संपत्ति का उत्तराधिकार और प्रशासन

यह लेख Shambhavi Upadhyay द्वारा लिखा गया है और बाद में Jaanvi Jolly द्वारा अद्यतन किया गया है। यह लेख इस्लामी कानून के तहत संपत्ति के प्रशासन की प्रक्रिया और संपत्ति के उत्तराधिकार की प्रक्रिया को समझाने का प्रयास करता है। यह भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रासंगिक प्रावधानों के साथ-साथ निष्पादक, प्रशासक और कानूनी प्रतिनिधि की अवधारणा को समझाता है। यह इस्लामी कानून के तहत ‘वसीयत’ के पहलू पर भी विस्तृत रूप से विचार करने का प्रयास करता है। इसमें उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता द्वारा मुस्लिम उत्तराधिकार में किए गए परिवर्तनों के साथ-साथ उत्तराधिकार के हिंदू और मुस्लिम कानूनों के बीच अंतर के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

भारत में अनेक धर्म हैं जिनके अलग-अलग कानून और रीति-रिवाज हैं। भारत को एक बगीचे की तरह देखा जा सकता है जिसमें विभिन्न प्रकार के वृक्ष हैं। यह बहुलता विजय अभियानों और समृद्ध व्यापारिक इतिहास के कारण लोगों के आगमन का परिणाम है। 

भारत में, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के आधार पर, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार है। विभिन्न धर्म अपने विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं। कुछ धर्मों में, इन कानूनों को विभिन्न क़ानूनों द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है, उदाहरण के लिए, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 आदि। इस्लाम जैसे अन्य धर्मों में कानून और नियम अभी भी प्राचीन धार्मिक ग्रंथों द्वारा शासित होते हैं। 

मुस्लिम कानून के विशिष्ट पहलू हमेशा से ही जनता के बीच जिज्ञासा का विषय रहे हैं। इस्लामी कानून में कुछ बहुत ही अनोखे पहलू हैं, जैसे कि एक पुरुष को चार विवाह तक की अनुमति देने वाली प्रथा, जिसमें पुरुष उत्तराधिकारी को महिला उत्तराधिकारी से दोगुना हिस्सा मिलता है, यदि वे अवशेष के रूप में एक ही वर्ग में आते हैं। किसी भी अन्य कानून के विपरीत, इस्लामी कानून विभिन्न आकस्मिकताओं के तहत उत्तराधिकार में प्रत्येक उत्तराधिकारी के लिए विशिष्ट हिस्सेदारी निर्धारित करता है। इसमें विभिन्न अनिवार्य भुगतानों को भी सूचीबद्ध किया गया है, जो कि प्रस्तावक (मृत व्यक्ति) की मृत्यु के बाद किए जाने होते हैं, जिसके बाद उसकी संपत्ति उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार के लिए उपलब्ध हो जाती है। शरीयत कानून के सिद्धांतों के अनुसार एक मृतक मुस्लिम की संपत्ति का प्रशासन धार्मिक शिक्षाओं और कानूनी ढांचे द्वारा निर्देशित एक प्रक्रिया है। कानून की इस शाखा के चार प्रमुख घटक हैं, जिनमें से प्रत्येक मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत निर्धारित धार्मिक और कानूनी दायित्वों को पूरा करता है। 

  • निष्पादक का पद – इस्लामी कानून के तहत निष्पादक को वकील कहा जाता है और उसे वसीयत की शर्तों के अनुसार मृतक की संपत्ति के प्रबंधन और प्रशासन के लिए नियुक्त किया जाता है।
  • उत्तराधिकार वितरण – इस्लामी कानून के तहत, फ़राएद या उत्तराधिकार के विशिष्ट नियम, रिश्तेदारों की निकटता के आधार पर उत्तराधिकारियों के निश्चित हिस्से को निर्दिष्ट करते हैं। इसमें उत्तराधिकारियों की पहचान, शेयरों की गणना और परिसंपत्तियों का वितरण शामिल है।
  • ऋण निपटान – उत्तराधिकारियों को संपत्ति वितरित करने से पहले, मृतक के ऋणों का निष्पादन किया जाना चाहिए। इस्लामी कानून के तहत, ऋण का निष्पादन धार्मिक दायित्वों के समान ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संपत्ति के हस्तांतरण से पहले ऋणदाताओं को उनकी बकाया राशि मिल जाए।
  • परिसंपत्ति प्रबंधन – निष्पादक मृतक की परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए तब तक जिम्मेदार होता है जब तक वास्तविक हस्तांतरण नहीं हो जाता है। वह संपत्ति की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए निवेश निर्णय, संपत्ति प्रबंधन और वित्तीय योजना के लिए भी जिम्मेदार है। 

संपत्ति प्रशासन के लिए इस्लामी कानून के अंतर्गत मार्गदर्शक सिद्धांत निम्नलिखित हैं: 

  • न्याय और निष्पक्षता-शरीयत विरासत वितरण से जुड़े मामलों में न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर जोर देती है। फरीद के अनुसार, इससे यह सुनिश्चित होता है कि उचित हिस्सा उत्तराधिकारियों को मिले। 
  • पारदर्शिता और जवाबदेही- ये सिद्धांत सर्वोपरि हैं और निष्पादक सभी लेनदेन का रिकॉर्ड रखने के लिए बाध्य हैं। 
  • करुणा और संवेदनशीलता – इन सिद्धांतों को निष्पादक द्वारा उत्तराधिकारियों के प्रति, विशेष रूप से दुःख की अवधि के दौरान, दर्शाए जाने पर बल दिया जाता है। उन्हें प्रशासन के साथ सहानुभूति और समझदारी से पेश आना चाहिए। 
  • प्रबंधन और विश्वसनीयता- निष्पादक को अपना कार्य पूरा करते समय एक वफादार प्रबंधक के रूप में कार्य करना चाहिए, तथा इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार वितरण सुनिश्चित करना चाहिए। 

उत्तराधिकार और विरासत से संबंधित इस्लामी कानून के प्राथमिक स्रोत निम्नलिखित हैं: 

  • पवित्र कुरान – यह ईश्वर द्वारा पवित्र पैगम्बर मुहम्मद को फ़रिश्ते जिब्रील के माध्यम से दिया गया ज्ञान है। ये खुलासे 23 वर्षों की अवधि में दिए गए संदेशों के रूप में हैं। यह कानून की किताब नहीं है; बल्कि इसका संबंध जीवन के आचरण से है। इसमें 6,000 श्लोक हैं, जिनमें से 200 श्लोक विवाह, वैवाहिक उपचार, संपत्ति, भरण-पोषण आदि से संबंधित कानूनी सिद्धांतों से संबंधित हैं।
  • सुन्नत – ये पवित्र पैगम्बर मुहम्मद की प्रथाएं या परंपराएं हैं। यह पवित्र पैगम्बर मुहम्मद द्वारा परिकल्पित आदर्श आचरण है। 
  • इज्मा – यह किसी विशेष मुद्दे पर समुदाय के विद्वानों की आम सहमति को दर्शाता है। यह कुरान की सुन्नत का पूरक है। 
  • क़ियास – ये ईश्वर द्वारा निर्धारित अच्छे सिद्धांतों के संबंध में सही और न्यायसंगत बातों के बारे में तर्क और अनुमान के प्रयोग द्वारा तैयार की गई उपमाएं हैं। जहां कोई विशेष स्थिति प्राथमिक स्रोतों द्वारा शामिल नहीं की जाती है, फिर भी इसे तर्क के सिद्धांतों को लागू करके शामिल किया जाता है। इस स्रोत को शिया लोग मान्यता नहीं देते है।

इस्लामी कानून के द्वितीयक स्रोत निम्नलिखित हैं: 

मुस्लिम कानून के तहत उत्तराधिकार और विरासत की अवधारणा

विद्वान फ़ाइज़ी के शब्दों में, “यह ऐसा है मानो संपत्ति एक गोल केक है, जो दूर से पूरा दिखता है; लेकिन जब प्रत्येक उत्तराधिकारी मेज के पास पहुंचता है, तो केक को सावधानीपूर्वक काटा जाता है और आनुपातिक रूप से विभाजित किया जाता है; और केवल इतना करना बाकी रह जाता है कि उसे उसका विशेष टुकड़ा सौंप दिया जाए।” 

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 की धारा 2 मुसलमानों के व्यक्तिगत कानून की प्रयोज्यता से संबंधित है। यह मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, जो शरीयत है, को बिना वसीयत के उत्तराधिकार, महिलाओं की विशेष संपत्ति (जिसमें विरासत में मिली या उपहार, अनुबंध या व्यक्तिगत कानून के अन्य प्रावधान के तहत प्राप्त की गई निजी संपत्ति शामिल है), विवाह, विवाह-भंग (जिसमें सभी प्रकार के विवाह – इल्ला, तलाक, जिहार, लियान, खुला और मुबारत शामिल हैं), भरण-पोषण, मेहर, संरक्षकता, उपहार, न्यास (ट्रस्ट) और धार्मिक बंदोबस्ती (एंडोमेंट) से संबंधित मामलों में प्रथागत कानूनों पर अधिभावी प्रभाव प्रदान करता है। 

मृतक मुस्लिम की संपत्ति के प्रशासन को नियंत्रित करने वाले सामान्य नियम

संपत्ति का प्रशासन मूल रूप से वह प्रक्रिया है जिसमें मृतक की स्थिति को अंतिम संस्कार व्यय, प्रोबेट या प्रशासन के पत्र प्राप्त करने की कार्यवाही के व्यय, उसकी मृत्यु के तीन महीने के भीतर मृतक को प्रदान की गई सेवाओं के लिए भुगतान, मृतक के ऋणों का भुगतान, चाहे वे सुरक्षित हों या असुरक्षित, और विरासत के भुगतान के लिए क्रमिक रूप से लागू किया जाता है। इन सभी का भुगतान हो जाने के बाद, शेष संपत्ति मृतक के उत्तराधिकारियों में वितरित की जाती है। 

भारत में, मृतक मुस्लिम की संपत्ति के हस्तांतरण के लिए लागू मूल कानून अभी भी मुस्लिम कानून है, जैसा कि 1937 के अधिनियम में कहा गया है। हालाँकि, ऐसे मृतक मुसलमानों के साथ-साथ अन्य समुदायों के सदस्यों की संपत्ति का प्रशासन एक समान कानून द्वारा शासित होता है, जिसे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 कहा जाता है। लेकिन यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह करता है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार, जिसमें लागू होने वाला मूल कानून भी शामिल है, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधानों के अनुसार होगा, न कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार है।

मुस्लिम कानून के तहत उत्तराधिकार के मामलों में सभी स्कूलों पर समान रूप से लागू होने वाले नियम इस प्रकार हैं: 

  • मृत व्यक्ति की संपत्ति में चल और अचल दोनों प्रकार की संपत्ति शामिल होती है और दोनों के बीच कोई अंतर नहीं होता है।
  • मुस्लिम व्यक्ति के पास जो भी संपत्ति है वह उसकी अलग संपत्ति है, इसलिए मृतक की मृत्यु पर उसके उत्तराधिकारी को जो भी संपत्ति प्राप्त होगी वह उसकी पूर्ण संपत्ति होगी। मुस्लिम कानून के अंतर्गत पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति की अवधारणा अनुपस्थित है। 
  • उत्तराधिकार और विरासत का प्रश्न प्रस्तावक की मृत्यु पर उठता है। 
  • जैसे ही किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, उसकी पैतृक संपत्ति तुरंत उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है, हालांकि शेयरों की वास्तविक गणना भविष्य में होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि संपत्ति को कभी भी स्थगित नहीं रखा जा सकता है। इस प्रकार, यह अधिकार मृतक की मृत्यु के तुरंत बाद प्राप्त हो जाता है।
  • उत्तराधिकार का अधिकार केवल प्रपोसिटस की मृत्यु के बाद ही उत्पन्न होता है। हिंदू कानून के विपरीत, किसी भी व्यक्ति का किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति पर कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है। 
  • निकटतम कानूनी उत्तराधिकारी को दूर के रिश्तेदार की तुलना में वरीयता दी जाएगी। 

जब किसी मुस्लिम व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो यह महत्वपूर्ण माना जाता है कि निम्नलिखित चार कर्तव्य दिए गए क्रम में निभाए जाएं: 

  • अंतिम संस्कार और दफ़न खर्च का भुगतान;
  • मृतक के ऋणों का भुगतान;
  • जाँच करें कि क्या वसीयत के माध्यम से कोई वसीयतनामा बनाया गया था।
  • शेष संपत्ति को शरीयत कानून के अनुसार मृतक के रिश्तेदारों में बांट दें। 

मुस्लिम कानून के तहत यह महत्वपूर्ण माना जाता है कि एक व्यक्ति अपने परिवार के लिए धन और संपत्ति छोड़ जाए। इस्लामी कानून के अनुसार, एक मृत व्यक्ति अपनी संपत्ति केवल अनिवार्य भुगतान करने के बाद बची हुई संपत्ति के 1/3 भाग तक ही वसीयत कर सकता है। इससे उसकी संपत्ति का 2/3 हिस्सा परिवार के सदस्यों के बीच वितरित किया जा सकता है। यह वसीयत कानूनी उत्तराधिकारी या गैर-कानूनी उत्तराधिकारी के पक्ष में हो सकती है। 

‘औल’ का सिद्धांत

यह सिद्धांत उस परिदृश्य को संबोधित करता है जहां परिसंपत्तियों का वितरण न्यायनीति (इक्विटी) से विचलित हो जाती है। शेयरधारकों को शेयरों का वितरण करने पर, वितरित कुल हिस्सा उपलब्ध संपत्ति के कुल अंश से अधिक पाया जाता है। दूसरे शब्दों में, जब आवंटित शेयरों की कुल राशि एक से अधिक हो जाती है, तो उत्तराधिकारियों के बीच आनुपातिक विभाजन सुनिश्चित करने के लिए पुनर्वितरण आवश्यक हो जाता है। इसमें संपत्ति का कुल अंश बढ़ाया जाता है, यह प्रत्येक हिस्से के व्यक्तिगत आकार को कम करके किया जा सकता है। इसे औल का सिद्धांत या वृद्धि का सिद्धांत कहा जाता है। 

शिया कानून में केवल बेटी या सगी बहन का हिस्सा कम किया जाता है, हालांकि सुन्नी कानून के तहत ऐसा कोई भेद नहीं किया गया है। 

‘रैड’ का सिद्धांत

यह सिद्धांत उस परिदृश्य को संबोधित करता है जहां परिसंपत्तियों का वितरण इक्विटी से विचलित हो जाता है। रैड का सिद्धांत, या वापसी का सिद्धांत, तब लागू होता है जब प्रस्तावक की मृत्यु हो जाती है और शेयर शेयरधारकों और अवशिष्टों को आवंटित कर दिए जाते हैं। पवित्र कुरान में निर्धारित नियम के अनुसार, यदि हिस्सेदारों को दिया गया हिस्सा और उपलब्ध कुल हिस्सा पैतृक संपत्ति से कम है तो अतिरिक्त हिस्सा सभी उत्तराधिकारियों में उनके संबंधित हिस्सों के अनुसार आनुपातिक रूप से वितरित किया जाता है। जब हिस्से में वृद्धि होगी तो मृतक का पति या पत्नी सुन्नी कानून के मामले में भाग नहीं लेंगे। हालाँकि, शिया कानून के अनुसार, प्रपोसिटस का पति या पत्नी, साथ ही माँ, इसमें भाग नहीं लेंगे। 

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत की अवधारणा

इस्लामी कानून में, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति निश्चित हिस्सों और अंशों के अनुसार बांटी जाती है। इसमें, वसीयत की स्वतंत्रता सभी ऋणों और अंतिम संस्कार व्ययों को घटाने के बाद व्यक्ति की शुद्ध संपत्ति के एक-तिहाई तक सीमित है। मुस्लिम कानून के तहत वसीयत को वसीयत कहा जाता है। वसीयतकर्ता वह व्यक्ति होता है जो वसीयत बनाता है और लाभार्थी वह व्यक्ति होता है जिसके पक्ष में वसीयत बनाई जाती है। यह वसीयती उत्तराधिकार का एक तरीका है। मुस्लिम कानून के तहत, संपत्ति का केवल 1/3 हिस्सा ही वसीयत के ज़रिए दिया जा सकता है और बाकी 2/3 हिस्सा शरीयत कानून के नियमों के तहत आता है। इस वंशानुगत हिस्से के लिए विशेष उत्तराधिकार नियम उस विशिष्ट विद्यालय द्वारा नियंत्रित होते हैं जिससे व्यक्ति संबंधित है तथा जीवित उत्तराधिकारियों की प्रकृति और संख्या पर निर्भर करते हैं। यदि यह एक तिहाई से अधिक के लिए किया जाता है, तो यह अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति से ही वैध होगा। यदि वे सहमति नहीं देते तो ऐसी वसीयत अवैध होगी। इस 1/3 हिस्से की गणना सभी अनिवार्य भुगतानों जैसे अंतिम संस्कार व्यय, सुरक्षित और असुरक्षित ऋण आदि को घटाने के बाद की जानी चाहिए। 

उदाहरण के लिए- 

कुल संपत्ति – रु. 10,00,000/-

अंतिम संस्कार व्यय – रु. 1,00,000/-

नौकर का बकाया वेतन – रु. 1,00,000/-

सुरक्षित ऋण – रु. 2,00,000/-

असुरक्षित ऋण – रु. 1,00,000/-

अनिवार्य भुगतान के बाद बची संपत्ति = रु. 5,00,000/-

वसीयत द्वारा दी जा सकने वाली संपत्ति – 5,00,000 रुपये का 1/3 = 1,65,000 रुपये 

कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा उत्तराधिकार के लिए छोड़ी गई पैतृक संपत्ति – 3,35,000 रुपये 

वसीयतकर्ता के लिए आवश्यक शर्तें

  • मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अंतर्गत आने के लिए वसीयतकर्ता का मुस्लिम होना आवश्यक है
  • वसीयतकर्ता स्वस्थ दिमाग का होना चाहिए
  • सामान्य नियम के अनुसार, वसीयतकर्ता का वयस्क होना आवश्यक है, लेकिन यदि वसीयत नाबालिग द्वारा बनाई गई है, तो वह उसके वयस्क होने के बाद ही वैध होगी। 

अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वसीयतकर्ता स्वस्थ मस्तिष्क वाला वयस्क मुसलमान होना चाहिए। कोई नाबालिग या पागल व्यक्ति वसीयत निष्पादित करने के लिए सक्षम नहीं है। एक नाबालिग आमतौर पर वसीयत बनाने के लिए अयोग्य होता है, लेकिन जब वह ऐसी वसीयत बनाता है, तो बाद में उसके वयस्क होने पर अनुसमर्थन द्वारा इसे वैध बनाया जा सकता है। 

