भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 के तहत पेटेंट उल्लंघन के लिए आपराधिक और सिविल उपचारों का अवलोकन

यह लेख Amith Singh द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से “पेटेंट कानून और विश्लेषण (यूएसपीटीओ): सर्च, स्पेसिफिकेशन्स, अभियोजन, मुकदमा और लाइसेंसिंग” में डिप्लोमा कर रहे हैं। इस लेख में हम भारतीय पेटेंट अधिनियम के तहत पेटेंट उल्लंघन के लिए आपराधिक और सिविल उपचारों का विस्तृत अवलोकन करेंगे। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

परिचय

पेटेंट एक विशेषाधिकार है, जो किसी उत्पाद या प्रक्रिया के आविष्कारक को प्रदान किया जाता है, जिससे एक उपयोगी और अनूठा (यूनिक) उत्पाद उत्पन्न होता है, जो पहले कभी अस्तित्व में नहीं था। इसका अर्थ यह है कि पेटेंट एक एकाधिकार (मोनोपली) है, अगर आप किसी व्यक्ति के विचारों (दूसरे आविष्कारक या व्यवसाय संगठन) को पेटेंट धारक के प्रति देखेंगे, तो वे पेटेंट की सराहना कभी नहीं कर पाएंगे, बल्कि केवल इसे सहन करेंगे। इसे एक नकारात्मक अधिकार भी कहा जा सकता है। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे कक्षा का परिवीक्षक (मॉनिटर) अनुशासन की ड्यूटी पर होता है, जिसे सम्मानपूर्वक सहन करना होता है और ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे आपको कक्षा शिक्षक के कमरे या उससे भी बुरी स्थिति में प्राचार्य के कार्यालय जाना पड़े।

सामान्य रूप से उल्लंघन का अर्थ है किसी कानून, समझौते आदि की शर्तों को तोड़ना। पेटेंट उल्लंघन की मजेदार बात यह है कि पेटेंट कानून में उल्लंघन की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। बल्कि, यह पेटेंटधारी के अधिकारों का वर्णन करता है और आगे यह कहता है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन पेटेंटधारी के समान अधिकारों का प्रयोग करता है, तो वे निश्चित रूप से पेटेंट उल्लंघन कर रहे हैं और यही कारण है जो कि पेटेंट उल्लंघन को एक कठिन विषय बना देता है।

मैं यह बताना चाहूंगा कि व्यापार चिह्न (ट्रेड मार्क) और कॉपीराइट अधिनियम उल्लंघन को परिभाषित करते हैं, जबकि पेटेंट अधिनियम नहीं करता। इसलिए पेटेंट और व्यापार चिह्न एवं कॉपीराइट के बीच एक न्यायशास्त्रीय अंतर है। यदि आप चाहें तो इस जानकारी को छोड़ सकते हैं, लेकिन यदि यह आपके मन में एक बड़ा चित्र बनाने में मदद करती है, तो मैं सुझाव दूंगा कि आप इसे सुरक्षित रखें, ठीक उसी तरह जैसे आप किसी प्रियजन से मिले फूल को अपनी नोटबुक के पन्नों के बीच संभालकर रखते हैं। अब हम पेटेंटधारी के विभिन्न अधिकारों पर एक नज़र डालते हैं।

पेटेंटधारी के अधिकार  

भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 48 पेटेंटधारी को विशिष्ट अधिकार प्रदान करती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत में पेटेंट के स्वामित्व के साथ कौन-कौन से अधिकार आते हैं। आइए इन अधिकारों का अध्ययन करें:  

आविष्कार करने का अधिकार 

  • यह अधिकार केवल उत्पाद से संबंधित पेटेंट पर लागू होता है। केवल पेटेंटधारी को ही उत्पाद बनाने या उसके उत्पादन का अधिकार होता है।  
  • यह दूसरों को पेटेंट द्वारा संरक्षित आविष्कार को बनाने, उपयोग करने, बेचने या उसकी नकल करने से रोकता है, जब तक कि पेटेंटधारी की अनुमति न हो। 
  • यह अधिकार पेटेंटधारी को अपने नवोन्मेषी (इनोवेटिव) कार्य की सुरक्षा करने और आविष्कार के उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करने की अनुमति देता है।  

आविष्कार का अभ्यास करने का अधिकार 

  • यह अधिकार मुख्य रूप से प्रक्रिया या विधि (मैथड) पेटेंट से संबंधित है। केवल पेटेंटधारी को ही पेटेंट की गई प्रक्रिया या विधि का उपयोग करने का अधिकार है, जितना वह अपने आविष्कार को उपयोग (या शोषण) करना चाहता है। 
  • यह दूसरों को पेटेंटधारी की अनुमति के बिना प्रक्रिया को अपनाने, उपयोग करने या लागू करने से रोकता है। 
  • यह अधिकार पेटेंटधारी के विचारों और विधियों की रक्षा करता है; यह उन्हें उनके आविष्कार के अनुप्रयोग को नियंत्रित करने की अनुमति देता है।  

आविष्कार का उपयोग करने का अधिकार 

  • यह अधिकार पेटेंटधारी को अपने पेटेंट किए गए आविष्कार का व्यावसायिक उपयोग करने की अनुमति देता है। इसमें आविष्कार का व्यावसायीकरण (कमर्शियलाइज) करने का अधिकार शामिल है।  
  • यह अधिकार पेटेंटधारी को अपने आविष्कार का व्यावसायिक रूप से उपयोग करने, आय उत्पन्न करने और अपनी बुद्धिमत्ता से लाभ प्राप्त करने का अवसर देता है। 
  • पेटेंट यह अधिकार प्रदान करते हुए नवाचार (इनोवेशन) को प्रोत्साहित करते हैं, ताकि आविष्कारक अपने आविष्कार के उपयोग का एकाधिकार कर सकें।  

आविष्कार को बाजार में बेचने का अधिकार

  • इस अधिकार के तहत, पेटेंटधारी को अपने पेटेंट किए गए उत्पाद को बाजार में बेचने का अधिकार होता है। वे बिक्री की शर्तें तय कर सकते हैं। 
  • यह पेटेंटधारी को अपने आविष्कार का शोषण करने और संभावित ग्राहकों से जुड़ने की अनुमति देता है। 
  • यह अधिकार पेटेंटधारी को उनके आविष्कार के आर्थिक लाभों को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।  

आविष्कार को वितरण करने का अधिकार 

  • यह अधिकार पेटेंटधारी को पेटेंट किए गए उत्पाद के वितरण और प्रचार को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। वे यह तय कर सकते हैं कि उत्पाद को कौन, किसे वितरित करेगा। 
  • यह गारंटी देता है कि पेटेंटधारी अपने आविष्कार को बाजार में लाने और अंतिम उपभोक्ताओं तक उपलब्ध कराने के तरीके को नियंत्रित कर सके।  
  • यह अनुमति, जिसे अक्सर “प्रथम बिक्री का अधिकार” कहा जाता है, पेटेंटधारी के लिए अपने आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चैन) को प्रबंधित करने और बाजार में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है।  

मुख्य बिंदु

  • भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 48 के तहत दिए गए अधिकार पेटेंट संरक्षण के अंतर्गत निहित अधिकार हैं। 
  • ये अधिकार पेटेंटधारी को उनके आविष्कार पर एक विशेषाधिकारपूर्ण स्थिति प्रदान करते हैं, जिसके तहत वे यह निर्धारित कर सकते हैं कि उनके आविष्कार को कौन बना सकता है, उपयोग कर सकता है और बेच सकता है। 
  • यह नवाचार को प्रोत्साहित करता है क्योंकि यह आविष्कारकों को नई तकनीकों के विकास में समय, संसाधन और परिश्रम लगाने का अधिकार देता है; यह विशिष्टता (एक्सक्लूसिविटी) उनके प्रयासों का इनाम है।  
  • उल्लंघन — पेटेंट किए गए आविष्कार का अनधिकृत उपयोग, निर्माण, बिक्री या वितरण।  
  • इन पहलुओं की जानकारी होना न केवल पेटेंटधारकों बल्कि उन व्यक्तियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कौशल है, जो पहले से पेटेंट किए गए सिस्टम का उपयोग करना चाहते हैं ताकि कानून का पालन सुनिश्चित किया जा सके। 
  • भारत में पेटेंट अधिकार और संबंधित मुद्दों पर विशिष्ट सलाह के लिए कानूनी परामर्श लेना अत्यंत आवश्यक है।  

पेटेंटधारी के अधिकारों के आधार पर पेटेंट उल्लंघन के प्रकार  

प्राथमिक/प्रत्यक्ष उल्लंघन  

पेटेंटधारी के पहले और दूसरे अधिकार (a और b) प्राथमिक उल्लंघन की श्रेणी में आते हैं, जहां तीसरा पक्ष (आप) स्वयं उल्लंघन करता है। इस प्रकार के उल्लंघन में केवल एक ही पक्ष शामिल होता है।  

द्वितीयक/अप्रत्यक्ष उल्लंघन

पेटेंटधारी के चौथे और पांचवें अधिकार (d और e) द्वितीयक उल्लंघन की श्रेणी में आते हैं, जहां आप स्वयं उल्लंघन नहीं करते बल्कि दूसरों को आविष्कार का उल्लंघन करने में सहायता करते हैं। अप्रत्यक्ष उल्लंघन में कई पक्ष शामिल होते हैं।  

डि-मिनिमस उल्लंघन

दंड कानून में “डि-मिनिमस नॉन-क्यूरेट लेक्स” नामक एक सिद्धांत है। यह एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है कि कानून तुच्छ मामलों पर ध्यान नहीं देता। इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उदाहरण लें। मान लीजिए कि एक 19 वर्षीय लड़का अपने पड़ोसी की संपत्ति में प्रवेश करके कुछ आम तोड़ लेता है। क्या वह अपराध कर रहा है? निस्संदेह हां, उसने भारतीय दंड संहिता के तहत अतिचार (ट्रेसपास) और चोरी का अपराध किया है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हर पड़ोसी बच्चा जो आपके घर में घुसकर कुछ आम तोड़े, उसे अतिचार और चोरी के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए?  

नहीं, कानून का इरादा ऐसा नहीं है। कानून कहता है कि तुच्छ उल्लंघनों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए।  

पेटेंट उल्लंघन के मामले में भी, ऐसे उल्लंघन जो कुछ कारकों के आधार पर तुच्छ माने जा सकते हैं, उन्हें डि-मिनिमस उल्लंघन की श्रेणी में रखा जाएगा और देश या उल्लंघनकर्ता के व्यापक हित में अभियोजन से बचा जा सकता है।  

डि-मिनिमस उल्लंघन से छूट  

भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 49 में डि-मिनिमस उल्लंघन से छूट को परिभाषित किया गया है।  

यदि किसी विदेशी देश में पंजीकृत कोई जहाज, विमान या भूमि वाहन आकस्मिक रूप से या किसी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए अस्थायी रूप से भारतीय क्षेत्र में आता है, और उस जहाज के कार्य, निर्माण या मरम्मत के लिए पेटेंट किए गए आविष्कार का उपयोग किया जा रहा है, तो इसे पेटेंट उल्लंघन नहीं माना जाएगा।  

उदाहरण: यदि कोई विदेशी जहाज भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करता है और पेटेंट आविष्कार का उपयोग करता है, तो सामान्यतः पेटेंट उल्लंघन का मामला उस स्थान पर दर्ज किया जाना चाहिए जहां जहाज पंजीकृत है या जहाज कंपनी का निगमित (कॉर्पोरेट) कार्यालय स्थित है। परंतु धारा 49 के अनुसार, यदि संबंधित देश समान समाधान प्रदान करता है, तो भारतीय न्यायालय उस मामले में क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे।  

यहां तक कि डब्ल्यू.टी.ओ भी यह मानता है कि डि-मिनिमस उल्लंघन बौद्धिक (इंटेलेक्चुअल) संपदा (प्रॉपर्टी) अधिकार (आई पी आर) के उल्लंघन के विरुद्ध एक वैध बचाव है।  

पेटेंट कानून में पूर्वानुमान 

जैसा कि इस लेख की शुरुआत में बताया गया था, पेटेंट उल्लंघन के लिए कोई विशेष नियम नहीं हैं, बल्कि पेटेंटधारी के अधिकारों को गहराई से परिभाषित किया गया है। पेटेंट कानून में कुछ अनुमान हैं जो केवल पेटेंट कानून के लिए विशिष्ट नहीं हैं बल्कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के साक्ष्य कानून में निहित हैं।  

आइए इन अनुमानों में से एक पर चर्चा करते हैं।  

सबूत का भार: (भारतीय पेटेंट अधिनियम, धारा 104A, अध्याय XVIII

मान लीजिए कि श्री अमित के पास वर्तमान में एक उत्पाद और उस उत्पाद के लिए एक प्रक्रिया पेटेंट है। अब उन्हें पता चलता है कि श्री आशीष नामक एक अन्य व्यक्ति बिना अमित की सहमति के वही उत्पाद बना रहा है। यह जानने के बाद, श्री अमित क्रोधित हो जाते हैं और श्री आशीष के खिलाफ उल्लंघन का अभियोजन शुरू करने का निर्णय लेते हैं। यहां अमित वादी हैं और आशीष प्रतिवादी हैं।  

यहां अमित को केवल अदालत को यह साबित करना है कि अमित के प्रक्रिया पेटेंट के अंतर्गत प्रक्रिया विनिर्देश (स्पेसिफिकेशन) उस उत्पाद को शामिल करता है जिसे आशीष बना रहा है। जैसे ही वह यह साबित कर लेता है, वह भार आशीष पर डाल देता है। अब आशीष पर यह भार है कि वह साबित करे कि जो उत्पाद वह बना रहा है, वह अमित के प्रक्रिया पेटेंट के विनिर्देश में शामिल नहीं है। दूसरे शब्दों में, आशीष को यह साबित करना होगा कि वह उत्पाद किसी ऐसी प्रक्रिया से बना रहा है जो अमित के प्रक्रिया पेटेंट विनिर्देश में शामिल नहीं है। यदि आशीष ऐसा कर सकता है, तो वह भार फिर से अमित पर स्थानांतरित कर देता है।

अब, इस प्रक्रिया में झूठ बोलने की बहुत गुंजाइश नहीं होती, जैसा कि अन्य सिविल कार्यवाही में होती है, क्योंकि यह प्रक्रिया पूरी तरह तकनीकी होती है। दुर्भाग्य से, एक पूरक प्रक्रिया जिसे खोज (डिस्कवरी) और  पूछताछ (इंटरोगेशन) कहा जाता है, भारत में अधिकांशतः लागू नहीं होती। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से जापान, अमेरिका और यूरोपीय अदालतों में देखी जाती है। हम खोज और पूछताछ प्रक्रिया पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे। इसलिए, थोड़ा धैर्य रखें।

ज्यादातर सामान्य कानून देशों में मुकदमेबाजी प्रक्रिया, जिसमें भारत शामिल है 

उल्लंघन को समझने के लिए, हमें उन सामान्य कानून देशों में मुकदमेबाजी प्रक्रिया को समझने की कोशिश करनी होगी, जिसमें भारत, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, अमेरिका और कई यूरोपीय देश शामिल हैं।  

  • मान लीजिए कि अमित वादी हैं; इसलिए वह मामला दर्ज करते हैं। अपने मामले को समर्थन देने के लिए उन्हें कई दस्तावेजों पर निर्भर होना होगा और यह दावा करना होगा कि अन्य पक्ष (आशीष) इन दस्तावेजों में दिए गए तथ्यों से परिचित हैं, जो मुकदमे की वजह बने।  
  • मुकदमे के बाद, दूसरे पक्ष यानी आशीष को सूचित किया जाना चाहिए। अमित के आशीष को सूचित करने और उसे तैयारी के लिए दिया जाने वाला समय 30-45 दिन का होता है, जिसे सूचनापत्र का जारी होना कहा जाता है।  
  • अब, सीपीसी  के अनुसार, प्रतिवादी यानी आशीष को समन या सूचनापत्र मिलने की तिथि से 90 दिनों के भीतर अपना लिखित बयान (रिटेन स्टेटमेंट) दाखिल करना होता है। यदि प्रतिवादी ऐसा करने में असफल रहता है, तो अदालत इसे और 90 दिनों के लिए माफ कर सकती है।  
  • मान लीजिए आशीष ने 90 दिनों के बाद अपना लिखित बयान प्रस्तुत किया।  
  • इसके बाद मामला “मुद्दों” के चरण में चला जाता है, जहां मुद्दों का निर्धारण (फ्रेमिंग ऑफ इश्यूज) किया जाता है।  
  • मुद्दों के निर्धारण के बाद, या इसके साथ ही, खोज और पूछताछ  का चरण आता है। अधिकतर भारतीय वकील इस प्रक्रिया का उपयोग दूसरे पक्ष के साक्ष्यों को उजागर करने के लिए नहीं करते। यह हिस्सा आमतौर पर बॉलीवुड फिल्मों में ज्यादा देखा जाता है।  
  • इसके बाद मामला वादी के साक्ष्य के चरण में जाता है, जहां गवाहों की जांच भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तीन चरणों के तहत की जाती है।  
  • तीन प्रकार की जांचें होती हैं: मुख्य परीक्षा (चीफ़ एग्जामिनेशन) : इसमें प्रश्न पूछे जाते हैं, लेकिन लीडिंग प्रश्न (वह प्रश्न जिनमें उत्तर निहित हो) की अनुमति नहीं होती।  
  • जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) : इसे वह पक्ष संचालित करती है जिसके खिलाफ गवाह गवाही दे रहा होता है और इसमें लीडिंग प्रश्नों की अनुमति होती है।  
  • पुनः परीक्षा (री एग्जामिनेशन) : यह मुख्यतः जिरह के दौरान उत्पन्न हुई किसी भी अस्पष्टता या भ्रम को दूर करने के लिए की जाती है। इस दौरान गवाह कोई अतिरिक्त तथ्य या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकता।

पेटेंट उल्लंघन से संबंधित मुकदमे में मूल नियम/सुझाव  

पेटेंट उल्लंघन पर विचार सिविल संहिता द्वारा किया जाता है, न कि पेटेंट कार्यालय द्वारा। पेटेंट कार्यालय कार्यपालिका शक्तियों का पालन करता है लेकिन किसी भी प्रकार की मनमानी नहीं करता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करता है। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में यह अदालत के अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। पेटेंट कार्यालय एक स्वशासित विधान है और विशेष रूप से साक्ष्य अधिनियम या अन्य सिविल संहिता को नहीं अपनाता, लेकिन न्याय को प्राथमिकता देता है।  

पेटेंट उल्लंघन मुकदमे के मूल नियम: 

  • सबसे निचली अदालत जहां मुकदमा दायर किया जा सकता है, वह जिला न्यायालय है। (धारा 104)  
  • प्रत्येक प्रतिवादी, वादी के पेटेंट की अमान्यता का प्रतिवाद (काउंटर क्लेम) प्रस्तुत कर सकता है। इस स्थिति में, मामला उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हो जाता है। (धारा 104)  
  • यदि पेटेंट एक वर्ष से कम पुराना है, तो प्रतिवादी आई पी ए बी (भारतीय पेटेंट अपीलीय मंडल) के समक्ष भी मामला दायर कर सकता है।  
  • यदि पेटेंट एक वर्ष से कम पुराना है, तो प्रतिवादी पोस्ट-ग्रांट आपत्ति भी दर्ज कर सकता है। (धारा 25, बिंदु 2, अध्याय V)  
  • यदि पेटेंट एक वर्ष से अधिक पुराना है, तो प्रतिवादी पेटेंट परीक्षक मंडल के समक्ष दावा कर सकता है। (पेटेंट परीक्षक मंडल का गठन चयनित पेटेंट परीक्षकों और भारतीय पेटेंट कार्यालय के नियंत्रक (कंट्रोलर) के साथ होता है।)  
  • कई बार, चुनौतियों को दूर करने के लिए वादी को पेटेंट में संशोधन करना पड़ता है। (भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 57, 58 और 59 का संदर्भ लें)। संशोधन का अधिकार पेटेंट नियंत्रक, आई पी ए बी और उच्च न्यायालय के पास होता है।  
  • यदि नुकसान की राशि अधिक हो, तो पेटेंट उल्लंघन का मामला चार महानगर न्यायालयों में दायर करना बेहतर है, क्योंकि इन अदालतों में फीस तुलनात्मक रूप से कम होती है।  

पेटेंट उल्लंघन मामले में उपचार  

  • नुकसान के लिए दावा : इस विषय को अगले भाग में “मामले का अध्ययन” के माध्यम से विस्तार से देखा जाएगा।  
  • लाभ के खातों के लिए मुकदमा :  इस प्रक्रिया में आमतौर पर सनदी लेखाकार (चार्टर्ड अकाउंटेंट) या वकील की नियुक्ति की जाती है। वे प्रतिवादी (उल्लंघन करने वाली कंपनी) के रिकॉर्ड की जांच करते हैं। इसमें उनके बिक्री कारोबार (सेल्स टर्नओवर) का मूल्यांकन किया जाता है और यह देखा जाता है कि पेटेंट के उल्लंघन से प्रतिवादी ने कितने लाभ अर्जित किए हैं। यह प्रतिशत 2-25% के बीच हो सकता है। यहां लाभ की मात्रा और स्तर का आकलन किया जाता है।  
  • प्रतिवादी/उल्लंघनकर्ता से सुरक्षा राशि (सिक्युरिटी) की मांग : प्रतिवादी से दावा मूल्य और लागत के बराबर सुरक्षा राशि जमा करने की मांग की जाती है।  
  • मुकदमे के अंत में निषेधाज्ञा (इनजंक्शन) : विचारण (ट्रायल) के अंत में स्थायी निषेधाज्ञा दी जाती है ताकि उल्लंघनकर्ता को भविष्य में पेटेंट का उपयोग करने से रोका जा सके। 
  • अंतरिम निषेधाज्ञा : सामान्यत: अंतरिम निषेधाज्ञा उपलब्ध नहीं होती है क्योंकि पेटेंट उल्लंघन से उत्पन्न नुकसान को वित्तीय मुआवजे के रूप में पर्याप्त रूप से पूरा किया जा सकता है।  

आइए पेटेंट उल्लंघन के उपायों को बेहतर तरीके से मामले के अध्ययनों के साथ समझें। इससे पहले, यह जान लेते हैं कि उल्लंघन का निर्धारण कैसे किया जाए।
पेटेंट द्वारा प्रदान किए गए एकाधिकार के दायरे को केवल दावों से देखा जाएगा। इसलिए, दावे पेटेंट का मुख्य और आधारभूत हिस्सा होते हैं। इस प्रकार, पेटेंट उल्लंघन का निर्धारण दावों को पढ़कर किया जाएगा।

पेटेंट उल्लंघन से बचने के तरीके 

पूर्व कला खोज करें: 

  • किसी भी नए उत्पाद या प्रक्रिया को विकसित या लॉन्च करने से पहले मौजूदा पेटेंट और प्रकाशनों की खोज करें। 
  • यू एस पी टी ओ (संयुक्त राज्य पेटेंट और व्यापार चिह्न कार्यालय) जैसे पेटेंट डेटाबेस में अपने विशेषज्ञता के क्षेत्र से जुड़े मौजूदा पेटेंट खोजें। 
  • एक पेशेवर पेटेंट खोजकर्ता या वकील को इस प्रक्रिया में मदद के लिए नियुक्त करना फायदेमंद हो सकता है।  

फ्रीडम टू ऑपरेट (एफ टी ओ) राय प्राप्त करें:

  • एफ टी ओ राय एक जटिल कानूनी विश्लेषण है जो पेटेंट उल्लंघन के जोखिम का मूल्यांकन करता है।  
  • एक पेशेवर पेटेंट वकील आपके उत्पाद या प्रक्रिया और संबंधित पेटेंट का निरीक्षण करके उल्लंघन के जोखिम का निर्धारण कर सकता है। 
  • एफ टी ओ राय आपको उत्पाद विकास या बाजार में प्रवेश के संबंध में सूचित निर्णय लेने में मदद करती है।  

मौजूदा पेटेंट के चारों ओर डिज़ाइन करें:  

  • यदि आपकी खोज में उल्लंघन की संभावना का पता चलता है, तो आप अपने उत्पाद या प्रक्रिया को बदलने पर विचार कर सकते हैं। 
  • इसके लिए डिज़ाइन में बदलाव, वैकल्पिक सामग्री या घटकों का उपयोग, या अलग-अलग प्रक्रियाओं का विकास आवश्यक हो सकता है। 
  • यह सुनिश्चित करने के लिए पेटेंट वकील के साथ काम करें कि आपके समाधान वैध हैं और अन्य पेटेंट का उल्लंघन नहीं करते।  

अपने स्वयं के पेटेंट प्राप्त करें: 

  • यदि आपके आविष्कार पेटेंट हैं, तो यह उल्लंघन के खिलाफ एक मजबूत बचाव प्रदान करता है। 
  • पेटेंट लाइसेंसिंग या क्रॉस-लाइसेंसिंग समझौतों में बातचीत के लिए उपयोगी हो सकते हैं। 
  • एक पेटेंट वकील को नियुक्त करें ताकि आपकी व्यावसायिक लक्ष्यों के अनुसार पेटेंट रणनीति विकसित और लागू हो सके।  

पेटेंट वॉच सिस्टम अपनाएं:  

  • अपने उद्योग में जारी नए पेटेंट पर नियमित निगरानी रखें ताकि आप उल्लंघन से बच सकें।  
  • पेटेंट निगरानी सेवाओं या सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके प्रासंगिक पेटेंट गतिविधियों पर नज़र रखें।  
  • यदि आप संभावित उल्लंघन वाले पेटेंट को देखते हैं, तो जोखिम का मूल्यांकन करने और प्रतिक्रिया रणनीति तय करने के लिए पेटेंट वकील से परामर्श करें।  

कर्मचारियों को पेटेंट कानून के बारे में शिक्षित करें: 

  • अनुसंधान और विकास, उत्पाद डिज़ाइन, और विपणन में काम करने वाले कर्मचारियों और टीम के सदस्यों को पेटेंट कानून और पेटेंट उल्लंघन के खतरों के बारे में शिक्षित करें। 
  • कर्मचारियों को किसी भी संभावित उल्लंघन की चिंता प्रबंधन या कानूनी सलाहकार को रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित करें।  

सटीक रिकॉर्ड बनाए रखें:  

  • अपने उत्पाद विकास प्रक्रिया के रिकॉर्ड बनाए रखें — डिज़ाइन दस्तावेज़, प्रोटोटाइप, परीक्षण परिणाम। 
  • ऐसे रिकॉर्ड किसी भी उल्लंघन दावों के खिलाफ अपना बचाव करने के लिए उपयोगी प्रमाण के रूप में काम कर सकते हैं।  

अतिरिक्त विचार

  • अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट सुरक्षा: यदि आप अपने उत्पादों या सेवाओं को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेचना चाहते हैं, तो इन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेटेंट करवाने पर विचार करें।
  • पेटेंट मुकदमा: यदि किसी पर पेटेंट उल्लंघन का आरोप है, तो विकल्पों का मूल्यांकन करने और बचाव योजना तैयार करने के लिए जल्द से जल्द कानूनी सलाह प्राप्त करें।
  • विकल्पी विवाद समाधान: पेटेंट विवादों को अदालत के बाहर हल करने के लिए मध्यस्थता या आर्बिट्रेशन जैसी विकल्पी विवाद समाधान विधियों पर विचार करें।

मामला अध्ययन  

मामला अध्ययन 1 (टेलोफोनअक्टिबोलागेट एलएम एरिक्सन… बनाम प्रतिस्पर्धा आयोग भारत और…)  

वादी को एरिक्सन के नाम से भी जाना जाता है और प्रतिवादी यहाँ माइक्रोमैक्स है। ये दोनों नाम जब अब कहे जाते हैं तो आपके दिमाग में मोबाइल फोन/स्मार्टफोन के उत्पाद से जुड़ी कंपनियों की याद आनी चाहिए। यह मामला जीएसएम, एडीज और 3जी तकनीकी से संबंधित कई मानक आवश्यक पेटेंट्स (एस ई पी) के लिए दावे के कारण दायर किया गया था।  

अदालत का निर्णय एरिक्सन के पक्ष में था और माइक्रोमैक्स को पेटेंट उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। माइक्रोमैक्स को एरिक्सन को रॉयल्टी के रूप में एक बड़ी राशि चुकानी पड़ी। अदालत के निर्णय ने पेटेंट प्रौद्योगिकी को लाइसेंस देने के मामले में एफ.आर.ए.एन.डी (न्यायसंगत, उचित, और बिना भेदभाव के) शर्तों को प्रतिबिंबित किया।  

मामला अध्ययन 2 (स्मिथक्लाइन बीचम बनाम फुजिमोटो फार्मास्युटिकल्स कंपनी, टोक्यो जिला न्यायालय 1998)  

पहली बात यह है कि यह मामला अध्ययन भारत का नहीं है, बल्कि जापान के पेटेंट उल्लंघन के मामले का एक उदाहरण है और मैं आपको बता दूं कि इस मामले ने जापान के पेटेंट उल्लंघन मामलों के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा पुरस्कार प्राप्त किया।  

स्मिथक्लाइन बीचम के पास एक उत्पाद जिसका नाम सिमेटिडाइन (एक दवा) था, पर प्रक्रिया पेटेंट था, जो 5 सितंबर 1993 तक वैध था।  

फुजिमोटो ने दिसंबर 1986 में स्लोवेनिया से उल्लंघन करने वाला उत्पाद आयात किया, 68,000 गोलियां बेचीं और सिमेटिडाइन सायलोक का जनरिक संस्करण निर्मित किया।  

स्मिथक्लाइन ने दावा किया कि फुजिमोटो ने उनके पेटेंट का उल्लंघन दिसंबर 1986 से लेकर सितंबर 1993 तक किया।  

न्यायाधीश ने अंततः स्मिथक्लाइन बीचम के पक्ष में निर्णय लिया, उन्हें 4.2 मिलियन डॉलर रॉयल्टी के रूप में और 21 मिलियन डॉलर खोए हुए लाभ के रूप में दिए, मानते हुए कि लाभ दर 15% थी।  

यह आज तक जापान में पेटेंट उल्लंघन के मुकदमे में दिया गया सबसे बड़ा मौद्रिक पुरस्कार है। मेरा अनुमान है कि तब से यह हर अन्य कंपनी और व्यवसायी के दिल में डर उत्पन्न कर चुका होगा।

निष्कर्ष  

निष्कर्ष में, पेटेंट उल्लंघन केवल भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक वास्तविक समस्या है और हमें इन उल्लंघनकर्ताओं को भी श्रेय देना चाहिए क्योंकि वे कोई चाकू चलाने वाले जंगली नहीं हैं; वे काफी बुद्धिमान हैं, वास्तव में, किसी दूसरे व्यक्ति के आविष्कार को सभी विवरणों के साथ अपना श्रेय पाने के लिए वे अच्छी तरह से रणनीति बनाते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब पेटेंट दाखिल किया जाए, तो पहले से ही उल्लंघनकर्ताओं के तैयार होने के लिए योजना बनानी चाहिए ताकि वे लाभ का एक हिस्सा छीन सकें और पेटेंट तैयार करते समय उल्लंघनकर्ताओं को ध्यान में रखते हुए उपायों को लागू किया जाए, साथ ही पेटेंट को और अधिक संपूर्ण और उल्लंघन-मुक्त बनाने की कोशिश की जाए। यदि ऐसा होता भी है, तो भारत में हमारे पास अदालतें, पेटेंट नियंत्रक, और आईपीएबी हैं, जिनके पास पेटेंट उल्लंघन के किसी भी परिदृश्य के लिए कई उपाय मौजूद हैं। गलती से भी यह मत समझिए कि मैं उल्लंघनकर्ताओं की प्रशंसा कर रहा हूं, बल्कि मैं उनकी चतुराई का संकेत दे रहा हूं, इस तरह से आविष्कारकों और पेटेंट विनिर्देशन तैयार करने वालों को यह प्रेरित करने का प्रयास कर रहा हूं कि वे पेटेंट दाखिल करते समय उल्लंघनकर्ताओं को भी ध्यान में रखें। समय के साथ, पेटेंट उल्लंघन के लिए उपाय बढ़े हैं और भारत, जो पेटेंट स्वीकृति के मामले में दुनिया के सबसे कड़े देशों में से एक है, उल्लंघन के ऐसे मामलों में उपायों के साथ खड़ा है।  

संदर्भ

 

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत

यह लेख Neha Gururani द्वारा लिखा गया है और आगे Titas Biswas द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख मुस्लिम कानून के तहत वसीयत के सभी पहलुओं के संबंध में विस्तृत जानकारी देता है, जहां लेखकों ने वसीयत की अवधारणा पर गहराई से जाते हुए इसकी वैधता, औपचारिकता, सीमा, वसीयत की संपत्ति लेने के योग्य लोग, वसीयत के निरसन (रिवोकेशन) की प्रक्रिया, उन मामलों के परिणाम जहां वसीयत का हिस्सा निर्दिष्ट है और जहां निर्दिष्ट नहीं है, सुन्नी कानून और शिया कानून के तहत इस अवधारणा में अंतर और ऐसे अन्य पहलुओं को शामिल किया हैं। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

संपत्ति के निपटान के तरीके हिंदू कानून और मुस्लिम कानून दोनों के तहत अलग हैं। इन दोनों के नियम और कानून अलग-अलग हैं। इस्लामी कानून के तहत, एक मुसलमान उपहार द्वारा, वक्फ बनाकर या अपनी वसीयतनामा शक्तियों का उपयोग करके यानी वसीयत बनाकर अपनी संपत्ति का निपटान कर सकता है।

इस्लामी कानून के तहत वसीयत की अवधारणा दो अलग-अलग प्रवृत्तियों के बीच एक प्रकार का सौदा है। एक, पैगंबर का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद, उसकी संपत्ति को उसके उत्तराधिकारियों को वितरित किया जाना है, और इस नियम को ईश्वरीय कानून माना जाता है, और इसमें कोई हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। दूसरी ओर, हर मुसलमान का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति के लिए उचित व्यवस्था करे। वसीयत को हर मुस्लिम व्यक्ति की नैतिक परिधि (कम्पास) कहा जाता है जो उसे सही रास्ते से विचलित हुए बिना अपने परिवार के प्रति दान और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करता है।

एक महान मुस्लिम कमांडर साद इब्न अबी वक्कास ने एक बार अपनी विदाई तीर्थयात्रा के दौरान ईश्वर के दूत के साथ अपनी दिव्य मुलाकात की कहानी सुनाई। उन्होंने पैगंबर के साथ अपनी पीड़ा साझा की कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी विशाल संपत्ति पीछे छूट गई और यह की उनके पास केवल उनकी बेटी ही है जिसे वह विरासत में मिले। अपनी चिंता साझा करते हुए, अबी वक्कास ने उपहार के रूप में अपनी संपत्ति का दो-तिहाई हिस्सा देने का इरादा व्यक्त किया। पैगंबर ने उन्हें अपनी संपत्ति का एक तिहाई दान करने और अपनी बेटी के लिए अधिक राशि आरक्षित करने का निर्देश दिया और इस बात पर जोर दिया कि अपनी बेटी को स्थिर वित्तीय सहायता के साथ छोड़ना उसे दूसरों पर निर्भर छोड़ने से बेहतर है।

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत का अर्थ और प्रकृति

परंपरागत रूप से, एक वसीयत, जिसे ‘वसीयतनामा’ भी कहा जाता है, एक ऐसी विधि है जो किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति जिसे वह अपनी मृत्यु के बाद देना चाहता है, का निपटान करने में सक्षम बनाती है। वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही वसीयत लागू होती है। वसीयत एक संपत्ति की कानूनी घोषणा है जिसे ऐसी संपत्ति के मालिक की मृत्यु के बाद हस्तांतरित किया जाता है। वसीयत मूल रूप से एक कानूनी दस्तावेज है जो वसीयतकर्ता (वसीयत के निर्माता) के इरादे को उसकी संपत्ति के वितरण के अनुसार घोषित करता है, जहां वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद ऐसा निपटान लागू होता है।

यद्यपि ‘वसीयत’ की परिभाषा एक संहिताबद्ध स्रोत से नहीं ली गई है, इस्लामी कानून में, एक मुस्लिम द्वारा निष्पादित वसीयत को ‘वसीयत’ के रूप में जाना जाता है। तैयबजी के अनुसार, ‘वसीयत’ का अर्थ ‘उपदेश’ है, जिसका आम तौर पर अर्थ है आज्ञा या निर्देश का इरादा। एक बहुत प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान ‘अमीर अली’ ने एक वसीयत को मुसलमान के दृष्टिकोण से एक दिव्य संस्था के रूप में परिभाषित किया क्योंकि इसका अभ्यास पवित्र कुरान द्वारा विनियमित है। अल-बुखारी (एक प्रमुख हदीस विद्वान) ने अपनी पुस्तक सहीह अल-बुखारी में अब्दुल्ला बिन उमर का उल्लेख किया, जो दूसरे खलीफा उमर के बेटों में से एक थे और पैगंबर मुहम्मद के साथी थे, जिन्होंने पैगंबर की शिक्षाओं में से एक को बताया था कि “एक मुसलमान जिसके पास कुछ है, उसे बिना वसीयत के दो रातें गुजारने का भी कोई अधिकार नहीं है जब तक कि उसने पहले से ही एक लिखा न हो”।

कुछ प्रतिबंधों और सीमाओं को बनाए रखते हुए एक वसीयत की जानी चाहिए। ऐसी सीमाओं का अनुप्रयोग सुन्नी कानून और शिया कानून दोनों के तहत समान नहीं है। शिया कानून के तहत, वसीयतकर्ता की कुल संपत्ति के एक-तिहाई से अधिक की वसीयत केवल तभी मान्य होती है जब उत्तराधिकारियों ने इसके लिए सहमति दी हो।

इसलिए, यह माना जा सकता है कि वसीयत एक वसीयतनामा घोषणा के माध्यम से किए गए स्वामित्व का स्वैच्छिक हस्तांतरण है, जो वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद लागू होता है। इसलिए वसीयत की कानूनी अवधारणा को एक वसीयतनामा उपहार के रूप में माना जा सकता है।

वसीयत के पक्ष

वसीयतकर्ता

वसीयत का निर्माता उस वसीयत का वसीयतकर्ता होता है। एक वसीयतकर्ता को एक मुस्लिम, समझदार व्यक्ति होना चाहिए, अठारह वर्ष की आयु प्राप्त कर लेनी चाहिए, और किसी भी अनुचित प्रभाव या जबरदस्ती से मुक्त ऐसी वसीयत बनाने के लिए सहमति दी होनी चाहिए।

वसीयतदार (लेगेटी)

जिस व्यक्ति के पक्ष में वसीयत की जाती है, वह उस वसीयत का वसीयतदार होता है। एक वसीयतदार की पूर्वापेक्षाओं में अस्तित्व में एक मानव होना शामिल है, जो अपनी मां के गर्भ में एक अजन्मे व्यक्ति को भी शामिल करता है। एक वसीयतदार वसीयत में संपत्ति को स्वीकार या त्याग सकता है।

विरासत

वसीयत में विरासत, वसीयत में दी गई संपत्ति को दर्शाती है। यह अक्सर वसीयत में संपत्ति के साथ परस्पर विनिमय के लिए उपयोग किया जाता है, जिसे इस तरह की वसीयत के निष्पादन पर निपटाया जाना निर्धारित है।

निष्पादक

एक निष्पादक एक वसीयत के वसीयतकर्ता द्वारा नियुक्त व्यक्ति है जो वसीयत की सामग्री और निर्देशों के अनुसार वसीयत को निष्पादित करने के लिए नियुक्त किया जाता है। अदालत वसीयतकर्ता द्वारा नियुक्ति की अनुपस्थिति में एक निष्पादक (जिसे ‘प्रशासक’ भी कहा जाता है) को नियुक्त कर सकती है।

मुस्लिम कानून के तहत वैध वसीयत की अनिवार्यता

वसीयत के वैध होने पर उसे कुछ पूर्वापेक्षाओं के साथ पूरा करना होगा। ये शर्तें वसीयत को वैध और निष्पादन योग्य मानेंगी। निम्नलिखित आवश्यक शर्तें हैं-

  • वसीयतकर्ता को वसीयत बनाने के लिए सक्षम होने के लिए सभी शर्तों को पूरा करना होगा।
  • वसीयतदार की क्षमता और सहमति मौजूद होनी चाहिए।
  • वसीयत की गई विरासत एक वसीयत योग्य संपत्ति होनी चाहिए और वसीयत बनाने के समय अस्तित्व में होनी चाहिए।
  • वसीयत बनाने के समय वसीयतकर्ता की स्वतंत्र सहमति मौजूद होनी चाहिए।
  • वसीयतकर्ता को वसीयत की गई संपत्ति के स्वामित्व और वसीयतनामा अधिकारों को धारण करना चाहिए।

वसीयत कौन बना सकता है

एक वैध वसीयत में कुछ शर्तें होती हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण और अपरिहार्य स्थिति वसीयतकर्ता की क्षमता है। वसीयतकर्ता की कानूनी क्षमता के बिना, वसीयत को वैध नहीं माना जाता है, जिससे यह शून्य हो जाती है। इन सभी शर्तों को पूरा करने वाला व्यक्ति वसीयत बनाने के लिए सक्षम है।

एक मुसलमान

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत तभी मान्य होगी जब ऐसी वसीयत मुस्लिम व्यक्ति द्वारा की गई हो। मुस्लिम कानून के तहत वसीयत से संबंधित कानून घोषित करते हैं कि केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही वसीयत करने का पात्र है। हालांकि, वसीयतदार, अर्थात्, जिसके पक्ष में संपत्ति वसीयत की गई है, एक गैर-मुस्लिम व्यक्ति हो सकता है।

यदि किसी मुस्लिम व्यक्ति ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत शादी की है, तो वसीयत के प्रावधान भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अनुसार शासित होंगे। मुस्लिम कानून और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत वसीयत के बीच मुख्य अंतर यह है कि, मुस्लिम कानून के तहत, वसीयतकर्ता के पास सीमित वसीयतनामा शक्तियां हैं, जिसका अर्थ है कि वह अपनी संपत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं बना सकता है। जबकि, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत इस तरह के कोई प्रतिबंध नहीं हैं और एक वसीयतकर्ता अपनी सभी संपत्तियों को वसीयत कर सकता है।

यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति वसीयत बनाने के बाद इस्लाम से अपना धर्म परिवर्तित करता है और गैर-मुस्लिम के रूप में मर जाता है, तो वसीयत को अमान्य नहीं किया जाएगा। इस सिद्धांत के पीछे तर्क यह है कि, वसीयत बनाने के समय, वसीयतकर्ता मुस्लिम था। हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक वसीयत को मुस्लिम विचार के विशिष्ट विचारधारा के कानूनों के अनुसार शासित किया जाना चाहिए, जिससे वसीयतकर्ता संबंधित है।

स्वस्थ मन

मुस्लिम कानून के सिद्धांतों में कहा गया है कि वसीयतकर्ता को वसीयत करते समय स्वस्थ दिमाग का होना चाहिए और अपने कार्यों की प्रकृति और परिणामों को जानना चाहिए। वसीयतकर्ता के पास ऐसी संपत्ति को वसीयत करने का ज्ञान और इरादा होना चाहिए। पटना उच्च न्यायालय ने अब्दुल मनन खान बनाम मिर्तुजा खान और अन्य (1991), के मामले में निर्णय गया कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति जो स्वस्थ दिमाग का है और नाबालिग नहीं है, अपनी संपत्ति का निपटान करने के लिए वसीयत बना सकता है।

तैयबजी ने अपनी पुस्तक ‘मुस्लिम कानून के सिद्धांत (1913)’ में उद्धृत किया है, “किसी व्यक्ति, जब वह अस्वस्थ दिमाग का होता है, द्वारा बनाई गई वसीयत, मान्य नहीं होती, जब वह उसके बाद स्वस्थ दिमाग का हो जाता है। स्वस्थ दिमाग के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा की गई वसीयत अमान्य हो जाती है यदि वसीयतकर्ता बाद में स्थायी रूप से मन से अस्वस्थ हो जाता है। इस पुस्तक की धारा 578 ‘वसीयत बनाने के लिए वसीयतकर्ता की क्षमता’ के प्रावधान प्रदान करती है। मुस्लिम कानून के तहत एक वसीयतकर्ता के स्वस्थ दिमाग के बारे में एक और निर्धारण अमीर अली की ‘मुस्लिम कानून’ की पुस्तक में पता लगाया जा सकता है, जहां उन्होंने एक कानूनी विद्वान द्वारा व्यक्त किए गए दृष्टिकोण का उल्लेख किया कि यदि कोई वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति की वसीयत करता है और बाद में पागल हो जाता है, तो ऐसी वसीयत शून्य हो सकती है। आगे यह व्यक्त किया गया है कि, ऐसे मामले में जहां अस्वस्थता की अवधि केवल छह महीने के लिए रहती है, वसीयत वैध रहेगी।

एक वयस्क 

वसीयतकर्ता को वसीयत बनाते समय वयस्कता की आयु प्राप्त करनी चाहिए। आमतौर पर मुस्लिम कानून के तहत वयस्क की उम्र 15 साल मानी जाती है। हालांकि, यह भारत में वसीयत के मामले में लागू नहीं है। मुस्लिम व्यक्ति की वयस्कता की आयु, विवाह, तलाक, दहेज और गोद लेने के मामलों के अपवाद के साथ, भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 द्वारा शासित होती है, जो 18 वर्ष है। हालांकि, ऐसी परिस्थितियों में जहां अदालत ने नाबालिग के लिए एक अभिभावक नियुक्त किया है या नाबालिग की संपत्ति को प्रतिपालय का न्यायालय (कोर्ट ऑफ वार्ड्स) के अधीक्षण के तहत ग्रहण किया गया है, नाबालिग के वयस्क की आयु को प्रतिपालय का न्यायालय अधिनियम, 1977 के अनुसार विनियमित किया जाएगा, जो कि 21 वर्ष है।

शिया कानून के अनुसार, एक वसीयत की वैधता का आकलन करने के संबंध में एक वसीयतकर्ता की वयस्क महत्वहीन है, और एक मुस्लिम व्यक्ति जो 10 वर्ष का है, वह भी वसीयत बना सकता है। तथापि, अब्दुल मनन खान बनाम मिर्तुजा खान एवं अन्य (1991), के मामले में पटना उच्च न्यायालय द्वारा इस रुख का समर्थन नहीं किया गया था और स्थापित किया कि एक नाबालिग द्वारा घोषित वसीयत शून्य है।

आत्महत्या से वसीयतकर्ता की मौत

शिया कानून के तहत, आत्महत्या से वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद उसके द्वारा बनाई गई वसीयत शून्य है। इस सिद्धांत के पीछे तर्क मन की अस्थिरता और तर्कसंगत सोच की अक्षमता है। हालांकि, अदालत ने मजहर हुसैन बनाम बोधा बीबी (1898) 21 ऑल 91 पीसी के मामले में कहा कि जहर खाने या आत्महत्या करने की दिशा में कोई कार्य करने से पहले किसी व्यक्ति द्वारा बनाई गई वसीयत वैध होगी। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस नियम के तहत वसीयत की अमान्यता साबित करने का दायित्व उस व्यक्ति पर है जो उस पर आरोप लगा रहा है।

सुन्नी कानून के तहत ऐसा कोई अपवाद नहीं है, और इसलिए, इस नियम के तहत वसीयत की अमान्यता सुन्नी कानून के तहत लागू नहीं होती है।

वसीयतकर्ता की स्वतंत्र सहमति

एक वसीयत एक वसीयतनामे के माध्यम से हस्तांतरण है, जो मूल रूप से एक संविदात्मक दस्तावेज है। इसलिए, वसीयत के वैध होने के लिए, एक वैध अनुबंध के सभी आवश्यक तत्वों को शामिल किया जाना चाहिए, और वसीयत के निर्माता की स्वतंत्र सहमति उनमें से एक है। एक स्वतंत्र सहमति वह है जो अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, धोखाधड़ी या जानबूझकर गलत बयानी से प्रभावित नहीं होती है। इसलिए, वसीयत बनाते समय, एक वसीयतकर्ता के पास इसे बनाने के लिए स्वतंत्र सहमति होनी चाहिए और इसके लिए मजबूर या धमकी नहीं दी जानी चाहिए।

आम तौर पर, स्वतंत्र सहमति को कानून द्वारा माना जाता है और विसंगतियों की स्थिति में, वसीयतकर्ता की वैध और स्वतंत्र सहमति साबित करने के लिए सबूत का बोझ वसीयत की वैधता का दावा करने वाले व्यक्ति पर होता है। इसे दिल्ली की एक जिला अदालत ने रहीसुद्दीन बनाम फातिमा (2020) के मामले में भी ठोस ठहराया था।

वसीयत के तहत संपत्ति कौन ले सकता है

जैसा कि पहले चर्चा की गई है, एक वसीयतनामा के द्वारा हस्तांतरण एक संविदात्मक समझौते के रूप में है और इसलिए, एक वसीयतकर्ता की सहमति अनिवार्य रूप से स्वतंत्र होनी चाहिए। इसी तरह, वसीयत के वैध होने के लिए, एक वसीयतदार की क्षमता भी मौजूद होनी चाहिए। निम्नलिखित बिंदु हैं जो एक उचित वसीयतदार निर्धारित करते हैं –

अस्तित्व में व्यक्ति

वसीयत को अपने पक्ष में स्वीकार करने के लिए वसीयतदार का अस्तित्व होना अनिवार्य है। एक वसीयत एक वसीयतकर्ता द्वारा एक वसीयतदार के पक्ष में की जाती है, इसके लिए उसकी मृत्यु के बाद निष्पादित किया जाता है लेकिन इस तरह के वसीयतदार के जीवनकाल के दौरान। यदि कोई वसीयतकर्ता शिया कानून के तहत वसीयतदार को छोड़ जाता है, तो ऐसी विरासत, वसीयतदार के कानूनी उत्तराधिकारियों की अनुपस्थिति में समाप्त हो जाएगी। इस बीच, सुन्नी कानून के तहत, वसीयत की गई संपत्ति को वसीयतकर्ता को वापस कर दिया जाएगा।

हालांकि, एक पागल व्यक्ति, एक नाबालिग या एक गैर-मुस्लिम व्यक्ति के पक्ष में एक वसीयत घोषित की जा सकती है। हालांकि, जिस व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति वसीयत की गई है, उसे इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि एक वसीयतदार सक्षम हो और संपत्ति रखने के लिए अस्तित्व में हो। एक वसीयतदार के सक्षम होने के लिए उम्र, लिंग, जाति, धर्म और मन की स्थिति कोई मायने नहीं रखती। एक धर्मार्थ या शैक्षणिक संस्थान के पक्ष में एक वसीयत भी वैध है और ऐसे संस्थान एक वैध वसीयतदार होने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, एक धार्मिक संस्था जो दूसरे धर्म का प्रचार करती है और इस्लाम को नीचा दिखाती है, वह एक सक्षम वसीयतदार नहीं होगी जैसा कि लाहौर उच्च न्यायालय ने बदरुल इस्लाम अली खान बनाम अली बेगम, एआईआर 1935 एलए 251 के तहत आयोजित किया था। हालांकि, एक मुस्लिम व्यक्ति अपने वसीयत के माध्यम से, मस्जिद के अलावा चर्च या किसी अन्य धार्मिक संस्थान का निर्माण नहीं कर सकता है। ऐसा धार्मिक संस्थान वैध वसीयतदार नहीं होगा। इस लेख में बाद में ‘पवित्र उद्देश्यों के लिए वसीयत’ शीर्षक के तहत विस्तार से चर्चा की गई है।

अजन्मा बच्चा

एक बच्चा जो मां के गर्भ में है, के लिए एक वसीयत मान्य है, बशर्ते कि वसीयत की घोषणा के समय बच्चा मां के गर्भ में अस्तित्व में होना चाहिए। वसीयतकर्ता द्वारा वसीयत की घोषणा के समय वसीयतदार का गैर-अस्तित्व वसीयत को अमान्य कर देता है और इसे शुरू से ही शून्य बना देता है। अब्दुल कादुर हाजी मोहम्मद बनाम सीए टर्नर आधिकारिक समनुदेशिती (असाइनी) और अन्य (1884) के मामले में न्यायालय द्वारा यह रुख अपनाया गया था। इस मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बेले की किताब ‘ए डाइजेस्ट ऑफ मोहमद्दन लॉ’ का हवाला दिया, जहां उन्होंने एक अजन्मे बच्चे के मामले में वसीयत के माध्यम से संपत्ति की दूसरी शर्त को ठोस बनाया। उन्होंने अजन्मे बच्चे के पक्ष में घोषित वसीयत की वैधता की पुष्टि की यदि वह बच्चा सुन्नी कानून के तहत वसीयत की तारीख से छह महीने के भीतर और शिया कानून के तहत दस महीने की अवधि के भीतर पैदा होता है।

वसीयतकर्ता का हत्यारा

वसीयत एक व्यक्ति की इच्छा से संपत्ति का हस्तांतरण है और इस तरह के दस्तावेज को वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद ही निष्पादित किया जाता है। इसलिए, ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां कोई इस व्यवस्था का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करता है, इसलिए वसीयतकर्ता की हत्या करता है। ऐसे व्यक्ति के पक्ष में वसीयत शून्य है। तैयबजी ने अपनी पुस्तक मुस्लिम कानून के सिद्धांत में इस सिद्धांत की उत्पत्ति के बारे में लिखा है। उनका कहना है कि पूर्व-इस्लामी काल में विरासत का मूल कारण ईर्ष्यापूर्ण रिश्तों से उत्पन्न हुआ जो रक्तपात में समाप्त हो गया। उन्होंने एक मामले की जांच करते हुए न्यायमूर्ति सर एस इवांस द्वारा कही गई पंक्तियों को भी उद्धृत किया, “यह स्पष्ट है कि कानून यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अपराध से उत्पन्न किसी भी अधिकार को प्राप्त नहीं कर सकता है, या लागू नहीं कर सकता है, न ही उसका प्रतिनिधि, जो उसके तहत दावा कर सकता है, ऐसे किसी भी अधिकार को प्राप्त या लागू कर सकता है।

एक वसीयतकर्ता के वसीयतदार के कारण होने वाली अनजाने में हुई मौत भी वसीयत को अमान्य कर देगी। हालांकि, शिया कानून के तहत, मृत्यु का ऐसा कारण वसीयत को अमान्य नहीं ठहराता है, बशर्ते कि कानूनी उत्तराधिकारियों के पास इसके लिए सहमति होनी चाहिए। हालांकि, यदि ऐसा वसीयतदार एकमात्र मालिक है, तो किसी सहमति की आवश्यकता नहीं होगी, और वह एक वैध वसीयतदार होगा।

वसीयतदार की सहमति

वसीयत की अवधारणा में, इसके लिए दोनों पक्षों की सहमति अनिवार्य रूप से स्वतंत्र होनी चाहिए। इसलिए, विरासत के स्वामित्व को वसीयतदार को हस्तांतरित करने के लिए वसीयतदार की सहमति के साथ संरेखण में होना चाहिए। एक वसीयतदार को वसीयत को अस्वीकार करने का पूरा अधिकार है, और इस तरह के अस्वीकरण पर, वसीयत की गई संपत्ति को वसीयतदार को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा। हालांकि, शिया कानून के तहत, एक वसीयतदार वसीयत के एक हिस्से को स्वीकार कर सकता है और शेष को अस्वीकार कर सकता है।

ऐसी स्थिति में जहां वसीयतकर्ता वसीयत को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना वसीयतदार से पहले मर जाता है, सुन्नी कानून के अनुसार, उसे निहित रूप से सहमति दी गई मानी जाएगी। जबकि, शिया कानून के अनुसार, वसीयत को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार उत्तराधिकारियों के पास है।

संयुक्त वसीयतदार

एक वसीयत को एक से अधिक वसीयतदार के पक्ष में घोषित किया जा सकता है, ऐसे वसीयतदार को संयुक्त वसीयतदार के रूप में जाना जाता है। संयुक्त वसीयतदार की धारणा के तहत दो परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। सबसे पहले, जहां हिस्से निर्दिष्ट है और दूसरा, जहां हिस्से अनिर्दिष्ट है।

जहां हिस्सा निर्दिष्ट है

एक वसीयत में जहां हिस्सों को वसीयतकर्ता द्वारा स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया जाता है, वसीयत की जाने वाली संपत्ति को निर्दिष्ट हिस्से के अनुसार वितरित किया जाना चाहिए।

उदाहरण के लिए, यदि एक वसीयतकर्ता अपने तीन बेटों के पक्ष में एक वसीयत बनाता है, यह निर्दिष्ट करते हुए कि उनके बीच वितरण अनुपात क्रमशः S1, S2 और S3 के लिए 3: 2: 1 होना चाहिए, तो संपत्ति को वसीयतकर्ता द्वारा निर्धारित अनुपात के अनुसार तीन बेटों के बीच विभाजित किया जाएगा।

जहां हिस्सा निर्दिष्ट नहीं है

यदि, वसीयत में, वसीयतकर्ता द्वारा कोई हिस्सा निर्दिष्ट नहीं किया जाता है, तो वसीयत की गई संपत्ति को वसीयतदारो के बीच समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए। जब वसीयत किसी वर्ग के व्यक्तियों के पक्ष में घोषित की जाती है तो ऐसे वर्ग को केवल एक वसीयतदार के रूप में माना जाएगा जैसा कि दूसरे वर्ग के लोगों के विरुद्ध है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई वसीयतकर्ता अपने बेटे ‘X’ के लिए और फकीरों के लिए अपनी संपत्ति का एक-तिहाई वसीयत बनाता है, तो ‘X’ और फ़कीर को उसकी संपत्ति का एक-छठा हिस्सा प्राप्त होगा। यहां, फकीरों को एक एकल वसीयतदार माना जाता है क्योंकि यह व्यक्तियों के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

एक और उदाहरण हो सकता है, जहां एक वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा अपने तीन चचेरे भाई, फकीर और बेहद गरीब लोगों के एक वर्ग को देता है। यहां, संपत्ति का पंद्रहवां हिस्सा इन तीन वर्गों के लोगों के बीच वितरित किया जाएगा।

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत की औपचारिकताएं

मुस्लिम कानून स्पष्ट रूप से वसीयत के निष्पादन के लिए किसी भी औपचारिकता को निर्दिष्ट नहीं करता है। एक वसीयत ज्यादातर उस वसीयत के निर्माता के इरादे से निर्धारित होती है। हालांकि, सुलेमान कद्र बनाम दाराह अली खान (1881) के मामले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि वसीयत का इरादा प्रकृति में स्पष्ट होना चाहिए। कई पूर्ववर्ती कानूनों ने यह भी देखा है कि वसीयत में ज़ोरदार शब्दावली या शब्दजाल नहीं होने चाहिए। एक वसीयत को सरल वाक्यों में तैयार किया जाना चाहिए और जटिल वाक्यों से बचना चाहिए, जैसा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मजहर हुसैन बनाम बोधा बीबी (1898) 21 ऑल 91 के मामले में आयोजित किया था। कुवारबाई बनाम मीर आलम खान (1883) के मामले में, अदालत ने व्यक्त किया कि वसीयत में उसके द्वारा की गई घोषणा के बराबर वसीयतकर्ता का इरादा होना चाहिए।

मौखिक वसीयत

वसीयत को मौखिक रूप से केवल “मैं, अब अपनी मृत्यु के बाद X के नाम पर इस संपत्ति को वसीयत करता हूं” जैसे शब्दों का उच्चारण करके घोषित किया जा सकता है। वसीयत बनाने की मात्र घोषणा वसीयत को मान्य करती है। हालांकि, इस तरह की वसीयत के वैध अस्तित्व के प्रमाण का बोझ भारी हो सकता है। अंततः, एक मौखिक वसीयत को तिथि, समय और स्थान में सटीकता के साथ अत्यधिक निष्ठा के साथ साबित करना होगा।

ऐसी स्थिति में, जहां पर्याप्त समय होने के बावजूद, वसीयत मौखिक रूप से बनाई जाती है, यह संदेह की रोशनी फेंक सकती है लेकिन ऐसी वसीयत की वैधता को समाप्त नहीं करेगी। यह रुख अदालत ने तमीज बेगम बनाम फुरहुत हुसैन (1870) 2 एनडब्ल्यू 55 के मामले में रखा था।

लिखित वसीयत

एक लिखित वसीयत को किसी विशेष रूप से निर्धारित तरीके का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। एक स्पष्ट इरादे से बनाई गई वसीयत ऐसी इच्छा को मान्य करने के लिए पर्याप्त होगी। वसीयत वैध होती है, भले ही उस पर वसीयतकर्ता द्वारा हस्ताक्षर न किए गए हों या गवाहों द्वारा सत्यापित न की गई हो। औलिया बेगम बनाम अलाउद्दीन (1906) के मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वसीयत की वैधता को बरकरार रखा, जहां यह वसीयतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित नहीं था या किसी भी गवाह द्वारा सत्यापित नहीं था। यह व्यक्त किया गया कि इस तरह की वसीयत बनाने का एक स्पष्ट इरादा और पूर्व निर्देश इसे वैध होने के लिए गठित करेगा। अदालत ने, इस मामले में, पार्कर बनाम फिलगेट (1883) एलआर, 8. पीडी, 171 के मामले का उल्लेख किया, जिसमें यह देखा गया था कि एक वसीयत वैध होगी यदि यह एक महिला वसीयतकर्ता द्वारा प्रदान किए गए निर्देशों के अनुसार बनाई गई है, भले ही निष्पादन के समय, महिला वसीयतकर्ता निर्देशों को विस्तार से याद नहीं करती है, लेकिन मानती है कि वसीयत को उसके निर्देश में बनाया गया था। अदालत ने औलिया बेगम के मामले की जांच करते हुए इंग्लैंड के कुछ अन्य मामलों का उल्लेख किया, जो वसीयत से संबंधित थे। यह मानते हुए अपने निष्कर्ष पर पहुंचा कि वसीयत के कानून के तहत, मुस्लिम कानून में, इस तरह की कोई औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है, जिसमें महिला वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर या किसी गवाह का सत्यापन शामिल है। कुरान के ईश्वरीय मार्गदर्शन में भी इसका उल्लेख है। वसीयत की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करना वसीयत के वैध होने को न्यायोचित ठहराता है।

इशारों से बनाई गई वसीयत

इस्लामी कानून के तहत, इशारों से वसीयत बनाई जा सकती है। बेली और तैयबजी के अनुसार, यदि कोई बीमार व्यक्ति, बंदोबस्ती करते समय, अपना सिर हिलाकर उसी के लिए अपना इरादा व्यक्त करता है, तो उसे वैध वसीयत बनाना कहा जाएगा।

मृत्यु-शय्या पर बनी वसीयत

वसीयतकर्ता द्वारा अपनी मृत्यु-शय्या पर बनाई गई वसीयत, जिसे औपचारिक रूप से ‘मर्ज़-उल-मौत’ कहा जाता है, एक वैध वसीयत है। वसीयतकर्ता की सीमित वसीयतनामा शक्तियां यहां भी लागू होती हैं, जो उसे अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा देने के लिए प्रतिबंधित करती हैं। इस मामले के तहत की गई वसीयत किसी भी शर्त से रहित होनी चाहिए और उसके बाद वसीयतकर्ता की मृत्यु हो जानी चाहिए, अन्यथा ऐसी वसीयत अमान्य होगी। यह इब्राहिम गुलाम आरिफ बनाम सैबू (1907) के मामले में आयोजित किया गया था, जहां विचाराधीन संपत्ति को वसीयत के बजाय एक वैध उपहार माना गया था क्योंकि वसीयत के बाद वसीयतकर्ता की मृत्यु नहीं हुई थी।

वसीयत की विषय-वस्तु

वसीयत की विषय वस्तु किसी भी प्रकृति की हो सकती है, चाहे वह साकार हो या निराकार, चल या अचल। हालांकि, एक वसीयतकर्ता के पास निम्नलिखित शर्तों को पूरा करने के बाद ही वसीयत द्वारा अपनी संपत्ति को वसीयत करने की शक्ति है।

  • यदि वसीयतकर्ता अपनी मृत्यु के समय संपत्ति का मालिक है।
  • वसीयत की गई संपत्ति हस्तांतरणीय होनी चाहिए।
  • वसीयत में भविष्य में घर रखने या अचल संपत्ति के भोगाधिकार का आनंद लेने या अन्यथा सीमित अवधि के लिए या वसीयतदार की मृत्यु तक का अधिकार भी शामिल है।

वसीयत में वसीयत की गई संपत्ति अनिवार्य रूप से ऐसी वसीयत बनाने के समय अस्तित्व में नहीं हो सकती है। हालांकि, एक वसीयतकर्ता को अपनी मृत्यु के समय विरासत का स्वामित्व रखना चाहिए। इस नियम के पीछे तर्क यह है कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद वसीयत का संचालन होना चाहिए, न कि वसीयत की घोषणा के समय।

उदाहरण के लिए, ‘A’ घोषणा करता है कि A अपनी सारी संपत्ति ‘B’ को वसीयत कर देगा। मान लीजिए कि वसीयत के निष्पादन के समय ‘A’ के पास एक घर है, लेकिन उसकी मृत्यु के समय, उसके पास एक कार भी है। इस प्रकार, ‘B’ वसीयत के तहत घर के साथ-साथ कार रखने का हकदार होगा।

ऐसी स्थिति में जहां वसीयत में एक वस्तु का विवरण एक विषय बनाता है, लेकिन एक उपयुक्त वस्तु निर्दिष्ट नहीं करता है, इस तरह के एक लेख को वसीयतकर्ता की संपत्ति से खरीदा जाना चाहिए और वसीयत को मान्य करने के लिए वसीयतदार को दिया जाना चाहिए।

पवित्र उद्देश्यों के लिए वसीयत

एक मुसलमान पवित्र उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति की वसीयत कर सकता है, जिसमें धार्मिक, संस्थागत, शैक्षिक और अन्य धर्मार्थ उद्देश्य शामिल हैं। इस उद्देश्य के लिए वसीयतकर्ता पर वसीयतनामा सीमाएं समान रहती हैं। एक वसीयतकर्ता केवल अपनी संपत्ति का एक तिहाई वसीयत कर सकता है और उसके उत्तराधिकारियों की सहमति की आवश्यकता नहीं है।

मुल्ला ने अपनी पुस्तक मुस्लिम कानून के सिद्धांत – 20 वें संस्करण की धारा 119 के तहत विरासत के उन्मूलन के संबंध में प्रावधानों का उल्लेख किया है, जहां पवित्र उद्देश्यों के लिए वसीयत को उनके उद्देश्यों के अनुसार निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है –

फैराज के लिए वसीयत

इस्लाम में फैराज का अर्थ है दायित्व या कर्तव्य। एक मुस्लिम व्यक्ति कुरान में स्पष्ट रूप से अंकित उद्देश्यों के लिए अपनी पूरी संपत्ति से कुछ संपत्ति की वसीयत कर सकता है।

वह ‘हज’ (तीर्थयात्रा) पर जाने के उद्देश्य से वसीयत कर सकता है या तीर्थयात्री को दान कर सकता है। वह ‘जकात’ जिसे इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक माना जाता है के उद्देश्य से अपनी संपत्ति की वसीयत कर सकता है। जकात को एक धार्मिक कर्तव्य कहा जाता है जहां एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल बचत का 2.5% या 1/40 दान करता है। हालांकि, मुस्लिम कानून के अलग-अलग विचारधाराों में यह राशि अलग-अलग हो सकती है। एक मुसलमान व्यक्ति अनिवार्य नमाज़ों की भरपाई करने के उद्देश्य से अपनी संपत्ति की वसीयत भी कर सकता है, अर्थात नमाज़ न पढ़ने के अपने कार्य का प्रायश्चित करने के लिए।

वाजीबात के लिए वसीयत

एक मुस्लिम व्यक्ति वाजीबात के उद्देश्य से वसीयत कर सकता है, जिसका अर्थ है ‘आवश्यक भाग’। ये ऐसे उद्देश्य हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं दिया गया है लेकिन उचित और आवश्यक माना जाता है।

वाजीबात में ‘सदक़ा अल-फितर’ (रमजान के बाद उपवास तोड़ने के लिए गरीबों को दान), ‘जकात अल-फितरा’ (मानव प्रकृति की भिक्षा), और अन्य बलिदान शामिल हैं। एक मुस्लिम व्यक्ति रमजान में उपवास तोड़ने के अवसर पर गरीबों को भोजन परोसने के उद्देश्य से अपनी संपत्ति से धन की वसीयत कर सकता है या अपनी संपत्ति से दान कर सकता है।

नवाफिल के लिए वसीयत

इस्लाम के तहत नवाफिल का मतलब ‘स्वैच्छिक कार्य’ होता है। एक मुस्लिम व्यक्ति धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति की वसीयत कर सकता है जैसे कि एक पवित्र तीर्थ, एक मस्जिद, एक शैक्षणिक संस्थान, यात्रियों के आराम करने और रहने के लिए एक जगह, पुल या गरीबों को दान करना। वह ऐसे स्वैच्छिक धर्मार्थ प्रयोजनों के लिए अपनी पूरी संपत्ति में से कुछ संपत्ति की वसीयत कर सकता है।

मुल्ला ने पवित्र उद्देश्यों के लिए वसीयत के प्रकार को भी प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम व्यक्ति को वसीयत करनी चाहिए, वसीयत के पहले रूप (फैराज) को प्राथमिकता देनी चाहिए, उसके बाद दूसरे (वाजीबत) और तीसरे (नवाफिल) को प्राथमिकता देनी चाहिए।

हालांकि, उपर्युक्त श्रेणियों के अलावा, पवित्र उद्देश्य मुस्लिम कानून के तहत व्यक्तिपरक हो सकता है। उदाहरण के लिए, अबू यूसुफ के अनुसार, एक मुस्लिम व्यक्ति की कब्र खोदने के लिए संपत्ति की वसीयत शून्य है, बशर्ते कि मुस्लिम व्यक्ति गरीब नहीं है और शारीरिक रूप से सक्षम है। अबू यूसुफ, जो हनफी विचारधारा के विश्वासी थे, का यह भी मानना था कि एक मुस्लिम व्यक्ति के लिए अपनी संपत्ति एक गरीब ईसाई को वसीयत करना वैध है, लेकिन अगर वह उनके लिए एक चर्च बनाता है तो यह शून्य होगा। पैगंबर मुहम्मद के अनुसार, धर्मार्थ उद्देश्यों में मक्का में हज या तीर्थयात्रा के लिए वसीयत करना शामिल था, जिसका अबू यूसुफ ने विरोध किया था। उन्होंने कहा कि धर्मार्थ उद्देश्यों को हज या तीर्थयात्रा के उद्देश्यों के लिए वसीयत करने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए और पुलों, शैक्षणिक संस्थानों या मस्जिद के निर्माण के उद्देश्य से खर्च किया जाना चाहिए।

वसीयतनामा शक्तियों पर सीमाएं

हर सामान्य नियम में अपवाद होते हैं और मुस्लिम कानून एक मुस्लिम व्यक्ति की वसीयतनामा शक्तियों पर सीमाएं निर्धारित करता है। प्रतिबंधों का विस्तार निम्नलिखित है:

वसीयत की जाने वाली संपत्ति की सीमा के संबंध में सीमा

एक मुस्लिम व्यक्ति को सभी ऋणों और अंतिम संस्कार के खर्चों में कटौती करने के बाद अपनी संपत्ति के केवल एक तिहाई की सीमा तक वसीयत निष्पादित करने की अनुमति है। यदि एक वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा एक वसीयतदार (चाहे वारिस या गैर-वारिस) को वसीयत करने का इरादा रखता है, तो उसे अपने उत्तराधिकारियों से पूर्व सहमति प्राप्त करनी होगी। मद्रास उच्च न्यायालय ने अस्मा बीवी बनाम अमीर अली (2008) के मामले में भी इस रुख को बरकरार रखा था। जीवा बनाम एचएच याकूब एली (1928) के मामले में यह माना गया था कि गैर-सहमति वाले उत्तराधिकारियों के कारण, वसीयत केवल वसीयतकर्ता की संपत्ति के एक तिहाई की सीमा तक वैध होगी, और शेष विरासत के माध्यम से वितरित की जाएगी।

एक मुसलमान अपने किसी भी उत्तराधिकारी को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी संपत्ति वसीयत नहीं कर सकता। उत्तराधिकारियों की सहमति व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनके स्पष्ट आचरण से भी तैयार की जा सकती है। दौलतराम बनाम अब्दुल कायम (1902) के मामले में, वसीयतकर्ता अपनी पूरी संपत्ति एक अजनबी को वसीयत कर देता है, और इस तरह की वसीयत को वसीयतकर्ता के दो बेटों द्वारा सत्यापित किया जाता है। वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद, वसीयतदार ने वसीयत की गई संपत्ति पर कब्जा करना शुरू कर दिया और किराया भी प्राप्त किया। जबकि यह सब वसीयतकर्ता के बेटों के ज्ञान में हुआ, यह कहा जाता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सहमति दी, क्योंकि उन्होंने कोई आपत्ति नहीं उठाई।

तैयबजी ने अपनी पुस्तक ‘मुस्लिम कानून के सिद्धांत (1913)’ में लिखा है कि मुस्लिम व्यक्ति द्वारा दी गई कोई भी वसीयत अमान्य होगी यदि वह इस्लाम का विरोध करने वाले उद्देश्य के लिए की जाती है। हालांकि, इस तरह की वसीयत वैध होगी यदि यह उसके उत्तराधिकारियों के अधिकारों और हितों को प्रभावित नहीं करती है।

वसीयतदार से संबंधित सीमाएं

दूसरा प्रतिबंध तब उत्पन्न होता है जब वसीयतदार वसीयतकर्ता के उत्तराधिकारियों में से एक होता है। इस सीमा के तहत, यह महत्वहीन है कि वसीयत की गई संपत्ति एक तिहाई या उससे कम है, और अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति एक वैध वसीयत स्थापित करने में एक प्रमुख कारक बन जाती है। कई उत्तराधिकारियों के मामले में, एक उत्तराधिकारी द्वारा सहमति को बाकी उत्तराधिकारियों द्वारा सहमति नहीं माना जाएगा। यह मोहम्मद हनीफा बनाम सलीम (2011) के मामले में केरल उच्च न्यायालय द्वारा आयोजित किया गया था। इस नियम के पीछे तर्क एक वसीयतकर्ता को दूसरों पर एक कानूनी उत्तराधिकारी को प्राथमिकता देने से रोकना है, जिससे शेष उत्तराधिकारियों के बीच नाराजगी और शत्रुता हो सकती है।

दूसरी ओर, शिया (इथना-अशरी) कानून उत्तराधिकारी या गैर-वारिस के बीच भेदभाव नहीं करता है। किसी व्यक्ति या प्रयोजन के लिए संपत्ति के एक तिहाई हिस्से तक की वसीयत को वैध माना जाता है। एक मुस्लिम व्यक्ति अन्य उत्तराधिकारियों की पूर्व सहमति के बिना अपनी संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा अपने उत्तराधिकारियों में से एक को वसीयत कर सकता है। हालांकि, एक वसीयतकर्ता को अपने उत्तराधिकारियों की सहमति प्राप्त करनी चाहिए यदि वसीयत उसकी संपत्ति के एक तिहाई से अधिक हो जाती है। शिया कानून के तहत, उत्तराधिकारियों द्वारा दी गई सहमति वैध है यदि केवल वसीयतकर्ता के जीवनकाल में दी गई हो। हालांकि, सुन्नी कानून और शिया कानून दोनों के तहत, उत्तराधिकारियों द्वारा दी गई सहमति को रद्द नहीं किया जा सकता है।

हालांकि, किसी भी मामले में, सहमति देने वाला व्यक्ति समझदार, बालिग और मुस्लिम होना चाहिए। वसीयत के तहत वसीयत संपत्ति की वसीयतनामा सीमाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए, और अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना वारिस को कोई भी वसीयत अमान्य होगी। गुलाम मोहम्मद बनाम गुलाम हुसैन (1931) के मामले में भी बॉम्बे उच्च न्यायालय  ने इसे बरकरार रखा है।

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत बनाना

सामान्य नियमों के अनुसार, मुस्लिम कानून के तहत पालन किए जाने वाले प्रथागत नियमों और गैर-तकनीकी और स्पष्ट भाषा की प्रथा के अनुसार एक वसीयत बनाई जानी चाहिए। वसीयत एक वसीयतनामा दस्तावेज है जो वसीयत के वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद संचालन में आता है। इसलिए, वसीयतकर्ता द्वारा बनाई गई वसीयत की व्याख्या वसीयत के निर्देश में व्यक्त उसके इरादों के अनुसार की जानी चाहिए। तैयबजी के अनुसार, एक अस्पष्ट वसीयत के कारण, व्याख्या को कानूनी उत्तराधिकारियों के विवेक पर छोड़ा जा सकता है। वसीयत मौखिक या लिखित हो सकती है। हालांकि, मौखिक वसीयत साबित करने का दायित्व ऐसी वसीयत का उत्पादन करने वाले व्यक्ति पर होगा यदि अन्य उत्तराधिकारियों द्वारा अदालत में चुनौती दी जाती है। हालांकि, एक लिखित वसीयत में सभी निर्देशों को स्पष्ट तरीके से निर्दिष्ट करना चाहिए। जैसा कि इस लेख में पहले कहा गया है, वसीयत को गवाह द्वारा सत्यापित करने की आवश्यकता नहीं है। हालाँकि, किसी मामले की परिस्थितियाँ और तथ्य विभिन्न मामलों में भिन्न हो सकते हैं। एक मुस्लिम व्यक्ति वसीयत घोषित करने के लिए किसी भी औपचारिकता से उपकृत (ओब्लाइज) करने तक ही सीमित नहीं है, बशर्ते कि इस तरह की वसीयत में स्पष्टता और वसीयतकर्ता का इरादा प्रतिबिंबित होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, उनकी वसीयत में एक वसीयतकर्ता संपत्तियों के व्यक्तिगत स्वामित्व को निर्दिष्ट किए बिना अपने दो बेटों को एक घर और एक दुकान वसीयत करेगा। यहां, वसीयत की सामग्री को रहस्यमय बना दिया जाता है, जिससे वसीयतदार दुविधा में पड़ जाता है। इस प्रकार उत्तराधिकारियों को वसीयत में वसीयत की गई संपत्ति के विभाजन पर पारस्परिक रूप से सहमत होने के लिए छोड़ दिया जाता है।

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत का निरसन

एक मुस्लिम व्यक्ति को उसके द्वारा की गई वसीयत को रद्द करने का अधिकार है। वह किसी वसीयत को या तो शब्दों में व्यक्त करके या निहित रूप से, अपने कार्यों के माध्यम से रद्द कर सकता है। निम्नलिखित दोनों रूपों का विस्तार निम्नलिखित है –

व्यक्त निरसन

एक वसीयतकर्ता लिखित या मौखिक रूप में उसके द्वारा बनाई गई वसीयत को रद्द कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट संकेत और निर्देशों के अपनी संपत्ति किसी को वसीयत करता है और फिर उसी संपत्ति को किसी और को वसीयत कर देता है, तो पूर्व वसीयतदार को घोषित वसीयत शून्य हो जाएगी।

यदि किसी वसीयत को उसके निर्माता द्वारा जला दिया जाता है या फाड़ दिया जाता है, तो इस तरह की कार्रवाई के इरादे की ऐसी वसीयत के निरसन के रूप में व्याख्या की जानी चाहिए। हालांकि, केवल वसीयत से इनकार करने से वसीयत रद्द नहीं होगी; इसके बाद एक ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो निरसन का गठन करे।

वसीयतकर्ता द्वारा निष्पादित वसीयत को शब्दों में और कार्य दोनों के माध्यम से निरसन की घोषणा पर रद्द कर दिया जाएगा। हालांकि, यह देखा गया है कि वसीयत की गई विषय वस्तु में एक जोड़ या परिवर्तन वसीयत को रद्द कर सकता है यदि इस तरह के परिवर्तन संपत्ति की प्रकृति को पूरी तरह से बदल देते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह के परिवर्तन, यदि एक व्यक्त घोषणा के साथ आता है कि यह वसीयत को दूषित नहीं करेगा, तो वसीयत का निरसन नहीं होगा।

निहित निरसन

एक कार्य जो वसीयत की विषय-वस्तु के विनाश की ओर जाता है, उसे वसीयत के निहित निरसन के रूप में माना जाता है। वसीयतकर्ता द्वारा की गई कार्रवाइयां, जैसे मौजूदा वसीयतदार के अलावा किसी और को संपत्ति हस्तांतरित करना, एक निहित निरसन के साथ-साथ संपत्ति को नष्ट करना या बदलना होगा। हालांकि, जब संपत्ति का एक ही टुकड़ा क्रमिक रूप से दो व्यक्तियों को वसीयत कर दिया गया है, तो पूर्व वसीयत को तब तक रद्द नहीं किया जाता है जब तक कि वसीयत द्वारा व्यक्त नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में, यदि वसीयतदार जिसे वसीयत की गई थी, बाद में मर जाता है, तो उसके लिए की गई वसीयत शून्य हो जाएगी, और पूर्व वसीयतदार के पक्ष में की गई वसीयत को रद्द नहीं माना जाएगा। वसीयतकर्ता द्वारा केवल घोषणा से इनकार करने से ऐसी वसीयत रद्द नहीं होगी।

उदाहरण के लिए, यदि ‘A’ ने कृषि भूमि को ‘B’ को वसीयत कर दी हो। ‘A’ ने बाद में उस भूमि पर एक दाख की बारी (वाइन यार्ड) का निर्माण किया। ऐसी भूमि की वसीयत रद्द कर दी गई है, क्योंकि वसीयत की गई संपत्ति की प्रकृति को इस तरह से बदल दिया गया था कि उसका कोई अस्तित्व नहीं था।

संपत्ति की एक वसीयत जो वसीयतकर्ता द्वारा बेची गई थी, अगर फिर से खरीदी गई और वसीयतदार को उपहार के रूप में माना जाता है, तो उसे निरसन माना जाएगा। इस नियम के पीछे का कारण संपत्ति से वसीयतकर्ता के स्वामित्व की छूट है। अब्दुल करीम बनाम शोफियानिसा (1906) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि एक वसीयत की गई संपत्ति को रद्द कर दिया जाएगा यदि इसे वसीयतकर्ता द्वारा हस्तांतरण के माध्यम से निपटाया जाता है।

वसीयत के नियम का अपवाद

वसीयत के सामान्य नियमों के कुछ अपवाद हैं। वे एक वसीयतकर्ता की सीमित वसीयतनामा शक्तियां और कानूनी उत्तराधिकारियों की अनिवार्य सहमति हैं। सुन्नी कानून और शिया कानून दोनों के तहत, एक मुस्लिम व्यक्ति की वसीयतनामा शक्तियां कर्ज की राशि और अंतिम संस्कार के खर्च में कटौती के बाद उसकी संपत्ति के एक तिहाई तक सीमित हैं। वसीयत के सामान्य नियमों के कुछ अपवाद निम्नलिखित हैं। –

शिया कानून के तहत सहमति

एक उत्तराधिकारी के पक्ष में संपत्ति देते समय अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति का सामान्य नियम शिया कानून के तहत लागू नहीं होता है। शिया कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति बाकी उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा उत्तराधिकारी को नहीं दे सकता है। यह ज्यादातर कानून के इस संप्रदाय के एक छोटे उप-समुदाय में प्रचलित है, जिसे शिया इथना-अशरी संप्रदाय कहा जाता है। हालांकि, यदि वसीयत की गई संपत्ति संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है, तो अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति अनिवार्य है। इस तरह की सहमति वसीयतकर्ता की मृत्यु से पहले या बाद में दी जा सकती है, जैसा कि हुसेनी बेगम बनाम सैयद मोहम्मद मेहदी (1927) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा आयोजित किया गया था। एक शिया-मुस्लिम व्यक्ति अन्य उत्तराधिकारियों से पूर्व सहमति के साथ, अपनी पूरी संपत्ति एक उत्तराधिकारी को वसीयत कर सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जाफरी खानम बनाम फहमीदा खानम (1908) में इस फैसले को बरकरार रखा और मुस्तफा हुसैन बनाम अमृत बीबी (1923) के मामले में भी दोहराया कि, ऐसे मामले में जहां वसीयत की गई संपत्ति वारिसों की संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है, वसीयतकर्ता की मृत्यु से पहले सहमति प्राप्त की जानी चाहिए, अन्यथा ऐसी वसीयत शून्य है। इस तरह की सहमति अत्यंत सावधानी से दी जा सकती है और, एक बार अस्वीकार करने के बाद, फिर से नहीं दी जा सकती है। यह रुख बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाबीर प्रसाद बनाम सैयद मुस्तफा हुसैन (1937) के मामले में रखा था। इसी तरह, सामान्य नियम के लिए यह अपवाद एक वारिस को लाभ नहीं पहुंचा सकता है, जो शाश्वतता (पर्पेच्यूटी) के खिलाफ नियम का उल्लंघन करता है।

यह अपवाद हनफी कानून के तहत भी लागू होता है।

‘शायरा-उल-इस्लाम’ का आधिकारिक पाठ कुछ बच्चों को वसीयत से बाहर रखने से घृणा करता है। यह सुझाव दिया जाता है कि दूसरों को छोड़कर एक उत्तराधिकारी के पक्ष में पूरी संपत्ति की वसीयत अप्रभावी होनी चाहिए।

शर्तों के अधीन वसीयत

शर्तों के अधीन संपत्ति की वसीयत उस हिस्से को छोड़कर प्रभावी है जहां शर्त लागू की जानी है, बशर्ते कि ऐसी शर्तें मुस्लिम कानून के प्रतिकूल हों। यह अब्दुल करीम बनाम अब्दुल कयूम (1906) 28 ऑल 324 के मामले में आयोजित किया गया था, कि जहां एक उत्तराधिकारी के पक्ष में वसीयत की गई संपत्ति संपत्ति के हस्तांतरण को प्रतिबंधित करने की शर्त के साथ संलग्न की गई थी और अन्य उत्तराधिकारियों ने इसके लिए सहमति दी थी, वसीयत वसीयतदार के पक्ष में मान्य होगी जैसे कि यह एक गैर-वारिस के पक्ष में बनाई गई थी।

इसी तरह का निर्णय नजीर अली शाह बनाम सुघरा बीबी (1920) 1 एआईआर (लाह) 302 के एक अन्य मामले में आयोजित किया गया था, कि यदि एक वारिस को इस शर्त के साथ वसीयत की जाती है कि उनकी मृत्यु पर, संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित की जाएगी, और अन्य उत्तराधिकारी वसीयत के लिए सहमति देते हैं, तो वसीयतदार को संपत्ति प्राप्त होगी और शर्त को शून्य माना जाएगा।

इसलिए, ऐसी परिस्थितियों में जहां पूरी संपत्ति की वसीयत असंगत और प्रतिकूल स्थिति के साथ की जाती है, ऐसी वसीयत वैध है लेकिन शर्त शून्य है।

एक वारिस रहित वसीयतकर्ता

वसीयत योग्य एक-तिहाई का सामान्य नियम उस मामले पर लागू नहीं होगा जहां वसीयतकर्ता उत्तराधिकारी नहीं है। एक उत्तराधिकार रहित वसीयतकर्ता धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए या किसी अजनबी को अपनी संपत्ति वसीयत कर सकता है। सरकार सहित कोई भी प्राधिकरण ऐसे व्यक्ति के वसीयतनामा अधिकार को प्रतिबंधित नहीं कर सकता है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि सरकार एक उत्तराधिकारी रहित व्यक्ति की उत्तराधिकारी नहीं है।

एकल वारिस

एक वसीयतकर्ता किसी अन्य वारिस की अनुपस्थिति में अपनी पूरी संपत्ति अपने एकल वारिस को वसीयत कर सकता है। हालांकि, यदि कोई वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक किसी अजनबी को वसीयत करता है, तो एकमात्र वारिस की सहमति अनिवार्य है।

