उपनिधान पर रखा गया था। यदि ऐसा कोई खंड नहीं है, तो समझौते को उपनिधान नहीं माना जा सकता है। यदि उपनिधानगृहीता द्वारा लौटाया गया सामान उपनिधान पर रखे गए सामान के समान  माना जाता है, लेकिन बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा उपनिधान पर दिया गया था, तो भी उपनिधान का अनुबंध अमान्य माना जाता है।

उदाहरण के लिए, एक ड्राई क्लीनर को कपड़े धोने और ड्राई क्लीनिंग के लिए कुछ कपड़े मिलते हैं। एक बार जब वह प्रक्रिया पूरी कर लेता है, तो उसे कपड़े असली मालिक को वापस करने की बाध्यता होती है।

इसके अलावा, यदि उपनिधाता ने वापसी का कोई विशिष्ट तरीका या कोई निर्देश दिया है कि उपनिधानगृहीता को सामान कैसे वापस करना चाहिए, तो वह उनका पालन करने के लिए बाध्य है।

शेओ सिंह राय और अन्य बनाम भारत के सचिव (1880) में, एक व्यक्ति नौ सरकारी वचन-पत्रों को रद्द करने और उन्हें 48000 रुपये के एक नोट में समेकित करने के उद्देश्य से एक कोषागार (ट्रेज़री) अधिकारी के पास गया। बाद में, कोषागार के एक कर्मचारी द्वारा नोटों का दुरुपयोग किया गया और उस व्यक्ति ने राज्य के खिलाफ एक उपनिधागृहीता के रूप में उसे जिम्मेदार ठहराने के लिए मुकदमा दायर किया। वह राज्य से हर्जाने का दावा करने में विफल रहा क्योंकि उसके और राज्य के बीच कोई उपनिधान नहीं था। इस निर्णय के पीछे तर्क यह था कि सामान का वितरण और उसे वापस करने के वादे के बिना, उपनिधान नहीं बनाया जा सकता। इसलिए, सरकार नोटों को वापस करने के लिए बाध्य नहीं थी।

उपनिधान का वर्गीकरण

वर्गीकरण के विभिन्न आधारों के आधार पर यह प्रकृति में दो प्रकार के हैं:

पारिश्रमिक के आधार पर

निःशुल्क उपनिधान

निःशुल्क उपनिधान एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जहां उपनिधाता द्वारा उपनिधानगृहीता को बिना किसी प्रतिफल के या लेनदेन से कोई लाभ प्राप्त करने की उम्मीद के बिना सामान का उपनिधान किया जाता है। 

उदाहरण के लिए: जब एक दोस्त दूसरे से पढ़ने के लिए एक किताब उधार लेता है, तो इसमें कोई पैसा शामिल नहीं होता है और इसलिए यह एक निःशुल्क कार्य है। 

गैर-निःशुल्क उपनिधान

ऐसी स्थिति में जहां प्रतिफल शामिल होता है, लेनदेन से प्राप्त लाभ के अस्तित्व के कारण उपनिधान गैर-निःशुल्क हो जाता है।

उदाहरण के लिए: जब कोई व्यक्ति बाइक किराए पर लेता है और एक विशिष्ट अवधि के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान करता है, तो इसे गैर-निःशुल्कउपनिधान माना जाता है। 

पक्षों को लाभ के आधार पर

उपनिधाता के अनन्य लाभ के लिए

ऐसी स्थितियों में, उपनिधाता को लाभ प्राप्त होता है और उपनिधानगृहीता को किसी भी तरह से लेनदेन से उत्पन्न होने वाला कोई लाभ नहीं होता है। 

उदाहरण के लिए, बाहर जाते समय सुरक्षित रखने के लिए अपने सामान को पड़ोसी के पास छोड़ना।

उपनिधानगृहीता के अनन्य लाभ के लिए

ऐसी स्थितियों में, उपनिधानगृहीता वह है जो लाभ प्राप्त करता है लेकिन उपनिधाता को उसी के लिए कोई प्रतिफल नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति अपनी बाइक किसी मित्र को उधार देता है। 

दोनों के पारस्परिक लाभ के लिए

ऐसे लेन-देन और समझौते से दोनों पक्षों को कुछ लाभ प्राप्त होता है। उपनिधाता को एक सेवा मिलती है और उपनिधानगृहीता को प्रतिफल मिलता है या इसके विपरीत। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सफाई के लिए कपड़े धोने की सेवा के लिए अपने कपड़े प्रदान करता है, तो व्यक्ति को सेवा के रूप में साफ कपड़े मिलते हैं और कपड़े धोने वाली कंपनी को प्रतिफल के रूप में भुगतान मिलता है।

उपनिधाता और उपनिधानगृहीता के कर्तव्य/अधिकार

उपनिधाता के कर्तव्य

ज्ञात दोषों का खुलासा करना 

इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना कि उपनिधानित सामान निःशुल्क या प्रतिफल के साथ किया गया था, उपनिधागृहीता का यह कर्तव्य है कि वह उपनिधानित सामान में उन दोषों को प्रकट करे जो उसके ज्ञान में हैं। खुलासा करने में विफलता उपनिधाता को उपनिधानगृहीता द्वारा किए गए सभी नुकसान या क्षति जो अज्ञात गलती से जुड़ी होती है के लिए उत्तरदायी बनाती है। उपनिधाता को ऐसे सभी नुकसानों के लिए उपनिधानगृहीता की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए। विशेष रूप से गैर-निःशुल्क उपनिधान के मामले में, उपनिधाता सभी दोषों के लिए उत्तरदायी है, चाहे वह उसके लिए ज्ञात हो या अज्ञात हो। 

उदाहरण: 

  1. हरि अपनी बाइक श्याम को एक दिन की यात्रा के लिए उधार देता है। हरि को पता था कि ब्रेक ठीक से काम नहीं करने के कारण उसकी बाइक खराब है। फाल्ट ब्रेक लगने के कारण श्याम का एक्सीडेंट हो गया। हरि चिकित्सा लागत और श्याम द्वारा किए गए अन्य नुकसानों की भरपाई करने के लिए उत्तरदायी है। 
  2. राहुल ने रेसिंग प्रतियोगिता के लिए राकेश को अपनी बाइक प्रदान की। बाइक में कुछ खराबी आने के कारण उसमें आग लग गई। हादसे में राकेश को कई गंभीर चोटें आई हैं। राकेश को लगी चोट के लिए राहुल जिम्मेदार है।

उपनिधान का खर्च वहन करें

गैर-निःशुल्क उपनिधान के मामले में

उपनिधाता से सभी असाधारण खर्चों को वहन करने की उम्मीद की जाती है लेकिन उपनिधानगृहीता उपनिधान के सभी सामान्य और उचित खर्चों को वहन करने के लिए बाध्य है।

उदाहरण: A अपने कुत्ते को एक सप्ताह के लिए B, जो एक पेशेवर कुत्ता प्रशिक्षक (ट्रेनर) है, के पास छोड़ देता है क्योंकि वह शहर से बाहर जा रहा है। B को इसके लिए भुगतान किया जा रहा है, इसलिए A को सामान्य खर्च वहन करने की आवश्यकता नहीं है। हालाँकि, कुत्ते को तेज बुखार हो गया और B को डॉक्टर को बुलाना पड़ा। A को B द्वारा वहन किए गए सभी चिकित्सा व्ययों को चुकाना होगा।

निःशुल्क उपनिधान के मामले में

निःशुल्क उपनिधान के मामलों में, उपनिधागृहीता का यह कर्तव्य है कि वह उपनिधानित सामान के रखरखाव के लिए उपनिधाग्रहीता द्वारा किए गए सभी आवश्यक खर्चों का भुगतान करे।

उदाहरण: A अपने पालतू कुत्ते को B को देता है ताकि वह उसे सुरक्षित रख सके क्योंकि A यात्रा पर जा रहा है। यह देखते हुए कि B को A से कोई भुगतान नहीं मिल रहा है, A को कुत्ते के भोजन जैसे सभी सामान्य खर्चों का भुगतान करना होगा। ऐसी स्थिति में जहाँ कुत्ता बीमार हो जाता है और B को उपचार के लिए चिकित्सा लागत उठानी पड़ती है, तो A को B को इसके लिए क्षतिपूर्ति करनी होगी।

उपनिधाग्रहीता की क्षतिपूर्ति

धारा 159 के अनुसार, निःशुल्क उपनिधान के मामले में, उपनिधाता किसी भी समय उपनिधान समाप्त कर सकता है, भले ही उपनिधान एक विशिष्ट समय या उद्देश्य के लिए हो। हालांकि, उपनिधान की प्रारंभिक समाप्ति के मामलों में, उपनिधाता को किसी भी नुकसान जो उसे लेनदेन की अचानक समाप्ति के कारण सामना करना पड़ सकता है के लिए उपनिधानगृहीता को क्षतिपूर्ति करनी होगी।

उदाहरण: आकाश 7 दिनों की पारिवारिक यात्रा के लिए अपनी कार अपने दोस्त राकेश को उधार देता है। राकेश 7 दिनों के लिए कार में पेट्रोल भरता है। 3 दिनों के बाद, आकाश राकेश को फोन करता है और अपनी कार की वापसी की मांग करता है। ऐसी स्थिति में, आकाश राकेश को कार में अप्रयुक्त छोड़े गए पेट्रोल के 4 दिनों की भरपाई करने के लिए उत्तरदायी है।

जब सामान दोषपूर्ण होने के कारण उपनिधानगृहीता को नुकसान होता है तो उसे क्षतिपूर्ति प्रदान करना।

धारा 164 के अनुसार, उपनिधाता उस स्थिति में उपनिधानगृहीता को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी है जब उपनिधाता के पास उपनिधान  किए गए सामान पर दोषपूर्ण या अपूर्ण शीर्षक है जो उपनिधानगृहीता को चोट या क्षति पहुंचाता है। 

उदाहरण: A, B से एक कार किराए पर लेता है। A 7 दिनों के लिए 5000 रुपये का भुगतान करता है। A पारिवारिक यात्रा के लिए जाता है लेकिन चौथे दिन, पुलिस अधिकारी A से कार जब्त कर लेते हैं। A को बाद में पता चलता है कि B ने उसे जो कार दी थी वह चोरी की कार थी और B का उस पर कोई स्वामित्व नहीं था। इसलिए B को हुई हानि या क्षति के लिए A को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी है। 

सामान वापस प्राप्त करें

एक बार जब उपनिधान की अवधि समाप्त हो जाती है या उपनिधान का उद्देश्य पूरा हो जाता है, तो उपनिधाता का कर्तव्य है कि वह उपनिधानगृहीता से सामान वापस प्राप्त करे। यदि उपनिधाता सामान वापस लेने से इनकार करता है, तो उसे उपनिधानगृहीता को सामान को अपनी अभिरक्षा में रखने के लिए कुछ मुआवजे का भुगतान करना होगा। 

उदाहरण: अनीश ने अपने कुत्ते को दो सप्ताह के लिए एक पेशेवर कुत्ते केनेल प्रदाता को दिया था क्योंकि वह एक यात्रा के लिए बाहर जा रहा था। वह सेवा प्रदाता को प्रति सप्ताह 200 रुपये का भुगतान करता था। उनकी यात्रा एक और सप्ताह के लिए बढ़ा दी गई। ऐसे में सेवा प्रदाता को जिस अतिरिक्त अवधि के लिए कुत्ता रखना पड़ता था, उसके लिए उसे 200 रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं।

उपनिधानगृहीता के कर्तव्य

उपनिधान पर दिए गए सामान की उचित देखभाल करें

धारा 151 के अनुसार, यह अप्रासंगिक है कि उपनिधान प्रतिफल के लिए है या नहीं, उपनिधानगृहीता उसी तरीके से उपनिधानित सामान की उचित देखभाल करने के लिए जिम्मेदार है जैसे वह अपने स्वयं के सामान की देखभाल करेगा। उसके पास इस मानक में जिम्मेदारी है कि साधारण विवेक का व्यक्ति अपने सामान की रक्षा के लिए क्या करेगा। यदि कर्तव्य का उल्लंघन होता है, तो उपनिधानगृहीता उपनिधाता को किसी भी नुकसान जो उसे हो सकता है के लिए क्षतिपूर्ति करने के लिए जिम्मेदार है।

उदाहरण: A ने अपने कुत्ते को B को दिया था, जो सुरक्षित रखने के लिए एक सेवा प्रदाता था। A ने दस दिनों के लिए प्रति दिन 100 रुपये की राशि का भुगतान किया था। B ने गलती से अपने फाटक खुले छोड़ दिए थे। कुत्ता उसकी संपत्ति से चोरी हो गया था। यह साबित हो गया कि यह B की लापरवाही के कारण हुआ। इसलिए, B नुकसान के लिए A को चुकाने के लिए उत्तरदायी है।

सामान का अनाधिकृत उपयोग न करें

धारा 154 के अनुसार, यदि इस तथ्य के कारण कि उपनिधानगृहीता अनुबंध की शर्तों के साथ असंगत तरीके से उपनिधान पर दिए गए सामान का उपयोग करता है, तो सामान को किसी भी प्रकार की क्षति होने पर उसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा, भले ही वह लापरवाह न रहा हो या क्षति किसी अप्रत्याशित दुर्घटना के कारण हुई हो।

उदाहरण: रमेश परीक्षा की तैयारी के लिए सुरेश को एक पुस्तक उधार देता है। सुरेश किताब सुस्मिता को देता है। सुस्मिता की लापरवाही से किताब को नुकसान पहुंचता है। सुरेश पुस्तक के लिए रमेश को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है क्योंकि रमेश ने उसे अपनी निजी तैयारी के लिए पुस्तक उधार दी थी न कि किसी और को उधार देने के लिए।

अपने स्वयं के सामान के साथ उपनिधानित सामान को न मिलाएं

उपनिधानगृहीता का कर्तव्य है कि वह उपनिधाता से संबंधित उपनिधानित सामान को अपने सामान के साथ न मिलाए। उपनिधानगृहीता को सामान अलग रखना चाहिए और उनके मिलावट को रोकना चाहिए। यहाँ विवरण हैं: 

  1. धारा 155 के अनुसार, यदि उपनिधाता सामान के मिलावट के लिए सहमति देता है, तो उपनिधाता और उपनिधानगृहीता दोनों इस प्रकार बनाए गए मिलावट में आनुपातिक हित प्राप्त करेंगे। 
  2. धारा 156 के अनुसार, यदि उपनिधाता की सहमति के बिना सामान मिलाया जाता है, और सामान को अलग और विभाजित किया जा सकता है, तो उपनिधानगृहीता को अलग करने की लागत वहन करनी होगी। 
  3. धारा 157 के अनुसार, यदि मिश्रण उपनिधाता की सहमति के बिना किया जाता है और सामान को अलग नहीं किया जा सकता है, तो उपनिधानगृहीता का कर्तव्य है कि वह सामान के नुकसान के लिए उपनिधाता को मुआवजा दे। 

सामान में किसी भी वृद्धि को वापस करें

जब भी अनुबंध स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं करता है कि उपनिधानित सामान से उत्पन्न होने वाला कोई भी लाभ उपनिधानगृहीता के पास होगा, तो सामान्य नियम यह है कि उपनिधानगृहीता उपनिधाता को उपनिधान के कार्यकाल के दौरान उत्पन्न होने वाले उपनिधानित सामान से लाभ वापस कर देगा। 

उदाहरण: रमेश ने अपनी गाय को सुरेश को एक सप्ताह के लिए उपनिधान पर दे दिया। गाय ने इस दौरान एक बछड़े को जन्म दिया। रमेश को यह अधिकार है कि वह उपनिधान की समाप्ति के बाद सुरेश से बछड़ा वापस ले ले। यह उपनिधाता का स्थापित अधिकार है। 

सामान वापस करें

एक बार जब उपनिधान की अवधि समाप्त हो जाती है या जिस उद्देश्य के लिए उपनिधान किया गया था, वह पूरा हो जाता है, तो उपनिधानगृहीता का कर्तव्य है कि वह उपनिधान पर दिया गया सामान उपनिधाता को वापस कर दे।

उपनिधाता के अधिकार

अधिकारों का प्रवर्तन

उपनिधाता को कानून के अनुसार प्रदान किए गए अपने अधिकारों को लागू करने के लिए मुकदमा दायर करने का कानून द्वारा अधिकार है। 

अनुबंध से बचना

धारा 153 के अनुसार, यदि उपनिधानगृहीता कुछ भी करता है जो उपनिधान की शर्तों के साथ असंगत है, तो, उपनिधाता उपनिधान को समाप्त कर सकता है।

उदाहरण: A ने अपनी कार B को उसकी निजी यात्रा के लिए उपनिधान पर दी। B सवारी के लिए C को कार उधार देता है। अनुबंध की शर्तें टूट जाती हैं। A अनुबंध को समाप्त कर सकता है। 

उधार दिए गए सामान की वापसी

ऐसी स्थितियों में जहां सामान को उपनिधान पर या मुफ्त में उधार दिया गया है, तो ऐसी स्थिति में उपनिधाता को यह अधिकार है कि वह उपनिधान का उद्देश्य पूरा होने या अवधि समाप्त होने के बाद सामान वापस प्राप्त कर सकता है। इसके विपरीत, ऐसी स्थिति में जहां सामान लाभ की तुलना में अधिक नुकसान पहुंचाता है, तो उपनिधाता को उपनिधानगृहीता की क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है। 

गलत करने वाले से मुआवजा

यदि उपनिधानगृहीता को चोरी करके या अनुबंधके किसी अजनबी या किसी तीसरे पक्ष के किसी कृत्य के कारण उपनिहित माल के कब्जे से गलत तरीके से वंचित किया जाता है, तो उपनिधाता और उपनिधानगृहीता दोनों को कब्जे और मुआवजे की वसूली के लिए मुकदमा दायर करने का अधिकार है। 

उपनिधानगृहीता के अधिकार

शीर्षक के बिना उपनिधाता को सामान का वितरण

धारा 166 के अनुसार, यदि उपनिधाता का उपनिधानित सामान पर कोई शीर्षक नहीं है और उपनिधानगृहीता को इसके बारे में पता चल जाता है तब उपनिधानगृहीता उपनिधाता के निर्देशानुसार सामान वापस कर सकता है और अगर वितरण नहीं होता है, तो उपनिधानगृहीता उत्तरदायी नहीं है। 

वितरण रोकने के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं

धारा 167 के अनुसार, यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जब किसी तीसरे पक्ष द्वारा उपनिधान  किए गए सामान के स्वामित्व का दावा किया जाता है, तो उपनिधानगृहीता उपनिधाता के वास्तविक स्वामित्व का निर्णय करने के लिए न्यायालय में आवेदन करके निक्षेपक को माल की वितरण रोक सकता है, तथा उसके बाद सही मालिक को वितरण कर सकता है।

अतिचार (ट्रेसपास) के विरुद्ध अधिकार

धारा 180 के अनुसार, ऐसी स्थिति में जहां उपनिधानगृहीता चोरी या किसी अन्य माध्यम से उपनिधानित सामान के कब्जे से वंचित हो जाता है, वहां उपनिधानगृहीता को वाद की वसूली और मुआवजे के लिए मुकदमा दायर करने का अधिकार है।

उपनिधानगृहीता का ग्रहणाधिकार (लियन)

ग्रहणाधिकार के अधिकार का अर्थ है कि ऐसी स्थिति में जहां उपनिधाता को क्षतिपूर्ति या किसी अन्य मामले के रूप में उपनिधानगृहीता को एक निश्चित राशि का भुगतान करना होगा, उपनिधानगृहीता को उपनिधान की समाप्ति के बाद भी अपने साथ उपनिधान पर दिया गया सामान रखने का अधिकार है, जब तक कि उपनिधाता निश्चित राशि का भुगतान नहीं करता है।

तिलेंद्र नाथ महंत बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया (2001) के मामले में, यह माना गया था कि ग्रहणाधिकार काफी हद तक दो प्रकार का होता है। सामान्य ग्रहणाधिकार से तात्पर्य बैंकरों, फैक्टर्स, व्हार्फिंगर्स, वकीलों और पॉलिसी-ब्रोकरों के अधिकारों से है, जो उन्हें उपनिधान किए गए किसी भी सामान को प्रतिभूति के रूप में बनाए रखने के लिए है, जब तक कि उनके खाते की शेष राशि पूरी तरह से या उनकी संतुष्टि के लिए भुगतान नहीं की जाती है। ग्रहणाधिकार किसी संपत्ति विशेष को प्रतिभूति के रूप में तब तक बनाए रखने का अधिकार है जब तक कि देनदार अपना पूरा ऋण चुका न दे। सामान्य ग्रहणाधिकार देनदार की सभी परिसंपत्तियों पर लागू होता है । 

गैर-वैधानिक उपनिधान

भले ही भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 148 दो पक्षों के बीच किए गए अनुबंध के रूप में उपनिधान के वैधानिक पहलू से संबंधित है, लेकिन इसके प्रावधानों से गैर-संविदात्मक (नॉन-कोंट्राक्टुअल) बाधाओं के पहलुओं का कोई उल्लेख नहीं है। उपनिधान को एक सुई जेनेरिस (अपनी तरह का) अवधारणा के रूप में समझा गया है, जो मूल रूप से इस बात पर जोर देता है कि उपनिधानगृहीता के खिलाफ कार्रवाई अनुबंध या अपकृत्य (टॉर्ट) में स्थापित कार्रवाई के माध्यम से नहीं की जा सकती है, लेकिन यह अपने दम पर एक कार्रवाई होनी चाहिए। एक उपनिधानगृहीता की देनदारियां दूसरों के सामान के कब्जे और अनुबंध के अस्तित्व पर निर्भर किए बिना उनकी उचित देखभाल करने से उत्पन्न होती हैं। अनुबंध की आवश्यकता के बिना उपनिधान का विचार एक दैनिक नई अवधारणा है जो दूसरे के सामानों की अभिरक्षा लेने के स्वैच्छिक या अनैच्छिक कार्य द्वारा बनाई गई सभी प्रकार की उपनिधान का गठन करती है। 

उपनिधान की पहले की समझ किसी और के सामान की अभिरक्षा लेने के लिए एक समझौते से उत्पन्न एक संविदात्मक संबंध तक सीमित थी और अनुबंध के लिए पक्षों की आपसी सहमति पर निर्भर थी। सरल शब्दों में, गैर-संविदात्मक उपनिधान का वर्तमान विचार किसी और के सामान को स्वेच्छा से या अनैच्छिक रूप से संविदात्मक संबंध बनाए बिना लेने के कार्य से उत्पन्न होता है। यदि कोई व्यक्ति औपचारिक समझौता किए बिना दूसरे के सामान को अपने कब्जे में ले लेता है, तो यह भी उपनिधान के बराबर है।

यह उल्टज़ेन बनाम निकोलस (1894) के मामले में आयोजित किया गया था, जिसमें उपरोक्त दृष्टिकोण को कोर्ट ऑफ कॉमन प्लीज़ द्वारा बरकरार रखा गया था। इस मामले में वादी एक रेस्तरां में गया था और रेस्तरां के वेटर ने उसका कोट लेकर हुक पर लटका दिया। वादी ने उससे ऐसा करने का अनुरोध नहीं किया था। रात का खाना खत्म करने के बाद, जब वादी जाने लगा, तो उसने अपना कोट गायब पाया। वादी ने प्रतिष्ठान (एस्टेब्लिशमेंट) पर मुकदमा दायर किया और तर्क दिया कि जब वेटर ने उसके अनुरोध के बिना उससे अपना कोट ले लिया, तो वह उसके कोट का उपनिधानगृहीता बन गया और उसी की उचित देखभाल करने का कर्तव्य था। यह माना गया कि भले ही वेटर ने ग्राहक के प्रति शिष्टाचार का काम किया, जब उसने किसी और के सामान का स्वैच्छिक कब्जा ले लिया, तो वह उसी को वापस करने के लिए बाध्य हो गया, जिससे उसने इसे लिया था। इसलिए, ग्राहक और वेटर के बीच एक गैर-संविदात्मक उपनिधान संबंध था, जिसने सामान पर भौतिक नियंत्रण ग्रहण किया, इसकी उचित देखभाल करने का कर्तव्य माना। इसलिए, रेस्तरां सामान के नुकसान के लिए उत्तरदायी है और ग्राहक को नुकसान का भुगतान करना होगा। 

अनैच्छिक उपनिधान गैर-संविदात्मक उपनिधान का दूसरा रूप है। अनैच्छिक उपनिधान के मामलों में, इसका अर्थ केवल दुर्घटना से है। उपनिधान के पारंपरिक रूप में, कब्जे का एक स्वैच्छिक वितरण होता है लेकिन अनैच्छिक उपनिधान में, कब्जा एक दुर्घटना के माध्यम से उपनिधानगृहीता के पास आता है। आकस्मिक परिस्थितियों से उत्पन्न एक उपनिधान एक अनैच्छिक उपनिधान है और ऐसी स्थिति में, उपनिधानगृहीता सामान के कब्जे के लिए सहमति नहीं देता है। यह देखते हुए कि उपनिधान के इस रूप में सहमति का अभाव है, इसे गैर-संविदात्मक-सर्वसम्मति उपनिधान के रूप में भी जाना जाता है। 

उदाहरण: A एक दुकान पर गया और अपनी लापरवाही के कारण, अपना पर्स वहीं छोड़ आया। जब दुकानदार को पर्स मिलता है, तो वह तुरंत उसी की उचित देखभाल करने के लिए बाध्य होता है और फिर इसे A को वापस कर देता है। यह सिद्धांत भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 71 के तहत भी निहित है जो “सामान को खोजने वाले” की अवधारणा से संबंधित है। 