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत मुस्लिम व्यक्ति द्वारा विवाह करने के परिणाम

यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के तहत विवाह करता है, तो मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के नियम उस पर लागू नहीं होंगे। इस मामले में, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधान लागू होंगे, भले ही वसीयत विवाह से पहले बनाई गई हो या बाद में। हालाँकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सामान्य नियम के रूप में, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधान मुसलमानों पर लागू नहीं होते हैं। 

इसके अलावा, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 21 में स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि एक बार जब कोई व्यक्ति अधिनियम के तहत विवाह कर लेता है, तो उसकी संपत्ति और ऐसे विवाह से उत्पन्न संपत्ति का उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधानों द्वारा शासित होगा। इसलिए, यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति अधिनियम के तहत विवाह करता है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार मुस्लिम व्यक्तिगत कानून द्वारा नहीं, बल्कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा शासित होगा। 

लिखित रूप में होना आवश्यक नहीं होगा

मुस्लिम कानून के तहत वसीयत मौखिक या लिखित हो सकती है, और यह आवश्यक नहीं है कि वह हमेशा लिखित ही हो। शब्द का कोई विशेष रूप आवश्यक नहीं है, बल्कि परीक्षक का आशय स्पष्ट होना चाहिए। 

आत्महत्या करने वाले व्यक्ति द्वारा बनाई गई वसीयत की स्थिति

सुन्नी कानून के तहत ऐसी वसीयत को वैध माना जाता है। हालाँकि, शिया कानून में, यदि आत्महत्या से पहले वसीयत बनाई जाती है, तो वह वैध है। यदि वसीयत कार्य के बाद लेकिन मृत्यु से पहले बनाई गई हो तो ऐसी वसीयत अवैध मानी जाती है। मज़हर हुसैन बनाम बोधा बीबी (1899),21 आईएलआरपीसी 91 के मामले में, मृतक ने पहले अपनी वसीयत बनाई और फिर जहर खा लिया। वसीयत को वैध माना गया। ज़हर खाने या आत्महत्या की दिशा में कोई अन्य कार्य करने के बाद की गई वसीयत शिया कानून के तहत अवैध होगी। 

किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा बनाई गई वसीयत की स्थिति जो बाद में अपना धर्म त्याग देता है

शिया कानून के तहत स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है। सुन्नी कानून के तहत, हनफ़ी स्कूल में, ऐसा अनुरोध वैध है अगर यह उस धर्म के अनुसार वैध है जिसे उसने अपनाया है। मालिकी कानून की विचारधारा के अनुसार, जिस दिन व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, उसी दिन उसकी वसीयत रद्द मानी जाती है। 

वसीयत की स्थिति, यदि वसीयतकर्ता ने X के पक्ष में वसीयत बनाई है और बाद में X वसीयतकर्ता की हत्या कर देता है

शिया कानून के तहत, यदि हत्या जानबूझकर की गई हो तो ऐसी वसीयत को अवैध माना जाएगा। सुन्नी कानून के तहत, हनफ़ी कानून की विचारधारा में, किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में वसीयत को मान्य किया जा सकता है, जिसने वसीयतकर्ता की मृत्यु का कारण बना हो, बशर्ते मृतक के उत्तराधिकारी अपनी सहमति दे दें। सुन्नी कानून के अन्य कानूनो की विचारधारा में, ऐसी वसीयत अवैध है, भले ही मृत्यु जानबूझकर या अनजाने में हुई हो। 

अजन्मे व्यक्ति को वसीयत की वैधता

यदि बच्चा अभी गर्भधारण भी नहीं हुआ है तो ऐसी वसीयत शून्य होगी। हालाँकि, यदि बच्चा गर्भ में है और वसीयत बनाने के छह महीने के भीतर उसका जन्म हो जाता है, तो सुन्नी कानून के तहत यह एक वैध वसीयत होगी। शिया कानून के तहत छह महीने की अवधि को बढ़ाकर दस महीने कर दिया गया है, इसलिए यदि बच्चा वसीयत बनाने के 10 महीने के भीतर पैदा होता है तो वह वैध वसीयत होगी। 

धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए बनाई गई वसीयत की वैधता

इस्लामी कानून के तहत, वसीयत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए बनाई जा सकती है। वसीयत बनाने का उद्देश्य किसी व्यक्ति को लाभ पहुंचाना या अपने धर्म का प्रचार करना हो सकता है। धार्मिक, धर्मार्थ या पवित्र उद्देश्यों के लिए बनाई गई वसीयत वैध है, लेकिन वह इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। 

वसीयत के प्रयोजन के लिए निम्नलिखित उद्देश्य पवित्र माने जाते हैं- 

  • फ़राज़ के लिए वसीयत – ये पवित्र कुरान में दिए गए उद्देश्यों या कार्यों के लिए हैं, उदाहरण के लिए, हज।
  • वाजिबत के लिए वसीयत – इसमें रोज़ा खोलने के दिन दिया गया दान शामिल होता है। 
  • नवाफिलित के लिए वसीयत – यह पूरी तरह से स्वैच्छिक प्रकृति की होती है, उदाहरण के लिए, मस्जिद, स्कूल या विश्राम गृह का निर्माण करना है। 

मुस्लिम व्यक्ति द्वारा की गई वसीयत की प्रोबेट की आवश्यकता

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 ऐसी वसीयत पर सीधे लागू नहीं होता, और इसलिए पारंपरिक मुस्लिम कानून के अनुसार किसी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती है। प्रोबेट वसीयत की एक प्रति है जिसे सक्षम न्यायालय की मुहर के तहत प्रमाणित किया जाता है। वसीयत के तहत नियुक्त निष्पादक को प्रोबेट प्रदान किया जा सकता है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत बनाई गई वसीयत के लिए प्रोबेट की आवश्यकता नहीं होती है और यदि इसे विधिवत साबित कर दिया जाए तो इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। 

मोहम्मद ग़ौसुद्दीन बनाम खाजा मैनुद्दीन (2009) के मामले में, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत, लिखित वसीयत के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 67 और धारा 68 के तहत दिए गए मानक प्रमाण की आवश्यकता होती है। 

वसीयत से संबंधित नियम

  1. अधिकतम एक तिहाई संपत्ति ही वसीयत में दी जा सकती है; यदि इससे अधिक संपत्ति वसीयत में दी जाती है तो कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक है। शियाओं के मामले में, यदि 1/3 तक की संपत्ति किसी कानूनी उत्तराधिकारी या गैर-कानूनी उत्तराधिकारी को दी जाती है, तो अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है। हालाँकि, यदि एक तिहाई से अधिक संपत्ति किसी कानूनी या गैर-कानूनी उत्तराधिकारी को दी जाती है, तो अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक होती है। सुन्नियों के मामले में, यदि 1/3 तक की संपत्ति किसी कानूनी उत्तराधिकारी को दी जाती है, तो अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक होती है, लेकिन यदि वही संपत्ति किसी गैर-कानूनी उत्तराधिकारी को दी जाती है, तो किसी सहमति की आवश्यकता नहीं होती है। हालाँकि, यदि एक तिहाई से अधिक संपत्ति किसी कानूनी या गैर-कानूनी उत्तराधिकारी को दी जाती है, तो अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक होती है।
  2. शिया कानून के तहत वसीयतकर्ता की मृत्यु से पहले सहमति दी जानी चाहिए। हालाँकि, मुल्ला के मोहोमेडन कानून के सिद्धांतों (19वीं संस्करण) के अनुसार, सहमति मृत्यु से पहले या बाद में दी जा सकती है। सुन्नी कानून के मामले में, वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद सहमति दी जाती है।
  3. सहमति एक या सभी उत्तराधिकारियों द्वारा दी जा सकती है। यदि वसीयत के माध्यम से 1/3 से अधिक हिस्सा दिया जाता है, तो यदि एक या कुछ कानूनी उत्तराधिकारी सहमति देते हैं, तो केवल उनका हिस्सा ही लाभार्थी को दिया जाएगा। 
  4. एक बार सहमति दे दी गई तो उसे रद्द नहीं किया जा सकता है।

शिया कानून के तहत अधिमान्य उपचार का नियम

शियाओं में अधिमान्यता का नियम लागू होता है, जिसका अर्थ है कि संपत्ति कुल में से 1/3 भाग पहले उत्तराधिकारी को दी जाती है, जिसका नाम पहले आता है, और इसलिए उसे क्रम में अन्य लोगों पर वरीयता दी जाएगी। जिस समय एक तिहाई शक्ति समाप्त हो जाएगी, यह माना जाएगा कि इच्छाशक्ति ने पूर्ण प्रभाव डाल दिया है। किसी अन्य उत्तराधिकारी को, जिसका नाम एक तिहाई संपत्ति वितरित होने के बाद आता है, कुछ भी नहीं दिया जाएगा। 

उदाहरण के लिए- 

X नाम के एक शिया व्यक्ति ने अपने पीछे 90,000 रुपये की संपत्ति छोड़ी। उसने अपनी वसीयत इस प्रकार बनाई- 

A को – 20,000/- रुपये 

B को – 10,000/- रुपये 

C को – 20,000/- रुपये 

D को – 20,000/- रुपये

मुस्लिम कानून के नियमों के अनुसार, वसीयत के माध्यम से उन्हें अधिकतम 30,000 रुपये देने की अनुमति थी। अधिमान्यता नियम का पालन करते हुए, चूंकि A का नाम सूची में पहले स्थान पर था, इसलिए उसे वरीयता दी गई तथा 20,000/- रुपए मूल्य की परिसंपत्तियां आवंटित की गईं थी। इसके बाद, B का उल्लेख किया गया है और उसे 10,000/- रुपये दिए गए हैं जो अभी भी संपत्ति के अंतर्गत आते हैं और वैध रूप से वसीयत किए जा सकते हैं; उसे भी उसका हिस्सा दिया जाएगा। हालाँकि, C और D को दी गई संपत्ति अनुमेय सीमा से अधिक है, और कानूनी उत्तराधिकारियों से कोई सहमति नहीं ली गई है, इसलिए उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा। 

केवल एक असाधारण परिस्थिति में कालानुक्रमिक प्राथमिकता का यह नियम लागू नहीं होता है। एक वसीयत के तहत दो या दो से अधिक व्यक्तियों को कुल संपत्ति का ठीक 1/3 हिस्सा दिया गया है। 

उदाहरण के लिए- X की कुल संपत्ति की कीमत 1,50,000/- रुपये है और उसने इसे इस प्रकार वसीयत किया है- 

A – 50,000 रुपये

B – 50,000 रुपये

C- 50,000 रुपये

इस स्थिति में, जिस व्यक्ति का नाम अंत में आता है उसे 1/3 हिस्सा मिलेगा तथा उससे पहले आने वाले व्यक्ति को कुछ भी नहीं मिलेगा। 

सुन्नी कानून के तहत कर योग्य अनुपात का नियम

सुन्नी कानून में, कर-योग्य अनुपात के नियम का पालन किया जाता है, सभी व्यक्तियों को, जिन्हें वसीयत द्वारा हिस्सा दिया गया है, उनके मूल हिस्से के अनुपात में, वसीयत करने योग्य संपत्ति का कुछ हिस्सा दिया जाएगा।

उदाहरण के लिए-

X के पास कुल 90,000/- रुपए की संपत्ति थी। उसने यह संपत्ति निम्न के पक्ष में वसीयत की –

A के लिए 15,000/- रुपए

B के लिए 30,000/- रुपए

C के लिए 45,000/- रुपए

= 90,000/- रुपए 

लेकिन मुस्लिम कानून के अनुसार, केवल 1/3 संपत्ति ही वसीयत के माध्यम से दी जा सकती है।

अतः अब केवल 30,000 रुपये ही वसीयत किए जा सकेंगे; इसलिए, दर वितरण के सिद्धांत का उपयोग करते हुए, हम वसीयत द्वारा वसीयत की गई संपत्ति में प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से का अनुपात निकालेंगे, जो A:B:C के लिए 1:2:3 होगा। इन अनुपातों के कुल योग को वसीयत की जा सकने वाली संपत्ति की राशि से विभाजित किया जाएगा। 

30,000 रुपये को 6 से भाग देने पर = 5000 रुपये

अब, A के पास 1 शेयर था = 5000 रुपये

B के पास 2 शेयर थे = 10,000 रुपये

C के पास 3 शेयर थे = 15,000 रुपये 

इस प्रकार वितरण सुचारू रूप से किया जाएगा। 

मुस्लिम कानून के तहत कानूनी प्रतिनिधि

मुस्लिम कानून के तहत, किसी मृत मुस्लिम व्यक्ति के निष्पादक या प्रशासक को आमतौर पर उसका कानूनी प्रतिनिधि माना जाता है। मृत मुस्लिम व्यक्ति की सभी परिसंपत्तियों सहित संपत्ति उसमें निहित होती है। ऐसे कानूनी प्रतिनिधि या प्रशासक के कर्तव्यों में परिसंपत्तियों का संग्रह और गणना, ऋणों का भुगतान, विरासत का भुगतान, तथा कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच शेष विरासतीय परिसंपत्तियों का वितरण शामिल है। 

ऐसे मामलों में जहां वसीयतनामा मुस्लिम व्यक्ति द्वारा बनाया जाता है, वहां निष्पादक या प्रशासक के लिए वसीयत का प्रोबेट प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं है। तथापि, यदि मृतक को देय ऋण वसूल किया जाना है, तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अनुसार मृतक की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने के लिए ऐसे प्रशासक द्वारा प्रतिनिधित्व आवश्यक है। इस प्रकार, यदि मृतक ने वसीयत बनाई है, तो प्रोबेट प्राप्त किया जा सकता है, और यदि उसकी मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो प्रशासन पत्र न्यायालय से प्राप्त किया जा सकता है। एक बार प्रोबेट या प्रशासन पत्र प्रदान कर दिए जाने के बाद, यह मृत व्यक्ति की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने के लिए कार्यकारी या प्रशासक की स्थिति को निर्णायक रूप से स्थापित कर देता है। निष्पादक को आमतौर पर वसीयत के तहत नियुक्त किया जाता है और वह ही वसीयत की प्रोबेट की मांग करता है। प्रशासनिक पत्र उस व्यक्ति को दिया जा सकता है जो मृतक का कानूनी उत्तराधिकारी हो। 

एक बार अंतिम संस्कार व्यय आदि का अनिवार्य भुगतान कर दिए जाने के बाद, निष्पादक वसीयत योग्य संपत्ति के संबंध में एक सक्रिय न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में कार्य करेगा, जो अधिकतम 1/3 तक है और शेष 2/3 उत्तराधिकार योग्य संपत्ति के संबंध में उत्तराधिकारियों के लिए न्यासी के रूप में कार्य करेगा। 

पारंपरिक मुस्लिम कानून के अनुसार, किसी गैर-मुस्लिम को निष्पादक बनने की अनुमति नहीं थी, लेकिन आधुनिक समय में, किसी गैर-मुस्लिम को भी वैध रूप से निष्पादक नियुक्त किया जा सकता है। 

निष्पादक और प्रशासक में संपत्ति का निहित होना

वसीयत के मामले में, मृतक की संपत्ति निष्पादक में निहित होती है, भले ही उसके द्वारा प्रोबेट प्राप्त न किया गया हो। निष्पादक के लिए वसीयत का प्रोबेट प्राप्त करना आवश्यक नहीं है; तथापि, यदि वह मृतक को देय किसी ऋण की वसूली के लिए वाद दायर करना चाहता है, तो न्यायालय ऐसे ऋणी के विरुद्ध कोई आदेश पारित नहीं करेगा या निष्पादन कार्यवाही की अनुमति नहीं देगा, जब तक कि प्रोबेट प्राप्त न हो जाए। ऐसा निष्पादक ऐसे प्रोबेट के स्थान पर प्रशासक सामान्य अधिनियम, 1963 के तहत प्रमाण पत्र या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर सकता है। 

प्रशासनिक पत्रों के मामले में, संपदा उस प्रशासक में निहित होती है जिसने ऐसे पत्र प्राप्त किए हैं। यदि न तो कोई निष्पादक है और न ही कोई प्रशासक, तो संपत्ति कानूनी उत्तराधिकारियों के पास निहित होगी। 

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत विभिन्न शब्दों को निम्नानुसार परिभाषित किया गया है: 

धारा 2(a) के तहत प्रशासक को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी द्वारा वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति का प्रशासन और प्रबंधन करने के लिए नियुक्त किया जाता है। प्रशासक की नियुक्ति उस स्थिति में की जाएगी जहां या तो व्यक्ति की बिना वसीयत के मृत्यु हो गई हो या वसीयतनामा के तहत निष्पादक का नाम नहीं दिया गया हो। न्यायालय के आदेश से नियुक्त प्रशासक के मामले में, उसकी नियुक्ति की तिथि से संपदा उसमें निहित हो जाती है। तब तक, प्रोबेट विभाग का न्यायाधीश ऐसी संपत्ति को अपने पास रखता है। 

धारा 2(c) के तहत, निष्पादक को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे वसीयतकर्ता द्वारा उसकी मृत्यु के बाद उसकी वसीयत को निष्पादित करने के लिए नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति भी वसीयत के तहत की गई है। जैसे ही वसीयतकर्ता की मृत्यु होती है, उसकी संपत्ति ऐसे निष्पादक के पास निहित हो जाती है। 

एक निष्पादक को निम्नलिखित कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है- 

  • निष्पादक मृतक की सभी परिसंपत्तियों की गणना करने तथा मृतक व्यक्ति को देय किसी भी ऋण की वसूली करने के लिए जिम्मेदार होता है।
  • निष्पादक मृतक के अंतिम संस्कार के खर्च सहित संपत्ति पर होने वाले सभी खर्चों का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार होता है
  • निष्पादक मृतक के किसी भी बकाया ऋण का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार होता है
  • निष्पादक विरासत के लिए भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है
  • निष्पादक शेष संपत्ति को कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच वितरित करने के लिए जिम्मेदार होता है

जहां किसी मुसलमान की बिना वसीयत के मृत्यु हो गई हो और प्रशासनिक पत्र किसी उत्तराधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त कर लिया गया हो। इसके परिणामस्वरूप, मृतक की परिसंपत्तियां ऐसे प्रशासक के पास निहित हो जाएंगी, क्योंकि वह मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। 

प्रशासक के कर्तव्य निम्नलिखित हैं- 

  • वह मृतक की सभी संपत्तियों की गणना करने तथा मृतक व्यक्ति पर बकाया ऋण वसूलने के लिए जिम्मेदार होता है।
  • वह मृतक के अंतिम संस्कार के खर्च सहित संपत्ति पर लगने वाले सभी खर्चों का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है
  • वह मृतक के किसी भी बकाया ऋण का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है
  • वह शेष संपत्ति को कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच वितरित करने के लिए जिम्मेदार है