रीति रिवाज 

एक समुदाय में प्रचलित एक रीति रिवाज मान्य होगा यदि इसकी शर्तें और सीमाएं मुस्लिम कानून के तहत वसीयत के औपचारिक नियमों से भिन्न हों, बशर्ते कि यह सार्वजनिक नीति के खिलाफ न हो या मुस्लिम कानून के साथ विवाद में न हो। इलियास बनाम बादशाह (1990) के प्रसिद्ध मामले में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि एक मुस्लिम व्यक्ति को अपनी संपत्ति किसी भी व्यक्ति को वसीयत करने की अनुमति है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो। यह आगे कहा गया कि, हिजड़े समुदाय के भीतर एक रीति रिवाज जिसे गुरु-चेला प्रणाली के रूप में जाना जाता है, जहां चेला को अपने गुरु का एकमात्र उत्तराधिकारी माना जाता है, गुरु की संपत्ति को किसी बाहरी व्यक्ति को उसके शिष्य की पूर्व सहमति से वसीयत करना एक वैध वसीयत है। इस रीति रिवाज के तहत, एक गुरु अपने शिष्य की सहमति के बिना किसी बाहरी व्यक्ति को अपनी संपत्ति वसीयत नहीं कर सकता है। अदालत ने कहा कि यह रीति रिवाज कानून का उल्लंघन नहीं है क्योंकि यह केवल वसीयतदार में से विकल्प चुनने को सीमित करता है और वसीयत बनाने के अधिकार को प्रतिबंधित नहीं करता है।

विरासतों का उन्मूलन (अबेटमेंट)

यदि, लेनदारों को सभी ऋणों का निपटान करने के बाद, अपरिहार्य खर्च, एक वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक वसीयत करता है, तो वसीयत योग्य एक-तिहाई के नियम को बनाए रखने के लिए वसीयतदार का अनुपात कम हो जाता है। लाभार्थियों की विरासत में इस कमी को विरासत में कमी के रूप में जाना जाता है। सुन्नी कानून के अनुसार, विरासत का उन्मूलन एक आनुपातिक तरीके से होता है, जबकि शिया कानून के तहत, इस तरह की छूट को प्राथमिकता दी जाती है।

कर योग्य वितरण

सुन्नी कानून के तहत छूट के इस नियम का पालन किया जाता है। कर योग्य कमी को आनुपातिक कमी भी माना जाता है। यह कमी तब की जाती है जब संपत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत की जाती है, और वारिस इसके लिए सहमति नहीं देते हैं। हिस्सों की गणना की जाती है और बाद में संपत्ति के एक तिहाई हिस्से के अनुपात में कम हो जाती है। इस तरह की गणना कुल संपत्ति पर की जाती है, अंतिम संस्कार के खर्च और ऋण में कटौती, यदि कोई हो। सुन्नी कानून के अलावा, हनफी कानून के तहत भी दर योग्य छूट का अभ्यास किया जाता है।

उदाहरण के लिए, ‘T’ द्वारा ‘A’, ‘B’ और ‘C’ के पक्ष में वसीयत की जाती है। वसीयत के तहत, ‘T’ ‘A’ को 4,500 रुपये, ‘B’ को 3,000 रुपये और ‘C’ को 1,500 रुपये देने की घोषणा करता है, जहां उसकी कुल संपत्ति 9,000 रुपये है। अब, वसीयतनामा प्रतिबंधों के अनुसार, कुल संपत्ति का केवल एक तिहाई वसीयत योग्य है, जो 3000/- रुपये के बराबर है, जो अनुमत वसीयत योग्य संपत्ति के बराबर है। वसीयतकर्ता ने संपत्ति को क्रमशः 3: 2: 1 के अनुपात के बाद A, B और C के बीच विभाजित किया। इसलिए, कर योग्य छूट नियम लागू करके, A, B और C के हिस्सेों को उसी अनुपात अर्थात 3: 2: 1 के बाद कम किया जाएगा। इस प्रकार, कर योग्य वितरण के आवेदन के बाद, A का हिस्सा 1,500/- रुपये हो जाएगा, B का हिस्सा 1,000/- रुपये हो जाएगा और C का हिस्सा 500/- रुपये हो जाएगा।

वरीयता (प्रेफरेंशियल) वितरण

शिया कानून के तहत, छूट के लिए एक अलग नियम लागू होता है। इस नियम के अनुसार, यदि वसीयत योग्य संपत्ति वसीयतकर्ता की संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है और उत्तराधिकारी अपनी सहमति देने से इनकार करते हैं, तो वरीयता वितरण का नियम लागू होता है। छूट की इस पद्धति के तहत, हिस्सेों में कोई कमी नहीं की जाती है, लेकिन हिस्से को वरीयता के आधार पर वितरित किया जाता है।

इस नियम के तहत वरीयता का मूल्यांकन आमतौर पर उस क्रम से किया जाता है जिसमें वसीयत के तहत वसीयतदारों के नामों का उल्लेख किया जाता है। वसीयतनामा दस्तावेज में सबसे आगे उल्लिखित वसीयतदार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी, उसके बाद दूसरी संख्या वाले वसीयतदार को वरीयता दी जाएगी। ऐसा हो सकता है कि पहले उल्लेखित वसीयतदार के हिस्सेों में कोई बदलाव न हो। जैसे ही संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा समाप्त हो जाता है, हिस्सेों का वितरण बंद हो जाता है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक वसीयतदार को उसका पूरा हिस्सा, या इसका एक हिस्सा या कुछ भी नहीं मिल सकता है।

उदाहरण के लिए, एक वसीयत ‘T’ द्वारा निष्पादित की गई थी, जो एक शिया मुस्लिम है। उन्होंने ‘A’ को 2,000 रुपये, ‘B’ को 1,000 रुपये और ‘C’ को 1,000 रुपये वसीयत में दिए। कुल संपत्ति 9,000/- रुपये है, जिसका एक-तिहाई 3,000/- रुपये है, जो अनुमत वसीयत्य राशि है। वरीयता नियम के अनुसार, ‘A’ को उसका पूरा हिस्सा अर्थात 2,000/- रुपये वसीयत किया जाएगा, ‘B’ को शेष 1,000/- रुपये मिलेंगे, जो उसका पूरा हिस्सा भी है, और C किसी भी हिस्से से रहित होगा, क्योंकि वरीयता वितरण के अनुसार ‘A’ और ‘B’ के बीच वितरण करते समय वसीयत की गई राशि का एक तिहाई समाप्त हो गया था।

वसीयत के निष्पादक (अल-वसी अल-मुख्तार)

एक वसीयतकर्ता एक निष्पादक नियुक्त कर सकता है, जो वसीयतकर्ता की संपत्ति के प्रबंधक के रूप में कार्य करेगा और वसीयतकर्ता द्वारा दी गई इच्छाओं और निर्देशों के अनुसार ऐसी वसीयत निष्पादित करेगा। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 211 (1) के अनुसार, एक निष्पादक सभी उद्देश्यों के लिए वसीयतकर्ता का कानूनी प्रतिनिधि होता है और मृतक वसीयतकर्ता की संपत्तियां उस पर निहित होती हैं।

हनफी कानून के तहत एक वसीयतकर्ता एक गैर-मुस्लिम हो सकता है। हेनरी इमलाच बनाम ज़ुहूरूनिसा (1828) 4 एसडीए [बेंग] 301, 303 के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा इसे बरकरार रखा गया था, कि एक वसीयत का निष्पादक एक से अधिक व्यक्ति हो सकता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 311 के अनुसार, जहां कई निष्पादक हैं, और उनके व्यक्तिगत कर्तव्यों के रूप में निर्देश अनुपस्थित है, यदि वे वसीयत की प्रोबेट प्राप्त करते हैं तो वे वसीयत पर कार्य कर सकते हैं। वसीयत में वसीयतकर्ता द्वारा दिए गए निर्देशों को लागू करना एक निष्पादक का कानूनी कर्तव्य है।

एक मुसलमान वसीयत के निष्पादक की शक्तियां, कर्तव्य और अन्य कार्य भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अध्याय VI द्वारा शासित होते हैं, जिसमें सभी अंतिम संस्कार खर्चों को पूरा करने, संपत्ति का निपटान करने, खातों को बनाए रखने, प्रोबेट के लिए आवेदन करने आदि का कर्तव्य शामिल है। एक निष्पादक के पास मृतक से बचने वाले सभी कारणों के लिए मुकदमा करने और मृतक की ओर से ऋण वसूलने की शक्ति होती है। उसके पास वसीयतकर्ता की संपत्ति का उसके निर्देश के अनुसार निपटान करने की शक्ति है।

मर्ज़-उल मौत

मर्ज़-उल-मौत मृत्यु-शय्या पर की गई वसीयत पर आधारित एक सिद्धांत है। यह सिद्धांत वसीयतकर्ता द्वारा उसकी मृत्यु-शय्या पर किए गए उपहारों को संदर्भित करता है, और शिया और सुन्नी दोनों कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत के तहत लेन-देन में हिबा (उपहार) और वसीयत दोनों का सार है। हालांकि, इसकी प्रकृति को वसीयत माना जाता है, क्योंकि उपहार में दी गई संपत्ति का हस्तांतरण के निर्माता की मृत्यु के बाद निष्पादित किया जाता है। यह वसीयतकर्ता की मृत्यु की आशंका पर किया गया एक वसीयतनामा स्वभाव है और इसलिए, केवल तभी मान्य है जब वसीयतकर्ता बाद में ऐसी वसीयत करने के बाद मर जाता है।

इस सिद्धांत के तहत भी वसीयतनामा सीमाओं और वसीयतदार के संबंध में प्रतिबंध समान होंगे। हालांकि, दो विशिष्ट प्रतिबंधों को सूचीबद्ध किया गया है, और वे इस प्रकार हैं-

  • एक वसीयतदार के रूप में, एक उत्तराधिकारी को रोका नहीं जा सकता है। हालांकि, हनफी कानून के तहत, एक उत्तराधिकारी के पक्ष में मर्ज-उल-मौत के तहत एक वसीयत केवल तभी मान्य होती है जब अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति प्राप्त की जाती है।
  • वसीयत राशि वसीयतकर्ता की संपत्ति के कुल हिस्से के एक तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस रुख को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फजल हुसैन खान बनाम अली हुसैन और अन्य (1914) के मामले में भी बरकरार रखा था। 

मृत्यु की आशंका में मृत्यु-शय्या पर एक वसीयतकर्ता अपने उत्तराधिकारियों सहित दरकिनार नहीं कर सकता है। वह इस तरह के कार्यों को तर्कसंगत नहीं बना सकता है और वसीयत के सिद्धांत में निहित अनिवार्य प्रतिबंधों का पालन नहीं कर सकता है। शरीयत कानून मर्ज़-उल-मौत पर कुछ शर्तों को भी लागू करता है, जिनका विवरण नीचे दिया गया है-

वसीयतकर्ता की मृत्यु

वसीयत बनाने वाला, इस सिद्धांत के तहत, एक दुःख या बीमारी से पीड़ित होना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप उस व्यक्ति की मृत्यु होने की बहुत संभावना है। अगर ऐसी बीमारी के परिणामस्वरूप, वसीयतकर्ता जीवित रहता है, तो वसीयत अमान्य और शून्य हो जाएगी।

मृत्यु की आशंका

जैसा कि शीर्षक से पता चलता है, वसीयतकर्ता की मृत्यु की आशंका पर वसीयत की जानी चाहिए। आशंका को वसीयतकर्ता द्वारा स्वयं समझा जाना चाहिए, न कि उसके उत्तराधिकारियों या उसके चिकित्सक द्वारा। वसीयतकर्ता के मन में इस तरह की आशंका की उपस्थिति मृत्यु-शय्या पर एक वैध वसीयत के रूप में पर्याप्त होने के लिए एक आवश्यक तत्व है।

हालांकि, ऐसे मामले में जहां बीमारी बिना किसी अलंकरण (एंबेलिशमेंट) के एक वर्ष से अधिक समय तक बनी रहती है, ऐसी बीमारी मृत्यु की आशंका के लिए पर्याप्त नहीं होगी। एक अन्य स्थिति में, जहां बीमारी विभिन्न अंतरालों में स्थायी होती है, जो अंततः वसीयतकर्ता को बिस्तर तक सीमित रहने के लिए मजबूर करती है, एक गंभीर भय और मृत्यु की आशंका पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में, मर्ज़-उल-मौत के तहत एक उपहार बनाने पर विचार किया जा सकता है।

शेख नूरबी बनाम पठान मस्तानबी और अन्य (2004) मे आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय में तीन मानदंडों को रेखांकित किया है जिनका मर्ज़-उल-मौत के अधीन विचार किए जाने वाले अंतरण के लिए अनुपालन किया जाना चाहिए, जिसका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है-

  1. मौत की आशंका की एक मजबूत भावना को प्रेरित करते हुए, मौत का एक आगामी खतरा होना चाहिए।
  2. दस्तावेज़ के निर्माता के दिमाग में मृत्यु का एक व्यक्तिपरक संकेत होना चाहिए।
  3. कुछ बाहरी संकेत होने चाहिए जो ऐसे व्यक्ति के खराब और पीड़ित स्वास्थ्य को दर्शाते हैं।

इसलिए, व्यक्ति को एक बीमारी से पीड़ित होना चाहिए, जिसकी मृत्यु होने की संभावना है, जिसकी आशंका उस व्यक्ति के दिमाग में मौजूद थी, और इस तरह की आशंका बाहरी संकेतों के साथ भी होनी चाहिए। बाहरी संकेत अस्वस्थता, काम से लंबे समय तक अनुपस्थिति या चिकित्सकीय रूप से निदान रिपोर्ट के कारण महत्वपूर्ण घटनाओं में उनकी अनुपस्थिति हो सकता है। हालांकि, किसी विशेष मामले की परिस्थितियों की जांच करना हमेशा आदर्श होता है ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि उपहार मर्ज़-उल-मौत के अंतर्गत आता है या नहीं। यह स्थिति साराबाई बनाम रबियाबाई (1905) के मामले में देखी गई थी, जहां बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा था कि नियमित व्यवसाय में भाग लेना या अपने रोजमर्रा के जीवन के कर्तव्यों को पूरा करना मृत्यु की आशंका का पूर्ण अभाव नहीं है। ऐसा हो सकता है कि बीमारी स्पर्शोन्मुख (एसिम्पटमेटिक) या चुप हो, लेकिन साथ ही, प्रकृति में गंभीर हो।

वसीयत से संबंधित सुन्नी और शिया कानूनों की तुलना

भारत में, मुस्लिम कानून के तहत दो प्रमुख विचारधारा प्रचलित हैं, जो शिया और सुन्नी कानून हैं। ऐसे नियम हैं जो दोनों विचारधाराों में अलग-अलग तरीके से शासित होते हैं, जिनका पालन कर्तव्यनिष्ठा से किया जाना चाहिए और विसंगतियों के मामले में अदालतों द्वारा विचार किया जाना चाहिए।

तुलना के लिए आधार सुन्नी कानून शिया कानून
एक वारिस के लिए एक वसीयत एक वसीयतकर्ता अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना अपने उत्तराधिकारियों में से एक को वसीयत करता है, अमान्य है। शिया कानून के तहत वसीयत वैध है, अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना वसीयतकर्ता की संपत्ति का एक तिहाई तक, लेकिन संपत्ति के एक तिहाई से अधिक नहीं।
उत्तराधिकारियों की सहमति का समय वारिस की सहमति वैध है यदि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद दी गई हो। सहमति या तो वसीयतकर्ता की मृत्यु से पहले या बाद में दी जा सकती है।
वसीयतदार वसीयतकर्ता का हत्यारा है यदि कोई वसीयतदार वसीयतकर्ता की मृत्यु का कारण बनता है, तो उसके पक्ष में वसीयत शून्य हो जाएगी। वसीयतकर्ता के वसीयतदार द्वारा अनजाने में मृत्यु का कारण वसीयत की वैधता को प्रभावित नहीं करेगा और वसीयत उचित होगी।
वसीयतकर्ता द्वारा आत्महत्या करना वसीयत को वैध माना जाएगा यदि कोई वसीयतकर्ता वसीयत की घोषणा से पहले या बाद में आत्महत्या करता है। वसीयत को केवल तभी वैध माना जाएगा जब वसीयत की घोषणा के बाद वसीयतकर्ता आत्महत्या करता है या कोई ऐसा कार्य करता है जो आत्महत्या करने का विचार करता है।
अजन्मा बच्चा एक अजन्मे बच्चे के लिए एक वसीयत वैध है यदि बच्चा अपनी मां के गर्भ में है, जबकि वसीयत की घोषणा उसके पक्ष में होती है। हालांकि, वसीयत बनाने के 6 महीने के भीतर बच्चे का जन्म होना चाहिए। इसके तहत मां के गर्भ में बच्चे का अस्तित्व अनिवार्य है लेकिन, जन्म देने की निर्धारित सीमा घोषणा के समय से 10 महीने है।
विरासत का उन्मूलन उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना वसीयतकर्ता की संपत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत के मामले में, हिस्से को आनुपातिक करने और इसे एक-तिहाई की सीमा तक कम करने के लिए कर योग्य वितरण के नियम का पालन किया जाता है। इसके तहत वसीयत राशि को घटाकर एक तिहाई करने के लिए वरीयता वितरण का नियम लागू होता है।
वसीयतकर्ता के पहले वसीयतदार की मौत यदि एक वसीयतदार वसीयत के वसीयतकर्ता से पहले मर जाता है, तो विरासत वसीयतकर्ता को वापस कर दी जाएगी। यदि कोई वसीयतदार वसीयत के वसीयतकर्ता से पहले मर जाता है, तो विरासत केवल वसीयतदार के उत्तराधिकारी रहित होने के कारण समाप्त हो जाएगी या वसीयतकर्ता स्वयं वसीयत को रद्द कर देगा।

निष्कर्ष

वसीयत एक वसीयतनामा लिखत (इंस्ट्रूमेंट) है जो किसी व्यक्ति को उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति को वसीयत करने के निर्देशों के साथ एक घोषणा बनाने का अधिकार देता है। इसे उत्तराधिकार कानून के एक बेहतर संशोधन के रूप में कहा जा सकता है, जो आम तौर पर उन उत्तराधिकारियों को बाहर करता है जिन्हें अन्यथा विरासत में लेना पसंद किया जा सकता है। वसीयत एक व्यक्ति को अपनी संपत्ति उस व्यक्ति को हस्तांतरित करने की अनुमति देता है जिसे वह चुन सकता है। लेकिन साथ ही, यह उत्तराधिकार के कानून और एक वसीयत के तहत संपत्ति के हस्तांतरण के बीच एक तर्कसंगत संतुलन भी बनाए रखता है। वसीयत किसी के उत्तराधिकारी के हितों की रक्षा के लिए एक लिखत होने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि धर्मार्थ और पवित्र कार्यों को बढ़ावा देने का एक लिखत भी है। वसीयत की अवधारणा ग्रेच्युटी और दान की भावना से संबंधित है और साद इब्न अबी वक्कास द्वारा सुनाई गई एक दिव्य घटना से उत्पन्न हुई है, जहां उन्हें पैगंबर द्वारा अपनी संपत्ति का एक तिहाई दान करने और शेष को अपने उत्तराधिकारियों के लिए बचाने का निर्देश दिया गया था।

इसलिए, एक वसीयत का निर्माण सटीकता के साथ किया जाना चाहिए और निर्माता के इरादों और दिशाओं को ध्यान में रखते हुए, एक दिव्य स्वभाव होने के नाते, संरेखित किया जाना चाहिए। वसीयत का उद्देश्य द्विगुना है; सबसे पहले, यह वैध उत्तराधिकारियों के दावों की रक्षा करता है। दूसरे, एक वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा किसी अजनबी या गैर-वारिस के पक्ष में उचित तरीके से तय कर सकता है। एक वसीयत का शासन मुस्लिम कानून के तहत एक विचारधारा से दूसरे विचारधारा में भिन्न हो सकता है। किसी भी विसंगति के तहत, अदालतों को ऐसे सभी नियमों की जांच करनी चाहिए और वसीयत की पवित्रता का ठीक से निरीक्षण करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या मुस्लिम कानून के तहत वसीयत भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा शासित है?

यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत मुस्लिम या गैर-मुस्लिम से शादी करता है, तो उसकी वसीयत भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा शासित होगी। मुस्लिम रीति-रिवाजों और नियमों के अनुसार शादी करने वाले मुस्लिम व्यक्ति को वसीयत के मामले में मुस्लिम स्वीय  (पर्सनल) कानून द्वारा शासित किया जाएगा। हालांकि, वसीयत के निष्पादक के कर्तव्यों, शक्तियों और कार्यों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा शासित किया जाता है, क्योंकि एक निष्पादक को उसके धर्म के बावजूद नियुक्त किया जाता है और वह गैर-मुस्लिम हो सकता है।

क्या वसीयत का पंजीकरण होना अनिवार्य है?

वसीयत पंजीकृत करना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, किसी भी विसंगतियों के मामले में अदालतों के लिए ऐसी वसीयत की प्रामाणिकता की जांच करना आसान होगा। वसीयत का पंजीकरण पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 40 और धारा 41 के तहत विनियमित किया जा सकता है। एक गैर-पंजीकृत वसीयत अमान्य नहीं है और निष्पादन योग्य है।

क्या हस्तांतरण की विषय वस्तु को मर्ज़-उल-मौत के तहत उपहार माना जाता है?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपहार कर आयुक्त बनाम अब्दुल करीम मोहम्मद अली खान (1991) के मामले में कहा गया था, की मर्ज-उल-मौत के तहत एक हस्तांतरण उपहार के दायरे में नहीं आता है, और इस तरह के लेनदेन के तहत उपहार-कर का कोई उद्ग्रहण नहीं है। यह संपत्ति का एक वसीयतनामा स्वभाव है और इसे वसीयत के रूप में माना जाना चाहिए।

कोडिसिल क्या है?

एक कोडिसिल एक वसीयत के संबंध में एक अतिरिक्त दस्तावेज है, जिसे वसीयत के प्रावधानों को बदलने, संशोधित करने या जोड़ने के लिए तैयार किया गया है। इसे परिशिष्ट या वसीयत के विस्तार के रूप में कहा जा सकता है। एक कोडिसिल को पहले से मौजूद प्रावधानों की सीमा तक बदला जा सकता है और वसीयतकर्ता के इरादों को पूरा करने के लिए आवश्यक से परे नहीं।

संदर्भ

  • आधुनिक भारत में मुस्लिम कानून – डॉ. पारस दीवान
  • अकील अहमद द्वारा मुस्लिम कानून।

 

माल की बिक्री के अनुबंध में दुर्व्यपदेशन

यह लेख लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, निगोशिएशन और विवाद समाधान में डिप्लोमा कर रही Tanvitha द्वारा लिखा गया है। इस लेख में दुर्व्यपदेशन (मिसरिप्रजेंटेशन), दुर्व्यपदेशन के प्रकार, माल की बिक्री के अनुबंध और उससे संबंधित कानूनी उपाय के बारे मे चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

रोजमर्रा की जिंदगी में सबसे आम लेन-देन चल वस्तुओं की खरीद और बिक्री है। माल बिक्री अधिनियम, 1930 चल माल की बिक्री और खरीद को नियंत्रित करता है। ऐसे प्रयोजन के लिए किया गया कोई भी करार या अनुबंध माल की बिक्री अनुबंध के रूप में संदर्भित किया जा सकता है। ऐसे अनुबंध में शामिल सबसे बड़ा जोखिम गलत बयानी है; यह अनुबंध के अंतिम रूप दिए जाने से पहले ही हो जाता है। गलत बयानी से अनुबंध करने वाले पक्ष को कानून या तथ्यों के दुर्व्यपदेशन के ज़रिए नुकसानदेह अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया जाता है। सत्य के बारे में ऐसे झूठे बयान जानबूझकर या अनजाने में दिए जा सकते हैं। माल की बिक्री के अनुबंध में इस विशेष जोखिम की जांच करना महत्वपूर्ण है ताकि इसके निहितार्थ और उपलब्ध उपायों को समझा जा सके। 

दुर्व्यपदेशन

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 18 के तहत दुर्व्यपदेशन की परिभाषा दी गई है। अनुबंधों से संबंधित दुर्व्यपदेशन की अवधारणा को एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करने हेतु दिया गया निर्दोष या जानबूझकर दिया गया झूठा बयान के रूप में परिभाषित किया गया है। दुर्व्यपदेशन किसी पक्ष को ऐसे अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करती है, जिसमें वह अन्यथा प्रवेश नहीं करता और इसके कारण उसे नुकसान उठाना पड़ता है। बयान देने वाला पक्ष यह मान सकता है कि उसके शब्द सत्य हैं, ऐसी स्थिति में यह एक निर्दोष दुर्व्यपदेशन होगा, हालांकि यह जानबूझकर और कपटपूर्ण भी हो सकता है। 

यह कब उत्पन्न होता है?

किसी अनुबंध के निर्माण से पहले बातचीत और चर्चा के चरण के दौरान दुर्व्यपदेशन उत्पन्न होती है। इस स्तर पर दिए गए कथन और दावे दूसरे पक्ष को अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रभावित करते हैं, इसलिए यह अनुबंध के निर्माण से पहले ही उत्पन्न हो जाता है। संविदा संबंधी चर्चा के प्रारंभिक चरण में अनुबंध से संबंधित तथ्यों के झूठे बयान और गलतियां की जाती हैं। 

उदाहरण: X और Y, X की नाव को Y को बेचने पर चर्चा कर रहे हैं। X, Y को बताता है कि उसकी मोटर बोट 80 किमी/घंटा की गति तक जा सकती है; हालांकि, वह यह नहीं बताता कि उसने एक साल से अधिक समय से इसे नहीं चलाया है और उसका दावा केवल एक अनुमान है जिसकी शाब्दिक पुष्टि नहीं हुई है। Y नाव खरीदने के लिए सहमत हो जाता है और उसे पता चलता है कि मोटरबोट की गति केवल 50 किमी/घंटा है। यहाँ, X ने नाव की गति को गलत बताया और इस दुर्व्यपदेशन ने Y को इसे खरीदने के लिए प्रेरित किया। 

दुर्व्यपदेशन अनुबंध के उल्लंघन का आधार होगी और  Y, X को उत्तरदायी ठहराते हुए अपने पास उपलब्ध उपचारों का प्रयोग कर सकता है। 

दुर्व्यपदेशन के प्रकार

दुर्व्यपदेशन को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

निर्दोष दुर्व्यपदेशन

निर्दोष दुर्व्यपदेशन, इस ज्ञान के अभाव के कारण गलत तथ्यों का प्रस्तुतीकरण है कि कथन असत्य है। 

निर्दोष दुर्व्यपदेशन का उपाय या तो अनुबंध को रद्द करना या निरसन करना है।

डेरी बनाम पीक मामला निर्दोष दुर्व्यपदेशन का एक बहुत अच्छा उदाहरण है। यहां प्रतिवादी के पास एक ट्रामवे कंपनी थी और वह वास्तव में मानता था कि स्टीम ट्राम के लिए अनुमोदन महज औपचारिकता मात्र थी, तथा कंपनी को अनुमति प्रदान कर दी गई थी। अंततः अनुमति नहीं दी गई और कंपनी के शेयर खरीदने वाले वादी को नुकसान उठाना पड़ा। अदालत ने कहा कि कंपनी जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि उनका वास्तव में मानना था कि अनुमति एक औपचारिकता थी। 

कपटपूर्ण दुर्व्यपदेशन

जब कोई प्रतिवादी कपटपूर्ण दुर्व्यपदेशन में संलग्न होता है, तो वह जानबूझकर किसी अन्य पक्ष को अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करने के इरादे से झूठा बयान देता है। इस प्रकार का दुर्व्यपदेशन विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि इसमें धोखा देने और गुमराह करने का जानबूझकर प्रयास किया जाता है। कपटपूर्ण दुर्व्यपदेशन को साबित करने के लिए, कई महत्वपूर्ण तत्वों को साबित किया जाना चाहिए। सबसे पहले, यह दिखाया जाना चाहिए कि प्रतिवादी ने तथ्य का गलत बयान दिया है। यह कथन मौखिक या लिखित हो सकता है, और यह दूसरे पक्ष की निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, झूठा बयान दूसरे पक्ष को अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करने में एक महत्वपूर्ण कारक रहा होगा। दूसरा, यह साबित किया जाना चाहिए कि प्रतिवादी को पता था कि बयान झूठा है या उसे इसकी सच्चाई या झूठ के प्रति कोई परवाह नहीं थी। इसका अर्थ यह है कि या तो प्रतिवादी को पता था कि बयान झूठा है या फिर उसके पास इसे सच मानने का कोई उचित आधार नहीं था। तीसरा, यह दर्शाया जाना चाहिए कि प्रतिवादी का इरादा दूसरे पक्ष को झूठे बयान के माध्यम से अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करना था। अंत में, यह साबित किया जाना चाहिए कि दूसरे पक्ष ने झूठे बयान पर भरोसा किया और परिणामस्वरूप उसे नुकसान उठाना पड़ा। यदि ये तत्व सिद्ध हो जाते हैं, तो पीड़ित पक्ष अनुबंध को रद्द कर सकता है और प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। कपटपूर्ण दुर्व्यपदेशन के मामले में क्षतिपूर्ति में आर्थिक नुकसान, जैसे कि जेब से किए गए खर्च और खोया हुआ लाभ, के लिए मुआवजा शामिल हो सकता है, साथ ही गैर-आर्थिक नुकसान, जैसे कि भावनात्मक संकट और प्रतिष्ठा को हुई क्षति के लिए मुआवजा भी शामिल हो सकता है।

लापरवाहीपूर्ण दुर्व्यपदेशन

किसी भी विक्रय अनुबंध में उचित सावधानी बरतना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। विक्रेता का दायित्व है कि वह क्रय हेतु प्रस्तुत माल के बारे में सटीक एवं आवश्यक जानकारी प्रदान करे। इसके अलावा, किसी भी मौजूदा क्षति या दोष के बारे में ग्राहक को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। यदि विक्रेता किसी कथन की प्रामाणिकता की जांच किए बिना उसे प्रस्तुत करता है, और वह कथन क्रेता के अनुबंध में प्रवेश करने के निर्णय को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है, तो क्रेता को झूठे विवरण के कारण हानि हो सकती है। ऐसे मामलों में, क्रेता को प्रदान की गई जानकारी का मूल्यांकन करते समय उचित सावधानी बरतने में विफल रहने की जिम्मेदारी लेनी होगी। 

लापरवाहीपूर्ण दुर्व्यपदेशन के मामलों में क्रेता के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग होते हैं। प्राथमिक तौर पर, क्रेता को अनुबंध को रद्द करने का अधिकार है, जिससे उसका अस्तित्व प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है। यह उपाय क्रेता को करार से हटने और माल विक्रेता को वापस करने की अनुमति देता है। इसके अतिरिक्त, क्रेता विक्रेता के दुर्व्यपदेशन के परिणामस्वरूप हुई क्षति के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है। इन क्षतियों में वित्तीय नुकसान, भावनात्मक संकट, या झूठे बयान के कारण क्रेता को हुई कोई अन्य हानि शामिल हो सकती है। 

लापरवाहीपूर्ण दुर्व्यपदेशन के मामले में सबूत का भार क्रेता पर होता है। क्रेता को यह प्रदर्शित करना होगा कि विक्रेता ने झूठा बयान दिया था, कि अनुबंध करते समय उन्होंने उस बयान पर भरोसा किया था, तथा विक्रेता के दुर्व्यपदेशन के प्रत्यक्ष परिणाम स्वरूप उन्हें क्षति उठानी पड़ी थी। क्रेताओं के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सामान खरीदते समय उचित सावधानी बरतें और सोच-समझकर निर्णय लें। गहन शोध, पेशेवर सलाह लेना, तथा अनुबंध की शर्तों की सावधानीपूर्वक समीक्षा करना, अपने हितों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। उचित सावधानी बरतकर, क्रेता लापरवाहीपूर्ण दुर्व्यपदेशन का शिकार होने के जोखिम को कम कर सकते हैं और अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं। 

माल की बिक्री का अनुबंध

माल की बिक्री के लिए अनुबंध, माल बिक्री अधिनियम, 1930 द्वारा शासित होते हैं। अधिनियम में विक्रय अनुबंध के निर्माण, ऐसे अनुबंध के प्रभाव, उसके निष्पादन, भुगतान करने वाले तथा न करने वाले विक्रेताओं के अधिकारों और कर्तव्यों तथा अनुबंध के उल्लंघन के लिए उपचार संबंधी प्रावधान शामिल हैं। 

माल की बिक्री के लिए एक अनुबंध में दो पक्ष शामिल होते हैं, एक क्रेता और दूसरा विक्रेता, जो एक अनुबंध बनाते हैं। इस अनुबंध में, विक्रेता एक निश्चित कीमत पर क्रेता को कुछ सामान हस्तांतरित करने के लिए सहमत होता है। मूल्य हस्तांतरण के लिए प्रतिफल है। माल की बिक्री के अनुबंध के लिए दो पक्षों की उपस्थिति, एक हस्तांतरणीय माल और प्रतिफल के रूप में मूल्य आवश्यक हैं। 

वैध अनुबंध के आवश्यक तत्वों में शामिल हैं:

  • प्रस्ताव
  • प्रस्ताव की स्वीकृति
  • कानूनी संबंध बनाने का आशय
  • प्रतिफल 

माल की बिक्री के अनुबंध में दुर्व्यपदेशन

इस अधिनियम की धारा 3 में कहा गया है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के प्रावधान किसी भी माल की बिक्री के अनुबंध पर लागू होंगे, बशर्ते कि वह माल की बिक्री अधिनियम के किसी भी प्रावधान से असंगत न हो। यह प्रावधान माल की बिक्री के अनुबंध में गलत बयानी के मामले में भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 18 के तहत मुकदमा दायर करने की अनुमति देता है। पीड़ित पक्ष न्यायालय में उपचार की मांग कर सकता है, हालांकि माल विक्रय अधिनियम में झूठे प्रतिनिधित्व के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। 

बिक्री का अनुबंध पूर्ण या सशर्त हो सकता है। अनुबंध को अंतिम रूप देने से पहले शर्तों पर चर्चा और बातचीत की जाती है। चर्चाओं और बातचीत के दौरान ही एक पक्ष दूसरे को प्रभावित करने में सक्षम होता है और इस स्तर पर दिया गया कोई भी बयान वैध और सुविचारित होना चाहिए, ताकि भविष्य में जोखिम से बचा जा सके। 

अनुबंध बनाते समय विश्वसनीय बयान देना क्रेता तथा विक्रेता दोनों का कर्तव्य है। आंशिक सत्य या किसी भी चूक के बयान भी गलत प्रतिनिधित्व का कारण बनेंगे। 

इस विषय पर आम सहमति

अनुबंध निर्माण के क्षेत्र में, किसी करार की वैधता के लिए एक मूलभूत आवश्यकता अनुबंध के विषय-वस्तु के संबंध में अनुबंध करने वाले पक्षों के बीच साझा समझ या “सर्वसम्मति” है।  यह साझा समझ यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्ष समान आशय और अपेक्षाओं के साथ अनुबंध में प्रवेश करें। हालाँकि, तथ्यों की ग़लतियाँ तब उत्पन्न हो सकती हैं जब विषय-वस्तु के संबंध में पक्षों के बीच ग़लतफ़हमी या भ्रांति हो। ये गलतियां मूलतः दुर्व्यपदेशन हैं जो अनुबंध के लिए सहमति उत्पन्न करती हैं। 

तथ्यों की ग़लतियाँ कई कारणों से हो सकती हैं। कभी-कभी, संचार संबंधी समस्याओं या समझ में अंतर के कारण विषय-वस्तु की ग़लतफ़हमी हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि एक पक्ष का मानना है कि वे कार का एक विशिष्ट मॉडल खरीद रहे हैं, लेकिन दूसरा पक्ष एक अलग मॉडल बेचने का इरादा रखता है, तो तथ्य की गलती हुई है। 

तथ्यों की गलतियों का एक अन्य सामान्य कारण महत्वपूर्ण तथ्यों का बहिष्करण या लोप है। यदि एक पक्ष महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा करने में विफल रहता है या विषय-वस्तु के बारे में गलत बयान देता है, तो यह दूसरे पक्ष को गलत धारणा के आधार पर अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि विक्रेता किसी उत्पाद में ज्ञात दोष का खुलासा करने में विफल रहता है, तो क्रेता यह गलत धारणा बनाकर उत्पाद खरीद सकता है कि इसमें कोई दोष नहीं है। 

तथ्यों की गलतियों के महत्वपूर्ण कानूनी निहितार्थ हो सकते हैं। कुछ मामलों में, तथ्य की गलती अनुबंध को शून्य या शून्यकरणीय बना सकती है। यह बात विशेष रूप से तब सत्य है जब गलती अनुबंध के लिए महत्वपूर्ण थी, अर्थात इसने करार के सार या तत्त्व को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, यदि तथ्य की कोई गलती विषय-वस्तु की पहचान से संबंधित है, जैसे कि मूल चित्रकारी के बजाय नकली चित्रकारी खरीदना, तो अनुबंध शून्य हो सकता है। 

अन्य मामलों में, तथ्य की गलती के कारण अनुबंध शून्य नहीं हो सकता, लेकिन निरसन या क्षतिपूर्ति के लिए दावा उत्पन्न हो सकता है। निरसन, अनुबंध को रद्द करने या समाप्त करने की प्रक्रिया है, जिसमें पक्षों को अनुबंध में प्रवेश करने से पहले की उनकी मूल स्थिति में बहाल किया जाता है। दूसरी ओर, क्षतिपूर्ति का उद्देश्य उस पक्ष को क्षतिपूर्ति प्रदान करना है जिसे गलती के कारण नुकसान हुआ है। 

तथ्यों की गलतियों के जोखिम को कम करने के लिए, अनुबंध के पक्षों के लिए विषय-वस्तु के बारे में स्पष्ट और सटीक ढंग से संवाद करना महत्वपूर्ण है। उन्हें अनुबंध में प्रवेश करने से पहले प्रासंगिक तथ्यों की पूरी तरह से जांच और सत्यापन करके उचित परिश्रम भी करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि दोनों पक्षों को विषय-वस्तु की सामान्य समझ हो तथा अनुबंध सटीक जानकारी पर आधारित हो। 

शून्यकरणीय

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 19 के अनुसार, जब कोई अनुबंध तथ्यों के झूठे प्रतिनिधित्व द्वारा निर्मित किया जाता है, तो पीड़ित पक्ष गलत प्रतिनिधित्व का पता चलने के बाद करार को रद्द करने का विकल्प चुन सकता है। मिथ्या-बयान द्वारा निर्मित अनुबंध शून्यकरणीय होता है; अन्यथा पीड़ित पक्ष अनुबंध के निष्पादन की मांग कर सकता है, मानो किया गया प्रतिनिधित्व सत्य था। 

हालाँकि, किसी अनुबंध को शून्य घोषित करने के कुछ अपवाद हैं: 

  • यदि प्रतिवादी की चुप्पी के कारण महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाने के कारण सहमति प्राप्त की गई थी तो करार शून्यकरणीय नहीं होगा। यदि पीड़ित पक्ष के पास ऐसे झूठे प्रतिनिधित्व को पकड़ने की क्षमता और संसाधन थे, लेकिन उसने सच्चाई की जांच करने के लिए उचित सावधानी या तत्परता नहीं बरती, तो अनुबंध शून्यकरणीय नहीं होगा।

हॉर्सफॉल बनाम थॉमस (1862) के ऐतिहासिक मामले में, न्यायालय को इस जटिल मुद्दे पर विचार करना पड़ा कि क्या केवल दोष का खुलासा न करना मिथ्या प्रस्तुति या दुर्व्यपदेशन माना जाएगा। 

मामला माल की बिक्री से जुड़ा था, जहां खरीदार, श्री हॉर्सफॉल ने विक्रेता, श्री थॉमस से तांबे की एक मात्रा खरीदी थी। श्री हॉर्सफॉल को पता नहीं था कि तांबे में एक गुप्त दोष था, जो इसे उसके इच्छित उद्देश्य के लिए अनुपयुक्त बनाता था। दोष का पता चलने के बाद, श्री हॉर्सफॉल ने श्री थॉमस के विरुद्ध दुर्व्यपदेशन और धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया था।  

अदालत ने लेन-देन से जुड़ी परिस्थितियों की सावधानीपूर्वक जांच की तथा विक्रेता के आचरण पर विशेष ध्यान दिया। इसने निर्धारित किया कि श्री थॉमस ने जानबूझकर दोष को नहीं छिपाया था, बल्कि वह श्री हॉर्सफॉल को इसके बारे में बताने में असफल रहे थे। अदालत ने तर्क दिया कि किसी दोष का खुलासा न करना, अपने आप में, दुर्व्यपदेशन या धोखाधड़ी नहीं है। 

महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि उक्त दोष श्री थॉमस द्वारा छिपाया या छुपाया नहीं गया था। यह एक गुप्त दोष था, जो सावधानीपूर्वक निरीक्षण करने पर पता चल गया। अदालत ने कहा कि श्री हॉर्सफॉल का यह दायित्व था कि वे अनुबंध में प्रवेश करने से पहले उचित सावधानी बरतें और माल की गहन जांच करें। 

हॉर्सफॉल बनाम थॉमस मामले में न्यायालय के निर्णय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि विक्रेता केवल इस आधार पर गलत बयानी या धोखाधड़ी के लिए उत्तरदायी नहीं है कि उसने किसी दोष को प्रकट करने में विफलता दिखाई है, जिसे जानबूझकर नहीं छिपाया गया है। यह सिद्धांत वाणिज्यिक लेनदेन में कैविएट एम्प्टर, या “क्रेता सावधान रहें” के महत्व को रेखांकित करता है। इससे क्रेता पर यह दायित्व आ जाता है कि वह खरीदारी करने से पहले पूरी जांच-पड़ताल कर ले और सामान का सावधानीपूर्वक निरीक्षण कर ले। 

फिर भी, अदालत के फैसले ने विक्रेताओं को अपने लेन-देन में ईमानदारी और पारदर्शिता से काम करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया। यद्यपि दोष का खुलासा न करना गलत बयानी या धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता है, फिर भी विक्रेता सद्भावना और निष्पक्ष व्यवहार के कर्तव्य से बंधे होते हैं। वे खरीददारों को सक्रिय रूप से गुमराह नहीं कर सकते हैं या बिक्री को बढ़ावा देने के लिए भ्रामक तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। 

हॉर्सफॉल बनाम थॉमस मामला दुर्व्यपदेशन और धोखाधड़ी के कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बना हुआ है, जो इसी तरह के मामलों के विश्लेषण में अदालतों का मार्गदर्शन करता है। यह बेईमान विक्रेताओं से क्रेताओं की सुरक्षा और वाणिज्यिक लेनदेन में निष्पक्षता और निश्चितता को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर प्रकाश डालता है। 

  • यदि दुर्व्यपदेशन के कारण सहमति नहीं दी गई है तो भी अनुबंध शून्यकरणीय नहीं है। जब क्रेता और विक्रेता के बीच किसी बिक्री पर चर्चा होती है, जिसमें विक्रेता मासूमियत से या धोखाधड़ी से कुछ गलत बयान करता है, तो क्रेता दुर्व्यपदेशन को पहचानने के बावजूद अनुबंध में प्रवेश करता है। इस मामले में, क्रेता ने जानबूझकर जोखिम उठाया, इसलिए बाद में अनुबंध को रद्द नहीं किया जा सकता है। 

कानूनी उपाय

निरसन 

निरसन एक उपाय है जो पक्षों को अनुबंध को समाप्त करने और अनुबंध बनने से पहले की अपनी प्रारंभिक स्थिति पर वापस जाने की अनुमति देता है। यह अनुबंध को शून्य और निरर्थक बना देता है तथा गैर-उत्तरदायी पक्षों को उनके दायित्वों से मुक्त कर देता है। जब विक्रय अनुबंध रद्द कर दिया जाता है, तो खरीदी गई वस्तु विक्रेता को वापस कर दी जाएगी तथा विक्रेता को क्रेता को भुगतान की गई कीमत वापस करनी होगी। 

प्रतिज्ञान

उपचार के रूप में प्रतिज्ञान को लागू करने के लिए, पीड़ित पक्ष को दुर्व्यपदेशन या अनुबंध के उल्लंघन के बारे में पता होना चाहिए। जब तक समय है, यदि वे पुष्टि करना चाहते हैं, तो अनुबंध जारी रहेगा, जैसे कि दुर्व्यपदेशन सच थी। हालाँकि, यदि दावेदार अनुबंध के उल्लंघन के बाद लंबे समय तक इसे रद्द करने या पुष्टि करने का विकल्प नहीं चुनता है, तो यह माना जाता है कि वह पुष्टि करता है और अनुबंध जारी रखना चाहता है। 

लॉन्ग बनाम लॉयड (1958)

दुर्व्यपदेशन के इस मामले में, वादी ने कुछ खामियों को देखते हुए प्रतिवादी से आधी कीमत पर एक लॉरी खरीदी थी। वादी को ट्रक के माइलेज में कुछ गंभीर समस्याएं नजर आईं और उसने इसकी सूचना प्रतिवादी को दी, जिसके बाद ट्रक खराब हो जाने पर उसने उसे अपने भाई को व्यापारिक यात्रा के लिए दे दिया। इस घटना के बाद, वादी अनुबंध को रद्द करना चाहता था। हालांकि, अदालत ने वादी के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि जब निर्दोष दुर्व्यपदेशन का पता चला तो वादी के पास इसे रद्द करने का अवसर था; हालांकि, उसने इसका उपयोग करना जारी रखा और यहां तक कि इसे अपने भाई को उधार भी दे दिया; भाई को इसे उधार देना पुष्टि का कार्य माना गया था। 

माल की बिक्री के अनुबंध में, दुर्व्यपदेशन के दावे से निपटने के लिए दायित्व की सीमाएं और उपचार शामिल किए जा सकते हैं। अनुबंध के उल्लंघन के लिए उपचार और दायित्व को सीमित करने वाला खंड उचित और निष्पक्ष होना चाहिए। 

धोखाधड़ी और दुर्व्यपदेशन के बीच अंतर

धोखाधड़ी और दुर्व्यपदेशन दोनों ही जानबूझकर किए गए कार्य हैं जो दूसरों को धोखा दे सकते हैं, लेकिन दोनों के बीच प्रमुख अंतर हैं।

धोखाधड़ी – धोखाधड़ी एक जानबूझकर किया गया कार्य है जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी को धोखा देना होता है। इसमें झूठ बोलना, धोखा देना या चोरी करना शामिल हो सकता है। धोखाधड़ीपूर्ण कृत्य आपराधिक या दीवानी हो सकते हैं, और इनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे जुर्माना, कारावास या प्रतिष्ठा की हानि। 

दुर्व्यपदेशन – दुर्व्यपदेशन एक व्यापक शब्द है जो किसी भी मिथ्या कथन या तथ्य की चूक को शामिल करता है। यह जानबूझकर या अनजाने में हो सकता है, और यह भौतिक या अभौतिक भी हो सकता है। भौतिक दुर्व्यपदेशन वे हैं जिनसे किसी व्यक्ति के निर्णय को प्रभावित करने की उचित रूप से अपेक्षा की जा सकती है, जबकि अभौतिक दुर्व्यपदेशन वे हैं जिनसे कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं होती है।  

मुख्य अंतर – धोखाधड़ी और दुर्व्यपदेशन के बीच मुख्य अंतर ये हैं: 

  • आशय: धोखाधड़ी हमेशा जानबूझकर की जाती है, जबकि दुर्व्यपदेशन जानबूझकर या अनजाने में हो सकती है। 
  • भौतिकता: धोखाधड़ी वाले कार्य हमेशा भौतिक होते हैं, जबकि दुर्व्यपदेशन भौतिक या अभौतिक हो सकते हैं।
  • परिणाम: धोखाधड़ी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे जुर्माना, कारावास या प्रतिष्ठा की हानि, जबकि दुर्व्यपदेशन के कोई भी परिणाम नहीं हो सकते हैं। 

उदाहरण – धोखाधड़ी और दुर्व्यपदेशन के कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं:

  • धोखाधड़ी: यदि कोई कार विक्रेता पुरानी कार की स्थिति के बारे में झूठ बोलता है तो वह धोखाधड़ी कर रहा है। 
  • दुर्व्यपदेशन: जो नौकरी का आवेदक अपने जीवनवृत्तांत (बायोडाटा) में अपनी योग्यताओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, वह दुर्व्यपदेशन कर रहा है।
  • धोखाधड़ी: जो कंपनी जानबूझकर दोषपूर्ण उत्पाद बेचती है, वह धोखाधड़ी कर रही है। 
  • दुर्व्यपदेशन: यदि कोई  रेस्टॉरेंट किसी व्यंजन को “ताज़ी सामग्री से बना” बताकर विज्ञापित करता है, जबकि वह वास्तव में जमे हुए सामग्रियों से बना होता है, तो वह दुर्व्यपदेशन कर रहा है।

निष्कर्ष

दुर्व्यपदेशन एक ऐसा झूठा कथन है जो किसी अनुबंध को बनाते समय दिया जाता है या दर्शाया जाता है। महत्वपूर्ण तथ्यों को छोड़ देने से गलत बयानी संभव है। इससे अनुबंध के एक पक्ष को हानि हो सकती है, जबकि दूसरे पक्ष को कुछ लाभ हो सकता है। अनुबंध बनाते समय सभी तथ्यों और कथनों की जांच करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तथ्य विश्वसनीय और सत्य हैं। मिथ्या कथन मासूमियत से या लापरवाही से या धोखाधड़ी के आशय से दिए जा सकते हैं, एक सक्षम पक्ष का यह कर्तव्य है कि वह करार करने से पहले सभी उचित सावधानियां बरतें। दैनिक जीवन में हर व्यक्ति द्वारा सामान बेचा और खरीदा जाता है; सामान खरीदते समय सोच-समझकर निर्णय लिया जाना चाहिए। मिथ्या प्रतिनिधित्व किसी पक्ष को ऐसा अनुबंध करने के लिए प्रेरित करता है, जिसे वह अन्यथा नहीं करता; तथापि, मिथ्या प्रतिनिधित्व का पता चलने पर, पीड़ित पक्ष के पास अनुबंध को रद्द करने या उसे पुष्ट करने तथा अनुबंध को जारी रखने की मांग करने का विकल्प होता है। दुर्व्यपदेशन अनुबंध के उल्लंघन का आधार है। 

संदर्भ

भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत आपराधिक मानव वध

यह लेख Yashovardhan Agarwal द्वारा लिखा गया है, और आगे Jaanvi Jolly द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया। यह लेख भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत प्रदान की गई आपराधिक मानव वध (कल्पेबल होमिसाइड)  की अवधारणा से विस्तृत रूप से निपटने का प्रयास करता है और संबंधित मामलों की मदद से इससे संबंधित कई बारीकियों पर विस्तार से चर्चा करता है। इसके अलावा, ‘कल्पित परिस्थितियों (सपोज़्ड सरकमस्टैन्स)’ की अवधारणा और ‘द्वेष के हस्तांतरण (ट्रान्स्फर ऑफ मैलिस)’ के सिद्धांत को भी समझाया गया है। यह बचाव के रूप में उकसावे के क्षेत्र में ‘पीड़ित महिला सिंड्रोम’ की अवधारणा को पेश करने का भी प्रयास करता है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है।  

परिचय

“मानव वध” को अंग्रेजी में होमीसाइड कहा जाता है यह शब्द लैटिन शब्द “होमो” जिसका अर्थ है मानव, और “सेडरे” जिसका अर्थ है मारना, से आया है,। एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की हत्या करना एक ऐसी घटना है जिसकी जड़ें मानव जाति की शुरुआत से ही है, प्रकृति की अवस्था में वापस जाती हैं।

मानव वध हमेशा दंडनीय नहीं होता; मृत्युदंड के किसी आदेश के क्रियान्वयन या निजी बचाव के किसी कार्य के बारे में सोचें जो दुर्भाग्य से दूसरे की मृत्यु का कारण बनता है। इन उदाहरणों में, चूंकि हमारे पास उचित आधार हैं तो किसी आपराधिक मनःस्थिति (मेंस रिया) को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, इसलिए इन्हें वैध मानव वध कहा जाता है। हालाँकि, उचित आधार के अभाव में, दूसरे की हत्या गैरकानूनी और दंडनीय है। ‘गैरकानूनी मानव वध’ या ‘आपराधिक मानव वध’ का क्षेत्र इस लेख का विषय है।

1860 का पूर्व भारतीय दंड संहिता (आईपीसी,1860) के अध्याय XVI और नव प्रस्तुत भारतीय न्याय संहिता, 2023 (इसके बाद बीएनएस, 2023) के अध्याय VI के तहत शरीर के खिलाफ अपराधों से व्यापक रूप से निपटते हैं, जिनमें से आपराधिक मानव वध एक हिस्सा है। भारत में, आपराधिक मानव वध को दो रूपों में विभाजित किया गया है: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 100 के तहत ‘आपराधिक मानव वध’ (पूर्व में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 299) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 101 के तहत ‘आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते है’ (पूर्व में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 300)।

प्रथम दृष्टया पढ़ने पर, दोनों बहुत समान लग सकते हैं; हालांकि, इरादे की डिग्री में बहुत महत्वपूर्ण अंतर हैं, जिन्हें अवधारणाओं की बेहतर समझ के लिए समझना होगा। इन अंतरों को लेख में उपयुक्त स्थानों पर विस्तृत रूप से बताया गया है। इन अवधारणाओं को समझने के बाद, कोई भी यह विश्लेषण करने और समझने में सक्षम होगा कि कौन सा कार्य हत्या के अपराध के अंतर्गत आएगा और कौन सा कार्य आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, उन  तक सीमित होगा।

नए शुरू किए गए बीएनएस, 2023 द्वारा केवल प्रावधानों की धारा संख्या बदल दी गई है और धारा के शब्दों में कोई बदलाव नहीं है। तुलना के लिए नए और पुराने धारा संख्या  नीचे तालिका में दिए गए हैं।

अपराध भारतीय न्याय संहिता         2023 के अंतर्गत धाराएँ  भारतीय दंड संहिता 1860 के                  अंतर्गत धाराएँ
आपराधिक मानव वध धारा 100  धारा 299 
हत्या धारा 101  धारा 300 
जिस व्यक्ति की मृत्यु का इरादा था उसके                                          अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनकर            आपराधिक मानव वध – द्वेष का स्थानांतरण धारा 102  धारा 301 
हत्या के लिए सज़ा धारा 103  धारा 302 
आजीवन कारावास की सजा पाए गए व्यक्ति के द्वारा हत्या करने पर सजा धारा 104  धारा 303 
आपराधिक मानव वध के लिए सजा धारा 105  धारा 304 

आपराधिक मानव वध

बीएनएस, 2023 के तहत प्रत्येक अपराध के लिए, तीन तत्व मौजूद होने चाहिए:

  1. आपराधिक मनःस्थिति: जो अपराध के लिए आवश्यक दोषी दिमाग या दोषी इरादा है। आपराधिक मानव वध के अपराध के लिए या तो इरादा या पूर्व जानकारी मौजूद होना चाहिए। यह,”एक्टस रीअस नॉन फेसिट रियम निसी मेंस सिट रिया, के आपराधिक कानून सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है “एक कार्य एक व्यक्ति को अपराध का दोषी नहीं बनाता है जब तक कि उसका मन भी दोषी न हो।”

दिप्ता दत्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2023), के मामले में यह कहा गया था कि, ‘आपराधिक मनःस्थिति‘ मन की स्थिति है जो दोषीता को इंगित करती है, जो अपराध के एक तत्व के रूप में एक क़ानून द्वारा आवश्यक है। प्रत्येक अपराध के लिए एक मानसिक तत्व की आवश्यकता होती है जो कि कोई निंदनीय मानसिक स्थिति होती है।

हालाँकि ‘आपराधिक मनःस्थिति‘ शब्द आईपीसी 1860 या बीएनएस 2023 में कहीं नहीं पाया गया है, इसका सार संहिता के लगभग सभी प्रावधानों में अभिव्यक्तियों के उपयोग से परिलक्षित होता है जैसे: “इरादे से, जानबूझकर, लापरवाही से, गैरकानूनी, दुर्भावनापूर्ण, जानकर या विश्वास करके, धोखाधड़ी से, बेईमानी से, आदि।”

  1. आपराधिक कार्य: जो अपराध के लिए आवश्यक दोषी कार्य या चूक है। आपराधिक मानव वध के अपराध के लिए, किसी व्यक्ति की मृत्यु होनी चाहिए।
  2. आकस्मिकता का तत्व: अभियुक्त का कार्य अपेक्षित आपराधिक मनःस्थिति के तहत किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, आपराधिक मानव वध के अपराध के लिए ‘मृत्यु कारित करने का कार्य’ ‘मृत्यु कारित करने के इरादे या ज्ञान’ के साथ किया जाना चाहिए। 

आपराधिक मानव वध की डिग्री

आचरण की गंभीरता और इसमें शामिल अपराध के कारण के आधार पर आपराधिक मानव वध को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • पहली डिग्री– यह आपराधिक मानव वध का सबसे गंभीर रूप है, जिसे बीएनएस, 2023 की धारा 101 में हत्या के रूप में परिभाषित किया गया है और बीएनएस, 2023 की धारा 103 में इसे दंडनीय बनाया गया है।
  • दूसरी डिग्री– यह बीएनएस, 2023 की धारा 100 में परिभाषित आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, उनका कम गंभीर रूप है और इसे बीएनएस, 2023 की धारा 105 के पहले भाग के तहत दंडनीय बनाया गया है।
  • तीसरी डिग्री– यह आपराधिक मानव वध का सबसे कम गंभीर रूप है। इसे भी बीएनएस, 2023 की धारा 100 के तहत परिभाषित किया गया है और बीएनएस, 2023 की धारा 105 के दूसरे भाग के तहत दंडनीय है।

संहिता की योजना में, आपराधिक मानव वध ‘जाति‘ है जबकि हत्या ‘प्रजातियाँ‘, है। सभी हत्याएं आपराधिक मानव वधएं हैं, लेकिन सभी आपराधिक मानव वध हत्या नहीं हैं। इसलिए, हत्या की विशेष विशेषताओं के बिना आपराधिक मानव वध, आपराधिक मानव वध है, जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता है । 

अगले खंड में हम आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, उनके अपराध और अपराध के लिए सज़ा का विश्लेषण करके शुरुआत करेंगे।

आपराधिक मानव वध, जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता: बीएनएस, 2023 की धारा 100 (आईपीसी, 1860 की धारा 299)

कोई भी कार्य दो परिस्थितियों में आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, इसके अंतर्गत आ सकता है:

  1. आपराधिक मानव वध, जो कभी भी हत्या बनने की सीमा पार नहीं कर पाया, या
  2. आपराधिक मानव वध, जो हत्या की सीमा को पार कर गया, लेकिन बीएनएस, 2023 की धारा 101 के तहत प्रदान किए गए कोई भी अपवाद लागू थे, जिससे आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, उसमे बदल दिया गया।

ये दोनों स्थितियाँ बीएनएस, 2023 की धारा 105 के तहत दंडनीय हैं।

बीएनएस, 2023 की धारा 100 में तीन वाक्यांश शामिल हैं जो अलग-अलग मानसिकता और अलग-अलग आचरण को दर्शाते हैं। ये इस प्रकार हैं:

  1. मृत्यु कारित करने का इरादा
  2. ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा जिससे मृत्यु होने की संभावना हो
  3. उस कार्य का ज्ञान जिससे मृत्यु होने की संभावना हो

तीन वाक्यांशों के बीच अंतर की समझ को आसान बनाने के लिए, लेखक अगले खंड में विस्तृत चर्चा के लिए इन्हें तीन भागों में विभाजित किया है।

भाग 1: मृत्यु कारित करने का इरादा

बीएनएस, 2023 की धारा 100 में कहा गया है कि जहां कोई कार्य ‘मौत का कारण बनने’ के इरादे से किया जाता है, वह आपराधिक मानव वध होगा। दिलचस्प बात यह है कि यही प्रावधान धारा 101(a) के तहत पुन: प्रस्तुत किया गया है, जो हत्या से संबंधित है; इसके परिणाम पर बाद में चर्चा की जाएगी। यहां इरादा एक विशेष परिणाम उत्पन्न करने की गहरी इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। कोई व्यक्ति कुछ करने के इरादे से कार्य करता है और परिणाम प्राप्त करने की पूर्ण इच्छा के साथ कार्य करता है। 

अपराध पर रसेल (12वां संस्करण) के अनुसार,”अपराध में मानसिक तत्व, ‘इरादा’ शब्द का उपयोग उस व्यक्ति के मानसिक दृष्टिकोण को दर्शाने के लिए किया जाता है जिसने एक निश्चित परिणाम लाने का संकल्प लिया है यदि वह संभवतः ऐसा कर सकता है। वह अपने आचरण की रेखा को इस प्रकार आकार देता है कि वह उस विशेष परिणाम को प्राप्त कर सके जिस पर उसका लक्ष्य है।”

कानून मानता है कि एक व्यक्ति अपने कार्यों के स्वाभाविक और अपरिहार्य (इनएविटेबल) परिणामों का इरादा रखता है; इसलिए, जब अभियुक्त  का आचरण अन्यथा दिखता है तो उसे ‘इरादे की कमी’ का बचाव करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उदाहरण के लिए, यदि यह प्रदर्शित होता है कि अभियुक्त ने नजदीक से सीधे पीड़ित के सिर में गोली मारी है, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एकमात्र इरादा मौत का कारण बनाना था, और अभियुक्त  द्वारा इरादे की कमी जैसे किसी भी अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जाएगा ।

‘मृत्यु कारित करने के इरादे से किया गया कार्य’ वाक्यांश को संतुष्ट करने के लिए तीन शर्तों को पूरा करना होगा:

  1. आपराधिक कार्य : हमें अभियुक्त के कार्य की जांच कर यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी इंसान की मौत हुई है।

उदाहरण के लिए: यदि अभियुक्त ने पीड़ित पर गोली चलाई, हालांकि गोली उसे नहीं लगी या केवल उसकी बांह में लगी जिसके परिणामस्वरूप गंभीर चोट लगी और मृत्यु नहीं हुई, तो यह शर्त पूरी नहीं कही जा सकती।

  1. आपराधिक मनःस्थिति: अभियुक्त के आचरण की जांच करके हमें यह समझना होगा कि क्या अभियुक्त का मौत का कारण बनने का ‘दोषी इरादा’ था। उदाहरण के लिए: यदि अभियुक्त  ने पीड़ित के दिल में चाकू मारा था, तो हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि उसका इरादा मौत का कारण बनना था।
  2. आकस्मिकता का तत्व: अभियुक्त के कार्य और मृत्यु के बीच संबंध स्थापित किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में व्यक्ति की मृत्यु अभियुक्त के कार्य के कारण होनी चाहिए। इस कारणता को मुकदमे में प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना चाहिए। 

उदाहरण के लिए: अभियुक्त  ने पीड़ित के भोजन में जहर मिलाया, हालांकि पीड़ित की भोजन को छूने से पहले ही दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, अभियुक्त  के कार्य और पीड़ित की मृत्यु के बीच कोई आकस्मिकता नहीं है। अत: यह शर्त पूरी नहीं होती। हालांकि यदि पीड़ित ने खाना खाया होता और जहर के कारण उसकी मृत्यु हो गई होती, तो शर्त पूरी हो जाती।

मोती सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) के मामले में आकस्मिकता के तत्व का पता लगाया गया। 9 फरवरी 1960 को, मृतक को पेट में दो गोली मारी गई  थी, जो जीवन के लिए खतरा थी। बाद में उन्हें छुट्टी दे दी गई, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि वह पूरी तरह से ठीक हो गए थे या नहीं। 1 मार्च 1960 को उनकी मृत्यु हो गई और बिना पोस्टमार्टम के उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल इस तथ्य कि बंदूक की गोली जीवन के लिए खतरनाक थी, को यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता कि घटना के तीन सप्ताह से अधिक समय के बाद पीड़ित की मृत्यु, अभियुक्त  द्वारा लगी चोटों के कारण हुई थी। अदालत ने आगे कहा कि हत्या के आरोप को साबित करने के लिए यह स्थापित करना जरूरी है कि मृतक की मौत अभियुक्तों द्वारा दी गई चोटों के कारण हुई। चूँकि मौत का कारण स्थापित करने के लिए कोई सबूत नहीं था, इसलिए अभियुक्त पर आपराधिक मानव वध का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

धारा 100 और धारा 101 (a) दोनों में ‘मृत्यु का कारण बनने के इरादे से किया गया कार्य’ शामिल करने का तर्क

किसी को आश्चर्य होगा कि ‘मृत्यु का कारण बनने के इरादे से किया गया कार्य’ वाक्यांश बीएनएस की धारा 100 और धारा 101 (a) दोनों में क्यों पाया जाता है। समावेशन के तर्क को समझने के लिए, आइए इस कथन को याद करें कि आपराधिक मानव वध जाति है जबकि हत्या प्रजाति है, इसलिए, प्रत्येक कार्य जो प्रजाति का हिस्सा है उसे भी जाति का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने का इरादा रखने वाला कार्य बीएनएस की धारा 101 के अंतर्गत आता है, उसे पहले धारा 100 के अंतर्गत आना होगा। परिणामस्वरूप, प्रत्येक कार्य जो मृत्यु कारित करने के इरादे से किया जाता है और वास्तव में मृत्यु कारित करता है, सीधे तौर पर हत्या के अपराध के अंतर्गत आएगा।

भाग 2: ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा जिससे मृत्यु होने की संभावना हो 

“ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे” के अनुसार, अभियुक्त  को ‘शारीरिक चोट’ पहुंचानी चाहिए, जैसे चाकू से वार करना या लोहे की छड़ से चोट पहुंचाना, और यह चोट मौत का कारण बनने की ‘संभावना’ या संभावित (हो सकती है या नहीं भी हो सकती है) होनी चाहिए। इरादा सीधे तौर पर मौत से नहीं बल्कि शारीरिक चोट जो मौत का कारण बन सकती है, से संबंधित है।

  • विशेष चोट: इस वाक्यांश को लागू करने के लिए, अभियुक्त  का इरादा ‘विशेष’ शारीरिक चोट पहुंचाने का होना चाहिए, जैसे पेट में चाकू मारना आदि। उदाहरण के लिए, यदि A कार चला रहा था और उसने B को मारा, तो यहां कोई विशेष चोट देने का इरादा नहीं था। यह कार्य ‘शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा, जिससे मृत्यु हो सकती है’ वाक्यांश के अंतर्गत नहीं आ सकता क्योंकि यह किसी विशेष चोट का इरादा नहीं था।
  • चोट पहुंचाने का इरादा जो वास्तव में पहुंचाई गई है: इसके अतिरिक्त, अभियुक्त का इरादा उस चोट को कारित करने का रहा होगा जो वास्तव में पहुंचाई गई थी। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति केवल दूसरे की बांह पर वार करना चाहता है लेकिन पीड़ित हिल जाता है जिसके कारण वार पीड़ित के सिर पर पड़ता है। यहां, यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्त ने उस चोट का इरादा किया था जो वास्तव में पहुंचाई गई थी।
  • जानबूझकर की गई चोट से मृत्यु होने की संभावना: शरीर को होने वाली चोट के कारण मौत होने की संभावना चिकित्सीय राय के अनुसार एक वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) जांच है। इसलिए, वास्तव में हुई शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे को साबित करना होता है, यह ज्ञान आवश्यक नहीं है कि ऐसी शारीरिक चोट से व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना है।

इसलिए, शरीर पर विशेष चोट पहुंचाने का इरादा एक व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) जांच है और क्या उस शारीरिक चोट से मृत्यु होने की संभावना थी या नहीं, यह वस्तुनिष्ठ जांच है।

  • बाहरी चोट के कारण आंतरिक चोट: जब भी किसी व्यक्ति के मन में किसी बाहरी चोट पहुंचाने का इरादा होता है, तो उसके मन में होने वाली सभी आंतरिक चोटों के इरादे का भी श्रेय दिया जाएगा। चोट की प्रकृति के आधार पर, उससे पूछताछ की जाएगी कि क्या ऐसी बाहरी और आंतरिक चोट एक साथ ऐसी थी कि जिससे मृत्यु होने की संभावना हो।

उदाहरण के लिए, यदि A ने पसली वाले क्षेत्र में B को मुक्का मारा है। परिणामस्वरूप, पसलियां टूट गईं और फेफड़े में छेद हो गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। बाहरी और आंतरिक दोनों तरह की चोट पहुंचाने का इरादा अभियुक्त  पर आरोपित किया जाएगा, और वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसका इरादा B के फेफड़े को छेदने का नहीं था।

संक्षेप में, इस वाक्यांश के अनुप्रयोग को आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों को पूरा करना होगा:

  1. विशिष्ट शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा,
  2. शरीर की चोट जिससे’मौत का कारण बनने की संभावना’ होनी चाहिए। 

स्पष्टीकरण  1 

बीएनएस, 2023 की धारा 100 का स्पष्टीकरण 1 उस कार्य से संबंधित है जिसमें व्यक्ति सीधे और स्वतंत्र रूप से दूसरे व्यक्ति की मृत्यु का कारण नहीं बनता है, बल्कि दूसरे व्यक्ति की मृत्यु को तेज करता है। इस मामले में, जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई है, वह पहले से ही किसी विकार, बीमारी या शारीरिक कमजोरी से पीड़ित है और अभियुक्त  के कार्य से पीड़ित की मृत्यु तेज हो जाती है। इसे माना जाएगा कि उसने व्यक्ति की हत्या कर दी है और यह दलील कि यह उसका स्वतंत्र कार्य नहीं था जिसके कारण मृत्यु हुई है, उसके लिए उपलब्ध नहीं होगी। 

उदाहरण के लिए: A ने B को पसलियों वाले क्षेत्र में मुक्का मारा, उसकी पसली पहले से ही टूटी हुई थी, जिससे अंततः B की मृत्यु हो गई। A आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी मे नहीं आते है के लिए उत्तरदायी है। भले ही यह साबित हो जाए कि अगर B की पसलियां नहीं टूटी होती, तो वह मुक्के के कारण नहीं मरता। इस मामले में, चूंकि A ने B की मृत्यु को तेज कर दिया है, जो पहले से ही चोट से पीड़ित था, उसे उसकी मृत्यु का कारण माना जाएगा।

स्पष्टीकरण  2

बीएनएस, 2023 की धारा 100 के स्पष्टीकरण  2 में कहा गया है कि यदि अभियुक्त  ने प्रारंभिक शारीरिक चोट पहुंचाई जिससे पीड़ित की मृत्यु हो गई, तो अभियुक्त  यह दावा नहीं कर सकता कि पीड़ित उचित चिकित्सा उपचार और देखभाल के साथ बच गया होता।

यहां ‘कॉजा साइन क्वा नॉन’ यानी प्रारंभिक कारण देखा जाएगा। उदाहरण के लिए, A ने X को पेट में छुरा घोंपा। B X को कंधे पर अस्पताल ले जाता है लेकिन गलती से उसे गिरा देता है। जब वे पहुंचते हैं, तो C, एक कंपाउंडर, ऑपरेशन करता है, लेकिन X की मृत्यु हो जाती है। इस मामले में, A यह तर्क नहीं दे सकता कि अगर उचित उपचार दिया गया होता तो X बच जाता।

यह मूल रूप से उन मामलों को संदर्भित करता है जहां प्राथमिक कारण अभियुक्त  द्वारा निर्धारित किया गया है, लेकिन मृत्यु किसी आगामी कारण से होती है। उदाहरण के लिए, यदि A ने B को मामूली चोट पहुंचाई, लेकिन B की मृत्यु गैंग्रीन के कारण हुई, तो A उत्तरदायी होगा क्योंकि प्राथमिक कारण A द्वारा शुरू किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप गैंग्रीन हुआ।

सोभा और अन्य बनाम किंग एम्परर (1935) 

तथ्य: इस मामले में अभियुक्त  ने अपने भाई के साथ मिलकर मृतक से झगड़ा किया। अभियुक्तों ने मृतक के सिर पर लाठी से वार किया और उस पर लात-घूंसे भी बरसाए, लड़ाई के एक सप्ताह के बाद, मृतक की मृत्यु हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक पता चला कि मौत की वजह सेप्सिस इलाज में लापरवाही की वजह से हुआ। 

उठाए गये मुद्दे: क्या अभियुक्त का कार्य पीड़िता की मौत का प्राथमिक कारण था?

निर्णय: अवध उच्च न्यायालय ने माना कि मौके पर हुआ हमला एक सामान्य झगड़ा था और लाठी से केवल एक ही वार किया गया था, जिसे डॉक्टरों के अनुसार केवल एक साधारण चोट के रूप में संदर्भित किया गया था। मृत्यु का प्राथमिक कारण सेप्सिस के उपेक्षापूर्ण उपचार है। स्पष्टीकरण में वह स्थिति शामिल है जहां मृत्यु का प्राथमिक कारण अभियुक्त का कार्य है और यदि उसे कुशल उपचार प्रदान किया गया होता तो मृत्यु को रोका जा सकता था। इसमें यह शामिल नहीं है कि चोट के बाद उपेक्षापूर्ण उपचार मृत्यु का प्राथमिक कारण है।

जिससे अभियुक्त  को केवल आईपीसी, 1860 के धारा 325 (बीएनएस, 2023 की धारा 116) के तहत दोषी ठहराया गया था, न कि आईपीसी, 1860 की धारा 304 (बीएनएस, 2023 की धारा 105) के तहत। 

भाग 3: यह जानते हुए किया गया कार्य कि ऐसे कार्य से उसकी मृत्यु होने की संभावना है

धारा 100 के तीसरे वाक्यांश में कहा गया है कि ‘आपराधिक मानव वध एक ऐसा कार्य है जो इस ज्ञान के साथ किया जाता है कि ऐसे कार्य से मृत्यु होने की संभावना है।’ यह वाक्यांश ज्ञान के तत्व से संबंधित है। यहां, “ज्ञान” का तात्पर्य किसी व्यक्ति की तथ्यों और परिस्थितियों के बारे में जागरूकता या समझ से है। अभियुक्त को पता होना चाहिए कि वह जो कार्य कर रहा है, उससे मृत्यु होने की संभावना है। 

वासुदेव बनाम पेप्सू राज्य (1956) के ऐतिहासिक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालयने इरादे और ज्ञान के बीच अंतर किया। इस मामले में अभियुक्त ने शादी की दावत के दौरान नशे की हालत में 16 साल के लड़के को गोली मार दी। उसने दावा किया कि वह इतना नशे में था कि उसे लड़के को मारने का न तो इरादा था और न ही इसकी जानकारी थी। न्यायालय ने कहा कि,“ज्ञान किसी कार्य के परिणामों की जागरूकता है। कई मामलों में, इरादा और ज्ञान एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं और कमोबेश एक ही अर्थ रखते हैं, और इरादे को ज्ञान से अनुमान लगाया जा सकता है। ज्ञान और इरादे के बीच की रेखा निस्संदेह पतली है, लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं है कि वे अलग-अलग चीजें हैं।”

“शब्द ‘संभावित’ का अर्थ है ‘शायद’ और इसे ‘निश्चित रूप से’ से अलग किया जाता है। जब किसी घटना के होने की संभावना उसके न होने की संभावना के बराबर या अधिक होती है, तो हम कह सकते हैं कि वह घटना ‘संभावित’ है। यह निष्कर्ष निकालने के लिए कि क्या अभियुक्त  को अपने कार्य से मृत्यु होने की संभावना का ज्ञान था। इसका परीक्षण एक उचित व्यक्ति के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। यदि कोई उचित व्यक्ति अभियुक्त की स्थिति में होता तो क्या उसे मृत्यु कारित करने की संभावना के बारे में पता होता? यदि हां, तो वही ज्ञान अभियुक्त  पर आरोपित किया जाएगा। 

उदाहरण के लिए: यदि एक छोटे से कमरे में 10 लोग मौजूद हैं और अभियुक्त  ने छत की ओर गोली चलाई है, तो यहां किसी भी समझदार व्यक्ति को यह ज्ञान होगा कि उसके कार्य से मृत्यु होने की संभावना है।

संक्षेप में, इस वाक्यांश के अनुसार किसी कार्य को आपराधिक मानव वध मानने के लिए दो शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

  1. सबसे पहले, कार्य या अवैध चूक अपराधी द्वारा की जानी चाहिए।
  2. दूसरा, अपराधी के बारे में यह ज्ञान कि उसके कार्य से  मृत्यु होने की संभावना है।

स्पष्टीकरण 3

बीएनएस, 2023 की धारा 100 के स्पष्टीकरण  3 में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा किए गये कार्य से किस बच्चे की मृत्यु हो जाती है जो अभी मां के गर्भ में है, उस कार्य को आपराधिक मानव वध नहीं माना जाएगा। यदि इस  की सभी तत्व पूरे होते है।

यदि बच्चे का कोई हिस्सा बाहर आ चुका है, भले ही बच्चा पूरी तरह से पैदा न हुआ हो, और यदि बच्चे की मृत्यु हो जाती है, तो वह आपराधिक मानव वध के अपराध के अंतर्गत आएगा। हालांकि, यदि बच्चा पूरी तरह से गर्भ में है, तो वह आपराधिक मानव वध के अपराध के अंतर्गत नहीं आएगा।

बीएनएस, 2023 की धारा 100 पर आधारित मामले

शनमुगम @ कुलंदावेलु बनाम तमिलनाडु राज्य (2002) 

तथ्य  

इस मामले के तथ्यों के अनुसार उस दुर्भाग्यपूर्ण शाम को, पीड़ित बोरवेल से पानी लाने के लिए अपने खेतों में गया, जहां उसने अपने बड़े भाई को ऐसी जगह पर सीटी बजाते हुए देखा, जहां अक्सर महिलाएं आती थीं। उन्होंने उससे पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। थोड़ी देर के झगड़े के बाद अभियुक्त अपनी झोपड़ी की ओर भागा और हथियार लेकर बाहर आया। वह पीड़ित पर झपटा और उसके पेट और सीने में चाकू घोंप दिया।

उठाए गये मुद्दे 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या पीड़ित पर पाई गई चोटें प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया में मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी, ताकि आईपीसी, 1860 की धारा 300 (बीएनएस, 2023 की धारा 101) के दायरे में आ सकें।

निर्णय

न्यायालय ने माना कि डॉक्टर की राय के अनुसार, चाकू का वार किसी भी महत्वपूर्ण अंग पर नहीं था क्योंकि पेट के अंदर कोई चोट नहीं थी। यह कहा गया कि मौत संक्रमण के कारण सेप्टिसेमिया के परिणामस्वरूप हुई। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि पित्ताशय (गॉलब्लैडर) में चाकू के घाव के कारण मृत्यु निश्चित थी।

इन तथ्यों के आधार पर, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त  की ओर से मृत्यु के इरादा से नहीं बचा जा सकता, और इस प्रकार यह मामला ऐसा था, जहां चोटें ऐसी प्रकृति की थी कि वे मृत्यु का कारण बन सकती थीं। इसके अलावा, अभियुक्त ने ऐसी चोटें पहुंचाने का इरादा किया और वास्तव में ऐसी चोटें पहुंचाई, इसलिए उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 299 (बीएनएस, 2023 की धारा 100) के तहत उत्तरदायी ठहराया गया था, और भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के पहले भाग (बीएनएस, 2023 की धारा 105 के पहले भाग) के तहत दंडनीय ठहराया गया। 

राजन बनाम गोमंगलम पुलिस स्टेशन, कोयंबटूर जिला, अब तिरुपुर जिला के पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रस्तुत राज्य, (2016)

तथ्य

इस मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं: अभियुक्त पीड़िता का पति था; उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन, अभियुक्त  पति, जो शराबी बन गया था, उसने अपनी पत्नी से शराब पीने के लिए पैसे मांगे। मृतक ने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद दंपति के बीच झगड़ा हुआ। अभियुक्त  ने गुस्से में आकर मृतिका का मुंह और नाक बंद कर दिया, जिससे वह बेहोश हो गई। अभियुक्त ने यह मानते हुए कि वह मर गई है, उसे चटाई पर लिटा दिया, उस पर मिट्टी का तेल डाला, आग लगा दी और घर को अंदर से बंद कर दिया। 

उठाए गये मुद्दे 

क्या अभियुक्त को आईपीसी की धारा 302 (बीएनएस, 2023 की धारा 103) के तहत हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

मद्रास उच्च न्यायालय ने विश्लेषण किया कि जब अभियुक्त ने मृतक को थप्पड़ मारने का पहला कार्य किया, तो उसका मृत्यु या ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा नहीं था जो मृत्यु का कारण बन सके। जब उसने मिट्टी का तेल डालकर आग लगाने का दूसरा कार्य किया, तो उसका मृतक की मृत्यु या ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा नहीं था जो मृत्यु का कारण बन सके।
अदालत ने माना कि ये दोनों कार्य एक ही कार्य का गठन करते हैं, और अभियुक्त  का किसी भी बिंदु पर मृत्यु या शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा नहीं था। वह धारा 299 ( बीएनएस, 2023 की धारा 100) के पहले या दूसरे भाग के अंतर्गत नहीं आएगा। चूंकि दूसरा कार्य, मिट्टी का तेल डालना और आग लगाना, पर्याप्त देखभाल और ध्यान दिए बिना किया गया था, और लापरवाही से किया गया था, बिना यह सत्यापित किए कि मृतक जीवित है या नहीं, अदालत ने उस पर ज्ञान आरोपित किया जैसा कि धारा 299 (बीएनएस, 2023 की धारा 100) के तीसरे भाग के तहत आवश्यक है और भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के दूसरे पैराग्राफ (बीएनएस, 2023 की धारा 105 ) के तहत दंडित किया गया था।

कपूर सिंह बनाम पेप्सू राज्य (1954) 

तथ्य

इस मामले में तथ्य इस प्रकार हैं: घटना से एक वर्ष पहले, मृतक के बेटे ने अपीलकर्ता के बेटे के पैर पर गंभीर चोट पहुंचाई, जिसके कारण उसका पैर काटना पड़ा। दुर्घटना के कारण, अपीलकर्ता को पिता और पुत्र के प्रति द्वेष था और वह बदला लेने की कोशिश कर रहा था। 30 सितंबर 1952 के दिन, अपीलकर्ता मृतक से मिला और उसने और उसके साथियों ने उसे पकड़ लिया, और अभियुक्त ने एक मोटी लकड़ी की छड़ी से मृतक के हाथ और पैरों पर 18 चोटें पहुंचाईं।

उठाए गये मुद्दे 

क्या अभियुक्त को आईपीसी की धारा 302 (बीएनएस, 2023 की धारा 103) के तहत हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

अदालत ने विश्लेषण किया कि, हालांकि चोटों की संख्या बहुत अधिक थी, लेकिन उनमें से कोई भी शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से पर नहीं थी। शीर्ष अदालत ने माना कि अपीलकर्ता का मकसद प्रतिशोध लेना था और इस तरह उसने मृतक के केवल हाथ और पैर पर चोटें पहुंचाईं और शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर कोई चोट नहीं पहुंचाई। इससे साफ जाहिर होता है कि उसका इरादा मृतक की हत्या करने का नहीं था।  इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि चोटें मृतक की मृत्यु का कारण बनने के इरादे से पहुंचाई गई थीं। हालाँकि, इतनी शारीरिक चोटें थीं कि उन्हें पता था कि इससे मृतक की मृत्यु होने की संभावना होगी। इसलिए, अदालत ने उसे आईपीसी की धारा 299 (बीएनएस, 2023 की धारा 100) के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

बीएनएस, 2023 की धारा 105  के तहत आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे नहीं आते है उनके लिए सजा

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 105 (जो पहले भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 304 थी) आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, जैसा कि बीएनएस, 2023 की धारा 100 में परिभाषित किया गया है के लिए सजा का प्रावधान करती है। 

बीएनएस, 2023 की धारा 105 में कहा गया है कि यदि अभियुक्त का कार्य बीएनएस, 2023 की धारा 100 के पहले या दूसरे भाग के अंतर्गत आता है, जो कि मृत्यु का कारण बनने के इरादे या मृत्यु की संभावना वाली शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे से संबंधित है, तो अभियुक्त  को आजीवन कारावास या न्यूनतम 5 वर्ष से 10 वर्ष तक की अवधि के लिए  कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

दूसरा भाग उस स्थिति में सजा से संबंधित है जब अभियुक्त का कार्य बीएनएस, 2023 की धारा 100 के तीसरे भाग के अंतर्गत आता है, जो अभियुक्त की ओर से इस ज्ञान से संबंधित है कि उसके कार्य से मृत्यु होने की संभावना है, तो ऐसे मामले में जुर्माने के साथ अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया है। 

अंबाजगन बनाम राज्य पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व (2023)

तथ्य

इस मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं: मृतक और अभियुक्त  दोनों कृषक थे, जिनके पास आस-पास के खेत थे। खेतों के बीच रास्ते को लेकर विवाद चल रहा है। रास्ते के इस्तेमाल को लेकर दोनों के बीच झगड़ा हो गया। अभियुक्त  ने गुस्से में आकर मृतक के सिर पर कुदाल, जो एक कृषि उपकरण है, से वार कर दिया। जिससे मृतक की मौके पर ही मौत हो गई। 

उठाए गये मुद्दे

क्या अभियुक्त  को आईपीसी की धारा 302 (बीएनएस, 2023 की धारा 103) के तहत हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यह नहीं कहा जा सकता कि जब अपीलकर्ता ने हथियार से मृतक को मारा, तो उसका इरादा ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का था जो सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त हो, पोस्ट-परीक्षण रिपोर्ट में दिखाई गई चोटें वास्तव में पार्श्विका(पेरिएटल) हड्डी और टेम्पोरल हड्डी टूट गई हैं और चोट वास्तव में मृत्यु का कारण थी। हालांकि, मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह अपने आप में इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त है कि अपीलकर्ता का इरादा ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का था जो मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त हो। अदालत ने माना कि अपीलकर्ता को केवल इस ज्ञान के साथ जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि यह ऐसी चोट का कारण बनने की संभावना थी जो मृत्यु का कारण बन सकती थी।

अदालत ने आगे आईपीसी की धारा 304 के दो पैराग्राफों के बीच अंतर को स्पष्ट किया है- यदि किसी अभियुक्त  व्यक्ति का कार्य ‘मृत्यु का कारण बनने की संभावना वाली शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे’ के अंतर्गत आता है, तो यह धारा 304 के पहले पैराग्राफ (बीएनएस, 2023 की धारा 105 के पहले पैराग्राफ) के तहत दंडनीय है। हालांकि, यदि कार्य इस ज्ञान के साथ किया जाता है कि ‘मृत्यु का कारण बनने की संभावना है’, तो यह धारा 304 के दूसरे पैराग्राफ (बीएनएस, 2023 की धारा 105 के दूसरे पैराग्राफ) के तहत दंडनीय है। इसलिए, प्रभाव में, इस धारा का पहला पैराग्राफ तब लागू होगा जब ‘अपराधपूर्ण इरादा’ हो, जबकि दूसरा पैराग्राफ तब लागू होगा जब ऐसा कोई इरादा न हो लेकिन ‘अपराधपूर्ण ज्ञान’ हो।

एलिस्टर एंथोनी परेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य (2012)

तथ्य 

इस मामले में 12 नवंबर 2006 को, मुंबई शहर में सुबह-सुबह एक कार फुटपाथ से टकरा गई और फुटपाथ पर सो रहे सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। चिकित्सीय साक्ष्य से घटना के समय अभियुक्त  के खून में अल्कोहल की मौजूदगी सिद्ध की गई। उच्च न्यायालय द्वारा अभियुक्त को धारा 299 के तहत आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, के अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया और धारा 304 के दूसरे पैराग्राफ के तहत दंडित किया गया।

उठाए गये मुद्दे

क्या उच्च न्यायालय द्वारा धारा 304 के दूसरे पैराग्राफ के तहत दंडनीय अपराध के लिए अपीलकर्ता को दी गई सजा में कोई संशोधन आवश्यक है?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस निष्कर्ष को सही ठहराया कि घटना के समय अभियुक्त  शराब के प्रभाव में था और उसने इस हालत में अपनी कार बहुत तेज गति से चलाकर सात लोगों की जान ले ली। उसे इस ज्ञान के साथ आरोपित किया गया है कि उसके कार्य इन परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बन सकते थे। उच्च न्यायालय द्वारा सजा सुनाई गई थी और कहा गया था कि अभियुक्त  को धारा 304 के दूसरे पैराग्राफ के तहत दंडित करने के लिए अभियोजन पक्ष पर यह साबित करने का भार है कि मृत्यु अभियुक्त के कार्य के कारण हुई थी और उसे पता था कि उसका कार्य मृत्यु का कारण बन सकता है।

बीएनएस, 2023 की धारा 101 (आईपीसी, 1860 की धारा 300) के तहत आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी मे आते है

यह धारा कहती है कि आपराधिक मानव वध हत्या है; यह इस तथ्य को प्रतिबिंबित करता है कि किसी कार्य को हत्या मानने के लिए सबसे पहले उसे आपराधिक मानव वध होना चाहिए। यह हत्या नहीं हो सकती इसलिए यह अंतर्निहित है कि आपराधिक मानव वध जाति है और हत्या प्रजाति है।

बीएनएस, 2023 की धारा 101 की शुरुआत ‘इसके बाद अपवादित मामलों को छोड़कर’ शब्दों से होती है, आपराधिक मानव वध हत्या है। यह स्पष्ट रूप से प्रकट करता है कि यदि धारा 101 के पांच अपवादों में से कोई भी लागू होता है, तो आपराधिक मानव वध हत्या नहीं होगी। इसलिए, आपराधिक मानव वध के किसी कार्य को हत्या के बराबर होने के लिए, या तो बाद के भागों में से किसी एक को लागू किया जाना चाहिए और कोई भी अपवाद लागू नहीं होना चाहिए।

मौत कारित करने का इरादा

धारा 101(a), धारा 100 के पहले भाग के समान है, जो एक ऐसे कार्य से संबंधित है जो मौत का कारण बनने के इरादे से किया जाता है। ‘आपराधिक मानव वध हत्या है’ कथन को सही ठहराने के लिए, सबसे पहले इस कार्य को आपराधिक मानव वध की परिभाषा के अंतर्गत आना होगा। इसलिए, हम धारा 100 के तहत पहले भाग को धारा 101(a) के समान पाते हैं। वास्तव में, मौत का हर जानबूझकर किया गया कारण धारा 101 के तहत हत्या के अंतर्गत आता है, धारा के पहले भाग के अंतर्गत आने वाली कोई भी चीज़ स्वचालित रूप से सीधे धारा 101 (a) के अंतर्गत आ जाएगी। दोनों प्रावधानों का निहितार्थ और दायरा एक समान है। इरादा कम या अधिक डिग्री का नहीं हो सकता है, इसलिए इरादे की समान डिग्री दोनों धाराओं में पाई जाती है।

इरादे का अर्थ है किसी परिणाम को उत्पन्न करने की इच्छा; कोई आकस्मिक आचरण नहीं देखा जा सकता है, बल्कि इस धारा के लिए एक निश्चित आचरण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के माथे के बीच से करीब से बंदूक से गोली चलाना स्पष्ट रूप से अभियुक्त के मृत्यु का कारण बनने के इरादे को प्रकट करता है।

इरादा हमेशा मन की एक अवस्था होती है और इसे केवल इसकी बाहरी अभिव्यक्तियों से ही सिद्ध किया जा सकता है। जहां शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर तेज धार वाले उपकरणों से चोट पहुंचाई जाती है, वहां मारने का इरादा अपराधी का माना जा सकता है, जैसा कि चाहत खान बनाम हरियाणा राज्य (1972) में कहा गया है। 

वसंत बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983) के मामले में अभियुक्त और मृतक के बीच कुछ पुरानी दुश्मनी थी और उनके बीच थोड़ी हाथापाई भी हुई थी, जिसे आसपास मौजूद लोगों ने शांत कर दिया था। इसके बाद अभियुक्त अपनी जीप के पास गया और उसे तेज गति से मृतक की ओर गलत दिशा में ले गया और उसे नीचे गिरा दिया जिससे उसकी मौत हो गई। जिससे यह साबित हो गया कि अभियुक्त  द्वारा गलत दिशा में जीप चलाने का कोई कारण नहीं था। इसलिए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उसका कार्य स्पष्ट रूप से मृतक की मृत्यु का कारण बनने का उसका इरादा दर्शाता है। 

मौत का कारण बनने के इरादे की जांच की जानी चाहिए। यह देखना होगा कि अभियुक्त निश्चितता के साथ परिणाम सुनिश्चित करने के लिए अधिक निश्चितता के साथ कार्य करता है। व्यक्ति के आचरण से उसकी मंशा की जांच की जाती है। उसने यह कार्य कैसे किया? आचरण साक्ष्य के आधार पर स्थापित किया जाता है और फिर एक उचित व्यक्ति के अनुसार उसके इरादे को समझने के लिए उसी आचरण की जांच की जाएगी। दूसरे शब्दों में, यदि एक उचित व्यक्ति ने अभियुक्त के समान कार्य किया होता तो उसका इरादा क्या होता?