एक उपनिधानगृहीता के रूप में सामान को खोजने वाला

अर्ध-अनुबंधों या ऐसी स्थितियों से निपटते समय जो अनुबंध की सभी प्रासंगिक अनिवार्यताओं को पूरा किए बिना अनुबंध जैसे संबंध से मिलती जुलती हैं, भारतीय अनुबंध अधिनियम सामान के खोज करने वाले की अवधारणा से निपटता है जो अनुबंध के बिना उपनिधान संबंध से मिलती जुलती है। प्रावधान में कहा गया है कि कोई व्यक्ति जो किसी और का सामान पाता है और उसे अपनी अभिरक्षा में लेने का फैसला करता है, तो उसकी जिम्मेदारियाँ उपनिधानगृहीता के सामान ही होंगी। यह प्रावधान भारतीय अनुबंध अधिनियम में उपनिधान के प्रावधानों के तहत उल्लिखित अनुबंध पर वितरण की आवश्यक शर्त का अपवाद है। इस प्रावधान के प्रभाव के परिणामस्वरूप अनुबंध बनाने के लिए आवश्यक निहितार्थ के रूप में सहमति लिए बिना वास्तविक मालिक और सामान को खोजने वाले दोनों पर अनुबंध की शर्तों को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) रूप से लागू किया जाता है। भले ही यह अनुबंध की अनिवार्यताओं का उल्लंघन करता है, फिर भी यह प्रासंगिक है और अर्ध-अनुबंध के रूप में कानूनी महत्व रखता है।

मूलतः, धारा 71 के तहत खोए हुए सामान के मालिक और खोजने वाले के बीच अर्ध-संविदात्मक संबंध की परिकल्पना इस प्रकार की गई है कि खोजने वाला एक उपनिधानगृहीता है और मालिक सामान रूप से जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य रखने वाला उपनिधाता है। ये जिम्मेदारियाँ खोजने वाले पर तब भी बोझ डालती हैं, जब वह इसके लिए सहमत नहीं होता है।

सामान खोजने वाले के कर्तव्य

यह देखते हुए कि सामान खोजने वाले को एक उपनिधाग्रहीता के रूप में माना जाता है, उसके कर्तव्य भी उपनिधाग्रहीता के सामान ही हैं।

उचित देखभाल करने का कर्तव्य

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 152 निर्दिष्ट करती है कि जब पक्षों की जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए एक विशेष अनुबंध का गठन किया जाता है, तो एक उपनिधानगृहीता को कानूनी मुकदमे के खिलाफ संरक्षित किया जाता है ताकि उपनिधानगृहीता की अभिरक्षा में सामान के संबंध में उपनिधाता को हुए किसी भी नुकसान की वसूली हो सके। यह तभी उत्पन्न होता है जब उपनिधानगृहीता यह साबित करता है कि उसने सामान की उचित देखभाल इस तरह से की है जो सामान्य विवेक और तर्क के व्यक्ति से अपेक्षित है। उपनिधानगृहीता या सामान के खोजने वाले से जोखिम को रोकने या कम करने के लिए उचित देखभाल और कार्य का एक मानक स्तर अपेक्षित है। इसका तात्पर्य यह है कि सामान को खोजने वाला खोए हुए सामान की उचित देखभाल करने के लिए जिम्मेदार है जो उसे मिलता है और एक संविदात्मक उपनिधान में एक उपनिधानगृहीता के सामान उसकी अभिरक्षा में लेता है। सामान के मालिक को जो भी नुकसान होता है, वह खोजने वाले से इसे पुनर्प्राप्त करने का हकदार नहीं होगा यदि खोजने वाले यह साबित करता है कि उसने खोए हुए सामान को खोजने के बाद उचित देखभाल की है। 

कोई अनधिकृत उपयोग न करने का कर्तव्य

एक संविदात्मक उपनिधान में, उपनिधाता विशेष रूप से उन तरीकों का उल्लेख करता है जिनमें उपनिधानित सामान का उपयोग किया जा सकता है और उपनिधानगृहीता का कर्तव्य है कि वह किसी अन्य तरीके से उपनिधानित सामान का उपयोग न करे। उपनिधानित सामान का ऐसे तरीके से उपयोग करना जो उपनिधाता द्वारा अधिकृत नहीं है, कर्तव्य का उल्लंघन होता है। यह देखते हुए कि एक अनैच्छिक उपनिधान में, सामान को खोजने वाला के पास उपनिधाता से इस तरह के प्राधिकरण को प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं है, वह खोए हुए सामान का सावधानीपूर्वक उपयोग करने के लिए जिम्मेदार होगा और किसी भी क्षति या खतरे से सामान की रक्षा के लिए बिल्कुल आवश्यक होने तक कोई भी उपयोग करने से बचें। इसलिए, यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायाधीश द्वारा मामले पर अपने विवेक का उपयोग करने के बाद मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह कर्तव्य निर्धारित किया जाता है।

मिलावट न करने का कर्तव्य

उपनिधानगृहीता से संबंधित सामान के साथ उपनिधानित सामान में मिलावट संविदात्मक उपनिधान में निषिद्ध है। इसी तरह, खोए हुए सामान को खोजने वाला का कर्तव्य है कि वह अपने द्वारा पाए गए सामान में कुछ भी न मिलाए। यदि मिश्रण होता है, तो यह स्पष्ट है कि ऐसा करने के लिए वास्तविक मालिक की कोई सहमति नहीं है और इसलिए, खोजने वाला परिणाम भुगतने के लिए जिम्मेदार है। जब सहमति के बिना मिश्रण किया जाता है, यदि सामान अलग करने योग्य है, तो उन्हें अलग किया जाना चाहिए और मूल अनुपात को मालिक को वापस कर दिया जाना चाहिए और अलग करने की लागत खोजने वाला द्वारा वहन की जाती है। यदि सामान को अलग नहीं किया जा सकता है, तो सामान को खोजने वाला की जिम्मेदारी है कि वह मालिक को इस तरह के कर्तव्य के उल्लंघन और सामान के मूल्य से किसी भी नुकसान या हानि की भरपाई करे। सामान की खोज करने वाले को ऐसी स्थितियों में उपनिधानगृहीता के सामान दायित्व का सामना करना पड़ता है। 

सामान वापस करने के लिए शुल्क

जिस तरह एक उपनिधानगृहीता का सख्त कर्तव्य होता है कि वह उसे सौंपे गए सामान को वापस करे, उसी तरह सामान की खोज करने वाले का भी कर्तव्य है कि वह खोए हुए सामान के असली मालिक को खोजने और उसे सामान वापस करने के लिए सभी उचित कार्रवाई करे। सामान की खोज करने वाले को सामान को अपने कब्जे में लेने के बाद मालिक की उचित तलाशी करनी होगी। अगर वह मिल जाता है तो उसे वापस करने का समय और तरीका मालिक द्वारा निर्दिष्ट किया जाएगा। सामान खोजने वाले को सामान से होने वाले किसी भी लाभ को भी वापस करना होगा, जब तक कि वह उसकी अभिरक्षा में है। इसलिए जिस क्षण से खोजने वाला को खोया हुआ सामान मिला, उस क्षण से लेकर जब तक उसे वापस नहीं किया गया, खोए हुए सामान से होने वाले किसी भी लाभ को खोजने वाले को असली मालिक को वापस करना होगा। उदाहरण: अगर किसी किसान को अपने खेत में एक गर्भवती गाय मिलती है और गाय किसान की अभिरक्षा में रहते हुए बछड़े को जन्म देती है, तो किसान को गाय और बछड़े दोनों को असली मालिक को वापस करना होगा। 

सामान को खोजने वाले के अधिकार 

खोए हुए सामान को खोजने वाले और सामान के वास्तविक मालिक के बीच अर्ध-संविदात्मक (क़यासी-कोंट्राक्टुअल) संबंध को ध्यान में रखते हुए, उसके पास लेनदेन से आपने वाले कुछ अधिकार भी हैं।

प्रस्तावित विशिष्ट पुरस्कार के लिए मुकदमा करने और ग्रहणाधिकार का अधिकार

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 168 के अनुसार, खोए हुए सामान को खोजने वाले को सामान के मालिक पर मुकदमा करने से रोका जाता है ताकि वह वास्तविक मालिक को खोजने और उसका पता लगाने और उक्त सामान वापस करने के लिए खर्च किए गए समय और वित्त के लिए मुआवजा प्राप्त कर सके। इसके पीछे कारण यह है कि कानून मानता है कि ऐसा कार्य सद्भावना और स्वेच्छा से किया जाता है। इसके विपरीत, यदि मालिक ने सामान की वापसी के लिए एक विशेष इनाम निर्दिष्ट किया है, तो खोजने वाला केवल उस विशिष्ट इनाम का दावा करने के लिए मुकदमा कर सकता है और ग्रहणाधिकार लगा सकता है जब तक कि उस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है या इनाम उसके द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है। 

कुछ मामलों में प्राप्त सामान को बेचने का अधिकार

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 169 के अनुसार, खोए हुए सामान को खोजने वाला उस सामान जिसे आमतौर पर बाजार में बेचा जाता है, उसे बेच सकता है यदि मालिक को खोजने के लिए उचित परिश्रम और देखभाल करने के बाद मालिक नहीं मिल सकता है या जब मालिक सामान के खोजने वाले को निर्दिष्ट इनाम का भुगतान करने से इनकार करता है। ऐसी स्थिति में, खोजने वाला इसे दो शर्तों पर बेच सकता है। सबसे पहले, सामान नाशवान प्रकृति का है और इसके मूल्य के बड़े हिस्से को नष्ट करने और खोने का खतरा है या जब किसी समान के संबंध में मालिक द्वारा खोजने वाले से निर्दिष्ट वैध शुल्क, पाए गए सामान के मूल्य का दो-तिहाई हो।केवल जब ऐसी स्थिति होती है जहां इनमें से कम से कम एक मानदंड पूरा होता है, तो खोजने वाले को लाभ या मुआवजे के लिए सामान बेचने का अधिकार प्राप्त होता है। यह संकीर्ण सीमा सामान बेचने के लिए प्रदान की जाती है ताकि सामान को खोजने वाले के हिस्से में अन्यायपूर्ण संवर्धन (एनरिच्मेंट) की रोकथाम की प्रथा सुनिश्चित की जा सके। खोजने वाले द्वारा खोए हुए सामान की बिक्री करने की निर्बाध स्वतंत्रता “ढूँढ़ने वाले रखवाले” की स्थिति को जन्म देगी और वास्तविक मालिक को उसके सामान से लाभान्वित होने से रोकेगी और खोजने वाले को अन्यायपूर्ण लाभ की स्थिति की अनुमति देगी। इसलिए ऐसे प्रावधानों का होना आवश्यक है जो किसी भी अन्यायपूर्ण संवर्धन को रोकेंगे और पक्षों के अधिकारों को संतुलित करेंगे। 

यह विश्लेषण के माध्यम से स्पष्ट है कि खोए हुए सामान को खोजने वाले और सामान के मालिक के बीच संबंध यह है कि यह एक अनुबंध जैसा दिखता है और इसलिए इसे अर्ध-संविदात्मक संबंध के रूप में जाना जाता है। कर्तव्य और जिम्मेदारियां एक उपनिधाता और एक उपनिधानगृहीता के सामान हैं और इसलिए, अधिकार और दायित्व उस क्षण से उत्पन्न होते हैं जब खोजने वाला सामान को अपनी अभिरक्षा में लेता है और उस क्षण तक मौजूद रहता है जब तक सामान खोए हुए सामान के वास्तविक मालिक को वापस नहीं कर दिया जाता है। सहमति के अस्तित्व के बिना भी, गैर-संविदात्मक संबंध इसलिए मौजूद हो सकते हैं। 

उपनिधाता और उपनिधानगृहीता के बीच सारणीबद्ध (टेबुलर) तुलना

विभिन्न मानदंडों के आधार पर उपनिधाता और उपनिधानगृहीता के बीच विभिन्न अंतर हैं। यहाँ दोनों के बीच एक सारणीबद्ध तुलना है।

श्रेणी उपनिधाता उपनिधानगृहीता
परिभाषा उपनिधान के अनुबंध में, वह पक्ष जो किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए सामान वितरित करता है, उसे उपनिधाता कहा जाता है। आमतौर पर, उपनिधाता, उपनिधान पर दिए गए सामान का मालिक होता है। उपनिधान के अनुबंध में, वह पक्ष जिसे सामान का कब्ज़ा हस्तांतरित किया जाता है या जिसे किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए सामान वितरित किया जाता है, उसे उपनिधानगृहीता कहा जाता है।
अधिकार उपनिधाता को समय अवधि की समाप्ति या उपनिधान के उद्देश्य की पूर्ति के बाद, उपनिधानगृहीता से उपनिधानित सामान को वापस मांगने का अधिकार है। उपनिधाता को उद्देश्य पूरा होने तक एक निश्चित अवधि के लिए सामान पर कब्ज़ा बनाए रखने का अधिकार है। उपनिधानगृहीता को ऐसी स्थिति से उत्पन्न होने वाले सभी नुकसानों के लिए क्षतिपूर्ति का अधिकार भी है, जहाँ उपनिधाता समय से पहले उपनिधान के अनुबंध को समाप्त कर देता है या उपनिधान किए गए सामान में अज्ञात भौतिक दोषों के कारण होने वाली क्षति के लिए।
कर्तव्य उपनिधानगृहीता का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी क्षति को रोकने के लिए, उपनिधान किए गए सामान में सभी दोषों का खुलासा करे। उपनिधानगृहीता का यह कर्तव्य है कि वह उपनिधान किए गए सामान की उचित देखभाल करे और उसे अपने सामान के साथ न मिलाए।
स्वामित्व आमतौर पर, उपनिधान  के दौरान उपनिधानगृहीता के पास उपनिधान पर दिए गए सामान का स्वामित्व बना रहता है। केवल एक निश्चित अवधि के लिए ही कब्ज़ा बरकरार रहता है। स्वामित्व हस्तांतरित नहीं किया जाता है।
उत्तरदायी अघोषित दोषों या भौतिक दोषों के कारण उपनिधानगृहीता को होने वाली क्षति या चोट। उचित मानक देखभाल का प्रयोग न करने के कारण सामान की हानि या उपनिधानित सामान को होने वाली क्षति।

उपनिधान सामान की बिक्री से कैसे अलग है

उपनिधान प्राथमिक धारणा में सामान की बिक्री से भिन्न होता है कि बिक्री में विक्रेता और क्रेता के बीच सामान के स्वामित्व का हस्तांतरण शामिल होता है, लेकिन एक उपनिधान के मामले में, स्वामित्व वास्तविक मालिक के साथ बरकरार रहता है और केवल सामान का कब्जा एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए स्थानांतरित किया जाता है।

श्रेणी सामान की बिक्री उपनिधान 
परिभाषा सामान की बिक्री से तात्पर्य किसी सामान के स्वामित्व के हस्तांतरण से है, जिसके लिए एक निश्चित कीमत चुकाई गई है। उपनिधान एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए उपनिधान किये गए सामान के कब्जे का हस्तांतरण है।
स्वामित्व स्वामित्व पूरी तरह से सामान के क्रेता/खरीदार को हस्तांतरित किया जाता है। केवल एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए कब्ज़ा हस्तांतरित किया जाता है और स्वामित्व उपनिधाता के पास रहता है।
प्रतिफल सामान खरीदने के लिए प्रतिफल का भुगतान किया जाता है प्रतिफल के साथ या उसके बिना हो सकता है।
आवश्यकता किसी सामान के स्वामित्व का स्थायी हस्तांतरण। विशिष्ट उद्देश्यों जैसे कि सुरक्षित रखने, मरम्मत, व्यक्तिगत उपयोग के लिए किराए पर लेना आदि के लिए।
वापसी एक बार बेचे गए सामान को खरीदार को तब तक वापस नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई विशेष कारण न हो। विशिष्ट उद्देश्य पूरा होने के बाद सामान को वापस कर दिया जाता है।
उदाहरण वाहन, किराने का सामान, आभूषण आदि की बिक्री मरम्मत के लिए ग्राइंडर देना, सुरक्षा के लिए कुत्ता देना, यात्रा के लिए कार किराए पर लेना।

 

उपनिधान और गिरवी के बीच अंतर

श्रेणी उपनिधान  गिरवी
परिभाषा उपनिधान एक निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए उपनिधाता से उपनिधानगृहीता को सामान का हस्तांतरण है, जिसमें उद्देश्य पूरा होने के बाद वापसी की निहित शर्त होती है। उपनिधान की एक प्रजाति जहां सामान का कब्ज़ा ऋण/वादे के प्रदर्शन के लिए प्रतिभूति के रूप में रखने के लिए स्थानांतरित किया जाता है।
पक्ष उपनिधान और उपनिधानगृहीता गिरवीकर्ता (प्लेजर) और गिरवीदार (प्लेजी) या पणयमकार (पौनर) और पणयमदार (पौनी)
आवश्यकता विभिन्न आवश्यकताएँ जैसे सुरक्षित रखना, सामान की मरम्मत, व्यक्तिगत उपयोग के लिए किराए पर लेना आदि। प्रतिभूति
स्वामित्व उपनिधाता के पास उपनिधान पर दिए गए सामान का स्वामित्व रहता है गिरवीकर्ता के पास गिरवी रखे गए सामान का स्वामित्व रहता है
सामान की बिक्री उपनिधानगृहीता को उपनिधान पर दिए गए सामान को बेचने की अनुमति नहीं है जब गिरवीकर्ता ऋण चुकाने या अपने दायित्व को पूरा करने में विफल रहता है, तो गिरवीदार को सामान बेचने का अधिकार है।
वापसी उद्देश्य पूरा होने के बाद उपनिधान को उपनिधानगृहीता को वापस कर दिया जाता है ऋण चुकाने या दायित्व पूरा होने के बाद गिरवी रखे हुए सामान को गिरवीदार को वापस कर दिया जाता है।
ग्रहणाधिकार उपनिधाता का ग्रहणाधिकार तभी बनता है जब उसने कोई असाधारण व्यय किया हो या क्षतिपूर्ति के लिए। गिरवीदार को तब तक ग्रहणाधिकार रखने का अधिकार है जब तक कि ऋण चुकाया न जाए या दायित्व पूरा न हो जाए।

उपनिधान के रूप में सुरक्षित जमा राशि

भारतीय परिदृश्य में, यह एक सामान्य कानूनी स्थिति है कि जब तक कोई अनुबंध या समझौता नहीं होता है, तब तक उपनिधान के संबंध को मान्यता नहीं दी जा सकती है। औपचारिक समझौते में उपनिधान पर दिए गए सामान के अनन्य और वास्तविक कब्जे का पता लगाना चाहिए। उपरोक्त मामलों के अनुसार भारतीय न्यायालयों की स्थिति इस पहलू में भिन्न है। ऐसी स्थिति में, सुरक्षित जमा बॉक्स को उपनिधान के संबंध बनाने के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है।

जब सुरक्षित जमा बक्से की बात आती है तो ग्राहक और सेवा प्रदाता के बीच साझा किया गया संबंध उपनिधान का नहीं होता है जब तक कि कोई अनुबंध मौजूद न हो जो सेवा प्रदाता को सुरक्षित जमा बक्से में रखे गए गए उपनिधान वाले सामान की उचित देखभाल करने के लिए बाध्य करता है। सुरक्षित जमा बक्सा किराए पर लेते समय सामान को आम तौर पर बैंक को सौंप दिया जाता है। सामान का वितरण बैंक के परिसर में तिजोरियों के माध्यम से किया जाता है और इसे सीधे बैंक को नहीं दिया जाता है।

एक सुरक्षित जमा बक्सा के ग्राहक और सेवा प्रदाता के बीच के संबंध की तुलना किरायेदार और मकान मालिक के बीच के रिश्ते से की जा सकती है। एक मकान मालिक का उस संपत्ति पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं माना जाता है जो व्यक्तिगत रूप से उसके किरायेदार से संबंधित है, लेकिन बस किरायेदार को सामान रखने और अपनी इच्छा और उसके नियंत्रण में रखने के लिए जगह के साथ निविदा देता है। ऐसी स्थिति में मकान मालिक का कर्तव्य है कि वह अपनी संपत्ति और उससे संबंधित परिसर की उचित देखभाल करे और किरायेदार को पट्टे (लीज़) पर दे, लेकिन मकान मालिक से संबंधित किराए की संपत्ति के परिसर में रखे किरायेदार के सामान पर वही कर्तव्य प्रकट नहीं होता है।

इसी तरह, बैंकों का कर्तव्य है कि वे बैंक के परिसर की देखभाल करें और हर कीमत पर उनकी रक्षा करें, लेकिन सुरक्षित जमा बक्से में रखी ग्राहकों की संपत्ति का उचित ध्यान और उचित परिश्रम करने का उनका कर्तव्य नहीं कहा जा सकता है। जब तक बैंक को दोनों पक्षों के बीच मौजूद उपनिधान के समझौते के निर्माण के माध्यम से वास्तविक और अनन्य कब्जे के रूप में सामग्री का प्रत्यक्ष कब्जा नहीं दिया गया है, तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि ग्राहकों को सौंपे गए सुरक्षित जमा बक्से की सामग्री का उचित ध्यान रखना उनका कर्तव्य है।

अमेरिकी संदर्भ में, कानूनी स्थिति के संदर्भ में अंतर है जब ग्राहक और सुरक्षित जमा बक्से के प्रदाता के बीच साझा किए गए संबंधों की बात आती है। अमेरिकी संदर्भ में ग्राहकों के पक्ष में एक धारणा मौजूद है। एक पूर्वकल्पित धारणा मौजूद है कि सुरक्षित जमा बक्से में रखी गई सामग्री के संदर्भ में ग्राहक और बैंक के बीच एक गैर-संविदात्मक उपनिधान या एक अर्ध संविदात्मक संबंध है। अमेरिकी संदर्भ में पालन किया जाने वाला सामान्य नियम यह है कि जब सुरक्षित जमा बक्से में रखे गए उपनिधान सामानों की प्रतिभूति के संबंध में बैंक की दायित्व से संबंधित कोई भ्रम होता है, तो निर्णय काफी हद तक बैंक के खिलाफ स्विंग करेगा। इस तरह के अनुमान के पीछे कारण यह है कि बैंक के हाथों में एक बड़ी सौदेबाजी की शक्ति है क्योंकि वे समझौते की शर्तों का मसौदा तैयार करने के लिए जिम्मेदार हैं जो ग्राहक और सुरक्षित जमा बक्से के प्रदाता के बीच एक उपनिधान संबंध बनाने की ओर जाता है। 

गोल्डबॉम बनाम बैंक ल्यूमी ट्रस्ट कंपनी (1982) के मामले में, यह निर्णय लिया गया था कि बैंक को अनुबंध से उत्पन्न होने वाली अपनी दायित्व को केवल इस तथ्य के कारण बाहर निकालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि कोई लिखित समझौता मौजूद नहीं है जो उनके संबंध को परिभाषित करता है। यह तर्क दिया गया था कि हालांकि अमेरिकी कानूनी प्रणाली में, एक लिखित औपचारिक समझौते की अनुपस्थिति में भी एक अनुबंध को उपनिधान माना जाता है, यह एक आवश्यक निहितार्थ है कि बैंक को देखभाल के अधिक मानक का अभ्यास करना चाहिए और किसी भी कीमत पर निर्धारित मानकों की अनदेखी नहीं कर सकता है। देखभाल के इस मानक को रॉबर्ट्स बनाम स्टुवेसेंट सेफ-डिपॉजिट कंपनी (1890) के मामले में निर्धारित किया गया था, जिसमें अभिरक्षा जमा बक्सा सेवा प्रदाता को उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले उचित देखभाल और जिम्मेदारी के मानक में लापरवाही के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था। यह तब माना गया जब सरकारी अधिकारियों को अभिरक्षा जमा बक्सा की सामग्री को जब्त करने की अनुमति दी गई। इस मामले में, ग्राहक और सेवा प्रदाता के बीच कोई स्पष्ट समझौता नहीं था, जो एक उपनिधान संबंध बना रहा था, लेकिन एक संविदात्मक संबंध की धारणा बैंक के खिलाफ काम करती थी।

भारतीय संदर्भ में, प्रमुख मामला अतुल मेहरा बनाम बैंक ऑफ महाराष्ट्र (2002) का मामला है। इस मामले में, अपीलकर्ता ने एक सुरक्षित जमा बक्सा किराए पर लिया था और सेवा प्रदाता प्रतिवादी बैंक था। अपीलकर्ता ने बैंक के सुरक्षित जमा बक्से में कुछ सोने के गहने और आभूषण संग्रहीत किए थे। बैंक को लूट लिया गया और इसके कारण सभी लॉकरों में छेड़छाड़ की गई और सामान चोरी हो गया। यह पाया गया कि बैंक सुरक्षा प्रक्रियाओं और दिशानिर्देशों के पर्याप्त मानकों को पूरा नहीं करता है जो उन्हें करना चाहिए था। स्ट्रांग रूम को धातु के तत्वों और कंक्रीट से बनाया जाना चाहिए लेकिन इस मामले में इसमें एक लकड़ी का ढांचा था जिसे तोड़ना और चोरी करना आसान था। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उसके और बैंक के बीच उपनिधान का संबंध मौजूद है, जहां बैंक उपनिधानगृहीता के रूप में कार्य करता है, बैंक को सुरक्षित जमा बक्सा में सामग्री का उचित ध्यान रखना चाहिए था। देखभाल के उचित मानक का पालन करने में विफलता के कारण, बैंक चोरी के सामान के लिए ग्राहक को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी है। इसके विपरीत, बैंक ने तर्क दिया कि उनके और ग्राहकों के बीच एक किरायेदार-मकान मालिक संबंध मौजूद है और इसलिए, उनके पास विशेष कब्जे या ज्ञान के बिना सामान की प्रतिभूति के प्रति कोई दायित्व नहीं है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उपनिधान का संबंध तब तक शुरू नहीं हो सकता जब तक कि उपनिधानगृहीता को सामान पर ज्ञान और अनन्य नियंत्रण न हो। क्यूंकि पक्षों के बीच कोई लिखित अनुबंध या समझौता नहीं था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि बैंक ग्राहक/अपीलकर्ता का उपनिधानगृहीता था। इसलिए, ऐसी स्थिति में बैंक की कोई दायित्व नहीं है। 