यदि मृतक मुस्लिम द्वारा न तो कोई निष्पादक नियुक्त किया गया है और न ही उसकी मृत्यु के बाद प्रशासन के पत्र प्राप्त किए गए हैं, तो संपत्ति मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों के हाथों में होगी। इन कानूनी उत्तराधिकारियों को मृत व्यक्ति का कानूनी प्रतिनिधि भी माना जाएगा। 

यह संपत्ति कानूनी उत्तराधिकारियों में संयुक्त रूप से नहीं बल्कि संपत्ति में उनके हिस्से के अनुपात में, मृत्यु के समय से ही अलग-अलग निहित होती है। उत्तराधिकारी ऐसी संपत्ति को अपने पास रखते हैं, बशर्ते कि उन्हें सभी प्रभारों और ऋणों का भुगतान करना पड़े, साथ ही उनके हिस्से के अनुपात में एक तिहाई भाग तक की विरासत का भुगतान भी करना पड़े। 

यदि कानूनी प्रतिनिधि मृतक व्यक्ति को देय ऋण वसूलने के लिए मुकदमा करना चाहते हैं या मृतक के निर्णय देनदारों के खिलाफ निष्पादन कार्यवाही शुरू करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो प्रशासक सामान्य अधिनियम, 1963 के तहत प्रमाण पत्र या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अनुसार उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की आवश्यकता होगी। 

उत्तराधिकार का हस्तांतरण

किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति दो तरीकों से हस्तांतरित की जा सकती है – उसकी वसीयत के माध्यम से (वसीयतनामा) और जब कोई वसीयत न हो तो उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार (अविवाहित)। उत्तराधिकार की अपेक्षित शर्तें पूरी हो जाने के बाद, अर्थात् दफ़न का खर्च, ऋण और वसीयतें चुका दी जाती हैं, उसके बाद उत्तराधिकार प्रदान किया जाता है। मुस्लिम कानून के अनुसार, वारिस मृतक के उत्तराधिकारी होते हैं, जिन्हें शरीयत द्वारा उसकी संपत्ति का कानूनी रूप से उत्तराधिकारी माना जाता है, बशर्ते कि उन्हें उत्तराधिकार से वंचित न किया जाए। उत्तराधिकारी निर्दिष्ट हिस्सों में साझा किरायेदार के रूप में संपत्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं। मुस्लिम कानून में कोई संयुक्त किरायेदारी नहीं होती है, तथा उत्तराधिकारी केवल साझा किरायेदार होते हैं। 

उत्तराधिकारियों को आम तौर पर दो महत्वपूर्ण श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, हिस्सेदार और अवशिष्ट। 

  • हिस्सेदारों में पति, पत्नी, पिता, माता, बेटी, सगे भाई, सगी बहन, गर्भाशय बहन  और सगे भाई शामिल हैं। इन हिस्सेदारों में चार ऐसे होते हैं जो कभी हिस्सेदार के रूप में और कभी अवशिष्ट के रूप में उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं। ये हैं पिता, पुत्री, सगी बहन, तथा रक्त संबंधी बहन।
  • अवशिष्ट वे लोग होते हैं जो तत्काल हिस्सेदार की अनुपस्थिति में उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं, तथा यदि संपत्ति उनके बीच हस्तांतरित होने के बाद भी बची रहती है। 

दूर के रिश्तेदारों की तीसरी श्रेणी मौजूद है, जो न तो हिस्सेदार हैं और न ही अवशिष्ट, बल्कि रक्त संबंधों से जुड़े हुए हैं। हालांकि, सौतेले बच्चे और सौतेले माता-पिता एक-दूसरे से संपत्ति प्राप्त नहीं करते हैं। सभी प्राकृतिक उत्तराधिकारियों के असफल होने पर मृतक की संपत्ति सरकार को हस्तांतरित हो जाती है। यदि कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो राज्य समस्त संपत्ति का अंतिम उत्तराधिकारी है। 

ऋणों के लिए उत्तराधिकारियों की देयता की सीमा

अलगाव की भावना

कुरान का यह सिद्धांत कि, “कर्ज चुकाए जाने के बाद ही कोई उत्तराधिकार प्राप्त होता है” मुस्लिम उत्तराधिकार कानून का एक अभिन्न अंग है।

मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति उत्तराधिकारियों के पास संयुक्त रूप से नहीं होती है। इसी प्रकार, मृत व्यक्ति से प्राप्त ऋण को भी सभी उत्तराधिकारियों के बीच, उन्हें प्राप्त संपत्ति के अनुपात के अनुसार विभाजित किया जाता है। वे इसका भुगतान करने के लिए अलग-अलग जिम्मेदार हैं तथा ऐसा नहीं कहा जाता कि कोई भी वारिस दूसरे सह-वारिस की ओर से भुगतान कर रहा है। 

मुहम्मद मुईन-उद-दीन एवं अन्य बनाम मुसम्मत जमाल फातिमा (1921) में न्यायालय ने माना था कि मुस्लिम मालिक की मृत्यु पर, संपत्ति नहीं बल्कि उत्तराधिकारी ऋणों के लिए उत्तरदायी हो जाता है। न्यायमूर्ति हॉबहाउस ने कहा कि “..उत्तराधिकारी स्वयं उत्तरदायी हैं और वह भी उस सीमा तक, जो उन्हें प्राप्त हुई हो।” इसका अर्थ यह है कि संपत्ति के साथ-साथ उत्तराधिकारियों को ऋण भी विरासत में मिलता है। न्यायालय द्वारा उन्हें ऋणदाता के अधिकारों की रक्षा के लिए राशि का भुगतान करने के लिए भी कहा जा सकता है। 

मुस्लिम कानून और न्यायिक उदाहरणों के अनुसार, जब तक कोई उत्तराधिकारी मृतक से प्राप्त ऋण का भुगतान नहीं कर देता, तब तक वह संपत्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता है। वह संपत्ति के अपने हिस्से से इसे चुकाने के लिए बाध्य है। सैयद शाह मुहम्मद काज़िम बनाम सैयद अबी सगीर और अन्य (1931) के मामले में, पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि “संपत्ति के किसी भी हिस्से को अपने उपयोग के लिए विनियोजित करने से पहले सभी ऋणों का भुगतान करना उत्तराधिकारी का कर्तव्य है।” यदि वारिस संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को बेचने में सफल हो जाता है, तब भी वह ऋणदाता, जिसका उस पर ऋण बकाया है, उस संपत्ति पर उस व्यक्ति की तुलना में अधिक बेहतर आधार रखेगा, जिसने सद्भावपूर्वक उसे खरीदा हो। 

संपत्ति का विभाजन और वितरण

मुस्लिम कानून के तहत मृतक की संपत्ति दो अलग-अलग तरीकों से वितरित की जाती है। 

  1. प्रति व्यक्ति वितरण 
  2. प्रति उपखंड वितरण

सुन्नी कानून के तहत प्रति व्यक्ति वितरण की पद्धति का पालन किया जाता है। इस पद्धति के अनुसार, सभी उत्तराधिकारियों को संपत्ति समान रूप से दी जाती है। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से की मात्रा मौजूद उत्तराधिकारियों की संख्या पर निर्भर करती है। इन सभी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बराबर-बराबर बांटी जाती है, प्रत्येक को बराबर हिस्सा मिलता है। इसके अलावा, सुन्नी कानून के तहत, प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को न तो उत्तराधिकारी के दावे के निर्धारण के मामले में मान्यता दी गई है और न ही प्रत्येक उत्तराधिकारी के हिस्से की मात्रा निर्धारित करने में है। 

शिया कानून के तहत प्रति उपखंड वितरण की पद्धति का पालन किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि उत्तराधिकारी को संपत्ति का अधिकार उस वर्ग या समूह के अनुसार मिलता है जिसका वह हिस्सा है। सबसे पहले हिस्सा प्रत्येक शाखा को दिया जाता है, और फिर बाद में उस हिस्से को शाखा के उत्तराधिकारियों के बीच विभाजित किया जाता है। इस प्रकार के विभाजन में, प्रत्येक उत्तराधिकारी के हिस्से की मात्रा कुल उत्तराधिकारियों की संख्या के बजाय उसकी शाखा को उपलब्ध संपत्ति पर निर्भर करती है। सुन्नी कानून के तहत, प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को प्रत्येक उत्तराधिकारी के हिस्से की गणना के सीमित उद्देश्य के लिए मान्यता दी गई है। 

मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के वितरण के उदाहरण

प्रति व्यक्ति – सुन्नी कानून

उदाहरण के लिए- A एक सुन्नी पुरुष है, उसके दो बेटे हैं, B और C। B के तीन बेटे हैं और C का एक बेटा है। यदि B और C की मृत्यु A से पहले हो गई हो, तो A के उत्तराधिकारियों की कुल संख्या 4 होगी, जो B और C के पुत्र हैं। 

प्रति व्यक्ति वितरण के नियम को लागू करने पर, वंशानुगत संपत्ति उन चारों के बीच समान रूप से विभाजित की जाएगी, चाहे वे किसी भी शाखा से संबंधित हों। इसका मतलब यह है कि उन सभी को A की संपत्ति का 1/4 हिस्सा मिलेगा। 

प्रति उपखंड – शिया कानून

उदाहरण के लिए- A एक शिया पुरुष है, B और C उसके दो बेटे है। B के तीन पुत्र X, Y और Z हैं, तथा C का एक पुत्र S है। यदि B और C की मृत्यु A से पहले हो गई हो, तो A के उत्तराधिकारियों की कुल संख्या चार होगी, X, Y, Z और S, जो B और C के पुत्र हैं। 

प्रति उपखंड वितरण के नियम को लागू करने पर, संपत्ति को आधे में विभाजित किया जाएगा क्योंकि प्रत्येक शाखा को उपलब्ध संपत्ति की मात्रा समान होगी। पहले आधे भाग के बाद B की शाखा आएगी, जिसमें B के तीन पुत्र, X, Y और Z शामिल होंगे। दूसरा भाग C की शाखा द्वारा सफल होगा, जिसमें C का एकमात्र पुत्र, अर्थात् S शामिल है। 

A के पौत्रों का अंतिम हिस्सा इस प्रकार होगा- 

X – 1/6वाँ

Y – 1/6वाँ

Z – 1/6वाँ

S – आधा

उत्तराधिकार का सुन्नी कानून

उत्तराधिकार संबंधी सुन्नी कानून केवल उन रिश्तेदारों पर केंद्रित है जो किसी ऐसे पुरुष सदस्य के वंशज हैं जो मृत व्यक्ति के रिश्तेदार हो सकते हैं। प्रत्येक उत्तराधिकारी संपत्ति को अलग-अलग रखता है तथा संपदा में उसका एक निश्चित हिस्सा होता है। 

सुन्नी कानून उत्तराधिकारियों को दो समूहों में वर्गीकृत करता है: 

  • कुरानिक उत्तराधिकारी – वे निर्वसीयत की संपत्ति में निर्धारित हिस्सा लेते हैं और उत्तराधिकार के लिए प्रथम पंक्ति में होते हैं। इसमें बेटियां, माता-पिता, दादा-दादी, पति-पत्नी, भाई-बहन आदि शामिल हैं।
  • अवशिष्ट – कुरानिक उत्तराधिकारियों को शेयर वितरित किए जाने के बाद संपत्ति का उत्तराधिकार। इनमें परिवार के पुरुष और महिला दोनों सदस्य शामिल हैं, जो रक्त-वंश की दूसरी पंक्ति में हो सकते हैं। 

कानून संपत्ति के उस हिस्से के लिए भी शेयर तय करता है जिस पर उत्तराधिकारी का अधिकार है:

  • यदि दम्पति की अपनी कोई संतान नहीं है या पुत्र की संतान है तो विधवा को एक-चौथाई हिस्सा पाने का अधिकार है। यदि ऐसा बच्चा हो तो वह आठवां हिस्सा लेती है। ऐसे मामलों में जहां एक से अधिक विधवाएं हों, वे एक-चौथाई या एक-आठवें हिस्से की संपत्ति में बराबर हिस्सा पाती हैं। 
  • संतान की अनुपस्थिति में पिता या पुत्र की संतान को अवशिष्ट माना जाता है तथा वह अन्य कुरानिक उत्तराधिकारियों को अंशों के आबंटन के बाद अवशिष्ट राशि प्राप्त करने का हकदार होता है। पिता को, पुत्र की संतान या संतान सहित, 1/6 भाग मिलता है। 
  • संतान के अभाव में या पुत्र या दो सगी बहनों या दो सगे भाइयों या एक भाई के साथ एक बहन, पूर्ण सगे या गर्भाशयी संतान की स्थिति में माता का हिस्सा 1/3 होता है। हालाँकि, माँ के साथ-साथ अन्य रिश्तेदार भी हैं, जिनका हिस्सा 1/6 है।
  • बेटे की बेटी को दो या अधिक बेटियों, एक बेटे या उच्चतर बेटे, बेटे या दो या अधिक उच्चतर बेटों की बेटियों की अनुपस्थिति में ही विरासत मिलती है। यदि इनमें से कोई भी मौजूद है, तो उसे उत्तराधिकार से पूरी तरह बाहर रखा जाता है। उपर्युक्त सम्बन्धियों की अनुपस्थिति में, एकल पुत्री के मामले में उसका हिस्सा आधा होता है, तथा एक से अधिक पुत्रियाँ होने पर उसका हिस्सा 2/3 होता है। 
  • यदि संतान न हो या पुत्र की संतान न हो तो पति आधा हिस्सा लेता है, तथा यदि संतान हो तो एक-चौथाई हिस्सा लेता है। 
  • एकमात्र पुत्री को आधी सम्पत्ति का हक है। एक से अधिक पुत्रियों के मामले में, सभी पुत्रियों को संयुक्त रूप से संपत्ति का दो-तिहाई हिस्सा मिलता है। 
  • अगर बेटी और बेटा दोनों ही मौजूद हैं, तो बेटी हिस्सेदार नहीं रह जाती और उसकी जगह अवशिष्ट हिस्सेदार बन जाती है। यहां, बेटा बेटी को मिलने वाली संपत्ति का दोगुना पाने का हकदार है।
  • सुन्नी कानून के तहत, नाजायज बच्चे को मैट्रिस फिलियस माना जाता है, जिसका अर्थ है कि उसे केवल मां से ही विरासत मिलती है।

सुन्नी कानून के तहत हित के हस्तांतरण के उदाहरण

मृतक के परिवार में उसके पिता, उसकी माता, उसके दादा, उसकी नानी, दो बेटियां और एक बेटे की बेटी हैं। 

यहां हम सबसे पहले पिता के हिस्से की गणना करेंगे, उसे 1/6 हिस्सा मिलेगा क्योंकि एक बच्चा जीवित है। 

यहां, पिता और माता द्वारा क्रमशः दादा और नाना को बाहर रखा गया है, जैसे निकटतम रिश्तेदार दूर के रिश्तेदारों को बाहर रखते हैं। 

मां को 1/6 हिस्सा मिलेगा क्योंकि वहां बच्चे मौजूद हैं, यानी दो बेटियां हैं। 

यहां पिता और माता दोनों का हिस्सा 1/6 है, क्योंकि यह केवल अवशिष्ट के मामले में होता है जहां पुरुष दोगुना हिस्सा लेता है क्योंकि महिला उसी वर्ग में आती है। 

जहां दो बेटियां हैं, वहां वे मिलकर 2/3 हिस्सा लेती हैं। 

बेटे की बेटी को भी इससे बाहर रखा जाएगा, क्योंकि उसे केवल दो या अधिक बेटियों की अनुपस्थिति में ही उत्तराधिकार प्राप्त होगा। 

इसलिए, अंतिम शेयर होंगे- 

पिता – 1/6

माता – 1/6

दो बेटियाँ – 4/6

शिया उत्तराधिकार कानून

शिया कानून उत्तराधिकारियों को दो समूहों में विभाजित करता है – रक्त संबंध (सगोत्र संबंध) और विवाह संबंध (सम्बन्ध)। रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारियों को नसब वारिस भी कहा जाता है, जबकि सम्बन्धी उत्तराधिकारियों को सबाब वारिस कहा जाता है। 

  • रक्त संबंधों के आधार पर, आगे तीन वर्गों में वर्गीकरण किया गया है। यहाँ, पहला पक्ष दूसरे पक्ष को उत्तराधिकार से बाहर कर देगा और दूसरा पक्ष तीसरे पक्ष को उत्तराधिकार से बाहर कर देगा। यह इस सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है कि निकटतम कानूनी उत्तराधिकारी को दूर के रिश्तेदारों की तुलना में वरीयता दी जाएगी। 
वर्ग 1 वर्ग 2 वर्ग 3
अभिभावक दादा-दादी पैतृक, और
बच्चे और अन्य वंशज भाई-बहन और उनके वंशज
  • मामा, चाचा और चाची,
  • और उनके बच्चे
  • इन तीनों श्रेणियों में पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच कोई अंतर नहीं है, सिवाय इसके कि पुरुष उत्तराधिकारी को महिला उत्तराधिकारी से दोगुना हिस्सा मिलेगा।
  • शिया कानून में कानूनी उत्तराधिकारियों की तीसरी श्रेणी के संबंध में इस आधार पर कोई वरीयता नहीं दी जाती है कि कोई व्यक्ति मृतक व्यक्ति से पैतृक या मातृ पक्ष से जुड़ा हुआ है। जब तक उनके बीच समान संबंध हैं, तब तक वे विरासत में हिस्सा लेंगे, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो और मृतक के साथ उनके संबंध का मूल कुछ भी हो। 
  • साझेदार को उत्तराधिकार से कभी बाहर नहीं रखा जाता है, वह निकटतम रक्त संबंधी के साथ मिलकर उत्तराधिकार प्राप्त करता है, जैसा कि ऊपर वर्णित चार्ट के अनुसार लागू हो सकता है। पति को अपने वंशज की उपस्थिति में संपत्ति का एक-चौथाई हिस्सा तथा उसकी अनुपस्थिति में आधी संपत्ति का अधिकार प्राप्त है। दूसरी ओर, पत्नी वंशज की उपस्थिति में संपत्ति का आठवां हिस्सा पाने की हकदार है, तथा अनुपस्थिति में एक-चौथाई हिस्सा पाने की हकदार है।

  • शिया कानून के अंतर्गत ‘ज्येष्ठाधिकार (प्राइमजेनिचर) के सिद्धांत’ का पालन किया जाता है। स्वस्थ मस्तिष्क वाला सबसे बड़ा पुत्र अपने पिता के वस्त्र, उनकी कुरान, अंगूठी और तलवार पहनने का हकदार है, बशर्ते मृतक ने इन वस्तुओं के अतिरिक्त कोई संपत्ति छोड़ी हो। सैयद मोहम्मद बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2014) के मामले में, यह देखा गया कि यह सिद्धांत सबसे बड़े बेटे को वरीयता देने से संबंधित है, बेटी को नहीं। 
  • शिया कानून के तहत नाजायज संतान को नुलियस फिलियस माना जाता है, जिसका अर्थ है कि उसे न तो पिता से और न ही माता से विरासत मिलती है। 

