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इलेक्ट्रॉनिक संविदा और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों की वैधता और प्रवर्तनीयता

यह लेख Buddhisagar Kulkarni, जो इन-हाउस काउंसल के लिए बिजनेस लॉ में डिप्लोमा कर रहें हैं और के.आई.आई.टी. स्कूल ऑफ लॉ, भुवनेश्वर की छात्रा Raslin Saluja के द्वारा लिखा गया है। इस लेख को Tanmaya Sharma (एसोसिएट, लॉसिखो) के द्वारा संपादित (एडिट) किया गया है। यह लेख इलेक्ट्रॉनिक संविदा (कॉन्ट्रेक्ट) और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों की वैधता और प्रवर्तनीयता (एनफोर्सेबिलिटी) पर प्रकाश डालता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है। 

परिचय

कोविड 19 महामारी की विनाशकारी स्थिति और उसके बाद भारत सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन और अन्य प्रतिबंधों ने सभी व्यावसायिक गतिविधियों को बंद कर के रख दिया था और गंभीर रसद (लॉजिस्टिकल) चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूर किया था। चूंकि भौतिक (फिजिकल) संविदा पर हस्ताक्षर करना संभव नहीं हो रहा था, इसलिए महामारी से पहले चर्चा में रह रहे कई सौदों को रोक दिया गया था। कंपनियों और व्यक्तियों ने ऐसे समय में इलेक्ट्रॉनिक संविदा को चुनने पर विचार किया है। इलेक्ट्रॉनिक संविदा भारत में एक नया विचार नहीं है, और इसे महामारी से बहुत पहले ही पहचान लिया गया था। महामारी के परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉनिक संविदा और दस्तावेजों के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के निष्पादन (एक्जीक्यूशन) में तेजी आई है।

वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे हम डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक संविदा, जिन्हें ई-संविदा के रूप में भी जाना जाता है, अब पेपर पर आधारित संविदा की जगह ले रहे हैं। समय के साथ- साथ, व्यापार करने के तरीके में बदलाव आया है, जिसमें आभासी (वर्चुअल) काम को प्राथमिकता दी जा रही है। व्यवसाय ई-संविदा को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि वे कम पैसों में भी बन जाते हैं और बड़े पैमाने पर लाभ प्रदान करते हैं। कुछ मामलों में तात्कालिकता (अर्जेंसी) की भावना और कंपनियों को अपने व्यवसायों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता ने लोगों को इस साधन का सहारा लेने की आवश्यकता दिखाई है।

एक ई-संविदा क्या होता है?

एक ई संविदा नियमित तौर पर पेपर और पेन पर आधारित संविदा का डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक रूप होता है। ई-संविदा की आवश्यकताएं भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत लिखित या मौखिक संविदा के समान हैं। इसके अलावा, ई-संविदा की एक अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकता इसकी स्वीकृति है, जिसमें या तो इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर या कोई भी अन्य स्वीकृति के तरीके शामिल है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप पर आधारित हों। 

इलेक्ट्रॉनिक संविदा के रूप

इलेक्ट्रॉनिक संविदा के 4 रूप होते हैं:  

  1. श्रिंक रैप संविदा
  2. क्लिक रैप संविदा
  3. ब्राउज रैप संविदा
  4. ई मेल

आइए इन सब रूपों को विस्तार में जाने:

1. श्रिंक रैप संविदा 

श्रिंक-रैप संविदा अक्सर सॉफ़्टवेयर लाइसेंसिंग समझौते होते हैं।

“श्रिंक-रैप” नाम सी.डी.-रोम की सिकुड़ी हुई रैप पैकेजिंग से लिया गया है, जिसका उपयोग सॉफ्टवेयर को स्थानांतरित (ट्रांसफर) करने के लिए किया जाता था। जब एक लाइसेंसिंग संविदा को किसी सॉफ्टवेयर के साथ पैक किया जाता है, तो संविदा तब शुरू होता है जब उपयोगकर्ता उत्पाद का उपयोग करने के लिए सिकुड़ने वाले रैप को फाड़ देता है।

सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल होने से पहले लाइसेंसिंग संविदा सामने आते हैं और फिर उसके बाद यह आमतौर पर सॉफ़्टवेयर पैकेज के साथ शामिल नहीं होते हैं। अन्य प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संविदा पर, श्रिंक रैप संविदा का एक अलग लाभ यह होता है की इसमें माल वापस करके उनकी स्वीकृति को रद्द किया जा सकता है।

2. क्लिक रैप संविदा 

क्लिक रैप संविदा, टेक्स्ट के वे बड़े – बड़े ब्लॉक होते हैं जिन्हें आमतौर पर बहुत से लोग नहीं पढ़ते हैं, जो की वेब पर आधारित सेवा, सॉफ़्टवेयर या अन्य सेवाओं का उपयोग करने के लिए संविदा की शर्तों के बारे में बताते है। उपयोगकर्ता को एक बटन पर क्लिक करना होता है या एक बॉक्स पर चेक करना होता है, यह दिखाने के लिए कि वे संविदा के नियमों और शर्तों से सहमत हैं, और इसलिए यही कारण है कि उन्हें क्लिक रैप संविदा कहा जाता है।

आपने शायद देखा होगा कि क्लिक-रैप संविदा, श्रिंक रैप संविदा की तुलना में “कम परक्राम्य (नेगियोशिएबल)” हैं क्योंकि उपयोगकर्ता को अगले वेब पेज पर आगे जाने के लिए या किसी सॉफ़्टवेयर का एक्सेस प्राप्त करने के लिए ऐसे संविदा की शर्तों को स्वीकार करना होता है। संक्षेप में समझें तो, क्लिक रैप समझौते, ऐसी स्थिति बना देते हैं जिसमें उपयोगकर्ता उन शर्तों को स्वीकार करने या छोड़ने के लिए बाध्य होता है और यही चीज क्लिक रैप संविदा की प्रवर्तनीयता से संबंधित कई कानूनी मुद्दों को उठाता है।

3. ब्राउज़ रैप संविदा 

आपने निःसंदेह ब्राउज़ रैप संविदा हर रोज़ देखे ही होंगे। वे विभिन्न वेबसाइटों पर इन शब्दों से संबंधित होते हैं जो कहते हैं कि “इन सेवाओं का उपयोग करते रहने से, आप इसके नियम और शर्तों से सहमत होते हैं” या “साइन अप करके, मैं उपयोग की शर्तों से सहमत होता हूं।” ब्राउज-रैप संविदा, ऐसे संविदा होते हैं जिनके लिए आप केवल उसमे प्रदान की गई सेवा का उपयोग जारी रख कर ही या वेब पेज ब्राउज़ करके सहमत होते हैं, और इसलिए यहां से ही इसका यह नाम आता है। इसके अलावा, ब्राउज रैप समझौतों की शर्तें आमतौर पर हाइपरलिंक के माध्यम से देखी जा सकती हैं।

4. ई मेल

ई मेल कुछ ऐसा नहीं है जिसे आप इलेक्ट्रॉनिक संविद की सूची में देखने का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन फिर भी वे कुछ परिस्थितियों में कानूनी रूप से लागू करने योग्य होते हैं।

ट्राइमेक्स इंटरनेशनल एफ.जेड.ई. बनाम वेदांता एल्युमिनियम लिमिटेड, भारत 2010 के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा यह माना गया था कि यदि ई मेल के माध्यम से किसी अपंजीकृत (अनरजिस्टर्ड) और अहस्ताक्षरित संविदा पर चर्चा की जाती है, तो वह वैध होता है। इसलिए, ऐसे संविदा जिन्हें ई मेल के द्वारा सहमत मिली होती है, वह भी लागू करने योग्य होते हैं। ई मेल को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी हस्ताक्षरित किया जा सकता है, जो यह निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है कि कोई समझौता संविदा बन जाता है या नहीं।

क्या ई संविदा कानूनी रूप से स्वीकार्य हैं?

किसी भी अन्य मूर्त (टैंजिबल) संविदा की तरह, एक ई संविदा काफी हद तक भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (आई.सी.ए.) के प्रावधानों से बाध्य होता है। जिसके परिणाम स्वरूप, ई संविदा की वैधता, एक वैध संविदा के मानदंडों को पूरा करने पर निर्भर करती है। आइ.सी.ए. की धारा 10 एक कानूनी संविदा के आवाश्यक तत्वों के बारे में बताती है।

  1. एक पक्ष द्वारा एक प्रस्ताव (ऑफर) दिया जाना चाहिए और दूसरे द्वारा उस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना चाहिए।
  2. पक्षों का आपसी समझौता होना चाहिए।
  3. दोनों के बीच कानूनी संबंध स्थापित करने की इच्छा होनी चाहिए।
  4. संविदा के पक्षों को संविदा में प्रवेश करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम होना चाहिए, जिसका अर्थ यह है कि पक्षों की उम्र 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए, स्थिर (स्टेबल) दिमाग, विलायक (सॉल्वेंट), और आदि होना चाहिए।
  5. संविदा का उद्देश्य कानूनी होना चाहिए और सार्वजनिक नीति का उल्लंघन नहीं करना चाहिए; उदाहरण के लिए, अवैध नशीले पदार्थों को बेचने का समझौता वैध संविदा नहीं होता है।
  6. समझौते का समर्थन करने के लिए प्रतिफल (कंसीडरेशन) का उपयोग किया जाना चाहिए, यानी, मौद्रिक या कुछ उसी तरह का मुआवजा होना चाहिए।
  7. समझौते को अंजाम देना संभव होना चाहिए।
  8. संविदा के प्रावधान स्पष्ट रूप से दिए जाने चाहिए।

ई-संविदा के इस रूप के कारण, कई कानून हैं जिनमें ई-संविदा को नियंत्रित करने के लिए विशिष्ट प्रावधान दिए गए हैं। ऐसे सभी कानूनों की व्याख्या आई.सी.ए. के प्रावधानों के संयोजन (कंजंक्शन) में की जानी चाहिए न कि एक दूसरे से अलग करके की जानी चाहिए।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट) (आई.टी. अधिनियम) की धारा 4 के तहत ये आवश्यकता दी गई है कि कोई भी जानकारी या मामला जो लिखित रूप में है, उसे तृप्त (सेटिसफाइड) माना जाएगा, यदि ऐसी जानकारी या मामला इलेक्ट्रॉनिक रूप में है और इसे अच्छी तरह से देखा जा सकता है, ताकि इसे भविष्य के विश्लेषण (एनालिसिस) के लिए उपयोग किया जा सके। 

इसके अलावा, आई.टी. अधिनियम की धारा 10A के तहत, जहां पर,

  1. एक संविदा का निर्माण,
  2. प्रस्तावों का संचार (कम्युनिकेशन),
  3. प्रस्तावों की स्वीकृति,
  4. प्रस्तावों को रद्द करना, और
  5. स्वीकृति, जैसा भी मामला हो, इलेक्ट्रॉनिक रूप में या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के माध्यम के द्वारा किया जाता है, तो ऐसे संविदा को केवल इस आधार पर लागू ना करने योग्य नहीं माना जाएगा कि इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक रूप या साधन का उपयोग उस उद्देश्य के लिए किया गया था।

तमिलनाडु ऑर्गेनिक प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मामले में, इलेक्ट्रॉनिक नीलामी के परिणाम को मद्रास उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा था। इसमें कहा गया था कि इलेक्ट्रॉनिक संविदा के माध्यम से संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) दायित्व उत्पन्न हो सकते हैं और ऐसे संविदा को कानून के माध्यम से लागू किया जा सकता है। उच्च न्यायालय के अनुसार, आई.टी. अधिनियम की धारा 10A, समझौतों और संविदा को पूरा करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक तरीकों के उपयोग की अनुमति देती है।

ई संविदा के संबंध में आई.टी. अधिनियम के लागू होने के अपवाद (एक्सेप्शन)

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आई.टी. अधिनियम की पहली अनुसूची (शेड्यूल) में इसको लागू करने से निम्नलिखित दस्तावेजों और लेनदेन को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है:

आई.टी.अधिनियम के उपरोक्त प्रावधानों को देखते हुए, भारतीय अदालतों ने समय-समय पर इलेक्ट्रॉनिक रूप में किए गए संविदा की वैधता को मान्यता दी है।

ई संविदा पर स्टांप शुल्क

भारत में, लागू केंद्रीय या राज्य स्तर के स्टांप शुल्क नियमों के अनुसार कुछ लिखतों (इंस्ट्रूमेंट) पर एक निश्चित या यथामूल्य (एड वेलोरेम) आधार पर स्टांप शुल्क देय होता है।

स्टांप शुल्क, आमतौर पर उन दस्तावेजों पर लगाया जाता है जो भौतिक रूप से मुद्रित और हस्ताक्षरित होते हैं।

भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 (“स्टांप अधिनियम”) के तहत, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या उनके निष्पादन पर देय स्टाम्प शुल्क से संबंधित कोई विशेष प्रावधान नहीं है। भारतीय स्टाम्प अधिनियम के अनुसार, एक लिखत कोई भी ऐसा दस्तावेज होता है जो किसी अधिकार या जिम्मेदारी को बनाता है, उसे स्थानांतरित करता है, सीमित करता है, बढ़ाता है, काम करता है, या रिकॉर्ड करता है या ऐसा करने का दिखावा करता है। जबकि ज्यादातर राज्य स्टांप शुल्क क़ानून, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उल्लेख नहीं करते हैं, लेकिन उनके अलावा कुछ राज्य करते हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, “लिखत” की परिभाषा में शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन पर स्टाम्प शुल्क लगाया जाता है।

स्टाम्प शुल्क का भुगतान करने में विफल होने के निहितार्थ (इमप्लिकेशंस)

  • जैसा कि पहले भी कहा गया है, ऐसा लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक रूप से किया गया कोई भी संविदा (और यदि उपयुक्त स्टाम्प अधिनियमों के तहत वह शुल्क के लिए उत्तरदायी है) स्टाम्प शुल्क भुगतान के अधीन हो सकता है।
  • जब तक संबंधित स्टांप ड्यूटी कानून के तहत इलेक्ट्रॉनिक रूप से निष्पादित लिखतों के लिए विशेष प्रभाव निर्धारित नहीं किया गया है, ऐसे दस्तावेजों के संबंध में स्टांप शुल्क का भुगतान करने में विफलता के परिणाम भौतिक लिखतों पर लागू होने वाले परिणामों के समान होंगे।
  • जिन दस्तावेजों पर स्टाम्प अधिनियम के अनुसार स्टाम्प शुल्क लगाया जाता है, उन्हें अदालत में साक्ष्य के रूप में अनुमति नहीं है।

फिर भी, स्टाम्प अधिनियम और साथ ही ज्यादातर राज्य स्टाम्प शुल्क विनियमों (रेगुलेशन) के तहत भी, अनुचित रूप से मुहर लगी लिखतों को उचित शुल्क के भुगतान के बाद साक्ष्य के रूप में स्वीकार करते है और शुल्क की राशि के संबंध में 10 गुना तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा, जो कोई भी गवाह के अलावा अन्य स्टाम्प ड्यूटी के साथ देय ऐसे किसी भी लिखत को निष्पादित या हस्ताक्षर करता है, उस पर उचित रूप से मुहर लगाए बिना मौद्रिक जुर्माना लगाया जा सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर किसी व्यक्ति की पहचान का प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन), इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रदान करता है। आई.टी. अधिनियम की धारा 2(1)(ta) के तहत इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को इस तरह से परिभाषित किया गया है: “दूसरी अनुसूची में प्रदान की गई इलेक्ट्रॉनिक तकनीक के माध्यम से एक ग्राहक के द्वारा किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का प्रमाणीकरण (ऑथेंटिकेशन) और इसमें एक डिजिटल हस्ताक्षर भी शामिल होता है।”

ई हस्ताक्षर की आवश्यकता

एक हस्ताक्षर का प्राथमिक उद्देश्य एक संविदा को प्रमाणित करना है और उन पक्षों पर इस संविदा को बाध्यकारी बनाना है, जो इस संविदा का हिस्सा बनने के लिए अपनी सहमति व्यक्त करते है। उन मामलों के लिए जहां संविदा  ऑनलाइन दर्ज किए जाते हैं और ई मेल के माध्यम से दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया जाता है, पक्ष वास्तव में व्यावहारिक रूप से इस पर हस्ताक्षर करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, जिससे ऑनलाइन दस्तावेज़ के प्रवर्तक (ओरिजिनेटर) की पहचान करना और दस्तावेज का प्रमाणीकरण मुश्किल हो जाता है। इस सीमा को ‘ई हस्ताक्षर’ का उपयोग करके दूर किया जा सकता है, जिन्हें कानूनी मान्यता दी गई है और आई.टी. अधिनियम के माध्यम से विनियमित किया जाता है।

ई संविदा के प्रमाणीकरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के मान्यता प्राप्त रूप

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को आई.टी. अधिनियम के तहत शासित किया जाता हैं। इस अधिनियम के तहत अनिवार्य रूप से, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों और अभिलेखों (रिकार्ड्स) को सत्यापित (वेरिफाई) और प्रमाणित करने के लिए दो प्रकार के ई-हस्ताक्षर को मान्यता दी गई है, जो इस प्रकार हैं:

  • डिजिटल हस्ताक्षर जो सममित (सिमेट्रिक) क्रिप्टोसिस्टम और हैश फ़ंक्शन के अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) के माध्यम से काम करते हैं।
  • दूसरा प्रकार, आई.टी. अधिनियम की दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट किए गए इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर या इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणीकरण की विधियां मेथड्स है।

क्या ई हस्ताक्षर कानूनी रूप से स्वीकार्य होते हैं?

ऊपर चर्चा किए गए सभी विषयों में हमने देखा कि कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से इलेक्ट्रॉनिक तरीको के माध्यम से संविदा में प्रवेश कर सकता है। निम्नलिखित प्रश्न इस बात से संबंधित है कि एक इलेक्ट्रॉनिक संविदा को कैसे मान्य किया जा सकता है। पक्ष अपने स्वयं के द्वारा किया गए हस्ताक्षरों के साथ, संविदा पर हस्ताक्षर करके कागजी संविदा को मान्य बना देते हैं। इसी तरह, आई.टी. अधिनियम की धारा 3 और 3A के अनुसार, दोनों पक्ष संविदा में अपने इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर लगाकर इलेक्ट्रॉनिक संविदा को मान्य बना सकते हैं। केंद्र सरकार ने आई.टी. अधिनियम की धारा 3A के तहत परिभाषित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों को स्वीकार कर लिया है, और उन्हें आई.टी. अधिनियम की अनुसूची II में शामिल किया गया है। वर्तमान में, केंद्र सरकार के द्वारा, दो प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों को मंजूरी दी गई है, जो इस प्रकार है:

1. ई प्रमाणीकरण के लिए आधार या अन्य ई के.वाई.सी. सेवाओं का उपयोग करना

एक उपयोगकर्ता जिसके मोबाइल नंबर से आधार आई.डी. जुड़ी हुई होती है, वह ऑनलाइन ई-हस्ताक्षर सेवा का उपयोग करके सुरक्षित रूप से ऑनलाइन डिजिटल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर सकता है। इस उदाहरण में, एक एप्लिकेशन सेवा प्रदाता (एप्लीकेशन सर्विस प्रोवाइडर) (ए.एस.पी.) उपयोगकर्ताओं को एक मोबाइल या वेब ऐप इंटरफ़ेस देने के लिए ऑनलाइन ई-हस्ताक्षर सेवा के साथ मिश्रित (अमलगमेट) हो जाता है, जिसके साथ उपयोगकर्ता जुड़ सकते हैं। इसके बाद, उपयोगकर्ता तब किसी भी डिजिटल दस्तावेज़ में ऑनलाइन ई हस्ताक्षर करने के लिए ऐप इंटरफ़ेस का उपयोग कर सकते हैं। एक बार जब उपयोगकर्ता ई हस्ताक्षर सेवा प्रदाता, जैसे कि ओ.टी.पी. (वन-टाइम पासकोड), द्वारा प्रदान की गई ई के.वाई.सी. सेवा का उपयोग करके अपना नाम मान्य कर देता है, तो ई हस्ताक्षर को किसी भी डिजिटल दस्तावेज़ से जोड़ा जा सकता है। ऑनलाइन ई हस्ताक्षर सेवा, सरकार के अनुरूप (कंप्लाएंट) प्रमाण पत्र और प्रमाणीकरण सेवाएं देने के लिए, अधिकृत सेवा प्रदाता के साथ सहयोग करती है।

2. केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित (अप्रूव्ड) प्रमाणन प्राधिकरण (सर्टिफाइंग अथॉरिटी) द्वारा जारी डिजिटल हस्ताक्षर के लिए प्रमाण पत्र पर आधारित ई प्रमाणीकरण तकनीक

इस स्थिति में, कोई व्यक्ति किसी डिजिटल दस्तावेज़ को प्रमाणित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रमाणित, प्रमाणन प्राधिकरण से प्राप्त डिजिटल हस्ताक्षर के लिए प्रमाण पत्र का उपयोग कर सकता है। डिजिटल हस्ताक्षर का प्रमाण पत्र एक व्यक्तिगत पहचान संख्या (पर्सनल आइडेंटिफिकेशन नंबर) (पिन) के साथ यू.एस.बी. टोकन में शामिल होता है। पिन का उपयोग करके डिजिटल दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने के लिए यू.एस.बी. टोकन को कंप्यूटर में प्लग करना होता है।

एक इलेक्ट्रॉनिक संविदा के साथ लगा हुआ एक इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, एक कागजी संविदा से जुड़े हस्तलिखित हस्ताक्षर के बराबर होता है और इसकी वैधता उसी के समान होती है।

आई.टी. अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, यदि किसी भी कानून के तहत यह बोला जाता है कि कोई भी जानकारी या किसी अन्य मामले को किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर लगाकर मान्य किया जाए, या किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए या उस पर किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर होने चाहिए, तो ऐसी आवश्यकता को पूरा किया गया तब माना जाएगा, जब ऐसी जानकारी या मामले को इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के माध्यम से प्रमाणित किया जाता है, और उस तरीके से जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा बताया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के तरीके या तकनीके

जैसा की ऊपर भी बताया गया है, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को आई.टी. अधिनियम की दूसरी अनुसूची के तहत विनियमित किया गया है और इसमें इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणीकरण तकनीक या प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। ये तकनीके इस प्रकार हैं:

  1. बायोमेट्रिक और वन-टाइम-पासवर्ड (ओ.टी.पी.) आधारित आधार ई के.वाई.सी. (अपने ग्राहक को जानें (नो योर कस्टमर)) की तकनीक-

इसका एक उदाहरण आधार ई हस्ताक्षर (ई-साइन) के रूप में भी जाना जाता है। यहां एक व्यक्ति जिसकी आधार आई.डी. उसके मोबाइल नंबर से जुड़ी होती है, वह ऑनलाइन डिजिटल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए एक ऑनलाइन ई-हस्ताक्षर का उपयोग कर सकता है। यह एक एप्लिकेशन सेवा प्रदाता (ए.एस.पी.) के साथ ऑनलाइन ई-हस्ताक्षर को एकीकृत (इंटीग्रेट) करके उपयोगकर्ताओं को ई के.वाई.सी. या ओ.टी.पी. के माध्यम से उनकी पहचान को प्रमाणित करके, डिजिटल दस्तावेजों पर ई-हस्ताक्षर करने के लिए एक मोबाइल या वेब एप्लिकेशन इंटरफेस प्रदान करने के लिए किया जाता है।

2. अन्य ई के.वाई.सी. सेवाएं जैसे ऑफलाइन आधार ई के.वाई.सी., संगठनात्मक (आर्गेनाइजेशन) ई के.वाई.सी. या बैंकिंग ई के.वाई.सी. की तकनीक-

आप पहचान के सत्यापन के विभिन्न रूपों के बारे में विवरण के लिए प्रमाणन प्राधिकरण के नियंत्रक (सी.सी.ए.) द्वारा जारी किए गए पहचान सत्यापन दिशानिर्देश पा सकते हैं, जो डिजिटल हस्ताक्षर के प्रमाण पत्र बनाने के लिए उपयोगकर्ता पहचान के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म होते हैं; तथा

3. ई प्रमाणीकरण तकनीक और विश्वसनीय तृतीय पक्षों द्वारा सुगम (फैसिलिटेट) ग्राहक की हस्ताक्षर कुंजी बनाने और उस तक पहुंचने की प्रक्रिया-

आवेदक (एप्लीकेंट) की पहचान और पते के सत्यापन के सफल होने के बाद डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र (डी.एस.सी.) जारी करने के लिए इन तरीकों या तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यह आई.टी. अधिनियम के तहत लाइसेंस प्राप्त एक विश्वसनीय स्वतंत्र तृतीय पक्ष (प्रमाणन प्राधिकारी) द्वारा हस्ताक्षरित होता है। एक प्रमाणित प्राधिकारी (सी.ए.) एक इकाई है जिसे सी.सी.ए. द्वारा लाइसेंस प्राप्त है और वह इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करती है। सी.सी.ए., सी.ए. को लाइसेंस प्रदान करने और विनियमित (रेग्यूलेट) करने के लिए आई.टी. अधिनियम के तहत नियुक्त प्राधिकरण है। सी.ए. की वर्तमान सूची यहां उपलब्ध है।

आमतौर पर, एक डी.एस.सी. एक व्यक्तिगत पिन के साथ एक यूनिवर्सल सीरियल बस (यू.एस.बी.) टोकन में समाहित (कंटेन) होता है, जिसका उपयोग यू.एस.बी. को कंप्यूटर में प्लग करके किया जाता है और उस पिन का उपयोग करके डिजिटल दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करके किया जा सकता है। एक डी.एस.सी. में तीन तत्व होते हैं जो इस प्रकार हैं:

  1. धारक (होल्डर) का नाम और एक्सटेंशन सहित उसकी राष्ट्रीयता (नेशनलिटी), ई मेल एड्रेस, धारक के कार्यस्थल (वर्कप्लेक) का विवरण, धारक की तस्वीर, उसकी उंगलियों के निशान का एक लेआउट, पासपोर्ट नंबर आदि।
  2. धारक की सार्वजनिक कुंजी (पब्लिक की) की जानकारी।
  3. प्रमाणीकरण प्राधिकारी। 