गैर-संविदा उपनिधान से संबंधित मामले

राम गुलाम बनाम यूपी सरकार (1949)

तथ्य

इस मामले में, उत्तर प्रदेश सरकार से कुछ आभूषणों की वसूली या उक्त आभूषणों की कीमत के मामले पर मुकदमा चला। अपीलकर्ता, जिसकी संपत्ति चोरी हो गई थी, उसको बाद में पुलिस द्वारा तलाशी और जब्ती प्रक्रिया के माध्यम से बरामद किया गया और बरामद होने के बाद, उन्हें कलेक्ट्रेट की अभिरक्षा में रखा गया। बाद में इसे कलेक्ट्रेट से चुरा लिया गया और उसका पता नहीं चला।

अपीलकर्ता ने अपनी संपत्ति की बहाली या संपत्ति के बराबर मूल्य के लिए सरकार पर मुकदमा दायर किया। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि क्यूंकि सरकार का प्रतिनिधि (एजेंट) एक उपनिधाग्रहीता के रूप में अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ था, इसलिए सरकार को रेस्पोंडेट सुपीरियर के सिद्धांत के अनुप्रयोग द्वारा चोरी की गई संपत्ति का मूल्य चुकाने का दायित्व है। यह सिद्धांत मूल रूप से बताता है कि एक मास्टर या प्रिंसिपल नौकर या प्रतिनिधि के कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा जो रोजगार के दौरान किया गया था। अपीलकर्ता के तर्कों के अनुसार, चोरी किए गए सामान को अभिरक्षा में लेकर, जो उसका था, सरकार ने कोई समझौता न होने पर भी एक उपनिधानगृहीता की भूमिका ग्रहण की। यह एक उपनिधानगृहीता का कर्तव्य है कि वह अपनी अभिरक्षा में संपत्ति की उचित देखभाल करे जो उपनिधाता से संबंधित है। ऐसी स्थिति में, उपनिधानगृहीता अपनी लापरवाही या कर्तव्य के उल्लंघन के कारण उपनिधाता को हुए किसी भी नुकसान के लिए उत्तरदायी है। 

मुद्दे

इस मामले में दो प्राथमिक मुद्दे तैयार किए गए थे:

  • पहला यह कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार की अपीलकर्ता के प्रति उपनिधानगृहीता की प्रकृति में कोई दायित्व है और यदि हां, तो क्या वह अपने कब्जे में चीजों के प्रति उचित देखभाल करने में विफल रही है। 
  • दूसरा मुद्दा यह था कि क्या सरकार को अपकृत्य के सिद्धांत के कारण अपीलकर्ताओं की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए या नहीं, जिसमें कहा गया है कि एक मालिक अपने नौकरों के अपकृत्य कृत्यों (प्रत्‍यधिकृत (विकैरियस) दायित्व) के लिए उत्तरदायी है। ये दो प्राथमिक मुद्दे थे जिन्हें न्यायालय ने तैयार किया था। 

निर्णय

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 151 और 152 के अनुसार, उपनिधाग्रहीता पर यह दायित्व होता है कि वह अपने पास उपनिधानित सामान की उचित देखभाल करे। उपनिधान से संबंधित सभी मामलों में, उपनिधाग्रहीता को अपने पास उपनिधानित सामानों की उतनी ही देखभाल करने के लिए जिम्मेदार होता है जितना कि सामान्य विवेक का कोई भी व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में होगा। उद्देश्य की पूर्ति के बाद सामान वापस करना एक उपनिधानगृहीता का कर्तव्य भी है।

इस मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उपनिधान के पहले मुद्दे की अनदेखी की, लेकिन अपकृत्य दायित्व के दूसरे मुद्दे को गंभीर महत्व दिया। उच्च न्यायालय ने उपनिधान के मुद्दे के संबंध में यह स्थिति अपनाई कि संविदात्मक समझौते के अभाव में, सरकार और अपीलकर्ता के बीच उपनिधान का कोई संबंध नहीं है। उच्च न्यायालय ने सख्ती से कहा कि सरकार को अपीलकर्ता का उपनिधानगृहीता नहीं माना जा सकता। दूसरे मुद्दे पर आते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि रेस्पोंडेट सुपीरियर के सिद्धांत के अनुसार, यदि नौकर के रोजगार के वैध दायरे के दौरान ऐसा होता है तो मालिक नौकर के अपकृत्यों के लिए उत्तरदायी होता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि संपत्ति को कब्जे में रखने का पुलिस का कार्य कानून द्वारा कर्तव्य का निर्वहन है। इसलिए सरकार अपकृत्य के लिए भी उत्तरदायी नहीं है।

लासलगांव मर्चेंट को-आपरेटिव बैंक बनाम प्रभुदास हाथीभाई एवं अन्य (1965)

तथ्य

इस मामले में एक साझेदारी फर्म ने कुछ सामान बैंक जो वादी है के पास गिरवी रखा था। गिरवी रखे गए सामान को एक गोदाम में रखा गया था जो साझेदारी फर्म का था और बैंक ने बस गोदाम की चाबियाँ अपने पास रखीं और उसे बंद रखा। आयकर विभाग ने फर्म के एक निश्चित साझेदार द्वारा भुगतान किए जाने वाले कुछ करों का भुगतान नहीं करने के लिए सामान जब्त किया था। सामान अभी भी उसी गोदाम में था जब पुलिस को चाबी दी गई थी। भारी बारिश के कारण गोदाम की छत में लीकेज हो गया और रखा हुआ सामान क्षतिग्रस्त हो गया। 

निर्णय

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि वर्तमान मामला अप्रत्याशित घटना या ईश्वरीय कार्य (फोर्स मेजर या एक्ट ऑफ गॉड) के संरक्षण में नहीं आएगा क्योंकि क्षति प्रतिवादी के नियंत्रण से बाहर किसी भी अप्रत्याशित बल के कारण नहीं थी। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि सामान को अपने कब्जे में लेने से सरकार उपनिधानगृहीता की स्थिति में खड़ी हो जाती है। न्यायालय ने प्रतिवादी को यह साबित करने का आदेश दिया कि उन्होंने देखभाल के उचित मानक का प्रयोग किया था जैसा कि उपनिधानगृहीता से करने की उम्मीद की जाती है। प्रतिवादी इस तथ्य को साबित करने में असमर्थ थे कि उन्होंने सामान का उचित ध्यान रखा था और इसलिए न्यायालय ने सरकार को उत्तरदायी ठहराया क्योंकि वे एक उपनिधानगृहीता के वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहे थे। न्यायालय ने राम गुलाम मामले में ली गई स्थिति से अलग रुख अपनाया और कहा कि एक सरकार एक उपनिधानगृहीता है जब वह किसी भी सामान को अपने कब्जे में लेती है, भले ही अनुबंध का अस्तित्व हो या नहीं। इसलिए, यह मामला गैर-संविदात्मक उपनिधान संबंध के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक निर्णय है जो सरकार को उपनिधानगृहीता की स्थिति में रखता है और इसके साथ वही देनदारियां जोड़ता है जो एक संविदात्मक सेटअप के तहत एक उपनिधानगृहीता के लिए निर्धारित करता है। 

गुजरात राज्य बनाम मेमन मोहम्मद (1967)

तथ्य

इस मामले में, वादी के ट्रकों को सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों द्वारा जब्त कर लिया गया था जो वादी के वाहन पर लगाए गए आयात शुल्क का भुगतान नहीं किया गया था। वादी ने न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के सामने मुकदमा दायर कर आदेश को रद्द करने की मांग की। राजस्व न्यायाधिकरण ने प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और जब्ती को रद्द करने का आदेश दिया, और यह भी आदेश दिया कि वाहनों को वादी को फिर से वितरित किया जाना चाहिए। वादी ने वाहनों को उसे देने की मांग की, लेकिन पता चला कि मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुसार उनका निपटान किया गया था। पीड़ित वादी ने खोए हुए वाहन के बदले 32,000 रुपये के नुकसान का दावा किया। वादी के दावे को अस्वीकार कर दिया गया और उसने सर्वोच्च न्यायालय में निर्णय की अपील की। 

निर्णय

शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में पिछले मामले में लिए गए निर्णय पर भरोसा किया और कहा कि भारत में गैर-संविदात्मक उपनिधान को मान्यता प्राप्त है। जिस क्षण सरकार ने वादी के वाहन को जब्त कर लिया, उन्होंने खुद को उपनिधानगृहीता की स्थिति में डाल दिया और उस भूमिका को संभालकर, वे वाहन की उचित देखभाल करने के लिए जिम्मेदार हो गए। जब्ती के आदेश को रद्द करने के बाद भी वाहनों को बेचकर, सरकारी अधिकारी उपनिधान वाले सामानों की उचित देखभाल करने में विफल रहे हैं और इसलिए सामान के नुकसान के कारण वादी को नुकसान का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हैं।

शीर्ष न्यायालय ने भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 71 को संबोधित करते हुए फैसले की पुष्टि की, जो अनुबंध के अस्तित्व के बिना भी सामान की खोज करने वाले को उपनिधानगृहीता के रूप में मानता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि एक समझौता करने के लिए सहमति के बिना भी, यदि कोई व्यक्ति/प्राधिकरण, स्वेच्छा से किसी और से संबंधित सामान का कब्जा लेता है, तो वे एक उपनिधानगृहीता की भूमिका ग्रहण करते हैं और उनके पास वही देनदारियां और अधिकार होते हैं जो भारतीय अनुबंध अधिनियम में निर्दिष्ट संविदात्मक उपनिधान संबंध में उपनिधानगृहीता के सामान हैं। 

13वें भारतीय विधि आयोग की सिफारिशें

13वें विधि आयोग के प्रतिवेदन (रिपोर्ट) में चर्चा के दौरान यह प्रश्न उठा था कि क्या जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से संबंधित सामान को अपने कब्जे में ले लेता है तो क्या उपनिधान के अनुबंध के अस्तित्व के बिना उपनिधान हो सकता है। उन प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए कि भारतीय अनुबंध अधिनियम गैर-संविदात्मक उपनिधान के संबंध में कोई उल्लेख नहीं करता है और न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय व्याख्या के संदर्भ में भिन्न होते हैं, विधि आयोग ने निर्णय लिया कि किसी भी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए इन मुद्दों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है। विधि आयोग के प्रतिवेदन में कहा गया है कि गैर-संविदात्मक उपनिधान के मुद्दे को संबोधित करने से पहले अर्ध संविदात्मक संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है। अर्ध अनुबंध एक पूर्व अनुबंध या पक्षों के बीच एक समझौते के अस्तित्व के बिना कानून के संचालन या कानून की प्रक्रिया द्वारा पक्षों पर लगाए गए दायित्व हैं। इन अनुबंधों को वैध अनुबंध बनाने के लिए कुछ आवश्यक तत्वों के बिना भी वैध माना जाता है। सामान को खोजने वाले पर लगाया गया दायित्व अर्ध अनुबंधों का एक उदाहरण है। 

13वें विधि आयोग की प्रतिवेदन के अनुसार, उपनिधान की वर्तमान परिभाषा को बदला नहीं जाना चाहिए, बल्कि उन तत्वों को संबोधित करने के लिए एक अलग धारा जोड़ी जानी चाहिए जो प्रकृति में अर्ध-संविदात्मक हैं। यह बताना चाहिए कि अनुबंध व्यक्त या निहित, के तहत उपनिधाता और उपनिधाग्रहीता, के सामान अधिकार और देनदारियां हैं जैसा कि वे एक संविदात्मक उपनिधान संबंध के तहत करते हैं। इस प्रकार, इस प्रतिवेदन में भारतीय संविदा अधिनियम के दायरे में गैर-संविदात्मक उपनिधान को स्वीकार करने की आवश्यकता पर ध्यान दिया गया है ताकि बेहतर अनुप्रयोग के लिए एक अलग प्रावधान बनाया जा सके और प्रावधानों के अनुप्रयोग और व्याख्या के संबंध में किसी भी प्रकार के भ्रम से बचा जा सके। इसने भारतीय कानूनी व्यवस्था में गैर-संविदात्मक उपनिधान की वैधता को स्वीकार किया। 

भारत में उपनिधान से जुड़े ऐतिहासिक मामले

भारत संघ बनाम उधो राम एंड संस (1963)

तथ्य

इस मामले में, मैसर्स राधा राम सोहन लाल द्वारा रेलवे के माध्यम से कोलकाता से दिल्ली के लिए विशिष्ट सामान भेजा गया था। भंडारण के कुछ सामान पारगमन के दौरान चोरी हो गए थे और वादी तक नहीं पहुंचे थे। इसके बाद वादी ने मुआवजे के लिए मुकदमा दायर किया। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुमान लगाया कि ट्रेन हावड़ा स्टेशन से रात 1:30 बजे रवाना हुई थी और सामान ले जाने वाली गाड़ियों को ठीक से सुरक्षित और सील कर दिया गया था, लेकिन ट्रेन के आने पर सामान रखने वाली कुछ गाड़ियों के दरवाजे पटक दिए गए और इससे केवल दो घंटे में एक सील और एक कीलक खुल गई। इससे चोरी की वारदात हुई। यह पता चला था कि गाड़ी ने कोई सावधानी नहीं बरती और गाड़ी के वैगनों की कोई निगरानी नहीं की गई। 

मुद्दे

क्या ट्रेन अधिकारियों की ओर से उचित सावधानी बरतने के लिए कर्तव्य का उल्लंघन किया गया था?

निर्णय

इन सभी कारकों के कारण, प्रतिवादियों को उत्तरदायी ठहराया गया क्योंकि उन्होंने देखभाल के उचित मानक का पालन नहीं किया था जो उन्हें ऐसी स्थिति में लेने की उम्मीद थी। चोरी को होने से रोकने के लिए प्रतिवादी का कर्तव्य था और उचित उचित परिश्रम न करके, यह उचित अपेक्षाओं का पालन नहीं करता था। इसलिए, प्रतिवादी उत्तरदायी है। 

कोलकाता क्रेडिट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम ग्रीस के प्रिंस पीटर (1963)

तथ्य

इस मामले में मरम्मत के लिए भेजी गई एक कार आग की वजह से क्षतिग्रस्त हो गई। जिस गैरेज में कार रखी गई थी वह एक ईंट और मोर्टार की इमारत थी जो लकड़ी के तख्तों से घिरी हुई थी लेकिन गैरेज में न केवल गैसोलीन वाली कारें बल्कि अन्य ज्वलनशील सामग्री जैसे पेंट थिनर आदि भी थीं। गैरेज का एक हिस्सा खाना पकाने के लिए इस्तेमाल किया गया था और खाना पकाने के क्षेत्र को लकड़ी का उपयोग करके गैरेज से अलग किया गया था। गैरेज मालिक द्वारा किए गए सुरक्षा उपाय अपर्याप्त पाए गए। जिस जगह पर वादी की कार रखी गई थी, उसे आग लगने के बाद भी काफी देर तक नहीं खोला जा सका क्योंकि कमरे की चाबी काम नहीं कर रही थी। 

मुद्दे

क्या गैराज के मालिक ने उपनिधान पर ली गई कार की उचित देखभाल उसी तरह की जैसे एक सामान्य विवेकशील व्यक्ति अपने सामान की देखभाल करता है?

निर्णय

यह माना गया कि प्रतिवादी गैरेज मालिक उचित परिश्रम करने में विफल रहा था और उचित मात्रा में देखभाल नहीं कर सकता था जिसे उसे कार के उपनिधानगृहीता के रूप में माना जाता था। प्रतिवादी ने दलील दी कि उसने कार जिसमें आग लगी थी की देखभाल उसी तरह की जैसे  वह अपनी संपत्ति की करता था। उन्होंने दलील दी कि दुर्घटना के कारण उनका अपना सामान भी जल गया है और इसलिए उन्हें सभी दायित्वों से मुक्त किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक वैध बचाव के रूप में नहीं माना और माना कि वह सामान की उचित देखभाल करने के लिए उत्तरदायी था और उसकी विफलता उसे हुए नुकसान के लिए उपनिधानगृहीता की भरपाई करने के लिए उत्तरदायी बनाती है। 

सूर्या फार्मास्युटिकल लिमिटेड बनाम एयर इंडिया लिमिटेड (2008)

तथ्यों

इस मामले में, वादी एक दवा कंपनी थी जिसने शिपमेंट खोने के लिए एयरलाइन कंपनी पर मुकदमा दायर किया था। वादी ने एयरलाइंस के माध्यम से दवाओं और अन्य ड्रग का एक पैकेज दूसरे स्थान पर भेजा था। पारगमन के दौरान, विमान ने इन सामानों को खो दिया। वादी ने तर्क दिया कि विमान उपनिधानगृहीता की स्थिति में था और उसे सामान की उचित देखभाल करनी चाहिए थी। यह देखते हुए कि उपनिधानगृहीता पारगमन में सामान की उचित देखभाल और परिश्रम करने में विफल रहा, उन्हें उपनिधानगृहीता की लापरवाही के कारण उसके द्वारा किए गए किसी भी नुकसान के वादी को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। प्रतिवादी एयरलाइंस कंपनी ने तर्क दिया कि उनका वादी के साथ एक अलग समझौता था जिसमें कहा गया था कि खोए हुए प्रत्येक 1 किलो सामान के लिए दायित्व की सीमा 20 डॉलर होगी। 

मामले में उठाए गए मुद्दे

क्या एक अलग समझौता होना वैध है जो उपनिधानगृहीता की दायित्व को सीमित करता है?

निर्णय

शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वाहक के दायित्व को सीमित करने वाले एक अलग समझौते का अस्तित्व वैध नहीं है। यह सार्वजनिक नीति के खिलाफ है और इसलिए कानून के अनुसार शून्य है। एयरलाइन कंपनी उचित देखभाल और सावधानी बरतने में विफल रही और इसलिए पारगमन में सामान के नुकसान के लिए दवा कंपनी को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। 

महेश मिंज बनाम झारखंड राज्य (2009)

तथ्य

इस मामले में, शिकायतकर्ता अपनी पत्नी श्रीमती कला श्रीवास्तव के साथ पंजाब नेशनल बैंक, रांची द्वारा उन्हें पट्टे पर दिए गए लॉकरों के संयुक्त पट्टेदार थे। शिकायतकर्ता ने लॉकर का अंतिम बार 22.02.2002 को उपयोग किया और लॉकर में कुछ सोने के सामानओं को संग्रहीत किया। घटना के दिन शिकायतकर्ता अपने बेटे और बहू के साथ लॉकर खोलने गया और सोने का सामान गायब पाया। उन्होंने पता लगाया कि सोने का लॉकर आसानी से खोला जा सकता है और उन्होंने पुलिस को घटना की सूचना दी। 

मामले में उठाए गए मुद्दे

क्या बैंक और शिकायतकर्ता के बीच उपनिधान अनुबंध मौजूद है?

मामले में फैसला

झारखंड उच्च न्यायालय ने कहा कि लॉकर किराए पर लेने से मकान मालिक और किरायेदार के समान लेनदेन बनाया जाता है, लेकिन इस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए कि एक बैंकर हमेशा मास्टर कुंजी का उपयोग करके लॉकर खोल सकता है और लॉकर का किरायेदार बैंक की मदद के बिना लॉकर नहीं खोल सकता है। किरायेदार की भी समय सीमा होती है लेकिन बैंकर की ऐसी कोई सीमा नहीं होती है। इसलिए ऐसी स्थितियों में, यदि भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 148 के अनुसार उपनिधान की सभी शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो बैंकर और किरायेदार के बीच उपनिधान का संबंध स्थापित किया जा सकता है। 

उपनिधान कानून में कमियां

भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत उपनिधान का कानून कई खामियों को दूर नहीं करता है जिससे अनुप्रयोग और व्याख्या में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। यह विभिन्न प्रकार की स्थितियों या जटिल स्थितियों को संबोधित करने में विफल रहता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

जब उपनिधानित सामान इच्छित उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो

भारतीय अनुबंध अधिनियम इस बात पर चुप रहता है कि उपनिधानगृहीता का सहारा क्या होगा जब उसे उपनिधान किया गया सामान इच्छित उपयोग के लिए अनुपयुक्त हों। इच्छित उपयोग उस अनुप्रयोग या कार्य को संदर्भित करता है जिसके लिए उपनिधान वाले सामान को पहले स्थान पर रखा गया था। उदाहरण के लिए यदि एक उपनिधानगृहीता एक किताब छापने के लिए एक प्रिंटिंग प्रेस मशीन किराए पर लेता है, लेकिन बाद में यह महसूस करता है कि मशीन का उपयोग केवल कम काम के बोझ वाली किसी भी चीज के पर्चे छापने के लिए किया जा सकता है, तो ऐसी स्थिति में क्या सहारा होगा। क्या उपनिधानगृहीता को मशीन किराए पर लेने के लिए उसके द्वारा भुगतान की गई कीमत वापस मिलनी चाहिए और मशीन को उपनिधाता को वापस कर देना चाहिए? क्या उपनिधाता का कर्तव्य है कि वह किराए पर लेने से पहले उपनिधानगृहीता को सूचित करे कि सामान का उपयोग केवल इन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है? क्या यह मान लेना उचित है कि उपनिधाता विशिष्ट प्रकृति के सभी संभावित उपयोगों के बारे में सोच सकता है और फिर उन्हें उपनिधानगृहीता को सूचित कर सकता है? इन सवालों का जवाब नहीं दिया गया है।

सामान्य नियम के अनुसार, प्रत्येक किराए के सामान एक अंतर्निहित गारंटी के साथ आते है कि वे उस इच्छित उद्देश्य की पूर्ति करेंगे जिसके लिए उन्हें पहले स्थान पर रखा गया था। यदि इस गारंटी का उल्लंघन किया जाता है, तो जिस किराया शुल्क का भुगतान किया जाना चाहिए था, वह अब देय नहीं है। ऐसी स्थितियों में क्या उपाय किया जाएगा, इसका समाधान करने के लिए व्यापक विनियम होने चाहिए। अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए क्योंकि विशिष्ट चीजों को काम पर रखने पर निहित दायित्वों और अनकही संविदात्मक आवश्यकताएं महत्वपूर्ण विचार हैं। एक अनुबंध का उल्लंघन किया जाता है जब बाद में यह पाया जाता है कि किसी विशेष उपयोग के लिए किराए पर लिया गया सामान उस विशेष उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है। 

नौकर की लापरवाही के लिए उपनिधानगृहीता का दायित्व

यह एक दिलचस्प प्रस्ताव है जो अपकृत्य और अनुबंध कानून का एक प्रतिच्छेदन (इंटरसेक्शन) प्रस्तुत करता है। अपकृत्य के कानून में, प्रत्‍यधिकृत दायित्व की अवधारणा में कहा गया है कि एक मालिक रोजगार के प्राकृतिक पाठ्यक्रम में नौकरों द्वारा किए गए कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा। भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार, एक उपनिधानगृहीता अपने नौकर के लापरवाही कार्यों के कारण उपनिधान सामान या उपनिधानगृहीता की अभिरक्षा में संपत्ति के संबंध में हुई क्षति के लिए उत्तरदायी होता है, लेकिन इस तरह का दायित्व तीसरे पक्ष के कार्यों के कारण होने वाले नुकसान तक नहीं है, जिसका अनुमान उपनिधानगृहीता द्वारा नहीं लगाया जा सकता था। फिर भी, एक उपनिधानगृहीता को रोजगार के दौरान से परे अपने नौकर के कार्यों के कारण उपनिधान वाले सामानों को नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। ताज महल होटल बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2019) के मामले में यह माना गया कि ऐसी स्थिति में जहां किसी होटल द्वारा वैलेट पार्किंग सेवाएं दी जाती हैं, होटल केवल तभी उत्तरदायी होता है जब कोई वैलेट या कर्मचारी कार को अपने कब्जे में ले लेता है और मालिक की सहमति के बिना उसे उसके नियंत्रण से हटा देता है। हालांकि, अगर होटल द्वारा उचित सावधानी बरतने के बावजूद किसी अजनबी द्वारा कार चोरी की जाती है, तो यह इसके लिए उत्तरदायी नहीं होगा क्योंकि चोरी उनके नियंत्रण से बाहर थी। ऐसी स्थितियों में, उपनिधानगृहीता की दायित्वो का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है। भले ही कानून एक उपनिधानगृहीता के दायित्व की सीमा के बारे में व्याख्या में कुछ अस्पष्टताओं को छोड़ देता है, लेकिन यह मामले के आधार पर पता लगाया जाता है ताकि मामले के आसपास के तथ्यों और परिस्थितियों के संबंध में दायित्वो का निर्धारण किया जा सके। इसलिए, इस क्षेत्र को पूर्ण सावधानी के साथ चलना महत्वपूर्ण है। 

नुकसान की मात्रा

जब उपनिधान और कर्तव्य के उल्लंघन के मामलों में नुकसान की मात्रा को मापने की बात आती है, तो उपाय पूरी तरह से मुकदमे पर निर्भर नहीं होता है क्योंकि वे विभिन्न अन्य साधनों में भी पूरा होते हैं। ऐसी परिस्थिति में जहां अनुबंध का उल्लंघन किया गया हो और उसकी शर्तें पूरी नहीं की गई हों, वहां शिकायतकर्ता पक्ष को समानता और सामान विवेक के सिद्धांतों के आधार पर यथासंभव पहले की स्थिति के करीब लाने के लिए अनुमान के मानदंड का उपयोग किया जाता है। उपनिधान पर दिए गए सामान का बाजार मूल्य नुकसान या मुआवजे के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि का निर्धारण करने के लिए एक महत्वपूर्ण मानदंड है। उपनिधानित सामान की हानि के लिए उपनिधाता के दावे की सीमा का निर्धारण करते समय, उस बाजार मूल्य पर विचार किया जाता है जिस पर उपनिधानित सामान बेचा गया है।

इस तरह की विधि में जो समस्या उत्पन्न होती है वह यह है कि जब उपनिधान  किए गए सामान के समान या तुलनीय सामान बाजार में उपलब्ध नहीं होता हैं, तो न्यायालयों के पास मुआवजे के मौद्रिक मूल्य या उपलब्ध नुकसान पर उपनिधानगृहीता के दावों को निर्धारित करने का कोई सहारा नहीं होता है। ऐसी स्थितियों में, मामले की योग्यता निर्धारित करने के लिए बड़े पैमाने पर उपनिधानगृहीता के प्रस्ताव को ध्यान में रखा जाता है। ऐसी स्थितियों से निपटने वाले न्यायालय के नए फैसलों के आधार पर पैटर्न बदलता है। ऐसे मामलों में बेलिफ द्वारा किए गए नुकसान और मुआवजे के दावों का पता लगाने के लिए प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रावधान होना महत्वपूर्ण है। इससे लंबी मुकदमेबाजी से बचा जा सकेगा और मुकदमों और विवादों के तेजी से समाधान में मदद मिलेगी। मामलों में इस तरह की स्पष्टता बेलिफ के बीच असंतोष को भी रोकती है और न्यायालयों को न्याय को पूरा करने में मदद करती है। 

निष्कर्ष

उपनिधान के अनुबंध अद्वितीय लेनदेन संबंधी संबंध हैं जो विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पक्षों के बीच अनुबंधों और समझौतों द्वारा बनाए गए हैं। इसलिए, वे मानव सभ्यता के लिए यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि लेनदेन और लेनदेन के विषय समान बनाने वाले सामान हर तरह से अच्छी तरह से संरक्षित हैं। वे एक वैध अनुबंध के सभी आवश्यक तत्वों का गठन करते हैं। जबकि परंपरागत रूप से, उपनिधान को एक अनुबंध के अस्तित्व से बने संबंध के रूप में देखा गया है, इसकी वर्तमान समझ गैर-संविदात्मक उपनिधान संबंधों के साथ अर्ध-संविदात्मक दायित्वों के साथ मान्यता प्राप्त होने के साथ काफी बदल रही है। समय के परिवर्तन और मानव जीवन को आसान बनाने के लिए सेवाओं के विभिन्न रूपों के निर्माण के साथ, नए प्रकार के संकट सामने आते हैं और कानूनी प्रावधानों के बेहतर कार्यान्वयन के लिए संविदात्मक संबंधों के तह में विचार किया जाना चाहिए। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

एक उपनिधान बनाने के लिए क्या आवश्यक हैं?