उदाहरण के लिए, यदि A किसी वयस्क व्यक्ति के सिर पर एक बार छड़ी से वार करता है, तो यह कार्य मृत्यु कारित करने के उसके इरादे को प्रकट नहीं करता है। हालांकि, यदि वह दो महीने के बच्चे के सिर पर उसी छड़ी से एक ही वार करता है, तो यह मौत का कारण बनने का इरादा प्रकट कर सकता है।

ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा जिसके कारण अपराधी को पता हो कि इससे मृत्यु होने की संभावना है

धारा 101(b) में कहा गया है कि जब कोई कार्य ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे से किया जाता है, जिसके बारे में अपराधी जानता है कि जिसे नुकसान पहुंचाया गया है, उस व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है, तो यह हत्या की श्रेणी में आएगा।

ज्ञान शब्द के साथ संभाव्य शब्द मृत्यु की निश्चितता का सूचक है न कि संभावना का। यह बताता है कि किसी चीज़ के घटित होने की संभावना बहुत अधिक है।

धारा 100 (b) के आवश्यक तत्व इस प्रकार हैं-

  1. शारीरिक चोट लग जाती है
  2. अपराधी को व्यक्तिपरक ज्ञान है कि विशिष्ट शारीरिक चोट से उस विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना है जिसे यह चोट लगी है
  3. आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते है, उसमे विशिष्ट परिस्थिति के ज्ञान की आवश्यकता एक अतिरिक्त तत्व है।

हालांकि धारा 100 और धारा 101 में एक विशिष्ट शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे और उस विशेष शारीरिक चोट के मृत्यु का कारण बनने की संभावना आम है, बाद वाले में अभियुक्त के इस विशिष्ट ज्ञान का अतिरिक्त तत्व आवश्यक है कि शारीरिक चोट उस विशेष पीड़ित की मृत्यु का कारण बन सकती है। 

यह खंड ऐसी स्थिति पर विचार करता है जहां अपराधी को विशिष्ट स्थिति या विशेष पीड़ित की स्वास्थ्य स्थिति के बारे में विशेष ज्ञान होता है जिसके कारण उसकी जानबूझकर शारीरिक चोटें घातक होने की संभावना होती है जैसा कि अंडा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य (1966) मे कहा गया है। 

उदाहरण के लिए, यदि पीड़ित की तिल्ली (स्प्लीन) में सूजन है और अभियुक्त  को इसकी विशेष जानकारी है, यदि तो वह पीड़ित को उस विशेष स्थान पर मारता है जिसके परिणामस्वरूप पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो धारा 100 के दूसरे भाग के प्रयोजन के लिए, उसका इरादा था उस चोट का कारण बनें और डॉक्टर की राय के अनुसार उस विशेष चोट के कारण मृत्यु होने की संभावना थी। हालांकि, उसके कार्य को धारा 101 के तहत लाने के लिए, अतिरिक्त आवश्यकता है कि अपराधी को सूजी हुई तिल्ली के बारे में विशिष्ट ज्ञान होना चाहिए जो यहाँ मौजूद है और इस प्रकार, यह उसके कार्य को धारा 101 के तहत लाएगा जो कि हत्या है।

प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त शारीरिक क्षति पहुँचाने का इरादा

धारा 101 (c) के अनुसार, अभियुक्त का इरादा शारीरिक चोट पहुंचाने का होना चाहिए और जो शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा है, वह “प्रकृति के सामान्य क्रम में मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त” होना चाहिए। 

धारा 101(c) धारा 100 के तहत पाए जाने वाले ‘मृत्यु का कारण बनने वाली शारीरिक चोट’ वाक्यांश का तीव्र रूप है। किसी कार्य को धारा 101(c) के अंतर्गत आने के लिए, यह सामान्य कारण प्रकृति में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। धारा 100 और धारा 101(c) के बीच मृत्यु की संभावना की डिग्री में अंतर है। 

धारा 101 (b) द्वारा दो-चरणीय परीक्षा की परिकल्पना की गई है –

  1. शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे का मतलब यह है कि जो शारीरिक चोट पहुंचाई गई वह बिल्कुल वही चोट थी जिसे अभियुक्त  पहुंचाना चाहता था। यह अभियुक्त  के दिमाग का व्यक्तिपरक परीक्षण है,
  2. इच्छित शारीरिक चोट मृत्यु का कारण बनने के लिए प्रकृति के सामान्य कारणों से पर्याप्त होनी चाहिए। यह वस्तुनिष्ठ पाठ है, जो डॉक्टरों की राय पर आधारित है। इस तत्व को सिद्ध करने के लिए अभियुक्त  के दिमाग की जांच नहीं की जानी चाहिए।

बीएनएस, 2023 की धारा 101(c) पर मामले

विरसा सिंह बनाम पंजाब राज्य (1958) 

तथ्य

इस मामले में अभियुक्त  ने पीड़ित के पेट पर भाले से वार किया, जिससे उसकी मौत हो गई।

उठाए गये मुद्दे

क्या सामान्य प्रक्रिया में अभियुक्त द्वारा किया गया वार मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त था?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आईपीसी की धारा 300, (तीसरा) (बीएनएस, 2023 की धारा 101(c)) के लिए, यह साबित किया जाना चाहिए कि पीड़ित पर पाई गई शारीरिक चोट वास्तव में अभियुक्त द्वारा इरादा से किया गया था। इसके अलावा, यह जांचना होगा कि क्या उक्त इरादा शारीरिक चोट सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी। बाद की जांच चिकित्सा राय पर आधारित है। यदि उपरोक्त दोनों तत्वों को स्वीकृत किया जाता है, तो आपराधिक मानव वध हत्या के बराबर होगी। दूसरे शब्दों में, “सवाल यह नहीं है कि कैदी का इरादा कोई गंभीर चोट पहुंचाने का था या मामूली चोट पहुंचाने का, बल्कि सवाल यह है कि क्या उसका इरादा ऐसी चोट पहुंचाने का था जो मौजूदा समय में साबित हो चुकी है…. जहां तक ​​इरादे का सवाल है, सवाल यह नहीं है कि उसका इरादा मारने का था या किसी खास गंभीरता की चोट पहुंचाने का, बल्कि यह है कि क्या उसका इरादा विचाराधीन चोट पहुंचाने का था”। 

चूंकि भाला का वार ऐसा था कि “यह आंतों में प्रवेश कर गया और आंतों के तीन कुंडलियाँ (कोइल्स) घाव से बाहर आ गए और पचा हुआ भोजन फटी तीन जगहों  से निकल गया।” अदालत ने अंततः हत्या के अपराध के लिए अभियुक्त को दोषी ठहराया।

इंदर सिंह बग्गा सिंह बनाम पेप्सू राज्य (1954)

तथ्य

इस मामले के तथ्य यह थे कि मृतक पीड़िता ने अपीलकर्ता की भाभी के प्रति पहले कदम बढ़ाया था। अपीलकर्ता ने उसे भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद, उनके गांव में शादी थी, मृतक अभियुक्त के घर के सामने खड़ा था और एक पीरे सिंह नामक व्यक्ति के साथ बातचीत में लगा हुआ था। उस समय, अभियुक्त अपने घर से लाठी लेकर दौड़ा और पीछे से पीड़ित के सिर पर एक वार किया, और जब वह मुड़ा, तो उसके सिर पर एक और वार किया गया। मृतक के जमीन पर गिरने के बाद भी, अपीलकर्ता ने उसकी गर्दन पर एक और वार किया, कुल मिलाकर छह वार किए गए। जब आस-पास के लोगों ने शोर मचाया, तो अपीलकर्ता भाग गया। कुछ दिनों बाद, पीड़ित की मृत्यु मस्तिष्क के संपीड़न (कम्प्रेशन) के कारण हो गई।

उठाए गये मुद्दे 

अभियुक्त  ने क्या अपराध किया है और उसे क्या सजा दी जानी चाहिए?

निर्णय

डॉक्टर की राय के अनुसार, यह कहा गया कि पहली चोट एक घातक चोट थी जिसके कारण उनके मस्तिष्क में संपीड़न के लक्षण विकसित हुए, जो धीरे-धीरे बढ़ते गए, उन्होंने कहा कि यह चोट प्रकृति की सामान्य शक्ति के कारण होने वाली मौत के लिए पर्याप्त थी। 

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हालांकि वार अभियुक्त  द्वारा किया गया था जिससे पीड़ित की मृत्यु हुई, लेकिन इस्तेमाल किया गया हथियार लाठी था न कि लोहे की छड़। इसके अलावा, मृतक मजबूत कद काठी का एक युवा व्यक्ति था और अभियुक्त  को उसकी मृत्यु का कारण बनने के इरादे से काम करने वाला नहीं माना जा सकता था। चिकित्सा साक्ष्य के बावजूद, अदालत का मानना ​​था कि चोट सामान्य कारण प्रकृति में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त नहीं थी क्योंकि वह चोट लगने के तीन सप्ताह बाद तक जीवित रहा, जिससे उसे आईपीसी की धारा 299 (बीएनएस की धारा 100) के तहत ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का दोषी ठहराया गया और आईपीसी की धारा 304 (बीएनएस की धारा 105) के पहले पैराग्राफ के तहत दंडनीय है।

आंध्र प्रदेश राज्य बनाम रायावारापु पुन्नय्या और अन्य (1976)

तथ्य

इस मामले के तथ्य इस प्रकार थे, एक दिन मृतक अन्य दो लोगों के साथ एक गंतव्य (डेस्टिनेशन) के लिए बस में चढ़ा। बाद में अभियुक्त अन्य लोगों के साथ बस में चढ़े। जब मृतक और उसके साथी बस से उतरे, तो उनका पीछा पांच अभियुक्तों ने किया। मृतक और अभियुक्त के बीच राजनीतिक विवाद था और मृतक ने पिछले दिन अभियुक्त के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी और उस दिन वह उसी के संबंध में पुलिस थाने जा रहा था। दो अभियुक्तों ने भारी लाठियां उठाईं और मृतक के पीछे गए, जो एक वृद्ध व्यक्ति था और भागने में असमर्थ था। उसने हाथ जोड़कर दया की भीख मांगी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, अभियुक्तों  ने मृतक के पैरों और हाथों को पीटा और उसे बेहोश होने तक पीटते रहे। इसके बाद वे चले गए। डॉक्टर की राय के अनुसार, मृतक पर कुल 19 चोटें थीं, जिनमें से नौ गंभीर थीं, और अगली सुबह सदमे और रक्तस्राव (हैमरेज) के कारण उसकी मृत्यु हो गई, चोटें संचयी रूप से सामान्य प्रकृति में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थीं।

उठाए गये मुद्दे 

क्या अभियुक्त हत्या के अपराध का दोषी है?

निर्णय

न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए दो तत्वों की जांच करनी होगी। सबसे पहले, जिस कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु हुई वह अभियुक्त द्वारा किया गया था, अर्थात, मृत्यु स्पष्ट रूप से अभियुक्त के कार्यों की श्रृंखला से संबंधित हो सकती है। 

दूसरा, आपराधिक मनःस्थिति के तत्व की जांच अभियुक्त  के आचरण से की जाती है। सभी चोटें पैरों और बांहों पर दी गई है, शरीर के किसी भी महत्वपूर्ण हिस्से पर कोई वार नहीं किया गया। इसलिए मृत व्यक्ति को मारने का सीधा इरादा संदेह से परे साबित नहीं किया जा सकता है। हालांकि, सबूतों से यह कहा जा सकता है कि अभियुक्तों का इरादा उन शारीरिक चोटों को कारित करने का था जो वास्तव में पाई गई थीं और उनका इरादा और ज्ञान रहा होगा कि ऐसी शारीरिक चोटों से मृत्यु होने की संभावना थी। इसलिए, आपराधिक मानव वध किसी भी संदेह से परे है।

इसके अलावा इस सवाल का जवाब देने के लिए कि क्या आपराधिक मानव वध हत्या के समान है, इस कार्य की जांच आईपीसी की धारा 300 (बीएनएस, 2023 की धारा 101 (c)) के तहत की जानी चाहिए। धारा के अनुप्रयोग के लिए दो तत्वों पर चर्चा करनी होगी। सबसे पहले, क्या मृतक पर पाई गई शारीरिक चोटें अभियुक्त  द्वारा जानबूझकर पहुंचाई गई थीं, जो एक व्यक्तिपरक जांच है। दूसरे, क्या ये चोटें प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थीं, जो एक वस्तुनिष्ठ जांच है। ये दोनों कारक मामले में साबित हो गए हैं और इस तरह अभियुक्त  को हत्या के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।

हरजिनदर सिंह अलियास जिंडा बनाम दिल्ली प्रशासन (1967)

तथ्य

इस मामले के तथ्य इस प्रकार हैं कि 31 जनवरी 1962 को दलीप कुमार और अपीलकर्ता के बीच लड़ाई हुई। लड़ाई में अपीलकर्ता हार गया, परिणामस्वरूप वह दलीप कुमार को धमकी देकर चला गया। अपीलकर्ता एक अन्य के साथ दलीप कुमार के घर पहुंचा और उस पर हमला कर दिया। इस समय दलीप सिंह के भाई केवल कुमार ने हस्तक्षेप किया। उस समय अभियुक्त  के साथ आए व्यक्ति ने दलीप सिंह को पकड़ लिया और अपीलकर्ता ने उसकी जांघ के ऊपरी हिस्से पर चाकू से वार कर दिया।

चाकू से किए गए वार के कारण ऊरु धमनी (फेमरल आर्टेरी) और नस कट गई, जिससे मांसपेशियों में और बाईं जांघ के ऊपरी हिस्से के आसपास रक्त का संलयन (फ्यूज़न) हो गया, जिससे काफी खून बह गया। डॉक्टरों के अनुसार, इन वाहिकाओं (वेसल्स) को काटने से आघात और रक्तस्राव के कारण तत्काल मृत्यु हो सकती है। 

उठाए गये मुद्दे

क्या धारा 300 के तीसरे चरण के अनुप्रयोग की आवश्यकताएं सिद्ध हो गई हैं?

निर्णय

अभियोजन ने तर्क दिया कि वीरसा सिंह बनाम पंजाब राज्य  के मामले में वर्णित सभी तत्व पूरे हो चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया और यह देखा गया कि:

सबसे पहले यह निष्पक्ष रूप से स्थापित किया जाना चाहिए कि शारीरिक चोटें मौजूद हैं। 

दूसरा, चोट की प्रकृति सिद्ध होनी चाहिए। 

तीसरा, यह साबित किया जाना चाहिए कि उस विशेष चोट को पहुंचाने का इरादा था और यह चोट आकस्मिक या अनजाने में नहीं थी या किसी अन्य प्रकार की चोट का इरादा नहीं था।

एक बार जब ये सभी तत्व मौजूद हो जाते हैं, तो जांच यह जांचने के लिए आगे बढ़ती है कि ऊपर वर्णित प्रकार की चोट, जो तीन तत्वों से बनी है, प्रकृति के सामान्य कारण से मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त है। यह जांच वस्तुनिष्ठ है और इसका अपराधी के इरादे से कोई लेना-देना नहीं है।

सवाल यह है कि क्या अभियुक्त  का इरादा पीड़ित को विशेष चोट पहुंचाने का था। यदि वह यह दिखाने में सक्षम है कि उसका ऐसा इरादा नहीं था, तो धारा के अनुप्रयोग के लिए आवश्यक इरादा पर्याप्त नहीं है। इस मामले में, परिस्थितियों से पता चलता है कि अभियुक्त  का इरादा जांघ के विशेष हिस्से पर चोट पहुंचाने का नहीं था, और चूंकि मृतक लड़ाई के बीच हस्तक्षेप करने और दोनों को अलग करने के लिए झुकने की स्थिति में था, इसलिए चाकू उसकी जांघ पर लगा। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उसने उस विशेष बिंदु पर यह जानते हुए प्रहार किया था कि इससे धमनी कट जाएगी। इसलिए, आईपीसी की धारा 300, तीसरा (बीएनएस, 2023 की धारा 101 (c)) को लागू नहीं किया जा सकता है।

फिर भी, चाकू एक खतरनाक हथियार था, और जब मृतक पर चाकू से वार किया गया था, तो अभियुक्त  को पता होगा कि यह शरीर के एक कमजोर हिस्से के पास लगेगा और इससे उसकी मृत्यु होने की संभावना थी। इसलिए, शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा जिससे मृत्यु होने की संभावना है, इस कार्य को आईपीसी की धारा 299 (बीएनएस, 2023 की धारा 100) के दूसरे भाग के अनुसार स्थापित किया गया है।

किसी आसन्न खतरनाक कार्य के बारे में ज्ञान 

धारा 101(d) के अनुसार, किसी कार्य को आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते है, ऐसा मानने के लिए, कार्य ऐसा होना चाहिए कि अभियुक्त  को पता हो कि यह “इतना आसन्न रूप से खतरनाक है कि पूरी संभावना है कि इससे मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति हो सकती है जिससे मृत्यु होने की संभावना हो”। इसके अलावा, यह कार्य मृत्यु या ऐसी चोट का जोखिम उठाने के किसी बहाने के बिना किया जाना चाहिए।

इस खंड में तीन आवश्यक तत्व हैं-

  1. यह ज्ञान कि यह कार्य आसन्न रूप से खतरनाक है 
  2. पूरी संभावना है कि यह कार्य ऐसी शारीरिक चोट का कारण बने जिससे मृत्यु होने की संभावना हो
  3. यह कार्य जोखिम उठाने के लिए बिना किसी बहाने के किया जाता है

जबकि धारा 100 में, जो जाति है, वहा ‘मृत्यु का कारण बनने की संभावना का ज्ञान’ होने की आवश्यकता होती है, जबकि धारा 101 (d) जो प्रजाति है मे आवश्यक ज्ञान उच्च स्तर (डिग्री) का है। बाद वाले को इस ज्ञान की आवश्यकता होती है कि कार्य आसन्न रूप से खतरनाक है और सभी संभावना में मृत्यु का कारण बनना चाहिए। 

यहाँ, आसन्न का अर्थ है तुरंत या लगभग, निश्चित रूप से घटित होने वाला।

उदाहरण के लिए, A भीड़ में बेतरतीब (रैंडमली) ढंग से गोली चलाता है। उसका लक्ष्य किसी खास हिस्से को निशाना बनाना नहीं है, इसलिए मौत का कारण बनने या शारीरिक चोट पहुंचाने का कोई सीधा इरादा नहीं है। हालांकि, ऐसी जानकारी है कि इस कार्य से मृत्यु होने की संभावना है। हालांकि, यदि वह 5-6 गोलियाँ चलाता है तो उसका कार्य धारा 101 (d) के अंतर्गत आएगा।

दूसरे उदाहरण में, यदि A किसी अस्पताल में जाता है और तीन मिनट के लिए टाइम बम लगाता है, तो वह सभी को बम के बारे में बताता है। हम मौत का कारण बनने के सीधे इरादे का आरोप लगाने में सक्षम नहीं हो सकते क्योंकि अभी भी बचने का समय है। चूंकि किसी विशेष शारीरिक चोट का इरादा नहीं है, इसलिए धारा 100 का दूसरा भाग भी लागू नहीं होगा। हालांकि, उसे ऐसा ज्ञान है जिससे मृत्यु होने की संभावना है। फिर हम आगे जांचते हैं कि क्या यह कार्य इतना खतरनाक है कि इसके कारण मृत्यु होने की पूरी संभावना है, यदि उत्तर सकारात्मक है तो यह कार्य धारा 101 (d) के अंतर्गत आएगा।

यह धारा स्वयं ऐसी स्थिति प्रस्तुत करती है जहां आपराधिक मानव वध का कार्य हत्या की श्रेणी में नहीं आएगा। दूसरे शब्दों में, यदि अभियुक्त के पास जोखिम उठाने का कोई बहाना है, तो धारा 101 (d) लागू नहीं होगी। 

बीएनएस, 2023 की धारा 101(d) पर मामले

एंपरर बनाम माउंट धिराजिया (1940)

तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता का पति क्रूर स्वभाव का था और वह अपीलकर्ता को मारने के लिए उसका पीछा कर रहा था। अपीलकर्ता अपने गोंद मे अपना बच्चा लेकर भाग रही थी, और खुद को बचाने के लिए अपीलकर्ता कुएं में कूद गई, जिससे बच्चे की मौत हो गई। 

उठाए गये मुद्दे 

क्या अभियुक्त को हत्या के अपराध का दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

यहां अदालत के समक्ष यह तर्क दिया गया कि, जब अपीलकर्ता कुएं में कूदी, तो उसे पता था कि उसका कार्य आसन्न खतरनाक था, और पूरी संभावना है कि इससे मौत हो सकती है। हालांकि, उसने दावा किया कि जब उसका पति उसका पीछा कर रहा था तो वह घबरा गई थी, इसलिए उसने कुएं में छलांग लगा दी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुएं में कूदने का जोखिम उठाने के उसके बहाने पर विचार किया और निष्कर्ष निकाला कि उसका कार्य आपराधिक मानव वध की श्रेणी में आता है, हत्या की श्रेणी में नहीं, क्योंकि उसका पति उसका पीछा कर रहा था, और यह एक दहशत की स्थिति थी जहां उसके पास खुद को बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं था।

ग्यारसीबाई पत्नी जगन्नाथ बनाम मध्य भारत राज्य (1952)

तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता-पत्नी के पति ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी जिसके कारण वह अपने बच्चे के साथ घर छोड़कर चली गई। पति उसका पीछा नहीं कर रहा था, इसके बावजूद वह भागकर कुएं में कूद गयी, जिससे उसके बच्चे की मौत हो गयी। 

उठाए गये मुद्दे 

क्या अभियुक्त को हत्या के अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि कोई आसन्न खतरा नहीं था और इस तरह उसके पास मृत्यु का कारण बनने के जोखिम को उठाने का कोई उचित बहाना नहीं था। इसलिए, उसे हत्या के लिए उत्तरदायी ठहराया गया और उसे आईपीसी की धारा 300 (चौथे) (बीएनएस, 2023 की धारा 101 (d)) के तहत प्रदान किए गए अपवाद का लाभ नहीं दिया गया। 

बीएनएस, 2023 की धारा 101 (आईपीसी, 1860 की धारा 300) पर ऐतिहासिक मामले

लक्ष्मण बनाम मध्यप्रदेश राज्य (2006)

तथ्य

इस मामले में मृतक अन्य लोगों के साथ अनाज लेने गाड़ाघाट गया था और वापस आ रहा था तभी यह घटना घटी। वापस लौटते समय अभियुक्त ने अन्य लोगों के साथ मिलकर उन्हें रोका और उन पर तीर और पत्थरों से हमला करना शुरू कर दिया। अभियुक्त  द्वारा चलाया गया एक तीर मृतक को लगा। चोट लगने पर मृतक गिर गया और तुरंत मर गया।

उठाए गये मुद्दे

न्यायालय के समक्ष मुद्दा यह था कि प्रयोग किया जाने वाला उचित प्रावधान क्या है?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि तथ्य बताते हैं कि तीर दूर से चलाये जा रहे थे, किसी विशेष सटीकता से नहीं। कई तीरों में से एक तीर मृतक को लगा। इसके अलावा, हमले से पहले कोई झगड़ा नहीं हुआ था। अदालत ने कहा कि स्थापित तथ्य केवल आपराधिक मानव वध का अपराध साबित करते हैं और धारा 304 प्रथम पैरा (बीएनएस की धारा 105) के तहत दंडनीय है।

मनोज कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2018)

तथ्य

इस मामले में अभियुक्त और मृतक के बीच कुछ जमीन के स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा लंबित था। घटना उस वक्त हुई जब मृतक विवादित जमीन से लौट रहा था और अभियुक्त  बगल के खेत में धान की रोपाई में व्यस्त थे। जब अभियुक्तों ने मृतक को उनकी जमीन पार करते हुए देखा, तो अभियुक्तों में से एक व्यक्ति अचानक आया और मृतक के साथ झगड़ा करने लगा और फिर बाद में अभियुक्त  के परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें शामिल हो गए। झगड़ा बढ़कर मारपीट तक पहुंच गया और अभियुक्त  व अन्य लोगों ने मृतक पर हमला कर दिया। किसी ने चाकू से हमला किया तो किसी ने लाठी से। अपनी जान बचाने के लिए मृतक और अन्य साथियों ने मौके से भागने का प्रयास किया।  हालांकि, बाद में मृतक ने दम तोड़ दिया और उसकी मौत हो गई।

उठाए गये मुद्दे

मुद्दा यह उठा कि क्या यहां अभियुक्त को आपराधिक मानव वध जो हत्या कारित करता है, उसके अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है या नहीं?

निर्णय

अदालत ने वर्तमान मामले में धारा 300 (बीएनएस की धारा 101) में अपवाद 4 के अनुप्रयोग का विश्लेषण किया। यह रिकॉर्ड पर साबित हुआ कि लंबित दीवानी मुकदमा के आलोक में पक्षों के बीच अचानक मौखिक झगड़ा हुआ और यह मौखिक झगड़ा शारीरिक लड़ाई में बदल गया।

अदालत ने कहा कि धारा 300 (बीएनएस की धारा 101) के अपवाद 4 उन मामलों से संबंधित है जिनमें विवाद की उत्पत्ति में कुछ उकसावे दिए गए हों या जो भी झगड़े का कारण था। फिर भी दोनों पक्षों के बाद के आचरण ने उन्हें अपराध के संबंध में समान स्तर पर रख दिया।

चूँकि वर्तमान मामले में झगड़ा बिना किसी सुधार के अचानक लड़ाई में बदल गया, इसलिए पूरी घटना सहज थी। इसलिए, इन परिस्थितियों के आलोक में, अभियुक्त  को धारा 300 (बीएनएस की धारा 101) के अपवाद 4, के अनुप्रयोग के कारण आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, के लिए दोषी ठहराया गया है।

जय प्रकाश बनाम राज्य (दिल्ली प्रशासन) (1991)

तथ्य

इस मामले में, मृतक ने अज्ञा देवी से शादी की थी और उनके साथ शाहदरा, दिल्ली में उनके घर में रहता था। अभियुक्त ने अज्ञा देवी के चचेरे भाई से शादी की थी, इसलिए रिश्तेदार के रूप में मृतक के घर जाता था। मृतक को डर था कि उसकी पत्नी और अभियुक्त के बीच अवैध संबंध हैं, और इसलिए उसने उसे अपने घर आने के लिए मना किया था। 18 अगस्त 1973 को, जब मृतक घर में नहीं था, तो अभियुक्त अज्ञा देवी से मिलने आया था। जब मृतक वापस आया, तो उसका अभियुक्त से विवाद हो गया, और अभियुक्त ने अपनी कमर से कृपाण निकाला और मृतक को सीने में छुरा घोंप दिया। इस हमले से मृतक की मौत हो गई।

उठाए गये मुद्दे

अदालत के सामने मुद्दा यह था कि अभियुक्त ने कौन सा अपराध किया था?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि, चूंकि दोनों के बीच केवल विवाद था और कोई लड़ाई नहीं थी, धारा 300 (बीएनएस की धारा 101) में अपवाद 4 का अनुप्रयोग प्रश्न से बाहर था। 

दूसरे, अदालत ने आईपीसी की धारा 300 तीसरे (बीएनएस की धारा 101(c)) की सामग्री की जांच की और निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त कृपाण लेकर मृतक के घर गया, और बीमार की छाती पर वार किया, जो शरीर का वह एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है, जो मृतक की मृत्यु का कारण बना।

अदालत ने इस तथ्य की भी जांच की कि अभियुक्त द्वारा केवल एक ही झटका दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि यह वार की संख्या नहीं बल्कि इस्तेमाल किए गए हथियार और हमले के उद्देश्य को देखा जाना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि क्या सामान्य परिस्थितियों में, चोट मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी।

इसलिए, उपरोक्त परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि अभियुक्त ने जानबूझकर किसी घातक हथियार से वह चोट पहुँचाई, इसलिए, उसे हत्या के अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।

मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य, आदि (1983)

तथ्य

इस मामले में दो परिवारों के बीच दुश्मनी के कारण पांच गांवों में तेजी से हुई पांच घटनाओं की एक श्रृंखला में 17 लोगों की जान चली गई। 12 अगस्त और 13 अगस्त 1977 की रात को अमर सिंह से संबंधित 17 लोगों की जान चली गई। इन घटनाओं के कारण मच्छी सिंह और उसके 11 साथियों पर पांच मामलों में मुकदमा चलाया गया। मच्छी सिंह को दो अन्य लोगों के साथ मौत की सजा सुनाई गई।

उठाए गये मुद्दे 

अदालत के सामने मुद्दा यह था कि क्या अपराध में कुछ असामान्य या अत्यंत घृणित था, जो आजीवन कारावास की सजा को अपर्याप्त बनाता है?

निर्णय

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि, केवल अत्यंत गंभीर दोषी मामलों में ही मृत्युदंड का आदेश दिया जाना चाहिए। इस विशेष मामले में, परिस्थितियाँ बताती हैं कि यह वास्तव में पीड़ितों की निर्मम हत्या थी, जो असहाय और असुरक्षित थे। पीड़ितों से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, बल्कि उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे अमर सिंह के परिवार से थे। हत्या का तरीका बेहद नृशंसता और क्रूरता का था, अभियुक्तों ने नाबालिग बच्चों, असहाय महिलाओं और एक वयोवृद्ध (वेट्रन) दम्पति सहित अन्य लोगों की भी हत्या कर दी। इसके अलावा, पीड़ित अभियुक्त  का कोई प्रतिरोध नहीं कर सके। अत: इन परिस्थितियों में आजीवन कारावास से भी कड़ी सजा की आवश्यकता है।

बीएनएस, 2023 की धारा 101 (आईपीसी, 1860 की धारा 300) के अपवाद

बीएनएस 2023 का अध्याय III सामान्य सुरक्षा प्रदान करता है। ये वे बचाव हैं जिन्हें यदि अभियुक्त सफलतापूर्वक साबित कर देता है, तो वह सभी आरोपों से बरी होने के योग्य हो जाएगा। ये बीएनएस, 2023 में प्रदान किए गए सभी अपराधों पर समान रूप से लागू होते हैं। हालांकि, धारा 101 के तहत ही, कुछ विशिष्ट असाधारण परिस्थितियाँ प्रदान की गई हैं, जो यदि अभियुक्त द्वारा स्थापित की जाती हैं, तो उसका अपराध हत्या से कम होकर आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, में बदल जाएगा। आंध्र प्रदेश राज्य बनाम रायवरपु पुन्नय्या (1976) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 101 की चार शर्तों में से एक का अस्तित्व आपराधिक मानव वध को हत्या में बदल देगा, जबकि विशेष अपवादों से हत्या के अपराध को आपराधिक मानव वध जो हत्या के श्रेणी में नहीं आते है, उनमे बदल देंगे।

प्रासंगिक मामलो के साथ इन अपवादों पर नीचे चर्चा की गई है।

अपवाद 1

धारा 101 के अपवाद एक के अनुसार, यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं तो हत्या का अपराध आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते हैnमे बदल जाएगा:

  1. यदि अपराधी को आत्म-नियंत्रण की शक्ति से वंचित कर दिया गया
  2. आत्म-नियंत्रण की हानि एक गंभीर और अचानक उकसावे के कारण हुई थी
  3. आत्म-नियंत्रण से वंचित रहते हुए, वह किसी अन्य व्यक्ति को उकसाने या गलती या दुर्घटना से मृत्यु का कारण बनता है
  4. हालांकि, उत्तेजना नहीं होनी चाहिए 
  • हत्या के बहाने के रूप में अपराधी द्वारा स्वेच्छा से उकसाया गया
  • उकसावे की कार्रवाई कानून का पालन करते हुए या किसी लोक सेवक द्वारा अपनी वैध शक्तियों का प्रयोग करते हुए किए गए कार्य के कारण नहीं होनी चाहिए
  • निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के वैध प्रयोग में किये गये कार्य द्वारा

वास्तव में, यह एक प्रश्न है कि क्या कोई विशेष उकसावा इतना गंभीर और अचानक था कि उसे अपवाद के अंतर्गत शामिल किया जा सके।

आर बनाम डफी (1949), के मामले में मुख्य न्यायमूर्ति गोडार्ड, ने उकसावे को परिभाषित किया है “उकसावा कुछ कार्य या कार्यों की एक श्रृंखला है जो मृत व्यक्ति द्वारा अभियुक्त  के प्रति की जाती है जो किसी भी उचित व्यक्ति को और वास्तव में अभियुक्त को, आत्म-नियंत्रण का अचानक और अस्थायी नुकसान पहुचाएगा, जो अभियुक्त को इस तरह से भावना के अधीन कर देगा कि वह क्षण भर के लिए स्व विवेक से बाहर हो जाएगा”।

के.एम नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961)

तथ्य: इस मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं। अभियुक्त  एक नौसेना अधिकारी था, जिस पर अपनी पत्नी के प्रेमी आहूजा की हत्या के लिए आईपीसी, 1860 की धारा 302 के तहत मुकदमा चलाया गया था। घटना वाले दिन अभियुक्त की पत्नी ने उसके सामने आहूजा के साथ अपने नाजायज रिश्ते की बात कबूल की थी। उसी दिन, वह अपनी पत्नी और बच्चों को एक फिल्म देखने ले गया, और वह अपने जहाज पर गया, रिवॉल्वर ली और आहूजा के घर चला गया। उनके बीच विवाद और संघर्ष हुआ, इस दौरान दो गोलियां चलाई गईं, जो आहूजा को लगीं।

उठाए गये मुद्दे: क्या वर्तमान मामले में अभियुक्त को अपवाद का लाभ दिया जा सकता है?

निर्णय: बचाव पक्ष द्वारा अपवाद का दावा किया गया कि अचानक गंभीर उकसावे के कारण अभियुक्त आत्म-नियंत्रण की शक्ति से बाहर हो गया और उसने मृतक को गोली मार दिया। प्रश्न यह पूछा जाना चाहिए कि क्या आहूजा ने अपवाद के तहत नानावती को उकसाया था? और इसके अलावा, क्या उकसावे की कार्रवाई गंभीर और अचानक थी?

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर विचार किया कि क्या अभियुक्त  के समान पद पर बैठा एक उचित व्यक्ति अपनी पत्नी द्वारा व्यभिचार (एडल्ट्री) की स्वीकारोक्ति पर उसी तरह से प्रतिक्रिया करता जिस तरह से अभियुक्त  ने प्रतिक्रिया की थी।

इस प्रश्न का उत्तर देने में विशेष महत्व दिया जाना चाहिए, सबसे पहले इस बात पर विचार करना कि क्या उकसावे के बाद एक उचित व्यक्ति को शांत होने का समय देने के लिए पर्याप्त अंतराल समाप्त हो गया है और दूसरी बात, उस उपकरण को ध्यान में रखना होगा जिसके साथ मानव वध प्रभावित हुआ था। आवेग की गर्मी में एक साधारण वार, छिपाकर किए गये खंजर जैसे घातक हथियार का उपयोग करने से बहुत अलग है, इसलिए यदि अपवाद का दावा किया जाना है तो चोट का तरीका उकसावे के लिए उचित होना चाहिए।

अदालत ने  जांच के लिए प्रासंगिक भारतीय कानून के अनुप्रयोग के अपवाद की जांच के लिए आगे कहा कि:

  1. गंभीर और अचानक उकसावे का परीक्षण यह है कि क्या समाज के उसी वर्ग से संबंधित एक उचित व्यक्ति, जिस स्थिति में अभियुक्त  को रखा गया था, उसे इतना उकसाया जाएगा कि वह अपना आत्म-नियंत्रण खो देगा।
  2. शब्द और इशारे भी कुछ परिस्थितियों में, उसके कार्य को इस अपवाद के अंतर्गत लाने के लिए गंभीर और अचानक उकसावे का कारण बन सकते हैं
  3. पीड़ित के पिछले कार्य से बनी मानसिक पृष्ठभूमि को यह सुनिश्चित करने के लिए ध्यान में रखा जा सकता है कि क्या बाद के कार्य अपराध करने के लिए गंभीर और अचानक उकसावे का कारण बना।
  4. घातक वार स्पष्ट रूप से उस उकसावे से उत्पन्न जुनून के प्रभाव के कारण होना चाहिए, न कि समय बीतने या अन्यथा से जुनून ठंडा होने के बाद, पूर्व-चिंतन और गणना के लिए जगह देना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने होम्स बनाम लोक अभियोजन के निदेशक (1946) मामले का हवाला दिया। जहां न्यायमूर्ति साइमन ने कहा कि “उकसावे से संबंधित संपूर्ण सिद्धांत इस तथ्य पर निर्भर करता है कि यह आत्म-नियंत्रण के अचानक और अस्थायी तरह से  खोने का कारण बनता है या पैदा कर सकता है, जिससे द्वेष, जो किसी को मारने या शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचाने के इरादे का गठन होता है, और नकारात्मक हो जाता है।

अदालत ने अंततः माना कि जब अभियुक्त  की पत्नी ने उसके सामने अपने व्यभिचारी व्यवहार के बारे में कबूल किया, तो हम आत्म-नियंत्रण की क्षणिक हानि मान सकते हैं। हालांकि, अपनी पत्नी और बच्चों के भविष्य के बारे में आहूजा से स्पष्टीकरण  मांगने का उनका आचरण स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि उन्होंने अपना आत्म-नियंत्रण हासिल कर लिया है। इसके अलावा, उन्होंने पूरे दिन की योजना बनाई थी। वह अपनी पत्नी और बच्चों को सिनेमा देखने ले गया, अपने जहाज पर गया, छह गोलियों से भरी एक रिवॉल्वर ली और अपनी कार चलाकर पहले कार्यालय गया, और फिर बाद में आहूजा के फ्लैट पर गया। वह दोपहर 1:30 बजे अपने घर से निकला और शाम 4:20 बजे हत्या हो गई। उसके पास अपना आत्म-नियंत्रण हासिल करने के लिए पर्याप्त समय था, केवल तथ्य यह है कि गोली मारने से पहले, मृतक ने अभियुक्त  को गाली दी थी और गाली ने उसे उकसाया था। अपमानजनक उत्तर हत्या के लिए उकसाने वाला नहीं हो सकता। इसलिए, अदालत ने आईपीसी, 1860 की धारा 100 के अपवाद एक का लाभ देने से इनकार कर दिया और अभियुक्त  को बीएनएस, 2023 की धारा 101 के तहत दोषी ठहराया।

अपवाद 2 

धारा 101 के अपवाद 2 के अनुसार, हत्या का कार्य आपराधिक मानव वध o हत्या की श्रेणी में नहीं आएगा में बदल जाएगा, यदि:

  1. अपराधी निजी बचाव के अपने अधिकार का प्रयोग सद्भावना के साथ कर रहा था
  2. उन्होंने निजी बचाव के अपने अधिकार का उल्लंघन किया
  3. वह एक अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बना जिसके विरुद्ध वह अपने बचाव के अधिकार का प्रयोग कर रहा था
  4. ऐसी मृत्यु बिना निवारण के और आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाने के इरादे के बिना की जानी चाहिए। 

जहां अभियुक्त ने दूसरे की हत्या कर दी, जबकि वह बीएनएस, 2023 के तहत प्रदान किए गए धारा 34-44 (आईपीसी की धारा 96106) के तहत सद्भावना में अपने निजी बचाव के अधिकार का प्रयोग कर रहा था। हालांकि, उसने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया और मृत्यु का कारण बना। मृत्यु किसी पूर्व-चिंतन से नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, उसे बचाव के लिए आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाने के इरादे से कार्य नहीं करना चाहिए।

कट्टा सुरेंद्र बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2008), के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘निजी बचाव के अधिकार का अधिकार बढ़ाने’ और ‘निजी बचाव का अधिकार समाप्त हो जाने के बाद कार्य करने’ की स्थिति के बीच अंतर किया। बाद के मामले में, अपवाद लागू नहीं होगा क्योंकि अभियुक्त को अब निजी बचाव का अधिकार नहीं था और इस तरह वह इसका उल्लंघन नहीं कर सकता था।

नाथन बनाम मद्रास राज्य (1972), के मामले में अभियुक्त  का कुछ जमीन पर कब्जा था जो उसने मृतक से पट्टे (लीज) पर ली थी। कुछ लगान बकाया हो गया था जिसके कारण मृतक जमींदार ने जबरदस्ती अभियुक्त को बेदखल कर उसकी फसल काटने की कोशिश की। अपनी संपत्ति के खिलाफ निजी बचाव की प्रयोग में, अभियुक्त  ने मृतक पर हमला किया जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। अदालत ने कहा कि अभियुक्त के पास अपनी निजी बचाव का प्रयोग करने का कानूनी अधिकार है। हालांकि, मृतक जमीनदार कोई घातक हथियार नहीं लिए था, इसलिए अभियुक्त की ओर से मौत या गंभीर चोट का कोई डर नहीं था। इसलिए, उनकी निजी बचाव आईपीसी की धारा 104 (बीएनएस, 2023 की धारा 42) के तहत मौत के अलावा किसी भी नुकसान पहुंचाने की सीमा तक सीमित थी। चूँकि उसने निजी बचाव के अपने अधिकार का उल्लंघन किया था, इसलिए धारा 300 का अपवाद 2 लागू हुआ, और उसका अपराध आपराधिक मानव वध जो हत्या नहीं कारित करता है, मे बदल दिया गया था।

अपवाद 3

धारा 101 के अपवाद 3 के अनुसार, हत्या का अपराध आपराधिक मानव वध जो हत्या नहीं कारित करता है, मे बदल जाएगा यदि:

  1. अपराधी एक लोक सेवक था या सार्वजनिक न्याय को आगे बढ़ाने में लोक सेवक की सहायता करने वाला व्यक्ति था।
  2. उसने कानून द्वारा प्रदत्त शक्ति को पार कर लिया
  3. वह सद्भावना से काम करते हुए उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण बना
  4. वह कार्य व्यक्ति के प्रति बिना किसी दुर्भावना के होना चाहिए और एक लोक सेवक के रूप में उसके कर्तव्य के निर्वहन के लिए वैध और आवश्यक होना चाहिए।

दाखी सिंह बनाम राज्य (1955) के मामले में पुलिस अधिकारी ने एक चोर को गिरफ्तार किया था और उसे ट्रेन में ले जा रहा था। हालांकि, चोर चलती ट्रेन से भाग गया और पुलिस अधिकारी ने उसका पीछा करने की कोशिश की। जब पुलिस अधिकारी उसे पकड़ने की स्थिति में नहीं था, तो उसने उस पर बंदूक से गोली चला दी, लेकिन अनजाने में वह गोली फायरमैन को लग गई और उसकी मौत हो गई। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ये मामला अपवाद 3 के अंतर्गत आएगा। 

अपवाद 4 

धारा 101 के अपवाद 4 के अनुसार, हत्या का अपराध आपराधिक मानव वध जो हत्या नहीं करता है, उसमे बदल जाएगा, जहां: 

  1. जोश में आकर अचानक हुई मारपीट से मौत हो जाती है
  2. लड़ाई अचानक झगड़े में बदल जाए। 
  3. अभियुक्त को बिना किसी पूर्व चिंतन के, बिना अनुचित लाभ उठाए और बिना क्रूर या असामान्य तरीके से कार्य करना चाहिए।

यह जांचना महत्वहीन है कि क्या यह अभियुक्त था या पीड़ित, जिसने पहले उकसावे या हमले की पेशकश की थी। ऐसी परिस्थिति में लड़ाई का अस्तित्व एक शर्त है, परन्तु जहां कोई लड़ाई ही नहीं है, वहा अपवाद आकर्षित नहीं होता है जैसा कि जसवन्त सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (1998) के मामले में कहा गया है।

शब्द ‘लड़ाई’ मौखिक झगड़े से अधिक कुछ दर्शाती है, जैसा कि केसर सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2008) में कहा गया है, जो की झड़प के आदान-प्रदान की मांग करता है।

मोहम्मद मिथेन शाहुल हामिद बनाम केरल राज्य (1980) में कहा गया है कि एक लड़ाई में दोनों पक्षों द्वारा हमला किया जाना चाहिए ना कि एक पक्ष द्वारा हमला और दूसरे द्वारा पीछे हटना लड़ाई नहीं  है।

धर्मन बनाम पंजाब राज्य (1956) के मामले में अभियुक्त और मृतक के बीच जमीन के स्वामित्व को लेकर विवाद था। मृतक ने विवादित जमीन पर चूना तोड़ने की मशीन लगायी थी, जिसे अभियुक्त ने तोड़ दिया।  इस बात को लेकर दोनों के बीच झगड़ा हो गया और परिणामस्वरूप मृतक पर जानलेवा वार हुए। अदालत ने माना कि अचानक बिना किसी बचाव के लड़ाई हुई और अचानक जुनून मे हुए झगड़े के वजह से चोटें आई थीं। इसके अलावा, अभियुक्त की ओर से कोई अनुचित लाभ या क्रूर कार्य नहीं किया गया। इसलिए, अपवाद 4 वर्तमान मामले पर लागू होगा।

अपवाद 5

धारा 101 के अपवाद 5 के अनुसार, हत्या के अपराध को आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, मे बदल दिया जाएगा, जहां पीड़ित बालिग है और उसने मृत्यु या मृत्यु का जोखिम सहने की सहमति दी है। दशरथ पवन बनाम बिहार राज्य (1957) के मामले में, अभियुक्त  दसवीं कक्षा का छात्र था जो अपनी परीक्षा में तीन बार फेल हो चुका था। अपनी असफलताओं से निराश होकर उसने अपनी जान लेने का फैसला किया। उसकी पत्नी ने पहले उसे मारने और फिर खुद को मारने के लिए कहा। समझौते के अनुसार, अभियुक्त  ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी, लेकिन इससे पहले कि वह अपनी जान ले पाता, उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पटना उच्च न्यायालय द्वारा अभियुक्त  को अपवाद 5 का लाभ दिया गया।

बीएनएस, 2023 की धारा 101 के अपवादों पर मामले

किशोर सिंह एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977)

तथ्य 

इस मामले में अपीलकर्ता ने 28 जुलाई, 1968 को मृतक जवाहर और पूरन सिंह पर हमला किया और ‘सब्बल’ और कुल्हाड़ी के कुंद सिरे का उपयोग करके मृतक को गंभीर चोटें पहुंचाई। सिर की चोटों के लिए सर्जिकल ऑपरेशन से उबरने के बाद जवाहर की मृत्यु 27 अगस्त, 1968 को अस्पताल में हो गई ।

उठाए गये मुद्दे

क्या अभियुक्त  को पीड़िता की हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

इस मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का विश्लेषण करने के बाद कहा। यह स्पष्ट है कि वहाँ “तीन डॉक्टरों द्वारा मौत के कारण के संबंध में दिए गये राय कुछ हद तक संकोचपूर्ण चिकित्सकीय राय है ” इसके अलावा, मृतक की मृत्यु घटना के एक महीने बाद हुई। इसलिए, धारा 300 तीसरी इन तथ्यों पर स्थापित नहीं हुई थी, चूंकि धारा 300 साबित नहीं हुई, इसलिए अभियुक्त  द्वारा अपवादों को लागू करने का सवाल ही नहीं उठता है। अभियोजन पक्ष यह कहकर तत्वों को साबित करने के अपने बोझ को हल्का नहीं कर सकता है कि अभियुक्त ने अपवादों के अनुप्रयोग की पैरवी नहीं की है या उसे साबित नहीं किया है।

अदालत ने आगे बताया कि धारा 300 के अपवादों को लागू करने के साथ, धारा 300 के सभी आवश्यक तत्वों को स्थापित करने का बोझ सबसे पहले अभियोजन पक्ष पर पड़ता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि हत्या का अपराध साबित हो जाता है, तो धारा 300 के तहत किसी भी अपवाद को लागू करने से अपराध को आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, उनमे बदल दिया जाएगा। हालांकि ऐसे मामले में जहां अभियुक्त ने किसी भी अपवाद की प्रयोज्यता का अनुरोध नहीं किया है, धारा 300 (बीएनएस की धारा 101) के तहत हत्या के अपराध की आवश्यक सामग्री को साबित करने का प्रारंभिक दायित्व अभी भी अभियोजन पक्ष पर है। आगे न्यायालय ने कहा कि, “यदि अभियोजन पक्ष आईपीसी की धारा 300 के चार खंडों में से किसी एक को स्थापित करने में इस दायित्व का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो हत्या का आरोप नहीं बनाया जाएगा और मामला आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, उसका हो सकता है क्योंकि यह आईपीसी की धारा 299 के तहत वर्णित है।” 

बीएनएस, 2023 की धारा 103 तहत हत्या के लिए सजा

हत्या के अपराध के लिए सज़ा के दो विकल्प दिए गए हैं। पहला मौत और दूसरा आजीवन कारावास। इन सजाओं के अलावा अभियुक्त को जुर्माना भी भरना होगा। 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में हत्या की सजा के लिए एक नई उपधारा जोड़ी गई है।

धारा 103(2): “जब पांच या अधिक व्यक्तियों का एक समूह एक साथ मिलकर नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य समान आधार पर हत्या करता है तो ऐसे समूह के प्रत्येक सदस्य को मौत या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी और जुर्माना भी देना होगा।”

वास्तव में, नई जोड़ी गई उपधारा, लोगों के एक गैरकानूनी समूह को सामूहिक रूप से हत्या का अपराध करने से हतोत्साहित करने का प्रयास करती है। यह इस तथ्य की स्वीकृति है कि किसी व्यक्ति द्वारा अकेले अपराध करने की तुलना में अन्य लोगों द्वारा समर्थित होने पर अपराध करने की अधिक संभावना होगी। इसके अलावा, नस्ल, जाति, सामुदायिक लिंग, जन्म स्थान, भाषा और व्यक्तिगत विश्वास जैसे कारक महत्वपूर्ण पहचान चिह्नक के रूप में कार्य करते हैं जो लोगों को एक साथ समूहित करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए, इस धारा के तहत 5 या अधिक लोग एक साथ मिलकर ऊपर बताए गए आधार पर हत्या का अपराध करते हैं, तो समूह के प्रत्येक सदस्य के लिए मौत की कठोरतम सजा या वैकल्पिक रूप से आजीवन कारावास निर्धारित की गई है। यह दायित्व प्रत्येक सदस्य के व्यक्तिगत योगदान की परवाह किए बिना तय किया जाएगा। 

इसे संहिता की धारा 3(5) के तहत पाए जाने वाले साझा इरादे के सिद्धांतों की एक शाखा के रूप में देखा जा सकता है। इसमें कहा गया है कि जब एक आपराधिक कार्य कई लोगों द्वारा ‘सभी के साझा इरादे को आगे बढ़ाने’ में किया जाता है, तो प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी ऐसी होती है जैसे उसने अकेले ही कार्य किया हो। दायित्व प्रत्येक के विशेष योगदान के बावजूद है, बशर्ते कि प्रत्येक का एक ही साझा इरादा हो और उसने उसे आगे बढ़ाने के लिए कुछ कार्य किया हो। 

बीएनएस 2023 की धारा 103 के तहत मौत की सजा

भारतीय न्यायशास्त्र में ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को बढ़ती महत्ता मिल रही है, जिससे कुछ अपराधों के लिए मृत्युदंड को सजा के रूप में देने की संवैधानिकता पर सवाल उठने लगे हैं। 

एक प्रतिधारणवादी (रीटेंसनिस्ट) और उन्मूलनवादी (ऐबोलिशनिस्ट) बहस उभरी है, जहां प्रतिधारणवादी का तर्क है कि कुछ जघन्य अपराधों के लिए, मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए। जबकि उन्मूलनवादी का तर्क है कि मानवाधिकारों की प्रधानता के युग में मृत्युदंड का कोई स्थान नहीं है। स्थिति पेनोलॉजी के विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। प्रतिधारणवादी निवारण और प्रतिशोध के सिद्धांत में विश्वास करते हैं, जबकि उन्मूलनवादी पुनर्वास और सुधार के सिद्धांत में विश्वास करते हैं।

भारत में, 1860 की भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और 2023 की भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) दोनों कुछ बहुत ही जघन्य अपराधों के लिए सजा के रूप में मौत की सजा का प्रावधान रखती हैं, उनमें से एक हत्या है। प्रत्येक मामले में मृत्यु या आजीवन कारावास की सजा देने के निर्णय के प्रश्न पर बीएनएसएस की धारा 393(3) (सीआरपीसी 1973 के धारा 354(3)) पर विचार करना होगा। यह धारा अदालत को विशेष सजा देने के लिए कारण रिकॉर्ड करने का कर्तव्य देती है और इसके अलावा, मृत्युदंड दिए जाने की स्थिति में विशेष कारण दर्ज करने होते हैं। हालाँकि, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय दिल्ली द्वारा शुरू की गई एक परियोजना, प्रोजेक्ट 39-A, द्वारा प्रकाशित “ विचारण न्यायालय में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा” शीर्षक वाली एक रिपोर्ट ने  सत्र न्यायालय द्वारा आयोजित मृत्युदंड की सजा सुनाने वाली सुनवाई की सतही प्रकृति का पर्दाफाश किया है और बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के फैसले द्वारा भारत में निर्धारित मृत्युदंड ढांचे में आदर्श और प्रक्रियात्मक अंतरालों को प्रदर्शित किया है। 

वर्ष 1980 तक, एक प्रकार की शून्यता थी कि कौन से मामले मृत्युदंड के दायरे में आएंगे और कौन से नहीं, लेकिन अब असाधारण और दुर्लभतम मामलों के सिद्धांत ने इसके लिए कुछ दिशा निर्देश निर्धारित किए हैं। इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के मामले में विकसित किया गया था। यह कहा गया कि अदालत को अपना विचार मुख्य रूप से अपराध तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि अपराधी की परिस्थितियों पर भी उचित विचार करना चाहिए। ऐसा तभी होता है जब दोषी अत्यधिक भ्रष्टता के अनुपात को मान लेता है कि विशेष कारणों को वैध रूप से अस्तित्व में माना जा सकता है। न्यायधीशों को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए।  मामले से अनुमान लगाए जा सकने वाले कुछ दिशानिर्देश इस प्रकार हैं:

  1. अत्यधिक गंभीर मामलों में दोषी होने को छोड़कर, मौत की अत्यधिक सज़ा नहीं दी जा सकती
  2. मृत्युदंड का विकल्प चुनने से पहले, अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ अपराधी की परिस्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है
  3. आजीवन कारावास नियम है, जबकि मृत्युदंड एक अपवाद है और केवल तभी दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास अपराध और अपराधी की परिस्थितियों के संबंध में अपर्याप्त लगता है।
  4. बढ़ती और कम करने वाली परिस्थितियों की एक सूची तैयार की जानी चाहिए।

इसके अलावा, अदालत को दो प्रश्न भी बनाने चाहिए जिनका उत्तर सजा तय करते समय दिया जाना चाहिए

  1. क्या उस अपराध में कुछ असामान्य है जो आजीवन कारावास की सजा को अपर्याप्त बनाता है और मौत की सजा की मांग करता है?
  2. क्या अपराध की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि परिस्थितियों को कम करने के लिए अधिकतम महत्व दिए जाने के बाद भी उस सज़ा को लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है?

मच्छी सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य (1983) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न स्थितियों को निर्धारित किया है, जो दुर्लभतम मामलों के अंतर्गत आएंगे। ये इस प्रकार हैं:

  1. जब की गई हत्या अत्यंत क्रूर, हास्यास्पद, शैतानी, विद्रोही या निंदनीय होती है, तो इससे समुदाय में तीव्र और अत्यधिक आक्रोश जागृत होता है। उदाहरण के लिए, किसी को जिंदा जलाने के इरादे से उसके घर में आग लगाना;
  2. अपराध की भयावहता बड़े पैमाने पर है, जिसका अर्थ है कई लोगों की मौत होना; या जहां बड़े पैमाने पर नरसंहार (मैसकर), एक समुदाय के लोगों की हत्या आदि होती है;
  3. जब मृत्यु व्यक्ति की जाति और धर्म के कारण होती है;
  4. जब अभियुक्त के इरादे क्रूर थे या पूर्ण भ्रष्टता का संकेत देते थे; और
  5. जब हत्या का शिकार एक मासूम बच्चा, एक असहाय महिला या व्यक्ति (बुढ़ापे या दुर्बलता के कारण), एक सार्वजनिक व्यक्ति, आदि है और क्रूर तरीके से किया जाता है।
  6. एक ऐसे व्यक्ति की हत्या जिसने हत्यारों पर बहुत भरोसा किया। 

कानूनी प्रस्ताव के रूप में, इस बात पर सहमति पर पहुंचना मुश्किल होगा कि मृत्युदंड कहाँ दिया जाना चाहिए और कहाँ नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्णय लेने का मामला है और कोई सीधा सूत्र नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि कोई भी दो अपराध समान नहीं होते हैं। यह अभी भी निर्धारित करने के लिए व्यक्तिपरक है कि सबसे दुर्लभ में क्या है और क्या नहीं है। इसलिए यह एक अस्पष्टता छोड़ देता है कि किन मामलों में मृत्युदंड लागू किया जा सकता है।

अपराध के अभियुक्तों को मौत की सज़ा दिए जाने का सबसे ताज़ा मुकेश और अन्य बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एवं अन्य (2017) (निर्भया मामला), मामला है। जहां एक किशोर को छोड़कर सभी अभियुक्तों को मौत की सजा सुनाई गई और आखिरकार 2020 में सजा पर अमल किया गया। इस फांसी ने मौत की सजा के मुद्दे को देश भर में कई गरमागरम बहसों का केंद्र बना दिया। प्रमुख प्रश्न यह उठाया गया है कि क्या अन्य देशों की तरह भारत को भी मृत्युदंड समाप्त कर देना चाहिए, जबकि न्यायपालिका के पास आजीवन कारावास जैसा विकल्प मौजूद है। 

निर्भया मामले में फांसी के बाद, मौत की सजा के मुद्दे पर जनता द्वारा विभिन्न दलीलें पेश की गईं। मौत की सजा को बरकरार रखने का समर्थन करने वाले समूह ने तर्क दिया कि जो लोग हत्या करते हैं, क्योंकि उन्होंने किसी और की जान ले ली है, उन्होंने अपना जीवन जीने का अधिकार खो दिया है या यह कि दोषी हत्यारों को मारकर, हम संभावित हत्यारों को लोगों की हत्या करने से रोक देंगे। दूसरी ओर, अनुच्छेद 21 और मानव जीवन को बढ़ती हुई महत्ता के साथ, मौत की सजा के उन्मूलन की आवाजें पहले से कहीं ज्यादा तेज हुई हैं। उनका तर्क है कि प्रतिशोध और आँख के बदले आँख के विचार को सुधार और पुनर्वास के विचार को रास्ता देना चाहिए। इसके अलावा, वे तर्क देते हैं कि मौत की सजा के निरोधक प्रभाव को किसी भी सबूत से स्थापित नहीं किया गया है।

जिंदल व्यवहारिक विज्ञान संस्थान  द्वारा एक सर्वेक्षण किया गया था, इस अध्ययन का उद्देश्य मृत्युदंड के प्रति जनता के दृष्टिकोण, अपराध के प्रकार और परिस्थितियों का आकलन करना था, जिनके लिए मृत्युदंड का पक्ष लिया जाता है, अनुभवजन्य (एम्पिरिकल) अनुसंधान के निष्कर्षों के अनुसार, यह देखा गया है कि भारी बहुमत 79% उत्तरदाताओं का कुछ विशिष्ट अपराधों के लिए मृत्युदंड को वैध बनाने का पक्षधर है। 

आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, और आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते है दोनों के बीच संबंध:

क्र.सं. बीएनएस, 2023 की धारा 100- आपराधिक मानव वध बीएनएस, 2023 की         धारा 101- आपराधिक  मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते है।  दोनों में अंतर
1. मृत्यु कारित करने का इरादा मृत्यु कारित करने                  का इरादा कोई अंतर नहीं- मृत्यु कारित करने के इरादे से किया गया कोई भी कार्य सीधे तौर पर हत्या के अपराध के अंतर्गत आएगा।
2. ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा             जिससे मृत्यु होने की संभावना हो। ऐसी शारीरिक चोट             पहुंचाने का इरादा जिसके       बारे में अपराधी                 जानता हो कि                       इससे उस व्यक्ति की                     मृत्यु होने की संभावना है जिसे नुकसान पहुंचाया गया है। जबकि धारा 100 में केवल शारीरिक चोट की संभावना है, धारा 101 में, विशेष पीड़ित के बारे में व्यक्तिपरक ज्ञान आवश्यक है।
3. ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का                 इरादा जिससे मृत्यु होने की संभावना हो। किसी भी व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा और पहुंचाई जाने वाली शारीरिक चोट प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त है।  धारा 100 के तहत शारीरिक चोट से केवल मृत्यु होने की संभावना है; हालांकि धारा 101 के लिए शारीरिक चोट मृत्यु का कारण बनने के लिए ‘पर्याप्त’ होनी चाहिए
4. यह ज्ञान कि ऐसे कार्य से मृत्यु होने की संभावना है। यह ज्ञान कि यह कार्य इतना आसन्न रूप से खतरनाक है कि इसके कारण पूरी संभावना है, की मृत्यु होनी चाहिए, या ऐसी शारीरिक चोट लगनी चाहिए जिससे मृत्यु होने की संभावना हो। धारा 100 के तहत आवश्यक ज्ञान केवल मृत्यु की संभावना के बारे में है, जबकि धारा 101 के तहत ज्ञान सभी संभावनाओं में मृत्यु के कारण के बारे में है।

रेग बनाम गोविंदा का ऐतिहासिक मामला (1876)

रेग बनाम गोविंदा (1876) यह सबसे ऐतिहासिक मामलों में से एक है जो आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, और हत्या के बीच अंतर और संबंध से संबंधित है, जिसे रेग बनाम गोविंदा (1876) मामले में स्पष्ट किया गया था। मामले के तथ्यों के अनुसार, एक दंपत्ति के बीच झगड़ा हुआ और गुस्से में आकर पति ने अपनी पत्नी को थप्पड़ मार दिया और धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। इसके बाद, उसने अपना घुटना उसकी छाती पर रख दिया और बंद मुट्ठी से उसके चेहरे पर दो या तीन जोरदार वार किए। चोटों के कारण पत्नी की कुछ ही देर बाद मौत हो गई। चिकित्सीय साक्ष्य के अनुसार, यह कहा गया कि मृत्यु मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह के कारण हुई। न्यायमूर्ति मेलविल ने मामले का फैसला करते हुए बीएनएस, 2023 की धारा 100 और बीएनएस, 2023 की धारा 101 (पहले क्रमशः धारा 299 और 300 आईपीसी, 1860) के बीच अंतर को स्पष्ट किया। 

अदालत ने दोनों धाराओं के बीच के अंतर को निम्नलिखित शब्दों में रेखांकित किया।

 “धारा 299 और धारा 300 का पहला भाग बताता है कि जहां मारने का इरादा हो, वहां अपराध हमेशा हत्या होता है।

धारा 299 और धारा 300 का तीसरा भाग, चौथा भाग मुझे उन मामलों पर लागू करने के लिए प्रतीत होता है जिनमें मृत्यु या शारीरिक चोट पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है। अपराध आपराधिक मानव वध है या नहीं, यह मानव जीवन को खतरे की डिग्री पर निर्भर करता है। यदि मृत्यु संभावित परिणाम है, तो यह आपराधिक मानव वध है; यदि यह सबसे संभावित परिणाम है, तो यह हत्या है।

दूसरे शब्दों में, धारा 300 का सार… “अपराध हत्या है, यदि अपराधी जानता है कि विशेष व्यक्ति को संविधान की विशिष्टता, अपरिपक्व आयु या अन्य विशेष परिस्थितियों से, ऐसी चोट से मार दिया जाए, जो सामान्य रूप से मृत्यु का कारण नहीं बनेगी।”

धारा 299 के दूसरे भाग और धारा 300 के तीसरे भाग पर विचार करना बाकी है, और इन दोनों खंडों की तुलना पर ही वर्तमान जैसे संदिग्ध मामलों का निर्णय आम तौर पर निर्भर होना चाहिए। यह अपराध आपराधिक मानव वध है, यदि पहुंचाई जाने वाली शारीरिक चोट से मृत्यु होने की संभावना हो; और यदि ऐसी चोट प्रकृति के सामान्य क्रम में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त है, तो यह हत्या है।”

इसलिए, वर्तमान मामले में, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त का मौत का कारण बनने का कोई इरादा नहीं था, न ही मृतक के बारे में कोई अनोखी बात थी जिसके बारे में अभियुक्त  को पता था और न ही जो शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा था, जो सामान्य कारण मे मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी, बल्कि यह केवल मृत्यु का कारण बनने की ‘संभावना’ थी। इस मामले में मृत्यु मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह के कारण हुई थी; इसलिए, अभियुक्त  को आपराधिक मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आते है, के अपराध का दोषी ठहराया गया।

इसलिए, वर्तमान मामले में, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त का मृत्यु का कारण बनने का कोई इरादा नहीं था, न ही मृतक के बारे में कोई ऐसी ख़ासियत थी जिसके बारे में अभियुक्त जानता था और न ही शारीरिक चोट जो पहुंचाने का इरादा था, सामान्य कारणों से मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी, बल्कि यह केवल ‘संभावित’ थी मृत्यु का कारण। मामले में मृत्यु मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह के कारण हुई थी; इसलिए, अभियुक्त को हत्या की मात्रा तक नहीं पहुंचने वाले दोषपूर्ण मानव हत्या के अपराध का दोषी ठहराया गया।

आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी द्वारा की गई हत्या के लिए बीएनएस, 2023 की धारा 102 (आईपीसी, 1860 की धारा 303) के तहत सजा

बीएनएस, 2023 की धारा 102, जो आईपीसी, 1860 की धारा 303 से मेल खाती है, एक विशेष मामले में हत्या के लिए सजा से संबंधित है। जहां कोई व्यक्ति जो पहले से ही आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है और जब वह सजा प्रभावी होती है, तो हत्या करता है, तो उसे मृत्युदंड या वैकल्पिक रूप से आजीवन कारावास, जिसका अर्थ है उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए, से दंडित किया जाएगा। 

आईपीसी, 1860 की धारा 303 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मिठू बनाम पंजाब राज्य (1983) मामले में असंवैधानिक माना गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि यह धारा असंवैधानिक और शून्य है क्योंकि यह समानता की गारंटी जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के साथ अनुच्छेद 21 में प्रदान किया गया है, जो कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर, किसी व्यक्ति के जीवन या निजी स्वतंत्रता से वंचित करने पर रोक लगाता है, का उल्लंघन करती है। अदालत ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा के दौरान हत्या करने वाले व्यक्तियों और ऐसे व्यक्ति जो तब हत्या करने है जन ऐसी सजा के अधीन नहीं हैं के बीच सजा के मामले में अंतर करने के लिए उचित तर्कसंगत औचित्य का अभाव है।

असंवैधानिकता का तत्व इस तथ्य के कारण था कि ऐसे अपराधी के मामले में केवल मौत की सजा निर्धारित की गई थी। हालाँकि, अब बीएनएस, 2023 के तहत मृत्यु और आजीवन कारावास के बीच विकल्प प्रदान किया गया है। जिससे असंवैधानिकता के तत्व का निवारण हो गया है।

बीएनएस, 2023 की धारा 102 के तहत द्वेष के हस्तांतरण का सिद्धांत

‘जिस व्यक्ति की मृत्यु का इरादा था उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के कारण आपराधिक मानव वध’ की धारणा बीएनएस, 2023 की धारा 102 (आईपीसी, 1860 की धारा 301) में निहित है, जिसमें कहा गया है कि:

आपराधिक मानव वध तब होता है जब कोई व्यक्ति, यह इरादा रखते हुए या यह जानते हुए कि उनके कार्यों से मृत्यु होने की संभावना है, अनजाने में उस व्यक्ति जिसे वे मारना चाहते थे या जानते थे कि मारे जाने की संभावना है, के अलावा किसी और की मृत्यु का कारण बनता है। ऐसे मामले में, आपराधिक मानव वध को उसी तरह वर्गीकृत किया जाता है जैसे कि व्यक्ति अपने इच्छित या अपेक्षित शिकार की मृत्यु का कारण बना हो।

दूसरे शब्दों में, B के प्रति उसका जो भी द्वेष था वह C में स्थानांतरित हो गया। B के प्रति उनका वही इरादा या ज्ञान उसके उस कार्य में स्थानांतरित हो गया जिसने C को मार डाला।

  1. केवल आपराधिक मनःस्तिथि ही हस्तांतरित की जाएगी जो अभियुक्त  के पास शुरू में थी।
  2. द्वेष के हस्तांतरण के लिए यह आवश्यक है कि उत्पन्न प्रभाव लेन-देन की निरंतरता में रहे।
  3. द्वेष के हस्तांतरण का यह सिद्धांत सभी अपराधों पर लागू होता है और बीएनएस की धारा 102 तक सीमित नहीं है।

इसे अंग्रेजी कानून में “स्थानांतरित द्वेष का सिद्धांत’ या ‘उद्देश्य का स्थानांतरण’ या ‘स्थानांतरित इरादा’ के रूप में भी जाना जाता है। आपराधिक मनःस्थिति आम तौर पर अपराध के सबूत का एक अनिवार्य तत्व है। इसे सजा से बचने के लिए एक दलील के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, जब आकस्मिक परिस्थितियों के कारण अभियुक्त  के कार्य के कारण अपराधी द्वारा अपेक्षित परिणाम नहीं आता है।

उदाहरण के लिए, A, B को मारने के इरादे से उस पर गोली चलाता है, लेकिन B बच जाता है और गोली C को मार देता है। यहां A की गोली के परिणामस्वरूप C की मृत्यु हो गई; यदि उसने B को मारने के इरादे से उसे गोली नहीं मारी होती तो वह नहीं मरता, इसलिए, कहा जाता है कि B के प्रति द्वेष C में स्थानांतरित हो गया है। हालांकि, इस सिद्धांत में केवल एक चेतावनी है, जो है ‘ कम ग्रेनो सालिस’ जिसका मतलब है कि व्यक्ति का कार्य एक ही अपराध का होना चाहिए। 

इसका मतलब यह है कि अगर A, B को गोली मारता है, जो एक इंसान है और B झुक जाता है, जिससे गोली C को लगती है, तो A आपराधिक मानव वध के लिए उत्तरदायी होगा।

हालाँकि, यदि A, B पर गोली चलाता है, जो एक कुत्ता है और चूक जाता है, और गोली C को मार देता है, जो एक इंसान है, तो वह उत्तरदायी नहीं होगा क्योंकि उसके पास आपराधिक मनःस्थिति किसी इंसान को नहीं बल्कि एक कुत्ते को मारने की थी।

कानूनी मामले 

राजबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2006)

तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता ने दावा किया कि पड़ोसी ने उसके भाई के घर के परिसर पर कुछ ईंटें फेंक दीं। इसी बात को लेकर उसके पिता और अभियुक्तों के बीच कहा-सुनी भी हुई लेकिन स्थानीय लोगों ने किसी तरह मामले को सुलझा लिया। अगले दिन अभियुक्त अपने दो रिश्तेदारों के साथ बंदूकें लेकर आ गया। वे शिकायतकर्ता की दुकान के पास आए, जहां उसके पिता खड़े थे। वहां अभियुक्त ने अपने रिश्तेदारों को उसे मारने के लिए  उकसाया और उन्होंने  शिकायतकर्ता के पिता पर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसके बाद वह घायल हो गए और गिर गए।

एक लड़की उस दुकान पर कुछ सामान खरीदने आई थी और उसे चोट लग गई और वह गिर गई। अस्पताल ले जाते समय दोनों घायलों की मौत हो गई। अभियुक्तों ने अपनी दलील में कहा कि लड़की की मौत दुर्घटनावश हुई और उसे मारने का उनका कोई इरादा नहीं था। वह उस जगह से गुजर रही थी और परिणामस्वरूप, उसे चोटें लगीं और उसकी मृत्यु हो गई। 

उठाए गये मुद्दे

क्या अभियुक्त  को लड़की की हत्या के आरोप में दोषी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

अदालत ने कहा कि धारा 301 का सार यह है कि यदि हत्या किसी ऐसे कार्य के दौरान हुई है, जिसे व्यक्ति करना चाहता है या जानता है कि मृत्यु का कारण बनने की संभावना है, तो उसे ऐसा माना जाना चाहिए जैसे कि हत्यारे का वास्तविक इरादा वास्तव में पूरा हो गया हो। इस मामले में, अभियुक्त का कुछ नुकसान पहुंचाने का इरादा था और उसी के अनुसरण में, उसने गोलियां चलाईं। धारा 301 इस मामले पर लागू होगी। इसलिए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अभियुक्त  को दोषी ठहराया और आईपीसी की धारा 301 (बीएनएस, 2023 की धारा 102) के तहत दोषी ठहराया गया।

लोक अभियोजक बनाम मुशुनुरू सूर्यनारायण मूर्ति (1912)

तथ्य 

इस मामले में A का इरादा B को मारने का था और इसके लिए उसने उसे हलवा परोसा जिसमें जहर मिला हुआ था। B ने हलवे का बहुत कम हिस्सा खाया और बाकी सड़क पर रख दिया। कुछ बच्चों ने हलवा उठाकर खा लिया, जिससे उनकी मौत हो गयी। A ने दावा किया कि उसका उन बच्चों को मारने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए वह उनकी हत्या के लिए उत्तरदायी नहीं होना चाहिए।

उठाए गये मुद्दे 

क्या बच्चों की मौत के लिए अभियुक्त  को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

निर्णय

अदालत ने उसे हत्या का दोषी ठहराया, क्योंकि B की मौत का उसका जो भी इरादा था वह उन बच्चों में स्थानांतरित हो गया था। इसलिए, B के संदर्भ में, उसे हत्या के प्रयास के अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था और बच्चों के संदर्भ में, उसे हत्या के अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। 

कल्पित परिस्थितियों का सिद्धांत

इस सिद्धांत को एक उदाहरण की सहायता से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है:

A ने B के सिर पर मोटी छड़ी से वार किया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी। A का प्रारंभिक द्वेष केवल B को गंभीर चोट पहुंचाने तक ही सीमित था। हालांकि, जब वह बेहोश होकर गिर गई, तो उसने उसे मृत मान लिया और केवल मौत को आत्महत्या के रूप में पेश करने के इरादे से, उसने उसके शरीर को छत के पंखे से लटका दिया।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मौत सिर पर डंडे के वार से नहीं, बल्कि फांसी लगाने से हुई थी। 

सवाल यह उठा कि क्या इस मामले में A को B की हत्या के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा या नहीं? 

कल्पित परिस्थितियों के सिद्धांत के अनुसार, A का आपराधिक दायित्व केवल उसके प्रारंभिक द्वेष के लिए होगा। चूँकि फाँसी देने का कार्य आपराधिक मनःस्थिति  हत्या करने के इरादे से, नहीं किया गया था क्योंकि जब उसने उसके शव को लटकाया तो उसे लगा कि वह मर चुकी है।

हालाँकि, अगर उसने शव को केवल इस निश्चितता के साथ लटका दिया होता की उसकी मृत्यु होनी है, तो उसका दायित्व हत्या का होगा। 

पलानी गौंडन बनाम अज्ञात (1919)

तथ्य

इस महत्वपूर्ण मामले में, तथ्य इस प्रकार थे: अभियुक्त ने अपनी पत्नी के सिर पर लकड़ी के हिस्से के साथ हल का फाल मारा, जिससे उसकी पत्नी बेहोश होकर गिर गई। उसे मृत समझकर, उसने झूठा सबूत बनाने के लिए, उसे फांसी पर लटका दिया। पोस्टमार्टम में, मौत का कारण फांसी बताया गया। 

उठाए गये मुद्दे 

अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध क्या है?

निर्णय

मद्रास उच्च न्यायालय ने काल्पनिक परिस्थितियों के सिद्धांत को लागू किया, क्योंकि जब A ने अपनी पत्नी के शव को लटका दिया, तो उसने सोचा कि वह मर चुकी है। यहां दुर्भावना के हस्तांतरण का सिद्धांत लागू होगा, जिसका अर्थ है कि मूल कार्य के लिए A का प्रारंभिक इरादा या आपराधिक मनःस्थिति  मूल बिंदु पर स्थानांतरित हो जाएगा जो वास्तव में मृत्यु का कारण बनता है। यहां जब उसने अपनी पत्नी को हल के फाल के लकड़ी के हिस्से से मारा, न कि धातु के हिस्से से, उसका इरादा केवल हमला करना था और झूठा सबूत बनाने का प्रयास करना था, इसलिए, वह केवल उन अपराधों के लिए उत्तरदायी होगा।

निष्कर्ष

हत्या और आपराधिक मानव वध के बीच प्राथमिक अंतर यह है कि हत्या आपराधिक मानव वध के अधिक गंभीर रूप का प्रतिनिधित्व करती है। हत्या में, इस बारे में कोई अस्पष्टता नहीं है कि क्या कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु होगी, जबकि आपराधिक मानव वध में कुछ अनिश्चितता शामिल होती है। बीएनएस, 2023 की धारा 100 (आईपीसी की धारा 299) के अनुसार, आपराधिक मानव वध तब होता है जब कोई कार्य मौत का कारण बनने के इरादे से किया जाता है या शारीरिक चोट जिससे मौत होने की संभावना हो पहुंचाने के इरादे से किया जाता है, या यह जानते हुए कि कार्य से मौत होने की संभावना है। इस धारा में “संभावना” शब्द का बार-बार उपयोग इस बारे में अनिश्चितता के तत्व को इंगित करता है कि क्या कार्य निश्चित रूप से मृत्यु का कारण बनेगा। इसके विपरीत, हत्या को बीएनएस, 2023 (धारा 300 आईपीसी, 1860) की धारा 101 के तहत परिभाषित किया गया है। 

यहाँ, “संभावना” के स्थान पर “पर्याप्त” शब्द का प्रयोग किया गया है, जो अस्पष्टता को दूर करता है। इससे पता चलता है कि अभियुक्त  की हरकतों से मौत निश्चित है। संक्षेप में कहें तो, जबकि आपराधिक मानव वध और हत्या दोनों में मौत का कारण शामिल है, अंतर इरादे और निश्चितता की डिग्री में निहित है। हत्या, मौत का कारण बनने के स्पष्ट इरादे के साथ अधिक गंभीर अपराध का प्रतिनिधित्व करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

शादियों और अन्य उत्सवों में जश्न में चलाने वाली गोली से होने वाली मौतों से संबंधित कानून क्या है?

भगवान सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2020), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय उन लोगों के दायित्व से निपटा जो जश्न में गोलियां चलाकर दूसरों को घायल करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस मामले में सवाल यह था कि क्या अपीलकर्ता का कार्य बीएनएस, 2023 की धारा 101 या धारा 100 के तहत आएगा। मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार थे: अभियुक्त  के बेटे की गांव में शादी हो रही थी, और जैसे ही बारात गंतव्य पर पहुंची, उसने जश्न में गोलियां चलाईं। ये गोलियाँ पाँच लोगों को लगीं और उनमें से दो की चोटों के कारण मृत्यु हो गई।

अदालत ने कहा कि हालांकि हम अभियुक्त  की ओर से मौत या शारीरिक चोट पहुंचाने का इरादा नहीं पा सके, जिससे मौत होने की संभावना हो, उसने कोई उचित सुरक्षा उपाय नहीं किए और इसलिए उससे यह जानने की उम्मीद की गई कि पास खड़े लोगो को बंदूक की गोली से चोट लग सकती है। सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लाइसेंसी बंदूक का इस्तेमाल जश्न के आयोजनों में नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह बहुत घातक हो सकती है। इसलिए, अभियुक्त  द्वारा किए गए अपराध को धारा 100 और बीएनएस 2023 के धारा 105 के तहत आपराधिक मानव वध के लिए दंडनीय माना गया है। 

‘पीड़ित महिला सिंड्रोम’ क्या है?

पीड़ित महिला सिंड्रोम‘ डॉ. लेनोरे वॉकर द्वारा प्रतिपादित एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है जो बताता है कि क्यों पीड़ित महिलाएं जो अपने साथियों को मारने के लिए मजबूर होती हैं, पर वे एक जगह रिश्ते में बनी रहती हैं। भारतीय संदर्भ में इसे ‘नल्लाथंगल सिंड्रोम’ के रूप में  किया गया है। हालांकि, भारत में पीड़ित महिला सिंड्रोम की कानूनी मान्यता अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। प्रतिशोध लेने वाली पीड़ित महिलाओं पर बहुत कम या कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

रेजिना बनाम किरणजीत अहलूवालिया (1992) के मामले में, इंग्लैंड और वेल्स की अदालत ने स्वीकार किया कि निरंतर दुर्व्यवहार के संचयी प्रभाव किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया और उसके कार्यों को नियंत्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं और आगे ‘उकसावे’ की पारंपरिक समझ के रूप में एक रक्षा बहुत संकीर्ण है और लंबे समय तक घरेलू शोषण के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखता है। 

भारत में, श्रीमती मंजू लाकड़ा बनाम असम राज्य (2013) का मामला, गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा रिपोर्ट किया गया पहला मामला है जिसमें एक पीड़ित महिला ने अपने साथी की हत्या करने के मामले में उकसावे का इस्तेमाल बचाव के रूप में किया है।

भारतीय न्याय संहिता में अन्य कौन से अपराध पाए गए हैं जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है लेकिन वह संहिता की धारा 100 या धारा 101 के अंतर्गत नहीं आते है?

बीएनएस, 2023 की धारा 106 (आईपीसी, 1860 की धारा 304A), जो लापरवाही से मौत का कारण बनने के अपराध से संबंधित है, यह धारा प्रदान करती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी लापरवाही से कार्य करके किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है, जो बीएनएस, 2023 की धारा 100 के अंतर्गत नहीं आता है, तो उसे  5 साल तक की अवधि की कारावास और जुर्माना के साथ दंडित किया जाएगा।

यह किसी व्यक्ति की मृत्यु की ओर ले जाने वाली चिकित्सा लापरवाही से भी संबंधित है, जहां 2 साल तक की सजा का प्रावधान है।

संदर्भ

 

व्यापार चिह्न अधिनियम 1999 की धारा 21

यह लेख Shreya Patel द्वारा लिखा गया है। यह लेख व्यापार चिह्न (ट्रेडमार्क) अधिनियम की धारा 21 के साथ भारत में व्यापार चिह्न विरोध प्रक्रिया की व्याख्या करता है। यह लेख ऐतिहासिक कानूनी मामले के साथ-साथ व्यापार चिह्न  विरोध के विभिन्न चरणों पर भी चर्चा करता है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है। 

परिचय

व्यापार चिह्न का पंजीकरण एक सफल व्यवसाय के लिए महत्वपूर्ण है। व्यापार चिह्न पंजीकरण में महत्वपूर्ण चरणों में से एक व्यापार चिह्न विरोध है। एक कंपनी ने अपने ब्रांड की सुरक्षा के लिए व्यापार चिह्न पंजीकरण के लिए आवेदन किया है। लेकिन क्या होता है, अगर कोई तीसरा पक्ष आपके व्यापार चिह्न आवेदन का विरोध करता है?