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की वैधता और प्रवर्तनीयता

आई.टी. अधिनियम की धारा 5 के तहत, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों को मान्यता दी जाती है और हस्ताक्षर की किसी भी आवश्यकता पर विचार किया जाता है और उसे संतुष्ट माना जाता है, यदि दस्तावेज़ को अधिनियम के तहत निर्धारित तरीके से इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के माध्यम से प्रमाणित किया जाता है। भारतीय कानून के तहत हस्तलिखित हस्ताक्षर के समान स्थिति वाले इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल हस्ताक्षरों और अन्य स्वीकृत वैध इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों की प्रवर्तनीयता के बीच कोई अंतर नहीं होता है। एक वैध इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (जैसा कि आई.टी. अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त है) का उपयोग करके हस्ताक्षरित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए वैधता का अनुमान होता है, जिसे किसी कागज़ पर किए हस्ताक्षर के बराबर माना जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के वैध होने के लिए, दो मानदंड होते हैं:

  • यह विश्वसनीय होना चाहिए।
  • इसे दूसरी अनुसूची के तहत मान्यता दी जानी चाहिए।

एक इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को विश्वसनीय तब ही माना जाता है जब वे इन शर्तों को पूरा करते हैं:

  1. यह धारक या हस्ताक्षरकर्ता के लिए अद्वितीय (यूनिक) होना चाहिए।
  2. हस्ताक्षरकर्ता के पास हस्ताक्षर के समय, हस्ताक्षर उत्पन्न करने के लिए उपयोग किए गए डेटा पर नियंत्रण होना चाहिए।
  3. किसी भी दस्तावेज़ होल्डिंग में कोई भी परिवर्तन पता लगाने योग्य होना चाहिए।
  4. हस्ताक्षर प्रक्रिया के दौरान उठाए गए कदमों का ऑडिट ट्रेल होना चाहिए।
  5. डी.सी.ए. को सी.सी.ए. द्वारा मान्यता प्राप्त होनी चाहिए, जिसे सी.ए. द्वारा जारी किया जाना चाहिए।

हालांकि, कोई भी इलेक्ट्रॉनिक संविदा जो क्लिक रैप के माध्यम से बनाएं जाते हैं, जो सी.ए. द्वारा जारी न किए गए प्रमाण पत्र है, उन्हें आई.टी. अधिनियम के तहत कोई मान्यता नहीं दी जाती है। हालांकि वे अधिनियम की धारा 10A के आधार पर अमान्य नहीं हो सकते हैं, वे वैधता का अनुमान नहीं रखते हैं और इसलिए उनमें विवाद हो सकते हैं। उन मामलों में, हस्ताक्षरकर्ता को निम्नलिखित साबित करना होता है:

  • उत्पन्न हस्ताक्षर अद्वितीय होता है और इसे केवल हस्ताक्षरकर्ता से ही जोड़ा जा सकता है;
  • हस्ताक्षर के समय केवल हस्ताक्षरकर्ता ही उस दस्तावेज़ को देख सकता था और उस पर उसका नियंत्रण था;
  • हस्ताक्षर में कोई परिवर्तन या हस्ताक्षर के बाद की गई जानकारी का पता लगाया जा सकता है; तथा
  • यह भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत एक वैध संविदा की अनिवार्यताओं का पालन करता है, जैसे कि प्रस्ताव, स्वीकृति और कानूनी संबंध बनाने का इरादा, पक्षों की क्षमता, प्रतिफल आदि।

संविदा या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की विषय-वस्तु (सब्जेक्ट मैटर) के संबंध में पक्षों का कोई अन्य आचरण भी इस संदर्भ में जरूरी हो सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की स्वीकार्यता (एडमिसिबिलीटी)

इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस एक्ट), 1872 के तहत इलेक्ट्रॉनिक समझौतों के हस्ताक्षर और अनुमान के प्रमाण के रूप में भी काम करते हैं। इसमें कहा गया है कि ई संविदा का एक कागजी समझौते के समान कानूनी प्रभाव है और यह धारा 3 में साक्ष्य की परिभाषा के तहत शामिल हैं। यह इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में मान्यता देता है। धारा 65B के अनुसार, यह एक इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ में निहित किसी भी जानकारी को कार्यवाही में स्वीकार्य बनाता है, जिसे उस साक्ष्य के किसी भी मूल दस्तावेज और सबूत के बिना सस्वीकर किया जा सकता है, यदि इसके साथ एक प्रमाण पत्र है, जो बताता है कि:

  • रिकॉर्ड बनाने वाले कंप्यूटर का नियमित रूप से उपयोग, उस व्यक्ति द्वारा किया जाता है, जिसका रिकॉर्ड बनाने के समय उस पर वैध नियंत्रण था।
  • उक्त कंप्यूटर ने सामान्य गतिविधियों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की जानकारी प्राप्त या संग्रहीत (स्टोर) की थी।
  • आउटपुट कंप्यूटर उचित संचालन की स्थिति में था, या, यदि इसमें परिचालन (ऑपरेशनल) से संबंधित कठिनाइयाँ थीं, तो यह दर्ज किए गए डेटा की सटीकता को प्रभावित नहीं करता था, और;
  • इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में निहित जानकारी सामान्य गतिविधियों के दौरान कंप्यूटर में दर्ज की गई जानकारी को फिर से पेश करती है।

क्या अदालत में सबूत के तौर पर ई संविदा और ई-हस्ताक्षर का इस्तेमाल किया जा सकता है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65A और 65B की व्याख्या करते हुए अदालत ने अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुषाणराव गोरंट्याल और अन्य (2020) के मामले में एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का निष्पादन पूरी तरह से कैसे किया जाता है, पर चर्चा की थी। फैसले के पैरा 72 के अनुसार, एक लैपटॉप कंप्यूटर, कंप्यूटर टैबलेट, या यहां तक ​​कि एक मोबाइल फोन के मालिक द्वारा एक मूल इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ को अदालत में साबित किया जा सकता है, जहां इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ संभाल कर रखा गया है, अगर वे उपर्युक्त साबित करने में सक्षम हैं या तो कटघरे (विटनेस बॉक्स) में प्रवेश करके या धारा 65B(4) के तहत प्रमाण पत्र के साथ धारा 65B के अनुसार ऐसे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ का प्रिंटआउट प्रदान करके यह दर्शाता है कि संबंधित डिवाइस, जिस पर मूल डेटा पहले सहेजा गया है, स्वामित्व में है और / या उसके द्वारा नियंत्रित है।

  • ऐसे मामलों में जहां पूर्वगामी (फोरगोइंग) संभव नहीं है, ऐसे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ का एक प्रिंटआउट प्राप्त किया जा सकता है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 B (4) के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र के साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 B (1) के अनुसार प्रदर्शित किया जा सकता है, जैसा कि अनवर पीवी बनाम पीके बशीर और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की एक और तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा स्थापित किया गया था।
  • साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 B(4) के तहत प्रमाण पत्र, उपरोक्त निर्णय के अनुसार, उस लिखत के संचालन के संबंध में एक सक्षम आधिकारिक पद रखने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ रखा गया है, और इसे निम्नलिखित मानदंडो को पूरा करना होता है:
  1. इसे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ को पहचानना चाहिए;
  2. इसे उस प्रक्रिया की व्याख्या करनी चाहिए जिसके माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ बनाया गया था;
  3. उसे उस दस्तावेज़ के निर्माण में प्रयुक्त लिखत के बारे में जानकारी प्रदान करनी चाहिए; तथा
  4. प्रमाण पत्र को साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B(2) में निर्दिष्ट मानदंडों को पूरा करना चाहिए।

धारा 47A के तहत न्यायालय, प्रमाणन प्राधिकारी की राय को संदर्भित कर सकता है, जिसने राय बनाने के लिए एक प्रासंगिक तथ्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी किया है। इसके अलावा, धारा 85A और 85B के तहत, जब तक इसके विपरीत न साबित हो, तब तक इसे अनुमान का लाभ मिलता है। न्यायालय का मानना ​​है कि:

  • इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित होने का दर्जा मिलने के बाद से उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है।
  • यह कि ग्राहक का इरादा सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर लगाने पर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर या अनुमोदन करने का था।

इस प्रकार, मान्यता प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर तब तक वैध माने जाते हैं जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।

उस संविदा की वैधता जिसे वैधानिक रूप से अधिकृत (ऑथराइज्ड) इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों का उपयोग करके प्रमाणित नहीं किया गया हो

  • जैसा की उपर चर्चा की गई है, आधार ई के.वाई.सी. दृष्टिकोण (एप्रोच), जैसे कि अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले कानूनी दस्तावेज़, के अलावा अन्य तरीकों के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर लगाकर निष्पादित किए गए संविदा को लागू करना और उसकी वैधता पर सवाल उठाया जा सकता है।
  • वहां जरूरी प्रश्न यह है कि क्या एक संविदा जिसे दोनों पक्षों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्ताक्षरित किया गया है (आधार ई-के.वाई.सी. दृष्टिकोण के अलावा अन्य तरीकों का उपयोग करके) और पक्षों के बीच ई मेल के माध्यम से संचार (कम्युनिकेशन) किया गया है, यह सिर्फ इसलिए अमान्य है क्योंकि इसमें वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर नहीं है।
  • ट्राइमेक्स मामले में इसके प्रावधानों की प्रवर्तनीयता के लिए एक संविदा के औपचारिक (फॉर्मल) निष्पादन की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नानुसार राय दी थी:

तथ्य यह है कि एक संविदा को मौखिक रूप से या लिखित रूप में पूरा करने के बाद पक्षों द्वारा एक औपचारिक संविदा का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार किया जाना चाहिए और उस पर हस्ताक्षर किए गए संविदा की स्वीकृति या प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ता है, भले ही औपचारिक संविदा पर कभी भी हस्ताक्षर नहीं किया गया हो।

  • नतीजतन, यह तर्क दिया जा सकता है कि पक्षों के बीच ई मेल के माध्यम से एक संविदा किया गया है और इसके प्रावधानों के बारे में पक्षों के बीच कोई असहमति नहीं थी, और यह ही दोनों पक्षों की संविदा की स्वीकृति का प्रतीक है और इसलिए उक्त संविदा दोनों पक्षों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी हो जाता है। जब तक पक्षों ने कानूनी रूप से बाध्य होने के लिए एक शर्त के रूप में संविदा के औपचारिक निष्पादन को स्थापित नहीं किया था, तब तक यह निष्कर्ष मान्य होगा चाहे संविदा की एक्सचेंज की गई इलेक्ट्रॉनिक कॉपी में वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर हो या इसमें कोई हस्ताक्षर न हो। इस सिद्धांत को इसी तरह आई.टी. अधिनियम की धारा 10A में शामिल किया गया है, जो इलेक्ट्रॉनिक प्रस्तावों, स्वीकृति और संविदा निर्माण के लिए विधायी भार प्रदान करती है।

प्रामाणिकता अनुमान: डिजिटल हस्ताक्षर की तुलना में इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर

डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से मान्य दस्तावेज़ और आई.टी. अधिनियम की दूसरी अनुसूची के तहत निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के माध्यम से मान्य दस्तावेज़ के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि डिजिटल हस्ताक्षर को सत्यता और स्वीकार्यता के अनुमान का लाभ मिलता है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को उसकी सच्चाई के लिए स्पष्ट रूप से सिद्ध होना होता है। 

डिजिटल हस्ताक्षर

एक डिजिटल हस्ताक्षर, भौतिक दुनिया के हस्तलिखित हस्ताक्षर का एक इलेक्ट्रॉनिक रूप है। ये कागजी दस्तावेजों के बजाय इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों पर लगाए जाते हैं। एक लिखित हस्ताक्षर के समान, इसमें अखंडता (इंटीग्रिटी) और अस्वीकृति की कमी का दोहरा कार्य होता है। यह हस्ताक्षर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अद्वितीय होते हैं और केवल उनके धारक के पास ही होते हैं और इसलिए उन्हें बाद में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह अखंडता को बनाए रखने में भी मदद करता है क्योंकि एन्क्रिप्शन तकनीक के कारण दस्तावेज़ के साथ कोई भी छेड़ छाड़ पकड़ी जाती है। यह एक असममित (एसिमेट्रीक) क्रिप्टोसिस्टम और हैश फ़ंक्शन का उपयोग करता है।

एक संदेश जिस पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होती है उसे हैश फ़ंक्शन का उपयोग करके एक हैश परिणाम के रूप में जाना जाने वाला आउटपुट बनाने के लिए चित्रित और संसाधित (प्रोसेस्ड) किया जाता है। हैश परिणाम मूल संदेश से छोटा होता है और इसके लिए अद्वितीय होता है, जो मूल संदेश में परिर्वतन करने पर ही बदलता है। हैश परिणाम तब प्रेषक (सेंटर) की एक निजी कुंजी के माध्यम से एन्क्रिप्ट (रूपांतरित (ट्रांसफॉर्म)) किया जाता है। यह एन्क्रिप्टेड हैश का परिणाम, एक डिजिटल हस्ताक्षर होता है। इस हस्ताक्षर को तब लगा दिया जाता है और संदेश के साथ भेजा जाता है और इसे केवल इच्छित रिसीवर द्वारा डिक्रिप्ट (मूल संदेश में परिवर्तित) किया जा सकता है, जिसके पास प्रेषक द्वारा प्रदान की गई सार्वजनिक कुंजी होती है।

दस्तावेज़ जिन पर डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर अमान्य हैं

केंद्र सरकार ने यह भी प्रावधान किया है कि किस श्रेणी के दस्तावेजों के ऊपर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर का उपयोग नहीं किया जा सकता है। इसमें निम्नलिखित शामिल किया गया है:

  1. आधिकारिक राजपत्र (ऑफिशियल गैजेट) में प्रकाशित अधिसूचना (नोटिफिकेशन) के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा बताए गए दस्तावेजों का कोई भी वर्ग (क्लास)।
  2. किसी भी अचल संपत्ति को बेचने के लिए, ब्याज या संवहन (कन्वेयंस) करने के लिए कोई संविदा।
  3. पावर ऑफ अटॉर्नी एक्ट, 1882 की धारा 1A के तहत पावर ऑफ अटॉर्नी।
  4. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (इंडियन सक्सेशन एक्ट), 1925 की धारा 2(h) के अनुसार वसीयत और/या वसीयतनामा (टेस्टामेंट)।
  5. परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 13 के अनुसार एक परक्राम्य लिखत (चेक को छोड़कर)।
  6. भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 की धारा 3 के अनुसार एक ट्रस्ट।

निष्कर्ष

2000 में आई.टी. अधिनियम के पास होने के बाद से, भारत में सूचना प्रौद्योगिकी को नियंत्रित करने वाले कानूनों ने एक लंबा सफर तय किया है। उपरोक्त शर्तों को देखते हुए और उनके अधीन, एक ठीक से निष्पादित इलेक्ट्रॉनिक संविदा की वैधता और प्रवर्तनीयता, बिलकुल एक भौतिक संविदा के समान ही होती है।

हालाँकि, एक ऑनलाइन संविदा के कई हिस्सों के संबंध में कठिनाइयाँ और भ्रम होते हैं, जिसमें हस्ताक्षर और मुहर लगाने की आवश्यकता भी शामिल है। डिजिटलीकरण (डिजिटलाइजेशन) के प्रति वर्तमान झुकाव के साथ, ई संविदाओं और ई हस्ताक्षरों की वैधता के बारे में किसी भी संदेह को दूर करना एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता प्रतीत होती है, और हम आशा करते हैं कि सरकार इस क्षेत्र में आवश्यक कदम उठाएगी।

तो ऊपर लेख मे प्रदान किए गए कानूनों और निर्णयों को के संयुक्त रूप से पढ़ने पर, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, इलेक्ट्रॉनिक संविदा और हस्ताक्षरों की वैधता की पर्याप्त मान्यता है। उनका उपयोग भी समय के साथ व्यापक रूप से बढ़ा है। दस्तावेज़ीकरण और निष्पादन में किसी भी धोखाधड़ी से बचने के लिए कई फिनटेक संस्थाएं इस रूप का सख्ती से उपयोग कर रही हैं और प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ, ओ.टी.पी., सत्यापन या इलेक्ट्रॉनिक लिखत के विवरण की ट्रैकिंग के लिए जियोलोकेशन का उपयोग करके ई-हस्ताक्षर को बनाए रखने के लिए, सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत जोड़ी जा सकती है। 

संदर्भ

 

 

उप एजेंट और प्रतिस्थापित एजेंट में अंतर

यह लेख Kamesh Tyagi ने लिखा है। यह लेख उप (सब) एजेंट और प्रतिस्थापित (सब्स्टिटूटेड) एजेंट में अंतर बताता है।  इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

एजेंसी सभी प्राधिकरण (अथॉरिटी) के बारे में है जो जिसके माध्यम से एजेंट प्रिंसिपल की ओर से कार्य करता है। एजेंट द्वारा अपने अधिकार के रहते किए गए सभी कार्यों के लिए प्रिंसिपल उत्तरदायी है। यह लैटिन मैक्सिम क्यूई फैसिट पर एलियम फैसिट पर से पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जो दूसरे के माध्यम से कार्य करता है वह स्वयं कार्य करता है। एजेंट को अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) की गोपनीयता के सिद्धांत के अपवाद (एक्सेप्शन) के रूप में माना जाता है क्योंकि एजेंट प्रिंसिपल की ओर से अधिकार प्राप्त कर सकता है और देनदारियों को वहन (इनकर लाइबिलिटी) कर सकता है। एजेंट प्रिंसिपल के नाम पर एक कॉन्ट्रेक्ट बनाने के लिए अधिकृत है, और प्रिंसिपल उस अनुबंध के आधार पर मुकदमा कर सकता है। एजेंसी का गठन चार तरीकों से किया जा सकता है: अनुबंध के माध्यम से एक वास्तविक प्राधिकरण (ऐक्चूअल अथॉरिटी), प्रिंसिपल द्वारा अनुसमर्थन (रैटीफ़ीकेशन), आचरण द्वारा रोक (एसटोप्पेल बाई कनडक्ट), और कानून द्वारा निहित अधिकार द्वारा।

प्रिन्सिपल अपनी ओर से तीसरे पक्ष को कार्य करने के लिए एजेंट को अपनी शक्ति और अधिकार सौंपता है। क्या एजेंट आगे अपना कर्तव्य सौंप सकता है और किसी व्यक्ति को उप-एजेंट के रूप में नियुक्त कर सकता है? आमतौर पर, एजेंट को प्रिन्सिपल द्वारा उसे सौंपे गए कार्य को सौंपने की कोई शक्ति नहीं होती है। यह कानूनी कहावत डेलेगाटा पोटेस्टास नॉन पोटेस्ट डेलेगरी पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि एक प्रतिनिधि आगे प्रतिनिधि नहीं बना सकता है। हालांकि, भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 190 दो असाधारण परिस्थितियों को प्रदान करता है जिसमें एजेंट अपने कर्तव्यों को आगे बढ़ा सकता है। वह तब कर सकता है जब:

  1. एजेंसी की प्रकृति इसकी अनुमति देती है या इसकी मांग करती है; या
  2. व्यवसाय की सामान्य प्रथाएं इसकी अनुमति देती हैं।

दो प्रकार के प्रतिनिधिमंडल (डेलगेशन) हो सकते हैं जहां प्रतिनिधिमंडल एक एजेंट से होता है; इसे सब-एजेंट कहा जाता है। जब विशेष कर्तव्य के लिए प्रतिनिधिमंडल सीधे प्रिंसिपल के माध्यम से किया जाता है, तो इसे एक प्रतिस्थापित एजेंसी के रूप में जाना जाता है। यह टुकड़ा उनके बीच के अंतर और प्रिंसिपल और मूल एजेंट दोनों द्वारा बनाए गए अधिकारों और देनदारियों पर चर्चा करेगा।

उप एजेंट

उप एजेंट को भारतीय अनुबंध अधिनियम के धारा 191 द्वारा परिभाषित किया गया है:

“एक उप-एजेंट एजेंसी के व्यवसाय में मूल एजेंट द्वारा नियोजित और उसके नियंत्रण में कार्य करने वाला व्यक्ति है।”

मूल एजेंट, उप-एजेंट को नियुक्त करता है, जो उसके नियंत्रण और अधिकार के तहत काम करता है। मूल एजेंट और उप-एजेंट के बीच का संबंध प्रिंसिपल और एजेंट का है। एजेंसी को नियंत्रित करने वाले सभी नियम उप-एजेंट और एजेंट के बीच संबंधों को स्वचालित रूप से नियंत्रित करेंगे। मूल एजेंट पर उप-एजेंट द्वारा वही अधिकार और देनदारियां बनाई जा सकती हैं जो एजेंट द्वारा प्रिंसिपल पर बनाई गई हैं।

बाल्सामो बनाम मेडिसी (1984) के मामले में, चांसरी कोर्ट (यहां देखें) ने माना कि उप-एजेंट पर लापरवाही के लिए भी प्रिंसिपल द्वारा सीधे मुकदमा नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके बीच कोई गोपनीयता नहीं है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 192 के अनुसार, उप-एजेंट पर केवल प्रिन्सिपल द्वारा सीधे धोखाधड़ी और जानबूझकर गलत के मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है। रघुनाथ प्रसाद बनाम सेवा राम टीकम दास (1980) में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (यहां देखें) ने कहा कि प्रिंसिपल किसी भी नुकसान के लिए मूल एजेंट के माध्यम से उप-एजेंट पर मुकदमा कर सकता है क्योंकि गोपनीयता के लिए मूल एजेंट और उप-एजेंट दोनों ज़िम्मेदार हैं और एजेंट एक दूसरे पर मुकदमा भी कर सकते हैं।

उप-एजेंट, जिसे उचित रूप से नियुक्त किया गया है, प्रिंसिपल के नाम पर उप-एजेंट द्वारा दर्ज किए गए किसी भी अनुबंध के लिए प्रिंसिपल को उत्तरदायी बना सकता है। अनुबंध को यह माना जाएगा की वह स्वयं प्रिन्सिपल द्वारा दर्ज किया गया है। मूल एजेंट उप-एजेंट के किसी भी कार्य के लिए प्रिंसिपल के प्रति जिम्मेदार है जिसमें लापरवाही, धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत, या कर्तव्य का कोई अन्य उल्लंघन शामिल है। नेंसुखदास शिवनारायण बनाम बर्डीचंद के मामले में, बॉम्ब उच्च न्यायालय (यहां देखें) ने माना कि प्रिंसिपल, अगर वह चाहें, तो सब-एजेंट या मूल एजेंट पर सीधे सब-एजेंट की धोखाधड़ी या जानबूझकर गलत के लिए मुकदमा कर सकते हैं।

जब जिस एजेंट के पास सब-एजेंट को नियुक्त करने का अधिकार नहीं है, वह सब-एजेंट की नियुक्ति करता है, तो एजेंट सब-एजेंट के प्रति प्रिंसिपल होगा। मूल एजेंट ऐसे व्यक्ति के कार्यों के लिए पूरी तरह से प्रिंसिपल और तीसरे पक्ष दोनों के लिए जिम्मेदार होगा। इस व्यक्ति को किसी भी तरह से प्रिंसिपल का प्रतिनिधि नहीं माना जाएगा और इस तरह वह प्रिंसिपल की ओर से अनुबंध में प्रवेश नहीं कर सकता है। ऐसे उप-एजेंट के कार्यों के लिए प्रिंसिपल को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

प्रतिस्थापित एजेंट

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 194 एक प्रतिस्थापित एजेंट को व्यवसाय के किसी विशेष भाग के लिए एजेंसी के व्यवसाय में काम करने के लिए प्रिंसिपल की जानकारी और सहमति के साथ मूल एजेंट द्वारा नामित व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है। प्रतिस्थापित एजेंट को नामित करने से पहले एक एजेंट द्वारा दो आवश्यकताओं को पूरा किया जाना है। पहला यह है कि मूल एजेंट के पास प्रिंसिपल द्वारा ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करने का निहित या व्यक्त अधिकार होता है। दूसरा यह है कि मूल एजेंट ने ऐसे व्यक्ति को एजेंसी के व्यवसाय के ऐसे हिस्से में प्रिंसिपल के लिए कार्य करने के लिए नामित किया है।

जब एजेंट ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है, तो एजेंट केवल प्रिंसिपल के प्रत्यक्ष अधिकार के दूत के रूप में कार्य करता है; यह नेंसुखदास शिवनारायण बनाम बर्डीचंद (यहां देखें) में कहा गया था।

मूल एजेंट द्वारा ऐसे व्यक्ति को नामित करना प्रिन्सिपल के मूल एजेंट द्वारा कर्तव्यों के प्रत्यायोजन (डेलगेशन) नहीं होता है। इसके बजाय, यह प्रमुख और नामित व्यक्ति के बीच सीधा संबंध स्थापित करता है। यहां, मूल एजेंट और मूल एजेंट द्वारा नामित व्यक्ति के बीच गोपनीयता स्थापित की जाती है। इस प्रकार, नामित व्यक्ति को मूल एजेंट के एजेंट के रूप में नहीं बल्कि प्रिंसिपल के एजेंट के रूप में माना जाएगा (सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम फर्म रुरचंद कुर्रामल और डी बुस्चे बनाम ऑल्ट)। यह गोपनीयता प्रतिस्थापित एजेंट और प्रिन्सिपल के बीच एक सीधा संबंध बनाती है, और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए, प्रतिस्थापित एजेंट सीधे प्रिंसिपल के प्रति जिम्मेदार होता है।

ऐसे प्रतिस्थापित एजेंट नियुक्त करने का अधिकार निहित है जब व्यवसाय की प्रकृति या व्यापार प्रथाओं के उपयोग के माध्यम से इसे उचित रूप से माना जा सकता है। जब प्रिंसिपल द्वारा प्रतिस्थापित एजेंट को स्वीकार कर लिया जाता है और उनके बीच गोपनीयता स्थापित हो जाती है, तो मूल एजेंट का संबंध स्थानापन्न और प्रिंसिपल के बीच व्यापार लेनदेन से नहीं होता है (देखें पुरुषोत्तम हरिदास बनाम अमृत घी कंपनी लिमिटेड और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम. फर्म रुरचंद कुर्रामल देखें)। वह प्रतिस्थापित एजेंट की दक्षता, चरित्र, या लापरवाही से चिंतित नहीं है (गंभीरमुल महाबीरप्रसाद बनाम इंडियन बैंक लिमिटेड देखें)। एक बार प्रिंसिपल और प्रतिस्थापित एजेंट के बीच संबंध स्थापित हो जाने के बाद, मूल एजेंट को प्रतिस्थापित एजेंट के आचरण के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है (देखें चौधरी टीसी बनाम गिरिंद्र मोहन नियोगी, 1930 कलकत्ता एचसी)।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 195 ऐसे व्यक्ति को नामित करने में एजेंट के कर्तव्य के बारे में बात करती है। यह धारा एजेंट पर एक व्यक्ति को प्रतिस्थापित एजेंट के रूप में चुनने के लिए इस तरह के विवेक का प्रयोग करके एक समान मामले में एक सामान्य तर्कसंगत व्यक्ति का प्रयोग करने का कर्तव्य लगाती है। यदि वह इस तरह की समझदारी का प्रयोग करता है, तो मूल एजेंट लापरवाही या प्रतिस्थापित एजेंट के किसी अन्य कार्य के लिए प्रिंसिपल के प्रति जिम्मेदार नहीं है।