उपनिधान प्राप्त सामान का अस्तित्व, सामान के कब्जे का वितरण, उस उद्देश्य का उल्लेख जिसके लिए सामान को उपनिधान किया जाता है और सामान की वापसी की शर्त एक उपनिधान बनाने के लिए कुछ आवश्यक चीजें हैं। 

क्या होता है जब उपनिधानगृहीता के कब्जे में उपनिधान पर दिया गया सामान चोरी हो जाता है?

यदि उपनिधानगृहीता की लापरवाही के कारण चोरी हुई और यह साबित हो जाता है कि उपनिधानगृहीता ने देखभाल के उचित मानक का प्रयोग नहीं किया, तो उपनिधानगृहीता को उपनिधाता के सामान के नुकसान के लिए उसको मुआवजा देना चाहिए। 

जब एक उपनिधान वाले सामान से लाभ अर्जित होता है,तो उसे कौन रखता है?

जब तक इसके विपरीत कोई अनुबंध मौजूद नहीं होता है, तब तक उपनिधान वाले सामान से उत्पन्न होने वाली कोई भी अभिवृद्धि या लाभ उपनिधाता का होता है और उसे वापस कर दिया जाना चाहिए। 

उपनिधाता को उपनिधानित सामान कब वापस किया जाना चाहिए?

उपनिधान पर दिए गए सामान आमतौर पर उस उद्देश्य के बाद वापस कर दिए जाते हैं जिसके लिए उन्हें वितरित किया गया था या उपनिधान की अवधि समाप्त हो जाती है। 

क्या बिना किसी समझौते के उपनिधान का संबंध बनाया जा सकता है?

एक सामान्य नियम के रूप में, उपनिधान के लिए एक अनुबंध के अस्तित्व की आवश्यकता होती है लेकिन कुछ मामलों में, न्यायालयों ने बिना किसी समझौते के उपनिधान संबंधों को मान्यता दी है। उदाहरण के लिए: जब कोई व्यक्ति किसी और से संबंधित खोए हुए सामान को पाता है और उन्हें अभिरक्षा में लेता है, तो वह सामान के लिए उपनिधानगृहीता बन जाता है। 

संदर्भ

 

विपणन में डीपफेक के कानूनी निहितार्थ

यह लेख Sukanya Das द्वारा लॉसिखो से हाऊ टू यूज ए.आई. टू ग्रो योर लीगल प्रैक्टिस पर ट्रेनिंग प्रोग्राम पर एक कोर्स करने के लिए लिखा गया है। इस लेख में विपणन (मार्केटिंग) में डीपफेक के कानूनी निहितार्थ पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

इस डिजिटल युग में, डीपफेक तकनीक को नवीन अवसरों के साथ और कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों के साथ भी पेश किया गया है, खासकर विपणन के क्षेत्र में। जबकि डीपफेक प्रौद्योगिकियां फिल्म निर्माण की तरह पूरे मनोरंजन उद्योग में एक नया मार्ग बना सकती हैं, जो निर्माण गृह के लिए बहुत सस्ती हो सकती है, दुर्भाग्य से, यह तकनीक अश्लील वीडियो, नकली समाचार, बदमाशी, अभद्र भाषा, बाल शोषण और वित्त उद्योग में भी संभावित उपयोग के लिए बहुत बदनाम हो गई है। आजकल, डीपफेक तकनीक (जनरेटिव एडवरसैरियल नेटवर्क (जीएएन)) का उपयोग नकली सामग्री, जोड़ तोड़ वाले वीडियो और चित्र बनाने के लिए उत्तरोत्तर किया जा रहा है जिन्हें नकली और वास्तविक के बीच अंतर नहीं किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, हाल ही में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना की विशेषता वाला एक वायरल डीपफेक वीडियो ऑल-सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामने आया, जिसने जनता के बीच भारी चिंता पैदा कर दी। एक और उदाहरण: 2018 में, एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के एक बयान देने वाले डीपफेक-जनरेटेड वीडियो को दर्शाया गया था। यहां डीपफेक के परिदृश्य का पता लगाया जाएगा, प्रकार, लाभ, अंतर्राष्ट्रीय कानून, विपणन, ए.आई. में कानून की भूमिका और वित्त और प्रतिष्ठा पर प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

डीपफेक क्या हैं और इसके प्रकार

डीपफेक एक प्रकार का सिंथेटिक मीडिया है जो यथार्थवादी चित्र, वीडियो या ऑडियो बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) (ए.आई.) का उपयोग करता है। उनका उपयोग अक्सर नकली समाचार बनाने या किसी और का प्रतिरूपण करने के लिए किया जाता है। विभिन्न तकनीकों का उपयोग करके डीपफेक बनाए जा सकते हैं, लेकिन यथार्थवादी चेहरे या आवाज उत्पन्न करने का तरीका सीखने के लिए डीप लर्निंग मॉडल का उपयोग करना सबसे आम है। इस मॉडल का उपयोग तब नकली वीडियो या ऑडियो क्लिप बनाने के लिए किया जा सकता है जो वास्तविक प्रतीत होगी।

डीपफेक एक अपेक्षाकृत नई तकनीक है, लेकिन दुनिया पर उनका पहले से ही महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। उनका उपयोग गलत सूचना फैलाने, लोगों को ब्लैकमेल करने और यहां तक कि चुनावों में हस्तक्षेप करने के लिए किया गया है। जैसे-जैसे डीपफेक अधिक परिष्कृत होते जाते हैं, संभावना है कि उनका उपयोग और भी अधिक दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

डीपफेक के बारे में कई चिंताएं हैं। एक चिंता यह है कि उनका इस्तेमाल फर्जी खबरें बनाने या गलत सूचना फैलाने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक डीपफेक वीडियो बनाया जा सकता है ताकि यह प्रकट हो सके कि एक राजनेता ने कुछ ऐसा कहा जो उन्होंने वास्तव में नहीं कहा था। इसका उपयोग चुनाव को प्रभावित करने या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

एक और चिंता यह है कि डीपफेक का इस्तेमाल लोगों को ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यह प्रकट करने के लिए एक डीपफेक वीडियो बनाया जा सकता है कि कोई ऐसा कुछ कर रहा है जो उन्होंने वास्तव में नहीं किया था। इसका उपयोग व्यक्ति से पैसे निकालने या उन्हें कुछ ऐसा करने के लिए ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सकता है जो वे नहीं करना चाहते हैं।

डीपफेक का इस्तेमाल चुनावों में हस्तक्षेप करने के लिए भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक डीपफेक वीडियो बनाया जा सकता है ताकि यह दिखाई दे कि एक उम्मीदवार कार्यालय के लिए अयोग्य है। इसका उपयोग लोगों को उम्मीदवार को वोट देने से हतोत्साहित करने या चुनाव जीतने की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

डीपफेक से निपटने के कई तरीके हैं। एक तरीका यह है कि जनता को डीपफेक और इसकी गलत सूचना फैलाने के लिए उनका उपयोग कैसे किया जा सकता है के बारे में शिक्षित किया जाए। दूसरा तरीका डीपफेक का पता लगाने के लिए उपकरण विकसित करना है। अंत में, उन कानूनों और विनियमों का समर्थन करना महत्वपूर्ण है जो डीपफेक के दुरुपयोग को रोकने में मदद करेंगे।

विपणन में डीपफेक के कानूनी निहितार्थ जटिल और दूरगामी हैं। डीपफेक यथार्थवादी डिजिटल छवियां या वीडियो हैं जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) का उपयोग करके यह प्रकट करने के लिए बनाए गए हैं कि कोई ऐसा कुछ कर रहा है या कह रहा है जो उन्होंने नहीं किया। जबकि नकली का उपयोग मनोरंजन के उद्देश्य से किया जा सकता है, उनका उपयोग गलत सूचना फैलाने, चुनावों में हेरफेर करने या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है।

डीपफेक के बारे में सबसे बड़ी कानूनी चिंताओं में से एक यह है कि उनका उपयोग झूठे विज्ञापन बनाने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक गहरे नकली का उपयोग यह प्रकट करने के लिए किया जा सकता है कि एक सेलिब्रिटी किसी उत्पाद का समर्थन कर रहा है जब उनका वास्तव में उत्पाद से कोई संबंध नहीं है। यह उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता है और उन्हें खरीदारी करने के लिए प्रेरित कर सकता है जो उन्होंने अन्यथा नहीं किया होगा।

डीपफेक के बारे में एक और कानूनी चिंता यह है कि उनका इस्तेमाल व्यक्तियों को परेशान करने या बदनाम करने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक डीपफेक का उपयोग एक वीडियो बनाने के लिए किया जा सकता है जो किसी को कुछ शर्मनाक या अवैध करते हुए दिखाता है। यह व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है और उनके लिए नौकरी पाना या रिश्ते बनाए रखना मुश्किल बना सकता है।

इन विशिष्ट कानूनी चिंताओं के अलावा, डीपफेक गोपनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में व्यापक प्रश्न भी उठाते हैं। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट नहीं है कि डीपफेक पहले संशोधन द्वारा संरक्षित हैं या नहीं। यदि डीपफेक को भाषण माना जाता है, तो उन्हें पहले संशोधन के तहत संरक्षित किया जा सकता है, भले ही उनका उपयोग गलत सूचना फैलाने या व्यक्तियों को परेशान करने के लिए किया जाता हो।

विपणन में डीपफेक के कानूनी निहितार्थों पर अभी भी बहस चल रही है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि डीपफेक में हानिकारक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने की क्षमता है। नतीजतन, सांसदों, नियामकों और विपणकर्ताओं के लिए कानूनों और विनियमों को विकसित करने के लिए मिलकर काम करना महत्वपूर्ण है जो डीपफेक द्वारा उत्पन्न जोखिमों को दूर कर सकते हैं।

विपणन में डीपफेक के कानूनी निहितार्थों को संबोधित करने के लिए यहां कुछ विशिष्ट सिफारिशें दी गई हैं:

  • स्पष्ट कानून और नियम विकसित करें जो झूठे विज्ञापन के लिए डीपफेक के उपयोग को प्रतिबंधित करते हैं।
  • डीपफेक के खतरों के बारे में जन जागरूकता अभियान बनाएं।
  • डीपफेक बनाते और उपयोग करते समय विपणक को नैतिक दिशानिर्देशों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • डीपफेक का पता लगाने और उसे रोकने के तरीकों में अनुसंधान का समर्थन करें।

ये कदम उठाकर, हम यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि डीपफेक का उपयोग उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाने या हमारे लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए नहीं किया जाता है।

प्रकार

  • ऑडियो-विजुअल हेरफेर: अन्य लोगों के शीर्ष पर लोगों की आवाज़ों और चेहरों को एक के ऊपर करके ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग को संशोधित करता है (मॉर्फिंग)। होठ तुल्यकालन (लिप सिंकिंग) किसी अन्य व्यक्ति को नेत्रहीन या मुखर रूप से कुछ कहने का एक और तरीका है जो मूल रूप से वीडियो या ऑडियो सामग्री में शामिल नहीं है।
  • सिंथेटिक मीडिया: इस प्रकार का डीपफेक पूरी तरह से अलग और मनगढ़ंत सामग्री उत्पन्न करता है, उदाहरण के लिए, वीडियो और चित्र। ये वास्तविकता से बहुत दूर हैं। उदाहरण के लिए, चेहरे की अदला बदली में किसी के चेहरे को किसी अन्य व्यक्ति के चेहरे से बदलना या शायद किसी अन्य फोटो/वीडियो सामग्री के साथ शामिल करना शामिल है। एक और उदाहरण: 2017 के अंत में, एक उपयोगकर्ता ने सेलिब्रिटी पोर्न डीपफेक पेश करना शुरू कर दिया और वहाँ कई शौक़ीन भी हैं जो केवल डीपफेक-संबंधित अश्लील साहित्य बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

उपरोक्त बिंदुओं पर संक्षिप्त चर्चा

एक रिपोर्ट सामने आई थी कि न्यू जर्सी हाई स्कूल और वेस्टफील्ड हाई स्कूल के छात्र अपने स्वयं के सहपाठियों की नकली नग्न या अश्लील छवियां बनाने के लिए मूल तस्वीरों में हेरफेर करने के लिए ए.आई. का उपयोग कर रहे हैं और जाहिर तौर पर तस्वीरें गर्मियों में समूहों के आसपास सामने आ रही थीं। ए.आई. तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि अब किशोर ऑनलाइन स्रोतों से ली गई अश्लील छवियों को बदल रहे हैं और अपने स्वयं के कम उम्र के सहपाठियों की नग्न तस्वीरें बना रहे हैं। एनबीसी के स्रोत से, माता-पिता को स्कूल प्रशासक द्वारा अपने बच्चों के पाठ्यक्रम में चैटजीपीटी को शामिल करने के बारे में सूचित किया गया था; इसलिए, सबसे पहले, वे चिंतित थे कि इससे उनके बच्चे की शिक्षा प्रभावित होगी और उनके स्कूल की गतिविधियों के लिए निबंध लिखना आसान हो जाएगा। बहरहाल, नकली नग्न तस्वीरों से जुड़ी घटना के बारे में जानने के बाद, चीजें बहुत अधिक चिंताजनक हो गईं।

भारत में, इलेक्ट्रॉनिक रूप में किसी भी यौन या अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करना आईटी अधिनियम की धारा 67A के तहत दंडनीय है। पहली बार दोषी पाए जाने पर एक अवधि के लिए कारावास का दंड होगा जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है और साथ ही जुर्माना भी देय होगा जो दस लाख रुपये तक हो सकता है। दूसरी बार दोषी पाए जाने पर कारावास की अवधि सात साल तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी 10 लाख रुपए तक बढ़ाया जा सकता है। एक और तरीका किसी भी सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करना है जो यौन उत्तेजना का कारण बनता है लेकिन बिल्कुल या स्पष्ट रूप से इंगित नहीं किया गया है, क्योंकि अश्लील साहित्य को भी अश्लील माना जाता है और आईटी अधिनियम की धारा 67  के तहत दंडनीय है। इसके लिए एक अवधि के लिए कारावास हो सकता, जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी देय होगा जिसे पांच लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है। बाद में दोषी पाए जाने पर पांच साल की कैद और दस लाख रुपये का जुर्माना बढ़ाया जा सकता है। सचिन तेंदुलकर के डीपफेक वीडियो (मानहानि (डिफेमेशन) की सजा) फैलाने के लिए जिम्मेदार गेमिंग वेबसाइट के मालिक के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 का हालिया मामला लगाया गया था। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आईपीसी की धारा 465 (जालसाजी के लिए सजा), धारा 469 (प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से जालसाजी), और आईटी अधिनियम की धारा 66C और 66E उन अपराधों को संबोधित करने वाले हैं जो कंप्यूटर संसाधनों और सूचना से संबंधित हैं। धारा 66C विशेष रूप से पहचान की चोरी से संबंधित है और धारा 66E गोपनीयता के उल्लंघन के लिए सजा को संबोधित करती है। इसलिए, इन धाराओं का उपयोग किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए किया जा सकता है, यदि आवश्यक हो, जब कोई या उपयोगकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के अपमानजनक बयान देने या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने जैसे डीपफेक के लिए ए.आई. तकनीक का दुरुपयोग करने की कोशिश करता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67B में बच्चों के अश्लील कार्यों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में यौन विषय-वस्तु अथवा अश्लील साहित्य दर्शाने के लिए दंड का प्रावधान है। पोक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 13, 14 और 15 इन सभी अधिनियमों को महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए लागू किया जा सकता है, और इन अपराधों पर मुकदमा भी चलाया जा सकता है, और धारा 292  और 294 भी दंड संहिता, 1860 के तहत अश्लील सामग्री के लिए दंडनीय हैं।

2024 के लोकसभा चुनावों ने एक चुनौतीपूर्ण स्थिति दिखाई, जिसने निश्चित रूप से डीपफेक के कारण खतरा पैदा कर दिया। कुछ राजनीतिक उम्मीदवारों को उनके डीपफेक वीडियो और ऑडियो दिखाते हुए चित्रित करना कि वे एक विशेष समुदाय के खिलाफ टिप्पणी कर रहे थे और इससे दंगे भड़काने का तीव्र सांप्रदायिक तनाव हो सकता है। चुनावी प्रक्रिया के दौरान इस प्रकार का व्यवधान संभवतः सामाजिक सद्भाव के लिए खतरा पैदा कर सकता है और सार्वजनिक अव्यवस्था भी पैदा कर सकता है। इस प्रकार के दंगों को आईपीसी की धारा 153A (धर्म, जाति, जन्म स्थान और निवास के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच नफरत को बढ़ावा देना) और धारा 505 (सार्वजनिक शरारत करने वाले बयान) के तहत जानबूझकर अपराध माना जा सकता है। हालाँकि, भारतीय कानूनी प्रणाली में अभी भी कई पहलुओं की कमी है, हालाँकि मेटी सलाहकार एक साथ अस्थायी समर्थन देते हुए मुद्दों को हल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। इसलिए, अंत में, कानून को गंभीर होने और ए.आई. के संबंध में तेजी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

डीपफेक में कई अन्य बहुमुखी प्रतिभाएं हैं, और डीपफेक प्रौद्योगिकियां कई घटनाओं को पुन: पेश करने में सक्षम हैं और जनता की राय या धारणाओं को बदल सकती हैं, बाजार में व्यापक महत्वपूर्ण रणनीतियाँ उपलब्ध हैं। डीपफेक बनाने वालों को 4 तरीकों से भी अलग किया जा सकता है:

  • सार्वजनिक डीपफेक शौकीन;
  • दुर्भावनापूर्ण ठग;
  • सरकारी अभिनेता जैसे राजनेता;
  • असली खिलाड़ी, जैसे टेलीविजन प्रतिष्ठान।

डीपफेक तकनीक के लाभ और मुद्दे

मीडिया मनोरंजन उद्योग

डीपफेक तकनीकों का उपयोग फिल्मों या किसी काल्पनिक वेब सीरीज में दृश्य प्रभावों को बढ़ा सकता है और यह कहानी को और अधिक रोचक बनाता है। लेकिन किसी अन्य तरीके से, डीपफेक तकनीक अभिनेताओं/कलाकारों के पक्ष में नुकसान भी पैदा कर सकती है। नेटफ्लिक्स के ब्लैक मिरर के साथ हाल ही में एक मुद्दा हुआ है; इससे पता चलता है कि ए.आई. पीढ़ी की मदद से पात्रों और अभिनेताओं का चित्रण भविष्य से बहुत दूर नहीं है। अभिनेता, जो बाद में दिसंबर 2023 में हड़ताल पर चले गए थे, ने अपनी कोई भी डिजिटल प्रतिकृति बनाने से पहले कंपनियों के साथ उनकी सहमति प्राप्त करने के लिए एक सौदा किया और यह सहमति में भी शामिल है कि कंपनियों को यह खुलासा करना होगा कि प्रतिकृति का उपयोग किस कारण से किया जाएगा; अभिनेताओं को उनकी डिजिटल प्रतिकृतियों के उपयोग के लिए मुआवजा देने की आवश्यकता है। एक और चीज शामिल है, जो अभिनेताओं की छवियों के आधार पर सिंथेटिक नकली कलाकारों के लिए एक दिशानिर्देश है और इसका उपयोग जनरेटिव ए.आई. को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा सकता है।

एक अन्य प्रकार का मुद्दा जिसने हाल ही में भारत में और इसके लोगों के भीतर एक बड़ी चिंगारी पैदा की है, कैटरीना कैफ, आलिया भट्ट, रश्मिका मंदाना और सचिन तेंदुलकर जैसे प्रभावशाली या सेलिब्रिटी आंकड़े “मॉर्फिंग” जैसी डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग का शिकार थे। दुर्भाग्य से, आजकल ये घटनाएं आम हो गई हैं, जो डीपफेक के अवैध और अनैतिक उपयोग के बारे में अलार्म उठा रही हैं। 23 दिसंबर, 2023 को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना मंत्रालय ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज)) को कुछ निश्चित नियमों का पालन करने का निर्देश देते हुए सलाहकारी जारी की। मध्यस्थों को उपयोगकर्ताओं को स्पष्ट रूप से सूचित करना होगा कि उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थों दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 और आईटी नियमों के नियम 3(1)(b) के तहत दायित्वों का पालन करना होगा उनके प्लेटफार्मों पर निषिद्ध सामग्री और गोपनीयता नीति, उपयोगकर्ता समझौते और सेवा की शर्तों के हिस्से के रूप में महत्वपूर्ण दस्तावेजों में शामिल करने की आवश्यकता है। नियम (3)(b)(v) में भ्रामक या गलत जानकारी भी निषिद्ध है, इसलिए इस नियम में उपयोगकर्ताओं को सूचित करना शामिल है कि किसी भी सामग्री को होस्टिंग, अपलोड, प्रदर्शित, साझा करना या संशोधित करना जो हानिकारक, अश्लील, मानहानिकारक, या पीडोफिलिक है, दूसरे व्यक्ति या मालिकों का जिनके सामान वे उपयोग कर रहे हैं, गैरकानूनी हैं, और मध्यस्थों को उस सामग्री के लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए जो वे अपनी सेवाओं पर साझा कर रहे हैं और अपने उपयोगकर्ताओं को इस बारे में शिक्षित करना चाहिए कि क्या अनुमत है और किसकी अनुमति नहीं है। 15 मार्च, 2024 की सलाहकारी ने कंपनियों को सलाह दी या सुझाव दिया कि उन्हें किसी भी/प्रत्येक ए-निर्मित टेक्स्ट या मीडिया में कुछ विशेष लेबल या एक अद्वितीय कोड जोड़ना चाहिए क्योंकि इससे सामग्री को ट्रैक करना आसान हो जाएगा, जैसे कि यह कहां से आया है और किसी भी दुरुपयोग के लिए रोका जा सकता है। इसलिए, मुख्य लक्ष्य यह पहचानना है कि डीपफेक किसी कंपनी के टूल का उपयोग करके बनाए गए थे या नहीं और इससे यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि उन्हें किसने बनाया है। हालांकि इन सभी दिशानिर्देशों का कोई कानूनी वजन नहीं है, इसका मतलब है कि कंपनियों को कानून द्वारा उनका पालन करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए कंपनियां अभी भी डीपफेक के लिए भविष्य के कानूनों को प्रभावित कर सकती हैं।

भारत में, डीपफेक खतरों को मापने और संबोधित करने के लिए कानूनी ढांचे का अभाव है; हालांकि, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी अधिनियम), भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) और आईटी नियमों जैसे मौजूदा कानून संभावित सामर्थ्य प्रदान करते हैं।

शिक्षा और प्रशिक्षण

शिक्षा और प्रशिक्षण नकली कदाचार के प्रसार का मुकाबला करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, रचनात्मक परियोजनाओं की सटीकता और अखंडता की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जनता को ए.आई. के दुरुपयोग के संभावित जोखिमों और परिणामों के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि व्यक्ति सूचित निर्णय ले सकें और अनैतिक प्रथाओं में शामिल होने से बच सकें।