वितरण के नियम इस प्रकार हैं: 

  • पति, जिसके कोई संतान या वंशज न हों, आधा हिस्सा लेता है। बच्चों या वंशजों के मामले में, उसका हिस्सा एक चौथाई है। 
  • बिना संतान या सीधी वंशावली वाली विधवा को एक चौथाई हिस्सा मिलता है। बच्चों या वंशजों के मामले में, उसका हिस्सा आठवां हिस्सा है। निःसंतान विधवा को मृत पति की चल सम्पत्ति में से केवल एक चौथाई हिस्सा मिलता है। 
  • बिना संतान या वंशज के पिता को अवशिष्ट संपत्ति के रूप में उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार है। बच्चों के मामले में उसका हिस्सा छठा हिस्सा है। 
  • संतान या सीधी संतान या दो या अधिक सगे भाई या एक भाई और दो बहनें या पिता के साथ चार बहनें न होने पर माता का हिस्सा एक तिहाई होता है। हालाँकि, उपर्युक्त संबंधियों की उपस्थिति में, उसका हिस्सा छठा हिस्सा है। 
  • यदि बेटी अकेली संतान है तो उसे आधा हिस्सा मिलेगा। दो या अधिक बेटियों का हिस्सा कुल मिलाकर दो-तिहाई होता है। हालाँकि, बेटे की उपस्थिति में, बेटी अवशिष्ट हो जाती है। 

शिया कानून के तहत ब्याज के हस्तांतरण के उदाहरण

एक मुसलमान महिला अपने पति, माता और पिता को छोड़कर मर जाती है। 

इसमें पति और माता हिस्सेदार होंगे, लेकिन बच्चों या अन्य वंशजों की अनुपस्थिति में पिता अवशिष्ट संपत्ति बन जाएगा। 

पति को आधा हिस्सा मिलेगा, बच्चों की अनुपस्थिति में माँ को एक तिहाई हिस्सा मिलेगा। 

पिता अवशिष्ट (रेसिड्यूल) है और उसे पति और माता को शेयर आवंटित करने के बाद शेष राशि मिलती है, जो 1/6 भाग होती है। 

यदि ऊपर उल्लिखित मुस्लिम व्यक्ति सुन्नी संप्रदाय से संबंधित है, तो उसकी मां को संपूर्ण संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा नहीं मिलेगा। बल्कि, उसे संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा मिलेगा, जो पति को हिस्सा देने के बाद बचेगा। अंतिम शेयर में निम्नलिखित होंगे- 

  • पति को आधा हिस्सा मिलेगा
  • माँ को आधे का 1/3 हिस्सा मिलेगा = 1/6
  • पिता को शेष हिस्सा मिलेगा, जो अंततः 1/3 होगा

लावारिस राजगामी संपत्ति (एस्कीट) का सिद्धांत

यदि किसी मुसलमान के पास अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं है, तो यह बताया गया है कि ऐसे देश में जो इस्लाम के कानून द्वारा शासित है, अर्थात ‘दार-उल-इस्लाम’ में यह संपत्ति ‘बैत-उल-माल’ में निहित होगी। हालाँकि, भारत में, चूंकि हम इस्लाम के कानून द्वारा शासित देश नहीं हैं। इसलिए, लावारिस राजगामी संपत्ति से हटने का कानून लागू हो जाएगा और ऐसी संपत्ति सरकार में निहित हो जाएगी। 

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रासंगिक प्रावधान

सम्पदा के प्रशासन की अवधारणा भारत में पहली बार अंग्रेजों द्वारा प्रोबेट और प्रशासन अधिनियम, 1881 के माध्यम से पेश की गई थी। इस अधिनियम को बाद में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया। सामान्य नियम के रूप में, इस अधिनियम के प्रावधान मुसलमानों पर लागू नहीं होते। हालाँकि, यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह करता है, तो ये प्रावधान लागू हो जाते हैं। 

निर्वसीयत उत्तराधिकार

अधिनियम का भाग पांच अंतरराज्यीय उत्तराधिकार से संबंधित है। अध्याय 2 में पारसियों के अलावा अन्य निर्वसीयत व्यक्तियों के मामलों में लागू नियमों का प्रावधान है। धारा 31 से 49 में नियमों का प्रावधान है। धारा 31 से 35 में सामान्य नियम दिये गये हैं। धारा 36 से 40 में वितरण के नियमों का प्रावधान है, जहां मृतक के वंशज हैं। धारा 41 से 49 में वितरण के नियमों का प्रावधान है, जहां कोई वंशज नहीं हैं। 

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत उत्तराधिकार की योजना इस प्रकार है- 

  • धारा 24 में सगोत्रीय संबंध या रक्त-संबंध को समान पूर्वज से उत्पन्न व्यक्तियों के बीच संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • धारा 25 में रैखिक रक्तसंबंध को दो व्यक्तियों के बीच के रिश्ते के रूप में परिभाषित किया गया है, जिनमें से एक दूसरे से सीधे वंश में आता है। उदाहरण के लिए, पिता, दादा और परदादा।
  • धारा 26 के अनुसार संपार्श्विक प्रेषण दो व्यक्तियों के बीच संबंध है जो एक ही पूर्वज के वंशज हैं, लेकिन उनमें से कोई भी दूसरे का प्रत्यक्ष वंशज नहीं है। उदाहरण के लिए, पिता के भाई का बेटा।
  • धारा 32 में संपत्ति के हस्तांतरण के नियम दिए गए हैं। मृतक की संपत्ति सबसे पहले उसकी पत्नी या पति या मृतक के रिश्तेदारों को हस्तांतरित होगी। 
  • धारा 33 के अनुसार, यदि मृतक अपने पीछे विधवा और – 
  1. यदि वह अपने पीछे कोई वंशज भी छोड़ गया है, तो 1/3 संपत्ति खिड़की को मिलेगी, और शेष वंशजों को मिलेगी 
  2. यदि कोई सीधा वंशज नहीं है, लेकिन ऐसे लोग हैं जो उसके रिश्तेदार हैं, तो विधवा को संपत्ति का आधा हिस्सा मिलेगा, और बाकी आधा उसके रिश्तेदारों को मिल सकता है 
  3. जहां कोई सगा-संबंधी न हो, वहां पूरी संपत्ति विधवा को मिलेगी।
  • धारा 34 उस स्थिति से संबंधित है जहां मृतक की कोई विधवा नहीं है, तो उसकी संपत्ति उसके वंशजों, वंशजों या सगे-संबंधियों को मिलेगी और उपर्युक्त वर्गों की अनुपस्थिति में यह सरकार को मिलेगी। जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह लावारिस राजगामी संपत्ति का सिद्धांत है। 

धारा 33 और 34 के तहत नियम विधुर के मामले में भी लागू होंगे।

वंशजों में वितरण

धारा 36 में कहा गया है कि विधवा के हिस्से की कटौती के बाद, हस्तांतरण के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाएगा। 

धारा 37 उस स्थिति से संबंधित है जहां मृतक अपने पीछे एक बच्चा या बच्चे छोड़ गया है, लेकिन मृतक बच्चे के माध्यम से कोई दूरस्थ वंशज नहीं है, एक बच्चे के मामले में, वह पूरी संपत्ति ले लेगा और एक से अधिक बच्चों के मामले में, यह उनके बीच समान रूप से विभाजित होगी।

धारा 38 उस स्थिति से संबंधित है जहां मृतक का कोई जीवित बच्चा नहीं है, लेकिन एक पोता है और मृतक पोते से कोई और वंशज नहीं है। फिर संपत्ति जीवित पोते या पोते-पोतियों की होगी, जो उनके बीच बराबर-बराबर विभाजित की जाएगी। 

उदाहरण के लिए: X के तीन बच्चे हैं, A, B और C। वे सभी पिता के मरने से पहले ही मर जाते हैं, A के मरने पर उसके दो बच्चे रह जाते हैं, B के तीन और C के चार। इसके बाद, एक्स की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है, तथा वह अपने पीछे उन नौ पोते-पोतियों को छोड़ जाता है, तथा किसी भी कम हुए पोते-पोती का कोई वंशज नहीं होता। उनके प्रत्येक पोते-पोती को 1/9 हिस्सा मिलेगा। 

वितरण जहां कोई वंशज नहीं हैं

धारा 41 के अनुसार यदि मृतक का कोई कानूनी वंशज नहीं है तो विधवा का हिस्सा काटने के बाद निम्नलिखित नियम लागू होंगे। 

धारा 42 के अनुसार, निर्वसीयत व्यक्ति का पिता जीवित है। उसे संपत्ति विरासत में मिलेगी।

धारा 43 में कहा गया है कि निर्वसीयत व्यक्ति का पिता मर चुका है, लेकिन उसकी माता और भाई या बहन जीवित हैं, तथा किसी भी मृतक भाई या बहन से उसकी कोई जीवित संतान नहीं है। फिर माँ और प्रत्येक जीवित भाई या बहन को बराबर हिस्सा मिलेगा। 

धारा 44 में कहा गया है कि जहां निर्वसीयतधारी के पिता की मृत्यु हो गई है, तथापि, माता जीवित है और भाई या बहन तथा किसी पूर्ववर्ती भाई या बहन के बच्चे भी जीवित हैं, तो माता तथा प्रत्येक जीवित भाई, बहन तथा मृतक भाई या बहन के जीवित बच्चे समान हिस्से में संपत्ति के हकदार होंगे। हालाँकि, बीमारी से पीड़ित बच्चे, भाई या बहन, केवल वही हिस्सा लेंगे, जो उनके माता-पिता लेते यदि वे उत्तराधिकार के समय जीवित होते है। 

उदाहरण के लिए: X, जो बिना वसीयत वाला है, अपनी मां, अपने भाइयों B और C को छोड़ जाता है, तथा अपनी मृत बहन D के एक बच्चे को, तथा E के दो बच्चों को छोड़ जाता है, जो कि सौतेला भाई है, जो कि उसके पिता का पुत्र था, लेकिन उसकी मां का नहीं है। माँ एक-पाँचवाँ हिस्सा लेती है, B और C प्रत्येक एक-पाँचवाँ हिस्सा लेते हैं, D का बच्चा एक-पाँचवाँ हिस्सा लेता है, तथा E के दोनों बच्चे शेष एक-पाँचवाँ हिस्सा आपस में बराबर-बराबर बाँट लेते हैं। 

धारा 46 में कहा गया है कि ऐसी स्थिति में जहां निर्वसीयत व्यक्ति के पिता की मृत्यु हो गई हो, तथापि मां जीवित हो और कोई भाई या बहन या ऐसे भाई या बहन के बच्चे जीवित न हों, तो संपत्ति मां की होगी। 

धारा 47 में कहा गया है कि ऐसे मामलों में जहां न तो कोई वंशज है, न ही पिता है और न ही माता है, संपत्ति उसके भाइयों और बहनों तथा उनमें से ऐसे लोगों के बच्चों के बीच विभाजित की जाएगी, जिनकी मृत्यु उससे पहले हो चुकी है। 

धारा 48 में कहा गया है कि जहां अंतरराज्यीय व्यक्ति का न तो कोई सीधा वंशज है, न ही माता-पिता, न ही भाई, न ही बहन, तो उसकी संपत्ति उसके निकटतम रिश्तेदार के बीच समान रूप से मांगी जाएगी। 

उदाहरण के लिए: X, जो निर्वसीयत है, अपने पीछे एक दादा, एक दादी छोड़ गया है तथा उसके समान या उससे निकटतर कोई अन्य रिश्तेदार नहीं है। वे, द्वितीय श्रेणी में होने के कारण, समान हिस्से में संपत्ति के हकदार होंगे, जिसमें निर्वसीयत व्यक्ति के चाचा या चाची शामिल नहीं होंगे, चाचा और चाची केवल तृतीय श्रेणी में होंगे। 

अधिनियम की प्रथम अनुसूची में रक्त-संबंध की तालिका दी गई है। इसमें पिता, पुत्र और पौत्र के साथ प्रथम पीढ़ी में आते हैं, तथा दादा, परपौत्र के साथ द्वितीय पीढ़ी में आते हैं। परदादा चौथी पीढ़ी में आते हैं और परदादा चाचा पांचवीं पीढ़ी में आते हैं। 

मृतक की संपत्ति के विरुद्ध तथा उसकी ओर से कानूनी कार्रवाई

अधिनियम का भाग सात मृतक की संपत्ति के संरक्षण से संबंधित है; धारा 192 से 210 इसी भाग के अंतर्गत आते हैं। 

धारा 192, उस व्यक्ति को, जो उत्तराधिकार के आधार पर रोग की संपत्ति का दावा करता है, किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गलत कब्जे के विरुद्ध राहत के लिए न्यायालय में जाने का अधिकार प्रदान करती है। जहां संपत्ति स्थित है, वहां के जिला न्यायाधीश के समक्ष आवेदन किया जा सकता है, या तो वास्तविक स्थिति का पता लगने के बाद या जब कब्जा जब्त करने के लिए बल प्रयोग किए जाने की आशंका हो। 

अधिनियम का भाग आठ उत्तराधिकार पर मृतक की संपत्ति के प्रतिनिधि अधिकार से संबंधित है। धारा 211 से 216 इस भाग के अंतर्गत आती हैं। 

धारा 211 निष्पादक या प्रशासक के चरित्र की घोषणा करती है, ऐसे व्यक्ति को मृतक का विधिक प्रतिनिधि माना जाता है तथा मृत व्यक्ति की सारी संपत्ति उसमें निहित मानी जाती है। हालाँकि, उपधारा (2) के अनुसार, यदि संपत्ति मुसलमानों के मामले में लागू व्यक्तिगत कानून के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर थी, तो ऐसी संपत्ति निष्पादक या प्रशासक में निहित नहीं होगी। 

धारा 212 में यह प्रावधान है कि मृतक की संपत्ति के किसी भी हिस्से के संबंध में कोई अधिकार तब तक न्यायालय में स्थापित नहीं किया जा सकता जब तक कि न्यायालय द्वारा प्रशासनिक पत्र प्रदान नहीं कर दिया जाता। 

धारा 213 में कहा गया है कि कोई व्यक्ति किसी न्यायालय में निष्पादक या वसीयतकर्ता के रूप में तब तक कोई अधिकार स्थापित नहीं कर सकता जब तक कि सक्षम न्यायालय ने ऐसी वसीयत का प्रोबेट प्रदान न कर दिया हो या वसीयत के साथ प्रशासनिक पत्र प्रदान न कर दिया हो। 

धारा 214 में प्रावधान है कि प्रतिनिधि हक साबित करना किसी भी ऋण की वसूली के लिए एक पूर्व शर्त होगी, चाहे वह ऋण मृतक से या मृतक को देय हो। 

इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी न्यायालय,

  • मृतक के ऋणी के विरुद्ध डिक्री पारित करना ताकि ऐसे ऋण का भुगतान उत्तराधिकार पर दावा करने वाले व्यक्ति को किया जा सके
  • ऐसे देनदार के विरुद्ध मृतक को देय ऋण के भुगतान के लिए डिक्री निष्पादित करने के लिए उत्तराधिकार पर हकदार होने का दावा करने वाले व्यक्ति के आवेदन पर आगे बढ़ना हैं।

जब तक दावा करने वाला व्यक्ति यह प्रस्तुत न करे-

  • किसी सक्षम न्यायालय द्वारा दिया गया प्रोबेट या प्रशासन पत्र
  • प्रशासक सामान्य अधिनियम 1963 की धारा 31 या धारा 32 के तहत प्रमाण पत्र
  • भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के भाग X के अंतर्गत प्रदान किया गया उत्तराधिकार प्रमाणपत्र 

धारा 216 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक बार किसी व्यक्ति को प्रोबेट या प्रशासन पत्र प्रदान कर दिया गया है, तो किसी अन्य व्यक्ति को तब तक कोई मुकदमा चलाने या अभियोजन चलाने या मृतक के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने का अधिकार नहीं होगा, जब तक कि प्रोबेट या प्रशासन पत्र को वापस नहीं ले लिया जाता या रद्द नहीं कर दिया जाता हैं। 

अधिनियम का भाग नौ, प्रोबेट प्रशासनिक पत्रों और मृतक की परिसंपत्तियों के प्रशासन से संबंधित है। भाग का अध्याय 1 संभावित प्रशासनिक पत्रों के अनुदान से संबंधित है। धारा 218 से धारा 236A इस भाग के अंतर्गत आती हैं।

धारा 218 में उन व्यक्तियों के बारे में बताया गया है जिन्हें प्रशासनिक पत्र प्रदान किया जा सकता है। यदि मृतक व्यक्ति की मृत्यु राज्य में हुई है और वह हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख या जैन था। संपत्ति के प्रशासन पत्र किसी भी व्यक्ति को प्रदान किए जा सकते हैं जो मृतक के मामले में लागू वितरण नियमों के अनुसार उसकी संपत्ति के हिस्से का हकदार होगा। 

धारा 220 ऐसे प्रशासन पत्रों के अनुदान के प्रभाव को स्पष्ट करती है। इनके तहत प्रशासक को उन सभी अधिकारों का हकदार बनाया गया जो उसकी मृत्यु से पहले अंतरराज्यीय प्रशासन के पास थे। 

धारा 222 में कहा गया है कि प्रोबेट केवल उस निष्पादक को ही प्रदान किया जा सकता है जिसे वसीयत द्वारा नियुक्त किया गया हो, यह नियुक्ति या तो व्यक्त की जा सकती है या आवश्यक निहितार्थ द्वारा की जा सकती है। 

किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा धर्मत्याग के मामले में परिणाम