पंजाब नेशनल बैंक बनाम फर्म ईश्वरभाई भाई लालभाई पटेल एंड कंपनी (यहां देखें) में, मूल एजेंट पर केवल नामांकित व्यक्ति की विफलता के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जब यह दिखाया जा सकता है कि मूल एजेंट नामित व्यक्ति का चयन करने में लापरवाही कर रहा था। मान लीजिए यह पाया जाता है कि मूल एजेंट ने ऐसे व्यक्ति को चुनने में लापरवाही की थी। उस मामले में, मूल एजेंट प्रिंसिपल को हर्जाना देने के लिए उत्तरदायी होगा क्योंकि इसे एजेंट के प्राथमिक कर्तव्य के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है। रामचंद्र लालभाई बनाम चिनूभाई लालभाई में, बॉम्बे एचसी (यहां देखें) ने माना कि मूल एजेंट के पास अपने प्रिंसिपल के हित में प्रतिस्थापित एजेंट के अधिकार को रद्द करने का निहित अधिकार है, या अन्यथा वह चयन में अपनी लापरवाही से बंधेगा

उप और प्रतिस्थापित एजेंट के बीच अंतर

उप-एजेंट और प्रतिस्थापित एजेंट के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप पर नियंत्रण और निर्देश, जिम्मेदारी, अनुबंध की गोपनीयता, नियुक्ति, दायित्व, एजेंटों को पारिश्रमिक और तीसरे पक्ष के प्रति जिम्मेदारी में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. नियंत्रण और निर्देश– उप-एजेंट को दिए गए सभी निर्देश और नियंत्रण मूल एजेंट द्वारा होते हैं क्योंकि वह मूल एजेंट का एजेंट होता है। इसके विपरीत, प्रतिस्थापित एजेंट पर सभी नियंत्रण अभ्यास सीधे प्रिंसिपल के माध्यम से होता है। प्रधान उप-एजेंट पर सीधे नियंत्रण नहीं कर सकता है, लेकिन वह मूल एजेंट के माध्यम से इसका प्रयोग कर सकता है। 
  2. उत्तरदायित्व– एक उप-एजेंट अपने सभी कार्यों के लिए मूल एजेंट के आगे ज़िम्मेदार है, जबकि प्रतिस्थापित एजेंट अपने कार्यों के लिए सीधे प्रिन्सिपल के आगे जिम्मेदार है। केवल धोखाधड़ी और जानबूझकर गलत करने के लिए, प्रतिस्थापित एजेंट सीधे प्रिंसिपल के लिए जिम्मेदार होता है। उप-एजेंट अन्य सभी कार्यों के लिए मूल एजेंट के माध्यम से प्रिंसिपल के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। 
  3. अनुबंध की गोपनीयता– उप-एजेंट और प्रिंसिपल के बीच अनुबंध की कोई गोपनीयता नहीं है। उप-एजेंट की गोपनीयता मूल एजेंट के पास है। दूसरी ओर, प्रिन्सिपल और प्रतिस्थापित एजेंट के बीच गोपनीयता है। प्रतिस्थापित एजेंट पर सीधे मुकदमा चलाया जा सकता है और वह प्रिंसिपल पर भी मुकदमा कर सकता है। धोखाधड़ी और जानबूझकर गलत करने के मामलों को छोड़कर प्रिंसिपल सीधे मुकदमा नहीं कर सकता या उप-एजेंट द्वारा मुकदमा नहीं किया जा सकता है।
  4. नियुक्ति – एक उप-एजेंट केवल मूल एजेंट द्वारा नियुक्त किया जा सकता है जब एजेंसी द्वारा निपटाए जाने वाले व्यवसाय की प्रकृति की मांग होती है या जहां उप-एजेंट की नियुक्ति के लिए व्यापार व्यवसाय में प्रथागत प्रथा है। एक प्रतिस्थापित एजेंट की नियुक्ति तब की जाती है जब मूल एजेंट के पास ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए प्रिन्सिपल से स्पष्ट या निहित अधिकार होता है। एक प्रतिस्थापित एजेंट को आमतौर पर व्यवसाय के किसी विशेष भाग को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जाता है जब उसे कुछ विशेष कौशल की आवश्यकता होती है या जो स्वयं एजेंट द्वारा नहीं किया जा सकता है। 
  5. दायित्व– उप-एजेंट उसके द्वारा किए गए किसी भी कार्य के लिए मूल एजेंट के प्रति उत्तरदायी होता है। उप-एजेंट किसी भी आचरण, कर्तव्य के उल्लंघन, धोखाधड़ी, या मूल एजेंट को सीधे जानबूझकर गलत करने के लिए उत्तरदायी है। उप-एजेंट धोखाधड़ी या जानबूझकर गलत करने के लिए प्रिंसिपल और मूल एजेंट दोनों के लिए उत्तरदायी है। दूसरी ओर, प्रतिस्थापित एजेंट उसके द्वारा किए गए किसी भी कार्य या उल्लंघन के लिए केवल प्रिन्सिपल के प्रति उत्तरदायी होता है। प्रिंसिपल मूल एजेंट को प्रतिस्थापित एजेंट द्वारा किए गए किसी भी कार्य के लिए उत्तरदायी ठहरा सकता है, यदि मूल एजेंट ने लापरवाही से ऐसे व्यक्ति को चुना है।
  6. एजेंटों को पारिश्रमिक– मूल एजेंट अपनी जेब या शेयर के माध्यम से उप-एजेंट को कमीशन या पारिश्रमिक का भुगतान करता है। प्रिंसिपल प्रतिस्थापित एजेंट को भुगतान करता है।
  7. तीसरे पक्ष के प्रति जिम्मेदारी– प्रिंसिपल की ओर से उचित रूप से नियुक्त उप-एजेंट द्वारा किए गए अनुबंध का वही प्रभाव होगा जो उसके एजेंट या प्रिंसिपल द्वारा स्वयं दर्ज किए गए अनुबंध का होगा। इस तरह के अनुबंध के लिए प्रिंसिपल तीसरे पक्ष के लिए बाध्य होगा। लेकिन जब उप-एजेंट को ठीक से नियुक्त नहीं किया जाता है, तो उप-एजेंट के अनुबंध का मूलधन के साथ-साथ तीसरे पक्ष पर कोई दायित्व नहीं होगा। इस तरह के अनुबंध के लिए, मूल एजेंट प्रिंसिपल और तीसरे पक्ष दोनों के लिए उत्तरदायी होगा। प्रतिस्थापित एजेंट द्वारा अपने अधिकार के भीतर किया गया कोई भी कार्य प्रिंसिपल को तीसरे पक्ष के साथ बाध्य करेगा।

निष्कर्ष

उप और प्रतिस्थापित एजेंट के बीच अंतर करना बहुत मुश्किल काम है। यह केवल कुछ तथ्यों को जोड़कर या हटाकर प्रतिस्थापित एजेंट से उप-एजेंट या इसके विपरीत में बदल सकता है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कि क्या कोई प्राधिकरण प्रतिस्थापित एजेन्सी है या उप-एजेंसी, यह तथ्य का प्रश्न होना चाहिए। इस प्रश्न का उत्तर विशिष्ट मामले के तथ्यों के विश्लेषण के माध्यम से ही दिया जा सकता है।

उप और प्रतिस्थापित एजेंसी के बारे में संदेह को दूर करने के लिए कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं। प्राधिकरण को कौन नियंत्रित कर रहा है? कौन किसके लिए जिम्मेदार है? किसके साथ गोपनीय है? उप या प्रतिस्थापित एजेंट की नियुक्ति का उद्देश्य क्या है? कौन किसके प्रति उत्तरदायी है? भुगतान कौन किसको देता है? उप एजेंट द्वारा बनाई गई जिम्मेदारी क्या है या तीसरे पक्ष के मुकाबले प्रिंसिपल को प्रतिस्थापित किया गया है? इन सभी सवालों के जवाब मिलने के बाद व्यक्ति आसानी से यह पता लगा सकता है कि उप-एजेंट कौन है और प्रतिस्थापित एजेंट कौन है।

ग्रंथ सूची (बिब्लियोग्राफ़ी)

मामले

    1. बी. महिंदर दास बनाम पी. मोहन लाल, एआईआर 1939 ऑल 187।
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  • सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम फर्म रुरचंद कुर्रमल, (1958) पुन 1115। 
  • चौधरी टीसी बनाम गिरिंद्र मोहन नियोगी, (1929) ) 56 काल 686: एआईआर 1930 काल 10.
  • डी बुस्चे बनाम ऑल्ट, (1878) 8 सीएचडी 286। 
  • गंभीरमुल महाबीरप्रसाद बनाम इंडियन बैंक लिमिटेड, एआईआर 1963 काल 163।
  • मेयरस्टीन बनाम पूर्वी एजेंसी कंपनी, (1885) 1 टीएलआर 595। 
  • नेनसुखदास शिवनारायण वी बर्डीचंद, एआईआर 1917 बॉम 19। 
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  • पुरुषोत्तम हरिदास बनाम अमृत घी कंपनी लिमिटेड, एआईआर 1961 एपी 143। 
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बुक्स

  1. पोलॉक एंड मुल्ला द इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872, (15वां संस्करण, लेक्सिस नेक्सिस, 2020) .
  2. एंसन का अनुबंध का कानून, (29वां संस्करण, ऑक्सफोर्ड, 2010)।

विधियां (स्टेट्यूट)

  1. भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872

 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत मध्यवर्ती लाभ

यह लेख कोलकाता के एमिटी लॉ स्कूल की Oishika Banerji ने लिखा है। यह लेख सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत मध्यवर्ती लाभ (मेस्ने प्रॉफ़िट्स) की अवधारणा से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

परिचय

अंतर्निहित (अंडरलाइंग) सिद्धांत जिस पर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 कार्य करती है, वह है ‘यूबी जस ईबी रेमेडियम’ जो यह दर्शाता है कि जहां एक अधिकार है, वहां एक उपाय है। मध्यवर्ती लाभ की अवधारणा इस सिद्धांत से विकसित की गई है क्योंकि यह प्रकृति का कानून है कि जहां कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, वहां मुआवजे का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए। मध्यवर्ती लाभ की अवधारणा में जाने से पहले, “स्वामित्व (ओनरशिप)” और “कब्जे (पजेशन)” शब्दों के अर्थ पर चर्चा करना आवश्यक है। जबकि पूर्व व्यक्ति के स्वामित्व वाली संपत्ति को रखने, आनंद लेने, संचारित करने, नष्ट करने का एक विशेष सामूहिक अधिकार है, बाद वाला पूर्व का एक प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) सबूत है। संपत्ति रखने का अधिकार कानून की नजर में तब तक सुरक्षित है, जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उस संपत्ति पर बेहतर शीर्षक का दावा नहीं करता है। जब यह दावा उठता है, तो कानून संपत्ति के मूल मालिक की रक्षा के लिए एक ढाल के रूप में कार्य करता है, जिससे अवैध या गैरकानूनी मालिक से मुआवजा मिलना सुनिश्चित होता है। मध्यवर्ती लाभ इस तरह के मुआवजे का एक तरीका है, जो पीड़ित पक्ष को इस तरह की संपत्ति से प्राप्त मुनाफे का आनंद लेने से गलत तरीके से रखने वाले पक्ष को उपाय की सुविधा प्रदान करता है। इस लेख का उद्देश्य सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा शासित मध्यवर्ती लाभ की अवधारणा की व्याख्या करना है।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत मध्यवर्ती लाभ

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 2(12) में “मध्यवर्ती लाभ” शब्द को परिभाषित किया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने फिराया लाल उर्फ ​​पियारा लाल बनाम जिया रानी और अन्य (1973) के उल्लेखनीय मामले में “मध्यवर्ती लाभ” शब्द के अर्थ की व्याख्या करते हुए कहा कि, जब कोई पक्ष नुकसान की वसूली के लिए दावा करती है, कि एक अतिचारी द्वारा संपत्ति, जो मूल रूप से पक्ष से संबंधित थी, और जो गलत कब्जे में है, तो इस तरह के नुकसान को मध्यवर्ती लाभ के रूप में जाना जाएगा। धारा 2(12) द्वारा प्रदान की गई परिभाषा में मध्यवर्ती लाभ का अपवाद शामिल है जो कि संपत्ति में गलत मालिक द्वारा किए गए सुधारों से प्राप्त लाभ, मध्यवर्ती लाभ के दायरे में नहीं आएगा। संहिता की धारा 2(12) के तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष यहां नीचे दिए गए हैं;

  1. यह ध्यान रखना है कि परिभाषा ने मध्यवर्ती लाभ प्राप्त करने के लिए उचित परिश्रम को महत्व दिया है।
  2. मध्यवर्ती लाभ तभी दिया जा सकता है जब संबंधित संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया हो, जिससे मूल मालिक को उसके अधिकारों से वंचित कर दिया गया हो।
  3. धारा 2(12) के तहत ब्याज, मध्यवर्ती लाभ का एक बुनियादी हिस्सा है।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XX नियम 12 में एक सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा डिक्री पारित करने का प्रावधान है, जहां अचल संपत्ति के कब्जे, किराए, या मध्यवर्ती लाभ की वसूली के लिए एक मुकदमा मौजूद है। सीधे शब्दों में कहें तो, एक सिविल न्यायालय मध्यवर्ती लाभ से संबंधित एक मुकदमे में शामिल पक्षों के अधिकारों को प्रस्तुत करते हुए, आदेश XX के नियम 12 पर निर्भर करेगा।

मध्यवर्ती लाभ की गणना

मध्यवर्ती लाभ के बारे में एक विचार प्राप्त करने के बाद, अब यह जानना प्रासंगिक है कि मध्यवर्ती लाभ की गणना कैसे की जाती है। इसका उत्तर अलग-अलग मामलों के आधार पर अलग होगा, जैसा कि अदालतों द्वारा व्याख्या की गई है। यदि कोई प्रावधान का पालन करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मध्यवर्ती लाभ का आकलन करने के लिए कोई निश्चित नियम मौजूद नहीं है। इसलिए मध्यवर्ती लाभ के आकलन की गुंजाइश अदालतों के हाथ में छोड़ दी गई है। इस प्रकार मामलो के माध्यम से मध्यवर्ती लाभ के इस धारा पर चर्चा करना आदर्श है।

हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड बनाम सेवन सीज लीजिंग लिमिटेड (2018)

इस मामले में, अपीलीय जो संबंधित संपत्ति का एक किरायेदार था, जिसकी किरायेदारी 1986 में शुरु हुई थी और 1998 में खत्म हो गई थी, उसने मुकदमा लंबित रहने के दौरान 1999 में, जगह खाली कर दी थी और लाभ भी सौंप दिया था। तथ्यों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले में परिसर के लिए मुकदमा दायर करने की तारीख (मई 1998) से संबंधित कब्जा वापस करने की तारीख (अगस्त 1999) तक मध्यवर्ती लाभ की गणना करने का निर्णय लिया।

स्क्वेर फोर एसेट मैनेजमेंट एंड रिकंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम ओरिएंट बेवरेजेज लिमिटेड और अन्य (2017)

इस मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 1908 की संहिता के आदेश XX नियम 12 के पीछे विधायी मंशा का फैसला करते हुए कहा कि जहां प्रतिवादी, जो एक वादी के घर का किरायेदार था, ने परिसर को किसी तीसरे व्यक्ति को उप-पट्टे (सब-लीज) पर दिया था, जिसने अवधि की समाप्ति के बाद भी परिसर को नहीं छोड़ा था, उसके लिए मध्यवर्ती लाभ की गणना उस अंतिम तिथि को ध्यान में रखते हुए की जाएगी जिस पर परिसर खाली किया गया था। हालांकि प्रतिवादी ने समाप्ति की तारीख (30 सितंबर 2015) पर जगह सौंप दिया था, जिस व्यक्ति को इसे उप-पट्टे पर दिया गया था, उसने 25 मई 2017 को परिसर खाली कर दिया था। इसलिए, मध्यवर्ती लाभ की गणना सूट की स्थापना की तारीख (17 मई 2016) से की जानी थी, और परिसर को खाली करने की अंतिम तिथि (25 मई 2017) तक थी। न्यायालय ने इस मामले में 17 मई 2016 से 25 मई 2017 तक मध्यवर्ती लाभ की भी जांच के आदेश दिए थे।

लालजी शाहय सिंह और अन्य डिक्री-धारक, बनाम एफ.सी. वॉकर और अन्य (1902)

इस मामले में, एक जिला न्यायालय के आदेश के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील लाई गई थी, जिसमें संबंधित भूमि के लिए भुगतान किए जाने वाले उचित किराए के अनुसार मध्यवर्ती लाभ का पता लगाया गया था, न कि भूमि उत्पादन के मूल्य के अनुसार। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इस मामले में भूमि एक रैयती थी, यह माना गया कि ऐसे मामलों में मूल मालिक और अतिचारी (ट्रेसपासर) दोनों ही किराया प्राप्तकर्ता हैं और इसलिए मध्यवर्ती लाभ की गणना उचित किराए के आधार पर ही की जानी चाहिए।

द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम मेसर्स एम. गुलाब सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड (2018)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस अपील मामले पर फैसला करते हुए मध्यवर्ती लाभ के मूल्य के निर्धारण पर ट्रायल न्यायालय के आकलन को ध्यान में रखा। ट्रायल न्यायालय ने प्रतिवादी द्वारा साबित किए गए पट्टानामा और 1.1.1999 से 30.06.2010 तक मध्यवर्ती लाभ के निर्धारण की अवधि को ध्यान में रखते हुए, विभिन्न अवधियों के लिए मध्यवर्ती लाभ की अलग-अलग दरों के साथ सामने आया था। माननीय उच्च न्यायालय ने इस मामले के आलोक में निम्नलिखित टिप्पणी की:

  1. प्रतिवादी द्वारा प्रदर्शित किए गए पट्टा विलेख प्रासंगिक थे क्योंकि वे न केवल आधार पर तैयार किए गए थे, बल्कि मध्यवर्ती लाभ की गणना के लिए निर्धारित अवधि के 50% (अर्थात वर्ष 2005 से 2010 तक) के संरेखण (एलाइनमेंट) में भी थे।
  2. यदि मध्यवर्ती लाभ का मूल्यांकन देय किराए की दर के अनुसार किया गया है, तो संबंधित संपत्ति या उसी क्षेत्र में स्थित किसी अन्य परिसर के किराए की दर को ध्यान में रखते हुए, इस तरह के मूल्यांकन को मध्यवर्ती लाभ के ईमानदार मूल्यांकन के रूप में घोषित किया जाएगा।

इसलिए, दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा देय मध्यवर्ती लाभ के मूल्य का निर्धारण करने में ट्रायल अदालत द्वारा दिए गए निर्णय को बरकरार रखा।

डॉ. जेके भक्तवासला राव बनाम इंडस्ट्रियल इंजीनियर, नेल्लोर (2005)

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस उल्लेखनीय मामले में मध्यवर्ती लाभ के लिए दो महत्वपूर्ण मूल्यांकन मानदंड (क्राइटेरिया) निर्धारित किए, जब केवल तथ्यों का सवाल इमारत के कब्जे और उपयोग के उद्देश्य के लिए कुछ नुकसानों को ठीक करने में शामिल है, क्योंकि इस तरह के मध्यवर्ती लाभ के मूल्यांकन के लिए कोई पैरामीटर नहीं है। कुछ मानदंड इस प्रकार हैं:

  1. सूट के स्थान, प्रकृति और आसपास की विशेषताओं का आकलन करना।
  2. आसपास के क्षेत्र में समान तरह (ट्रेट) वाले परिसरों को देखना।

उपरोक्त मामलो से एक निष्कर्ष निकालते हुए, यह कहा जा सकता है कि कोई समान निर्धारण मानदंड मौजूद नहीं है, जिसे मध्यवर्ती लाभ के मूल्य का आकलन करने के लिए लागू किया जा सकता है। प्रत्येक मामले में मध्यवर्ती लाभ पर एक अलग दृष्टिकोण है। इक्विटी के कानून को लागू करना, जो मध्यवर्ती लाभ को शुद्ध लाभ होने की मांग करता है, जो इस तरह के मुनाफे को प्राप्त करने में शामिल आवश्यक व्यय की कटौती के बाद प्राप्त हुआ है, मध्यवर्ती लाभ का आकलन करता है। हालांकि किराया मध्यवर्ती लाभ के मूल्य के निर्धारण कारकों में से एक हुआ करता था, लेकिन समय बीतने के साथ इस कारक को खारिज कर दिया गया और भारतीय अदालतों ने भी इसे खारिज कर दिया। इस प्रकार मध्यवर्ती लाभ का आकलन करते समय अदालतों के लिए एक आधार जो बरकरार रहा है, वह यह है कि मुनाफे को गलत तरीके से रखने वाले द्वारा इसे उचित परिश्रम के साथ हासिल किया जाना चाहिए।

परिस्थितियाँ जब मध्यवर्ती लाभ नहीं दिया जाता है

अब तक हमने उन स्थितियों को ध्यान में रखा है, जिनमें पूर्व की संपत्ति के गलत कब्जे के कारण मूल मालिक को मध्यवर्ती लाभ दिया गया है। सिक्के के दूसरे पहलू के बारे में जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जो कि ऐसी परिस्थितियाँ या परिदृश्य हैं, जिनमें कानून की अदालतों द्वारा मध्यवर्ती लाभ को अस्वीकार कर दिया गया है। उन्हें नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

संयुक्त परिवार की संपत्ति और पार्टियां जो उसी के संयुक्त कब्जे में हैं

श्रीमती सुबाशिनी बनाम एस. शंकरम्मा (2018) के मामले में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि संबंधित अचल संपत्ति एक संयुक्त परिवार की संपत्ति है और अपीलीय और प्रतिवादी दोनों ऐसी संपत्ति के संयुक्त मालिक हैं, तो ऐसी परिस्थिति में अपीलीय लाभ का दावा नहीं कर सकता क्योंकि प्रतिवादी स्वयं एक मालिक है और इसलिए उक्त, संपत्ति के गलत कब्जे में नहीं हैं।

मध्यवर्ती लाभ के प्रभाव के लिए किसी भी न्यायालय द्वारा कोई आदेश या डिक्री नहीं होना चाहिए

आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल) ने कृष्णा एन भोजवानी, बनाम निर्धारिती (2021) के मामले में बताया गया कि किसी भी सिविल न्यायालय द्वारा आदेश या डिक्री, मध्यवर्ती लाभ को प्रभाव करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। इस विशेष मामले में, मध्यवर्ती लाभ के अनुदान को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया है कि किसी भी सिविल न्यायालय द्वारा कोई आदेश या डिक्री मौजूद नहीं है, जो मध्यवर्ती लाभ को प्रभाव कर सकता है। अत: अपीलीय को इससे प्रतिबंधित कर दिया गया था।

जिन परिस्थितियों में 1908 की संहिता की धारा 144 के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं

मूर्ति भवानी माता मंदिर आरईपी, पुजारी गणेशी लाल (डी), एलआर के माध्यम से बनाम राजेश और अन्य (2019) के मामले में, जहां अपीलकर्ता ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 144 के तहत विवादित संपत्ति पर अपने कब्जे की बहाली और मध्यवर्ती लाभ देने के लिए एक आवेदन दायर किया था, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देखा कि इस मामले में धारा 144 का प्रावधान लागू नहीं होगा क्योंकि ट्रायल न्यायालय द्वारा कोई डिक्री या आदेश नहीं था जो अपीलीय को अधिकार देगा, और न ही ऐसे किसी आदेश या डिक्री ने प्रतिवादी को अनिवार्य किया था कि वह विवादित कब्जे को मूल मालिक को सौंप दें।

पर्याप्त सबूतों का अभाव

मध्यवर्ती लाभ के मामलों में, सबूत का बोझ पूरी तरह से संपत्ति के गलत कब्जे का दावा करने वाले दावेदार पर टिका होता है, यह दावेदार की जिम्मेदारी है कि वह मध्यवर्ती लाभ का दावा करने से पहले अवैध मालिक के खिलाफ कानून की अदालत के समक्ष पर्याप्त सबूत पेश करे।

प्रारंभिक कब्जा गलत नहीं था लेकिन बाद में उसने गलत चरित्र ग्रहण कर लिया है

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यवर्ती लाभ देने के संबंध में यूनियन ऑफ इंडिया (यूओआई) और अन्य बनाम बनवारी लाल एंड संस (2004) के मामले में एक उल्लेखनीय टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसी संपत्ति है जो शुरू में गलत नहीं थी लेकिन भविष्य में उसका गलत चरित्र मान लिया गया था, तो ऐसे मामले में संपत्ति के मालिक को मध्यवर्ती लाभ नहीं दिया जाएगा, बल्कि उस संपत्ति का उचित किराया ही प्रदान किया जायगा।

हालांकि ये परिस्थितियाँ प्रकृति में संपूर्ण नहीं हैं, लेकिन ये भारतीय अदालतों द्वारा दिए गए निर्णयों की व्याख्या हैं।

ऐतिहासिक निर्णय

कुछ निर्णयों के अनुपात-निर्णय (रेश्यो डेसीडंडी) को नीचे सूचीबद्ध किया गया है ताकि मध्यवर्ती लाभ और इससे जुड़े तत्वों का अवलोकन किया जा सके।

श्रीमती सुबाशिनी बनाम एस. शंकरम्मा (2018)

इस मामले पर फैसला करते हुए, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने मध्यवर्ती लाभ देने के पीछे के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। यह देखा गया कि मध्यवर्ती लाभ एक संपत्ति के मूल मालिक को क्षतिपूर्ति करने की भूमिका निभाता है, जिसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसी संपत्ति के अनधिकृत कब्जे के कारण नुकसान और क्षति हुई है। मुआवजे शब्द का प्रयोग इस तथ्य पर जोर देने के लिए किया जाता है कि एक व्यक्ति को अपनी संपत्ति के आनंद के अधिकार से वंचित कर दिया गया है और एक वैध मालिक को नुकसान हुआ है। मध्यवर्ती लाभ देने के पीछे का विचार है कि, जो गलत हुआ है उसे सुधारना है।