स्कूलों को कम उम्र से शुरू करते हुए ए.आई. शिक्षा को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। छात्रों को ए.आई. के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें इसकी क्षमताएं, सीमाएं और नैतिक निहितार्थ शामिल हैं। ए.आई. में बच्चों को एक ठोस आधार प्रदान करके, स्कूल उन्हें महत्वपूर्ण सोच कौशल और ए.आई. को रचनात्मक और जिम्मेदारी से उपयोग करने की क्षमता विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

स्कूलों में ए.आई. सिखाने का एक तरीका परियोजना-आधारित शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना है। छात्रों को ऐसी परियोजनाएं सौंपी जा सकती हैं जिनके लिए उन्हें वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने या अभिनव समाधान बनाने के लिए ए.आई. का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। यह व्यावहारिक दृष्टिकोण छात्रों को अपने ज्ञान को लागू करने और ए.आई. के साथ व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने की अनुमति देता है।

ए.आई. के बारे में छात्रों को पढ़ाने के अलावा, उन्हें नकली कदाचार के खतरों के बारे में शिक्षित करना भी महत्वपूर्ण है। छात्रों को उन विभिन्न तरीकों से अवगत कराया जाना चाहिये जिनसे एआई का दुरुपयोग किया जा सकता है, जैसे कि नकली समाचार बनाना या दुष्प्रचार फैलाना। उन्हें यह भी सिखाया जाना चाहिए कि नकली सामग्री की पहचान कैसे करें और इसे उपयुक्त अधिकारियों को कैसे रिपोर्ट करें।

ए.आई. और नकली कदाचार से बचने के महत्व के बारे में जनता को शिक्षित करके, हम एक अधिक सूचित और जिम्मेदार समाज बना सकते हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि ए.आई. का उपयोग मानवता की भलाई के लिए किया जाता है न कि दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के लिए।

डीपफेक तकनीकों को भी जनता को शिक्षित करने की आवश्यकता है क्योंकि डीपफेक विश्लेषण एक छोटे लेकिन अनोखे तरीके से किया जा सकता है, जैसे कैमरे का उपयोग करके वीडियो रिकॉर्ड करते समय, लेंस विरूपण (डिस्टॉर्शन) और सेंसर शोर जैसे छोटे निशान पीछे रह जाते हैं। ये निशान डीपफेक के प्रमाण या पहचान के रूप में कार्य करते हैं क्योंकि प्रत्येक कैमरा अद्वितीय है और इसके कारण, डीपफेक वीडियो बनाने के साथ किए जाने के बाद भी सबूत बनाए रखा जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय कानून

आपराधिक क़ानून और मानहानि

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अभी, डीपफेक तकनीक के खतरों को दूर करने के लिए कोई संघीय कानून उपलब्ध नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों ने डीपफेक तकनीक के बारे में कानून के चयनित टुकड़े पारित किए हैं, जैसे टेक्सास, जिसने एसबी 751 को मंजूरी दी है और कैलिफोर्निया ने भी 730 के वर्ष में एबी 2019 पारित किया है। इसलिए, इन दोनों कानूनों ने डीपफेक संबंधित सामग्री के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि इसका उपयोग उनके चुनाव में किया गया होगा और इससे उम्मीदवारी प्रभावित हो सकते है।
  • चीन: यह बहुत कम देशों में से एक है जिसने डीपफेक, विशेष रूप से डीप सिंथेसिस प्रावधानों के संबंध में एक सख्त विनियमन स्थापित किया है। यह अधिनियम वास्तव में ए.आई. उपयोगकर्ता को प्राथमिक उपयोगकर्ता की सहमति या ज्ञान के बिना किसी भी सामग्री को डीपफेक करने से रोकता है। यह अधिनियम जनवरी 2023 में चीन में प्रभावी हो गया। अधिनियम के मुख्य दो उद्देश्य हैं:
  • ऑनलाइन सेंसरशिप को मजबूत करना।
  • नई उन्नत तीव्र तकनीकों के साथ बिंदु तक रहें।

मानहानि की जा सकती है क्योंकि डीपफेक कंटेंट बनाने वाले अपकृत्य (ट्रॉट) के निजी कानून के तहत कुछ हद तक उत्तरदायी हैं। हालांकि, मानहानि का अपकृत्य ऑस्ट्रेलियाई कानून की तरह देश से देश में भिन्न हो सकता है, जो वास्तव में मुख्य रूप से लिखित और बोली जाने वाली सामग्री का सामना करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, उदाहरण के लिए, एक समाचार पत्र।

आईपी उल्लंघन और कॉपीराइट

व्यापार चिह्न या लेबल जैसी किसी चीज़ का अवैध रूप से शोषण करना आईपी अधिकारों का उल्लंघन है। डीपफेक के साथ खतरा लंबा है और अधिक गंभीर मुद्दों का कारण बन सकता है, उदाहरण के लिए, मानवाधिकार, व्यक्तिगत डेटा संरक्षण और गोपनीयता अधिकार, और कॉपीराइट उल्लंघन। अभी, ऑस्ट्रेलिया में कोई कानून नहीं है जो नागरिकों को उनके आईपी अधिकारों के लिए किसी के अपने चेहरे या आवाज के लिए मदद कर सकता है; केवल एक लेखक ही अपने चेहरे को दर्शाने वाले अपने काम का कॉपीराइट रख सकता है या अपनी आवाज रिकॉर्ड करने के साथ भी किया जा सकता है।

ए.आई. में कानून की भूमिका और चुनौतियां

डीपफेक और कदाचार के भारी उपयोग के कारण, राजनीतिक अधिकारियों और उम्मीदवारों के डीपफेक उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के निहितार्थ एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गए हैं। यहां अधिकार क्षेत्र के भीतर जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ संरक्षण को संरेखित करने के लिए कानून प्रणाली नियम को फिर से काम करना आवश्यक है। भारत में इस डीपफेक कदाचार के मुद्दे का भी अभाव है; हालाँकि, भारत कानूनों को फंसाने की कोशिश कर रहा है, जो सामूहिक रूप से सरकार को कुछ हद तक डीपफेक मुद्दे से लड़ने में मदद कर सकते हैं। आईटी अधिनियम की धारा 66E कहती है कि किसी भी व्यक्ति की गोपनीयता का उल्लंघन करने के लिए दंड होगा, जैसे कि किसी की सहमति के बिना किसी भी चित्र को प्रसारित या प्रकाशित करना और सजा में 3 साल की कैद के साथ-साथ 2 लाख रुपये का जुर्माना शामिल है जो तैयारी करने वाले पर लगाया जाएगा। फिर भी, इस अधिनियम पर एक दुविधा है; बात यह है कि क्या यह धारा तब लागू होगी जब छवियां पूरी तरह से नकली उत्पन्न होती हैं और ए.आई. की मदद से विकसित होती हैं।

वित्त और प्रतिष्ठा को नुकसान

दुर्भाग्य से, दुर्भावनापूर्ण डीपफेक का खतरा वित्त उद्योग पर मंडरा रहा है, जिससे बाजार में हेरफेर, वित्तीय नुकसान और अस्थिरता का एक महत्वपूर्ण जोखिम पैदा हो रहा है। धोखा देने और नुकसान पहुंचाने के इरादे से बनाए गए ये डीपफेक व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए समान रूप से दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

प्राथमिक चिंताओं में से एक स्टॉक की कीमतों में हेरफेर करने के लिए डीपफेक का उपयोग करने की क्षमता है। झूठे बयान देने या अनैतिक व्यवहार में संलग्न होने वाले व्यापारिक नेताओं के नकली वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग बनाकर, दुर्भावनापूर्ण अभिनेता गलत सूचना फैला सकते हैं और निवेशकों को गलत जानकारी के आधार पर निर्णय लेने का कारण बन सकते हैं। इससे अचानक बाजार में उतार-चढ़ाव, घबराहट में बेचना और पहले से न सोचा निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय नुकसान हो सकता है।

डीपफेक से जुड़ा एक अन्य बड़ा जोखिम यह है कि वे व्यवसायों और व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भ्रामक या मानहानिकारक डीपफेक सामग्री जल्दी से ऑनलाइन फैल सकती है, व्यवसायों की विश्वसनीयता को धूमिल कर सकती है और ग्राहकों और भागीदारों के उन पर विश्वास को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे राजस्व खोना पड़ सकता है, ब्रांड छवि क्षतिग्रस्त हो सकती है और नए ग्राहकों को आकर्षित करने में कठिनाई हो सकती है।

डीपफेक के दुरुपयोग से मुक्त भाषण और अभिव्यक्ति पर भी द्रुतशीतन (सी) प्रभाव पड़ सकता है। डीपफेक द्वारा लक्षित होने का डर व्यवसायों और व्यक्तियों को महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने या सार्वजनिक रूप से अपनी राय साझा करने से हतोत्साहित कर सकता है। यह नवाचार, रचनात्मकता और विभिन्न उद्योगों और क्षेत्रों में प्रगति को रोक सकता है।

डीपफेक के बढ़ते खतरे को दूर करने के लिए, नियामक निकाय, प्रौद्योगिकी कंपनियां और कानून प्रवर्तन एजेंसियां इन दुर्भावनापूर्ण कृतियों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए समाधान विकसित करने के लिए मिलकर काम कर रही हैं। इसमें सख्त कानूनों और विनियमों को लागू करना, डीपफेक की पहचान करने के लिए उन्नत तकनीक में निवेश करना और डीपफेक के खतरों के बारे में जनता में जागरूकता बढ़ाना शामिल है।

डीपफेक के खिलाफ लड़ाई जारी है, और व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए सूचित और सतर्क रहना महत्वपूर्ण है। एक साथ काम करके, हम दुर्भावनापूर्ण डीपफेक द्वारा उत्पन्न जोखिमों को कम कर सकते हैं और वित्त उद्योग और व्यापक अर्थव्यवस्था की अखंडता की रक्षा कर सकते हैं।

निष्कर्च

हालांकि डीपफेक प्रौद्योगिकियां वित्त और विपणन उद्योग, मीडिया और मनोरंजन उद्योग के लिए कई नए तरीकों और संभावनाओं की पेशकश कर रही हैं, डीपफेक के दुरुपयोग अभी भी उस विश्वास को बनाने के लिए पर्याप्त जोखिम पैदा कर रहे हैं, और यह अर्थव्यवस्था की स्थिरता और सभी के व्यक्तिगत विश्वास को भी खतरे में डाल रहा है। इन चुनौतियों को बहु-कार्य तरीके से संबोधित करने की आवश्यकता है; दृष्टिकोण विधायी, आईटी, शिक्षा और कुछ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ भी आने की जरूरत है। इन मजबूत रणनीतियों के निहितार्थ जिम्मेदारियों को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं और रचनात्मकता के साथ-साथ शेष बाजारों और प्रामाणिकता को सुनिश्चित करके डीपफेक के विकसित परिदृश्य के युग को नेविगेट कर सकते हैं।

संदर्भ

 

व्यापार चिह्न अधिनियम 1999 की धारा 29

यह लेख Kanika Goyal द्वारा लिखा गया है। यह व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 29 के तहत एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन से निपटने के प्रावधान का विस्तृत विश्लेषण देता है। प्रावधान की व्यापक व्याख्या के साथ, लेख विभिन्न प्रकार के व्यापार चिह्न उल्लंघन, उल्लंघन के खिलाफ उपलब्ध बचाव और इसके अपवादों से भी संबंधित है। इसके अलावा, यह व्यापार चिह्न उल्लंघन के खिलाफ उपलब्ध दंड और उपायों का एक संक्षिप्त विवरण प्रदान करता है, जो विभिन्न महत्वपूर्ण मामले कानूनों द्वारा पूरक है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) एक ऐसी चीज है जिसका हम अपने जीवन में नियमित रूप से सामना करते हैं। बिस्तर के लिनेन के डिजाइन से लेकर घर के विभिन्न उत्पादों पर व्यापार चिह्न तक, हमारे घर के फर्नीचर से लेकर हमारे द्वारा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों तक, बौद्धिक संपदा इसका एक हिस्सा बन जाती है। विशेष रूप से, बौद्धिक संपदा मानव जीवन के लगभग हर एक पहलू का एक हिस्सा है, जिसमें कौशल, ज्ञान, श्रम, पूंजी आदि शामिल हैं। यह मानव बुद्धि और सृजन को दर्शाता है। बौद्धिक गुणों या आई.पी. को आमतौर पर दो व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, अर्थात् “कॉपीराइट” और “औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) गुण”।

व्यापार चिह्न एक ऐसी बौद्धिक संपदा है जो औद्योगिक संपत्ति के शीर्ष के अंतर्गत आती है। व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (जिसे इसके बाद अधिनियम कहा गया है) के अंतर्गत व्यापार चिह्न आते हैं और उन चिह्नों, प्रतीकों, लोगो अथवा लेबल को दर्शाते हैं जो क्रेताओं को माल की पहचान करने में समर्थ बनाते हैं। वे आई.पी. कानून के एक अनिवार्य पहलू के रूप में कार्य करते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य एक मालिक के अधिकारों की रक्षा करना है जिसके नाम पर एक चिह्न पंजीकृत है।

व्यापार चिह्न वे विशिष्ट चिह्न या संकेत या प्रतीक हैं जो ग्राहकों को किसी विशेष चिह्न से जुड़े सामानों और सेवाओं के बीच अंतर करने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, शीतल पेय के उपभोक्ता कोका-कोला को अपने पसंदीदा पेय के रूप में चुनकर आसानी से अपनी पसंद के पेय को अलग कर सकते हैं। यहां, उपभोक्ता कोका-कोला के व्यापार चिह्न से शीतल पेय की पहचान करते हैं।

तथापि, ऐसे व्यापार चिह्नों का उल्लंघन होने की प्रवृत्ति होती है जिससे उपभोक्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है और बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है। जब कोई व्यक्ति एक चिह्न का उपयोग करता है जो भ्रामक रूप से पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान है, तो उसे उस व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने के लिए कहा जाता है। इस लेख का उद्देश्य उन सभी अवधारणाओं और विवरणों पर विस्तार से बताना है जिन्हें व्यापार चिह्न उल्लंघन की अवधारणा का विश्लेषण करने के लिए समझना आवश्यक है।

व्यापार चिह्न का अर्थ

जैसा कि अधिनियम की धारा 2 (1) (zb) के तहत परिभाषित किया गया है, एक व्यापार चिह्न एक ऐसा चिह्न है जो एक व्यक्ति से जुड़े सामानों और सेवाओं को दूसरे से अलग करने के लिए चित्रात्मक (ग्राफिक) रूप से प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है। इन चिह्नों में आकार, लोगो, रंग, प्रतीक, शब्द और चित्रात्मक, ध्वनियाँ, गंध आदि शामिल हो सकते हैं। व्यापार चिह्न की वैधता 10 वर्ष है, लेकिन इसके लिए शुल्क का भुगतान करने के बाद अनिश्चित काल तक नवीनीकृत (रिन्यू) किया जा सकता है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत में व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 द्वारा बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) समझौता और पेरिस सम्मेलन (कन्वेंशन), 1883 के सिद्धांतों के अनुरूप व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 द्वारा शासित होते हैं।

धारा 2 (1) (zb) के तहत व्यापार चिह्न की वैधानिक परिभाषा के अनुसार, इस तरह के चिह्न को अधिनियम के अध्याय XII (धारा 107 को छोड़कर) के दायरे में एक पंजीकृत व्यापार चिह्न भी माना जाता है, जब इसका उपयोग कुछ वस्तुओं या सेवाओं के संबंध में किया जाता है ताकि माल/सेवाओं और उस व्यक्ति के बीच संबंध इंगित किया जा सके जिसके नाम पर ऐसा चिह्न पंजीकृत है।

इसलिए, चित्रात्मक प्रतिनिधित्व और विशिष्टता व्यापार चिह्न की परिभाषा के दो मुख्य अनिवार्यताओं का गठन करती है। एक चिह्न पंजीकृत व्यापार चिह्न होने के लिए, इसके लिए रेखांकन का प्रतिनिधित्व करना आवश्यक है और अन्य वस्तुओं और सेवाओं के साथ संबंधित वस्तुओं और सेवाओं के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए। एक बार व्यापार चिह्न पंजीकृत हो जाने के बाद, मालिक उस विशेष चिह्न का अनन्य मालिक बन जाता है और अपने सामान और सेवाओं के लिए इसका उपयोग करने का अधिकार प्राप्त करता है। ऐसे मामले में, मालिक को किसी अन्य व्यक्ति को भ्रामक रूप से समान चिह्न का उपयोग करने से रोकने की शक्ति मिलती है।

पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन

व्यापार चिह्न का पंजीकरण स्वामी को ऐसे चिह्न का उपयोग करने का विशेष अधिकार देता है। हालांकि, ऐसे अंकों का उल्लंघन होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। जब कोई व्यक्ति, जो किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न का अधिकृत उपयोगकर्ता या स्वामी नहीं है, एक ऐसे चिह्न का उपयोग करता है जो भ्रामक रूप से उस पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान होता है, तो यह अक्सर उस व्यापार चिह्न से जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं के संबंध में उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा करता है। इस तरह के समान चिह्नों के उपयोग का ऐसा कार्य व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन करता है।

हालांकि, जब भी किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया जाता है, तो उस व्यापार चिह्न के अनन्य स्वामी या मालिक को अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार नुकसान और निषेधाज्ञा के दावे के लिए उल्लंघनकर्ता पर वाद चलाने का अधिकार होता है। भारत में व्यापार चिह्न कानून का उद्देश्य एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के अनन्य मालिक के अधिकारों की रक्षा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि विशिष्टता और ब्रांड की पहचान बनी रहे ताकि ब्रांड मालिकों की प्रतिष्ठा कोई नुकसान न हो।

व्यापार चिह्न की भ्रामक समानता

जैसा कि धारा 2 (1) (h) के तहत उल्लेख किया गया है, एक भ्रामक रूप से समान चिह्न को “एक चिह्न को भ्रामक रूप से दूसरे चिह्न के समान माना जाएगा यदि यह लगभग उस अन्य चिह्न जैसा दिखता है जो धोखा देने या भ्रम पैदा करने की संभावना है।” इस परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए, एक व्यापार चिह्न को पंजीकृत व्यापार चिह्न की तुलना में भ्रामक रूप से समान माना जाता है जब दोनों चिह्नों के बीच समानता की डिग्री इतनी अधिक होती है कि वे एक-दूसरे के समान दिखाई देते हैं और पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं की उत्पत्ति के संबंध में उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा करते हैं। दो अंकों के बीच भ्रामक समानता की जांच करते समय समानता की डिग्री और जनता के लिए भ्रम की संभावना को ध्यान में रखते हुए, एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

धारा 29

अधिनियम की धारा 29(1) के अनुसार, किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति, जो उस व्यापार चिह्न का पंजीकृत स्वामी नहीं है, अनुमत उपयोग के तरीकों का उल्लंघन करते हुए इसका उपयोग करता है। इसके अलावा, भ्रामक रूप से समान व्यापार चिह्न या एक समान चिह्न का उपयोग जो इसकी प्रदान की गई सेवाओं के संदर्भ में समानता को दर्शाता है, व्यापार चिह्न उल्लंघन भी माना जाता है।

धारा 29 (2) अन्य तरीकों का उल्लेख करती है जिसमें एक अपंजीकृत मालिक द्वारा इस्तेमाल किया गया चिह्न पंजीकृत व्यापार चिह्न के संबंध में भ्रम पैदा कर सकता है और उल्लंघन का कारण बन सकता है। ये इस प्रकार हैं:

  • जब अनधिकृत व्यक्ति द्वारा उपयोग किए गए चिह्न की पहचान पंजीकृत व्यापार चिह्न या शामिल की गई सेवाओं के समान हो।
  • पंजीकृत व्यापार चिह्न की पहचान और उस व्यापार चिह्न द्वारा शामिल की गई सेवाओं की पहचान दोनों भ्रामक रूप से किसी अनधिकृत व्यक्ति द्वारा उपयोग किए गए चिह्न के समान हैं।
  • चिह्नों द्वारा शामिल की गई वस्तुओं और सेवाओं में समानता है और पहचान बड़े पैमाने पर जनता के लिए भ्रम पैदा करती है।

धारा 29 (3) भ्रम की वैधानिक धारणा के बारे में बात करती है, जबकि यह कहते हुए कि अदालत यह मान लेगी कि दो अंकों द्वारा शामिल की गई वस्तुओं और सेवाओं की समानता बड़े पैमाने पर जनता को भ्रम पैदा करेगी यदि इस्तेमाल किया गया व्यापार चिह्न धारा 29 (2) के खंड (c)की श्रेणी में आता है।

धारा 29 (4) में प्रसिद्ध व्यापार चिह्न या पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है जिनकी भारत में स्थिर प्रतिष्ठा है। इस प्रावधान के अनुसार, एक प्रसिद्ध व्यापार चिह्न का उल्लंघन तब माना जाता है जब एक समान व्यापार चिह्न का उपयोग होता है, भले ही यह विभिन्न सेवाओं को शामिल करता हो। हालांकि, यह ध्यान रखना उचित है कि एक प्रसिद्ध व्यापार चिह्न के उल्लंघन के मामलों में, कुछ चीजों पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिसमें प्रसिद्ध व्यापार चिह्न का अनुचित लाभ उठाना और बिना किसी उचित कारण के समान चिह्न का उपयोग करना शामिल है।

इस प्रावधान को एन.आर. डोंगरे बनाम व्हर्लपूल कॉर्पोरेशन (1996) के ऐतिहासिक निर्णय में दिए गए फैसले से समझा जा सकता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि प्रतिवादी अपने व्यापार चिह्न “व्हर्लपूल” की सीमा पार प्रतिष्ठा रखते थे, जो भारतीय क्षेत्र तक भी फैला हुआ था और इसलिए, वादी द्वारा निर्मित उत्पादों के लिए समान चिह्न का उपयोग पास-ऑफ के इरादे से उल्लंघन होगा।

अधिनियम की धारा 29 (5) के अनुसार, व्यापार चिह्न का उल्लंघन तब कहा जाता है जब इस तरह के चिह्न का उपयोग किसी अन्य व्यक्ति द्वारा व्यापार नाम या उसके उद्यम के नाम के रूप में किया जाता है। यह प्रावधान अपंजीकृत चिह्नों के ऐसे उपयोगकर्ताओं को प्रतिबंधित करता है। प्रावधान स्पष्ट रूप से बताता है कि पंजीकृत व्यापार चिह्न के तहत शामिल की गई वस्तुओं और सेवाओं के संबंध में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा व्यापार नाम के रूप में एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग इस तरह के व्यापार चिह्न का उल्लंघन होगा।

धारा 29(6) किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न के उस व्यक्ति द्वारा अनधिकृत प्रयोग के तरीकों से संबंधित है जो पंजीकृत स्वामी नहीं है। एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन का गठन करने वाले उपयोगों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पंजीकृत व्यापार चिह्न को अपने स्वयं के सामान और पैकेजिंग से जोड़ना;
  • पंजीकृत व्यापार चिह्न के नाम के तहत माल का आयात और निर्यात;
  • माल का विज्ञापन करने या व्यावसायिक कागजात पर उनका उपयोग करने के लिए पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग; नहीं तो
  • किसी के सामान की बिक्री के लिए या उसी पंजीकृत व्यापार चिह्न के तहत सेवाओं की पेशकश के लिए एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग।

धारा 29(7) के तहत प्रावधान के अनुसार, जब कोई व्यक्ति पंजीकृत मालिक नहीं होने के कारण अपने स्वयं के सामान को लेबल या पैकेज करने के लिए एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग करता है या अपनी सेवाओं को ऐसा करने के लिए विधिवत अधिकृत नहीं किया जाता है, तो इसे उस पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन माना जाता है।

इसके अलावा, धारा 29(8) के तहत प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पंजीकृत मालिक नहीं होने के कारण अपने सामान या सेवाओं का विज्ञापन करने के लिए व्यापार चिह्न का उपयोग करता है और ऐसा विज्ञापन उस पंजीकृत व्यापार चिह्न का अनुचित लाभ उठाने के लिए किया जाता है, या ईमानदार वाणिज्यिक (कमर्शियल) प्रथाओं के उल्लंघन में होता है, या पंजीकृत व्यापार चिह्न के चरित्र या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, यह उल्लंघन का गठन करता है।

धारा 29 (9) में कहा गया है कि एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग बोले गए उपयोग या शब्दों के दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा भी उल्लंघन किया जा सकता है या जो उस चिह्न के एक विशिष्ट तत्व का गठन करता है।

व्यापार चिह्न उल्लंघन के प्रकार

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, धारा 29 में एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन का उल्लेख है। सरल शब्दों में, जब भी कोई अनधिकृत व्यक्ति भ्रामक रूप से समान चिह्न का उपयोग करता है और संबंधित वस्तुओं और सेवाओं के संबंध में भ्रम पैदा करता है, तो उसे उस व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने के लिए कहा जाता है। मुख्य रूप से, व्यापार चिह्न के उल्लंघन को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उल्लंघन। आइए हम इनमें से प्रत्येक को संक्षेप में समझते हैं।

व्यापार चिह्न का प्रत्यक्ष उल्लंघन

व्यापार चिह्न का प्रत्यक्ष उल्लंघन वह है जहां एक अनधिकृत व्यक्ति लगभग समान चिह्न का उपयोग करता है जो संबंधित वस्तुओं और सेवाओं की पसंद के बारे में भ्रम पैदा करता है। धारा 29 के तहत व्यापार चिह्न का उल्लंघन प्रत्यक्ष उल्लंघन माना जाता है। प्रत्यक्ष व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन करने के लिए निम्नलिखित आवश्यक चीजें मौजूद होनी चाहिए:

