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विचारण से पहले की प्रक्रिया: सी.आर.पी.सी. के तहत विचारण में आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रिया

यह लेख जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की तीसरे वर्ष की कानून के छात्रा Mehar Verma द्वारा लिखा गया है। इस लेख में, लेखक सी.आर.पी.सी. के तहत समन, वारंट और उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) के माध्यम से विचारण (ट्रायल) के समय आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रक्रिया के बारे में बात करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

आपराधिक मामले में आरोपी के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति को विचारण का अधिकार है और न्यायालय के समक्ष पेश होने का अधिकार है। एक निष्पक्ष विचारण वह होती है जहां आरोपी को मामले में उपस्थित होने की अनुमति दी जाती है और आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए, न्यायालय को समन या वारंट के माध्यम से विचारण में सभी आरोपी को नोटिस जारी करना आवश्यक होता है। यदि आरोपी फिर भी पेश नहीं होता है, तो अदालत उद्घोषणा जारी कर सकती है। यदि न्यायालय, आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत ‘A’ को समन जारी करता है, तो वह उसे उसके खिलाफ आरोपों के बारे में सूचित करता है और अदालत के सामने पेश होने के लिए कहता है। यदि आरोपी ऐसा करने में विफल रहता है, तो न्यायालय वारंट जारी करेगा, जिसमें किसी तीसरे व्यक्ति को न्यायालय में ‘A’ को पकड़ कर लाने के लिए कहा जाएगा। यदि ‘A’ वहां से भाग जाता है या अपनी इच्छा से खुद को छुपाता है, तो न्यायालय ‘A’ के ​​खिलाफ उद्घोषणा का नोटिस जारी करेगा और ‘A’ की संपत्ति को कुर्क (अटैच) करेगा।

विचारण में आरोपी की उपस्थिति का महत्व

विचारण में आरोपी की उपस्थिति आपराधिक प्रक्रिया का मूल सिद्धांत है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लघंन न किया जाए। आरोपी  की उपस्थिति न केवल तथ्यात्मक परिस्थितियों को स्थापित करने में मदद करती है बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि आरोपी के पास बचाव का एक प्रभावी अधिकार है। विचारण में आरोपी की भौतिक उपस्थिति उसे सार्थक (मीनिंगफुल) और सूचित तरीके से भाग लेने, अपना मामला पेश करने का अधिकार, गवाहों का परीक्षण करने का अधिकार और समझने का अधिकार देती है। इस प्रकार एक निष्पक्ष विचारण के संचालन के लिए, विचारण की सभी कार्यवाही आरोपी या उसके वकील के सामने होनी चाहिए और आपराधिक विचारण में एकतरफा निर्णय नहीं होना चाहिए। निष्पक्ष विचारण की भावना में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया गया है, अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 238 के तहत, मजिस्ट्रेट को चार्जशीट की एक प्रति (कॉपी), गवाहों के बयान और आरोपी की जांच के बारे में अन्य सभी आवश्यक दस्तावेजों सहित सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने होते है। अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 273 के तहत प्रावधान है कि विचारण के सभी साक्ष्य या कोई अन्य विचारण आरोपी या उसके वकील की उपस्थिति में ही किया जाएगा। इसके अलावा संहिता की धारा 317 में कहा गया है कि यदि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक हो तो, एक मजिस्ट्रेट आरोपी की उपस्थिति के बिना ही विचारण को आगे बढ़ा सकता है।

मोहम्मद हुसैन @ जुल्फिकार बनाम दिल्ली राज्य, के मामले में आरोपी को केवल एक ही गवाह से परीक्षण करने की अनुमति दी गई थी, जबकि वहां माजूद कुल मिलाकर छप्पन गवाह थे। अदालत ने कहा कि आरोपी की दोषसिद्धि (कनविक्शन) को रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक निष्पक्ष विचारण नहीं है और एक गंभीर आरोप के आरोपी व्यक्ति को विचारण में शामिल होने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।

आरोपी की उपस्थिति हासिल करने के लिए प्रक्रिया

चूंकि आरोपी की उपस्थिति और दोनों पक्षों का विचारण, एक निष्पक्ष विचारण का सार है, इसलिए संहिता का एक पूरा अध्याय एक समन, वारंट या उद्घोषणा, और संपत्ति की कुर्की के संबंध में सभी प्रतिवादियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के बारे मे बताता है। किसी अपराध का संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेने के बाद मजिस्ट्रेट को यह तय करना होता है कि आरोपी की उपस्थिति के लिए समन या वारंट जारी किया जाए या नहीं।

गिरफ्तारी का समन

समन अदालत द्वारा दिया गया एक आदेश है, जिसमें एक व्यक्ति को आपराधिक मामलों में अदालत के सामने पेश होने के लिए कहा जाता है।

समन का रूप

संहिता की धारा 61 समन का रूप प्रदान करती है। प्रत्येक समन:

  1. लिखित में होना चाहिए;
  2. एक डुप्लीकेट प्रति बनाई जानी चाहिए;
  3. इस पर ऐसे न्यायालय के पीठासीन (प्रीसाइडिंग) अधिकारी या उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित किसी अन्य अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए;
  4. कोर्ट की मुहर होनी चाहिए।

संहिता की अनुसूची 2 का फॉर्म 1, समन का प्रारूप (फॉर्मेट) प्रदान करता है और इसमें आरोपी का नाम, आरोपी का पता, समन जारी करने की तिथि, मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर और न्यायालय की मुहर शामिल है।

समन कैसे भेजा जाता है?

संहिता की धारा 62 समन भेजने की प्रक्रिया प्रदान करती है। इस धारा का खंड (क्लॉज) (1) कहता है कि प्रत्येक समन को, एक पुलिस अधिकारी या अदालत के किसी अधिकारी या अन्य लोक सेवकों द्वारा भेजा जाएगा, जो संबंधित राज्य सरकार के नियमों के अधीन होगा।

इस धारा के खंड (2) में कहा गया है कि यदि संभव हो तो समन की प्रति, व्यक्तिगत रूप से समन भेजे गए व्यक्ति को दी जानी चाहिए।

धारा के खंड (3) में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति जिसे समन भेजा गया है, उसे डुप्लिकेट प्रति के पीछे हस्ताक्षर करना होगा, यदि यह सेवारत अधिकारी द्वारा आवश्यक है।

कॉर्पोरेट निकायों और सोसायटियों पर समन की तामील (सर्विस)

संहिता की धारा 63 के अनुसार, निगम के सचिव, स्थानीय प्रबंधक या निगम के किसी अन्य प्रमुख अधिकारी को तामील करके कॉर्पोरेट निकायों और सोसायटियों पर समन किया जा सकता है। समन भारत में निगम के मुख्य अधिकारी को संबोधित एक पत्र या डाक के माध्यम से दिया जा सकता है। ऐसे मामलों में, समन की तामील तब पूरी होती है जब डाक के सामान्य क्रम में पत्र आते हैं।

इस धारा में ‘निगम’ में सोसायटी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत सोसायटी शामिल नहीं है, बल्कि इसमें केवल एक निगमित कंपनी या अन्य कॉर्पोरेट निकाय शामिल हैं।

जब समन किए गए व्यक्ति न मिल सकें तब तामील

संहिता की धारा 64 में कहा गया है कि ऐसे मामलों में जहां व्यक्ति सम्यक् तत्परता (ड्यू डिलीजेंस) के बाद भी नहीं मिल सकता है, तो समन की एक प्रति उसके साथ रहने वाले उसके परिवार के वयस्क (एडल्ट) पुरुष सदस्य को दी जा सकती है। धारा यह भी प्रावधान करती है कि यदि समन देने वाला अधिकारी आवश्यक समझे तो वह डुप्लीकेट प्रतियों पर हस्ताक्षर करवा सकता है।

सरकारी सेवक पर तामील

धारा 66 में प्रावधान है कि जिन मामलों में समन किया गया व्यक्ति कोई सरकारी कर्मचारी है, तो अदालत उस कार्यालय के प्रमुख को समन की एक प्रति भेज देगी, जिसमें ऐसा व्यक्ति काम करता है। तत्पश्चात, मुख्य अधिकारी संहिता की धारा 62 में निर्धारित शर्तों का पालन करते हुए समन किए गए व्यक्ति पर इसकी तामील करेगा और इसे अपने हस्ताक्षर के तहत न्यायालय को लौटा देगा। आरोपी के हस्ताक्षर सबूत के तौर पर काम करते हैं।

ऐसे मामलों में, जब तामील करने वाला अधिकारी उपस्थित न हो, तब तामील का सबूत

अदालत को समन की तामील के सबूत की आवश्यकता होती है। धारा 68 में यह प्रावधान है कि जिन मामलों में समन न्यायालय के स्थानीय अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) से बाहर जारी किया गया था, और ऐसे मामलों में जहां समन देने वाला व्यक्ति विचारण के समय उपलब्ध नहीं है, ऐसे मामलों में एक हलफनामा (एफिडेविट) जिसमें कहा गया था कि समन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। हलफनामा और समन की दूसरी प्रति अनुमेय (एडमिसिबल) साक्ष्य हैं और हलफनामे में दिए गए बयानों को तब तक सत्य माना जाता है जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।

गिरफ्तारी का वारंट

ऐसे मामलों में जहां समन का अनुपालन नहीं किया जाता है या यदि अपराध बेहद गंभीर होते हैं, तो अदालत वारंट जारी कर सकती है। एक वारंट अदालत द्वारा किसी तीसरे पक्ष को दिया गया आदेश है, आमतौर पर यह एक पुलिस अधिकारी को अदालत के समक्ष एक व्यक्ति को पकड़ कर लाने के लिए होता है। वारंट जमानती भी हो सकता है और गैर जमानती भी।

गिरफ्तारी वारंट का फॉर्म और विषय

संहिता की धारा 70 गिरफ्तारी और अवधि के वारंट का रूप प्रदान करती है। गिरफ्तारी का हर वारंट निम्नलिखित रूप में होना चाहिए:

  • लिखित में होना चाहिए;
  • पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए;
  • न्यायालय की मुहर होनी चाहिए।

वारंट तब तक लागू रहेगा जब तक कि इसे निष्पादित करने वाले न्यायालय द्वारा इसे रद्द नहीं किया जाता है।

संहिता की अनुसूची 2 का फॉर्म 2 वारंट जारी करने का प्रारूप प्रदान करता है, इसमें उस व्यक्ति या व्यक्तियों का नाम और पद होना चाहिए जो वारंट निष्पादित (एग्जीक्यूट) कर रहा हैं, आरोपी का नाम और पता, वारंट जारी करने की तारीख, मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर और न्यायालय की मुहर लगी होनी चाहिए।

गिरफ्तारी वारंट के निष्पादन के तरीके

संहिता की धारा 72 के तहत, गिरफ्तारी का वारंट आमतौर पर एक पुलिस अधिकारी द्वारा निष्पादित किया जाता है। हालाँकि, यदि तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है और उस समय कोई पुलिस अधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति को वारंट निष्पादित करने का निर्देश दे सकता है।

यह धारा यह भी प्रावधान करती है कि जब वारंट एक से अधिक अधिकारी या व्यक्ति को निर्देशित किया जाता है, तो वारंट उनमें से किसी या उन सभी द्वारा निष्पादित किया जा सकता है।

जिस व्यक्ति के विरुद्ध वारंट जारी किया गया है, उसके गिरफ्तार होने पर प्रक्रिया

जिस व्यक्ति के विरुद्ध वारंट जारी किया गया है, उसके गिरफ्तार होने पर प्रक्रिया, संहिता की धारा 80 में वर्णित है। जब न्यायालय के स्थानीय अधिकार क्षेत्र के बाहर वारंट जारी किया जाता है, तो व्यक्ति को मजिस्ट्रेट या जिला अधीक्षक (डिस्ट्रिक्ट सुपरिटेंडेंट) या मूल अधिकार क्षेत्र के आयुक्त (कमीशनर) के समक्ष ले जाया जाता है। हालांकि, अगर गिरफ्तारी की जगह वारंट जारी करने वाली अदालत के 30 किलो मीटर के भीतर है, तो गिरफ्तार व्यक्ति को वारंट जारी करने वाली अदालत में ही ले जाया जाएगा। उदाहरण के लिए, दिल्ली के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सोनीपत में एक व्यक्ति का गिरफ्तारी वारंट जारी करते हैं। हालांकि आरोपी दिल्ली-सोनीपत की सीमा पर रहता है और उसका आवास मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट से 30 किलोमीटर के दायरे में है, तो इस मामले में आरोपी को दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने ले जाया जाएगा न कि सोनीपत के मजिस्ट्रेट के पास।

गिरफ्तारी के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया

गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का अधिकार है। संहिता की धारा 81 में कहा गया है कि यदि अपराध जमानती है और गिरफ्तार व्यक्ति मजिस्ट्रेट, जिला अधीक्षक या आयुक्त की आवश्यकता के अनुसार जमानत देने को तैयार है या वारंट पर प्रतिभूति (सिक्योरिटी) देने का निर्देश दिया गया है और गिरफ्तार व्यक्ति ऐसी प्रतिभूति देने के लिए तैयार है, तो जिला अधीक्षक या आयुक्त ऐसी प्रतिभूति या जमानत लेंगे और न्यायालय को एक बॉन्ड भेजेंगे।

यदि अपराध गैर-जमानती है, तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या सत्र (सेशन) न्यायाधीश न्यायालय के समक्ष प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के आधार पर गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत दे सकते हैं।

संपत्ति की उद्घोषणा और कुर्की

उद्घोषणा का अर्थ है व्यक्ति को स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का अंतिम अवसर देना और यह तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति वारंट लेने से बचता है या फरार हो जाता है। एक व्यक्ति को उसके निवास या अंतिम ज्ञात पते पर एक उद्घोषणा नोटिस दिया जाता है, जिसमें उसे न्यायालय के समक्ष पेश होने के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है और यदि वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो अदालत उसके फरार होने की उद्घोषणा करती है। ऐसे व्यक्ति को देश में किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किया जा सकता है और उसकी संपत्ति को कुर्क और बेचा भी जा सकता है।

फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा

धारा 82 के खंड (1) में कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति फरार हो जाता है या जानबूझकर छुपा रहता है ताकि वारंट निष्पादित नहीं किया जा सके, तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एक लिखित उद्घोषणा जारी कर सकता है, जिसमें उसे इस उद्घोषणा के 30 दिनों के भीतर निर्दिष्ट समय और स्थान पर उपस्थित होने की आवश्यकता होती है।

इस धारा का खंड (2) उद्घोषणा को प्रकाशित करने की प्रक्रिया प्रदान करता है:

  • इसे उस नगर या ग्राम के, जिसमे ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है, किसी स्थान में सार्वजनिक रूप में पढ़ा जाना चाहिए;
  • यह उस घर के किसी भाग पर लगाया जाएगा, जिसमें व्यक्ति सामान्य रूप से निवास करता है;
  • उसकी एक प्रति उस न्यास सदन के किसी सहजदृश्य भाग पर लगाई जाएगी;
  • उद्घोषणा को एक दैनिक समाचार पत्र में भी प्रकाशित किया जा सकता है यदि न्यायालय को लगता है कि यह आवश्यक है।

न्यायालय द्वारा लिखित में दिए गए एक बयान को स्वीकार्य सबूत माना जाता है कि उद्घोषणा की गई थी। बयान में यह शामिल है कि इस धारा की आवश्यकता का अनुपालन किया गया है और जिस तारीख को उद्घोषणा की गई थी।

फरार व्यक्ति की संपत्ति की कुर्की

धारा 83 के तहत, यदि न्यायालय का मानना ​​है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ उद्घोषणा जारी की गई है, अपनी समस्त संपत्ति या उसके किसी भाग को उस न्यायालय की स्थानीय अधिकार क्षेत्र से हटाने वाला है, तो न्यायालय उद्घोषणा जारी करने के साथ ऐसी संपत्ति को कुर्क करने का आदेश दे सकता है।

यदि कुर्क करने का आदेश दी गई संपत्ति एक चल संपत्ति है, तो इस धारा के तहत कुर्की की जाएगी:

  1. जब्ती से;
  2. एक रिसीवर नियुक्त करके;
  3. उद्घोषित व्यक्ति को ऐसी संपत्ति के वितरण को प्रतिबंधित करने वाले लिखित आदेश द्वारा;
  4. उपरोक्त में से किसी या सभी आदेशों द्वारा।

यदि विचाराधीन संपत्ति अचल है और जहां राज्य सरकार को राजस्व (रेवेन्यू) देने वाली भूमि का भुगतान किया जाता है, वहां संपत्ति को जिले के कलेक्टर के माध्यम से कुर्क किया जाता है और अन्य सभी मामलों में कुर्की निम्नलिखित द्वारा की जाएगी:

  1. कब्जा करके;
  2. एक रिसीवर नियुक्त करके;
  3. उद्घोषित व्यक्ति को किराए के भुगतान पर रोक लगाकर;
  4. उपरोक्त में से किसी एक या सभी आदेशों से।

यदि कुर्क की गई संपत्ति खराब होने वाली प्रकृति की है, जिसमें पशुधन (लाइव स्टॉक) शामिल है, तो न्यायालय तत्काल बिक्री का आदेश दे सकता है।

कुर्की के बारे में दावे और आपत्ति

संहिता की धारा 84 के अनुसार, यदि संपत्ति की कुर्की के 6 महीने के भीतर उद्घोषित व्यक्ति को छोड़कर किसी भी व्यक्ति द्वारा कोई आपत्ति की जाती है, यह दावा करते हुए कि कुर्क की गई संपत्ति में उसका हित है, तो न्यायालय को दावे या आपत्ति के बारे में पूछताछ करने की आवश्यकता है।

ऐसी आपत्ति या दावे के लिए वाद उस न्यायालय में किया जा सकता है, जिसने कुर्की जारी की है या उस न्यायालय में जिसने कुर्की की है, यदि न्यायालय भिन्न हो।

कोई भी व्यक्ति जिसका दावा या आपत्ति अस्वीकार्य है, वह ऐसे आदेश की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपील कर सकता है।

कुर्क की हुई संपत्ति को निर्मुक्त (रिलीज) करना, विक्रय (सेल) और वापस करना

संहिता की धारा 85 के अनुसार, यदि उद्घोषित व्यक्ति 30 दिनों की समाप्ति से पहले न्यायालय के समक्ष पेश होता है, तो कुर्क की गई संपत्ति को निर्मुक्त कर दिया जाता है।

यदि उद्घोषित व्यक्ति उपस्थित नहीं होता है, तो कुर्क की गई संपत्ति राज्य सरकार के व्ययनाधीन (डिस्पोजल) पर रहेगी। हालाँकि, सरकार कुर्की की तारीख से 6 महीने की समाप्ति से पहले संपत्ति को तब तक नहीं बेच सकती जब तक कि संपत्ति खराब न हो और संपत्ति को बेचना मालिक के सर्वोत्तम हित में न हो।

यदि दो वर्ष के भीतर, अपनी इच्छा से उद्घोषित व्यक्ति अदालत के सामने आता है और यह साबित करता है कि वह फरार नहीं हुआ था, बल्कि उसके पास उद्घोषणा की कोई सूचना नहीं थी, तो कुर्क की गई संपत्ति को वापस कर दिया जाता है और यदि वह पहले ही बेची जा चुकी है, तो बिक्री की आय उसे दी जाती है।

निष्कर्ष

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, विचारण में आरोपी की उपस्थिति को उचित महत्व देती है और इस प्रकार संहिता का एक पूरा अध्याय आरोपी की उपस्थिति से संबंधित है। न्यायालय समन जारी कर किसी व्यक्ति को निर्धारित फॉर्म में न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए कह सकता है। समन लिखित रूप में किया जाता है और एक डुप्लीकेट प्रति पर हस्ताक्षर करके न्यायालय द्वारा मुहर लगाई जाती है। समन न्यायालय के किसी भी लोक अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा निर्धारित अन्य लोक सेवकों द्वारा तामील किया जा सकता है।

ऐसे मामलों में जहां समन का अनुपालन नहीं किया जाता है या गंभीर अपराध होते हैं, अदालत निर्धारित प्रपत्र में वारंट जारी करती है। समन की तरह वारंट भी लिखित रूप में बनाया जाता है, सील किया जाता है और न्यायालय द्वारा हस्ताक्षरित किया जाता है।

यदि आरोपी फरार होने की कोशिश करता है और वारंट से बचता है, तो न्यायालय एक व्यक्ति को अदालत के सामने पेश होने का अंतिम मौका देते हुए एक उद्घोषणा जारी कर सकता है। यदि न्यायालय आवश्यक समझे, तो उद्घोषित व्यक्ति की संपत्ति को भी कुर्क कर सकता है।

 

सी.आर.पी.सी. के तहत समन मामलों का विचारण

इस लेख में, Rachna Dalal, सी.आर.पी.सी. के तहत समन मामलों के विचारण (ट्रायल) पर चर्चा करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

“समन” एक दस्तावेज है जो एक व्यक्ति को अदालत के सामने पेश होने और उसके खिलाफ की गई शिकायत का जवाब देने का आदेश देता है। मजिस्ट्रेट द्वारा, सी.आर.पी.सी., 1973 की धारा 204(1)(A) के तहत आरोपी को समन जारी किया जाता है। “समन मामले” का अर्थ एक अपराध से संबंधित मामला है, जो वारंट मामला नहीं है। समन मामलों को वारंट मामले की परिभाषा से संदर्भित किया जा सकता है, अर्थात, मृत्युदंड, आजीवन कारावास और दो साल से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध, जिन्हें वारंट मामले कहा जाता है। तो समन मामले वे हैं जिनमें सजा दो साल के कारावास से अधिक नहीं होती है। यह कहा जा सकता है कि समन मामले गंभीर प्रकृति के नहीं होते हैं, इसलिए निष्पक्ष विचारण की आवश्यकताओं को समाप्त किए बिना, इसे शीघ्रता से तय करने की आवश्यकता होती है। सी.आर.पी.सी., 1973 की धारा 251 से 259 में ऐसे मामले से निपटने की प्रक्रिया प्रदान की गई है जो अन्य परीक्षणों की तरह गंभीर/औपचारिक (फॉर्मल) नहीं है (जैसे सत्र (सेशन) विचारण, पुलिस रिपोर्ट पर दर्ज़ किए गए वारंट मामला और पुलिस रिपोर्ट के अलावा दर्ज़ किए गए वारंट मामले)।

वर्तमान लेख में मुख्य जोर समन मामलों की प्रक्रिया पर दिया गया है। समन मामले में प्रक्रिया के सामान्य चरण अन्य विचारण के समान होते हैं, लेकिन यह विचारण त्वरित उपचार के लिए कम औपचारिक होता है।

समन-मामलों में विचारण की प्रक्रिया

अपराध के विवरण का स्पष्टीकरण (एक्सप्लेनेशन)

धारा 251 में प्रावधान है कि आरोप तय करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन जब आरोपी को अदालत में पेश किया जाता है तो धारा अपराध के विवरण के स्पष्टीकरण से दूर नहीं होती है। ऐसा आरोपी को अपने ऊपर लगे आरोपों के लिए संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेने के लिए किया जाता है। विवरण देने में असमर्थ होने की स्थिति में, मुकदमा खराब नहीं होगा और इससे आरोपी के साथ पूर्वाग्रह (प्रेजुडिस) नहीं होगा क्योंकि यह अनियमितता (इरेगलेरिटी) संहिता की धारा 465 के तहत उपचार योग्य है। धारा 251 के तहत अदालतें आरोपी से पूछती हैं कि क्या आरोपी ने अपना दोष स्वीकार किया है, और धारा 252 और 253 का पालन दोषसिद्धि के लिए किया जाना चाहिए, जब दोषी अपना दोष स्वीकर कर लेता है।

दोषियों के द्वारा दोष की स्वीकृति पर दोषसिद्धि

धारा 252 और 253 दोषी के द्वारा दोष की स्वीकृति पर दोषसिद्धि प्रदान करती है। धारा 252 सामान्य रूप से दोषी के द्वारा दोष की स्वीकृति का प्रावधान करती है और धारा 253 छोटे मामलों में दोषी के द्वारा दोष की स्वीकृति का प्रावधान करती है। यदि आरोपी अपना दोष स्वीकार करता है, तो उत्तर कानून के अनुसार सकारात्मक होता है, अदालत आरोपी के सटीक शब्दों में उसकी स्वीकृति दर्ज करती है जिसके आधार पर आरोपी को न्यायालय के विवेक पर दोषी ठहराया जा सकता है। यदि सकारात्मक नहीं है तो अदालत को धारा 254 के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। यदि आरोपी अपना दोष स्वीकार करता है, और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप कोई अपराध नहीं बनते हैं, तो केवल स्वीकृति के आधार पर ही आरोपी की दोषसिद्धि नहीं होगी। चूंकि मजिस्ट्रेट के पास उसकी स्वीकृति पर उसे दोषी ठहराने या न ठहराने का विवेक है, तो अगर स्वीकृति पर आरोपी को दोषी ठहराया जाता है तो मजिस्ट्रेट धारा 360 के अनुसार आगे बढ़ेगे, अन्यथा आरोपी को सजा के सवाल पर सुनेंगे और उसे कानून के अनुसार सजा दी जाएगी। यदि दोषी की स्वीकृति को स्वीकार नहीं किया जाता है तो मजिस्ट्रेट धारा 254 के अनुसार कार्यवाही करेंगे।

अगर आरोपी को स्वीकृति पर दोषी नहीं ठहराया जाता है तो उसके लिए प्रक्रिया

धारा 254 में अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) और बचाव, दोनों मामलों के बारे में प्रावधान है यदि आरोपी को धारा 252 और 253 के तहत स्वीकृति पर दोषी नहीं ठहराया जाता है।

अभियोजन मामला

मजिस्ट्रेट आरोपी की बात सुनेंगे और सारे सबूत लेंगे। विचारण में अभियोजन पक्ष को उन तथ्यों और परिस्थितियों को रखकर अपना मामला खोलने का मौका दिया जाएगा जो मामले का गठन करते हैं और उन सबूतों को प्रकट करते हैं जिन पर उसने भरोसा किया था की वह मामले को साबित करने के लिए आवश्यक होगे। अभियोजन पक्ष के आवेदन पर मजिस्ट्रेट किसी भी गवाह को उपस्थित होने और कोई दस्तावेज या चीज पेश करने के लिए समन जारी करते है। मजिस्ट्रेट धारा 274 के अनुसार साक्ष्य का ज्ञापन (मेमोरेंडम) तैयार करेंगे। समन मामलों में अन्य विचारण की तरह ही मजिस्ट्रेट धारा 279 अर्थात आरोपी को साक्ष्य की व्याख्या और धारा 280 अर्थात गवाहों के आचरण की रिकॉर्डिंग का पालन करेंगे।

बचाव पक्ष की सुनवाई  :- (बचाव मामला)

धारा 254 के तहत अभियोजन के साक्ष्य और धारा 313 के तहत बचाव पक्ष की जांच के बाद, अदालत धारा 254 (1) के तहत बचाव पक्ष के विचारण के साथ आगे बढ़ेगी। बचाव पक्ष के विचारण में आरोपी से अभियोजन पक्ष के साक्ष्य के विरुद्ध साबित करने के लिए कहा जाएगा। किसी भी मामले में आरोपी सुनवाई में विफलता आपराधिक मुकदमे में मौलिक त्रुटि (एरर) होगी और इसे धारा 465 के तहत ठीक नहीं किया जा सकता है। आरोपी द्वारा पेश किए गए साक्ष्य उसी तरह दर्ज किए जाएंगे जैसे धारा 274, 279, 280 के तहत अभियोजन के मामले में दर्ज किए गए थे। बचाव पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद, उसे धारा 314 के तहत अपने तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाएगी।

दोषमुक्ति (एक्वीटल) या दोषसिद्धि

धारा 254 के तहत साक्ष्य दर्ज करने के बाद मजिस्ट्रेट आरोपी को दोषी न पाए जाने पर बरी कर देंगे। यदि आरोपी दोषी है तो मजिस्ट्रेट धारा 360 या 325 के अनुसार कार्यवाही करेंगे अन्यथा उसे कानून के अनुसार सजा देंगे।

शिकायतकर्ता का उपस्थित न होना या उसकी मृत्यु होना

धारा 256 के अनुसार आरोपी की उपस्थिति के लिए निर्धारित तिथि पर, शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति अदालत को आरोपी को बरी करने का अधिकार देगी जब तक कि अदालत के पास मामले को किसी और दिन के लिए स्थगित करने का कारण न हो। शिकायतकर्ता की मृत्यु के मामले में भी धारा 256(1) लागू होती है। यदि मृत शिकायतकर्ता का प्रतिनिधि (रिप्रेजेंटेटिव) 15 दिनों तक उपस्थित नहीं होता है, जहां प्रतिवादी पेश हुआ, तो प्रतिवादी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किया जा सकता है। 

समन मामलों में कार्यवाही रोक देना

शिकायत के अलावा अन्य तरीके से दर्ज मामलों को समन, धारा 258 किसी भी स्तर पर प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को अधिकृत (ऑथराइज) करती है कि वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी के साथ कार्यवाही को रोक सके। इसलिए यदि वह ‘सबूत को रिकॉर्ड करने के बाद’ कार्यवाही को रोक देते है, तो यह बरी होने के फैसले की घोषणा होगी, और यदि वह मामले में ‘सबूत को रिकॉर्ड करने से पहले’ रोक देते है, तो यह माना जाएगा की मामले को रोक दिया गया है।

यह विवादास्पद है कि शिकायत पर दर्ज समन मामले में मजिस्ट्रेट के पास मामले को रोकने की कोई शक्ति नहीं है, भले ही उनके पास आरोपी के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर मजिस्ट्रेट ऐसा करते है तो वह अपने ही आदेश को वापस ले लेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रक्रिया का मुद्दा मजिस्ट्रेट का अंतरिम (इंटरिम) आदेश होगा, फैसला नहीं, इसलिए इसे वापस लिया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में मामले को रोकने के लिए मजिस्ट्रेट को सशक्त बनाने के लिए किसी प्रावधान की आवश्यकता नहीं है। शिकायत पर दर्ज़ किए गए समन मामलों में मजिस्ट्रेट प्रक्रिया के मुद्दे के आदेश को निर्वहन, समीक्षा (रिव्यू) और वापस नहीं ले सकते है।  समन मामलों में निचली अदालत के मजिस्ट्रेट को कानून में इस तरह के प्रावधान के अभाव में कार्यवाही छोड़ने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में एक व्यक्ति सी.आर.पी.सी. की धारा 482 के तहत उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। समन मामलों में आरोप मुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है, शिकायत पर आरोपित को या तो दोषी ठहराया जाएगा या बरी किया जाएगा।

विश्लेषण (एनालिसिस)

समन मामलों की विचारण अन्य विचारण प्रक्रिया की तुलना में कम औपचारिक है, क्योंकि यह केवल त्वरित उपचार के लिए है। इसलिए धारा 258, जो पर्याप्त आधार के अभाव में भी मजिस्ट्रेट को मामले को छोड़ने का अधिकार नहीं देती है, वह किसी भी तरह से आरोपी के लिए पूर्वाग्रह है। न्यायालय की राय, के.एम. मैथ्यू के मामले में यह थी कि यदि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप किसी भी अपराध को साबित नहीं करते है, तो मजिस्ट्रेट के पास मामले को छोड़ने की निहित शक्ति है। विभिन्न न्यायिक घोषणाओं में, इसे असहमति जताई है। अरविंद केजरीवाल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कानून विशेष रूप से धारा 258 के तहत मामले को छोड़ने के संबंध में मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं देता है और धारा 482 के तहत मामले से निपटने के लिए, मामले को उच्च न्यायालय में पास कर दिया जाता है। लेकिन इस बिंदु पर विचार करने की आवश्यकता है कि उच्च न्यायालय के द्वारा भी फिर से मामले को देखने की जरूरत होती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या आरोपी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार है, यह सब समन मामले के मुख्य उद्देश्य, यानी त्वरित विचारण को बाधित करता है। हालांकि इस मुद्दे को विभिन्न मामलों में शीर्ष अदालत के समक्ष संबोधित किया गया था, लेकिन निष्पक्ष विचारण और ऐसी परिस्थितियों में आरोपी के अधिकार को खतरे में डालने के लिए इसकी फिर से जांच की जानी चाहिए।