मेसर्स स्काईलैंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम आयकर अधिकारी (2020)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मेसर्स स्काईलैंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम आयकर अधिकारी (2020) के मामले में, वैध मालिक द्वारा उसके अवैध कब्जे के कारण प्राप्त उस मध्यवर्ती लाभ को धारण करके मध्यवर्ती लाभ पर एक उल्लेखनीय निर्णय लिया। अचल संपत्ति को राजस्व (रेवेन्यू) प्राप्ति के रूप में माना जाएगा और इसलिए यह आयकर अधिनियम की धारा 21(1) के तहत एक कर योग्य विषय-वस्तु होगी।

नज़ीर मोहम्मद बनाम जे कमला और अन्य (2020)

इस मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अचल संपत्ति के कब्जे की डिक्री किसी भी तरह से स्वामित्व की घोषणा की डिक्री का स्वचालित रूप से पालन नहीं करता है। गलत कब्जे के आरोप को सही ठहराने का भार पूरी तरह से वादी पर है। यदि वह प्रतिवादी पर अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहता है, तो न्यायालय कब्जे को उसकी प्रकृति से प्रतिकूल मानेगा।

निष्कर्ष

यदि संहिता की धारा 2(12) का आकलन किया जाता है, तो यह स्पष्ट किया जा सकता है कि ऐसे बहुत से मूलभूत प्रश्न हैं जिनका समाधान करने में प्रावधान विफल हैं। जबकि प्रावधान किसी संपत्ति के गलत कब्जे के लिए मध्यवर्ती लाभ को निर्दिष्ट करता है जो मूल रूप से किसी और की है, यह उन मापदंडों को निर्धारित नहीं करता है जिनके आधार पर अदालतों द्वारा मध्यवर्ती लाभ की अनुमति दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, जब ब्याज दर की बात आती है, जो कि मध्यवर्ती लाभ के साथ लगाई जाती है, तो यह प्रावधान चुप रहता है, और पूरी जिम्मेदारी अदालतों पर छोड़ देता है। हम देखते हैं कि मध्यवर्ती लाभ की गणना के लिए अदालतों द्वारा अपनाई गई कई तरह की विधियां हैं। यद्यपि एक समान मानदंड निर्धारित नहीं किए जा सकते हैं जैसा कि प्रावधान ने माना है, कोई भी इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकता है कि विशिष्टता किसी भी कानून का सार है। इस प्रकार इन प्रश्नों को संबोधित करने और बेहतर कार्यान्वयन (इम्प्लीमेंटेशन) के लिए तार्किक (लॉजिकल) समाधान प्रदान करने की आवश्यकता है।

संदर्भ

 

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत अनुबंध का विफलीकरन 

इस लेख को Vanshika Sharma और Shantanu Dhingra द्वारा लिखा है।  लेख में भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत अनुबंध के विफलीकरन के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय

जब दो पक्ष एक अनुबंध में प्रवेश करते हैं, तो एक सामान्य धारणा है कि वे अपने संविदात्मक दायित्वों (कॉन्ट्रैक्चुअल ऑब्लिगेशन) को और अनुबंध की शर्तों को पूरा करने की चाह रखते हुए अनुबंध में प्रवेश करते हैं, इसलिए, उन्होंने कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते में प्रवेश किया है, लेकिन ऐसे संविदात्मक दायित्वों को असंभव या अव्यवहारिक बनाने वाली कुछ परिस्थितियां हो सकती हैं जो इस पूर्ति को जन्म देंगी। जब ये परिस्थितियाँ पक्षों के नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं और जब वे अनुबंध को पूरा करना असंभव बना देती हैं, तो ऐसे अनुबंध को विफलीकरन या नैराश्यवाला (फ्रस्ट्रेटेड) अनुबंध कहा जाता है। विफलीकरन  एक छत्र शब्द है जिसमें सभी संभावित परिस्थितियों को शामिल किया गया है जिससे संविदात्मक दायित्व की पूर्ति असंभव या अव्यवहारिक हो सकती है।  

यही कारण है कि ‘विफलीकरन  का सिद्धांत’ कानून में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि यह ऐसी अप्रत्याशित (अनप्रेडक्टेबल) और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के लिए एक तंत्र प्रदान करता है जिससे अनुबंध निराश हो जाता है। अनुबंधों की बाध्यकारी प्रकृति और इसके परिणामों को ध्यान में रखते हुए जब कोई पक्ष अपने संविदात्मक दायित्वों को पूरा नहीं करता है तो ‘विफलीकरन  का सिद्धांत’ पक्षों को उन मामलों में नुकसान का भुगतान करने से बचाने के लिए एक उचित तंत्र प्रदान करता है जहां अप्रत्याशित घटनाएं उनके नियंत्रण से बाहर होती हैं। अधिकांश सामान्य कानून देशों के विपरीत, ‘विफलीकरन  का सिद्धांत (प्रिंसिपल ऑफ फ्रस्ट्रेशन)’ केवल वर्षों के न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) द्वारा विकसित नहीं किया गया है; यह भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 56 के तहत भारतीय कानून में स्पष्ट रूप से शामिल है।  

भले ही भारतीय अनुबंध अधिनियम स्पष्ट रूप से विफलीकरन  शब्द को परिभाषित नहीं करता है, फिर भी यह धारा 56 के तहत ‘विफलीकरन  के सिद्धांत’ के सभी आधारों और प्रावधानों को शामिल करता है। विफलीकरन  का सिद्धांत अनुबंध के निर्वहन (डिस्चार्ज) निष्पादित करने की असंभवता के एक विशेष मामले का “सिद्धांत” है। 

भारतीय अनुबंध अधिनियम में धारा 32 के तहत अनुबंध की विफलीकरन के लिए एक और प्रावधान है, लेकिन यह उन परिस्थितियों के कारण विफलीकरन  को कवर नहीं करता है जो अप्रत्याशित और पक्षों के नियंत्रण से बाहर हैं, यह केवल पहले से अनुबंध में उल्लिखित शर्तों के अनुसार पक्षों के दायित्वों को समाप्त करता है। यह पत्र भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत आयोजित विफलीकरन के विशेष स्थिति सिद्धांत की व्याख्या करने के साथ-साथ इसकी उत्पत्ति और इसकी आधुनिक प्रासंगिकता और अनुप्रयोग की व्याख्या भी करने का प्रयास करेगा।

विफलीकरन के सिद्धांत का इतिहास और विकास

जैसा कि आम कानून के तहत अधिकांश प्रावधानों के मामलो में है, विफलीकरन की उत्पत्ति के सिद्धांत को रोमन कानून में खोजा जा सकता है। इसे रोमन कानून के तहत एक प्रावधान के रूप में देखा जा सकता है जिसमें कहा गया है कि पक्षों को उनके संविदात्मक दायित्वों से मुक्त किया जाना चाहिए, यदि ऐसी घटनाएं होती हैं जिसमे स्वयं की कोई गलती नहीं होती हैं और जो अप्रत्याशित नहीं थे। उदाहरण के लिए, यदि एक आदमी ने एक निश्चित दिन पर एक दास को देने का वादा किया था और उस विशेष दास की डिलीवरी से पहले अप्रत्याशित कार्यों के कारण उसकी मृत्यु हो गई जो उसके नियंत्रण से बाहर थी इसलिए उस व्यक्ति को रोमन कानून के तहत संरक्षित किया गया। 

प्राचीन काल से आगे बढ़ते हुए, विफलीकरन  के सिद्धांत का पहला उदाहरण 1863 के टेलर बनाम कार्डवेल के मामले में क्वीन बेंच के फैसले में खोजा जा सकता है। इस विशेष मामले में, एक ओपेरा हाउस एक आकस्मिक आग के कारण नष्ट हो गया था और परिणामस्वरूप ओपेरा के प्रदर्शन को दिखाने में सक्षम नहीं था, वादी (ओपेरा के लिए टिकट का खरीदार) ने प्रतिवादी पर अनुबंध के उल्लंघन के लिए मुकदमा दायर किया। हालांकि, यह माना गया था कि प्रतिवादी नुकसान का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि जिस वस्तु पर अनुबंध की पूरी पूर्ति आधारित थी, वह किसी भी पक्ष की गलती से नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए यह माना गया कि पक्षों को उनके संविदात्मक दायित्वों से मुक्त किया गया था। इस मामले से पहले, यह माना गया था कि पक्ष यदि चाहे तो अपने अनुबंध में ऐसी परिस्थितियों को डाल सकते हैं जिससे की अनुबंध पर एक नकारात्मक प्रभाव हो सकता है लेकिन वह केवल परिस्थिति का उपयोग अपने संविदात्मक दायित्वों को पूरा न करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। 

इससे पहले, विफलीकरन के मामलों में आम कानून में कठोरता थी जैसा कि पैराडाइन बनाम जेन के ऐतिहासिक फैसले में देखा गया था। इस मामले में, एक किरायेदार को बकाया किराए का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी बनाया गया था, भले ही जिन परिस्थितियों के कारण उसे किराए का भुगतान नहीं करना पड़ा, वह उसके नियंत्रण से बाहर थी। हालांकि, इस कठोरता को कार्डवेल मामले के बाद बदल दिया गया था। हालांकि, कार्डवेल मामले के तहत विफलीकरन  के लिए दिए गए तर्क की आलोचना की गई क्योंकि दिया गया तर्क यह था कि जब पक्ष एक अनुबंध में प्रवेश करते हैं तो एक निहित शर्त होती है कि अप्रत्याशित और दुर्भाग्यपूर्ण घटना के मामले में वे दायित्वों से मुक्त हो जाएंगे। इस तर्क की कई कानूनी विद्वानों ने आलोचना की क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह अदालतों में बनाई गई एक ‘कानूनी कल्पना’ है।

नेशनल कैरियर्स लिमिटेड बनाम पैनलपिना (उत्तरी) लिमिटेड के तहत हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा इसकी आलोचना की गई क्योंकि उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अनुबंध के पक्ष नहीं है वह अनुबंध में घुसपैठ कर रहे है। हालांकि, विफलीकरन  के सिद्धांत को मजबूत किया गया था, जब “वस्तु की हानि” सिद्धांत को विफलीकरन  के सिद्धांत को सही ठहराने के लिए दिया गया था, इस सिद्धांत ने कहा कि जब मुख्य वस्तु जिस पर पूरा अनुबंध घिरा हुआ है, एक ऐसी घटना से नष्ट हो जाती है जो उचित रूप से अप्रत्याशित और पक्षों के नियंत्रण से बाहर नही है में अनुबंध का पूरा होना असंभव हो जाता है और इसलिए, ऐसे मामलो में पक्षों को नुकसान का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए। यह एक अधिक परिष्कृत (सोफेस्टिकेटेड) सिद्धांत था और इसे सबसे पहले क्रेल बनाम हेनरी के ऐतिहासिक मामले में इस्तेमाल किया गया था। इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि विफलीकरन  के सिद्धांत की जड़ें प्राचीन हैं लेकिन यह समय के साथ विकसित हुई है और आज तक अत्यंत प्रासंगिक (रिलेवेंट) है।

महत्वपूर्ण मामले

जैसा कि देखा गया है कि भले ही भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत भारतीय कानून में विफलीकरन के सिद्धांत को विशेष रूप से शामिल किया गया है, सिद्धांत की व्याख्या और दायरे निरंतर न्यायशास्त्र के माध्यम से विकसित हो रहे हैं। भारतीय कानून में विफलीकरन के सिद्धांत और धारा 56 से संबंधित कुछ प्रमुख मामले निम्नलिखित हैं:

सत्यव्रत बनाम मैंगनीराम 

इस मामले ने भारतीय कानून के तहत धारा 56 के दायरे को स्थापित किया। मामले के तथ्य इस प्रकार हैं: प्रतिवादी की कंपनी भूमि के बड़े भूखंडों की खरीद में शामिल थी और बाद में वह उन भूखंडों को खरीदकर उनको व्यक्तियों के खरीदने के लिए छोटे भूखंडों में विभाजित करते थे, व्यक्तियों को इन भूखंडों को खरीदने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता था। उत्तरदाताओं की कंपनी ने सड़कों, टैंकों, पार्कों और आवासीय उद्देश्यों के लिए आवश्यक सभी चीजों का विकास किया था। 30 नवंबर 1946 को अपीलकर्ता ने एक भूखंड खरीदा लेकिन भूमि कलेक्टर द्वारा अधिग्रहित (एक्वायर्ड) की गई थी। अतः प्रतिवादी ने अपीलकर्ता को वह राशि देने की पेशकश की जो उसने भूखंड की खरीद के लिए दी थी। अपीलकर्ता ने इसका खंडन किया और वाद दायर किया। 

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विफलीकरन  के लिए अंग्रेजी कानून द्वारा दिया गया तर्क भारतीय कानून पर लागू नहीं है और “असंभवता” का अर्थ केवल भौतिक और शाब्दिक असंभवता नहीं है, बल्कि धारा 56 के तहत असंभवता का अर्थ व्यावहारिक असंभवता भी है। अदालत ने कहा कि यदि अनुबंध की पूर्ति न केवल शाब्दिक भौतिक असंभवता के कारण असंभव हो जाती है, बल्कि जब अनुबंध का उद्देश्य पूरा करना अव्यावहारिक हो जाता है तो यह भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के दायरे में आएगा।

सुशीला देवी बनाम हरि सिंह 

यह मामला एक और मामला है जिसने स्थापित किया कि धारा 56 के तहत असंभवता का मतलब केवल शाब्दिक असंभवता नहीं बल्कि व्यावहारिक असंभवता भी है। मामले के तथ्य इस प्रकार हैं: अपीलकर्ता एक गांव के मालिक थे और उन्होंने जनवरी, 1947 से शुरू होकर तीन साल की अवधि के लिए प्रतिवादी को गांव में एक संपत्ति पट्टे (लीज) पर दी थी, लेकिन चूंकि भारत और पाकिस्तान का विभाजन चल रहा था गांव पाकिस्तान का हिस्सा बन गया और इस वजह से प्रतिवादी के लिए सांप्रदायिक कारणों से भूमि का उपयोग करना संभव नहीं था। अपीलकर्ताओं का तर्क है कि यह स्वयं थोपी गई विफलीकरन  थी लेकिन यह माना गया कि यदि अनुबंध की पूर्ति व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाती है तो इसे भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत निराश माना जाएगा।

निर्मला आनंद बनाम एडवेंट कॉर्पोरेशन प्राईवेट लिमिटेड

इस मामले में यह माना गया कि विफलीकरन  स्वतः ही एक अनुबंध को समाप्त कर देती है। यह माना गया कि अनुबंध उस घटना तक होता है जो उसे निराश करती है लेकिन उस घटना के घटित होने के बाद अनुबंध स्वतः ही निराश हो जाता है।

धारा 56 के तहत विफलीकरन के विशिष्ट उदाहरण

विषय वस्तु की भौतिक क्षति (फिजिकल डैमेज), वस्तु का गायब होना, जिसके परिणामस्वरूप निष्पादन में अवैधता, व्यक्तिगत सफलता से जुड़े अनुबंध में एक प्रतिभागी की मृत्यु या अक्षमता, और इसी तरह धारा 56 के प्रावधानों के तहत विफलीकरन के कुछ उदाहरण हैं। एक या इनमें से अधिक कारक किसी मामले पर लागू हो सकते हैं। इनमें से कुछ कारकों का विश्लेषण नीचे किया गया है: 

विषय वस्तु का भौतिक विनाश

यदि अनुबंध के प्रदर्शन के लिए आवश्यक विषय वस्तु नष्ट हो जाती है तो अनुबंध निराश हो जाएगा। उदाहरण के लिए, वी.एल नरसु बनाम पी.एस.वी अय्यर में, सिनेमा हॉल में एक फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए एक अनुबंध प्रदर्शन करना असंभव हो गया क्योंकि भारी बारिश के कारण हॉल की पिछली दीवार गिर गई, तीन लोगों की मौत हो गई, और हॉल का लाइसेंस तब तक रद्द कर दिया गया जब तक मुख्य अभियंता (इंजीनियर) की संतुष्टि पर भवन का फिरसे बनाया गया। पुनर्निर्माण के लिए मालिक की ओर से कोई दायित्व नहीं था। 

नष्ट की गई चीजें अनुबंध की विषय वस्तु होनी चाहिए; इस प्रकार, यदि अनुबंध ऐसी विशेष वस्तुओं के लिए अनन्य नहीं था, तो इसे निराश नहीं किया जा सकता था। टर्नर बनाम गोल्डस्मिथ में, प्रतिवादी द्वारा निर्मित वस्तुओं को वितरित करने के लिए एजेंसी का अनुबंध कारखाने के जलने के बाद निराश नहीं हुआ था क्योंकि अनुबंध उस विशिष्ट कारखाने में प्रतिवादी द्वारा उत्पादित उत्पादों के लिए अनन्य नहीं था। 

बाद में अवैधता में समाप्त होने वाले कानून में परिवर्तन

कानून या कानूनी स्थिति में परिणामी परिवर्तन जो अनुबंध को प्रभावित करता है और अनुबंध के प्रदर्शन को रोकता है, धारा 56 के तहत विफलीकरन  का एक प्रसिद्ध कारण है। जब तक अनुबंध अलग-अलग निर्दिष्ट नहीं करता है, तब तक “कानून” में अंतर्राष्ट्रीय कानून शामिल हो सकता है। 

अनुबंध का निर्वहन करने के लिए, कानून में परिवर्तन केवल अनुबंध के तहत प्रदर्शन को निलंबित करने के बजाय अनुबंध की नींव से कानून का उपयोग किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का एक आदेश कानून में ऐसा बदलाव ला सकता है। इसके अलावा, प्रदर्शन को असंवैधानिक बनाने वाले किसी भी सरकारी निषेध डिक्री से अनुबंध की विफलीकरन  होगी।

भारतीय संविधान के प्रारंभ ने उन अनुबंधों को भी समाप्त कर दिया जो संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन करते थे। अनुच्छेद 19(1)(g) के आवेदन ने रेडियो और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण पर एकाधिकार (मोनोपोली) प्रदान करने वाले अनुबंध को विफल कर दिया।

पक्ष की मृत्यु या प्रदर्शन करने में असमर्थता

यदि किसी अनुबंध की पूर्ति एक निश्चित इकाई के जीवन पर आकस्मिक है, तो उस व्यक्ति को प्रदर्शन करने से छूट दी जाएगी यदि वह व्यक्ति प्रदर्शन करने में असमर्थ हो जाता है। इस प्रकार, जब अनुबंध का सार या प्रावधान वचनदाता को व्यक्तिगत रूप से अनुबंध करने के लिए मजबूर करता है, तो उसकी मृत्यु या अक्षमता अनुबंध को समाप्त कर देती है।

उदाहरण के लिए रॉबिन्सन बनाम डेविसन में, एक कुशल पियानोवादक, वादी और प्रतिवादी की पत्नी ने सहमति व्यक्त की थी कि वह एक विशिष्ट तिथि पर वादी द्वारा आयोजित एक संगीत कार्यक्रम में पियानो बजाएगी। वह संगीत कार्यक्रम की सुबह बीमार हो गई और भाग लेने में असमर्थ थी। जब संगीत कार्यक्रम को पुनर्निर्धारित करना पड़ा उस वजह से वादी को उस कार्यक्रम में निवेश किए गए पैसों को खोना पडा। अनुबंध के उल्लंघन के लिए वादी के दावे को खारिज कर दिया गया था। अदालत के अनुसार, उसे न केवल पियानो बजाने से छूट दी गई थी, बल्कि अगर उसे अनफिट समझा गया था और अनुबंध निराश था, तो वह पियानो बजाने के लिए स्वतंत्र नहीं थी।

घटनाओं का न होना

कभी-कभी एक अनुबंध की पूर्ति अक्सर पूरी तरह से संभावित होती है, लेकिन अनुबंध के औचित्य (जस्टिफिकेशन) के रूप में सभी पक्षों द्वारा प्रत्याशित घटना की गैर-घटना के कारण प्रदर्शन की वैधता नष्ट हो जाती है। 

हर्न बे स्टीम बोट कंपनी बनाम हटन में, रॉयल नेवल रिव्यू प्रस्तावित किया गया था। प्रतिवादी ने नेवल रिव्यू देखने और बेड़े के माध्यम से एक दिन के क्रूज का आनंद लेने के लिए भुगतान करने वाले यात्रियों के एक समूह को परिवहन के लिए दो-व्यक्ति स्टीमबोट किराए पर लिया। रिव्यू, हालांकि, रद्द कर दी गई थी, और प्रतिवादी जहाज का उपयोग करने में असमर्थ था। फिर भी, वादी द्वारा व्यवसाय के सामान्य पाठ्यक्रम में अर्जित लाभ को घटाकर उन्हें किराए की बकाया राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था। 

धारा 56 की सामग्री

धारा 56 की 3 सामग्री हैं:

  • इसमें कहा गया है कि ऐसा कार्य करने का समझौता जो अपने आप में असंभव है, शून्य है।
  • यह निम्नलिखित परिस्थितियों में एक कार्य को अमान्य करने के लिए एक अनुबंध को प्रस्तुत करता है: जब अनुबंध किए जाने के बाद कार्य करना असंभव हो जाता है, या जब ऐसी घटनाओं के कारण कार्य असंवैधानिक हो जाता है जिसे वचनदाता टाल नहीं सकता है।
  • जहां एक व्यक्ति कुछ ऐसा करने के लिए सहमत हो गया है जिसे वह जानता था, या उचित परिश्रम के साथ जानना चाहिए था, जो असंभव या गैरकानूनी था, और जिसे वादा करने वाला नहीं जानता था कि वह असंभव या गैरकानूनी था,  उसे वादे के गैर-प्रदर्शन के परिणामस्वरूप वादाकर्ता हुए नुकसान के लिए दूसरे पक्ष को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा। 

प्रारंभिक और बाद की असंभवता के बीच अंतर

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 56 के अनुसार असंभव हो जाने वाले कार्य को करने का अनुबंध शून्य है। 

प्रारंभिक असंभव 

किसी भी अनुबंध का उद्देश्य पक्षों के लिए अपने-अपने वादों को पूरा करना है, और यदि अनुबंध को पूरा करना असंभव है, तो पक्ष कभी भी इसमें प्रवेश नहीं करेंगे। शब्द “प्रारंभिक असंभवता” उन स्थितियों को संदर्भित करता है जिनमें अनुबंध शुरू से ही पूरा करना असंभव था। धारा 56 के पहले पैराग्राफ के अनुसार असंभव वास्तव में या कानून में पहले से मौजूद होना चाहिए। 

उदाहरण के लिए, यदि कोई पुरुष जो पहले से ही विवाहित है, किसी महिला के साथ अनुबंध करता है और उससे शादी करने का वादा करता है, यह जानते हुए कि उसकी एक ही समय में दो पत्नियां नहीं हो सकती हैं, तो वह अनुबंध अमान्य होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वादा करने वाले को इस तरह की असंभवता के बारे में पता था या नहीं, वैसे भी यह अनुबंध को शून्य बना देगा। 

बाद की असंभवता 

इसे पर्यवेक्षण (सुपरविजन) असंभवता के रूप में भी जाना जाता है। धारा 56 का दूसरा पैराग्राफ अनुबंध के प्रदर्शन पर बाद की असंभवताओं के प्रभावों का उल्लेख करता है। जब पक्षों के बीच एक अनुबंध किया जाता है, तो अक्सर इसे पूरा करना बहुत संभव होता है। हालांकि, बाद में कुछ ऐसा होता है जिससे कार्य करना मुश्किल या अवैध हो जाता है। इस मामले में, अनुबंध को शून्य माना जाता है। इस मामले को पोस्ट-कॉन्ट्रैक्चुअल या बाद की असंभवता कहा जाता है।

ऐसी असंभवता के कुछ उदाहरण हैं: जब विवाह की व्यवस्था के लिए पक्षों में से एक पागल हो जाता है, या जब माल के आयात के लिए एक अनुबंध किया जाता है और आयात को सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया जाता है, या जब एक संगीतकार गाने के लिए अनुबंध करता है और बीमार हो जाता है ऐसा करने पर अनुबंध किसी भी स्थिति में अमान्य हो जाता है। 

आम तौर पर, यह किसी भी पक्ष की त्रुटि के कारण नहीं होता है, जिसके परिणामस्वरूप अनुबंध और उसके दायित्वों को समाप्त कर दिया जाता है। 

धारा 56 और कोविड-19

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यू एच ओ) द्वारा नोवेल कोरोनावायरस (कोविड-19) को एक वैश्विक महामारी घोषित किया गया है, और दुनिया भर के हर देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति घोषित की गई है। निस्संदेह, कोविड-19 का वैश्विक अर्थव्यवस्था और अनुबंधों के प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और रहेगा। 

ऐसे दो परिदृश्य हैं जिनमें एक अप्रत्याशित घटना खंड एक महामारी पर लागू हो सकता है:

  • यदि एक महामारी को स्पष्ट रूप से एक अप्रत्याशित घटना के मामले की संविदात्मक अवधारणा में शामिल किया जाए, तो अप्रत्याशित घटना के मामलों के दायरे में महामारी के जुड़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या कोविड-19 महामारी अनुबंध के अप्रत्याशित घटना खंड को ट्रिगर करेगी।
  • यदि अप्रत्याशित घटना खंड उन असामान्य स्थितियों पर लागू होता है जो पक्षों के उचित नियंत्रण से बाहर हैं। यदि यह ज्ञात हो कि महामारी द्वारा निर्मित तथ्यात्मक परिस्थितियाँ प्रभावित पक्ष के उचित प्रभाव से बाहर हैं, तो ऐसा खंड लागू किया जा सकता है। 
  • यदि कोविड-19 को एक अप्रत्याशित घटना के रूप में निर्दिष्ट नहीं किया गया है, या यदि अनुबंध में एक स्पष्ट अप्रत्याशित घटना का प्रावधान है, तो एक घायल पक्ष विफलीकरन/असंभवता (कर्तव्य को पूरा करने या कार्य करने के लिए) के लिए धारा 56 के तहत निवारण की मांग कर सकता है।

अप्रत्याशित घटना या विफलीकरन का नियम एक सामान्य नियम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है; बल्कि, प्रत्येक मामले की व्याख्या तथ्यों और परिस्थितियों द्वारा निर्धारित की जाएगी। कोविड-19 के मामले में अप्रत्याशित घटना या विफलीकरन के सिद्धांत का सफल कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) अनुबंध के खंड की बारीकियों और स्थिति की वास्तविकता पर निर्भर है। 