सभी पक्षों के लिए व्यापार चिह्न विरोध प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है, चाहे आप ब्रांड के मालिक हों जो अपने स्वयं के व्यापार चिह्न के लिए आवेदन कर रहे हों या कोई तीसरा पक्ष जो किसी भी आवेदन से संबंधित हो। व्यापार चिह्न विरोध एक ऐसी विधि है जिसका उपयोग तीसरे पक्ष द्वारा किया जाता है जो व्यापार चिह्न आवेदन से संबंधित हैं। कोई भी व्यक्ति वैध कारण होने पर व्यापार चिह्न पंजीकरण का विरोध कर सकता है।

इस लेख में, हम व्यापार चिह्न विरोध की प्रक्रिया, जिन आधारों पर व्यापार चिह्न आवेदन का विरोध किया जा सकता है, सभी महत्वपूर्ण फॉर्म और शुल्क जिनकी आवश्यकता विभिन्न चरणों में दायर करने के लिए होती है, और साथ ही ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा करेंगे जो निर्धारित समय सीमा के तहत व्यापार चिह्न दाखिल करने के महत्व और अन्य पहलुओं को दर्शाते हैं।

व्यापार चिह्न  विरोध का महत्व

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 (इसके बाद ‘अधिनियम’ कहा जाता है) भारत में व्यापार चिह्न विरोध का प्रावधान प्रदान करता है। अधिनियम की धारा 21 व्यापार चिह्न विरोध और उसकी संबंधित जानकारी की व्याख्या करती है। व्यापार चिह्न  नियम, 2017 (इसके बाद ‘नियम’ कहा जाता है) में भी ऐसे नियम शामिल हैं जिनका पालन व्यापार चिह्न विरोध के समय किया जाता है। अधिनियम और नियम दोनों मिलकर सभी जानकारी प्रदान करते हैं जो आवेदक और तीसरे पक्ष दोनों के लिए आवश्यक है जो एक व्यापार चिह्न आवेदन का विरोध कर रहे हैं कि वे सभी कदम उठा सकते हैं और साथ ही समय सीमा का पालन कर सकते हैं।

आइए व्यापार चिह्न  विरोध की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले व्यापार चिह्न  विरोध के महत्व को समझें। 

व्यापार चिह्न का विरोध बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक व्यापार चिह्न को पंजीकृत होने से रोककर समाज में उपभोक्ताओं की रक्षा करता है, जो 2 या अधिक ब्रांडों के बीच उपभोक्ताओं के मन में भ्रम पैदा कर सकता है। व्यापार चिह्न का विरोध समान व्यापार चिह्न पंजीकरण को भी रोकता है, जिससे पंजीकृत व्यापार चिह्न  से अनुचित लाभ हो सकता है।

किसी व्यापार चिह्न का विरोध करने की प्रक्रिया व्यापार चिह्न के अंतिम रूप से पंजीकृत होने से पहले और उससे पहले आती है, जो शुरुआती चरणों में विवादों को हल करने में मदद करती है और व्यापार चिह्न  के पंजीकरण के बाद कानूनी विवादों के जोखिम को कम करती है। व्यापार चिह्न  विरोध यह भी सुनिश्चित करता है कि केवल वे चिह्न जो सुरक्षा के योग्य हैं, पंजीकृत हैं और सार्वजनिक भागीदारी की सुविधा प्रदान करते हैं क्योंकि व्यापार चिह्न  पंजीकरण का विरोध किसी भी पक्ष द्वारा किया जा सकता है। व्यापार चिह्न  का विरोध करने वाले पक्षों को पंजीकृत होने वाले व्यापार चिह्न  में किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित की आवश्यकता नहीं थी। 

व्यापार चिह्न का विरोध

व्यापार चिह्न आवेदन भरना और उसकी परीक्षा पूरी व्यापार चिह्न पंजीकरण प्रक्रिया के शुरुआती चरणों में से एक है। व्यापार चिह्न आवेदन के रजिस्ट्रार द्वारा जांच किए जाने और इस अंत से स्वीकार किए जाने के बाद, पंजीकरण के लिए आवेदन व्यापार चिह्न पत्रिका (जर्नल) में विज्ञापित किया जाता है। आवेदन अब जनता के लिए खुला है, यदि कोई तीसरा पक्ष यह महसूस करता है कि यह चिह्न या तो बाजार में मौजूदा चिह्न के समान है या अन्य व्यापार चिह्न के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो विरोध किया जा सकता है। व्यापार चिह्न आवेदन का विरोध करने का उद्देश्य उस पक्ष की रक्षा करना है जो महसूस करता है कि इस तरह के चिह्न को पंजीकृत करने से उपभोक्ताओं के मन में भ्रम हो सकता है क्योंकि दोनों चिह्न या तो जानबूझकर समान है, या प्रकृति में समान हैं।

भारत में व्यापार चिह्न पंजीकरण का विरोध करने के कई कारण हैं। आइए इन कारणों पर एक नजर डालते हैं!

व्यापार चिह्न विरोध के क्या आधार है?

विभिन्न आधार है, (धारा 9 और 11) जिस पर व्यापार चिह्न पंजीकरण का विरोध किया जा सकता है, जैसे – 

  1. व्यापार चिह्न पंजीकरण का विरोध किया जा सकता है यदि वह चिन्ह पंजीकृत व्यापार चिह्न  के समान हो।
  2. एक चिह्न जो समान या एकरूप है और व्यापार चिह्न पत्रिका में पहले से ही प्रकाशित है, उसका भी विरोध किया जा सकता है।
  3. यदि व्यापार चिह्न  में  विशिष्टता नहीं है तो व्यापार चिह्न  पंजीकरण का विरोध किया जा सकता है।
  4. यदि कोई चिह्न प्रकृति में वर्णनात्मक है, तो उसका भी विरोध किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि प्रतीक या शब्द चिह्न स्वयं वस्तुओं या सेवाओं की प्रमुख विशेषताओं और उनकी गुणवत्ता को दर्शाता है। 
  5. किसी व्यापार चिह्न  का तब भी विरोध किया जा सकता है जब वह भारत के किसी कानून के विपरीत हो या किसी कानून द्वारा रोका गया हो।
  6. यदि व्यापार चिह्न  भारत में किसी भी वर्ग की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाता हुआ प्रतीत होता है, तो ऐसे पक्ष व्यापार चिह्न पंजीकरण के विरोध के लिए आवेदन कर सकते हैं।
  7. जब एक बिल्कुल समान व्यापार चिह्न पंजीकृत किया जा रहा है, जो सद्भावना में नहीं है, तो इसका उन पक्षों द्वारा भी विरोध किया जा सकता है जिन्हें लगता है कि उनके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। 

व्यापार चिह्न अधिनियम की धारा 21 की खंडवार व्याख्या

धारा 21 व्यापार चिह्न विरोध प्रक्रिया के बारे में सब कुछ बताती है। व्यापार चिह्न विरोध भारत में व्यापार चिह्न  पंजीकरण प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। व्यापार चिह्न  विरोध का चरण व्यापार चिह्न पत्रिका में व्यापार चिह्न आवेदन के विज्ञापित होने के बाद आता है। यह धारा संपूर्ण विपक्ष प्रक्रिया के साथ-साथ महत्वपूर्ण समय-सीमाओं के बारे में बात करती है जिनका पालन विरोध में शामिल सभी पक्षों को करना होता है।  

आइए सभी उप-धाराओं की व्यक्तिगत रूप से जांच करें और इच्छित निहितार्थों का पता लगाएं।

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 21(1)

इस उप-धारा में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति व्यापार चिह्न पत्रिका में ऐसे व्यापार चिह्न आवेदन के विज्ञापित या पुन: विज्ञापित होने की तारीख से चार महीने के भीतर व्यापार चिह्न पंजीकरण का विरोध कर सकता है। प्रेम एन. मेयर और अन्य बनाम व्यापार चिह्न के रजिस्ट्रार और अन्य (1968) के मामले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विरोध प्रक्रिया के संबंध में सिद्धांत स्थापित किए। रजिस्ट्रार की ओर से वकील द्वारा यह तर्क दिया गया था कि अपीलकर्ता व्यापार चिह्न पंजीकरण पर आपत्ति नहीं कर सकता क्योंकि वह पंजीकृत व्यापार चिह्न का मालिक नहीं है।

अपीलकर्ता द्वारा बताया गया कि व्यापार और पण्य (मर्चेन्डाइज़) वस्तु चिह्न अधिनियम 1958 की धारा 21 में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि ‘कोई भी व्यक्तिजो समान व्यापार चिह्न से जुड़े पक्ष से संबंधित है  व्यापार चिह्न पंजीकरण पर आपत्ति कर सकता है।’ व्यापार चिह्न के आवेदन का विरोध कौन कर सकता है, इसके लिए कोई निश्चित मानदंड नहीं हैं। व्यापार चिह्न रजिस्ट्रार केवल मामले की योग्यता पर विचार करेगा, न कि उस पक्ष पर जिसने व्यापार चिह्न  पर विरोध दर्ज कराया है।

यह विरोध लिखित रूप में और रजिस्ट्री द्वारा निर्धारित तरीके के अनुसार, व्यापार चिह्न  कार्यालय द्वारा निर्दिष्ट कुछ शुल्क के भुगतान के साथ होना चाहिए। यह उप-धारा व्यापार चिह्न  विरोध का सबसे महत्वपूर्ण तत्व प्रदान करती है, जो कि इस तरह के विरोध को दर्ज करने की समय सीमा है। व्यापार चिह्न  पंजीकरण के हर दूसरे चरण की तरह, यदि कोई तीसरा पक्ष व्यापार चिह्न  के पंजीकरण का विरोध करना चाहता है तो उन्हें इसके लिए शुल्क का भुगतान करना होगा और नोटिस लिखित रूप में होना चाहिए।

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 21(2)

इस उप-धारा में कहा गया है कि विरोध के नोटिस की एक प्रति रजिस्ट्रार द्वारा उस व्यापार चिह्न के आवेदक को भेजी जानी है जिसका किसी तीसरे पक्ष द्वारा विरोध किया जा रहा है। आवेदक को विरोध की सूचना प्राप्त होने के 2 माह के भीतर उसका उत्तर देना होगा। आवेदक को उस आधार पर प्रति-कथन (काउंटर स्टेटमेंट) भेजना होगा जिस पर उसका आवेदन आधारित है। यदि आवेदक निर्धारित समय के भीतर विरोध के नोटिस का उत्तर भेजने में विफल रहता है, तो पंजीकरण के लिए ऐसा आवेदन आवेदक द्वारा त्याग दिया गया माना जाता है। 

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 21(3)

इस उप-धारा में कहा गया है कि जब विरोध के नोटिस का जवाब भेजा जाता है, तो रजिस्ट्रार उसे व्यापार चिह्न  पंजीकरण का विरोध करने वाले पक्ष को भेज देगा।

व्यापार चिह्न  अधिनियम, 1999 की धारा 21(4)

विरोध नोटिस भेजने के समय और ऐसे नोटिस का जवाब देने के समय भी साक्ष्य शामिल किया जाना चाहिए। इस उप-धारा में कहा गया है कि विरोधी पक्ष और आवेदकों द्वारा प्रदान किए गए सभी साक्ष्य रजिस्ट्रार द्वारा निर्धारित तरीके से दोनों पक्षों को दिए गए समय अवधि के भीतर दायर किए जाने हैं। सुनवाई का अवसर भी रजिस्ट्रार द्वारा दोनों पक्षों को आवश्यक होने पर प्रदान किया जाएगा।

व्यापार चिह्न  अधिनियम, 1999 की धारा 21(5)

इस उप-धारा में कहा गया है कि रजिस्ट्रार, दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद और उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की समीक्षा करने के बाद यह तय करता है कि व्यापार चिह्न का पंजीकरण होना चाहिए या नहीं। रजिस्ट्रार यह भी तय करता है कि यदि आवश्यक हो तो कुछ सीमाएं या विशेष शर्तें होनी चाहिए या नहीं। रजिस्ट्रार व्यापार चिह्न पंजीकरण को अस्वीकार करने के अन्य कारणों पर भी विचार कर सकता है, भले ही इसका उल्लेख विरोधी द्वारा नहीं किया गया हो।

व्यापार चिह्न  अधिनियम, 1999 की धारा 21(6)

जब कोई पक्ष जो व्यापार चिह्न आवेदन का विरोध कर रहा है वह भारत में व्यवसाय नहीं कर रहा है या नहीं रह रहा है, तो इस उप-धारा मे कहा गया है कि ऐसे पक्ष को रजिस्ट्रार द्वारा सभी कानूनी लागतों को शामिल करने के लिए प्रतिभूति (सिक्योरिटी) जमा करने के लिए कहा जाना चाहिए। ऐसे मामले में जहां ऐसी प्रतिभूति का भुगतान नहीं किया गया है, रजिस्ट्रार आवेदन या विरोध को परित्यक्त मान सकता है।

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 21(7)

यह उप-धारा प्रति-कथन या विरोध के नोटिस में त्रुटि के मामले में कोई भी संशोधन या सुधार करने की अनुमति प्रदान करती है, यदि रजिस्ट्रार इसकी अनुमति देता है। 

आइए अब व्यापार चिह्न विरोध प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानें। 

व्यापार चिह्न विरोध का टूटना

व्यापार चिह्न  विरोध नोटिस

किसी भी व्यक्ति द्वारा व्यापार चिह्न  विरोध उस तारीख से चार महीने के भीतर दायर किया जा सकता है जिस दिन इस तरह के पंजीकरण आवेदन को स्वीकार किया गया है और भारत में व्यापार चिह्न पत्रिका में विज्ञापित किया गया है। पंजीकरण आवेदन का विरोध तब किया जाता है जब किसी पक्ष को लगता है कि कोई समान या विशिष्ट रूप से समान व्यापार चिह्न  पहले से ही बाजार में मौजूद है या पंजीकरण की प्रक्रिया में है। 

विरोध का नोटिस

विरोध का नोटिस फॉर्म टीएम-ओ दाखिल करके दिया जाना है, फॉर्म को भौतिक रूप से या ऑनलाइन दायर किया जा सकता है। फॉर्म टीएम-ओ फॉर्म का शुल्क निम्नलिखित है:

शुल्क दाखिल करने का प्रकार
₹3000 भौतिक 
₹27000 ऑनलाइन

नियमों के नियम 43 में वे सभी प्रमुख आवश्यकताएं बताई गई हैं, जिन्हें टीएम-ओ फॉर्म में शामिल किया जाना है। फॉर्म में निम्नलिखित शामिल होंगा:

  • जिस आवेदन का विरोध किया जा रहा है उसका विवरण
    • आवेदन की संख्या
    • जिन वस्तुओं या सेवाओं का विरोध किया जा रहा है
    • आवेदक के नाम  
    • चिह्न या अधिकार के सभी विवरण जिनका वर्तमान ट्रेड चिह्न पंजीकरण के साथ उल्लंघन किया जा रहा है। 
  • यदि किसी व्यापार चिह्न  के पंजीकरण का विरोध पहले से मौजूद व्यापार चिह्न  के आधार पर किया जा रहा है तो उपयोग और प्रभाव का संकेत। 
  • पहले वाले व्यापार चिह्न के दायर होने की तिथि और आवेदन संख्या
  • यदि विरोध प्रसिद्ध व्यापार चिह्न  पर आधारित है, तो उस प्रसिद्ध व्यापार चिह्न  का विवरण।
  • विरोधी पक्ष का विवरण, जैसे मालिक का नाम और पता, व्यापार चिह्न  के स्वामित्व का प्रमाण, व्यवसाय के मुख्य स्थान का पता।
  • विरोध के आधार जिन पर विरोध दाखिल किया जाता है। 

विरोध के नोटिस पर अधिकृत एजेंट द्वारा हस्ताक्षर किए जाने हैं। व्यापार चिह्न के विभिन्न वर्गों के लिए एक ही विरोध नोटिस दायर किया जा सकता है और नियम 42 के तहत इसके लिए शुल्क का भुगतान प्रत्येक वर्ग के लिए अलग से किया जा सकता है। विरोध का नोटिस रजिस्ट्रार कार्यालय में जमा करने के बाद उसकी औपचारिकता जांच की जाती है, जिसके बाद विरोध के नोटिस की एक प्रति आवेदक को भेजी जाती है। 

प्रति-कथन की सूचना

आवेदक को, विरोध का नोटिस प्राप्त होने पर, नोटिस प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर एक उत्तर दाखिल करना होता है, जिसे प्रति-कथन कहा जाता है, जैसा कि नियमों के नियम 44 मे कहा गया है। प्रति कथन का सत्यापन (वेरिफिकेशन) नियम 43 के अनुसार किया जाना है। प्रति कथन प्रस्तुत करके विरोध का नोटिस का उत्तर एक माह तक बढ़ाया जा सकता है।

व्यापार चिह्न  विरोध के अंतर्गत साक्ष्य

विपक्ष के समर्थन में सबूत

नियम 45 के अनुसार, विरोध के समर्थन में दायर किए जाने वाले साक्ष्य के बारे में बात की गई है। प्रति कथन की तामील (सर्विस) के दो महीने के भीतर विरोधी पक्ष को एक हलफनामे का उपयोग करके साक्ष्य दाखिल करना होगा। विरोधी पक्ष विरोध नोटिस के साथ रजिस्ट्रार को प्रस्तुत करके आवेदक को भी लिखकर भेजकर कुछ साक्ष्य संलग्न कर सकता है। इन साक्ष्यों में बिक्री चालान, विज्ञापन सामग्री, उत्पादों की पैकेजिंग आदि शामिल हो सकते हैं जो व्यापार चिह्न के उपयोग को दर्शाते हैं। विरोधी पक्ष यह भी लिखित रूप में बता सकता है कि वह विरोध के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करता है, बल्कि केवल उन तथ्यों पर निर्भर करता है जो विरोध नोटिस में शामिल हैं।

विरोधी पक्ष आवेदन के साथ दायर किए गए साक्ष्य की प्रतियां भी भेज सकता है और रजिस्ट्रार को इसकी सूचना दे सकता है। यदि विरोधी पक्ष द्वारा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाता है, तो विरोध को त्याग दिया गया माना जा सकता है।

आवेदन के समर्थन में साक्ष्य

नियम 46 आवेदन के समर्थन में साक्ष्यों के बारे में बात करता है। नियम 45 के तहत विरोध के समर्थन में साक्ष्य भेजने के बाद आवेदक को आवेदन के समर्थन में साक्ष्य भेजना होगा। साक्ष्य में ऐसे दस्तावेज़ शामिल हो सकते हैं जो चिह्नों के बीच विशिष्टता दिखाते हैं, यदि लागू हो तो पूर्व उपयोग का प्रमाण आदि, जो दिखाते हैं कि कैसे व्यापार चिह्न पंजीकृत व्यापार चिह्न का विरोध नहीं कर रहा है। इस चरण में, आवेदक के पास इस अधिकार को त्यागने और अकेले प्रति-कथन प्रस्तुत करने का विकल्प चुनने का विकल्प होता है। 

विरोधी पक्ष द्वारा उत्तर में साक्ष्य

आवेदन के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद, विरोधी पक्ष को नियम 47 के तहत फिर से विरोधी पक्ष के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का मौका दिया जाता है। पक्षों द्वारा बार-बार साक्ष्य प्रस्तुत करने के चक्र को समाप्त करने के लिए विरोध की प्रक्रिया पर निष्कर्ष निकालने के लिए यह नियम जोड़ा गया है।  

नियम 48 में यह भी कहा गया है कि आगे कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाएगा, लेकिन यदि रजिस्ट्रार उचित समझे तो सुनवाई के समय इसकी अनुमति दी जा सकती है। 

मामले की सुनवाई

आवेदक और विरोधी पक्ष दोनों द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत किये जाने के बाद मामले की सुनवाई होती है। व्यापार चिह्न  सुनवाई व्यापार चिह्न रजिस्ट्रार द्वारा निर्धारित की जाती है और दोनों पक्षों को सूचित किया जाता है (नियम 50)। यदि कोई भी पक्ष किन्हीं कारणों से सुनवाई में शामिल नहीं हो पाता है तो वह जिस तारीख को सुनवाई होनी है उससे कम से कम तीन दिन पहले सुनवाई स्थगित करने के लिए फॉर्म टीएम-एम प्रस्तुत कर सकता है। 

सुनवाई अधिकतम कम से कम दो बार के लिए स्थगित की जा सकती है, जो तीस दिन से अधिक नहीं होगी। रजिस्ट्रार दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देने के बाद यह निर्णय लेता है कि व्यापार चिह्न  पंजीकृत किया जाएगा या नहीं।

विरोध प्रक्रिया की समयरेखा

चरण समय
विरोध का नोटिस दाखिल करना जिस तारीख को व्यापार चिह्न  आवेदन स्वीकार किया जाता है और व्यापार चिह्न  पत्रिका में विज्ञापित किया जाता है, उस तारीख से 4 महीने के भीतर उदाहरण के लिए: व्यापार चिह्न  आवेदन 5-10-2024 को विज्ञापित किया गया था, तो विरोध दायर करने की समय अवधि की गणना 5-10-2024 – 5-02-2025 तक 4 महीने की जाएगी।
प्रति-कथन का नोटिस दाखिल करना विरोध का वास्तविक नोटिस प्राप्त होने की तारीख से 2 महीने के भीतर प्रति कथन दाखिल किया जाना है। 
साक्ष्य प्रस्तुत करना विरोध और प्रति कथन का नोटिस देने के दो महीने के भीतर, जहां एक महीने का विस्तार प्रदान किया जाता है।
सुनवाई रजिस्ट्रार के अनुसार, इसे दो बार के लिए स्थगित किया जा सकता है लेकिन तीस दिनों से अधिक के लिए नहीं।

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 21 पर ऐतिहासिक मामले

यह मामला अधिनियम की धारा 21(2) की व्याख्या और व्यापार चिह्न की कार्यवाही में विरोध नोटिस की प्राप्ति पर धारा के आवेदन से संबंधित है।

राम्या एस मूर्ति बनाम व्यापार चिह्न  रजिस्ट्रार (2023)

मामले के तथ्य

यह महत्वपूर्ण निर्णय मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा अगस्त 2023 में दिया गया था। राम्या एस. मूर्ति ने व्यापार चिह्न के पंजीकरण के लिए 2 आवेदन दायर किए थे, दोनों अलग-अलग व्यापार चिह्न वर्गों के तहत थे। परीक्षक द्वारा आवेदनों को स्वीकार कर लिया गया था, और उन्हें व्यापार चिह्न पत्रिका में विज्ञापित किया गया था। निरमा लिमिटेड ने इन 2 आवेदनों के खिलाफ किसी भी व्यापार चिह्न  आवेदन का विरोध करने के लिए प्रदान की गई चार महीने की अवधि में विरोध दर्ज कराया।

इस मामले में मुख्य विवाद याचिकाकर्ता को विरोध के नोटिस के वितरण के संबंध में था। व्यापार चिह्न  रजिस्ट्री द्वारा जनवरी में याचिकाकर्ता को इलेक्ट्रॉनिक रूप से नोटिस भेजा गया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसे ऐसा कोई नोटिस नहीं मिला। इससे याचिकाकर्ता विरोधी के नोटिस पर कोई प्रतिकथन दाखिल नहीं कर सका। इस तरह का प्रतिवाद दाखिल करने की समय अवधि दो महीने है, जैसा कि अधिनियम की धारा 21(2) में उल्लिखित है। इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता/आवेदक के खिलाफ आदेश लागू हो गए।

उठाए गये मुद्दे

इस मामले का मुख्य मुद्दा अधिनियम की धारा 21(2) की व्याख्या है, और यह कि क्या प्रतिकथन दाखिल करने की दो महीने की समय सीमा विरोध के नोटिस की वास्तविक प्राप्ति की तारीख से गिनी जानी चाहिए या ऐसे विरोध के नोटिस की तारीख से।

विश्लेषण और निर्णय

इस मामले में मुख्य सवाल यह था कि प्रतिवाद दाखिल करने के लिए दिए गए 2 महीने की समय सीमा की गणना कब से शुरू की जाए। धारा 21(2) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आवेदक द्वारा विरोध नोटिस की प्राप्ति से दो महीने के भीतर आवेदक द्वारा प्रतिवाद दाखिल किया जाना है। नियम 18(2) ईमेल द्वारा तमिल के बारे में बात करता है और ईमेल भेजने के समय तमिल को मान्य मानता है। यह बताया गया था कि यदि व्याख्या शाब्दिक अर्थ में की जाती है, तो धारा 21(2) के भीतर भाषा में विरोधाभास उत्पन्न हो सकता है और आवेदक के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

अदालत द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रतिवाद दाखिल करने की समय सीमा उस तारीख से शुरू होगी जिस दिन वास्तविक ईमेल प्राप्त होता है। सफल अंतरण (ट्रांसमिशन) को दर्शाने वाले दस्तावेज याचिकाकर्ता द्वारा प्राप्ति के साक्ष्य के रूप में कार्य नहीं करते हैं।

मद्रास उच्च न्यायालय ने पहले दिए गए आदेशों को रद्द कर दिया और दोनों व्यापार चिह्नों के आवेदकों को रजिस्ट्रार द्वारा पुनर्विचार करने के लिए वापस भेजने और बहाल करने की सलाह दी गई। पूरे मामले का पुनर्मूल्यांकन रजिस्ट्रार द्वारा किया जाना था और दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाना था।

मामला उस समय अवधि पर स्पष्टीकरण प्रदान करता है जिसके दौरान आवेदकों द्वारा विरोध का नोटिस प्राप्त होने पर प्रति कथन दायर किया जाना चाहिए और उस तारीख से, ऐसी दो महीने की अवधि शुरू हो जाएगी। यह व्याख्या प्राकृतिक न्याय सिद्धांत को संरेखित करने के साथ-साथ व्यापार चिह्न आवेदकों के अधिकारों की रक्षा करने में मदद करती है। 

परवेश कम्बोज बनाम पेटेंट, डिज़ाइन और व्यापार चिह्न महानियंत्रक (2022)

मामले के तथ्य

परवेश कम्बोज बनाम पेटेंट, डिज़ाइन और व्यापार चिह्न  महानियंत्रक (2022), के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा चार रिट याचिकाओं को एक साथ मिला दिया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालयों की कुछ रिट जारी करने की शक्ति) और अनुच्छेद 227 (उच्च न्यायालय द्वारा सभी न्यायालयों पर पर्यवेक्षण की शक्ति) के तहत दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं को अधिनियम की धारा 21 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी गई थी, जो कि उन व्यापार चिह्नों के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए है जो उन्हें लगता है कि उनके अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

याचिकाकर्ता न्यायालय द्वारा 2020 में कोविड-19 के कारण दी गई सीमा की अवधि के विस्तार का उपयोग करके व्यापार चिह्न के विरोध के लिए दायर करना चाहते थे। हालांकि, इसकी अनुमति नहीं दी गई। याचिकाकर्ताओं का मानना ​​था कि पेटेंट, डिज़ाइन और व्यापार चिह्न के महानियंत्रक (सीजीपीडीटीएम) ने मनमाने और भेदभावपूर्ण तरीके से काम किया। विरोध दर्ज न करने का कारण यह था कि विरोध सीमा अवधि से परे दायर किए जाने वाले थे और जिन व्यापार चिह्नों का याचिकाकर्ता विरोध करना चाहता था, उन्हें पहले ही पंजीकरण प्रदान किया जा चुका था और उनका पंजीकरण प्रमाणपत्र भी उन्हें दिया जा चुका था।

सीजीपीडीटीएम के इस तरह के फैसले से व्यथित होकर, याचिकाकर्ताओं ने उपरोक्त रिट याचिकाएं दायर करके दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया।

उठाए गये मुद्दे

मामले के मुख्य मुद्दे ये हैं:

  1. क्या सीजीपीडीटीएम को यह पता होने के बावजूद कि याचिकाकर्ताओं का सीमा अवधि से परे इसका विरोध करने का इरादा मनमाना था, इसके बावजूद प्रमाण पत्र जारी करने के साथ-साथ पंजीकरण प्रदान करना मनमाना था?
  2. क्या याचिकाकर्ता पंजीकरण प्रक्रिया पूरी होने और पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी होने के बाद अधिनियम की धारा 21 के तहत विरोध दर्ज कर सकते हैं?

विश्लेषण और निर्णय

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि व्यापार चिह्न कार्यालय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को केवल कुछ विरोधियों पर लागू करने का विकल्प चुनकर मनमाना व्यवहार कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई चार महीने की मोहलत के बावजूद याचिकाकर्ता अपना विरोध दर्ज नहीं करा पाए।  रजिस्ट्री ने याचिकाकर्ताओं के विरोध पर विचार नहीं किया और मालिकों को प्रमाण पत्र जारी कर दिया। बाद में अदालत को सूचित किया गया कि इस दौरान चार लाख से अधिक पंजीकरण की अनुमति दी गई, जिससे चिंता बढ़ गई। 

सीजीपीडीटीएम के अधिकारियों ने बाद में अदालत को सूचित किया कि महामारी के समय कई विरोध दायर किए गए और स्वीकार किए गए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निराशा व्यक्त की क्योंकि उन्हें इसके बारे में पहले सूचित नहीं किया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक जानबूझकर उठाया गया कदम है जिसने आवेदक के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है। 

अदालत ने माना कि सीजीपीडीटीएम की कार्रवाई अस्वीकार्य थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को ऑफलाइन या ऑनलाइन विरोध दर्ज करने की अनुमति दी, जबकि रजिस्ट्री द्वारा जो पंजीकरण दिया गया था, उसे अदालत ने पूरी प्रक्रिया समाप्त होने तक निलंबित कर दिया था। सीजीपीडीटीएम प्रत्येक अधिकारियों पर ₹ 100,000 का जुर्माना लगाया गया और इसे महामारी के लिए राहत कोष (फंड) में जमा करने का आदेश दिया गया।

उपरोक्त मामले से, हम समझ सकते हैं कि आवेदकों को अपने अधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यापार चिह्न का विरोध करने का अधिकार है। लेकिन विरोध दर्ज कराने में रुचि रखने वाले पक्षों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध नोटिस व्यापार चिह्न पत्रिका में स्वीकार किए जाने और विज्ञापित होने की तारीख से चार महीने की अवधि के भीतर दायर किया जाए।

निष्कर्ष

पूरा लेख पढ़ने के बाद हम समझ सकते हैं कि व्यापार चिह्न  विरोध की पूरी प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण है। व्यापार चिह्न  विरोध तब दायर किया जाता है जब किसी तीसरे पक्ष को लगता है कि एक समान या एकरूपी  चिह्न पहले से ही पंजीकृत है या उस चिह्न के अधिकारों का उल्लंघन करता है जो वर्तमान में पंजीकरण प्रक्रिया में है। व्यापार चिह्न  पंजीकरण तभी पूरा होता है जब रजिस्ट्रार उसे मंजूरी दे देता है। यदि रजिस्ट्रार विरोधी पक्ष का पक्ष लेता है, तो व्यापार चिह्न  पंजीकरण से इनकार भी किया जा सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि व्यापार चिह्न  पंजीकरण छूट न जाए, विरोध प्रक्रिया के लिए समय-सीमा के साथ निर्धारित नियमों का पालन करना बहुत महत्वपूर्ण है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

भारत में व्यापार चिह्न विरोध कौन दायर कर सकता है?

अधिनियम की धारा 21 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति भारत में व्यापार चिह्न  विरोध दर्ज करा सकता है। वह व्यक्ति उसी क्षेत्र में काम करने वाला प्रतिस्पर्धी, उपभोक्ता या कोई अन्य तीसरा पक्ष हो सकता है। व्यापार चिह्न  विरोध का विरोध करने के लिए व्यक्ति को व्यापार चिह्न  में कोई व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित रखने की आवश्यकता नहीं है।

आवेदक को विरोध का नोटिस भेजे जाने के बाद अगला कदम क्या है?

तीसरे पक्ष द्वारा विरोध का नोटिस भेजने के बाद, आवेदक को दो महीने के भीतर प्रति कथन के माध्यम से विरोधी आवेदन का जवाब दाखिल करना होता है। 

यदि आवेदक विरोध के नोटिस का उत्तर नहीं देता है तो क्या होगा?

यदि व्यापार चिह्न आवेदक निर्धारित समय (2 महीने) के भीतर विरोध के नोटिस का जवाब देने में विफल रहता है तो रजिस्ट्री द्वारा विरोध को छोड़ दिया गया माना जाएगा।

किसी तीसरे पक्ष को व्यापार चिह्न  के लिए विरोध कहाँ दर्ज कराना चाहिए?

व्यापार चिह्न का विरोध व्यापार चिह्न रजिस्ट्री में दायर किया जाना है, जहां व्यापार चिह्न  के लिए आवेदन दायर किया गया था। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि विरोध सही अधिकार क्षेत्र में दायर किया गया है।  

व्यापार चिह्न  विरोध का समाधान कैसे करें?

भारत में व्यापार चिह्न विरोध को हल करने के लिए, आवेदक सुनवाई के बाद सभी सबूतों और दस्तावेजों के साथ प्रति कथन जमा कर सकता है। ऐसे अंकों को खारिज किया जाए या दर्ज किया जाए, इस पर अंतिम निर्णय रजिस्ट्रार द्वारा तैयार मामले के आधार पर लिया जाएगा। 

संदर्भ

 

पेटेंट योग्य और गैर पेटेंट योग्य आविष्कार

यह लेख Monika Verma द्वारा लिखा गया था और आगे Jaanvi Jolly द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया था। यह लेख पेटेंट कानून के संदर्भ में ‘आविष्कार’ की अवधारणा को समझाता है, जिसमें इसकी परिभाषा और प्रासंगिक मामलो के साथ पेटेंट करने के लिए योग्यता के लिए मानदंड शामिल हैं। इसमें यह भी शामिल है कि गैर पेटेंट योग्य विषय वस्तु क्या है और यह विषय वस्तु पर अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का संक्षिप्त अवलोकन प्रदान करता है। यह आगे दवा उद्योग में पेटेंट और ए.आई. की पेटेंट करने के लिए योग्यता  के संबंध में स्थिति की व्याख्या करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

पेटेंट कानून बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) कानूनों के क्षेत्र में एक विशेष क्षेत्र है। बौद्धिक संपदा मानव मन और रचनात्मक बुद्धि से उत्पन्न होती है। इसलिए, जो व्यक्ति अपने रचनात्मक कौशल का उपयोग करते हैं, उन्हें अपने आविष्कार के संरक्षण के रूप में लाभ का कुछ रूप दिया जाना चाहिए। यह संरक्षण पेटेंट के रूप में दिया जा सकता है। एक पेटेंट एक आविष्कार के लिए दिया गया एक विशेष अधिकार है।

जब पेटेंट की बात आती है, तो सभी आविष्कार सुरक्षा के लिए योग्य नहीं होते हैं। यह समझना कि किस आविष्कार को पेटेंट कराया जा सकता है और किसे नहीं, आविष्कारकों और व्यवसायों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।

पेटेंट योग्य आविष्कार वे हैं जो पेटेंट कानूनों द्वारा निर्धारित विशिष्ट मानदंडों को पूरा करते हैं। आम तौर पर, एक आविष्कार पेटेंट योग्य होने के लिए, यह नहीं, गैर-स्पष्ट और उपयोगी होना चाहिए। उदाहरणों में पदार्थ के नए उपकरण, विधियां या रचनाएं शामिल हैं जो एक स्पष्ट आविष्कारशील कदम प्रदर्शित करती हैं और एक ठोस लाभ प्रदान करती हैं।

दूसरी ओर, गैर पेटेंट योग्य आविष्कार, पेटेंट संरक्षण के दायरे से बाहर हैं। इनमें अक्सर अमूर्त विचार, प्राकृतिक घटनाएं और प्रकृति के नियम शामिल होते हैं। जिन आविष्कारों में नवीनता की कमी मानी जाती है या जिन्हें मौजूदा ज्ञान के प्रकाश में स्पष्ट माना जाता है, वे भी पेटेंट योग्य नहीं हैं।

पेटेंट प्रणाली को प्रभावी ढंग से समझने और यह सुनिश्चित करने के लिए इन भेदों को समझना आवश्यक है कि बौद्धिक संपदा ठीक से संरक्षित है। पेटेंट के लिए योग्यता के ये आधार अलग-अलग देशों में अलग-अलग हो सकते हैं क्योंकि ये क्षेत्रीय कानूनों द्वारा शासित होते हैं, इस पहलू पर अगले खंड में चर्चा की गई है।

पेटेंट कानूनों कि क्षेत्रीय प्रयोज्यता (टेरिटोरियल एप्लिकेबिल्टी) 

जब हम पेटेंट कानूनों के बारे में बात करते हैं, तो वे क्षेत्रीय होते हैं, अर्थात वे उस देश के विशिष्ट कानूनों द्वारा शासित होते हैं जहां वे पंजीकृत होते हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार राष्ट्रीय कानूनों द्वारा शासित होते हैं, हालांकि, जो देश विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के सदस्य हैं, उन्हें बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार से संबंधित पहलुओं  पर समझौते (ट्रिप्स) के अनुरूप अपने राष्ट्रीय कानूनों को तैयार करने की आवश्यकता है। यहां यह उल्लेख करना उचित है कि विश्व व्यापार संगठन एक ऐसा संगठन है जो वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों की देखरेख और सुविधा प्रदान करता है और सदस्य देशों के बीच विवादों को हल करता है। ट्रिप्स समझौता विश्व व्यापार संगठन द्वारा प्रशासित एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर बौद्धिक संपदा (आई.पी.) अधिकारों के संरक्षण और प्रवर्तन के लिए व्यापक मानक स्थापित करना है।

ट्रिप्स समझौते के अनुच्छेद 7 के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य को निर्धारित किया गया है।

  1. यह तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना चाहता है।
  2. यह प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजिकल) ज्ञान के उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं के पारस्परिक लाभ के लिए प्रौद्योगिकी को स्थानांतरित और प्रसारित करना चाहता है। यह स्थांतरण इस तरह से होने का इरादा है जो सामाजिक और आर्थिक कल्याण के पक्ष में है और इसमें शामिल पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को संतुलित करता है।

ट्रिप्स समझौते द्वारा स्थापित एक व्यापक पेटेंट ढांचे के निर्माण के बावजूद, हम पेटेंट के लिए योग्यता और गैर पेटेंट के लिए योग्यता के आधार पर कुछ देश विशिष्ट भेद पा सकते हैं।

इस लेख में पेटेंट योग्य और गैर पेटेंट योग्य आविष्कारों के पहलू पर भारत और पेटेंट अधिनियम 1970 (इसके बाद इसे अधिनियम 1970 के रूप में संदर्भित किया गया है) के संदर्भ में चर्चा की गई है।

यह अधिनियम, 1970 दो समितियों, बख्शी टेकचंद समिति और न्यायमूर्ति राजगोपाल अयंगर समिति के सुझावों का प्रत्यक्ष परिणाम था। समितियों की विभिन्न सिफारिशों में खाद्य और दवा से संबंधित पेटेंट, अनिवार्य लाइसेंसिंग और संबंधित कार्य आवश्यकताएं शामिल थीं जो विशेष रूप से भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर केंद्रित थीं। दवा उद्योग के लिए पेटेंट कानून का सबसे उल्लेखनीय लाभ इसके अनन्य अधिकारों का प्रावधान था, जिसने दवा विकास में नवाचार और निवेश का महत्वपूर्ण समर्थन किया, जिसके कारण भारतीय कंपनियों ने विश्व स्तर पर दवाओं का निर्यात करना शुरू किया।

पेटेंट योग्य और गैर पेटेंट योग्य आविष्कारों के बारे में समझ इकट्ठा करने के लिए, हमें सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि ‘पेटेंट’ से हमारा क्या मतलब है।

पेटेंट का अर्थ

पेटेंट एक प्रकार की बौद्धिक संपदा है, जिसे एक विशेष अधिकार के रूप में समझा जा सकता है जो सरकार द्वारा किसी उत्पाद या प्रक्रिया के निर्माता को दिया जाता है। उत्पाद या प्रक्रिया प्रकृति में नवीन होना चाहिए, एक समस्या का एक नया तकनीकी समाधान होना चाहिए।

डब्ल्यूआई.पी.ओ (विश्व बौद्धिक संपदा संगठन) के अनुसार, “एक पेटेंट एक आविष्कार के लिए दिया गया एक विशेष अधिकार है। पेटेंट आविष्कारकों को उनके आविष्कारों की कानूनी सुरक्षा प्रदान करके लाभान्वित करते हैं।”

कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार, एक पेटेंट “किसी विशेष संख्या में वर्षों के लिए आविष्कार करने या बेचने का आधिकारिक कानूनी अधिकार है।”

अफाली दवा लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (1989) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने पेटेंट को कुछ विशेषाधिकार, संपत्ति या अधिकार के अनुदान के रूप में परिभाषित किया, जो सरकार या किसी देश के संप्रभु द्वारा एक या अधिक व्यक्तियों को दिया गया था।

एक पेटेंट एक आविष्कार को निजी संपत्ति के रूप में स्थापित करके उसकी रक्षा करने का लाभ प्रदान करता है, जिससे पेटेंट धारक को इसके उपयोग और व्यावसायीकरण पर विशेष नियंत्रण मिलता है। पेटेंट मालिक को दूसरों को उनके आविष्कार की नकल करने या उपयोग करने से रोकने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है। मालिक को न केवल आविष्कार का उपयोग करने का अधिकार है, बल्कि अन्य सभी को इसका उपयोग करने या व्यावसायिक रूप से शोषण करने से रोकने का भी अधिकार है।

एक पेटेंट अनिवार्य रूप से स्वामित्व के लिए एक विशेष अधिकार का अनुदान है, हालांकि, कुछ अतिरिक्त लाभ हैं जो पेटेंट के अनुदान के बाद पेटेंटकर्ता के लिए उपलब्ध हैं जिन पर आगे चर्चा की गई है।

पेटेंट के अधिकार और लाभ

अधिनियम, 1970 की धारा 48 पेटेंटकर्ता के अधिकारों का प्रावधान करती है जो पेटेंट प्रदान किए जाने के बाद उत्पन्न होते हैं। इनमें से कुछ अधिकार और लाभ इस प्रकार दिए गए हैं:

  1. किसी उत्पाद या प्रक्रिया पेटेंट के मामले में, पेटेंटकर्ता को किसी अन्य व्यक्ति को पेटेंटकर्ता की सहमति के बिना आविष्कार का उपयोग करने, बनाने, व्यावसायिक रूप से शोषण करने या आयात करने से रोकने का एक विशेष अधिकार मिलता है।
  2. पेटेंटकर्ता या उनकी कंपनी को उनकी प्रतिस्पर्धा पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है। जब भी वे अपने व्यवसाय में प्रौद्योगिकी के रूप में पेटेंट आविष्कार का उपयोग करने में सक्षम होते हैं, तो यह निर्विवाद रूप से उनकी बाजार शक्ति में सुधार करेगा और उन्हें दूसरों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करेगा, जिससे उन्हें अधिक लाभ कमाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, जब भी बाजार में कोई और अपनी पेटेंट तकनीक का उपयोग करता है, तो उन्हें उसी के लिए स्वत्व (रॉयल्टी) शुल्क मिलेगा।
  3. एक पेटेंट पेटेंटकर्ता को अपने आविष्कार के संदर्भ में सुरक्षा प्रदान करता है जब वह अपने आविष्कार को जनता के सामने प्रकट करता है। यह उसे एक प्रदर्शनी या एक व्यापार शो में जाने और दूसरों द्वारा कॉपी किए जाने के डर के बिना अपने आविष्कार को प्रदर्शित करने में सक्षम बनाता है। इससे या तो प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी या समाप्त हो जाएगी और बिक्री में वृद्धि होगी।
  4. पेटेंट को लाइसेंस देकर या समनुदेशित (ऐसाइन) करके राजस्व (रेवेन्यू) का एक नया स्रोत जोड़ा जा सकता है। इसलिए, जब कोई व्यवसाय या व्यक्ति अपने आविष्कार के लिए पेटेंट प्राप्त करने में सक्षम होता है, तो उन्हें अपने आविष्कार को कीमत के लिए दूसरों को लाइसेंस देने या समनुदेशित करने की भी अनुमति होती है। यह एक तरह से उन्हें एकाधिकार प्रदान करता है।
  5. यह व्यवसायों या व्यक्तियों को निवेशकों को आकर्षित करके धन जुटाने में भी मदद करता है। इसके अलावा, पेटेंट भी खरीदा और बेचा या लाइसेंस प्राप्त किया जा सकता है। वे बैंक ऋणों के लिए संपार्श्विक प्रतिभूति (कोलेटरल सिक्योरिटी) के रूप में भी काम कर सकते हैं।
  6. प्रतियोगी के साथ लाइसेंसिंग वार्ता के दौरान एक पेटेंट का उपयोग सौदेबाजी चिप के रूप में भी किया जा सकता है। क्रॉस-लाइसेंसिंग की अवधारणा के तहत, कंपनियां दूसरे के बदले में पेटेंट लाइसेंस के अधिकारों का आदान-प्रदान करती हैं, इससे उन्हें भारी स्वतव शुल्क का भुगतान करने से बचाया जाता है। यह बातचीत और सहयोग में मदद करता है और उस पूंजी को कम करता है जो नई तकनीक हासिल करने के लिए आवश्यक होती।

पेटेंट की विषय वस्तु एक आविष्कार है, इसलिए यह समझने से पहले कि कौन से आविष्कार पेटेंट योग्य हैं, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ‘आविष्कार’ का गठन क्या है।

आविष्कार

अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(j) ‘आविष्कार’ शब्द को परिभाषित करती है। परिभाषा को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस बात के दायरे को रेखांकित करता है कि भारत में क्या पेटेंट कराया जा सकता है और क्या नहीं। इस धारा के अनुसार, एक आविष्कार का अर्थ है एक नया उत्पाद या प्रक्रिया जिसमें एक आविष्कारशील कदम शामिल है और औद्योगिक अनुप्रयोग में सक्षम है। आविष्कार इस संदर्भ में पूर्ण नवीनता का होना चाहिए कि इसका न तो उपयोग किया गया है और न ही दुनिया के किसी भी हिस्से में प्रकाशित किया गया है।

पूर्वोक्त प्रावधान के पढ़ने के आधार पर, पेटेंट के अनुदान के लिए निम्नलिखित तत्व आवश्यक हैं, जिन्हें नीचे समझाया गया है:

  1. एक नया उत्पाद या प्रक्रिया: इस पहलू को नवीनता पहलू या मानदंड भी कहा जाता है। एक सफल पेटेंट पंजीकरण की तलाश करने के लिए किसी उत्पाद या प्रक्रिया के लिए, यह कुछ नया होना चाहिए, दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी रूप में सार्वजनिक रूप से उपयोग या खुलासा नहीं किया जाना चाहिए।
  2. एक आविष्कारशील कदम को शामिल करना: अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(ja) ‘आविष्कारशील कदम’ की परिभाषा प्रदान करती है। इसमें मौजूदा तकनीकी ज्ञान में प्रगति शामिल है या इसका आर्थिक महत्व है, या दोनों। इन पहलुओं के साथ-साथ, यह एक ऐसा कदम भी होना चाहिए जो उस व्यक्ति के सामान्य ज्ञान के भीतर नहीं है जो विशेष उद्योग में शामिल है। इस पहलू को गैर-स्पष्ट पहलू भी कहा जाता है। किसी उत्पाद या प्रक्रिया को पेटेंट कराने के लिए, यह कुछ नया होना चाहिए और उस क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के ज्ञान के भीतर नहीं होना चाहिए जिसके लिए पेटेंट मांगा गया है। आविष्कार आविष्कारक की रचनात्मकता का परिणाम होना चाहिए।
  3. औद्योगिक अनुप्रयोग में सक्षम: अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(ac) ‘औद्योगिक अनुप्रयोग में सक्षम’ शब्द को एक ऐसे आविष्कार के रूप में परिभाषित करती है जिसे किसी उद्योग में बनाया या उपयोग किया जा सकता है। यह पहलू व्यावहारिक उपयोगिता पहलू है। किसी उत्पाद या प्रक्रिया को पेटेंट कराने के लिए, इसकी कुछ व्यावहारिक उपयोगिता होनी चाहिए और केवल एक सिद्धांत नहीं होना चाहिए, व्यावहारिकता में लगने में असमर्थ होना चाहिए।

दूसरी ओर, अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(l) ‘नए आविष्कार’ शब्द को परिभाषित करती है। इसके दो तत्व हैं:

  1. कोई आविष्कार या प्रौद्योगिकी जिसका किसी प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान या अपेक्षा नहीं की गई है। दूसरे शब्दों में, पेटेंट की विषय वस्तु सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं होनी चाहिए या कला की स्थिति का हिस्सा नहीं होनी चाहिए।
  2. कोई भी आविष्कार या तकनीक जिसका उपयोग दुनिया में कहीं भी पेटेंट आवेदन दाखिल करने से पहले नहीं किया गया है।

पेटेंट करने के लिए योग्यता और आविष्कार

पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत, आविष्कार और पेटेंट करने के लिए योग्यता  की अवधारणाओं को विभेदित किया गया है, वे एक आविष्कार के अलग-अलग पहलुओं से निपटते हैं। इसलिए, पेटेंट के अनुदान के लिए, यह आवश्यक है कि आविष्कार ‘आविष्कार और पेटेंट के लिए योग्यता’ के दोहरे परीक्षण को पूरा करता है।

एक नवाचार जिसे आम तौर पर एक आविष्कार माना जा सकता है, अधिनियम के तहत प्रदान की गई परिभाषा के अनुसार एक आविष्कार के रूप में योग्य नहीं हो सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई चीज अधिनियम में दी गई परिभाषा के अनुसार आविष्कार होने की शर्त को पूरा करती भी है तो उसे अधिनियम, 1970 की धारा 3 के अंतर्गत यथा निर्धारित अन्य प्रतिफलों के लिए पेटेंट प्रदान करने से मना किया जा सकता है जिसमें दो प्रकार की शर्तें लागू की गई हैं।

  1. पहला कहता है कि विशेष नवाचारों को इस अधिनियम के तहत आविष्कार नहीं माना जाएगा। उदाहरण के लिए, किसी ज्ञात पदार्थ या किसी पदार्थ के नए रूप की खोज मात्र से केवल गुणों का एकत्रीकरण होता है।
  2. दूसरा प्रावधान करता है कि, हालांकि नवाचार अधिनियम के अनुसार एक आविष्कार होने की शर्तों को पूरा करता है, इसके बावजूद इसे अन्य कारणों से पेटेंट संरक्षण नहीं दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, धारा 3 की धारा 3(b) एक आविष्कार के संरक्षण को रोकती है जिसका उपयोग सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के विपरीत है।

पेटेंट कानून के तहत एक आविष्कार का गठन क्या है, इसके बारे में समझ हासिल करने के बाद, सवाल उठता है कि पेटेंट द्वारा सभी प्रकार के आविष्कारों को क्या संरक्षित किया जा सकता है, पेटेंट योग्य विषय वस्तु के इस पहलू पर आगे चर्चा की जाती है।

पेटेंट योग्य विषय वस्तु

भारत में, विधायिका ने आविष्कारों की एक निश्चित विस्तृत सूची प्रदान नहीं की है जिसे पेटेंट दिया जा सकता है। जब भी कोई विषय वस्तु धारा 2(1)(j) में प्रदान किए गए पेटेंट करने के लिए योग्यता  के तीन गुना मानदंडों को पूरा करती है, तो वह पेटेंट संरक्षण का दावा करने के योग्य हो जाती है। हालांकि, अंतिम पंजीकरण क्षेत्र के शासी कानून के प्रावधानों के अधीन है। भारत में, अधिनियम, 1970 की धारा 3 और धारा 4 में गैर पेटेंट योग्य विषय वस्तु की एक विशेष सूची प्रदान की गई है। यह अन्य सभी आविष्कारों को पेटेंट योग्य बनाता है यदि वे नवीन हैं और एक आविष्कारशील कदम और औद्योगिक अनुप्रयोग हैं।

ट्रिप्स समझौते की धारा 5 में पेटेंटों से संबंधित प्रावधान हैं और अनुच्छेद 27 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों में उत्पादों अथवा आविष्कारों की प्रक्रियाओं के लिए पेटेंट प्रदान किए जा सकते हैं। हालांकि, आविष्कार नए होने चाहिए, एक आविष्कारशील कदम शामिल होना चाहिए और औद्योगिक अनुप्रयोग में सक्षम होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण था क्योंकि यह अधिनियम, 1970 के मूल प्रावधान से प्रस्थान को चिह्नित करता था, जिसने भोजन, दवाओं या दवाओं के रूप में उपयोग किए जाने वाले या उपयोग करने में सक्षम पदार्थों के लिए पेटेंट को अस्वीकार कर दिया था। इनके लिए, केवल प्रक्रिया पेटेंट की अनुमति दी गई थी।

अधिनियम 1970 में पेटेंट किए जा सकने वाले आविष्कारों की सूची निर्धारित नहीं की गई है, तथापि, अधिनियम, 1970 की धारा 2, 3 और 4 स्पष्ट रूप से उन आविष्कारों से संबंधित हैं जिन्हें पेटेंट प्रदान नहीं किया जा सकता है।

गैर पेटेंट योग्य विषय वस्तु के पहलू पर प्रासंगिक निर्णय के साथ आगे चर्चा की गई है।

पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत गैर पेटेंट योग्य विषय वस्तु

अधिनियम, 1970 का अध्याय 2 उन आविष्कारों से संबंधित है जिन्हें अधिनियम द्वारा पेटेंट योग्य होने से रोक दिया गया है। दूसरे शब्दों में, इस अध्याय के प्रावधानों के भीतर आने वाले आविष्कारों को पेटेंट नहीं किया जा सकता है।

पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 3

अधिनियम, 1970 की धारा 3 में उन विषयों की सूची दी गई है जो अधिनियम के अनुसार आविष्कार की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते हैं और इसलिए पेटेंट संरक्षण के लिए पात्र नहीं हैं।

धारा 3 के विभिन्न प्रावधानों पर धारा की समझ बढ़ाने के लिए प्रासंगिक निर्णय के साथ विस्तार से चर्चा की गई है।

तुच्छ आविष्कार

अधिनियम, 1970 की धारा 3(a) उन आविष्कारों को पेटेंट देने से रोकती है जो तुच्छ हैं या जो एक स्पष्ट बात का दावा करना चाहते हैं या प्राकृतिक कानूनों के विपरीत हैं। एक तुच्छ आविष्कार वह है जिसका कोई उपयोग नहीं है या पेटेंट योग्य नहीं है क्योंकि यह अच्छी तरह से स्थापित कानूनों या सार्वजनिक नैतिकता के खिलाफ जाता है।

उदाहरण के लिए, एक मशीन जो बिना किसी इनपुट के ऊर्जा उत्पन्न करने का दावा करती है, वह तुच्छ होगी क्योंकि यह ऊर्जा के कानून या लोगों को टेलीपोर्ट करने का दावा करने वाली मशीन का खंडन करती है। एक सतत गति मशीन पेटेंट योग्य नहीं होगी क्योंकि यह ऊष्मागतिकी (थर्मोडायनामिक) के नियमों की अवहेलना करेगी।

सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के विपरीत आविष्कार

अधिनियम, 1970 की धारा 3(b) उन आविष्कारों को पेटेंट देने से रोकती है जिनका प्राथमिक या इच्छित उपयोग या वाणिज्यिक (कमर्शियल) शोषण सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के विपरीत हो सकता है या मनुष्यों, जानवरों या पर्यावरण के लिए गंभीर पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है। कोई भी आविष्कार जो मनुष्यों, जानवरों, पौधों या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है या उन आविष्कारों से संबंधित है जो डकैती, मुद्रा को खिलाने, नोटों को खिलाने, धोखाधड़ी आदि के उदाहरणों में सहायता करते हैं, को सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के खिलाफ आविष्कार माना जा सकता है। उदाहरण के लिए, आविष्कार जो वाणिज्यिक उद्देश्यों या आविष्कारों के लिए मानव भ्रूण (एंब्रियो) का उपयोग करते हैं जो मनुष्यों या जानवरों की आनुवंशिक (जेनेटिक) पहचान को संशोधित करते हैं या उन्हें पीड़ित करते हैं।

सिद्धांत की खोज मात्र

अधिनियम, 1970 की धारा 3(c) उन आविष्कारों के पंजीकरण पर रोक लगाती है जो वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज या एक अमूर्त सिद्धांत के निर्माण मात्र हैं। इस श्रेणी के अंतर्गत प्रमुख उदाहरणों में गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) का सिद्धांत या ऊष्मागतिकी के नियम, पाइथागोरस प्रमेय (थीओरेम), आइंस्टीन का सापेक्षता (रेलटीविटी) का सिद्धांत या न्यूटन के गति के नियम शामिल हैं। पेटेंट किए जा सकने वाले आविष्कार प्रकृति में तकनीकी होने चाहिए और तकनीकी समस्या को हल करने का इरादा होना चाहिए।

प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थों की खोज मात्र

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (c) उन आविष्कारों को पेटेंट देने से रोकती है जो प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थों की खोज मात्र हैं। प्रकृति में स्वाभाविक रूप से मौजूद किसी चीज की खोज को एक आविष्कार के बजाय एक खोज माना जाता है और इस प्रकार इसे पेटेंट द्वारा संरक्षित नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, केवल एक सूक्ष्मजीव की खोज पेटेंट संरक्षण के लिए योग्य नहीं है। हालांकि, अगर इस खोज का उपयोग एक नई वस्तु या पदार्थ बनाने के लिए एक नवीन प्रक्रिया में किया जाता है, तो यह पेटेंट संरक्षण के लिए योग्य हो सकता है।

इसमें सूर्योदय, इंद्रधनुष, बवंडर, कटाव और विद्युत चुम्बकीय दालों जैसे तत्व शामिल होंगे। इसमें पौधों या जानवरों की एक प्रजाति की खोज भी शामिल होगी। ये तत्व स्वाभाविक रूप से होते हैं और मानव बुद्धि से कोई संबंध नहीं रखते हैं, इस प्रकार, यह केवल एक खोज है और आविष्कार के रूप में दावा या पेटेंट नहीं किया जा सकता है।

एक नए रूप की खोज मात्र

अधिनियम, 1970 की धारा 3(d) पहले से ही ज्ञात पदार्थ के एक नए रूप की खोज के लिए पेटेंट के अनुदान पर रोक लगाती है जिससे पदार्थ की प्रभावकारिता में वृद्धि नहीं होती है। पहले से ही ज्ञात पदार्थ के एक नए रूप की खोज केवल एक खोज है और आविष्कार नहीं है और इस प्रकार पेटेंट योग्य नहीं है। उदाहरण के लिए, यह पता लगाना कि पेरासिटामोल में एनाल्जेसिक गुण होते हैं या एथिल अल्कोहल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि इसके एंटी-नॉकिंग गुण केवल खोज हैं और आविष्कार नहीं हैं।

यदि यह पहले से ही ज्ञात प्रायोज्यता को काफी हद तक बढ़ाता है या पदार्थ के लिए एक नया उपयोग करता है, तो इसे पेटेंट के लिए माना जा सकता है।

इस धारा के तहत प्रभावकारिता अधिनियम, 1970 की धारा 3(d) के तहत वांछित या इच्छित परिणाम उत्पन्न करने की क्षमता को संदर्भित करती है। प्रभावकारिता की जांच उत्पाद के कार्य, उपयोगिता अथवा प्रयोजन पर निर्भर करेगी, जो विचाराधीन है। एक दवा के मामले में जो किसी बीमारी को ठीक करने का दावा करता है, प्रभावकारिता का परीक्षण केवल दवा की चिकित्सीय प्रभावकारिता होगी, जिसे स्पष्टीकरण के साथ धारा 3 (d) के तहत सख्ती से आंका जाना है, एक नए पूर्व प्रासंगिक के सभी लाभकारी गुण नहीं, लेकिन केवल वे गुण जो इससे संबंधित हैं। इसकी प्रभावकारिता को रूप में परिवर्तन माना जाता है जो उस रूप में निहित गुणों में परिवर्तन करता है, स्वयं ज्ञात पदार्थ की प्रभावकारिता में वृद्धि के रूप में योग्य नहीं हो सकता है।

इसलिए, पदार्थ को मौजूदा पदार्थ के एक नए रूप का प्रतिनिधित्व करना चाहिए और अधिनियम में उल्लिखित आविष्कार के मानदंडों को पूरा करना चाहिए। इसे धारा 3 (d) के स्पष्टीकरण के तहत प्रदान किए गए उन्नत चिकित्सीय प्रभावकारिता परीक्षण को भी पूरा करना चाहिए।

इस धारा के प्रयोजनों के लिए, लवण (साल्ट), एस्टर, ईथर, बहुरूप, चयापचयों (मेटाबोलिटी), शुद्ध रूप, कण आकार, आइसोमर्स, आइसोमर्स के मिश्रण, परिसरों, संयोजनों और ज्ञात पदार्थ के अन्य व्युत्पन्न को एक ही पदार्थ माना जाएगा, जब तक कि वे प्रभावकारिता के मामले में काफी भिन्न न हों। किसी भी नई संपत्ति की खोज या किसी ज्ञात पदार्थ के उपयोग का पेटेंट तब तक पेटेंट नहीं किया जाता है जब तक कि यह मूल पदार्थ की तुलना में अधिक दक्षता का न हो, इसलिए केवल वृद्धिशील नवाचार पेटेंट के दायरे में नहीं आता है।

मोनसेंटो बनाम बोमन (2013) के मामले में, कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पेटेंट पर विस्तार से चर्चा की गई। अपीलकर्ता मोनसेंटो के पास एक विशिष्ट बीज के लिए पेटेंट था जो एक विशिष्ट शाकनाशी (हर्बिसाइड) के खिलाफ प्रतिरोध प्रदान करने के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्म थी। अपीलकर्ता ने केवल एक लाइसेंसिंग समझौते के अधीन बीज बेचे, जिसके तहत किसानों को केवल फसल बेचने की अनुमति है, लेकिन इसे फिर से लगाने की नहीं।

प्रतिवादी किसान ने एक मौसम के लिए बीज का इस्तेमाल किया और अगले बागान के लिए कुछ अन्य कम खर्चीले सोयाबीन के बीज का इस्तेमाल किया। चूंकि सस्ते बीज बड़े पैमाने पर राउंडअप-तैयार सोयाबीन के साथ लगाए गए खेतों से काटे गए थे, इसलिए कई सस्ते बीजों में राउंडअप-तैयार विशेषता थी। प्रतिवादी ने बाद में खेतों में शाकनाशी को लागू किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन पौधों में राउंडअप-तैयार विशेषता है और अगले मौसम में फिर से रोपण के लिए अपने बीज बचाते हैं। इस प्रथा की खोज अपीलकर्ता ने की और उल्लंघन के लिए मुकदमा दायर किया गया।

प्रतिवादी ने “पेटेंट समापन” की रक्षा की, जो एक पेटेंट वस्तु के खरीदार और किसी भी बाद के मालिक को वस्तु का उपयोग करने या फिर से बेचने का अधिकार देता है, लेकिन खरीदार को पेटेंट उत्पाद की नई प्रतियां बनाने की अनुमति नहीं देता है। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने बचाव को खारिज कर दिया और माना कि पेटेंट समापन ने बोमन की रक्षा नहीं की क्योंकि उन्होंने “एक नया उल्लंघन वस्तु” बनाया था। एक किसान जो पेटेंट बीज खरीदता है, पेटेंट धारक की अनुमति के बिना रोपण और कटाई के माध्यम से उन्हें पुन: पेश नहीं कर सकता है।

यदि हम भारत में इस निर्णय के अनुप्रयोग को देखते हैं, तो निर्णय बहुत अलग होगा। भारत ट्रिप्स समझौते का एक हस्ताक्षरकर्ता है और इसलिए उसे अपने राष्ट्रीय पेटेंट कानून को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाना पड़ा। हालांकि, जहां तक पौधों की किस्मों का संबंध है, समझौतों के अनुच्छेद 27.3 में प्रावधान है कि एक सदस्य राज्य या तो इसे पेटेंट योग्य विषय बना सकता है या इसे ‘सुई जेनेरिस’ (अपनी तरह का) प्रणाली के तहत संरक्षित कर सकता है। भारत ने एक सुई जेनेरिस प्रणाली का विकल्प चुना है और देश की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए पौधे की किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 का संरक्षण लागू किया है। इसलिए भारतीय कानून दो महत्वपूर्ण लचीलापन प्रदान करता है:

  1. भारत में बीज और पौधों की किस्में पेटेंट योग्य नहीं हैं।
  2. धारा 39 “किसान के अधिकार” प्रदान करती है और किसानों को बीज फिर से बोने की अनुमति देती है।

नोट: इस कानून पर लेख में बाद में चर्चा की गई है।

नोवार्टिस एजी बनाम भारत संघ (2013) के मामले में, अपीलकर्ता ने दावा किया कि उनके उत्पाद में ‘इमैटिनिब मेसाइलेट’ मुक्त आधार था, जो एक प्रसिद्ध पदार्थ था। उत्पाद इमैटिनिब मेसाइलेट के समाधान से बनाया गया था और उस समाधान से रसायन के अल्फा और बीटा के क्रिस्टलीय रूप प्राप्त किए गए थे।

इस प्रकार, उन्होंने दावा किया कि एक-चरण एकल रूप नहीं है, बल्कि एक ज्ञात पदार्थ से क्रमिक दोहरे चरण हैं और धारा 3 (d) केवल एकल-चरण की खोज पर लागू होती है। यह भी दावा किया गया था कि धारा 3 (d) में शब्द रूप के एक तुच्छ परिवर्तन पर विचार करता है और बीटा क्रिस्टलीय रूप का आविष्कार रूप का एक बड़ा परिवर्तन नहीं था।

सर्वोच्च न्यायालय ने मोनसेंटो बनाम बोमन, 2013 के मामले पर भरोसा किया, जिसमें निम्नलिखित बिंदु बताए गए थे:

  1. एक बार जो ज्ञात है उसकी धारणा तय हो जाने के बाद, यह स्पष्ट हो जाता है कि दवाओं के संदर्भ में प्रभावकारिता का मतलब चिकित्सीय प्रभावकारिता होना चाहिए।
  2. धारा 3(d) के अधिनियमन का कारण कृषि के संरक्षण और उन औषधों के संरक्षण से संबंधित चिंताएं थीं जो पेटेंटों की सदाबहार हैं।
  3. चिकित्सीय प्रभावकारिता क्या है, इसकी विस्तृत परिभाषा देना संभव नहीं है और इसे तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार देखा जाना चाहिए कि क्या ज्ञान में प्रगति से चिकित्सीय प्रभावकारिता में वृद्धि होती है
  4. स्पष्टीकरण एक अच्छा वैधानिक मार्गदर्शक है, जिसमें कहा गया है कि एक ही अणु के बदले हुए रूप को अधिनियम, 1970 की धारा 3 (d) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के रूप में नहीं माना जाता है। यह संभव है कि कार्बनिक अणुओं के परिवर्तित रूपों में गिरावट हो सकती है जैसे कि इसे अधिक घुलनशील या थर्मोडायनामिक रूप से स्थिर बनाना, और इस तरह के परिवर्तनों से तत्व की जैव उपलब्धता में सुधार हो सकता है। हालांकि, इनमें से कोई भी विशेषता मूल आविष्कार की चिकित्सीय प्रभावकारिता को प्रभावित नहीं करती है।
  5. इसके अलावा, गैर-पदार्थ की प्रभावकारिता को धारा 3 (d) के तहत अयोग्यता से बचाने के लिए बढ़ाया जाना चाहिए और यह वह गैर-पदार्थ होना चाहिए, जिसका नया रूप खोजा गया है।

इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अपील को खारिज कर दिया जाना चाहिए क्योंकि इमैटिनिब मेसाइलेट का बीटा रूप न तो एक नया पदार्थ है क्योंकि यह प्रत्याशित और स्पष्ट दोनों है और न ही यह एक पदार्थ का एक नया रूप है जो काफी बढ़ी हुई प्रभावकारिता प्रदर्शित करता है। अंत में, यह आयोजित किया गया था कि नवीनता, आविष्कारशील कदम और आवेदन के परीक्षणों के अलावा दवा पेटेंट के लिए, दावों के लिए बढ़ी हुई चिकित्सीय प्रभावकारिता का एक नया परीक्षण है जो मौजूदा दवाओं में वृद्धिशील परिवर्तनों को शामिल करता है जो नोवार्टिस की दवा भी योग्य नहीं थी।

ग्लोकेम इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड (2009) के मामले में, चर्चा किया गया मुद्दा पेटेंट के उल्लंघन और पेटेंट के अनुदान के लिए मानक से संबंधित था। अपीलकर्ता, ग्लोकेम इंडस्ट्रीज, के पास एक दवा उत्पाद के संबंध में पेटेंट था। विचाराधीन पेटेंट एक दवा का एक विशिष्ट सूत्रीकरण था।

प्रतिवादी पर उपरोक्त पेटेंट के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। तय किया जाने वाला प्रश्न यह था कि क्या प्रतिवादी का सूत्रीकरण उल्लंघन का गठन करने के लिए पर्याप्त रूप से समान था। प्रतिवादी ने अपने बचाव में अपीलकर्ता के पेटेंट की पेटेंट करने के लिए योग्यता  को चुनौती दी।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता के पेटेंट की वैधता को डिकोड करने के लिए नवीनता, आविष्कारशील कदम और औद्योगिक अनुप्रयोग के आधार पर पेटेंट की जांच की और क्या प्रतिवादी का उत्पाद पेटेंट के दायरे में आता है।

मामले में ‘तुल्यता (इक्विवेलेंट) के सिद्धांत’ की अवधारणा पर चर्चा की गई थी। शाब्दिक उल्लंघन पाया जा सकता है यदि एक अभियुक्त का उपकरण या विधि पूरी तरह से दावा किए गए दावों के दायरे में आता है, एक बार ठीक से समझा जाता है, लेकिन कोई शाब्दिक उल्लंघन नहीं है यदि कोई दावा सीमा अभियुक्त के उपकरण या विधि से अनुपस्थित है।

जब शाब्दिक उल्लंघन मौजूद नहीं होता है, तो उल्लंघन, कुछ सीमित परिस्थितियों में, फिर भी न्यायिक रूप से बनाए गए सिद्धांत के तहत पाया जा सकता है जिसे “तुल्यता का सिद्धांत” कहा जाता है।

सिद्धांत के तहत, एक उत्पाद या प्रक्रिया जो पेटेंट दावे की व्यक्त शर्तों का शाब्दिक उल्लंघन नहीं करती है, फिर भी उल्लंघन करने के लिए पाया जा सकता है यदि अभियुक्त उत्पाद या प्रक्रिया के तत्वों और पेटेंट आविष्कार के दावा किए गए तत्वों के बीच ‘तुल्यता’ है।

तुल्यता का सिद्धांत एक उल्लंघन कार्रवाई के संदर्भ में उत्पन्न होता है। यदि कोई अभियुक्त उत्पाद या प्रक्रिया सचमुच पेटेंट आविष्कार का उल्लंघन नहीं करती है, तो अभियुक्त उत्पाद या प्रक्रिया को तुल्यता के सिद्धांत के तहत उल्लंघन करने के लिए पाया जा सकता है। एक जांच के पीछे आवश्यक उद्देश्य है, क्या अभियुक्त उत्पाद या प्रक्रिया में पेटेंट आविष्कार के प्रत्येक दावा किए गए तत्व के समान या समकक्ष तत्व शामिल हैं।

तुल्यता का निर्धारण करने में, विशिष्ट पेटेंट दावे के संदर्भ में प्रत्येक तत्व द्वारा निभाई गई भूमिका का विश्लेषण इस प्रकार जांच को सूचित करेगा कि क्या एक स्थानापन्न तत्व दावा किए गए तत्व के कार्य, तरीके और परिणाम से मेल खाता है, या क्या विकल्प दावा किए गए तत्व से काफी अलग भूमिका निभाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि कैडिला के उत्पाद ने ग्लोकेम के पेटेंट का शाब्दिक या समकक्ष उल्लंघन नहीं किया। यह निष्कर्ष निकाला गया कि कैडिला द्वारा सूत्रीकरण ग्लोकेम के पेटेंट फॉर्मूलेशन से काफी अलग था, इस प्रकार, उल्लंघन का गठन नहीं किया।

केवल मिश्रण

अधिनियम, 1970 की धारा 3(e) में घोषणा की गई है कि केवल घटकों के मिश्रण से किसी पदार्थ की खोज केवल संपत्तियों के एकत्रीकरण के लिए गैर पेटेंट योग्य है। मिश्रण के संयोजन का मात्र कार्य पेटेंट योग्य नहीं है जब तक कि यह एक सहक्रियात्मक प्रभाव के मानदंडों को पूरा नहीं करता है। एक सहक्रियात्मक प्रभाव का अर्थ है कि दो या दो से अधिक पदार्थों की बातचीत व्यक्तिगत प्रभावों के योग से अधिक संयुक्त प्रभाव पैदा करती है।

केवल पुनर्व्यवस्था

अधिनियम, 1970 की धारा 3(f) में कहा गया है कि एक दूसरे से स्वतंत्र तरीके से काम करने वाले उपकरणों की केवल व्यवस्था या पुनर्व्यवस्था या दोहराव के कारण हुई खोज एक आविष्कार नहीं है। किसी चीज़ पर सरल सुधार या पहले से ज्ञात तत्वों का संयोजन पेटेंट योग्य नहीं है जब तक कि इसका परिणाम नया न हो या एक नवीन लेख न हो।

कृषि या बागवानी से संबंधित तरीके

अधिनियम, 1970 की धारा 3(h) इस आधार पर चर्चा करती है। जब पेटेंट करने के लिए योग्यता  की बात आती है तो कृषि और बागवानी से संबंधित तरीकों की खोज विशिष्ट प्रतिबंधों का सामना करती है। उनकी पेटेंट करने के लिए योग्यता पर निषेध का मुख्य कारण यह है कि उन्हें अक्सर “अमूर्त विचारों” या “प्राकृतिक घटनाओं” श्रेणियों का विस्तार माना जाता है, जो पेटेंट योग्य नहीं हैं। पेटेंट प्रणाली का उद्देश्य आमतौर पर तकनीकी प्रगति को प्रोत्साहित करना है जिसमें प्राकृतिक कानूनों या बुनियादी सिद्धांतों की खोजों के बजाय नए और आविष्कारशील कदम शामिल हैं।

हालाँकि, कृषि से संबंधित कुछ आविष्कार हैं जो पेटेंट योग्य हो सकते हैं:

  • जैव प्रौद्योगिकी विकास

आनुवंशिक (जेनेटिक) रूप से संशोधित जीवों (जीएमओ) या पौधों के नए उपभेदों जैसे नवाचार जिनमें जेनेटिक इंजीनियरिंग या जैव प्रौद्योगिकी के तरीके शामिल हैं, पेटेंट योग्य हो सकते हैं यदि वे नवीनता, आविष्कारशील कदम और औद्योगिक प्रयोज्यता के मानदंडों को पूरा करते हैं।

  • कृषि मशीनरी और उपकरण

नई कृषि मशीनरी या उपकरणों से संबंधित आविष्कार जो दक्षता या कार्यक्षमता में सुधार करते हैं, पेटेंट योग्य हो सकते हैं, बशर्ते उनमें तकनीकी नवाचार शामिल हो।

  • नवीन योग और रचना

कृषि में उपयोग किए जाने वाले नए रासायनिक योगों या रचनाओं (जैसे उर्वरक (फर्टिलाइजर), कीटनाशक, या शाकनाशी) से जुड़े तरीके पेटेंट योग्य हो सकते हैं यदि वे तकनीकी समस्या का एक नवीन और गैर-स्पष्ट समाधान प्रदान करते हैं।

डेको वर्ल्डवाइड पोस्ट हार्वेस्ट होल्डिंग बनाम पेटेंट और डिजाइन नियंत्रक, (2023) के मामले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अधिनियम, 1970 की धारा 3(h) और धारा 3(i) के तहत विषय वस्तु के भेदभाव पर चर्चा की।

पेटेंट प्रदान करने का प्रश्न ब्लैक सिगाटोका के लिए कवकनाशी (फंगिसिडल) उपचार के आविष्कार के संबंध में था, जो केले के पौधों में एक विशिष्ट कवक के कारण होने वाले पत्तियों के धब्बे जैसे रोग का उपचार है। यह दावा किया गया था कि आविष्कार एक लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल तरीका था जो प्रतिरोध के जोखिम को कम करता है और पौधे के स्वास्थ्य और उपज में सुधार करता है, जिससे इसका आर्थिक मूल्य बढ़ जाता है। पेटेंट नियंत्रक ने यह कहते हुए आवेदन को खारिज कर दिया कि आविष्कार कृषि का एक तरीका था। जबकि अपीलकर्ता का दावा है कि यह पौधों के उपचार की एक प्रक्रिया है ताकि उन्हें बीमारी से मुक्त किया जा सके।

अदालत ने कहा कि अधिनियम, 1970 की धारा 3(h) और 3(i) आविष्कार की विभिन्न श्रेणियों को शामिल करती है जहां धारा 3(h) बागवानी में कृषि की एक विधि है। यह पौधों के उपचार पर विचार नहीं करता है ताकि उन्हें बीमारियों से मुक्त किया जा सके। जबकि, धारा 3 (i) उपचार और रोकथाम की प्रक्रिया से संबंधित है। अदालत ने आगे कहा कि 2002 के संशोधन द्वारा, धारा 3 (i) से ‘या पौधे’ शब्द को हटा दिया गया था।

मूल रूप से पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत धारा 3 (i) में कहा गया है कि “औषधीय, सर्जिकल, उपचारात्मक, रोगनिरोधी नैदानिक (डाग्नोस्टिक), चिकित्सीय या मनुष्यों के अन्य उपचार के लिए कोई प्रक्रिया या जानवरों या पौधों के समान उपचार के लिए कोई प्रक्रिया उन्हें बीमारी से मुक्त करने या उनके आर्थिक मूल्य या उनके उत्पादों को बढ़ाने के लिए।

2002 के संशोधन के बाद, इसे बदल दिया गया, “औषधीय, सर्जिकल, उपचारात्मक, रोगनिरोधी नैदानिक, चिकित्सीय या मनुष्यों के अन्य उपचार के लिए कोई भी प्रक्रिया या जानवरों के समान उपचार के लिए कोई भी प्रक्रिया उन्हें बीमारी से मुक्त करने या उनके आर्थिक मूल्य या उनके उत्पादों को बढ़ाने के लिए।

परिणामस्वरूप, अधिनियम, 1970 की धारा 3 (i) का दायरा और कम हो गया है। नियंत्रक द्वारा कोई कारण नहीं दिया गया है कि आविष्कार कृषि की श्रेणी में धारा 3 (h) के अंतर्गत क्यों आता है। अधिनियम की धारा 3 (i) से यह स्पष्ट है कि पौधों का उपचार गैर पेटेंट करने के लिए योग्यता  के दायरे में नहीं आएगा। अदालत ने नियंत्रक के आदेश को रद्द कर दिया और अदालत द्वारा स्पष्ट किए गए कानून पर पुनर्विचार के लिए इसे वापस भेज दिया।

मनुष्यों और जानवरों के उपचार से संबंधित आविष्कार

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (i) में कहा गया है कि मनुष्यों या जानवरों में बीमारियों के इलाज के लिए औषधीय, उपचारात्मक, रोगनिरोधी, नैदानिक, चिकित्सीय प्रक्रिया की खोज पेटेंट योग्य नहीं है। यदि पेटेंट कराया जाता है तो उपचार प्रक्रिया डॉक्टरों को रोगियों के लिए सर्वोत्तम देखभाल प्रदान करने से रोकेगी। पेटेंट देखभाल के बिंदु पर चिकित्सा चिकित्सकों को प्रतिबंधित करेगा। जानवरों के लिए उपचार के मामले में जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, या उनके आर्थिक मूल्य या उनके उत्पादों को बढ़ाना भी पेटेंट योग्य नहीं हैं। इसमें मौखिक या इंजेक्शन योग्य दवा, सिलाई मुक्त सर्जरी, और सजीले टुकड़े (प्लॉक) जैसी स्थितियों के लिए उपचार जैसे तरीके शामिल हैं, जो आविष्कार के रूप में योग्य नहीं हैं।

आविष्कार के रूप में पशु और पौधे

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (j) सूक्ष्मजीवों को छोड़कर पौधों या बीजों के लिए पेटेंट के अनुदान पर रोक लगाती है, जिसमें उनके प्रसार के लिए जैविक प्रक्रियाएं, जानवरों और उनके उत्पादन या लंबे समय तक जैविक प्रक्रियाएं शामिल हैं। पर्यावरण में स्वाभाविक रूप से पाई जाने वाली किसी चीज को पेटेंट नहीं दिया जा सकता है। कोई बस एक नए पौधे की खोज नहीं कर सकता है और पेटेंट संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता है।

भारत में पौधों की किस्मों या उत्पादों पर पेटेंट रखना भी संभव नहीं है। अधिनियम, 1970 यह स्पष्ट करता है कि बीजों, किस्मों और प्रजातियों सहित पूरे या आंशिक रूप से पौधे और पौधों के उत्पादन या प्रसार के लिए अनिवार्य रूप से जैविक प्रक्रियाएं पेटेंट योग्य आविष्कार नहीं हैं।

भारत सरकार ने ‘सुई जेनेरिस’ (अपनी तरह की) प्रणाली को अपनाते हुए पौधे की किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 (पीपीवीएफआर) अधिनियमित किया। भारतीय विधान न केवल पौधों की नई किस्मों के संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, 1978 के अनुरूप है बल्कि इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की प्रजनन संस्थाओं और किसानों के हितों की रक्षा के लिए भी पर्याप्त प्रावधान हैं। यह कानून पादप प्रजनन गतिविधि में वाणिज्यिक पादप प्रजनकों और किसानों दोनों के योगदान को मान्यता देता है और ट्रिप्स के प्रावधानों को इस तरह से लागू करता है जो निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों और अनुसंधान संस्थानों के साथ-साथ संसाधन-विवश किसानों सहित सभी हितधारकों के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक हितों का समर्थन करता है।

पीपीवीएफआर अधिनियम 2001 के अनुसार, “एक किसान को इस अधिनियम के तहत संरक्षित किस्म के बीज सहित अपने कृषि उपज को बचाने, उपयोग करने, बोने, विनिमय, साझा करने या बेचने का अधिकार है, जैसा कि वह इस अधिनियम के लागू होने से पहले हकदार था: बशर्ते कि किसान इस अधिनियम के तहत संरक्षित किस्म के ब्रांडेड बीज बेचने का हकदार नहीं होगा। इसे किसानों और प्रजनकों दोनों के अधिकारों पर विचार करने वाला दुनिया का पहला अधिनियम माना जाता है।

तथापि, अधिनियम के अंतर्गत नई पौध किस्मों के पंजीकरण की अनुमति है। अधिनियम की धारा 15 में कहा गया है कि नई किस्म नवीन, विशिष्ट, एकसमान और स्थिर होनी चाहिए।

  • नवीन: ऐसी नई किस्म के कटे हुए उत्पाद को प्रजनक या उनके उत्तराधिकारी की सहमति से भारत में एक वर्ष से पहले और भारत के बाहर चार साल से पहले बेचा नहीं जाना चाहिए, लेकिन पेड़ों और लताओं के मामले में छह साल से पहले।
  • स्‍पष्‍टतया भिन्‍न: कम से कम एक आवश्यक विशेषता होनी चाहिए जो नई किस्म को स्पष्ट रूप से एक किस्म से अलग करती है जो किसी भी देश में सामान्य ज्ञान का विषय है।
  • एकरूप: नई किस्म की आवश्यक विशेषताओं को किसी भी भिन्नता के अधीन पर्याप्त रूप से समान रहना चाहिए जो इसके प्रसार की विशेष विशेषताओं से उम्मीद की जा सकती है।
  • स्थिर: किस्म के बार-बार प्रसार के बाद भी, इसकी आवश्यक विशेषताएं समान रहनी चाहिए।

गणितीय, व्यावसायिक तरीके या कंप्यूटर प्रोग्राम

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) इस आधार पर चर्चा करती है। अधिनियम के अनुसार, कोई भी गणितीय गणना या वैज्ञानिक सत्य या कोई कार्य, मानसिक कौशल या व्यवसाय, विधियों या एल्गोरिदम से संबंधित गतिविधियां पेटेंट संरक्षण के लिए अयोग्य हैं।

रेथियॉन कंपनी बनाम पेटेंट महानियंत्रक (2023) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग सेट-अप में शेड्यूलिंग से संबंधित एक आविष्कार से संबंधित प्रश्न पर चर्चा की, जिसमें कंप्यूटर प्रणाली और नेटवर्क में पाए जाने वाले सभी प्रकार के हार्डवेयर डिवाइस शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि धारा 3(k) उन मामलों की पेंटिंग निर्धारित करती है जो धारा में उल्लिखित श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं और इस मामले में, आविष्कार गणितीय व्यवसाय पद्धति या एल्गोरिथ्म से संबंधित नहीं है। तथापि, क्या यह स्वत कम्प्यूटर प्रोग्राम की श्रेणी से संबंधित है, इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए।

कंप्यूटर प्रोग्राम के संदर्भ में 2017 के दिशानिर्देशों के अनुसार, कंप्यूटर से संबंधित आविष्कारों की पहचान के लिए परीक्षण संकेतक प्रकाशित किए गए थे। दिशानिर्देश कंप्यूटर से संबंधित आविष्कारों की पेटेंट करने के लिए योग्यता  से संबंधित विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा करते हैं। ऐसे आवेदनों की जांच करते समय पेटेंट कार्यालय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और इस क्षेत्र में विकसित हुए न्यायशास्त्र पर भी चर्चा की गई है।

एक सॉफ्टवेयर नवाचार के लिए पेटेंट प्राप्त करने के लिए, नवाचार को इस तरह से प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि जिस नवाचार को संरक्षित करने की मांग की जाती है उसमें विषय वस्तु शामिल हो जो “केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं है”। इसलिए, भारत में एक सॉफ्टवेयर आविष्कार के लिए एक पेटेंट प्राप्त किया जा सकता है बशर्ते सॉफ्टवेयर आविष्कार हार्डवेयर के साथ संयोजन के रूप में पेटेंट योग्य हो। यह वास्तव में आविष्कारकों के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन प्रदान करेगा।

अधिनियम, 1970 की धारा 3(k) के तहत ‘प्रति से’ शब्दों का उपयोग बताता है कि परिवर्तन प्रस्तावित किया गया है क्योंकि कभी-कभी कंप्यूटर प्रोग्राम में कुछ अन्य चीजें शामिल होती हैं जो सहायक होती हैं या अपना स्वयं का विकास करती हैं और विधायिका का इरादा उन्हें अपने आविष्कारों के पेटेंट के अनुदान से अस्वीकार करना नहीं है, हालांकि, इस तरह के कंप्यूटर प्रोग्राम को पेटेंट दिए जाने का इरादा नहीं है।