संदर्भ

  • Section 2(w) of Criminal procedure code, 1973
  • Section 2(x) of Criminal procedure Code, 1973
  • Manbodh Biswal v. Samaru Pradhan 1980 Cri LJ 1023(ori); Nayan Ram v. Prasanna Kumar, 1953 cri LJ 1574;
  • S. Rama Krishna v. S Rami Reddy (2008) 5 SCC 535
  • K. M. Matthew v. State of Kerala (1992) 1 SCC 217
  • Subramanium Sethuraman v. State of Maharashtra & Anr, (2004) 13 SCC 324
  • Arvind Kejriwal and others v. Amit Sibal & Anr (2014) 1 High Court Cases (Del) 719
  • R.K. Aggarwal v. Brig Madan Lal Nassa & Anr 2016 SCC Online Del 3720

 

आच्छादन का सिद्धांत: एक व्यापक विश्लेषण

यह लेख नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ओडिशा की कानून की छात्रा Ansruta Debnath ने लिखा है। यह लेख आच्छादन के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ एक्लिप्स) के बारे में बात करता है जो एक कानूनी सिद्धांत है जिसका उपयोग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पूर्व-संवैधानिक कानूनों को मान्य करने के लिए किया गया है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय

भारतीय कानूनों के तहत आच्छादन का सिद्धांत एक कानूनी सिद्धांत है जिसमें कहा गया है कि कोई भी मौजूदा कानून जो मौलिक अधिकारों के साथ असंगत है, वह पूरी तरह से अमान्य नहीं होता है। इसे वैध बनाया जा सकता है यदि भारत के संविधान, 1950 में उपयुक्त संशोधन (अमेंडमेंट) किए जाते हैं, जिससे उस कानून का तालमेल मौलिक अधिकारों के साथ बिठाया जा सके। यह सिद्धांत इस आधार पर टिका है कि मौलिक अधिकार संभावित हैं। इस प्रकार, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कोई भी पूर्व-संवैधानिक कानून शून्य नहीं होगा क्योंकि उस कानून के निर्माण के समय, भारत के संविधान, 1950 के मौलिक अधिकार अस्तित्व में नहीं थे। हालाँकि, सवाल उठे हैं कि क्या यह सिद्धांत संवैधानिक कानूनों के बाद भी लागू होता है, जो इस लेख में संबोधित किया गया है। 

आच्छादन का सिद्धांत और भारतीय संविधान

यह सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 से संबंधित है जो मौलिक अधिकारों के साथ असंगत या अपमानजनक कानूनों के बारे में बात करता है। अनुच्छेद 13(1) में कहा गया है कि भारत के क्षेत्र के भीतर संविधान के प्रारंभ से पहले, लागू कोई भी मौजूदा कानून जो भारतीय संविधान के भाग III में मौजूद मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाता है या असंगत (इनकंसिस्टेंट) है, तो वह ऐसी असंगति की सीमा तक शून्य हो जाता है।  इसके अलावा, अनुच्छेद 13(2) में कहा गया है कि कोई भी नया कानून मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की सीमा तक, इस तरह के उल्लंघन की सीमा तक शून्य हो जाता है। ये प्रावधान सीधे तौर पर पृथक्करणीयता (सेवरेबिलिटी) के सिद्धांत के अनुरूप हैं। यह सिद्धांत बताता है कि किसी क़ानून का कोई भी प्रावधान जो संविधान के विरुद्ध है, उसे उस अधिनियम से अलग कर दिया जाएगा और केवल उस सीमा तक ही शून्य माना जाएगा। इस प्रकार, न्यायालयें पूरे अधिनियम के बजाय उस प्रावधान को शून्य घोषित कर सकती हैं। हालांकि, अनुच्छेद 13(4) कहता है कि अनुच्छेद 13 संवैधानिक संशोधनों पर लागू नहीं होता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई संवैधानिक संशोधन कानून पास हो जाता है जो कुछ मौलिक अधिकारों को छीन लेता है या उनका उल्लंघन करता है, तो वे कानून, हालांकि जो अधिकारों से असंगत हैं, वह शून्य नहीं हैं।

आच्छादन के सिद्धांत की उत्पत्ति और विकास

भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, कई मौजूदा कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती थी। इसी तरह, न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) ने आच्छादन के सिद्धांत को स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। जबकि भीकाजी नारायण धाकरा और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955) वह मामला था जहां इस कानूनी सिद्धांत को औपचारिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा घोषित किया गया था, इस सिद्धांत का इस्तेमाल कुछ अन्य पिछले मामलों में मुख्य रूप में किया गया था।

पहला मामला जहां इस सिद्धांत की उत्पत्ति के निशान पाए जा सकते हैं वह है केशव मदवन मेनन बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे (1951)। इस मामले में, अपीलकर्ता के खिलाफ 1949 में प्रकाशित एक पैम्फलेट के संबंध में भारतीय प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम, 1931 के तहत खुद के खिलाफ मामला था। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ ऐसा मामला नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह पैम्फलेट में दी गई सही वाक् और अभिव्यक्ति (स्पीच एंड एक्सप्रेशन) की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ संरेखित (अलाइन्ड) है। न्यायालय ने कहा कि क्योंकि जिस समय पैम्फलेट प्रकाशित हुआ था, उस समय भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार मौजूद नहीं थे। इस प्रकार, अपीलकर्ता उनके पास होने का दावा नहीं कर सकता था। इस प्रकार इस मामले ने स्थापित किया कि मौलिक अधिकारों का पूर्वव्यापी प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) नहीं था, बल्कि केवल भावी अनुप्रयोग (प्रोस्पेक्टिव एप्लीकेशन) था। अनुच्छेद 13(1) के मामले में, न्यायालय ने माना कि यह संभावित था और पूर्वव्यापी नहीं था, खासकर जब से कोई क़ानून संभावित है, जब तक कि विशेष रूप से अन्यथा न कहा गया हो। चूँकि इस अनुच्छेद की भाषा किसी भी प्रकार के पूर्वव्यापी आवेदन का संकेत नहीं देती है, इसलिए इसे आच्छादन नहीं किया जा सकता है। इस मत को पन्नाला बिनाराज बनाम भारत संघ (1957) के मामले में दोहराया गया था।

अगला महत्वपूर्ण मामला, जिसमें अनुच्छेद 13(1) और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पूर्व-संवैधानिक कानूनों के बीच के संबंध के बारे में बात की गई थी, वह बेहराम खुर्शीद पेसिकाका बनाम बॉम्बे राज्य (1955) का मामला था। इसमें, अपीलकर्ता पर मुंबई दारुबंदी अधिनियम, 1949 की धारा 66 (B) के तहत आरोप लगाया गया था। इस धारा में शराब के प्रभाव में ड्राइविंग के बारे में बताया गया था। अपीलकर्ता ने बॉम्बे राज्य और एनआर बनाम एफएन बलसारा (1951) के मामले का इस्तेमाल किया, जहां अधिनियम की धारा 13 (B) को मादक औषधीय और शौचालय की तैयारी के उपयोग के लिए इसके आवेदन की सीमा तक शून्य घोषित किया गया था क्योंकि वही अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था। बहिर्वेशन (एक्सट्रपलेशन) द्वारा, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 66 (B) को भी शून्य माना जाना चाहिए क्योंकि उसमे मादक औषधीय और शौचालय में इस्तेमाल की जाने वाली औषधि का संबंध था। 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने शुरू में माना कि बलसारा मामले ने धारा को निरस्त (रिपील) या संशोधित नहीं किया। लेकिन एक बड़ी संवैधानिक पीठ के संदर्भ में, बहुमत की राय ने माना कि नागरिकों के अधिकारों और दायित्वों के निर्धारण के लिए धारा को क़ानून से “काल्पनिक रूप से मिटा दिया गया” था। आगे यह माना गया कि बलसारा में फैसला मादक औषधीय और शौचालय में इस्तेमाल की जाने वाली औषधि के संबंध में धारा 66 (B) के तहत एक आरोप के लिए एक अच्छा बचाव था। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना था कि आरोपी मादक औषधि बनाने के अलावा किसी भी प्रतिबंधित शराब के प्रभाव में गाड़ी चला रहा था और आरोपी को इसी के विपरीत साबित करना था।

भीकाजी नारायण धाकरा बनाम मध्य प्रदेश राज्य

सबसे महत्वपूर्ण मामला जो आच्छादन के सिद्धांत को स्पष्ट और प्रतिपादित (प्रोपाउंड) करने के लिए जिम्मेदार था, वह भीकाजी नारायण धाकरा और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955) का मामला था। इस मामले में, याचिकाकर्ताओं ने सीपी और बरार मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 1947 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी, जिसने मोटर वाहन अधिनियम, 1939 में संशोधन किया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान के पारित होने से संशोधन अधिनियम शून्य हो गया क्योंकि यह अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन करता है या किसी पेशे का अभ्यास (प्रैक्टिस) करने या कोई व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। संशोधन ने प्रांतीय सरकार को राज्य में मोटर परिवहन (ट्रांसपोर्ट) व्यवसाय पर एकाधिकार (मोनोपॉली) स्थापित करने की अनुमति दी थी, जिसे याचिकाकर्ताओं ने 1950 के नवनिर्मित भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था।

उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि यद्यपि अधिनियम प्रारंभ में भारतीय संविधान का उल्लंघन था, संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 और संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 के पास होने के बाद, अनुच्छेद 19(6) के अतिरिक्त के माध्यम से विसंगतियों (इनकंसिस्टेंसी) को हटा दिया गया था और सीपी और बरार मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम फिर से लागू किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से कहा कि यह अधिनियम अनुच्छेद 13(1) के अनुसार शून्य हो गया था और जब तक कि उसे दोबारा अधिनियमित नहीं किया गया तब तक वह अस्तित्व में नहीं है ऐसा माना गया था।

हालांकि याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज कर दिया गया था और प्रतिवादियों के तर्कों को स्वीकार कर लिया गया था। भीकाजी मामले के फैसले से कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-

  • शुरुआत के लिए, निर्णय केशव मामले पर निर्भर था। इसके अलावा, यह कहा गया है कि अनुच्छेद 13 में “शून्य” शब्द का अर्थ मौलिक अधिकारों के साथ असंगति की सीमा तक ही शून्य है।
  • इसका मतलब यह हुआ कि अधिनियम का पूरा संचालन (ऑपरेशन) बंद नहीं हुआ था। अनुच्छेद 13 (1) को एक मौलिक अधिकार के साथ असंगत, असंगतता की सीमा तक निष्क्रिय (इनैक्टिव) अधिनियम प्रस्तुत करना था। यह मौलिक अधिकार से ढका हुआ है और निष्क्रिय रहता है लेकिन मृत नहीं होता है।
  • यह आच्छादन का सिद्धांत है। मौलिक अधिकार के साथ असंगति, अधिनियम को तब तक आच्छादन करती है जब तक असंगति है, इसलिए आच्छादन को हटाया नहीं जाता है।
  • संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 और अनुच्छेद 19 के खंड (क्लॉज) 6 में परिवर्तन के साथ, आक्षेपित (ऑब्जेक्टेड) अधिनियम के प्रावधान अब असंगत नहीं थे और इसका परिणाम यह हुआ कि इस तरह के संशोधन की तारीख से अधिनियम एक बार फिर से लागू होना शुरू हो गया था। 

भारतीय दंड संहिता में आच्छादन के सिद्धांत को लागू करना

पी. राठीराम बनाम भारत संघ (1994) के मामले में, भारतीय दंड संहिता की धारा 309, जो आत्महत्या करने के प्रयासों को दंडित करती है, उसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। यह फैसला सुनाया गया था कि धारा 309 अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है जो बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ न बोलने का अधिकार भी देता है। इसके अलावा, यह कहा गया था कि यह धारा अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है जो कि बहिर्वेशन (एक्स्ट्रापोलेशन) द्वारा भी नहीं जीने का अधिकार देती है।

इसे जियान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) में एक अमान्य खोज (इनवैलिड फाइंडिंग) माना गया था। इस प्रकार, संक्षेप में, राठीराम मामले ने मौलिक अधिकारों के साथ धारा 309 को आच्छादन कर लिया था जिसे जियान निर्णय द्वारा हटा दिया गया था।

संवैधानिक कानूनों के बाद आच्छादन के सिद्धांत का अनुप्रयोग

जबकि अनुच्छेद 13(1) पूर्व-संवैधानिक कानूनों पर लागू होता है, अनुच्छेद 13(2) संवैधानिक कानूनों के बाद लागू होता है। इन दो खंडों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) में तैयार किया गया था। यहां, यह कहा गया था कि भारतीय संविधान के भाग III द्वारा दिए गए अधिकारों के साथ विसंगतियों की सीमा को छोड़कर भाग lll एक पूर्व-संवैधानिक अस्तित्व में है, लेकिन भाग III के उल्लंघन में कोई भी पूर्व-संवैधानिक कानून नहीं बनाया जा सकता है और यदि बनाया गया है तो वह शुरुआत से शून्य है। इस प्रकार, अनुच्छेद 13 को पढ़ने से, आच्छादन का सिद्धांत संवैधानिक कानूनों के बाद लागू नहीं हो सकता है। सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1954) में, यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित किया गया था कि जो अधिनियम भारतीय संविधान के प्रारंभ के बाद अधिनियमित हुए है और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन करते हुए खंड 6 द्वारा संरक्षित नहीं किए गए है ऐसे किसी भी कानून को वैध नहीं बनाया जा सकता है।

इस संबंध में एक अन्य महत्वपूर्ण मामला महेंद्र लाई जैनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) है। इस मामले में, यह आधिकारिक रूप से स्थापित किया गया था कि आच्छादन का सिद्धांत संवैधानिक कानूनों के बाद लागू नहीं होता है और बाद में संवैधानिक संशोधनों द्वारा स्वचालित (ऑटोमैटिक) रूप से पुनर्जीवित (रिवाइव) नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, यदि किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, जैसा कि अनुच्छेद 13(2) में दिया गया है, तो आक्षेपित अधिनियम प्रारंभ से ही शून्य हो जाएगा। उस क़ानून को लागू करने के लिए, संविधान में संशोधन करना होगा और पहले वाले को फिर से अधिनियमित करना होगा। इस सिद्धांत को के के पूनाचा बनाम कर्नाटक राज्य (2010) में दोहराया गया था। इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी अधिनियम को इस आधार पर शून्य घोषित किया जा सकता है कि वह राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित नहीं था और संविधान के अनुच्छेद 31 (3) की आवश्यकता के अनुसार उसकी सहमति प्राप्त नहीं हुई थी। यह माना गया कि एक अधिनियम सिर्फ इसलिए रद्द नहीं हो जाता क्योंकि उसे सहमति नहीं मिली थी। जब तक अनियमितता दूर नहीं हुई तब तक यह आच्छादन लगा रहता है। वर्तमान परिदृश्य (सिनेरियो) में, अनुच्छेद 31 को निरस्त कर दिया गया और इस प्रकार, अधिनियम फिर से पुनर्जीवित हो गया था।

इस सिद्धांत का उपयोग अन्य परिस्थितियों में भी किया गया है। उदाहरण के लिए, के पी मनु, मालाबार सीमेंट्स लिमिटेड बनाम अध्यक्ष, स्क्रूटनी कमेटी (2015) के मामले में, न्यायालय ने कहा कि जब कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो मूल जाति आच्छादन के अधीन रहती है और जैसे ही उसके जीवनकाल में व्यक्ति मूल धर्म में वापस आ जाता है, आच्छादन गायब हो जाता है और जाति स्वतः पुनर्जीवित हो जाती है। इसके अलावा, यूओआई और अन्य बनाम दुली चंद (2010) के मामले में, न्यायालय ने माना कि रोके जाने पर शिक्षा के आदेश को आच्छादन किया जाएगा और वह मृत नहीं होगा। जब उसी रुकावट को निकाल दिया जाता है, तो उसी क्षण से, उसकी उर्वरित शिक्षा फिर से शुरू हो जाएगी।

निष्कर्ष

इस प्रकार, आच्छादन के सिद्धांत का अनुप्रयोग बिल्कुल स्पष्ट है। हालांकि यह संवैधानिक संशोधनों की अनुमति देकर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पूर्व-संवैधानिक कानूनों को मान्य कर सकता है, वह संवैधानिक कानूनों के बाद लागू नहीं होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्व और बाद के संवैधानिक कानूनों के मुद्दे, अनुच्छेद 13 के तहत अलग-अलग हैं। पूर्व-संवैधानिक कानूनों के संबंध में, यह सिद्धांत असंवैधानिक कानूनों को निष्क्रिय बनाकर असाधारण परिस्थितियों में उनको मिटाए जाने से बचाने की अनुमति देता है जब तक कि उन्हें भविष्य में पुनर्जीवित नहीं किया जाता है।

संदर्भ

  • आच्छादन का सिद्धांत – CuriousForLaw

 

सी.आर.पी.सी. के तहत पीड़ित की चिकित्सा जांच की प्रक्रिया

यह लेख Abhinav Anand द्वारा लिखा गया है, जो वर्तमान में डीएसएनएलयू, विशाखापत्तनम से बी.ए एलएलबी (ऑनर्स) कर रहे हैं। इस लेख में, उन्होंने सी.आर.पी.सी. के तहत पीड़ित की चिकित्सा जांच के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में बताया है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

आपराधिक न्याय प्रणाली में विभिन्न तकनीकों के आने के साथ, स्थिति की मांग होने पर चिकित्सा जांच/अन्वेषण (इन्वेस्टिगेशन) का एक जरूरी हिस्सा बन गई है। आरोपी या पीड़ित की जांच के बाद एकत्र किए गए साक्ष्य के महत्व को देखते हुए चिकित्सा जांच की अवधारणा पूरी दुनिया में विकसित हुई है।

भारत में अपराध में शामिल पक्षों की चिकित्सा जांच को पीड़ित के अनुकूल (फ्रेंडली) बनाया गया है। प्रक्रिया में शामिल संबंधित अधिकारियों को अनिवार्य रूप से कानून के शासन का पालन करने का निर्देश दिया जाता है। पीड़ितों की निजता का अधिकार सभी मामलों में सुरक्षित है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में नागरिक की चिकित्सा जांच करते समय उसके मूल मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता को स्पष्ट किया है।

चिकित्सा जांच की आवश्यकता

पीड़िता के साथ हुई घटना के बारे में सही तथ्य जानने के लिए चिकित्सा जांच की जाती है। यह पुलिस अधिकारियों को पर्याप्त सबूत प्रदान करता है जो उन्हें जांच की प्रक्रिया में तेजी लाने में मदद करता है। चिकित्सा जांच की मदद से तथ्यों की पुष्टि की जाती है और इससे किसी निष्कर्ष पर शीघ्रता से पहुँचने में सहायता मिलती है।

इसने उन देशों में जांच की गुणवत्ता में सुधार किया है जहां प्रक्रिया में शामिल संबंधित व्यक्ति की योग्यता ठीक है। यह पुष्टि (कॉरोबोरेशन) की ओर जाता है जिसके परिणामस्वरूप मामलों का त्वरित निपटान होता है।

चिकित्सा जांच के लिए प्रक्रिया

सी.आर.पी.सी. की धारा 53 में आरोपी की चिकित्सा जांच की प्रक्रिया का प्रावधान है।

  • जब भी आरोपी कोई कार्य करता है या उस पर कोई कार्य करने का आरोप लगाया जाता है, तो पुलिस के पास यह मानने के लिए उचित आधार होते हैं कि आरोपी व्यक्ति की चिकित्सा जांच से पुलिस को उसके द्वारा अपराध किए जाने का सबूत प्राप्त करने में मदद मिल सकती है, तब वे पंजीकृत (रजिस्टर्ड) चिकित्सक से उस व्यक्ति की जांच के लिए अनुरोध कर सकते हैं। चिकित्सा व्यवसायी को निर्देश देने वाला पुलिस अधिकारी सब-इंस्पेक्टर होना चाहिए या सब-इंस्पेक्टर के पद से ऊपर का होना चाहिए।
  • जब आरोपी एक महिला हो तो महिला चिकित्सक की देखरेख में उसकी जांच की जा सकती है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 53 A में बलात्कार के मामलों के आरोपियों की जांच की प्रक्रिया का प्रावधान है:

  • जब भी किसी व्यक्ति पर बलात्कार करने या बलात्कार करने के प्रयास करने का आरोप लगाया जाता है और इस विश्वास के लिए उचित आधार होते है कि आरोपी की जांच अपराध करने के लिए एक सबूत दे सकती है, तो सरकारी अस्पताल के पंजीकृत चिकित्सक या कोई स्थानीय प्राधिकारी (अथॉरिटी), और यदि वह उपस्थित नहीं है तो अपराध घटित होने के स्थान से 16 किलोमीटर के दायरे के भीतर, पुलिस अधिकारी, जो सब-इंस्पेक्टर की रैंक से नीचे का नहीं है, के अनुरोध पर किसी भी पंजीकृत चिकित्सक के साथ जांच की जा सकती है और ऐसा करना वैध होगा।
  • पंजीकृत चिकित्सक बिना किसी देरी के जांच आयोजित करेगा और निम्नलिखित जानकारी प्रदान करके ऐसे व्यक्ति की रिपोर्ट तैयार करेगा:
  1. आरोपी का नाम और उस व्यक्ति का नाम जिसके द्वारा उसे लाया गया था,
  2. आरोपी की उम्र,
  3. चोट के निशान,
  4. डी.एन.ए. प्रोफाइलिंग के लिए व्यक्ति से ली गई सामग्री का विवरण,
  5. विशेष रूप से कोई अन्य जानकारी।
  • रिपोर्ट में प्रत्येक निष्कर्ष पर पहुंचने का कारण स्पष्ट रूप से बताया जाएगा।
  • रिपोर्ट में शुरू होने और पूरा होने की तारीख का उल्लेख किया जाना चाहिए।
  • पंजीकृत चिकित्सक बिना किसी देरी के पुलिस अधिकारी को रिपोर्ट भेजेगा और पुलिस अधिकारी सी.आर.पी.सी. की धारा 173 के तहत मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजेगा।

एक बलात्कार पीड़िता की चिकित्सा जांच की प्रक्रिया

सी.आर.पी.सी. की धारा 164 में बलात्कार पीड़ितों की जांच की प्रक्रिया का प्रावधान है:

  1. बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के अपराध की जांच के दौरान, पीड़ित को सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के पंजीकृत चिकित्सक के साथ चिकित्सकीय जांच करने का प्रस्ताव दिया जाता है, यदि वह मौजूद नहीं है, तो किसी भी पंजीकृत चिकित्सक की सहमति से महिला या उसकी ओर से किसी सक्षम व्यक्ति की सहमति से जांच की जा सकती है। अपराध की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर महिला को चिकित्सक के पास जांच के लिए भेजा जाना चाहिए।
  2. पंजीकृत चिकित्सक को निम्नलिखित जानकारी के साथ बिना किसी देरी के रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए:
  1. पीड़िता और उसे लाने वाले व्यक्ति का नाम और पता,
  2. पीड़िता की उम्र, 
  3. डी.एन.ए. प्रोफाइलिंग के लिए व्यक्ति से ली गई सामग्री का विवरण,
  4. महिला की सामान्य मानसिक स्थिति,
  5. विशेष रूप से विस्तार से कोई अन्य सामग्री,
  1. रिपोर्ट में प्रत्येक निष्कर्ष पर पहुंचने का तर्क सटीक रूप से प्रदान किया जाना चाहिए,
  2. रिपोर्ट में विशेष रूप से महिला या उसकी ओर से सक्षम व्यक्ति की सहमति का उल्लेख होना चाहिए।
  3. रिपोर्ट में जांच के सही समय और शुरू होने का उल्लेख होना चाहिए।
  4. पंजीकृत चिकित्सक को तुरंत जांच की रिपोर्ट, अधिकारी को भेजनी चाहिए और जांच अधिकारी को धारा 173 के तहत तुरंत इसे मजिस्ट्रेट को भेजना चाहिए।
  5. इस धारा में किसी भी बात को महिला और उसकी ओर से किसी सक्षम व्यक्ति की सहमति के बिना वैध बनाने के रूप में नहीं माना जाएगा।

पॉक्सो अधिनियम की धारा 27 (2), चिकित्सा जांच का प्रावधान करती है। एक बच्ची के मामले में, एक महिला डॉक्टर के द्वारा उसकी चिकित्सा जांच की जानी चाहिए।

रिपोर्ट में विवरण

चिकित्सा जांच रिपोर्ट में निम्नलिखित बातें शामिल होंगी:

  • पीड़िता का नाम और पता।
  • पीड़िता की उम्र।
  • डी.एन.ए. प्रोफाइलिंग करने वाले व्यक्ति से ली गई सामग्री का विवरण।
  • पीड़ित की सामान्य मानसिक स्थिति।
  • रिपोर्ट में पीड़िता या उसकी ओर से सक्षम व्यक्ति की सहमति भी शामिल होगी।
  • रिपोर्ट में निष्कर्ष पर पहुंचने के तर्क का भी ठीक-ठीक उल्लेख किया जाएगा।

पीड़िता की सहमति

यौन हिंसा की शिकार किसी भी महिला का चिकित्सा परीक्षण तभी किया जाता है जब वह महिला सहमति देती है। धारा 164A (7) अदालत और पुलिस को पीड़िता की सहमति के बिना पीड़िता की चिकित्सा जांच करने से रोकती है। पीड़िता या उसकी ओर से सहमति देने के लिए सक्षम व्यक्ति द्वारा सहमति दी जा सकती है। सहमति प्राप्त करते समय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जाना चाहिए:

  • यदि पीड़िता सहमति देने की स्थिति में नहीं है तो पीड़ित के माता-पिता सहमति दे सकते हैं।
  • अगर पीड़िता 12 साल से कम उम्र की बच्ची है और उसकी ओर से सहमति देने वाला कोई नहीं है, तो अस्पताल के अधिकारियों के पैनल के वरिष्ठ डॉक्टर सहमति दे सकते हैं। ऐसे में बच्ची के हित में निर्णय लिया जाएगा।
  • आई.पी.सी. की धारा 89 और 90 के प्रावधान के अनुसार, यदि पीड़ित की आयु 12 वर्ष से अधिक है तो वह चिकित्सकीय जांच के लिए सहमति दे सकती है।
  • आई.पी.सी. की धारा 92 के अनुसार, एक डॉक्टर, रोगी की सहमति के बिना उसकी जीवन रक्षा प्रक्रिया का संचालन कर सकता है।
  • यदि बच्चे के माता-पिता उसके कल्याण के खिलाफ हैं तो बाल कल्याण समिति को सूचित किया जाना चाहिए क्योंकि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी इस समिति की है।
  • मानसिक रूप से विकलांग किसी भी व्यक्ति की चिकित्सा जांच कराने के लिए किसी भी व्यक्ति की सहमति ली जा सकती है जो उसके सर्वोत्तम हित में कार्य करेगा।
  1. क्षेत्राधिकार (ज्यूरिसडिकशन) न्यायालय,
  2. माता-पिता या स्थानीय अभिभावक (गार्डियन),
  3. अस्पताल के डॉक्टर,
  4. बच्चे के मामले में बाल कल्याण समिति।
  • सुनने और बोलने में अक्षम पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सा जांच करने के लिए, दुभाषिया (इंटरप्रेटर) का उपयोग करके सूचित सहमति प्राप्त की जा सकती है।
  • सहमति फॉर्म पर पीड़ित, गवाह और जांच करने वाले डॉक्टर के हस्ताक्षर होने चाहिए।

ऐतिहासिक निर्णय

देवमन शामजी पाटिल बनाम स्टेट

इस मामले में याचिकाकर्ता आरोपी था। मामले के तथ्य यह थे कि एक दिन पुलिस अधिकारी को सूचना मिली कि एक व्यक्ति शराब के नशे में सार्वजनिक सड़क पर बदतमीजी कर रहा था। इसकी सूचना के आधार पर संबंधित पुलिस अधिकारी ने 5 से 6 सिपाहियों की टीम बनाकर मौके पर पहुंच कर पाया कि वह व्यक्ति शराब के नशे में था और उन्होंने उसे पास के डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया, ताकि उसकी चिकित्सकीय जांच की जा सके।

इस बीच जब पुलिस अधिकारियों ने उसे डॉक्टर के पास ले जाने की कोशिश की तो उसने मना कर दिया और उसके और एक पुलिस कांस्टेबल के बीच हाथापाई भी हुई, जिसे उसने हाथापाई के दौरान घूंसा मारा था। आरोपी को चिकित्सा जांच के लिए डिस्पेंसरी ले जाया जा रहा था, बीच में किसी तरह से वह मौके से फरार हो गया।

कुछ दिनों के बाद उसने अपने कार्य की गंभीरता को देखते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर दिया। लोक सेवक को अपने कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने के लिए उसे आई.पी.सी. की धारा 353 के तहत दोषी ठहराया गया था।

दोषसिद्धि एक अपील में बदल गई और अदालत ने आई.पी.सी. की धारा 99(1) की तकनीकी व्याख्या पर भरोसा किया, जिसमें आरोपी को निजी प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। आरोपी को चिकित्सा डिस्पेंसरी ले जाने का आदेश कांस्टेबल ने दिया था, जिसे ऐसा आदेश जारी करने की अनुमति नहीं है।

अदालत ने माना कि आरोपी आई.पी.सी. की धारा 352 और 354 के तहत दोषी नहीं है और निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।

राम स्वरूप पाठक बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश 

इस मामले में अभियोजन पक्ष आठवीं कक्षा का एक छात्र था। अपीलकर्ता अंग्रेजी का शिक्षक था। घर में अभिभावक के न होने पर अपीलकर्ता पीड़िता के घर आया और उससे दूध के लिए पैसे लेने को कहा। बाद में, उसे एक सुनसान जगह पर ले जाया गया जो एक किराए का कमरा था और शिक्षक द्वारा उसके साथ बलात्कार किया गया। शिक्षिक ने उसे धमकी दी कि वह इस तथ्य को किसी को न बताए अन्यथा उसे परिणाम भुगतने होंगे।

निचली अदालत ने अपने फैसले में अपीलकर्ता को जिम्मेदार ठहराया और उसे पहली गिनती में 10 साल के कठोर कारावास और अंतिम गिनती में 3 साल के कठोर कारावास के लिए जेल भेज दिया गया था।

अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की जिसमें अदालत ने उसे निम्नलिखित आधारों पर जमानत की अनुमति दी:

  • मौजूदा मामले में चिकित्सा जांच में दो दिन की देरी हुई थी।
  • इसके अलावा, अभियोजन पक्ष की कहानी उसकी मां द्वारा समर्थित नहीं है, उसकी मां ने कहा कि उसने उसे बताया कि अपीलकर्ता ने सिर्फ उसकी शील (मोडेस्टी) भंग करने की कोशिश की थी।
  • इसके अलावा, चिकित्सा परीक्षण के दौरान जिन साक्ष्यों पर भरोसा किया जाता है, वह वीर्य (सीमेन) की उपस्थिति है, वीर्य की उपस्थिति आरोपी के शरीर पर नहीं थी।
  • उपरोक्त निष्कर्षों के आधार पर, अदालत ने आंशिक रूप से अपील की अनुमति दी और आई.पी.सी. की धारा 506 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा और उसे 3 साल तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

सेल्वी बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक 

इस मामले में, 2004 में, श्री सेल्वी और अन्य ने आपराधिक अपीलों का पहला बैच दायर किया और उसके बाद, बाद में अपील की गई थी। पहले मामलों में जहां यह कहा गया था कि जांच एजेंसियों द्वारा जानकारी निकालने से भविष्य में अपराध की रोकथाम में मदद मिलेगी। यह भी आग्रह किया गया था कि इस तरह की तकनीकों को लागू करने से तथ्यों को मजबूत करने में मदद मिलेगी और इससे दोषसिद्धि और बरी होने की दर में भी वृद्धि होगी।