निष्कर्ष

यह देखा जा सकता है कि जब अनुबंध कानून की बात आती है तो विफलीकरन  का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत विफलीकरन के सिद्धांत को वैधानिक अधिकार दिया गया है। भारतीय न्यायालय विफलीकरन  की व्याख्या न केवल उन घटनाओं को शामिल करने के लिए करते हैं जो अनुबंध के तहत शर्तों के दायित्वों की पूर्ति को शारीरिक रूप से असंभव बनाती हैं बल्कि व्यावहारिक रूप से अव्यवहारिक हैं और अनुबंध के उद्देश्य को विफल करती हैं। घटनाओं की एक विस्तृत सूची नहीं है जो एक अनुबंध को विफल कर सकती है, यह विकसित होना जारी है क्योंकि भारत में विफलीकरन का सिद्धांत अनुबंध अधिनियम की धारा 56 के तहत एक गतिशील प्रावधान है। यह उन घटनाओं के बारे में बात करता है जो अनुबंध के उद्देश्य को असंभव बना देती हैं और ऐसी घटनाओं का एक समूह है जो इस दायरे में हो सकती हैं।

सिविल कानून और आपराधिक कानून के बीच अंतर

यह लेख आईआईएमटी, आईपी विश्वविद्यालय से बीए एलएलबी करने वाली Khushi Sharma (ट्रेनी एसोसिएट, ब्लॉग आईप्लीडर्स) द्वारा लिखा गया है। यह लेख सिविल कानून और आपराधिक कानून के बीच अंतर से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

एक कानून के छात्र या कानूनी क्षेत्र से संबंधित किसी भी व्यक्ति के रूप में हम हर उस शाखा को जान सकते हैं, जहां हमारे देश का कानून फैला हुआ है, लेकिन एक आम आदमी को केवल कानून का बुनियादी ज्ञान हो सकता है। ऐसी दो शाखाएं जिनसे सभी परिचित हैं, वे हैं सिविल और आपराधिक कानून। ये दो विषय, कानून के तहत सामान्य हैं जो संभवत: इसके बड़े हिस्से को भी कवर करते हैं। एक सामान्य अंतर किसी के द्वारा भी पता लगाया जा सकता है लेकिन इस लेख में, हम विस्तार से विश्लेषण करने जा रहे हैं कि सिविल और आपराधिक कानूनों के तहत क्या शामिल है।

हमारी व्यापक आबादी के कारण भारत के कानून में इसके तहत कई तरह के अलगाव हैं जो लोगों द्वारा कानूनों के उल्लंघन और लोगों के अधिकारों के उल्लंघन का कारण बनते हैं। इस तरह के कार्यों में वृद्धि के कारण, भारत में विभिन्न प्रकार के विधानों को प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी जो हमें कानून के तहत कई प्रकार और शाखाएं प्रदान करते थे। भारत के कानून को निम्नलिखित प्रमुख कानून में विभाजित किया गया है –

  • सार्वजनिक और निजी कानून;
  • सिविल कानून और आपराधिक कानून;
  • मूल और प्रक्रियात्मक कानून (सब्सटेंटिव एंड प्रोसीजरल लॉ);
  • नगरपालिका और अंतर्राष्ट्रीय कानून।

इनके अलावा हमारे पास सामान्य कानून और सांविधिक (स्टेच्यूटरी) कानून भी हैं। इन उपर्युक्त कानूनों में विभिन्न प्रकार के अधिनियम और कानून शामिल हैं, इस प्रकार यह भारत को कई अलग-अलग कानून बनाने में सक्षम बनाता है, और इस लेख में हम सिविल और आपराधिक कानून और उनके मतभेदों पर ध्यान केंद्रित करेगे।

सिविल कानून

एक सामान्य अर्थ में सिविल कानूनों का अर्थ, किसी व्यक्ति या किसी अन्य निजी संपत्ति (निगम) को किसी अन्य व्यक्ति के कार्य या व्यवहार से हुई चोट या नुकसान है। पक्ष द्वारा किए गए कार्य सिविल कानूनों के तहत गैर-आपराधिक प्रकृति के हैं। यह आमतौर पर पक्षों के बीच विवादों को सुलझाने से संबंधित है। सिविल कानून आमतौर पर पीड़ित पक्ष या न्यायालय को मुआवजा या जुर्माना प्रदान करके राहत से निपटते हैं। सिविल कानूनों के कारण हुए नुकसान की भरपाई मुआवजे से की जाती है। आपराधिक कानून के विपरीत, सिविल कानून बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ अपराध नहीं बनाता है।

सिविल कानून की विशेषताएं

सिविल कानून इतने गतिशील होने के कारण कई विविध विशेषताओं और विशिष्ट अनिवार्यताओं के साथ अटका हुआ है जो इस प्रकार हैं –

  1. सिविल कानून, कानून की एक शाखा है जिसमें सिविल न्यायालयों और उससे संबंधित न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) के तहत मामलों की सुनवाई की जाती है।
  2. दोनों पक्षों में से किसी एक को हुए नुकसान का समाधान कारावास के माध्यम से नहीं, बल्कि उन्हें एक राशि देकर किया जाता है।
  3. ये संहिताबद्ध (कोडिफाइड) कानूनों और निर्णयों का एक समूह हैं, जो शामिल पक्षों के लिए बाध्यकारी हैं।
  4. सिविल कानून संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) दायित्वों की ओर बहुत अधिक झुकाव रखता है क्योंकि अनुबंध कानून इसकी प्रमुख शाखा है।

सिविल कानून के तहत शाखाएं

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, सिविल कानून इतना विशाल होने के कारण इसमें शामिल लोगों के लिए एक बहुत ही उपयोगी कानूनी करियर बनाने वाली गतिशील शाखाओं का एक समूह है। सिविल कानून के तहत काम करने वाली मशीनरी पक्षों को विवाद समाधान तंत्र प्रदान करने पर केंद्रित है। सिविल कानून की कई अलग-अलग शाखाएँ हैं, उनमें से कई संहिताबद्ध हैं, कुछ परिभाषित हैं और कुछ मिसालों पर आधारित हैं। सिविल कानूनों के तहत निम्नलिखित शाखाएँ उपलब्ध हैं –

  • अनुबंध कानून

अनुबंध कानून सबसे व्यापक रूप से प्रचलित और इस्तेमाल किए जाने वाले सिविल कानूनों में से एक है। एक अनुबंध कानून में कानूनी रूप से लागू करने योग्य समझौते और अनुबंध शामिल हैं और सामान्य रूप से संविदात्मक संबंधों को लागू करने के लिए प्रभावी उपाय और प्रक्रियाएं प्रदान करते हैं। यह अनुबंध के उल्लंघन के लिए उचित उपाय प्रदान करता है और यह बताता है कि कैसे एक घायल पक्ष कानून की अदालत से राहत की मांग कर सकता है। यह सिविल कानून के तहत एक बहुत ही सामान्य रूप से इस्तेमाल की जाने वाली शाखा है। अनुबंध कानून को नियंत्रित करने वाला क़ानून भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 है। अनुबंध अधिनियम सभी कानूनी रूप से लागू करने योग्य अनुबंधों को नियंत्रित करता है और बताता है कि कौन से अनुबंध वैध हैं और कौन से नहीं है।

  • टॉर्ट कानून

टॉर्ट कानून भी सिविल कानून की एक व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली शाखा है। सामान्य कानून अधिकार क्षेत्र में टॉर्ट सिविल कानून है। इसमें किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को हुई क्षति शामिल है, जो उस व्यक्ति के प्रति कानूनी दायित्व बनाता है जिसने दूसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाया है। पीड़ित व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से नुकसान का दावा कर सकता है जिसने एक टॉर्टीयस कार्य किया है। इसमें लापरवाही, अतिचार (ट्रेसपास), निजता (प्राइवेसी) के हनन जैसे कार्य शामिल हो सकते हैं। अधिकांश टॉर्ट कानून असंहिताबद्ध (अनकोडीफाइड) है और इसे विनियमित (रेगुलेट) करने वाला कोई प्रमुख क़ानून नहीं है।

  • पारिवारिक कानून

पारिवारिक कानून घरेलू संबंधों को नियंत्रित करने वाला कानून है। यह पारिवारिक वैवाहिक मामलों में कानूनों को नियंत्रित करता है। इसमें गोद लेना, वसीयतनामा, तलाक, शादी आदि जैसे मामले शामिल हैं, पारिवारिक मामले पक्षों की पसंद के अनुसार उचित अदालती कार्यवाही या मध्यस्थता (मिडिएशन) के द्वारा हल किए जा सकते हैं। पारिवारिक कानून कई कानूनों द्वारा शासित होता है जैसे – हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; विशेष विवाह अधिनियम, 1954; पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1839; मुस्लिम विवाह विघटन (डिजोल्यूशन) अधिनियम, 1939; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1925

  • प्रशासनिक कानून

प्रशासनिक कानून सिविल कानून का विभाजन है, जो सरकार की शाखाओं की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। प्रशासनिक कानून कार्यकारी (एग्जिक्यूटिव) शाखा नियम बनाने, निर्णय लेने या कानूनों के प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) से संबंधित है। सिविल कानून वाले देशों में विशेष प्रशासनिक न्यायालय होते हैं, जो इन निर्णयों की समीक्षा (रिव्यू) करते हैं। प्रशासनिक कानून सरकार की इकाइयों के लिए निर्णय लेने से संबंधित है।

  • व्यापार/ कॉर्पोरेट/ वाणिज्यिक (कमर्शियल) कानून

व्यापार कानून वे कानून हैं जो व्यापार और वाणिज्य के इर्द-गिर्द घूमते हैं। सिविल कानून की यह शाखा सार्वजनिक और निजी दोनों कानूनों से संबंधित है। यह वाणिज्य और व्यवसाय से संबंधित अधिकारों, विनियमों, कानूनों और कर्तव्यों को लागू करता है। सिविल कानून का कॉर्पोरेट खंड कंपनियों से संबंधित कानूनों के लिए जिम्मेदार है। यह व्यवसाय या कंपनी के गठन, विघटन, निवेश को नियंत्रित करता है। व्यवसाय और कॉर्पोरेट कानूनों को विनियमित करने वाले कुछ कानून कंपनी अधिनियम, 1956, माल की बिक्री अधिनियम, 1930, सरफेसी अधिनियम, 2002, भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 हैं।

सिविल कानून की कई और शाखाएँ हैं जो आमतौर पर कानूनी पेशे में देखी जाती हैं जैसे कर कानून, संपत्ति कानून, मीडिया / मनोरंजन कानून, खेल कानून आदि।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और सिविल कानून

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 वह कानून है जो सिविल कार्यवाही की प्रक्रिया को बताता है। एक मामले की स्थापना को सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) और सिविल कानून से संबंधित अन्य प्रक्रियाओं में समझाया गया है। संहिता को दो भागों में विभाजित किया गया है- पहला जिसमें 158 धारा हैं और दूसरे भाग में पहली अनुसूची (शेड्यूल) है, जिसमें 51 आदेश और नियम हैं। न्यायालय में कार्रवाई करने के लिए सिविल कानून के तहत सभी कार्यवाही सीपीसी के अनुसार होनी चाहिए। सिविल मुकदमेबाजी के लिए सीपीसी एक महत्वपूर्ण उपकरण है। सिविल कानून में विशेषज्ञता के लिए उभरते वकीलों को इससे अच्छी तरह वाकिफ होना चाहिए।

आपराधिक कानून

आपराधिक कानून वह कानून है जो अपराध और उसके दंड से संबंधित है। आपराधिक कानून उन अपराधों से संबंधित है जो पारंपरिक समाज के खिलाफ हैं। यह अपराध की बुरी प्रकृति के कारण राज्य के खिलाफ अपराध है और समाज के प्रत्येक सदस्य को किए गए जघन्य (हीनियस) अपराध और आरोपी को दी जाने वाली समान सजा के बारे में पता होना चाहिए। सिविल कानून के बजाय आपराधिक कानून के मामले में पर्याप्त जागरूकता होनी चाहिए। आपराधिक कानून में ऐसे कार्य होते हैं जो किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य या संपत्ति को हानिकारक या अन्यथा खतरे में डालते हैं। आपराधिक कानून विवाद को सुलझाने से ज्यादा सजा और प्रतिशोध (रेट्रीब्यूशिन) पर केंद्रित है जैसा कि सिविल कानून में देखा गया है। आपराधिक कानून के तहत गठित कार्य सिविल कानून की तुलना में गंभीर हैं क्योंकि क्षति और चोट किसी व्यक्ति को इस तरह से होती है जो समाज के लिए कल्पना करने और जीने के लिए बहुत ही भयानक हो सकती है।

आपराधिक कानून की विशेषताएं

  1. आपराधिक कानून के तहत मामलों की सुनवाई आपराधिक अदालतों या सत्र (सेशन) न्यायालय के द्वारा की जाती है।
  2. अपराधी को दंड प्रदान करके किसी व्यक्ति को हुई क्षति को उचित ठहराया जाता है।
  3. यह सार्वजनिक हित के खिलाफ सार्वजनिक अपराध बनाता है न कि निजी दायित्व।
  4. यह जनता के अधिकारों का हनन है।

आपराधिक कानून के तहत अधिनियम

सिविल कानून के विपरीत, आपराधिक कानून कई शाखाओं में विभाजित नहीं है, लेकिन इसमें कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक और नियामक अधिनियम हैं, जिन्हें आपराधिक मामले के रूप में माना जाना आवश्यक है। ये अधिनियम आपराधिक कार्यों के लिए सभी नियमों और विनियमों को नियंत्रित करते हैं। आपराधिक कानून के तहत निम्नलिखित अधिनियम हैं-

  • भारतीय दंड संहिता, 1860

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) भारत में आपराधिक कानून की आधिकारिक संहिता है। आईपीसी भारत का मूल कानून है। इस संहिता में वे सभी अपराध शामिल हैं जो भारत में अपराध के रूप में गठित हैं। यह सभी अपराधों, उनके आवश्यक तत्वों और उसी के लिए उल्लिखित दंड की व्याख्या करता है। भारत के इतिहास में अब तक किए गए हर अपराध का उल्लेख इस संहिता के तहत किया गया है। यह संहिता भारत के प्रथम विधि आयोग की सिफारिशों द्वारा बनाई गई थी। संहिता में कुल 23 अध्याय और 511 धारा हैं।

  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973

आपराधिक कानून की प्रक्रिया का उल्लेख दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में किया गया है। यह मूल कानूनों के प्रक्रियात्मक प्रशासन को नियंत्रित करता है। यह अपराध की जांच, अपराध की आशंका, साक्ष्य एकत्र करने, दोषी या निर्दोष के लिए दिशा-निर्देश और सजा की दिशा में भी जानकारी और प्रक्रिया प्रदान करता है। इस अधिनियम में 565 धाराएं, 5 अनुसूचियां और 56 फॉर्म हैं।

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872

साक्ष्य अधिनियम, 1872 कानून की अदालत में साक्ष्य की स्वीकार्यता का प्रावधान करता है। इसमें उल्लेख किया गया है कि किस तरह से साक्ष्य एकत्र किए जाते हैं और किस प्रकार के स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद हैं। साक्ष्य अधिनियम में तथ्यों की प्रासंगिकता और किसी अपराध के अस्तित्व को साबित करने में एक महत्वपूर्ण तत्व कैसे हो सकता है, के बारे में विवरण का भी उल्लेख है। यह किए गए तथ्यों की श्रृंखला और इसके बीच दर्ज किए गए सभी साक्ष्यों को अत्यधिक महत्व देता है। इसमें कुल 167 धाराएँ हैं।

सिविल कानून और आपराधिक कानून के बीच अंतर

अनुक्रमांक संख्या मापदंड (पैरामीटर्स) सिविल कानून आपराधिक कानून
अर्थ सिविल कानून व्यक्तियों से संबंधित कार्यों से संबंधित है जिसके कारण हुए नुकसान को मुआवजे या मौद्रिक राहत द्वारा चुकाया जा सकता है। आपराधिक कानून एक ऐसे अपराध से संबंधित है जो किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है, जो समाज के खिलाफ भी अपराध है। किए गए अपराध की राहत उस व्यक्ति को कारावास देना है।
2. दायित्व यह किसी व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध एक निजी दायित्व बनाता है। यह समाज और पीड़ित के खिलाफ तैयारी करने वाले के लिए एक दायित्व बनाता है।
3. सजा ज्यादातर मामलों में नुकसान के खिलाफ आर्थिक राहत प्रदान करके न्याय दिया जाता है। आरोपी को एक अवधि के लिए कारावास या जुर्माना या दोनों प्रदान करके न्याय दिया जाता है।
4. विचारणीय सिविल कानून के तहत मामले सिविल कोर्ट या न्यायाधिकरण के तहत विचारणीय हैं। आपराधिक कानून के तहत मामलों की सुनवाई आपराधिक न्यायालय या सत्र न्यायालय के तहत की जाती है।
5. उद्देश्य सिविल कानून का उद्देश्य व्यक्तियों के बीच विवाद समाधान है। आपराधिक कानून का उद्देश्य आरोपी को दंडित करके पीड़ित को न्याय प्रदान करना है।
6. प्रक्रियात्मक कानून सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973
7. अपराधों की गंभीरता आपराधिक से कम गंभीर है। सिविल से अधिक गंभीर है।
8. मामला दर्ज करना सिविल मामलों में पीड़ित पक्ष मामला दर्ज करता है। आपराधिक मामलों में, सरकार पीड़ित की ओर से मामला दर्ज करती है। 
9. पंजीकरण आम तौर पर सिविल मामलों में, मामला सीधे अदालत में दर्ज किया जा सकता है। आपराधिक मामलों में, मामले को सीधे अदालत के समक्ष पुलिस कार्यालय में दर्ज करने की आवश्यकता होती है।
10. उल्लंघन निजी अधिकारों का उल्लंघन है। सार्वजनिक अधिकारों का उल्लंघन है।
11. शाखा कॉर्पोरेट कानून, परिवार कानून, संपत्ति कानून, मीडिया कानून, खेल कानून आदि। इस तरह का कोई विभाजन नहीं है।
12. कार्य के उदाहरण लापरवाही, गोपनीयता का हनन, अतिचार आदि। हत्या, बलात्कार, अपहरण, चोरी आदि।

निष्कर्ष

सिविल और आपराधिक कानून के बीच एक अनिश्चित अंतर है। कानून की सबसे महत्वपूर्ण शाखा होने के कारण दोनों के अपने विशिष्ट नियम हैं। सिविल और आपराधिक कानूनों को मजबूत कानून और प्रक्रियात्मक कानूनों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सिविल कानून में विवाद समाधान तंत्र होता है जबकि आपराधिक कानून में प्रतिशोध तंत्र होता है। कानून की ये दो शाखाएं कानून के अधिकांश हिस्सों को कवर करती हैं। अपने बीच चयन करने के इच्छुक लोग किसी को भी चुन सकते हैं क्योंकि वे हमारे देश के प्रभावी कामकाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। सिविल कानून की शाखाएं आपराधिक कानून की तुलना में अधिक विविध हैं। जैसा कि हमने देखा, सिविल कानून में कई विभाजन हैं, इसमें संपत्ति कानून, कॉर्पोरेट कानून, व्यापार कानून और बहुत कुछ शामिल हैं। सिविल कानून की कुछ शाखाएं असंहिताबद्ध हैं, जैसे कि टॉर्ट, लेकिन आपराधिक कानून के तहत लगभग सभी कानूनों और विनियमों को संहिताबद्ध किया जाता है, इसलिए प्रत्येक बिंदु जो दोनों कानूनों को अलग करता है और हमारे देश के लिए काम करने और अपराध को कुशलता से खत्म करने के लिए पूर्ण मशीनरी बनाता है।

संदर्भ

 

  

आवश्यकता के सिद्धांत

यह लेख उस्मानिया विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज ऑफ लॉ से बीए.एलएलबी कर रही R Sai Gayatri द्वारा लिखा गया है। यह लेख आवश्यकता के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ नेसेसिटी), इसकी परिभाषा, इतिहास, अपवाद, भारतीय आपराधिक कानून में इसकी स्थिति और इसके न्यायिक दृष्टिकोण से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय 

आवश्यकता कोई कानून नहीं जानता।” – ईसप।

“निमो इन प्रोप्रिया कॉसा जूडेक्स, एस्से डेबेट” एक लैटिन कहावत है जिसमें कहा गया है कि किसी को भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बनाया जाना चाहिए। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों में से एक है। उपरोक्त कहावत यह भी कहती है कि यदि किसी व्यक्ति को निर्णय लेने का अधिकार और शक्ति प्रदान की जाती है तो उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह (प्रिजुडिस) के, निष्पक्ष तरीके से कार्य करना चाहिए।

उदाहरण के लिए, यदि जॉन ने रॉन का कीमती सामान चुरा लिया और बाद में जॉन को खुद यह तय करने के लिए अपने आप को न्यायाधीश बनाया गया कि उसने रॉन का कीमती सामान चुराया है या नहीं। जाहिर है जॉन मामले का फैसला अपने पक्ष में करेगा और खुद को बेगुनाह साबित करेगा। यह न्याय के उद्देश्य को ही विफल कर देता है, इसलिए, ऐसे गंभीर मामलों पर अंकुश लगाने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत मौजूद हैं। पूर्वाग्रह के खिलाफ नियम, इस धारणा पर आधारित है कि यह मानव मनोविज्ञान के खिलाफ है कि वह अपने हित के खिलाफ मामला तय करे।

पक्षपात या पूर्वाग्रह मूल रूप से किसी भी तत्व को संदर्भित करता है जो किसी व्यक्ति को मामले की स्थिति के बारे में अपनी खुद की आशंकाओं के पक्ष में या उनके खिलाफ निर्णय लेने के लिए प्रभावित करता है। इस प्रकार, वर्तमान मामले का निर्णय केवल साक्ष्य के आधार पर नहीं किया जाता है। इस प्रकार नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों में पूर्वाग्रह के विरुद्ध नियम शामिल है। उक्त नियम उन तत्वों को समाप्त करता है जो किसी विशेष मामले में निर्णय लेते समय न्यायाधीश को गलत तरीके से प्रभावित करते हैं। हालांकि, आवश्यकता के सिद्धांत को पूर्वाग्रह के खिलाफ नियम का अपवाद माना जाता है। आइए इस लेख के माध्यम से आवश्यकता के सिद्धांत के बारे में और अधिक समझें।

आवश्यकता के सिद्धांत को समझना

नैसर्गिक/प्राकृतिक न्याय (नेचरल जस्टिस) के सिद्धांत सबसे बुनियादी कानूनी मानदंड (पैरामीटर्स) हैं जिन पर जब भी किसी न्यायालय को निर्णय लेना होता है तो उन पर विचार किया जाता है। हालाँकि, जब प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों में से एक की बात आती है, यानी पूर्वाग्रह के खिलाफ नियम, तो यहां एक अपवाद मौजूद है और वह आवश्यकता का सिद्धांत है। आवश्यकता का सिद्धांत कानूनी अधिकारियों को निम्नलिखित तरीके से कार्य करने में सक्षम बनाता है – 

  • कुछ ऐसे कार्य करना जो एक विशेष क्षण में करना जरूरी बन जाता है, और जहा ऐसे कार्यों को सामान्य कानूनी स्थिति में कानून के दायरे से अलग नहीं माना जाएगा।
  • आवश्यकता के सिद्धांत को केवल ऐसी परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है  जहां किसी मामले के संबंध में निर्णय लेने के लिए एक निर्धारण प्राधिकारी (डिटरमाइनिंग अथॉरिटी) की अनुपस्थिति है।

ऐसी स्थिति में जहां किसी व्यक्ति को किसी मामले के संबंध में पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करने या मामले को स्वयं रद्द करने का विकल्प दिया जाता है, ऐसे समय उसे पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्रवाई करने को वरीयता (प्रिफरेंस) दी जाएगी, भले ही इससे निर्णायक प्राधिकरण (अथॉरिटी) के पूर्वाग्रह का निर्णय प्रभावित हो सकता है। उपरोक्त स्थिति के समान मामलों में, पूर्वाग्रह के खिलाफ नियम आवश्यकता के नियम से पराजित होता है। यहां एकमात्र शर्त यह है कि इस तरह के निर्णय लेने वाले प्राधिकारी को मामले को अनिवार्य रूप से समाप्त करना चाहिए।

आवश्यकता के सिद्धांत का इतिहास

आवश्यकता के सिद्धांत की जड़ें मध्यकालीन न्यायविद हेनरी डी ब्रेक्टन के लेखन में हैं। उन्होंने कहा कि “जो अन्यथा वैध नहीं है उसे आवश्यकता से वैध बना दिया जाता है”। बाद में फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान बनाम मौलवी तमीजुद्दीन खान (1955) का विवादास्पद मामला पाकिस्तान की न्यायपालिका के सामने आया था।

इस मामले में, पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश यानी मुहम्मद मुनीर ने गवर्नर-जनरल, गुलाम मोहम्मद द्वारा आपातकालीन शक्तियों के अतिरिक्त-संवैधानिक उपयोग को कानूनी रूप से मान्य किया था। इसके अलावा, पाकिस्तान के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने हेनरी डी ब्रैक्टन की ऊपर बताई गई उक्ति (मैक्सिम) का उल्लेख किया और इस प्रकार आवश्यकता के सिद्धांत को लागू किया। फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान बनाम मौलवी तमीजुद्दीन खान (1955) के मामले ने विभिन्न अन्य राष्ट्रमंडल देशों द्वारा आवश्यकता के सिद्धांत के उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन, इस सिद्धांत को लागू करने में शर्त यह है कि पूर्वाग्रह के प्रयोग से भी न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि न्याय किया गया है। इसलिए, आवश्यकता का सिद्धांत नेमो जुडेक्स इन कोसा सुआ के सिद्धांत का अपवाद है।

जब भारत के मामले की बात आती है, तो गुल्लापल्ली नागेश्वर राव बनाम एपीआरटीसी (1958) का ऐतिहासिक मामला, आवश्यकता के सिद्धांत को लागू करने के लिए जाना जाता है। उक्त सिद्धांत को बाद में भारत के चुनाव आयोग बनाम डॉ सुब्रमण्यम स्वामी (1996) के मामले के माध्यम से पूर्ण आवश्यकता के सिद्धांत में संशोधित किया गया था, जिसमें अदालत ने यह माना था कि आवश्यकता के सिद्धांत को केवल पूर्ण आवश्यकता के मामलों में ही लागू किया जाएगा। 