जिस क्षण कोई मुस्लिम व्यक्ति धर्मत्याग करता है, उसे इस्लामी राष्ट्र से बहिष्कृत कर दिया जाता है, तथा उसके सभी अधिकार, हित, स्थिति और संबंध स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इस्लामी कानून में इस्लाम से धर्मत्यागी और मूलतः गैर-मुस्लिम को समान दृष्टि से देखा जाता है। यदि कोई मृतक मुसलमान अपने पीछे तीन उत्तराधिकारी छोड़ जाता है, जिनमें से पहला गैर-मुस्लिम, दूसरा धर्मत्यागी और तीसरा मुसलमान हो, तो मुस्लिम कानून के अनुसार, पहले दो को उत्तराधिकार से बाहर रखा जाएगा और उत्तराधिकार तीसरे वर्ष तक चलेगा, भले ही वह निकटता की दृष्टि से सबसे दूर क्यों न हो। इससे स्पष्ट है कि धर्मत्यागी को अपने मुस्लिम पूर्वजों की सम्पत्ति के उत्तराधिकार से वंचित रखा जाता है। इसके अलावा, यदि हम उस मामले पर विचार करें जहां मृत व्यक्ति ने इस्लाम से दूसरे धर्म को अपना लिया है, तो विधिवेत्ता अमीर अली ने ‘फतवा-ए-आलमगीरी’ से उद्धृत किया है कि सुन्नी कानून के तहत, एक मुसलमान को गैर-मुस्लिम से विरासत नहीं मिलती है, और न ही एक गैर-मुस्लिम को मुसलमान से विरासत मिलती है। इसी प्रकार, डॉ. आबिद हसन के अनुसार, उत्तराधिकार के इस्लामी नियमों के अनुसार, कोई मुसलमान किसी काफिर का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता, और न ही कोई काफिर किसी मुसलमान का उत्तराधिकारी हो सकता है। हालाँकि, भारत में यह नियम जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम 1850 के बाद लागू नहीं हो सकता है।

प्रासंगिक कानूनी मामले 

कृष्णा दास चौधरी बनाम प्रबीन रहमान हजारिका (2015)

इस मामले में, यह प्रश्न उठा कि यदि पिता अपनी मृत्यु से पहले हिंदू बन गया हो तो क्या निकाह से पैदा हुई संतान को उसकी मृत्यु पर उसकी संपत्ति विरासत में मिलेगी। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने इस्लामी कानून में स्थापित स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि कोई मुसलमान किसी काफिर का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता, और न ही कोई काफिर किसी मुसलमान का उत्तराधिकारी हो सकता है। इसलिए, जब कोई धर्मत्यागी हिंदू धर्म अपनाने के बाद मर जाता है, तो उसकी मृत्यु के समय उस पर हिंदू कानून लागू होगा। इसलिए, उनकी संपत्ति का उत्तराधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 द्वारा शासित होगा। इसलिए, यह माना गया कि उत्तराधिकार धर्म की परिधि से बाहर नहीं होता है।

रुक्मणि बाई बनाम बिस्मिलवाई (1992)

इस मामले में, मृतक ने अपने भविष्य निधि और ईडीएलआई लाभ में एक निश्चित राशि छोड़ी थी। अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने हिन्दू धर्म से इस्लाम धर्म अपना लिया था। प्रतिवादी की पुत्री ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के अंतर्गत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रदान करने के लिए आवेदन किया था। मृतक की भतीजी अपीलकर्ता ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 384 के तहत प्रतिवादी को प्रमाण पत्र देने के अदालत के फैसले के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। अपीलकर्ता ने प्रतिवादी को चुनौती दी और अनुदान का दावा स्वयं के लिए किया। न्यायालय ने पाया कि मृतक ने वास्तव में इस्लाम धर्म अपना लिया था और प्रतिवादी, उसकी पुत्री होने के नाते, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की पात्र थी। न्यायालय ने कहा कि, मोहम्मडन कानून के सिद्धांतों के अनुसार, किसी विपरीत प्रथा के अभाव में, इस्लाम में धर्मांतरित व्यक्ति का उत्तराधिकार इस्लामी कानूनों द्वारा शासित होता है। इसके अलावा, इसने मितर सेन सिंह बनाम मकबूल रसन खान (1930) के मामले में स्थापित मिसाल का हवाला दिया, जहां प्रिवी काउंसिल ने माना था कि जब कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलता है, तो उसके व्यक्तिगत कानून बदल जाते हैं, और नया कानून उस पर और उसके बच्चों पर समान रूप से लागू होता है। अदालत ने कहा कि कोई अवशेष राशि नहीं है, और इस प्रकार बेटी मुस्लिम कानून की धारा 66 के तहत अपने हिस्से और अवशेष राशि के हिस्से की हकदार है। इसलिए, अदालत ने माना कि प्रतिवादी कानूनी रूप से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने का हकदार था, और अपीलकर्ता के पक्ष में योग्यता की कमी के कारण, अपील को खारिज कर दिया गया था।

रिजिया बीबी और अन्य बनाम अब्दुल कचेम और अन्य (2013)

इस मामले में, अब्दुल खालिक द्वारा निष्पादित वसीयत के संबंध में प्रश्न उठा था। वादी पहली पत्नी और उससे उत्पन्न पुत्र हैं तथा प्रतिवादी दूसरी पत्नी तथा उसकी पुत्री और पुत्र हैं। मृतक अपने पीछे 3.25 एकड़ जमीन छोड़ गया। वादीगण ने भूमि के विभाजन का दावा किया, जिसे प्रतिवादियों ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि संपत्ति वसीयत में उन्हें दी गई थी। न्यायालय ने मुस्लिम कानून के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत शून्य और निष्क्रिय है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि मुस्लिम वसीयत द्वारा वसीयत एक निर्धारित सीमा के भीतर होनी चाहिए, एक सक्षम उत्तराधिकारी होना चाहिए तथा वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारियों की सहमति प्राप्त होनी चाहिए। 

एक मुसलमान अपनी संपत्ति अपने उत्तराधिकारी के पक्ष में दे सकता है, बशर्ते कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति ली जाए। जब उत्तराधिकारी लंबे समय तक ऐसी वसीयत पर सवाल नहीं उठाते, तो इसे सहमति माना जाता है। इसके अलावा, मुस्लिम कानून अंतिम संस्कार व्यय और ऋण के भुगतान के बाद अधिशेष के 1/3 से अधिक संपत्ति को वसीयत करने की वसीयतकर्ता की शक्ति को सीमित करता है। यहां, वसीयत अनुमेय सीमा से अधिक हो जाती है, जिससे वसीयत अमान्य हो जाती है और वादी को उनके उचित हिस्से से वंचित कर दिया जाता है। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 14 के प्रकाश में मुस्लिम कानून के तहत लिंग भेदभावपूर्ण प्रावधानों की वैधता

भारत का संविधान अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार की गारंटी देता है, जो लिंग, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव को रोकता है। अनुच्छेद 13(3)(a) “कानून” को परिभाषित करता है, इस अनुच्छेद के अनुसार, कानून में कोई भी अध्यादेश, आदेश, उप-कानून, नियम, विनियमन, अधिसूचना, प्रथा या प्रचलन शामिल है। कानून की इस परिभाषा को व्यापक अर्थ दिया गया है ताकि इसे राज्य के विविध साधनों पर लागू किया जा सके। इस प्रावधान के अंतर्गत ‘कानून’ के दायरे के बारे में प्रश्न उठता है। 

यद्यपि भारत का संविधान 1950 में ही लागू हुआ, परन्तु विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानून बहुत पहले से अस्तित्व में हैं। ये व्यक्तिगत कानून निजी प्रकृति के विषयों, जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि को नियंत्रित करते हैं। अनुच्छेद 13 (1) ग्रहण के सिद्धांत का प्रावधान करता है, जिसके अनुसार “इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के क्षेत्र में लागू सभी कानून, जहां तक वे इस भाग के प्रावधानों के साथ असंगत हैं, ऐसी असंगतता की सीमा तक शून्य होंगे।” 

भारत के संविधान के लागू होने के बाद से, भारत के सर्वोच्च न्यायालय को दोनों चरम सीमाओं के बीच एक संतोषजनक समझौता करने की दुविधा का सामना करना पड़ा है। एक ओर व्यक्तिगत कानून और धार्मिक प्रथाएं, तो दूसरी ओर भारतीय संविधान का भाग 3 मौलिक अधिकारों से संबंधित है। 

इस प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनेक निर्णयों में चर्चा की गई है, उनमें से कुछ पर यहां चर्चा की गई है, ताकि स्थिति को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इस मुद्दे से निपटने वाला पहला मामला बॉम्बे राज्य बनाम नरसु अप्पा माली (1951) था, जहां बॉम्बे हिंदू द्विविवाह निवारण अधिनियम 1946 की वैधता पर सवाल उठाया गया था। इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 के विपरीत बताया गया था। बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न उठा कि क्या हिंदुओं, मुसलमानों और अन्य समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को संविधान के अनुच्छेद 13(3) और अनुच्छेद 372(3) के अर्थ में ‘कानून’ माना जाएगा। उच्च न्यायालय ने माना कि पर्सनल लॉ को अनुच्छेद 13 के तहत ‘कानून’ शब्द के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है, न ही वे अनुच्छेद 372 के तहत ‘प्रचलित कानून’ हैं। 

इसके अलावा, यह माना गया कि व्यक्तिगत कानून अनुच्छेद 13 के तहत लागू कानून नहीं होंगे क्योंकि वे धार्मिक और प्रथागत प्रथाओं द्वारा समर्थित हैं, और भारत के संविधान के भाग 3 में निहित सिद्धांतों को व्यक्तिगत कानूनों पर लागू नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि धार्मिक आस्था, विश्वास और धार्मिक प्रथाओं के बीच अंतर किया जाना चाहिए। राज्य धार्मिक आस्था और विश्वास की रक्षा करता है, और यदि कोई विशेष धार्मिक प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य कल्याण के विरुद्ध है, तो ऐसी प्रथा संरक्षण के दायरे से बाहर होगी। अहमदाबाद, महिला एक्शन ग्रुप बनाम भारत संघ (1977) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों आदि के व्यक्तिगत कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत ‘कानून’ की परिभाषा का हिस्सा नहीं हैं।

वर्तमान में, व्यक्तिगत कानूनों पर अनुच्छेद 13 की प्रयोज्यता के प्रश्न पर नरसु अप्पा माली निर्णय एक अच्छा कानून बना हुआ है। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में हमने इस प्रश्न पर विभिन्न न्यायालयों की भिन्न-भिन्न राय देखी है। एक ओर, कृष्ण सिंह बनाम मथुरा अहीर (1979) जैसे मामलों में ‘हस्तक्षेप न करने’ के सिद्धांत को अपनाया गया है, जिसमें यह माना गया है कि भारत के संविधान के भाग 3 का व्यक्तिगत कानूनों पर कोई प्रभाव नहीं होगा और इसलिए नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों के विरुद्ध व्यक्तिगत कानूनों का परीक्षण करने से इनकार कर दिया गया है। दूसरी ओर, डैनियल लतीफी बनाम भारत संघ (1986) जैसे मामलों में, अदालतों ने ‘समीक्षा दृष्टिकोण’ अपनाया है और भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों की कसौटी पर व्यक्तिगत अधिकारों का परीक्षण किया है। 

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का प्रभाव

समान नागरिक संहिता लाने की आवश्यकता सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में व्यक्त की गई है, जिनमें लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000) और मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) शामिल हैं। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि संसद को समान नागरिक संहिता स्थापित करने के लिए कदम उठाने चाहिए। ऐसे कई मामले हैं जहां व्यक्तिगत कानून भारत के संविधान में निहित मौलिक सिद्धांतों के साथ टकराव में आते हैं। इस स्थिति को सुधारने तथा कानूनों की प्रयोज्यता में एकरूपता लाने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया जाता रहा है। 

उत्तराखंड राज्य में समान नागरिक संहिता के तहत उत्तराधिकार के मुस्लिम कानून में बदलाव किए गए

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता 2024 (जिसे आगे यूसीसी कहा जाएगा) लागू करने वाला भारत का पहला राज्य है। समान नागरिक संहिता से पहले, उत्तराखंड में उत्तराधिकार कानून संबंधित पक्षों के धर्म के अनुसार अलग-अलग थे, जैसा कि भारत के अन्य भागों में प्रचलित था। हालाँकि, अब यह उन सभी भारतीय नागरिकों पर लागू होगा जो पिछले 15 वर्षों से उत्तराखंड के स्थायी निवासी हैं। इसने अंतरराज्यीय उत्तराधिकार के लिए एक नई व्यवस्था शुरू की है। हालाँकि, यदि कोई वसीयत है, तो उत्तराधिकार पर समान नागरिक संहिता कानून लागू नहीं होगा।

  1. निश्चित शेयरों को हटाना- पारंपरिक मुस्लिम कानून के तहत, शेयरों का एक निश्चित अनुपात सूचीबद्ध किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप असमान वितरण हुआ जो पुरुषों के पक्ष में था। अब, यूसीसी के तहत कोई निश्चित शेयर उपलब्ध नहीं कराये जाते। यह अब व्यक्तियों को निश्चित अनुपात का पालन किए बिना स्वतंत्र रूप से संपत्ति वितरित करने की अनुमति देता है; उदाहरण के लिए, वसीयत द्वारा दी गई संपत्ति के 1/3 भाग की सीमा अब समाप्त कर दी गई है।
  2. उत्तराधिकार की नई व्यवस्था- यूसीसी के तहत बिना वसीयत के मरने वाले मुसलमानों के संबंध में उत्तराधिकार का सामान्य नियम स्थापित किया गया है। इसमें अब उत्तराधिकारियों की दो श्रेणियों, वर्ग 1 और वर्ग 2, के साथ-साथ अन्य रिश्तेदारों की दो अवशिष्ट श्रेणियों का प्रावधान किया गया है। यह निश्चित शेयरों के मुस्लिम कानून नियम से विचलन का प्रतीक है। 
  3. लिंगों के बीच समानता- मुस्लिम कानून के तहत पुरुषों के समान वर्ग में आने वाली महिलाओं को पुरुषों के आधे हिस्से का हक था। अब समान नागरिक संहिता मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम पुरुषों के समान संपत्ति पर समान अधिकार देती है। 

निष्कर्ष

भारत में मुसलमानों के लिए उत्तराधिकार अधिनियम एकल नहीं है, बल्कि कई अलग-अलग कानूनों का एक संयोजन है। वे जिस संप्रदाय से संबंधित हैं उसके अनुसार लोगों पर अलग-अलग तरीके से लागू होते हैं। उत्तराधिकार के सुन्नी और शिया कानूनों में कई अंतर हैं, जिन पर इस लेख में चर्चा की गई है। इसके अलावा, यह महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम कानून के सामान्य सिद्धांत पूरे समुदाय पर समान रूप से लागू होते हैं। ये कानून पूरी तरह से संहिताबद्ध नहीं हैं, लेकिन वे उन रीति-रिवाजों और प्रथाओं का परिणाम हैं जिनका पालन दुनिया भर में इस्लामी समुदाय में सदियों से किया जाता रहा है। वसीयत और निर्वसीयत उत्तराधिकार दोनों अलग-अलग हैं और विरासत के हस्तांतरण के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं का पालन करते हैं। मुस्लिम कानून के तहत वसीयत की अवधारणा भी इस पर लगाई गई सीमाओं के कारण बहुत अनोखी है। निष्कर्ष के तौर पर, यह कहा जा सकता है कि मुस्लिम कानून के तहत उत्तराधिकार का कानून एक सावधानीपूर्वक डिजाइन किया गया और जटिल रूप से सोचा गया ढांचा है जो विभिन्न आकस्मिकताओं के तहत सभी सदस्यों के शेयरों को निर्दिष्ट करता है। हिंदू कानून के विपरीत, इस प्रक्रिया में आजादी के बाद से ज्यादा बदलाव नहीं आया है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

मुस्लिम और हिंदू कानून के बीच उत्तराधिकार के कानून में प्रमुख अंतर क्या हैं?

मुख्तार अहमद बनाम महमूदी खातून (2010) के मामले में, झारखंड उच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानून के तहत संयुक्तता की अवधारणा से संबंधित प्रश्न पर चर्चा की है। न्यायालय ने उत्तराधिकार कानून की अवधारणा का उल्लेख किया, जैसा कि ताहिर महमूद ने अध्याय 12 में मुस्लिम कानून, ज्ञात और अज्ञात अवधारणाएं शीर्षक के अंतर्गत चर्चा की है। 

इसमें कहा गया कि उत्तराधिकार का मुस्लिम कानून भारत की समानांतर स्वदेशी प्रणाली से अलग है। जन्म से अधिकार का सिद्धांत, जो हिंदू कानून के तहत उत्तराधिकार के कानून का आधार है, मुस्लिम कानून के लिए अज्ञात है। इस्लाम के अंतर्गत उत्तराधिकार प्रक्रिया शास्त्रीय दयभाग कानून के करीब है, लेकिन फिर भी इसमें मौलिक अंतर हैं। 

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि संपत्ति का बाधित और निर्बाध विरासत तथा स्व-अर्जित और पैतृक संपत्ति में विभाजन मुस्लिम कानून के लिए विदेशी है। मुस्लिम कानून के तहत किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों या अन्य लोगों से जो भी संपत्ति विरासत में मिलती है, वह उसकी पूर्ण संपत्ति होती है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी लिंग का हो। मुस्लिम कानून के अनुसार, जब तक व्यक्ति जीवित है, वह अपनी संपत्ति का पूर्ण मालिक है और उसके बेटे सहित किसी अन्य व्यक्ति को उस पर कोई अधिकार नहीं है। उनकी मृत्यु के बाद ही उत्तराधिकारियों के कानूनी अधिकारों का प्रश्न उठता है। 

इसके अलावा, अविभाजित परिवार, सहदायिकता, कर्ता-धर्ता, उत्तरजीविता और विभाजन जैसी संयुक्त हिंदू परिवार अवधारणाओं का मुस्लिम कानून में कोई स्थान नहीं है, जहां एक साथ रहने वाले पिता और पुत्र संयुक्त परिवार का गठन नहीं करते हैं। 

इसके अलावा, मुस्लिम कानून के तहत, किसी व्यक्ति का लिंग संपत्ति के उत्तराधिकार में कोई बाधा नहीं है, जबकि पारंपरिक हिंदू कानून में ऐसा था। किसी महिला के मामले में केवल लिंग के आधार पर उत्तराधिकार से कोई बहिष्कार नहीं किया जा सकता है तथा उन्हें पुरुषों के समान स्वतंत्र रूप से उत्तराधिकार प्राप्त करने का समान अधिकार दिया गया है। उन्हें केवल भरण-पोषण प्राप्त करने का प्रतिबंधित अधिकार या भरण-पोषण के बदले में संपत्ति रखने का अधिकार नहीं दिया गया है, जैसा कि पारंपरिक हिंदू कानून के तहत मौजूद था। मुस्लिम कानून में न तो स्त्रीधन की अवधारणा है और न ही किसी महिला की मृत्यु के बाद उसके सीमित राज्य को दूसरों को सौंप दिए जाने की अवधारणा है। 

क्या गोद लिए गए बच्चों को मुस्लिम कानून के तहत कानूनी उत्तराधिकारी माना जाता है?

मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार गोद लेने की अनुमति नहीं है। वे अभिभावक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत बच्चे की संरक्षकता प्राप्त कर सकते हैं। मोहम्मद इलाहाबाद खान बनाम मोहम्मद इस्माइल (1886) के मामले में यह माना गया कि मुस्लिम कानून में हिंदू प्रणाली में मान्यता प्राप्त दत्तक ग्रहण के समान कुछ भी नहीं है। मुस्लिम कानून के तहत ‘पितृत्व की स्वीकृति’ दत्तक ग्रहण की सबसे निकटतम प्रक्रिया है। जहां कोई मुसलमान किसी बच्चे को अपना वैध बच्चा मानता है, उस बच्चे का पितृत्व उस पर स्थापित हो जाता है, तथापि, इसका उपयोग किसी ऐसे बच्चे को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता है जिसे नाजायज माना जाता है।

हालाँकि, हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने शबनम हाशमी बनाम भारत संघ (2014) के ऐतिहासिक फैसले में किशोर न्याय अधिनियम 2015 के प्रावधानों के तहत मुसलमानों को भी गोद लेने का अधिकार दिया है। 

मुस्लिम कानून के तहत हिबा की अवधारणा क्या है?

हिबा शब्द अरबी मूल का है और इसका शाब्दिक अर्थ उपहार है। मुस्लिम कानून के तहत, जब कोई जीवित व्यक्ति स्वेच्छा से संपत्ति का स्वामित्व किसी अन्य जीवित व्यक्ति को हस्तांतरित करता है, तो उसे हिबा कहा जाता है। यह पूर्ण हित का हस्तांतरण है और उपहार में दी गई संपत्ति में अधिकारों का कोई भी प्रतिबंधात्मक शर्त या आंशिक हस्तांतरण मुस्लिम कानून के तहत हिबा की अवधारणा के विपरीत है। हिबा के रूप में हस्तांतरित संपत्ति हस्तांतरण के समय अस्तित्व में होनी चाहिए और भविष्य में मौजूद संपत्ति का कोई भी हस्तांतरण शून्य होगा। यह अंतर-जीव हस्तांतरण है और यह पक्षकारों के कार्यों द्वारा किया जाता है, न कि कानून के संचालन द्वारा किया जाता है। 

संदर्भ

ऑस्टिन की संप्रभुता का सिद्धांत

यह लेख Anubhav Garg द्वारा लिखा गया है और Shefali chitkara द्वारा आगे अद्यतन (अपडेट) किया गया है। इस लेख में संप्रभुता (सोवरेंटी) के सिद्धांत जो जॉन ऑस्टिन द्वारा दिया गया था का गहन विश्लेषण शामिल है । यह हमारे देश की राजनीतिक और कानूनी प्रणाली को देखते हुए इस सिद्धांत की प्रासंगिकता को भी शामिल करता है। लेख इस सिद्धांत के पिता जॉन ऑस्टिन के बारे में संक्षिप्त विवरण के साथ शुरू होता है। यह आगे कानून की विश्लेषणात्मक या सकारात्मक विचारधारा पर चर्चा करता है और इस सिद्धांत की उत्पत्ति, महत्व और आलोचना को भी शामिल करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

संप्रभुता एक ऐसी प्रणाली है जिसमें राष्ट्र को चलाने के लिए एक सर्वोच्च और स्वतंत्र प्राधिकरण होता है। यह राज्य का वह घटक है जो इसे अन्य राजनीतिक अधिकारियों से अलग करता है क्योंकि एक संप्रभु राज्य में, केवल एक सर्वोच्च प्राधिकरण होता है। इसका मतलब है कि राज्य किसी अन्य राज्य या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन पर निर्भर नहीं है। रोमन साम्राज्य को एक ऐतिहासिक बिंदु माना जा सकता है जहां से संप्रभुता का विश्लेषण शुरू हुआ। उस समय, न्यायविदों ने “इम्पीरियम का सिद्धांत” बनाया और पाया कि कानून का स्रोत ‘राजा की इच्छा’ है। इस सिद्धांत को धीरे-धीरे राज्य की शक्ति और उसके कार्यों के साथ विकसित किया गया था।

हॉब्स और बेंथम से, इस सिद्धांत के पीछे का कानूनी विचार जॉन ऑस्टिन तक पहुंचा और उन्होंने एक सटीक शब्दावली बनाई और “संप्रभुता का सिद्धांत” प्रतिपादित (प्रोपाउंड) किया।

ऑस्टिन के शब्दों में, “कानून प्रतिबंध द्वारा समर्थित एक संप्रभु की आज्ञा है”। इस परिभाषा ने संप्रभुता के सिद्धांत का आधार बनाया है। इसमें इस सिद्धांत के तीन आवश्यक घटकों का उल्लेख किया गया है, अर्थात, आदेश, संप्रभु और प्रतिबंध जिनकी चर्चा नीचे की गई है। ऑस्टिन के शब्दों में, यदि एक श्रेष्ठ मानव किसी दिए गए समाज में लोगों के समूह से आदतन आज्ञाकारिता प्राप्त करता है, तो वह श्रेष्ठ समाज में संप्रभु हो जाता है, और उस समाज को एक राजनीतिक और स्वतंत्र समाज के रूप में जाना जाता है।

आइए अब हम संप्रभुता के सिद्धांत से निपटने से पहले जॉन ऑस्टिन के बारे में संक्षिप्त विवरण देखें।

जॉन ऑस्टिन (1790-1859) के बारे में एक संक्षिप्त विवरण

जॉन ऑस्टिन, जो यूनाइटेड किंगडम में पैदा हुए थे, को कानून की विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) विचारधारा के पिता और संस्थापक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने “न्यायशास्त्र का प्रांत निर्धारित” नामक एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी है और उन्हें संप्रभुता और कानूनी प्रत्यक्षवाद (पॉजिटिविजम) के सिद्धांत के लिए भी जाना जाता है। वह शुरू में पांच साल के लिए सेना में थे और यूनाइटेड किंगडम के चांसरी बार का भी हिस्सा थे।

उन्हें न्यायशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था और लंदन विश्वविद्यालय में न्यायशास्त्र पढ़ाया गया था। उन्होंने जर्मनी में दो साल बिताए और प्राचीन नागरिक कानून और रोमन कानून का अध्ययन किया और अंततः उन्हें कानून की सकारात्मक विचारधारा के बारे में अपनी विचारधाराओं को बनाने में मदद मिली। उन्होंने विभिन्न पदों पर सरकार के लिए पढ़ाया और काम किया। दुर्भाग्य से, 1859 में यूनाइटेड किंगडम में उनकी मृत्यु हो गई।

संप्रभुता की तुलना में कानून का विश्लेषणात्मक या सकारात्मक विचारधारा

कानून की विश्लेषणात्मक विचारधारा ने प्राकृतिक कानून सिद्धांत को चुनौती दी और कहा कि कानून एक संप्रभु प्राधिकरण से उत्पन्न हुए हैं और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं। प्राकृतिक कानून सिद्धांत के महत्व खोने के बाद 19 वीं शताब्दी में यह विचारधारा उभरी। इसने इस बात के बीच अंतर करने की कोशिश की कि वर्तमान में कानून कैसे मौजूद है और यह सही अर्थों में कैसा होना चाहिए। विश्लेषणात्मक विचारधारा मूल रूप से जेरेमी बेंथम द्वारा स्थापित किया गया था। इसे आगे जॉन ऑस्टिन द्वारा विकसित किया गया था जिन्होंने संप्रभुता का सिद्धांत दिया था जो कानून की विश्लेषणात्मक विचारधारा का एक हिस्सा है। बेंथम और ऑस्टिन को अक्सर कानून के विश्लेषणात्मक विचारधारा के संस्थापक के रूप में माना जाता है। कानून की विश्लेषणात्मक विचारधारा या प्रत्यक्षवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में योगदान देने वाले अन्य विद्वान शेल्डन एमन्स, सर विलियम्स मार्कबी, हॉलैंड, सैल्मंड और हार्ट हैं।

कानून के विश्लेषणात्मक विचारधारा के चार सिद्धांत हैं। य़े निम्नलिखित हैं:

  • कानून मानव इच्छा का एक उत्पाद है,
  • हर कानून में आज्ञा, संप्रभु और प्रतिबंध होती है,
  • विश्लेषणात्मक विचारधारा सकारात्मक कानून पर केंद्रित है, और
  • कानून नैतिकता से अलग है।

जेरेमी बेंथम ने भी अपने सिद्धांत में संप्रभुता और आदेश के महत्व पर जोर दिया। हालांकि, विश्लेषणात्मक विचारधारा में बेंथम के सिद्धांत ने जॉन ऑस्टिन के विपरीत प्रतिबंधों पर कम जोर दिया। इसके अलावा, ऑस्टिन के कानून के सिद्धांत ने “कानून ठीक से तथाकथित” और “कानून अनुचित तरीके से तथाकथित” के बीच अंतर किया। उचित कानून वे हैं जो प्राधिकरण में व्यक्ति द्वारा लगाए जाते हैं और अनुचित कानून वे होते हैं जो सादृश्य द्वारा लगाए जाते हैं और राज्य द्वारा स्वीकृत नहीं होते हैं। उचित कानूनों को आगे तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है- मानव कानून, भगवान के नियम और सकारात्मक कानून। उन्होंने अनुचित कानूनों को भी दो प्रकारों में विभाजित किया- सादृश्य द्वारा कानून और रूपक द्वारा कानून।

संप्रभुता का सिद्धांत

संप्रभु एक ऐसा राज्य है जो स्वतंत्र है। संप्रभुता जिसे अंग्रेजी में सोवरेंटी कहते हैं एक लैटिन शब्द “सुपरनस” से लिया गया है जिसका अर्थ है सर्वोच्च। औपनिवेशिक (कोलोनियल)  शक्तियों के पहले के शासन के विपरीत संप्रभुता नागरिकों के मामलों में एक पूर्ण स्वतंत्रता है। यदि कोई देश संप्रभु है, तो वह खुद के लिए चुनने के लिए स्वतंत्र है कि कैसे शासित किया जाए, किसे शासक बनाया जाए और आंतरिक और बाहरी मामलों को विनियमित करने वाली समग्र नीतियां क्या हैं।

यदि कोई राष्ट्र संप्रभु है, तो यह किसी देश पर बाहरी नियंत्रण और दबाव का विरोध करता है। उदाहरण के लिए, भारत एक संप्रभु राष्ट्र है जैसा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में भी स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है। जो देश संप्रभु हैं, उनसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने और लोगों के हित में नीतियां बनाने की अपेक्षा की जाती है, न कि किसी बाहरी विदेशी दबाव के अनुसार।

जॉन ऑस्टिन ने कानून को “प्रतिबंध द्वारा समर्थित संप्रभु का एक आदेश” के रूप में परिभाषित किया। कानून की इस समझ के आधार पर, उन्होंने संप्रभुता के अपने सिद्धांत को विकसित किया। उनके सिद्धांत के अनुसार, कानून संप्रभु की आज्ञा है और कोई नैतिक सिद्धांत नहीं है। उनका सिद्धांत इस आधार पर आधारित था कि यदि एक निर्धारित मानव श्रेष्ठ समाज में लोगों से आदतन आज्ञाकारिता प्राप्त करता है, तो उसे संप्रभु माना जाता है और समाज राजनीतिक और स्वतंत्र होता है। कानून की वैधता संप्रभु के आदेश से ली गई है न कि किसी नैतिक मूल्यों के पालन के माध्यम से। इस सिद्धांत को निरपेक्ष (एब्सोल्यूट) सिद्धांत या अद्वैतवादी सिद्धांत या गैर-बहुलवादी (नॉन प्लूरेलिस्टिक) या संप्रभुता के एकल सिद्धांत के रूप में भी जाना जाता है।

इस परिभाषा में तीन आवश्यक घटक जो ऊपर वर्णित हैं, उन्हें नीचे समझाया और गंभीर रूप से विश्लेषण किया गया है।

आदेश

यह अपने अधीनस्थों या आम जनता के लिए संप्रभु की इच्छा है। संप्रभु द्वारा कुछ आदेश कानून हो सकते हैं और कुछ कानून नहीं हैं। जॉन ऑस्टिन के अनुसार कानूनों को उनकी व्यापकता में अन्य आदेशों से अलग किया जा सकता है। परेड ग्राउंड पर वरिष्ठों द्वारा दी गई आज्ञा और सैनिकों द्वारा पालन किया जाना कानून नहीं है, बल्कि केवल संप्रभु का आदेश है।

ऑस्टिन द्वारा दिए गए आदेश की परिभाषा के अनुसार, सर्वोच्च शक्ति संप्रभु के पास है। इसका तात्पर्य यह है कि यह पूर्ण प्राधिकरण है जो किसी भी नियंत्रण के अधीन नहीं है। यह कुछ हद तक लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे का विरोध करता है जो वर्तमान में भारत में प्रचलित है जो बताता है कि लोग सर्वोच्च हैं। ऑस्टिन द्वारा दी गई परिभाषा का अर्थ है कि संप्रभु राजनीतिक रूप से श्रेष्ठ है लेकिन लोकतांत्रिक राष्ट्रों में यह सच नहीं है। जॉन ऑस्टिन वैधानिक उपकरणों के रूप में बनाए गए कानूनों और न्यायाधीशों द्वारा बनाए गए कानूनों को मिसाल के रूप में मानने में विफल रहे। यह बदले में न्यायशास्त्र, अर्थव्यवस्था, सामान्य रूप से समाज और हमारे देश के अन्य संस्थानों के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।

संप्रभु

वह व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय है जो आम जनता या उसके अधीनस्थों को आदेश देता है लेकिन स्वयं किसी अन्य व्यक्ति के आदेश का पालन करने के लिए उत्तरदायी नहीं है। अपनी परिभाषा में, जॉन ऑस्टिन ने यह बताने की कोशिश की थी कि जो व्यक्ति संप्रभु है वह किसी अन्य व्यक्ति के प्रति जवाबदेह नहीं है और सभी को संप्रभु के निर्देशों और आदेशों का पालन करना होगा।

इसके अलावा, ऑस्टिन ने यह भी बताने की कोशिश की थी कि संप्रभु को दी गई शक्तियां विभाज्य नहीं हैं। वह वह है जो अपने राज्य के भीतर कानूनों को बना सकता है, निष्पादित कर सकता है और प्रशासित कर सकता है। यह लोकतंत्र के विचार और संघवाद के सिद्धांत का विरोध और विरोधाभास है।

निरपेक्ष और अविभाज्य संप्रभु

सिद्धांत के अनुसार, संप्रभुता निरपेक्ष और अविभाज्य है। संप्रभु को दी गई शक्तियां अपरिहार्य हैं और इसे किसी राष्ट्र में अन्य अधिकारियों के बीच विभाजित नहीं किया जा सकता है। इसे किसी अन्य विदेशी प्राधिकरण को भी हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है।

प्रतिबंध

शब्द “प्रतिबंध” जिसे अंग्रेजी में सैंक्शन कहा जाता है, रोमन कानून से लिया गया है। इसे सैल्मंड द्वारा “जबरदस्ती के साधन जिसके द्वारा अनिवार्य कानून की कोई भी प्रणाली लागू की जाती है के रूप में परिभाषित किया गया है”।

यह कहा जा सकता है कि प्रतिबंध वह बल है जिसका उपयोग किसी व्यक्ति पर तब किया जाता है जब वह व्यक्ति संप्रभु की आज्ञाओं का पालन करने में विफल रहता है। जॉन ऑस्टिन की प्रतिबंध की परिभाषा निरंकुश लगती है क्योंकि इसे राज्य द्वारा उन व्यक्तियों को पार करने के लिए शारीरिक बल के उपयोग के रूप में परिभाषित किया गया है जिन्होंने संप्रभु के निर्देशों का पालन नहीं किया है। यह तत्व आगे बताता है कि सरकार जो संप्रभु है, के मामलों में राष्ट्र के लोगों द्वारा भागीदारी के लिए कोई जगह नहीं है ।

वर्तमान परिदृश्य में, लोग न केवल प्रतिबंधों के डर से बल्कि नैतिकता और जिम्मेदारी से भी कानूनों का पालन करते हैं। राज्य और लोगों के बीच आपसी समझ है। भारत में, जो एक विविधतापूर्ण देश है, कोई पूर्ण सम्राट नहीं हो सकता है। ऑस्टिन द्वारा लिखित पुस्तक “न्यायशास्त्र का प्रांत निर्धारित” में, उन्होंने स्वीकार किया कि “उनके दर्शन बहुत उद्देश्यपूर्ण हैं और कानून को नैतिकता, मूल्यों या किसी अन्य सामाजिक मानदंड से अलग करते हैं और यह कानून को वैसा ही देखता है जैसा वह है और वैसा नहीं जैसा होना चाहिए”। यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि ऑस्टिन ने कानून को परिभाषित करते समय कानून की स्वैच्छिक आज्ञाकारिता, आपसी समझ और सम्मान जैसे कुछ आवश्यक घटकों की अनदेखी की।

इस सिद्धांत को अद्वितीय माना जाता है क्योंकि यह कानून को नैतिकता, न्याय और मूल्यों से अलग करता है। ऑस्टिन को उनके काम में सादगी और सहजता के लिए सराहा गया। हालाँकि, कानून के अन्य विचारधाराों द्वारा भी इसकी आलोचना की गई थी। यह सिद्धांत इंग्लैंड में महान विधायी सुधारों के समय तैयार किया गया था जिसे सराहा भी गया था।

उपर्युक्त तत्वों के अलावा संप्रभुता के सिद्धांत में परिलक्षित दो अन्य तत्व हैं। य़े निम्नलिखित हैं:

कानून की वैधता

जॉन ऑस्टिन के सिद्धांत के अनुसार, कानून संप्रभु की आज्ञा है और कोई नैतिक सिद्धांत नहीं है। कानून की वैधता संप्रभु के आदेश से ली गई है न कि किसी नैतिक मूल्यों के पालन के माध्यम से।

अधिकार-क्षेत्र

एक अन्य आवश्यक तत्व संप्रभु की शक्तियों का क्षेत्रीय दायरा है। सिद्धांत के अनुसार, एक संप्रभु अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सभी व्यक्तियों पर अधिकार का प्रयोग कर सकता है और संप्रभुता किसी विशेष राष्ट्र और उसके परिभाषित अधिकार क्षेत्र के भीतर काम कर सकती है।

संप्रभुता के सिद्धांत के निहितार्थ

कानून की समझ और राजनीतिक प्राधिकरण की प्रकृति के बारे में संप्रभुता के सिद्धांत के कुछ निहितार्थ हैं। ये इस प्रकार हैं:

कानूनी प्रत्यक्षवाद के साथ जुड़ाव

कानूनी प्रत्यक्षवाद कानून का वह सिद्धांत है जो कानून की पारंपरिक प्रकृति और इस विचार पर जोर देता है कि सभी कानून विधायकों द्वारा बनाए गए हैं। संप्रभुता का सिद्धांत कानूनी प्रत्यक्षवाद से जुड़ा हुआ है। संप्रभुता के सिद्धांत ने कानून को नैतिकता और न्यायिक मिसालों और विधायी अधिनियमों जैसे कानूनी प्रणाली के घटकों से भी अलग कर दिया है। इसने नैतिक सिद्धांतों पर कानून की निर्भरता से इनकार किया।