इस मामले ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अपराध का निर्धारण करने पर काफी हद्द तक प्रकाश डाला था। इस मामले में निम्नलिखित तकनीकी साक्ष्य पर चर्चा की गई थी:

  • नार्को एनालिसिस टेस्ट: इस टेस्ट में आरोपी को एक हिप्नोटिक ड्रग दिया जाता है और जब वह अवचेतन (सबकांशियस) में पहुंचता है तो उससे सवाल पूछे जाते हैं। इसकी सफलता दर अधिक नहीं है। इसके अलावा, कनाडा के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक कृत्रिम निद्रावस्था (हिप्नोटिक स्टेट) में दिया गया बयान स्वैच्छिक नहीं है और इसे सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल: इस तरीके को यह जानने के लिए प्रयोग किया जाता है कि क्या व्यक्ति कुछ निश्चित सूचनाओं से परिचित है जो कार्य को मापने के माध्यम से होते है जो उत्तेजनाओं (स्टीमुली) के चयनित जोखिम से शुरू होते है।

अदालत ने कहा है कि नार्को एनालिसिस का अनैच्छिक प्रशासन क्रूर, अपमानजनक और अमानवीय है। यदि यह आरोपी की सहमति के बिना किया गया है तो नार्को एनालिसिस टेस्ट के द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्य अस्वीकार्य हैं।

अदालत ने उपरोक्त तकनीकों के साथ एकत्र किए गए सबूतों की सीमा पर भी जोर दिया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(3) की व्याख्या की जो स्वयं को दोषी ठहराने की बात करता है।

अदालत ने कहा कि चिकित्सा जांच और डी.एन.ए. प्रोफाइलिंग, ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ टेस्ट जैसी किसी अन्य तकनीक के जरिए साक्ष्य एकत्र करना आरोपी को दोषी ठहराने की सीमा तक सीमित होना चाहिए। इसके अलावा, आरोपी के निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

पीड़िता की चिकित्सा जांच की प्रक्रिया को मौजूदा स्थिति के हिसाब से बदला जाना चाहिए। प्रक्रिया में अपराध के स्थान के आसपास चिकित्सक की उपस्थिति की परिकल्पना की गई है, लेकिन यदि अपराध दूरस्थ (रिमोट) क्षेत्र में किया जाता है जहां चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच नहीं है, तो क्या संभावनाएं हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता है, यह भी देखा जाना चाहिए। सरकारी अस्पताल में सुधार किया जाना चाहिए और हाल के दिनों की चिंता को दूर करने के लिए इसे आधुनिक मशीनों से लैस (इक्विप) किया जाना चाहिए।

 

सीआरपीसी के तहत तलाशी और जब्ती से संबंधित प्रक्रिया

यह लेख किरीत पी. मेहता स्कूल ऑफ लॉ, एनएमआईएमएस के छात्र Abhay ने लिखा है। यह एक विस्तृत लेख है जो तलाशी और जब्ती के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय VII, जिसमें धारा 91100 शामिल है, जो दस्तावेजों या अन्य चीजों को पेश करने के लिए सम्मन से संबंधित प्रावधान, तलाशी-वारंट प्रावधान और तलाशी और जब्ती से संबंधित अन्य कानूनों से संबंधित है। इस अध्याय के प्रावधान सम्मन और वारंट, उनके मुद्दे, किस तरीके से उन्हें भेजा जाता हैं और निष्पादित (एग्जीक्यूट) किया जाता हैं, से संबंधित हैं।

सम्मन, अदालत से एक व्यक्ति को एक निश्चित समय और स्थान पर उसके सामने पेश होने का आदेश है। आपराधिक और सिविल दोनों मामलों में सम्मन जारी किया जा सकता है। वारंट एक कानूनी दस्तावेज है जो एक न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा एक पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी, तलाशी, संपत्ति जब्त करने या न्याय प्रणाली के प्रशासन (एडमिनिस्ट्रेशन) से संबंधित कार्रवाई करने के लिए अधिकृत (ऑथराइज) करता है।

‘तलाशी’ शब्द सरकारी मशीनरी के संचालन को संदर्भित करता है जिसमें किसी छिपी हुई चीज़ का पता लगाने या किसी अपराध के साक्ष्य के टुकड़ों को प्रकट करने के लिए किसी स्थान, क्षेत्र, व्यक्ति, वस्तु आदि की जाँच या सावधानीपूर्वक निरीक्षण (इंस्पेक्ट) करना शामिल है। पुलिस किसी व्यक्ति या कार या परिसर की तलाश कर सकती है, लेकिन केवल आवश्यक और वैध अनुमोदन (एप्रूवल) लेने के बाद ही। “जब्ती” एक कार्रवाई है जो अप्रत्याशित (अनएक्सपेक्टेड) रूप से किसी इकाई या व्यक्ति को अपने कब्जे में लेती है।

तलाशी और जब्ती से संबंधित प्रक्रिया

धारा 91 में कहा गया है कि न्यायालय एक सम्मन जारी कर सकता है या प्रभारी (इन चार्ज) अधिकारी यह कहते हुए एक लिखित आदेश दे सकते है कि व्यक्ति को दस्तावेज या कुछ भी प्रस्तुत करना होगा जिसे जांच या कार्यवाही करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। जिस व्यक्ति के पास उस विशेष दस्तावेज या चीज का कब्जा है, उसे इस अनुरोध का पालन करना होगा और उसे सम्मन या आदेश द्वारा निर्धारित समय और स्थान पर प्रस्तुत करना होगा।

धारा 92 में कहा गया है कि यदि जिला मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय सहित कानून प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) एजेंसियों की राय है कि एक दस्तावेज, पार्सल या कुछ भी जो डाक या टेलीग्राफ प्राधिकरण (अथॉरिटी) की हिरासत में है, जांच, परीक्षण या कार्यवाही के लिए आवश्यक है, तो डाक या टेलीग्राफ प्राधिकरण को न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करना होगा और निर्देशों के अनुसार दस्तावेज़ वितरित करना होगा। न्यायालय डाक या टेलीग्राफ प्राधिकरण को किसी भी दस्तावेज, पार्सल या वस्तु की तलाशी करने की अनुमति दे सकता है जिसके कारण न्यायालय का आदेश लंबित है।

धारा 93 यह निर्धारित करती है कि तलाशी वारंट कब जारी किया जा सकता है। सबसे पहले, यदि न्यायालय का मानना ​​​​है कि जिस व्यक्ति को सम्मन या आदेश संबोधित किया गया है, वह दस्तावेज या कार्यवाही के लिए आवश्यक चीज नहीं लाएगा, तो उस व्यक्ति के खिलाफ वारंट जारी किया जा सकता है। यह तब भी जारी किया जा सकता है जब न्यायालय उस व्यक्ति को नहीं जानता जिसके पास दस्तावेज़ हो सकता है। न्यायालय उस विशेष स्थान या भाग को निर्दिष्ट कर सकता है जहाँ तक निरीक्षण का विस्तार होगा और निरीक्षण का प्रभारी व्यक्ति दिए गए न्यायालय के आदेश का पालन करेगा और निरीक्षण की सीमा का विस्तार नहीं करेगा। केवल जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ही किसी दस्तावेज की तलाशी की अनुमति दे सकता है जो डाक या तार प्राधिकरण की हिरासत में है।

धारा 94 उन स्थानों पर की गई तलाशी से संबंधित है, जिनमें ऐसी संपत्ति होने का संदेह है जो चोरी की हो सकती हैं या जाली दस्तावेज हो सकती हैं। जांच या सूचना के बाद, यदि किसी जिला मजिस्ट्रेट, उप प्रभागीय (सब डिविजनल) मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की राय है कि किसी स्थान का उपयोग चोरी की संपत्ति को जमा करने या बेचने के लिए किया गया होगा या उसका उपयोग इस धारा में उल्लिखित और निर्धारित आपत्तिजनक वस्तुओं के उत्पादन के लिए किया गया होगा, तो वह पुलिस अधिकारी (एक कांस्टेबल के पद से ऊपर) को आवश्यकता पड़ने पर सहायता के साथ ऐसे स्थान में प्रवेश करने के लिए वारंट द्वारा अधिकृत कर सकता है।

पुलिस को दिए गए वारंट में निर्दिष्ट तरीके से उस जगह की तलाशी लेनी होती है, जो आपत्तिजनक या चोरी की संपत्ति को अपने कब्जे में ले लेती है। उसे मजिस्ट्रेट को सब कुछ बताना होता है या अपराधी को मजिस्ट्रेट के पास ले जाने तक उसकी रक्षा करनी होती है। वह आपत्तिजनक वस्तु का किसी सुरक्षित स्थान पर निपटान कर सकता है और यदि उसे कोई व्यक्ति मिलता है जो आपत्तिजनक वस्तु या चोरी की संपत्ति की जमा, बिक्री या उत्पादन में शामिल हो सकता है, तो वह उस व्यक्ति को हिरासत में ले सकता है और बाद में उसे मजिस्ट्रेट के सामने ले जा सकता है।

धारा 94 के अनुसार आपत्तिजनक मानी जाने वाली वस्तुओं में निम्नलिखित चीज़े है–

धारा 95 कुछ प्रकाशनों को ज़ब्त करने की घोषणा करने के लिए न्यायालय को शक्ति प्रदान करती है। न्यायालय इन प्रकाशनों के लिए तलाशी वारंट जारी कर सकता है और यदि राज्य सरकार को पता चलता है कि किसी लेख, समाचार पत्र, दस्तावेज़ या पुस्तक में कुछ ऐसा हो सकता है जो आईपीसी की निम्नलिखित धाराओं 124A, 153A, 153B, 292, 293 या 295A के तहत दंडनीय है तो वह ऐसी सामग्री की प्रत्येक प्रति को सरकार को जब्त करने की घोषणा कर सकते है। मजिस्ट्रेट किसी भी पुलिस अधिकारी को उन दस्तावेजों को जब्त करने के लिए अधिकृत कर सकते है। वारंट के अनुसार, पुलिस किसी भी परिसर में संदिग्ध दस्तावेज की तलाशी के लिए प्रवेश कर सकती है और उसकी तलाशी ले सकती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि तलाशी के लिए नियुक्त पुलिस अधिकारी सब-इंस्पेक्टर के पद से नीचे का नहीं हो सकता। शब्द “अखबार” और “पुस्तक” का वही अर्थ है जो पुस्तक के प्रेस और पंजीकरण अधिनियम, 1867 में कहा गया है, और “दस्तावेज़” शब्द में कोई भी ड्रॉइंग, पेंटिंग, फोटोग्राफ या अन्य दृश्य प्रस्तुतियां शामिल हैं।

उदाहरण: आनंद चिंतामणि दिघे बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में, राज्य सरकार ने गुजराती अनुवाद सहित मी नाथूराम गोडसे बोल्टो आहे (मैं नाथूराम गोडसे बोल रहा हूं) नामक सभी रूपों में पुस्तक को जब्त करने के लिए एक नोटिस को इस कारण से जब्त कर लिया था कि उक्त पुस्तक के प्रकाशन से सार्वजनिक शांति भंग होगी, विभिन्न समूहों या समुदायों के बीच वैमनस्य (डिसहार्मनी) या शत्रुता, घृणा या द्वेष की भावना को बढ़ावा मिलेगा।

धारा 97 एक ऐसे व्यक्ति की तलाशी के बारे में है जिसका सीमित किया गया है और ऐसा करना एक अपराध है। यदि किसी जिला, उप प्रभागीय या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के पास ऐसा मानने का कोई कारण है, तो वह तलाशी वारंट जारी कर सकता है। जिस व्यक्ति को तलाशी वारंट संबोधित किया जाता है, उसे बंद व्यक्ति की तलाशी लेनी होती है और अगर उसे बंद व्यक्ति मिल जाता है, तो उसे आगे की कार्यवाही के लिए उसे तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने ले जाना होगा। धारा 98 में 18 साल से कम उम्र की एक बच्ची सहित एक अपहृत महिला की बहाली (रेस्टोरेशन) के पहलुओं को शामिल किया गया है। धारा 99 में तलाशी वारंट के निर्देश शामिल हैं। जारी किए गए सभी तलाशी वारंट पर धारा 38, 70, 72, 74, 77, 78 और 79 के प्रावधान लागू होते हैं।

तलाशी वारंट और सम्मन से संबंधित प्रपत्र (फॉर्म)

एक बार दायर किए जाने के बाद अधिकारी को विशेष अपराध के बारे में जानकारी प्राप्त होने के बाद वारंट की तलाशी के लिए प्रपत्र संख्या 10 है। प्रपत्र संख्या 11 किसी विशेष स्थान की तलाशी के लिए है जो जमा करने का संदिग्ध स्थान है। प्रपत्र संख्या 30 के तहत, उस व्यक्ति के लिए विशेष सम्मन जारी किया जाता है, जिस पर छोटे-मोटे अपराध करने का आरोप होता है। प्रपत्र संख्या 33 के तहत गवाहों को सम्मन निष्पादित किया जाता है। ये तलाशी वारंट और सम्मन से संबंधित प्रपत्र हैं।

बंद स्थान के प्रभारी व्यक्ति द्वारा तलाशी के लिए अनुमति

यदि किसी स्थान की तलाशी लेनी है या निरीक्षण करना, बंद करना है, तो उस स्थान के रहने वाले या प्रभारी व्यक्ति को धारा 100 में उल्लिखित अधिकारी को प्रवेश देना होगा और उसे वह सभी सुविधाएं प्रदान करनी होंगी जो तलाशी के लिए उपयुक्त या आवश्यक हैं। यदि प्रवेश प्राप्त नहीं किया जा सकता है, तो पुलिस अधिकारी धारा 47 (2) में निर्दिष्ट तरीके से आगे बढ़ सकता है।

यदि किसी व्यक्ति पर ऐसा कुछ छिपाने का संदेह है जिसके लिए अधिकारी तलाशी ले रहा है, तो उस व्यक्ति की तलाशी ली जा सकती है ताकि वह छुपी हुई वस्तु मिल सके। अगर कोई महिला कुछ वस्तु छुपा रही है तो महिला की किसी दूसरी महिला द्वारा तलाशी की जा सकता है; लेकिन की गई तलाशी के लिए शालीनता का सख्ती से पालन किया जाएगा। इस धारा के अनुसार, उस विशेष समाज या इलाके के दो या दो से अधिक सम्मानित और स्वतंत्र निवासियों को बुलाना महत्वपूर्ण है।

उदाहरण: रूप चंद बनाम हरियाणा राज्य के मामले में, अदालत ने दोहराया कि यह एक अच्छी तरह से स्थापित कानूनी अवधारणा है कि जांच एजेंसी को स्वतंत्र गवाहों की सहायता करनी चाहिए, जब प्रतिबंधित वस्तुएं जब्त की जाती हैं, और ऐसी स्थिति में उनकी असमर्थता अभियोजन मामले पर संदेह डालती है। लेकिन अगर उनमें से कोई भी तलाशी का गवाह बनने के लिए तैयार नहीं है या उपलब्ध नहीं है, तो पुलिस उन्हें ऐसा करने के लिए लिखित रूप में आदेश जारी कर सकती है। अगर कोई व्यक्ति बिना उचित कारण बताए गवाह बनने से इनकार करता है, तो ऐसे व्यक्ति को आईपीसी की धारा 187 के तहत अपराधी माना जाएगा।

तलाशी, बुलाए गए निवासियों की उपस्थिति में आयोजित की जाती है। जब्त की गई सभी सामग्रियों की सूची पर गवाहों को हस्ताक्षर करने होंगे। जब तक सम्मन में विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया जाता है, तब तक किसी गवाह को कार्यवाही में शामिल होने की आवश्यकता नहीं होती है। अधिभोगी (ओक्यूपेंट) तलाशी के हर चरण में उपस्थित हो सकते है।

पुलिस अधिकारी को अधिभोगी को जब्त की गई वस्तुओं की एक प्रति देनी होती है; धारा 101 उन चीजों के निपटान से संबंधित है जो अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) से परे तलाशी में पाई जाती हैं। यदि किसी न्यायालय द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर तलाशी वारंट जारी किया जाता है, तो जब्त की गई वस्तुओं की सूची के साथ चीजों को तुरंत अदालत में ले जाना होता है। धारा 103 के तहत मजिस्ट्रेट अपनी मौजूदगी में तलाशी लेने का निर्देश दे सकते है।

पुलिस अधिकारी की शक्तियां

जबकि समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है; हम सभी ने ऐसी घटनाओं के बारे में सुना है जहां पुलिस ने अपनी सीमाएं लांघी और हमारे अधिकारों का उल्लंघन किया है। तो यहां भारत में तलाशी और जब्ती से संबंधित पुलिस शक्तियों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

कानून पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शक्ति प्रदान करता है। कुछ संपत्ति को जब्त करने की पुलिस अधिकारियों को शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में धारा 102 के तहत दी गई है। कोई भी पुलिस अधिकारी किसी भी संपत्ति को जब्त कर सकता है जो ज्ञात या चोरी होने का संदेह हो सकती है या ऐसी परिस्थितियों में पाई जाती है जो किसी भी अपराध के होने का संदेह पैदा करती हैं। पुलिस अधिकारी को जब्ती की सूचना वरिष्ठ (सीनियर) अधिकारी को देनी होगी यदि वह उस वरिष्ठ अधिकारी के अधीनस्थ (सबऑर्डिनेट) है जो थाने का प्रभारी है। प्रत्येक पुलिस अधिकारी जब्ती की सूचना अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को तत्काल देगा। जहां जब्त की गई संपत्ति ऐसी है कि इसे आसानी से न्यायालय में नहीं ले जाया जा सकता है, वह किसी भी व्यक्ति को एक बांड के निष्पादन पर अदालत के समक्ष संपत्ति देने और संपत्ति के निपटान के बारे में अदालत के अगले आदेशों को प्रभावी करने के लिए बोंड के निष्पादन पर हिरासत दे सकता है। 

पुलिस आपके घर या कार्यालय में वारंट के बिना तलाशी ले सकती है यदि उन्हें संदेह है कि आपके पास छिपी हुई वस्तुएं हैं जिन्हें अवैध माना जाता है, जैसे कि नशीले पदार्थ, आदि। एक साझा घर के लिए, यदि आप मौजूद नहीं हैं, तो पुलिस वारंट के बिना साझा क्षेत्रों की तलाश करेगी, लेकिन आपकी निजी चीजों को तलाशी नहीं करेगी। पुलिस बिना अनुमति के जब्त कार की तलाशी भी ले सकती है।

ऐतिहासिक निर्णय

  • वी.एस. कुट्टन पिल्लई बनाम रामकृष्णन के मामले में, तलाशी वारंट की प्रक्रियात्मक वैधता को बरकरार रखा गया था, जिसमें यह माना गया था कि आरोपी के कब्जे वाले परिसर की तलाशी किसी भी तरह से उसे अपने खिलाफ सबूत देने के लिए मजबूर नहीं करती थी और इस प्रकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं है।
  • रमेश बनाम लक्ष्मी बाई के मामले में, यह माना गया था कि एक बेटे को उसके पिता की हिरासत में नहीं रखा जाना चाहिए या उसे गैरकानूनी नजरबंदी के रूप में नहीं माना जाना चाहिए, और तदनुसार, उसके लिए कोई तलाशी वारंट जारी नहीं किया जा सकता है।
  • माताजोग डोबे बनाम एच.सी. भारी के मामले में अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां वैधानिक (स्टेच्यूटरी) प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है, तलाशी  के समर्थन में साक्ष्य की विश्वसनीयता कम हो सकती है और प्रदान किए गए साक्ष्यो पर अविश्वास किया जा सकता है जब तक कि प्रतिवादी प्रावधानों के किसी भी गैर-अनुपालन के लिए पर्याप्त कारण नहीं देता है।
  • महाराष्ट्र राज्य बनाम तापस डी. नियोगी के मामले में, यह सही ठहराया गया था कि संहिता की धारा 102 के तहत ‘बैंक खाते’ को संपत्ति के रूप में सुनिश्चित किया जाता है और पुलिस अधिकारी को ऐसे बैंक खाते के संचालन को जब्त करने का अधिकार है, अगर ये संपत्तियां विशेष रूप से उस अपराध से संबंधित हैं जिसके लिए जांच की जा रही है।
  • मध्य प्रदेश राज्य बनाम पलटन मल्लाह के मामले में, यह माना गया था कि अवैध तलाशी के तहत प्राप्त साक्ष्य पूरी तरह से खारिज नहीं किए जाते है जब तक कि इससे आरोपी को गंभीर पूर्वाग्रह (प्रेजुडिस) न हो। अदालतों को हमेशा इस तरह के साक्ष्यों को स्वीकार करने या न करने का फैसला करने का विवेक दिया गया है।
  • मोदन सिंह बनाम राजस्थान राज्य के मामले में, यह माना गया था कि यदि अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) अधिकारी द्वारा लापता वस्तुओं को पुनः प्राप्त करने का साक्ष्य देना है, तो इस आधार पर वसूली के सबूत से इनकार करना उचित नहीं है कि जब्ती गवाह अभियोजन पक्ष के संस्करण (वर्जन) को स्वीकार नहीं करते हैं।

निष्कर्ष

तलाशी और जब्ती का अधिकार समाज की बेहतरी के लिए एक अनिवार्य शक्ति है; तलाशी और जब्ती स्वभाव से एक अत्यंत व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) तंत्र है, और शक्ति के प्रयोग पर विशिष्ट प्रक्रियात्मक सीमाएं भी हैं। तलाशी और जब्ती करने के लिए अधिकृत अधिकारियों के पास विशिष्ट शक्तियां होती हैं और प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी से एक वरिष्ठ अधिकारी को रिपोर्ट करना आवश्यक होता है ताकि कोई भी अधिकारी मनमाने ढंग से कार्य न कर सके।

तलाशी लेने और जब्त करने का अधिकार विशेष रूप से कानून में निर्धारित होना चाहिए और संबंधित अधिकारी को निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के अनुपालन में कार्य करना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को पूछताछ करने, लोगों को गिरफ्तार करने, तलाशी लेने, व्यक्तियों और उनकी संपत्ति की जब्ती करने और यहां तक ​​कि ड्यूटी के दौरान उचित बल का उपयोग करने का अधिकार प्रदान किया जाता है; फिर भी इस शक्ति को कानून की सीमाओं के भीतर प्रयोग किया जाना चाहिए, और जब अधिकारी उन सीमाओं से अधिक हो जाते हैं तो वे अभियोजन के लिए एकत्रित किसी भी जानकारी की स्वीकार्यता को खतरे में डाल देते हैं।

 

 

आकस्मिक अनुबंधों और दांव लगाने के समझौतों के बीच अंतर

यह लेख मराठवाड़ा मित्र मंडल के शंकरराव चव्हाण लॉ कॉलेज, पुणे के Ishan Arun Mudbidri द्वारा लिखा गया है। यह लेख आकस्मिक (कंटिंजेंट) अनुबंधों और दांव लगाने (वेजरिंग) के समझौतों की अवधारणाओं की व्याख्या करता है और दोनों की तुलना करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

एक अनुबंध और एक समझौता एक हैं या नहीं, इस पर बहस अनंत है। इन दोनों अवधारणाओं को पढ़ने के बाद, हम उनके प्रकारों के बारे में जानते हैं। इसके दो प्रकार हैं, आकस्मिक अनुबंध और दांव लगाने के समझौते। अब, आकस्मिक शब्द का अर्थ किसी निश्चित घटना के घटित होने पर निर्भर करता है, और दांव लगाने का भी यही अर्थ है। लेकिन एक अनुबंध है और दूसरा एक समझौता है, इसलिए इन दोनों शब्दों में कुछ विशिष्ट विशेषताएं हैं, जिन्हें लेख में उजागर किया गया है।

एक आकस्मिक अनुबंध क्या है?

जहां तक ​​बुनियादी समझ की बात है, एक अनुबंध दो पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित एक समझौता है, जो कानून द्वारा लागू करने योग्य है। लेकिन इसे और दिलचस्प बनाने के लिए, अनुबंध में नियम और शर्तें किसी के लाभ के अनुसार संशोधित की जाती हैं। ऐसे अनुबंधों में से एक को आकस्मिक अनुबंध के रूप में जाना जाता है। आकस्मिक शब्द का अर्थ एक ऐसा कार्य है जो भविष्य में किसी अन्य कार्य के होने या न होने पर निर्भर करता है। एक आकस्मिक अनुबंध एक अनुबंध है जिसकी वैधता भविष्य में एक अनिश्चित घटना पर निर्भर करती है। आइए एक उदाहरण लेते हैं, A, B को 30,000 का भुगतान करने के लिए सहमत होता है, केवल तब जब B अपनी अंतिम वर्ष की परीक्षा में टॉप करता है। अब, यह एक आकस्मिक अनुबंध है क्योंकि B अपनी परीक्षा में सफल हो भी सकता है और नहीं भी।

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, जो अनुबंध से संबंधित सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है, धारा 31 से धारा 35 में आकस्मिक अनुबंध शब्द का उल्लेख करता है। धारा 36 एक आकस्मिक समझौते के बारे में बात करता है। आइए एक टेबल के माध्यम से इन सभी धाराओं का विश्लेषण करें:

धाराएं महत्व
धारा 31 एक आकस्मिक अनुबंध को भविष्य की अनिश्चित घटना के होने या न होने पर कुछ करने या न करने के अनुबंध के रूप में परिभाषित किया गया है।
धारा 32 कुछ करने या न करने के लिए एक आकस्मिक अनुबंध, भविष्य में घटना होने के बाद ही कानून द्वारा लागू किया जा सकता है। उदाहरण: – A ने B को एक लक्जरी कार उपहार में देने का वादा किया है अगर B, C से शादी करता है। B से शादी करने से पहले C की मृत्यु हो जाती है, इसलिए  अब अनुबंध शून्य हो जाएगा।
धारा 33 किसी घटना के न होने पर एक आकस्मिक अनुबंध कानून द्वारा लागू किया जा सकता है यदि वह घटना असंभव हो जाती है। उदाहरण: – यदि कोई निश्चित विमान सोमवार को नहीं आता है तो X, Y को एक राशि का भुगतान करने का वादा करता है। विमान सोमवार को आ जाता है, इसलिए अनुबंध शून्य है।
धारा 34 यदि कोई अनुबंध किसी घटना पर आकस्मिक है और इस पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति भविष्य में कैसे कार्य करेगा, तो ऐसा अनुबंध असंभव समझा जाएगा यदि वह व्यक्ति घटना को असंभव बना देता है। उदाहरण: – A ने B को उपहार देने का वादा किया यदि वह 100 मीटर की दौड़ में जीत जाता है। C दौड़ जीत जाता है। इसलिए C का दौड़ जीतने का कार्य, B के लिए इसे जीतना असंभव बना देता है। हालांकि दोबारा मैच हो सकता है, लेकिन इस घटना को असंभव माना जाता है
धारा 35 यदि अनिश्चित घटना पर कुछ करने या न करने का आकस्मिक अनुबंध एक निश्चित समय के भीतर होता है, और घटना नहीं हुई होती है और समय व्यतीत हो जाता है या यदि निश्चित समय की समाप्ति से पहले घटना असंभव हो जाती है, तो यह शून्य हो जाएगा। उदाहरण:- C, D के लिए एक लग्जरी कार खरीदने के लिए सहमत होता है, यदि उनका मूल्यवान माल ढोने वाला विमान सोमवार को वापस लौट जाता है। हालांकि, विमान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है और सारा माल नष्ट हो जाता है। अतः यह अनुबंध अमान्य होगा।
धारा 36 यदि कुछ करने या न करने का समझौता किसी असंभव घटना पर आकस्मिक है, तो ऐसा समझौता शून्य हो जाएगा, भले ही पक्षों को असंभव घटना के बारे में पता हो या नहीं।

एक आकस्मिक अनुबंध के आवश्यक तत्व

एक आकस्मिक अनुबंध के लिए महत्वपूर्ण तत्व इस प्रकार हैं:

  • किसी घटना का होना या न होना

जैसा कि हम उपरोक्त टेबल पर नज़र डालते हैं, धारा 32 और धारा 33 एक घटना के होने या न होने पर एक आकस्मिक अनुबंध की प्रवर्तनीयता (एंफोर्सेबिलिटी) के बारे में बात करते हैं। अनुबंध केवल अनिश्चित भविष्य की घटना के आधार पर मान्य होगा। घटना कभी भी हो सकती है, लेकिन घटना होनी ही चाहिए।

  • घटना अनुबंध के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) होना चाहिए

संपार्श्विक शब्द का अर्थ द्वितीयक या अतिरिक्त है इसलिए किसी घटना का होना या न होना, अनुबंध पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यह अनुबंध के लिए द्वितीय होना चाहिए और स्वतंत्र रूप से मौजूद होना चाहिए।

  • शर्त आकस्मिक होनी चाहिए और वचनबद्ध नहीं होनी चाहिए

एक आकस्मिक अनुबंध का प्रवर्तन अनिश्चित भविष्य की घटना पर निर्भर करता है, जिसे एक शर्त के रूप में कहा जा सकता है। लेकिन इस आकस्मिकता को एक वादा नहीं कहा जा सकता क्योंकि भविष्य की घटना अनिश्चित है। तो एक वचनबद्ध शर्त और एक आकस्मिक शर्त के बीच एक स्पष्ट अंतर है। पहले मामले में, व्यक्ति को एक दायित्व का पालन करना पड़ता है जिसे बाद की तारीख के लिए स्थगित किया जा सकता है लेकिन उसे इसका पालन करना ही पड़ता है, जबकि बाद में कोई दायित्व नहीं है क्योंकि अनुबंध भविष्य की अनिश्चित आकस्मिकता पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, A ने B के लिए भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी खरीदने का वादा किया है, अगर वे आज मैच जीतते हैं। अब, यह एक आकस्मिकता है क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भारत मैच जीतेगा ही। इसी उदाहरण में, A, B को जर्सी खरीदने का वादा करता है यदि वह उसे पैसे देता है, तो यह एक वचन शर्त होगी जो एक कर्तव्य के प्रदर्शन पर निर्भर करती है।

  • एक अनिश्चित घटना

अनुबंध के दोनों पक्षों को उस घटना के बारे में पता नहीं होना चाहिए। यह एक अनिश्चित भविष्य की घटना होनी चाहिए। यदि घटना निश्चित है, तो इसे एक सामान्य अनुबंध कहा जाएगा और यह आकस्मिक नहीं होगा क्योंकि दोनों पक्ष इसके बारे में जानते हैं और तदनुसार अपने दायित्वों का पालन करेंगे।

  • अनुबंध वचनदाता (प्रॉमिसर) पर निर्भर नहीं होना चाहिए

अनुबंध वचनदाता की इच्छा पर नहीं होना चाहिए। यह पूरी तरह से भविष्य और अनिश्चित घटना के होने या न होने पर निर्भर होना चाहिए। वचनदाता भविष्य की घटना की शर्तों को निर्धारित नहीं कर सकता है।

  • अनुबंध का प्रदर्शन स्थगित नहीं किया जा सकता है

केवल अनुबंध के लिए निर्धारित समय को स्थगित करने से, इसे आकस्मिक अनुबंध नहीं कहा जा सकता है। दोनों पक्षों को घटना की भविष्य की तारीख और समय के बारे में कोई जानकारी नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपनी संपत्ति बेचने के लिए सहमत होता है, लेकिन अगले महीने की 31 तारीख को प्रक्रिया शुरू करने का फैसला करता है। यह एक आकस्मिक अनुबंध नहीं होगा। उपरोक्त उदाहरण में अनुबंध के आकस्मिक होने के लिए, व्यक्ति को अपनी संपत्ति को अनिश्चित भविष्य की घटना पर बेचना चाहिए, जिसके बारे में दोनों पक्षों को कोई जानकारी नहीं है।

एक आकस्मिक अनुबंध का महत्व

एक आकस्मिक अनुबंध, कई मामलों में काम आ सकता है। यदि आप किसी अनुबंध के भारी नियमों और शर्तों से बचना चाहते हैं, तो आप एक आकस्मिक अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का प्रयास कर सकते हैं। यह अनुबंध नुकसान के जोखिम से बचाता है, जो अनुबंध के टूटने की स्थिति में दोनों पक्षों में से किसी एक को उठाना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक आकस्मिक अनुबंध में, अनुबंध भविष्य की घटना के होने या न होने पर वैध हो जाता है। घटना अनिश्चित होनी चाहिए। इसलिए इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि यह अनुबंध कब तक समाप्त होगा।