अदालत ने यह भी माना कि नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्थाओं में, जहां अधिकांश आविष्कार कंप्यूटर प्रोग्राम पर आधारित होते हैं, यह तर्क देना अनुचित होगा कि ऐसे सभी आविष्कार पेटेंट योग्य नहीं हैं। कृत्रिम बौधिमत्ता, ब्लॉकचेन प्रद्योगिकी, वगैरह के क्षेत्र में नवाचार कंप्यूटर प्रोग्राम पर आधारित हैं और यह दावा करने के लिए कि वे केवल इस कारण से पेटेंट योग्य नहीं होंगे, मनमाना है कि ऐसा उत्पाद देखना दुर्लभ है जो कंप्यूटर प्रोग्राम, कारों या अन्य ऑटोमोबाइल, माइक्रो वाशिंग मशीन, वगैरह पर आधारित नहीं है। सभी के पास किसी न किसी प्रकार का कंप्यूटर प्रोग्राम बनाया गया है। इसलिए डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों सहित ऐसे कार्यक्रमों का उत्पादन करने वाला प्रभाव पेटेंट करने के लिए योग्यता  के परीक्षण को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

कहने के लिए शब्द को शामिल किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कंप्यूटर प्रोग्राम के आधार पर विकसित किए गए वास्तविक आविष्कारों को पेटेंट से इनकार नहीं किया जाता है। अदालत ने अंत में महानियंत्रक को अदालत के निर्णय के संदर्भ में आवेदनों की जांच करने का निर्देश दिया।

यूपीआई ढांचे की पेटेंट के लिए योग्यता

यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस या यूपीआई को दो पहलुओं के संदर्भ में समझा जा सकता है। पहला एक अवधारणा या प्रणाली के रूप में स्वयं विधि है और दूसरा यूपीआई से संबंधित विशिष्ट नवाचार या अद्वितीय तकनीकी कार्यान्वयन है। जबकि पहला आमतौर पर पेटेंट योग्य नहीं होता है, बाद वाले को पेटेंट कराया जा सकता है।

एक विचार के रूप में यूपीआई विधि इलेक्ट्रॉनिक रूप से पैसे ट्रांसफर करने की अवधारणा पर बनाई गई है। यह केवल एक अमूर्त विचार या मौलिक आर्थिक अभ्यास है और इसलिए पेटेंट योग्य नहीं है। इसके अलावा, यूपीआई भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मानक है जिसे नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा विकसित किया गया है। यह व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और बड़े पैमाने पर लोगों के लिए सुलभ है, इसलिए एक पेटेंट के अनुदान की आवश्यकताएं जो नयापन और गैर-स्पष्ट नवाचार है, गायब हैं।

हालांकि, अगर किसी व्यक्ति ने यूपीआई ढांचे के भीतर एक अद्वितीय, नवीन तकनीकी नवाचार या एल्गोरिदम बनाया है जो मानक सूत्र में नहीं पाया जाता है, तो यह पेटेंट योग्य है। उदाहरण के लिए, लेनदेन सुरक्षा में सुधार के लिए एक नवीन विधि या भुगतान अनुरोधों को संभालने के लिए एक अद्वितीय एल्गोरिथ्म पेटेंट योग्य हो सकता है यदि वे नवीनता, गैर-स्पष्टता और उपयोगिता के मानदंडों को पूरा करते हैं।

विशिष्ट तकनीकी सुधारों के मामले में जो इसके प्रदर्शन या सुरक्षा में सुधार करते हैं। इसके अलावा, यदि कुछ सॉफ्टवेयर नवाचार व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं जो लेनदेन डेटा के प्रबंधन या उपयोगकर्ता अनुभव में सुधार के संदर्भ में इसकी कार्यक्षमता को बढ़ाता है। उन नवाचारों को पेटेंट योग्य किया जा सकता है।

निष्कर्ष निकालने के लिए, यूपीआई भुगतान प्रणाली समग्र रूप से पेटेंट योग्य नहीं है। हालांकि, विशिष्ट, नवीन और तकनीकी नवाचार संभावित रूप से पेटेंट योग्य हो सकते हैं।

कॉपीराइट योग्य विषय वस्तु

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (l) इस आधार पर चर्चा करती है। इसके अनुसार, साहित्यिक, नाटकीय, संगीत या कलात्मक कार्य जिसमें सिनेमैटोग्राफिक और टेलीविजन प्रोडक्शन सहित कोई अन्य सौंदर्यपरक रचना शामिल है, एक आविष्कार नहीं है। लेखन, पेंटिंग, संगीत रचनाएं या सिनेमैटोग्राफिक प्रस्तुतियों जैसी गतिविधियां पेटेंट योग्य नहीं हैं। तथापि, इनमें से कुछ को, यदि वे शर्तों को पूरा करते हैं, तो उन्हें कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के माध्यम से संरक्षित किया जा सकता है।

मानसिक कार्य या खेल खेलने की विधि

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (m) घोषित करती है कि एक नवाचार जो केवल एक योजना या नियम या मानसिक कार्य करने की विधि या खेल खेलने की विधि है, एक आविष्कार नहीं है और इस तरह पेटेंट नहीं दिया जा सकता है। शतरंज या सुडोकू जैसे खेल खेलने की रणनीतियाँ तकनीकी हस्तक्षेप के बजाय मानसिक अभ्यास हैं, और इस तरह, वे पेटेंट संरक्षण के लिए पात्र नहीं हैं।

जानकारी की प्रस्तुति

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (n) इस आधार पर चर्चा करती है। इसमें कहा गया है कि जानकारी प्रस्तुत करने के तरीके, जैसे कि टेबल, चार्ट, पाई चार्ट या ग्राफ़ के रूप में, आविष्कार नहीं माना जाता है और इसलिए पेटेंट योग्य नहीं हैं। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि डेटा को व्यवस्थित करने या प्रदर्शित करने के मूलभूत तरीकों को पेटेंट संरक्षण प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि उन्हें आम तौर पर तकनीकी नवाचारों के बजाय संचार के लिए उपकरण माना जाता है। एक कंपनी के लिए वार्षिक बिक्री के आंकड़ों पर डेटा प्रदर्शित करने के लिए उपयोग की जाने वाली एक तालिका, समय के साथ विभिन्न शहरों की जनसंख्या वृद्धि को दर्शाने वाला एक बार चार्ट, और कई वर्षों में शेयर बाजार की कीमतों में रुझानों को दर्शाने वाला एक लाइन ग्राफ कुछ उदाहरण हैं।

एकीकृत परिपथों (सर्किट) की स्थलाकृति (टोपोग्राफी)

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (o) इस आधार पर चर्चा करती है। यह एक नवाचार के पंजीकरण को रोकता है जो केवल एकीकृत परिपथों की स्थलाकृति से संबंधित है।

पारंपरिक ज्ञान

अधिनियम, 1970 की धारा 3 (p) में घोषणा की गई है कि एक नवाचार जो केवल पारंपरिक रूप से ज्ञात घटकों के ज्ञात गुणों का पारंपरिक ज्ञान या दोहराव है, अधिनियम के तहत आविष्कार नहीं है और इस प्रकार पेटेंट नहीं दिया जा सकता है। पारंपरिक ज्ञान या कौशल ज्ञान और कौशल हैं जो एक समुदाय में पीढ़ियों को पास किए जाते हैं। ये पहले से ही प्रसिद्ध हैं और इनमें नवीनता का तत्व नहीं है। इसलिए, इनका पेटेंट नहीं कराया जा सकता है। उदाहरण के लिए, हल्दी के एंटीसेप्टिक गुण, नीम के एंटीसेप्टिक गुण आदि।

पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 4

धारा 4 परमाणु ऊर्जा से संबंधित आविष्कारों से संबंधित है जो पेटेंट योग्य नहीं हैं और जो परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 की धारा 20 (1) के अंतर्गत आते हैं।

अधिनियम, 1970 की धारा 65 केंद्र सरकार को पेटेंट रद्द करने के लिए पेटेंट नियंत्रक को निर्देश देने का अधिकार देती है। ऐसी शक्तियों का प्रयोग तब किया जा सकता है जब केंद्र सरकार संतुष्ट हो कि परमाणु ऊर्जा से संबंधित आविष्कार के लिए पेटेंट दिया गया है जो परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 की धारा 20 के अनुसार नहीं है। महानियंत्रक को पेटेंटकर्ता को नोटिस देने की आवश्यकता होती है, और उसे सुनवाई का अवसर देने के बाद, पेटेंट को रद्द कर सकता है।

दवा उद्योग के क्षेत्र में पेटेंट देने का सवाल अक्सर विवादों में घिर जाता है, इसलिए अगले खंड में, हम इस विषय पर भारतीय स्थिति के विकास को देखेंगे।

दवा उद्योगों में उत्पाद पेटेंट की पेटेंट के लिए योग्यता

भारत की स्वतंत्रता के समय, भारतीय पेटेंट कानून पेटेंट और डिजाइन अधिनियम, 1911 द्वारा शासित होता था जो उत्पाद पेटेंट और प्रक्रिया पेटेंट दोनों के लिए प्रदान करता था। हालांकि, बाद में सरकार द्वारा यह स्वीकार किया गया कि प्रस्तुत पेटेंट कानून ने भारतीयों की तुलना में विदेशियों को अधिक लाभान्वित किया है। इसने देश के भीतर वैज्ञानिक अनुसंधान (रिसर्च) और औद्योगीकरण को बढ़ावा नहीं दिया और इसके बजाय नवाचार और आविष्कारशीलता पर अंकुश लगाया।

परिणामस्वरूप, पेटेंट कानून की समीक्षा टेकचंद समिति और अय्यंगार समिति द्वारा की गई थी। इस समिति ने कहा कि रासायनिक पदार्थों और खाद्य और दवा से संबंधित आविष्कारों के लिए पेटेंट केवल प्रदान किया जाना चाहिए, प्रक्रिया, पेटेंट और उत्पाद पेटेंट की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इसके बाद, समितियों की सिफारिश पर 1970 का पेटेंट अधिनियम अधिनियमित किया गया, जिसने पेटेंट और डिजाइन अधिनियम, 1911 को बदल दिया। अधिनियम, 1970 की धारा 5 में उन पदार्थों के लिए उत्पाद पेटेंट को बाहर रखा गया था जो खाद्य या दवा या दवाओं में उपयोग किए जाने के लिए आशयित या सक्षम थे। इससे भारत के दवा उद्योग पर एक परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा। दवाओं के उत्पादन में वृद्धि हुई और भारत दुनिया में कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं का निर्यातक बन गया।

तत्पश्चात्, टैरिफ एवं व्यापार संबंधी सामान्य समझौते (जीएटीटी) के अंतर्गत उरुग्वे दौर की वार्ताएं आयोजित की गई थीं। इसके परिणामस्वरूप विश्व व्यापार संगठन का गठन हुआ और बाद में 1995 में ट्रिप्स समझौता तैयार हुआ। ट्रिप्स समझौता एक व्यापक बहुपक्षीय समझौता था जिसने बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण और प्रवर्तन के लिए न्यूनतम मानकों को निर्धारित किया था और इसका उद्देश्य विश्व स्तर पर आई.पी. कानूनों को सुसंगत बनाना था।

चूंकि हम विश्व व्यापार संगठन के सदस्य हैं इसलिए भारत ट्रिप्स समझौते के अंतर्गत दायित्वों से भी बंधा हुआ है। ट्रिप्स समझौते के अनुसार, भारत को दवा और कृषि रासायनिक पदार्थों के क्षेत्र में उत्पाद पेटेंट के अनुदान की अनुमति देने की आवश्यकता थी, जिसे पहले 1970 अधिनियम की धारा 5 के तहत रोक दिया गया था।

नतीजतन, भारत सरकार 1994 में पेटेंट (संशोधन) अध्यादेश लाई, जिसने किसी पदार्थ के लिए एक आविष्कार के पेटेंट के लिए दावे की अनुमति देने के लिए प्रदान किया, जिसका उपयोग दवा या दवा के रूप में उपयोग करने में सक्षम था और उस उत्पाद के संबंध में विशेष विपणन अधिकार प्रदान करने के लिए जो इस तरह के पेटेंट दावे का विषय है।

1999 में, पेटेंट अधिनियम, 1970 में संशोधन किया गया और अध्यादेश के अनुरूप लाया गया। 2004 में, सरकार पेटेंट संशोधन अध्यादेश लाई जिसके द्वारा अधिनियम, 1970 की धारा 5 को हटा दिया गया, जिसने अन्य आविष्कारों के साथ दवा उत्पादों के पेटेंट के लिए दरवाजे खोल दिए।

जब संसद में इस विधान पर चर्चा हुई तो अध्यादेश को विधान द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना था। कुछ चिंताओं को उठाया गया था जैसे कि दवा और कृषि क्षेत्रों में पेटेंट उत्पादन। रासायनिक उत्पादों का जीवन रक्षक दवाओं को कुछ लोगों की पहुंच से बाहर रखने का प्रभाव होगा।

इसलिए, कानून को देश के लोगों के प्रति अपने कर्तव्य के साथ-साथ संधि के तहत अपने दायित्व के बीच संतुलन बनाना था। लोगों की आशंकाओं को संतुलित करने के लिए, संसद ने 1970 अधिनियम की धारा 3 (d) में संशोधन किया, जिसका उद्देश्य दवा और कृषि, रासायनिक पदार्थ उद्योगों में उत्पाद पेटेंट के किसी भी दुरुपयोग का ख्याल रखना था।

रसायन और दवा उद्योग में एक नए उत्पाद का मतलब जरूरी नहीं है कि कुछ ऐसा हो जो बिल्कुल नया या पूरी तरह से अपरिचित हो या पहले मौजूद न हो। यह कुछ ऐसा हो सकता है जो पिछले उत्पाद से अलग है जो पहले मौजूद उत्पाद से बेहतर है, जो उसी तरह के दूसरे उत्पाद के अलावा है।

इस प्रकार, रसायनों और दवा के मामले में, यदि जिस उत्पाद पर पेटेंट उत्पाद संरक्षण लागू किया जाता है, वह गैर-प्रभावकारिता के साथ पहले से ही ज्ञात पदार्थ का एक नया रूप है, तो उत्पाद को दिए जाने के लिए, एक पेटेंट को धारा 2(1) (j) और (ja) के तहत प्रदान किए गए आविष्कार का परीक्षण, स्पष्टीकरण के साथ पढ़ी गई धारा 3(d) में प्रदान की गई बढ़ी हुई प्रभावकारिता का परीक्षण।

अधिनियम की धारा 3 (d) पेटेंट करने के लिए योग्यता  की अवधारणा का प्रतिनिधित्व करती है, जो आविष्कार शब्द से अलग है।

कृत्रिम बौद्धिमत्ता का क्षेत्र हाल के दिनों में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, यह अनिवार्य रूप से हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है। सिरी जैसे आभासी सहायकों के उपयोग से लेकर चैटजीपीटी जैसे सॉफ़्टवेयर के उपयोग तक, हम धीरे-धीरे अपने जीवन में ए.आई. के एकीकरण को देख सकते हैं। इसलिए, ए.आई. से जुड़े आविष्कारों की पेटेंट करने के लिए योग्यता  पर चर्चा करना उचित हो जाता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) (ए.आई.) की पेटेंट करने के लिए योग्यता 

ए.आई. से संबंधित पेटेंट ए.आई. प्रौद्योगिकी के विभिन्न पहलुओं को कवर कर सकते हैं। य़े हैं:

  1. एल्गोरिदम और तरीके: ए.आई. से संबंधित पेटेंट में मशीन लर्निंग, तंत्रिका नेटवर्क या डेटा प्रसंस्करण के लिए उपयोग किए जाने वाले विशिष्ट एल्गोरिदम शामिल होंगे।
  2. अनुप्रयोगों: ए.आई. से संबंधित पेटेंट में ए.आई. के व्यावहारिक उपयोग शामिल होंगे, जैसे छवि पहचान, प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण या सिफारिश प्रणाली।
  3. प्रणाली और वास्तुकला: ए.आई. से संबंधित पेटेंट में हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर कॉन्फ़िगरेशन शामिल होंगे जो ए.आई. तकनीक को लागू करते हैं, जिसमें विशेष प्रोसेसर शामिल हैं।
  4. प्रक्रियाएं और तकनीकी जानकारी: ए.आई. मॉडल को प्रशिक्षित करने या उनके प्रदर्शन को अनुकूलित करने के लिए नवीन तरीके।

ए.आई. की पेटेंट करने के लिए योग्यता को तीन दृष्टिकोणों में देखा जा सकता है:

ए.आई. प्रणाली का पेटेंट

संयुक्त राज्य अमेरिका या यूरोपीय संघ में, ए.आई. प्रणाली को पेटेंट कराया जा सकता है यदि वे पेटेंट करने के लिए योग्यता  की तीन आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। ये आवश्यकताएं आविष्कार की नवीनता या नएपन, आविष्कारशील कदम या आविष्कार की गैर-स्पष्टता और औद्योगिक प्रयोज्यता की आवश्यकता हैं। हालाँकि, ए.आई. एल्गोरिदम या ए.आई. से संबंधित अमूर्त विचार पेटेंट योग्य नहीं हैं। बल्कि उन एल्गोरिदम के विशिष्ट अनुप्रयोग या कार्यान्वयन का पेटेंट कराया जा सकता है।

ए.आई. एल्गोरिदम की पेटेंट करने के लिए योग्यता 

ए.आई. के बारे में एक विशुद्ध रूप से गणितीय एल्गोरिथ्म या एक अमूर्त सिद्धांत या विचार पेटेंट योग्य नहीं है। हालांकि, अगर एल्गोरिथ्म व्यावहारिक रूप से लागू होता है तो यह हो सकता है। इसका एक उदाहरण चिकित्सा स्थितियों के निदान या विनिर्माण प्रक्रियाओं के अनुकूलन के लिए ए.आई.-आधारित विधि होगी जिसे पेटेंट कराया जा सकता है यदि यह एक नवीन और गैर-स्पष्ट तकनीकी प्रगति को प्रदर्शित करता है।

एक आविष्कारक के रूप में ए.आई.

स्थिति अभी भी बहुत स्पष्ट नहीं है कि क्या ए.आई. प्रणाली को पेटेंट अनुप्रयोगों में आविष्कारक के रूप में उल्लेख किया जा सकता है। विश्व स्तर पर, वर्तमान स्थिति केवल मनुष्यों को आविष्कारक के रूप में स्वीकार करती है। हालांकि, तकनीकी प्रगति की तीव्र गति को देखते हुए, यह वास्तव में भविष्य में एक वास्तविकता बन सकता है।

पेटेंट योग्य और गैर पेटेंट योग्य आविष्कारों से संबंधित निर्णय

पेटेंट योग्य आविष्कार

ब्लैकबेरी लिमिटेड बनाम पेटेंट और डिजाइन नियंत्रक (2024) दिल्ली उच्च न्यायालय

  • तथ्य: इस मामले में, ‘स्वचालित चयन’ और ‘कैश प्रबंधक द्वारा अद्यतन’ की सुविधा के लिए पेटेंट की मांग की गई थी। इसे “संभावना के आधार पर आत्मविश्वास स्तर प्रदान करने की विशेषता” पर एक नवीन तकनीकी प्रगति के रूप में दावा किया गया था, जो कि पूर्व कला थी, जिस पर “कैश प्रबंधक द्वारा ‘स्वचालित चयन’ और अद्यतन करने की विशेषता नवीन तकनीक थी”।

पेटेंट आवेदन को पेटेंट नियंत्रक द्वारा यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया गया था कि तत्व एल्गोरिथम और कंप्यूटर प्रोग्राम हैं और इसलिए अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) के दायरे में आते हैं।

अपीलकर्ता द्वारा यह दावा किया गया था कि तकनीकी विशेषता जो आविष्कार का विषय है, एक महत्वपूर्ण विशेषता थी जिसने ब्लैकबेरी को प्रचार सामग्री जारी करने के लिए प्रेरित किया, इस बात पर प्रकाश डाला कि इसके उपकरणों पर अधिक संगीत डाउनलोड किया जा सकता है, और यदि विषय आविष्कार में दावा की गई सुविधा सक्षम है, तो डिवाइस पर अधिक से अधिक संगीत या अन्य सामग्री डाउनलोड की जा सकती है। इसलिए इसे अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) की सीमा को पार करने के लिए पर्याप्त माना जाना चाहिए। इसके अलावा, तकनीकी प्रभाव इस तथ्य से काफी स्पष्ट है कि यह उपयोगकर्ता को कई स्रोतों के माध्यम से संगीत प्राप्त करने में सक्षम बनाता है जो इस हस्तक्षेप से पहले संभव नहीं था।

  • मुद्दा: क्या विषय वस्तु स्वतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम है और इस प्रकार अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) के तहत पेटेंट संरक्षण पर रोक लगा दी गई है?
  • निर्णय: अदालत ने कहा कि जबकि विषय पेटेंट और आवेदन और पूर्व कला के बीच कुछ समानताएं हैं, वर्तमान पेटेंट आवेदन कई नवीन तत्वों का परिचय देता है, जो दोनों को अलग करते हैं। जबकि दोनों में उपयोगकर्ता वरीयताओं के आधार पर मीडिया फ़ाइलों का स्वचालित चयन शामिल है, वर्तमान पेटेंट विषय संभावना के आधार पर “आत्मविश्वास स्तर” का उपयोग करता है, पूर्व कला में उपयोग की जाने वाली लोकप्रियता रेटिंग की तुलना में एक अलग मेट्रिक प्रदान करता है।

इसके अलावा, वर्तमान विषय पेटेंट में आत्मविश्वास के स्तर के आधार पर मीडिया फ़ाइल को वर्गीकृत करने और चयन के लिए फ़िल्टर के रूप में उपलब्ध भंडारण के लिए फ़ाइल आकारों की तुलना करने के लिए एक विशिष्ट चरण शामिल है जो पूर्व कला में प्रदान नहीं किया गया था। इसके अतिरिक्त, वर्तमान पेटेंट आवेदन में एक विशिष्ट कैश प्रबंधक को शामिल करना जो चयनित मीडिया फ़ाइलों से संबंधित जानकारी वाली सूची को अद्यतन करने के लिए जिम्मेदार है, एक नवीन विशेषता है जो पूर्व कला में नहीं मिली है।

इसलिए, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि कैश प्रबंधक, विशिष्ट वर्गीकरण और फ़िल्टरिंग प्रक्रिया से जुड़े तकनीकी कदम सहित ये विशिष्ट विशेषताएं पूर्व कला में प्रकटीकरण से परे एक तकनीकी अग्रिम प्रदान करती हैं और इसलिए, नवीनता की कमी के कारण गैर पेटेंट के लिए योग्यता का आधार खड़ा नहीं होता है।

बायोट्रॉन लिमिटेड बनाम पेटेंट और डिजाइन महानियंत्रक (2023) कलकत्ता उच्च न्यायालय

  • तथ्य: इस मामले में, आविष्कार का विषय यौगिकों (कंपाउंड) की नवीन संरचना से संबंधित है, जिन्हें वायरल संक्रमण के इलाज और रोकथाम में प्रभावी होने का दावा किया गया था, विशेष रूप से एचआईवी, एचसीवी और डेंगू वायरस के खिलाफ। यह दावा किया गया था कि चक्रीय प्रतिस्थापन वाले यौगिक गैर-चक्रीय विकल्प वाले यौगिकों से बेहतर हैं जो अपीलकर्ता के आविष्कार से पहले मौजूद थे। इसलिए, विषय आविष्कार अन्य ज्ञात यौगिकों की तुलना में तकनीकी रूप से उन्नत है।

पेटेंट और डिजाइन के महानियंत्रक द्वारा आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि इसमें अधिनियम, 1970 की धारा 2 (1) (j) और 2 (1) (ja) के तहत आविष्कारशील कदमों का अभाव था और आगे यह अधिनियम, 1970 की धारा 3 (d) के तहत एक गैर पेटेंट योग्य विषय था।

  • मुद्दा: क्या विषय वस्तु में आविष्कारशील कदम का अभाव है और यह अधिनियम, 1970 की धारा 3 (d) के दायरे में भी आता है?
  • निर्णय: न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता ने यह खुलासा करने के लिए पूर्व कला के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया था कि चक्रीय प्रतिस्थापन में चक्रीय प्रतिस्थापन वाले यौगिकों की तुलना में बेहतर गतिविधि है। पेटेंट की विषय वस्तु में गैर-चक्रीय प्रतिस्थापन, जिनका उक्त प्रतिजनों (एंटीजन) के विरुद्ध कोई कार्यकलाप नहीं है, की तुलना में तीन वायरल एंटीजन के विरुद्ध यौगिकों का औसत जीवाणु स्कोर होता है।

पेटेंट और डिजाइन नियंत्रक द्वारा आदेश इस पहलू पर विचार करने में विफल रहा, अदालत ने नोवार्टिस एजी बनाम भारत संघ (2013) में मामले पर भरोसा किया, जिसमें यह कहा गया था कि धारा 3 (d) स्पष्ट रूप से रासायनिक पदार्थों के लिए योग्यता मानकों का दूसरा स्तर स्थापित करती है ताकि सच्चे और वास्तविक आविष्कारों के लिए दरवाजा खुला रह सके, लेकिन एक ही समय में दोहराए जाने वाले पेटेंट के किसी भी प्रयास की जांच करने के लिए। धारा 3 (d) रसायनों और दवा पदार्थों के सभी वृद्धिशील आविष्कारों के लिए पेटेंट संरक्षण पर रोक नहीं लगाती है।

अंत में, अदालत ने पेटेंट अधिकारियों से फैसले में दिए गए निर्देशों के आलोक में अपने आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए कहा।

गैर पेटेंट योग्य आविष्कार

विश्वनाथ प्रसाद राधेश्याम बनाम हिंदुस्तान मेटल इंडस्ट्रीज (1979) सर्वोच्च न्यायालय

  • तथ्य: इस मामले में प्रतिवादी हिंदुस्तान मेटल इंडस्ट्रीज एक भागीदारी फर्म है जो पीतल और जर्मन चांदी के बर्तनों के निर्माण में कारोबार करती है। अपीलकर्ता विश्वनाथ प्रसाद राधेश्याम का बर्तन बनाने का व्यवसाय भी था। प्रतिवादी फर्म के भागीदारों में से एक ने बर्तनों के निर्माण के लिए एक उपकरण और विधि का आविष्कार किया, जिसने उत्पादित वस्तुओं में सुधार, सुविधा, गति, सुरक्षा और बेहतर फिनिश पेश किया। इसके बाद, उन्होंने कथित आविष्कार का पेटेंट कराया। बाद में, प्रतिवादी को पता चला कि प्रतिवादी उपकरण और विधि का उपयोग कर रहा था, जो पूर्व पेटेंट का विषय था और अपीलकर्ता के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) के लिए मुकदमा दायर किया।

अपीलकर्ता ने दावा किया कि प्रतिवादी के पेटेंट द्वारा कवर की गई विधि ‘खराद’ (हेडस्टॉक, एडेप्टर और टेल स्टॉक) ज्ञात है और वाणिज्यिक दुनिया में खुले तौर पर और आमतौर पर उपयोग की जाती है। इस प्रकार, आविष्कार निर्माण या सुधार का एक नया तरीका नहीं था, न ही इसमें कोई आविष्कारशील कदम शामिल था। इसलिए, इसे रद्द किया जाना चाहिए।

  • मुद्दा: क्या विषय वस्तु में पेटेंट के अनुदान के लिए पात्र होने के लिए एक आविष्कारशील कदम शामिल है?
  • निर्णय: अदालत ने अपीलकर्ता की आपत्ति को देखते हुए कहा कि एक आविष्कार को पेटेंट योग्य बनाने के लिए, किसी ऐसी चीज पर सुधार जो पहले से ही ज्ञात है, केवल एक कार्यशाला सुधार से अधिक होना चाहिए। इसे स्वतंत्र रूप से आविष्कार या एक आविष्कारशील कदम की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। एक सुधार होने के लिए इसे एक नया परिणाम या एक नया लेख या पहले से बेहतर या सस्ता लेख उत्पन्न करना चाहिए। इसलिए, प्रतिवादी का आविष्कार पेटेंट के अनुदान के लिए योग्य नहीं होगा।

ओपनटीवी आईएनसी बनाम पेटेंट और डिजाइन नियंत्रक, (2023) दिल्ली उच्च न्यायालय

  • तथ्य: इस मामले में अपीलकर्ता कंपनी इंटरैक्टिव टेलीविजन समाधान प्रदान करने में लगी हुई है। इसने “उपहार मीडिया प्रदान करने के लिए प्रणाली और विधि” के पेटेंट के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसे “एक नेटवर्क वास्तुकला और किसी भी प्रकार के डिजिटल या मूर्त मीडिया के इंटरैक्टिव मीडिया सामग्री वितरण के आदान-प्रदान को सक्षम करने के लिए उसी पर लागू की गई विधि” कहा गया है।

आवेदन को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया था कि विषय वस्तु अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) के अंतर्गत आती है और इसलिए पेटेंट योग्य नहीं है।

  • मुद्दा: क्या विषय अधिनियम, 1970 की धारा 3 (k) के तहत प्रदान किए गए प्रतिबंध के अंतर्गत आता है?
  • निर्णय: अदालत ने कहा कि विषय वस्तु “विभिन्न ज्ञात घटकों और प्रौद्योगिकियों को इस तरह से अनुकूलित किया जा रहा है ताकि मानवीय हस्तक्षेप के बिना उपहार देने में सक्षम बनाया जा सके, सिवाय शुरुआत में जहां उपहार और प्राप्तकर्ता प्रेषक द्वारा चुना जाता है”। इसे विभिन्न अवतार स्वरूपों में एक नेटवर्क के रूप में और विभिन्न मीडिया प्रारूपों को प्रसारित करने के उद्देश्य से भी वर्णित किया गया है। पेटेंट का अनुदान वास्तव में उपहार देने की एक विधि से संबंधित एकाधिकार होगा और चूंकि यह एक व्यावसायिक विधि है, इसलिए कोई पेटेंट नहीं दिया जा सकता है। धारा 3 (k) के अनुसार, व्यावसायिक तरीकों के संबंध में बहिष्करण एक पूर्ण है।

निष्कर्ष

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां अर्थव्यवस्थाएं अत्यधिक ज्ञान-संचालित हैं। जहां सरकारें अपने नागरिकों में नवाचार को बढ़ावा देने का प्रयास करती हैं। हमें रचनात्मक और आविष्कारशील विचारों की आवश्यकता है जो या तो एक नई अवधारणा लाते हैं या मौजूदा में सुधार करते हैं। यदि कोई व्यवसाय या व्यक्ति इस तरह के उत्पाद या प्रक्रिया को विकसित करता है, तो वे आदर्श रूप से प्रौद्योगिकी पर मालिकाना अधिकार या एकाधिकार रखना चाहते हैं और दूसरों को इसका उपयोग करने से रोकना चाहते हैं।

यह वास्तव में सच है कि पेटेंट नवाचार के लिए प्रोत्साहन प्रदान करते हैं लेकिन जिस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है वह यह है कि वे अस्थायी एकाधिकार भी बनाते हैं। आवश्यक प्रौद्योगिकियों तक सार्वजनिक पहुंच के साथ पेटेंटकर्ता के पेटेंट संरक्षण को संतुलित करने का कार्य यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज द्वारा एक साथ साझा किया जाता है।

एक मजबूत पेटेंट प्रणाली ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के विकास का समर्थन करती है, जहां बौद्धिक संपदा और तकनीकी नवाचार आर्थिक गतिविधि के लिए केंद्रीय हैं। जिन राष्ट्रों के पास पेटेंट की एक मजबूत प्रणाली है, उन्हें प्रौद्योगिकी और नवाचार के युग में नेताओं के रूप में देखा जाता है। यह प्रतिष्ठा ज्ञान वैश्वीकरण में उनकी वैश्विक स्थिति और प्रभाव को बढ़ाती है।

पेटेंट अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के उत्कर्ष को भी प्रोत्साहित करता है और आर्थिक विविधीकरण में योगदान देता है जो बदले में पारंपरिक उद्योगों पर निर्भरता को कम करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

पेटेंट संरक्षण की अवधि समाप्त होने के बाद क्या होता है?

न्यायमूर्ति राजगोपाल आयंगर समिति कि रिपोर्ट में कहा गया है कि पेटेंट प्रणाली एक प्रकार की प्रतिपाद्य (क्विड प्रो कुओ) प्रणाली थी। इस प्रणाली में, आविष्कारक को पेटेंट अवधि समाप्त होने के बाद स्वतंत्र रूप से उपयोग किए जाने वाले आविष्कार के प्रकटीकरण के बदले बीस साल की निश्चित अवधि के लिए पेटेंट जारी करके एकाधिकार प्रदान किया जाता है। संरक्षण अवधि समाप्त होने के बाद आविष्कार सार्वजनिक डोमेन में प्रवेश करेगा। इसका मतलब यह है कि कोई भी मूल पेटेंट धारक की अनुमति के बिना आविष्कार को बनाने, उपयोग करने, बेचने या आयात करने के लिए स्वतंत्र होगा।

आविष्कार के सार्वजनिक डोमेन में प्रवेश करने से अंततः बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धा और नवाचार की अनुमति मिलेगी, क्योंकि अन्य कंपनियां और व्यक्ति आविष्कार पर निर्माण करने या नए और बेहतर उत्पाद या प्रक्रियाएं बनाने में सक्षम होंगे। दूसरा, एक बार पेटेंट समाप्त हो जाने और सार्वजनिक डोमेन में प्रवेश करने के बाद, पेटेंट धारक पेटेंट से संबंधित स्वतव भुगतान प्राप्त करना बंद कर सकता है। इसके अलावा, दूसरों के साथ कोई भी लाइसेंसिंग समझौता स्वचालित रूप से मिटा दिया जाएगा।

एक बार दिए गए पेटेंट की अवधि क्या है?

अधिनियम, 1970 की धारा 53 में यह निर्धारित किया गया है कि भारत में प्रदान किए गए पेटेंट की अवधि 20 वर्ष है, जो पेटेंट आवेदन दायर करने की तारीख से शुरू होती है। इसका मतलब यह है कि पेटेंट द्वारा दिए गए अनन्य अधिकार दाखिल करने की तारीख से 20 साल की अवधि के लिए वैध हैं, बशर्ते कि पेटेंट धारक सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है, जिसमें नवीकरण शुल्क का समय पर भुगतान और अन्य वैधानिक दायित्वों का अनुपालन शामिल है। इस 20 साल की अवधि के बाद, पेटेंट अधिकार समाप्त हो जाते हैं, और आविष्कार सार्वजनिक डोमेन में प्रवेश करता है, जिससे दूसरों को मूल पेटेंट धारक से अनुमति की आवश्यकता के बिना आविष्कार का उपयोग करने, बनाने या बेचने की अनुमति मिलती है।

पेटेंट के सदाबहार का क्या मतलब है?

आम आदमी के शब्दों में सदाबहार का मतलब कुछ ऐसा है जो जीवन भर चलेगा। पेटेंट कानून में, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा पेटेंटकर्ता अपने मुनाफे को अधिकतम करने के लिए अपने पेटेंट के जीवन का विस्तार कर सकता है। इस प्रयास में, पेटेंटकर्ता एक ही आविष्कार के विभिन्न भागों या पहलुओं को कवर करने के लिए कई पेटेंट दर्ज करता है। इसमें, आविष्कार की सुरक्षा अवधि को बीस साल की सीमा से आगे बढ़ाने के लिए कई अनुवर्ती (फॉलो अप) पेटेंट दायर किए जाते हैं। यह प्रक्रिया किसी भी क्षेत्र में आविष्कार के लिए की जा सकती है। हालांकि, यह दवा के क्षेत्र में सबसे अधिक प्रचलित है।

अंतिम लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई खामी नहीं है जिसका उपयोग प्रतियोगी मूल पेटेंट को बायपास करने और पेटेंट सुरक्षा का उल्लंघन किए बिना प्रतिस्पर्धी उत्पाद या सेवा बनाने के लिए कर सकता है।

क्या पेटेंट रद्द किया जा सकता है?

अधिनियम, 1970 की धारा 64 पेटेंट के रद्द करने के आधारों से संबंधित है। निम्नलिखित कुछ आधारों का उल्लेख किया गया है:

  1. पेटेंट एक ऐसे व्यक्ति के आवेदन पर प्रदान किया गया था जो इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत आवेदन करने का हकदार नहीं है।
  2. पेटेंट याचिकाकर्ता या किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के उल्लंघन में गलत तरीके से प्राप्त किया गया था जिसके तहत या जिसके माध्यम से वह दावा करता है।
  3. पूर्ण विनिर्देश नया नहीं है, दावे की प्राथमिकता तिथि से पहले भारत में सार्वजनिक रूप से ज्ञात या सार्वजनिक रूप से उपयोग किया गया था।
  4. पूर्ण विनिर्देश के दावे स्पष्ट हैं या इसमें कोई आविष्कारशील कदम शामिल नहीं है।
  5. पूर्ण विनिर्देश का कोई भी दावा उपयोगी नहीं है।
  6. पेटेंट एक झूठे सुझाव या प्रतिनिधित्व पर प्राप्त किया गया था।
  7. पूर्ण विनिर्देश का कोई भी दावा इस अधिनियम के तहत पेटेंट योग्य नहीं है।

पेटेंट समापन का सिद्धांत क्या है?

पेटेंट समापन का सिद्धांत पेटेंटकर्ता के अधिकारों को नियंत्रित करने के लिए सीमित करता है कि अन्य लोग एक आविष्कार को मूर्त रूप देने या युक्त लेख के साथ क्या कर सकते हैं। सिद्धांत के अनुसार, किसी पेटेंट वस्तु की पहली या प्रारंभिक अधिकृत बिक्री उस वस्तु के सभी पेटेंट अधिकारों को समाप्त कर देती है। हालांकि, यह केवल पेटेंटकर्ता के अधिकार को बेचे गए विशेष लेख तक सीमित करता है और खरीदार को पेटेंट किए गए आविष्कार की नई प्रतियां बनाने से रोकने के उसके अधिकार को प्रभावित नहीं करता है।

संदर्भ

 

भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधन

यह लेख Diksha Shastri द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारत में संवैधानिक संशोधनों के लिए पूरी प्रक्रिया को शामिल करता है और वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों को उनके प्रभावों और नतीजों के साथ सूचीबद्ध करता है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐतिहासिक निर्णय सामने आते हैं। इसमें पहले संशोधन से लेकर सबसे हाल के संवैधानिक संशोधन अर्थात् 106वें संशोधन तक संवैधानिक संशोधनों की संपूर्ण सूची शामिल है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत की स्वतंत्रता के ठीक बाद, भारतीय संविधान का प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) शुरू हुआ था। क्या आप जानते हैं कि इस पहले संस्करण (वर्जन) में स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार पर कोई प्रतिबंध नहीं था? यह दिलचस्प है, है ना? फिर, आपके विचार से वे युक्तिसंगत प्रतिबंध कैसे लगाए गए थे?

भारतीय कानूनी प्रणाली में लाया गया कोई भी संशोधन भारत के संविधान (इसके बाद “संविधान” के रूप में संदर्भित) के अनुसार होना चाहिए जो भारत के पूरे गणराज्य को नियंत्रित करता है।

तो, क्या होता है जब भारत राष्ट्र में बदलाव की बहुत आवश्यकता होती है, लेकिन मौजूदा संविधान इसके बारे में कुछ भी व्यक्त नहीं करता है? इसका उत्तर संविधान के संशोधन में निहित है। संविधान में संशोधन करके विधायी ढांचे को बदला जा सकता है। यह लेख यह भी बताता है कि भारत में विधायी ढांचे और संविधान में किस हद तक संशोधन किया जा सकता है।

इस लेख में भारत में अब तक के सभी महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों का गहन अध्ययन शामिल है। संविधान बनाने के पीछे इतना इतिहास है जैसा कि आज है, आइए एक यात्रा करें और देखें कि यह सब कैसे शुरू हुआ!

संविधान संशोधन से क्या तात्पर्य है

भारत के संविधान में किसी भी परिवर्तन या संशोधन को संवैधानिक संशोधन के रूप में जाना जाता है। संविधान संशोधन के लिए, संसद को संविधान के प्रावधानों द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। किसी विशेष प्रावधान में नई जानकारी जोड़कर या पहले से मौजूद जानकारी को छोड़कर संशोधन किया जाता है।

भारत के संविधान में संशोधन के विभिन्न तरीके

चूंकि संविधान सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है जो हमारे राष्ट्र की संपूर्णता को भी नियंत्रित करता है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि संशोधन सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद ही हों। परिणामस्वरूप, हमारे संविधान के संशोधन को सामान्य कानून में संशोधन या परिवर्तन से अलग तरीके से लिया जाता है।

अनुच्छेद 368 संसद को तीन विभिन्न प्रकार के संवैधानिक संशोधनों की अनुमति देता है –

  1. संसद के दोनों सदनों के साधारण बहुमत से मतदान;
  2. संसद के विशेष बहुमत द्वारा मतदान; और
  3. अंत में, पहले उल्लिखित विशेष प्रावधानों के लिए: विशेष बहुमत द्वारा मतदान और साधारण बहुमत द्वारा आधे राज्य विधानसभाओं की व्यक्त सहमति।

भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

ऊपर वर्णित तीन प्रकार के संशोधनों के लिए, निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाता है:

साधारण बहुमत से संशोधन

अनुच्छेद 368 के अनुसार, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत प्राप्त करके संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है। एक साधारण बहुमत का मतलब है कि उपस्थित और मतदान करने वाले 50% सदस्यों को प्रस्तावित संशोधन के अनुमोदन में मतदान करना होगा।

  • साधारण बहुमत के माध्यम से निम्नलिखित प्रकार के प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है:
  • अनुच्छेद 2 के तहत एक नए राज्य की स्थापना;
  • क्षेत्रों और राज्यों में सीमाओं का परिवर्तन;
  • किसी राज्य की विधान परिषदों का गठन या उन्मूलन (एबॉलिशमेंट);
  • मौजूदा राज्यों के नामों में परिवर्तन; और आदि।

संसद का विशेष बहुमत

अन्य मामलों में, जहां संशोधन का विषय थोड़ा अधिक जटिल है, संसद के विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। संसद के विशेष बहुमत में दो चीजें शामिल होती हैं:

  1. संसद के प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों से संशोधन के पक्ष में 50% से अधिक मतों का बहुमत; और
  2. प्रत्येक सदन का उपस्थित और मतदान का दो-तिहाई बहुमत।

निम्नलिखित परिस्थितियों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है:

  • मूल संरचना को बाधित किए बिना संविधान के प्रावधानों को बदलना;
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए;
  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) (सी.ए.जी.) को हटाना; और
  • राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित मामलों के लिए।

राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुसमर्थन के साथ विशेष बहुमत

संविधान के प्रावधानों में कोई भी परिवर्तन जो भारत की संघीय प्रकृति और राजनीति से संबंधित है, विशेष बहुमत के माध्यम से कम से कम आधे राज्य विधानसभाओं की सहमति प्राप्त करने के बाद ही पारित किया जाना चाहिए।

निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तनों के लिए राज्य विधानसभाओं के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है:

  • राष्ट्रपति चुनाव;
  • संघ और राज्यों की शक्ति का दायरा; और
  • सर्वोच्च न्यायालय, किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय आदि से संबंधित कोई भी प्रावधान

मुख्य टिप्पणी: संविधान के किसी भी प्रकार के संशोधन के लिए, संसद के प्रत्येक सदन में विधेयक को अलग से पारित करना अनिवार्य है।

भारत में संवैधानिक संशोधनों का एक संक्षिप्त इतिहास

भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद, भारतीय संविधान को नवंबर 1949 में संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
भारत द्वारा अपनी स्थापना के 15 महीने के बाद, अधिकारों के प्रतिबंधों की कमी के कारण कई मुद्दों का सामना करना पड़ा। इसके चलते पहली बार संविधान में संशोधन की जरूरत महसूस की गई। इसलिए, इन प्रतिबंधों को शामिल करने और संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 के अधिनियमन द्वारा सामाजिक व्यवस्था लाने के लिए अनुच्छेद 19(1)(a) को बहुत अधिक बदल दिया गया था।

तब से, भारत में कुल 106 संवैधानिक संशोधन पारित किए गए हैं। जबकि संवैधानिक संशोधनों की यात्रा समाजवादी और कल्याणकारी सुधार लाने और समानता को बढ़ावा देने के साथ शुरू हुई, जल्द ही, शक्तियों की सीमा, चार्टर दस्तावेज की मूल संरचना को भी बदला जा रहा था। कई संवैधानिक संशोधनों को वर्षों से गंभीर आलोचना का सामना करना पड़ा है, कई को निरस्त कर दिया गया है, और कई सकारात्मक बदलाव लाए हैं। आइए हम भारतीय संविधान के सभी महत्वपूर्ण संशोधनों की पूरी सूची पर एक नज़र डालें।

भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधनों की सूची

अब जब हम संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति के दायरे को संक्षेप में समझ गए हैं, तो अब तक के सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों की सूची पर एक नज़र डालने का समय आ गया है। 100 से अधिक संवैधानिक संशोधन किए गए हैं। इसके अलावा, संक्षेप में चर्चा किए गए उपरोक्त मामलों से, हम यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि इन संशोधनों ने विवादों को जन्म दिया है और समग्र भारतीय कानूनी ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव और सुधार लाए हैं।

संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951

1951 के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन के माध्यम से लाए गए मौलिक अधिकारों में यह एकमात्र बदलाव नहीं था। व्यापार और पेशे का अभ्यास करने की स्वतंत्रता में अनुच्छेद 19(6) में “आम जनता का हित” भी जोड़ा गया था।

पहले संवैधानिक संशोधन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू उस समय स्थापित जमींदारी उन्मूलन कानूनों की वैधता को सुरक्षित करने के लिए प्रावधानों को जोड़ना था। आइए बेहतर समझ के लिए पहले संवैधानिक संशोधन के माध्यम से लाए गए सभी संशोधनों की एक सूची देखें:

  1. अनुच्छेद 15: अनुच्छेद 29 के प्रावधानों के बावजूद, भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों, अनुसूचित जातियों (एस.सी.) और अनुसूचित जनजातियों (एस.टी.) की बेहतरी के लिए विशेष प्रावधान बनाने के लिए अनुच्छेद 15 में संशोधन किया गया था।
  2. अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर किसी भी उचित प्रतिबंध के बिना, इसका दुरुपयोग बढ़ गया। इस दुरुपयोग को खत्म करने के लिए, प्रावधान को यह सुनिश्चित करने के लिए संशोधित किया गया था कि मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं।
  3. अनुच्छेद 31A का सम्मिलन: अनुच्छेद को कुछ कानूनों की रक्षा के लिये सम्मिलित किया गया था जो संपत्ति के अधिग्रहण के लिये पारित किये जायेंगे, भले ही वे निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।
  4. अनुच्छेद 31B: कुछ अधिनियमों और विनियमों को मान्य करने के लिये नया अनुच्छेद 31B भी डाला गया था। इस अनुच्छेद के अनुसार, नौवीं अनुसूची के तहत पारित कोई भी कानून अदालत के किसी भी प्रकार के निर्णय द्वारा असंगति के किसी भी आधार पर शून्य नहीं ठहराया जाएगा।

संविधान (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1952

1951 की जनगणना के बाद, यह पाया गया था कि राज्यों और क्षेत्रों के भीतर जनसंख्या राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार नहीं थी। नतीजतन, प्रदेशों को फिर से समायोजित करने की आवश्यकता थी।

1952 में, संविधान (दूसरा संशोधन) अधिनियम लोक सभा में चुने गए सदस्यों की संख्या में परिवर्तन करने के लिए पारित हुआ। ये परिवर्तन भारत में विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों (यू.टी.) की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रस्तावित किए गए थे। अनुच्छेद 81, जो लोक सभा के गठन का प्रावधान करता है, में संशोधन किया गया ताकि राज्यों के पुन: समायोजन के उद्देश्य से लोक सभा में सदस्यों की ऊपरी सीमा में ढील दी जा सके। संशोधन से पहले, अनुच्छेद 81(1)(b), प्रत्येक राज्य को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया था और 7,50,000 की आबादी के लिए एक से कम सदस्य का चयन नहीं किया गया था और 5,00,000 की आबादी के लिए एक से अधिक सदस्य का चयन नहीं किया गया था। पुन: समायोजन के उद्देश्य से, और राज्यों के प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाने के लिए, प्रति 7,50,000 जनसंख्या पर एक सदस्य से कम नहीं की ऊपरी सीमा को छोड़ दिया गया था।

दूसरे संविधान संशोधन की आवश्यकता

यह विधेयक जून 1952 में संसद में पेश किया गया था, क्योंकि संसद में एक सीट के लिए अधिकतम आबादी के लिए ऊपरी सीमा को कम करने की आवश्यकता थी। भारत के संविधान में इस महत्वपूर्ण संशोधन से पहले, संसद के निचले सदन में सदस्यों की कुल संख्या 500 थी। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि एक सदस्य 7,50,000 लोगों की आबादी से अधिक का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि, देश में जनसंख्या के बदलते रुझान के साथ, स्वतंत्रता के बाद, इस अधिकतम सीमा को छोड़ना आवश्यक हो गया था, जिसके परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन किया जाना था।

दूसरे संशोधन के महत्वपूर्ण प्रावधान

1 मई 1952 को लागू होने वाले, दूसरे संवैधानिक संशोधन ने अनुच्छेद 81 (1) (b) के संशोधन के लिए “प्रत्येक 7.5 लाख जनसंख्या के लिए एक सदस्य से कम नहीं” शब्दों को हटाने के लिए प्रदान किया, जो कि जनसंख्या पर ऊपरी सीमा या अधिकतम सीमा है।

संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955

स्वतंत्रता और संविधान की स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में, संपत्ति के अधिकार और जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बीच विवाद के कारण एक बड़ा व्यवधान (डिस्रप्शन) था। 1955 में, संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 को जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के लिए पारित सभी कानूनों को शामिल करने के लिए पारित किया गया था जो संविधान की नौवीं अनुसूची के तहत आएंगे। यह एक विशेष प्रावधान है जो इसमें सूचीबद्ध कुछ कानूनों को न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) के दायरे से बचाता है। ये कानून प्रमुख रूप से भूमि के अधिग्रहण (एक्विजिशन) और इस तरह के अधिग्रहण के बदले में प्रदान किए गए मुआवजे से संबंधित थे। इस उद्देश्य के लिए, अनुच्छेद 31 और 31A में संशोधन किया गया था (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल के फैसले में अनुच्छेद 31 की व्यापक व्याख्या के बाद)।

चौथे संविधान संशोधन का उद्देश्य

1955 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के कुछ हालिया निर्णयों के कारण, शब्दों में अस्पष्टता को समाप्त करने के लिए संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन करने की आवश्यकता महसूस की गई, विशेष रूप से अनुच्छेद 31 को प्रदान करते हुए। इस अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों का कथन यह दर्शाता है कि भले ही अनुच्छेद 31 के दो उप-खंडों में शब्द अलग-अलग थे, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या समान थी। इसलिए, अनुच्छेद 31 के शब्दों में स्पष्टता में सुधार करने की आवश्यकता थी।

इसके अलावा, इस संशोधन अधिनियम ने निम्नलिखित उद्देश्यों को भी पूरा किया:

  • भारत में कृषि भूमि पर भूमि सुधार उपायों को सुविधाजनक बनाना;
  • देश में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए योजना में सुधार करना और मलिन बस्तियों को हटाना; और
  • अधिक से अधिक जनता के हित के लिए, एक वाणिज्यिक (कमर्शियल) या औद्योगिक उपक्रम (इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग) के अधिग्रहण की सुविधा के लिए।

चौथे संशोधन के महत्वपूर्ण प्रावधान

भारत के संविधान के कई प्रावधानों को संशोधित किया गया और साथ ही इस अधिनियम के एक हिस्से के रूप में जोड़ा गया। आइए हम विभिन्न परिवर्तनों पर गहराई से एक नज़र डालें:

अनुच्छेद 31 में परिवर्तन

अधिनियम के अनुसार अनुच्छेद 31 के संशोधन ने संपत्ति के मौलिक अधिकार को हटा दिया और इसे कानूनी अधिकार में बदल दिया। यह जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की सुविधा के लिए किया गया था।

नया अनुच्छेद 31A

यह अनुच्छेद कुछ कानूनों को अनुच्छेद 13 के तहत असंवैधानिक होने से बचाने के लिए पेश किया गया था। निम्नलिखित प्रकार के कानूनों को शामिल किया गया था:

  • राज्य द्वारा संपत्ति के अधिग्रहण और मुआवजे के भुगतान के लिए कानून;
  • राज्य द्वारा सीमित अवधि के लिए संपत्ति प्रबंधन का अधिग्रहण करना;
  • निगमों का समामेलन (अमलगमेशन); और
  • शेयरधारकों का संशोधन, आदि।

उपरोक्त उद्देश्यों के संबंध में सभी कानूनों को अनुच्छेद 14 और 19 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ असंगति के आधार पर असंवैधानिक के रूप में आयोजित किए जाने के खिलाफ इस नए अनुच्छेद के तहत सुरक्षा प्रदान की गई थी।

अनुच्छेद 31B

यह अनुच्छेद संसद द्वारा पारित और नौवीं अनुसूची में निर्दिष्ट कुछ अधिनियमों और विनियमों को मान्य करने के लिए पेश किया गया था। इसने विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा पारित भूमि सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए पारित कुछ कानूनों को मान्य किया।

अनुच्छेद 39(b)

अनुच्छेद 39 के उप-खंड (b) को राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को सुविधाजनक बनाने के लिए जोड़ा गया था, जिसमें कहा गया था कि विभिन्न कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) के माध्यम से धन और संसाधनों की एकाग्रता को हर कीमत पर टाला जाना था।

नौवीं अनुसूची में संशोधन

नौवीं अनुसूची में निम्नलिखित अधिनियमों को पेश करने के लिए संशोधन किया गया था:

संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956:

यह अधिनियम भारत के संविधान के सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक के अंतर्गत आता है क्योंकि इसने भारत में केंद्र शासित प्रदेशों की अवधारणा पेश की थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन के कई उदाहरण बार-बार सामने आए हैं। पहले कुछ वर्षों के भीतर एक राज्य पुनर्गठन समिति का गठन किया गया था, जिसके तहत सुझाव दिए गए थे। उन सुझावों को लागू करने के लिए संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 अधिनियमित किया गया था।

सातवें संशोधन का महत्व

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 31 अगस्त 1956 को 14 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल करने के लिए पारित किया गया था। इससे दंगे और विवाद हुए, जिसके परिणामस्वरूप गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों का विभाजन हुआ और बॉम्बे को एक अलग राज्य के रूप में आयोजित किया गया।

सातवें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा लाए गए प्रमुख परिवर्तन

इस अधिनियम के तहत किए गए संशोधन 1 अक्टूबर 1956 से लागू किए गए थे। प्रमुख परिवर्तन निम्नलिखित थे:

  • केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) को पेश किया गया;
  • राज्यों की तीन श्रेणियों (भाग A, B, C और D) को समाप्त कर दिया गया;
  • नए राज्यों की स्थापना की गई;
  • मौजूदा राज्यों की सीमाओं को बदल दिया गया (केरल जैसे नए राज्यों का गठन त्रावणकोर, कोचीन के क्षेत्रों को मालाबार जिले मद्रास के साथ मिलाकर किया गया था। कुछ का विलय भी कर दिया गया, जैसे कच्छ और सौराष्ट्र को बंबई में मिला दिया गया);
  • राजप्रमुखों की भूमिका (जैसा कि नीचे चर्चा की गई है) को छोड़ दिया गया था।

नोट:

भाग A राज्यों में ब्रिटिश भारत के 9 राज्यपाल प्रांत शामिल थे जैसे अजमेर-मेवाड़ा, नागपुर प्रांत, पूर्वी बंगाल और असम, ग्वालियर, बलूचिस्तान, आदि।

भाग B में ब्रिटिश भारत की 9 रियासतें जैसे हैदराबाद, त्रावणकोर, भोपाल, जूनागढ़ और बहुत कुछ शामिल थे।

भाग C राज्य में ब्रिटिश भारत के मुख्य आयुक्त प्रांत और दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और असम जैसी कुछ रियासतें थीं।

भाग D राज्यों में ब्रिटिश भारत के तहत लेफ्टिनेंट द्वारा शासित प्रांत शामिल थे

महत्वपूर्ण प्रावधान

इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप, भारत के संविधान के अनुच्छेद 1 को भी पहली अनुसूची के साथ बदल दिया गया था।

इसके अलावा, नए केंद्र शासित प्रदेशों के लागू होने के बाद राज्यसभा की सीटों में बदलाव के लिए अनुच्छेद 80 और चौथी अनुसूची को बदल दिया गया था। फिर, भारत में भाग C राज्यों को समाप्त करने और नए केंद्र शासित प्रदेशों को आधिकारिक तौर पर स्थापित करने के लिए, विभिन्न अनुच्छेदों में कई अन्य बदलाव किए गए। यहां तक कि भाग B राज्यों के उन्मूलन की सुविधा के लिए अनुच्छेद 131 को संशोधित किया गया था।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 में भी दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति के लिए तकनीकी बाधाओं की संभावना को हटाने के लिए एक परंतुक (प्रोविजो) जोड़कर संशोधन किया गया था।

राजप्रमुख की अवधारणा स्वतंत्रता से पहले भारत में एक प्रशासनिक स्थिति या उपाधि को संदर्भित करती है। कोई राजप्रमुख को किसी भारतीय प्रांत या राज्य का नियुक्त राज्यपाल मान सकता है। अब शीर्षक रखने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, इस संशोधन का उद्देश्य शीर्षक को समाप्त करना था। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति (वी.पी.) के रूप में नियुक्ति से या यहां तक कि राष्ट्रपति और कार्यकारी शक्तियों से बहिष्कार के लिए उनके शीर्षक को हटाना था। इसे संभव बनाने के लिए, संविधान के कई प्रावधानों में बदलाव किया गया था।

अनुच्छेद 216 में अंतिम परिवर्तन किया गया, ताकि इसके प्रावधान को हटाया जा सके। परंतुक में मूल रूप से कहा गया है कि राष्ट्रपति के पास किसी भी उच्च न्यायालय में नियुक्त किए जाने वाले न्यायाधीशों की संख्या को सीमित करने की शक्ति थी। हालांकि यह अक्सर परिवर्तन के लिए खुला था, इसलिए परंतुक को पूरी तरह से छोड़ने का निर्णय लिया गया।

संविधान (दसवां संशोधन) अधिनियम, 1961

इस संशोधन के माध्यम से, भारत में आधिकारिक तौर पर एक नया केंद्र शासित प्रदेश पेश किया गया था। दादरा और नगर हवेली केंद्र शासित प्रदेश को इस अधिनियम के तहत अनुच्छेद 240 (1) में संशोधन करके भारत के 7वें केंद्र शासित प्रदेश के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

10वें संशोधन की आवश्यकता

1954 तक, दादरा और नगर हवेली का केंद्र शासित प्रदेश पुर्तगाल का उपनिवेश (कॉलोनी) था। यह मुद्दा तब उठा जब पुर्तगालियों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी, इस क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर उनके शासन में माना जाता था। नतीजतन, दादरा और नगर हवेली के मुक्त क्षेत्र के लिए एक पंचायत का गठन किया गया था।

1961 में, तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ एक समझौते के माध्यम से भारत गणराज्य के साथ डी एंड एन.एच  के क्षेत्र का विलय (मर्ज) करने का निर्णय लिया गया था।

10वें संशोधन के प्रावधान

पहली अनुसूची में संशोधन

इस अधिनियम के तहत संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन किया गया था ताकि केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली को भारत के 7वें केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जोड़ा जा सके।

अनुच्छेद 240(1)

इस उप-खंड में केंद्र शासित प्रदेश को शामिल करने और भारत के राष्ट्रपति को नव स्थापित केंद्र शासित प्रदेश की सरकार में शांति, विकास और सद्भाव बनाए रखने के लिए नियम और कानून बनाने की अनुमति देने के लिए संशोधन किया गया था।

संविधान (पंद्रहवां संशोधन) अधिनियम, 1963

1963 में लोकसभा में संविधान में विभिन्न परिवर्तनों को प्रभावी करने के लिए पेश किया गया, जो कुछ समय से बातचीत में था, 15 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1963 भारत में महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों में से एक है।

15वें संशोधन का उद्देश्य

नवंबर 1955 में, पांचवां संवैधानिक संशोधन अधिनियम लोकसभा में पेश किया गया था। हालांकि, विभिन्न कारणों से यह समाप्त हो गया, और केवल एक परिवर्तन पेश किया गया, और अन्य बने रहे। इन परिवर्तनों को 15 वें संशोधन के माध्यम से फिर से प्रस्तुत किया गया था।

इसके अलावा इस संशोधन को लाने का एक और बड़ा मकसद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र बढ़ाना था।

संशोधन का महत्व

सेवानिवृत्ति के लिए आयु सीमा बढ़ाने के अलावा, इस संशोधन ने उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र में निर्देश और रिट जारी करने की भी अनुमति दी।

15वें संविधान संशोधन के महत्वपूर्ण प्रावधान

संविधान के अनुच्छेद 217 में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने के लिए इस अधिनियम के तहत संशोधन किया गया था। इसी तरह संविधान के अनुच्छेद 224 में भी संशोधन कर उच्च न्यायालय के अतिरिक्त या कार्यकारी न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु को बदलकर 62 वर्ष कर दिया गया था। उच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए संविधान में अनुच्छेद 224A भी जोड़ा गया था। इसके अलावा, न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलों पर निर्णय लेने की शक्ति, विशेष रूप से उम्र को ध्यान में रखते हुए, राष्ट्रपति को हस्तांतरित कर दी गई थी, और तदनुसार अनुच्छेद 124 में संशोधन किया गया था।

इसके अलावा, अतीत में जब उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को तबादला किया गया था, तो वे किसी भी अदालत में वकालत नहीं कर सकते थे, जिसमें वे पद पर थे। चूंकि यह थोड़ा अनुचित प्रतीत होता है, इसलिए इस प्रमुख 15वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, अनुच्छेद 220 के तहत, यदि संविधान में बदलाव करके उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के समक्ष वकालत करने की अनुमति दी गई थी, सिवाय उस उच्च न्यायालय के, जिसमें वे अंतिम में पोस्टेड थे। इससे न्यायाधीशों का तबादले आसान हो गया और उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद अभ्यास करने के लिए अधिक विकल्प हासिल करने में भी मदद मिली।

इस संशोधन तक, जब एक पोस्टिंग से दूसरी पोस्टिंग में स्थानांतरित किया जाता था, तो न्यायाधीशों को सभी लागतों को वहन करना पड़ता था। इस प्रकार, अनुच्छेद 222 (2) में एक नया खंड जोड़ा गया, जो न्यायाधीशों को उनके तबादलों की सुविधा के लिए मुआवजे का भुगतान करने का प्रावधान करता है। इसके अलावा, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में रहने की अनुमति देने के लिए, अनुच्छेद 128 में भी संशोधन किया गया था।

इन सभी महत्वपूर्ण परिवर्तनों के साथ, सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन संविधान के अनुच्छेद 226 में किया गया था। भारत में उच्च न्यायालयों को सरकार के खिलाफ निम्नलिखित जारी करने की अनुमति देने के लिए इसे बदल दिया गया था:

  • रिट;
  • आदेश; और
  • दिशा-निर्देश

यह एक बड़ा कदम था जिसने आम जनता को राज्य और केंद्र सरकार को उनके गलत कामों के लिए जिम्मेदार ठहराने की अनुमति दी।

इस संशोधन से पहले, बर्खास्तगी के आरोपों का सामना करते समय, सभी सिविल सेवकों को सुनने या अपने पक्ष का प्रतिनिधित्व करने का कोई अवसर नहीं था। हालाँकि, इस संशोधन ने वह बदलाव लाया है। इसके कारण अनुच्छेद 311 में संशोधन हुआ, जो किसी राज्य के सिविल सेवकों की बर्खास्तगी, हटाने या रैंक में कमी का प्रावधान देता है। इसके अलावा, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के संबंध में अनुच्छेद 316 में संशोधन किया गया था ताकि अध्यक्ष की अनुपस्थिति के मामले में कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति की अनुमति दी जा सके।

संविधान (उन्नीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1966

इस अधिनियम का प्रवर्तन (इंफोर्समेंट) चुनाव न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) को समाप्त करने और चुनाव याचिका परीक्षणों को उच्च न्यायालयों द्वारा नियंत्रित करने की अनुमति देने के लिए चुनाव आयोग की एक महत्वपूर्ण सिफारिश का परिणाम था, जिसके कारण संविधान के अनुच्छेद 324 में संशोधन किया गया था।

19वें संशोधन की आवश्यकता

जब भारत की राजनीतिक व्यवस्था की बात आती है, तो 19वां संशोधन वास्तव में महत्वपूर्ण है। इसने आज भारत की राजनीति के काम करने के तरीके को आकार दिया। कई समस्याओं के कारण चुनाव न्यायाधिकरणों को हटाकर उनकी शक्तियों को उच्च न्यायालय को तबादला करने की जरूरत पड़ी।

संविधान में बड़े बदलाव

11 दिसंबर, 1966 को इसकी मंजूरी के बाद, 19वां संशोधन लागू हुआ, और भारत के संविधान में निम्नलिखित परिवर्तन लाया:

अनुच्छेद 324 का संशोधन

चुनाव के मामलों पर फैसला करने के लिए चुनाव न्यायाधिकरणों की स्थापना और नियुक्ति से संबंधित शब्दों को हटाने के लिए अनुच्छेद 324 (1) में संशोधन किया गया था।

संविधान (इक्कीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1967

भारत में, हमारे पास संविधान की 8 वीं अनुसूची के एक भाग के रूप में भाषाओं की एक आधिकारिक सूची है। इक्कीसवें संशोधन से पहले, सिंधी इस आधिकारिक सूची का हिस्सा नहीं थी। देश भर में सिंधी समुदाय और सिंधी भाषी लोगों की लगातार मांग के बाद इसे बदलने के लिए यह संशोधन पारित किया गया था।

21 वें संशोधन की उत्पत्ति

इक्कीसवें संशोधन को लागू करने के लिए विधेयक 20 मार्च, 1967 को राज्यसभा में अधिनियमित किया गया था और अप्रैल 1967 में पेश किया गया था। इस संशोधन का कारण सिंधी भाषी लोगों की इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग थी।

21वें संशोधन का महत्व

सिंधी भाषी भारतीयों के साथ भाषाई अल्पसंख्यक आयोग का मानना था कि सिंधी भी 8 वीं अनुसूची के तहत मान्यता प्राप्त आधिकारिक भाषाओं का एक हिस्सा थी। परिणामस्वरूप, सिंधी को अन्य आधिकारिक भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में शामिल करने के लिए 8वीं अनुसूची में संशोधन किया गया था।

संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971:

24वां संशोधन अधिनियम, आई.सी. गोलकनाथ के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय का परिणाम था। यह पहला फैसला था जिसने संसद को ऐसी शक्तियां रखने का अधिकार नहीं दिया था जो किसी भी तरीके से संविधान में संशोधन कर सकती थी। जिसका अर्थ है कि इस फैसले ने पहले वाले को उलट दिया, जो उसी अदालत द्वारा बहुत समान पहलुओं पर पारित किया गया था।

इस प्रकार, अनुच्छेद 368 में संशोधन किया गया था क्योंकि भूमि सुधार कानूनों और अन्य कानूनों की वैधता को चुनौती देने के लिए पूरे भारत में अदालतों के समक्ष उत्पन्न होने वाले मामलों की बढ़ती संख्या के कारण, यह स्पष्ट रूप से उल्लेख करना महत्वपूर्ण था कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति संपूर्ण थी। इस कदम के परिणामस्वरूप संसद को एक प्रकार की असीमित शक्ति प्राप्त हुई।

हालाँकि, एक और प्रावधान जो अभी भी मौलिक अधिकारों की रक्षा करता था वह अनुच्छेद 13 था। शक्ति को और अधिक संपूर्ण बनाने के लिए, अनुच्छेद 368 के तहत पारित कानूनों को अनुच्छेद 13 के तहत असंवैधानिक होने से बचाने के लिए अनुच्छेद 13 में भी संशोधन किया गया था।

सभी संवैधानिक विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की सहमति को अनिवार्य बनाने के लिए एक अंतिम महत्वपूर्ण परिवर्तन भी पेश किया गया था। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 368 के उपखंड (c) से खंड (2) में संशोधन किया गया था।

24वें संशोधन का उद्देश्य

भारत के संविधान के इस महत्वपूर्ण संशोधन के पीछे का उद्देश्य उन कठिनाइयों को दूर करना था जो सरकार को राज्य नीतियों के निर्देशक सिद्धांतों (इसके बाद “डीपीएसपी” के रूप में संदर्भित) को व्यावहारिक प्रभाव देने में सामना करना पड़ा, खासकर जब भूमि अधिग्रहण का मामला आया।

सर्वोच्च न्यायालय ने बैंक राष्ट्रीयकरण मामले (1970) में, संपत्ति के मौलिक अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 31(2) का उल्लंघन करने वाले कानून को रद्द कर दिया था, जब सरकार द्वारा अधिग्रहित संपत्तियों से जुड़े मुआवजे की बात आई थी। इस संशोधन में, अनुच्छेद 31 को मुआवजे से राशि में बदलने के लिए बदल दिया गया था।

इतना ही नहीं, कुछ कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए अनुच्छेद 31B के बाद एक नया अनुच्छेद, अनुच्छेद 31C भी डाला गया था, जब तक कि राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी करने के लिए कानून पारित किया गया था।

भले ही संविधान के केवल दो प्रावधानों को बदल दिया गया था, फिर भी इसके द्वारा लाए गए परिवर्तन अभी भी बहुत महत्वपूर्ण थे क्योंकि इस संशोधन के परिणामस्वरूप संपत्ति का अधिकार, जो मौलिक अधिकार था, अब एक हद तक कम हो गया था।

संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971

प्राचीन भारत में, प्रिवी पर्स एक ऐसी प्रणाली थी जहां ग्रामीणों और आम लोगों को शासकों को कुछ राशि का भुगतान करना पड़ता था। जब संविधान पेश किया गया था और भारत को लोकतंत्र के रूप में घोषित किया गया था, तो इन प्रथाओं को कानूनी रखने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इस प्रकार, इस अवधारणा को समाप्त करने और पूर्व राज्यों के शासकों को समाप्त करने के लिए 26 वां संवैधानिक संशोधन लागू किया गया था।

संविधान (चौंतीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1974

जुलाई, 1972 के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में भूमि के स्वामित्व की सीमा को कम करने के लिए अनेक सुझाव दिए गए। ये वे परिवर्तन हैं जो इस अधिनियम के तहत लागू हुए हैं।

  • ऊपरी सीमा (सीलिंग) के स्तर में कमी;
  • परिवार के आधार पर अधिकतम सीमा का अनुप्रयोग; और
  • सभी छूटों को वापस लेने के लिए।

परिणामस्वरूप, संविधान की नौवीं अनुसूची में एक परिवर्तन लाया गया और सूची में दो नए कानून जोड़े गए, अर्थात्:

संविधान (छत्तीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1975:

इस संशोधन के पारित होने से पहले, सिक्किम राज्य सिर्फ एक छोटा बौद्ध राज्य था, जो एक सम्राट के अधीन शासित था। सिक्किम को भारत के सहयोगी राज्य के रूप में स्वीकार करने के लिए 36वां संशोधन अधिनियम पारित किया गया था। इसलिए, सिक्किम को जोड़ने के लिए पहली अनुसूची में संशोधन किया गया था, और यहां तक कि राज्य सभा में सिक्किम राज्य को एक सीट भी आवंटित की गई थी।

36वें संशोधन की आवश्यकता

जब सिक्किम के मुख्य मंत्री ने भारतीय संसद से सिक्किम को भारत के आधिकारिक राज्य के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया, तो मतदान किया गया और 97% से अधिक वोट प्राप्त करने के बाद, संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता पैदा हुई।

संविधान में बड़ा बदलाव

सिक्किम को एक राज्य के रूप में मान्यता देने के लिए, पहली अनुसूची में संशोधन किया गया था और सिक्किम का नाम भारत के विभिन्न राज्यों के साथ शामिल किया गया था।

संविधान (अड़तीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1975

जिन परिस्थितियों में 38वां संशोधन लागू किया गया , वे इसे संवैधानिक संशोधनों के इतिहास के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण बनाती हैं। यह अधिनियम तब लागू किया गया था जब आंतरिक विवाद के कारण भारत में राष्ट्रव्यापी आपातकाल घोषित किया गया था।

भारतीय संविधान के 38वें संशोधन का उद्देश्य और दायरा

भारतीय संविधान के 38 वें संशोधन को पेश करने का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राज्य और राष्ट्रपति की शक्तियों को बढ़ाना था। इसके अलावा, इसने भारत में राष्ट्रीय आपातकाल के संबंध में किए गए निर्णयों की समीक्षा करने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को भी हटा दिया।

यह विचार भारत में आपातकाल की किसी भी स्थिति के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों को पूर्ण और गैर-बहस योग्य बनाने के लिए था। इस प्रावधान का अधिक दिलचस्प पहलू यह है कि इसे 1975-77 के दौरान लागू किया गया था, जब आपातकाल लागू था। गुजरात, पंजाब, राजस्थान, मणिपुर आदि राज्यों सहित भारत के कई राज्यों ने इस संशोधन की पुष्टि नहीं की।

इसे एक महत्त्वपूर्ण संशोधन माना जाता है क्योंकि इससे राष्ट्रपति के निर्णयों या कार्यों की समीक्षा करने की न्यायपालिका की शक्ति को छीनने या सीमित करने से न्यायपालिका और कार्यपालिका की शक्तियों में असंतुलन पैदा हो गया है।

संविधान में महत्वपूर्ण परिवर्तन

यह विशेष संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति, राज्यपाल और प्रशासकों के लिए शक्तियों के दायरे को बढ़ाने के लिए किया गया था। अनुच्छेद 123, 213 और 239B को इस तथ्य को प्रभावी करने के लिए बदल दिया गया था कि तीन पदों की संतुष्टि निर्णायक होगी।

इसके अलावा, अनुच्छेद 352, 356 और 360, जो राष्ट्रपति को राष्ट्र में निम्नलिखित आधारों पर आपातकाल के संबंध में शक्तियां प्रदान करते हैं:

  • युद्ध की धमकी, बाहरी आक्रमण या आंतरिक गड़बड़ी;
  • वित्तीय आपातकाल; और
  • राज्य सरकार की विफलता;

जो चुनौती और विवाद में थे, आपातकाल को गैर-न्यायोचित बनाने के लिए संशोधन भी किए गए थे।

तथ्य यह है कि आपातकाल की भविष्य की घोषणाओं के खिलाफ एक चुनौती थी, अनुच्छेद 356 में एक बदलाव किया गया था, ताकि राष्ट्रपति को पूर्व घोषणाओं के प्रवर्तन के बावजूद कई आधारों पर आपातकाल की घोषणा को लागू करने की अनुमति मिल सके।

अनुच्छेद 359 में भी संशोधन किया गया ताकि मौलिक अधिकारों के निवारण को अनुच्छेद 358 में प्रदान किए गए समान पढ़ा जा सके।

इस संशोधन के परिणामस्वरूप, राष्ट्रपति के आदेशों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से हटा दिया गया, और आपातकाल के दौरान कार्यकारी के कार्यों की रक्षा की गई।

संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976

समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र की अखंडता को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से, यह अधिनियम 1976 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों को मिटाना था। नतीजतन, “समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता” शब्दों को प्रस्तावना में शामिल किया गया था, जो इस संशोधन को भारतीय संविधान के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक बनाता है।

संसद की शक्ति को प्रमुख महत्व दिया गया था, और भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा को आगे बढ़ाने में, संविधान के भाग IV में निर्धारित सभी सिद्धांतों को शामिल करने के लिए अनुच्छेद 31C का विस्तार किया गया था।

42वें संशोधन की आवश्यकता

इस संविधान में संशोधन की मुख्य आवश्यकता लगातार मुद्दों का सामना करने और मामलों की बढ़ती संख्या के कारण, सरकार के फैसले की वैधता को चुनौती देने के बाद महसूस की गई थी। नतीजतन, चीजों को स्पष्ट करने के लिए, 42 वां संशोधन, भारतीय संविधान का सबसे लंबा संशोधन पेश किया गया था।

42वें संशोधन का दायरा और उद्देश्य

संविधान के 50 से अधिक प्रावधानों में संशोधन कर इसका उद्देश्य संसद और केंद्र सरकार की शक्तियों को बढ़ाना और न्यायपालिका के प्रभाव को कम करना था। परिणामस्वरूप, निम्न प्रकार के परिवर्तन किए गए:

  • संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्षतावादी और अखंडता शब्द जोड़े जाने थे;
  • नागरिकों के लिए राष्ट्र के कल्याण पर अपनी जिम्मेदारी बढ़ाने के लिए मौलिक कर्तव्यों की शुरुआत की गई थी;
  • इसने अदालतों की न्यायिक समीक्षा की शक्तियों को भी कम कर दिया;
  • सरकार की शक्तियों में वृद्धि करके, भारत की संघीय प्रकृति को भी 42 वें संशोधन के दायरे में ले लिया गया; और
  • राज्यों और केंद्र के बीच शक्ति संतुलन में परिवर्तन।

संशोधन के प्रमुख प्रावधान

प्रमुख संशोधनों और इसकी व्यापक और विस्तृत प्रकृति के कारण, संविधान के 42 वें संशोधन को लघु-संविधान का नाम भी दिया गया है। इसने सरकार की केंद्रीय शक्ति को बढ़ाने, राज्य स्वायत्तता को कम करने और सरकार द्वारा पारित कानूनों की रक्षा के लिए संविधान के 50 से अधिक अनुच्छेदों में बदलाव लाए।

अनुच्छेद 31D

इस संशोधन में अनुच्छेद 31D पेश किया गया था, जहां कुछ कानूनों को असंवैधानिक के रूप में आयोजित किए जाने से संरक्षण प्रदान किया गया था, अगर यह निम्नलिखित में से किसी भी उद्देश्य के तहत आया:

  • राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की रोकथाम; और
  • राष्ट्रविरोधी संघ के गठन की रोकथाम।

अनुच्छेद 32A

अनुच्छेद 32 रिट याचिकाओं से निपटने के दौरान राज्य सरकार द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित कारकों पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दायरे को सीमित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 32A भी जोड़ा गया था।

अनुच्छेद 39

फिर, अनुच्छेद 39 में भी परिवर्तन किया गया। यह अनुच्छेद विशेष रूप से राज्य पर कुछ कर्तव्यों को डालने के लिए तैयार किया गया है, ताकि उच्चतम संभव सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को प्राप्त करने का प्रयास किया जा सके। इसलिए, राज्य के लिए एक डीपीएसपी पेश किया गया था, ताकि बच्चों को शोषण या परित्यक्त (अबैंडन) चाहे वह भौतिक या शारीरिक रूप से हो से बचाने के प्रयास किए जा सकें।

अनुच्छेद 39A का सम्मिलन

इस प्रावधान को और मजबूत बनाने के लिए नया अनुच्छेद 39A डाला गया। यह मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करके समाज के कमजोर वर्गों के लिए न्याय तक पहुंच प्रदान करता है। यह संशोधन ही कारण था कि आज निशुल्क विधिक सहायता की सहायता से निर्धन लोगों की न्याय तक पहुंच अपेक्षाकृत सरल है।

अनुच्छेद 43A का सम्मिलन

एक अन्य अनुच्छेद 43A भी जोड़ा गया। यह अनुच्छेद एक कारखाने की स्थापना के श्रमिकों को प्रबंधन में अधिक शामिल महसूस करने की अनुमति देने के लिए है। इसमें प्रावधान किया गया था कि राज्यों को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो उस परिवर्तन को करने के लिए आवश्यक हो सकते हैं। अनुच्छेद 48A को पेश करके पर्यावरण की रक्षा के लिए एक और प्रयास भी किया गया था, जिसमें यह प्रावधान था कि राज्यों को पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए कार्य करना चाहिए।

संविधान के भाग IVA का सम्मिलन

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस संशोधन में है कि भारत के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को भारतीय संविधान के भाग IVA के रूप में पेश किया गया था। तत्पश्चात्, यदि राष्ट्रपति द्वारा सलाह के इन टुकड़ों को अनुमोदित किया जाता है तो प्रधानमंत्री की सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का गठन करने के लिए अनुच्छेद 74 में परिवर्तन किए गए थे। इसलिए, इसने विभिन्न निर्णयों में राष्ट्रपति की शक्तियों के दायरे को और बढ़ा दिया।

अनुच्छेद 83

यहां तक कि अनुच्छेद 83 में शब्दों के प्रतिस्थापन द्वारा संसद के सदनों की अवधि को पांच से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया था।

अनुच्छेद 102 में परिवर्तन

अनुच्छेद 102 में संशोधन किया गया था ताकि यह लागू किया जा सके कि किसी भी व्यक्ति को संसद के पद से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए यदि वे भारत सरकार के तहत लाभ का पद धारण करते हुए पाए जाते हैं।

अनुच्छेद 131A

केंद्र द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिक वैधता तय करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विशेष अधिकार क्षेत्र प्रदान करने के लिए अनुच्छेद 131A भी पेश किया गया था।

अनुच्छेद 139A का सम्मिलन

इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय के दायरे को व्यापक बनाते हुए, अनुच्छेद 139A भी पेश किया गया था, जिसने सर्वोच्च न्यायालय को कुछ मामलों का अपने स्वयं के प्रस्ताव पर संज्ञान लेने की अनुमति दी थी, और यदि मामला एक या अधिक उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित है, तो उनका निपटान कर सकता है।

अनुच्छेद 144A

अनुच्छेद 144A के माध्यम से कानूनों की संवैधानिक वैधता का निर्धारण करते समय विशेष प्रावधान भी पेश किए गए थे। इसके अनुसार, ऐसे मामलों पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक न्यूनतम पीठ संख्या में 7 थी, और एक केंद्रीय कानून को पीठ में बैठे न्यायाधीशों के दो-तिहाई बहुमत के बिना अमान्य नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 131A और 139A के तहत कार्यवाही को सुविधाजनक बनाने के लिए न्यायालय के नियमों आदि में भी संशोधन किया गया। न्यायिक समीक्षा की शक्ति को कम करने और अधिकार क्षेत्र को सीमित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 में भी काफी बदलाव किया गया था।

अनुच्छेद 226A

इसके अलावा, संवैधानिक वैधता के लिए परीक्षण के दायरे से केंद्रीय कानूनों को बाहर रखने के लिए अनुच्छेद 226A पेश किया गया था।

42वें संशोधन की आलोचना

इस संशोधन ने भारत के संविधान की मूल संरचना को शाब्दिक रूप से बाधित करके, मूल संरचना सिद्धांत की शुरूआत का एक स्पष्ट मार्ग दिया। इस संशोधन से पहले, केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का संतुलन था, जिसने भारत द्वारा अनुसरण किए जाने वाले संघीय सिद्धांतों का भी मार्ग प्रशस्त किया। हालाँकि, इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से किए गए परिवर्तनों ने एक बड़ा असंतुलन पैदा किया, जिसके परिणामस्वरूप, इसे बहुत आलोचना का सामना करना पड़ा:

  • विपक्षी दल द्वारा;
  • अदालतों के समक्ष याचिकाएं; और
  • बड़े पैमाने पर जनता का विरोध।

संविधान (तैंतालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1977:

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्तियों के दायरे में जोड़ी गई सीमाओं पर किसी का ध्यान नहीं गया था। अनुच्छेद 32A, 131A, 144A, 226A और 228A ने अदालतों की शक्तियों पर अंकुश लगाया। इसके अलावा, कुछ अनुच्छेद भारत के कुछ हिस्सों में रहने वाले लोगों को न्याय तक पहुंचने में कठिनाइयां भी ला रहे थे।

43वें संशोधन की आवश्यकता

पिछले संवैधानिक संशोधनों के कारण, हाल ही में, न्यायालयों में मामलों की बहुत संख्या हो गई थी। यह न्याय प्रशासन पर अनावश्यक बोझ डाल रहा था। पूर्व संशोधनों से कुछ प्रावधानों को हटाने और बदलने और कुछ सामाजिक व्यवस्था लाने की आवश्यकता थी। इस प्रकार, 43वां संशोधन अधिनियम सामने आया।

43वें संशोधन के तहत प्रावधान

इस कदम के अलावा, संशोधन ने अदालतों को मामलों को इस तरह से तय करने की अनुमति दी जैसे कि वे अनुच्छेदों को पेश किए जाने से पहले दायर किए गए थे। इससे मामलों को तेजी से और अधिक कुशलता से निपटाने में मदद मिली।

अंतिम चरण के रूप में, अनुच्छेद 31D जो संसद को राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कानून बनाने की शक्तियां प्रदान करता था, को भी समाप्त कर दिया गया था, खासकर अब जब यह इतना स्पष्ट था कि शक्तियों का आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता था।

संविधान के 43वें संशोधन का महत्व

43वें संशोधन का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह है कि इसने 42वें संशोधन अधिनियम में पेश किए गए 6 प्रावधानों को अमान्य कर दिया, जो कि सत्ता में दल द्वारा संविधान में सुधार करने, इसे बदलने के लिए किया गया एक वादा था जैसा कि आपातकाल से पहले था। आइए निरस्त किए गए प्रावधानों पर एक नज़र डालें।

अनुच्छेद 31D

अनुच्छेद 31D का उन्मूलन साबित करता है कि इस संशोधन का उद्देश्य स्वतंत्रता को बढ़ाना था। इसके अलावा, इसने न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा शक्तियों को भी बहाल किया और शक्तियों के बीच एक उचित संतुलन बनाया।

अनुच्छेद 32A

अनुच्छेद 32A को अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे से राज्य के कानूनों को हटाने के लिए प्रावधान पेश किया गया था। इसलिए, कानूनों की समीक्षा करने के लिए अदालतों की शक्ति पर स्पष्टता दिए जाने के बाद, शक्ति संतुलन बनाने के लिए अनुच्छेद को निरस्त कर दिया गया था।

अनुच्छेद 131A

इस अनुच्छेद ने सर्वोच्च न्यायालय को केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता पर निर्णय लेने का विशेष अधिकार क्षेत्र प्रदान किया। जिसके परिणामस्वरूप, केंद्र द्वारा पारित कानूनों की वैधता पर निर्णय लेने की उच्च न्यायालय की शक्ति छीन ली गई। इसलिए, उच्च न्यायालयों की शक्ति को बहाल करने के लिए इस मनमाने प्रावधान को हटा दिया गया था।

अनुच्छेद 144A

इस अनुच्छेद में केंद्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता पर निर्णय लेने के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या 7 के रूप में उपस्थित होने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, इसके परिणामस्वरूप कई मामलों को रोका जा रहा था। इस प्रकार, अनुच्छेद 144A को हटाने का प्रस्ताव किया गया।

अनुच्छेद 226A और 228A

अनुच्छेद 226A केंद्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता पर निर्णय लेने के लिए उच्च न्यायालयों पर प्रतिबंध लगाता है। जिसके परिणामस्वरूप, इसे छोड़ दिया गया था। इसके अलावा, अनुच्छेद 228A जो राज्य कानूनों की वैधता के निपटान के लिए विशेष प्रावधान प्रदान करता है, ने सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर भी प्रतिबंध लगा दिया। इन सभी परिवर्तनों को धीरे-धीरे उलट दिया गया

संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1977:

42वें संशोधन के बाद, 44वां संवैधानिक संशोधन भी एक ऐसा संशोधन है जिसने भारत के विधायी ढांचे में महत्वपूर्ण बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया। संविधान के पिछले संशोधनों के साथ-साथ उस समय देश में हुई घटनाओं से यह स्पष्ट था कि नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकार भी बहुमत द्वारा लिए जाने की संभावना थी।