इसके अलावा, इसने कानूनी वैधता के स्रोत के रूप में संप्रभु के अधिकार पर जोर दिया था। इसी तरह, कानूनी प्रत्यक्षवाद ने कानूनों की नैतिकता को खारिज कर दिया है और समाज में कानूनों के निर्माण और प्रवर्तन पर ध्यान केंद्रित किया है। यह भी कहा जा सकता है कि कानूनी प्रत्यक्षवाद प्राकृतिक कानून के सिद्धांत के विपरीत खड़ा हुआ है। प्रत्यक्षवादियों ने यह भी तर्क दिया है कि कानून नैतिक सिद्धांतों के बजाय विधायिका और अदालतों जैसे सरकार के अंगों से प्राप्त होते हैं।

जॉन ऑस्टिन ने नैतिकता से कानून को अलग करने पर बहुत जोर दिया था। यह तर्क दिया गया था कि हालांकि, कानून में नैतिक सामग्री हो सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि नैतिक हो। संप्रभु कानून की वैधता का स्रोत है और कोई नैतिक मूल्य नहीं है। जॉन ऑस्टिन ने कानून को नैतिकता, मूल्यों और अन्य सामाजिक मानदंडों से अलग रखते हुए परिभाषित किया।

संप्रभु का पालन करने का कानूनी कर्तव्य

कानूनी कर्तव्य संप्रभु के आदेशों से उत्पन्न हुए। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह कानूनों का पालन करे क्योंकि वे प्रतिबंधों के खतरे से समर्थित हैं। कर्तव्य का विचार जबरदस्ती की अवधारणा से संबंधित है और संप्रभु का पालन करने का कर्तव्य मूल रूप से किसी भी नैतिक अनिवार्यता के बजाय उन प्रतिबंधों के खतरे पर आधारित है।

संप्रभु की अविभाज्य शक्तियां

संप्रभु की शक्तियों की अविभाज्यता पर जोर दिया जाता है क्योंकि राजनीतिक सत्ता के संगठनों पर इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। किसी राष्ट्र में अन्य अंगों के बीच एक संप्रभु की शक्ति को विभाजित करने का कोई भी प्रयास संप्रभुता के सिद्धांत को कमजोर करता है।

लोगों द्वारा आदतन आज्ञाकारिता

लोगों द्वारा संप्रभु के निर्देशों की निरंतर आज्ञाकारिता द्वारा संप्रभु का अधिकार बनाए रखा जाता है। यदि लोग प्रभुता सम्पन्न की आज्ञा का पालन करना बंद कर देते हैं, तो अधिकार संप्रभु नहीं रह जाता है। इसने ऑस्टिन के सिद्धांत में एक अनुभवजन्य घटक के रूप में कार्य किया क्योंकि संप्रभुता का अस्तित्व व्यवहार के अवलोकन योग्य पैटर्न पर निर्भर है।

आधुनिक भारतीय राजनीति और कानूनी समाज में ऑस्टिन के सिद्धांत का महत्व और प्रभाव

सिद्धांत महत्वपूर्ण साबित हुआ है और हमारे देश के न्यायशास्त्र पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ा है। इसने कानूनी प्रत्यक्षवाद के विकास के लिए एक आधार के रूप में काम किया और हर्बर्ट लियोनेल एडोल्फस हार्ट जैसे कई अन्य सिद्धांतकारों के समर्थन के रूप में काम किया। एचएलए हार्ट का सिद्धांत जॉन ऑस्टिन के सिद्धांत की आलोचना पर आधारित था। हार्ट का सिद्धांत भी कानूनी प्रतिबंधों पर केंद्रित था लेकिन हार्ट के सिद्धांत ने संप्रभु को हटा दिया और सिद्धांत को माध्यमिक स्रोतों के माध्यम से आगे बढ़ने की अनुमति दी।

ऑस्टिन ने उस तंत्र पर अंतर्दृष्टि भी प्रदान की थी जिसके माध्यम से कानून कमांड, प्रतिबंधों और संप्रभुता की भूमिका का अध्ययन करके सामाजिक नियंत्रण के एक उपकरण के रूप में संचालित होता है। इसने कानूनी विषयों और विभिन्न कानूनी सिद्धांतों पर स्पष्टता भी प्रदान की है। इसके अलावा, इसने कानून और शक्ति के बीच संबंधों और कानूनी प्राधिकरण की प्रकृति को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान की है।

ऑस्टिन के संप्रभुता के सिद्धांत की आलोचना

संप्रभुता के सिद्धांत, इसके निहितार्थ और महत्व का विश्लेषण करने के बाद, इस सिद्धांत के लिए निम्नलिखित आलोचना की जा सकती है।

संप्रभु की निरपेक्ष, अप्रतिबंधित और अविभाज्य शक्तियां

ऑस्टिन के संप्रभुता के सिद्धांत से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि संप्रभु पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है और वह अन्य व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूहों पर सर्वोच्च अधिकार है। संप्रभु के पास अपने अधीनस्थों को नियंत्रित करने की सभी शक्तियां हैं और सब कुछ पूरी तरह से उसकी इच्छाओं पर निर्भर है। चूंकि एक एकल निकाय एक संप्रभु के रूप में कार्य कर रहा है, इसलिए राजनीतिक अस्थिरता हो सकती है और वह विदेशी हमलों के लिए कमजोर हो सकता है।

यह सिद्धांत संप्रभु को पूरी तरह से निरपेक्ष बनाता है लेकिन यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। यहां तक कि पहले के राजाओं को भी कुछ आचार संहिता के अधीन किया गया था और वे अपने कार्यों से पूरी तरह से प्रतिरक्षा नहीं कर रहे थे।

ऐसा लगता है कि ऑस्टिन ने संप्रभु को पूर्ण शक्तियां देकर राजशाही का पक्ष लिया। संप्रभु को किसी भी व्यक्ति के आदेशों का पालन करने के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया गया है और दूसरों को उसकी सभी मांगों और आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य किया गया है।

सिद्धांत में यह भी उल्लेख किया गया है कि संप्रभु की शक्तियां विभाज्य नहीं हैं और संप्रभु के पास केवल कानूनों को बनाने, निष्पादित करने और प्रशासन करने की शक्ति है।

गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) के मामले में, मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय संविधान में शक्ति का पृथक्करण (सेपरेशन) एक महत्वपूर्ण और असंगत प्रावधान है। उन्होंने कहा कि सरकार के तीनों अंगों को संविधान द्वारा सौंपे गए कुछ अतिक्रमणों को ध्यान में रखते हुए अपने कार्यों का पालन करना होगा। संविधान तीनों अंगों के अधिकार क्षेत्र का सूक्ष्मता से सीमांकन करता है। यह आगे उम्मीद करता है कि उन्हें अपनी सीमाओं को पार किए बिना अपनी संबंधित शक्तियों के भीतर प्रयोग किया जाएगा। सभी अंगों को संविधान द्वारा उन्हें आवंटित क्षेत्रों के भीतर कार्य करना होता है। भारत के संविधान के तहत कोई भी प्राधिकरण सर्वोच्च नहीं है। भारत का संविधान संप्रभु है और सभी अधिकारियों को देश के सर्वोच्च कानून यानी संविधान के तहत कार्य करना चाहिए।

इस प्रकार, उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आधुनिक भारतीय राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि इससे राजनीतिक अस्थिरता और बहुत अधिक अराजकता हो सकती है।

लोगों द्वारा निरंतर आज्ञाकारिता

जॉन ऑस्टिन ने माना कि संप्रभु आदेश देगा और लोग पालन करेंगे लेकिन आज के समय में यह सच नहीं है। यह भी माना गया है कि लोग पूरी तरह से राजनीतिक रूप से शिक्षित हैं। जो व्यक्ति महसूस करते हैं कि संप्रभु फिट है, वे स्वेच्छा से उसकी आज्ञा का पालन करेंगे; जो लोग महसूस करते हैं कि संप्रभु नहीं है, वे प्रतिबंध के डर से उसकी आज्ञा का पालन करेंगे और जो भ्रमित हैं, वे प्रथा समझकर उसका पालन करेंगे।

आज के समय में ऐसा नहीं है क्योंकि अगर लोगों को लगेगा कि सरकार अयोग्य है तो वे सरकार की आलोचना और विरोध करेंगे। उदाहरण के लिए, 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल लागू करने के दौरान सरकार के खिलाफ मार्च किया गया था। इसके अलावा, यह नहीं माना जा सकता है कि भारत के लोग राजनीतिक रूप से शिक्षित हैं क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी पढ़ और लिख नहीं सकती है। इसका कारण यह भी है कि लोग राजनीति और सरकार के बारे में जागरूक नहीं हैं।

इस प्रकार, लोगों द्वारा निरंतर और अभ्यस्त (हैबिचुअल) आज्ञाकारिता की धारणा, जो संप्रभुता के सिद्धांत का सबसे आवश्यक तत्व है, भारत की आधुनिक राजनीतिक और कानूनी प्रणाली में प्रबल नहीं हो सकती है।

यह लोकतंत्र, संवैधानिकता और शक्ति के पृथक्करण के विचारों को जगह नहीं देता है

ऑस्टिन के शब्दों में, केवल वे आदेश कानून हैं जो संप्रभु द्वारा दिए गए हैं। भारत में, सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून को वैध घोषित नहीं कर सकता है यदि भारतीय संविधान के प्रावधानों का विधायिका द्वारा उल्लंघन किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून को अमान्य घोषित कर सकता है यदि वह संविधान के भाग III के तहत निहित अधिकारों का उल्लंघन करता है। सर्वोच्च न्यायालय हमारे भारतीय संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करता है। हालांकि, जॉन ऑस्टिन के अनुसार, अदालतें कानून के माध्यमिक स्रोत हैं और वे संप्रभु के अधीन हैं। जॉन ऑस्टिन ने रीति-रिवाजों को कानून का स्रोत नहीं माना। अन्य व्यक्तिगत और प्रथागत कानून जैसे व्यापारियों का कानून, चर्च का कानून, मुस्लिम कानून और हिंदू कानून को भी जॉन ऑस्टिन द्वारा कानून नहीं माना गया था। इस प्रकार, उन्होंने सामान्य कानून प्रणाली पर विचार नहीं किया जो कई देशों की कानूनी प्रणालील का एक हिस्सा है।

इस प्रकार, संप्रभुता के सिद्धांत को भारत की वर्तमान कानूनी और सामाजिक प्रणाली के साथ असंगत माना जाता था क्योंकि इसमें लोकतंत्र, शक्ति पृथक्करण और संवैधानिकता के विचार को ध्यान में नहीं रखा गया था।

भारतीय संविधान के मानवीय तत्वों और अन्य मौलिक मूल्यों पर कोई विचार नहीं

जॉन ऑस्टिन ने राज्य और उस राज्य के लोगों के बीच सहयोग और बुनियादी समझ जैसे मानवीय तत्वों की अनदेखी की। इसने समानता, स्वतंत्रता जैसे मूल सिद्धांतों की भी अनदेखी की है जो किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए आवश्यक हैं।

इसने आगे प्रस्तावना और भारत के संविधान में निहित सिद्धांतों और प्रावधानों पर विचार नहीं किया। भारत एक “राज्यों का संघ” है जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के तहत उल्लेख किया गया है और भारत के राज्य एकीकृत हैं और व्यक्ति की स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) संरक्षित है। इस सिद्धांत ने इसे ध्यान में नहीं रखा है। इस सिद्धांत ने एक संप्रभु प्राधिकरण होने और हमारे जैसी लोकतांत्रिक प्रणाली के विपरीत एक एकल प्राधिकरण को पूर्ण शक्तियां देने के विचार का समर्थन किया।

अंतरराष्ट्रीय कानून की अज्ञानता

प्रत्येक देश को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना आवश्यक है क्योंकि इसका उल्लंघन करना किसी देश की समग्र सामाजिक-आर्थिक भलाई के लिए अच्छा नहीं है और इससे देश में संकट पैदा हो सकता है और आयात और निर्यात के मामले में प्रतिबंध भी लग सकता है। लेकिन, संप्रभुता का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय कानूनों या संबंधों पर कोई विचार नहीं करता है और संप्रभु को भूमि की सर्वोच्च शक्ति देता है।

इस प्रकार, उपरोक्त तथ्यों से, यह कहा जा सकता है कि यह सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड) (आईएमएफ), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यूएनएचआरसी), आदि जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रभाव को देखते हुए वैश्वीकरण के आधुनिक युग में व्यावहारिक रूप से लागू नहीं है।

इसने लोकप्रिय संप्रभुता के विचार को नजरअंदाज कर दिया

यह सिद्धांत रूसो की सामान्य इच्छा की अवधारणा के खिलाफ है और इसलिए, लोकतंत्र के विचार के खिलाफ भी है। रूसो का मानना था कि वैध कानून लोगों की सामान्य इच्छा पर आधारित हैं और यह वास्तव में सरकारी नेताओं को याद दिलाएगा कि वे अपने अधिकार के लिए लोगों पर निर्भर हैं।

हालांकि, जॉन ऑस्टिन के सिद्धांत के अनुसार, संप्रभु श्रेष्ठ है और हर दूसरा व्यक्ति उसके अधीनस्थ है। जॉन ऑस्टिन ने लोकप्रिय संप्रभुता की अनदेखी की थी और लोगों को देने के बजाय संप्रभु को सारी शक्ति दे दी थी।

एक महासंघ में निर्धारित व्यक्ति के साथ संप्रभुता की अनुपस्थिति

यह सिद्धांत संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि सभी शक्तियां संप्रभु को दी जाती हैं, इसके विपरीत संघीय राज्य में क्या होता है, जहां हमारे संविधान द्वारा सरकार के विभिन्न स्तरों को शक्ति दी जाती है और अंततः राष्ट्रपति या किसी अन्य एकल व्यक्ति के बजाय लोगों में निहित होती है।

इंग्लैंड के लिए लागू नहीं

जॉन ऑस्टिन के अनुसार, इंग्लैंड में संसद का राजा संप्रभु है। हालांकि, यहां तक कि राजा को खुद को लोगों की सामान्य इच्छा पर विचार करना पड़ता है और वह शक्ति का एकमात्र स्रोत नहीं है। इंग्लैंड में लोग सत्ता के सच्चे स्रोत हैं। इस प्रकार, जॉन ऑस्टिन द्वारा दिया गया दावा गलत था।

इस सिद्धांत की आलोचना सर हेनरी मेन ने कुछ अन्य न्यायविदों के साथ की है, जो मानते थे कि संप्रभुता निर्धारित मानव श्रेष्ठ में नहीं रहती है।

निष्कर्ष 

ऑस्टिन की संप्रभुता या कमांड सिद्धांत का सिद्धांत इस बात पर प्रकाश डालता है कि कानून सर्वोच्च शक्ति का आदेश है जिसके आदेशों का पालन समाज के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए। इसके अलावा, यदि लोग संप्रभु के आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। यह कहा जा सकता है कि संप्रभुता का यह सिद्धांत आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक नहीं है क्योंकि यह शक्ति के पृथक्करण, लोकतांत्रिक सरकार और अंतर्राष्ट्रीय कानून जैसी कई चीजों को ध्यान में नहीं रखता है। भारत की विशाल संस्कृति, विविधता और युवाओं की बढ़ती मांग भी इस सिद्धांत की प्रयोज्यता का विरोध करती है क्योंकि युवा लोग अक्सर सहभागी लोकतंत्र और पारदर्शिता चाहते हैं और संप्रभुता के साथ, सब कुछ एक संप्रभु के हाथों में होगा।

हालांकि, इस सिद्धांत ने निश्चित रूप से न्यायशास्त्र और कानून के विकास में मदद की है। इसने उन चुनौतियों की याद दिलाने के रूप में भी काम किया है जो संप्रभुता की अवधारणा को समझते समय शामिल हैं। ऑस्टिन उन न्यायविदों में से एक थे जो कानून को बहुत सादगी और स्पष्टता के साथ स्पष्ट करने में सक्षम थे। इसने एचएलए हार्ट जैसे अन्य न्यायविदों के लिए आधुनिक कानूनी प्रणाली में अपने काम को विकसित करने का एक रास्ता खोल दिया है। यह कहा जा सकता है कि इस सिद्धांत ने कानूनी दर्शन में एक मूलभूत अवधारणा के रूप में कार्य किया है जिसने कानून और इसकी प्रकृति को समझने में एक व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की पेशकश की है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

जॉन ऑस्टिन कौन है?

जॉन ऑस्टिन एक अंग्रेजी न्यायविद थे और उन्होंने “न्यायशास्त्र के प्रांत निर्धारित” (1832) सहित कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी थीं। वह न्यायशास्त्र और कानूनी प्रत्यक्षवाद के विश्लेषणात्मक विचारधारा के पिता हैं। उन्होंने संप्रभुता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत दिया था जिसकी इस लेख में विस्तार से चर्चा की गई है।

संप्रभुता के सिद्धांत के संस्थापक कौन हैं?

जॉन ऑस्टिन को संप्रभुता के सिद्धांत के पिता और संस्थापक के रूप में जाना जाता है।

“संप्रभुता” शब्द का क्या अर्थ है?

संप्रभुता से तात्पर्य स्वतंत्रता और स्वायत्तता की स्थिति से है जो निर्णय लेने और राज्य के मामलों में किसी अन्य बाहरी या विदेशी नियंत्रण को समाप्त करने के लिए है।

संप्रभुता के सिद्धांत में तीन मुख्य तत्व क्या हैं?

जॉन ऑस्टिन द्वारा दिए गए संप्रभुता के सिद्धांत में तीन प्रमुख आवश्यक कमांड, संप्रभु और प्रतिबंध हैं।

उपयोगितावाद (यूटिलिटेरियनिसम) का जनक कौन है?

जेरेमी बेंथम को उपयोगितावाद का जनक माना जाता है। उनका मूल विश्वास था, “यह सबसे बड़ी संख्या का सबसे बड़ा सुख है जो सही और गलत का माप है”।

न्यायशास्त्र पर जेरेमी बेंथम की प्रसिद्ध पुस्तक कौन सी थी?

जेरेमी बेंथम द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक “न्यायशास्त्र की सीमा परिभाषित” थी।

जॉन ऑस्टिन के अनुसार संप्रभुता की विशेषताएं क्या हैं?

ऑस्टिन के अनुसार, संप्रभुता निरपेक्ष, स्थायी, सार्वभौमिक, अविच्छेद्य, अविभाज्य और संप्रभु के साथ अनन्य है। इसके अतिरिक्त, प्रभुता सम्पन्न के प्रति आज्ञाकारिता अभ्यस्त और निरन्तर बनी रहती है।

जॉन ऑस्टिन के अनुसार संप्रभु कौन है?