इसके अलावा, दोनों पक्षों को अनुबंध की शर्तों पर सहमत होने की आवश्यकता नहीं है, यह अनिश्चित भविष्य की घटना तय करेगी। इसलिए दोनों पक्षों को अनुबंध के कारण उत्पन्न होने वाले किसी भी मतभेद के साथ रहना होगा। इस प्रकार के अनुबंध का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पक्ष अनुबंध की शर्तों पर फिर से बातचीत नहीं कर सकती हैं यदि भविष्य की घटना उनके अनुसार नहीं होती है। घटना होने से पहले अनुबंध के बारे में चर्चा पक्षों को करनी होगी।

भविष्य की घटना के आधार पर, एक पक्ष को लाभ होता है और दूसरे को नहीं होता है। इससे लंबी अदालती कार्यवाही की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि दोनों पक्ष पहले ही इस तरह के अनुबंध में प्रवेश करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। यह एक अच्छे संबंध को बनाए रखने में मदद करता है और दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा करता है।

अंत में, कोई भी पक्ष अनुबंध की शर्तों और भविष्य की घटना पर नियंत्रण हासिल नहीं कर सकता है, क्योंकि घटना अनुबंध के लिए संपार्श्विक या द्वितीय है और इस पर निर्भर नहीं है।

प्रसिद्ध मामले

  • नेमी चंद और अन्य बनाम हरक चंद और अन्य (1965), के मामले में न्यायालय द्वारा यह देखा गया था कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 32 में कहा गया है कि कुछ भी करने या न करने के लिए एक आकस्मिक अनुबंध अनिश्चित भविष्य की घटना के होने पर निर्भर करता है और तब तक अनुबंध को लागू नहीं किया जा सकता है। यह तथ्य सत्य है। हालांकि, जो पक्ष दावा करता है कि अनुबंध शून्य हो जाएगा क्योंकि घटना असंभव हो गई है, उसे मामला दर्ज़ करना चाहिए और न केवल कानून के सवाल पर बल्कि तथ्य के सवाल पर भी याचिका दायर करनी चाहिए। यदि पक्ष मामले को दर्ज़ नहीं करना चाहता है, तो यह न्यायालयों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे मामले पर स्वत: विचार करें।
  • कमिश्नर ऑफ एक्सेस प्रॉफिट टैक्स बनाम रूबी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (1957) के मामले में, प्रतिवादी (रूबी जनरल इंश्योरेंस), जीवन, अग्नि और समुद्री बीमा प्रदान करने वाली एक बीमा कंपनी थी। अग्नि बीमा से संबंधित कंपनी द्वारा प्राप्त सभी प्रीमियम को संपत्ति के रूप में दिखाया गया था, लेकिन इसमें से 40% को अनपेक्षित जोखिम और देनदारियों के रूप में दिखाया गया था। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि शेष भाग को वर्ष में प्राप्त कुल पूंजी में से कटौती के लिए उत्तरदायी होना चाहिए। उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि असमाप्त जोखिम के रूप में अलग रखा गया हिस्सा एक आकस्मिक देयता है और बीमा का अनुबंध नहीं है। अदालत ने कहा कि अनपेक्षित जोखिम के रूप में अलग रखा गया हिस्सा, व्यवसाय की कुल पूंजी में शामिल नहीं किया जा सकता है, इसलिए इसे नहीं काटा जाना चाहिए। आगे यह माना गया कि बीमा का एक अनुबंध एक आकस्मिक अनुबंध के दायरे में शामिल है।

एक दांव लगाने के समझौते का विश्लेषण

लोग दांव और शर्त लगाने के शब्दों के बीच भ्रमित हो जाते हैं। किसी को यह अजीब लग सकता है, लेकिन एक शर्त एक दांव है और एक दांव एक शर्त है। इसे सरल शब्दों में कहें तो शर्त लगाने का अर्थ है किसी घटना के परिणाम के आधार पर किसी चीज को संपार्श्विक के रूप में रखना, जिसका अर्थ दांव लगाना होता है। अब जब लोग शर्त लगाते हैं, तो वे एक समझौता करते हैं। उदाहरण के लिए, A, B को 100 रुपये का भुगतान करने के लिए सहमत होता है अगर भारत आज क्रिकेट मैच जीत जाता है। अब अगर भारत मैच हार जाता है तो B को A को 1000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसलिए इसे एक दांव समझौते के रूप में जाना जाता है, जहां एक निश्चित घटना के परिणाम के आधार पर दोनों पक्षों के लिए जीत-हार की स्थिति होती है। यह समझौता जोखिम भरा है क्योंकि एक पक्ष को लाभ होता है और दूसरे को नुकसान होता है जिसके परिणामस्वरूप विवाद और तर्क उत्पन्न हो सकते हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 30 दांव लगाने के समझौते का उल्लेख करती है। यदि आप ध्यान से देखें, तो आईसीए की धारा 20 से 30 उन समझौतों या अनुबंधों का उल्लेख करती है जो शून्य हैं, अर्थात, कानून द्वारा निषिद्ध हैं। इसलिए धारा 30 में कहा गया है कि एक समझौता जहां किसी भी पक्ष को किसी घटना के होने या न होने पर पैसे का भुगतान किया जाता है, शून्य है। न्यायालय ऐसे किसी भी मामले पर विचार नहीं करेंगे जिसमें दांव के माध्यम से जीते गए धन की वसूली का दावा किया जाता है।

जुआ या सट्टेबाजी को भारतीय क़ानूनों ने कभी अपनाया नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 301 से अनुच्छेद 307, जिसमें व्यापार और वाणिज्य (कॉमर्स) से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है, में जुआ शामिल नहीं है। जुआ को रेस एक्स्ट्रा कॉमर्सियम माना जाता है, जिसका अर्थ है कि कुछ चीजें व्यापार के लिए अनुत्तरदायी हैं और वाणिज्य से बाहर हैं। वर्तमान में भारत में, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 दांव लगाने के समझौतों से संबंधित एकमात्र क़ानून है। इस अधिनियम के प्रावधानों को 1865 के दांव से बचने (संशोधन) अधिनियम द्वारा पूरक (सप्लीमेंट) किया गया था।

एक दांव लगाने के समझौते की विशेषताएं और आवश्यक तत्व

एक दांव लगाने का समझौता सामान्य समझौते से अलग होता है। तो आइए एक दांव लगाने के समझौते की कुछ विशेषताओं को देखें:

  • आपसी लाभ और हानि

एक दांव लगाने का समझौता एक आपसी समझौता है। इसका मतलब यह है कि दोनों पक्ष पारस्परिक रूप से भविष्य की घटना के आधार पर लाभ या हानि भुगतने के लिए सहमत होते हैं। इसलिए, यदि एक पक्ष दांव हार जाता है, तो उसे दूसरे पक्ष को एक राशि का भुगतान करना होता है। दांव के लिए इनाम कुछ भी हो सकती है जिसका मौद्रिक मूल्य हो। यदि एक पक्ष अनिश्चित घटना के परिणाम को जानता है, तो इसे दांव लगाने का समझौता नहीं कहा जाएगा। घटना पर किसी भी पक्ष का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, A और B एक दांव लगाने के समझौते में प्रवेश करने के लिए पारस्परिक रूप से सहमति व्यक्त करते है। शर्तें यह थीं कि यदि C परीक्षा में टॉप करता है, तो A, B को 2000 रुपये का भुगतान करेगा, और यदि नहीं तो B, A को समान भुगतान करेगा। यह एक पारस्परिक रूप से सहमत दांव है।

  • दो पक्ष होने चाहिए

एक वैध दांव लगाने के समझौते के लिए, दो पक्षों का होना आवश्यक है। यह बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि एक अकेला व्यक्ति खुद के साथ दांव नहीं लगा सकता है, उदाहरण के लिए, A अपने साथ एक दांव लगाता है कि यदि वह एक मिनट में 30 से अधिक पुश-अप करता है, तो वह चीज़केक खाएगा और यदि वह नहीं करता है, तो उसे एक मील अतिरिक्त दौड़ के लिए जाना होगा। तो ऐसा हो सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति को समझौता नहीं कहा जाएगा। यह कानून का मूल नियम है कि एक वैध समझौते के लिए दो पक्षों का होना आवश्यक है। ऐसा ही दांव लगाने के समझौते में भी है।

  • समझौता केवल एक दांव तक का होना चाहिए और उससे आगे का नहीं

जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, कोई भी पक्ष दांव के परिणाम को नियंत्रित नहीं कर सकता है। इसके अलावा समझौते की एकमात्र शर्त भविष्य की घटना के परिणाम के आधार पर एक दांव होना चाहिए। यदि पक्षों का इस शर्त से परे कोई हित है, तो दांव लगाने का समझौता मान्य नहीं होगा। उदाहरण के लिए, X, Y के साथ एक दांव में प्रवेश करता है। यदि X की फूड टेक स्टार्ट-अप को 6 महीनों में कम से कम 50,000 ग्राहक मिलते हैं, तो Y, X को एक निश्चित मौद्रिक राशि का भुगतान करेगा, और यदि यह लक्ष्य पूरा नहीं होता है, तो X को Y को समान राशि का भुगतान करना होगा। हालांंकि X को बाद में एहसास हुआ कि उनके दांव के परिणाम के आधार पर, Y उसके स्टार्ट-अप में 20% हिस्सेदारी भी चाहता है। इसलिए ऐसी स्थिति को दांव लगाने का समझौता नहीं कहा जाएगा।

एक दांव लगाने के समझौते के अपवाद

अब तक, हमें इस बात की थोड़ी समझ हो गई होगी कि वास्तव में एक दांव लगाने का समझौता क्या है। लेकिन, कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जो दांव लगाने के समझौते की शर्तों को पूरा नहीं करती हैं। वे इस प्रकार हैं:-

  • बीमा का अनुबंध

बीमा प्राप्त करने का अनुबंध एक दांव लगाने के समझौते का सबसे महत्वपूर्ण अपवाद हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक दांव के समान है। एक बीमा अनुबंध में, बीमाकर्ता के रूप में ज्ञात वित्तीय क्षतिपूर्ति प्रदान करने वाले पक्ष का अनुबंध में बीमा योग्य हित होता है। इसका मतलब यह है कि कंपनी उस पक्ष की रक्षा करती है, जिसने अप्रत्याशित (अनएक्सपेक्टेड) बुरी घटना के कारण वित्तीय नुकसान से बीमा लिया है। इसलिए, इस प्रकार के अनुबंध को क्षतिपूर्ति के अनुबंध के रूप में जाना जाता है, जो पक्षों  को नुकसान उठाने से बचाता है। पक्षों का मुख्य उद्देश्य नुकसान से रक्षा करना है, न कि किसी घटना के होने या न होने से लाभ प्राप्त करना। यदि बीमाकर्ता का बीमा योग्य हित नहीं है, तो इस अनुबंध को दांव कहा जा सकता है।

  • घुड़दौड़ प्रतियोगिता

घुड़दौड़ प्रतियोगिता में सट्टेबाजी भी शामिल है। लोग दौड़ जीतने और उससे पैसे कमाने के लिए अपने मनचाहे घोड़े पर सट्टा लगाते हैं। तो क्या यह एक दांव लगाने वाला समझौता है? नहीं। भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 30 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि घुड़दौड़ से जुड़े दांव को दांव लगाने वाला समझौता नहीं माना जाएगा, इसलिए यह शून्य नहीं है। हालांकि भारत में, राज्य सरकारें ऐसी प्रतियोगिताओं के लिए परमिट प्रदान करती हैं। एक घुड़दौड़ प्रतियोगिता भाग्य के बजाय कौशल (स्किल) पर अधिक आधारित होती है। दौड़ से पहले पूरी तैयारी की आवश्यकता होती है, जैसे घोड़े को प्रशिक्षित (ट्रेनिंग) करना, उसका भोजन, रखरखाव आदि।

  • कौशल की आवश्यकता वाले खेल

हम अक्सर गेमिंग अनुबंधों के बारे में जानते हैं। उदाहरण के लिए, A और B दोनों प्लेस्टेशन पर फीफा (फुटबॉल) का खेल खेलते हैं। यहां ट्विस्ट यह है कि अगर A गेम जीत जाता है, तो B उसे ट्रीट देगा और अगर A हार जाता है तो A, B को ट्रीट देगा। हालांकि इसे एक दांव लगाने वाला समझौता नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि वीडियो गेम में कौशल की आवश्यकता होती है, और खेल का परिणाम भाग्य पर निर्भर नहीं करता है। एमजे सिवानी बनाम कर्नाटक राज्य (1995) के मामले में, वीडियो गेम के दायरे और कानूनी वैधता की जांच की गई थी। अदालत द्वारा यह देखा गया कि गेमिंग का मतलब खेलना होता है, और चूंकि खेल गैरकानूनी नहीं है, इसलिए यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि इसमें कौशल शामिल है या भाग्य।

शेयर बाजार ट्रेडिंग

पिछले कुछ वर्षों में शेयर बाजार कई लोगों के लिए सोने की खान बन गया है। किसी को आश्चर्य हो सकता है कि क्या शेयर बाजार में व्यापार करना एक दांव है क्योंकि लोग एक पक्ष से दूसरे पक्ष को शेयर खरीदते और बेचते हैं। हालांकि, यह एक दांव नहीं माना जाता है और पूरी तरह से कानूनी है।

प्रसिद्ध मामले

  • बाबासाहेब रहीमसाहेब बनाम राजाराम रघुनाथ अल्पे (1930) के मामले में, दोनों पक्ष पहलवान थे और उन्होंने एक समझौता किया। समझौतों की शर्तें यह थीं कि उन्हें पुणे में एक निश्चित तारीख पर एक-दूसरे से कुश्ती लड़नी थी। इसके बाद, यदि कोई भी पक्ष मैच के लिए उपस्थित होने में विफल रहता है, तो दूसरे पक्ष को 500 रुपये का भुगतान करना होगा। अंत में, मैच जीतने वाले व्यक्ति को 1,125 रुपये के साथ पुरस्कृत किया जाना था। प्रतिवादी (राजाराम एल्पे) मैच के लिए उपस्थित होने में विफल रहा। इसलिए वादी (बाबासाहेब रहीमसाहेब) ने अदालत में उनके समझौते की शर्तो के अनुसार 500 रुपये का दावा किया। निचली अदालत ने वादी की याचिका खारिज कर दी। वादी ने तर्क दिया कि चूंकि घटना का विजेता अनिश्चित था और समझौता एक दांव है, इसलिए प्रतिवादी को उसे वांछित धन का भुगतान करना होगा। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने देखा कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 में दांव लगाने के समझौते को परिभाषित नहीं किया गया है, और सर विलियम एंसन द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार यह एक अनिश्चित घटना के निर्धारण पर पैसे का भुगतान करने का वादा है। वर्तमान परिस्थितियों में, समझौता यह था कि विजेता को पूरे मूल्य का पैसा मिलता है और हारने वाला खाली हाथ चला जाता है। हारने वाला पुरस्कार जीतने में विफल रहा और उसने अपने दम पर कुछ भी नहीं खोया। इसलिए अदालत ने माना कि यह उदाहरण दांव लगाने के समझौते के तहत नहीं आता है क्योंकि विजेता को दी जाने वाली कीमत का पैसा उन लोगों से था, जिन्हें इवेंट के लिए टिकट खरीदना था।
  • घेरूलाल पारख बनाम महादेवदास मैया और अन्य (1959) के मामले में अपीलकर्ता (घेरूलाल पारख) और प्रतिवादी (महादेवदास मैया) ने साझेदारी की। उन्होंने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया था कि फर्म की ओर से प्रतिवादी, अन्य लोगों के साथ अनुबंध करेगा, लेकिन लाभ और हानि पक्षों द्वारा समान रूप से साझा की जाएगी। ऐसे अनुबंधों में से एक गलत हो गया और प्रतिवादी को पूरी राशि की क्षतिपूर्ति करनी पड़ी जो अपीलकर्ता ने नहीं की। इसलिए प्रतिवादी ने अपीलकर्ता से राशि वसूल करने के लिए एक मुकदमा दायर किया और तर्क दिया कि एक दांव लगाने के अनुबंध में प्रवेश करने का समझौता आईसीए की धारा 23 के तहत गैरकानूनी नहीं है। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि दांव लगाने के अनुबंध धारा 30 के तहत शून्य हैं और धारा 23 के अर्थ के भीतर अवैध हैं। न्यायालय द्वारा यह माना गया था कि दांव लगाने के अनुबंध धारा 30 के तहत शून्य हैं, लेकिन कानून द्वारा निषिद्ध नहीं हैं। एक समझौता जो दांव लगाने के अनुबंध के लिए संपार्श्विक है, वह भी धारा 23 के तहत गैरकानूनी नहीं है। इसलिए तर्कों को नकारात्मक किया जाना चाहिए।

वे कैसे भिन्न हैं

जैसा कि हमने देखा है कि आकस्मिक अनुबंध और दांव लगाने के समझौते वास्तव में क्या हैं, वे बहुत समान हैं। लेकिन जैसा कि एक अनुबंध है और दूसरा एक समझौता है, दोनों के बीच के अंतर को जानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत अच्छी तरह से विनियमित (रेगुलेटेड) हैं और इन दोनों दस्तावेजों से निपटने के दौरान किसी भी भ्रम की स्थिति गंभीर हो सकती है। तो आइए हम कुछ विशिष्ट विशेषताओं को देखें, जो एक टेबल के माध्यम से एक आकस्मिक अनुबंध को एक दांव लगाने के समझौते से अलग करती हैं:

अंतर के बिंदु आकस्मिक अनुबंध दांव लगाने के समझौते
दस्तावेज़ के प्रकार एक आकस्मिक अनुबंध कानून द्वारा लागू करने योग्य है। इसका मतलब यह है कि किसी घटना के घटित होने या न होने पर आधारित कोई भी अनुबंध, जिसका कानून द्वारा विरोध किया जाता है, को एक वैध अनुबंध नहीं माना जाएगा।  एक दांव एक ऐसा समझौता है जिसे कानून द्वारा लागू किया जा सकता है या लागू नहीं भी किया जा सकता है।
उल्लिखित भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 31 में एक आकस्मिक अनुबंध का उल्लेख किया गया है, और यह कानूनी रूप से मान्य है।  भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 30 में एक दांव समझौते का उल्लेख किया गया है। इस धारा के अनुसार, दांव समझौते को शून्य माना जाता है।
परिभाषा भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 31 में कहा गया है कि एक आकस्मिक अनुबंध भविष्य की अनिश्चित घटना के परिणाम के आधार पर कुछ करने या न करने का अनुबंध है, जो इस अनुबंध के लिए संपार्श्विक है।  भारतीय अनुबंध अधिनियम दांव लगाने के समझौते को परिभाषित नहीं करता है। हालांकि, एक दांव का मतलब भविष्य की अनिश्चित घटना के परिणाम के आधार पर किसी चीज पर दांव लगाकर लाभ या हानि उठाना है।
हित एक आकस्मिक अनुबंध में हित होता है, क्योंकि अनिश्चित भविष्य की घटना के आधार पर एक कार्य किया जाता है।  एक दांव समझौते में, एकमात्र हित यह है कि क्या मुझे लाभ हुआ है या नुकसान हुआ है, जो एक घटना के परिणाम पर निर्भर करता है।
अनिश्चित भविष्य घटना एक अनिश्चित भविष्य की घटना अनुबंध के लिए द्वितीयक या संपार्श्विक है। यह अनुबंध के परिणाम को निर्धारित नहीं करता है।   एक अनिश्चित भविष्य की घटना ही एकमात्र कारक है जो यह निर्धारित करती है कि दांव किसने जीता है।
पारस्परिक वादा एक आकस्मिक अनुबंध में, पारस्परिक वादे हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते है।  एक दांव समझौते में, पारस्परिक वादे शामिल होते हैं।

निष्कर्ष

इन दोनों अवधारणाओं का विश्लेषण करने के बाद, यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि क्या एक आकस्मिक अनुबंध एक दांव लगाने के समझौते से बेहतर है क्योंकि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत एक दांव समझौता शून्य है। एक आकस्मिक अनुबंध एक ही समय में वैध है, लेकिन प्रदर्शन के रूप में जोखिम भरा है और अनुबंध की अनिश्चित भविष्य की घटना पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना सुरक्षित है कि अनुबंध या समझौते में प्रवेश करते समय, उन सभी तत्वों और नियमों का पालन करना बेहतर होता है, जो अनुबंध को कानूनी रूप से वैध बनाते हैं।

संदर्भ

 

 

सी.आर.पी.सी. और व्यक्तिगत कानूनों के तहत भरण पोषण- एक तुलनात्मक अध्ययन

यह लेख रांची के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ की छात्रा Pragya Rakshita के द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वह सीआरपीसी के तहत भरण पोषण (मेंटेनेंस) के प्रावधान पर चर्चा करती है और साथ ही इस प्रावधान की तुलना विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों जैसे हिंदू, मुस्लिम, पारसी आदि से करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है, लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की समझ, इस शब्द की दुनिया भर में प्रसिद्ध धारणा से अलग है। भारत में, धर्मनिरपेक्षता का मतलब केवल यह नहीं है कि सरकार किसी धर्म को स्वीकार नहीं करती है, इसके बजाय, इसका अर्थ यह है कि यहां राज्य सभी धर्मों को स्वीकार करता है और उनका सम्मान करता है, और सभी को अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करने की अनुमति देता है।

भरण पोषण को कानूनी रूप से वित्तीय सहायता के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका भुगतान एक पूर्व पति द्वारा उसकी पत्नी को कानूनी अलगाव (सेपरेशन) या तलाक के अनुसार किया जाता है। यह वित्तीय सहायता पत्नी या तलाकशुदा पत्नी की आजीविका (लाइवलीहुड) के लिए, उसके बच्चों के लिए, संपत्ति के देख भाल के लिए, और यहां तक ​​कि कुछ मामलों में, उसे मुकदमे में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंट) करने के लिए सक्षम बनाने के लिए दी जाती है।

भरण पोषण से संबंधित प्रावधान अलग-अलग कानूनों के तहत अलग-अलग होते हैं। लेकिन, भरण पोषण का एक धर्मनिरपेक्ष कानून भी है जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत दिया गया है। हिंदुओं के लिए उनके भरण पोषण के कानून उनके व्यक्तिगत कानूनों के तहत प्रदान किए गए हैं; मुसलमानों के लिए, इन्हे मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के तहत दिया गया है; और ईसाइयों और पारसियों के लिए, उनके संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के तहत प्रदान किया गया है। साथ ही, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का कानून भी प्रदान किया गया है, जो प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, इसलिए किसी भी व्यक्ति द्वारा, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, इस प्रावधान को लागू किया जा सकता है। अन्य व्यक्तिगत कानूनों की तुलना में सी.आर.पी.सी. में यह एक अनूठी (यूनिक) विशेषता है।

इस लेख में, लेखक के द्वारा व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ सी.आर.पी.सी. के तहत विभिन्न भरण पोषण कानूनों का पता लगाया जाएगा और उनके बीच की विभिन्नताओं का विश्लेषण भी किया जाएगा। अंत में, लेखक के द्वारा तलाकशुदा महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ बेहतर उपाय खोजने का प्रयास किया गया है।

सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण 

सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण के प्रावधान प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि किसी भी धर्म या आस्था से संबंधित कोई भी महिला इसके तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है। भरण पोषण का कानून दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125-128 के तहत प्रदान किया गया है, और यह प्रकृति में दीवानी (सिविल) है। इस धारा के तहत, पत्नी, बच्चों और माता-पिता द्वारा भरण पोषण का दावा किया जा सकता है। धारा 125 से 128 उन व्यक्तियों के खिलाफ एक त्वरित (स्पीडी), प्रभावी और सस्ता उपाय प्रदान करती है, जो अपनी आश्रित (डिपेंडेंट) पत्नियों, बच्चों और माता-पिता की उपेक्षा या भरण पोषण करने से इनकार करते हैं।

इस शोध परियोजना (रिसर्च प्रोजेक्ट) में केवल एक व्यक्ति की पत्नी पर होने वाले प्रभाव पर ध्यान दिया गया है। धारा 125 के स्पष्टीकरण (एक्सप्लेनेशन) के भाग (B) के अनुसार, एक “पत्नी” शब्द के तहत एक ऐसी महिला शामिल है, जिसे उसके पति के द्वारा तलाक दे दिया गया है, या उसने उससे तलाक ले लिया है और फिर से विवाह नहीं किया है। तो इस धारा के तहत भरण पोषण का प्रावधान एक तलाकशुदा पत्नी पर भी लागू होता है, न कि केवल यह एक विवाहित पत्नी के लिए ही है।

हालांकि यह कानून धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन एक पहलू से देखा जाए तो यह सिर्फ एक ही लिंग पर ध्यान देता है। इस कानून के तहत भरण पोषण का दावा केवल पत्नी के द्वारा ही किया जा सकता है, न कि पति के द्वारा। साथ ही “पत्नी” शब्द की व्याख्या पर भी विचार करने की आवश्यकता है। सविताबेन सोमभाई भाटिया बनाम स्टेट ऑफ़ गुजरात के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार, धारा 125 (1) के तहत, “पत्नी” शब्द की परिभाषा में आने वाली महिला का अर्थ केवल कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। लेकिन, डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल और चानमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा के हाल ही के फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि ऐसे मामलों में जहां महिला शादी जैसे रिश्ते में थी, लेकिन धारा 125 के तहत उसे कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं माना जाता है, तो वह घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती है।

तो, यदि एक पत्नी पर, कानूनी रूप से विवाहित होने पर इतना जोर दिया जाता है तो जिन धर्मों में, जिन में केवल एकांगी (मोनोगेमस) संबंध बनाने की अनुमति दी जाती है, तो ऐसे में उन धर्मों में दूसरी पत्नी का क्या होता है? इस प्रश्न पर, इस शोध पत्र के अगले अध्यायों में चर्चा की गई है।

हिंदू व्यक्तिगत कानून के तहत भरण पोषण की अवधारणा

हिंदू व्यक्तिगत कानून के तहत, महिलाओं को,  हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम (हिंदू एडॉप्शन एंड मैटेनेंस एक्ट), 1956 के तहत भरण पोषण प्रदान किया जाता है।

हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत, पति द्वारा पत्नी को भरण पोषण प्रदान करने का प्रावधान है। इस धारा के उद्देश्य के लिए, पत्नी शब्द में तलाकशुदा पत्नी को शामिल नहीं किया गया है। यह धारा केवल विवाहित पत्नी पर ही लागू होती है। पति अपने जीवनकाल के दौरान उसे भरण पोषण प्रदान करने के लिए बाध्य है। वह उसे तब भी भरण पोषण प्रदान करने के लिए बाध्य है, जब वह उससे अलग रह रही हो, लेकिन तभी जब इस तरह के अलगाव को इस विशेष धारा के तहत दिए गए किसी भी कारण से उचित ठहराया जाता है। यह धारा भी सिर्फ एक ही लिंग पर ध्यान देती है।

वहीं दुसरी तरफ, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत भरण पोषण का प्रावधान एक अलग स्तर पर है। इस धारा के तहत पति या पत्नी में से कोई भी भरण पोषण का दावा कर सकता है। कोई भी पक्ष भरण पोषण के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है और यह केवल पत्नी तक ही सीमित नहीं है। हालांकि, किसी व्यक्ति को भरण पोषण प्रदान किया जाएगा या नहीं, यह तय करने के लिए मानदंड एक ही लिंग पर जोर देते हैं। इसका मतलब है कि महिलाओं के लिए, पुरुषों की तुलना में अलग मानदंड है।

कंचन बनाम कमलेंद्र के मामले के अनुसार, यह माना गया था कि पति अपनी पत्नी से केवल तभी भरण पोषण पाने का हकदार है, जब वह स्वतंत्र आय प्राप्त करने में शारीरिक या मानसिक रूप से सक्षम ना हो। जबकि, मनोकरण बनाम देवकी के मामले के निर्णय के अनुसार, पत्नी को भरण पोषण का हक तब ही प्रदान किया जाता है जब कार्यवाही के दौरान किसी भी समय यह देखा जाता है कि उसके पास पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं है। इसलिए, पत्नी को केवल यह साबित करना होता है कि उसके पास पर्याप्त और स्वतंत्र आय नहीं है। वहीं दूसरी ओर, पति को यह भी साबित करना होता है कि वह कमाई करने में सक्षम नहीं है। साथ ही, चित्रा बनाम ध्रुबा के मामले में, यह निर्णय लिया गया था कि भरण पोषण का मतलब केवल जिंदा रहने के लिए सहारा प्रदान करना नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह भी है कि दावेदार को भी पति या पत्नी के समान जिंदगी जीने के बराबर के स्तर पर होना चाहिए। इसलिए, भरण पोषण की मात्रा भी इसी के अनुसार तय की जानी चाहिए।

इसके अलावा, रमेश चंद्र रामप्रतापजी डागा बनाम रामेश्वरी रमेश चंद्र डागा के मामले में, यह माना गया था कि अभिव्यक्ति “किसी भी डिक्री को पारित करने के समय” के तहत, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 से 13 के तहत पास की गई सभी डिक्री शामिल की गई है। इस प्रकार, न्यायालय किसी भी प्रकार की डिक्री, जिसके परिणामस्वरूप विवाह भंग हो सकता है को पास करते समय भरण पोषण प्रदान कर सकता है।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

इन दोनों कानूनों के तहत भरण पोषण का कानून बहुत अलग स्तर पर है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार, पति या पत्नी दोनों भरण पोषण का दावा कर सकते हैं; जबकि सी.आर.पी.सी. के तहत केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है। इसके अलावा, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए पत्नी को केवल यह साबित करने की आवश्यकता होती है कि उसके पास पर्याप्त और स्वतंत्र आय नहीं है। जबकि, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए, उसे यह भी साबित करना होता है कि उसके पति ने उसे भरण पोषण प्रदान करने से या तो इनकार कर दिया है या फिर प्रदान करने की उपेक्षा की है।

शंभू नाथ पाठक बनाम कांति देवी के मामले में, यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि पत्नी सी.आर.पी.सी. और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 दोनों के तहत भरण पोषण का लाभ दो बार नहीं ले सकती है। वह इन दोनो कानूनों में से केवल एक के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती है।

भरण पोषण के लिए दूसरी पत्नी की स्थिति

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत, अधिनियम की धारा 5 (i) के अनुसार केवल एक विवाह नियम प्रदान किया गया है। साथ ही, इस अधिनियम की धारा 17 ऐसी दूसरी शादी को शून्य घोषित कर देती है, और आई.पी.सी., 1860 की धारा 494 और 495 को संदर्भित करती है, जिसके अनुसार, द्विविवाह एक दंडनीय अपराध है।

जैसा कि भाऊराव शंकर लोखंडे और अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र और अन्य के मामले में यह आयोजित किया गया था की, दुसरे विवाह के लिए आई.पी.सी., 1860 की उपर प्रदान की गई धाराओं के तहत, द्विविवाह को दंडित करने के लिए, यह आवश्यक है कि दूसरी शादी का प्रदर्शन वैध रूप से किया जाना चाहिए। लेकिन, भरण पोषण प्रदान करने के प्रश्न के लिए, केवल यह ही महत्वपूर्ण नहीं है कि विवाह का ‘अनुष्ठान (सोलमनाइज)’ कानूनी रूप से किया गया हो, या वैध रूप से किया गया हो, बल्कि महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्नी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी होनी चाहिए।

तो, क्या दूसरी पत्नी ऐसी स्थिति में भरण पोषण प्राप्त करने के लिए सक्षम होगी?

इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न मामलों में दिया गया है जो नीचे दिए गए हैं:

बादशाह बनाम सौ उर्मिला बादशाह गोडसे और अन्य के ऐतिहासिक मामले में यह माना गया था कि कुछ परिस्थितियों में दूसरी पत्नी को भी सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का हक प्रदान किया जा सकता है। भले ही कोई पुरुष और महिला बिना किसी वैध विवाह के लंबे समय से एक दुसरे के साथ रह रहे हो, इस स्थिति में पत्नी को सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए। यदि दूसरी पत्नी को यह गलत बयान दिया गया था कि वह पुरुष अविवाहित है और इस विवाह में प्रवेश करने के लिए सक्षम है, और यदि महिला को शादी के समय इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके पति की एक जीवित जीवनसाथी है, तो दूसरी पत्नी भरण पोषण की हकदार है।

मल्लिका और अन्य बनाम पी कुलंदी के मामले में, यह माना गया था कि यदि पति ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, तो उसकी दूसरी पत्नी को भरण पोषण का अधिकार होना चाहिए।

राजेश बाई बनाम शांताबाई के मामले में, एक महिला की शादी को, उसके पति के किसी भी पिछले विवाह के अस्तित्व में होने के कारण शून्य घोषित कर दिया गया था, लेकिन यहां अदालत ने माना कि उसे हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम, 1956 के तहत भरण पोषण का दावा करने का भी अधिकार है। 

इस प्रकार, उपरोक्त निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि दूसरी पत्नी, हालांकि कानूनी पत्नी नहीं है, लेकिन तब भी वह सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण की हकदार है। सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत कार्यवाही में शादी के सबूत का मानक (स्टैंडर्ड ऑफ़ प्रूफ) उतना सख्त नहीं होता है जितना कि आई.पी.सी. की धारा 494 के तहत अपराध के मुकदमे में आवश्यक होता है। इस धारा का उद्देश्य सामाजिक तौर पर न्याय प्रदान करना है जिसे ऐसे निर्णयों के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है।

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत भरण पोषण की अवधारणा

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत, कानून कहता है कि जिस पति ने अपनी पत्नी को तलाक दिया है, उसे इद्दत की अवधि के दौरान उसके लिए भरण पोषण प्रदान करना होगा। हिदाया भरण पोषण को इस प्रकार परिभाषित करते है: “वे सभी चीजें जो जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, जैसे भोजन, कपड़े और रहने की जगह; यह केवल भोजन तक ही सीमित हो सकता है।” फतवा-ए-आलमगिरी इसे इस प्रकार परिभाषित करते है “भरण पोषण के तहत, भोजन, वस्त्र और रहने की जगह आते है, हालांकि आम बोलचाल में यह केवल भोजन तक ही सीमित है”।

इसलिए, सामान्य व्यवहार में, भरण पोषण में केवल पत्नी को भोजन उपलब्ध कराने का खर्च शामिल होता है। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून यह कहते है कि पति को केवल अपनी पत्नी को ही भरण पोषण प्रदान करना चाहिए, न कि तलाकशुदा पत्नी को। तलाक के बाद, उसे केवल इद्दत अवधि के लिए भरन पोषण प्रदान करने की आवश्यकता होती है। आमतौर पर देखा जाए तो, दहेज के भुगतान को पत्नी के लिए पर्याप्त भरण पोषण माना जाता है।

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में भरण पोषण का कानून विभिन्न मामलों के माध्यम से निम्नलिखित तरीके से विकसित हुआ है-

बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन के मामले में, यह माना गया था कि चूंकि दहेज की राशि सी.आर.पी.सी. की धारा 127(3)(B) के तहत दी गई ‘देय राशि’ शब्द के अर्थ के अंतर्गत आती है, इसलिए एक महिला जो इसे पहले ही प्राप्त कर चुकी है, वह सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत आगे के भरण पोषण की हकदार नहीं है।

फ़ुज़लुनबी बनाम के. खादर वली के अगले मामले में, यह निर्णय लिया गया था कि मेहर की पर्याप्तता को देखते हुए ही पति को कोई और भुगतान करने से मुक्त किया जाना चाहिए।

फिर, मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम के ऐतिहासिक मामले के आलोक में, अंततः यह साफ हो गया था कि मेहर धारा 127(3)(B) के तहत नहीं आती है, क्योंकि यह पति पर एक दायित्व है, और पत्नी के सम्मान के रूप में भुगतान किया जाता है, न कि तलाक पर पत्नी को देय राशि के रूप में।

उसके बाद, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पास किया गया था, जहां न्यायोचित और उचित प्रावधान किया जाना चाहिए और इद्दत की अवधि के भीतर भरण पोषण का भुगतान किया जाना चाहिए।

डेनियल लतीफी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले को तब उपरोक्त अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए दायर किया गया था, जहां यह माना गया था कि यह संवैधानिक रूप से वैध था, और हालांकि भरण पोषण का भुगतान इद्दत की अवधि के भीतर किया जाना था, और इसलिए यह उसे अपने पूरे जीवन के लिए बनाए रखने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

अंत में, अब्दुल लतीफ मंडल बनाम अनुवारा खातून के मामले में, यह चर्चा की गई थी कि चूंकि सी.आर.पी.सी. की धारा 125 का उद्देश्य महिला को बेसहारा होने से रोकना था, और चूंकि यह तेज है, इसलिए मुस्लिम महिलाएं अभी भी सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

मुस्लिम महिलाएं भी सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की तुलना में, सी.आर.पी.सी. के तहत तलाकशुदा महिलाओं को भी भरण पोषण का अधिकार दिया जाता है। यह एक विवाद और कानून का सवाल था कि क्या मुस्लिम में तलाकशुदा महिलाएं दहेज प्राप्त करने के बाद भी सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण के अधिकार का दावा कर सकती हैं या नहीं। यह विवाद ऊपर सूचीबद्ध मामलों के माध्यम से हमेशा के लिए सुलझा लिया गया है।

इसके अलावा, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 में यह भी प्रावधान दिया गया है कि दोनों पक्ष मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के बजाय सी.आर.पी.सी. की धारा 125 से 128 के तहत धर्मनिरपेक्ष कानून द्वारा शासित होने का विकल्प चुन सकते हैं। इस प्रकार, महिलाएं सी.आर.पी.सी. या मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती हैं।

इस परिदृश्य (सिनेरियो) में सी.आर.पी.सी. एक अधिक उपयुक्त उपाय है क्योंकि यह व्यक्तिगत कानून की तुलना में विवाहित और तलाकशुदा दोनों पत्नियों के लिए भरण पोषण का प्रावधान करता है। साथ ही, धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत भरण पोषण की मात्रा अधिक उचित है, जबकि व्यक्तिगत कानून के तहत सिर्फ मेहर के भुगतान को ही पर्याप्त माना जाता है। इसके अलावा, सी.आर.पी.सी. के तहत, भरण पोषण पूरे जीवन के लिए है, जबकि व्यक्तिगत कानून के तहत, यह इद्दत की अवधि तक के लिए है।

ईसाई और पारसी व्यक्तिगत कानून और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत भरण पोषण

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 40 के तहत पारसियों के लिए भरण पोषण का कानून प्रदान किया गया है। यह धारा बिल्कुल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 की तरह ही है। इसके अनुसार भी पति या पत्नी दोनों ही भरण पोषण का दावा कर सकते हैं। 

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 37 विवाह के विघटन (डिसोल्यूशन) या न्यायिक अलगाव की डिक्री प्राप्त होने की स्थिति में पति द्वारा पत्नी के भरण पोषण का प्रावधान करती है। इसके अनुसार केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है।

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 38 और पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 41 में समान प्रावधान हैं। इन धाराओं में प्रावधान है कि भरण पोषण की राशि का भुगतान या तो स्वयं पत्नी को या उसके ट्रस्टियों को किया जा सकता है।

अंतर-धार्मिक विवाह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 द्वारा शासित होते हैं। इस अधिनियम की धारा 37 भरण पोषण के पहलू से संबंधित है। इस धारा के तहत, केवल पत्नी ही भरण पोषण का दावा कर सकती है, और इसलिए, यह एक विशिष्ट लिंग पर ध्यान देती है।

सी.आर.पी.सी. के साथ तुलना

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम की तुलना में, सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का प्रावधान केवल पत्नी तक सीमित है। इसके अलावा, सी.आर.पी.सी. सभी धर्मों तक फैली हुई है। लेकिन पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 केवल पारसियों को नियंत्रित करता है, और भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 केवल ईसाइयों को नियंत्रित करता है, और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर-धार्मिक विवाह के मामलों में लागू होता है।

निष्कर्ष

विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ सी.आर.पी.सी. के धर्मनिरपेक्ष कानून में दिए गए भरण पोषण के कानूनों में विभिन्न अंतर हैं।

हिंदू कानूनों के तहत, पुरुष भी भरण पोषण प्राप्त करने के पात्र हैं। लेकिन दूसरी शादी के मामलों में, दूसरी पत्नियों को केवल सी.आर.पी.सी. की धारा 125 में भरण पोषण मिल सकता है। इसलिए, भरण पोषण प्राप्त करने के लिए हिंदू व्यक्तिगत कानून की तुलना में सी.आर.पी.सी. एक बेहतर सहारा है।

मुस्लिम महिलाओं के मामले में, उनके लिए यह निश्चित रूप से अधिक फायदेमंद है कि वे अपने व्यक्तिगत कानून के बजाय सी.आर.पी.सी. के तहत भरण पोषण का दावा करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाए। सी.आर.पी.सी. उचित मात्रा में भरण पोषण प्रदान करती है। साथ ही, यह मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, जो केवल इद्दत की अवधि तक भरण पोषण का प्रावधान करता है, के विपरीत तलाकशुदा महिलाओं पर भी लागू होता है। यह मुस्लिम कानून के विपरीत आजीवन भरण पोषण का भी प्रावधान करता है ।

इस प्रकार, पूरी चर्चा और तुलना के माध्यम से, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सी.आर.पी.सी., एक धर्मनिरपेक्ष, न्यायसंगत, प्रभावी, सस्ती और तेज विधि होने के कारण, तलाकशुदा महिलाओं द्वारा भरण पोषण प्राप्त करने के लिए सबसे अनुकूल (फेवरेबल) विकल्प है।

संदर्भ

  • R. V. Kelkar, Criminal Procedure 833 (K. N. Chandrasekharan Pillai ed., 6th ed. 2014).
  • 2005) 3 SCC 636.
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  • AIR 1992 Bom 493.
  • AIR 2003 Mad 212.
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  • 2000 CriLJ 142.
  • AIR 1982 Bom 231.
  • AIR 1979 SC 362.
  • AIR 1980 SC 1730.
  • AIR 1985 SC 945.
  • AIR 2001 SC 3958.
  • (2002) 1 CLJ 186.

 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत साक्ष्य और विभिन्न प्रकार के साक्ष्य क्या हैं

यह लेख यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून की Saswata Tewari ने लिखा है। यह लेख भारतीय कानून में साक्ष्य के अर्थ और एक मामले में विभिन्न प्रकार के साक्ष्य की प्रासंगिकता (रिलेवेंसी) के बारे में विस्तार से बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

सर टेलर ने साक्ष्य के नियम को एक ऐसे तरीके के रूप में वर्णित किया था, जिसके माध्यम से तर्क किसी भी तथ्य को साबित या अस्वीकृत कर सकता है। जिसकी सच्चाई न्यायिक जांच को दी जाती है।

अदालत में, किसी भी मामले का साक्ष्य एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि अदालत में हर आरोप या मांग को कुछ साक्ष्यों द्वारा समर्थित किया जाता है अन्यथा इसे निराधार माना जाएगा। ‘एविडेंस’ शब्द लैटिन अभिव्यक्ति ‘एविडेंस एविडेरे’ से लिया गया है जिसका अर्थ है कि साक्ष्य की स्थिति स्पष्ट या कुख्यात है।

भारत में, विभिन्न प्रकार के साक्ष्य प्रतिदिन अदालत में प्रस्तुत किए जाते हैं और साक्ष्य का क्षेत्र भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1882 द्वारा शासित होता है। हालांकि, किसी को आश्चर्य हो सकता है कि साक्ष्य का सही अर्थ क्या हो सकता है और अदालत में प्रस्तुत किए गए मुख्य प्रकार के साक्ष्य क्या हैं।

साक्ष्य कानून की अवधारणा

यदि कोई ‘साक्ष्य’ शब्द का विश्लेषण करता है, तो इसका सीधा सा मतलब सबूत देने की स्थिति है। लेकिन यह अर्थ उन चीजों पर लागू होता है जो किसी चीज के बारे में साक्ष्य देने का इरादा रखते हैं।

अंग्रेजी कानून

अंग्रेजी कानून के अनुसार, ‘साक्ष्य’ शब्द का अर्थ अदालत के गवाहों द्वारा बोले गए शब्दों और प्रदर्शित चीजों से भी हो सकता है। हालांकि, यह उन शब्दों या चीजों से साबित हुए तथ्यों को भी इंगित कर सकता है और अंततः अन्य तथ्यों पर निष्कर्ष के रूप में चुना जाता है जो साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। साथ ही, इस बात का दावा करने के लिए साक्ष्य हटाया जा सकता है कि एक निश्चित तथ्य उस मामले के लिए प्रासंगिक है जो जांच के अधीन है।

भारतीय कानून

हालांकि, भारतीय कानून में, साक्ष्य को अधिक निश्चित अर्थ दिया गया है और इसका उपयोग केवल इसके पहले अर्थ में किया जाता है। इस प्रकार अधिनियम के आधार पर, यह कहा जा सकता है कि ‘साक्ष्य’ शब्द का अर्थ केवल उन उपकरणों से है जिनके माध्यम से उपयुक्त तथ्य न्यायालय के समक्ष लाए जाते हैं और जिनकी सहायता से न्यायालय इन तथ्यों से आश्वस्त होता है। इसलिए, गवाहों के बयानों और अदालत के निरीक्षण के लिए प्रदान किए गए दस्तावेजों के अलावा अन्य मुकदमे के दौरान किसी भी आरोपी व्यक्ति के स्वीकारोक्ति (कन्फेशन) या बयान साक्ष्य होते है।

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पक्षों द्वारा दिए गए बयान जब गवाहों के अलावा जांचे जाते हैं, गवाहों के आचरण, स्थानीय जांच या निरीक्षण (इंस्पेक्शन) के परिणाम, और हथियार, उपकरण, चोरी की संपत्ति इत्यादि जैसे दस्तावेजों के अलावा अन्य भौतिक वस्तुओं, को भारतीय कानून के तहत दी गई साक्ष्य की परिभाषा के अनुसार साक्ष्य नहीं माना जाता है।

फिर भी, इन मामलों का न्यायालय द्वारा वैध रूप से विचार किया जाता है। ‘साक्ष्य’ की परिभाषा को ‘साबित’ की परिभाषा के साथ पढ़ा जाना चाहिए और इन दो परिभाषाओं के जोड़ने के परिणाम को मामले में स्पष्ट होने के लिए एक तथ्य का पता लगाने के लिए माना जाता है। हालांकि, ये केवल वे चीजें नहीं हैं जिन्हें अदालतें अपना निष्कर्ष बनाते समय ध्यान में रखती हैं। एक बयान जो अधिनियम की धारा 164 के तहत दर्ज किया जा रहा है, अधिनियम के दायरे में साक्ष्य नहीं माना जाता है। इसलिए किसी आरोपी द्वारा दिए गए स्वीकारोक्ति को भी सामान्य अर्थ में साक्ष्य नहीं माना जाएगा। यहां तक ​​​​कि शत्रुतापूर्ण (होस्टाइल) गवाहों द्वारा प्रस्तुत या बताए गए साक्ष्य को भी न्यायालय द्वारा पूरी तरह से बाहर नहीं किया जाता है।

जब किसी मामले में अपीलकर्ता की शक्तियों को पहचानने की बात आती है तो अदालत के पास व्यापक शक्तियां होती हैं। अदालत के पास साक्ष्य की समीक्षा (रिव्यू) करने का पूरा अधिकार है। आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धि या बेगुनाही के बारे में अपने निष्कर्ष पर पहुंचना, साक्ष्य और प्रासंगिक परिस्थितियों के माध्यम से अदालत की शक्तियों के भीतर है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में साक्ष्य की परिभाषा

साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 3 के अनुसार, साक्ष्य का अर्थ है और इसमें शामिल हैं:

  • ऐसे सभी बयान जिन्हें अदालत जांच के तहत तथ्य के मामलों के संबंध में गवाहों द्वारा उसके सामने पेश करने की अनुमति देती है या पेश करने की आवश्यकता है। इन बयानों को मौखिक साक्ष्य कहा जाता है।
  • किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सहित ऐसे सभी दस्तावेज निरीक्षण के लिए न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए है। इन दस्तावेजों को दस्तावेजी साक्ष्य कहा जाता है।

साक्ष्य के प्रकार

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में दी गई परिभाषा के अनुसार, साक्ष्य को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • मौखिक साक्ष्य;
  • दस्तावेज़ी साक्ष्य।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि साक्ष्य मौखिक और दस्तावेजी दोनों हो सकते हैं और साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में अदालत में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि आपराधिक मामलों में भी, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के माध्यम से साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकता है। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी शामिल है।

मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • प्रत्यक्ष या प्राथमिक (डायरेक्ट और प्राइमरी);
  • अप्रत्यक्ष या द्वितीयक (इंडायरेक्ट और सेकेंडरी)।

वास्तविक या भौतिक (मैटेरियल) साक्ष्य की भी एक श्रेणी है, जिसकी भौतिक वस्तुओं द्वारा न्यायालय के निरीक्षण के लिए भेजा जाता है जैसे कि चोरी की गई वस्तु या अपराध का हथियार।

  • मौखिक साक्ष्य

मौखिक साक्ष्य उस साक्ष्य को प्रस्तुत करता है जो मुख्य रूप से मुंह से बोले जाने वाले शब्द हैं। यह किसी भी दस्तावेजी साक्ष्य के समर्थन के बिना साबित करने के लिए पर्याप्त है, बशर्ते इसमें विश्वसनीयता होनी चाहिए।

प्राथमिक मौखिक साक्ष्य वह साक्ष्य है जिसे किसी गवाह की इंद्रियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से सुना या देखा या एकत्र किया गया है। इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 द्वारा परिभाषित प्रत्यक्ष साक्ष्य कहा जाता है।

कानून की अदालत में आम तौर पर अप्रत्यक्ष साक्ष्य स्वीकार्य नहीं हैं क्योंकि तथ्यों की रिपोर्ट करने वाला व्यक्ति मुद्दों में तथ्यों का वास्तविक गवाह नहीं होता है। हालांकि, अप्रत्यक्ष साक्ष्य के मामले में कुछ अपवाद हैं जहां यह कानून की अदालत में स्वीकार्य है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 और धारा 33, अप्रत्यक्ष साक्ष्य के असाधारण मामलों के बारे में बताती है।

  • दस्तावेज़ी साक्ष्य

दस्तावेजी साक्ष्य वह साक्ष्य है जो किसी भी चीज पर अक्षरों, अंकों या चिह्नों के माध्यम से वर्णित या व्यक्त किए गए या एक से अधिक तरीकों से किसी भी मुद्दे का उल्लेख करता है, जिसे मुद्दे को रिकॉर्ड करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस तरह के साक्ष्य अदालत में एक विवादित तथ्य को साबित करने के लिए एक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।

प्राथमिक दस्तावेजी साक्ष्य में वे साक्ष्य शामिल होते हैं जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 में उल्लिखित मूल दस्तावेज हैं, जबकि द्वितीयक दस्तावेजी साक्ष्य ऐसे साक्ष्य होते हैं जिनमें कुछ परिस्थितियों में अदालत में प्रस्तुत किए जा सकने वाले दस्तावेजों की प्रतियां या भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 और धारा 65 में उल्लिखित दस्तावेज शामिल होते हैं।  

  • प्रत्यक्ष या प्राथमिक साक्ष्य

प्रत्यक्ष साक्ष्य को मामले में निर्णय लेने के लिए आवश्यक, सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। प्रत्यक्ष साक्ष्य किसी तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करता है या तथ्य को उसके गुण से अस्वीकृत करता है। प्रत्यक्ष साक्ष्य के मामले में, तथ्य से संबंधित किसी कारण को बताए बिना किसी विशेष तथ्य को सीधे स्वीकार कर लिया जाता है। किसी को दिए गए दृष्टांत (इलस्ट्रेशन) को इंगित करने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि अदालत में गवाह द्वारा दिया गया साक्ष्य प्रत्यक्ष साक्ष्य है जो मामले को अपराध के तथ्य की गवाही के खिलाफ साबित करने के लिए पर्याप्त है।

साथ ही, कभी-कभी सर्वोत्तम साक्ष्य का नियम न्यायालय में प्रत्यक्ष साक्ष्य को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सर्वोत्तम साक्ष्य का नियम कानून का एक नियम है जिसमें केवल प्राथमिक साक्ष्य ही शामिल होते है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई दस्तावेज या रिकॉर्डिंग से संबंधित साक्ष्य अदालत में पेश किए जाते हैं तो केवल मूल साक्ष्य ही स्वीकार्य होंगे जब तक कि अदालत में मूल का उपयोग न करने का कोई कारण न हो।

  • अप्रत्यक्ष साक्ष्य

अप्रत्यक्ष साक्ष्य वह साक्ष्य है जो अन्य तथ्यों को अप्रत्यक्ष साक्ष्य देकर प्रश्नगत तथ्यों को साबित करता है और बाद में मुद्दे से उनकी प्रासंगिकता साबित करता है। अन्य तथ्यों की एक श्रृंखला को प्रश्नगत तथ्यों से जोड़कर इस तरह के साक्ष्य से हटाया जा सकता है। ये अप्रत्यक्ष तथ्य विचाराधीन तथ्यों से संबंधित होते है और इनका एक कारण और प्रभाव का संबंध होता है।

प्रत्यक्ष प्रमाण का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है

  • सुने हुए साक्ष्य के खिलाफ

इस विरोध के अनुसार, प्रत्यक्ष साक्ष्य एक तथ्य द्वारा दिया गया साक्ष्य है जिसे एक गवाह द्वारा अपनी इंद्रियों या गवाह द्वारा आयोजित एक राय के साथ महसूस किया जाता है जबकि सुने हुए साक्ष्य इस बात का साक्ष्य है कि किसी अन्य व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति द्वारा क्या देखा या सुना है। इस अंतर को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 में देखा जा सकता है, जहां ‘प्रत्यक्ष’ शब्द का प्रयोग ‘सुने हुए’ शब्द के विपरीत किया जाता है।

  • परिस्थितिजन्य (सर्कमस्टेंशियल) साक्ष्य के खिलाफ

प्रत्यक्ष साक्ष्य वह साक्ष्य है जो स्पष्ट रूप से प्रश्न में ही जाता है और जो, यदि माना जाता है, तो किसी भी तर्क से किसी भी मदद की आवश्यकता के बिना प्रश्न में तथ्य को साबित कर देगा, उदाहरण के लिए साक्ष्य जैसे कि हत्या के एक चश्मदीद गवाह की गवाही, जबकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य विचाराधीन मुद्दे को साबित नहीं करेगा, लेकिन यह केवल अनुमान या तर्क से बिंदु का पता लगाता है।

उदाहरण के लिए, इस तथ्य का प्रमाण कि एक व्यक्ति का किसी अन्य व्यक्ति की हत्या करने का मकसद था और हत्या के समय उस व्यक्ति को एक खंजर के साथ देखा गया था, जो मारे गए व्यक्ति की जगह की ओर जा रहा था और कुछ ही समय बाद, वही से खून से सने कपड़ों में लौटते हुए देखा गया था, अप्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य कहलाएंगे।

प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बीच अंतर

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, मामले में तथ्यों के अस्तित्व होने या अस्तित्व में न होने की अदालती कार्यवाही में साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकता है और ऐसे अन्य तथ्य जिन्हें अधिनियम द्वारा प्रासंगिक माना जाता है। यदि प्रस्तुत साक्ष्य किसी तथ्य के अस्तित्व होने या अस्तित्व में न होने से सीधे संबंधित है तो साक्ष्य को प्रत्यक्ष माना जाएगा, लेकिन यदि साक्ष्य केवल एक प्रासंगिक तथ्य के अस्तित्व या गैर-अस्तित्व से संबंधित है तो इसे अप्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना जायेगा। हालांकि, इस धारा द्वारा समझे गए प्रत्यक्ष साक्ष्य को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 में परिभाषित के रूप में भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। धारा 60 के अनुसार, ‘प्रत्यक्ष साक्ष्य’ शब्द का प्रयोग ‘सुनी हुई साक्ष्य’ के विपरीत किया जाता है, न कि ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ के विपरीत और इस प्रकार, धारा के अनुसार, परिस्थितिजन्य साक्ष्य हमेशा प्रत्यक्ष होना चाहिए जैसा कि उन तथ्यों में होता है जिनसे मुद्दे में तथ्य के अस्तित्व को स्थापित किया जाना है, प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना है, न कि किसी सुने साक्ष्य से साबित करना है।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा प्रमाण स्थापित करने के लिए चार चीजों की आवश्यकता होती है:

  • सभी तथ्य सिद्धांत के अनुरूप होने चाहिए।
  • जिन परिस्थितियों से सिद्धांत के लिए निष्कर्ष निकाला गया था, उन्हें पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए।
  • परिस्थितियाँ निर्णायक प्रकृति की होनी चाहिए।
  • परिस्थितियों को केवल सिद्ध करने के लिए प्रस्तावित सिद्धांत का अर्थ सिद्ध करना चाहिए और किसी अन्य सिद्धांत का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

एक सिद्धांत को साबित करने के लिए प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्य दोनों का उपयोग करने की सिफारिश की जाती है जो कानून की अदालत में प्रश्न में है और कोई भी सिद्धांत किसी मामले में कानून के दोनों नियमों के उपयोग को रोकता नहीं है।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि परिस्थितिजन्य और प्रत्यक्ष साक्ष्य दोनों की शक्तियों का उपयोग करने से बेईमान पक्षों को गवाहों और गवाह के किसी अन्य माध्यम से छेड़छाड़ करने से रोकने में काफी प्रभाव पड़ सकता है। यदि उनके पास ज्ञान होता तो उनके लिए साक्ष्यों को विकृत करना संभव होता।

लिखित साक्ष्य की शक्तियां

धारा 144

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 144 लिखित रूप में मामलों के साक्ष्य से संबंधित है। इस धारा में कहा गया है कि इस धारा के तहत, जिस गवाह से पूछताछ की जा रही है, उससे पूछा जा सकता है कि क्या कोई समझौता, अनुदान (ग्रांट), या संपत्ति का कोई अन्य निपटान, जिसके बारे में दस्तावेज़ में शामिल नहीं था। जब गवाह सकारात्मक रूप से प्रश्न का उत्तर देता है या जब गवाह ऐसे दस्तावेज की सामग्री के बारे में कोई बयान देने वाला होता है जिसे अदालत के फैसले में अदालत के समक्ष पेश किया जाना है तो मामले में विरोधी पक्ष को आपत्ति जताने का अधिकार  है, ताकि इस तरह के साक्ष्य को दस्तावेज़ के स्वयं प्रस्तुत किए जाने से पहले या किसी द्वितीयक साक्ष्य के माध्यम से दस्तावेज़ की सामग्री को साबित करने के उद्देश्य से उचित प्रतिष्ठान रखे जा सके। 

धारा 144 गवाह को किसी दस्तावेज़ की सामग्री के बारे में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए बयानों के मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देती है यदि ऐसे बयान अपने आप में प्रासंगिक तथ्य हैं।

उदाहरण के लिए, यदि यह आरोप लगाया जाता है कि A ने B और C पर हमला किया है, तो एक गवाह गवाही देता है कि उसने A को यह कहते हुए सुना है कि B ने एक पत्र भेजा था जिसमें A पर हत्या करने का आरोप लगाया गया था और A B से बदला लेगा। यह बयान किसके द्वारा दिया गया है यह पत्र के विषय के बारे में C को साबित किया जा सकता है, भले ही पत्र प्रस्तुत न किया गया हो क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के अनुसार, B पर हमला करने के लिए A के मकसद को दिखाने के लिए यह बयान पर्याप्त प्रासंगिक है।

धारा 145

भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 145 के अनुसार, गवाह द्वारा लिखित रूप में दिए गए पिछले बयानों के बारे में और संबंधित मामलों पर, गवाह को कोई ऐसा लेखन दिखाए बिना या उस मामले के बारे में जो उसके सामने साबित हुआ है, के रूप में गवाह की जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) की जा सकती है, लेकिन यदि ऐसा लिखित रूप में गवाह का खंडन करने के लिए, गवाह का ध्यान, लेखन को साबित करने से पहले, लेखन के उन हिस्सों की ओर आकर्षित किया जाना चाहिए, जिनका उपयोग गवाह का खंडन करने के लिए किया जाना है।

आम तौर पर, क्या होता है कि एक लेखन की सामग्री को साक्ष्य के रूप में तब तक उपयोग नहीं किया जाता है जब तक कि लेखन स्वयं अदालत में पेश नहीं किया जाता है। लेकिन धारा 145 इस मामले में एक अपवाद बनाती है क्योंकि इसमें कहा गया है कि गवाह को लिखित रूप में व्यक्ति द्वारा दिए गए पूर्व बयानों के रूप में और संबंधित मामलों पर गवाह को इस तरह के लेखन को दिखाए बिना या साबित किए बिना गवाह की जिरह की जा सकती है।

निष्कर्ष

साक्ष्य केवल वह सब कुछ है जो प्रस्तुत करने की सच्चाई को स्वीकार करने या समझाने के लिए उपयोग किया जाता है और किसी मामले के परिणाम को निर्धारित करने के लिए हर तरह के साक्ष्य को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

चाहे वह एक दीवानी (सिविल) मामला हो या आपराधिक मामला, साक्ष्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि तथ्यों का प्रमाण बिना किसी साक्ष्य के प्रभावी नहीं होगा। इसके अलावा, विभिन्न प्रकार के साक्ष्य उनकी प्रासंगिकता और स्वीकार्यता मानकों से संबंधित उल्लेखनीय हैं।  सरल शब्दों में, मामले में कोई साक्ष्य न होने पर किसी मामले के परिणामों को निर्धारित करना असंभव होगा।

संदर्भ

 

 

आई.पी.सी.,1860 की धारा 354 D का विश्लेषण 

यह लेख उस्मानिया विश्वविद्यालय के के.वी.आर.आर. लॉ कॉलेज के M.Manaswini Reddy द्वारा लिखा गया है। इसमें आई.पी.सी. की धारा 354 D यानी पीछा करने (स्टॉकिंग) की विस्तृत व्याख्या की गई है। यह लेख महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक कानूनी प्रावधान के रूप में इस धारा को उजागर करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

अपराध को एक ऐसे कार्य या चूक के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कानून का उल्लंघन करता है और जिससे बड़े पैमाने पर समाज प्रभावित होता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 विभिन्न प्रावधान प्रदान करता है ताकि महिलाओं को अपराधों के खिलाफ सुरक्षा दी जा सके। यह संहिता अनिवार्य रूप से किसी अपराध को दंडित करने के लिए एक्टस रीअस और मेन्स रीआ को देखती है। आम तौर पर पीछा करने का मतलब है कि किसी व्यक्ति की सहमति के बिना या तो ऑनलाइन या शारीरिक रूप से उसका पीछा करना ताकि ऐसे व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत बातचीत स्थापित की जा सके, भले ही वे इससे असहमत हों। भारतीय दंड संहिता के तहत पीछा करना एक दंडनीय अपराध है, हालांकि संहिता केवल महिलाओं के खिलाफ पीछा करने के अपराध के लिए सजा का प्रावधान करता है। भारतीय दंड संहिता के तहत पीछा करने के अपराध को एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल), जमानती और गैर-शमनीय (नॉन कंपाउंडेबल) अपराध के रूप में मान्यता प्राप्त है। पीछा करने से महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। ज्यादातर पीड़ितों को तनाव और सामाजिक चिंता का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें यह सब, अलग स्थानों पर स्थानांतरित (ट्रांसफर) होने, नौकरी बदलने, आपातकालीन संपर्क और अघोषित (अनडिस्क्लोज्ड) हथियारों के साथ पीछा किए जाने के आघात (ट्रॉमा) के परिणामस्वरूप सहना पड़ता है। यह लेख भारतीय दंड संहिता की धारा 354 D और इसके प्रत्येक आवश्यक तत्वों का एक अवलोकन (ओवरव्यू) देता है।

पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड)

आपराधिक न्याय प्रणाली में बदलाव लाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। 23 दिसंबर 2013 को गठित इस समिति में अध्यक्ष के रूप में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, न्यायमूर्ति लीला सेठ और वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) गोपाल सुब्रमण्यम शामिल थे। इन परिवर्तनों का उद्देश्य महिलाओं से संबंधित चरम (एक्सट्रीम) प्रकृति के यौन उत्पीड़न के अपराधों के लिए परीक्षण और दंड के मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली को तेज करना था। यह कुख्यात दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले के परिणामस्वरूप किया गया कार्य था, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बढ़ती संख्या और उनके शील (मोडेस्टी) भंग को उजागर किया गया था। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के तहत समिति द्वारा धारा 354 D के तहत पीछा करने के अपराध को पेश किया गया था और 23 जनवरी 2013 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी।

आई.पी.सी. की धारा 354 D 

कोई भी पुरुष जो किसी महिला का पीछा करता है, उससे संपर्क करता है या व्यक्तिगत बातचीत के लिए उससे बार-बार संपर्क करने का प्रयास करता है, भले ही महिला ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया हो कि उसे, उससे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, तो इसे धारा 354 D के अनुसार पीछा करना कहा जाता है। इस धारा में ऑनलाइन माध्यम से पीछा करना यानी किसी महिला के इंटरनेट, ई मेल या इलेक्ट्रॉनिक संचार (कम्युनिकेशन) के अन्य रूपों के उपयोग पर निगरानी रखना भी शामिल है। 

पीछा करने के अपवाद

  • यदि किसी अपराध का पता लगाने या किसी कार्य को होने से रोकने के लिए, राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी के तहत किसी पुरुष द्वारा महिला का पीछा किया जाता है,;
  • कानून द्वारा अधिकृत (ऑथराइज्ड) व्यक्ति द्वारा दी गई किसी भी शर्त या कानून का पालन करना;
  • अन्य परिस्थितियाँ जो उसके आचरण को उचित रूप से न्यायसंगत (जस्टिफिएबल) बना सकती हैं।

पीछा करने के अपराध के लिए इस धारा द्वारा निर्धारित सजा, पहली सजा पर, तीन साल की अवधि के लिए साधारण या गंभीर कारावास और जुर्माना और दूसरी सजा पर पांच साल की कैद और जुर्माना है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D की व्याख्या अन्य प्रावधानों के साथ

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 354 A में एक महिला के प्रति यौन प्रगति (एडवांसेज) और अवांछित या स्पष्ट शारीरिक संपर्क, यौन संबंध बनाने के लिए मांग या अनुरोध, महिला की इच्छा के विरुद्ध साहित्य/पुस्तकें दिखाने और यौन रूप से अश्लील टिप्पणी करने की चर्चा है। इन सभी को यौन उत्पीड़न के रूप में वर्गीकृत किया गया है और धारा 354 D से पहले इस धारा का इस्तेमाल पीछा करने के लिए भी किया जाता था क्योंकि यौन उत्पीड़न के अधिकांश मामले पीछा करने से ही शुरू होते हैं।

उदाहरण के लिए, छेड़खानी, यदि एक लड़की पर अश्लील टिप्पणी की जाती है या यौन संबंध बनाने की मांग और अनुरोध किया जाता है, तो ऐसे मामलों में आई.पी.सी. की धारा 354 A को धारा 354 D (1) (I) के साथ पढ़ा जाएगा।

  • धारा 354B– यह धारा किसी महिला की इच्छा के बिना उसको निर्वस्त्र करने के इरादे से आपराधिक बल के प्रयोग या हमले के बारे में बात करती है। यह धारा ऐसे अपराध के लिए उकसाने पर भी दंड देती है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक महिला को निर्वस्त्र करने का अर्थ है महिला के कपड़े उसकी इच्छा के विरुद्ध उतारना या उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर करना। यह भी एक महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध छेड़ने और उसका पीछा करने के इरादे से छेड़खानी करने का एक रूप है। यह एक महिला की शील भंग करने के साथ-साथ धारा 354D(1)(i) दोनों को आकर्षित करता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां एक पुरुष एक महिला का पीछा करता है, फिर उसे घेर लिया जाता है, और आपराधिक बल का प्रयोग किया जाता है या उस पर हमला किया जाता है, उसे निर्वस्त्र करने के लिए मजबूर किया जाता है या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसको निर्वस्त्र करने का प्रयास किया जाता है।

  • धारा 354C– इस धारा के तहत दृश्यरतिकता (वॉयरिज्म) को स्पष्ट किया गया है, जिसका सीधा मतलब है कि किसी व्यक्ति को नग्न या यौन गतिविधियों में लिप्त देखकर यौन सुख प्राप्त करना। भारतीय दंड संहिता किसी भी पुरुष को दंडित करती है जो किसी महिला की निजता पर आक्रमण करके उसकी तस्वीरें खींचता है या देखता है, अनिवार्य रूप से जब वह नग्न होती है जिसका अर्थ है कि उसके जननांग (जेनिटल), पश्च (पोस्टीरियर) और स्तन उजागर हो जाते हैं या जब वह किसी ऐसे निजी कार्य में लिप्त होती है जिसे वह आमतौर पर सार्वजनिक रूप से नहीं करती है। यह धारा इस वाक्य का उपयोग करके – “वह अपनी निजता के समय किसी के द्वारा देखे जाने की उम्मीद नहीं करेगी”, यह स्पष्ट करती है कि इस तरह का कार्य दंडनीय है यदि यह महिला की सहमति के बिना किया जाता है। यह धारा महिला के ऐसे चित्रों को प्रसारित करने को दंडित करती है।

दृश्यरतिकता को भी अक्सर धारा 354(1)(i) के साथ पढ़ा जाता है क्योंकि इसमें एक पुरुष शामिल होता है जो एक महिला का पीछा करता है और उसकी तस्वीरें खींचता है या देखता है, जिससे उसकी निजता भंग होती है।

  • धारा 509– शब्दों, इशारों या कार्यों का उपयोग करके किसी महिला की शील का अपमान करना। इस धारा का मुख्य तत्व यह है कि अपराधी को कोई शब्द बोलने चाहिए, ध्वनि या इशारा करना चाहिए या किसी वस्तु का प्रदर्शन करना चाहिए और यह इस इरादे से किया जाना चाहिए कि इसे सुना जाए या देखा जाए या महिला की निजता पर इससे प्रभाव पड़ सके। धारा 509 को अक्सर 354D(1)(i) के साथ पढ़ा जाता है क्योंकि एक महिला का पीछा करते हुए उसके शील का अपमान करने के इरादे से अकसर छेड़खानी की घटनाएं हुई हैं।

आई.पी.सी. की धारा 354 D और साइबर स्टॉकिंग

धारा 354 D(1)(ii) में उल्लेख किया गया है कि इंटरनेट या ई मेल या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार के उपयोग के द्वारा किसी की निगरानी करना, भले ही उसने बातचीत करने के लिए अपनी अनिच्छा और असहमति व्यक्त की हो, तो यह ऑनलाइन माध्यम से पीछा करने के बराबर है।

एक महिला से संपर्क करने की कोशिश करना और एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी अरुचि, मानहानि, बदनामी (स्लेंडर) और परिवाद (लिबल) दिखाने के बाद भी व्यक्तिगत परिचित बनाने को भी साइबर स्टॉकिंग माना जाता है। उदाहरण के लिए: एक लड़की के अकाउंट पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना, भले ही उसने उसे कई अकाउंट से रिजेक्ट कर दिया हो।

साइबर स्टॉकिंग को आमतौर पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट) 2000 की धारा 66E, 67, 67A और 67B के तहत निपटाया जाता है और साथ ही 354D(1)(ii) के साथ भी पढ़ा जाता है।

  • आई.टी. अधिनियम की धारा 66 E: जबकि धारा 354C, धारा 354 D(1)(i) के साथ पढ़ी जाती है, जो दृश्यरतिकता के साथ शारीरिक रूप से पीछा करना होता है, धारा 66E इंटरनेट के माध्यम से किए गए दृश्यरतिकता के बारे में बात करती है जो आमतौर पर साइबर स्टॉकिंग का परिणाम है। यह धारा किसी व्यक्ति की तस्वीरें खींचने, प्रकाशित करने और निजता का उल्लंघन करने को दंडित करती है।
  • आई.टी. अधिनियम की धारा 67: यह धारा अश्लील सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रसारित करने के लिए निर्धारित दंड के बारे में बात करती है, इस धारा को आई.पी.सी. की धारा 292 और धारा 354 D (1) (i) के साथ पीछा करने और अश्लील, निर्लज्ज सामग्री भेजने के साथ पढ़ा जाता है।
  • आई.टी.अधिनियम की धारा 67A और 67B: जबकि धारा 67A एक वयस्क महिला का पीछा करने और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री भेजने, स्पष्ट सामग्री को प्रकाशित करने और प्रसारित (ट्रांसमिट) करने से संबंधित है, 67B उपरोक्त समान स्थिति में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से संबंधित है। ये दोनों धाराएं 354 D(1)(i) के दायरे को कवर करती हैं।

पीछा करने के खिलाफ शिकायत कैसे पहचानें और दर्ज करें?

शारीरिक रूप से पीछा करना

इन प्रावधानों के आधार पर, कोई यह पहचान सकता है कि धारा 354D(1)(i) के तहत उनका किस तरह से पीछा किया जा रहा है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीछा करने की कुछ क्रियाओं के परिणामस्वरूप यौन-स्पष्ट प्रकृति का उत्पीड़न भी होता है, जिसे धारा 354A, 354B, 354C और 509 के तहत निर्धारित किया जाना चाहिए। यह समझना और निर्धारित करना महत्वपूर्ण है कि क्या आपके साथ हो रहे कार्य इस धारा के अनुसार है, अर्थात्:

  • यदि आपका पीछा किया जा रहा है या किसी व्यक्ति द्वारा संपर्क किया जा रहा है,
  • वह पुरूष व्यक्तिगत संपर्क बनाने के इरादे दिखाता है,
  • आपने अरुचि का संकेत दिया है,
  • पहचानें कि क्या पीछा करने के साथ-साथ कोई अन्य कार्य हो रहा है। उदाहरण के लिए, यौन उत्पीड़न, दृश्यरतिकता (सहमति के बिना तस्वीरें लेना), हमला करना, शब्दों या हरकतों से शील भंग करने की कोशिश करना और जबरदस्ती कपड़े उतारने की कोशिश करना।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीछा करने की कुछ क्रियाओं के परिणामस्वरूप यौन-स्पष्ट प्रकृति का उत्पीड़न भी होता है, जिसे धारा 354A, 354B, 354C और 509 के तहत निर्धारित किया जाना चाहिए।

  • इन कार्यों के खिलाफ नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफ.आई.आर. या शिकायत दर्ज करें।
  • यदि आप अपने खुद के राज्य में नहीं हैं, तो एक शून्य प्राथमिकी (ज़ीरो एफ.आई.आर.) दर्ज की जा सकती है। एक शून्य प्राथमिकी आपको शिकायत दर्ज करने की अनुमति देती है, भले ही अपराध कही भी किया गया हो और बाद में ऐसी शिकायत को उस अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहां अपराध किया गया है।
  • यह स्थापित करना कि अपराध संज्ञेय है या गैर-संज्ञेय है, यह समझने में मदद करता है कि अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए अदालत की मंजूरी या वारंट की आवश्यकता होगी या नहीं।
  • चूंकि 354 D एक संज्ञेय अपराध है, तो पुलिस अपराधी को अदालत की मंजूरी के बिना गिरफ्तार कर सकती है, जिसके बाद जांच शुरू होती है।

साइबर स्टाकिंग

साइबर स्टॉकिंग को 354 D(1)(ii) के तहत निपटाया जाता है: तो सबसे पहले पहचानें और सुनिश्चित करें कि आप इस धारा में उल्लिखित अनिवार्यताओं के माध्यम से साइबर स्टॉकिंग का सामना कर रहे हैं।

  • यदि आपका पीछा किया जा रहा है या किसी व्यक्ति द्वारा संपर्क किया जा रहा है
  • वह पुरुष व्यक्तिगत संपर्क बनाने के इरादे दिखाता है,
  • आपने अरुचि का संकेत दिया है,
  • आपके इंटरनेट के उपयोग पर नज़र रखता है,
  • पहचानें कि क्या पीछा करने के साथ-साथ कोई अन्य कार्य हो रहा है। उदाहरण के लिए, यौन उत्पीड़न, दृश्यरतिकता (सहमति के बिना तस्वीरें लेना/प्रकाशित करना), शब्दों या इशारों से शील भंग करने की कोशिश करना, अश्लील साहित्य दिखाना या स्पष्ट सामग्री भेजना।
  • इंटरनेट से संबंधित आपराधिक गतिविधि, जो साइबर अपराध है, से निपटने वाले साइबर सेल में शिकायत दर्ज की जा सकती है।
  • शिकायत या तो ऑनलाइन या प्राथमिकी के जरिए दर्ज की जा सकती है।
  • गुमनाम रूप से शिकायत दर्ज करने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ एक ऑनलाइन शिकायत सेल का प्रावधान है जो फिर मामले को स्थानीय पुलिस को भेज देता है।
  • सोशल मीडिया ऐप्स और साइटें ऐसी किसी भी गतिविधि की रिपोर्ट करने का विकल्प प्रदान करती हैं जिसे स्पष्ट जानकारी माना जाता है जो आपत्तिजनक हो सकती है। यह विकल्प दिशानिर्देश नियम (इंटरमीडियर गाइडेंस रूल), 2011 के अनुसार 36 घंटों के भीतर आपत्तिजनक जानकारी को हटाने में मदद करता है।

किसी भी तरह का पीछा करने के लिए दायर की गई शिकायतो को मानने से अगर मना कर दिया जाता है तो पीड़ित सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट से कानूनी सहायता ले सकता है। दर्ज की गई शिकायत को, पीड़ित की पहचान को भी गोपनीय रखना चाहिए।

साइबर स्टॉकिंग की रोकथाम

साइबर स्टॉकिंग को रोकने के लिए यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं:

  • यह सलाह दी जाती है कि अपने सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत विवरण जैसे फोन नंबर, ई मेल या घर के पते का खुलासा करने से बचना चाहिए।
  • व्यक्तिगत और पेशेवर ऑनलाइन उपस्थिति के लिए अलग-अलग अकाउंट होने से बहुत सारे जोखिम कम हो जाते हैं।
  • यह सुनिश्चित करना कि आपके उपकरणों (डिवाइस) का जी.पी.एस. बंद है और साथ ही जब भी आवश्यकता न हो, लाइव स्थानों को साझा न करना, सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
  • निजता सेटिंग्स की जाँच करने और अज्ञात कॉल या संदेशों का जवाब न देने की सलाह दी जाती है।
  • वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क के साथ अपने आई.पी.पते को सुरक्षित रखें, अपने उपकरणों में एंटी-वायरस सॉफ़्टवेयर स्थापित करने से भी मदद मिलती है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D से संबंधित महत्वपूर्ण मामले

सबसे अधिक विचार किए जाने वाले मामलों में से एक, जिसमें प्रावधान 354 D लागू किया गया था वह: संतोष कुमार सिंह बनाम स्टेट थ्रू सी.बी.आई. (2010) का मामला है, जहां प्रियदर्शिनी मट्टू, एक 25 वर्षीय कानून की छात्रा का पीछा किया गया था, उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी नई दिल्ली में उसके आवास पर हत्या कर दी गई थी। कानून के तीसरे वर्ष की छात्रा का कई बार पीछा किया गया था और एक पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी के बेटे संतोष सिंह, जो दिल्ली में कैंपस लॉ सेंटर में उससे बड़ा था, के द्वारा उसे परेशान किया गया था। उसके खिलाफ पीछा करने, परेशान करने, धमकी देने और अश्लील अनुरोध करने के कई मामलों में उसके खिलाफ शिकायतें दर्ज की गईं थी। मौरिस नगर पुलिस स्टेशन में धारा 354 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, अपराधी को गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा कर दिया गया था। विश्वविद्यालय के डीन के पास शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिन्होंने आरोपी को ऐसी गतिविधियां न करने के लिए कहा, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित को व्यक्तिगत सुरक्षाकर्मी भी सौंपे गए था।

23 जनवरी 1996 को जब कानूनी समझौता करने के कारण पीड़िता घर पर अकेली थी, तो अपराधी ने उसके साथ मारपीट की। फिर उसने अपने हेलमेट से उसे 14 बार मारा, उसके साथ बलात्कार किया और तार से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। मुकदमे की सुनवाई निचली अदालत ने की और आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया क्योंकि सी.बी.आई. ने झूठे सबूत बनाए थे, और कानून की प्रक्रियाओं के अनुसार सबूत एकत्र नहीं किया गए थे।

जब इस मामले को उच्च न्यायालय में उठाया गया तो आरोपी को मृत्युदंड दिया गया, जिसे बाद में 10 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा में कम कर दिया था।

श्री देउ बाजू बोडके बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र (2016) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक महिला द्वारा आत्महत्या के मामले पर निर्णय लिया था, जिसने अपनी आत्महत्या का कारण यह बताया था कि अपराधी द्वारा उसका लगातार उत्पीड़न और पीछा किया जा रहा था। जब वह काम पर थी तब न केवल आरोपी ने उसे परेशान किया और उसका पीछा किया, बल्कि उसकी अनिच्छा और असहमति के बावजूद उससे शादी करने की भी मांग की। उच्च न्यायालय ने आरोपी को दंडित करने के लिए आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के साथ-साथ धारा 354 D दर्ज करना अनिवार्य बताया था।

अरविंद कुमार गुप्ता बनाम स्टेट 2018, के मामले में, एक व्यक्ति, एक महिला के पीछे उसके कार्यालय तक पहुंच गया और जब तक वह काम से नहीं लौटती, वह उसकी बगल में ही खड़ा रहता था। यह एक साल तक जारी रहा जब तक कि महिला के भाई ने उस आदमी का सामना नहीं किया जिसने कहा कि लड़की ने उसे किसी की याद दिला दी और वह उससे शादी करने का इरादा रखता है। महिला ने एक प्राथमिकी दर्ज की और मुकदमे में वह व्यक्ति अपना बचाव नहीं कर सका। अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष यह साबित करने में सक्षम था कि महिला के द्वारा दिलचस्पी न लेने के बाद भी लगातार उसका पीछा किया गया था। अदालत द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि धारा 354 D(1)(i) के तहत वह पुरुष, महिला का पीछा करने का दोषी है, वह बिना किसी संदेह के उसकी असहमति व्यक्त करने के बाद भी उससे बातचीत करना चाहता था। अदालत ने उसे साधारण कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

आई.पी.सी. की धारा 354 D का विश्लेषण एनालिसिस

धारा 354 D, हालांकि ज्यादा से ज्यादा हद तक पीछा करने पर चर्चा करती है, लेकिन यह केवल महिलाओं के साथ ही होने वाले पीछा करने के अपराध का प्रावधान करती है। पीछा करने का अपराध, एक ऐसा अपराध है जो कभी भी किसी के भी साथ हो सकता है और तकनीक के आविष्कार के बाद से सभी लिंग के लोग संचार के माध्यम से किए जा रहे अपराध के शिकार हो सकते हैं। तो यहां पर इस प्रावधान को और अधिक लिंग-समावेशी (जेंडर इन्क्लूसिव) बनाने की बात उठती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 D के तहत पीछा करना पहली बार में एक जमानती अपराध है जिसका मतलब है कि आरोपी जमानत पर जाने के लिए स्वतंत्र है। ऐसी जमानत के लिए न्यायालय द्वारा अनुमोदित (अप्रूव) होना आवश्यक नहीं है; न ही आरोपी को अदालत के सामने पेश होने की जरूरत है। जबकि वास्तव में इसे गैर-जमानती बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है क्योंकि इसका अक्सर पुरुषों द्वारा दुरुपयोग किया जाता है। पीछा करना न केवल अपने आप में एक अपराध है बल्कि यह कुछ अन्य अपराधों का भी कारण है, जिनमें सबसे अधिक यौन उत्पीड़न होता है। उपरोक्त मामलों से पता चलता है कि पीछा करने से बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ कई गंभीर अपराध हो सकते हैं।

महिला को प्रताड़ित किया जाता है, यौन अश्लील टिप्पणियों से बुलाया जाता है, छेड़ा जाता है, यौन संबंध बनाने और मांग के लिए कहा जाता है। चूंकि इंटरनेट की पीढ़ी तेज है, इसलिए पीछा करने का अपराध जिससे यौन उत्पीड़न होता है, यह ऑनलाइन मोड में काफी प्रचलित (प्रीवेलेंट) है। ऐसे सभी कार्यों का महिला के आत्म-सम्मान, स्वतंत्र होने के आत्म विश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। महिलाओं के खिलाफ अधिकांश अपराध पीछा करने से शुरू होते हैं और गंभीर अपराधों की ओर बढ़ते हैं, विशेष रूप से इस गुस्से से कि पीड़िता ने मामला दर्ज कराया है। पीछा करने वाले को गिरफ्तार होने के बावजूद जमानत पर स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति दी जाती है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D की आलोचना (क्रिटिसिज्म)

जबकि राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो ने अनुमान लगाया है कि 2017 में अपराध के रूप में पीछा करना तेजी से बढ़ा है, केवल 26% सजा दर के साथ कोई मदद नहीं कर सकता है, लेकिन विश्लेषण करें की पीछा करने से रोकने के लिए पर्याप्त कानून हैं। भारतीय दंड संहिता, 1860, सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के साथ पीछा करने के लिए सजा का प्रावधान करती है, हालांकि रोकथाम के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है। यह इंगित करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को सुरक्षात्मक तरीके के बजाय महिलाओं से संबंधित प्रावधानों को निवारक तरीके से देखने की आवश्यकता है। अर्थात बुराई को जड़ से खत्म करने की आवश्यकता है।

ऐसे कार्यों को मजबूत करने की आवश्यकता है जो एक अपराध के रूप में पीछा करने के तहत आते हैं क्योंकि यह केवल एक महिला का पीछा करने और उसके असहमति व्यक्त करने पर भी उसके साथ संपर्क स्थापित करने की कोशिश करने की बात करता है। इसमें उन कार्यों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है जो पीछा कर सकते हैं या पीछा करने का एक तरीका है जैसे, किसी व्यक्ति को घूरना, झूठी अफवाहें फैलाना, कॉल करना या किसी व्यक्ति के निवास के आसपास छिपना।

निष्कर्ष

भारतीय दंड संहिता ने महिलाओं के लिए प्रावधानों की रूपरेखा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संहिता सभी उम्र की महिलाओं के खिलाफ सभी अपराधों को कवर करने का प्रयास करती है, जन्म के पूर्व चरण से लेकर बचपन, किशोरावस्था, प्रजनन (रिप्रोडक्टिव) आयु और बुजुर्ग महिलाओं के खिलाफ अपराध, उदाहरण के लिए, विधवाओं के उत्पीड़न के कई मामले सामने आए हैं।

पीछा करने के ज्यादातर मामलों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है क्योंकि महिलाएं घूमने-फिरने में सक्षम होने की स्वतंत्रता को जोखिम में नहीं डालना चाहती हैं और कई प्रत्यक्षदर्शी (आईविटनेसेज) इसे अनदेखा कर देते हैं, इन सब ने अपराध को गंभीरता से नहीं लिया है, भले ही इसे दंडित करने का प्रावधान हो। अपराध की रिपोर्ट करने के लिए धारा 354 D लागू करने या पीछा किए जाने की स्थितियों में प्रतिक्रिया करने के बारे में जागरूकता और शिक्षा के साथ, एक प्राथमिकी दर्ज करने और सही अधिकारियों से संपर्क करने के द्वारा, एक बदलाव लाया जा सकता है।

संदर्भ

मानव शरीर के खिलाफ अपराध

यह लेख स्कूल ऑफ एक्सीलेंस इन लॉ, चेन्नई की छात्रा Sujitha S द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारतीय दंड संहिता के तहत निर्धारित किए गए मानव शरीर के खिलाफ अपराधों पर चर्चा करता है। यह कुछ महत्वपूर्ण एतिहासिक मामलों के साथ उनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों को और विस्तृत करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

‘मानव शरीर के खिलाफ अपराध’ में आपराधिक कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला (वाइड रेंज) शामिल है, जिसमें आम तौर पर शारीरिक हिंसा, शारीरिक नुकसान का डर, या किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध किए गए अन्य प्रकार के कार्य शामिल हैं। धारा 299 से धारा 377 तक मानव शरीर से संबंधित कई अपराधों के प्रावधान प्रदान किए गए है। इस लेख में इन में से सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों के ऊपर चर्चा की गई है।

भारतीय दंड संहिता (1860) की धारा 11 के अनुसार, ‘व्यक्ति’ शब्द के अंतर्गत कोई भी कंपनी या संघ (एसोसिएशन) या व्यक्तियों का निकाय (बॉडी) शामिल होता है, चाहे वह निगमित (इनकॉर्पोरेटेड) हो या न हो। इसके अलावा ‘पुरुष’ और ‘महिला’ शब्द को आई.पी.सी. की धारा 10 के तहत परिभाषित किया गया है। ‘पुरुष’ शब्द का अर्थ, किसी भी आयु के मानव नर को दर्शाता है और ‘महिला’ शब्द किसी भी उम्र की मानव नारी को दर्शाता है। ये अपराध आमतौर पर किसी को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाकर या किसी अन्य व्यक्ति पर बल का प्रयोग करके किए जाते हैं। ऐसे अपराधों की प्रकृति को आमतौर पर चार श्रेणियों के तहत विभाजित किया जाता है, जो इस प्रकार हैं:

  • घातक (फ़ेटल),
  • जो घातक नहीं हैं,
  • यौन (सेक्शुअल), और
  • जो यौन नहीं हैं।

गैर इरादतन मानव वध (कल्पेबल होमिसाइड) और हत्या, हमला और आपराधिक बल, स्वतंत्रता से वंचित करना, यौन अपराध (जैसे की बलात्कार), घरेलू हिंसा, यह सब मानव शरीर के खिलाफ अपराधों के कुछ उदाहरण हैं।

मानव शरीर के खिलाफ अपराध

गैर इरादतन मानव वध (धारा 299)

  • मानव वध अर्थात होमिसाइड शब्द दो लैटिन शब्दों से मिलकर बना है: होमो और सीडो। होमो मानव का प्रतीक है, और सीडो मानव हत्या को दर्शाता है। मानव वध को किसी व्यक्ति द्वारा, किसी अन्य व्यक्ति की हत्या के रूप के तहत परिभाषित किया जाता है। हत्या वैध या गैर कानूनी दोनों हो सकती है। वैध मानव वध के तहत उन उदाहरणों को संदर्भित किया जा सकता है जिसमें एक व्यक्ति, जो किसी अन्य व्यक्ति की हत्या का कारण बना है, लेकिन उसे उस व्यक्ति की मृत्यु के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए, निजी प्रतिरक्षा (प्राइवेट डिफेंस) के अधिकार का प्रयोग करते समय (धारा 96) करना या भारतीय दंड संहिता के तहत प्रदान किए गए सामान्य अपवादों के अध्याय IV में वर्णित अन्य मामलों में, अर्थात धारा 76 से 106 के तहत कोई कार्य करना।
  • अंग्रेजी कानून के तहत, गैर इरादतन मानव वध को हत्या के रूप में माना जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गैर इरादतन मानव वध को सेकंड डिग्री मर्डर के कानूनी नाम से जाना जाता है, जबकि हत्या के अपराध को फर्स्ट डिग्री मर्डर कहा जाता है।
  • गैर इरादतन मानव वध के दो प्रकार होते हैं:
  1. गैर इरादतन मानव वध जो हत्या के स्तर तक नहीं बढ़ता है (धारा 299)।
  2. गैर इरादतन मानव वध (धारा 300)

आपराधिक मानव वध, जैसा कि धारा 299 और 300 के तहत परिभाषित किया गया है, उन अतिरिक्त तत्वों को संदर्भित करता है जो गैर इरादतन मानव वध को एक हत्या बनाते हैं। यह परिभाषा किसी कार्य को करने के शारीरिक और मानसिक दोनों तत्वों पर जोर देती है, जिसमे मौत कारित (कॉज) करने का उद्देश्य है, या इस ज्ञान के साथ किया गया है कि अपराधी जो कार्य करने जा रहा है वह किसी की मृत्यु कर सकता है, या ऐसी शारीरिक क्षति करित कर सकता है जिसके परिणामस्वरूप एक व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है।

गैर इरादतन मानव वध और हत्या दोनों ही संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध हैं, जो जमानती या कंपाउंडेबल नहीं हैं। दोनों पर केवल सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) में ही मुकदमा चलाया जा सकता है।

परिभाषा

भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के अनुसार, “जो भी कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के इरादे से, या ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने के इरादे से जिससे मृत्यु होना संभावना हो, या यह जानते हुए कि यह संभावना है कि ऐसे कार्य से मृत्यु होगी, कोई कार्य करके मृत्यु कारित करता है, तो वह आपराधिक मानव वध का अपराध करता है।”

धारा 299 को अच्छे से समझने के बाद, गैर इरादतन मानव वध की निम्नलिखित बुनियादी विशेषताओं का पता चलता है:

  1. आरोपी ने कोई कार्य किया होगा।
  2. वह कार्य निम्नलिखित में से एक या अधिक इरादों या ज्ञान के साथ किया जाना चाहिए:
  • किसी को मारने के इरादे के साथ।
  • शारीरिक क्षति कारित करने के इरादा के साथ, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होने की संभावना है।
  • यह ज्ञान के साथ कि मृत्यु का परिणाम होने की संभावना है।
  1. पीड़ित की मृत्यु आरोपी के किसी कार्य से होनी चाहिए।

उदाहरण: A को पता है कि Z एक झाड़ी के पीछे छिपा हुआ है। B इससे पूरी तरह अनजान था। A ने B को झाड़ी में गोली मारने को कहा, इस इरादे के साथ की मृत्यु कारित हो सकती है, या यह जानते हुए है कि इससे मृत्यु होने की संभावना है। Z, B की गोली से मारा जाता है। इस मामले में, B ने कोई अपराध नहीं किया हो सकता है, लेकिन A ने गैर इरादतन मानव वध किया है।

गैर इरादतन मानव वध से संबंधित प्रमुख मामले 

री: पलानी गौंडन बनाम अज्ञात (1919) के मामले में, आरोपी ने अपनी पत्नी के सिर में हल से प्रहार किया, जिसने मौत का कारण बनने की संभावना के रूप में प्रदर्शित न होने पर, उसे बेहोश कर दिया था, और आरोपी विश्वास कर रहा था की वह मृत हो गई है और इसलिए उस ने, रस्सी से पीड़िता का गला घोंट दिया, जिससे उसकी गला घोंटकर मौत हो गई। प्रतिवादी को गैर इरादतन मानव वध का दोषी नहीं पाया गया, इसके बजाय, उसे न्यायालय द्वारा गंभीर क्षति (ग्रीवियस हर्ट) का दोषी पाया गया था।

जोगिंदर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (1979) के मामले में, एक व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति का पीछा कर रहा था, उसे गैर इरादतन मानव वध का दोषी नहीं पाया गया था, क्योंकि जब एक आदमी का, खुले मैदान में उसके दुश्मनों द्वारा पीछा किया जा रहा था, जिन्होंने पहले ही एक घटना में उसके एक रिश्तेदार को मार डाला था, तो वह खुद को बचाने के लिए एक कुएं में कूद गया और इस कारण वह मर गया था, तो यह निर्धारित किया गया था कि आरोपी के कार्यों को यह नही माना जा सकता है कि यह, भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के तहत निर्दिष्ट इरादे या ज्ञान के साथ किया गया एक कार्य है, और इसलिए उसे बरी कर दिया गया था।

हत्या (धारा 300)

गैर इरादतन मानव वध जो हत्या की श्रेणी में आते है (कल्पेबल होमिसाइड अमाउंटिंग टू मर्डर)