पिछली त्रुटियों का एक उदाहरण स्थापित करने के लिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए कि भविष्य में ऐसा कोई मुद्दा उत्पन्न न हो, संविधान के कुछ अनुच्छेदों और प्रावधानों को बदलने का प्रस्ताव किया गया था।

44वें संशोधन की आवश्यकता

इस अधिनियम में प्रस्तावित सभी परिवर्तन उन प्रावधानों को बदलने से संबंधित थे जो:

  • देश की धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक प्रकृति को बिगाड़ने का प्रभाव था;
  • मौलिक अधिकारों को छीन लिया;
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर प्रभाव पड़ा; और
  • न्यायिक शक्तियों से समझौता।

इसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 368 में संशोधन हुआ।

संशोधन के प्रमुख प्रावधान

फिर संपत्ति के मौलिक अधिकार से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवादों को खत्म करने के लिए अनुच्छेद 31 को भी हटा दिया गया और अनुच्छेद 19 में आवश्यक संशोधन किए गए। जब सरकार का ध्यान डीपीएसपीपी को प्राप्त करने की ओर स्थानांतरित हुआ, तो संपत्ति का मौलिक अधिकार समाजवादी लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक बाधा के रूप में सामने आ रहा था। नतीजतन, संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया था और इसके बजाय संविधान में कानूनी अधिकार के रूप में लेबल किया गया था।

इसके अलावा, मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार की सुरक्षा के लिए, आंतरिक विवादों को आपातकाल की घोषणा के लिए एक वैध आधार होने से हटाने का प्रस्ताव किया गया था, जब तक कि यह सशस्त्र विद्रोह न हो। भारत के संविधान को बदलने के लिए संसद की असाधारण शक्तियों पर रोक लगाने के लिए इस कदम की बहुत आवश्यकता थी।

फिर, इस संशोधन ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबंधों में भी परिवर्तन किया। इस प्रकार, कुछ शक्तियों को कम करने के लिए परिवर्तन किए गए थे जो सरकार या राष्ट्रपति को मौलिक अधिकारों को निलंबित करने की अनुमति देते थे।

भारत की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या को कम करने की भी आवश्यकता थी। इसे संभव बनाने के लिए, अनुच्छेद 132, 133 और 134 में संशोधन किया गया और नया अनुच्छेद 134A डाला गया। नया अनुच्छेद किसी राज्य के उच्च न्यायालय को निर्णय पारित करने के बाद किसी भी बिंदु पर सर्वोच्च न्यायालय की अपील के लिए प्रमाण पत्र देने पर विचार करने की अनुमति देता है, भले ही वह तत्काल हो।

यह संशोधन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने और भारत में मीडिया घरानों के लिए स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट करने में सक्षम होने पर विचार किया गया था। इससे आम जनता में मौजूदा स्थितियों के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद मिलेगी। इसलिए, यह भी कहा गया कि सरकार द्वारा मीडिया घरानों पर सेंसरशिप की कोई आवश्यकता नहीं थी।

संविधान (इक्यावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1984

31 मार्च 1980 के दिन, मेघालय राज्य ने संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की मांग करने के लिए एक प्रस्ताव के माध्यम से भारत सरकार से संपर्क किया था।

इस संकल्प का अर्थ था कि अब इस आरक्षण को सुगम बनाने के लिए अनुच्छेद 330 और 332 में संशोधन करने की आवश्यकता थी। इसलिए, संविधान (इक्यावनवां संशोधन) अधिनियम, 1984 पारित किया गया था।

संशोधन की आवश्यकता

मेघालय के अलावा, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम सरकारें भी इन संशोधनों को उन क्षेत्रों में भी प्रभावी बनाने के लिए जोर दे रही थीं। इस प्रकार, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम और आंध्र प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के इस आरक्षण की अनुमति देने के लिए इस संशोधन अधिनियम को लागू किया गया था।

51वें संशोधन के प्रमुख प्रावधान

अनुच्छेद 330

लोकसभा में नागालैंड, मिजोरम, आंध्र प्रदेश और मेघालय के एस.टी. के लिए सीटों के आरक्षण की अनुमति देने के लिए इस अनुच्छेद में बदलाव किया गया था।

अनुच्छेद 332

नागालैंड और मेघालय की विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण की अनुमति देने के लिए इस प्रावधान में संशोधन किया गया था।

संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985

जब तक पहले 50 संशोधन पारित किए गए, तब तक लोगों ने शक्ति संतुलन और शक्तियों के पृथक्करण (सेपरेशन) के महत्व को पहचानना शुरू कर दिया। कुछ राजनीतिक दोषों के कारण देश को कई व्यवधानों का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक दलबदल आमतौर पर उस स्थिति को संदर्भित करता है जब किसी विशेष राजनीतिक दल का व्यक्ति विद्रोह करता है या उस दल के साथ अपना जुड़ाव बदल लेता है, और दूसरे दल में शामिल हो जाता है।

इस मुद्दे को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। इस प्रकार, दलबदल विरोधी (एंट्री डिटेक्शन) विधेयक पारित किया गया था। इस विधेयक का उद्देश्य सभी प्रकार के राजनीतिक दलबदल को हटाना और अमान्य करना था। विचार यह सुनिश्चित करना था कि लोकतंत्र सुरक्षित रहे।

दलबदल विरोधी विधेयक के प्रावधान

नतीजतन, अनुच्छेद 101, 102 और 190 के प्रावधानों में बदलाव किए गए। साथ ही, संविधान की दसवीं अनुसूची पेश की गई, जो राजनीतिक दलबदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधान प्रदान करती है। आइए हम प्रावधानों में किए गए परिवर्तनों पर गहराई से एक नज़र डालें।

अनुच्छेद 101

प्रावधान को उन आधारों को निर्धारित करने के लिए संशोधित किया गया था जो निम्नलिखित में से किसी एक के सदस्यों के दलबदल के बराबर होंगे:

  • संसद का सदन; नहीं तो
  • राज्य की विधानसभा; नहीं तो
  • सदस्यों की परिषद।

इस विधेयक और संशोधनों ने देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लाया। बहस की एक श्रृंखला ने इस अधिनियम को जन्म दिया, और भारत के संविधान में एक बड़े बदलावों में से एक था।

अनुच्छेद 102

खंड (2) को संसद सदस्य के रूप में सदस्यता से निरर्हता की सूची में जोड़ा गया था, यदि उसे दसवीं अनुसूची के प्रावधान के अनुसार भी अयोग्य घोषित किया गया था।

अनुच्छेद 190

अनुच्छेद 191 का खंड (2) संसद के सदन से निरर्हता के दायरे में डाला गया था।

अनुच्छेद 191

इस अनुच्छेद में संशोधन करके यह जोड़ा गया था कि जो कोई भी अनुसूची 10 के तहत अयोग्य घोषित किया गया था, उसे किसी भी राज्य विधान परिषद या विधान सभा में सदस्यता की स्थिति के लिए इस प्रावधान के तहत भी अयोग्य घोषित किया जाएगा।

ऐतिहासिक पूर्ववर्ती निर्णय 

किहोटो होलोहान बनाम ज़चिल्हू और अन्य (1992)

यह भारत में दलबदल विरोधी विधेयक के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित ऐतिहासिक निर्णयों में से एक है। आइए तथ्यों, मुद्दों और निर्णय को देखें।

मामले के तथ्य

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कई राजनीतिक दलों द्वारा दलबदल विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता पर प्राप्त कई याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया था। मुख्य विवाद यह था कि 10वीं अनुसूची विशेष रूप से लोकतंत्र और भारत के संविधान के मूल सार का उल्लंघन कर रही थी।

उठाए गए मुद्दे

इस निर्णय में निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा की गई:

  • क्या संविधान की 10वीं अनुसूची ने हमारे देश के मूल ढांचे और लोकतांत्रिक स्वरूप का उल्लंघन किया है? और
  • क्या दसवीं अनुसूची का पैरा 7 न्यायिक समीक्षा के दायरे को सीमित कर रहा था और क्या इसे रद्द किए जाने की आवश्यकता थी?
निर्णय

3:2 के आश्चर्यजनक बहुमत के साथ, पीठ ने इस ऐतिहासिक निर्णय में निर्णय लिया कि दलबदल विरोधी कानून वैध था और इसलिए, इसने 52वें संवैधानिक संशोधन की वैधता की पुष्टि की। यह निर्णय इस बात की याद दिलाता है कि कानून के सभी प्रावधानों को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए, न कि इसके वास्तविक सार को प्राप्त करने के लिए भागों में।

संविधान (इकसठवां संशोधन) अधिनियम, 1988

पुराने समय में, भारत में मतदान के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी। फिर भी, कई देशों में, मतदान की आयु 18 वर्ष देखी गई। इसके अलावा, भारत में भी, कई राज्य सरकारें 18 वर्ष की आयु के समान पैटर्न का पालन कर रही थीं।

यह भी माना गया कि वर्तमान युवा उस परिपक्वता को हासिल करने और उसके अनुसार मतदान करने के लिए पर्याप्त स्मार्ट और साक्षर है।

संवैधानिक प्रावधान में बड़े बदलाव

मतदान के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष करने के लिए इस अधिनियम में अनुच्छेद 326 में संशोधन किया गया था। संशोधन अधिनियम पारित होने से पहले, अनुच्छेद 326 के अनुसार मताधिकार की आयु “21 वर्ष से कम नहीं” थी। हालांकि, इसे बदलकर 18 साल की उम्र कर दिया गया था।

संशोधन का महत्व

इससे पता चलता है कि समय और विकास के साथ, राष्ट्र के युवा अधिक परिपक्व हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप उनके लिए 18 साल की उम्र में मतदान का ऐसा निर्णय लेना ठीक माना गया था।

आज, यदि हम वयस्कता तक पहुंचते ही बाहर निकल कर मतदान कर पाते हैं तो ऐसा केवल भारत के संविधान के 61वें संशोधन के कारण है।

संविधान (पैंसठवां संशोधन) अधिनियम, 1990:

इस संशोधन को एक महत्त्वपूर्ण संशोधन माना जाता है क्योंकि इसमें एस.सी. एस.टी. को प्रदत्त अधिकारों से संबंधित सभी मामलों की जाँच के लिये अनुच्छेद 338 के तहत एक उच्च स्तरीय पाँच सदस्यीय आयोग का गठन किया गया है। यह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग का जन्म है, जिसमें पांच सदस्य, साथ ही अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य शामिल हैं। आयोग के पास राष्ट्रपति से पूछताछ, सलाह देने, प्रस्तुत करने और सुरक्षा उपायों तक पहुंच प्राप्त करने में एस.सी. और एस.टी. के सामने आने वाले मुद्दों की रिपोर्ट और रिकॉर्ड बनाने और रखने की शक्तियां थीं। इससे पहले इस अनुच्छेद के तहत एक ही अधिकारी आवंटित किया गया था, जिसकी भूमिका इस महत्वपूर्ण संविधान संशोधन के लागू होने पर हटा दी गई थी।

संविधान (उनहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1991

इस अधिनियम का उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित करना था। इस मामले को देखने के लिए नियुक्त एक समिति की रिपोर्ट से, यह निर्णय लिया गया कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में ठीक है, और उसे विधानसभा और मंत्रिपरिषद प्रदान की गई थी। इसके अलावा, रिपोर्ट की सिफारिशों में से एक सिफारिश अन्य केन्द्र शासित प्रदेशों के बीच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को एक विशेष दर्जा प्रदान करना था। इसी वजह से संसद ने अनुच्छेद 239AA और 239AB पेश किया।

संशोधन की आवश्यकता

90 के दशक से पहले, दिल्ली एक अलग नगर निगम था जो दिल्ली प्रशासन अधिनियम के माध्यम से शासित था। हालांकि, एक बार जब इसे राष्ट्रीय क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई थी, तो हमारे राष्ट्र की राजधानी को प्रशासित करने के तरीके को फिर से व्यवस्थित करने की आवश्यकता थी, जिसके परिणामस्वरूप, 69 वां संवैधानिक संशोधन पेश किया गया था।

प्रावधानों में बदलाव

अनुच्छेद 239AA

यह प्रावधान संशोधन की तारीख के साथ-साथ दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रूप में स्थापना की तारीख की घोषणा करने के लिए पेश किया गया था।

अनुच्छेद 239AB

इस अनुच्छेद ने प्रशासन की विफलता के मामले में प्रशासन को बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रावधान प्रदान किए। इसने राष्ट्रपति को संचालन के निलंबन का आदेश देने की शक्ति दी।

संविधान (तिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1992:

भारत में, पंचायती राज 1959 से कार्यात्मक है। हालांकि, 73 वें संशोधन तक, इसे संवैधानिक नहीं बनाया गया था। इस अधिनियम को पारित करने का उद्देश्य इस प्रणाली को उचित मान्यता देना था, ताकि वे सम्मान और गरिमा के साथ कार्य कर सकें।

मान्यता की कमी के कारण, उचित चुनाव प्रणाली नहीं थी, और पंचायती राज में भारी दमन के कारण, इस संशोधन ने संविधान के भाग IX को पेश किया जो भारत में पंचायतों के प्रबंधन के लिए सभी प्रावधान प्रदान करता है।

73वें संशोधन की आवश्यकता

प्रमुख आवश्यकता भारत में प्रचलित पंचायती राज प्रणालियों को मान्यता देने की थी। भारत में पंचायत प्रणाली की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को पहचानने के लिए अधिनियम को दो अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया था।

प्रावधानों में बड़ा बदलाव

संविधान के अनुच्छेद 40 को यह सुनिश्चित करने के लिए बदल दिया गया था कि राज्य ग्राम पंचायतों की स्थापना के लिए प्रयास कर रहे थे, और उन्हें स्वशासन की एक इकाई के रूप में कार्य करने की शक्तियां दे रहे थे।

संविधान (चौहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992:

जब कई राज्यों के स्थानीय निकाय विभिन्न कारणों से कमजोर और अप्रभावी हो गए। इसलिए, चौहत्तरवें संशोधन ने सरकार और शहरी स्थानीय निकायों के बीच संबंध लाने और कार्यों और कर शक्तियों का प्रबंधन करने, राजस्व साझाकरण की व्यवस्था करने आदि के बारे में बात की।

इससे तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का निर्माण और संरचना हुई:

  • नगर पंचायतें;
  • नगर परिषद; और
  • नगर निगम।

74वें संविधान संशोधन की आवश्यकता

इस संशोधन को पारित करने से पहले, सत्ता का केंद्रीकरण हुआ था। समय बीतने के साथ, सत्ता और शासन की एकाग्रता से बचने के लिए इन शक्तियों के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता महसूस की गई। जिसके परिणामस्वरूप, 1992 में, नगर पालिकाओं जैसे स्थानीय अधिकारियों को एक सीमित क्षेत्र को विनियमित करने की शक्ति की अनुमति देने के लिए 74 वां संशोधन अधिनियम पारित किया गया था।

74वें संशोधन के प्रमुख प्रावधान

भारत में नगरपालिकाओं को नियामक शक्तियां प्रदान करने के लिए, संविधान का भाग IX-A पेश किया गया था, जिसमें निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:

  • नगरपालिकाओं की संरचना के लिए;
  • वार्ड समिति;
  • नगरपालिकाओं में सीटों का आरक्षण;
  • शक्तियों;
  • जिम्मेदारियों; और
  • लेखा परीक्षा आवश्यकताएं।

इसके अलावा, इस संशोधन के कारण भारत के संविधान की 12वीं अनुसूची भी डाली गई थी। इसमें नगरपालिकाओं के विभिन्न कार्य शामिल हैं, जैसे:

  • शहरी और नगर नियोजन;
  • सड़कें और पुल;
  • अग्निशमन सेवाएं;
  • शहरी वानिकी;
  • अपशिष्ट (वेस्ट) प्रबंधन;
  • कमजोर वर्गों के हितों की सुरक्षा;
  • गरीबी उन्मूलन; और अधिक।

इस संशोधन के कारण अब सभी राज्य सरकारों को नगरपालिकाओं की नई व्यवस्था को अपनाने की आवश्यकता थी। इस कदम के पीछे का उद्देश्य शक्तियों के संचय का विकेंद्रीकरण करना और स्थानीय लोगों के लिए एक मजबूत शहरी सरकार बनाना था।

संविधान (छियासीवां संशोधन) अधिनियम, 2002:

90 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत तक, बच्चों के कल्याण के लिए प्राथमिक शिक्षा का महत्व बढ़ रहा था। समानता बनाने और समान अवसर प्रदान करने के लिए, 2002 में, राष्ट्र के लिए वास्तव में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने के लिए संविधान में संशोधन किया गया था। इस महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने संविधान में अनुच्छेद 21A डाला, जिसके तहत राज्य के लिए 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य था।

इसके अलावा, संसद ने अनुच्छेद 45 के प्रावधानों को भी बदल दिया ताकि राज्य की शक्तियों को भारत में सभी बच्चों के लिए 6 साल की उम्र पूरी होने तक प्रारंभिक बचपन स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा का प्रावधान करने की अनुमति मिल सके।

इसके अलावा, माता-पिता को कानूनी जिम्मेदारी जोड़ने के लिए, अनुच्छेद 51A(k) को संविधान में पेश किया गया था। माता-पिता और अभिभावकों पर यह एक मौलिक कर्तव्य है कि वे क्रमशः अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करें, खासकर 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच।

86वें संविधान संशोधन का उद्देश्य

शिक्षा को निशुल्क और अनिवार्य बनाकर, यह संशोधन अधिनियम आने वाली पीढ़ियों के समग्र जीवन स्तर में सुधार करने पर अत्यधिक केंद्रित है, यह सुनिश्चित करके कि वे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करें, जो उन्हें दुनिया के उचित प्रदर्शन के साथ स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने में मदद कर सके।

निरक्षरता भारत के विकास के लिए एक बाधा के रूप में कार्य करने वाले प्रमुख मुद्दों में से एक थी। इसके अलावा, डीपीएसपी के तहत प्रदान किए गए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, सरकार को सामाजिक कल्याण पर काम करना था। 14 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाने का यह कदम बड़े पैमाने पर सामाजिक कल्याण के साथ-साथ हमारे देश के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है।

86वें संशोधन का महत्व

इसे सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों में से एक कहा जा सकता है, क्योंकि यह कई वर्षों से हमारी शिक्षा प्रणाली के काम करने के तरीकों को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस बदलाव ने उन लोगों के लिए एक लाख नए अवसरों को जन्म दिया, जिन्होंने कभी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित नहीं किया और इसने शिक्षा की आवश्यकता के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई, खासकर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए।

संविधान (अठासीवाँ संशोधन) अधिनियम, 2003:

इस अधिनियम ने सेवा कर की अवधारणा को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 268A को शामिल करने का प्रस्ताव किया। यह केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाना था और केन्द्र सरकार दोनों द्वारा एकत्र और विनियोजित किया जाना था। नतीजतन, अनुच्छेद 270 और संविधान की सातवीं अनुसूची में भी संशोधन किया गया।

संशोधन का उद्देश्य

इस संशोधन से पहले, संविधान की राज्य या संघ सूचियों में सेवा करों के किसी भी लेवी का कोई उल्लेख नहीं था। तथापि, इस अवधारणा को लागू करने और केन्द्र सरकार द्वारा सेवा कर लगाए जाने की आवश्यकता महसूस की गई जिसे बाद में केन्द्र द्वारा राज्यों को विनियोजित किया जाएगा।

सेवा कर संशोधन का महत्व

इसने भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 268A पेश किया और सरकार को सेवाओं पर कर लगाने की अनुमति दी। हालांकि, एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सेवा कर की शुरुआत के कुछ साल बाद, पूरी अवधारणा को वस्तु और सेवा कर (जी.एस.टी.) द्वारा बदल दिया गया था, साथ ही उत्पाद शुल्क जैसे विभिन्न अप्रत्यक्ष कर व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया था।

संविधान (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003

अधिनियम का उद्देश्य

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य दलबदल विरोधी कानूनों को मज़बूत करना और केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या को सीमित करना था। यह देखा गया कि 10वीं अनुसूची के तीसरे पैरा में दिए गए अपवादों का दुरुपयोग किया जा रहा था। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों का विभाजन हुआ।

इसलिए, 91वां संशोधन अधिनियम इस उद्देश्य से पारित किया गया था:

  • सदस्यों की संख्या पर एक सीमा रखो;
  • सार्वजनिक कार्यालय की स्थिति से दलबदलुओं को हटा दें; और
  • दलबदल विरोधी कानून को मजबूत किया जाए।

महत्वपूर्ण प्रावधान

अनुच्छेद 361B पेश किया गया था, जो प्रदान करता है कि दसवीं अनुसूची के तहत किसी भी अयोग्य सदस्य को भी एक पारिश्रमिक राजनीतिक पद की नियुक्ति के लिए इस धारा के तहत अयोग्य माना जाएगा।

एक नया खंड शामिल करने के लिए अनुच्छेद 75 में भी संशोधन किया गया था, जिसने परिषद के कुल मंत्रियों पर एक सीमा लगा दी थी। यह कहा गया था कि पीएम सहित मंत्रियों की संख्या लोकसभा के कुल सदस्यों के 15% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

इसके अलावा, इस सीमा और अयोग्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए अनुच्छेद 164 में भी संशोधन किया गया था। अंत में, दसवीं अनुसूची के पैरा 3, जो राजनीतिक दलबदल के मामले में अयोग्यता से संरक्षित था, को भी दलबदल विरोधी कानून को मजबूत बनाने के लिए हटा दिया गया था।

संविधान (तिरानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2005

2000 के दशक की शुरुआत तक यह बदलाव लाने के लिए उच्च समय था जो एस.सी. और एस.टी. के साथ-साथ भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एस.ई.बी.सी.) की रक्षा करेगा। यह संशोधन अधिनियम एस.ई.बी.सी. के आरक्षण और संरक्षण जैसे प्रावधान बनाने के लिए पेश किया गया था।

इस संशोधन में अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित संस्थानों को छोड़कर, पूरे भारत में निजी और सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए एस.ई.बी.सी. के लिए आरक्षण भी शामिल था।

93वें संशोधन का उद्देश्य

भारत में एस.ई.बी.सी. को समान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से, संशोधन अधिनियमित किया गया था। यह निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तनों के लिए प्रदान किया गया है:

  • केंद्र द्वारा प्रशासित शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण प्रदान करना;
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण के कोटे को बढ़ाकर 27% करना;
  • ओबीसी के लिए 27% का विशेष आरक्षण कोटा भी प्रदान किया गया था; और
  • आरक्षण के कार्यान्वयन के लिए आदेश जारी करने और कानून पारित करने के लिए सरकार को कुछ शक्तियां प्रदान करना।

संशोधन का महत्व

हालांकि एस.सी., एस.टी. और ओबीसी को विकसित करने में मदद करने और उन्हें समान अवसर देने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ बदलाव किए गए थे, लेकिन कई क्षेत्रों से आलोचना भी हुई थी। कई आलोचकों ने बताया कि इससे संस्थान अपने मानकों को कम कर सकते हैं।

इसके अलावा, कई लोगों ने यह भी महसूस किया कि यह आरक्षण एस.सी. और एस.टी. वर्गों को अन्य गैर-आरक्षित वर्गों से कलंकित करेगा।

93वें संशोधन अधिनियम के लिए महत्व का एक और बिंदु यह भी था कि शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण सरकार द्वारा प्रशासित नहीं था बल्कि निजी संस्थानों के लिए भी था।

संविधान (सत्तानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2011

भारत में सहकारी समितियां स्वतंत्रता-पूर्व युग से कार्य कर रही हैं। अब जबकि भारत स्वतंत्र था और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था प्राथमिकता थी, 2011 में, अनुच्छेद 43B को 97वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से  भारत के संविधान में पेश किया गया था। यह अनुच्छेद भारत में सहकारी समितियों को बढ़ावा देने के उपाय करने के लिए राज्य पर एक कर्तव्य लगाता है।

97वें संविधान संशोधन की मुख्य विशेषताएं

इसका मुख्य उद्देश्य भारत में सहकारी समितियों को आधिकारिक मान्यता देना था। इस संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • अनुच्छेद 19 ने भारत में सहकारी समितियों को संगठित करने और बनाने का मूल अधिकार बना दिया;
  • सहकारी समितियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार के लिए एक नया डीपीएसपी पेश किया गया था; और
  • संविधान के भाग IX-B को भारत में सहकारी समितियों के लिए प्रावधानों की अनुमति देने और प्रशासन करने के लिए पेश किया गया था।

संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014

लंबे समय से, भारत में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले के लिए कॉलेजियम प्रणाली का पालन किया गया है।

हालाँकि, 99वें संवैधानिक संशोधन को इस प्रणाली को छोड़ने और इसके बजाय अनुच्छेद 124A को सम्मिलित करके एक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एन.जे.ए.सी.) की रचना करने के लिए तैयार किया गया था। नियुक्ति आयोग को न्यायाधीशों के तबादले और नियुक्ति की शक्ति देने के लिए इस अधिनियम में भारत के संविधान के कई प्रावधानों को बदलने का प्रस्ताव किया गया था।

संशोधन की आवश्यकता

सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड बनाम भारत संघ (1998) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक प्रक्रिया के ज्ञापन (मेमोरंडम) बनाया था। इस ज्ञापन को 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया जा रहा था।

99वें संविधान संशोधन की मुख्य विशेषताएं

  • एक नए आयोग का गठन, एन.जे.ए.सी को देश भर में न्यायाधीशों का चयन करने और स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया था;
  • एन.जे.ए.सी की संरचना में केंद्रीय कानून मंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सी.जे.आई.) और दो अतिरिक्त वरिष्ठ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सहित 6 सदस्य होने थे।

प्रमुख संशोधन

अनुच्छेद 124A को एन.जे.ए.सी. की संरचना प्रदान करने के लिए पेश किया गया था।  एन.जे.ए.सी. में निम्नलिखित शामिल होने चाहिए थे:

  • सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश;
  • अध्यक्ष के रूप में सीजेआई; और
  • एक विशेष समिति द्वारा चुने गए दो व्यक्ति।

अनुच्छेद 124B ने  एन.जे.ए.सी. के कर्तव्यों को प्रदान किया और निम्नलिखित कार्य शामिल किए:

  • मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों जैसे पदों के लिए दावेदारों की सिफारिश;
  • तबादले प्रक्रियाओं का ध्यान रखना; और
  • न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए चुने गए उम्मीदवारों की क्षमता और अखंडता की पुष्टि करना।

अंत में, संसद को एन.जे.ए.सी को विनियमित करने के लिए कानूनों को लागू करने की शक्ति देने के लिए अनुच्छेद 124C भी डाला गया था।

इस नए आयोग को सुविधाजनक बनाने के लिए कई अन्य प्रावधानों में संशोधन किया गया। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 127 को तदर्थ (एड हॉक) न्यायाधीशों की नियुक्ति को सीजेआई की शक्ति से एन.जे.ए.सी में बदलने के लिए संशोधित किया गया था। इसमें संशोधन किया गया ताकि यह समायोजित किया जा सके कि सीजेआई एन.जे.ए.सी की सिफारिशों के आधार पर तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सकते हैं।

हालांकि, अक्टूबर 2015 में, कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद, जिसे चौथे न्यायाधीश के मामले के रूप में भी जाना जाता है, सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखने का फैसला किया था, और एन.जे.ए.सी को शून्य माना गया था।

इस मामले में एन.जे.ए.सी कानून की संवैधानिकता और 99वें संविधान संशोधन की समीक्षा को लेकर याचिका दायर की गई थी। इस मामले में फैसला करने वाली एस.सी. पीठ की टिप्पणी इस प्रकार थी:

  • उचित रूप से निर्णय लेने के लिए एन.जे.ए.सी की न्यायिक शाखा में न्यायाधीशों का अपर्याप्त चित्रण था;
  • एन.जे.ए.सी का गठन न्यायपालिका की स्वतंत्रता की अवधारणा के खिलाफ था;
  • इसे अन्य मूल स्तंभों को भारत में सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को चुनने और नियुक्त करने और स्थानांतरित करने की अनुमति देकर शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन भी माना गया था; और
  • अंत में, यह कदम न्यायपालिका की शक्तियों को लेकर न्यायालय की अखंडता के बिल्कुल विरुद्ध था।

न्यायाधीशों ने तब यह भी निर्णय पारित किया कि न्यायपालिका की नियुक्ति की प्रक्रिया को बदलना और कार्यपालिका को शामिल करना शक्ति संतुलन को बाधित कर रहा था, जो भारत के संविधान की एक मूल संरचना थी। परिणामस्वरूप, अधिनियम के साथ इस आयोग को अमान्य और असंवैधानिक माना गया।

संविधान (एक सौवाँ संशोधन) अधिनियम, 2015

भारत और बांग्लादेश ने अपने क्षेत्रों को अलग करने के लिए 1974 में एक भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। मई 2015 में, समझौते में कुछ संशोधन भी किए गए थे। क्षेत्रों के इस हस्तांतरण को दर्ज करने की आवश्यकता थी, और नए क्षेत्रों को पूरा करने के लिए संविधान को बदला जाना था। इस प्रकार, इसे नोट करने और तदनुसार संविधान में परिवर्तन करने के लिए 100वां संशोधन अधिनियम पारित किया गया था।

100वें संविधान संशोधन के महत्वपूर्ण प्रावधान

समझौते के निष्पादन के बाद भूमि के पुनर्गठन की अनुमति देने के लिए इस अधिनियम के तहत भारत के संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन किया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो बांग्लादेश से कुछ क्षेत्र भारत में स्थानांतरित कर दिए गए थे, और कुछ क्षेत्रों को भारत से बांग्लादेश में स्थानांतरित कर दिया गया था। निवासियों को स्थानांतरित करने या रहने का विकल्प दिया गया था।

इसके कारण, भारत ने बांग्लादेश से लगभग 51 विदेशी क्षेत्र प्राप्त किए थे और उन्हें 100 से अधिक भारतीय विदेशी क्षेत्र प्रदान किए थे।

संविधान (एक सौ पहला संशोधन) अधिनियम, 2016

भारत में जी.एस.टी. से पहले, कोई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था नहीं थी। उत्पाद शुल्क, सेवा कर, बिक्री कर आदि जैसे कई अलग-अलग कर थे। संगठन की इस कमी के कारण, कर चोरी भी बढ़ रही थी जिसके परिणामस्वरूप यह महत्वपूर्ण 101 वां संवैधानिक संशोधन हुआ।

भारत में जी.एस.टी. की आवश्यकता

इस संशोधन से पहले, वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए गए कई अप्रत्यक्ष करों ने उच्च लागत और कर प्रणाली में अक्षमता का कारण बना। जैसे कई मुद्दे:

  • सरकार में अविश्वास;
  • छिपे हुए या अधिभार (सरचार्ज) कर;
  • दोहरा कराधान;

और भी बहुत कुछ आगे आया, जिससे भारत में एकल अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की आवश्यकता बढ़ गई। जिसके परिणामस्वरूप, 101 वां संशोधन पेश किया गया था।

महत्वपूर्ण प्रावधान

2016 में, माल और सेवा कर की मान्यता के लिए विशेष प्रावधानों को जोड़ने के लिए भारत के संविधान में संशोधन किया गया था। यह परिवर्तन भारत के संविधान में अनुच्छेद 246A जोड़कर डाला गया था। यह संसद को पूरे देश में जी.एस.टी. लागू करने के लिए आवश्यक कई कानून और प्रावधान बनाने की व्यापक शक्तियां प्रदान करता है।

इस अनुच्छेद के अलावा, इस नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए कई अन्य प्रावधानों में भी संशोधन किया गया था।

संशोधन का महत्व

जी.एस.टी. को लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण भारत में कर संरचना को सरल बनाना था। इसके अलावा, यह भी माना गया था कि, प्रक्रिया को सरल बनाने के अलावा, जी.एस.टी. कर राजस्व में वृद्धि करेगा और देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा।

इसके अतिरिक्त, निर्यात पर छिपे हुए शुल्कों को हटाकर, इस नए शासन ने व्यापार मालिकों को निर्यात पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए बढ़ावा दिया, जो एक तरह से भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक वरदान है।

कोई निश्चित रूप से कह सकता है कि जब भारत की कर प्रणाली की बात आती है तो यह सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों में से एक है। इस संशोधन ने देश भर के सभी व्यापार मालिकों के लिए पाठ्यक्रम बदल दिया।

संविधान (एक सौ दोवाँ संशोधन) अधिनियम, 2018

100वें संशोधन द्वारा पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में कई प्रावधान थे। हालांकि, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (एस.ई.बी.सी.) के लिए एक आयोग की आवश्यकता थी। इसलिए, अगस्त 2018 में, इस संशोधन अधिनियम के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एन.सी.बी.सी.) की स्थापना की गई थी।

102वें संशोधन का उद्देश्य

इसका मुख्य उद्देश्य देश के एस.ई.बी.सी. के हितों की रक्षा के लिए एक आयोग बनाना था। यह आयोग एक संवैधानिक निकाय था और एस.ई.बी.सी. द्वारा की गई विभिन्न शिकायतों को देखने और उन्हें हल करने की शक्तियां थीं, विशेष रूप से उनके लाभ के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए शिकायतों के मामलों में।

एन.सी.बी.सी. को एस.ई.बी.सी. के लिए विकास करने के लिए केंद्र को सुझाव और सलाह देने की शक्तियां भी प्रदान की गईं। इसलिए, इसका संपूर्ण उद्देश्य एस.ई.बी.सी. के हितों की रक्षा करना था।

102वें संशोधन अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधान

इसे वास्तविकता में बदलने के लिए, अनुच्छेद 338B को भारत के संविधान में भी डाला गया था। इस अनुच्छेद के अनुसार, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के समान शक्तियां प्राप्त थीं। इसका अर्थ है कि उनका कर्त्तव्य इस तथ्य पर नजर रखना था कि राज्य विद्युत बोर्ड को उन्हें प्रदान किए गए सुरक्षोपायों में से सर्वोत्तम लाभ मिल रहा था और उनका दुरुपयोग नहीं किया जा रहा था।

इसके साथ ही, अनुच्छेद 342A को भी 102वें संविधान संशोधन के माध्यम से पेश किया गया था। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को एस.ई.बी.सी. श्रेणी में आने वाले लोगों पर सार्वजनिक अधिसूचना देने की शक्ति प्रदान करता है।

संविधान (एक सौ तीनवां संशोधन) अधिनियम, 2019

समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को विकसित करने में मदद करने के लिए, 103 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने विशेष रूप से कमजोर वर्गों के आर्थिक स्थिरता या अस्थिरता के आधार पर भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा उपाय प्रदान करके अनुच्छेद 15 में संशोधन किया।

इसके अलावा, यह भी माना गया कि सरकार आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए प्रावधान बनाने के लिए कोई भी उपाय कर सकती है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ई.डब्ल्यू.एस.) के भीतर आने वाली वर्तमान सीमा 1 लाख रुपये से कम की वार्षिक पारिवारिक आय है।

परिणामस्वरूप, राज्य को सार्वजनिक क्षेत्र में ई.डब्ल्यू.एस. के आरक्षण के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 16 में भी संशोधन किया गया था।

103वें संशोधन की संवैधानिक वैधता

भले ही इस संशोधन को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी, नवंबर 2022 में, इस संशोधन की वैधता को बरकरार रखा गया था, क्योंकि न्यायालय के अनुसार, आर्थिक मानदंड आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की रक्षा के लिए कार्रवाई करने के वैध कारण हैं। इसके अलावा, 3:2 के फैसले में यह भी कहा गया था कि आरक्षण मानदंड से ई.डब्ल्यू.एस. को हटाना भारत के मूल संरचना सिद्धांत के खिलाफ होगा। इस मामले को जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2019) (जिसे ई.डब्ल्यू.एस. आरक्षण मामला भी कहा जाता है) के मामले में भी जाना जाता है। इस फैसले में न्याय और समानता की आवश्यकता को समझाया गया और जोर दिया गया।

संविधान (एक सौ चारवाँ संशोधन) अधिनियम, 2019

जनवरी 2020 में, आरक्षण के लिए समय अवधि बढ़ाने के लिए 104 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया था। इसके परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 334 को बदल दिया गया था।

अधिनियम का उद्देश्य

104 वां संवैधानिक संशोधन भारत में निचली जातियों के लिए आरक्षण सुविधा को 10 साल की अवधि तक बढ़ाने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था, विशेष रूप से लोकसभा के साथ-साथ विभिन्न राज्य विधानसभाओं में आरक्षण के लिए। इसके अलावा, इसने आंग्ल भारतीय (एंग्लो-इंडियन) के लिए आरक्षण को भी हटा दिया।

संशोधन की आवश्यकता

इस तथ्य के बावजूद कि एस.सी. और एस.टी. ने आरक्षण और अन्य सरकारी पहलों के कारण बहुत विकास देखा था, फिर भी लोगों की आंखों में एक कलंक था। इसके अलावा, यह पहली बार था कि निचली जातियों को अपने जीवन में विकास और प्रगति करने का मौका मिला था। इसलिए, इस समावेशिता (इन्क्लूजिविटी) को जारी रखने और निचली जातियों के इस विकास को बढ़ावा देने के लिए, आरक्षण को अगले 10 वर्षों के लिए उपलब्ध कराना आवश्यक समझा गया। परिणामस्वरूप, 104 वां संशोधन पारित किया गया था।

संविधान (एक सौ पांचवां संशोधन) अधिनियम, 2021

संविधान के अनुच्छेद 338B में संशोधन करके खंड 9 में एक प्रावधान जोड़ा गया था, कि अनुच्छेद अनुच्छेद 342A के खंड (3) के किसी भी उद्देश्य पर लागू नहीं होगा। फिर, राज्यों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने की शक्ति देने के लिए 105वें संविधान संशोधन में अनुच्छेद 342A में संशोधन किया गया।

यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एस.ई.बी.सी.) की पहचान करने के लिए राज्य की शक्ति को सीमित करने के बाद सामने आया।

यह मराठा आरक्षण मामले में ऐतिहासिक निर्णय पारित होने के बाद हुआ, जिसने भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को घोषित करने के लिए राज्य की शक्तियों को सीमित कर दिया।

105वें संविधान संशोधन की आवश्यकता

जब एन.सी.बी.सी. के नए संवैधानिक निकाय के लिए 102 संशोधन प्रदान किया गया, तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया कि एस.ई.बी.सी. को मान्यता देने के मानदंड पर विचार करने और चुनने के लिए राज्यों और केंद्र की संवैधानिक शक्ति राज्य से छीन ली गई थी। इसके जवाब के रूप में, राज्य के साथ-साथ एनसीबीसी की शक्तियों की पुष्टि करने के लिए यह नया संशोधन पारित किया गया था।

यह सब मराठा आरक्षण मामले से शुरू हुआ, जिसमें राज्य के कानून ने मराठों को एस.ई.बी.सी. के रूप में आरक्षण के तहत रहने की अनुमति दी, जिसे इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि एनसीबीसी जिम्मेदार था, न कि राज्य। अदालत ने इस दृष्टिकोण को मंजूरी दे दी और परिणामस्वरूप, कहा कि केंद्र निर्धारित कर सकता है और राज्य नहीं कर सकते। केंद्र सरकार ने फैसले की समीक्षा की मांग की, जिसके बाद नए ढांचे की बेहतर स्पष्टता के लिए इस अधिनियम को पारित करने की आवश्यकता थी।

105वें संशोधन का महत्व

निम्नलिखित कारक 105वें संविधान संशोधन को अब तक पारित सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक बनाते हैं:

  • इसने एस.ई.बी.सी. को चुनने के लिए राज्यों की शक्तियों को बहाल किया;
  • कई अलग-अलग ओबीसी समुदायों को अपनी विशेष स्थिति बनाए रखने और प्रगति के लिए आरक्षण और अन्य पहलों के लाभों का आनंद लेने की अनुमति दी;
  • इस अधिनियम का उद्देश्य निम्न जातियों और वर्गों से जुड़े कलंक को मिटाना और सामाजिक कल्याण और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है; और
  • हमारे समाज के हाशिए के क्षेत्रों के हितों की रक्षा करता है।

संविधान (एक सौ छवाँ संशोधन) अधिनियम, 2023

106वां संशोधन नवीनतम है और हाल के वर्षों में भारत के संविधान के सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक है। हमारे देश में महिलाओं की रक्षा और सुरक्षा के उद्देश्य से इस संशोधन विधेयक को महिला आरक्षण विधेयक, 2023 या नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से भी जाना जाता था।

106वें संशोधन के प्रमुख प्रावधान

पिछले वर्ष ही इस संशोधन के माध्यम से महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया था। इस उद्देश्य के लिए कई अनुच्छेद बदल दिए गए थे।

  • दिल्ली के संबंध में विशेष प्रावधान प्रदान करने वाले अनुच्छेद 239AA में राष्ट्रीय राजधानी की विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण की अनुमति देने के लिए संशोधन किया गया था।
  • लोक सभा में महिलाओं के लिए सीटें प्रदान करने के लिए एक नया अनुच्छेद 330A भी जोड़ा गया था।
  • राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करने के लिए संविधान का अनुच्छेद 332A भी जोड़ा गया था।

इसके अलावा, संशोधन में यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि इनमें से किसी भी आरक्षण का संसद के सदनों में मौजूदा सीटों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।

नवीनतम संवैधानिक संशोधन का महत्त्व

इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीति में महिलाओं का सशक्तिकरण था। नवीनतम संवैधानिक संशोधन के अनुसार, अधिनियम के लागू होने की तारीख से शुरू होने वाले 15 वर्षों की अवधि के लिए, भारत की महिलाएं 1/3 सीटों की हकदार थीं:

  • लोक सभा;
  • राज्य विधान सभाएं; और
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए विधान सभा

यह दर्शाता है कि हाल के वर्षों में हमारे देश ने कितनी प्रगति की है। जहां ज्यादातर महिलाएं हाशिए पर थीं, यहां तक कि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन से भी वंचित थीं, आज उन्हें संसद के, राष्ट्र के प्रमुख निर्णयों का हिस्सा बनने का मौका मिलता है।

ये भारत में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन हैं, जिन्हें आज तक पारित किया गया है। इस उपरोक्त कालक्रम से, यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्षों से, कई उद्देश्यों के लिए संविधान में कई संशोधन हुए हैं, जबकि कुछ उदाहरण हमें यह भी दिखाते हैं कि संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का दुरुपयोग करना कितना आसान है। इस प्रकार, प्रत्येक संशोधन जो होता है, उसे राष्ट्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए न्यायिक समीक्षा के लिए खुला होना चाहिए।

संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति

जब संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति के वर्तमान दायरे की बात आती है, तो हम केशवानंद भारती श्रीपदगलवरु बनाम केरल राज्य और अन्य (1973) का उपयोग कर सकते हैं निर्णय और उसमें पेश किए गए सिद्धांत के अनुसार, भारतीय संविधान में संशोधन करने की संसदीय शक्ति व्यापक है। हालाँकि, यह एक पूर्ण शक्ति है और संसद कभी भी भारतीय संविधान में संशोधन नहीं कर सकती है यदि संशोधन भारतीय संविधान की मूल संरचना को बदल देता है।

मूल संरचना सिद्धांत परीक्षण

केशवानंद भारती मामले (1973) के ऐतिहासिक फैसले में यह माना गया था कि संसद के पास मौलिक अधिकारों के साथ-साथ संविधान में संशोधन करने की शक्तियां हैं, जब तक कि संशोधन किसी मूल सिद्धांत या संविधान की मौलिक संरचना को प्रभावित नहीं करता है।

इस मूल संरचना सिद्धांत को लागू करने के पीछे मूल विचार संसद की शक्तियों पर नियंत्रण रखना था और यह सुनिश्चित करना था कि वे मूल संरचना, यानी हमारे भारतीय संविधान के सच्चे सार को बदल या नष्ट नहीं कर दें। तो, वास्तव में एक मूल संरचना सिद्धांत के दायरे में क्या आता है? भारतीय संविधान के कौन से प्रावधान संशोधन योग्य नहीं हैं? इसका उत्तर वर्षों से भारतीय न्यायालयों द्वारा निर्धारित विभिन्न निर्णयों और मिसालों के माध्यम से प्राप्त किया गया है।

ऐतिहासिक निर्णय ने हमें यह विचार करने के लिए परीक्षण भी प्रदान किया कि कौन सी विशेषताएं मूल संरचना सिद्धांत के दायरे में आती हैं:

संविधान की सर्वोच्चता

शक्ति चाहे जो भी हो, संसद को यह स्वीकार करना चाहिए कि अंतिम प्राधिकार संविधान के पास है। यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोच्च कानून है। इस प्रकार, कोई भी संशोधन जो हमारे संविधान की सर्वोच्चता को कम करता है, शून्य माना जाएगा।

भारत का गणतंत्र और लोकतांत्रिक स्वरूप

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र रहा है। संवैधानिक प्रावधान प्रमुख पहलू हैं जो हमारे भारतीय गणतंत्र की इस प्रकृति की रक्षा करते हैं। इस प्रकार, यह संविधान के लिए और भारत में सामाजिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, यह हमारे भारतीय संविधान का एक अभिन्न अंग बन जाता है। जिसका अर्थ है कि भारत में यदि किसी भी समय कोई ऐसा कानून पारित किया जाता है जिससे लोकतांत्रिक और गणतंत्र प्रकृति की खतरा पैदा हो जाता है तो उस कानून को उस सीमा तक अवैध और असंवैधानिक माना जाएगा। संविधान (उनतालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 संसद द्वारा संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन करके इन्हें बदलने का एक प्रयास था, जिससे चुनाव और अन्य संबंधित मामलों पर निर्णय लेने के लिए भारत में अदालतों की शक्तियां सीमित हो गईं।

यह मुद्दा इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) के ऐतिहासिक मामले में उठाया गया था। ऐसे में चुनाव में इंदिरा गांधी के एक विरोधी ने कदाचार के आधार पर उनके चुनाव को चुनौती देने का फैसला किया। जब यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित था, संसद ने भारतीय संविधान में 39वां संशोधन पारित किया। इसे वास्तव में एक स्मार्ट कदम माना जा सकता है, क्योंकि इस संशोधन के बाद, निम्नलिखित के चुनावों की वैधता पर निर्णय लेने के लिए अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर एक सीमा थी:

  • राष्ट्रपति;
  • उप राष्ट्रपति; और
  • अध्यक्ष

यह कार्रवाई इसे भारत के संविधान के सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक बनाती है, क्योंकि पूरा विवाद शक्तियों के संतुलन, न्यायिक समीक्षा और अन्य ऐसे मुद्दों के आसपास था, जो बड़े पैमाने पर हमारे देश के लोकतंत्र को प्रभावित कर रहे थे। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने 39वें संशोधन को असंवैधानिक और शून्य माना क्योंकि यह हमारे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ था।

संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र

हमारे राष्ट्र की सबसे आकर्षक विशेषता इसके बाद की धर्मनिरपेक्षता है, जो हमारे संविधान की मूल विशेषताओं का एक हिस्सा भी है। इसलिए, हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता को प्रभावित करने या धमकी देने वाले किसी भी परिवर्तन को भी मूल संरचना में बदलाव माना जाता है और इसलिए, उन्हें अमान्य माना जाता है।

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) हमारे राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता और सिद्धांत की मूल विशेषता के रूप में इसकी स्थिति पर विचार करते हुए सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री (सी.एम.) एस.आर. बोम्मई को बर्खास्त कर दिया गया और राज्य पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

वास्तव में, यह राज्य सरकार की बर्खास्तगी का एकमात्र उदाहरण नहीं था। भारत के कई राज्यों में, केंद्र ने राज्य सरकारों को विभिन्न आरोपों पर बर्खास्त कर दिया था, जैसे कि वे गैर-धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं का प्रचार करने की कोशिश कर रहे थे, और यह कहकर कि राज्य में अस्थिरता थी। इन बर्खास्तगी को तब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। इस मामले में शामिल प्रमुख मुद्दों में से एक यह था कि क्या किसी राज्य की सरकार को इस आधार पर बर्खास्त किया जा सकता है कि वे गैर-धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे और क्या धर्मनिरपेक्षता मूल संरचना सिद्धांत की परिभाषा और दायरे में आती है या नहीं।

यह तब था जब सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के संविधान की मूल या विशेषता के एक हिस्से के रूप में धर्मनिरपेक्षता की पुष्टि की। माननीय पीठ ने कहा कि भारत सरकार की कोई भी कार्रवाई, चाहे वह केंद्र हो या राज्य, अमान्य और असंवैधानिक होगी यदि वह किसी भी तरह से हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को प्रभावित करती है। इसके अलावा, यह भी माना गया कि एक राज्य सरकार को बर्खास्त किया जा सकता है यदि वह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप अपने कार्यों का प्रदर्शन नहीं कर रही है।

शक्तियों का पृथक्करण और संतुलन

भारत राष्ट्र तीन स्तंभों पर खड़ा है, विधायी, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इनमें से प्रत्येक निकाय की अपनी भूमिका है। यह पृथक्करण भारत में लोकतंत्र को बनाए रखने में मदद करता है। यदि शक्तियों को मिला दिया जाए तो उन्हें अलग रखने के बजाय व्यक्तियों के एक समूह को पूरे राष्ट्र के कामकाज पर अधिकार मिल जाएगा।

वास्तव में, जिस तरह से संविधान संशोधन ने अब तक काम किया है, वह इस बात की भी याद दिलाता है कि शक्तियों का पृथक्करण क्यों जरूरी है। इतना ही नहीं, इन शक्तियों में असंतुलन भी लोकतांत्रिक और संघवादी प्रकृति को बाधित कर सकता है। इसलिए, शक्तियों का पृथक्करण और उसका संतुलन भी संविधान का एक अभिन्न पहलू है।

इसके अनुसार, यदि कोई कानून अलग-अलग शक्तियों के इस संतुलन को प्रभावित करता है, तो यह अमान्य और असंवैधानिक है। संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 के तहत अनुच्छेद 368 में संशोधन की वैधता का निर्धारण करते समय मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) के मामले में इस मुद्दे पर आगे चर्चा की गई थी।

संविधान का संघीय चरित्र

भारत की संघीय विशेषता का अर्थ है कि संविधान केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संतुलन और शक्तियों के विभाजन की रक्षा और सम्मान करता है। दोनों एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए तैयार हैं।

न्यायिक समीक्षा

केशवानंद भारती मामले के बाद, कानूनों की समीक्षा करने की अदालत या न्यायपालिका की शक्ति को फिर से एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से विवाद में लाया गया और मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) के ऐतिहासिक फैसले में इस पर और चर्चा की गई। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर कहा था कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान की मूल विशेषताओं में से एक थी क्योंकि यह संघीय प्रकृति का एक हिस्सा था और तीन स्तंभों की अलग-अलग शक्तियों की रक्षा करता था। इसलिए, यह माना गया कि न्यायिक समीक्षा शक्तियां भी मूल संरचना सिद्धांत के दायरे में हैं।

ऐतिहासिक पूर्ववर्ती निर्णय 

श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य (1951)

मामले के तथ्य

स्वतंत्रता के बाद अधिकारियों ने कृषि भूमि सुधार अधिनियमों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया। जबकि इलाहाबाद और भोपाल राज्यों में अधिनियमों को वैध और कानूनी माना गया था, पटना उच्च न्यायालय ने बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 को असंवैधानिक घोषित करने का निर्णय पारित किया।

इससे विवाद छिड़ गया और पटना उच्च न्यायालय के फैसले को मिटाने के उद्देश्य से प्रथम संशोधन अधिनियम पारित किया गया।

वर्तमान मामला इस संशोधन की वैधता को चुनौती देने के लिए दायर किया गया था। इसे संपत्ति के मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 13 (2) के प्रावधान के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई थी।

उठाए गए मुद्दे

नतीजतन, मामले में तीन महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटा गया:

  • क्या संसद के पास संविधान में संशोधन करने का अधिकार है?
  • मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जाए या नहीं? और
  • अनुच्छेद 368 की प्रयोज्यता के दायरे का निर्धारण।

देश में यह पहली बार था कि इन मुद्दों पर चर्चा की जा रही थी। इसके अलावा, अनुच्छेद 13 और 368 में हड़ताल मतभेद संघर्ष का कारण बन रहे थे। जबकि संसद को शक्ति प्रदान की गई थी, अनुच्छेद 13 भी इसे प्रतिबंधित कर रहा था।

निर्णय

इस फैसले में, अदालत ने अनुच्छेद 13 और 368 के बीच संघर्ष पर करीब से नज़र डाली। इस विवाद से निपटने के लिए, इस फैसले में, अदालत ने सामंजस्यपूर्ण अर्थानव्यन (हरमोनियस कंस्ट्रक्शन) के सिद्धांत पर भरोसा किया, जिसका अर्थ है कि जब भी दो प्रावधानों के बीच संघर्ष होता है, तो अदालत को एक शून्य प्रावधान के रूप में रद्द करने के बजाय प्रावधानों के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

यह माना गया कि पहला संशोधन वैध था और अनुच्छेद 13 का दायरा सामान्य कानूनों तक सीमित है न कि संवैधानिक कानूनों तक। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 13 में संदर्भित शब्द कानून को संवैधानिक कानूनों और इसके संशोधन तक विस्तारित नहीं किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप, संविधान में संशोधन करने के लिए अनुच्छेद 368 के तहत बनाए गए कानून को अनुच्छेद 13 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती थी।

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)

जैसा कि हमने देखा है कि पहले के संवैधानिक संशोधन ज्यादातर सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए हुए थे, और भूमि सुधारों को उसी के एक प्रमुख हिस्से के रूप में देखा गया था। 17वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद, और संविधान की नौवीं अनुसूची में और कानून जोड़े गए, यह मामला चला। सज्जन सिंह द्वारा दायर एक याचिका सहित कुल छह याचिकाएं अदालत द्वारा संपत्ति के अधिकार की रक्षा और इन सुधारों की वैधता को चुनौती देने के लिए दायर की गई थीं।

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता सज्जन सिंह आजादी से पहले भारत में रतलाम रियासत के पूर्व शासक थे। स्वतंत्रता के बाद, सज्जन सिंह और भारतीय केंद्र सरकार ने उन्हें कुछ विशिष्ट भूमि स्वामित्व अधिकारों की अनुमति देने के लिए एक समझौता किया था।

1964 में, जब 17वां संविधान संशोधन लागू किया गया था, तो इसने संविधान में बहुत सारे बदलाव लाए, विशेष रूप से राज्य और केंद्र के बीच शक्ति संतुलन के लिए, और भूमि सुधार कानूनों और प्रावधानों को जोड़ने के लिए नौवीं अनुसूची को व्यापक बनाया गया था।

इस अधिनियम ने सज्जन सिंह को दिए गए भूमि स्वामित्व अधिकारों को भी प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप, उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष 17वें संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि इसने उनके विशेष विशेषाधिकार और संविधान के तहत दी गई संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन किया, साथ ही साथ भारतीय संघ के साथ हस्ताक्षरित समझौते का भी उल्लंघन किया।

उठाए गए मुद्दे

इस मामले में निपटाए गए दो महत्वपूर्ण मुद्दे थे:

  • अनुच्छेद 368 के तहत संसद की शक्ति मौलिक अधिकारों पर लागू होती है या नहीं; और
  • भूमि सुधार कानूनों की रक्षा के लिए नौवीं अनुसूची को शामिल किया जाना संविधान के मूल संरचना का उल्लंघन करता है या नहीं।

निर्णय

इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के पक्ष में फैसला दिया और 17वें संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। इसलिए, पिछले मामले के फैसले को भी बरकरार रखा गया था, और सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जब तक अनुच्छेद 368 इस शक्ति को प्रदान करता है, संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है।

पीठ द्वारा 3:2 के बहुमत से यह निर्णय दिया गया कि चूंकि अनुच्छेद 13 के तहत प्रतिबंध एक ‘कानून’ पर लागू होता है और जबकि संविधान में संशोधन कानून नहीं थे, इसलिए संसद की शक्तियों को अनुच्छेद 13 के माध्यम से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।

हालांकि, इस मामले का एक दिलचस्प पहलू पीठ के अल्पसंख्यक निर्णय धारकों के दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द भी घूमता है, जिनका विचार था कि संसद द्वारा इस शक्ति का दुरुपयोग संविधान की मूल संरचना को बदलने या यहां तक कि नष्ट करने के लिए किया जा सकता है।

आई. सी. गोलकनाथ एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य (1967)

17 वें संवैधानिक संशोधन की वैधता पर सवाल उठाने के लिए दायर एक अन्य मामला, जहां पंजाब में भूमि मालिकों ने इसे इस आधार पर चुनौती दी थी कि इससे संपत्ति के उनके अधिकार पर असर पड़ा है।

मामले के तथ्य

जब पंजाब राज्य सरकार द्वारा पंजाब भूमि स्वामित्व सुरक्षा अधिनियम, 1953 पारित किया गया था, तो इसने पंजाब में परिवारों के स्वामित्व वाली भूमि पर एक सीमा लगा दी थी। ऐसे व्यक्ति हेनरी गोलखनाथ को अपनी भूमि का एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकार को देना पड़ा क्योंकि यह अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अधिशेष थी। अतिरिक्त भूमि का स्वामित्व सरकार को हस्तांतरित किया जाना था।

इसके परिणामस्वरूप, गोलखनाथ ने पंजाब सरकार द्वारा पारित अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाने के लिए ऐसे अन्य पीड़ित याचिकाकर्ताओं के साथ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उठाए गए मुद्दे

मामले में निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा की गई:

  • संसद के पास संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति थी या नहीं;
  • क्या संविधान के संशोधन को न्यायिक समीक्षा के दायरे में आने वाले कानून के रूप में माना जाए; और
  • संविधान में संशोधन संवैधानिक कानून होगा या साधारण कानून।

निर्णय

एक ऐतिहासिक फैसले में, एक मामूली बहुमत के साथ, पीठ ने कहा था कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पूर्ण नहीं थी, और इसकी कुछ सीमाएं थीं। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने के लिए पारित अधिनियम को एक साधारण कानून माना जाएगा, न कि संवैधानिक कानून। परिणामस्वरूप, यदि संवैधानिक संशोधनों में प्रस्तावित परिवर्तन अनुच्छेद 13 का उल्लंघन करते हैं, तो इसे अमान्य माना जाएगा।

भारतीय अदालतों में यह पहली बार था कि संविधान को बदलने के लिए संसदीय शक्तियों की सीमा के संबंध में इस दृष्टिकोण को बहुमत मिला। इस निर्णय के परिणामस्वरूप, संविधान को एक प्रमुख संशोधन अर्थात् 24वां संवैधानिक संशोधन करना पड़ा, जिससे, यदि आपको ठीक से याद हो, तो संविधान के अनुच्छेद 368 में इस प्रकार संशोधन किया गया कि संसद को मौलिक अधिकारों सहित भारत के संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की स्पष्ट शक्तियां प्रदान की गई थीं।

कोई कह सकता है कि इस मामले ने केशवानंद भारती के मामले के लिए एक मंच तैयार किया, जिसमें मूल संरचना सिद्धांत पेश किया गया था।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)

भारत में भूमि सुधार कानूनों का उद्देश्य किसी विशेष व्यक्ति के स्वामित्व वाली भूमि की मात्रा को सीमित करना और जमींदारी की सदियों पुरानी प्रणाली के कारण संपत्ति के स्वामित्व में असमानता को दूर करना है। हालाँकि, इन कानूनों ने व्यक्तियों की संपत्ति के अधिकार में भी बाधा डाली।

भूमि सुधार कानूनों की संवैधानिक वैधता को संवैधानिक कानून के इतिहास के सबसे ऐतिहासिक निर्णय अर्थात् केशवानंद भारती मामले में भी लाया गया था। आजादी के शुरुआती दिनों में, सरकार का ध्यान जमींदारी प्रथा को खत्म करने पर था। जिसे आगे बढ़ाने के लिए, विभिन्न केंद्रीय और राज्य विधानसभाओं द्वारा भूमि सुधार लागू किए गए थे। ऐसी ही एक विधायिका को एक धार्मिक संस्थान के प्रमुख श्री केशवानंद भारती ने चुनौती दी थी, जब केरल राज्य सरकार ने उनकी भूमि का स्वामित्व छीन लिया था। सरकार के इस फैसले को अदालत ने बरकरार रखा, क्योंकि कानून संविधान के प्रावधानों के अनुसार था।

फिर भी, अपराजित याचिकाकर्ता ने एक और कदम उठाने का फैसला किया, और भारत के संविधान में संशोधनों को इस आधार पर चुनौती दी कि संविधान की मूल संरचना इन परिवर्तनों के खिलाफ थी। यही मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना का कारण बना।

जैसा कि ऊपर देखा गया है, पिछले मामलों में, अदालत ने संविधान की मूल संरचना पर जोर देना शुरू कर दिया था। हालांकि, इस बदलाव को कार्रवाई में लाने के लिए एक सक्रिय प्रयास, अदालत में एक याचिका दायर की गई।

मामले के तथ्य

वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता, श्री गलवारू केशवानंद भारती, एडनीर मठ के नेता थे, जो केरल के एक जिले में एक धार्मिक संप्रदाय है। संप्रदाय के स्वामित्व वाले भूखंड से, याचिकाकर्ता धार्मिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भूमि के एक निश्चित हिस्से का मालिक था। 1969 में, जब केरल राज्य सरकार ने केरल भूमि सुधार संशोधन अधिनियम पेश किया, तो इसने राज्य सरकार को धार्मिक संप्रदाय एडनीर मठ से भूमि के कुछ हिस्सों का अधिग्रहण करने की अनुमति दी।

इसके परिणामस्वरूप, श्री केशवानंद भारती ने मार्च 1970 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका दायर की। जब यह याचिका चल रही थी, 1971 में, केरल सरकार ने 1971 के केरल भूमि सुधार संशोधन अधिनियम नामक एक और कानून बनाया। याचिका का उद्देश्य अपने धर्म का पालन करने के अपने मूल अधिकार को लागू करना और इसे आसानी से प्रशासित करना था।

उठाए गए मुद्दे

सबसे महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती निर्णय में से एक के रूप में, जिसने भारत के संविधान में संशोधन के तरीके को आकार दिया, निम्नलिखित मुद्दों के आधार पर तय किया गया था:

  • केरल भूमि सुधार अधिनियम संवैधानिक और वैध था या नहीं?
  • क्या अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पूर्ण थी या नहीं?
  • क्या मूल संरचनाओं का सिद्धांत भी संविधान का हिस्सा है? और
  • संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति मूल संरचना सिद्धांत तक फैली हुई है या नहीं?

निर्णय

मौजूदा स्थिति, तथ्यों, उदाहरणों और सर्वोच्च न्यायालय ने 7: 6 बहुमत के फैसले में सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद, मूल संरचना सिद्धांत की संवैधानिक वैधता स्थापित की। इस प्रकार, अंततः इस ऐतिहासिक निर्णय के माध्यम से यह निर्णय लिया गया कि मूल संरचना सिद्धांत संविधान का एक अभिन्न अंग था, और इसे किसी भी तरह से संशोधित नहीं किया जा सकता था।

इसने संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सीमा के सवाल पर भी रोक लगा दी। इस प्रकार, हम देख सकते हैं कि 50 साल पहले दिया गया यह निर्णय अभी भी हमारे दिलों में बसता है, भारत में लोकतंत्र के सिद्धांतों और कानून के शासन की रक्षा के लिए हमारे लिए बहुत कुछ कहता है।

इस निर्णय के पारित होने के बाद, संवैधानिक संशोधनों का पूरा क्रम भी बदल गया और इसने भारत के भीतर कानूनी ढांचे में लोकतांत्रिक सिद्धांतों की उपस्थिति की याद दिला दी।

मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (1980)

केशवानंद भारती मामले के बाद, भारतीय न्यायालयों ने मूल संरचना सिद्धांत को मान्यता देना शुरू कर दिया। मिनर्वा मिल्स मामला बाद में हुआ, जब रुग्ण (सिक) राष्ट्रीयकरण अधिनियम द्वारा मिलों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। यह मामला संवैधानिक संशोधनों के इतिहास में ऐतिहासिक निर्णयों में से एक बन गया क्योंकि यह इस मामले में था कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी स्थापना के बाद सिद्धांत के बारे में स्पष्टीकरण प्रदान किया था।

फैसले का दिलचस्प हिस्सा सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी थी कि चूंकि सिद्धांत संसदीय शक्ति को संशोधन तक सीमित करता है, इसलिए इस सीमा को बदलने और खुद को असीमित शक्ति देने के लिए कोई भी परिवर्तन वैध नहीं होगा। नतीजतन, सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन अधिनियम के दो खंडों को रद्द कर दिया, जो आपातकाल के दौरान लगाए गए थे। आइए हम तथ्यों, मुद्दों और निर्णयों को संक्षेप में देखें।

मामले के तथ्य

1974 में, संसद ने रुग्ण कपड़ा उपक्रम (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम पारित किया था। इस अधिनियम का उद्देश्य कपड़ा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करना और इसके विकास में सुधार करना था। यह कार्रवाई व्यापक और सार्वजनिक हित के नाम पर की गई थी, यानी बड़े पैमाने पर समाज को लाभ पहुंचाने के लिए। यह विचार सभी के लिए सामान को किफायती बनाने का था। मिनर्वा मिल्स भी एक कपड़ा कंपनी थी, चूंकि यह रेशम विनिर्माण श्रेणियों में आती थी, इसलिए इस अधिनियम के अनुसार, उन्हें राष्ट्रीयकरण से गुजरना पड़ा। जिसके परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता अधिनियम की वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत के समक्ष आया।

उठाए गए मुद्दे

इस मामले में संवैधानिक वैधता पर दो महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे:

  1. 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 4 और धारा 5; और
  2. अनुच्छेद 368 के उपखंड 4 और 5 संवैधानिक और वैध थे या नहीं।

निर्णय

4: 1 बहुमत के साथ, 42 वें संशोधन की धारा 4 और 5 को बने रहने का निर्णय लिया गया। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 31C को धारा 4 द्वारा इस तरह से संशोधित किया गया था कि इसने डीपीएसपी को सर्वोच्चता और शक्ति दी। इसके अलावा, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए न्यायिक समीक्षा के रूप में रुग्ण कपड़ा अधिनियम को चुनौती देने से बचाने के लिए अनुच्छेद 39 (b) और (c) में भी संशोधन किया गया था। इसके अलावा, अनुच्छेद 368 (5) को पढ़ने के बाद, उन्होंने यहां तक कहा कि कोई भी प्रावधान या कानून जो राज्य को अनंत शक्ति या अधिकार प्रदान करता है, वैध नहीं है और असंवैधानिक है।

आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)

मामले के तथ्य

उन कानूनों का प्रवेश जो पहले असंवैधानिक या मनमाने के रूप में आयोजित किए गए थे, संविधान की नौवीं अनुसूची में, संशोधन के बाद काफी स्पष्ट था।
उदाहरण के लिए, एक पुराने फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने 1972 में गुडलूर जन्मम एस्टेट (रैयतवाड़ी में उन्मूलन और रूपांतरण) अधिनियम, 1969 को शून्य घोषित कर दिया। हालांकि, 34 वें संविधान संशोधन के पारित होने के बाद।
यहां तक कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के पश्चिम बंगाल भूमि होल्डिंग राजस्व अधिनियम, 1979 की धारा 2 (c) को मनमाने के रूप में रखने का एक समान निर्णय किसी तरह पलट गया था, जब 66वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1990 ने उस अधिनियम को नौवीं अनुसूची में शामिल किया था।

वामन राव और अन्य बनाम भारत संघ (1981) के मामले में पारित फैसले का उल्लेख करते हुए, 1999 में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि 9वीं अनुसूची में जोड़े जा रहे कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी जा सकती है, यदि वे 24 अप्रैल, 1973 के बाद पारित किए गए थे।

इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की पीठ को इस निर्णय की फिर से जांच करने और न्यायिक समीक्षा की स्थिति पर उचित और अंतिम स्थिति प्रदान करने का काम सौंपा गया था।

उठाए गए मुद्दे

मूल रूप से, नौवीं अनुसूची को संविधान में ऐसे बदलाव लाने के लिए डाला गया था जो सामाजिक कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए होंगे और डी.पी.एस.पी. को प्राप्त करने में मदद करेंगे और इसमें भूमि सुधारों के इर्द-गिर्द घूमने वाले लगभग 13 कानून शामिल थे।
हालांकि, समय के साथ, संविधान की मौलिक संरचना का उल्लंघन करने वाले कई कानूनों को नौवीं अनुसूची में डाला जा रहा था, और न्यायिक समीक्षा पर संरक्षण भी ऐसे कानूनों तक बढ़ा दिया गया था। इस मामले से पहले, 200 से अधिक कानून नौवीं अनुसूची द्वारा प्रदान किए गए संरक्षण का एक हिस्सा थे, जिनमें आरक्षण और व्यापार जैसे विषय शामिल थे।

इसलिए, न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर एक मजबूत आधार बनाने की सख्त जरूरत थी। इसे ध्यान में रखते हुए, मामले में चर्चा किया गया प्राथमिक मुद्दा निम्नलिखित था:

  • केशवानंद भारती मामले के फैसले के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए सभी कानून क्या नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जाएगा, भले ही वे मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन कर रहे हों?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में सर्वसम्मति से फैसला सुनाया जब न्यायलय ने की न्यायिक समीक्षा की शक्ति फिर से विवाद में थी। जनवरी 2007 में, यह निर्णय देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत की सर्वोच्चता की पुष्टि की। इसके अलावा, उन्होंने इस प्रयोज्यता को 9वीं अनुसूची तक बढ़ा दिया और माना कि भले ही किसी कानून को 9वीं अनुसूची की सूची के तहत संरक्षित किया गया हो, फिर भी यह न्यायपालिका से समीक्षा के लिए खुला था, अगर कानून के मूल संरचना और मौलिक अधिकारों के अनुसार नहीं होने का कोई संदेह या दायरा था।

उन्होंने कानून बनाने के लिए संसद की शक्ति को प्रतिबंधित करने पर भी जोर दिया, और कहा कि अनुच्छेद 368 को भी हमारे संविधान की मूल संरचना और सार की रक्षा करनी चाहिए।

निष्कर्ष 

जैसा कि हम आज जानते हैं, भारत एक दूर का सपना होता यदि हमारे कानूनी ढांचे में बदलाव नहीं होते। यदि संविधान में कोई संशोधन ही नहीं होता तो क्या होता? इसका परिणाम एक ऐसा भारत हो सकता था जहां भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक भी प्रतिबंध न हो या जहां समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान न हों।

जब हम संविधान संशोधनों की पूरी यात्रा के बारे में बात करते हैं, तो हम कह सकते हैं कि उन्होंने निश्चित रूप से भारत के ढांचे में महान बदलाव लाए हैं। आज तक अधिनियमित कुल 106 संशोधनों में से कई ने व्यवधान भी पैदा किए हैं, जबकि कई संशोधनों ने वास्तव में हमारे देश और इसके सभी लोगों के विकास में मदद की है।

हालांकि, सबसे प्रभावशाली हिस्सा यह है कि इस यात्रा के माध्यम से हमने महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों को देखा है। निष्कर्ष से पहले, आइए संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से पूरे वर्ष में देखे गए परिवर्तनों की सूची को संक्षेप में प्रस्तुत करें;

  • कई बार सत्ता का दुरुपयोग देखने को मिला। हालांकि, हमारे राष्ट्र की संघीय प्रकृति के कारण, इसे शक्ति संतुलन बनाकर दूर किया गया है;
  • संविधान में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष, और अखंडता शब्द जोड़े गए; और
  • संसद की शक्ति और न्यायिक समीक्षा अधिकांश संवैधानिक संशोधनों में विवाद के दो प्रमुख कारण थे;
  • ई.डब्ल्यू.एस., एस.ई.बी.सी., एस.सी. और एस.टी., बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कदम उठाए गए हैं;
  • मौलिक कर्तव्य लगाए गए हैं और भी बहुत कुछ।

संवैधानिक संशोधनों को महत्वपूर्ण बनाने वाला पहलू या तो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन है, या एक ऐसा संशोधन जो एक स्वतंत्र लोकतंत्र के रूप में भारत की स्थिति को बाधित करता है और न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति में असंतुलन द्वारा इसके मूल सिद्धांतों को धूमिल करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

संवैधानिक संशोधन क्यों महत्वपूर्ण हैं?

संशोधन का मतलब है बदलाव। भारत में कोई भी कानून तब तक पारित नहीं किया जा सकता, जब तक कि संविधान में इसका प्रावधान न हो। राष्ट्र की बदलती गतिशीलता के साथ, इसके विधायी ढांचे को भी बदलना होगा जो केवल कुछ मामलों में संविधान के प्रावधानों में संशोधन के माध्यम से संभव है।

किस संशोधन को भारत के लघु संविधान के रूप में जाना जाता है?

42वां संविधान संशोधन हमारे देश का लघु संविधान है। इसके पीछे का कारण यह तथ्य है कि संशोधन सबसे लंबे संवैधानिक संशोधनों में से एक था और संविधान के कई प्रावधानों में बदलाव किए।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द किस वर्ष डाले गए थे?

राष्ट्र में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लाने के लिए, ऊपर वर्णित तीन शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ने का प्रस्ताव दिया गया था, जिससे उन्हें वर्ष 1976 में संविधान के मूल तत्व बना दिया गया। इसे प्रभावी करने वाला कानून संविधान (बयालीसवां) संशोधन अधिनियम, 1976) था।

क्या अनुच्छेद 368 के तहत संसद की शक्ति संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान करती है?

नहीं, संसद को दी गई यह शक्ति निश्चित रूप से पूर्ण नहीं है। हालांकि, शुरुआती संशोधनों में, ऐसा माना जाता था। हालांकि, बाद के चरणों में, एक ही समझौते के कई मामलों (ऊपर देखें) के साथ, अदालतों ने अनुच्छेद को अधिक गहराई से देखना शुरू कर दिया, और इस प्रकार, मूल संरचना सिद्धांत को पेश करके, संसद की शक्ति को सीमित कर दिया, जिसका संसद की शक्ति पर वर्चस्व (सुप्रीमेसी) है।

संदर्भ

  • Constitution Amendment in India, R.C. Bhardwaj

आकस्मिक अनुबंध

यह लेख Abhay Pandey द्वारा लिखा गया है और Upasana Sarkar द्वारा इसे आगे अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के तहत आकस्मिक अनुबंधों (कॉन्टिनजेंट कॉन्ट्रैक्ट) से संबंधित है। यह आकस्मिक अनुबंधों के विभिन्न घटकों और शर्तों से संबंधित है। यह आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग करने के फायदे और नुकसान की एक विस्तृत सूची भी देता है। यह दांव और सशर्त अनुबंधों की सटीक परिभाषा भी देता है और ये आकस्मिक अनुबंधों से कैसे भिन्न हैं यह भी बताता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

अनुबंध विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं, जैसा कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 में निर्धारित है। इसमें यह भी बताया गया है कि कौन से अनुबंध अदालत में लागू करने योग्य हैं और कौन से नहीं। इस अधिनियम को पढ़ते समय, हमें विभिन्न प्रकार के अनुबंधों के बारे में पता चलेगा, जिन्हें विभिन्न कारकों के आधार पर अलग किया जा सकता है। उनमें से दो पूर्ण अनुबंध और आकस्मिक अनुबंध हैं। किसी अनुबंध को तभी आकस्मिक माना जाता है जब कोई निर्दिष्ट अनिश्चित घटना हो जो भविष्य में घटित हो भी सकती है और नहीं भी। एक आकस्मिक अनुबंध उस घटना के घटित होने या न होने पर निर्भर होता है। अनुबंध में उल्लिखित शर्त अनुबंध की संपार्श्विक (कोलेटरल) होनी चाहिए। यह इसमें निर्दिष्ट प्रतिफल का हिस्सा नहीं होनी चाहिए। 

आकस्मिक अनुबंधों का निष्पादन पूरी तरह से ऐसी शर्तों के पूरा होने पर निर्भर करता है, जिसके बाद वचनदाता (प्रोमिसर) द्वारा कार्य किया जाता है। लेकिन पूर्ण अनुबंध के मामले में ऐसा नहीं है। इन अनुबंधों में, आकस्मिक अनुबंधों की तरह इसके प्रदर्शन के लिए किसी शर्त की उपस्थिति की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए, दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि एक आकस्मिक अनुबंध भविष्य की दुर्घटनाओं के खिलाफ सुरक्षा के रूप में कार्य करता है, क्योंकि इस प्रकार के अनुबंधों में, वचनदाता अपना कर्तव्य तभी निभाने के लिए मजबूर होता है जब अनुबंध में उल्लिखित संपार्श्विक शर्तें पूरी हो जाती हैं जिस पर पक्षों द्वारा पहले सहमति दी गई है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत आकस्मिक अनुबंध का अर्थ और अवधारणा

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 31, ‘आकस्मिक अनुबंध’ शब्द को परिभाषित करती है। इस धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जैसा कि अनुबंध में कहा गया है, कुछ करने या न करने का अनुबंध केवल तभी होता है जब ऐसे अनुबंध में उल्लिखित संपार्श्विक शर्तें पूरी होती हैं। इस प्रकार के अनुबंध में दो महत्वपूर्ण बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। एक यह है कि अनुबंध की सशर्त प्रकृति उसके साथ संपार्श्विक होनी चाहिए। दूसरी बात यह है कि इसे प्रतिफल का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

उदाहरण:- यदि A और B के बीच एक अनुबंध किया जाता है, जहां A B का घर जल जाने पर B को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का अनुबंध करता है। यह एक शर्त है। A द्वारा B को राशि का भुगतान आग से नष्ट हुए घर पर निर्भर है। यदि B का घर आग से नहीं जला है, तो A की ओर से B को उस राशि का भुगतान करने का कोई दायित्व नहीं बनता है। चूंकि आग से B के घर का विनाश अनुबंध की संपार्श्विक शर्त है, ऐसी घटना का न होना B को A से राशि का दावा करने से रोकता है।

आकस्मिक अनुबंध के मुख्य घटक

एक आकस्मिक अनुबंध के मुख्य घटक भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 31 के तहत निर्धारित किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-

कुछ करने या कुछ न करने के लिए एक वैध अनुबंध मौजूद होना चाहिए

पक्षों के बीच किया गया अनुबंध वैध माना जाता है यदि उन्होंने भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 32 और धारा 33 के प्रावधानों का पालन करते हुए अनुबंध किया है। धारा 32 मुख्य रूप से आकस्मिक अनुबंधों से संबंधित है जहां भविष्य में अनिश्चित घटना घटित होने की आवश्यकता होती है, और जब तक वह घटना घटित नहीं होती, तब तक इसे अदालत में लागू नहीं किया जा सकेगा। दूसरी ओर, धारा 33 बिल्कुल विपरीत कहती है। यह मुख्य रूप से ऐसी घटनाओं से संबंधित है जहां ऐसी घटना घटित नहीं होनी चाहिए, और केवल जब वह भविष्य की घटना असंभव हो जाती है तो इसे कानून की अदालत में लागू किया जा सकेगा, उसके पहले नहीं। आकस्मिक अनुबंध आमतौर पर वहां बनाए जाते हैं जहां पक्ष जोखिम लेने के लिए सहमत होती हैं।

उदाहरण: यदि P और Q के बीच एक अनुबंध किया जाता है, जहां P एक निश्चित जहाज के वापस न आने पर Q को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का वादा करता है। यदि तूफान या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा के कारण जहाज डूब जाता है, तो इस आकस्मिक अनुबंध को लागू किया जा सकता है।

अनुबंध का निष्पादन सशर्त होना चाहिए

एक अनुबंध का निष्पादन, जो प्रकृति में सशर्त है, वचनदाता द्वारा आवश्यक शर्त पूरी होते ही पूरा किया जाना चाहिए। वह स्थिति स्वाभाविक रूप से अनिश्चित होनी चाहिए। यदि वह शर्त भविष्य में पूरी हो जाती है, तो वचनदाता को अनुबंध की शर्तों को पूरा करना होगा, जो घटना के घटित होने या न होने पर निर्भर हैं।

उदाहरण: यदि Y 80% अंकों के साथ परीक्षा उत्तीर्ण करता है तो X, Y से उसे छुट्टियों की यात्रा पर ले जाने का वादा करता है। इसलिए, X, Y को यात्रा पर तभी ले जाने के लिए उत्तरदायी होगा जब Y अपनी परीक्षा में 80% या उससे अधिक अंक प्राप्त करेगा।

भविष्य की अनिश्चित घटना पर शर्त संपार्श्विक होनी चाहिए

शर्त प्रकृति में संपार्श्विक होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, घटना का घटित होना या न घटित होना अनुबंध के लिए संपार्श्विक होना चाहिए, अर्थात इसका स्वतंत्र रूप से अस्तित्व होना चाहिए, अन्यथा इसे लागू नहीं किया जा सकता है।

उदाहरण: X ने Y से वादा किया है कि वह 2000 रुपये के भुगतान पर उसे 20 प्रतियां देगा। यह अनुबंध आकस्मिक अनुबंध नहीं है क्योंकि उस अनुबंध में कोई अनिश्चित स्थिति मौजूद नहीं है। 2000 रुपये का भुगतान इस अनुबंध में प्रतिफल के रूप में कार्य करता है। यहां, प्रतियों का वितरण घटना पर निर्भर करता है, जो एक प्रतिफल है न कि कोई संपार्श्विक शर्त।

भविष्य की घटनाएँ वचनदाता के विवेक पर या नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए

भविष्य की घटना केवल वचनदाता की इच्छा पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। आयोजन उसके नियंत्रण या इच्छा के अधीन नहीं होना चाहिए। आकस्मिकता वचनदाता पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं होनी चाहिए। यह पूरी तरह से भविष्यवादी और अनिश्चित घटना होनी चाहिए। यदि ऐसी शर्त वचनदाता के नियंत्रण या इच्छा के अधीन है, तो इसे आकस्मिक अनुबंध नहीं माना जाएगा। 

उदाहरण 1: M ने N को 10 लाख रुपये की राशि का भुगतान करने का वादा किया है यदि N 1 जनवरी, 2025 को पढ़ाई के लिए विदेश जाता है। यह एक आकस्मिक अनुबंध है। अध्ययन के लिए विदेश जाना पूरी तरह से एक भविष्यवादी और अनिश्चित घटना है और यह केवल M की इच्छा नहीं है।  

उदाहरण 2: X और Y एक अनुबंध में प्रवेश करते हैं जहां X Y से वादा करता है कि वह उसे 50,000 रुपये देगा यदि X, A से विवाह नहीं करता है। उसके मामले में, भविष्य की घटना वचनदाता के विवेक पर निर्भर है। इसलिए इसे आकस्मिक अनुबंध नहीं माना जाएगा। 

आकस्मिक अनुबंध की मुख्य विशेषताएं 

आकस्मिक अनुबंधों की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं जिन्हें आकस्मिक अनुबंधों के बारे में अध्ययन करते समय जानना आवश्यक है, वे इस प्रकार हैं-

  • अनुबंध करने वाले पक्षों के दायित्व: इसे पूरा करना अनुबंध के पक्षों का कर्तव्य है। वहाँ दो पक्ष उपस्थित होने चाहिए, जिनमें से एक वचनदाता है, और दूसरा वचनगृहीता (प्रोमिसी) है। आकस्मिक अनुबंध करते समय, दोनों पक्षों को नियम और शर्तों को समान रूप से समझना चाहिए, और उनके उद्देश्यों को अन्य अनुबंधों की तरह एक-दूसरे के साथ संरेखित करना चाहिए।
  • अनुबंध का प्रवर्तन: किसी आकस्मिक अनुबंध के प्रवर्तन से पहले यह देख लेना चाहिए कि उसमें वे सभी कानूनी आवश्यकताएँ मौजूद हैं जो एक वैध अनुबंध के लिए आवश्यक हैं। अनुबंधों के उन तत्वों के अभाव में, आकस्मिक अनुबंध तैयार करना संभव नहीं होगा। इसलिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि आकस्मिक अनुबंध का प्रदर्शन एक निश्चित निर्दिष्ट घटना पर निर्भर करता है। इसलिए आकस्मिक अनुबंध को लागू करने के लिए अनुबंध में सभी तत्वों की उपस्थिति महत्वपूर्ण है।
  • अनुबंध का प्रभाव: जैसा कि ऊपर कहा गया है, सभी आकस्मिक अनुबंध किसी विशेष घटना के घटित होने या न होने पर निर्भर होते हैं, जिसका अनुबंध के खंडों में उल्लेख किया जाना चाहिए और दोनों पक्षों द्वारा सहमति व्यक्त की जानी चाहिए। तदनुसार, पक्ष अनुबंध को पूरा करने या न करने के लिए उत्तरदायी होंगे। इसलिए यदि कोई विशिष्ट कार्य या घटना घटित नहीं होती है या हो चुकी है, जो अनुबंध के प्रावधानों के अनुसार नहीं है, तो पक्ष अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
  • निर्दिष्ट घटना: अनुबंध में निर्दिष्ट घटना अनुबंध से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए। इसकी घटना प्रकृति में स्वतंत्र होनी चाहिए और किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
  • निष्पादन की संभावना: आकस्मिक अनुबंध की यह भी एक महत्वपूर्ण विशेषता है। यदि कोई विशेष घटना अव्यावहारिक, अवैध, या इतनी अनिश्चित है कि उसके परिणाम की भविष्यवाणी करना असंभव है, तो पक्षों के बीच किया गया समझौता वैध नहीं रहेगा।
  • अनुबंध की वैधता: बनाए गए विशेष नियमों और शर्तों के आधार पर, आकस्मिक अनुबंधों के अलग-अलग कानूनी परिणाम हो सकते हैं। किसी भी अन्य अनुबंध की तरह, एक आकस्मिक अनुबंध में भी, यह देखना पक्षों का कर्तव्य है कि दोनों को उनके बीच बनी शर्तों को एक ही अर्थ में स्वीकार करना चाहिए और वे उन शर्तों को समझने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हैं जैसा कि इसमें कहा गया है।

आकस्मिक अनुबंध का प्रवर्तन

आकस्मिक अनुबंधों के प्रवर्तन से संबंधित प्रावधान धारा 32, धारा 33, धारा 34, धारा 35 और धारा 36 के तहत बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं- 

किसी घटना के घटित होने पर आकस्मिक अनुबंध का प्रवर्तन

आकस्मिक अनुबंध की पहली शर्त का उल्लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 32 के तहत किया गया है, जो भविष्य में अनिश्चित घटना के घटित होने के आधार पर आकस्मिक अनुबंधों के प्रवर्तन से संबंधित है। इस अनुबंध का प्रवर्तन उस घटना के घटित होने पर निर्भर है। यदि यह अनुबंध में उल्लिखित शर्तों के अनुसार नहीं होता है या किसी कारण से ऐसा होना असंभव हो जाता है, तो अनुबंध को पूरा करने के लिए किसी भी पक्ष पर कोई दायित्व नहीं है।

उदाहरण: X, Y को 100,000 रु. देने का वादा करता है यदि वह Z जो उनके इलाके की सबसे खूबसूरत लड़की है से शादी करता है। यह एक आकस्मिक अनुबंध है। लेकिन इस अनुबंध के कुछ ही दिनों बाद एक दुर्भाग्यपूर्ण कार दुर्घटना में Z की मृत्यु हो जाती है। चूँकि घटना अब संभव नहीं है, अनुबंध शून्य हो जाता है।

किसी घटना के घटित न होने पर आकस्मिक अनुबंध का प्रवर्तन

आकस्मिक अनुबंध की दूसरी शर्त का उल्लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 33 के तहत किया गया है, जो भविष्य में किसी अनिश्चित घटना के घटित न होने के आधार पर आकस्मिक अनुबंधों के प्रवर्तन से संबंधित है। इस मामले में, चूंकि आकस्मिक अनुबंध को किसी विशेष घटना के घटित न होने पर निष्पादित करने की आवश्यकता होती है, इसलिए वचनदाता अपनी भूमिका निभाने के लिए तभी उत्तरदायी होता है जब भविष्य की घटना घटित नहीं होती है। यदि इसके विपरीत होता है, तो वचनदाता को अपना वादा पूरा करने के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता है।

उदाहरण: X ने Y से उसे 20000 रु. देने का वादा किया है यदि उसके खेत में 100 किलो सेब का उत्पादन नहीं होता है। लेकिन उस वर्ष बारिश अपर्याप्त थी जिसके कारण 100 किलोग्राम सेब का उत्पादन नहीं हो सका। इसलिए, X को आकस्मिक अनुबंध के एक भाग के रूप में भुगतान करना होगा।

जब कोई अनुबंध किसी जीवित व्यक्ति के भविष्य के आचरण पर निर्भर होता है

आकस्मिक अनुबंध की तीसरी शर्त का उल्लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 34 के तहत किया गया है, जो एक जीवित व्यक्ति के आचरण से संबंधित है। इस धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी घटना का घटित होना जो किसी व्यक्ति की कार्रवाई पर निर्भर या नियंत्रण में है, असंभव हो गई मानी जाएगी यदि ऐसा व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करता है जिससे ऐसी स्थिति का निष्पादन अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो जाता है।

उदाहरण: इसलिए Y और A के बीच विवाह असंभव हो जाता है, क्योंकि Z अब पहले से ही A से विवाहित है। हालाँकि यह संभव है कि A की मृत्यु हो जाए और Z बाद में Y से शादी कर ले, लेकिन चूँकि यह घटना अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गई है, इसलिए इसे असंभव माना जाएगा।

निश्चित समय के भीतर होने वाली किसी घटना पर निर्भर अनुबंध

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 35 (पैरा 1) एक निश्चित समय के भीतर किसी घटना के घटित होने पर एक आकस्मिक अनुबंध के प्रवर्तन पर चर्चा करती है। इस प्रकार के आकस्मिक अनुबंध में, वचनदाता अपने दायित्वों को पूरा करने का वादा करता है यदि भविष्य में कोई अनिश्चित घटना किसी विशेष अवधि के भीतर होती है।

उदाहरण: M ने N को कुछ सामग्रियों की आपूर्ति करने का वादा किया है जो 1 अगस्त, 2025 से पहले कुछ जहाजों के माध्यम से आ जाएंगी। यदि वादा पूरा हो जाता है, तो N, M को पैसे देने का वादा करता है। इस स्थिति में, यदि जहाज डूब जाता है या निश्चित समय के भीतर वापस नहीं आता है तो अनुबंध रद्द हो जाता है।

किसी घटना के निश्चित समय के भीतर न होने पर निर्भर अनुबंध

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 35 (पैरा 2) एक निश्चित समय के भीतर किसी घटना के घटित न होने पर आकस्मिक अनुबंधों के प्रवर्तन पर चर्चा करती है। इस प्रकार के आकस्मिक अनुबंध में, वचनदाता अपने दायित्वों को पूरा करने का वादा करता है यदि भविष्य में कोई अनिश्चित घटना किसी विशेष अवधि के भीतर नहीं होती है या असंभव हो जाती है।

उदाहरण: M और N के बीच एक अनुबंध किया गया था। अनुबंध के अनुसार, M ने N से वादा किया कि यदि कोई जहाज 1 अगस्त, 2025 से पहले वापस नहीं आता है तो वह एक निश्चित राशि का भुगतान करेगा। यदि जहाज दिए गए समय से पहले जल जाता है, जिससे वापसी भी असंभव हो जाएगी, तो ऐसी स्थिति में अनुबंध को कानून द्वारा लागू किया जा सकता है क्योंकि वापसी असंभव है।

एक असंभव घटना पर निर्भर अनुबंध 

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 36, आकस्मिक अनुबंध की छठी शर्त से संबंधित है। यह असंभव घटनाओं के आकस्मिक अनुबंधों के बारे में बात करता है। यदि दो पक्ष एक आकस्मिक अनुबंध में प्रवेश करते हैं जहां ऐसी भविष्य की घटना का घटित होना असंभव है, तो ऐसा समझौता शून्य माना जाएगा, भले ही अनुबंध में प्रवेश करते समय उन्हें इसके बारे में जानकारी थी या नहीं।

ऐसी स्थितियाँ जब कोई आकस्मिक अनुबंध शून्य हो जाता है

कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनके अंतर्गत एक आकस्मिक अनुबंध शून्य हो जाता है, जो इस प्रकार हैं-

  • सबसे पहले, धारा 32 के अनुसार, यदि वह घटना जिस पर आकस्मिक अनुबंध निर्भर है, उसका निष्पादन असंभव हो जाता है, तो अनुबंध स्वतः ही शून्य हो जाएगा।
  • दूसरा, धारा 34 के अनुसार, यदि वह घटना जिस पर आकस्मिक अनुबंध निर्भर है, किसी व्यक्ति के कुछ कार्यों के कारण असंभव हो जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यक्ति की कार्रवाई ने घटना को घटित होने से रोक दिया। अत: ऐसे मामलों में अनुबंध शून्य माना जायेगा। 
  • तीसरा, धारा 35 के अनुसार, यदि वह घटना जिस पर आकस्मिक अनुबंध निर्भर है, एक विशिष्ट समय के भीतर नहीं होती है, या यदि अनिश्चित घटना जो निश्चित समय अवधि से पहले नहीं होनी चाहिए थी, तो अनुबंध असंभव बन जाएगा है, और इसे शून्य माना जाएगा । 

उदाहरण: एक अनुबंध दो पक्षों के बीच किया जाता है, जहां सुभ वचनदाता है, और रोनी वचनगृहीता है। यहां, सुभ ने रॉनी के लिए एक यात्रा प्रायोजित करने का वादा किया है, अगर वह एक साल के भीतर अपने पसंदीदा अभिनेता के साथ एक टॉक शो बना सकता है। तो समय अवधि उस वर्ष के भीतर है। जब उसके पसंदीदा अभिनेता की एक वर्ष के भीतर मृत्यु हो जाती है तो अनुबंध रद्द हो जाता है।

  • चौथा, धारा 36 के अनुसार, यदि कोई समझौता किसी असंभव घटना के घटित होने पर निर्भर करता है, तो ऐसा समझौता शून्य है, भले ही उस घटना की असंभवता के बारे में पक्षों को उस समय पता हो जब समझौता किया गया था।

उदाहरण: रोहिणी पायल के साथ एक अनुबंध में प्रवेश करती है, जहां रोहिणी पायल को 5000 रुपये का भुगतान करने का वादा करती है यदि सूर्य पूर्व की बजाय पश्चिम में उगता है। उनके द्वारा किया गया यह समझौता शून्य है क्योंकि ऐसी घटना कभी नहीं हो सकती। 

आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग कब किया जाता है

आकस्मिक अनुबंध अधिकतर उन लोगों के लिए सहायक होते हैं जो व्यवसायों में शामिल हैं। आकस्मिक अनुबंधों के प्रावधान उन्हें व्यवसाय संचालन के दौरान मौजूद जोखिमों और अनिश्चितताओं का प्रबंधन करने में मदद करते हैं। यह उन स्थितियों में भी उपयोगी है जहां पक्षों के बीच बातचीत के परिणामस्वरूप गतिरोध उत्पन्न होता है। उन स्थितियों में, वे एक आकस्मिक अनुबंध में प्रवेश करते हैं जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होगा और उन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं से बचाएगा। कुछ परिस्थितियाँ जब किसी आकस्मिक अनुबंध का उपयोग लाभकारी प्रतीत होता है तो वे इस प्रकार हैं-

  • बीमा: बीमा समझौते सबसे महत्वपूर्ण आकस्मिक अनुबंधों में से एक हैं क्योंकि वे लोगों के दैनिक जीवन में होने वाली विभिन्न घटनाओं को शामिल करते हैं। बीमा एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा कोई पक्ष किसी अज्ञात दुर्घटना की स्थिति में अपनी संपत्ति सुरक्षित करने का प्रयास करते है। यदि भविष्य में कोई अनिश्चित घटना घटती है, तो बीमाकर्ता द्वारा दायित्व लिया जाएगा। यह बीमाकर्ता का कर्तव्य है कि वह दूसरे पक्ष को मुआवजा दे जिसने कार दुर्घटना, संपत्ति क्षति और अन्य जैसी कुछ विशिष्ट दुर्घटनाओं के दौरान मौद्रिक सुरक्षा और संरक्षण के लिए समझौता किया है। बीमा जो लोगों के लिए अधिकतर सहायक होता है उसमें स्वास्थ्य बीमा, कार बीमा, संपत्ति बीमा और अन्य शामिल हैं।
  • रोजगार के अनुबंध: रोजगार के उद्देश्य से नियोक्ता और कर्मचारी के बीच किए गए अनुबंध को रोजगार अनुबंध के रूप में जाना जाता है। उस समझौते में किसी कर्मचारी के प्रदर्शन से संबंधित कुछ आकस्मिक खंड हो सकते हैं। इसमें नियोक्ता द्वारा पहले निर्धारित एक विशिष्ट लक्ष्य को पूरा करने या एक निर्दिष्ट अवधि के लिए कंपनी के साथ रहने पर आकस्मिक बोनस या स्टॉक विकल्प जैसे प्रोत्साहन देना शामिल है।
  • रियल एस्टेट लेनदेन: रियल एस्टेट लेनदेन का मतलब रियल एस्टेट की खरीद के लिए किए गए समझौते हैं। खरीद और बिक्री समझौता (पीएसए) किसी व्यवसाय के लिए खरीदार और विक्रेता के बीच होने वाले लेनदेन के नियमों और शर्तों को स्थापित करने के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें वित्तपोषण (फाइनेंसिंग), सफल निरीक्षण और जिसके पूरा होने पर आकस्मिक अनुबंध निष्पादित किया जाएगा, से संबंधित कुछ आकस्मिक प्रावधान शामिल हो सकते हैं।
  • विलय और अधिग्रहण (मर्जर एंड एक्विजिशन): विलय और अधिग्रहण के मामले में भी, पक्ष आम तौर पर आकस्मिक अनुबंधों में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जहां भुगतान विशेष लक्ष्यों या बेंचमार्क के आधार पर किया जाता है जैसा कि पक्षों द्वारा पहले अनुबंध की शर्तों के अनुसार निर्धारित किया गया है। जैसे ही लक्ष्य पूरा हो जाता है, खरीदार और विक्रेता दोनों का कर्तव्य है कि वे सभी भुगतानों को निपटाने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में आएं।
  • निर्माण के अनुबंध: आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग निर्माण उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है, जहां भुगतान किसी विशेष परियोजना के पूरा होने, कुछ भवनों के निर्माण या कुछ अन्य शर्तों पर निर्भर करता है। आम तौर पर, श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान अनुबंध में निर्दिष्ट कुछ निर्माण के पूरा होने पर किया जाता है।
  • आयोजन की योजना बनाना और साझेदारी समझौते: आयोजन की योजना बनाने के मामले में, कुछ आकस्मिक खंड होते हैं जैसे कि एक विशिष्ट संख्या में मेहमानों को शामिल करना होगा, स्थान को उनके कैटलॉग से चुना जाना चाहिए, और कई अन्य। इसी तरह, एक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के बाद संपत्ति और मुनाफे को साझा करने के लिए किसी फर्म या कंपनी के भागीदारों के बीच एक आकस्मिक समझौता भी किया जाता है।
  • अनुसंधान और विकास से संबंधित अनुबंध: अनुसंधान और विकास क्षेत्र परियोजना लक्ष्यों के लिए भुगतान बांधने के लिए अपने समझौतों में विभिन्न प्रकार के आकस्मिक खंडों का उपयोग करता है। इस प्रकार, आकस्मिक अनुबंध इस क्षेत्र में भी उपयोगी होते हैं।
  • क्षतिपूर्ति (इंडेमनिटी), वारंटी और गारंटी के अनुबंध: ये अनुबंध आकस्मिकता खंडों का भी उपयोग करते हैं। वारंटी और गारंटी के अनुबंधों का उपयोग अधिकतर तब किया जाता है जब किसी आपूर्तिकर्ता का प्रतिपक्ष के साथ कोई संबंध नहीं होता है। चंदूलाल हरजीवनदास बनाम सीआईटी (1966), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया कि बीमा और क्षतिपूर्ति के सभी अनुबंध आकस्मिक अनुबंध हैं।

आकस्मिक अनुबंध दांव समझौते से किस प्रकार भिन्न है?