अनधिकृत व्यक्ति

एक व्यक्ति जिसे पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है या जो पंजीकृत व्यापार चिह्न का मालिक नहीं है।

भ्रामक समानता

इसे दो चिह्नों के बीच समानता निर्धारित करने के लिए एक परीक्षण माना जाता है, जिनमें से एक पंजीकृत व्यापार चिह्न है। वह चिह्न जो कुछ वस्तुओं और सेवाओं के संबंध में उपभोक्ताओं के मन में भ्रम पैदा करता है जिसके लिए एक पंजीकृत व्यापार चिह्न है, भ्रामक रूप से समान कहा जाता है।

माल और सेवाएं

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जो सामान या सेवाएं पंजीकृत नहीं हैं, वे भी पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े उन सामानों और सेवाओं के समान होनी चाहिए। किसी चिह्न का किसी भी प्रकार का अनधिकृत उपयोग जो इसका उपयोग करने वाले व्यक्ति के नाम पर पंजीकृत नहीं है, व्यापार चिह्न उल्लंघन का कार्य है।

पंजीकृत व्यापार चिह्न

जब हम व्यापार चिह्न उल्लंघन के बारे में बात करते हैं, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि केवल एक पंजीकृत व्यापार चिह्न ही उल्लंघन हो सकता है। पासिंग ऑफ की अवधारणा अन्य मामलों में लागू होती है।

व्यापार चिह्न का अप्रत्यक्ष उल्लंघन

जब किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न का अप्रत्यक्ष उल्लंघन होता है, तो वे सभी लोग जिन्हें प्रत्यक्ष उल्लंघनकर्ता माना जाता है और जो व्यापार चिह्न के प्रत्यक्ष उल्लंघन को प्रेरित करने में सहायता और योगदान करते हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाता है। अप्रत्यक्ष उल्लंघन को सामान्य कानून का सिद्धांत माना जाता है। ऐसे मामलों में, पार्टियां सीधे व्यापार चिह्न का उल्लंघन नहीं करती हैं, लेकिन इसमें योगदान देकर या इसे सुविधाजनक बनाकर उल्लंघन में योगदान करती हैं। अप्रत्यक्ष उल्लंघन को आगे दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

प्रतिनिधिक (विकेरियस) उल्लंघन

अधिनियम की धारा 114 के अंतर्गत आंतरिक रूप से  प्रदान किए गए के अनुसार, जब कोई कंपनी व्यापार चिह्न उल्लंघन का अपराध करती है तो कंपनी के प्रति उत्तरदायी लोगों को पंजीकृत व्यापार चिह्न के अप्रत्यक्ष उल्लंघन के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है, प्रतिनिधिक दायित्व आमतौर पर नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों में उत्पन्न होता है। एकमात्र प्रावधान जो किसी व्यक्ति को प्रतिनिधिक दायित्व से बचाता है, वह तब होता है जब ऐसा व्यक्ति अच्छे विश्वास में कार्य करता है और उल्लंघन का कोई ज्ञान नहीं रखता है।

अंशदायी (कॉन्ट्रिब्यूटी) उल्लंघन

जैसा कि नाम से पता चलता है, जब कोई व्यक्ति पहले से ही जानता है कि जो कार्य किया गया है वह व्यापार चिह्न उल्लंघन का कारण बन सकता है और फिर भी विशेष अधिनियम के कमीशन में योगदान और सहायता जारी रखता है, तो उसे उस व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने के लिए कहा जाता है। इसलिए, एक व्यक्ति को इस प्रकार के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा जब निम्नलिखित आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं:

  • उल्लंघन का ज्ञान; और
  • प्रत्यक्ष उल्लंघनकर्ता को महत्वपूर्व योगदान या सहायता।

व्यापार चिह्न उल्लंघन के अपवाद

भले ही ज्यादातर मामलों में व्यापार चिह्न का इसके अनुचित उपयोग का उल्लंघन किया जाता है, लेकिन कुछ बचाव और कुछ कार्य होते हैं जो व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं। ऐसे कृत्य अधिनियम की धारा 30 के दायरे में आते हैं जिसमें कतिपय ऐसे कार्य स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं जो पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन नहीं करते हैं। इन अधिनियमों में तुलनात्मक विज्ञापन, चिह्न का उचित प्रयोग, चिह्न का वर्णनात्मक और गैर-वाणिज्यिक उपयोग, पूर्व अनुमति अथवा प्राधिकार से ऐसे व्यापार चिह्न का उपयोग आदि शामिल हैं। आइए हम उन्हें विस्तार से समझते हैं।

ऐसे कार्य जो व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं

जैसा कि धारा 30 (1) के तहत उल्लेख किया गया है, पंजीकृत व्यापार चिह्न के निम्नलिखित कार्य या उपयोग इसके उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं:

अधिकृत उपयोग

जब व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति ने पहले ही पंजीकृत व्यापार चिह्न के अनन्य मालिक की अनुमति प्राप्त कर ली है ताकि उद्योगों की ईमानदार प्रथाओं के अनुसार चिह्न का उपयोग किया जा सके, तो यह व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है।

तुलनात्मक विज्ञापन

तुलनात्मक विज्ञापन शब्द धारा 30 (1) के दायरे में आता है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति कुछ वस्तुओं और सेवाओं के विज्ञापन के संबंध में एक चिह्न का उपयोग करता है जो पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े लोगों के लिए प्रतिस्पर्धी हैं, तो यह व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है, बशर्ते कि चिह्न का उपयोग ईमानदार क्षमता में किया जाता है और उपभोक्ता बाजार में भ्रम पैदा नहीं करता है।

प्रतिष्ठा के लिए गैर-हानिकारक

एक चिह्न का उपयोग करते समय जो एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान है, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह पंजीकृत व्यापार चिह्न की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक नहीं होना चाहिए और चरित्र में विशिष्ट होना चाहिए ताकि प्रतिष्ठा को कोई नुकसान पहुंचाने से बचा जा सके। इस तरह के कृत्य व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं।

एक चिह्न का गैर-व्यावसायिक उपयोग

कुछ मामलों में, भले ही चिह्न एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान हो, इसका उपयोग व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है। ऐसा ही एक मामला अकादमिक और अनुसंधान (रिसोर्स) क्षेत्रों में ऐसे अंकों का उपयोग है। जब कोई व्यक्ति गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए एक समान चिह्न का उपयोग करता है, उदाहरण के लिए, अनुसंधान, शिक्षाविदों या टिप्पणी करने में, यह व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है क्योंकि इस तरह के चिह्न का उपयोग उपभोक्ताओं को धोखा देने के इरादे से रहित रहता है।

उचित उपयोग का सिद्धांत

एक व्यापार चिह्न उल्लंघन नहीं है, भले ही इसका उपयोग मालिक की अनुमति के बिना किया जाता है, बशर्ते कि इस तरह के चिह्न का उपयोग निष्पक्ष और जनता को धोखा देने के किसी भी इरादे से रहित होना चाहिए। जब व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने का आरोप लगाने वाला व्यक्ति आलोचना के लिए या समीक्षा और समाचार रिपोर्टिंग लिखने के लिए इसका उपयोग करता है, तो यह व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है क्योंकि यह वस्तुओं और सेवाओं की एक विशेष श्रेणी पर ईमानदार राय के निर्धारण की ओर जाता है।

जब एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन नहीं किया जाता है

धारा 30 (2) के प्रावधानों के अनुसार, निम्नलिखित मामले पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं:

  1. जब वादी प्रतिवादी पर वाद करने के लिए किसी भी शीर्षक से रहित हो।
  2. व्यापार चिह्न के अवैध पंजीकरण के मामले में, कथित उल्लंघनकर्ता पंजीकरण को समाप्त करने और व्यापार चिह्न का उपयोग करने का बचाव कर सकता है।
  3. जब कथित उल्लंघनकर्ता कुछ विशिष्ट भौगोलिक मूल के सामान और सेवाओं को इंगित करने के लिए व्यापार चिह्न का उपयोग करता है।
  4. शर्तों और उसके पंजीकरण की सीमाओं के दायरे से परे व्यापार चिह्न का उपयोग करना व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है।
  5. अधिनियम की धारा 29 के अंतर्गत उल्लिखित मामलों को छोड़कर जहां कोई व्यक्ति व्यापार चिह्न का प्रयोग करता है, उन सभी मामलों में यह व्यापार चिह्न का उल्लंघन नहीं है।
  6. जब व्यापार चिह्न का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो अनन्य स्वामी नहीं है, लेकिन व्यापार चिह्न का अनुचित लाभ उठाने के किसी भी उद्देश्य के बिना ईमानदार औद्योगिक प्रथाओं के कारण है, तो यह उस व्यापार चिह्न का उल्लंघन नहीं करता है।
  7. जब एक चिह्न का उपयोग पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े माल और सेवाओं के प्रकार, गुणवत्ता या इच्छित उद्देश्य को इंगित करने के लिए किया जाता है, तो यह उस व्यापार चिह्न के उल्लंघन का कार्य नहीं करता है।

व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए प्रवर्तन

व्यापार चिह्न उल्लंघन के खिलाफ कानूनी कार्रवाइयों के प्रवर्तन के बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए, व्यापार चिह्न का उल्लंघन होने पर कानूनी कार्रवाइयों के प्रवर्तन से संबंधित आकस्मिक अवधारणाओं को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

वादी या वह व्यक्ति, जो वाद कर सकता है

जब व्यापार चिह्न का उल्लंघन होता है, तो निम्नलिखित व्यक्ति वादी के स्थान पर कदम रख सकते हैं और पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर वाद कर सकते हैं:

  • वह मालिक जिसके नाम पर व्यापार चिह्न पंजीकृत है या उसके कानूनी उत्तराधिकारी;
  • ऐसे मामलों में जहां पंजीकृत मालिक व्यापार चिह्न के उल्लंघनकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहता है, उस विशेष व्यापार चिह्न का पंजीकृत उपयोगकर्ता पंजीकृत मालिक को पूर्व सूचना देकर उल्लंघनकर्ता पर वाद भी कर सकता है;
  • पंजीकृत मालिक की मृत्यु के मामले में, उसके कानूनी उत्तराधिकारी;
  • यदि एक व्यापार चिह्न दो मालिकों के संयुक्त नाम पर पंजीकृत है, तो उनमें से कोई भी उल्लंघनकर्ता पर वाद कर सकता है;
  • व्यापार चिह्न का उपयोग करने के अधिकार की रक्षा के लिए, किसी व्यक्ति के लिए उस व्यापार चिह्न पर स्वामित्व और विशिष्टता रखने के लिए अपने व्यापार चिह्न को पंजीकृत करना और इसके उल्लंघन के मामले में वाद करने का अधिकार रखना बहुत आवश्यक है।
  • भारत में पंजीकृत व्यापार चिह्न के उल्लंघन के मामलों में, एक विदेशी मालिक भी वाद कर सकता है।

उल्लंघनकर्ता या जिस पर वाद चलाया जा रहा है

जब व्यापार चिह्न का उल्लंघन होता है, तो निम्नलिखित व्यक्तियों पर उस विशेष व्यापार चिह्न के उल्लंघनकर्ता की क्षमता में वाद चलाया जा सकता है:

  • उल्लंघनकर्ता स्वयं जो अपने स्वयं के कृत्यों से व्यापार चिह्न उल्लंघन का कारण बनता है या अपने पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग करने के लिए वादी के अधिकार का उल्लंघन करके व्यापार चिह्न की प्रतिष्ठा के लिए खतरा पैदा करता है;
  • जब व्यापार चिह्न का अप्रत्यक्ष उल्लंघन होता है और देयता को विकृत पाया जाता है, तो ऐसे मामलों में मालिक अपने कर्मचारी या नौकर के कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यापार चिह्न उल्लंघन होता है;
  • प्रतिवादी या उल्लंघनकर्ता की ओर से चिह्न का उपयोग करने वाले एजेंटों पर भी वादी द्वारा वाद चलाया जा सकता है;
  • हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऐसे मामलों में जहां व्यापार चिह्न उल्लंघन किसी कंपनी द्वारा किया जाता है, निदेशकों या प्रमोटरों को संयुक्त रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है जब तक कि उनके खिलाफ कार्रवाई के व्यक्तिगत कारण का सबूत न हो।

उल्लंघन के वाद के लिए अधिकार क्षेत्र

अधिनियम की धारा 134 के अनुसार, व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए वाद जिला न्यायालय से नीचे की किसी भी अदालत में दायर नहीं किया जा सकता है, जिसके पास उसी के लिए वाद चलाने का अधिकार क्षेत्र है। इसमें स्थानीय सीमाओं के भीतर अदालतें शामिल हैं जिनके अधिकार क्षेत्र में वादी या व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए वाद दायर करने वाला व्यक्ति:

  • वास्तव में और स्वेच्छा से खुद रहता है; नहीं तो
  • लाभ के लिए काम करता है; नहीं तो
  • अपने व्यवसाय को वहन करता है या जारी रखता है।

व्यापार चिह्न उल्लंघन का वाद दायर करने के लिए परिसीमा (लिमिटेशन) अवधि

परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची के अनुसार, किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न के अतिक्रमण का वाद व्यापार चिह्न के उल्लंघन की तारीख से 3 वर्ष के भीतर दायर किया जाना होता है। हालांकि, एक वाद सीमा द्वारा वर्जित है यदि सीमा की निर्धारित अवधि से परे दायर किया जाता है।

व्यापार चिह्न उल्लंघन के खिलाफ उपाय

जब किसी पंजीकृत व्यापार चिह्न के लिए प्रासंगिक अनन्य अधिकारों का उल्लंघन पंजीकृत मालिक या उस व्यापार चिह्न के मालिक की अनुमति या प्राधिकरण के बिना किया जाता है, तो यह व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन करता है। व्यापार चिह्न उल्लंघन के ऐसे मामलों में, व्यापार चिह्न का मालिक या पंजीकृत मालिक उल्लंघन के खिलाफ वाद ला सकता है और उपलब्ध निम्नलिखित उपायों में से किसी के लिए प्रार्थना कर सकता है:

दीवानी उपचार

एक वादी व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए अपने वाद के माध्यम से नागरिक राहत की मांग कर सकता है:

निषेधाज्ञा (इंजंक्शन)

सक्षम न्यायालय वादी को निषेधाज्ञा के माध्यम से विवेकाधीन राहत प्रदान कर सकता है ताकि उल्लंघनकर्ता को वादी के खिलाफ कार्रवाई करने से रोका जा सके जब तक कि वाद का निपटारा नहीं हो जाता। जब उल्लंघनकर्ता को उन कार्यों को करने से प्रतिबंधित किया जाता है जो व्यापार चिह्न उल्लंघन का कारण बने हैं, तो इसे वार्ताकार निषेधाज्ञा कहा जाता है। यह प्रतिवादी को व्यापार चिह्न का उपयोग करने से रोकता है। इसे अधिनियम की धारा 135 के अनुसार एक अस्थायी निषेधाज्ञा के रूप में भी जाना जाता है।

उल्लंघनकर्ता या प्रतिवादी को किसी भी कार्य को करने से पूरी तरह से रोकने के लिए, जिसके परिणामस्वरूप व्यापार चिह्न उल्लंघन होगा, सक्षम अदालत स्थायी निषेधाज्ञा का आदेश भी पारित कर सकती है जो वाद के अंतिम निपटान पर दी जाती है।

कैडबरी यूके लिमिटेड बनाम लोट्टे इंडिया कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2014) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि यह मामला व्यापार चिह्न उल्लंघन का एक उदाहरण था क्योंकि वादी अपने प्रथम दृष्टया मामले को स्थापित करने में सफल रहे थे, जिसमें दिखाया गया था कि प्रतिवादियों द्वारा भारत में एक समान चिह्न का उपयोग शुरू करने के बाद उनके व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया गया था और वादी की कंपनी के सामान की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा था। इसलिए, अदालत ने वादी के पक्ष में अंतरिम निषेधाज्ञा की डिक्री दी।

हाल ही में, डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज लिमिटेड बनाम रेबंता हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड (2024) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने वादी को एक अंतरिम निषेधाज्ञा दी क्योंकि यह प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करने में सक्षम था कि इसके प्रसिद्ध व्यापार चिह्न “रेबाहील” को अवैध रूप से अपनाया गया था और प्रतिवादी द्वारा यह दिखाते हुए उल्लंघन किया गया था कि इसका उपयोग विभिन्न उपचारों के लिए किया जा रहा था। अदालत ने वादी के पक्ष में एक आदेश पारित किया और कहा कि प्रतिद्वंद्वी कंपनी द्वारा इस्तेमाल किए गए चिह्न भ्रामक रूप से समान थे और न केवल देखने में बल्कि ध्वन्यात्मक रूप से भी समान थे।

मुआवजा

सक्षम न्यायालय प्रतिवादी को मुआवजे या क्षति के माध्यम से भी राहत दे सकता है जो प्रतिवादी द्वारा वादी को दिया जाना है। ये मुआवजा वादी द्वारा किए गए नुकसान की वास्तविक राशि नहीं है, बल्कि केवल हर्जाने या मुआवजे की एक काल्पनिक राशि है। वादी को मुआवजा देते समय, अदालत आमतौर पर निम्नलिखित मापदंडों को ध्यान में रखती है:

  • प्रतिवादी के प्रत्यक्ष उल्लंघनकारी कार्यों के कारण वादी को हुए वास्तविक नुकसान की सीमा;
  • वादी के व्यवसाय के पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े सामानों और सेवाओं की प्रतिष्ठा के कारण चोट;
  • अदालत उन मामलों में भी हर्जाना दे सकती है जहां अंकों के बीच कोई धोखा नहीं है।

लाभ का भाग

अधिनियम की धारा 135 (1) के अनुसार, अदालत या तो वादी को मुआवजा दे सकती है या लाभ का कुछ भाग दे सकती है। ये वादी के पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन करके प्रतिवादी द्वारा प्राप्त वास्तविक लाभ हैं। अदालत प्रतिवादी को व्यापार चिह्न उल्लंघन गतिविधियों के दौरान उसके द्वारा अर्जित वास्तविक लाभ को स्थानांतरित करने के लिए कह सकती है।

आपराधिक उपचार

अधिनियम के अध्याय XII के तहत प्रावधानों में उन दंडों का उल्लेख है जो सक्षम न्यायालय द्वारा प्रतिवादी या उल्लंघनकर्ता पर लगाए जा सकते हैं। व्यापार चिह्न उल्लंघन के खिलाफ आपराधिक उपचार के रूप में गिने जाने वाले कई प्रावधानों का उल्लेख सारणीबद्ध रूप में नीचे किया गया है:

धारा उल्लंघन अधिनियम की प्रकृति दण्ड
धारा 103 झूठे व्यापार चिह्नों का उपयोग करके या कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर गलत तरीके से चिह्न लगाकर या पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े माल के मूल के साथ छेड़छाड़ करके पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन, आदि। कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कारावास जिसे 3 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ₹50,000/- से कम की राशि का जुर्माना जो 2 लाख रुपये तक हो सकता है।
धारा 104 पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े सामान बेचना या उन्हें देना या उन्हें किराए पर लेना या ऐसी सेवाएं प्रदान करना जिन पर गलत व्यापार चिह्न विवरण लागू होता है। कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कारावास जिसे 3 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ₹50,000/- से कम की राशि का जुर्माना जो 2 लाख रुपये तक हो सकता है।
धारा 105 धारा 103 और 104 के तहत उल्लिखित अधिनियम की प्रकृति के लिए एक बाद की सजा कम से कम 1 वर्ष की अवधि के लिए कारावास जिसे 3 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। 1 लाख से कम की राशि का जुर्माना जो 2 लाख तक जा सकता है।

प्रशासनिक उपाय

दीवानी और आपराधिक उपचार के साथ, व्यापार चिह्न उल्लंघन के खिलाफ वादी के लिए निम्नलिखित प्रशासनिक उपचार भी उपलब्ध हैं:

  1. समान चिह्न का विरोध एक ऐसा प्रशासनिक उपाय है।
  2. एक अन्य उपाय भ्रम की स्पष्ट संभावनाओं को खत्म करने के लिए पहले से पंजीकृत व्यापार चिह्न का सुधार है।
  3. पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन करने के लिए उल्लंघनकर्ता द्वारा उपयोग किए गए चिह्न से जुड़े सामानों के आयात और निर्यात पर प्रतिबंध लगाना।

उल्लंघन और पासिंग ऑफ

पासिंग ऑफ का अर्थ

पासिंग ऑफ का मामला तब उत्पन्न होता है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आयोजित अपंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े अन्य सामानों के नाम पर अपना सामान बेचता है। एक अपंजीकृत व्यापार चिह्न की सद्भावना की रक्षा के लिए, पारित होने की क्रिया का उपयोग किया जाता है।

जैसा कि वाक्यांश से पता चलता है, “पासिंग ऑफ” वादी को प्रतिवादी के व्यापार चिह्न के तहत किए गए सामान को बेचने या पारित करने से रोकने में सक्षम बनाता है। इस तरह की कार्रवाई आमतौर पर एक विशेष व्यापार चिह्न रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध होती है, हालांकि अपंजीकृत है। हालांकि, कुछ विशेषताओं या लक्षणों को देखा जाना चाहिए जब पासिंग ऑफ की कार्रवाई की जाती है। य़े हैं:

  1. वादी के व्यापार चिह्न को प्रतिवादी द्वारा गलत तरीके से व्याख्या की जानी चाहिए ताकि संबंधित सामानों के लिए अपना नाम स्थापित किया जा सके।
  2. वादी के व्यापार चिह्न से जुड़े सामानों से जुड़ी सद्भावना होनी चाहिए।
  3. पारित करने के लिए एक कार्रवाई शुरू करने के लिए, वादी को यह स्थापित करना होगा कि प्रतिवादी की गलत बयानी के कारण उसे नुकसान हुआ है।
  4. प्रतिवादी द्वारा किए गए गलत बयानी को बेचे गए सामान के संबंध में जनता को भ्रम पैदा करने के इरादे से किया जाना चाहिए।

पासिंग ऑफ और व्यापार चिह्न उल्लंघन के बीच अंतर

  • जहां एक तरफ, एक पासिंग ऑफ एक्शन एक सामान्य कानून सिद्धांत है, उल्लंघन का एक वाद केवल उस मामले में स्थापित किया जा सकता है जहां एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया जाता है। पासिंग ऑफ की कार्रवाई लाने के लिए व्यापार चिह्न के पंजीकरण का कोई सवाल ही नहीं है।
  • व्यापार चिह्न उल्लंघन का वाद किसी के वैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर दायर किया जाता है। हालांकि, एक पासिंग ऑफ कार्रवाई में, व्यापार चिह्न मालिक के सामान्य कानून अधिकार का उल्लंघन किया जाता है।
  • दो चिह्नों के बीच भ्रामक समानता, जिनमें से एक पंजीकृत व्यापार चिह्न होना व्यापार चिह्न उल्लंघन का प्रथम दृष्टया प्रमाण बन सकता है। हालांकि, पासिंग ऑफ की कार्रवाई को स्थापित करने के लिए, किसी को न केवल प्रतिवादी द्वारा बेचे गए सामानों और चिह्न से जुड़े लोगों के बीच समानता दिखानी चाहिए, बल्कि इस तथ्य को भी स्थापित करना चाहिए कि किसी और के व्यापार चिह्न के तहत अपने सामान को प्रदर्शित करने की उसकी कार्रवाई जनता को भ्रम पैदा करती है और उन्हें धोखा देती है।
व्यापार चिह्न उल्लंघन पासिंग ऑफ
व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 के अंतर्गत व्यापार चिह्न के उल्लंघन का वाद एक कानूनी उपाय है। पारित करने के लिए एक कार्रवाई एक सामान्य कानून उपाय है जिसमें एक वादी सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 20 के प्रावधानों के अनुसार प्रतिवादी पर वाद कर सकता है।
भ्रामक समानता व्यापार चिह्न उल्लंघन का प्रथम दृष्टया प्रमाण बन जाती है। पारित करने के लिए एक कार्रवाई लाने के लिए, एक वादी को एक समान व्यापार चिह्न का उपयोग करने के प्रतिवादी के कार्य को स्थापित करना होगा, जो वादी के ब्रांड की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है और जनता के बीच भ्रम पैदा करता है।
व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए वाद लाने के लिए, व्यापार चिह्न पंजीकृत करवाना आवश्यक है। पासिंग ऑफ के लिए कार्रवाई करने के लिए किसी के व्यापार चिह्न को पंजीकृत करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
यह आवश्यक नहीं है कि वादी के सामान या उसके व्यापार चिह्न को चोट या क्षति हो। पारित करने के लिए एक कार्रवाई लाने के लिए, यह स्थापित करना आवश्यक है कि वादी के सामान और व्यापार चिह्न की सद्भावना या प्रतिष्ठा प्रतिवादी द्वारा क्षतिग्रस्त या घायल हो गई है।
प्रतिवादी द्वारा समान चिह्न के उपयोग की अनुपस्थिति में भी वादी द्वारा उल्लंघन का वाद दायर किया जा सकता है। पारित होने की कार्रवाई के लिए, माल का उपयोग और वादी के व्यवसाय की सद्भावना को चोट पहुंचाना आवश्यक है।

महत्वपूर्ण मामले

पारले प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम जेपी एंड कंपनी (1972)

तथ्य

इस मामले में, वादी पंजीकृत व्यापार चिह्न “ग्लूको” के मालिक होने के नाते वादी द्वारा उपयोग किए जाने वाले रैपर के भ्रामक रूप से समान चिह्न और पैटर्न का उपयोग करने के लिए प्रतिवादियों के खिलाफ व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए वाद दायर किया।