गैर इरादतन मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते हैं उनकी कार्रवाई धारा 300 के तहत  की जाती है। दूसरे शब्दों में, इस धारा में कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में गैर इरादतन मानव वध को हत्या माना जाता है। जिसके परिणामस्वरूप, हत्या के रूप में वर्गीकृत (कैटेगराइज) होने के लिए, एक कार्य को पहले गैर इरादतन मानव वध के सभी मानदंडों को पूरा करना होता है।

धारा 300 में प्रदान किया गया है कि, निम्नलिखित परिस्थितियों के तहत, गैर इरादतन मानव वध को हत्या माना जाता है: 

  • यदि कोई कार्य किसी को मारने के इरादे से किया जाता है। हत्या के लिए उच्च स्तर के इरादे की आवश्यकता होती है। इरादा मौजूद होना चाहिए, और इस इच्छा के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होनी चाहिए, केवल क्षति या कोई गंभीर नुकसान नहीं होनी चाहिए, जो किसी को मारने के इरादे के बिना पहुंचाई गई हो।
  • किसी को शारीरिक नुकसान कारित करना, जो अपराधी जानता था कि उस व्यक्ति की मृत्यु का परिणाम हो सकता है। दूसरे परिदृश्य (सिनेरियो) में एक अपराधी होता है, जिसे पीड़ित के स्वास्थ्य के बारे में विशेष ज्ञान होता है और वह इस ज्ञान का उपयोग पीड़ित को इस तरह से नुकसान पहुंचाने के लिए करता है, जिस से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। इसके लिए, कोई धारा 300 का उल्लेख कर सकता है, जिसमें कहा गया है कि अपराधी यह जनता था की इस कार्य से मृत्यु कारित होने की संभावना है’।
  • शारीरिक क्षति पहुंचाना जिसके परिणामस्वरूप, प्रकृति के मामूली अनुक्रम (कोर्स) में मृत्यु हो जाती है। इन उदाहरणों में शारीरिक क्षति से जुड़े कार्य शामिल हैं, जो घटनाओं के सामान्य अनुक्रम में, व्यक्ति की मृत्यु में का कारण बन सकते है।
  • बिना किसी वैध कारण के आसन्न (कंपेंडिंग) जोखिम भरा कार्य करने से मृत्यु या शारीरिक क्षति होगी जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होनी चाहिए। इस श्रेणी में ऐसे कार्य शामिल होते हैं जो इतने खतरनाक हैं कि यदि वे किए जाते हैं, तो उनके परिणामस्वरूप मृत्यु या शारीरिक क्षति लग सकती है जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, और वे बिना किसी कानूनी औचित्य (जस्टिफिकेशन) के किए जाते हैं।

जब गैर इरादतन मानव वध हत्या की श्रेणी में आता है

  1. निम्नलिखित स्थितियों में, गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है:
  • गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है, यदि यह धारा 300 के संबंधित खंड (क्लॉज) के अतिरिक्त मानकों (स्टैंडर्ड) को पूरा नहीं करता है।
  • यदि धारा 300 के पांच अपवादों में से एक के तहत, एक गैर इरादतन मानव वध किया जाता है, तो इसे हत्या नहीं माना जाता है।

2. धारा 300 के अपवाद नीचे सूचीबद्ध हैं।

  • गंभीर और अचानक उत्तेजना (ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन)।
  • निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग अधिकता में करना।
  • यादि लोक सेवक कानून द्वारा उसे दी गई शक्तियों से अधिक में कार्य करता है।
  • पहले किए गए किसी सोच विचार के बिना, अचानक लड़ाई में किसी की मृत्यु करना।
  • 18 वर्ष से अधिक आयु के मृतक की सहमति के बाद मृत्यु कारित करना।

अपवाद (एक्सेप्शन) I

गंभीर और अचानक उत्तेजना

गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है यदि अपराधी गंभीर और अचानक उत्तेजना के परिणामस्वरूप खुद को नियंत्रित करने की अपनी क्षमता को खो देता है और उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है जिसने उसे या किसी अन्य व्यक्ति को गलती या दुर्घटना से उकसाया था। यह सिर्फ एक अपराध के आरोप में होने के जोखिम को कम करता है। आपराधिक अपराध से बचने की कोई पूर्ण उन्मुक्ति (इम्यूनिटी) नहीं है।

के.एम. नानावटी बनाम स्टेट ऑफ़ बॉम्बे (1961), के मामले में, जिसे नानावती मामले के रूप में भी जाना जाता है, में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि-

  • भारत में, कुछ शब्द और कार्य गंभीर और अचानक उत्तेजना को भड़का सकते हैं।
  • जब याचिका गंभीर और अचानक उत्तेजना के लिए होती है, तो पीड़ित के पहले के कार्यों से उत्पन्न मानसिक पृष्ठभूमि (बैकड्रॉप) पर विचार किया जा सकता है।
  • पीड़ित के कार्य की प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालत को यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या आरोपी के समान सामाजिक वर्ग का एक उचित व्यक्ति, यदि उसी स्थिति में रखा जाता है, तो उसे आत्म-नियंत्रण खोने के तत्व पर प्राकृतिक उत्तेजना के अधीन किया जाता है या नहीं।
  • घातक प्रहार का पता, स्पष्ट रूप से उत्तेजना से प्रेरित क्रोध से लगाया जा सकता है। जुनून के समाप्त हो जाने के बाद, एक घातक प्रहार को अचानक और गंभीर उत्तेजना के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। अपवाद 1 का लाभ तब नहीं प्रदान किया जा सकता जब पहले से सोच विचार और गणना के लिए समय और गुंजाइश हो।

अपवाद II

सद्भाव (गुड फेथ) में निजी प्रति रक्षा के अधिकार के प्रयोग में कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं से अधिक कार्य कर देना

आपराधिक मानव वध हत्या की श्रेणी में नहीं आता है यदि अपराधी, सद्भाव में किसी व्यक्ति या संपत्ति की निजी प्रति रक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए, कानून द्वारा उसे दी गई शक्ति से अधिक कार्य कर जाता है और उस व्यक्ति को मार देता है जिसके खिलाफ वह अधिकार का प्रयोग करता है।

इस अपवाद का लाभ तब प्राप्त किया जा सकता है जब यह भी प्रदर्शित (डिमॉन्स्ट्रेट) किया जाता है कि अपराधी ने बिना सोचे-समझे या आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से मृत्यु कारित की है।

अपवाद III

जब लोक सेवक कानून द्वारा उसे दी गई शक्तियों से अधिक में कार्य करता है

  • यदि अपराधी लोक सेवक के रूप में कार्य करते हुए या लोक न्याय प्रदान करने में लोक सेवक की सहायता करते हुए, कानून द्वारा उसे दिए गए अधिकार से अधिक में कार्य कर देता है और मृत्यु कारित कर देता है, तो गैर इरादतन मानव वध को हत्या की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।
  • इस अपवाद के लाभ का दावा केवल तभी किया जा सकता है जब कार्य सद्भाव में और इस विश्वास में किया गया हो कि यह उसके कर्तव्यों के उचित निर्वहन में कानूनी और आवश्यक था। यह भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि अपराधी की मृतक से कोई दुश्मनी नहीं थी।

अपवाद IV

अचानक हुई मार पीट से हुई मौत

  • गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाएगा यदि यह अचानक हुई मार पीट के दौरान जोश में और अपराधी द्वारा स्थिति का लाभ उठाए बिना या किसी क्रूर या असामान्य तरीके से कार्य किए बिना किया जाता है।
  • इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस मामले में कौन कार्य करने के लिए उकसाता है या हमला करता है।

अपवाद V

18 वर्ष से अधिक आयु के मृतक की सहमति

गैर इरादतन मानव वध को हत्या की श्रेणी में नहीं रखा जाता है यदि मारे गए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष से अधिक है और वह अपनी सहमति से मृत्यु कारित करने के लिए कहता है या मृत्यु का जोखिम उठाता है।

हत्या और गैर इरादतन मानव वध के बीच का अंतर

  1. आपराधिकता की डिग्री ही हत्या और गैर इरादतन मानव वध के बीच मुख्य अंतर है। हत्या के मामले में, आपराधिकता का स्तर गैर इरादतन मानव वध के मामले की तुलना में अधिक है।
  2. प्रत्येक मानव वध सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण एक जिम्मेदार हत्या है। हालांकि, हर गैर इरादतन मानव वध हत्या नहीं होती। दूसरे शब्दों में कहें तो, मानव वध एक जीनस है, जबकि हत्या केवल एक प्रजाति है।
  3. ‘हत्या’ शब्द को धारा 300 के तहत परिभाषित किया गया है। यह आपराधिक संहिता की धारा 302 के तहत अवैध है। गैर इरादतन मानव वध एक कम गंभीर अपराध है जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दंडित किया जाता है।
  4. गैर इरादतन मानव वध और हत्या के बीच एक संकीर्ण (नैरो) रेखा है, फिर भी यह स्पष्ट है। धारा 300 के अलग-अलग खंडों में निहित महत्वपूर्ण शब्दों को दो अपराधों की पहचान करने के लिए नोट किया जाना चाहिए।
  5. स्टेट ऑफ़ आंध्र प्रदेश बनाम आर. पुन्नय्या (1975) के मामले में, यह माना गया था कि-
  • गैर इरादतन मानव वध के तीन अंश या प्रकार हैं जिसे संहिता द्वारा मान्यता प्राप्त हुई है।
  • धारा 300 में प्रथम श्रेणी में गैर इरादतन मानव वध को हत्या के रूप के तहत परिभाषित किया गया है। यह गैर इरादतन मानव वध का सबसे गंभीर प्रकार है।
  • दूसरी डिग्री के गैर इरादतन मानव वध को गैर इरादतन मानव वध के रूप में जाना जाता है। इसे धारा 304, खंड I के तहत दंडित किया जाता है।
  • गैर इरादतन मानव वध का सबसे कम स्तर तीसरी डिग्री में गैर इरादतन मानव वध है। यह धारा 304, खंड II के तहत दंडित किया जाता है।
  • अदालतों को पहले यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या विचाराधीन मौत आरोपी के कार्यों के कारण हुई थी। यदि आरोपी की कार्रवाई सकारात्मक है, तो धारा 300 पर विचार किया जाना चाहिए।

जिस व्यक्ति की मृत्यु का इरादा था, उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करके गैर इरादतन मानव वध करना

भारतीय दंड संहिता की धारा 301 के तहत-

  • आरोपी ने योजना बनाई होगी या उसे पता होगा कि उसके कार्यों के परिणामस्वरूप किसी की मृत्यु होने की संभावना है।
  • उसके कार्य के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, भले ही अपराधी को इस बात का कोई इरादा या ज्ञान नहीं था कि उसके कार्य के परिणामस्वरूप उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी।
  • इस से पहले वाली स्थिति में, आरोपी को उसी तरह की सजा का सामना करना पड़ेगा जैसे कि उसने उस व्यक्ति कारित की थी, जिसकी हत्या वह करना चाहता था, उसको ज्ञान था, या मारने की संभावना थी।
  • स्थानांतरित द्वेष (ट्रांसफर्ड मेलिस) का सिद्धांत धारा 301 में निहित धारणा के लिए व्यापक नाम है। इस सिद्धांत के अनुसार, जब कोई व्यक्ति दुर्घटना या किसी त्रुटि के कारण किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाता है, जिसे वह क्षति पहुंचाने का इरादा नहीं रखता था लेकिन इससे उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो अपराधी अपराध के लिए उत्तरदायी होगा।
  • जिस व्यक्ति का मामला धारा 301 के तहत आता है, उस को स्थिति के आधार पर धारा 302 या 304 के तहत दंड दिया जाता है।

दहेज हत्या

यह एक महिला के खिलाफ किया गया अपराध है। दहेज एक ऐसा अपराध है जो भारतीय सभ्यता में सैकड़ों वर्षों से मौजूद है और तमाम कोशिशों के बाद भी इस बुराई को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। भारतीय दंड संहिता की धारा 304 B के तहत ‘दहेज’ शब्द का वही अर्थ है जो दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 में है, जो इस तरह परिभाषित किया गया है: 

“कोई ऐसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति अभिप्रेत है जो विवाह के समय या उसके पूर्व [या पश्चात्‌ किसी समय] –

  1. विवाह के एक पक्षकार द्वारा विवाह के दूसरे पक्षकार को ; या
  2. विवाह के किसी भी पक्षकार के माता-पिता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा विवाह के किसी भी पक्षकार को या किसी अन्य व्यक्ति को,
  3. उक्त पक्षकारों के विवाह के संबंध में, 

या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी जाती है या दी जाने के लिए सहमति की गई है।

धारा 304B के तहत दहेज हत्या का मामला बनाने के लिए महिला की शादी के सात साल के भीतर जलने या अन्य शारीरिक क्षति लगने या अन्य सामान्य परिस्थितियों के कारण मृत्यु होनी चाहिए। उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले दहेज की मांग के संबंध में उसे उसके पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार होना चाहिए।

कामेश पंजियार बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार (2005) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज हत्या (धारा 304B, आई.पी.सी.) के प्रमुख तत्वों को इस प्रकार बताया:

  • एक महिला की मृत्यु जलने, शारीरिक क्षति या किसी अन्य असामान्य घटना के कारण होनी चाहिए।
  • उसकी शादी के पहले सात वर्षों के दौरान उसकी मृत्यु हो जानी चाहिए थी।
  • उसके पति या उसके पति के किसी भी रिश्तेदार ने उसके साथ क्रूर व्यवहार किया होगा या उसे परेशान किया होगा।
  • ऐसी क्रूरता या उत्पीड़न दहेज की मांग के जवाब में या उसके संयोजन (कंजंक्शन) में होना चाहिए।
  • यह साबित किया जाना चाहिए कि महिला को उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले इस तरह की क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा था।

क्षति पहुंचाना (हर्ट) (धारा 319-338)

क्षति, जो सरल या गंभीर हो सकती है, मानव शरीर के खिलाफ कई अपराधों में से एक है।

  • धारा 319338 क्षति और उसके कई रूपों से संबंधित है।
  • ‘क्षति’ शब्द को धारा 319 के तहत परिभाषित किया गया है, जबकि धारा 320 क्षति के प्रकारों को निर्दिष्ट करती है जिन्हें गंभीर के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

साधारण क्षति

धारा 319 साधारण क्षति को परिभाषित करती है जिसके अनुसार जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या दुर्बलता कारित करता है, उसे क्षति कारित करने वाला कहा जाता है।

‘शारीरिक दर्द’ शब्द इंगित करता है कि दर्द मानसिक के बजाय शारीरिक होना चाहिए। नतीजतन, किसी को मानसिक या भावनात्मक नुकसान पहुंचाने को धारा 319 के तहत क्षति नहीं माना जाएगा। हालांकि, इस धारा के तहत आने के लिए पीड़ित को कोई भी दिखने वाली क्षति लगने की कोई आवश्यकता नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 319 के अनुसार, जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक परेशानी, बीमारी या अक्षमता कारित करता है, उसे क्षति पहुंचाने वाला माना जाता है।

आवश्यक तत्व

  1. शारीरिक दर्द, बीमारी, या दुर्बलता (इनफिरमिटी) होनी चाहिए

शारीरिक दर्द एक प्रकार का नुकसान है, मामूली नुकसान को छोड़कर, जिसके लिए किसी को आपत्ति नहीं होगी। किसी नुकीली चीज से चुभना, जैसे कि सुई, किसी के चेहरे पर प्रहार करना, या किसी महिला के बाल खींचना शारीरिक दर्द के कुछ उदाहरण हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दर्द कितने समय तक रहता है। जब किसी का अंग नियमित रूप से काम करने में असमर्थ होता है, तो उसे दुर्बलता कहा जाता है। यह या तो कुछ समय के लिए या लंबे समय तक के लिए हो सकता है। इसमें हिस्टीरिया या पैनिक जैसी मानसिक स्थितियाँ भी शामिल हैं।

2. यह आरोपी की अपनी मर्जी का नतीजा होना चाहिए

माराना गौदान बनाम अज्ञात (1940) में आरोपी, मृतक से पैसे चाहता था, जो उस पर बकाया था। मृतक ने कहा कि वह बाद में भुगतान करेगा। इसके बाद आरोपी ने उसके पेट में लात मारी, जिससे पीड़ित गिरकर मर गया। आरोपी को शारीरिक नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया गया क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि उसके पास इरादा या ज्ञान था कि पेट पर लात मारने से जान को खतरा होगा।

गंभीर क्षति (धारा 320)

इस धारा के अनुसार केवल निम्न प्रकार की क्षति को गंभीर के रूप में नामित किया गया है:

  • पुंस्त्वहरण (एमेस्कुलेशन) (किसी व्यक्ति को यौन रूप से अक्षम या कमजोर बनाना)।
  • दोनों में से किसी भी आंख की दृष्टि का स्थायी विच्छेद (लॉस)।
  • एक या दोनों कानों में सुनने की स्थायी विच्छेद।
  • किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद।
  • किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का नाश या स्थायी हानि।
  • सिर या चेहरे की स्थायी विकृति।
  • हड्डी या दांत का फ्रैक्चर या अव्यवस्था
  • कोई भी क्षति जो पीड़ित के जीवन को खतरे में डालती है या गंभीर शारीरिक दर्द के कारण उसे बीस दिनों की अवधि के लिए उसकी सामान्य गतिविधियों को करने में असमर्थ बनाती है।

स्वेच्छा से क्षति पहुँचाना (धारा 321)

  1. धारा 321 के अनुसार, जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से कुछ करता है और स्वेच्छा से ऐसा करने में सफल होता है, वह क्षति कारित करता है।
  2. ऐसा कार्य किया गया होगा:
  • नुकसान पहुंचाने के इरादे से।

धारा 321 के तहत अपराध, धारा 323 के तहत दंडनीय है (या तो एक साल की जेल या एक हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों)। यह गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल), जमानती, कंपाउंडेबल है और एक मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

उत्तेजना पर क्षति होना (धारा 334) या गंभीर क्षति होना (धारा 335)

धारा 334 उन परिस्थितियों के बारे में बताती है जिनमें किसी को उत्तेजित करने के परिणामस्वरूप नुकसान होता है। यदि नुकसान का स्वैच्छिक कारण गंभीर और अचानक उत्तेजना से संबंधित है, तो सज़ा एक महीने की जेल या 500/- रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

  • जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य से कुछ भी करता है और स्वतंत्र रूप से ऐसा करने में सफल हो जाता है, तो वह गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
  • एक व्यक्ति जो जानबूझकर दूसरे व्यक्ति को भयानक नुकसान पहुंचाता है और फिर उस व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाता है, तो यह माना जाता है की उसने स्वतंत्र रूप से उस व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
  1. आरोपी ने जरूर कोई अपराध किया होगा।
  2. ऐसा कार्य किया गया होगा:
  • गंभीर नुकसान पहुंचाने के इरादे से; या
  • यह जानते हुए कि नुकसान होने की संभावना है; तथा
  • इसके परिणामस्वरूप किसी भी व्यक्ति को गंभीर नुकसान हो सकता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 335 के तहत, यदि अपनी इच्छा से गंभीर नुकसान पहुंचाना, गंभीर और अचानक उत्तेजना से संबंधित है, तो ऐसे में सज़ा या तो चार साल के कारावास या 2000/- रुपये तक के जुर्माने की हो सकती है या दोनों।

गलत तरीके से प्रतिबंधित करना (रॉन्गफुल कन्फाइनमेंट) (धारा 340)

भारतीय दंड संहिता की धारा 340 के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को गलत तरीके से इस तरह से प्रतिबंधित करता है कि वह उस व्यक्ति को कुछ निश्चित सीमाओं से आगे बढ़ने से रोक सके, तो ऐसे व्यक्ति को ‘गलत तरीके से प्रतिबंधित करना’ कहा जाता है।

दृष्टांत (इलस्ट्रेशन)

  1. A, Z को दीवार से घिरे हुए स्थान पर ले जाता है और उसे वहीं बंद कर देता है। जिसके नतीजतन, Z दीवार की परिसीमा से परे किसी भी दिशा में नहीं जा सकता। Z को A द्वारा गलत तरीके से प्रतिबंधित किया गया है।

आवश्यक तत्व

  1. किसी व्यक्ति को गैर कानूनी तरीके से प्रतिबंधित करना, और
  2. प्रतिबंधित करने का उद्देश्य उस व्यक्ति को उस विशिष्ट परिसीमा से आगे जाने से रोकना चाहिए, जिसके आगे जाने का उसे कानूनी अधिकार है। उसे पूर्ण तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, आंशिक रूप से नहीं।

धारा 342 में गलत तरीके से प्रतिबंधित करने की सजा की चर्चा की गई है। धारा 342 के तहत, जो कोई भी किसी व्यक्ति को गलत तरीके से प्रतिबंधित करता है, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास, जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या एक हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

दीप चंद बनाम राजस्थान (1961) के मामले में पीड़ित एक धनी व्यापारी का बेटा था। एक दिन दो नकाबपोश लोग उसके अपार्टमेंट में घुसे, उनमें से एक के पास रिवॉल्वर थी। उसने शोर मचाया तो दोनों लोगों ने उसे गोली मारने की धमकी दी। वे उसे बाहर ले गए, जहाँ दो ऊंट खड़े थे। पीड़ित के चेहरे पर कपड़ा बंधा हुआ था। वे उसे आरोपी के घर ले जाने से पहले कुछ दूरी तक ऊंट पर बिठाकर ले गए, जहां उसे 17 दिनों तक रखा गया। उसने पीड़ित के पिता को तीन पत्र लिखकर 50 हजार रुपये की फिरौती की मांग की थी। फिरौती देने के बाद उन्होंने पीड़ित को छोड़ दिया। उसके बाद, अपराधियों की पहचान की गई और उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 347, 365, 382 और 452 के तहत आरोपित किया गया।

गलत तरीके से दबाव डालना (रॉन्गफुल रिस्ट्रेन्ट) (धारा 339-341)

धारा 339 के अनुसार, गलत तरीके से दबाव डालने को परिभाषित किया गया है, जो कोई भी अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति को किसी भी दिशा में आगे बढ़ने से रोकने के लिए उस व्यक्ति पर दबाव डालता है, जिसमें उस व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है, तो यह माना जाता है की ऐसे व्यक्ति ने दुसरे व्यक्ति पर गलत तरीके से उस दबाव डाला होगा। 

दृष्टांत

A के सद्भावपूर्ण विश्वास के बावजूद कि Z को ऐसा करने का अधिकार है, वह उस रास्ते को अवरुद्ध (ब्लॉक) कर देता है जिसका उपयोग करने का Z को अधिकार है। जिसके परिणामस्वरूप, Z वहां से जा नहीं पाता है। Z पर, A द्वारा अवैध रूप से दबाव डाला गया है।

गलत तरीके से दबाव डालने के लिए सजा

धारा 341– जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति पर गलत तरीके से दबाव डालता है, उसे एक महीने से अधिक की अवधि के लिए साधारण कारावास, या पांच सौ रुपये से अधिक का जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

आवश्यक तत्व

धारा 339 के तहत गलत तरीके से दबाव डालने को परिभाषित किया गया है। गलत तरीके से दबाव डालने के मूल तत्व निम्नलिखित हैं:

  • एक व्यक्ति पर स्वेच्छा से दबाव डालना, और
  • अवरोध ऐसा होना चाहिए कि यह व्यक्ति को किसी भी दिशा में आगे बढ़ने से रोकता है, जिसमें उसे आगे बढ़ने का अधिकार है।

राजा राम बनाम स्टेट ऑफ़ हरियाणा (1972) के मामले में, एक मां और एक 13 वर्षीय बच्चे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया था। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के प्रावधान में कहा गया है कि 15 वर्ष से कम उम्र के किसी भी महिला या पुरुष को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन नहीं बुलाया जाना चाहिए। इसके बजाय, उनसे उनके स्थान पर पूछताछ की जानी चाहिए। आरोपी जो की एक पुलिस अधिकारी था, को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के उल्लंघन का दोषी पाया गया था। इसके आलोक में एक महिला और एक 13 साल के बच्चे को थाने में हिरासत में रखना गलत तरीके से दबाव डालने के तहत लाया गया। आरोपी को धारा 341 के तहत दोषी पाया गया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 342 के तहत नहीं।

आपराधिक बल (क्रिमिनल फोर्स) (धारा 350)

धारा 350 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ, उस व्यक्ति की सहमति के बिना किसी अपराध को करने के लिए बल का प्रयोग करता है, या ऐसा करने का इरादा रखता है या जानता है कि इस तरह के बल का उपयोग करके, वह उस व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ (एनॉयंस) का कारण बन सकता है, तो यह कहा जाता है की ऐसे व्यक्ति ने  उस दूसरे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

दृष्टांत

  1. Z एक नदी के किनारे रस्सी से बंधी हुई नाव पर बैठा था। A जानबूझकर रस्सियों को उद्बन्धित (लूसन) कर देता है और उस प्रकार नाव को धार में साशय बहा (डाउन स्ट्रीम) देता है। यहां A, Z को साशय गतिमान (मोशन) करता है, और वह रसायनों (केमिकल्स) को इस तरह से नदी मे डाला किसी और से कोई कार्य किए बिना गति उत्पन्न होती है। A ने जानबूझकर Z के खिलाफ बल का प्रयोग किया है; और यदि उसने ऐसा Z की सहमति के बिना किया है, तो कोई अपराध करने के लिए, या तो इरादा होना चाहिए या यह जानते हुए किया जाना चाहिए कि बल के इस प्रयोग से Z को क्षति, भय या क्षोभ होने की संभावना है, तो A ने Z के खिलाफ आपराधिक बल का इस्तेमाल किया है।

आवश्यक तत्व

अंग्रेजी कानून में, आपराधिक बल ‘बैटरी’ के बराबर है, जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति पर उसकी सहमति के बिना जानबूझकर बल के प्रयोग को संदर्भित करता है।

  • धारा 349 द्वारा परिभाषित बल का प्रयोग;
  • ऐसे बल का प्रयोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए;
  • किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध करने के लिए बल का प्रयोग किया जाना चाहिए; तथा
  • बल का प्रयोग उस व्यक्ति की इच्छा के बिना किया होना चाहिए जिसके विरुद्ध इसका प्रयोग किया गया है।
  • बल का उपयोग उस व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ पैदा करने के इरादे से किया जाना चाहिए जिसके खिलाफ इसका इस्तेमाल किया गया है।

हमला (असॉल्ट)

धारा 351 के अनुसार, जो कोई भी इस आशय या ज्ञान के साथ कोई संकेत या तैयारी करता है कि इस तरह के संकेत या तैयारी से उपस्थित किसी व्यक्ति को संदेह होगा कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग करने वाला है, तो उसे हमला कहा जाता है।

दृष्टांत

  1. A इस आशय से या यह जानते हुए, Z को मुक्का दिखाता है की, संभवतः Z यह मान लेगा कि A, Z पर वार करने की तैयारी कर रहा है। इस मामले में, A ने हमला किया है।

आवश्यक तत्व

हमले के आवश्यक तत्व निम्नलिखित हैं:

  • आरोपी आपराधिक बल का प्रयोग करने के लिए एक संकेत या तैयारी करता है;
  • ऐसा संकेत या तैयारी उस व्यक्ति की उपस्थिति में की जाती है जिसके संबंध में इसे बनाया जाता है;
  • आरोपी के पास इरादा या ज्ञान होना चाहिए कि इस तरह के संकेत या तैयारी से पीड़ित के मन में यह आशंका पैदा होगी कि उसके खिलाफ आपराधिक बल का इस्तेमाल किया जाएगा; तथा
  • इस तरह के संकेत या तैयारी का पीड़ित पर शारीरिक प्रभाव पड़ता है।

आपराधिक बल, हमला और क्षति के बीच अंतर

आई.पी.सी. में, ‘हमला’, ‘आपराधिक बल’ और ‘क्षति’ शब्दों के अलग-अलग अर्थ और परिभाषाएँ हैं। एक हमला, हिंसा के खतरे से ज्यादा कुछ नहीं है जो गैरकानूनी बल का उपयोग करने की इच्छा और ऐसा करने की क्षमता को प्रदर्शित करता है। जब बल का प्रयोग किया जाता है, तो यह आपराधिक बल में परिवर्तित हो जाता है। अब, आपराधिक बल को अपराध करने के लिए या कारण या ज्ञान की इससे क्षति, भय, या चिढ़ हो सकती है, के इरादे से व्यक्ति की सहमति के बिना गति, गति में परिवर्तन, या गति को रोकने के कार्य के रूप मे परिभाषित किया गया है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो अनुचित तरीके से अपनी बाहों को एक महिला की कमर के चारों ओर लपेटता है, किसी व्यक्ति पर पानी छिड़कता है, या कुत्ते को किसी व्यक्ति पर हमला करने का आदेश देता है, बिना किसी शारीरिक नुकसान या क्षति के अवैध बल का उपयोग करता है, तो उसे आपराधिक बल का अपराध कहा जाता है। हालांकि, अगर इस तरह के गैरकानूनी बल के इस्तेमाल से शारीरिक पीड़ा या चोट लगती है, तो इसे ‘क्षति’ माना जाता है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 323 के तहत अपराध है।

उत्पीड़न

किसी महिला की लज्जा को भंग करने के उद्देश्य से किसी भी आपराधिक बल का कार्य, भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत आता है। आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (2013) ने चार अतिरिक्त प्रावधानों को शामिल करके धारा 354 के दायरे का विस्तार किया है। धारा 354 A, धारा 354 B, धारा 354 C, और धारा 354 D इसकी नई धाराएं हैं। स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम मेजर सिंह (1966) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘एक महिला की लज्जा भंग करना एक अपराध है- महिला की उम्र नहीं बल्कि अभद्र (इनडिसेंट) व्यवहार, लज्जा भंग करने के अपराध को परिभाषित करने की परीक्षा है, जिसे धारा 354, आई.पी.सी. के तहत दंडित किया जाता है।

  • धारा 354A: यौन उत्पीड़न और उसके लिए सजा
  • धारा 354B: कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग
  • धारा 354C: दृश्यरतिकता (वॉयरिज्म)
  • धारा 354D: पीछा करना

यौन उत्पीड़न और उसके लिए सजा : धारा 354 A

एक पुरुष जो निम्नलिखित में से कोई भी व्यवहार करता है:

  • अवांछित (अनवेलकम) और स्पष्ट यौन प्रस्ताव; या
  • यौन अनुग्रह के लिए अनुरोध या मांग; या
  • एक महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध अश्लीलता के लिए उजागर करना; या
  • अश्लील टिप्पणी (कमेंट) करना।

उसे यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

कोई भी व्यक्ति जो पैरा (1) के खंड (i), (ii), या (iii) में वर्णित अपराध करता है, उसे तीन साल तक के कठोर कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जाना चाहिए।

कोई भी व्यक्ति जो उपधारा (1) के पैरा (iv) में वर्णित अपराध करता है, उसे एक वर्ष तक की अवधि के लिए किसी भी प्रकार के कारावास, जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाना चाहिए।

विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (1997)

विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (1997) कार्यस्थल पर एक महिला के यौन उत्पीड़न के जघन्य (हीनियस) अपराध से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामला है। अहम सवाल यह था कि क्या महिलाओं को काम पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए नियमों को लागू करना जरूरी था। अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत हर व्यापार या पेशा कर्मचारियों को सुरक्षित काम करने का माहौल प्रदान करेगा। इसने जीवन के अधिकार के साथ-साथ गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को भी बाधित किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि महिलाओं को कार्यस्थल में होने वाले यौन उत्पीड़न से मुक्त होने का मूल अधिकार है। इसने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से बचने के लिए कर्मचारियों द्वारा पालन किए जाने वाले कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी रेखांकित किया था। अंत में, 2013 में, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 लागू किया गया, था जिससे कई आवश्यक सुरक्षा को प्रकाश में लाया गया था।

कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग : धारा 354 B

यह प्रावधान स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करता है कि एक पुरुष जो एक महिला के कपड़े उतारने के लिए आपराधिक बल का उपयोग करता है, उसे एक निर्धारित अवधि के लिए दंडित किया जाएगा। इस धारा का उल्लंघन भी एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध है, हालांकि यह कारावास से दंडनीय नहीं है।