दांव समझौता एक ऐसा समझौता है जहां एक पक्ष किसी अनिश्चित भविष्य की घटना के घटित होने पर दूसरे पक्ष को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का वादा करता है, और दूसरा पक्ष घटना के घटित न होने की स्थिति में पहले पक्ष को उतनी ही राशि का भुगतान करेगा। ऐसी परिस्थितियों में, कोई भी पक्ष समझौते के वास्तविक परिणाम को नहीं जानता है। दोनों में से कोई भी पक्ष जीत सकता है, और दूसरा पक्ष खेल हार जाएगा। ये समझौते वे समझौते हैं जो कानून की अदालत में लागू करने योग्य नहीं हैं क्योंकि उन्हें शून्य घोषित कर दिया गया है।

आकस्मिक अनुबंधों के विपरीत, जिन्हें कानून द्वारा वैध माना जाता है, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 30 के तहत एक दांव समझौता बिल्कुल शून्य है। उदाहरण के लिए, एक क्रिकेट मैच में, यदि दो पक्षों के बीच कोई चुनौती होती है, जहां एक पक्ष, X, दूसरे पक्ष, Y को चुनौती देता है, तो उसे यकीन होता है कि टीम A मैच जीतेगी। यह सुनने पर कि यदि Y इस चुनौती को स्वीकार करता है और कहता है कि यदि टीम A क्रिकेट मैच जीतती है, तो वह X को 1000,रुपये की राशि देगा और यदि नहीं, तो X उसे 1000 रु. का भुगतान करेगा। यदि X, Y के प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो ऐसे समझौते को दांव समझौता कहा जाएगा। 

आकस्मिक अनुबंध और दांव समझौते के बीच अंतर इस प्रकार हैं-

कारक  आकस्मिक अनुबंध  दांव समझौता 
परिभाषा  आकस्मिक अनुबंध की उचित परिभाषा धारा 31 में दी गई है। हालाँकि धारा 30 दांव लगाने के अनुबंधों से संबंधित है, लेकिन उस धारा के तहत दांव की कोई उचित परिभाषा मौजूद नहीं है।
प्रकृति  सभी आकस्मिक अनुबंध हमेशा प्रकृति में दांव लगाने वाले नहीं होते हैं। यह दांव लगाने का समझौता हो भी सकता है और नहीं भी। सभी दांव समझौते आकस्मिक प्रकृति के माने जाते हैं।
पारस्परिक वादा आकस्मिक अनुबंधों में पारस्परिक वादे हो भी सकते हैं और नहीं भी। दांव के समझौते वे समझौते हैं जहां हमेशा पारस्परिक वादे होते हैं।
एक समझौते की वैधता दांव लगाने के समझौतों के विपरीत, आकस्मिक अनुबंध कानून की अदालत में लागू करने योग्य होते हैं, और इसलिए वे वैध अनुबंध होते हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत दांव समझौते को शून्य समझौता माना जाता है।
समझौते का प्रमुख तत्व यह शर्त कि भविष्य में कोई अनिश्चित घटना घटित होगी, अनुबंध के मुख्य उद्देश्य के लिए संपार्श्विक है। दांव लगाने के समझौतों के लिए, भविष्य की घटनाएं संपार्श्विक नहीं बल्कि समझौते का एक आवश्यक कारक या प्रमुख तत्व हैं।
पक्षों का हित अनुबंध की विषय वस्तु में पक्षों का हित एक महत्वपूर्ण कारक है। पक्षों की असली हित किसी घटना के होने या न होने पर होता है। पक्षों का वास्तविक हित दांव की राशि जीतने या हारने पर है, न कि किसी घटना के घटित होने या न होने पर।
संयोग का खेल आकस्मिक अनुबंध संयोग का खेल नहीं हैं। दूसरी ओर, दांव लगाने के समझौते, संयोग का खेल हैं।
हानि और लाभ की पारस्परिकता जब पक्ष आकस्मिक अनुबंध में प्रवेश करते हैं, तो यह हानि और लाभ की पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर किया जाता है। दांव लगाने के समझौते में, दोनों में से किसी एक पक्ष को लाभ हो सकता है, और दूसरे को हानि होगी। तो यह खोने और पाने का खेल है।

एक सशर्त अनुबंध आकस्मिक अनुबंध से किस प्रकार भिन्न है?

आकस्मिक अनुबंध और सशर्त अनुबंध, हालांकि, समान लगते हैं, लेकिन उनकी विशेषताएं थोड़ी भिन्न होती हैं। सशर्त अनुबंध वे अनुबंध होते हैं जिनका निष्पादन किसी विशिष्ट घटना के पूरा होने पर सशर्त होता है। सशर्त अनुबंधों में निम्नलिखित प्रकार की शर्तें शामिल हो सकती हैं-

  • पूर्ववर्ती (प्रिसिडेंट) शर्त: ऐसे कई अनुबंध हैं जहां एक निश्चित शर्त मौजूद होती है जिसे अनुबंध पर आगे बढ़ने से पहले किसी एक या दोनों पक्षों को पूरा करना होता है। उस स्थिति को पूर्ववर्ती शर्त के रूप में जाना जाता है।
  • अनुवर्ती (सबसेक्वेंट) शर्त: ऐसे कई अनुबंध हैं जहां अनुबंध में उल्लिखित कुछ घटनाओं के घटित होने या न होने के कारण अनुबंध स्वतः समाप्त हो जाता है। इस प्रकार की स्थिति को परवर्ती शर्त कहा जाता है।
  • समवर्ती (कॉन्करेंट) शर्त: समवर्ती शर्त का अर्थ है कि अनुबंध में, एक निश्चित शर्त मौजूद होती है जिसे दोनों पक्षों को अनुबंध के निष्पादन के साथ-साथ पूरा करना होता है, क्योंकि यह उन पर बाध्यकारी होती है।

सशर्त अनुबंधों के मामले में, जिन शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता होती है, वे निश्चित होती हैं, यानी, होने के लिए बाध्य होती हैं, जो कि आकस्मिक अनुबंधों के मामले में नहीं है, क्योंकि ऐसी शर्तें हो भी सकती हैं और नहीं भी हो सकती हैं। अनुबंध में कुछ शर्तों को जोड़ने मात्र से यह एक आकस्मिक अनुबंध नहीं बन जाता है, निर्धारित शर्तों को एक आकस्मिक अनुबंध की अनिवार्यताओं को पूरा करना होगा। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि सभी आकस्मिक अनुबंध सशर्त अनुबंध हैं, लेकिन इसके विपरीत नहीं है। 

आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग करने के लाभ 

आकस्मिक अनुबंध का उपयोग करने के लाभ इस प्रकार हैं-

  • सभी पक्षों के हितों को संतुलित करना: किसी अनुबंध पर विभिन्न पक्षों की राय बाद में भिन्न हो सकती है। इसलिए उस समय, यह पक्षों के बीच संविदात्मक संबंधों में समस्याएँ पैदा कर सकता है। इसलिए आकस्मिक अनुबंध पक्षों को अपने हितों को संरेखित करने में मदद करते हैं।
  • जोखिम को कम करना: यह आकस्मिक अनुबंधों के एक महत्वपूर्ण लाभ के रूप में भी कार्य करता है। इसलिए, आकस्मिक अनुबंध उन्हें अपने जोखिम को कम करने में मदद करते हैं।
  • लचीलापन: आकस्मिक अनुबंध अनुबंध में प्रवेश करने वाले पक्षों को लचीलापन भी प्रदान करते हैं। चूँकि यह अनुबंधों की समाप्ति या अप्रत्याशित घटनाओं के परिणामस्वरूप होने वाले विवादों से बचने में मदद करता है, इसलिए इसे अन्य प्रकार के अनुबंधों की तुलना में अधिक लचीला माना जाता है।
  • बातचीत की गुंजाइश: पूर्ण अनुबंध के मामले में, पुन: बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन यदि पक्ष कुछ शर्तों को बताते हुए एक आकस्मिक अनुबंध में प्रवेश करते हैं, तो यह अक्सर उन्हें आवश्यक समायोजन या उप-समझौते करके संशोधित करने में मदद करता है।
  • मुकदमेबाजी से बचना: अनिश्चित घटनाओं के घटित होने से अक्सर पक्षों के बीच विभिन्न विवाद होते हैं जो अंततः मुकदमेबाजी का कारण बनते हैं। आकस्मिक अनुबंध ऐसी अनिश्चित घटनाओं के मामले में क्या करने की आवश्यकता है, इसका सटीक वर्णन करके विवाद की संभावना को कम करते हैं।
  • लागत-प्रभावशीलता: ये आकस्मिक अनुबंध किसी व्यवसाय को व्यवस्थित करने के लिए भी उपयोगी होते हैं क्योंकि इनमें पारंपरिक अनुबंधों की तुलना में कम अग्रिम निवेश शामिल होता है। इसलिए यह एक लागत प्रभावी तरीका है।

आकस्मिक अनुबंधों के नुकसान

आकस्मिक अनुबंध का उपयोग करने के नुकसान इस प्रकार हैं-

  • प्रकृति में जटिल: आकस्मिक अनुबंध का एक नुकसान यह है कि यह प्रकृति में जटिल है।
  • गैर-निष्पादन का जोखिम: आकस्मिक अनुबंध में गैर-निष्पादन का भी जोखिम होता है क्योंकि किसी घटना के घटित होने या न होने में अनिश्चितता होती है। इसलिए, अनुबंध के उल्लंघन की संभावना है।
  • जानकारी का अभाव: दोनों पक्षों के पास समान जानकारी होना आवश्यक है, अन्यथा, एक पक्ष दूसरे की तुलना में लाभप्रद स्थिति में होगा। इसलिए बहुमूल्य जानकारी रखने वाले पक्ष के जीतने की संभावना अधिक होती है। अन्य पक्षों के बारे में जानकारी की कमी से सत्ता का असंतुलन हो सकता है और उन पक्षों को नुकसान हो सकता है।
  • खराब माप मानदंड: घटना या गैर-घटना के खराब माप मानदंड एक आकस्मिक अनुबंध के पूरा होने में समस्या पैदा कर सकते हैं।

महत्वपूर्ण न्यायिक घोषणाएँ

फ्रॉस्ट बनाम नाइट (1872)

इस मामले में, प्रतिवादी ने वादी से उसके पिता की मृत्यु पर शादी करने का वादा किया। जब वादी के पिता जीवित थे, तब उन्होंने दूसरी महिला से शादी कर ली। इसलिए, किसी अन्य महिला से शादी करके, प्रतिवादी ने स्पष्ट रूप से अपना वादा पूरा न करने का इरादा दर्शाया है। अंग्रेजी अदालत ने यह माना कि यह असंभव हो गया था कि वह वादी से शादी करे और इसलिए वह अनुबंध के उल्लंघन के लिए उस पर मुकदमा करने की हकदार थी।

हरबख्श सिंह गिल और अन्य बनाम राम रतन और अन्य (1988)

इस मामले में प्रतिवादी सं. 2 अपनी आधी संपत्ति प्रतिवादी सं. 1 को बेचने के लिए सहमत हुआ और यदि संपत्ति के विभाजन के मुकदमे का निपटारा 1 वर्ष में नहीं होता है तो प्रति वर्ष 3% की दर से राशि का भुगतान भी करेगा। बिक्री विलेख (डीड) का निष्पादन संपत्ति के विभाजन और उसमें विक्रेता के हिस्से को अलग करने के एक महीने बाद हुआ। प्रतिवादी सं. 2 ने प्रतिवादी संख्या 1 के साथ बिक्री के समझौते पर हस्ताक्षर करने की सहमति दी। परन्तु जब वादी का बँटवारा प्रार्थना पत्र खारिज हो गया तो प्रतिवादी सं. 2 ने सौदे को अंतिम रूप देने से इनकार कर दिया और अपनी बयाना राशि वापस मांगी। अपीलकर्ताओं ने वादी के दावे का खंडन किया और तर्क दिया कि उनके खिलाफ विशिष्ट निष्पादन की आवश्यकता नहीं हो सकती क्योंकि उन्होंने संपत्ति खरीदी थी। 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा कि यह विक्रेता की गलती नहीं थी क्योंकि उसने हिस्सेदारी अलग करने की कोशिश की थी लेकिन ऐसा करने में असफल रहा। अदालत ने यह कहते हुए इसे आकस्मिक अनुबंध मानने से इनकार कर दिया कि जब अनुबंध का प्रदर्शन किसी संपार्श्विक घटना के घटित होने पर निर्भर नहीं होता है, तो यह एक पूर्ण अनुबंध है। इसलिए इसे बिना किसी शर्त के लागू किया जाना चाहिए। अदालत द्वारा यह माना गया कि विक्रेता केवल उस विक्रेता की संपत्ति को भविष्य में किसी और को बेचने पर रोक लगाने वाला निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) मुकदमा दायर कर सकता है।

नेमी चंद और अन्य बनाम हरक चंद और अन्य (1965)

नेमी चंद और अन्य बनाम हरक चंद और अन्य (1965), के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा यह देखा गया कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (आईसीए) की धारा 32 में कहा गया है कि कुछ भी करने या न करने का आकस्मिक अनुबंध अनिश्चित भविष्य की घटना के घटित होने पर निर्भर करता है, और तब तक, अनुबंध लागू नहीं किया जा सकता है।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और कहा कि यह पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह मामले की सुनवाई करे और न केवल कानून के सवाल पर बल्कि तथ्य के सवाल पर भी याचिका दायर करे। वे यह नहीं कह सकते कि ऐसे मामले की सुनवाई स्वत: संज्ञान से करना अदालत की जिम्मेदारी है। 

यह भी घोषित किया गया कि विवादित अनुबंध राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा एक आकस्मिक अनुबंध था। न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि कुछ करने या न करने का आकस्मिक अनुबंध किसी अनिश्चित भविष्य की घटना के घटित होने पर निर्भर होता है। अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई पक्ष मामले की सुनवाई नहीं करना चाहता है तो यह अदालतों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह स्वत: संज्ञान लेकर मामले पर विचार करे।

नंदकिशोर लालभाई बनाम न्यू एरा फैब्रिक्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य (2015)

इस मामले में, भूमि की बिक्री के लिए एक अनुबंध निष्पादित किया गया था। उस ज़मीन को एक कारखाने को बेचने का अनुबंध इस शर्त पर किया गया था कि यह तभी किया जाएगा जब श्रमिक संघ बिक्री के लिए सहमत होंगे और भूमि उपयोग में परिवर्तन को सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। दोनों पक्षों ने उस आकस्मिक समझौते पर सहमति व्यक्त की जो बाद में जमीन बेचने के लिए उनके बीच किया गया था। 

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले से निपटते हुए पाया कि बाद में जब उन्होंने इसे बेचने का फैसला किया, तो अनुबंध में उल्लिखित कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि न तो श्रमिक संघ और न ही सक्षम प्राधिकारी ने भूमि की बिक्री के लिए अपनी सहमति दी थी। इस प्रकार, अनुबंध विक्रेता के विरुद्ध लागू करने योग्य नहीं था।

निष्कर्ष

आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग मुख्य रूप से वहां किया जाता है जहां जोखिम शामिल होते हैं या कुछ भविष्य के लक्ष्य होते हैं। यह पूर्ण अनुबंधों की तरह नहीं है। आकस्मिक अनुबंधों को उनके प्रदर्शन से पहले शर्तों की पूर्ति की आवश्यकता होती है। इसका प्रदर्शन भविष्य में किसी घटना के घटित होने या न होने पर भी निर्भर करता है। इसलिए अधिकांश समय, ये अनुबंध निष्पादित नहीं हो पाते हैं क्योंकि पक्षों द्वारा सोची गई अनुमानित समय सीमा के भीतर किसी घटना का घटित होना या न होना संभव नहीं होता है। हालाँकि, आकस्मिक अनुबंध विभिन्न व्यावसायिक समझौतों और कानूनी संदर्भों के लिए बहुत सहायक होते हैं। आकस्मिक अनुबंध बीमा अनुबंधों, क्षतिपूर्ति या गारंटी के अनुबंधों या बातचीत के लिए उपयोगी होते हैं। आम तौर पर, सामान्य अनुबंध बनाते समय आकस्मिक अनुबंधों का उपयोग नहीं किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

आकस्मिक अनुबंधों में मौजूद सार्वभौमिक बाधाएँ क्या हैं?

आकस्मिक अनुबंधों में मौजूद कुछ सार्वभौमिक बाधाएँ इस प्रकार हैं-

  • सक्षम पक्षों द्वारा उचित आधार पर सद्भावपूर्वक इस पर पारस्परिक सहमति होनी चाहिए।
  • आकस्मिक अनुबंध में उचित स्पष्टता और विशिष्टता होनी चाहिए।
  • शर्त कुछ ऐसी होनी चाहिए जिसके घटित होने की संभावना होनी चाहिए अन्यथा अनुबंध अपनी वैधता खो देगा।

आकस्मिक अनुबंध के आवश्यक घटक क्या हैं?

आकस्मिक अनुबंध के विभिन्न आवश्यक घटक इस प्रकार हैं-

  • अनुबंध का निष्पादन शर्तों पर आधारित है।
  • शर्तें प्रकृति में संपार्श्विक होनी चाहिए।
  • किसी घटना के घटित होने या न होने पर आधारित होना चाहिए।
  • भविष्य की घटना का घटित होना या न होना वचनदाता की इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

क्या बीमा अनुबंध आकस्मिक अनुबंध हैं या नहीं?

बीमा अनुबंध भी आकस्मिक अनुबंध हैं क्योंकि जिन व्यक्तियों ने अपनी बीमा पॉलिसी के तहत सदस्यता ली है, उन्हें केवल तभी मुआवजा देना होगा जब विषय वस्तु, जो भी उन्होंने बीमा कराया है, या तो खो गई है या क्षतिग्रस्त हो गई है।

संदर्भ

 

भारतीय कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया

यह लेख Srishti Kaushal द्वारा लिखा गया है और आगे Sakshi Kuthari द्वारा अद्यतन किया गया है। इस लेख में कॉपीराइट संरक्षण की प्रक्रिया, कॉपीराइट पंजीकरण की आवश्यकता और महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेजों और कॉपीराइट पंजीकरण के लिए पात्र व्यक्तियों की सूची दी गई है। इसमें कॉपीराइट पंजीकरण से संबंधित निर्णयों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

क्या होगा अगर आप कोई नई किताब लिखें? यह एक साहित्यिक कृति है जो आपको बहुत सारा पैसा दिला सकती है, लेकिन आप डरे हुए हैं और सोच रहे हैं कि क्या होगा अगर इसका प्रकाशन करते समय लोग इसकी नकल करके अपने नाम से बेचने लगें? इसे रोकने और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आपको क्या करना होगा? 

इसका उत्तर आसान है। आपको अपना काम कॉपीराइट पंजीयक के पास पंजीकृत कराना होगा। कॉपीराइट साहित्य, नाटक, संगीत, कला आदि के क्षेत्रों में मौलिक कार्य के रचनाकारों को कानून द्वारा दिया गया अधिकार है। पंजीकृत कॉपीराइट कानूनी रूप से आपके कार्य की सुरक्षा करता है और उसके अनधिकृत उपयोग को रोकता है। 

2023 और 2024 के बीच बौद्धिक संपदा कार्यालय को लगभग 36,000 कॉपीराइट आवेदन प्राप्त हुए। यह अंततः निपटाए गए लगभग 45,000 कॉपीराइट आवेदनों की संख्या से काफी कम है। यह विसंगति दर्शाती है कि कार्यालय ने कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने की पहल की है। कॉपीराइट आवेदनों के निष्पादन से बचने के लिए, आपको कॉपीराइट पंजीकरण की आवश्यकताओं और प्रक्रिया को समझना होगा। 

इस लेख में, हम उन कार्यों के प्रकारों को समझेंगे जिनके लिए आप कॉपीराइट प्राप्त कर सकते हैं, वे लोग जो किसी कार्य के लिए कॉपीराइट प्राप्त करने के हकदार हैं, कॉपीराइट प्राप्त करने का प्रयास करते समय आपके पास कौन से आवश्यक दस्तावेज होने चाहिए तथा कॉपीराइट पंजीकरण प्रक्रिया में शामिल प्रक्रिया है। यह ऑनलाइन माध्यम से कॉपीराइट पंजीकरण दाखिल करने के निर्देश भी प्रदान करता है। 

कॉपीराइट पंजीकरण से संबंधित प्रक्रिया पर चर्चा करने से पहले, आइए ‘कॉपीराइट’ शब्द का संक्षिप्त अवलोकन करें, और फिर यह विचार करें कि कॉपीराइट पंजीकरण क्यों आवश्यक हो जाता है। 

कॉपीराइट का अर्थ

‘कॉपीराइट’ शब्द एक अद्वितीय प्रकार की बौद्धिक संपदा है। वह अधिकार जो कोई व्यक्ति किसी कार्य में अर्जित करता है, जो उसके बौद्धिक श्रम का परिणाम है, उसे उसका कॉपीराइट कहा जाता है। कॉपीराइट कानून का प्राथमिक कार्य किसी व्यक्ति के काम, श्रम, कौशल या परीक्षण के फल को अन्य लोगों द्वारा छीने जाने से बचाना है। ब्लैक लॉ डिक्शनरी के अनुसार कॉपीराइट साहित्यिक संपत्ति का अधिकार है जिसे सकारात्मक कानून द्वारा मान्यता प्राप्त और स्वीकृत किया गया है। 

यह एक अमूर्त, अभौतिक अधिकार है जो किसी साहित्यिक या कलात्मक रचना के लेखक या सर्जक को प्रदान किया जाता है, जिसके तहत उसे एक निश्चित अवधि के लिए उसकी प्रतियों को बढ़ाने, उन्हें प्रकाशित करने और बेचने का एकमात्र और अनन्य विशेषाधिकार प्राप्त होता है। 

कॉपीराइट पंजीकरण की आवश्यकता

उपरोक्त चर्चा से ‘कॉपीराइट’ शब्द का अर्थ स्पष्ट है। अब, आइए समझते हैं कि कॉपीराइट पंजीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है। साधारण भाषा में कहें तो कॉपीराइट पंजीकरण से तात्पर्य रचनाकार के कार्य को सुरक्षित करना है, जिससे उसे कानूनी संरक्षण मिलता है। यह पंजीकरण कार्य के निर्माता को विशेष अधिकार प्रदान करता है। पंजीकरण से निर्माता को मिलने वाले विशेष अधिकार और सख्त कानूनी संरक्षण कॉपीराइट पंजीकरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं। 

कॉपीराइट पंजीकरण निर्माता के श्रम, कौशल और पूंजी को संरक्षित, मान्यता और प्रोत्साहित करता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ईस्टर्न बुक कंपनी एवं अन्य बनाम डी.बी.मोदक एवं अन्य (2007) में माना कि भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1957 का उद्देश्य कॉपीराइट कार्य के लेखक को दूसरों द्वारा उसके कार्य के अवैध शोषण से बचाना है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह उद्देश्य तब सबसे अधिक फलदायी होता है जब कॉपीराइट पंजीकृत होता है। 

यह कॉपीराइट मालिक को कॉपीराइट स्वामी की सहमति के बिना दूसरों को कार्य का शोषण करने से रोकने का अधिकार देता है। कॉपीराइट पंजीकृत होने के बाद, यह सार्वजनिक डोमेन की सुरक्षा में लेखक और जनता के हितों और अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है। 

आइये अब कॉपीराइट की प्रक्रिया को समझते हैं, कॉपीराइट पंजीकरण आवेदन को ऑनलाइन दाखिल करने से लेकर उसे कॉपीराइट पंजिका (रजिस्टर) में दर्ज कराने तक तथा कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया से संबंधित अन्य सभी प्रासंगिक प्रावधानों को समझते हैं। 

कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया

आइए देखें कि आप कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (जिसे आगे 1957 का अधिनियम कहा जाएगा) के अध्याय X और कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 69 से 74 के अंतर्गत कॉपीराइट पंजीयक के पास अपने मूल कार्य को कैसे पंजीकृत करा सकते हैं। एक बार जब हम कॉपीराइट पंजीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन करने के चरणों से स्पष्ट हो जाते हैं, तो हम पंजीकरण के लिए आवश्यक अनिवार्य दस्तावेजों पर चर्चा करेंगे और कॉपीराइट का उपयोग करके इसे पंजीकृत करने का अधिकार किसे है। 

यह ध्यान देने योग्य है कि, प्रारंभिक काल में जब लोग प्रौद्योगिकी और ऑनलाइन प्रक्रियाओं से अच्छी तरह परिचित नहीं थे, कॉपीराइट पंजीकृत कराने में रुचि रखने वाला व्यक्ति, आवश्यक दस्तावेजों को नई दिल्ली स्थित कॉपीराइट के मुख्य कार्यालय में भौतिक रूप से प्रस्तुत कर सकता था या नई दिल्ली कार्यालय में डाक द्वारा भेज सकता था, तथापि, वर्तमान में कॉपीराइट पंजीकृत कराने का सबसे व्यवहार्य तरीका ऑनलाइन आवेदन पत्र प्रस्तुत करना है। 

कॉपीराइट पंजीकरण फॉर्म ऑनलाइन दाखिल करने के निर्देश

कॉपीराइट पंजीकरण ऑनलाइन कॉपीराइट पंजीकरण फॉर्म भरकर किया जा सकता है। निर्देश इस प्रकार हैं:

  1. कॉपीराइट आवेदक लॉग इन करने के लिए एक वैध यूजर आईडी और पासवर्ड दर्ज करता है;
  2. यदि कॉपीराइट आवेदक पंजीकृत नहीं है, तो “नया उपयोगकर्ता पंजीकरण पर क्लिक करें”;
  3. भविष्य में उपयोग के लिए यूजर आईडी और पासवर्ड नोट कर लें;
  4. एक बार आवेदक लॉग इन कर ले, तो उसे “ऑनलाइन कॉपीराइट पंजीकरण के लिए क्लिक करें” लिंक पर क्लिक करना चाहिए;
  5. नीचे दिए गए चरणों में, ऑनलाइन “कॉपीराइट पंजीकरण फॉर्म” भरना होगा: 
  1. फॉर्म XIV भरना होगा। फिर, दर्ज किए गए विवरण को सुरक्षित करने के लिए संचय बटन दबाएँ और अगले चरण पर जाने के लिए चरण 2 दबाएँ; 
  2. कॉपीराइट आवेदक के हस्ताक्षर को 512 केबी में स्कैन किया जाना चाहिए और अपलोड करने के लिए तैयार रखा जाना चाहिए; 
  3. फिर विवरण में कथन भरना चाहिए। इसके बाद दर्ज किए गए विवरण को सहेजने के लिए संचय बटन दबाएँ। इसके बाद, अगले चरण पर जाने के लिए चरण 3/4 दबाएँ;  
  4. इसके बाद आवेदक को “अतिरिक्त विवरण में कथन” भरना चाहिए। यह प्रपत्र “साहित्यिक/नाटकीय, संगीतमय, कलात्मक और सॉफ्टवेयर” कार्यों के लिए लागू है। फिर दर्ज किए गए विवरण को सुरक्षित करने के लिए संचय बटन दबाएं। इसके बाद अगले चरण पर जाने के लिए चरण 4 दबाएँ।
  5. इंटरनेट पेमेंट गेटवे के माध्यम से भुगतान किया जाता है। 
  1. फॉर्म सफलतापूर्वक जमा होने पर एक डायरी नंबर उत्पन्न होगा। (कृपया इसे भविष्य के संदर्भ के लिए नोट कर लें)। 
  2. कलात्मक कार्य पीडीएफ/जेपीजी प्रारूप में अपलोड किया जाता है, ध्वनि रिकॉर्डिंग कार्य एमपी3 प्रारूप में अपलोड किया जाता है और साहित्यिक/नाटकीय, संगीत और सॉफ्टवेयर कार्य पीडीएफ प्रारूप में अपलोड किया जाता है। पीडीएफ प्रारूप 10 एमबी से कम होना चाहिए। 
  3. अंत में, “पावती (एक्नॉलेजमेंट) पर्ची” की 1 हार्ड कॉपी और “कॉपीराइट पंजीकरण फॉर्म” की 1 कागज़ी प्रति (हार्ड कॉपी) का प्रिंट लें और इसे इस पते पर पोस्ट करें: 

कॉपीराइट प्रभाग 

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन (प्रमोशन) विभाग 

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय 

बौधिक सम्पदा भवन,

प्लॉट नंबर 32, सेक्टर 14, द्वारका, नई दिल्ली-110078 

ईमेल पता: copyright[at]nic[dot]in

टेलीफोन नंबर: 011-28032496

कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आवश्यक दस्तावेज

इससे पहले कि हम उस प्रक्रिया पर चर्चा करें जिसका आपको पालन करना होगा यदि आप अपना कार्य 1957 के अधिनियम के तहत पंजीकृत कराना चाहते हैं, हमें उन आवश्यक दस्तावेजों पर गौर करना होगा जिनकी आपको सुचारू पंजीकरण के लिए आवश्यकता होगी। 

यद्यपि विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए कुछ विशेष आवश्यकताएं हैं, लेकिन आम तौर पर अनिवार्य आवश्यकताएं इस प्रकार हैं: 

  • यदि कार्य प्रकाशित हो तो कार्य की 3 प्रतियां;
  • यदि कार्य प्रकाशित नहीं है, तो पांडुलिपि की 2 प्रतियां;
  • यदि आवेदन किसी वकील द्वारा दायर किया जा रहा है, तो वकील और पक्षकार द्वारा हस्ताक्षरित विशेष मुख्तारनामा या वकालतनामा;
  • कार्य के संबंध में प्राधिकरण, यदि कार्य आवेदक का कार्य नहीं है;
  • कार्य के शीर्षक और भाषा के संबंध में जानकारी;
  • आवेदक का नाम, पता और राष्ट्रीयता से संबंधित जानकारी;
  • आवेदक को अपना मोबाइल नंबर और ईमेल पता भी देना होगा;

  • यदि आवेदक लेखक नहीं है, तो लेखक का नाम, पता और राष्ट्रीयता वाला एक दस्तावेज, और यदि लेखक की मृत्यु हो गई है, तो उसकी मृत्यु की तारीख;
  • यदि कार्य का उपयोग किसी उत्पाद पर किया जाना है, तो व्यापार-चिह्न कार्यालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक है;
  • यदि आवेदक लेखक के अलावा कोई और है, तो लेखक से अनापत्ति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होगी। इस मामले में, लेखक का प्राधिकरण भी आवश्यक हो सकता है; 
  • यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर कार्य में दिखाई देती है, तो ऐसे व्यक्ति से अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक है; 
  • यदि प्रकाशक आवेदक नहीं है, तो प्रकाशक से अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक है;
  • यदि कार्य प्रकाशित है, तो प्रथम प्रकाशन का वर्ष और पता भी आवश्यक है;
  • आगामी प्रकाशनों के वर्ष और देश के बारे में जानकारी;
  • यदि कॉपीराइट सॉफ्टवेयर के लिए है, तो स्रोत कोड और ऑब्जेक्ट कोड भी आवश्यक है।

इस बिंदु पर, यह ध्यान रखना उचित है कि एक बार कॉपीराइट पंजीकृत हो जाने के बाद, उसका विवरण बनाए रखने के लिए एक पंजिका रखी जाती है। आइए नीचे दिए गए प्रावधानों पर एक नज़र डालें जो कॉपीराइट की पंजीकरण प्रक्रिया को पूरी तरह से समझने के लिए प्रासंगिक हैं। 

कॉपीराइट का पंजीकरण करवाना

कॉपीराइट प्राप्त कार्यों से संबंधित पूर्ण जानकारी बनाए रखने के लिए पंजीयक द्वारा कॉपीराइट पंजीकरण का रखरखाव किया जाता है। 1957 के अधिनियम की धारा 44 के अनुसार, कॉपीराइट कार्यालय में कॉपीराइट की एक पंजिका रखी जाती है। कॉपीराइट रजिस्टर में कार्यों के नाम या शीर्षक तथा लेखकों, प्रकाशकों और कॉपीराइट के स्वामियों के नाम और पते तथा अन्य विवरण होते हैं, जो निर्धारित किए जा सकते हैं। इस धारा को लागू करने के पीछे उद्देश्य कॉपीराइट के प्रवर्तन के उद्देश्य से पंजीकरण को अनिवार्य या अनिवार्य बनाना नहीं है। किसी लेखक के लिए धारा 44 के तहत कॉपीराइट पंजीकृत कराना अनिवार्य नहीं है, ताकि वह इसके द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्राप्त कर सके। इससे केवल यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पंजीकरण में दर्शाया गया व्यक्ति ही वास्तविक लेखक है। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 69(1) में प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीकरण को भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप में छह भागों में रखा जाएगा, अर्थात्: 

  • भाग I: कंप्यूटर प्रोग्राम, तालिकाओं और संकलनों के अलावा अन्य साहित्यिक कार्य जिनमें कंप्यूटर डेटाबेस और नाटकीय कार्य शामिल हैं;
  • भाग II: संगीतमय कार्य;
  • भाग III: कलात्मक कार्य;
  • भाग IV: सिनेमैटोग्राफ फिल्में;
  • भाग V: ध्वनि रिकॉर्डिंग;
  • भाग VI: कंप्यूटर प्रोग्राम, तालिकाएँ और संकलन जिनमें कंप्यूटर डाटाबेस शामिल हैं। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 69(2) में प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीकरण में कॉपीराइट नियम, 2013 की प्रथम अनुसूची के प्रपत्र-XIII में निर्दिष्ट विवरण शामिल होंगे। 

कॉपीराइट पंजीकरण में प्रविष्टियाँ

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कॉपीराइट का नाम कॉपीराइट पंजिका में दर्ज कराने के लिए, 1957 के अधिनियम की धारा 45(1) के तहत आवेदन किया जा सकता है। उपर्युक्त धारा में यह प्रावधान है कि लेखक या प्रकाशक या कॉपीराइट का मालिक या किसी कार्य में कॉपीराइट में रुचि रखने वाला अन्य व्यक्ति कॉपीराइट पंजिका में कार्य का विवरण दर्ज करने के लिए कॉपीराइट पंजीयक को आवेदन कर सकता है। 

1957 के अधिनियम की धारा 45(2) में प्रावधान है कि जब कॉपीराइट पंजीयक को किसी कार्य के संबंध में आवेदन प्राप्त होता है, तो वह ऐसी जांच करने के बाद, जिसे वह उचित समझे, उस विशेष कार्य को कॉपीराइट पंजिका में दर्ज कर सकता है। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 70 में कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवेदन से संबंधित विवरण दिए गए हैं। वे इस प्रकार हैं: 

  • नियम 70(1): कॉपीराइट के पंजीकरण के प्रयोजनार्थ आवेदक द्वारा फार्म- XIV भरा जाएगा। पंजिका में किसी भी विवरण को अद्यतन करने के लिए फॉर्म-XV भरना होगा। 
  • नियम 70(2): कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवेदन केवल एक ही कार्य से संबंधित होना चाहिए और कॉपीराइट नियम, 2013 की दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट शुल्क के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 
  • नियम 70(3): प्रत्येक आवेदन पर केवल आवेदक द्वारा हस्ताक्षर किया जाना चाहिए, जो या तो लेखक या अधिकार-धारक हो सकता है। यदि कॉपीराइट के मालिक द्वारा आवेदन दायर किया जाता है, तो उसके साथ अनापत्ति प्रमाण पत्र भी संलग्न करना होगा। 
  • नियम 70(4): अप्रकाशित कार्य के पंजीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ कार्य की दो प्रतियां संलग्न होनी चाहिए। 
  • नियम 70(5): कंप्यूटर प्रोग्राम को पंजीकृत करने के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ स्रोत कोड और ऑब्जेक्ट कोड दोनों होने चाहिए। 
  • नियम 70(6): किसी कलात्मक कार्य के पंजीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन में, जिसका उपयोग किसी वस्तु या सेवा के संबंध में किया जाता है या किया जा सकता है, इस आशय का एक कथन शामिल होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, आवेदन के साथ व्यापार-चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 3 में उल्लिखित व्यापार-चिह्न पंजीयक से एक प्रमाण पत्र भी संलग्न होना चाहिए, जिसमें यह पुष्टि की गई हो कि कलात्मक कार्य के समान या भ्रामक रूप से समान कोई भी व्यापार-चिह्न आवेदक के अलावा किसी अन्य के नाम पर उस अधिनियम के तहत पंजीकृत नहीं किया गया है, या आवेदक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसा कोई आवेदन नहीं किया गया है। 
  • नियम 70(7): किसी कलात्मक कार्य के पंजीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन, जिसे डिजाइन अधिनियम, 2000 के तहत डिजाइन के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है, में निम्नलिखित बताते हुए एक हलफनामा शामिल होना चाहिए: 
    • यह कार्य डिजाइन अधिनियम, 2000 के अंतर्गत पंजीकृत नहीं है; तथा
    • इस कार्य को किसी औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किसी वस्तु पर लागू नहीं किया गया है तथा इसे पचास से अधिक बार पुनरुत्पादित किया गया है।
  • नियम 70(8): कॉपीराइट कार्यालय में आवेदन व्यक्तिगत रूप से, डाक द्वारा या कॉपीराइट कार्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध ऑनलाइन फाइलिंग सुविधा के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • नियम 70(9): आवेदक को उन सभी व्यक्तियों को सूचित करना होगा जो कॉपीराइट विषय-वस्तु में रुचि का दावा करते हैं या आवेदक के अधिकारों पर विवाद करते हैं।
  • नियम 70(10): यदि आवेदन प्राप्त होने के तीस दिन के भीतर कॉपीराइट पंजीयक को पंजीकरण पर कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती है, और पंजीयक प्रदान किए गए विवरण की सटीकता से संतुष्ट है, तो पंजीयक कॉपीराइट पंजिका में विवरण दर्ज करेगा। 
  • नियम 70(11): यदि कॉपीराइट पंजीयक को निर्दिष्ट समय सीमा के भीतर पंजीकरण पर कोई आपत्ति प्राप्त होती है, या यदि पंजीयक आवेदन विवरण की सटीकता से संतुष्ट नहीं है, तो वे उचित समझी जाने वाली जांच करने के बाद कॉपीराइट पंजिका में कार्य के विवरण को दर्ज कर सकते हैं, जैसा कि वे आवश्यक समझें। 
  • नियम 70(12): कॉपीराइट पंजीयक को किसी कार्य के पंजीकरण के लिए किसी भी आवेदन को अस्वीकार करने से पहले सुनवाई का अवसर प्रदान करना चाहिए। 
  • नियम 70(13): पंजीकरण प्रक्रिया तभी पूरी मानी जाती है जब कॉपीराइट पंजिका में प्रविष्टियों की एक प्रति कॉपीराइट पंजीयक या कॉपीराइट के उप पंजीयक द्वारा हस्ताक्षरित और जारी की जाती है, जिसे ऐसा अधिकार सौंपा गया है।
  • नियम 70(14): कॉपीराइट पंजीयक, जहां भी संभव हो, कॉपीराइट पंजीयक में प्रविष्टियों की एक प्रति यथाशीघ्र संबंधित पक्षों को भेजेगा। 

सूचकांक

1957 के अधिनियम की धारा 46 में प्रावधान है कि कॉपीराइट कार्यालय निर्धारित अनुसार कॉपीराइट पंजिका के सूचकांक भी बनाए रखेगा। कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 72(1) में कहा गया है कि कॉपीराइट कार्यालय कॉपीराइट पंजिका के प्रत्येक अनुभाग के लिए भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक दोनों स्वरूपों में निम्नलिखित अनुक्रमणिकाएँ बनाए रखेगा:

  • एक सामान्य लेखक सूचकांक;
  • एक सामान्य शीर्षक सूचकांक; 
  • प्रत्येक भाषा में कार्यों के लिए एक लेखक सूचकांक; तथा
  • प्रत्येक भाषा में कार्यों के लिए एक शीर्षक सूचकांक।

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 72(2) में कहा गया है कि प्रत्येक सूचकांक को कार्ड प्रारूप में वर्णानुक्रम में व्यवस्थित किया जाएगा। 

पंजिका का प्रारूप और निरीक्षण

1957 के अधिनियम की धारा 47 में प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीयक सभी उचित समयों पर निरीक्षण के लिए खुला रहेगा, और कोई भी व्यक्ति निर्धारित शुल्क का भुगतान करके तथा निर्धारित शर्तों के अधीन ऐसी पंजिका या अनुक्रमणिकाओं की प्रतियां लेने या उनसे उद्धरण बनाने का हकदार होगा। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 73 में यह प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजिका और उसकी अनुक्रमणिकाएं कॉपीराइट पंजीयक द्वारा निर्दिष्ट तरीके और शर्तों के अंतर्गत उचित समय के दौरान किसी भी व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए सुलभ होंगी। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 74(1) में प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति कॉपीराइट पंजीयक द्वारा पर्यवेक्षण की व्यवस्था के अधीन, द्वितीय अनुसूची में निर्धारित शुल्क का भुगतान करके कॉपीराइट पंजिका या उसकी अनुक्रमणिकाओं की प्रतियां प्राप्त कर सकता है या उनसे उद्धरण बना सकता है। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 74(2) में प्रावधान है कि आवेदन प्राप्त होने तथा द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट शुल्क के भुगतान पर कॉपीराइट पंजीयक कॉपीराइट पंजिका में प्रविष्टियों तथा उसकी अनुक्रमणिकाओं की प्रमाणित प्रतिलिपि उपलब्ध कराएगा। 

कॉपीराइट पंजिका उसमें दर्ज विवरणों का प्रथम दृष्टया साक्ष्य होगा

1957 के अधिनियम की धारा 48 में कहा गया है कि कॉपीराइट पंजिका, उसमें दर्ज विवरणों के लिए प्रथम दृष्टया साक्ष्य के रूप में कार्य करेगा। वे दस्तावेज जो कॉपीराइट पंजीयक द्वारा प्रमाणित हैं और जिन पर कॉपीराइट कार्यालय की मुहर लगी है, तथा जो पंजिका से किसी प्रविष्टि या उद्धरण की प्रतिलिपि होने का दावा करते हैं, उन्हें बिना किसी अतिरिक्त सबूत या मूल प्रस्तुत करने की आवश्यकता के, साक्ष्य के रूप में न्यायालय में स्वीकार्य किया जाएगा। 

कॉपीराइट पंजिका में प्रविष्टियों में सुधार

1957 के अधिनियम की धारा 49 में प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीयक, निर्धारित परिस्थितियों और शर्तों के अधीन, कॉपीराइट पंजीयक को निम्नलिखित तरीकों से संशोधित या परिवर्तित कर सकता है:

  1. नाम, पते या अन्य विवरण में किसी भी त्रुटि को ठीक करना; या
  2. आकस्मिक चूक के कारण हुई अन्य गलतियों को सुधारना। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 71(1) में प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीयक अपनी पहल पर या किसी इच्छुक पक्ष के आवेदन के जवाब में, 1957 के अधिनियम की धारा 49 में निर्दिष्ट प्रविष्टियों के लिए कॉपीराइट पंजिका में संशोधन या परिवर्तन कर सकते हैं। ऐसे परिवर्तन करने से पहले, पंजीयक, जब भी संभव हो, प्रभावित व्यक्ति को प्रस्तावित संशोधन या परिवर्तन को चुनौती देने का अवसर प्रदान करेगा तथा किए गए परिवर्तनों के बारे में उन्हें सूचित करेगा। 

कॉपीराइट नियम, 2013 के नियम 71(2) में अतिरिक्त रूप से यह प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीयक, 1957 के अधिनियम की धारा 50 के अंतर्गत पंजीयक द्वारा किए गए आवेदन के आधार पर कॉपीराइट बोर्ड द्वारा जारी आदेश के अनुसरण में कॉपीराइट पंजिका में प्रविष्टियों में सुधार करेगा। 

उच्च न्यायालय द्वारा पंजिका में सुधार

1957 के अधिनियम की धारा 50 में प्रावधान है कि उच्च न्यायालय, कॉपीराइट पंजीयक या किसी पीड़ित पक्ष के आवेदन पर, कॉपीराइट पंजीयक को निम्नलिखित तरीके से सुधार का आदेश दे सकता है: 

  1. इसमें पंजिका में गलत तरीके से छूटी हुई कोई भी प्रविष्टि शामिल है;
  2. किसी भी गलत प्रविष्टि को हटाना या पंजिका में बची हुई प्रविष्टि को हटाना; या
  3. पंजिका में किसी भी त्रुटि या दोष को ठीक करना। 

कॉपीराइट पंजिका में प्रकाशित की जाने वाली प्रविष्टियाँ

1957 के अधिनियम की धारा 50A के अंतर्गत यह प्रावधान है कि कॉपीराइट पंजीयक कॉपीराइट पंजिका में की गई प्रत्येक प्रविष्टि, साथ ही धारा 49 के अंतर्गत किए गए किसी भी सुधार और धारा 50 के अंतर्गत सुधार आदेश को आधिकारिक राजपत्र में या ऐसे अन्य तरीके से, जैसा वह उचित समझे, प्रकाशित करेगा।

अब तक यह स्पष्ट है कि आवेदक किस प्रकार ऑनलाइन माध्यम से कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकता है, तथा कॉपीराइट पंजीकरण के बाद के चरणों जैसे कॉपीराइट पंजिका में प्रविष्टि, उसकी अनुक्रमणिका (इंडेक्स), निरीक्षण और सुधार आदि को कैसे पूरा कर सकता है। 

अब तक हमने कॉपीराइट पंजीकरण के विस्तृत प्रावधानों पर चर्चा की है, अब हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को समझते हैं, जब हम यह तय करते हैं कि हमें अपना कॉपीराइट पंजीकृत करवाना चाहिए या नहीं, यानी वे कार्य जो कॉपीराइट का उपयोग करके पंजीकृत किए जा सकते हैं। 

कॉपीराइट का उपयोग करके कौन सा कार्य पंजीकृत किया जा सकता है, इसका अवलोकन

1957 के अधिनियम की धारा 13 में उन कार्यों की श्रेणी का उल्लेख किया गया है जिनमें कॉपीराइट मौजूद रहता है। 1957 के अधिनियम की धारा 13(1) के अनुसार, निम्नलिखित कार्य ऐसे हैं जिनमें कॉपीराइट मौजूद है: 

  • मौलिक साहित्यिक, नाटकीय, संगीतमय और कलात्मक कार्य;
  • सिनेमैटोग्राफ फिल्में; और
  • ध्वनि रिकॉर्डिंग

1957 के अधिनियम की धारा 2(y) के अनुसार, “कार्य” का तात्पर्य निम्नलिखित में से किसी भी कार्य से है, अर्थात: 

  • कोई साहित्यिक, नाटकीय, संगीतमय या कलात्मक कार्य;
  • सिनेमैटोग्राफ फिल्म;
  • ध्वनि रिकॉर्डिंग

अतः उक्त अधिनियम की धारा 2(y) में निम्नलिखित छह प्रकार के कार्य शामिल हैं:

कार्य का प्रकार विवरण
साहित्यिक कार्य [धारा 2(o)] “साहित्यिक कार्य” से तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(o) के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी कार्य से है।
नाटकीय कार्य [धारा 2(h)] “नाटकीय कार्य” से तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(h) के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी कार्य से है।
संगीतमय कार्य [धारा 2(p)] “संगीतमय कार्य” से तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(p) के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी कार्य से है।
कलात्मक कार्य [धारा 2(c)] कलात्मक कार्य” से तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(c) के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी कार्य से है।
सिनेमैटोग्राफ फिल्में [धारा 2((f)] “सिनेमैटोग्राफ फिल्म” से तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(f) के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी कार्य से है।
ध्वनि रिकॉर्डिंग [धारा 2(xx)] “ध्वनि रिकॉर्डिंग” का तात्पर्य 1957 के अधिनियम की धारा 2(xx) के अंतर्गत सूचीबद्ध कार्य से है।

साहित्यिक कार्य में कॉपीराइट के कुछ चित्र जिन्हें पंजीकृत नहीं किया जा सकता

दृष्टांत विवरण
किसी भी शब्द पर कोई कॉपीराइट नहीं होता है  एक भी शब्द कॉपीराइट का विषय नहीं हो सकता है। 
कथानक (स्क्रिप्ट) के रूप में कोई कॉपीराइट नहीं कॉपीराइट का स्वामित्व हमेशा उस व्यक्ति के पास नहीं होता जो अवधारणा (पटकथा या कथानक) लेकर आया है, बल्कि यह उस व्यक्ति के पास होता है जो अवधारणा को क्रियान्वित करता है।
सामान्य जानकारी कॉपीराइट योग्य नहीं है जब विषय-वस्तु सभी के लिए उपलब्ध सामान्य जानकारी से ली गई हो, तो ऐसे कार्य पर कोई कॉपीराइट नहीं हो सकता है।
न्यायिक घोषणाएँ और न्यायिक कार्यवाही की विधि रिपोर्ट निर्णयों या आदेशों का पुनरुत्पादन या उत्पादन कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
ऐतिहासिक कार्य ऐतिहासिक कृतियाँ स्वतः कॉपीराइट योग्य नहीं होतीं है।
मौजूदा कार्य के नए संस्करण नए संस्करण में कॉपीराइट बनाने के उद्देश्य से, मौजूदा कार्य को नया रूप देने के लिए श्रम कौशल और पूंजी निवेश का साक्ष्य होना चाहिए।
रोजगार के दौरान किए गए कार्य पर कोई कॉपीराइट नहीं होता 1957 के अधिनियम की धारा 17(b) और (c) “किराए पर काम” से संबंधित है। इसमें प्रावधान है कि लिखित समझौते के अभाव में, नियोक्ता को कॉपीराइट का मूल स्वामी माना जाता है, जहां कोई लेखक सेवा या प्रशिक्षुता के दौरान किसी कृति का सृजन करता है।

कॉपीराइट पंजीयक के पास कौन अपनी कृति पंजीकृत करा सकता है?

यदि आपने अपने दिमाग और प्रतिभा का उपयोग करके कोई नई चित्रकारी बनाई है, तो क्या कोई इसका कॉपीराइट प्राप्त कर सकता है? बिल्कुल नहीं। आइए देखें कि कौन कानूनी तौर पर अपने काम के लिए कॉपीराइट पाने का हकदार है। 

निम्नलिखित लोग कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत करने के हकदार हैं और यदि वे चाहें तो बाद में इसे पंजीकृत भी करा सकते हैं; 

लेखक इस कृति के लेखक हैं:

  1. या तो वह व्यक्ति जिसने वास्तव में कार्य का सृजन किया है, या 
  2. यदि रोजगार के दायरे के दौरान किया गया हो, तो नियोक्ता। इसे ‘किराए पर लिया गया काम’ माना जाता है।
  3. ऐसे लेखक को कानूनी तौर पर अपने काम के लिए कॉपीराइट प्राप्त करने की अनुमति है। 
अनन्य अधिकारों का मालिक कॉपीराइट कानून किसी व्यक्ति को मूल कार्य को नियंत्रित करने, उपयोग करने और वितरित करने के लिए विशेष अधिकार प्रदान कर सकता है। इन अधिकारों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  1. मूल कार्य की प्रतिलिपियाँ बनाने या पुनरुत्पादन का अधिकार;
  2. कार्य की प्रतियां वितरित करने का अधिकार;
  3. कार्य को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का अधिकार;
  4. कार्य निष्पादित करने का अधिकार; तथा
  5. कार्य में परिवर्तन करने और मूल कार्य से व्युत्पन्न बनाने का अधिकार। 
कॉपीराइट दावेदार यह या तो:

  1. लेखक है; या
  2. वह व्यक्ति या संगठन है जिसने लिखित अनुबंध, वसीयत आदि के माध्यम से लेखक से स्वामित्व अधिकार प्राप्त किया हो। 
प्राधिकृत एजेंट इसका तात्पर्य किसी भी ऐसे व्यक्ति से है जो निम्नलिखित में से किसी की ओर से कार्य करने के लिए प्राधिकृत है:

  1. लेखक; या
  2. कॉपीराइट दावेदार; या
  3. अनन्य अधिकार का मालिक। 

यहां यह भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए कोई आयु सीमा नहीं है तथा एक नाबालिग भी कॉपीराइट पंजीकृत कराने का हकदार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कॉपीराइट कानून रचनात्मकता को मान्यता देता है और समझता है कि उम्र रचनात्मकता पर प्रतिबंध नहीं हो सकती है। इसके अलावा, यदि कार्य दो या अधिक लोगों द्वारा बनाया गया है तो कार्य के निर्माता सह-मालिक होंगे, जब तक कि वे अन्यथा सहमत न हों। 

क्या कॉपीराइट का पंजीकरण अनिवार्य है

कॉपीराइट का पंजीकरण वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं है। किसी कार्य पर कॉपीराइट का दावा करने के लिए यह कोई पूर्वापेक्षित शर्त नहीं है। कॉपीराइट कार्य के निर्माण के क्षण से ही उत्पन्न होता है। 1957 के अधिनियम में ऐसी कोई धारा नहीं है कि जब तक रचना पंजीकृत नहीं हो जाती, लेखक को कोई अधिकार या उपचार नहीं मिल सकता है। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नव साहित्य प्रकाश एवं अन्य बनाम आनंद कुमार एवं अन्य (1980) मामले में माना कि कॉपीराइट का पंजीकरण केवल उसमें लेखक के रूप में दर्शाए गए व्यक्ति के पक्ष में अनुमान लगाता है। 1957 के अधिनियम का कोई भी प्रावधान किसी लेखक को उसके अधिकारों से केवल उसके अधिकारों के पंजीकरण न कराने के कारण वंचित नहीं करता है। 

माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एशियन पेंट्स (आई) लिमिटेड बनाम जयकिशन पेंट्स एंड एलाइड प्रोडक्ट्स (2002) में माना कि 1957 के अधिनियम की धारा 46 और 48 के तहत पंजीकरण वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं है।

कॉपीराइट पंजीकृत न कराने के परिणाम

यद्यपि कॉपीराइट का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, तथापि कॉपीराइट का पंजीकरण न कराने पर कॉपीराइट मालिक को पंजीकृत कॉपीराइट मालिक की तुलना में कुछ अतिरिक्त लाभों का दावा करने से वंचित होना पड़ता है। यदि कॉपीराइट पंजीकृत नहीं है, तो किसी भी व्यक्ति को लेखक के कार्य का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता है। यदि कॉपीराइट पंजीकृत नहीं है तो लेखक को परिवर्तन, विनाश और अन्य कार्यों को रोकने का अधिकार नहीं है जो लेखक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जिस व्यक्ति का कॉपीराइट कार्य पंजीकृत है, उसे गैर-पंजीकृत मालिक की तुलना में निम्नलिखित लाभ मिलते हैं। वे इस प्रकार हैं:

  1. कॉपीराइट का दावा करते समय किसी गैर-पंजीकृत कॉपीराइट कार्य का उपयोग सार्वजनिक रिकॉर्ड के रूप में नहीं किया जा सकता है;
  2. ऐसे समय में जब कानूनी विवाद उत्पन्न होते हैं, तो गैर-पंजीकृत कॉपीराइट को अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है कि कार्य कॉपीराइट द्वारा संरक्षित है;
  3. जिस व्यक्ति का कॉपीराइट पंजीकृत नहीं है, वह कॉपीराइट उल्लंघन के लिए मुकदमा दायर नहीं कर सकता है और वैधानिक क्षतिपूर्ति और वकील की फीस के लिए पात्र नहीं हो सकता है;
  4. गैर-पंजीकृत कॉपीराइट कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कॉपीराइट के जीवन के लिए निर्माता का काम संरक्षित और प्रलेखित है, इसलिए, निर्माता की बौद्धिक संपदा की रक्षा नहीं होती है;
  5. किसी लेखक का कार्य जो पंजीकृत नहीं है, उसके कार्य को उसकी अनुमति के बिना कॉपी या उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता है;
  6. यदि कॉपीराइट पंजीकृत नहीं है, तो इससे दीर्घकाल में लेखक का समय और पैसा बर्बाद होता है, क्योंकि इससे दावे की वैधता निर्धारित करने के लिए न्यायालय की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। 

इसलिए, कॉपीराइट के रचनाकारों और मालिकों को अपने अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने कॉपीराइट को पंजीकृत कराने पर विचार करना चाहिए। 

निष्कर्ष

1957 के अधिनियम के तहत कॉपीराइट पंजीकरण की प्रक्रिया, रचनाकारों के कार्यों को कानूनी मान्यता देकर उनके अधिकारों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह न केवल कॉपीराइट मालिकों के अधिकारों की रक्षा करता है बल्कि रचनात्मकता को भी बढ़ावा देता है। समाज में प्रगति को सक्षम करने के लिए रचनात्मकता सबसे आवश्यक आवश्यकता है। रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने से समाज का आर्थिक और सामाजिक विकास संभव होता है। कॉपीराइट लोगों की रचनात्मकता की रक्षा करता है और कलाकारों, लेखकों आदि के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। 

कॉपीराइट पंजीयक के पास अपने कार्य को पंजीकृत कराने से आपको उसे पुनः प्रस्तुत करने का अधिकार, कार्य को अनुकूलित करने का अधिकार, पितृत्व का अधिकार तथा कार्य को वितरित करने का अधिकार प्राप्त होता है। यद्यपि यह आसान लगता है, कॉपीराइट पंजीकरण प्रक्रिया एक लंबी लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें 10 से 12 महीने तक का समय लग सकता है। अपने कॉपीराइट को पंजीकृत कराना हमेशा उचित होता है। 

यह कानूनी विवादों में प्रथम दृष्टया साक्ष्य के रूप में कार्य करता है, जिससे अधिकारों को लागू करना आसान हो जाता है। एक बार आपका कॉपीराइट पंजीकृत हो जाए तो अदालत में जाना और आपके कार्य की अवैध नकल करने वाले व्यक्ति को दंडित करवाना बहुत आसान हो जाता है। कॉपीराइट धारकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए, कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 63 के तहत, कम से कम छह महीने से तीन साल तक के कारावास तथा कम से कम 50,000 रुपये से 2,00,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है, यदि किसी के द्वारा आपके अधिकार का उल्लंघन किया जाता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

कॉपीराइट संरक्षण का मूल उद्देश्य क्या है?

भारतीय कॉपीराइट कानून का आधार, जो अंग्रेजी मूल और उत्पत्ति का है, का नैतिक आधार है और यह आठवीं आज्ञा, “चोरी नहीं करना” पर आधारित है (जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आर.जी.आनंद बनाम मेसर्स डिलक्स फिल्म्स एवं अन्य (1978) में कहा है)। भारतीय और अंग्रेजी दोनों कॉपीराइट कानूनों का मूल उद्देश्य हमेशा से ही किसी व्यक्ति के कौशल, श्रम और प्रयास के फल को दूसरों द्वारा हड़पे जाने से बचाना रहा है। 

कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवेदन किस माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए?

कॉपीराइट पंजीकरण के लिए आवेदन ऑनलाइन, डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।

क्या वस्तुओं और सेवाओं से संबंधित कलात्मक कार्यों का कॉपीराइट पंजीकरण प्राप्त करने के लिए 1957 के अधिनियम की धारा 45(1) के प्रावधान के तहत अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) अनिवार्य है?

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने मोहम्मद इरशाद सोल प्रोप्राइटर एक एजेंसीज बनाम पंजीयक ऑफ कॉपीराइट्स एंड अन्य (2022) में कहा कि किसी व्यक्ति को किसी कलात्मक कार्य के कॉपीराइट का पंजीकरण प्राप्त करने के लिए, जिसका उपयोग किसी भी सामान और सेवाओं के संबंध में किया जा रहा है या उपयोग किए जाने में सक्षम है, 1957 के अधिनियम की धारा 45 (1) के प्रावधान के तहत अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करना अनिवार्य है। 

क्या एक ही आवेदन में एकाधिक कॉपीराइट कार्य पंजीकृत किये जा सकते हैं?

नहीं, प्रत्येक आवेदन केवल एक ही कार्य के लिए होना चाहिए। 

यदि कोई कॉपीराइट पंजीकरण पर आपत्ति करता है तो क्या होगा?

कॉपीराइट पंजीयक आपत्तियों पर विचार करेंगे और पंजीकरण से पहले जांच कर सकते हैं। 

क्या कॉपीराइट शीर्षकों और नामों पर लागू होता है?

कॉपीराइट में सामान्यतः शीर्षक, नाम, लघु शब्द संयोजन, नारे, संक्षिप्त वाक्यांश, विधियां, कथानक या तथ्यात्मक जानकारी शामिल नहीं होती हैं। इसके अलावा, कॉपीराइट विचारों या अवधारणाओं तक विस्तारित नहीं होता है। कॉपीराइट संरक्षण के लिए पात्र होने हेतु कार्य वास्तविक होना चाहिए। 

कॉपीराइट पंजीकरण की प्रभावी तिथि क्या है?

कॉपीराइट पंजीकरण उस तिथि से प्रभावी होता है, जब कॉपीराइट कार्यालय को सभी आवश्यक तत्व स्वीकार्य रूप में प्राप्त हो जाते हैं। कॉपीराइट कार्यालय को किसी आवेदन पर कार्रवाई करने में लगने वाला समय, कार्यालय को प्राप्त होने वाली सामग्री की मात्रा पर निर्भर करता है। 

कॉपीराइट संरक्षण की अवधि क्या है?

1957 के अधिनियम के अध्याय V में कॉपीराइट संरक्षण की अवधि का प्रावधान है। यह लेखक के जीवनकाल (साहित्यिक, कलात्मक, नाटकीय और संगीत संबंधी कार्य के मामले में) के लिए, लेखक की मृत्यु के वर्ष के बाद आने वाले कैलेंडर वर्ष की शुरुआत से लेकर साठ वर्ष तक बना रहता है। 

निष्पक्ष व्यवहार का सिद्धांत क्या है?

निष्पक्ष व्यवहार का सिद्धांत लेखक की अनुमति के बिना कॉपीराइट सामग्री का उपयोग करना है। किसी व्यक्ति को कॉपीराइट किए गए कार्य का उपयोग करने का अधिकार है, बशर्ते कि यह उल्लंघन न हो। अनुसंधान या समीक्षा के उद्देश्य से किसी साहित्यिक, नाटकीय, संगीतमय या कलात्मक कार्य के साथ उचित व्यवहार, चाहे वह कार्य हो या कोई अन्य कार्य, कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। अधिनियम, 1957 की धारा 52 (1) (a) के अंतर्गत निष्पक्ष व्यवहार का प्रावधान किया गया है। 

संदर्भ

 

अलग कानूनी इकाई

यह लेख Tejaswini Kaushal द्वारा लिखा गया है और आगे Ashwani Dwivedi द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख ‘अलग कानूनी इकाई की अवधारणा’ पर चर्चा करता है। यह उस इतिहास, निहितार्थ और मामलों के बारे में बात करता है जिसके कारण इस अवधारणा का विकास हुआ। इसका अनुवाद Pradyumn Singh ने किया है।

परिचय

किसी कंपनी के कानूनी व्यक्तित्व या एक अलग कानूनी इकाई के रूप में उसके कानूनी अस्तित्व को मध्ययुगीन (मिड्यीवल) काल से मान्यता दी गई है, और 17 वीं शताब्दी के बाद से निगम के स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व की धारणा को स्वीकार करते हुए विभिन्न अदालतों द्वारा कई निर्णय सुनाए गए हैं।

एक अलग कानूनी इकाई की अवधारणा, क्योंकि यह विशाल संयुक्त स्टॉक फर्मों से संबंधित थी, उन्नीसवीं शताब्दी के विशेषकर 1840 और 1880 के बीच में अधिकांश भाग में उभरी। यह परिवर्तन धीमा था और इसमें कई मोर्चों पर मामूली संशोधन शामिल थे। शेयरधारिता की प्रकृति में परिवर्तन और एक कंपनी के अंदर आंतरिक संबंधों का सुधार आम कानून के तहत किए गए कुछ कानूनी नवाचार और सुधार थे। इससे एक कंपनी को उसके शेयरधारकों से अलग करने में मदद मिली, इसलिए कंपनियों को साझेदारी से अलग करने में मदद मिली।

कंपनियों ने एक ही समय में खुद को निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाने के लिए अपनी पूंजी संरचनाओं और पूंजी जुटाने के तरीकों को संशोधित किया। ये तरीके संयुक्त स्टॉक कंपनियों और साझेदारियों के बीच निवेश क्षेत्र के भेदभाव को भी दर्शाते हैं। इस प्रकार, न्यायिक निर्णयों और विधायी हस्तक्षेपों के माध्यम से इसमें काफी वृद्धि हुई है, जिससे यह व्यवसायों के लिए कानूनी निहितार्थ के साथ एक महत्वपूर्ण अवधारणा बन गई है।

वास्तव में यह समझने के लिए कि कंपनियां एक विशिष्ट कानूनी व्यक्तित्व का आनंद क्यों लेती हैं, हमें एक ‘अलग कानूनी इकाई’ की अवधारणा को गहराई से समझना होगा।

एक अलग कानूनी इकाई क्या है

एक अलग कानूनी इकाई एक ‘कानूनी व्यक्ति’ है यानी, कानून द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्ति। कंपनी पर शासन करने वाले और/या उसके मालिक होने वाले व्यक्तियों से अलग, इकाई के अपने कानूनी अधिकार और कर्तव्य हैं।

एक अलग कानूनी इकाई में निम्नलिखित आवश्यक विशेषताएं होती हैं:

  • यह अपने नाम से किसी भी प्रकार की संपत्ति को खरीद, बेच और रख सकता है, 
  • यह अनुबंधों में प्रवेश कर सकता है और 
  • अपने ही नाम से मुकदमा कर सकता है। 

इन विशेषताओं के परिणामस्वरूप, स्वतंत्र कानूनी संस्थाएँ यह कर सकती हैं:

  • बकाया धन (जो एक संविदात्मक संबंध द्वारा निर्मित होता है) दूसरों को उधार देने से वे ऋणदाता बन जाते हैं
  • स्वयं की संपत्ति
  1. मूर्त संपत्ति (टेंजिबल) : भूमि, भवन, फर्नीचर, आदि।
  2. अमूर्त (इनटेंजिबल) संपत्ति: बौद्धिक संपदा (इन्टलेक्चुअल प्रॉपर्टी) अधिकार: डिज़ाइन, व्यापार चिन्ह (ट्रेडमार्क), व्यापार रहस्य, आदि।
  • करों का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार बनें (एक वैधानिक दायित्व)।

कानूनी दृष्टिकोण से, सभी कानूनी संस्थाएँ जो वह पूरा कर सकती हैं, और एक मानव पूरा कर सकता है, उन्हें अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

उदाहरण के लिए, एक कंपनी दो या दो से अधिक लोगों का एक समूह है जो एक समान व्यावसायिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करते हैं। यह एक ‘अलग कानूनी इकाई’ है जिसके सदस्यों के बीच एक विशिष्ट पहचान है। एक कंपनी अपने नाम पर संपत्ति रख सकती है, मुकदमा लड़ सकती है और अपने नाम पर मुकदमा दायर कर सकती है, और अन्य चीजों के अलावा कानूनी इकाई के रूप में स्थायी उत्तराधिकार का भी अधिकार रख सकती है।

हालांकि, एक कंपनी एक कृत्रिम व्यक्ति है, वह केवल अपने एजेंटों, जो निदेशक मंडल हैं, के माध्यम से कार्य कर सकती है। साथ ही, कंपनी के निगमित होने तक वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं।

‘कंपनी का निगमन’ एक कॉर्पोरेट कंपनी को उसके सदस्यों से अलग कानूनी इकाई के रूप में स्थापित करने की कानूनी प्रक्रिया है। एक कंपनी शुरू करने के लिए, लोगों के एक समूह को कंपनियों के रजिस्ट्रार (आरओसी) से निगमन का प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा।

कंपनी अधिनियम, 2013, जिसे पहली बार 1913 में अपनाया गया था, भारत में कंपनियों को नियंत्रित करता है। इसमें संशोधन 2015, 2017, 2019, और सबसे हाल में 2020 मे ही किया गया है। 

एक अलग कानूनी इकाई की अवधारणा में जाने से पहले, यह समझना आवश्यक है कि ‘अलग इकाई’ का वास्तव में क्या अर्थ है।

एक अलग इकाई क्या है

“अलग कानूनी इकाई” का अर्थ एक व्यवसाय या समूह है जो कानूनी रूप से अपने मालिकों या सदस्यों से अलग है। इसे अलग ढंग से कहें तो, इकाई के अपने कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां हैं जो उसके मालिकों, निदेशकों या शेयरधारकों से अलग हैं। यह माल का मालिक हो सकता है, अनुबंध पर हस्ताक्षर कर सकता है, कर्ज में डूब सकता है, मुकदमा कर सकता है और अपने नाम पर मुकदमा दायर कर सकता है। 

एक कंपनी कानूनी रूप से एक अलग इकाई है। कंपनी राज्य के साथ पंजीकृत होती है और अपने संचालन को अलग रखने के लिए लेनदेन और स्वामित्व दस्तावेज़ का उपयोग करती है। छोटी कंपनियाँ, पेशेवर कंपनियाँ और व्यक्तिगत सेवा कंपनियाँ सभी अलग-अलग प्रकार की कंपनियाँ हैं। किसी व्यवसाय को संचालित करने के लिए, एकमात्र स्वामित्व को छोड़कर सभी प्रकार के व्यवसायों को राज्य के साथ पंजीकृत होना होगा। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राज्य के साथ पंजीकरण का मतलब यह नहीं है कि कंपनी एक अलग कानूनी इकाई है।

उदाहरण के लिए, एक सीमित देयता (लायबिलिटी) कंपनी (एलएलसी) भी इसी तरह अलग है क्योंकि एलएलसी मालिक (जिन्हें सदस्य कहा जाता है) केवल फर्म में अपने योगदान के लिए उत्तरदायी होते हैं।

इसी तरह, चुनी गई साझेदारी के प्रकार के आधार पर, साझेदारियां सीमित जिम्मेदारी के साथ स्वतंत्र कानूनी संस्थाएं हो सकती हैं। एक सामान्य साझेदारी में, प्रत्येक सदस्य साझेदारी के दायित्वों और मुकदमेबाजी के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होता है। दूसरी ओर, साझेदारी के कुछ रूपों को, हालांकि, सीमित देयता और स्वतंत्र कंपनियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 

इसके अतिरिक्त, एक सीमित भागीदारी, या सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) को एक अलग इकाई के रूप में बनाया जा सकता है। पेशेवर(प्रोफेशनल) लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप पेशेवरों के एक समूह (उदाहरण के लिए वकील, सीपीए या आर्किटेक्ट) द्वारा बनाया गया एक विशिष्ट संगठन है।

इसके विपरीत, एकल स्वामित्व एक अलग कानूनी इकाई नहीं है। एकमात्र स्वामित्व व्यवसाय एक व्यक्ति द्वारा चलाया जाता है, जो फर्म का मालिक भी है। इस प्रकार, कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत ऋण और कानूनी जिम्मेदारियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं।

अंततः, किसी भी प्रकार का व्यवसाय कानूनी रूप से स्थापित किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने का मूल कारण कंपनी के दायित्वों को उस व्यक्ति की देनदारियों से अलग करना है जो व्यवसाय का मालिक है। 

किसी कंपनी या व्यक्ति को ऋण के साथ-साथ लापरवाही या आपराधिक व्यवहार से उत्पन्न मुकदमे के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। यह समझने से कि कानून इन देनदारियों से कैसे निपटता है, हमें यह देखने में मदद मिलती है कि ‘कानूनी इकाई’ की अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है।

कानूनी इकाई क्या है

एक कानूनी इकाई एक व्यक्ति या लोगों का समूह है जिसके पास अनुबंधों, समझौतों, लेनदेन, भुगतान, दायित्वों, मुकदमों और दंड से संबंधित कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां हैं। यह किसी भी प्रकार के संगठन को संदर्भित करता है जो देश के कानूनों के अनुसार कानूनी रूप से स्थापित है।

एक व्यक्ति, एक संगठन, एक व्यवसाय, एक साझेदारी, या कानूनी ढांचे द्वारा अनुमत किसी अन्य सामाजिक रूप को कानूनी इकाई माना जा सकता है। यह एक प्राकृतिक व्यक्ति के विपरीत, कानूनी व्यवस्था की नजर में एक विशिष्ट नाम और पहचान के साथ कानूनी निगमन के समय स्थापित एक निकाय है। कानूनी संस्थाओं के कई रूप हैं, प्रत्येक के अपने कानूनी विशेषाधिकार और कर्तव्य हैं।

उदाहरण के लिए, एकमात्र मालिक, एक प्रकार की कानूनी संरचना है जिसमें कम लागत और सरल होने का लाभ होता है लेकिन व्यक्ति के लिए कोई संपत्ति सुरक्षा प्रदान नहीं की जाती है। इससे पता चलता है कि ऐसे मामलों में एकमात्र मालिक व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी हो जाता है। दूसरी ओर, कंपनियों में शेयरधारकों के पास न्यूनतम दायित्व और देनदारी जोखिम होता है।

कानूनी इकाई के भाग

किसी कंपनी का ‘विभाग’, जिसे आम तौर पर एक अलग नाम से रखा जाता है, उसका उपयोग उस निश्चित कंपनी के अंदर एक व्यावसायिक इकाई को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, जो एक कानूनी इकाई है जिसका नाम विभाग से अलग है। इसलिए, विभाजन उस कानूनी इकाई के नाम से मेल खाता है और कोई नई कानूनी इकाई नहीं बनाता है।

कभी-कभी ‘विभाग’ शब्द एक या अधिक कानूनी संस्थाओं को भी संदर्भित करता है। लेकिन यह एक असाधारण परिदृश्य है और इसकी पुष्टि कंपनी या संबंधित प्रभाग के कानूनी दस्तावेजों और पंजीकरणों से की जानी चाहिए। कोई व्यक्ति उस कंपनी जो व्यापार कर रही है और ‘विभाग’ होने का दावा कर रही है, का वास्तविक नाम जानने के लिए, वह खोज करके ऐसा कर सकता है।

कानूनी इकाई की शाखाएँ

कोई भी व्यवसाय जो विस्तार करना और स्थानांतरित करना चाहता है उसे एक नया स्थान ढूंढना होगा। इसलिए कई कंपनियों की कई शाखाएँ या कार्यालय होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना भौतिक पता होता है। ज्यादातर मामलों में, किसी कंपनी को प्रत्येक शाखा के लिए मुख्य कंपनी की सहायक कंपनी बनाने से कोई नहीं रोक सकता है, प्रत्येक शाखा का स्वामित्व एक ही सहायक कंपनी के पास होता है। लेकिन इससे यह सवाल उठता है कि नए शाखा स्थान को कंपनी की संरचना में कानूनी रूप से कैसे एकीकृत किया जा सकता है।

इसे तीन तरीकों में से एक में पूरा किया जा सकता है:

  • अपनी स्वयं की कानूनी पहचान के साथ एक सहायक कंपनी की स्थापना करना, यानी एक ऐसी सहायक कंपनी जिसका मुख्य संगठन से अलग अस्तित्व हो
  • एक आश्रित शाखा (परिचालन सुविधा) की स्थापना करना, अर्थात, हर तरह से मुख्यालय पर निर्भर होना और एक अलग कानूनी इकाई नहीं होना।
  • एक अलग शाखा (शाखा प्रतिष्ठान) स्थापित करना, यानी मुख्य संगठन से अलग कानूनी इकाई नहीं, और मुख्य संगठन के कानूनी और संगठनात्मक घटक के रूप में कार्य करता है।