आवश्यकता के सिद्धांत के अपवाद

आवश्यकता का सिद्धांत निर्णायकों (एडज्यूडिकेटर) को पूर्वाग्रह से बचाता है। हालांकि, उक्त सिद्धांत हर मामले को तय करने में पूर्वाग्रह के बहाने, इस्तेमाल करने का लाइसेंस नहीं देता है। इसका अर्थ यह है कि आवश्यकता का सिद्धांत ऐसे निर्णायकों को अयोग्य ठहराता है जो निर्णय लेते समय पूर्वाग्रह का सहारा लेते हैं। लेकिन, कुछ अपवाद हैं जिनमें न्याय निर्णायक द्वारा दिए गए ऐसे पक्षपातपूर्ण निर्णय मान्य किए जाते हैं। अपवाद इस प्रकार हैं-

  • जब मध्यस्थता के लिए किसी अन्य सक्षम व्यक्ति की उपलब्धता नहीं है। 
  • जहा एक निर्णायक के अभाव में कोरम का गठन नहीं किया जा सकता है।
  • जहा एक और सक्षम न्यायाधिकरण स्थापित करने की कोई संभावना नहीं है।

यदि प्रत्येक कानूनी मामले में आवश्यकता के सिद्धांत को लागू किया जाता है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि यह चूक करने वाले पक्ष के पक्ष में होगा। इसके साथ ही, यदि आवश्यकता के सिद्धांत को पूरी तरह से त्याग दिया जाता है तो यह निर्णय को समाप्त कर देगा जिससे किसी भी पक्ष को कोई न्याय नहीं मिलेगा।

आवश्यकता के सिद्धांत को लागू करने से पहले किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए यह गंभीर रूप से विश्लेषण करना उचित है कि क्या उक्त सिद्धांत को वास्तव में लागू करने की आवश्यकता है या नहीं। यह निर्णय लेने की शक्ति को मजबूत और बेहतर बनाता है। आवश्यकता का सिद्धांत पक्षों को अदालत में प्रशासनिक कार्यों को चुनौती देने और सवाल करने में सक्षम बनाता है। लेकिन एक प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता तय करते समय यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब तक पूर्व निर्धारित अवधारणाएं उनके दिमाग में न्यायाधीश के पूर्वाग्रह को प्रभावित करने में सक्षम नहीं हैं, तब तक ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत आवश्यकता का सिद्धांत

आवश्यकता का सिद्धांत भारतीय आपराधिक कानून में पाया जा सकता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 के अध्याय IV में धारा 76 से 106 के तहत ‘सामान्य अपवाद’ के प्रावधान शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति अध्याय-IV में बताए गए अपवादों या परिस्थितियों में से कोई भी अपराध करता है, तो ऐसे व्यक्ति को आपराधिक दायित्व से छूट दी गई है। ऐसे में व्यक्ति को किसी सजा का सामना नहीं करना पड़ेगा। आवश्यकता के सिद्धांत को भी आईपीसी की धारा 81 के तहत ऐसे सामान्य अपवादों में शामिल किया गया है।

आईपीसी की धारा 81 ऐसे कृत्यों के बारे में बात करती है जिनसे नुकसान होने की संभावना है लेकिन जहां ऐसे कार्य, किसी आपराधिक इरादे के बिना, नुकसान पहुंचाने के लिए किए जाते हैं। किसी व्यक्ति या किसी संपत्ति को किसी भी प्रकार के और नुकसान से बचने या रोकने के लिए इस तरह का कार्य भी सद्भावपूर्वक किया जाना चाहिए। हालांकि, ऐसा कार्य करने के जोखिम को प्रत्येक स्थिति की प्रकृति और आवश्यकता के विरुद्ध तोला जाएगा।

एक हानिकारक स्थिति को रोकने के मामले में, एक व्यक्ति को दो विकल्प दिए जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप किसी न किसी तरह से नुकसान होता है। ऐसी स्थिति में, अधिक से अधिक नुकसान से बचने या रोकने के लिए, एक व्यक्ति अत्यधिक आवश्यकता के कारण एक ऐसा कार्य करने के लिए मजबूर होता है जिसे अन्यथा अपराध माना जाएगा। सरल शब्दों में, व्यक्ति को दो बुराइयों के बीच चयन करने की आवश्यकता होती है और आवश्यकता के सिद्धांत को लागू करने के लिए उन्हें कम बुरे विकल्प का चयन करना चाहिए।

आवश्यकता के सिद्धांत के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण

रेजिना बनाम डुडले और स्टीफेंस (1884)

इस मामले में थॉमस डुडले और एडविन स्टीफेंस प्रतिवादी थे। उक्त प्रतिवादी और रिचर्ड पार्कर नाम के एक केबिन बॉय को जहाज़ की तबाही के कारण बिना भोजन और पानी के एक नाव में डाल दिया गया था। बाद में, अठारहवें दिन, जब वे तीनों सात दिनों तक बिना भोजन के रहे और पांच दिनों तक बिना पानी के रहे, डुडले ने स्टीफन को प्रस्ताव दिया कि बाकी को बचाने के लिए एक को मौत के घाट उतार दिया जाना चाहिए। तदनुसार, उन्होंने फैसला किया कि पार्कर को मारना बेहतर होगा ताकि वे अपनी जान बचा सकें। बीसवें दिन, डूडले और स्टीफेंस दोनों ने पार्कर को मार डाला और चार दिनों तक उसका मांस खाया। बाद में, एक जहाज ने उन्हें बचाया और उन पर रिचर्ड पार्कर की हत्या करने का आरोप लगाया गया।

अदालत ने कहा कि अपनी जान बचाने के लिए एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या करना, हत्या को उचित नहीं ठहराता, भले ही यह भूख की अत्यधिक आवश्यकता के तहत किया गया हो। इसके बाद, प्रतिवादियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, हालांकि, बाद में इसे छह महीने के कारावास में घटा दिया गया था।

संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम होम्स (1842)

इस मामले में, ‘विलियम ब्राउन’ नाम का एक अमेरिकी जहाज, जिसमें 65 यात्री और चालक दल के 17 सदस्य थे, एक हिमखंड (आइसबर्ग) से टकराया और तेजी से डूब गया। नतीजतन, लंबी नाव तूफानी समुद्र में बह गई। नाव को डूबने से बचाने के लिए चालक दल के सदस्यों ने कुछ यात्रियों को पानी में फेंक दिया। बाद में, जब चालक दल के सदस्यों में से एक के मुकदमे के लिए मामला सामने आया, तो अदालत ने माना कि आवश्यकता की ऐसी स्थितियों को आपराधिक हत्या के आरोप के खिलाफ बचाव माना जा सकता है। हालांकि, अदालत ने कहा कि जिन लोगों की बलि दी जाती है, उन्हें उपस्थित लोगों के समूह के आधार पर उचित रूप से चुना जाना चाहिए।

रेक्स बनाम बॉर्न (1938)

इस मामले में पांच जवानों द्वारा, बलात्कार (रेप) के बाद 14 साल की एक बच्ची गर्भवती हो गई। प्रतिवादी स्त्री रोग विशेषज्ञ था। उसने लड़की के माता-पिता की सहमति से गर्भपात कर दिया क्योंकि उसका मानना ​​था कि अगर बलात्कार पीड़िता को जन्म देने की अनुमति दी गई तो उसकी मृत्यु हो सकती है। मामले के तथ्यों को सुनने के बाद, अदालत ने प्रतिवादी को अवैध रूप से गर्भपात कराने के अपराध का दोषी नहीं ठहराया। प्रतिवादी को दोषी नहीं पाया गया क्योंकि उसने स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए नेकनीयती से काम किया था।

टाटा सेल्युलर बनाम भारत संघ (1994)

इस मामले में, भारत सरकार ने सभी मोबाइल ऑपरेटरों को चार मेट्रो शहरों यानी चेन्नई, बॉम्बे, कलकत्ता और दिल्ली में अपने नेटवर्क स्थापित करने के लिए निमंत्रण जारी किया। मूल्यांकन (ईवैल्यूएशन) समिति को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के तहत निविदाओं का अवलोकन (परस्यू) और मूल्यांकन करना था, जिसमें दूरसंचार महानिदेशक था। मूल्यांकन प्रक्रिया के अंत में महानिदेशक (डायरेक्टर) के बेटे की निविदा (टेंडर) का चयन किया गया था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘निमो जूडेक्स इन कॉसा सुआ’ के उल्लंघन को मंजूरी नहीं दी और कहा की संचार महानिदेशक के बिना किसी भी निविदा का चयन नहीं किया जा सकता है और निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। प्रतिस्थापन (सबस्टिट्यूशन) का कोई विकल्प नहीं था और इस प्रकार निर्णय को रद्द करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय उत्तरदायी नहीं था। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आवश्यकता के सिद्धांत को उदारतापूर्वक (लिबरली) लागू किया।

भारत निर्वाचन आयोग बनाम डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी (1996)

इस मामले में, यह माना गया था कि यदि मुख्य चुनाव आयोग पूर्वाग्रह की संभावना पर जोर देता है तो उनकी भागीदारी अनिवार्य नहीं है और इसी तरह आवश्यकता का सिद्धांत लागू नहीं होगा। हालाँकि, उनके लिए एक उचित पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया था जिसमें वे एक बैठक बुला सकते थे और बैठक से हट सकते थे जिससे निर्णय लेने के लिए आयोग के अन्य सदस्यों को छोड़ दिया गया था। आवश्यकता के सिद्धांत को केवल उन मामलों में लागू किया जाएगा जहां उनके बीच संघर्ष है। इसलिए, इस मामले में, आवश्यकता के सिद्धांत को पूर्ण आवश्यकता के सिद्धांत में बदल दिया गया था, जिसने बदले में यह स्थापित किया कि उक्त सिद्धांत केवल पूर्ण आवश्यकता के मामलों में ही लागू किया जा सकता है।

निष्कर्ष

आवश्यकता का सिद्धांत ‘निमो जूडेक्स इन कॉसा सुआ’ के सिद्धांत का अपवाद है। उक्त सिद्धांत के अनुसार, पूर्वाग्रह के आधार पर, एक प्राधिकारी अयोग्य होने के लिए उत्तरदायी है। जब आवश्यकता के सिद्धांत को लागू किया जाता है, तो यह एक बचाव के रूप में कार्य करता है, भले ही निर्णय को निष्पक्ष और वैध बनाते हुए कानून का उल्लंघन हो। हालाँकि, उक्त सिद्धांत को केवल कुछ स्थितियों में लागू किया जा सकता है, जिसमें यदि सिद्धांत को लागू नहीं किया जाता है, तो यह मामले को पूरी तरह से समाप्त कर देगा जिससे अधिक नुकसान होगा। इसके अलावा, उक्त सिद्धांत को हर मामले में लागू नहीं किया जा सकता है, अर्थात, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि उक्त सिद्धांत केवल पूर्ण आवश्यकता के मामले में ही लागू किया जा सकता है।

संदर्भ

 

एक्शियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना: कानूनी कहावत 

यह लेख महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, फैकल्टी ऑफ लॉ, वडोदरा से बीए एलएलबी की छात्रा Meera Patel ने लिखा है। यह लेख कानूनी कहावत, एक्शियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना कार्रवाई के एक व्यक्तिगत अधिकार को संदर्भित करता है जो व्यक्ति के साथ खत्म हो जाता है। यह लेख आपको उपरोक्त कानूनी कहावत के बारे में जानने के लिए आवश्यक सब कुछ बताता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

जब कानून और कानूनी साहित्य की बात आती है, तो एक बहुत ही संक्षिप्त और सटीक अभिव्यक्ति जो किसी भी कानून या कानूनी नीति के मूल सिद्धांत को दर्शाती है, उसे कानूनी कहावत के रूप में जाना जाता है। ये कानूनी सिद्धांत शिक्षाशास्त्र (पेडागॉजी)  हैं और अक्सर लोगों द्वारा साहित्य को समझने में आसान और सटीक बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। मैक्सिम शब्द लैटिन शब्द ‘मैक्सिमा’ से लिया गया है। आमतौर पर, ये कानूनी कहावतें हमें लैटिन भाषा में मिलती हैं क्योंकि इनमें से अधिकांश कहावतें मध्यकालीन युग (मेडिवल एरा) के दौरान विभिन्न यूरोपीय राज्यों से उत्पन्न हुई थीं। इन राज्यों में लैटिन का इस्तेमाल अपनी कानूनी भाषा के रूप में किया जाता है। भारत के संविधान की विभिन्न विशेषताएं दुनिया भर के देशों से उधार ली गई हैं और उनमें से अधिकांश देश यूरोप से हैं। यह बताता है कि अधिकांश कानूनी कहावतें लैटिन भाषा में क्यों हैं।

ये नियम/सिद्धांत सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) हैं और हर जगह समान अर्थ रखते हैं। दुनिया भर के न्यायालय इन कानूनी सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होते हैं क्योंकि वे उन्हें अधिक स्पष्ट अर्थों में कानूनों की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) को समझने में मदद करते हैं। ये कहावतें अच्छे निर्णय के लिए एक अच्छा आधार बनाती हैं। इसके पीछे कारण यह है कि ये कहावतें आधिकारिक कानून नहीं हैं और इन कहावतों को मामलों में लागू करना व्यर्थ हो सकता है, वे स्वचालित रूप से अदालतों द्वारा पेश किए गए निर्णयों के लिए एक अच्छी समर्थन प्रणाली बन जाती हैं। यह लेख कानूनी कहावत “एक्शियो पर्सनेलिस  मोरिटर कम पर्सोना” के बारे में और दुनिया भर में विभिन्न मामलों में इसका उपयोग कैसे किया गया है, पर बात करता है।

इस कहावत का मतलब क्या है?

एक्शियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना का साधारण शब्दों में अर्थ है ‘कार्रवाई का एक व्यक्तिगत अधिकार व्यक्ति के साथ खत्म हो जाता है’।

  • एक्शियो का अर्थ ‘एक कार्य’ या ‘एक क्रिया’ है।
  • पर्सनेलिस का मतलब ‘व्यक्तिगत’ है।
  • मोरिटर का मतलब ‘मौत’ है।
  • कम का अर्थ ‘साथ’ है।
  • पर्सोना का मतलब ‘व्यक्ति’ है।

आम आदमी के शब्दों में, व्यक्ति की मृत्यु के साथ एक व्यक्तिगत अधिकार और/या कार्रवाई करने का कारण खत्म हो जाता है। इससे पहले, सभी प्रकार की कार्रवाइयां जिनमें विशेष रूप से असिमित हर्जाने के लिए कार्रवाइयां शामिल होती हैं, या हम कह सकते हैं कि व्यक्ति की मृत्यु होते ही टॉर्ट और अनुबंध की कार्रवाई समाप्त हो जाती है। उनके कर्तव्य, साथ ही उपचार, उनकी मृत्यु पर समाप्त कर दिए जाते हैं, लेकिन चूंकि विविध प्रावधान अधिनियम, 1934 के कानूनों में सुधार किया गया था, इसलिए यह कहा गया है कि, “किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसमें निहित कार्यों के सभी कारण उसकी संपत्ति के लाभ के लिए जीवित रहेंगे।”

इस प्रकार, अब हम जानते हैं कि इस कहावत का मुख्य नियम यह है कि सभी कर्तव्य और उपचार व्यक्ति के साथ समाप्त हो जाते हैं लेकिन मानहानि, हमला और व्यक्तिगत क्षति इस कानूनी कहावत के तीन बड़े अपवाद हैं।

व्याख्या

कानूनी कहावत की संपूर्ण अवधारणा को समझाने के लिए, हमें इस सिद्धांत की जड़ों को समझने की जरूरत है।

  • यह कहावत उद्धृत (कोट) की गई थी और इसे एक मामले के साहित्य में पाया गया था जिसे यूरोप में वर्ष 1496 में एक अदालत में सुना गया था। इस मामले में एक महिला के खिलाफ फैसला सुनाया गया था और उसे मानहानि के आरोप में दोषी ठहराया गया था। इससे पहले कि वह यातना देने वाले को हुए नुकसान के लिए बकाया राशि का भुगतान कर पाती, उसकी मृत्यु हो गई।
  • कानूनी कहावत के अनुसार, जैसे ही व्यक्ति की किसी चोट या घायल पक्ष  द्वारा मृत्यु होती है, वैसे ही टॉर्ट या अनुबंध की कार्रवाई खत्म हो जाती है। भले ही मानहानि पहले अपवाद नहीं थी, अब यह कार्रवाई का एक कानूनी कारण है जो किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद लाया जा सकता है यदि व्यक्ति को मानहानि, हमला या व्यक्तिगत क्षति का दोषी ठहराया जाता है।
  • ऊपर के समान नियम को लागू करते हुए यह भी कहा गया है कि यह कहावत उन कार्यों पर लागू की जा सकती है जो अनुबंधों के अनुसार किए जाते हैं और विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत प्रकृति पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, किसी से शादी करने का वादा। लेकिन एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इसके प्रयोग को सीमित कर दिया गया है और इसका प्रभाव केवल निंदा (लिबेल) से उत्पन्न होने वाले कार्यों तक ही सीमित है।
  • ऊपर उल्लिखित वैधानिक (स्टेच्यूटरी) अपवादों के अलावा, एक प्रावधान है जहां मृतक व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रतिनिधियों को कार्रवाई करने का अधिकार है यदि मृतक की निजी संपत्ति उनके जीवनकाल के दौरान खराब हो गई है। यहां एकमात्र नियम यह है कि मृतक व्यक्ति के लिए कार्रवाई करने वाले रिश्तेदारों को केवल तभी मुआवजा मिल सकता है जब मृतक को लापरवाही से या अतिचार (ट्रेसपास) से मारा गया हो।
  • अंग्रेजी कानून के अनुसार, इस कानूनी कहावत के सिद्धांत को शामिल किया गया है और यह किसी भी तरह से सामान्य कानूनी प्रणाली के लिए अजीब या असामान्य नहीं है।  इस कहावत की पूरी अवधारणा सार्वभौमिक कानून के तहत प्राथमिक स्तर पर आधारित है। जैसे-जैसे समय बीता है, हमने कानूनों को बदलते देखा है और ध्यान देने वाली मुख्य बात यह है कि इसके लिए न्यायिक समर्थन धीरे-धीरे सीमित कर दिया गया है और अब इसे कानून द्वारा और प्रतिबंधित किया जा रहा है। कानून द्वारा उपयोग किए जाने वाले इस नियम के लिए एक छत्र नियम की तरह एकमात्र नियम यह है कि यदि मृतक द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को या किसी और की संपत्ति को हानि पहुंचाई गई है, तो यह उचित है कि सभी पीड़ित की संतुष्टि के लिए असिमित नुकसान की भरपाई की जाए। इस नियम के साथ भी, यह कहना उचित है कि कार्रवाई उस व्यक्ति के साथ खत्म हो जाएगी जिसके साथ या जिसके द्वारा गलत किया गया था।

चित्रण (इलस्ट्रेशन)

  • ऐसी स्थिति में जहां तिथि, सौम्या पर बैटरी का अपराध करती है और यदि घटना के दौरान दोनों पक्षों में से किसी की मृत्यु हो जाती है, तो सौम्या के कार्यों का अधिकार इस तथ्य के कारण उत्पन्न हुआ कि तिथि ने उस पर बैटरी का अपराध किया, सौम्या को तिथि के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई भी अधिकार नहीं मिलेगा। लेकिन अगर तिथि सौम्या पर बैटरी का अपराध करती है और उसे अन्य चोटे पहुंचाती है, तो तीसरे व्यक्ति को मिलने वाली कार्रवाई का अधिकार बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होगा और इस मामले में कानूनी कहावत “एक्सियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना” का उपयोग किया जाएगा।
  • जनवरी के महीने में, व्यक्ति A सहमत होता है और व्यक्ति B की शादी में एक डांस शो करने के लिए एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है जो जुलाई के महीने में होगा। A जून में एक दुर्घटना के कारण शादी में शामिल नहीं हो सका। इस तरह, B भंग अनुबंध के लिए A या उनके कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता है।
  • सलोनी ने विश्वासघात किया और बृजेश से गलत तरीके से जमीन हथिया ली। इसके ठीक बाद सलोनी की मृत्यु हो जाती है और इसीलिए बृजेश को सलोनी के कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है।

मामले

नीचे सूचीबद्ध कुछ महत्वपूर्ण मामले हैं जिनमें इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया गया था:

  • गिरिजा नंदिनी देवी व अन्य बनाम बिजेंद्र नारायण चौधरी (1966) के मामले में अदालत ने देखा और कहा कि व्यक्तिगत कार्रवाई व्यक्ति के साथ खत्म हो जाती है और जब एक्सियो पर्सनेलिस  मोरिटर कम पर्सोना लागू किया गया था, तो यह माना गया था कि इस कानूनी कहावत का सीमित प्रयोग होगा। यह स्पष्ट किया गया था कि कलाकारों के कारण यह सिद्धांत कार्रवाई के एक सीमित वर्ग में संचालित होता है, जिसका अर्थ एक गलत से है जिसमें मानहानि, हमले या किसी अन्य व्यक्तिगत चोट के खिलाफ नुकसान के लिए कार्रवाई शामिल है, जो किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण नहीं बनती है और यह अन्य कार्यों के बराबर नहीं है जहां व्यक्ति की मृत्यु के बाद, दी गई राहत का आनंद नहीं लिया जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा, “विचार के लिए कार्रवाई नुकसान के लिए कार्रवाई नहीं है और यह गणना किए गए वर्गों में नहीं आती है और न ही ऐसा है कि वह मृत्यु के बाद व्यक्ति होने का आनंद नहीं ले सकता है, या इसे देना निरर्थक होगा। ”

  • हैम्बली बनाम ट्रॉट (1776) का मामला कहावत ऐक्सियो पर्सनैलिस मोरिटर कम पर्सोना के सिद्धांत के संस्थापक (फाउंडिंग) मामलों में से एक है। इस मामले में, प्रतिवादी की मृत्यु वादी से कुछ खेत जानवरों को हथियाने के बाद हुई थी। वादी ने तब मृतक की संपत्ति से उन जानवरों को फिर से प्राप्त करने का एक तरीका खोजा, लेकिन वादी अपनी इच्छानुसार ऐसा करने में सक्षम नहीं था, लेकिन साथ ही, न्यायालय ने कुछ नियम बनाए जिसके द्वारा किसी संपत्ति के खिलाफ कोई भी दावा सफल होगा। यह इस तथ्य के कारण था कि अतिचार विफल हो जाएगा क्योंकि यह व्यक्ति के खिलाफ था न की संपत्ति के खिलाफ इसलिए अनुबंध के लिए कोई भी कार्रवाई सफल होगी।
  • श्री रामेश्वर मांझी बनाम संग्रामगढ़ कोलियरी के प्रबंधन (1993) के मामले में, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने सुना था, यह माना गया था कि इस कहावत की सामान्य कानून के साथ-साथ इंग्लैंड में भी बहुत आलोचना हुई है। यह इस तथ्य के कारण है कि इसे एक अन्यायपूर्ण कानूनी कहावत के रूप में वर्गीकृत किया गया है क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति गलत और अस्पष्ट प्रकृति की है जो अंत में इसके प्रयोग को अनिश्चित बनाती है। अदालत ने यह भी कहा कि इस कहावत ने लोगों के साथ घोर अन्याय किया है।
  • वत्सला श्रीनिवासन बनाम श्यामला रघुनाथन (2016) के मामले में, अदालत ने कहा कि ऐसी घटना में जहां वसीयत के निष्पादक (एग्जिक्यूटर) की मृत्यु हो जाती है, यह कहावत उस कार्यवाही की जांच के लिए लागू नहीं होगी जो निष्पादक द्वारा उनकी मृत्यु से पहले शुरू की गई थी। ऐसी स्थितियों में, यदि कोई निष्पादक अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है, तो वसीयत के लाभार्थी या कोई भी व्यक्ति जो वसीयत का प्रतिनिधित्व करता है, वह हस्तक्षेप करने और शेष कार्यवाही को आगे बढ़ाने के हकदार हैं, जो कि संलग्न (एनेक्स्ड) के साथ प्रशासन के पत्रों में आधिकारिक संशोधन प्रार्थना के साथ कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं।
  • नूरानी जमाल और अन्य बनाम नारन श्रीनिवास राव और अन्य (1993) के मामले में, मोटर वाहन दुर्घटनाओं के संदर्भ में इस कहावत की प्रयोज्यता पर आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सामने चर्चा की गई थी। न्यायधीश की एकल पीठ (सिंगल बेंच) को इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ा कि क्या मोटर वाहन दुर्घटना के दौरान मृत्यु या चोट के बाद भी हर्जाने के दावे जीवित रहते हैं और क्या मृतक की संपत्ति को नुकसान होने पर कानूनी प्रतिनिधि कोई कार्रवाई कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत चोटों के लिए दावा करने वाले नुकसान की कार्रवाई मृत व्यक्ति के साथ खत्म नहीं होनी चाहिए। जहां मृतक व्यक्ति की संपत्ति का नुकसान होता है, वहां कहावत का उपयोग नहीं किया जाएगा।
  • मोटर वाहन दुर्घटनाओं से संबंधित एक समान उदाहरण मामला गुजरात राज्य सड़क परिवहन (ट्रांसपोर्ट) निगम अहमदाबाद बनाम रमनभाई प्रभातभाई (1987) का है जहां लापरवाही का कारक सामने आता है। याचिकाकर्ता के चालक की लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण, चौदह वर्ष के लड़के को परिणाम भुगतना पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के भाई ने एक मुकदमा दायर किया और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के सामने मुआवजे की मांग की और बाद में इस मामले की पुष्टि की गई और गुजरात उच्च न्यायालय के साथ-साथ भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समर्थित किया गया। न्यायालयों ने माना कि यह दलील कि जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई है, उस व्यक्ति के मरने के बाद उसके मुआवजे का अधिकार किसी और को दिया जा सकता है नहीं यह कानून के शासन द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और इसलिए निगम मृतक किशोर के भाई को मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।
  • प्रभाकर अडिगा बनाम गौरी और अन्य (2017) के मामले में, न्यायालय ने कहा कि, “आम तौर पर, व्यक्तिगत कार्रवाई एक व्यक्ति के साथ खत्म हो जाती है, लेकिन यह सिद्धांत सीमित प्रकार के कार्यों पर लागू होता है।” अदालत ने यह भी देखा कि एक्सियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना एक सिद्धांत है जिसका उपयोग अनुमान के रूप में किया जाता है जिसमें कहा गया है कि व्यक्तिगत कार्रवाई व्यक्ति के साथ खत्म हो जाती है और इसका सीमित अनुप्रयोग होता है। गिरिजा नंदिनी देवी और अन्य बनाम बिजेंद्र नारायण चौधरी के मामले का भी इस मामले में हवाला दिया गया था और यही कारण है कि अदालत ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत कार्रवाई के एक सीमित वर्ग में संचालित होता है जिसमें क्षति, हमले और अन्य प्रकार की व्यक्तिगत चोटे शामिल है जो अन्य ऐसे कार्यों के बराबर नहीं है जहां व्यक्ति की मृत्यु के बाद, दी गई राहत का आनंद नहीं लिया जा सकता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, कहावत एक्सियो पर्सनेलिस मोरिटर कम पर्सोना, साहित्यिक दृष्टि से इसका मतलब है कि कार्रवाई करने का व्यक्तिगत अधिकार व्यक्ति के साथ खत्म हो जाता है जैसा कि हमने विभिन्न मामलों के माध्यम से ऊपर चर्चा की है, लेकिन कई अदालतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उपरोक्त मामलो में अदालतों द्वारा बताए गए विभिन्न कारकों के कारण, इसका शाब्दिक अर्थ इसके आवेदन से अलग है और यही कारण है कि इस कहावत को समग्र रूप से अन्यायपूर्ण और अनुचित माना जाता है। 