दृश्यरतिकता : धारा 354C

कोई भी पुरुष, एक निजी कृत्य में लगी महिला की छवि को उन परिस्थितियों में देखता है, कैमरा में खींचता है, जहां वह सामान्य रूप से अपराधी या अपराधी की पहल पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा देखे न जाने की उम्मीद नही करती है, या यदि वह व्यक्ति ऐसे चित्र को प्रसारित करता है, तो उसे उसकी पहली दोषसिद्धि (कनविक्शन) पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नहीं होगी, लेकिन जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, से दंडित किया जाएगा और वह जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा। दूसरी या बाद की दोषसिद्धि पर, अपराधी को कम से कम तीन साल की अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, लेकिन उसे सात साल से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता, साथ ही साथ वह जुर्माना देने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

पीछा करना : धारा 354 D

कोई भी पुरूष जो-

  • एक महिला का पीछा करता है और उसकी स्पष्ट अनिच्छा के बावजूद, अंतरंग संबंधों को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार उससे संपर्क करता है या उससे संपर्क करने का प्रयास करता है; या
  • एक महिला के इंटरनेट, ईमेल, या इलेक्ट्रॉनिक संचार के अन्य रूपों पर नज़र रखता है;

तो वह पीछा करने का अपराध करता है।

व्यपहरण (धारा 359-363)

व्यपहरण, किसी भी रूप में, व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है। यह अनिवार्य रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ-साथ मानव अधिकारों द्वारा दिए गए जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है। यह लोगों के मन में डर पैदा करता है और सभ्य समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 359 के अनुसार, व्यपहरण दो प्रकार का होता है: भारत में से व्यपहरण और वैध संरक्षकता (गार्जियनशिप) से व्यपहरण।

धारा 360 के अनुसार, किसी कार्य को भारत में से व्यपहरण तब कहा जाता है, जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को, उसी की, या उस व्यक्ति की ओर से सहमति देने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत (ऑथराइज्ड) किसी व्यक्ति की सहमति के बिना, भारत की सीमाओं से परे ले जाता है।

धारा 361 के अनुसार, वैध संरक्षकता से व्यपहरण तब होता है जब कोई व्यक्ति सोलह वर्ष से कम आयु के किसी भी नाबालिग को, या अठारह वर्ष से कम आयु की किसी भी महिला, या विकृत दिमाग के किसी भी व्यक्ति को, ऐसे अभिभावक की सहमति के बिना या विकृत दिमाग के व्यक्ति के वैध अभिभावक की सहमति के बिना ले जाता है या बहकाता है। 

आवश्यक तत्व

  • नाबालिग या विकृत दिमाग के व्यक्ति को ले जाना या बहलाना;
  • ऐसे नाबालिग की आयु सोलह वर्ष से कम होनी चाहिए, यदि वह पुरुष है, या अठारह वर्ष से कम हो, यदि वह महिला है;
  • ले जाना या बहलाना नाबालिग या व्यक्ति के वैध अभिभावक की संरक्षकता से बाहर होना चाहिए; तथा
  • ऐसा ले जाना या लुभाना अभिभावक की सहमति के बिना होना चाहिए।

एस वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास (1964) के मामले में, वयस्कता की उम्र में आ रही एक लड़की ने स्वेच्छा से अपने पिता का घर छोड़ दिया, एक विशिष्ट स्थान पर आरोपी से मिलने की योजना बनाई, और रजिस्ट्रार के उप-कार्यालय में गई जहां आरोपी और लड़की ने एक विवाह के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस बात का कोई सबूत नहीं था कि आरोपी ने उसे उसके माता-पिता की कानूनी देखभाल से बाहर कर दिया था क्योंकि आरोपी ने उसे घर छोड़ने के लिए राजी करने में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई थी। यह निर्णय लिया गया था कि इस धारा के तहत अपराध का कोई सबूत नहीं है।

अपहरण (धारा 362)

भारतीय दंड संहिता की धारा 362 के तहत, जो कोई भी बलपूर्वक, या किसी भी धोखे से किसी भी व्यक्ति को किसी भी स्थान से जाने के लिए प्रेरित करता है, तो यह माना जाता है की उस व्यक्ति ने अपहरण किया है।

आवश्यक तत्व

  • जबरन जबरदस्ती, या भ्रामक तरीकों से प्रलोभन, और
  • ऐसी विवशता या प्रलोभन का आशय किसी व्यक्ति को किसी स्थान से हटाना होना चाहिए।

बल

शब्द ‘बल’, जैसा कि आई.पी.सी. की धारा 362, के तहत परिभाषित किया गया है, वास्तविक बल के उपयोग को संदर्भित करता है, न कि केवल धमकी या बल का प्रदर्शन। इस धारा के अनुसार, यदि कोई आरोपी पीड़ित को अपने साथ जाने के लिए मजबूर करने के लिए पिस्तोल से पीड़िता को धमकी देता है, तो यह अपहरण होगा।

धोखा

इस प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को धोखे से स्थान छोड़ने के लिए प्रेरित करना भी अपराध है। ‘बल के प्रयोग’ के विकल्प के रूप में धोखे का प्रयोग किया जाता है। जिसके नतीजतन, एक व्यक्ति बल का प्रयोग कर सकता है, या वैकल्पिक रूप से, किसी अन्य व्यक्ति को एक स्थान छोड़ने के लिए धोखा दे सकता है। किसी भी मामले में, इसे अपहरण के रूप में माना जाता है।

कहीं से भी जाने के लिए 

किसी व्यक्ति को किसी भी स्थान को छोड़ने के लिए मजबूर करना या समझाना अपहरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक वैध अभिभावक की संरक्षकता से होना जरूरी नहीं है, जैसा कि व्यपहरण के मामले में होता है। व्यपहरण, अपहरण के विपरीत, एक सतत (कंटीन्यूअस) अपराध है। जब किसी व्यक्ति को भारत से या किसी अभिभावक की वैध संरक्षकता से हटा दिया जाता है, तो व्यपहरण का अपराध किया जाता है। हालांकि, अपहरण के मामले में, एक व्यक्ति का न केवल तब अपहरण किया जाता है जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है, बल्कि तब भी जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है।

व्यपहरण की सजा, भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत आती है। इसमें कहा गया है कि जो कोई भी भारत से या वैध संरक्षकता से किसी भी व्यक्ति का अपहरण करता है, उसे एक अवधि के कारावास की सजा भुगतनी होगी, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी देना होगा।

यौन अपराध (धारा 375-376D)

बलात्कार

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार, संभोग छह खंडों में से एक के तहत होना चाहिए। जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ संभोग करता है:

  • उसकी इच्छा के विरुद्ध; या
  • उसकी सहमति के बिना; या।उसकी सहमति से, उसे मृत्यु या हानि के भय में डालकर; या
  • उसकी सहमति से, जब वह पुरुष जानता है कि वह उसका पति नहीं है और उसकी सहमति दी गई है क्योंकि वह मानती है कि वह एक अन्य पुरुष है जिससे उसने कानूनी रूप से शादी की है; या
  • उसकी सहमति से, यदि वह उस की प्रकृति और परिणामों को समझने में असमर्थ है जिसके लिए वह पागलपन, नशा, या उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से या किसी अन्य के माध्यम से इस तरह की सहमति के समय किसी भी हानिकारक पदार्थ के नशे के कारण सहमति देती है; या
  • चौदह वर्ष से कम आयु की महिला की सहमति से या उसके बिना।

सर्वोच्च न्यायालय ने तुलसीदास कनोलकर बनाम स्टेट ऑफ़ गोवा (2003) में स्पष्ट रूप से घोषित किया कि मानसिक रूप से विकलांग लड़की द्वारा दी गई सहमति को संभोग के लिए ‘सहमति’ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अपनी स्वीकृति के प्रभाव को समझने में असमर्थ थी।

वैवाहिक बलात्कार पर वाद विवाद

पति या पत्नी की इच्छा के विरुद्ध, अपने पति या पत्नी के साथ संभोग का कार्य वैवाहिक बलात्कार के रूप में जाना जाता है। दुनिया भर में, 195 में से 140 देशों ने पहले ही वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक कार्य बना दिया है। सूची में शामिल देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और रूस शामिल हैं। भारत उन कुछ देशों में से एक है जहां वैवाहिक बलात्कार अभी भी अवैध नहीं है। इसकी कानूनी जड़ों को भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में वापस खोजा जा सकता है, जो बलात्कार से संबंधित है और इसमें एक “अपवाद” है, जिसमें कहा गया है, “यदि पत्नी की उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है, तो एक पुरुष द्वारा, उसकी पत्नी के साथ किया गया संभोग, बलात्कार नहीं है।”

मार्च 2000 में, भारत के विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने “बलात्कार कानूनों की समीक्षा (रिव्यू)” पर अपनी 172वीं रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि यह धारा 375 में अपवाद खंड को समाप्त करने का प्रस्ताव नहीं करेगा “क्योंकि यह वैवाहिक संबंधों के साथ अनुचित हस्तक्षेप हो सकता है। “

2015 में, आर.आई.टी. फाउंडेशन की याचिका ने “विवाह अपवाद” की वैधता को चुनौती दी थी। 2022 में फाइनल राउंड के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय इस पर सुनवाई करेगा। एक अन्य महत्वपूर्ण मामला इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) का था, जिसमें विवाद का सवाल यह था कि क्या एक पति को अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध रखने पर बलात्कार किया माना जा सकता है यदि पत्नी की उम्र 15 से 18 साल के बीच है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और  21 चर्चा के विषय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि पत्नी की आयु 18 वर्ष से कम है, तो आई.पी.सी. की धारा 375 के अपवाद 2 को लागू नहीं किया जा सकता है।

वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण (क्रिमिनलाइजेशन) के खिलाफ तर्क

  • चूंकि इस तरह के मुद्दों को घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत नियंत्रित किया जाता है, वैवाहिक बलात्कार को कवर करने या आई.पी.सी. की धारा 375 से इस अपवाद को हटाने के लिए एक अलग कानून की आवश्यकता नहीं है।
  • कई व्यक्तियों, न्यायविदों (ज्यूरिस्ट्स) और यहां तक ​​कि पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करने वालों ने भी एक प्रमुख कारक के रूप में, इस कानून के गलत उपयोग का हवाला देते हुए वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की है।
  • सबूत का बोझ एक बड़ी समस्या है जिसने वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण को रोक दिया है।
  • वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के खिलाफ सबसे प्रमुख कारणों में से एक यह है कि इससे विवाह के बंधन टूट सकते है, पत्नियां पतियों पर अन्यायपूर्ण आरोप लगा सकती हैं।

वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण के लिए तर्क

  • अपवाद के तहत विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच असमानता को मनमाना और अप्राकृतिक माना गया और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया गया, जो कानून के तहत समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • यह भी तर्क दिया गया था कि वैवाहिक बलात्कार के अपवाद ने विवाहित महिलाओं के अनुच्छेद 21 के तहत स्वायत्तता (ऑटोनोमी) और गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन किया और धारा 375 के तहत सुरक्षा ना प्रदान करके, अनुच्छेद 15 के तहत उनके गैर-भेदभाव के अधिकार का उल्लंघन किया।
  • यह एक सांख्यिकीय (स्टेटिस्टिकली) रूप से सिद्ध तथ्य है कि अधिकांश यौन हमले उन लोगों द्वारा किए जाते हैं जो पीड़ित से परिचित होते हैं – अक्सर पति या पत्नी।
  • महिलाओं के खिलाफ वैवाहिक बलात्कार की वास्तविकता और व्यापकता, जो इसकी सजा की आवश्यकता को रेखांकित करती है, को कानूनी दुरूपयोग के मुद्दे से अलग किया जाना चाहिए।

सामूहिक बलात्कार

भारतीय दंड संहिता की धारा 376D में कहा गया है कि जब एक महिला का बलात्कार, एक या एक से अधिक लोगों द्वारा किया जाता है जो एक समूह का हिस्सा हैं या एक समान लक्ष्य के लिए मिलकर कार्य कर रहे हैं, तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को बलात्कार का दोषी माना जाता है और उसे न्यूनतम बीस साल की कारावास जिसे अजीवन तक बढ़ाया जा सकता है, की सजा दी जा सकती है, जिसका अर्थ है कि वे अपने शेष जीवन के लिए कैद हो जाएंगे, और जुर्माना के साथ भी दंडित किया जाएगा।

प्रदीप कुमार बनाम यूनियन एडमिनिस्ट्रेटर, चंडीगढ़ (2006) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन (प्रॉसिक्यूटर) पक्ष को यह साबित करना होगा कि:

  • ऐसे व्यक्तियों का एक समूह था जिन्होंने पीड़िता के साथ बलात्कार करने के सामान्य इरादे के साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया,
  • समूह के एक से अधिक व्यक्तियों ने पूर्व-व्यवस्थित (प्री अरेंज्ड) योजना के साथ बलात्कार के कार्य में भाग लिया, और
  • समूह के सामान्य उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए समूह के एक या अधिक सदस्यों (जरूरी नहीं कि सभी) द्वारा बलात्कार का कार्य किया गया हो।

ऐसे में माना जाता है कि बलात्कार को समूह के सभी सदस्यों ने अंजाम दिया है। एक सामान्य इरादे का अस्तित्व ही दोष का सार है। किसी व्यक्ति की एक मात्र उपस्थिति, जब कोई दूसरा बलात्कार कर रहा हो, यह स्थापित करने के लिए अपर्याप्त है कि वह अन्य लोगों के साथ पहले से ही ऐसा करने के लिए सहमत था, और इस प्रकार उसे सामूहिक बलात्कार का दोषी ठहराया जा सकता है।

अप्राकृतिक अपराध (धारा 377)

अंत में, मानव शरीर के खिलाफ छठा प्रकार का अपराध एक अप्राकृतिक अपराध है। धारा 377 अप्राकृतिक अपराधों को परिभाषित करती है:

जो कोई भी अपनी इच्छा से किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ शारीरिक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास से या 10 साल की सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

यह धारा सोडॉमी और पशुता के लिए दंड से संबंधित है। एक पुरुष द्वारा एक अन्य पुरुष के साथ प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ, या एक महिला के द्वारा अन्य महिला के साथ, या एक पुरुष या महिला द्वारा किसी जानवर के साथ किसी भी तरह से किए गए शारीरिक संभोग को अपराध माना जाता है। प्रवेश, भले ही यह केवल एक मामूली संकेत हो, बलात्कार में महत्वपूर्ण है। इस धारा के तहत किसी मामले में सहमति इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है। वह व्यक्ति जो निष्क्रिय भूमिका निभाता है, वह उतना ही दोषी है जितना कि वह व्यक्ति है जो सक्रिय (एक्टिव) रूप से एक दुष्प्रेरक के रूप में कार्य में भाग लेता है।

धारा 377 की संवैधानिक वैधता

नाज़ फाउंडेशन बनाम एन.सी.टी. ऑफ़ दिल्ली सरकार (2009) में, एक गैर-सरकारी संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। नाज़ ने तर्क दिया कि धारा 377, निजी तौर पर दो वयस्कों के बीच सहमति से संभोग को शामिल करके, अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 में दिए गए संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है। इस बात पर जोर दिया गया था कि धारा 377, कानून के समक्ष समानता का अधिकार (जो तर्कहीन तर्कसंगतता के आधार पर किसी भी वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) को प्रतिबंधित करता है) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (जिसमें गोपनीयता, गरिमा (डिग्निटी) और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अधिकार शामिल है) जो, क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 द्वारा गारंटीकृत है, की भावना के खिलाफ जाती है। इसमें कहा गया था कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उचित संवैधानिक प्रावधानों और आकांक्षाओं के आलोक में उनके तर्कों और प्रतिवादों की जांच के बाद सभी पक्षों की दलीलों को स्वीकार कर लिया; देश और विदेश से न्यायिक घोषणाएं और न्यायिक राय; सहमति से समलैंगिकता के (गैर) अपराधीकरण के लिए और उसके खिलाफ नैतिक औचित्य (मॉरल जस्टिफिकेशन); और निजी तौर पर दो इच्छुक वयस्कों के बीच यौन क्रिया से संबंधित विदेशी कानून में किए गए सुधार। इसने धारा 377 को आंशिक रूप से असंवैधानिक रूप से निर्धारित किया। इसने फैसला किया कि धारा 377 अवैध है, क्योंकि यह वयस्कों (अर्थात, 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों) के यौन कार्यों को निजी तौर पर अपराध बनाती है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 21 का उल्लंघन करती है।

आई.पी.सी. में धारा 377 को बनाए रखने के खिलाफ और समान रूप से बाध्यकारी कारणों को सुनने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के नाज़ फाउंडेशन के निर्णय को खारिज कर दिया और सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन (2013) में आई.पी.सी. की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। 

2018 में, नवतेज सिंह जौहर और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के ऐतिहासिक फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक यौन संबंध सहित वयस्कों के बीच सभी सहमति से बनाए यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। न्यायालय ने धारा 377 के प्रावधानों को बनाए रखा जो जानवरों पर सहमति के बिना किए गए कार्यों या यौन कार्यों को अवैध बनाते हैं।

आपराधिक कानून संशोधन विधेयक (क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल), 2019

  • निर्भया कांड के परिणामस्वरूप महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से निपटने वाले कानूनों में सुधार ने महिलाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिसके नतीजतन, आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 का उद्देश्य सभी प्रकार के यौन उत्पीड़न को दंडित करने वाले लिंग-तटस्थ घटक (जेंडर न्यूट्रल कंपोनेंट) की वकालत करके प्रगति करना है।
  • यह विधेयक आई.पी.सी. की धारा 2 में “लज्जा” की परिभाषा जोड़ने का प्रयास करता है। यह किसी भी पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर व्यक्ति से संबंधित व्यक्तित्व विशेषता के रूप में इसका वर्णन करने का प्रयास करता है, जो आमतौर पर नैतिकता, शालीनता और भाषण और व्यवहार की अखंडता (इंटीग्रिटी) में विश्वास रखता है।
  • आई.पी.सी. की धारा 354, 354A, 354B, 354C और 354D में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। महिलाओं की लज्जा भंग करना, यौन उत्पीड़न, कपड़े उतारने का इरादा, दृश्यरतिकता और पीछा करना सभी प्रतिबंधित हैं। बलात्कार के अपराधी और पीड़िता के लिंग को ध्यान में रखते हुए इन कानूनों में संशोधन किया जाएगा। शब्द “लड़का” या “कोई भी पुरुष जो” को “कोई भी” से बदलने की योजना है, जबकि “एक महिला” को “किसी भी व्यक्ति” से बदलने का प्रस्ताव है।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बदलाव किया गया है। विधेयक में “किसी भी व्यक्ति” या “अन्य व्यक्ति” जैसे सर्वनामों को “किसी भी व्यक्ति” या “अन्य व्यक्ति” जैसे शब्दों से बदलने का प्रस्ताव है, जिससे बलात्कार को एक लिंग-तटस्थ अपराध बनाने का इरादा है है।
  • यह विधेयक “लिंग (पेनिस)” और “योनि (वजीना)” शब्दों को “जननांग (जेनिटल)” शब्द के साथ जोड़ने का भी प्रयास करता है, जिसे स्पष्टीकरण 1 में लिंग और योनि के रूप के तहत परिभाषित किया गया है।
  • यह विधेयक, एक नई धारा 375A का प्रस्ताव करता है, जो यौन हमले को जानबूझकर जननांगों, गुदा (एनस), या स्तनों को छूने के रूप में परिभाषित करता है, या किसी अन्य व्यक्ति को, बिना उसकी सहमति के दूसरे व्यक्ति के ऐसे हिस्सों को छूने के लिए मजबूर करता है, या अवांछित शब्दों या इशारों का उपयोग करता है जो एक “कार्रवाई योग्य प्रकृति का अवांछित खतरा बनाते हैं” और ऐसे कार्यों के लिए तीन साल तक की कारावास की सजा और / या जुर्माना हो सकता है।
  • हिरासत में महिलाओं और बच्चों के बलात्कार से निपटने वाली विशेष उप-धाराओं के अलावा, इस विधेयक का उद्देश्य “महिला” शब्द को “किसी भी व्यक्ति” के साथ बदलकर आई.पी.सी. की धारा 376 A, 376 B, 376 C और 376 D में सूचीबद्ध अपराधों को लिंग-तटस्थ करना है।”

मानव शरीर के विरुद्ध अपराधों के लिए दंड

आई.पी.सी. की धारा 53 में पांच प्रकार की सजा का प्रावधान है:

  • मृत्यु दंड,
  • आजीवन कारावास,
  • कारावास (कठोर/साधारण),
  • संपत्ति की जब्ती, और
  • जुर्माना।

भारतीय दंड संहिता 1860 का अध्याय 3, जिसका शीर्षक सजा है, धारा 53 से लेकर 75 तक विभिन्न प्रकार की सजाओं से संबंधित है।

मृत्यु दंड

किसी अपराध के लिए दंड के रूप में अपराधी के जीवन को छीन लेने को मृत्युदंड के रूप में जाना जाता है। यह केवल भारत में दुर्लभतम मामलों (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) में ही दिया जाता है। इसे निम्नलिखित अपराधों के लिए दंड के रूप में लगाया जा सकता है:

  • भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना (धारा 121),
  • विद्रोह का दुष्प्रेरण (एबेटमेंट ऑफ़ म्यूटिनी) (धारा 132),
  • झूठे सबूत गढ़ने के लिए दिया जा सकता है, जिस पर एक निर्दोष व्यक्ति को मौत की सजा का सामना करना पड़ा हो (धारा 194),
  • हत्या (धारा 302),
  • आजीवन कारावास से दंडित दोषियों द्वारा हत्या (धारा 303),
  • नाबालिग या पागल या नशे में धुत व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना (धारा 305), और;
  • हत्या के साथ डकैती (धारा 396),
  • फिरौती के लिए व्यपहरण (धारा 364A)।

कारावास

साधारण कारावास

यह एक प्रकार की सजा है जिसमें अपराधी को सिर्फ कैद किया जाता है और काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है। साधारण कारावास से दंडित किए जाने वाले कुछ अपराध हैं:

  • गलत तरीके से दबाव डालना (धारा 341),
  • किसी स्त्री की मर्यादा को ठेस पहुंचाने के आशय से कोई ध्वनि या इशारा करने पर कोई शब्द बोलना (धारा 509),
  • नशे में व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर दुराचार (मिसकंडक्ट) (धारा 510)
  • मानहानि (डिफेमेशन) (धारा 500, 501, 502),
  • संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग (मिसअप्रोप्रिएशन) (धारा 403)।

कठोर कारावास

इस प्रकार के कारावास में, अपराधी को अन्य कार्यों के अलावा, अनाज पीसने, खुदाई करने और लकड़ी काटने जैसे शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता है। स्टेट ऑफ़ गुजरात बनाम गुजरात उच्च न्यायालय (1998) के मामले में, कठोर कारावास से गुजर रहे कैदियों पर कड़ी मेहनत का आरोप संवैधानिक पाया गया था। इसे निम्नलिखित अपराधों में दिया जा सकता है:

आजीवन कारावास

आजीवन कारावास का अर्थ है कि अपराधी को उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कैद किया जाएगा। धारा 57 के अनुसार आजीवन कारावास की सजा 20 साल की सजा के बराबर है। हालांकि, सजा की अवधि के अंशों (फ्रैक्शंस) की गणना (कैलकुलेट) करने के उद्देश्य के लिए, आजीवन कारावास 20 साल के कारावास के बराबर है; अन्यथा आजीवन कारावास की सजा असीमित अवधि की होती है।

संपत्ति की जब्ती

सजा के तौर पर संपत्ति की जब्ती का अतीत बहुत पुराना है। भारतीय दंड संहिता की धारा 53, सजा की एक विधि के रूप में संपत्ति को जब्त करने की अनुमति देती है। इसे भारतीय दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम 1921 (1921 का 16) द्वारा निरस्त (रिपील) कर दिया गया था, जिसने संहिता की धारा 61 और 62 को हटा दिया था। अपराधी की संपत्ति की पूर्ण जब्ती अब सजा का एक तरीका नहीं है। दूसरी ओर, भारतीय दंड संहिता में तीन अपराध हैं, जिसके लिए अपराधी अपनी संपत्ति को जब्त करने के लिए उत्तरदायी है। वे इस प्रकार हैं:

  • भारत सरकार से मैत्री (एलायंस) या शांति का संबंध रखने वाली किसी शक्ति के राज्यक्षेत्र (टेरिटरी) में लूटपाट करने के लिए, ऐसी लूटपाट करने के लिए उपयोग में लाई गई या उपयोग में लाए जाने के लिए इरादा होने वाली, या ऐसी लूटपाट द्वारा अर्जित संपत्ति, इसकी जब्ती से दंडनीय है (धारा 126)।
  • युद्ध या लूटपाट के दौरान ली गई संपत्ति को प्राप्त करना उस संपत्ति की जब्ती द्वारा दंडनीय है (धारा 127)।
  • एक सार्वजनिक अधिकारी जो अवैध रूप से अपने नाम पर या किसी अन्य के नाम पर संपत्ति की खरीद या बोली लगाता है, उसकी संपत्ति को जब्त कर लिया जाता है (धारा 169)।

जुर्माना

सजा लगाने से संबंधित लगभग हर प्रावधान में दंड के रूप में जुर्माना होता है। जहां एक राशि निर्दिष्ट की जाती है, जिस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, हालांकि, धारा 63 में कहा गया है कि अपराधी जिस जुर्माने के लिए उत्तरदायी है, वह असीमित हो सकता है, लेकिन अत्यधिक नहीं हो सकता।

सोमन बनाम स्टेट ऑफ़ केरल (2012) में, सर्वोच्च न्यायालय ने आनुपातिकता (प्रोपोर्शनेलिटी), प्रतिरोध और पुनर्वास सहित सजा के विवेक का प्रयोग करते समय कई मानदंडों पर विचार किया है। न्यायालय ने कहा कि शमन करने वाले और उत्तेजित करने वाले तत्वों को आनुपातिकता विश्लेषण का हिस्सा माना जाना चाहिए।

अपराधों की रोकथाम: आगे क्या किया जा सकता है

भारत में, अपराधों में हत्या, मनी लॉन्ड्रिंग, धोखाधड़ी और मानव तस्करी जैसे अपराधों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। इन अपराधों में विभिन्न सांख्यिकीय प्रवृत्तियां (टेंडेंसी) होती हैं जो समय के साथ बदलती हैं, जो मानव विचार के विकसित होने से बदलती हैं। वर्तमान में, अपराध अब सामाजिक मुद्दों का एक घटक नहीं रह गया है; बल्कि, यह एक राष्ट्र के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे के रूप में विकसित हुआ है। उनके विभिन्न कारणों को प्रभावित करने के लिए हस्तक्षेप करके, अपराध की रोकथाम के तरीके और पहल अपराध होने की संभावना को कम करने का प्रयास करते हैं, साथ ही साथ व्यक्तियों और समाज पर उनके संभावित प्रतिकूल प्रभाव, विशेष रूप से अपराध के डर को कम करने का प्रयास करते हैं।

सरकारी हस्तक्षेप

समन्वय (को-ऑर्डिनेशन)

समन्वय राष्ट्रीय अपराध रोकथाम निदान (डायग्नोसिस) और रणनीतियों के लिए स्थानीय आपराधिक समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध के बीच संबंधों को शामिल करने की आवश्यकता को संदर्भित करता है।

अधिकारियों की भूमिका

अधिकारियों का प्राथमिक ध्यान उन स्थितियों को रोकने पर होना चाहिए जो आपराधिकता की ओर ले जाती हैं और अंत में, अपराधों का संचालन करती हैं। यह एक व्यवस्थित, एकीकृत (इंटीग्रेटेड) और समन्वित रणनीति द्वारा पूरा किया जा सकता है, जिसमें दंडात्मक उपायों का उपयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाता है। सरकारों को दमन (सप्रेशन) और रोकथाम के बीच संतुलन की स्थिति के साथ-साथ पुनर्वास पहल के आधार पर एक प्रणाली विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो लोगों की मानसिकता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा, और इसलिए आपराधिकता को कम करेगा।

मानवाधिकार उपकरण (ह्यूमन राइट्स इंस्ट्रूमेंट)

यह सुनिश्चित करते है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों (ट्रीटीज), कानून और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अन्य उपायों का पालन किया जाता है और उनकी निगरानी की जाती है।

प्रतिबद्धता (कमिटमेंट)

अपराध के कारणों की व्यापक प्रकृति और उन्हें संबोधित करने के लिए आवश्यक कौशल (स्किल) और जिम्मेदारियों को देखते हुए, प्रभावी अपराध रोकथाम के लिए एक संस्थागत ढांचे को बनाने और बनाए रखने के लिए सभी स्तरों पर सरकार की प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

जवाबदेही

केवल कार्यक्रमों की स्थापना और रखरखाव और मूल्यांकन के लिए पर्याप्त संसाधन, साथ ही वित्तपोषण (फाइनेंसिंग), कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन), मूल्यांकन और वांछित परिणामों की उपलब्धि के लिए स्पष्ट जवाबदेही ही स्थिरता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती है।

नीतियां और कार्यक्रम

ज्ञान-आधारित रणनीतियों, नीतियों और कार्यक्रमों को ज्ञान के व्यापक विषय के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए, साथ ही विशिष्ट अपराध मुद्दों, कारणों और सिद्ध दृष्टिकोणों (एप्रोच) के साक्ष्य पर भी स्थापित किया जाना चाहिए।

गैर-सरकारी हस्तक्षेप

  • लागू सामाजिक और आर्थिक नीतियों में अपराध की रोकथाम को शामिल करने की आवश्यकता के साथ-साथ जोखिम वाले समुदायों, बच्चों, परिवारों और युवाओं के सामाजिक एकीकरण पर जोर देने को सामाजिक-आर्थिक विकास और समावेशन (इंक्लूजन) कहा जाता है।
  • गैर सरकारी संगठन कार्यक्रम जोखिम में रह रहे युवाओं या पूर्व-अपराधियों और उनके परिवारों के साथ-साथ पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन), प्रशिक्षण (ट्रेनिंग), कैरियर की संभावनाएं, माइक्रोक्रेडिट, और बचे लोगों के लिए समर्थन के साथ-साथ सहकर्मी शिक्षा प्रशिक्षण और जागरूकता बढ़ाने के लिए मल्टीमीडिया प्रशिक्षण प्रदान कर सकते हैं।
  • जबकि ज्यादातर देशों में सरकारें विशिष्ट नीतियों और कानूनों के माध्यम से अपराध की रोकथाम में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) को सुरक्षित और अपराध-मुक्त समुदायों के निर्माण में सहायता करने में बढ़ती दिलचस्पी दिखानी चाहिए।
  • गैर-सरकारी हस्तक्षेप कार्यक्रम जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी का आकार लेते हैं, उन्हें बहुत सफलता मिलती है। प्रशिक्षण और पुनर्वास पर ध्यान देने के साथ ज्यादातर गैर-सरकारी गतिविधियां विकास पर आधारित होनी चाहिए।

निष्कर्ष

हर देश में अपराध होते हैं, और अपराध मुक्त राज्य जैसी कोई चीज नहीं होती है। अपराध एक ऐसी बीमारी की तरह है जिसका कोई इलाज नहीं है और जिसे दुनिया से पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे गंभीरता और आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) में कम किया जा सकता है, जिसमें कहा गया है कि अपराधों के लिए दंड ऐसा होना चाहिए कि वे उन लोगों के मन में भय पैदा करें जो उन्हें करते हैं, इस प्रकार उन्हें करने से रोकते हैं। क्योंकि यह एक सच्चाई है कि आज के दौर में व्यक्ति इस हद तक कार्यों को अंजाम दे सकते हैं कि उन्हें मानव जीवन की कीमत चुकानी पड़ सकती है, जो ईश्वर का एक मूल्यवान उपहार है, तभी मानव व्यवहार को विनियमित, संयमित और शांति के सामान्य लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अच्छे विश्वास में चलाया जा सकता है। 

संदर्भ