कानूनी संस्थाओं के प्रकार 

कानूनी संस्थाओं के प्रकार निम्नलिखित हैं:

सीमित देयता कंपनी

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी वह होती है जिसका कोई सार्वजनिक शेयरधारक नहीं होता है। एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना कम से कम 2 सदस्यों और अधिकतम 200 सदस्यों के साथ की जा सकती है। इस प्रकार की कंपनी बाजार में विवरण पत्रिका (प्रॉस्पेक्टस) की पेशकश नहीं कर सकती है, यानी सार्वजनिक धन नहीं ले सकती है। एक निजी कंपनी के शेयर आसानी से हस्तांतरणीय नहीं होते हैं, उदाहरण के लिए, गूगल एलएलसी। कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार, भारत में एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी निम्नलिखित प्रकारों में से एक हो सकती है:

  • शेयरों द्वारा सीमित कंपनी
  • कंपनी गारंटी द्वारा सीमित है
  • असीमित कंपनी

सार्वजनिक संगठन

एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी ऐसी कंपनी होती है जिसके शेयर स्टॉक मार्केट में सार्वजनिक रूप से कारोबार किया जाता है। एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी कम से कम 7 सदस्यों के साथ स्थापित की जा सकती है। शेयरों की विनिमयशीलता पूरी तरह से अप्रतिबंधित है। सरकार, साथ ही अन्य एजेंसियों जैसे भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई), भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), और अन्य को सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी, उदाहरण के लिए, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड से अधिक सार्वजनिक प्रकटीकरण और अनुपालन की आवश्यकता है।

एकल स्वामित्व

यह सबसे बुनियादी प्रकार की कंपनी है जिसे कोई भी चला सकता है। एकल स्वामित्व कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त व्यावसायिक इकाई नहीं है। फर्म का मालिक कंपनी के ऋणों के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह है। कर और कानूनी उद्देश्यों के लिए, मालिक और व्यवसाय को एक इकाई माना जाता है, और व्यवसाय पर अलग से कर नहीं लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, फ्रीलांसर अक्सर एकमात्र मालिक के रूप में काम करते हैं।

एक व्यक्ति कंपनी (ओपीसी)

2013 के कंपनी अधिनियम ने एक व्यक्ति कंपनी की धारणा बनाई, जिससे एकल स्वामित्व को कॉर्पोरेट ढांचे में प्रवेश करने की अनुमति मिल गई। यह एकल निवेशक को एक सीमित देयता कंपनी को शामिल करने की अनुमति देता है। एक-व्यक्ति कंपनी का स्वरूप स्वामित्व के समान होता है, लेकिन उन समस्याओं के बिना जिनका मालिकों को आम तौर पर सामना करना पड़ता है। एक व्यक्ति कंपनी की सबसे आवश्यक विशेषताओं में से एक यह है कि खतरे उस व्यक्ति द्वारा रखे गए शेयरों के मूल्य तक ही सीमित हैं।

साझेदारी

भारतीय भागीदारी अधिनियम 1932 की धारा 4 साझेदारी को “उन व्यक्तियों के बीच संबंध जो सभी के लिए कार्य करने वाले या उनमें से किसी एक द्वारा किए गए व्यवसाय के मुनाफे को साझा करने के लिए सहमत हुए हैं” के रूप में परिभाषित करता। साझेदारी दो या दो से अधिक लोगों के बीच संयुक्त रूप से प्रबंधित किए जाने वाले व्यवसाय की कमाई को विभाजित करने का एक समझौता है। 

यह व्यवसाय उन सभी द्वारा संचालित किया जा सकता है या उनमें से किसी एक द्वारा सभी की ओर से कार्य किया जा सकता है। व्यक्तिगत रूप से, साझेदारी व्यवसाय के मालिकों को ‘साझेदार’ के रूप में जाना जाता है, और साथ में, उन्हें ‘फर्म’ या ‘साझेदारी फर्म’ के रूप में जाना जाता है। ‘फर्म का नाम’ वह नाम है जिसके तहत व्यवसाय संचालित किया जाता है। कुछ मायनों में, फर्म साझेदारों का संक्षिप्त रूप मात्र है, उदाहरण के लिए, रेड बुल।

एक साझेदारी, एक कंपनी के विपरीत, अपने सदस्यों से अलग कानूनी इकाई नहीं है। यह संपत्ति रखने, कर्ज लेने या अपने नाम पर मुकदमा दायर करने में असमर्थ है। इसके अलावा, साझेदारी फर्म के साझेदार फर्म की देनदारियों के लिए संयुक्त रूप से और अलग-अलग जवाबदेह होते हैं।

सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी)

2008 का सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम भारत में सीमित देयता भागीदारी अवधारणाओं को नियंत्रित करता है। इसमें एलएलपी और सार्वजनिक कंपनी दोनों की विशेषताएं हैं। साझेदारी के विपरीत, एलएलपी की देनदारी प्रतिबंधित है, और किसी भी साझेदार को दूसरे के कार्यों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है। यह एक अलग कानूनी इकाई है जिसकी अपनी अलग इकाई है जो इसके सदस्यों से स्वतंत्र है। एलएलपी का मूलभूत दोष यह है कि, एक कंपनी के विपरीत, यह आईपीओ के माध्यम से जनता से नकदी नहीं जुटा सकता है, उदाहरण के लिए, कानूनी फर्म।

एक कॉर्पोरेट कानूनी इकाई बनाने में केवल एक नाम और एक मिशन से कहीं अधिक शामिल होता है; यह कंपनी की कानूनी पहचान, अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करने की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। पंजीकरण से लेकर अनुपालन तक, हम देखेंगे कि कोई व्यवसाय कानून की नजर में कैसे जीवंत होता है।

एक कॉर्पोरेट कानूनी इकाई तैयार करने के साधन

एक निगम का कानूनी व्यक्तित्व चार तरीकों में से एक में बनाया जा सकता है: 

निरंतरता बनाए रखकर

इसका मतलब यह है कि कोई कंपनी बिना किसी रुकावट के व्यवसाय करना, संपत्ति का मालिक बनना और अनुबंधों को पूरा करना जारी रख सकती है। कानूनी संगठन समय के साथ अस्तित्व में बना रह सकता है, भले ही मालिक की मृत्यु हो जाए या निगम की संपत्ति वापस ले ली जाए। एक निगम का जीवन अमर है, जिसका अर्थ है कि कंपनी तब तक बिना किसी रुकावट के काम करती रहती है जब तक कि वह एक प्रक्रिया द्वारा समाप्त न हो जाए। डार्टमाउथ कॉलेज के संरक्षक (ट्रस्टी) बनाम वुडवर्ड, (1819) के ऐतिहासिक निर्णय में यह सिद्धांत स्थापित किया गया। 

एक ‘पहचान योग्य व्यक्तित्व’ का निर्माण

जिस नाम से निगम को जाना जाता है उसे ‘पहचान योग्य व्यक्तित्व’ कहा जाता है। निगम का नाम कानूनी रूप से उत्तरदायी व्यक्ति के रूप में कार्य करता है जो व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन के दौरान अपने कार्यों और चूक के लिए उत्तरदायी है। उस निगम में शामिल लोगों के नाम सर्वविदित हैं। कंपनी का शीर्षक या नाम निगम की अमूर्त संपत्ति है, जैसे फ्रेंचाइजी, विशेष अधिकार, प्रतिष्ठा, छवि ब्रांड इत्यादि। अमूर्त संपत्ति व्यवसायों के लिए राजस्व (रेवेन्यू)  का एक आकर्षक स्रोत है। इस व्यक्तित्व का उपयोग सभी अनुबंधों में किया जाता है, और इस व्यक्तित्व में, एक निगम मुकदमा कर सकता है और मुकदमा दायर किया जा सकता है।

संपत्ति विशिष्टता 

निगम की संपत्तियों को शेयरधारकों की संपत्तियों से अलग करने के लिए एक तंत्र होना चाहिए, साथ ही यह भी बताना चाहिए कि कौन सी संपत्ति व्यवसाय को आवंटित की गई है। यह परिसंपत्ति पृथक्करण (सेपरेशन) उन लोगों के लिए आसान बनाता है जो व्यवसाय में निवेश या योगदान करने की योजना बनाते हैं। ये यह भी सुनिश्चित करता है कि, निगम के विघटन की स्थिति में, एक व्यक्ति को एक निर्धारित राशि का नुकसान (सीमित देयता का सिद्धांत) उठाना होगा।

स्व-शासन 

एक कानूनी इकाई माने जाने के लिए एक निगम के पास अपने आंतरिक मामलों को नियंत्रित करने के लिए एक प्रणाली और क्षमता होनी चाहिए। निगम के पास आंतरिक शासन निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।

एक अलग कानूनी इकाई के महत्व को समझने से पहले, इस अवधारणा की उत्पत्ति पर नज़र डालना और इसकी ऐतिहासिक जड़ों को समझना आवश्यक है।

अलग कानूनी इकाई की उत्पत्ति 

कॉर्पोरेट व्यक्तित्व के विकास का एक लंबा इतिहास है, और शोध से पता चलता है कि यह अवधारणा सबसे पहले मध्य युग में धार्मिक और चर्च उद्देश्यों के लिए बनाई गई थी। स्थानीय राजाओं ने इन संस्थाओं को चार्टर प्रदान किये, जिससे उन्हें अधिकार प्राप्त हुआ। संपत्ति रखने के इरादे से चार्टर जारी किए गए थे। 

किसी संस्था की अपने नाम पर संपत्ति रखने की क्षमता यह सुनिश्चित करती है कि उस संस्था द्वारा रखी गई संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह से उस संस्था के पास है, न कि उस पर शासन करने वाले व्यक्तियों या कानूनी उत्तराधिकारियों के पास। इन संपत्तियों को उच्च करों से भी छूट दी गई थी। उनके निर्माण के बाद उन्हें एक शाही चार्टर भी प्रदान किया गया। शाही चार्टर दिए जाने के बाद ऐसी संस्थाओं के स्वामित्व वाली संपत्ति को वापस लॉर्ड्स की संपत्ति में नहीं बदला जा सकता था। बाद में 16वीं शताब्दी में, चार्टर के लिए पात्र संस्थानों की सीमा का विस्तार किया गया, और अस्पताल, विश्वविद्यालय और कॉलेज उन चार्टर में शामिल थे। 

उन निगमों का उद्देश्य सतत उत्तराधिकार और एक ही कानूनी इकाई के रूप में कई व्यक्तियों की मान्यता सुनिश्चित करना था। लेकिन उस काल तक निगमों का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाता था। राजा, बिशप और अन्य जैसे व्यक्ति कुछ विशेष प्रकार के निगमों में शामिल थे जिन्हें ‘एकमात्र निगम’ कहा जाता था।

इन निगमों के निगमन का लक्ष्य आम जनता को यह स्पष्ट करना था कि जिस संपत्ति का वे प्रबंधन करते हैं वह उनकी अपनी नहीं है बल्कि सार्वजनिक हित में उनके पास है, और किए गए अनुबंध, यदि कोई हों, व्यक्तिगत ओर से नहीं बल्कि इसके बजाय एक आधिकारिक क्षमता में। इन सभी व्यवसायों को ‘समग्र निगम’ कहा जाता था।  

17वीं सदी के इंग्लैंड में, शुरुआत में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए व्यापारिक फर्मों को चार्टर जारी किए गए थे। हालांकि, व्यापारिक निगम कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संविदात्मक भागीदारी थे जिन्हें चार्टर की आवश्यकता नहीं थी। 17वीं सदी के अंत तक ऐसी कई कंपनियाँ स्थापित हो चुकी थीं। समय के साथ, विधायी हस्तक्षेप और न्यायिक मिसालों ने इस अवधारणा के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई है।

कानूनी अवधारणा के रूप में एक अलग कानूनी इकाई का महत्व 

किसी फर्म के लिए अपनी कानूनी पहचान होना क्यों महत्वपूर्ण है? इस पर विचार करें: एक अलग कानूनी इकाई के साथ, कंपनी, जोखिम, ऋण और जिम्मेदारी स्वयं वहन करती हैं न कि उसके मालिक। यह पृथक्करण व्यक्तिगत संपत्तियों की रक्षा करता है, निवेश को बढ़ावा देता है, और व्यक्तिगत हितधारकों को जोखिम में डाले बिना फर्म को आगे बढ़ने की अनुमति देता है। यह एक शक्तिशाली सिद्धांत है जो आधुनिक व्यवसाय को सक्षम बनाता है।

एक अलग कानूनी इकाई की अवधारणा कंपनी को उसके मालिक से अलग बनाती है। सबसे महत्वपूर्ण औचित्य यह है कि किसी भी अपराध के लिए मालिक, शेयरधारकों या निदेशकों के बजाय कंपनी को दोषी ठहराया जाता है। कंपनी को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।’ 

कंपनी के संस्थापक इसमें अपनी भागीदारी की सीमा के लिए पूरी तरह से जवाबदेह हैं। इसका तात्पर्य यह है कि कंपनी के शेयरधारक किसी भी वाणिज्यिक ऋण के लिए पूरी तरह उत्तरदायी नहीं हैं, और ऋणदाता वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए उनकी निजी संपत्ति को जब्त नहीं कर सकते हैं। 

इसी तरह, निवेशकों को कंपनी के लाभ के परिणामस्वरूप प्राप्त किसी भी कमाई पर कर का भुगतान करना होगा। ये कमाई वेतन, प्रोत्साहन के रूप में होती है, और कंपनी को कम कॉर्पोरेट दर पर कमाई या किसी अतिरिक्त मुनाफे पर कंपनी कर का भुगतान करना होगा।

साथ ही, जब किसी सदस्य या किसी निदेशक के इस्तीफा देने पर कंपनी ध्वस्त नहीं होती है क्योंकि यह सदस्यों, निदेशकों और शेयरधारकों से बनी एक स्वायत्त इकाई है। यदि किसी शेयरधारक या निवेशक की मृत्यु हो जाती है, तो कंपनी अपनी शेयरधारिता को किसी अन्य संपत्ति की तरह ही स्थानांतरित कर सकती है, और फर्म को कोई नुकसान नहीं होता है। यह कंपनी को सतत उत्तराधिकार प्रदान करता है।

कंपनी एक अलग कानूनी इकाई क्यों है

अपने व्यापार के लिए एक अलग कानूनी इकाई बनाने में परेशानी क्यों है? कल्पना करें कि आप व्यक्तिगत संपत्तियों को सुरक्षित करने, देनदारी कम करने और अपने व्यवसाय को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति देने में सक्षम हैं। एक अलग कानूनी संगठन के साथ, कंपनी अपने निर्णय स्वयं ले सकती है, कर्ज ले सकती है, अनुबंध कर सकती है और यहां तक ​​कि मालिकों के व्यक्तिगत वित्त को नुकसान पहुंचाए बिना मुकदमा भी चला सकती है। यह कंपनी को अपना ‘कानूनी जामा’ देने जैसा है जो उसे विस्तार करने और सुरक्षित रूप से जोखिम लेने की अनुमति देता है। 

व्यापार और व्यवसाय के मामले में कंपनियाँ उपक्रम का सबसे सामान्य रूप हैं। व्यवसाय में लगे व्यक्तियों को व्यक्तिगत दायित्व से संरक्षित किया जाता है जो कंपनी द्वारा व्यवसाय करने के परिणामस्वरूप विकसित हो सकता है, जो एक अलग कानूनी इकाई है। इसलिए, कंपनी:

  • वह पैसा बनाती है जो कंपनी का होता है;
  • वह खर्च वहन करती है जिसका भुगतान कंपनी द्वारा किया जाता है;
  • कर अधिकारियों को कर चुकाने का कानूनी कर्तव्य है; और 
  • अन्य व्यक्तियों की तुलना में कम दर पर कर का भुगतान करती है।

कुछ को छोड़कर, व्यवसाय के मालिक और निदेशक कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त हैं (जिसमें अनिवार्य रूप से किसी प्रकार का धोखाधड़ी वाला आचरण शामिल है)। शेयरधारकों की सुरक्षा और कानूनी जिम्मेदारी अक्सर उन कारणों की सूची में सबसे ऊपर होती है जिनके लिए यह महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या होता है जब एक से अधिक कंपनियों के सहयोग से एक नया व्यवसाय बनता है? इन मामलों में संयुक्त उद्यम समाधान प्रदान करते हैं।

संयुक्त उपक्रम

संयुक्त उद्यम (जॉइंट वेंचर) निगम वर्तमान व्यवसायों से विभिन्न परियोजनाओं को सक्षम करने के लिए एक लगातार तंत्र है। दो या दो से अधिक स्वतंत्र कंपनियाँ (अर्थात, अलग-अलग कानूनी संस्थाएँ) एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए इकाई में शामिल होना चाहती हैं; वे अक्सर एक संयुक्त उद्यम स्थापित करते हैं। इन संयुक्त उद्यमों को अक्सर ‘विशेष प्रयोजन वाहन’ के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनका गठन एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया गया था। वे:

  • संस्थापक कंपनियों का संयुक्त स्वामित्व है;
  • संयुक्त उद्यम कंपनी के स्वामित्व वाले लाभ कमा सकते हैं;
  • संपत्ति की खरीद और स्वामित्व;
  • संपत्ति ख़रीदना और पट्टे पर देना, बौद्धिक संपदा अधिकारों का लाइसेंस देना; जैसे सॉफ़्टवेयर 
  • उनके अपने ग्राहक और आपूर्तिकर्ता हैं;
  • व्यय, कर, कर्मचारियों और सलाहकारों का भुगतान करना ;
  • संस्थापक कंपनियों को सहमत प्रतिशत में मुनाफा लौटाना;
  • सफल होने पर बेचना;
  • संयुक्त उद्यम के प्रति देनदारियों को अलग करना; और
  • मूल कंपनियों को प्रभावित किए बिना परिसमापन (लिक्विडेशन) करना

परिणामस्वरूप, यह ध्यान दिया जा सकता है कि संयुक्त उद्यम कंपनियों और फर्मों को सहयोग करने और प्रत्यक्ष जिम्मेदारी लेने में मूल फर्मों की प्रत्यक्ष भागीदारी से बचने का अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन विभिन्न देशों में कई उद्यमों या परिचालनों से निपटने के लिए मूल कंपनियां किस रणनीति का उपयोग करती हैं? यह हमें सहायक व्यवसायों की ओर ले जाता है।

सहायक व्यवसाय

कुछ निगम समूह के रूप में काम करते हैं, एक एकल मूल कंपनी बड़ी संख्या में सहायक कंपनियों की देखरेख करती है, जिनमें से प्रत्येक के पास सहायक कंपनियों का अपना समूह होता है। कई कारणों से, सहायक कंपनियों को मूल कंपनी के नीचे स्थापित किया जा सकता है:

  • किसी कंपनी के संचालन को व्यवस्थित करने की एक विधि के रूप में;
  • जोखिम को मुख्य फर्म से हटाकर अन्य कानूनी संस्थाओं पर स्थानांतरित करना;
  • अपने कार्यों को व्यवस्थित करें;
  • पोर्टफोलियो के बाकी हिस्सों से विशिष्ट परिसंपत्तियों और देनदारियों को अलग करें;
  • एक बड़े निगम के भीतर एक स्वतंत्र फर्म चलाएं;
  • समूह की कई कंपनियों की आय और घाटे को संतुलित करें;
  • किसी देश में अपने निगम के लिए लाभ प्राप्त करने के लिए विदेशी क्षेत्राधिकार में व्यापार करना, जैसे कि टैरिफ-मुक्त व्यापार की स्वतंत्रता (जैसे कि यूरोपीय संघ में पाई जाती है), साथ ही साथ कम कर दरें।
  • कंपनियों के संपूर्ण समूह या किसी मूल कंपनी का स्वामित्व छोड़े बिना बाहरी निवेश आकर्षित करें।

कारण जो भी हो, सहायक कंपनियों के पास अन्य अलग-अलग कानूनी कंपनियों के सभी फायदे हैं, जिसमें उन लोगों के लिए व्यक्तिगत दायित्व संरक्षण भी शामिल है जो उनका प्रशासन करते हैं, उनके लिए काम करते हैं और उनके मालिक हैं। इसलिए, एक अलग कानूनी इकाई की इस अवधारणा का उपयोग विभिन्न तरीकों से लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है, जैसे:

  • किसी एक कंपनी के निदेशकों और मालिकों को बड़ी कंपनियों में जिम्मेदारी से बचाना;
  • विशेष प्रयोजन वाहनों में नई परियोजनाओं और संयुक्त उद्यमों को अलग करना;
  • स्थानीय कानून के तहत शामिल सहायक कंपनियों के साथ विभिन्न देशों में व्यापार; और
  • मूल फर्मों को उनकी सहायक कंपनियों के ऋणों के लिए जवाबदेह नहीं रखना (सहायक कंपनी अपने सभी ऋणों के लिए जिम्मेदार है), इत्यादि।

अंतिम बिंदु के संबंध में, यदि सहायक कंपनी कुप्रबंधन के ऐसे क्रम में लगी हुई है जो कानूनी रूप से दोषी ठहराती है, जैसे कि नकली फर्म, तो मूल कंपनी को सहायक कंपनी के दायित्वों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

एक अलग कानूनी इकाई के लाभ 

चूँकि अधिकांश लोग किसी फर्म द्वारा वहन की जाने वाली बड़ी ज़िम्मेदारी को वहन नहीं कर सकते, इसलिए दायित्व संरक्षण की अवधारणा महत्वपूर्ण है। शब्द ‘कॉर्पोरेट ढ़ाल’ या ‘कॉर्पोरेट पर्दा’, एक अलग इकाई की अवधारणा को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि कंपनी (या अन्य अलग इकाई) दायित्व से सुरक्षित है। यदि कंपनी एक अलग इकाई है तो उस ढाल या पर्दे को नहीं तोड़ा जा सकता है। इस सिद्धांत का उपयोग विभिन्न परिस्थितियों में किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • कंपनी के निर्णयों के लिए शेयरधारकों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बनाना;
  • लेनदार उन फर्म मालिकों का पीछा करने में असमर्थ हैं जो अलग-अलग कानूनी संस्थाएं हैं; और
  • व्यक्तिगत और व्यावसायिक संपत्तियों को एक साथ मिलाया जाता है।

स्वतंत्र कानूनी व्यक्तित्व की अवधारणा के व्यवसायों के लिए कई कानूनी निहितार्थ हैं, जो इस स्थिति की पुष्टि करते हैं कि कंपनी, उसके निदेशक और शेयरधारक अलग-अलग संस्थाएं हैं। लाभों में इस अवधारणा की निम्नलिखित विशेषताएं भी शामिल हैं:

  • एक स्वतंत्र कानूनी इकाई का परिणाम इस अर्थ में सीमित जिम्मेदारी है कि कंपनी के ऋण के लिए शेयरधारकों की दोषीता (कल्पेबिलिटी) कंपनी के शेयरों के लिए भुगतान की गई राशि तक सीमित है, और उन्हें कंपनी के ऋणों के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है। इसकी पुष्टि अधिनियम का धारा 19(2), के द्वारा होती है। जो बताता है कि कोई व्यक्ति किसी कंपनी की किसी भी देनदारियों या दायित्वों के लिए केवल इसलिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि वह कंपनी का एक निगमनकर्ता, शेयरधारक या निदेशक है, सिवाय उस हद तक जब अधिनियम या निगमन ज्ञापन ऐसा नहीं करता है।
  • कंपनी की संपत्ति कंपनी की है, शेयरधारकों या निदेशकों की नहीं। इसलिए, कंपनी के ऋण और देनदारियां उसकी अपनी है, और शेयरधारकों को कंपनी के ऋण का भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। 
  • एक अलग कानूनी व्यक्तित्व भी एक कंपनी को सतत उत्तराधिकार का आनंद लेने की अनुमति देता है, जिसका अर्थ है कि फर्म अपनी कानूनी पहचान बनाए रखेगी और सदस्यता बदलने पर भी अस्तित्व में रहेगी।

एक अलग कानूनी इकाई होने के कानूनी निहितार्थ

ऐसे कई कानूनी मुद्दे हैं जो बार-बार सामने आते हैं, जिन्हें कुछ सावधानियां बरतकर टाला जा सकता है। उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे दिया गया है:

कानूनी इकाई का सही निर्धारण करना

कंपनी के बारे में पता करने का कोई विकल्प नहीं है जिससे व्यावसायिक पंजीकरण पर कानूनी इकाई का पता लगाया जा सके। भारत में, कंपनी रजिस्ट्रार संपर्क करने के लिए प्रासंगिक कार्यालय है। यह भारतीय कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और कंपनी अधिनियम, 2013, सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008, कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 और चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 के प्रशासन से संबंधित है। यह देश में सभी पंजीकृत कंपनियों, सीमित देयता भागीदारियों और अन्य निगमित कानूनी संगठनों का रिकॉर्ड रखता है।

त्वरित और आसान तरह से कंपनी के बारे में पता लगाने से निम्नलिखित के बारे में कोई भी अस्पष्टता समाप्त हो जाती है:

  • कंपनी की स्थायी उपस्थिति और आधिकारिक पता कंपनी की पंजीकरण संख्या से निर्धारित होता है।
  • स्वामित्व का विवरण और व्यवसाय की नियमित देखभाल कौन कर रहा है,
  • क्या कंपनी ने कंपनी रजिस्ट्रार के पास सभी आवश्यक दस्तावेज़ दाखिल कर दिए हैं, और
  • कंपनी की वर्तमान स्थिति। 

यदि कंपनी आरओसी में सूचीबद्ध नहीं है तो उसका कानूनी अस्तित्व नहीं है। 

कंपनी बनने से पहले अनुबंध पर हस्ताक्षर करना

किसी कंपनी के गठन की प्रत्याशा में, कुछ व्यवसायी उसके गठन से पहले ही अनुबंध पर हस्ताक्षर कर देते हैं। चूँकि कंपनी एक अलग कानूनी इकाई के रूप में मौजूद नहीं है, इसलिए यह किसी भी अनुबंध में प्रवेश करने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि कंपनी उस समय अस्तित्व में नहीं थी, तो उसके नाम पर निष्पादित अनुबंध उसके विरुद्ध लागू नहीं किए जा सकते। यह तथ्य कि कंपनी अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के बाद की अवधि में अस्तित्व में आई है, इसलिए अनुबंध को वैध नहीं बनाती है।

रिकॉर्ड यह भी दिखाएगा कि कंपनी विघटित हो गई है या परिसमापन में है। जब कोई कंपनी भंग हो जाती है, तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है और वह अनुबंध में शामिल नहीं हो सकती। हालांकि, अनुबंध उस व्यक्ति के विरुद्ध लागू किया जा सकता है जिसने इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

अनुबंध करने वाले पक्षों की पहचान करना

एक सदी पहले जब कॉर्पोरेट फर्मों का गठन शुरू हुआ था, तो उन्हें ग्राहकों और आपूर्तिकर्ताओं को सूचित करने के तरीके के रूप में अपने नाम में “लिमिटेड” या संक्षिप्त रूप “एलटीडी” शब्द शामिल करने की आवश्यकता थी कि वे सीमित देयता वाली कंपनी के साथ काम कर रहे हैं। यह मानदंड आज भी लागू है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए, श्री एक्स एक ऑनलाइन व्यवसाय का स्वामित्व और संचालन करते हैं। उनकी एक वेबसाइट है,परन्तु वे अपनी वेबसाइट पर कंपनी का नाम नहीं बताते हैं:

  • व्यवसाय की शर्तें,
  • गोपनीयता कथन, या
  • वेबसाइट के अन्य पेजों पर।

इसलिए, यह जानना मुश्किल हो जाता है कि वेबसाइट का मालिक या प्रदर्शित करने वाली कानूनी इकाई का नाम क्या है? कंपनी का मालिक कौन है? यह वह कंपनी नहीं हो सकती जो कंपनी का पूरा नाम जाने बिना व्यापार कर रही हो, उदाहरण के लिए: ‘अमरकांत’ और ‘अमरकांत लिमिटेड’ ‘पूरी तरह से अलग कानूनी संस्थाएं हैं। इसलिए, जब कोई स्वाभाविक व्यक्ति कंपनी के बजाय अपने नाम पर अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह हो जाता है।

कंपनी का पूरा नाम कब उपयोग कर सकते हैं

यदि आप एक कंपनी के रूप में व्यवसाय कर रहे हैं, तो आपको ‘लिमिटेड’ या ‘एलटीडी’ शब्द शामिल करना होगा। कंपनी खुद को उचित रूप से पहचानने के लिए कानून द्वारा बाध्य है। इसके अलावा, कंपनी का पूरा नाम शामिल करने में विफल रहने पर अनुबंध के तहत व्यक्तिगत दोषी ठहराया जा सकता है और इससे संविदात्मक संबंधों में अस्पष्टता बढ़ जाएगी। इसे सभी दस्तावेज़ों पर किया जाना चाहिए, जैसे पत्र, व्यवसाय कार्ड और चालान, ईमेल फ़ुटर, खरीद या बिक्री के आदेश, कानून द्वारा आवश्यक फाइलिंग, पक्षों के साथ कोई संचार, वेबसाइट पर, रोजगार अनुबंध आदि। एक बार जब आप इसे प्राप्त कर लें यदि आप पंजीकृत हैं, तो कानूनी रूप से लागू करने योग्य अनुबंध बनाने के लिए पूर्ण पंजीकृत नाम का उपयोग करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकारी रिकॉर्ड पर दिखाई देता है।

यदि कोई उपयुक्त होने पर कंपनी का नाम उपयोग नहीं करता है तो क्या होता है?

उपयुक्त तर्क दिया जा सकता है कि यह कंपनी नहीं है जो व्यापार कर रही है। व्यापार कंपनी के अलावा किसी और द्वारा किया जा रहा है। यदि वह व्यक्ति कंपनी का निदेशक है, तो यह प्रतिबंधित जिम्मेदारी से बचने का एक आसान तरीका है जो अन्यथा व्यापार निदेशकों और शेयरधारकों पर लागू होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि कानूनी संबंध कंपनी के साथ नहीं है। यह सबसे अधिक संभावना है कि कंपनी के संचालन के प्रभारी लोग हैं।

व्यावसायिक संस्थाएँ जिन्हें एक अलग कानूनी इकाई के रूप में नहीं माना जाता है 

दो प्रकार की व्यावसायिक संस्थाएँ हैं जो अलग-अलग संस्थाएँ हैं लेकिन उन्हें अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में नहीं माना जाता है:

  1. एकल स्वामित्व; और
  2. अधिकांश परिदृश्यों में साझेदारी

अलग कानूनी इकाई के सिद्धांत के तहत एकल स्वामित्व

एकल स्वामित्व की अपनी कानूनी इकाई नहीं होती है। इसका तात्पर्य यह है कि आपकी व्यावसायिक संपत्ति और दायित्व आपसे व्यक्तिगत रूप से अलग नहीं हैं। आपको कंपनी के ऋणों और दायित्वों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

अलग कानूनी इकाई के सिद्धांत के तहत साझेदारी

साझेदारी के विभिन्न रूप हैं, और प्रत्येक की कानूनी जिम्मेदारियाँ आपकी कंपनी द्वारा चुने गए प्रकार से निर्धारित होती हैं। साझेदारी के विभिन्न रूप और उनसे जुड़ी देनदारियाँ निम्नलिखित हैं:

सामान्य साझेदारी

सामान्य साझेदारी में सभी भागीदार फर्म के लिए समान कानूनी और वित्तीय जिम्मेदारी वहन करते हैं। प्रत्येक भागीदार के कर्तव्य का स्तर लिखित समझौतों के माध्यम से निर्धारित किया जा सकता है।

सीमित देयता भागीदारी

प्रत्येक सदस्य के व्यक्तिगत दायित्व को सीमित करता है ताकि यदि एक भागीदार पर मुकदमा चलाया जाता है, तो अन्य भागीदार प्रभावित न हों। किसी भी मुद्दे में शामिल न होने वाले प्रतिभागियों के इस प्रकार के सहयोग में शामिल होने की संभावना कम होती है।

सीमित भागीदारी

सामान्य और सीमित देयता भागीदारी को एक सीमित भागीदारी में संयोजित किया जाता है। कंपनी के ऋणों के लिए कम से कम एक सदस्य व्यक्तिगत और कानूनी रूप से जिम्मेदार है। साझेदारी के एक या अधिक सदस्य मूक भागीदार होते हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी कंपनी में उनके निवेश तक ही सीमित होती है। मूक भागीदार आमतौर पर कंपनी के दैनिक कार्यों में शामिल नहीं होते हैं।

एलएलसी साझेदारी

एलएलसी भागीदारी को कानूनी तौर पर एलएलसी माना जाता है क्योंकि वे बहु-सदस्यीय एलएलसी हैं। चूंकि एलएलसी निजी कंपनियों के लिए एक व्यावसायिक संरचना है, मालिकों को फर्म से अलग संस्थाओं के रूप में देखा जाता है।

एक अलग कानूनी इकाई क्या नहीं हो सकती

इसके स्पष्ट स्वरूप के बावजूद, एक अलग कानूनी इकाई निम्नलिखित नहीं हो सकती:

व्यापार चिन्ह  

व्यापार चिन्ह (ट्रेडमार्क) व्यक्तिगत संपत्ति है जिसका स्वामित्व एक कानूनी इकाई के पास होता है, चाहे वह इकाई एक व्यक्ति हो, व्यवसाय हो या किसी अन्य प्रकार की कानूनी संस्था हो।

डोमेन नाम 

डोमेन नाम वह नाम है जो किसी व्यवसाय के नाम पर पंजीकृत होता है। इसका स्वामित्व कानूनी निकाय के पास नहीं है जिसके पास इसका उपयोग करने का अधिकार है। लागू डोमेन नाम रजिस्ट्रार इसे कानूनी इकाई को किराए पर देता है।

ब्रांड या व्यापारिक नाम

एक ब्रांड या व्यापारिक नाम अनिवार्य रूप से एक कानूनी कंपनी के लिए एक उपनाम है। किसी निगम से एकमात्र वास्तविक संबंध, व्यापार चिन्ह की तरह, कॉर्पोरेट नाम के साथ प्रत्यय का उपयोग है।

कंपनियों का समूह

संग्रह में प्रत्येक फर्म एक अलग कानूनी इकाई है। सिर्फ इसलिए कि व्यवसायों का एक समूह सहायक कंपनियों और मूल कंपनियों के साथ मौजूद है, इसका मतलब यह नहीं है कि उन सभी की कानूनी स्थिति समान है। वे सभी अलग-अलग कानूनी संस्थाएं हैं।

व्यापार

एक व्यवसाय कानूनी संस्थाओं के एक समूह को संदर्भित कर सकता है जो एक या एकल कानूनी इकाई के रूप में काम कर रहा है जो अन्य कानूनी संस्थाओं से स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि ‘व्यवसाय’ शब्द को कैसे परिभाषित किया जाता है।

किसी कंपनी की अलग कानूनी इकाई 

हमारी कानूनी व्यवस्था में अलग कानूनी व्यक्तित्व लंबे समय से एक अवधारणा रही है, और यह कॉर्पोरेट कानून के केंद्र में है। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 1 में एक कंपनी को अधिनियम के तहत शामिल एक न्यायिक इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है, और एक कंपनी कंपनी अधिनियम की धारा 19(1)(b) के तहत एक अलग कानूनी व्यक्तित्व वाला एक कानूनी व्यक्ति है।

इसलिए, अधिनियम मानता है कि एक कंपनी का अपना कानूनी व्यक्तित्व होता है, जो उसे अपने निदेशकों और स्टॉकधारकों से अलग अधिकार प्राप्त करने और देनदारियां लेने की अनुमति देता है। सिवाय उस हद तक कि कोई कानूनी व्यक्ति ऐसी कोई शक्ति लेने में या ऐसा कोई अधिकार रखने में अयोग्य है, या उस हद तक जो निगमन ज्ञापन प्रदान करता है। 

अलग कानूनी व्यक्तित्व की यह अवधारणा किसी कंपनी के निगमन के पंजीकृत होने की तारीख और समय से मौजूद है, और कंपनी के पास उस बिंदु से आगे एक व्यक्ति की सभी कानूनी शक्तियां और क्षमताएं होंगी। इसके महत्व के बावजूद, सामान्य कानून और विधायी विकास में प्रगति से पता चला है कि यह विशेषाधिकार पूर्ण नहीं है और दुरुपयोग के मामलों में इसे बरकरार नहीं रखा जाएगा। 

हालाँकि, यह दावा किया जाएगा कि अदालतों द्वारा इन अपवादों की स्थापना ने कंपनी कानून की इस आधारशिला को नष्ट होने से बचाया है, और यह यह सुनिश्चित करने के लिए एक आवश्यक उपकरण के रूप में कार्य करता है कि अलग कानूनी व्यक्तित्व की अवधारणा संरक्षित है।

एक अलग कानूनी इकाई के रूप में संदर्भित होने के लिए फर्म को उचित रूप से निगमित और पंजीकृत किया जाना चाहिए। यदि फर्म को सही ढंग से निगमित किया गया है, तो इसका अपनी मूल कंपनी से अलग कानूनी अस्तित्व होगा। इसमें अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए;

  • निदेशक: क्योंकि वे कंपनी के संचालन की देखरेख करते हैं।
  • कंपनी के सदस्य: वे कंपनी के सच्चे मालिक हैं।
  • शेयरधारक: जिन्होंने कंपनी का स्टॉक खरीदा है।

अपीलिय न्यायालय ने एचएल बोल्टन इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड बनाम टीजे ग्राहम एंड संस लिमिटेड (1956) में माना कि कुछ परिस्थितियों में एक कंपनी की तुलना एक जीवित प्राणी से की जा सकती है। जिस तरह एक जीवित व्यक्ति का मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र शरीर के कामकाज को बनाए रखता है, उसी तरह एक कंपनी का मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र भी करता है। इसके पास संचालन के लिए हाथ भी होते हैं और कंपनी के निदेशकों के आदेशों के अनुसार काम करते हैं। 

संगठन में अधिकांश कर्मचारी और एजेंट कर्मचारी और एजेंट हैं जो कंपनी के हाथ में हैं, जो काम करते हैं, और जिन्हें कंपनी के विचारों या इरादों को प्रतिबिंबित करने के लिए साबित नहीं किया जा सकता है। अन्य कार्यकारी और पर्यवेक्षक हैं, जो कंपनी के मूल संगठनात्मक विचारों का प्रतीक हैं और इसके संचालन का निरीक्षण करते हैं। इन अधिकारियों के विचार व्यापार के विचार हैं, और कानून उन्हें इस तरह मानता है।

ऐसी कुछ चीजें हैं जो कंपनियां कर सकती थी यदि एक अलग कानूनी इकाई की धारणा अस्तित्व में नहीं होती, जैसे:

  1. किसी के द्वारा किए गए अपराध के कारण, कंपनी किसी ऐसे व्यक्ति को जवाबदेह ठहरा सकती है जो कंपनी का मालिक है या उसके लिए काम करता है।
  2. उन्होंने ऐसे समझौते किए होंगे जिनमें व्यक्ति और फर्म दोनों को जिम्मेदार ठहराया गया हो।
  3. यदि कोई फर्म कंपनियों के समूह का हिस्सा है, तो ऐसे कई समझौते होंगे जो गलत तरीके से स्थापित किए गए होंगे।
  4. ऐसे कानूनी मामले होते जिनकी न तो फर्म और न ही व्यक्ति । चोरी की गई अमानत के उल्लंघन, आपराधिक दुरुपयोग, दंडात्मक क्षति के दावे, या कानूनी पक्ष के अलावा किसी व्यक्ति या इकाई से जुड़ी किसी अन्य कार्रवाई के आधार पर अदालती सुनवाई हो सकती थी। यदि दावा सफल होता, तो इससे व्यक्तिगत दोष हो सकता था।

इसलिए, मौजूदा फर्म परिवेश में एक अलग कानूनी इकाई की धारणा मौजूद होनी चाहिए, अन्यथा, कई गलतियां होंगी, जिससे अदालती विवाद हो सकते हैं।

कॉर्पोरेट ढाल की अवधारणा

जब आप कॉरपोरेट ढाल के बारे में सोचते हैं, तो क्या यह उचित लगता है कि यह व्यवसाय मालिकों को व्यक्तिगत दायित्व से बचा सकता है, लेकिन केवल एक सीमा तक?

कॉर्पोरेट ढाल सिद्धांत एक कानूनी धारणा है जो कंपनी की पहचान को उसके व्यक्तियों से अलग करती है। इसलिए, सदस्य कंपनी के कृत्यों से उत्पन्न होने वाले दायित्व से सुरक्षित हैं।

इसलिए, यदि फर्म कर्ज लेती है या कोई कानून तोड़ती है, तो सदस्य ऐसी गलतियों के लिए जवाबदेह नहीं होते हैं और कॉर्पोरेट प्रतिरक्षा से लाभान्वित होते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, शेयरधारकों को कंपनी के कार्यों से सुरक्षा मिलती है।

इससे कई प्रमुख प्रश्न उठते हैं:

  1. क्या कॉर्पोरेट ढाल को हटाना संभव है?
  2. यदि हां, तो कॉर्पोरेट ढाल को हटाना की संभावित परिस्थितियां और नियम क्या है?

कॉर्पोरेट ढाल को हटाने में कानूनी इकाई यानी निगम से परे जाना शामिल है। वैकल्पिक रूप से, व्यवसाय ब्रांड को अनदेखा करें और लोगों पर ध्यान केंद्रित करें।

अन्य परिस्थितियों में, अदालतें निगम की उपेक्षा करती हैं और सीधे कंपनी के सदस्यों या प्रबंधन से निपटती हैं। इस प्रक्रिया को कॉर्पोरेट ढाल को भेदने के रूप में जाना जाता है। जब विवाद स्वामित्व के बजाय नियंत्रण के प्रश्न से संबंधित होता है, तो अदालतें आमतौर पर इस विकल्प को अपनाती हैं।

कॉर्पोरेट ढाल उठाना

क्या आपने कभी सोचा है कि जब कॉर्पोरेट घूँघट हटा दिया जाता है तो क्या होता है? कॉर्पोरेट ढाल हटाने का मतलब है कि अदालतें किसी कंपनी की अलग कानूनी पहचान की उपेक्षा करती हैं और उसके मालिकों या निदेशकों को उसके कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराती हैं। यह आमतौर पर तब होता है जब धोखाधड़ी या दुरुपयोग का सबूत होता है, और यह कानून के लिए यह सुनिश्चित करने का एक तरीका है कि व्यवसाय के मालिक जवाबदेही से बचने के लिए अपनी कंपनी के पीछे नहीं छिप सकते।

यह अलग कानूनी इकाई सिद्धांत का अपवाद है क्योंकि सिद्धांत का दुरुपयोग किया जा सकता है और व्यावसायिक सदस्यों पर आँख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वे धोखाधड़ी कर सकते हैं और फिर भी लाभ कमा सकते हैं। यह कर्मचारियों को कंपनी के नाम पर गैरकानूनी कार्य करने से रोकता है। यदि धारणा मौजूद नहीं है, तो कंपनी के सदस्य सिद्धांत का दुरुपयोग करने का प्रयास करेंगे, और अदालत उन सदस्यों को लाभ देने के लिए मजबूर होगी जो बचाव के रूप में एक अलग कानूनी इकाई के सिद्धांत का उपयोग करते हैं।

इसलिए, कॉर्पोरेट ढाल उठाने की धारणा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी अलग कानूनी संस्थाओं का सिद्धांत। यह ऐसे समय होते हैं जब एक अलग निकाय के विचार को मनमाने ढंग से देखा जा सकता है, और अदालतें कई कारणों से एक अलग कानूनी इकाई की अवधारणा के खिलाफ फैसला दे सकती हैं। ढाल के पीछे व्यक्ति का सामना करने और कंपनी की वास्तविक प्रकृति को उजागर करने के लिए, अदालत ऐसे निर्णय भी लेती है जो एक अलग कानूनी इकाई की धारणा के प्रतिकूल होते हैं। 

ढाल हटाना कंपनी कानून में सबसे व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला सिद्धांत है, जिसमें अदालत यह तय करती है कि कंपनी के नाम पर किए गए अपराध के लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जाए या नहीं। यह धारणा आज भी दुनिया में सबसे व्यापक रूप से लागू होने वाली धारणाओं में से एक बनी हुई है।

ढाल हटाने वाले कानून वर्तमान में जोखिम के संकेत के रूप में मौजूद है कि किसी फर्म के शेयरधारकों को उनके निवेश के मूल्यांकन से परे उनकी कंपनी की जिम्मेदारियों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जाना चाहिए। व्यक्तिगत वित्तीय पेशेवरों की देनदारी को सीमित करने का आधार तीन प्रकार की लेनदेन लागतों को खत्म करने पर केंद्रित है। 

पहला है ऋण मालिकों या व्यक्तिगत निवेशकों द्वारा विभिन्न निवेशकों की संपत्ति पर नजर रखने की लागत, और दूसरा है अधिकारियों की गतिविधियों के जोखिमों का आकलन करने वाले प्रत्येक निवेशक या पट्टेदार की लागत और विभिन्न समस्याएं। तीसरा, सीमित निवेशक जोखिम निवेशकों के लिए अपना दांव बढ़ाना कम खर्चीला और आसान बनाता है। प्रतिबंधित शुल्क इन विनिमय शुल्कों को प्रतिबंधित करने के परिणामस्वरूप उद्यमों को सक्रिय करता है और बाजार गतिविधि को प्रोत्साहित करता है।

इसलिए, जब ढाल उठाया जाता है, तो अदालत निगम को छोड़ देती है और कंपनी के नाम पर किए गए कार्यों के लिए सदस्य को जिम्मेदार ठहराती है। उन कारकों को निर्धारित करना असंभव है जो कॉर्पोरेट प्रतिरक्षा को ढहने का कारण बनते हैं। मामला काफी हद तक अदालत के विवेक के साथ-साथ अंतर्निहित सामाजिक, आर्थिक और नैतिक तत्वों पर निर्भर है क्योंकि वे संगठन में और उसके माध्यम से काम करते हैं।

ऐसे परिदृश्य जिनमें कॉर्पोरेट ढाल हटाया जा सकता है

कॉर्पोरेट ढाल महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन यह अभेद्य नहीं है। हालाँकि, कुछ परिस्थितियों में, कानून अदालतों को किसी कंपनी के कार्यों की वास्तविक प्रकृति या उसके गठन के पीछे के इरादों को उजागर करने के लिए इस ढाल को हटाने की अनुमति देता है। कुछ परिदृश्य जिनमें कॉर्पोरेट ढाल हटाया जा सकता है, नीचे उल्लिखित हैं:

कंपनी का चरित्र निर्धारित करना

कुछ परिस्थितियों में, अदालतों को यह निर्धारित करना होगा कि कोई फर्म शत्रु है या मित्र। ऐसी परिस्थितियों में, अदालतें नियंत्रण परीक्षण का उपयोग करती हैं। जब तक सार्वजनिक हित ख़तरे में न डाला जाए, अदालतें कॉर्पोरेट ढाल को शायद ही कभी हटाया जाए। हालांकि, अदालत यह जाँच करने का निर्णय ले सकती है कि क्या कोई निगम एक शत्रु कंपनी है।

एक प्रश्न उठता है: कोई निगम शत्रु कैसे हो सकता है? यह मित्र या शत्रु नहीं हो सकता क्योंकि इसके पास कोई दिमाग या विवेक नहीं है, ठीक है? यदि किसी निगम के मामले किसी शत्रु देश के व्यक्तियों के हाथों में हैं, तो कंपनी एक प्रतिद्वंद्वी (कॉम्पटीटर)  भी बन सकती है। 

ऐसे मामलों में, अदालत कंपनी के संचालन के प्रभारी व्यक्तियों के चरित्र की जांच कर सकती है, जैसा कि डेमलर कंपनी लिमिटेड बनाम कॉन्टिनेंटल टायर और रबर कंपनी (1916) मामले में था। 

राजस्व या कर की सुरक्षा करना

उदाहरण के लिए, कर चोरी या चकमा देने वाले मामलों में अदालत व्यावसायिक इकाई को नजरअंदाज कर सकती है। एक ऐसी फर्म पर विचार करें जिसका उपयोग करों का भुगतान करने से बचने के लिए किया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में, कॉर्पोरेट ढाल का उल्लंघन अदालत को यह निर्धारित करने की अनुमति देता है कि कंपनी की कमाई का वास्तविक मालिक कौन है और उन्हें कानूनी करों के लिए जिम्मेदार ठहराता है।

कानूनी दायित्व की चोरी को रोकने के लिए

निगम के सदस्य कभी-कभी कुछ कानूनी आवश्यकताओं से बचने के लिए एक सहायक कंपनी बना सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में, कॉर्पोरेट ढाल का उल्लंघन अदालतों को यह देखने की अनुमति देता है कि पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। 

एक निगम का उदाहरण लें जो कानूनी तौर पर अपनी आय का एक निश्चित प्रतिशत अपने कर्मचारियों के साथ बोनस के रूप में विभाजित करने के लिए बाध्य है। इससे बचने के लिए, निगम एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी स्थापित करता है और अपने निवेश हितों को इसमें स्थानांतरित करता है। नव स्थापित निगम के पास कोई संपत्ति नहीं है और वह कोई राजस्व उत्पन्न नहीं करता है। यह पूरी तरह से मुख्य निगम पर निर्भर है। 

इसके बाद, प्राथमिक कंपनी के अपने कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन दायित्व कम कर दिए गए। कॉर्पोरेट ढाल को भेदकर, अदालतें प्रमुख कंपनी के असली इरादों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं और गारंटी दे सकती हैं कि वह अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन करती है।

सहायक कंपनियों को एजेंट के रूप में स्थापित करना

निगम बनाने का उद्देश्य कभी-कभी अपने सदस्यों या किसी अन्य फर्म के लिए ट्रस्टी या एजेंट के रूप में काम करना होता है। ऐसी परिस्थितियों में, कंपनी की मौलिकता को मालिक के पक्ष में त्याग दिया जाता है। इसके अलावा, मालिक कंपनी के कार्यों के लिए जवाबदेह है।

कपटपूर्ण या अवैध कॉर्पोरेट उद्देश्यों को संबोधित करने के लिए

कॉर्पोरेट ढाल को उन परिस्थितियों में हटाया जा सकता है जब किसी निगम की स्थापना अवैध या अनुचित इरादों, जैसे कि कानून को दरकिनार करने के लिए की गई हो।

ज्यादातर मामलों में, प्रत्येक कानूनी इकाई स्वतंत्र होती है, लेकिन कुछ स्थितियों में एकल प्रणाली के उपयोग की आवश्यकता होती है जब कई कंपनियों को एक ही आर्थिक विषय माना जाता है। यह हमें ‘एकल आर्थिक इकाई’ अवधारणा की ओर ले जाता है जिसमें संबद्ध कंपनियों के वित्तीय हितों को एकता के रूप में लिया जाता है।

‘एकल आर्थिक इकाई’ की अवधारणा

एकल आर्थिक इकाई नियम का उपयोग उन स्थितियों में किया जाता है जहां व्यक्तिगत कानूनी संस्थाएं होती हैं जिन्हें विभिन्न मूल कानूनी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है लेकिन वास्तव में आर्थिक उद्देश्यों के लिए समूहीकृत किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि उनकी मुख्य कंपनी से संबंधित सभी कंपनियों का साझा आर्थिक मकसद होता है, इसलिए, सहयोगी कंपनियों जैसी सहायक कंपनियां प्रतिस्पर्धा नहीं करती हैं क्योंकि वे बाजार में अपने निर्णय नहीं ले सकती हैं।

कॉपरवेल्ड कार्पोरेशन बनाम इंडिपेंडेंस ट्यूब कार्पोरेशन (1984) में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मूल कंपनी और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी को एक इकाई माना जाएगा। इसी प्रकार, भारत में, प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 2(h) की ‘उद्यम’ को इस प्रकार परिभाषित करती है जो ‘एकल आर्थिक इकाई’ के विचार को प्रतिबिंबित करता है। 

उक्त धारा के अनुसार, एक ‘उद्यम’ का अर्थ सरकार का एक व्यक्ति या विभाग है जो सीधे या अपनी एक या अधिक इकाइयों या प्रभागों या सहायक कंपनियों के माध्यम से किसी भी गतिविधि में लगा हुआ है।

भारतीय अविश्वास कानूनों को स्पष्ट बनाने के लिए इस पर काम करने की जरूरत है। यह तय करने की आवश्यकता है कि क्या किसी उद्यम का विचार एकल आर्थिक इकाई सिद्धांत से छुटकारा पाने के लिए पर्याप्त है। चाहे कुछ भी हो, यह स्पष्ट है कि एकल आर्थिक इकाई का विचार भारत के प्रतिस्पर्धा कानून का हिस्सा है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि एकल आर्थिक इकाई का विचार कॉर्पोरेट ढाल उठाने के विचार से आता है। सहायक कंपनियाँ कानूनी रूप से अपनी मूल कंपनी से अलग मौजूद हैं और अपने नाम पर कार्य करती हैं, लेकिन कॉर्पोरेट ढाल के पीछे, अभी भी एक एकल मूल कंपनी है। चूँकि उसकी सहायक कंपनी जो करती है उसमें मूल कंपनी का अधिकार होता है, इसलिए वह जो करती है उसके लिए उसे कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

अलग कानूनी इकाई की अवधारणा पर ऐतिहासिक निर्णय 

फॉस बनाम हार्बोटल (1843)

यह मामला अंग्रेजी कंपनी कानून में एक प्रमुख मिसाल है। इस मामले में स्थापित फैसले के अनुसार, यदि कंपनी को अपने सदस्यों या बाहरी लोगों की लापरवाही या धोखाधड़ी गतिविधियों के परिणामस्वरूप नुकसान होता है, तो कंपनी की ओर से या व्युत्पन्न कार्रवाई के रूप में कार्रवाई शुरू की जा सकती है।

मामले के तथ्य

रिचर्ड फॉस और एडवर्ड स्टार्की टर्टन ‘विक्टोरिया पार्क कंपनी’ में दो अल्पमत मालिक थे, जिसकी स्थापना सितंबर 1835 में मैनचेस्टर के पास 180 एकड़ (0.73 किमी प्रति वर्ग किलोमीटर) संपत्ति खरीदने और इसे ‘विक्टोरिया पार्क, मैनचेस्टर’ में बदलने के लिए की गई थी। 

निगम की स्थापना 1837 में संसद द्वारा अनुमोदित एक अधिनियम द्वारा लैंकेस्टर काउंटी में रशोलमे, चोरल्टन अपॉन मेड-लॉक और मॉस साइड की टाउनशिप के भीतर आकर्षक पार्क स्थापित करने और बनाए रखने के लिए की गई थी। 

उन्होंने दावा किया कि कंपनी की संपत्ति को लूट लिया गया और बर्बाद कर दिया गया, साथ ही कंपनी की संपत्ति पर अनुचित तरीके से कई बंधक प्रदान किए गए। दोनों शेयरधारकों ने पांच निदेशकों, कानूनी प्रतिनिधियों और निर्माताओं के साथ-साथ बायरोम, एडहेड और वेस्ट के विभिन्न नियुक्तियों (असाइनि) के खिलाफ दावा दायर करने का फैसला किया।

उनके दावे का आधार निम्नलिखित था: 

  • प्राथमिक कारण यह था कि कपटपूर्ण गतिविधियों के माध्यम से कंपनी की संपत्ति का दुरुपयोग किया गया था। 
  • दूसरा आधार यह था कि कंपनी में ऐसे योग्य निदेशकों की कमी थी जो निदेशक मंडल बना सकें, और तीसरा आधार यह था कि कंपनी में योग्य निदेशकों का अभाव था जो वास्तव में मंडल बना सकें। 
  • तीसरे आधार के रूप में, निगम में एक क्लर्क और एक कार्यालय का अभाव था। 

इन शर्तों के कारण, शेयरधारकों के पास कंपनी का नियंत्रण छीनने के लिए निदेशकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई दायर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

उठाए गये मुद्दे

  1. क्या कंपनी के सदस्य कंपनी की ओर से मुकदमा दायर कर सकते हैं या नहीं?
  2. दोषी लोगों को उनके गलत कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है या नहीं?

 निर्णय 

चांसरी न्यायालय ने निर्धारित किया कि शेयरधारक उचित वादी नहीं थे और इसलिए मुकदमा दायर नहीं कर सकते थे। अदालत के अनुसार निगम उचित दावेदार है। चूँकि एक निगम अपने सदस्यों से अलग एक कानूनी इकाई है, कोई सदस्य कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुकदमा नहीं कर सकता है। 

यह कुछ ऐसा है जिसे कंपनी स्वयं संभाल सकती है। व्यक्तिगत सदस्यों को निगम के नाम पर मुकदमा करने की अनुमति नहीं है। इन परिस्थितियों में, उठाए गए मुद्दों के लिए निगम को अपनी कॉर्पोरेट क्षमता में समाधान प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं थी।

कोंडोली टी कंपनी लिमिटेड बनाम अज्ञात (1886)

यह कानूनी मामला इस विचार पर आधारित है कि एक निगम अपने सदस्यों से एक अलग कानूनी व्यक्ति या निकाय है, जो उनके जीवनकाल से परे रहने में सक्षम है। यह भी स्थापित किया गया कि कोन्डोली टी कंपनी लिमिटेड में शेयरधारक कौन थे, कंपनी एक अलग व्यक्ति और एक अलग निकाय थी, इसलिए, कंपनी को संपत्ति का हस्तांतरण जो कुछ हितधारकों के स्वामित्व में था, उतना ही संपत्ति का हस्तांतरण था। यदि कंपनी में शेयरधारक पूरी तरह से अलग लोग होते।

मामले के तथ्य

आठ व्यक्तियों के एक समूह ने, जो कंपनी के एकमात्र शेयरधारक थे, एक चाय बागान को एक निगम को हस्तांतरित कर दिया। इस हस्तांतरिती (ट्रांसफ़री) -कंपनी के एकमात्र शेयरधारक ये आठ व्यक्ति थे। लेन-देन का भुगतान हस्तांतरिती-कंपनी के शेयरों और डिबेंचर में किया गया था। यह तर्क दिया गया कि यह केवल संपत्ति को एक नाम से दूसरे नाम पर एक अलग नाम के तहत स्थानांतरित करना था, न कि एक हस्तांतरण (संपत्ति के स्वामित्व का कानूनी हस्तांतरण) या बिक्री। विनिमय मूल्य $43,320 था, कंपनी के शेयरों और डिबेंचर में पैसे का भुगतान बराबर किया गया था।

हालांकि, कंपनी के शेयरधारकों ने भूमि के हर लेनदेन पर देय एड वैलोरेम अर्थात यथामूल्य शुल्क का भुगतान करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यह मुकदमा हुआ। उन्होंने दावा करके एड वैलोरेम  कर चकाने का प्रयास किया कि वे कंपनी के एकमात्र शेयरधारक थे। शेयरधारकों का दावा था कि क्योंकि वे कंपनी में एकमात्र शेयरधारक थे, इसलिए संपत्ति का हस्तांतरण उनसे स्वयं को एक अलग नाम के तहत किया गया था, इसलिए उन्हें कर का भुगतान नहीं करना पड़ा।

उठाए गये मुद्दे

क्या एक दस्तावेज जो संपत्ति हस्तांतरण के रूप में एक विशिष्ट लेनदेन करता है, जैसा कि स्टांप अधिनियम की धारा 3 के खंड 9 में परिभाषित किया गया है और उक्त अधिनियम की अनुसूची I की अनुच्छेद 21 में परिभाषित किया गया है?

निर्णय

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कंपनी एक अलग कानूनी इकाई है और संपत्ति कंपनी के नाम पर स्थानांतरित कर दी गई थी, संपत्ति को हस्तांतरित के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और याचिकाकर्ता किसी भी कर के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। 

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कोंडोली टी कंपनी लिमिटेड अपने व्यक्तियों से एक स्वतंत्र कानूनी इकाई या निकाय थी, जो उनके जीवनकाल से परे चलने में सक्षम थी। भले ही कोंडोली टी कंपनी लिमिटेड के शेयरधारक कोई भी हों, कंपनी एक अलग व्यक्ति थी, एक अलग निकाय थी, और कंपनी को संपत्ति के स्वामित्व का हस्तांतरण, जो कि उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं में हिस्सेदारों की संपत्ति थी, बिल्कुल वैसा ही था। बहुत कुछ ऐसा व्यक्त हुआ जैसे कि कंपनी के शेयरधारक पूरी तरह से अलग लोग हों। 

विवादित दस्तावेज़ एक सम्प्रेषण (कन्वेयंस) है, और उस पर उपयोग करने के लिए उपयुक्त स्टाम्प है महत्व के लिए स्टाम्प अधिनियम की अनुसूची I के अनुच्छेद 21 में वर्णित स्टाम्प, जिसे लिखत में बताई गई प्रतिफल की राशि पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

सॉलोमन बनाम ए सॉलोमन कंपनी लिमिटेड (1897)

यह प्राथमिक मामला है, जिसने कॉर्पोरेट ढाल की अवधारणा स्थापित की। यह यूके कंपनी कानून में एक बड़ा निर्णय है जो एक अलग कानूनी इकाई के रूप में कॉर्पोरेट व्यक्तित्व के सिद्धांत को दृढ़ता से कायम रखता है, जिसका अर्थ है कि कंपनी के दिवालियापन (बैंकक्रप्सी) के लिए शेयरधारकों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

मामले के तथ्य

एरोन सॉलोमन उन्नीसवीं सदी में एक बहुत ही सफल चमड़े के व्यापारी थे, और उनका व्यवसाय अपने चरम पर था क्योंकि वह उस समय चमड़े के एकमात्र व्यापारी थे। कंपनी में कोई और नहीं था जो सॉलोमन का मुकाबला कर सके। इसके बाद सॉलोमन ने 20007 शेयरों के साथ एक निगम बनाया, जिसमें से उन्होंने 20001 शेयर खरीदे, और उनके परिवार के सदस्यों, अर्थात् उनकी पत्नी और पांच बच्चों, एक-एक ने, शेष 6 शेयर खरीदे। सॉलोमन ने एक निगम की स्थापना की और इसे कंपनी को 38,782 पाउंड में बेच दिया। 

फर्म ने सॉलोमन को 20001 पूरी तरह से भुगतान किए गए शेयर और 8,781 पाउंड नकद में भुगतान किया, जिससे कंपनी द्वारा सॉलोमन को भुगतान की गई कुल राशि 28,782 पाउंड (शेयर और नकद दोनों में) हो गई, जबकि कंपनी द्वारा सॉलोमन को 10,000 पाउंड का भुगतान शेष था। जिसे उन्होंने एक डिबेंचर के साथ सुरक्षित किया। 

सॉलोमन ने व्यवसाय शुरू करने के लिए सभी आवश्यक नियमों और विनियमों का पालन किया। उनकी कंपनी में सात लोग थे, लेकिन अधिकांश शेयर सॉलोमन के पास थे। वह उसी समय कंपनी के प्रमुख ऋणदाता भी थे। 

उठाए गये  मुद्दे 

जब कंपनी विफल होने के कारण बंद हो गई, तो यह निर्धारित करने के लिए अदालत में एक मुद्दा पेश किया गया कि क्या सॉलोमन के सुरक्षित ऋण को 11,000 पाउंड की राशि में किसी अन्य लेनदार के असुरक्षित ऋण पर प्राथमिकता दी जाएगी। यदि अदालत ने असुरक्षित ऋण पर सुरक्षित ऋण को प्राथमिकता दी, तो गैर-सुरक्षित ऋणदाता के पास कुछ भी नहीं बचेगा क्योंकि कंपनी की संपत्ति बहुत कम थी। दिवालियेपन के समय कंपनी की संपत्ति केवल 7,000 पाउंड थी। 

पक्षों की दलीलें

निगम को बंद करने के लिए नियुक्त परिसमापक के अनुसार, सॉलोमन ने जानबूझकर व्यवसाय को फर्म में स्थानांतरित कर दिया। परिसमापक ने आगे दावा किया कि निगम ने सॉलोमन के एजेंट के रूप में काम किया और मालिक के रूप में, वह असुरक्षित लेनदार ऋण के लिए जिम्मेदार है।

निर्णय

मामले को सुनने और परिसमापक के तर्कों पर विचार करने के बाद, उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि  निगम सॉलोमन का एजेंट था, इसलिए उसे सभी लेनदारों के दायित्वों के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था। 

अपील

सॉलोमन ने निगमन और सीमित दायित्व के अधिकारों का शोषण किया; इस प्रकार, निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उनकी अपील भी अस्वीकार कर दी गई। केवल वे ही जो वफादार और निष्पक्ष शेयरधारक हैं, सीमित देयता के लिए पात्र हैं। फर्म बनाते समय सॉलोमन ने स्पष्ट हाथों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने फर्म को एकमात्र व्यापारी के रूप में चलाया। 

हाउस ऑफ लॉर्ड्स

हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने निचली अदालत और अपील अदालत दोनों के फैसलों को पलट दिया, जिससे वर्तमान व्यापार कानून के लिए आधारशिला आधार स्थापित हुआ। हाउस ऑफ लॉर्ड्स में सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की गई कि एक कंपनी अपने सदस्यों और स्टॉकधारकों से एक अलग कानूनी इकाई है। वैध व्यवसाय निगमन के लिए सभी आवश्यक शर्तें पूरी की गईं। 

कंपनी के निगमन ज्ञापन पर सात सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। सभी ग्राहकों के पास शेयर थे, और स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं था। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने पाया कि सॉलोमन कंपनी का गठन कानून के अनुरूप ठीक से किया गया था, कंपनी के दायित्व उसके ऋण हैं, और सदस्य कंपनी के ऋणों के लिए जवाबदेह नहीं है।

अंतिम परिणाम 

स्टॉकधारकों ने फर्म को कानूनी इकाई के रूप में शामिल करने के लिए कंपनी कानून के सभी प्रावधानों का पालन किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फर्म का प्रबंधन एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है या सभी मालिकों द्वारा; परिणामस्वरूप, सॉलोमन के डिबेंचर को प्राथमिकता दी गई।

डेमलर कंपनी लिमिटेड बनाम कॉन्टिनेंटल टायर और रबर कंपनी (1916)

जब कोई कंपनी किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाई जाती है, तो उससे अपने शेयरधारकों से तटस्थ और अलग होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन युद्ध के दौरान ऐसा नहीं होता है, और शेयरधारक कंपनी के निर्णयों पर प्रभाव डाल सकते हैं। यह मामला एक ही मामले के बारे में है, और फैसले ने कई विवादों को स्पष्ट किया, और यह उसी मुद्दे के लिए एक मिसाल के रूप में कार्य करता है।

मामले के तथ्य

इंग्लैंड में एक जर्मन निर्माता द्वारा जर्मनी में बने टायर बेचने के लिए इंग्लैंड में एक कंपनी बनाई गई थी। एक शेयरधारक को छोड़कर, जो जर्मनी में पैदा हुआ था लेकिन स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश नागरिक बन गया था, अन्य सभी शेयरधारक जर्मन थे। 

इंग्लैंड और जर्मनी के बीच प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद, जर्मन व्यवसाय कॉन्टिनेंटल टायर ने यह कहते हुए कोई पैसा देने से इनकार कर दिया कि ऐसा करना दुश्मन देश के साथ व्यापार करना होगा, जिससे  समझौते का उल्लंघन हो  जाएगा। सचिव ने अपराधी के खिलाफ शत्रु अधिनियम के साथ व्यापार (1914) के तहत  कार्रवाई किया और निर्णय जर्मन फर्म के पक्ष में दिया गया, जो दर्शाता है कि फर्म शत्रुतापूर्ण थी।

उठाए गये मुद्दे

  1. यदि निगम एक विदेशी कंपनी होती, तो क्या ऋण का भुगतान शत्रु के साथ व्यापार माना जाता?
  2. क्या आपात्कालीन स्थिति में कॉर्पोरेट ढाल उठाना संभव है?

निर्णय

राज्य सचिव ने अपील अदालत के फैसले के खिलाफ हाउस ऑफ लॉर्ड्स में अपील किया। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने अपील को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया कि यद्यपि निगम अपने शेयरधारकों से एक अलग कृत्रिम इकाई है, अगर कंपनी के प्रभारी शेयरधारक या एजेंट किसी दुश्मन देश से हैं, तो कंपनी शत्रुतापूर्ण चरित्र अपना लेगी। 

जब सब कुछ शांत हो या जब युद्ध का समय न हो, तो अदालत का मानना ​​था कि व्यक्तिगत शेयरधारकों का चरित्र कंपनी के चरित्र को प्रभावित नहीं कर सकता। हालांकि, जब युद्ध का समय होता है, तो एजेंट या कोई भी व्यक्ति जो ऐसे शेयरधारकों से आदेश ले रहा है जो दुश्मन देश से हैं, कंपनी के चरित्र को निर्धारित करने में समग्र रूप से विचार करना महत्वपूर्ण है। 

अदालत ने कहा कि इस मामले में, यह माना जाता है कि कंपनी का शत्रु चरित्र है क्योंकि सचिव के पास 25000 में से केवल एक शेयर है, और बाकी जर्मनी से हैं। अदालत ने माना कि कंपनी पर यह साबित करने का भार है कि सचिव किसी दुश्मन देश के अन्य शेयरधारकों से आदेश नहीं ले रहा था।

न्यायालय ने इस मामले में पाया कि शेयरधारकों के कार्य और चरित्र उस विशेष फर्म की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं और यदि किसी शत्रु देश के शेयरधारक कंपनी के लिए निर्णय लेते हैं तो निगम शत्रु चरित्र प्राप्त कर सकता है।

मैकौरा बनाम नॉर्दर्न एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (1925) एसी 619

हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने इस मामले की सुनवाई की, जो कॉर्पोरेट ढाल हटाने के मुद्दे से संबंधित था। इस परिदृश्य में, निगम के मालिक की ओर से अनुरोध आया, जो असामान्य है।

मामले के तथ्य

अपीलकर्ता श्री मैकौरा के पास पहले उत्तरी आयरलैंड में एक लकड़ी की संपत्ति थी, जिसे उन्होंने कंपनी के शेयरों के भुगतान के बदले में एक कनाडाई मिलिंग कंसर्न को बेच दिया था। अपीलकर्ता को 42,000 पूर्ण चुकता £1 शेयर दिए गए, जिससे उसे पूर्ण स्वामित्व प्राप्त हुआ। वह £19,000 का असुरक्षित ऋणदाता भी था। अपीलकर्ता ने अपने नाम पर लकड़ी के लिए अग्नि बीमा कवरेज खरीदा, और कुछ ही समय बाद आग से क्षति हुई। अपीलकर्ता ने ऐसी बीमा पॉलिसी के तहत नुकसान की वसूली करने का प्रयास किया, लेकिन नॉर्दर्न एश्योरेंस कंपनी ने भुगतान करने से इनकार कर दिया क्योंकि निगम के पास लकड़ी का स्वामित्व था और वह एक अलग कानूनी इकाई थी।

उठाए गये मुद्दे 

क्या श्री मैकौरा की आग से संबंधित क्षति के लिए बीमा कंपनी जिम्मेदार है? 

निर्णय

हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने फैसला सुनाया कि अनुबंध के तहत बीमाकर्ता जिम्मेदार नहीं थे क्योंकि श्री मैकौरा का लकड़ी में कोई बीमा योग्य हित नहीं था क्योंकि उनका संबंध वस्तुओं के बजाय निगम के साथ था। इस मामले में, कॉर्पोरेट ढाल हटाने का आवेदन निगम के मालिक द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसने शेयरों का सबसे बड़ा प्रतिशत रखने का दावा किया था। हालांकि, अदालत ने फैसला किया कि कॉरपोरेटर, भले ही उसके पास सभी शेयर हों, वह निगम नहीं है और न तो उसके पास और न ही कंपनी के किसी लेनदार के पास व्यवसाय की संपत्ति में कोई कानूनी या न्यायसंगत संपत्ति है।

गिलफोर्ड मोटर कंपनी बनाम हॉर्न (1933)

यह मामला यूनाइटेड किंगडम में कॉर्पोरेट ढाल को हटाना शामिल है। ऐसी परिस्थिति में जहां किसी कंपनी को धोखाधड़ी के साधन के रूप में उपयोग किया जाता है, यह दर्शाता है कि अदालतें शेयरधारकों और एक फर्म को एक के रूप में कैसे देखेंगी।

मामले के तथ्य

गिलफोर्ड एक व्यापारी था जो गिलफोर्ड मोटर व्हीकल्स के नाम से काम करता था और इंटरनेट पर असेंबल की गई वस्तुएं बेचता था। गिलफोर्ड ने निर्माताओं से मोटर पार्ट्स खरीदे, उन्हें एक साथ रखा और फिर उन्हें इंटरनेट पर बेच दिया। कंपनी ने स्पेयर पार्ट्स की पेशकश भी की और ऑनलाइन खरीदी गई मोटरों का रखरखाव भी किया।

हॉर्न को तब गिलफोर्ड ने प्रबंध निदेशक के रूप में नियुक्त किया था। यह नौकरी छह साल के लिए अनुबंध के आधार पर थी। हालांकि, अनुबंध में कर्मचारी के व्यापार पर एक प्रतिबंध था, जिसमें कहा गया था कि कर्मचारी को कंपनी में रहते हुए या अनुबंध समाप्त होने के बाद नियोक्ता के किसी भी ग्राहक को लुभाने की अनुमति नहीं थी।

दुर्भाग्य से, गिलफोर्ड और हॉर्न का कार्य अनुबंध ढाई साल बाद समाप्त हो गया और हॉर्न ने कंपनी छोड़ दी। हालाँकि, गिलफोर्ड मोटर व्हीकल्स में अपनी नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद, उन्होंने अपने घर पर जे.एम. हॉर्न एंड कंपनी लिमिटेड की स्थापना की। उन्होंने कई ग्राहकों से भी संपर्क किया, जिन्हें उन्होंने गिलफोर्ड मोटर व्हीकल्स में काम करने के दौरान अपनी मुलाकातों के माध्यम से आकर्षित किया था।

उठाये गये मुद्दे

न्यायालय ने निम्नलिखित दो प्रमुख मुद्दों का मूल्यांकन किया:

  1. क्या अदालत जे.एम. हॉर्न और कंपनी लिमिटेड के ढाल को हटा सकती है?
  2. क्या हॉर्न अपने पिछले रोजगार अनुबंध में व्यापार संयम अनुबंध का उल्लंघन कर रहा है?

निर्णय

याचिकाकर्ता प्रारंभिक कार्रवाई में असफल रहा। गिलफोर्ड द्वारा हॉर्न पर लगाए गए प्रतिबंध को दो कारणों से अमान्य पाया गया:

  • प्रतिबंध रोजगार अनुबंध का हिस्सा था, और इस तरह, यह नौकरी की समाप्ति से बच नहीं सका, जो बिना किसी चेतावनी या कारण के हुआ था, और
  • जिस प्रतिबंध को लगाने की मांग की गई थी वह बहुत व्यापक था और इसे अब लागू नहीं किया जा सकता था।

इस आलोक में, अदालत ने मूल रूप से यह निर्धारित करने से इनकार कर दिया कि हॉर्न की कंपनी में धोखाधड़ी थी या नहीं। प्रारंभ में,अदालत ने माना कि प्रतिबंध होर्न के खिलाफ प्राथमिक रूप से लागू नहीं था क्योंकि यह दायरे में बहुत व्यापक था।

हालांकि,अपील पर स्थिति अलग थी। अपील अदालत निचली अदालत के फैसले से असहमत थी। हॉर्न की स्थापित फर्म के साथ वैसा ही व्यवहार किया गया जैसा कि वह थी, रोजगार समझौते की शर्तों और उसमें शामिल प्रतिबंधात्मक अनुबंधों से बचने के लिए हॉर्न द्वारा तैयार किया गया एक दिखावा था।

ली बनाम ली एयर फार्मिंग कंपनी लिमिटेड (1960)

यह मामला न्यूजीलैंड का है, और इसमें कंपनी कानून का मुद्दा शामिल है जिसमें कॉर्पोरेट घूँघट और विशिष्ट कानूनी व्यक्तित्व शामिल है जो यूके कंपनी कानून और भारतीय कंपनी अधिनियम, 2013 के लिए भी प्रासंगिक है। प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति ने पुष्टि की कि एक निगम एक अलग कानूनी इकाई है और एक निदेशक को अभी भी उस कंपनी द्वारा नियुक्त किया जा सकता है जिसे वह अकेले नियंत्रित करता है।

मामले के तथ्य

अपीलकर्ता के पति ली ने 1954 में एरियल टॉप-ड्रेसिंग व्यवसाय जारी रखने के इरादे से ‘लीज़ एयर फार्मिंग लिमिटेड’ बनाई, जिसमें एक यूरो के 3000 हजार शेयर कंपनी की शेयर पूंजी थे, जिनमें से ली के पास 2999 शेयर थे। ली ने संगठन के निदेशक के रूप में भी काम किया। कंपनी की गतिविधियों पर उनका पूरा अधिकार था और सभी अनुबंधों पर वह एकमात्र निर्णय लेने वाले थे। 

कंपनी कर्मचारी बीमा के लिए बीमा एजेंसियों के साथ कई अनुबंधों में शामिल हुई थी, और ली द्वारा अपने नाम पर ली गई व्यक्तिगत नीतियों के कुछ प्रीमियम का भुगतान कंपनी के बैंक खाते के माध्यम से किया गया था, हालांकि उन्हें ली के कंपनी बुक खाते में डेबिट किया गया था। ली कंपनी के निदेशक होने के साथ-साथ पायलट भी थे। 

मार्च 1956 में हवाई टॉप-ड्रेसिंग के दौरान विमान उड़ाते समय ली की हत्या कर दी गई थी। ली की पत्नी, अपीलकर्ता, ने कर्मचारी मुआवजे की मांग की थी। न्यूज़ीलैंड श्रमिक मुआवज़ा अधिनियम, 1922, यह दावा करते हुए कि ली फर्म के लिए काम करते समय घायल हो गए थे। न्यूजीलैंड कोर्ट ऑफ अपील ने अपीलकर्ता के दावे को खारिज कर दिया क्योंकि उसने ली को एक कार्यकर्ता के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि एक आदमी खुद को प्रभावी ढंग से नियोजित नहीं कर सकता है।

मार्च 1956 में हवाई टॉप-ड्रेसिंग के दौरान विमान उड़ाते समय ली की हत्या कर दी गई थी। ली की पत्नी, अपीलकर्ता ने न्यूज़ीलैंड श्रमिक मुआवज़ा अधिनियम, 1922, के तहत कर्मचारी मुआवजे की मांग की, यह दावा करते हुए कि ली को फर्म के लिए काम करते हुए चोट लगी थी। अपीलीय न्यायालय ने अपीलकर्ता के दावे को खारिज कर दिया क्योंकि उसने ली को एक कार्यकर्ता के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि एक आदमी प्रभावी ढंग से खुद को रोजगार नहीं दे सकता है।

उठाए गये  मुद्दे

  1. क्या अलग इकाई सिद्धांत प्रासंगिक है या नहीं?
  2. क्या श्रीमती ली (अपीलकर्ता) 1922 श्रमिक मुआवजा अधिनियम के तहत मुआवजे की हकदार हैं?

निर्णय

मामला न्यूजीलैंड के अपीलीय न्यायालय में ले जाया गया ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मृतक श्रमिक मुआवजा अधिनियम, 1922 के तहत प्रतिवादी फर्म द्वारा एक कार्यकर्ता के रूप में लगाया गया था या नहीं। 

निर्णय नकारात्मक था, और पीठ ने कहा कि मृतक आजीवन एकमात्र शासी निदेशक था, जिसका कंपनी पर पूरा नियंत्रण था; हालांकि, जबकि निदेशक और कंपनी के बीच एक रोजगार अनुबंध हो सकता है, इस मामले में, कंपनी के पास केवल एक ही व्यक्ति के पास अधिकार था, और वह आदेश देने वाला और उनका पालन करने वाला नहीं हो सकता था।

इसलिए, दोनों कार्यालय एक ही व्यक्ति के साथ नहीं रह सकते हैं और इस प्रकार असंगत हैं। अपीलीय न्यायालय  ने आगे निर्धारित किया कि क्योंकि मृतक एक निदेशक था, इसलिए वह प्रतिवादी निगम का कर्मचारी नहीं था। इसलिए नौकर या कार्यकर्ता नहीं हो सकता था।

तब अपीलकर्ता ने अपना मामला प्रिवी काउंसिल में ले जाया, जहां लॉर्ड्स ने सोलोमन बनाम सोलोमन (1896) के फैसले द्वारा स्थापित मिसाल पर विचार किया, जिसमें माना गया कि एक व्यक्ति कई भूमिकाओं में काम कर सकता है जबकि फर्म और उसके एकल मालिक या शेयरधारक कानूनी संस्थाएं बने रहते हैं। 

इसी तरह, श्री ली और प्रतिवादी फर्म के बीच एक संविदात्मक संबंध स्थापित होते ही अस्तित्व में था, और उस रिश्ते को नष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि मृतक कंपनी में सबसे बड़ा शेयरधारक और नियंत्रण शक्ति था। यह अज्ञात है कि अपनी जिम्मेदारियों को निभाते समय जब उनकी मृत्यु हुई तो वह किस पद पर थे, लेकिन यह उन किसानों के अनुरोध पर किया गया था जिनके पास प्रतिवादी फर्म के साथ अनुबंध संबंधी अधिकार और दायित्व थे। 

तथ्य यह है कि एक संविदात्मक संबंध केवल दो स्वतंत्र कानूनी संस्थाओं के बीच बनाया जा सकता है जो पहले ही साबित हो चुका है, केवल मृतक की स्थिति के कारण खारिज नहीं किया जा सकता है। इसलिए, अपीलकर्ता मुआवजा प्राप्त करने में सक्षम था क्योंकि कर्मचारी और कंपनी के बीच सेवा का अनुबंध मौजूद था।

निष्कर्ष

पिछली बहस के परिणामस्वरूप, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि एक कंपनी अपने सदस्यों से एक अलग कानूनी इकाई है और कॉर्पोरेट कानून के तहत उचित गठन के बाद एक व्यवसाय को कानूनी दर्जा प्राप्त होता है। एक कंपनी अपने प्रतिनिधियों और एजेंटों के माध्यम से व्यवसाय कर सकती है, और कंपनी के किसी सदस्य द्वारा किया गया कोई भी लेनदेन किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कंपनी लेनदेन माना जाएगा जो ऐसा करने के लिए अधिकृत है। कंपनी अपनी किसी भी संपत्ति को बेच सकती है और किसी भी प्रकार की संपत्ति खरीद भी सकती है। इसलिए, कंपनी के पास संविदात्मक क्षमता है और वह किसी के भी साथ, यहां तक ​​कि अपने कर्मचारियों और स्टॉकधारकों के साथ भी अनुबंध कर सकती है।

यदि कोई पक्ष अनुबंध की किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो दोनों पक्षों को मामले को अदालत में ले जाने का अधिकार है। इसलिए, कंपनी के पास मुकदमा दायर करने की क्षमता है। 

इसके अलावा, यूरोपीय संघ और भारत के भीतर प्रतिस्पर्धा कानून को समझने में ‘एकल आर्थिक इकाई’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि मूल कंपनियां और उनकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां एक इकाई के रूप में काम करती हैं, जिससे उन्हें प्रतिस्पर्धा नियमों का उल्लंघन किए बिना समझौतों में शामिल होने की अनुमति मिलती है। अंततः, इस अवधारणा की मान्यता बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए अभिन्न अंग है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या किसी कंपनी का नाम बदलने से कोई नई कानूनी इकाई अस्तित्व में आती है?

जब कोई व्यवसाय भारत में बनाया जाता है, तो उसे पंजीकृत किया जाता है और एक विशिष्ट पहचान संख्या आवंटित की जाती है जिसे कॉर्पोरेट पहचान संख्या (सीआईएन) कहा जाता है। यह एक पंजीकरण संख्या है जो कंपनी की विशिष्ट पहचान करती है। वह पंजीकरण संख्या स्थिर रहती है और कंपनी की स्थायी विशिष्ट पहचानकर्ता होती है।

किसी व्यवसाय का नाम बदलने से नई कंपनी का गठन नहीं होता है। सीआईएन वही रहता है, और सभी हितधारकों के अधिकार और देनदारियां अपरिवर्तित रहती हैं। इसलिए, सीआईएन कभी नहीं बदलता है, और दूसरी ओर, कंपनी का नाम परिवर्तन के अधीन है।

भिन्न कानूनी इकाई होने से क्या समस्याएँ आती हैं?

एक अलग कानूनी इकाई के रूप में चलने के कई फायदे हैं, लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएं भी आती हैं। प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली हो सकती है, और इसके निगमन में बहुत अधिक लागत आ सकती है। कानूनी और वित्तीय कर्तव्य भी हैं, जैसे नियमों का पालन करना, वार्षिक रिपोर्ट बनाना और अधिक जटिल कर कर्तव्य जिन्हें सही उपकरण या ज्ञान के बिना संभालना मुश्किल हो सकता है।

कोई भारतीय अलग कानूनी इकाई कैसे बना सकता है?

भारत में एक अलग कानूनी इकाई, मान लीजिए प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या एलएलपी, स्थापित करने के लिए निम्नलिखित कई चरणों की आवश्यकता होती है:

  1. निदेशकों को एक डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र (डीएससी) और निदेशक पहचान संख्या (डीआईएन) प्राप्त करें।
  2. कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) पोर्टल का उपयोग करके एक विशिष्ट कंपनी का नाम चुनें।
  3. कंपनी के रजिस्ट्रार (आरओसी) के साथ, सहचर्य के अनुच्छेद (एसोसिएशन ऑफ आर्टिकल्स) (एओए) और संघठन का ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन) (एमओए) सहित निगमन दस्तावेज जमा करें।
  4. आवश्यक पंजीकरण शुल्क का भुगतान करें और जीएसटी पंजीकरण सहित किसी भी अतिरिक्त कानूनी दिशानिर्देशों का पालन करें।

क्या न्यास  एक अलग कानूनी इकाई है?

किसी न्यास को एक निगम या एलएलसी की तरह एक अलग कानूनी इकाई के रूप में नहीं माना जाता है। एक न्यास के पास संपत्ति हो सकती है और वह लेन-देन कर सकता है, लेकिन उसके पास अपने स्वयं के कानूनी व्यक्तित्व का अभाव है। इसके बजाय, एक न्यास एक कानूनी ढांचा है जिसमें एक संरक्षक लाभार्थियों की ओर से संपत्तियों को नियंत्रित और प्रबंधित करता है। संरक्षक न्यास की ओर से कार्य करता है, और संरक्षक ही कानूनी रूप से जिम्मेदार है, न्यास स्वयं नहीं। इसलिए, जबकि एक न्यास एक अलग कंपनी की तरह कुछ निश्चित तरीकों से कार्य कर सकता है, लेकिन इसकी कानूनी स्थिति समान नहीं है।

एक अलग कानूनी इकाई होने से व्यवसाय मालिकों को कैसे मदद मिलती है?

एक अलग कानूनी इकाई होने से व्यवसाय मालिकों को जिम्मेदारी सीमित करने और व्यक्तिगत संपत्तियों को कॉर्पोरेट दायित्वों और कानूनी चिंताओं से बचाने में लाभ होता है। यह स्वामित्व परिवर्तन की परवाह किए बिना कॉर्पोरेट निरंतरता का आश्वासन देता है, शेयरों के माध्यम से स्वामित्व हस्तांतरण की सुविधा देता है, और कर लाभ प्रदान करता है। यह धन तक पहुंच में सुधार करता है, कानूनी संचालन को सुव्यवस्थित करता है, और व्यक्तिगत और कंपनी के मामलों को अलग करता है, जिससे वित्त का प्रबंधन करना और जोखिम कम करना आसान हो जाता है।

संदर्भ