संदर्भ

 

ई-कॉमर्स अनुबंधों के प्रकार : क्लिक रैप, श्रिंक रैप और ब्राउज रैप

यह लेख लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रेसोल्यूशन में डिप्लोमा करने वाले Chaitali Bagai द्वारा लिखा गया है। इस लेख का संपादन (एडिट) Anahita Arya (सीनियर एसोसिएट, लॉ​​सिखो) और Dipshi Swara (सीनियर एसोसिएट, लॉसिखो) ने किया है। इस लेख में ई कॉमर्स अनुबंधो के प्रकार क्लिक रैप श्रिंक रैप और ब्राउज रैप के बारे में चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

परिचय

  1. क्या आप जानते हैं कि आपने यह जाने बिना भी, अपनी कुर्सी पर बैठकर अमेज़न जैसी बड़ी कंपनी के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए होंगे?
  2. क्या आपने कभी किसी ऐप का उपयोग करने से पहले नियम और शर्तें स्वीकार की हैं?
  3. क्या आपने अनुबंध के बारे में जाने बिना “मैं सहमत हूं” पर क्लिक किया है?
  4. महामारी ने तकनीक की दुनिया में कई नवाचारों (इन्नोवेशंस) को जन्म दिया है और इस अवधि के दौरान नए व्यापार के मॉडल भी विकसित किए गए हैं। सब कुछ अब बस एक क्लिक पर हो सकता है, आप खाना ऑर्डर करना चाहते हैं- ज़ोमाटो, इलेक्ट्रॉनिक्स ऑर्डर करना चाहते हैं- अमेज़न, ग्रॉसरी ऑर्डर करना चाहते हैं- ग्रोफर्स। क्या आपने कभी सोचा है कि वे आपके साथ अनुबंध कैसे करते हैं? अनुबंध पर हस्ताक्षर करना भी इन दिनों एक क्लिक दूर है।

आइए यह समझने के लिए आगे पढ़ें कि ये विभिन्न प्रकार के अनुबंध क्या हैं और उनके बीच अंतर क्या हैं।

ई-अनुबंध

ई-अनुबंध पारंपरिक अनुबंधों के चचेरे भाई हैं, जो विदेश गए और नए इलेक्ट्रॉनिक्स और एक फैंसी नाम के साथ वापस आए। इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध डिजिटल संस्करण (डिजिटल वर्ज़न्स) में अनुबंध हैं और इन दिनों मांग में हैं। ई-अनुबंध नियमित अनुबंधों के समान हैं, केवल अंतर यह है कि वे संचार एक डिजिटल मोड के माध्यम से होते हैं जो ऑनलाइन है। ई-अनुबंध ने बिचौलियों की नौकरी खत्म कर दी है, क्यूंकि अब विक्रेता सीधे ग्राहकों तक पहुंचते हैं। बिचौलिए अब कंप्यूटर प्रोग्राम हैं, जो विक्रेता को इलेक्ट्रॉनिक एजेंट यानी ऐप और खरीदार को इलेक्ट्रॉनिक एजेंट से भी जोड़ते हैं। मूल रूप से, यह खरीदार और विक्रेता के मिलने के लिए एक मंच बनाता है।

क्या ई-अनुबंध बाध्यकारी और वैध हैं?

भारत में, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, धारा 10 में कहा गया है कि “सभी समझौते अनुबंध हैं यदि वे अनुबंध के लिए सक्षम पार्टियों की स्वतंत्र सहमति से, वैध प्रतिफल (कन्सिडरेशन) के लिए और वैध उद्देश्य के साथ किए गए हैं, और इसके द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित नहीं किए गए हैं।”

इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट), 2000 की धारा 10 (a) में कहा गया है कि “जहां एक अनुबंध के गठन में, प्रस्तावों का संचार, प्रस्तावों की स्वीकृति, प्रस्तावों का निरसन (रिपील) और स्वीकृति, जैसा भी मामला हो, इलेक्ट्रॉनिक रूप में व्यक्त किया जाता है या एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के माध्यम से किया जाता है, इस तरह के अनुबंध को केवल इस आधार पर अप्रवर्तनीय नहीं माना जाएगा कि इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक रूप या साधन का उपयोग उस उद्देश्य के लिए किया गया था।”

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस एक्ट), 1882 के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को भी हस्ताक्षर के प्रमाण के रूप में माना जाता है और डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र तब उत्पन्न होते हैं जब कोई दस्तावेज़ इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्ताक्षरित होता है और यह प्रमाण पत्र आईटी अधिनियम, 2000 के अनुसार कानूनी रूप से मान्य और बाध्यकारी भी होता है।

भारत में, अनुबंध भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 द्वारा शासित होते हैं, और इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध कानून की व्याख्या के भीतर मान्य होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक अनुबंधों की अनिवार्यताएं हैं-

  1. प्रस्ताव
  2. स्वीकार
  3. वैध प्रतिफल (कन्सिडरेशन)
  4. वैध वस्तु
  5. अनुबंध करने के लिए सक्षम पक्ष
  6. स्वतंत्र सहमति
  7. शर्तों की निश्चितता

ई-अनुबंध, कागजी दस्तावेजों के लिए एक विकल्प हैं जो महंगे और अक्षम (इनएफ़्फीशिएंट) होते हैं और इन्हें लंबी प्रक्रिया से बचने के लिए पसंद किया जाता हैं। दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध उपयोग करने के लिए कुशल हैं और इनका टर्नअराउंड समय लंबी कागजी कार्रवाई की तुलना में बहुत अधिक है। वास्तव में, ई-हस्ताक्षर भी बहुत समय और प्रयास बचाते हैं। इसलिए, ई-अनुबंध कानून द्वारा प्रवर्तनीय हैं और कानूनी रूप से वैध हैं, भले ही वे डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित और निष्पादित हों। हालांकि, क्लिक- रैप अनुबंधों के मामले में यह अलग है।

ई-अनुबंध के प्रकार

कुछ श्रिंक-रैप अनुबंध, क्लिक-रैप अनुबंध, ब्राउज-रैप अनुबंध, सोर्स-कोड एस्क्रो अनुबंध, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और लाइसेंसिंग एग्रीमेंट और कई अन्य, विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध हैं। यहां तीन अलग-अलग प्रकार के अनुबंध हैं-

1. श्रिंक-रैप अनुबंध-

इस अनुबंध का नाम सीडी-रोम की सिकुड़ी हुई रैप पैकेजिंग से आया है, जिसमें सॉफ्टवेयर वितरित किया जाता था। श्रिंक-रैप अनुबंध विभिन्न सॉफ़्टवेयर के लिए लाइसेंसिंग अनुबंध हैं। ये संपर्क लाइसेंस समझौते या बॉयलरप्लेट या नियम और शर्तें हैं, जो उत्पाद के साथ ही लिपटे हुए होते हैं। जब कोई ग्राहक उत्पाद का उपयोग करता है, तो इसका मतलब है कि उसने अनुबंध स्वीकार कर लिया है। श्रिंक रैप मूल रूप से उत्पाद के कवर पर किया जाने वाला प्लास्टिक रैपिंग है। श्रिंक रैप का इस्तेमाल ज्यादातर आईटी कंपनियां करती हैं। इस अनुबंध की सबसे दिलचस्प विशेषता यह है कि उत्पाद को वापस करके इस अनुबंध की स्वीकृति को वापस किया जा सकता है। इसके अलावा, इन दिनों लाइसेंसिंग अनुबंध उत्पाद के साथ वितरित नहीं किए जाते हैं, बल्कि यह सॉफ़्टवेयर स्थापित करने से पहले दिखाई देता है।

2. क्लिक-रैप अनुबंध-

क्या आपने किसी ऐप या सॉफ़्टवेयर का उपयोग करने के लिए लंबे टेक्स्ट, विस्तृत नियम और शर्तें देखी हैं, जिन्हें कोई नहीं पढ़ता है? हाँ, वे क्लिक रैप अनुबंध हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, पार्टी इस अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से बस एक क्लिक दूर होती है। उन्हें अनुबंध को स्वीकार करने के लिए बस एक बटन पर क्लिक करना होगा या एक बॉक्स को चेक करना होगा। मूल रूप से, उपयोगकर्ता को अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाता है अन्यथा वह आगे नहीं बढ़ पाता है और इसलिए वे बिल्कुल भी परक्राम्य (नेगोशिएबल) नहीं हैं। इससे संबंधित कुछ कानूनी मुद्दे हैं, जिन्हें बाद में कवर किया जाएगा।

3. ब्राउज-रैप अनुबंध-

क्या आपने इन पंक्तियों को देखा है जो “इन सेवाओं के अपने उपयोग को जारी रखते हुए, आप इसके नियम और शर्तों से सहमत होते हैं” या “साइन अप करके मैं उपयोग की शर्तों से सहमत हूं”?

ब्राउज रैप अनुबंध वेबपेज के निचले भाग में देखे जाते हैं और यदि ग्राहक एप्लिकेशन का उपयोग कर रहा है, तो उसकी स्वीकृति मान ली जाती है। ये अनुबंध आमतौर पर वेबसाइटों और यहां तक ​​कि कुछ मोबाइल ऐप या सॉफ़्टवेयर एप्लिकेशन में भी देखे जाते हैं। उन्हें हाइपरलिंक के माध्यम से भी देखा जा सकता है।

जटिल अन्वेषण (क्रिटिकल एनालिसिस)

अब कुछ अमेरिकी केस कानूनों की मदद से इन अनुबंधों की प्रवर्तनीयता के बारे में बात करते हैं। सामान्य तौर पर, क्लिक रैप अनुबंधों की वैधता न्यायालयों में ब्राउज़ रैप अनुबंधों की वैधता से अधिक होती है।

लॉन्ग बनाम प्राइड कॉमर्स इंक. के मामले में, अदालत ने माना कि ब्राउज रैप अनुबंध केवल तभी लागू होगा जब उपभोक्ता ने अनुबंधों में उल्लिखित सभी शर्तों को पढ़ लिया हो और उन्हें इसके बारे में पता हो। इस मामले का निष्कर्ष यह था कि ये अनुबंध केवल तभी लागू किए जा सकते हैं जब एक उचित विवेकपूर्ण व्यक्ति अनुबंध की शर्तों को जानता होगा जो प्लेसमेंट और लिंक के डिजाइन पर निर्भर करता है।

गुयेन बनाम बार्न्स एंड नोबल इंक. के एक अन्य मामले में, अदालत ने फैसला सुनाया कि लिंक की निकटता और विशिष्टता के आधार पर अनुबंध लागू किया जा सकता है। रे ज़प्पोस.कॉम इंक. के मामले में, अदालत ने कहा कि इन अनुबंधों को लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि इन अनुबंधों के लिंक का फ़ॉन्ट, रंग और डिज़ाइन अन्य लिंक के समान है। इसलिए, उपभोक्ता भेद नहीं कर पा रहे थे।

अदालत द्वारा स्थापित ब्राउज रैप अनुबंध लिंक को डिजाइन करने के लिए कुछ दिशानिर्देश हैं;

  1. लिंक की दृश्यता पहले पृष्ठ पर होनी चाहिए न कि उप-पृष्ठों पर और ऐसी जगह पर रखी जानी चाहिए जहां यह तुरंत दिखाई दे।
  2. लिंक में अलग-अलग फ़ॉन्ट शैली और रंग के साथ एक बड़ा फ़ॉन्ट होना चाहिए। इसे अन्य कड़ियों से अलग करने के लिए ऐसा किया जाना चाहिए।
  3. एक अतिरिक्त नोटिस पॉप-अप होना चाहिए क्योंकि लिंक पर्याप्त नहीं है।

तीनों के बीच के अंतर को समझना

क्लिक रैप अनुबंध और श्रिंक रैप अनुबंध एकतरफा होते हैं और एक निश्चित अनुबंध के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं, जबकि ब्राउज रैप अनुबंध काफी अलग होते हैं क्योंकि वे उपभोक्ता को अनुबंध स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करते हैं बल्कि वेबसाइट का उपयोग करते समय उनकी स्वीकृति मान ली जाती है। क्लिक रैप और ब्राउज रैप जैसे अनुबंध आमतौर पर उन वेबसाइटों द्वारा उपयोग किए जाते हैं जो आपके उपभोक्ताओं के लिए उनके नियमों और शर्तों से सहमत होना अनिवार्य बनाना चाहते हैं। दोनों के बीच एकमात्र अंतर यह है कि वे इसे किस तरह से जनादेश (मैंडेट) देते हैं। ब्राउज रैप के लिए सहमति की आवश्यकता नहीं है लेकिन क्लिक रैप, उपभोक्ताओं को “मैं सहमत हूं” बटन पर क्लिक कराता है। श्रिंक-रैप अनुबंध, क्लिक-रैप अनुबंध और ब्राउज-रैप अनुबंध, ऑनलाइन उपभोक्ताओं के साथ अनुबंध करने के तरीके हैं। ब्राउज रैप समझौते के लिए सबसे पुराना रूप और मानक रूप है, क्योंकि यह सरल था और सभी प्रासंगिक जानकारी को कवर करता था। श्रिंक रैप सॉफ्टवेयर उद्योग में ही पाया गया था लेकिन एक अलग रूप में। श्रिंक-रैप अनुबंध में पैकेजिंग के अंदर समझौता होता है और पैकेज को खोलना उसी के प्रति उपभोक्ता की स्वीकृति को इंगित करता है। ब्राउज रैप अनुबंध में लिंक के साथ हाइलाइट की गई वेबसाइट पर लिखे गए नियम और शर्तें और गोपनीयता नीति होती है। उपभोक्ता डिफ़ॉल्ट रूप से इस अनुबंध के लिए सहमत हो जाता है और आमतौर पर, लाइन कहती है, “हमारी साइट का आपका उपयोग, इन उपयोग की शर्तों की आपकी स्वीकृति और उनके द्वारा बाध्य होने के लिए आपके समझौते का गठन करता है”। इसलिए, यदि आप नियम और शर्तों से सहमत नहीं हैं, तो बस वेबसाइट का उपयोग न करें। दूसरी ओर, क्लिक रैप अनुबंध की आवश्यकताएं श्रिंक-रैप और ब्राउज रैप से अधिक हैं। दो मुख्य घटक जो एक बड़ा अंतर बनाते हैं, वह यह है कि सबसे पहले, क्लिक रैप अनुबंध एक लिंक प्रदान करते हैं लेकिन वे एक नोटिस भी प्रदान करते हैं, जो सभी कानूनी नियमों और शर्तों का सारांश है। दूसरे, वे “मैं सहमत हूं” बटन या चेक बॉक्स जैसे पॉप-अप विंडो के माध्यम से कार्रवाई योग्य सहमति मांगते हैं। अगर कोई वेबसाइट या ऐप इस अनुबंध का उपयोग करता है, तो इसका मतलब है कि आगे बढ़ने से पहले उन्हें उपभोक्ता से स्पष्ट सहमति लेने की आवश्यकता है। उपभोक्ता के पास “रद्द करें” बटन पर क्लिक करके नियम और शर्तों को अस्वीकार करने का विकल्प भी होता है।

निष्कर्ष

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, भारत में सभी अनुबंधों को नियंत्रित करता है लेकिन सभी इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा शासित होते हैं। अधिकतर सभी इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध उपभोक्ताओं को क्लिक रैप और ब्राउज रैप के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। दोनों अनुबंधों के लिए शब्द -रैप, श्रिंक रैप अनुबंधों से लिया गया है क्योंकि नियम और शर्तें उत्पाद की पैकेजिंग में लपेटी होती हैं। लेकिन क्लिक रैप और ब्राउज रैप दोनों का ही उपयोग डिजिटल रूप में ही किया जाता है। श्रिंक रैप का उपयोग डिजिटल और भौतिक दोनों में किया जा सकता है। अतीत में, वेबसाइट के मालिक के पास क्लिक रैप और ब्राउज रैप के बीच एक विकल्प था, दोनों को समान रूप से कानूनी रूप से गोपनीयता नीति और नियम और शर्तों की तरह माना जाता था, लेकिन अब समय बदल गया है। अंत में, मैं इस बात पर प्रकाश डालना चाहूंगा कि नियम और शर्तों के लिए कोई भी ब्राउज़ रैप अनुबंध का उपयोग कर सकता है, लेकिन गोपनीयता नीति जैसे कानूनी दस्तावेजों को एक क्लिक रैप अनुबंध के साथ होना चाहिए ताकि एक व्यक्त सहमति हो।

आई.पी.सी. की धारा 452: उसका अवलोकन, अनिवार्यताएं, सज़ा और मामले

यह लेख इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय की कानून की छात्रा Kanisha Goswami ने लिखा है। यह लेख आई.पी.सी. की धारा 452 की व्याख्या करता है जो बिना अनुमति घर में घुसने, चोट पहुंचाने के लिए हमले या गलत तरीके से दबाव बनाने की तैयारी से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है। 

परिचय

आम आदमी के शब्दों में अतिचार (ट्रेसपास) का अर्थ, किसी की सहमति के बिना उसकी भूमि में प्रवेश करना है। जब भी अपराध करने के इरादे से अतिचार किया जाता है, तो यह आपराधिक अतिचार की श्रेणी में आता है और भारतीय दंड संहिता के तहत इसे एक दंडनीय अपराध माना जाता है। यदि कोई कार्य जो किसी व्यक्ति के निजी संपत्ति का आनंद लेने के अधिकार का उल्लंघन करता है, तो वह गृह अतिचार है। धारा 452 किसी को चोट पहुंचाने, हमला करने या दबाव बनाने के इरादे से अतिचार के बारे में बात करती है, यह गृह अतिचार का एक उग्र (एग्रावेटेड) रूप है, क्योंकि संपत्ति जहां एक व्यक्ति रहता है और अपना कीमती सामान रखता है, में अतिचार, अवैध है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि इस धारा के तहत दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने से पहले, यह साबित होना चाहिए कि उस कथित अतिचार में, धारा 452 में वर्णित सभी तत्व मौजूद थे।

आई.पी.सी. की धारा 452

आई.पी.सी. की धारा 452, किसी को चोट पहुंचाने या किसी व्यक्ति पर हमला करने या किसी पर गलत तरीके से दबाव बनाने, या किसी को चोट पहुंचाने या हमले या गलत तरीके से दबाव बनाने के डर से घर में घुसने से संबंधित है। यहां, अतिचार करने वाले को न्यूनतम 7 साल की सजा और जुर्माने से दंडित किया जाता है। यह एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल), जमानती अपराध है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह धारा ज्यादा दंड प्रदान करती है जहां किसी घर में अतिचार से किसी को नुकसान, हमला या दबाव डाला जाता है।

जब आपराधिक इरादे से अतिचार किया जाता है, तो इसका परिणाम आपराधिक अतिचार होता है जो आई.पी.सी. के तहत दंडनीय है। यदि किसी व्यक्ति की निजता या संपत्ति, चाहे वह चल हो या अचल, का आनंद किसी अन्य व्यक्ति की आपराधिक गतिविधियों के कारण लिया जाता है, तो आई.पी.सी. अधिकारों के ऐसे उल्लंघन के लिए एक उपाय प्रदान करती है।

आई.पी.सी. की धारा 452 की आवश्यकताएं

  • किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति में प्रवेश करना

यहां प्रवेश का मतलब है कि कोई व्यक्ति किसी की संपत्ति में बुरे इरादे से प्रवेश करता है। यहां बल द्वारा प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं है, इसे अनधिकृत (अनऑथराइज) या उस भूमि के मालिक की इच्छा के विरुद्ध होना चाहिए।

सविताबेन बनाम गुजरात राज्य (2019) में, दोपहर लगभग 2:30 बजे शिकायतकर्ता की पत्नी, नर्मदाबेन अपने बेटे को डांट रही थी, और आरोपी सविताबेन ने गलत समझा, जिसके परिणामस्वरूप उनके बीच मौखिक रूप से बहस हुई थी। सविताबेन के पति ने एक छड़ी ली और नर्मदाबेन को पीटने के लिए उनका पीछा किया। नर्मदाबेन ने कमरे के अंदर जाकर घर का दरवाजा बंद कर लिया। आरोपी और उसके पति ने दरवाजा तोड़ दिया और उसे बर्थ पर लेटा दिया और सविताबेन ने मिट्टी के तेल का जार लाकर अपने पति को दे दिया और उसने मृतक (नर्मदाबेन) को आग लगा दी। इसके बाद दोनों वहां से भाग गए। अदालत ने माना कि आरोपी 1 और आरोपी 2 दोनों आई.पी.सी. की धारा 302 और धारा 452 के साथ-साथ धारा 114 के तहत दंडनीय हैं।

  • संपत्ति का स्वामित्व किसी अन्य व्यक्ति के पास होना चाहिए

संपत्ति का स्वामित्व किसी अन्य व्यक्ति के पास होना चाहिए न कि स्वयं अतिचार करने वाले के पास। इस धारा का मुख्य कार्य मालिकों के हितों की रक्षा करना है। यदि अतिचार करने वाले के द्वारा किया गया प्रवेश किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या हमला करने के लिए स्पष्ट है तो उस व्यक्ति इस धारा के तहत उत्तरदायी है।

मेन पाल बनाम हरियाणा राज्य (2010) के मामले में, शिकायतकर्ता ने कहा कि जब वह और उसकी बहू अपने घर में सो रही थी, तब लगभग 11:30 बजे, अपीलकर्ता ने उसके घर की दीवार पर छलांग लगा दी और सभी बल्ब तोड़ दिए, और वह वहां से भाग गया। उस समय घर पर कोई पुरुष सदस्य नहीं था और एक घंटे के बाद अपीलकर्ता फिर से उसके घर आया और उसकी बहू को छुआ। अदालत ने अपराधी पर उसकी बहू के साथ दुर्व्यवहार करने के इरादे से गृह अतिचार के अपराध का आरोप लगाया।

  • चोट, हमला, और गलत तरीके से दबाव डालने का इरादा होना चाहिए

इस धारा के तहत आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आरोपी का इरादा जरूरी है। आरोपी को ऐसी संपत्ति पर कब्जा करने के लिए किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने, हमला करने या उस पर दबाव डालने के इरादे से अपराध करना चाहिए। परिस्थितिजन्य साक्ष्य (सर्कमस्टेंशियल एविडेंस) द्वारा इरादे को साबित किया जा सकता है।

उदाहरण:

यदि कोई किसी व्यक्ति के घर में फर्जी वारंट लेकर गिरफ्तारी के लिए गया और उस व्यक्ति को उसकी मर्जी के बिना ले गया, तो यहां अपराधी इस धारा के तहत दंडनीय होगा।

अतिचार

अतिचार एक कानूनी शब्द है जिसका अर्थ है मालिक की भूमि पर उसकी अनुमति के बिना या अनुचित आक्रमण (इनवेजन) के बिना, उसकी सहमति के बगैर प्रवेश करना। आपराधिक कानून और टॉर्ट कानून दोनों में अतिचार का उल्लेख किया गया है। यह किसी व्यक्ति या उसकी संपत्ति के साथ जानबूझकर हस्तक्षेप करना है। यहाँ ‘इरादा’ शब्द का अर्थ है जानबूझकर गलत करना। इरादा एक आवश्यक तत्व है क्योंकि ‘मेन्स रीआ’ एक कार्य के आपराधिक होने का मुख्य कारण है। एक घर में अतिचार, आपराधिक अतिचार का एक उग्र रूप है। इस प्रकार, यदि कोई व्यक्ति जिसे ड्राइंग रूम में बैठने की अनुमति है, वह बिना किसी कारण के बेडरूम में प्रवेश करता है, तो उस प्रवेश को अतिचार माना जाएगा।

किसी के परिसर (प्रिमाइज) में कचरा फेंकना भी अतिचार का एक कार्य है, जिसका अर्थ है कि अतिचार केवल शारीरिक हस्तक्षेप के बारे में नहीं है, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पर किसी भौतिक वस्तु को फेंक कर भी किया जा सकता है। यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति का किसी अन्य व्यक्ति को परेशान करने के लिए एक गुप्त या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य है।

गलत तरीके से दबाव डालना (रॉन्गफुल रिस्ट्रेंट)

भारतीय दंड संहिता की धारा 339 में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छा से किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी दिशा में जाने से रोकता है जिसमें उस व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से चलने का अधिकार है, या उस व्यक्ति के रास्ते को असंभव, खतरनाक, या पार करने के लिए मुश्किल बना कर उस व्यक्ति को बाधित करता है, तो यह माना जाता है की उस व्यक्ति ने गैरकानूनी रूप से किसी अन्य व्यक्ति के ऊपर गलत तरीके से दबाव डाला है। इस धारा का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। शिकायतकर्ता को यह साबित करना होता है कि कोई बाधा डाली गई थी जिसने उसे किसी भी दिशा में आगे बढ़ने से रोका था। इस धारा को लागू करने के लिए, शिकायतकर्ता को भूमि पर अपना अधिकार साबित करना होता है। जो कोई भी व्यक्ति, किसी व्यक्ति को बाधित करता है, उसे एक महीने तक की कैद या पांच सौ रुपये तक का जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