जैसा कि वादी द्वारा तर्क दिया गया था, इसने “पारले” माल की प्रामाणिकता के बारे में बाजार में भ्रम पैदा कर दिया था और उसके व्यापार चिह्न के अनन्य चरित्र को पतला कर दिया था। भले ही प्रतिवादियों ने इसका विरोध किया और तर्क दिया कि इस्तेमाल किए गए चिह्न और रैपर के बीच पर्याप्त अंतर कारक था, यह मामला व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए एक वाद के रूप में सर्वोच्च न्यायालय में गया।

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वादी द्वारा इस्तेमाल किए गए व्यापार चिह्न पर “ग्लूको बिस्कुट” शब्द के साथ और प्रतिवादियों द्वारा “ग्लूकोज बिस्किट” के रूप में इस्तेमाल किए गए व्यापार चिह्न ने बाजार में पूर्व ब्रांड के प्रमुख स्थान के संबंध में बड़े पैमाने पर जनता के बीच भ्रम पैदा किया।

अदालत ने भ्रामक रूप से समान चिह्न के खिलाफ किसी के पंजीकृत व्यापार चिह्न की रक्षा करने के महत्व पर जोर दिया। इस ऐतिहासिक फैसले में, अदालत ने कहा कि प्रतिवादियों द्वारा इस्तेमाल किए गए रैपर पर चिह्न भ्रामक रूप से वादी के पंजीकृत चिह्न के समान था।

कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड बनाम कैडिला फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (2001)

तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता, अर्थात् “कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड” एक दवा कंपनी है जो सेरेब्रल मलेरिया के इलाज के लिए “फाल्सीगो” नामक एक औषधीय दवा की शुरुआत के लिए जिम्मेदार थी जिसे आमतौर पर “फाल्सीफेरम” के रूप में पहचाना जाता है और उस व्यापार चिह्न को 1996 में पंजीकृत किया गया था।

अपीलकर्ता की दलीलों के अनुसार, इस मामले में प्रतिवादी ने 1997 में “फाल्सीटैब” व्यापार चिह्न के तहत उसी बीमारी के इलाज के लिए एक दवा का आयात करना शुरू कर दिया था। अपीलकर्ता के अनुसार, इसने बाजार में भ्रम पैदा कर दिया क्योंकि यह भ्रामक रूप से अपने पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान था। इस मामले में अपीलकर्ता ने वडोदरा जिला न्यायालय, गुजरात में प्रतिवादी के खिलाफ निषेधाज्ञा के लिए वाद दायर किया, लेकिन फैसला प्रतिवादी के पक्ष में सुनाया गया, जिसमें कहा गया कि दोनों दवाओं का निर्माण अलग-अलग था।

परिणामस्वरूप, उच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील की गई, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए अपील को खारिज कर दिया कि दवाओं और उनके निर्माण के संबंध में भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं थी। इससे व्यथित होकर अपीलकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में जाकर अपील की।

निर्णय

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत और उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पिछले फैसले के विवरण में नहीं आया और कहा कि “अनुसूची L” में दवाओं की एक ही श्रेणी से संबंधित होने के बावजूद, इसमें जनता के मन में भ्रम पैदा करने की उच्च गुंजाइश थी और इसलिए भ्रामक समानता का मामला बन गया। अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए, अदालत ने कहा कि वर्तमान मामला पारित होने का मामला था, जिसने अपीलकर्ता की प्रतिष्ठा की साख को भी नुकसान पहुंचाया।

निष्कर्ष 

इस लेख से, यह विश्लेषण किया जा सकता है कि व्यापार चिह्न उल्लंघन न केवल पंजीकृत मालिक की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा सकता है, बल्कि यह मालिक के व्यापार चिह्न से जुड़े ब्रांड की अखंडता और विशिष्टता के लिए भी खतरा पैदा करता है। अधिनियम की धारा 29 उन तरीकों का विस्तृत विवरण देती है जिनमें व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया जा सकता है।

स्वस्थ बाजार प्रथाओं की रक्षा और रखरखाव के लिए, किसी के पंजीकृत व्यापार चिह्न की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए एक वाद न केवल पंजीकृत मालिक के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि उसे यह सुनिश्चित करने में भी मदद करता है कि प्रतिवादी पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े सामानों और सेवाओं के बारे में लोगों को धोखा देने के लिए उपयोग किए जाने वाले चिह्न के संबंध में भ्रम पैदा करके जनता को गुमराह नहीं करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

एक याचिकाकर्ता द्वारा यह दिखाने के लिए क्या लक्षण स्थापित किए जाने चाहिए कि उसके व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया गया है?

व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए वाद लाने के लिए, एक याचिकाकर्ता को निम्नलिखित तत्वों को स्थापित करना होगा:

  • किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग करना जिसे पंजीकृत व्यापार चिह्न का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है या जो पंजीकृत व्यापार चिह्न का स्वामी नहीं है।
  • भ्रामक समानता को दो चिह्नों के बीच समानता निर्धारित करने के लिए एक परीक्षण के रूप में माना जाता है, जिनमें से एक पंजीकृत व्यापार चिह्न है। वह चिह्न जो कुछ वस्तुओं और सेवाओं के संबंध में उपभोक्ताओं के मन में भ्रम पैदा करता है जिसके लिए एक पंजीकृत व्यापार चिह्न निहित है, को भ्रामक रूप से समान प्रकृति का कहा जाता है।
  • यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जो सामान या सेवाएं पंजीकृत नहीं हैं, वे भी पंजीकृत व्यापार चिह्न से जुड़े उन सामानों और सेवाओं के समान होनी चाहिए।
  • व्यापार चिह्न उल्लंघन के लिए प्रतिवादी पर वाद करने के लिए, किसी के व्यापार चिह्न को पंजीकृत करना महत्वपूर्ण है। जब हम व्यापार चिह्न उल्लंघन के बारे में बात करते हैं, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि केवल एक पंजीकृत व्यापार चिह्न का उल्लंघन किया जा सकता है।

भ्रामक समानता का क्या अर्थ है?

जैसा कि धारा 2 (1) (h) के तहत उल्लेख किया गया है, एक भ्रामक रूप से समान चिह्न को “एक चिह्न को भ्रामक रूप से दूसरे चिह्न के समान माना जाएगा यदि यह लगभग उस अन्य चिह्न जैसा दिखता है जो धोखा देने या भ्रम पैदा करने की संभावना है। इस परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए, एक व्यापार चिह्न को एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान भ्रामक रूप से माना जाता है, जब दोनों चिह्नों के बीच समानता की डिग्री ऐसी होती है कि वे या तो एक-दूसरे के समान लगते हैं या संबंधित वस्तुओं और सेवाओं की उत्पत्ति के बारे में उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा करते हैं।

व्यापार चिह्न उल्लंघन क्या नहीं है?

जैसा कि धारा 30 (1) के तहत उल्लेख किया गया है, पंजीकृत व्यापार चिह्न के निम्नलिखित कार्य या उपयोग इसके उल्लंघन का गठन नहीं करते हैं:

  • पंजीकृत व्यापार चिह्न का अधिकृत उपयोग।
  • पंजीकृत व्यापार चिह्न के साथ तुलनात्मक विज्ञापन व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है, बशर्ते कि चिह्न का उपयोग ईमानदार क्षमता में किया जाता है और उपभोक्ता बाजार में भ्रम पैदा नहीं करता है।
  • एक चिह्न का उपयोग करते समय, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह पंजीकृत व्यापार चिह्न की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक नहीं होना चाहिए और चरित्र में विशिष्ट होना चाहिए ताकि पंजीकृत व्यापार चिह्न की प्रतिष्ठा को कोई नुकसान न पहुंचे।
  • कुछ मामलों में, भले ही चिह्न एक पंजीकृत व्यापार चिह्न के समान हो, इसका उपयोग व्यापार चिह्न उल्लंघन का गठन नहीं करता है। ऐसा ही एक मामला अकादमिक और अनुसंधान क्षेत्रों में ऐसे अंकों का उपयोग है।
  • एक व्यापार चिह्न उल्लंघन नहीं है, भले ही इसका उपयोग मालिक की अनुमति के बिना किया जाता है, बशर्ते कि इस तरह के चिह्न का उपयोग निष्पक्ष और जनता को धोखा देने के किसी भी इरादे से रहित होना चाहिए।

संदर्भ

  • V.K Ahuja, Law relating to Intellectual Prooperty Rights

 

अपकृत्य कानून के तहत अपरिहार्य दुर्घटना

यह लेख Shruti Somya द्वारा लिखा गया है और Pragya Pathak द्वारा इसे आगे अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख अपकृत्य (टॉर्ट) कानून के तहत अपरिहार्य (इनएविटेबल) दुर्घटनाओं के बचाव पर विस्तार से चर्चा करता है, जिसमें इसका अर्थ, इतिहास, उदाहरण, ऐतिहासिक निर्णय और वैचारिक विश्लेषण शामिल है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय 

अपकृत्य का कानून समय के साथ अपने अस्तित्व से विकसित हुआ है। फ्रेजर ने ‘अपकृत्य’ को एक निजी व्यक्ति के अधिकार के उल्लंघन के रूप में परिभाषित किया है, जिसके परिणामस्वरूप मुआवजे का अधिकार प्राप्त होता है, जहां ऐसे उल्लंघन के कारण घायल व्यक्ति के कहने पर मुकदमा उठता है। अपरिहार्य दुर्घटना अपकृत्य कानून का बचाव है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति को अपकृत्य की कार्रवाई से बचाने के लिए एक रोकथाम के रूप में कार्य करता है। अपकृत्य की कार्यों के कुछ उदाहरण हैं मारपीट, अतिचार (ट्रेसपास), मानहानि और लापरवाही, आदि।

अपरिहार्य दुर्घटना अपकृत्य के तहत एक बचाव है जब कोई लापरवाहीपूर्ण कार्य होता है। लापरवाही के कार्यों के परिणामस्वरूप हर्जाने का भुगतान होता है, जो अपकृत्यों में एक दंड है जो आमतौर पर परिसमाप्त (लिक्विडेटेड) हर्जाने के रूप में होता है। जब कोई कार्य, जिसे लापरवाहीपूर्ण माना जाता है, अप्रत्याशित या अपरिहार्य तरीके से होता है, तो अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव सामने आता है। बचाव मुख्य रूप से प्रतिवाद हैं जो किसी मामले में प्रतिवादियों द्वारा नियोजित किए जाते हैं। इन प्रतिवादों को ‘अपकृत्यों में सामान्य बचाव’ के रूप में जाना जाता है। अपकृत्य के कानून में कई बचाव हैं। इनमें से कुछ ईश्वरीय कार्य , उपद्रव (न्यूसेंस), अपरिहार्य दुर्घटनाएँ आदि हैं। यह लेख अपरिहार्य दुर्घटनाओं के बचाव और उसी की वैचारिक समझ से संबंधित है। यह भारत और विदेशों में अपकृत्य कानून के तहत अपरिहार्य दुर्घटनाओं के परिदृश्य को आकार देने वाले अर्थ, इतिहास और महत्वपूर्ण निर्णयों पर भी प्रकाश डालता है।

अपरिहार्य दुर्घटना

अर्थ

‘अपरिहार्य’ का शब्दकोश अर्थ है कुछ ऐसा जिसे टाला नहीं जा सकता। यदि हम शब्दों के इस संयोजन को विशिष्ट रूप से देखें, तो हम पाते हैं कि ‘अपरिहार्य’ शब्द ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जिसे किसी भी परिस्थिति में रोका नहीं जा सकता, चाहे एहतियाती उपाय कितने भी कड़े और पर्याप्त क्यों न हों। ऐसी स्थिति से बचा नहीं जा सकता जहाँ यह अपरिहार्य हो, हालाँकि यह उचित आचरण के साथ किया गया था और बिना किसी दुर्भावनापूर्ण इरादे के मौजूद था। 

‘दुर्घटना’ शब्द एक अप्रत्याशित (अनएक्सपेक्टेड) घटना है जो किसी प्रकार के नुकसान या चोट की ओर ले जाती है जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता या जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। आम तौर पर, लोगों से केवल उन परिदृश्यों के लिए सतर्क रहने की अपेक्षा की जाती है जो उचित हों। सभी देखभाल और सावधानी एक उचित सीमा तक संभव है। उस सीमा से परे, यदि परिदृश्य अनुचित रूप से व्यापक हो जाते हैं, तो ऐसी देखभाल और सावधानी भी विफल हो सकती है। यह दृष्टिकोण लॉर्ड डुनेडिन द्वारा फरडन बनाम हरकोर्ट रिविंगटन (1932) के मामले में अपनाया गया था। सरल शब्दों में, कानून हमसे अपने कार्यों में सावधान रहने की मांग करता है ताकि हमारे कार्यों से दूसरों को नुकसान न पहुंचे। यहाँ यह सावधानी, एक सामान्य सावधानी है। यह कोई अतिशयोक्ति (ओवरस्टेपिंग) नहीं है।

आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, A घोड़े पर आग्नेयास्त्र (फायरआर्म) लेकर दूसरे शहर जा रहा है। उसे आग्नेयास्त्र से संबंधित किसी भी दुर्घटना के लिए तैयार रहना चाहिए। इसलिए, पैकेजिंग सही तरीके से की जानी चाहिए ताकि इसे सुरक्षित रूप से उसके गंतव्य (डेस्टिनेशन) तक पहुँचाया जा सके। हालाँकि, अगर घोड़ा परेशान हो जाता है और सड़क पर कुछ बदमाशों की वजह से भागने या कूदने लगता है, तो ऐसा लगता है कि इस स्थिति में A कुछ नहीं कर सकता। वह, सबसे अच्छा, घोड़े को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकता है। अब, इस दौरान, अगर घोड़ा कूदता है और आग्नेयास्त्रों का कार्टेल गाड़ी से फिसल जाता है और एक पागल व्यक्ति को मिल जाता है जो खुद को गोली मार लेता है, तो क्या A जिम्मेदार होगा? 

A ने पूरी सावधानी बरती और फिर भी, यह अप्रत्याशित घटना हुई जिससे घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हो गई। श्रृंखला में सभी घटनाओं के लिए, A को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जब वादी लापरवाही साबित कर देगा, तो A आसानी से और सफलतापूर्वक अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव कर सकता है।

बचाव के रूप में अपरिहार्य दुर्घटना

“अपरिहार्य दुर्घटना” वाक्यांश सुनने के बाद सबसे पहला विचार जो मन में आता है, वह है सड़क दुर्घटना, जैसा कि ऊपर चर्चा किए गए उदाहरण में हुआ था। लेकिन, कानून में, अपरिहार्य दुर्घटना अपकृत्य के कानून में एक सामान्य बचाव है, न कि केवल एक दुर्घटना। अपरिहार्य दुर्घटना कहती है कि किसी व्यक्ति को उस दुर्घटना के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है जो उसकी ओर से की गई सभी देखभाल और सावधानी के बावजूद पूर्वानुमानित नहीं थी। कानून कहता है कि उच्च स्तर की सावधानी की आवश्यकता नहीं है और उचित देखभाल पर्याप्त है। 

अपरिहार्य दुर्घटना की अवधारणा को समझने के लिए, आइए अन्य संबंधित उदाहरणों पर नज़र डालें। यदि A कार चला रहा था और वह अपने होश में था और उसने पूरी सावधानी बरती, लेकिन अचानक, यांत्रिक भाग की खराबी के कारण, उसकी कार का संतुलन बिगड़ गया और वह किसी राहगीर से टकरा गई। इस मामले में, चालक उत्तरदायी नहीं होगा क्योंकि उसने अपनी तरफ से सभी सावधानियां बरती थीं। यहाँ, यह ध्यान रखना उचित है कि सावधानी बरतने के बाद भी ऐसी दुर्घटनाएँ अपरिहार्य थीं। 

ईश्वरीय कार्य के उदाहरणों को कभी-कभी अपरिहार्य दुर्घटनाओं में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे एक अन्य उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि A अपनी ओर से पूरी उचित सावधानी के साथ कार चला रहा था और अचानक भारी बारिश और तूफान के कारण सड़क टूट गई और A की कार ने कई पैदल यात्रियों को टक्कर मार दी। इस मामले में भी, चालक उत्तरदायी नहीं होगा क्योंकि स्थिति पूरी तरह से उसके नियंत्रण से बाहर थी। इस प्रकार, इस तरह के मामले का निपटारा करते समय कानून की अदालत को यह देखना चाहिए कि किस तरह की अपरिहार्य स्थिति की बात की जा रही है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि न्याय दिया जा रहा है, इस बात का सावधानीपूर्वक अवलोकन करना आवश्यक है कि क्या वास्तव में प्रतिवादी द्वारा सावधानी बरतने की कोई गुंजाइश नहीं थी। साथ ही, यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या किसी स्थिति में लापरवाही का मामला वास्तव में बनाया गया है या यह केवल वादी द्वारा लगाया गया आरोप है।

सर फ्रेडरिक पोलक ने एक अपरिहार्य दुर्घटना को इस प्रकार परिभाषित किया है, ” ऐसी किसी भी सावधानी से टाला नहीं जा सकता है, जो एक विवेकशील व्यक्ति द्वारा ऐसा कार्य करने पर अपेक्षित हो सकती है ।” यह हमेशा व्यक्तिगत चोट से जुड़े मुकदमों का एक हिस्सा होता है, जहाँ शामिल पक्षों की किसी भी गलती के बिना नुकसान पहुँचाया जाता है। अपरिहार्य दुर्घटना के इस बचाव का उपयोग एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है, जहाँ एक पक्ष यह स्थापित करता है कि प्रथम दृष्टया लापरवाही का मामला हुआ है और उसके बाद, प्रतिवादी को एक अपरिहार्य दुर्घटना, जिस तरह से दुर्घटना हुई और वह दुर्घटना कैसे अपरिहार्य थी, यह साबित करने का दायित्व दिया जाता है। इसमें उन विवरणों को शामिल किया जाना चाहिए जो प्रतिवादी के दावों को साबित कर रहे हैं, जैसे कि वाहन पर नियंत्रण कैसे खो गया और कैसे, किसी भी उचित देखभाल और एहतियात के बावजूद, विशेष दुर्घटना को टालना असंभव था।

यह बचाव का एक तरीका है जिसका प्रयोग प्रतिवादी द्वारा तब किया जाता है जब अपरिहार्य दुर्घटना के सिद्धांत को उस स्थिति में लागू किया जाता है जब किसी मामले में वादी द्वारा लापरवाही का दावा किया जाता है और प्रतिवादी की ओर से दुर्भावनापूर्ण इरादे का अभाव होता है। 

अपरिहार्य दुर्घटना का ऐतिहासिक विकास

अपकृत्य के कानून के तहत बचाव के रूप में अपरिहार्य दुर्घटनाओं की शुरुआत अतिचार से जुड़ी स्थितियों में हुई। ब्लैक लॉ डिक्शनरी में अतिचार को “एक गैरकानूनी कार्य जो किसी अन्य व्यक्ति के शरीर या संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन अधिक विशेष रूप से, जहां कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति की भौतिक निजी संपत्ति में प्रवेश कर रहा है ” के रूप में परिभाषित किया गया है। यह एक जानबूझकर किया गया अपकृत्य है, जिसका अर्थ है कि यह अपकृत्य तभी किया जा सकता है जब व्यक्ति का ऐसा इरादा हो। यह वह जगह है जहां अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव ने उन लोगों की मदद की, जिनका वास्तव में अतिचार का अपकृत्य करने का इरादा नहीं था और फिर भी उन्होंने इसे कर दिया। यह बचाव और भी महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि उस समय अतिचार का अपकृत्य कार्रवाई योग्य था, भले ही ऐसा कार्य करने वाले व्यक्ति का इसे करने का इरादा था या नहीं।

उदाहरण के लिए, यदि A को पता चलता है कि उसकी बकरी गायब है और वह उसे ढूँढ़ता है, और उसे B की संपत्ति में पाता है, तो A बकरी को लेने के लिए भूमि के अंदर जा सकता है। इस मामले में, B अतिचार का दावा कर सकता है और A को जवाबदेह ठहरा सकता है, भले ही A का अतिचार करने का इरादा न हो। न्यायालयों ने ऐसे मामले में प्रतिवादियों को छूट देने का फैसला किया। प्रतिवादियों को अनिवार्य रूप से यह साबित करना था कि यह एक अपरिहार्य घटना थी। यह एक ऐसा मामला था जहाँ प्रतिवादी पर दोष की अनुपस्थिति को साबित करने का दायित्व था।

उपरोक्त नियम इस बचाव की प्रयोज्यता के बारे में एक पुराना नियम था। वर्तमान में, यह दायित्व प्रतिवादी के कंधों से हट गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब, प्रतिवादी की ओर से लापरवाही की मौजूदगी को साबित करना वादी की आवश्यकता बन गई है। यह प्रतिवादी द्वारा अतीत में लापरवाही की मौजूदगी को साबित करने के विपरीत है।

अपरिहार्य दुर्घटना और लापरवाही के बीच संबंध

अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव या सिद्धांत को समझने के लिए, हमें लापरवाही और अपरिहार्य दुर्घटना के बीच के संबंध को भी समझना होगा। विनफील्ड के अनुसार, “लापरवाही एक अपकृत्य के रूप में देखभाल करने के लिए एक कानूनी कर्तव्य का उल्लंघन है और जिसके परिणामस्वरूप वादी को ऐसे नुकसान होते हैं जो प्रतिवादी द्वारा वांछित नहीं हैं “। इसलिए, लापरवाही के मामले में, प्रतिवादी के पास देखभाल करने का एक कानूनी कर्तव्य है जिसका उल्लंघन होता है और प्रतिवादी की ओर से इस उल्लंघन के कारण, वादी को नुकसान उठाना पड़ता है। प्रतिवादी के पास ऐसा कोई कर्तव्य था या नहीं, इसका निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर कानून की अदालत द्वारा किया जाता है।

जबकि यह साबित करने का भार कि दुर्घटना अपरिहार्य थी, प्रतिवादी पर है, यह साबित करने का भार कि प्रतिवादी द्वारा लापरवाही का कार्य किया गया है, वादी पर है। इस प्रकार, एक अपरिहार्य दुर्घटना लापरवाही के दावे का परिणाम है। सरल शब्दों में, किसी भी वादी द्वारा दावा की गई लापरवाही में कुछ अपवाद हैं जिनका उपयोग प्रतिवादियों द्वारा कथित लापरवाही से मुक्त होने के लिए किया जा सकता है। ये अपवाद वास्तव में बचाव हैं जो प्रतिवादी द्वारा उठाए जा सकते हैं, जो कि सहभागी (कंट्रीब्यूटरी) लापरवाही, ईश्वरीय कार्य (विस मेजर) और अपरिहार्य दुर्घटना हैं।

प्रतिवादी द्वारा अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव का उपयोग करने के लिए, दो बातें दर्शाना आवश्यक है। सबसे पहले, प्रतिवादी की ओर से दुर्घटना को सकारात्मक रूप से पूरक करने का कोई इरादा नहीं होना चाहिए और, दूसरी बात, उचित सावधानी के साथ टक्कर को टाला नहीं जा सकता था। प्रतिवादी स्पष्ट रूप से किसी भी जिम्मेदारी से इनकार कर सकता है लेकिन अधिकारियों को संतुष्ट करना अधिक कठिन है। प्रतिवादी द्वारा इस्तेमाल किया गया सबसे प्रमुख बचाव यह है कि दुर्घटना से ठीक पहले एक अप्रत्याशित अंधेरा हुआ था। उस मामले में, प्रतिवादी को यह साबित करना होगा कि अचानक कोई चिकित्सा बीमारी हुई थी। यहाँ अपरिहार्य दुर्घटनाओं के तहत दिए गए उदाहरण ज्यादातर सड़क दुर्घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं क्योंकि यह बचाव ज्यादातर सड़क दुर्घटनाओं के मामले में प्रतिवादियों द्वारा किया जाता है। 

हालांकि, हम एक और उदाहरण ले सकते हैं जो एक अलग परिदृश्य से संबंधित है। ईशान, एक प्रतिवादी, बागवानी का शौक़ीन था और छत की रेलिंग के पास गमले रखता था और गमलों को दूसरी मंजिल से नीचे गिरने से रोकने के लिए उन्हें एक जाल से घेरता था जहाँ वह रहता था। एक दिन, एक गमला छत से गिर गया क्योंकि जाल को चूहे ने काट लिया था, जिसके परिणामस्वरूप एक छेद हो गया जो आँखों से दिखाई नहीं दे रहा था। यह गमला एक कुत्ते पर गिरा जो क्रोधित हो गया और उसने ईशान के पड़ोसी, श्री किशन जो कुत्ते के पास से गुज़र रहे थे को काट लिया। श्री किशन ने ईशान पर यह कहते हुए मुकदमा दायर किया कि ईशान अपने आचरण में लापरवाह था लेकिन ईशान एक अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव वैध रूप से कर सकता है क्योंकि इस मामले में इस सिद्धांत के सभी आवश्यक तत्व संतुष्ट हो रहे हैं। बेहतर समझ के लिए इन आवश्यक तत्वों पर आगे चर्चा की गई है।

अपरिहार्य दुर्घटना और ईश्वरीय कार्य  के बीच संबंध

अपरिहार्य दुर्घटनाएँ और ईश्वरीय कार्य अपकृत्य कानून के तहत बचाव हैं। वे इस अर्थ में समान हैं कि वे प्रतिवादी को उसके द्वारा किए गए अपकृत्य से उत्पन्न होने वाली किसी भी कानूनी देयता से बचाते हैं। समानता का एक और बिंदु यह है कि वे वादी को नुकसान या चोट भी पहुँचाते हैं, जिसके लिए, हालाँकि, ऐसे अपकृत्यकर्ताओं पर ऐसी क्षति पहुँचाने के लिए अपकृत्य देयता नहीं डाली जा सकती। हालाँकि, वे वैचारिक रूप से एक दूसरे से बहुत अलग हैं।