यदि बाधा सद्भावपूर्वक (गुड फेथ) तरीके से डाली जाती है और किसी को बाधा डालने वाले आरोपी को उस व्यक्ति को बाधित करने का कानूनी अधिकार है, तो यह गलत तरीके से दबाव डालना नहीं होगा। यह अपराध संज्ञेय, जमानती और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह एक कंपाउंडेबल अपराध है।

मदाला परैया और अन्य बनाम वोरुगंती चेंड्रिया (1954) के मामले में, तथ्य यह था कि शिकायतकर्ता ने पास में जमीन खरीदी थी और जब भी वह वहां जाता था तो उसे वहां के नियोजित रास्ते (डोनका) से गुजरना पड़ता था। नियोजित रास्ता आरोपी की जमीन से होकर जाता था। दोनों के बीच विवाद हो गया था। एक दिन जब वह डोनका को पार कर रहा था, तो आरोपी ने उसे पानी का उपयोग करने से रोक दिया और उसने रास्ते में अपने बैल खड़े कर के उसको उसकी जमीन पर जाने से रोका और साथ ही उसे पीटा, और वहां से भगा दिया। अदालत ने माना कि आरोपी ने गलत तरीके से दबाव डालने का अपराध किया है।

गलत तरीके से प्रतिबंधित करना (रॉन्गफुल कन्फाइनमेंट)

भारतीय दंड संहिता की धारा 340 गलत तरीके से प्रतिबंधित करने को इस तरह से परिभाषित करती है- “जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को इस तरह से प्रतिबंधित करता है कि वह उस व्यक्ति को कुछ निश्चित सीमाओं से आगे बढ़ने से रोक सके”। गलत तरीके से प्रतिबंधित करना एक प्रकार से गलत तरीके से दबाव डालना ही है क्योंकि दोनों अपराधों में व्यक्ति को सीमा के भीतर रखा जाता है, जिससे बाहर जाने का उसके पास अधिकार है  या वह जाना चाहता है। इसमें पूर्ण रूप से दबाव डाला जाना चाहिए, और इसमें आंशिक रूप से दबाव नहीं होना चाहिए। उदाहरण: किसी व्यक्ति को एक कमरे में बंद करना गलत तरीके से प्रतिबंधित करने की श्रेणी में आता है।

राज्य बनाम बालकृष्ण और अन्य (1992) में, आरोपी जो एक पुलिस अधिकारी था, ने शिकायतकर्ता के रिश्तेदार को गिरफ्तार कर लिया। शिकायतकर्ता थाने पहुंचा और अधिकारी से पूछा कि उसके रिश्तेदार ने क्या अपराध किया है। आरोपी ने शिकायतकर्ता को पूरी रात कोने में खड़े रहने की आज्ञा दी। उन्हें आगे बढ़ने और कानूनी उपचार लेने की अनुमति नहीं थी। इधर, आरोपी ने गलत तरीके से प्रतिबंधित करने का अपराध किया है क्योंकि उसने शिकायतकर्ता को उस जगह से जाने से रोक दिया था।

धारा 340 के तहत सजा

जो कोई किसी व्यक्ति को अवैध रूप से प्रतिबंधित करता है, तो उसे कारावास से, जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या एक हजार रुपए तक के जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा। इस धारा के तहत अपराध संज्ञेय, जमानती और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह एक कंपाउंडेबल अपराध है।

गृह अतिचार के अन्य तरीके

  • आई.पी.सी. की धारा 442

भारतीय दंड संहिता की धारा 442 गृह अतिचार को आपराधिक अतिचार के रूप में परिभाषित करती है, यदि कोई व्यक्ति किसी निर्माण, तम्बू या जलयान (वेसल) में, जो मानव-निवास के रूप में उपयोग में आता है, या किसी निर्माण में, जो उपासना-स्थान (प्लेस ऑफ वर्शिप) के रूप में, या किसी संपत्ति की अभिरक्षा (कस्टडी) के स्थान के रूप में उपयोग में आता है, वह उसमें प्रवेश करता है या उसमें बना रहता है तो यह माना जाता है की उसने गृह अतिचार किया है। किसी भी व्यक्ति को इस अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है यदि वह किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति में अनुमति या लाइसेंस द्वारा प्रवेश करता है।

  • आई.पी.सी. की धारा 443 

आई.पी.सी. की धारा 443 में प्रच्छन्न (लर्किंग) गृह अतिचार को परिभाषित किया गया है। कोई भी व्यक्ति जो इस तरह के अतिचार को किसी अन्य व्यक्ति से छुपाने के लिए सावधानी बरतते हुए गृह अतिचार करता है, जिसे तंबू, निर्माण या जलयान से बाहर निकालने का अधिकार है, उसे प्रच्छन्न गृह अतिचार करना कहा जाता है। यह गृह अतिचार का एक उग्र रूप है।

  • आई.पी.सी. की धारा 444

आई.पी.सी. की धारा 444 में रात में प्रच्छन्न रूप से किए गए गृह अतिचार के बारे में बात की गई है। जब कोई व्यक्ति सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गुप्त रूप से अतिचार करता है, तो इसे प्रच्छन्न गृह अतिचार के बराबर माना जाता है। यह अपराध आई.पी.सी. की धारा 456 के तहत तीन साल से अधिक के कारावास और जुर्माने के साथ दंडनीय है।

  • आई.पी.सी. की धारा 445 

आइ.पी.सी. की धारा 445 गृह भेदन (हाउस ब्रेकिंग) के अपराध को परिभाषित करती है, जो प्रच्छन्न गृह अतिचार का एक गंभीर रूप है। यह धारा अलग-अलग तरीके बताती है जिसमें गृह भेदन के अपराध को किया जा सकता है:

  • यदि कोई अपराधी किसी ऐसे मार्ग से प्रवेश करता है जो उसके द्वारा बनाया गया था;
  • यदि कोई मार्ग, अतिचार करने वाले के अलावा किसी अन्य द्वारा उपयोग नहीं किया जाता है;
  • गृह भेदन का अपराध करने के लिए किसी भी मार्ग को खोलने से, जिसे घर के मालिक द्वारा खोलने का इरादा नहीं था;
  • कोई ताला खोलकर;
  • प्रवेश के समय या प्रस्थान के समय आपराधिक बल का प्रयोग कर के।

आई.पी.सी. की धारा 446

आई.पी.सी. की धारा 446, रात में गृह भेदन करने के अपराध को परिभाषित करती है जो सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले किया जाता है, यह गृह भेदन का एक गंभीर रूप है। यह अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 456 के तहत कारावास के साथ दंडनीय है जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी हो सकता है।

आई.पी.सी. की धारा 452 के तहत सजा

जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँचाने या किसी अन्य व्यक्ति पर हमला करने या किसी व्यक्ति पर गैरकानूनी रूप से दबाव डालने के इरादे से गृह अतिचार करता है तो उसे कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, और उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। यह अपराध कंपाउंडेबल अपराधों के तहत सूचीबद्ध नहीं है।

महत्त्वपूर्ण मामले

  • तुलसीराम भानुदास कांबले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2007) के मामले में, कुछ व्यक्ति मृतक व्यक्ति के घर के अंदर एक फिल्म देख रहे थे। कुछ देर बाद वे बगीचे में बैठ गए। बाद में आरोपी कुछ लोगों के साथ आया और उनके पास तलवारें और हथियार थे। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता ख़तरनाक हथियारों के साथ शिकायतकर्ता के घर आए थे और शिकायतकर्ता को मारने के इरादे से और सामान्य उद्देश्य से आए थे। उन्होंने शिकायतकर्ता को मारने के इरादे से गृह अतिचार का अपराध किया है और मृतक (घर के मालिक) की मौके पर ही मौत हो गई, क्योंकि उसके सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में कई घाव हुए थे।
  • अचार सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2021) में, शिकायतकर्ता और उसकी मां, पास के एक गांव में एक शादी में गए। और फिर दोनों महिलाएं घर लौट गईं। आरोपी व अन्य ग्रामीणों ने उन्हें जान से मारने की नीयत से उन पर पथराव शुरू कर दिया। शिकायतकर्ता और उसकी मां दौड़कर घर पहुंचे। हालांकि, आरोपी ने दरवाजा तोड़ दिया और हथियारों के साथ घर में घुस गया। शिकायतकर्ता की मां की मौके पर ही मौत हो गई और शिकायतकर्ता को लाठियों से पीटा गया था। किसी तरह शिकायतकर्ता घर से निकली और थाने चली गई। इस मामले में आरोपी व अन्य ग्रामीणों ने धारा 452 के तहत अपराध किया था।
  • उधम सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2019) में शिकायतकर्ता के पिता और उसका भाई, जो जामनिया गांव के रहने वाले थे, शाम 5 बजे अपनी जमीन में पानी भरने गए। मृतक व आरोपित के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। इसके बाद आरोपी और उसके परिवार ने उसे बुलाया और उसे लाठी से पीटा गया। चश्मदीद गवाह, काशीराम (मृतक का बेटा) ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कराया। अदालत ने माना कि पक्षों के बीच झगड़ा हुआ था और उस समय एक घटना हुई थी, मृतक की मौत चोटों के कारण हुई और कहा कि आरोपी और उसके परिवार के सदस्य इस धारा के तहत उत्तरदायी हैं।

निष्कर्ष

यदि कोई अजनबी या परिचित, कोई ऐसी संपत्ति में प्रवेश करता है जो आपके कब्जे में है, और वह ऐसा उसे नुकसान या हमला करने के इरादे से करता है, तो ऐसा व्यक्ति गृह अतिचार के अपराध के तहत उत्तरदायी होगा और किसी भी अदालत में उपाय की मांग की जा सकती है। गृह अतिचार आपराधिक अतिचार का एक उग्र रूप है और प्रच्छन्न गृह अतिचार और गृह भेदन गृह अतिचार के अधिक उग्र रूप हैं। गृह अतिचार एक ऐसी चीज है जो किसी अन्य व्यक्ति की निजता (प्राइवेसी), जिसका आनंद लेने का उस व्यक्ति को पूरा अधिकार है, में बाधा डाल सकती है, निजता एक नागरिक का मौलिक अधिकार है जिसमें किसी को भी बाधा डालने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार, उन स्थितियों के बीच अंतर जानना बहुत आवश्यक है जहां अपराध गृह अतिचार हो सकता है या जहां यह नहीं हो सकता है। इस तरीके से ही लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेंगे।

संदर्भ

 

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के अपवाद

यह लेख लॉयड लॉ कॉलेज की छात्रा Shweta Kumari ने लिखा है। यह लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 और इसके अपवादों का एक ओवरव्यू है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

कानूनी कार्यवाही के माध्यम से संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) अधिकारों के प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) को प्रतिबंधित करने का अनुबंध, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के तहत शून्य है। धारा 28 में तीन अपवाद हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम पंजाब नेशनल बैंक और अन्य के मामले में 28 जुलाई, 2021 को एक महत्वपूर्ण निर्णय पास किया गया था, जिसमें धारा 28 के अपवाद 3 की व्याख्या की गई थी। यह लेख हाल के निर्णय के आलोक में धारा 28 और इसके अपवादों का एक ओवरव्यू है। यह महत्वपूर्ण मामलों पर भी चर्चा करता है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 में कहा गया है कि कानूनी कार्यवाही के पूर्ण प्रतिबंध में एक समझौता शून्य है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 (a) में कहा गया है कि:

  1. कोई भी समझौता न्यायालय के माध्यम से अधिकारों के प्रवर्तन पर रोक नहीं लगा सकता है।
  2. कोई भी समझौता न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बाहर नहीं कर सकता है।
  3. कोई भी समझौता भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1963 के तहत निर्धारित समय सीमा से कम समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकता है।

97वें विधि आयोग ने खुद ही धारा 28 का विश्लेषण किया और एक संशोधन का प्रस्ताव रखा। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28(b), जिसे भारतीय अनुबंध (संशोधन) अधिनियम, 1997 के माध्यम से सम्मिलित किया गया है, इसमें कहा गया है कि:

  1. कोई भी समझौता किसी निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर किसी भी पक्ष के अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता है।
  2. कोई भी समझौता किसी भी पक्ष को एक निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर किसी भी दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता है।

किसी भी पक्ष को उनके अधिकारों के प्रवर्तन से प्रतिबंधित करने के लिए ऊपर दिए हुए प्रावधानों को सम्मिलित करने से अनुबंध उस सीमा तक शून्य हो जाएगा। संशोधन ने ‘सही’ और ‘उपाय’ के बीच की रेखाओं को धुंधला कर दिया है।

धारा 28 के अपवाद

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 पूर्ण नहीं है। इसके तीन अपवाद हैं।

  • पहला अपवाद कहता है कि एक समझौता जो पक्षों के बीच उत्पन्न होने वाले सभी विवादों को मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के लिए संदर्भित करता है, वह शून्य नहीं होगा। इसके अलावा, संदर्भित विवादों में एक मात्र मध्यस्थता पुरस्कार वापस पाने योग्य होगा। अपवाद 1 का दूसरा खंड विशिष्ट राहत अधिनियम (स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट), 1877 द्वारा निरस्त कर दिया गया था।
  • दूसरे अपवाद में कहा गया है कि पक्षों के बीच मध्यस्थता के लिए खंड को सम्मिलित करने से पहले उत्पन्न होने वाले प्रश्नों को संदर्भित करने के लिए एक समझौता शून्य नहीं होगा।
  • तीसरे अपवाद में कहा गया है कि किसी बैंक या वित्तीय संस्थान का गारंटी समझौता किसी पक्ष के अधिकारों को समाप्त करने या किसी पक्ष को किसी भी दायित्व से मुक्त करने के प्रावधान के साथ एक निर्दिष्ट अवधि (> 1 वर्ष) की समाप्ति पर एक निर्दिष्ट घटना / गैर-घटना की तारीख से शून्य नहीं होगा।  

अपवाद 3 को भारतीय बैंक संघ (एसोसिएशन) की सिफारिशों पर 2013 में बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम, 2012 के माध्यम से जोड़ा गया था। इसने 1977 के संशोधन के बाद बैंकों के लिए एक निवारण तंत्र के रूप में कार्य किया है।

अपवाद 3 में अभिव्यक्ति “बैंक” में ये शब्द शामिल हैं:

शब्द धारा (परिभाषा)
बैंकिंग कंपनी बैंकिंग विनियमन (रेगुलेशन) अधिनियम, 1949 की धारा 5(c)
एक संबंधित (करेस्पोंडिंग) नया बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5(da)
भारतीय स्टेट बैंक भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 की धारा 3
एक सहायक (सब्सिडियरी) बैंक भारतीय स्टेट बैंक (सहायक बैंक) अधिनियम, 1959 की धारा 2(k)
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 की धारा 3
सहकारी (को-ऑपरेटिव) बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5(cci)
एक बहु-राज्य (मल्टी स्टेट) सहकारी बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5(cciiia)

अपवाद 3 में अभिव्यक्ति ‘एक वित्तीय संस्थान’ का अर्थ कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4-A के अर्थ में कोई भी सार्वजनिक वित्तीय संस्थान है।

2013 के संशोधन के माध्यम से भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के अपवाद 3 को सम्मिलित करने से कानून में एक द्वंद्व पैदा हो गया। इसके दो दृष्टिकोण हैं, जिन्हे यहां संदर्भित किया गया है।

  1. बैंक गारंटी की न्यूनतम दावा अवधि 12 महीने से कम नहीं होनी चाहिए।
  2. जबकि बैंकों को बैंक गारंटी की न्यूनतम दावा अवधि 12 महीने से कम करने का अधिकार है, बैंकों के दायित्वों को पूरी तरह से समाप्त नहीं करना चाहिए।

लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम पंजाब नेशनल बैंक और अन्य के मामले में पहला दृष्टिकोण गलत था।

मध्यस्थता समझौता

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (आर्बिट्रेशन एंड कन्सिलीएशन एक्ट), 1996 की धारा 7 में कहा गया है कि एक ‘मध्यस्थता समझौता’ पक्षों के बीच उत्पन्न होने वाले सभी या विशिष्ट विवादों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने के लिए पक्षों के बीच एक समझौता है। एक समझौता, अनुबंध में एक खंड या एक अलग समझौता हो सकता है। समझौता लिखा जाना चाहिए। मध्यस्थता समझौते के अभाव में किसी विवाद को मध्यस्थता के लिए संदर्भित नहीं किया जा सकता है जब तक कि पक्ष संयुक्त ज्ञापन (मेमो) या संयुक्त आवेदन के माध्यम से लिखित सहमति प्रदान नहीं करते हैं।

मेसर्स एलीट इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन (एचवाईडी) प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स टेकट्रांस कंस्ट्रक्शन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2018) में, अदालत ने मध्यस्थता खंड को सम्मिलित करने के लिए विशिष्ट नियम और विनियम स्थापित किए थे।

  1. मध्यस्थता खंड के साथ दस्तावेज़ का स्पष्ट संदर्भ होना चाहिए।
  2. मध्यस्थता खंड के संदर्भ को मध्यस्थता खंड को शामिल करने के इरादे को इंगित करना चाहिए।
  3. मध्यस्थता खंड किसी भी और सभी प्रकार के विवादों तक विस्तारित होना चाहिए जो अनुबंध के संबंध में उत्पन्न हो सकते हैं।
  4. मध्यस्थता खंड के साथ किसी अन्य अनुबंध के संदर्भ में अनुबंध अस्वीकार्य होगा।
  5. जब तक अनुबंध में अन्य अनुबंध के मध्यस्थता खंड का कोई संदर्भ न हो, तब तक नियम और शर्तों के साथ किसी अन्य अनुबंध के संदर्भ में अनुबंध अस्वीकार्य है।
  6. अनुबंध में किसी संस्था के नियमों और शर्तों में बताए गए मध्यस्थता खंड का संदर्भ होना चाहिए।

धारा 28 से संबंधित महत्वपूर्ण मामले

  • तपश मजूमदार बनाम प्रणब दासगुप्ता (2006) में, ईस्ट बंगाल क्लब ने कार्यकारी समिति को क्लब के सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अधिकृत (ऑथराइज)  किया, जिन्होंने अदालत में कार्यकारी (एग्जिक्यूटिव) समिति की चुनाव प्रक्रिया को चुनौती दी थी। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि इस तरह का प्रतिबंध सार्वजनिक नीति के खिलाफ था और भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 का उल्लंघन था।
  • भारत संचार निगम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2008), में एक अग्रिम (एडवांस) खरीद आदेश में सीमित क्षति की राशि, जिसका मूल्यांकन क्रेता द्वारा लगाया गया था, उस राशि को आपूर्तिकर्ता द्वारा अपरिवर्तनीय घोषित किया गया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि खरीदार का सीमित नुकसान का निर्धारण करने का एकतरफा अधिकार कानूनी कार्यवाही के अवरोध (रिस्ट्रेन) में था और इस प्रकार भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के तहत शून्य था।
  • हकम सिंह बनाम गैमन (इंडिया) लिमिटेड (1971) में, पक्षों के बीच समझौते में कहा गया है, कि “अकेले बॉम्बे शहर में कानून के न्यायालय के पास उस पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र होगा”। वाराणसी में दायर एक मुकदमा खारिज कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि समझौता भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 का उल्लंघन नहीं करता है। यदि बॉम्बे अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है तो समझौता शून्य होगा। एक समझौता एक अदालत पर गैर-मौजूद अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं कर सकता है।
  • दिल्ली बॉटलिंग कंपनी लिमिटेड बनाम टाइम्स गारंटी फाइनेंशियल लिमिटेड (2001) में, बॉम्बे में निष्पादित (एक्जीक्यूटेड) वाणिज्यिक (कमर्शियल) वाहनों के एक किराया खरीद समझौते ने किसी भी विवाद के मामले में बॉम्बे अदालतों को विशेष अधिकार क्षेत्र प्रदान किया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि समझौते ने भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि पक्ष अधिकार क्षेत्र वाले किसी भी न्यायालय को विशेष अधिकार क्षेत्र सौंप सकते हैं।
  • यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम एसोसिएटेड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन लिमिटेड (1987), मालवाहक (कैरियर) के हस्ताक्षर के साथ खेप (कंसाइनमेंट) नोट पर “अकेले बॉम्बे अधिकार क्षेत्र के अधीन” मुद्रित शब्द एक समझौते के बराबर नहीं थे। केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि मालवाहक और वाहक के विचार एक समान नहीं थे और इस प्रकार पक्षों ने एक समझौता नहीं किया था।
  • दिलीप कुमार रे बनाम टाटा फाइनेंस लिमिटेड (2001) में, मद्रास में निष्पादित टाटा एस्टेट कार के एक किराया खरीद समझौते ने सभी विवादों का अनन्य अधिकार क्षेत्र बॉम्बे को निर्धारित किया। यहां भुवनेश्वर में दायर एक मुकदमे को खारिज कर दिया गया था।
  • सी. सत्यनारायण बनाम के.एल. नरसिम्हम (1966), में प्रतिवादी ने वादी को लिखे पत्र पर “मद्रास अधिकार क्षेत्र के अधीन” शब्द छपवाए। अदालत ने फैसला सुनाया कि शब्द एक समझौते के बराबर नहीं थे और पक्ष मद्रास के अधिकार क्षेत्र के लिए बाध्य नहीं थे क्योंकि वादी ने इसके लिए अपनी सहमति नहीं दी थी।
  • बड़ौदा स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी लिमिटेड बनाम सत्यनारायण मरीन एंड फायर इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (1913), में अग्नि बीमा पॉलिसी को तीन महीने की अवधि के भीतर दावे की अस्वीकृति के खिलाफ कार्रवाई/मुकदमे की आवश्यकता थी। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर कोई कार्रवाई/मुकदमा नहीं किया गया तो सभी लाभ भंग कर दिए जाएंगे। अदालत ने समझौते को वैध करार दिया। 
  • रूबी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम भारत बैंक लिमिटेड और अन्य (1950) में जस्टिस कपूर, ने समझाया कि पक्ष इस बात से सहमत हो सकते हैं कि एक वादाकर्ता वादा करने वाले को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी होगा यदि उसे एक विशिष्ट समय सीमा के भीतर अधिसूचित (नोटिफाई) किया जाता है। यह बीमा समझौतों में आम है जहां समय का महत्व है।
  • नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम एस.जी नायक एंड कंपनी (1997) में अदालत ने एक बीमा अनुबंध खंड पर फैसला सुनाया, जिसने अगर 12 महीनों के भीतर नुकसान/क्षति का दावा दायर नहीं किया, तो भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के उल्लंघन में नहीं होने पर बीमा कंपनी को सभी देयताओं से मुक्त कर दिया जाएगा। समझौते में सीमा की अवधि को कम करने का प्रयास नहीं किया गया था। एक निर्दिष्ट समय अवधि समाप्त होने से पहले अधिकारों को ज़ब्त करने/छोड़ने का एक समझौता शून्य नहीं है।
  • यूनियन ऑफ इंडिया बनाम इंडसइंड बैंक लिमिटेड (2016) में, यूनियन ऑफ इंडिया ने प्रस्तुत किया कि बैंक गारंटी जो उस समय अवधि को सीमित करती है जिसके भीतर उन्हें लागू किया जा सकता है, एक साल बाद पेश किए गए संशोधन से प्रभावित नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि धारा 28 मूल कानून है। यह संभावित (प्रोस्पेक्टिव) रूप से संचालित होता है न कि पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) रूप से। अदालत ने बैंक गारंटी पर धारा 28(b) को जोड़ने के नतीजों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन कहा कि संसद ने धारा 28 में अपवाद जोड़कर बैंकों की शिकायतों का समाधान किया है।

अपवाद 3 पर दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय

लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम पंजाब नेशनल बैंक और अन्य में, पंजाब नेशनल बैंक और भारतीय बैंक संघ की भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के अपवाद 3 की व्याख्या को चुनौती दी गई थी।

तथ्य

भारतीय बैंक संघ ने धारा 28 के अपवाद 3 की व्याख्या करने के प्रयास में सर्कुलर जारी किए, जिसमें 12 महीने से कम की न्यूनतम दावा अवधि को शून्य घोषित किया गया था, जिसके आधार पर पंजाब नेशनल बैंक ने लार्सन एंड टुब्रो को बैंक गारंटी की न्यूनतम दावा अवधि एक वर्ष तक निर्धारित करने के लिए मजबूर किया था।

उठाए गए मुद्दे

प्रतिवादियों द्वारा धारा 28 के अपवाद 3 की गलत व्याख्या के कारण याचिकाकर्ता को अतिरिक्त कमीशन शुल्क देना पड़ा। याचिकाकर्ता को एक विस्तारित अवधि के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) सुरक्षा बनाए रखने की भी आवश्यकता थी। गलत व्याख्या ने याचिकाकर्ता को अपना व्यवसाय करने में बाधा डाली और इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उनके मौलिक अधिकार को प्रभावित किया।

पंजाब नेशनल बैंक द्वारा लार्सन एंड टुब्रो को जारी किए गए 18.08.2018 और 28.03.2019 के पत्रों और भारतीय बैंक संघ द्वारा दिनांक 10.02.2017 और 05.12.2018 को सभी सदस्य बैंकों को जारी किए गए पत्रों को रद्द करने की मांग करते हुए एक रिट याचिका दायर की गई थी। याचिका में भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 के अपवाद 3 के साथ पठित धारा 28 (b) की व्याख्या की भी मांग की गई, जिसमें 12 महीने से कम की न्यूनतम दावा अवधि को रद्द करने का प्रावधान है।

न्यायालय का अवलोकन

धारा 28 दावा अवधि से संबंधित नहीं है बल्कि लेनदार के अपने अधिकारों को लागू करने के अधिकारों से संबंधित है। भारतीय बैंक संघ का सर्कुलर और पंजाब नेशनल बैंक का संचार गलत है। दावा अवधि एक अनुग्रह (ग्रेस) अवधि है जो गारंटी की वैधता अवधि से आगे बढ़ती है और बैंक गारंटी में मौजूद हो भी सकती है और नहीं भी।

निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अपवाद 3 ने बैंक गारंटी के लिए न्यूनतम दावा अवधि निर्धारित नहीं की है।

निष्कर्ष

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 और इसके अपवाद पक्षों के अपरिहार्य (इंडिस्पेंसेबल) हितों की रक्षा करते हैं। धारा 28, कई बार संशोधित हुई है और अभी भी कानून के क्षेत्र में एक पहेली है। लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम पंजाब नेशनल बैंक और अन्य मामले में हाल ही का निर्णय पहेली का एक टुकड़ा था।

संदर्भ