अपरिहार्य दुर्घटनाएँ वैध कार्यों से उत्पन्न होती हैं जहाँ उचित सावधानी बरती जाती है, फिर भी इससे नुकसान होता है। यह महत्वपूर्ण है कि उचित देखभाल की गई हो, अन्यथा यह एक लापरवाहीपूर्ण कार्य बन जाता है जिसके लिए देयता लगाने से कोई बचाव नहीं है। ईश्वरीय कार्य के मामले में, ऐसा कोई साधन नहीं है जिससे कोई कार्य लापरवाही बन सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वरीय कार्य के मामले में जो कार्य नुकसान पहुंचाता है, वह किसी भी मानवीय शक्ति से परे है। भूकंप, बाढ़, भूस्खलन आदि कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं और किसी एक इंसान या समूह को ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

अपरिहार्य दुर्घटनाओं के आवश्यक तत्व

जब कोई प्रतिवादी अपरिहार्य दुर्घटना के सिद्धांत का उपयोग कर रहा हो, तो इस सिद्धांत के सफल प्रयोज्यता के लिए कुछ आवश्यक बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। इसे तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। आइए नीचे इस पर विस्तार से चर्चा करें-

  • सबसे पहले तो कोई दुर्घटना होनी चाहिए यानी कोई अपरिहार्य घटना;
  • दूसरा, यह अथाह और अपरिहार्य होना चाहिए भले ही व्यक्ति ने सभी संभव कौशल, देखभाल और सतर्कता का उपयोग किया हो;
  • तीसरा, इसके परिणामस्वरूप, किसी व्यक्ति को कष्ट, क्षति, चोट या हानि होनी चाहिए थी, लेकिन यह हानि किसी अन्य व्यक्ति के कारण नहीं हुई है, जिसने उचित सावधानी बरती है और लापरवाही नहीं बरती है।

अपरिहार्य दुर्घटनाओं के प्रकार

सामान्य शब्दावली में अपरिहार्य दुर्घटनाओं को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है-

  • ऐसी दुर्घटनाएँ जो मानव शक्ति से परे शक्तियों के हस्तक्षेप के कारण होती हैं; तथा
  • दुर्घटनाएँ जो आंशिक रूप से या पूर्णतः किसी मानव द्वारा किए गए कार्य के कारण होती हैं।

अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव के अपवाद

कुछ विशेष परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ प्रतिवादी अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव का उपयोग करने में असमर्थ होता है। ये उदाहरण अपवाद हैं या इन्हें इस बचाव की सीमाएँ कहा जा सकता है जिनकी चर्चा नीचे की गई है:

अतिचार

अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव अतिचार की स्थिति में लागू नहीं होता है। अतिचार तब होता है जब कोई अनधिकृत व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति में प्रवेश करता है। बचाव यह सुनिश्चित करने के लिए लागू नहीं होता है कि प्रतिवादी को सबूत का बोझ नहीं उठाना पड़ता है, लेकिन वादी को उठाना पड़ता है।

सख्त देयता

सख्त देयता का सिद्धांत वह है जहां किसी व्यक्ति पर सख्त अर्थों में देयता का गंभीर बोझ होता है और लापरवाही आदि का दावा करके कोई छूट संभव नहीं है। कोई भी स्थिति जो दूसरों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है, उसे किसी भी उचित देखभाल और सतर्कता से टाला नहीं जा सकता है, इसलिए, इन स्थितियों में अपरिहार्य दुर्घटना एक उपलब्ध बचाव नहीं है।

अपरिहार्य दुर्घटनाओं पर विदेशी ऐतिहासिक निर्णय

जॉर्ज ब्राउन बनाम जॉर्ज के. केंडल (1850)

इस मामले में, वादी और प्रतिवादी दोनों के पास कुत्ते थे। एक दिन, उनके कुत्ते लड़ने लगे और उन्हें अलग करने के लिए, केंडल ने एक छड़ी मारना शुरू कर दिया। हालाँकि ब्राउन कुत्तों की लड़ाई वाली जगह से सुविधाजनक रूप से दूर था, लेकिन जब कुत्ते उसके पास आने लगे तो वह केंडल की पीठ के पास पहुँच गया। केंडल, उसके आगे बढ़ने से अनजान था, उसने छड़ी उठाई और ब्राउन को चोट पहुँचाई। ब्राउन को गंभीर चोट लगी और उसने केंडल के खिलाफ हिंसा और हमले का प्रस्ताव लाया। केंडल ने अदालत के समक्ष अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव की दलील दी। 

इस मामले में मैसाचुसेट्स के सर्वोच्च न्यायालय ने केंडल के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसने अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव किया था। इसने वादी द्वारा किए गए लापरवाही के दावे को नज़रअंदाज़ किया और प्रतिवादी का पक्ष लिया।

होम्स बनाम माथर (1875)

होम्स बनाम माथर (1875) एलआर 10 एक्स. 261 के ऐतिहासिक मामले में वादी एक व्यक्ति सड़क पर चल रहा था। प्रतिवादी का नौकर उसी सार्वजनिक सड़क पर घोड़ों के साथ गाड़ी चला रहा था। सड़क पर एक कुत्ते के भौंकने की वजह से घोड़े चौंक गए और बेकाबू हो गए। इस दौरान, कीचड़ वादी के कपड़ों और आँखों पर लग गया जिससे वह घायल हो गई। वादी ने प्रतिवादी की ओर से लापरवाही का दावा किया लेकिन अदालत ने वादी के खिलाफ फैसला सुनाया। 

इसने तर्क दिया कि यह दुर्घटना प्रकृति में अपरिहार्य थी और प्रतिवादी संभवतः ऐसी स्थिति के परिणामों को नहीं जान सकता था जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। सामान्य बोलचाल में, न्यायालय ने कहा कि हमें शरारत की ऐसी छोटी-छोटी घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि दूसरों की ओर से उचित सावधानी हमेशा ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होती है।

स्टेनली बनाम पॉवेल (1891)

ऐतिहासिक मामले में, वादी और प्रतिवादी शूटिंग पार्टी का हिस्सा थे जो तीतरों को मारने की गतिविधि में शामिल थे। प्रतिवादी ने तीतर को मारने के लिए निशाना साधा और गोली चलाई लेकिन गोली चूक गई और पेड़ से टकराकर वादी की आंख में चोट लग गई। वादी ने प्रतिवादी की ओर से लापरवाही का दावा किया। हालांकि, क्वीन्स की खंड पीठ ने फैसला सुनाया कि प्रतिवादी द्वारा किसी भी प्रकार की सावधानी बरतकर भी दुर्घटना को टाला नहीं जा सकता था। यह माना गया कि प्रतिवादी की ओर से कोई लापरवाही नहीं थी और प्रतिवादी की ओर से उचित देखभाल और सावधानी की कोई कमी नहीं थी।

नेशनल कोल बोर्ड बनाम जेई इवांस एंड कंपनी (कार्डिफ़) लिमिटेड (1951)

इस मामले में, अतिचार का अपकृत्य एक मुद्दा था। काउंटी परिषद की भूमि पर वादी के पूर्ववर्तियों द्वारा एक विद्युत केबल बिछाई गई थी। काउंटी परिषद को इसकी जानकारी नहीं थी और जब काउंटी परिषद ने भूमि की खुदाई के लिए कुछ श्रमिकों को नियुक्त किया, तो यह विद्युत केबल क्षतिग्रस्त हो गई। वादी ने मुकदमा दायर किया। इस मामले में प्रतिवादियों ने अपरिहार्य दुर्घटना के लिए दलील दी। उन्होंने दावा किया कि उनके पास केबल के बारे में पता लगाने का बिल्कुल भी तरीका नहीं था। न्यायालय ने माना कि अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव सही ढंग से किया गया था और निर्णय में प्रतिवादियों का पक्ष लिया।

चाउ-हिदासी बनाम हिदासी (2011)

इस मामले में, वादी पत्नी है और प्रतिवादी पति है। पति और पत्नी दोनों पहाड़ी सड़क पर यात्रा कर रहे थे। प्रतिवादी को फिसलन भरी सड़क के बारे में अच्छी तरह पता था; इसलिए, उसने सभी सावधानियां बरतीं। वह 100 किमी प्रति घंटे से कम की गति से यात्रा कर रहा था, लेकिन किसी तरह कार का संतुलन बिगड़ गया। प्रतिवादी ने आपातकालीन ब्रेक खींचे, जो कार को रोक नहीं सके और कार पास के बैरियर से टकरा गई, जिससे वादी घायल हो गया। 

वादी ने पति पर यह कहते हुए मुकदमा दायर किया कि वह लापरवाही से गाड़ी चला रहा था और उसने एहतियाती उपाय नहीं किए। प्रतिवादी ने अपरिहार्य दुर्घटना का तर्क दिया। अदालत ने बचाव पक्ष की दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि यांत्रिक खराबी के कारण कार ने नियंत्रण खो दिया, जो प्रतिवादी के दायरे से पूरी तरह बाहर था।

इस मामले में, ब्रिटिश कोलंबिया के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि यह लापरवाही की स्थिति नहीं थी बल्कि एक अपरिहार्य दुर्घटना थी और इस प्रकार, वादी द्वारा की गई कार्रवाई को खारिज कर दिया। इसलिए, अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव को अदालत ने स्वीकार कर लिया। 

एफस्टैथियोस सी एच कॉन्स्टेंटिनाइड्स लिमिटेड, केंट्रिकी इंश्योरेंस लिमिटेड बनाम एंड्रिया पापायिन्नी (2015)

एफस्टैथियोस सीएच कॉन्स्टेंटिनाइड्स लिमिटेड, केंट्रीकी इंश्योरेंस लिमिटेड बनाम एंड्रिया पापायन्नी, मामला संख्या नंबर 1249/08, (2015) के मामले में, प्रतिवादी सड़क पर कार चला रहा था और अचानक उसे दिल का दौरा पड़ा। इस अचानक गिरफ्तारी के कारण, उसने एक राहगीर और एक दर्शक को टक्कर मार दी। मामला अदालत में गया और प्रतिवादी ने अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव किया। अपने पक्ष का समर्थन करने के लिए, उन्होंने अदालत को दिल के दौरे का अपना चिकित्सीय इतिहास भी दिखाया। लेकिन लिमासोल के जिला न्यायालय ने प्रतिवादी के खिलाफ फैसला दिया। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सका कि दुर्घटना के समय गिरफ्तारी अचानक हुई थी जो अपरिहार्य दुर्घटना की दलील के लिए एक आवश्यक तत्व था।  

दूसरे, प्रतिवादी को हृदयाघात की अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में अच्छी तरह से पता था। उसे गाड़ी चलाने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए था। इसलिए, दुर्घटना अप्रत्याशित नहीं थी और इसे टाला जा सकता था। इसलिए, अपनी गंभीर बीमारी के साथ गाड़ी चलाते हुए, यह समझ से परे है कि कब हृदयाघात हो जाएगा और दुर्घटना हो जाएगी। इसलिए, उन्होंने फैसला सुनाया कि उन्हें दुर्घटना के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

अपरिहार्य दुर्घटनाओं पर भारतीय ऐतिहासिक निर्णय

पद्मावती एवं अन्य बनाम दुग्गनिका एवं अन्य (1975)

इस मामले में, एक जीप थी जिसने दो अजनबियों को लिफ्ट दी थी। जब वे जीप में सवार हुए, तो दुर्भाग्य से, आगे की तरफ का दाहिना टायर अलग हो गया क्योंकि एक्सल से जुड़ा बोल्ट टूट गया था। दोनों अजनबियों को गंभीर चोटें आईं, और उनमें से एक ने उन चोटों के कारण दम तोड़ दिया। प्रतिवादियों ने दावा किया कि यह एक अपरिहार्य दुर्घटना थी। साथ ही, वे स्वेच्छा से जीप में सवार हुए, जो ‘वॉलंटरी नॉन फिट इंजुरिया’ के सिद्धांत को आकर्षित करता है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा कि वाहन की नियमित जांच की मदद से इस तरह की तकनीकी खराबी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए, प्रतिवादियों को अदालत द्वारा उत्तरदायी नहीं पाया गया।

एस. वेदांताचार्य एवं अन्य बनाम साउथ अर्काट का राजमार्ग विभाग एवं अन्य (1986)

वर्तमान मामले मे, एक बस एक नाले में गिर गई क्योंकि जिस नाले से वह गुजर रही थी, वह ढह गया और उसी के कारण एक यात्री की मौत हो गई। राजमार्ग विभाग ने तर्क दिया कि यह एक अपरिहार्य घटना थी जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता था क्योंकि इंजीनियरों ने एक दिन पहले ही नाले को सही स्थिति में पाया था और साथ ही, दो सप्ताह से बारिश हो रही थी। 

मद्रास उच्च न्यायालय ने अपरिहार्य दुर्घटना के बचाव को स्वीकार कर लिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय को पलट दिया और कहा कि राजमार्ग विभाग इस लापरवाही के लिए उत्तरदायी होगा क्योंकि किसी भी मौसम संबंधी समस्या के खिलाफ गर्त को मजबूत करके ऐसी घटनाओं में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई एहतियाती उपाय नहीं किए गए थे। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वादी के पक्ष में यह देखते हुए निर्णय दिया कि भले ही एक अपरिहार्य घटना घटित हुई हो, लेकिन सावधानी न बरतने के कारण उत्तरदायित्व अभी भी प्रतिवादी का है। 

श्रीधर तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (1987)

इस मामले में , प्रतिवादी की बस ‘X’ थी, जिसे बस के चालक ‘X’ के सामने अचानक आ गए एक साइकिल सवार को रोकने के लिए ब्रेक लगाना पड़ा। यह बारिश का दिन भी था, जिसकी वजह से सड़कें भी गीली थीं। जिस समय बस ‘X’ के चालक द्वारा ब्रेक लगाए गए, उस समय तस्वीर में एक और बस ‘Y’ थी, जो विपरीत दिशा से आ रही थी। ब्रेक लगाने की प्रक्रिया में बस ‘X’ का पिछला हिस्सा बस ‘Y’ के अगले हिस्से से टकरा गया। यह पाया गया कि यह दुर्घटना केवल साइकिल सवार के अचानक सामने आने का परिणाम थी। अन्यथा, बसें मध्यम गति से चलाई जा रही थीं; इसलिए, कोई लापरवाही नहीं थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि प्रतिवादी निगम उत्तरदायी नहीं है क्योंकि यह अपरिहार्य दुर्घटना का मामला था।

ए. कृष्णा पात्रा बनाम उड़ीसा राज्य विद्युत बोर्ड एवं अन्य (1998)

इस मामले में, एक जोड़ा उड़ीसा की सड़कों पर चल रहा था, तभी पत्नी सड़क पर खुली अवस्था में पड़े एक संवाहक (कंडक्टर) के संपर्क में आकर खतरनाक दुर्घटना का शिकार हो गई। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। याचिकाकर्ता, उसके पति ने उड़ीसा राज्य विद्युत बोर्ड से 1,00,000 रुपये के मुआवजे का दावा करते हुए कहा कि यह दुर्घटना पूरी तरह से विद्युत बोर्ड की ओर से लापरवाही के कारण हुई थी। उचित देखभाल और सावधानी नहीं बरती गई, इसलिए बोर्ड को मुआवजे के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। 

विद्युत बोर्ड ने तर्क दिया कि यह घटना एक अपरिहार्य दुर्घटना थी। यह घटना उनके नियंत्रण से बाहर थी। इसके तुरंत बाद, कंडक्टर की स्थिति और उसके गिरने के कारण की जांच करने के लिए एक विद्युत निरीक्षक को नियुक्त किया गया। आश्चर्यजनक रूप से, विद्युत निरीक्षक ने मामले की एक अलग तस्वीर दिखाई। उसे पहले से ही 30 साल से अधिक हो चुका था और बहुत कमजोर था। गिरने का कारण इसकी उम्र थी और यह यांत्रिक रूप से अस्वस्थ हो गया था, इसलिए अगर यह किसी जीवित प्राणी के संपर्क में आता है तो यह खतरनाक रूप से घातक हो सकता है। पुलिस जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिला की मौत विद्युत के कारण हुई थी। 

तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद, यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह घटना एक अपरिहार्य दुर्घटना नहीं थी। इस स्थिति में अनिवार्य सावधानी नहीं बरती गई। विद्युत बोर्ड ने समय-समय पर कंडक्टर की जांच नहीं की। कंडक्टर और तारों के नियमित निरीक्षण से इस दुर्घटना को टाला जा सकता था। हम देख सकते हैं कि लापरवाही साबित करने के लिए आवश्यक सभी तत्व मौजूद हैं। महिलाओं की मौत के लिए विद्युत बोर्ड को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। लेकिन विद्युत बोर्ड ने अपरिहार्य दुर्घटना का बचाव किया जिसे अदालत ने खारिज कर दिया और प्रतिवादी को 50,000 रुपये का मुआवजा दिया। 

असम राज्य सहकारी विपणन (मार्केटिंग) एवं उपभोक्ता संघ लिमिटेड बनाम अनुभा साहा एवं अन्य (2001)

असम राज्य सहकारी विपणन और उपभोक्ता संघ लिमिटेड बनाम अनुभा साहा और अन्य एआईआर 2001 गौ 18 के मामले में, वादी मकान मालिक है और प्रतिवादी मकान मालिक का किरायेदार है। प्रतिवादी ने मकान मालिक से किराए पर दिए गए परिसर की विद्युत की तार की मरम्मत करने का अनुरोध किया। वादी के ध्यान में लाया गया कि तार खराब थी और उसे मरम्मत की जरूरत थी, लेकिन वादी ने मरम्मत नहीं करवाई। अंततः परिसर में आकस्मिक आग लग गई। वादी ने किरायेदार से परिसर को हुए नुकसान की भरपाई का दावा करने के लिए मुकदमा दायर किया। अदालत ने फैसला किया कि प्रतिवादी की ओर से कोई लापरवाही नहीं थी। अदालत ने कहा कि यह एक अपरिहार्य दुर्घटना का स्पष्ट मामला था

नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम स्वर्ण सिंह एवं अन्य (2004)

इस मामले में, बीमा कंपनी द्वारा बीमित वाहन से दुर्घटना हुई थी और इस वाहन से घायल हुए लोगों ने बीमा कंपनी से मुआवजे की मांग की थी। यह तर्क दिया गया था कि यह एक पूर्वानुमानित घटना नहीं थी और इसलिए, कंपनी के कंधों पर कोई दायित्व नहीं है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कंपनी को उत्तरदायी ठहराया और दुर्घटना और अपरिहार्य दुर्घटना के बीच अंतर किया। इसने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह स्वीकार नहीं किया जाएगा कि अस्पष्ट पॉलिसी शर्तों जैसे तकनीकी आधार पर किसी भी पक्ष द्वारा दायित्व से बचने की कोशिश की जाए। इसने यह भी कहा कि लापरवाही और दुर्घटना एक साथ हो सकते हैं और यह एक दुर्घटना का मामला था, अपरिहार्य दुर्घटना नहीं। यदि न्यायालय ने बीमा कंपनी द्वारा दी गई दलीलों को स्वीकार कर लिया, तो सभी दुर्घटनाएँ अपरिहार्य दुर्घटनाएँ बन जाएँगी और सभी दायित्व रोक दिए जाएँगे

निष्कर्ष 

अपरिहार्य दुर्घटना न केवल चालकों के लिए एक सहायक बचाव है जहां एक सड़क दुर्घटना हुई है, बल्कि कई अन्य मामलों में भी है जहां लापरवाही का दावा किया जाता है और एक दुर्घटना होती है जो किसी व्यक्ति के नियंत्रण से परे है। लापरवाही का मतलब है किसी भी प्रकार की देखभाल और सावधानी का अभाव। एक अपरिहार्य दुर्घटना में, एक व्यक्ति सभी सावधानी बरतता है, लेकिन फिर भी, ऐसी घटना को रोकना संभव नहीं है क्योंकि यह प्रतिवादी के हाथ से बाहर है।

लापरवाही का दावा अदालत में आने की स्थिति में बचाव के विभिन्न प्रकारों में एक बड़ा अंतर होता है। इस बचाव को अदालत में कैसे पेश किया जा सकता है, इस पर भी एक स्पष्टता है। प्रतिवादी को केवल यह साबित करना होता है कि घटना से बचने के लिए उसके कार्य  में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता था और पूरी घटना जानबूझकर नहीं की गई थी। हालांकि, अगर प्रतिवादी अपने कार्य  को साबित नहीं कर पाता है और अदालत पाती है कि कार्य से बचा जा सकता था, तो बचाव उपलब्ध नहीं होगा। अदालतें इस बचाव के बारे में उदार और समावेशी (इन्क्लूसिव) रही हैं और यह सुनिश्चित किया है कि प्राकृतिक कानून के आधार पर भी, दावे के आधार को देखे बिना इस बचाव को अस्वीकार नहीं किया जाता है।

इन निर्णयों से पता चलता है कि अपरिहार्य दुर्घटनाओं पर अधिकांश ऐतिहासिक निर्णयों में न्यायालयों द्वारा अपनाया गया न्यायशास्त्र मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि प्रतिवादी को गलत कार्य करने का बोझ न उठाने दिया जाए, जो उस व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर था।

अपरिहार्य दुर्घटना के इस बचाव ने लापरवाही की अवधारणा को और अधिक उन्नत और समृद्ध किया है तथा किसी भी गलत निर्णय को भी रोका है, जिससे यह पता चलता है कि हमेशा ऐसा नहीं होता कि दुर्घटना घटित हुई हो, इसलिए यह कार्य करने वाले की गलती ही होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

अपरिहार्य दुर्घटना बचाव/सिद्धांत से आपका क्या मतलब है?

अपरिहार्य दुर्घटना का सिद्धांत एक बचाव है जो वादी द्वारा किए गए लापरवाही के दावे के खिलाफ प्रतिवादी की रक्षा करता है। यदि प्रतिवादी सभी संभव देखभाल, सावधानी और कौशल का उपयोग करने के बावजूद किसी आकस्मिक स्थिति को होने से नहीं रोक सकता था, तो ऐसी दुर्घटना से होने वाली चोट, नुकसान या क्षति को रोकना व्यावहारिक रूप से असंभव है। यह किसी मामले में प्रतिवादी के स्थान पर किसी भी व्यक्ति के लिए उपलब्ध तीन बचावों में से एक है, जो हैं, सहभागी लापरवाही, ईश्वरीय कार्य और अपरिहार्य दुर्घटना।

अपरिहार्य दुर्घटना और सहभागी लापरवाही के बीच क्या अंतर है?

लापरवाही, जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को नुकसान होता है, तब होती है जब कोई व्यक्ति सावधानी बरतने के अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है। लापरवाही का आरोप लगाए जाने पर प्रतिवादी स्थिति के आधार पर अपरिहार्य दुर्घटना और सहभागी लापरवाही के बचाव का दावा करके खुद को बचा सकता है। 

सहभागी लापरवाही का बचाव तब सामने आता है, जब प्रतिवादी वादी को हुए नुकसान के लिए केवल आंशिक रूप से जिम्मेदार होता है और वादी भी गैर-जिम्मेदार होता है, जो हुई लापरवाही में योगदान देता है। अपरिहार्य दुर्घटना के मामले में, जैसा कि हमने पहले ही लेख में चर्चा की है, एक आकस्मिक और अपरिहार्य स्थिति होनी चाहिए जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को नुकसान या चोट लगी हो, भले ही सभी उचित सावधानी बरती गई हो। उक्त अपरिहार्य दुर्घटना वह होगी जिसे रोकना असंभव था, भले ही अपकृत्य करने वाले द्वारा सभी संभव सावधानियां बरती गई हों।

अपरिहार्य दुर्घटना और ईश्वरीय कार्य  में क्या अंतर है?

ये दोनों ही बचाव हैं जिनका उद्देश्य प्रतिवादी के लिए किसी भी प्रकार के अपकृत्य दायित्व को रोकना है। ईश्वरीय कार्य या बल की घटना के मामले में, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने वाली स्थिति सीधे ईश्वरीय कार्य के कारण होती है, जिसका अर्थ है कि ऐसा कुछ जो किसी भी मानवीय हस्तक्षेप या नियंत्रण से परे हुआ हो। ‘ईश्वरीय कार्य ‘ या विस मेजर के उदाहरण भूकंप, बाढ़, भूस्खलन आदि हैं। एक अपरिहार्य दुर्घटना एक अपरिहार्य स्थिति है जो प्रतिवादी द्वारा बरती गई सभी देखभाल और एहतियात के बावजूद घटित होती है। यह विस मेजर से इस बात पर अलग है कि कर्ता या कथित अपकृत्यकर्ता वह व्यक्ति है जिसके कार्य को होने से रोकना असंभव था।

कौन सा कानून अपरिहार्य दुर्घटनाओं को शामिल करता है जो किसी व्यक्ति को इस अपकृत्य के लिए बचाव प्रदान करता है?

अपरिहार्य दुर्घटनाएँ सामान्य कानून के अंतर्गत आती हैं। भारत ने अपरिहार्य दुर्घटनाओं के संबंध में दिवाली कानून के दृष्टिकोण के विपरीत सामान्य कानून दृष्टिकोण अपनाया है। यही कारण है कि भारत भी अपकृत्य के कानून को स्वीकार करता है। अंग्रेजों ने सामान्य कानून का पालन किया और भारतीय दंड संहिता, 1860 के संहिताकरण में भी मदद की, जिसमें सभी अपकृत्य को दंडित किया गया। हालाँकि, अपकृत्य मुख्य रूप से विभिन्न अपकृत्य से संबंधित न्यायिक मिसालों द्वारा शासित होते हैं, ताकि ऐसे मामलों में कार्रवाई के तरीके को समझा जा सके।

संदर्भ