कोई भी दृढ़ निश्चयी मानव श्रेष्ठ संप्रभु होता है जिसकी आज्ञाओं का पालन उसके अधीनस्थों द्वारा किया जाता है। एक सभ्य समाज में, राज्य संप्रभु है और एक संप्रभु के लिए अधिकांश लोगों द्वारा आदतन आज्ञाकारिता होनी चाहिए।

संदर्भ

  • Jurisprudence and Legal Theory by P.S.A. Pillai Edition, 3rd edition, by P.S.A. Pilla
  • Jurisprudence and Legal Theory, 5th edition by VD Mahajan

भारत में विलय और उसके प्रकारों का अवलोकन

यह लेख लॉसिखो से एम एंड ए, इंस्टीटूशनल फाइनेंस एंड इन्वेस्टमेंट लॉज़ (पीई एंड वीसी ट्रांसक्शन्स) में डिप्लोमा कर रहे Priyanshu Verma द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारत में विलय (मर्जर) और उसके प्रकारों के बारे में चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है। 

परिचय

वर्तमान में, हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं जहां उन्नत तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा (कम्पटीशन) एक व्यवसाय के विकास को संचालित करती है। विलय उन कंपनियों के लिए एक रणनीतिक उपकरण के रूप में उभरा है जो अपने व्यवसायों में तेजी से लाभ और विकास की तलाश कर रहे हैं, विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए, जिसमें ऊर्जा, दवा, दूरसंचार और बैंकिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में जबरदस्त विकास के अवसर हैं। भारत के पास पहले से ही एक विशाल बाजार आधार है, लेकिन घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अधिकांश निगमों ने विशिष्ट क्षेत्रों में शून्य से शुरुआत करने के बजाय कारोबार को सुचारू रूप से चलाने के लिए विलय को अपनाना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, विलय न केवल पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त करने में मदद करते हैं बल्कि नई तकनीकों को प्राप्त करने, ग्राहक आधारों का विस्तार करने और समग्र बाजार उपस्थिति को बढ़ाने में भी मदद करते हैं। इस लेख का उद्देश्य भारत में विलय और उनके विभिन्न अन्य वर्गीकरणों की गहन समझ प्रदान करना है।

विलय को समझना

भारत में, विलय शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। हालांकि, आयकर अधिनियम की धारा 2 (1B) समानार्थी शब्द “समामेलन (अमलगमेशन)” को कंपनियों के किसी अन्य कंपनी के साथ एक या एक से अधिक कंपनियों के विलय या एक कंपनी बनाने के लिए दो या दो से अधिक कंपनियों के विलय के रूप में परिभाषित करती है। सरल शब्दों में विलय, एक कंपनी में दो या दो से अधिक कंपनियों का समेकन शामिल है। विलय आमतौर पर आपसी करार के रूप में संरचित होते हैं जहां दोनों संस्थाएं अपनी ताकत और संसाधनों को जोड़ती हैं, अधिग्रहण (एक्विज़िशन) की तरह नहीं जहां एक कंपनी दूसरी कंपनी को इसके तहत लेती है। विलय करने का प्राथमिक कारण यह है कि जब वे व्यक्तिगत रूप से काम कर रहे थे, तब की तुलना में बेहतर प्रदर्शन और मूल्य के साथ एक संयुक्त इकाई बनाना है। विलय आमतौर पर बाजार हिस्सेदारी हासिल करने, परिचालन लागत को कम करने, नए क्षेत्रों में विस्तार करने, आम उत्पादों को एकजुट करने, राजस्व बढ़ाने और मुनाफे में वृद्धि करने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त, वे कंपनियों को साझा विशेषज्ञता और नवाचार (इनोवेशन) का लाभ उठाने की अनुमति देते हैं, जिससे अधिक प्रतिस्पर्धी और लचीला व्यवसाय बनता है।

विलय के प्रकार

विलय के विभिन्न प्रकार हैं; इनमें से कुछ सबसे सामान्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

क्षैतिज (हॉरिजॉन्टल) विलय

क्षैतिज विलय एक प्रकार का विलय है जहां एक ही उद्योग में काम करने वाली कंपनियां या प्रत्यक्ष प्रतियोगी अपने संचालन को जोड़ती हैं। ऐसे विलय का प्राथमिक उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को कम करना, बाजार हिस्सेदारी बढ़ाना और दक्षता और लाभप्रदता बढ़ाने के लिए संयुक्त संसाधनों का लाभ उठाना है।

क्षैतिज विलय के परिणामस्वरूप किसी विशेष उद्योग में बड़े और अधिक प्रमुख खिलाड़ियों का निर्माण हो सकता है। अपने संचालन को मिलाकर, विलय की गई संस्थाएं पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त कर सकती हैं, उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित कर सकती हैं, लागत कम कर सकती हैं और मूल्य निर्धारण शक्ति बढ़ा सकती हैं। इससे कम प्रतिस्पर्धियों के साथ अधिक केंद्रित बाजार हो सकता है, संभावित रूप से उपभोक्ता की पसंद को कम किया जा सकता है और कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

क्षैतिज विलय के कुछ उल्लेखनीय उदाहरणों में शामिल हैं:

  • वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्युलर (2018): इस विलय से भारत में सबसे बड़ी दूरसंचार ऑपरेटर वोडाफोन आइडिया लिमिटेड का निर्माण हुआ। विलय का उद्देश्य अत्यधिक प्रतिस्पर्धी भारतीय दूरसंचार बाजार में वोडाफोन की स्थिति को मजबूत करना और रिलायंस जियो के साथ अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करना था, जिसने कम लागत वाली पेशकशों के साथ उद्योग को बाधित कर दिया था।
  • एक्सॉन और मोबिल (1999): इस विलय के परिणामस्वरूप दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी एक्सॉन मोबिल का गठन हुआ। इस विलय का उद्देश्य अन्वेषण (एक्सप्लोरेशन), उत्पादन, शोधन (रिफाइनिंग) और विपणन (मार्केटिंग) में दोनों कंपनियों की शक्तियों को संयोजित करना था ताकि वैश्विक तेल उद्योग में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल की जा सके।

क्षैतिज विलय उपभोक्ताओं, प्रतिस्पर्धियों और समग्र उद्योग परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। वे बाजार की शक्ति में वृद्धि, कम नवाचार और उच्च कीमतों का कारण बन सकते हैं। इसलिए, ऐसे विलय अक्सर विनियामक जांच के अधीन होते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे प्रतिस्पर्धा को नुकसान न पहुँचाएँ और अंततः उपभोक्ताओं को नुकसान न पहुँचाएँ।

ऊर्ध्वाधर (वर्टीकल) विलय

ऊर्ध्वाधर विलय तब होता है जब एक ही उद्योग में काम करने वाली लेकिन आपूर्ति श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर काम करने वाली कंपनियाँ मिलकर एक इकाई बनाती हैं। ऐसे विलय का प्राथमिक उद्देश्य आपूर्ति श्रृंखला को अनुकूलित करना और उत्पादन के विभिन्न चरणों में दक्षता बढ़ाना है।

ऊर्ध्वाधर विलय के प्रमुख लाभों में से एक संचालन को सुव्यवस्थित करने और लागत को कम करने की क्षमता है। उत्पादन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को एक ही छत के नीचे लाकर, कंपनियां अकुशलताओं को खत्म कर सकती हैं और बर्बादी को न्यूनतम कर सकती हैं। इससे पैमाने की अर्थव्यवस्थाएं हो सकती हैं, क्योंकि विलय की गई इकाई आपूर्तिकर्ताओं और वितरकों के साथ बेहतर सौदों पर बातचीत करने के लिए अपने आकार और संसाधनों का लाभ उठा सकती है।

इसके अलावा, ऊर्ध्वाधर विलय गुणवत्ता नियंत्रण और स्थिरता को बढ़ा सकते हैं। संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करके, कंपनियाँ यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि कच्चे सामान और सामग्री उनके मानकों और विनिर्देशों के अनुरूप हों। इससे उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है और ग्राहक संतुष्टि में वृद्धि हो सकती है।

ऊर्ध्वाधर विलय का एक अन्य लाभ बाजार हिस्सेदारी और प्रतिस्पर्धी लाभ में वृद्धि की संभावना है। अपने संचालन को समेकित करके, कंपनियां बाजार का एक बड़ा हिस्सा हासिल कर सकती हैं और प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती हैं। इसके अतिरिक्त, ऊर्ध्वाधर विलय कंपनियों को नए बाजारों में विस्तार करने और व्यापक ग्राहक आधार तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं।

हालांकि, ऊर्ध्वाधर विलय भी संभावित चुनौतियों और जोखिमों के साथ आते हैं। एक चिंता कुछ बड़ी कंपनियों के हाथों में शक्ति की बढ़ती एकाग्रता है, जिससे उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त, ऊर्ध्वाधर विलय छोटे व्यवसायों के लिए प्रतिस्पर्धा करना अधिक कठिन बना सकते हैं, क्योंकि उनके पास विलय की गई इकाई के पैमाने और दक्षता से मेल खाने के लिए संसाधन नहीं हो सकते हैं।

इन चिंताओं को दूर करने के लिए, नियामक प्राधिकरण अक्सर यह सुनिश्चित करने के लिए ऊर्ध्वाधर विलय की जांच करते हैं कि वे प्रतिस्पर्धा को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं या एकाधिकार नहीं बनाते हैं। बाजार एकाग्रता, प्रवेश के लिए संभावित बाधाओं और उपभोक्ताओं पर प्रभाव जैसे कारकों को ऊर्ध्वाधर विलय को मंजूरी देने या अस्वीकार करने से पहले सावधानीपूर्वक विचार किया जाता है।

कुल मिलाकर, ऊर्ध्वाधर विलय कई मायनों में फायदेमंद हो सकते हैं, क्योंकि वे दक्षता में सुधार कर सकते हैं, गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं और बाजार हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, इस तरह के विलय के साथ आगे बढ़ने से पहले संभावित जोखिमों और लाभों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसमें शामिल सभी हितधारकों को लाभ हो।

कांग्लोमरेट मर्जर

कांग्लोमरेट विलय उन प्रकार के विलय हैं जहां कंपनियां जो एक साथ आती हैं वे न तो एक ही उद्योग में काम करती हैं और न ही एक ही उत्पादन चक्र में। वे पूरी तरह से अलग-अलग उद्योगों से संबंधित हैं जिनमें कोई अतिव्यापी (ओवरलैपिंग) व्यवसाय नहीं है। इस तरह के विलय का मुख्य उद्देश्य विकास के नए अवसरों और विविधीकरण की तलाश करना है। कांग्लोमरेट विलय का एक उदाहरण रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) और हमलेस (2019) है। आरआईएल मुख्य रूप से अपने पेट्रोकेमिकल और दूरसंचार उद्योग के लिए जाना जाता है; इस विलय में आरआईएल ने ब्रिटिश खिलौना कंपनी हैमलेज का अधिग्रहण किया था। इससे रिटेल में आरआईएल के कारोबार में विविधता आई। 

बाजार विस्तार विलय

बाजार विस्तार विलय उन प्रकार के विलय हैं जहां कंपनियां समान प्रकार के उत्पाद बेचती हैं लेकिन विभिन्न बाजारों में उनके संचालन को जोड़ती हैं। इस तरह के विलय का मुख्य उद्देश्य नई इकाई के लिए बाजार विस्तार, नए दर्शकों को लक्षित करना और वैश्विक स्तर पर ब्रांड पहचान बढ़ाना है। बाजार विस्तार विलय का एक उदाहरण टाटा मोटर्स और जगुआर लैंड रोवर (2008) है। इस विलय ने टाटा मोटर्स के लिए वैश्विक लक्जरी कार बाजार में प्रवेश करने का द्वार खोल दिया।

उत्पाद विस्तार विलय

उत्पाद विस्तार विलय उन प्रकार के विलय हैं जहां कंपनियां एक ही भौगोलिक बाजार में विभिन्न उत्पाद और सेवाएं प्रदान करती हैं और एक दूसरे के साथ गठजोड़ करती हैं। इस तरह के विलय के पीछे का कारण लागत में कमी के लिए एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग करना और इकाई में तालमेल में सुधार करना है। इसके अलावा, यह महान बाजार पहुंच और अन्य वित्तीय लाभ भी स्थापित करता है। उत्पाद विस्तार विलय का एक उदाहरण पेप्सिको और क्वेकर ओट्स (2001) है। इससे पेप्सिको को अपने मौजूदा उत्पादों के साथ नई बाजार रणनीतियों को आजमाने में मदद मिली।

कानूनी और नियामक ढांचा

1500

एलपीजी (उदारीकरण (लिबरलाइज़ेशन), निजीकरण और वैश्वीकरण) की अवधि के बाद, भारतीय बाजारों में आसमान छू गया है क्योंकि भारत अब वैश्विक दिग्गजों के साथ पेश और प्रतिस्पर्धा कर रहा है। इसके कारण, गतिशील बाजार में जीवित रहने के लिए कई व्यवसायों का विलय हो गया है। इसलिए निष्पक्ष खेल के लिए और बाजार में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए, सेबी (भारतीय प्रतिभूति (सेक्योरिटी) और विनिमय मंडल), सीसीआई (भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग), कंपनी अधिनियम 2013, और प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002, सहित विभिन्न निकाय और अधिनियम बनाए गए। वे सामूहिक रूप से भारत में निर्बाध (सीमलेस) विलय के लिए प्रक्रिया, निष्पादन और अनुमोदन की रूपरेखा के लिए नियामक वातावरण और व्यापक संरचना बनाते हैं। आइए इन पर विस्तार से चर्चा करें।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) विलय को विनियमित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे बाजार की प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव न डालें। प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित, सीसीआई का प्राथमिक उद्देश्य उन कार्यों को रोककर बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखना है जो बाजार में प्रभुत्व पैदा कर सकते हैं या प्रतिस्पर्धा को प्रतिबंधित कर सकते हैं। प्रतिस्पर्धा अधिनियम के कुछ महत्वपूर्ण और आधारशिला कार्य निम्नलिखित हैं:

प्रतिस्पर्धा-विरोधी करार का निषेध

अधिनियम उन करार, अनुबंधों या व्यवस्थाओं को प्रतिबंधित करता है जिनका भारत के भीतर प्रतिस्पर्धा पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनमें कीमतों का विनियमन या हेरफेर, सामान और सेवाओं की नियंत्रण आपूर्ति, बोली-हेराफेरी और अन्य मिलीभगत प्रथाएं शामिल हैं।

प्रमुख स्थिति के दुरुपयोग की रोकथाम

यह अधिनियम उद्यमों (इंटरप्राइसेस) को बाजार में अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग करने से रोकता है। इसमें प्रतिस्पर्धा के उन्मूलन के लिए किसी उत्पाद के लिए अवास्तविक रूप से उच्च या निम्न मूल्य निर्धारण जैसी प्रथाएं शामिल हैं, जिन्हें “शिकारी मूल्य निर्धारण” भी कहा जाता है, बिक्री पर अनुचित शर्तों को लागू करना, और एक बाजार में प्रभुत्व का लाभ उठाकर दूसरे में प्रवेश करना।

संयोजनों का विनियमन

प्रतिस्पर्धा अधिनियम विलय, अधिग्रहण और संयोजनों को नियंत्रित करता है जो बाजार में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकते हैं। सीसीआई मूल्यांकन करता है कि प्रस्तावित विलय या अधिग्रहण का बाजार में प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है या नहीं। और यदि उपयुक्त शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो सीसीआई समामेलन को मंजूरी देता है, या यह इसे प्रतिबंधित कर सकता है यदि यह पाता है कि इसका बाजार में प्रतिस्पर्धा पर एक सराहनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

कंपनी अधिनियम, 2013

कंपनी अधिनियम भारत में प्राथमिक कानून है जो कंपनियों के निगमन, प्रबंधन और संचालन को नियंत्रित करता है। यह अधिनियम शेयरधारकों और नियामक प्राधिकरणों के अनुमोदन सहित कंपनियों के समेकन के लिए प्रक्रिया निर्धारित करता है, इसके निम्नलिखित कार्य हैं:

शेयरधारकों के अधिकारों का संरक्षण

अधिनियम शेयरधारकों के अधिकारों की रक्षा के लिए तंत्र प्रदान करता है, जिसमें शेयरधारक मतदान अधिकारों और लाभांश (डिविडेंड्स) प्राप्त करने के अधिकार के प्रावधान शामिल हैं।

नियामक प्राधिकरणों की भूमिका

अधिनियम में विलय, अधिग्रहण और एकीकरण की प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) (एनसीएलटी), भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) से अनुमोदन की आवश्यकता भी शामिल है।

निवेशक संरक्षण

अधिनियम में धोखाधड़ी को रोकने, अल्पसंख्यक शेयरधारकों की रक्षा करने और उन प्रथाओं को सुनिश्चित करने के लिए कदम और प्रावधान शामिल हैं जो प्रतिभूति बाजार को प्रभावित नहीं करते हैं।

सेबी के नियम

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) अधिनियम, 1992 और इससे जुड़े नियम और विनियम भारत में प्रतिभूति बाज़ारों को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन विनियमों का उद्देश्य निवेशकों की सुरक्षा करना और निष्पक्ष और पारदर्शी व्यापारिक प्रथाओं को सुनिश्चित करना है।

सेबी के प्राथमिक कार्यों में से एक यह सुनिश्चित करना है कि सूचीबद्ध कंपनियों, दलालों और अन्य मध्यस्थों (इंटरमीडियरी) सहित प्रतिभूति बाजार में सभी प्रतिभागी निर्धारित मानकों और प्रथाओं का पालन करें। इसमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि कंपनियां निवेशकों को सटीक और समय पर वित्तीय जानकारी प्रदान करती हैं और ब्रोकर और अन्य मध्यस्थ अपने ग्राहकों के सर्वोत्तम हित में कार्य करते हैं।

सेबी के पास बाजार में हेरफेर और कदाचार के अन्य रूपों को रोकने की भी जिम्मेदारी है जो प्रतिभूति बाजार की अखंडता को कमजोर कर सकते हैं। इसमें अंदरूनी व्यापार, मूल्य हेरफेर या अन्य अवैध गतिविधियों में संलग्न व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई करना शामिल है।

मध्यस्थों के उचित आचरण को बनाए रखने के लिए, सेबी विशिष्ट दिशानिर्देश और नियम निर्धारित करता है जिनका इन संस्थाओं को पालन करना चाहिए। ये दिशानिर्देश पंजीकरण आवश्यकताओं, पूंजी पर्याप्तता और नैतिक मानकों जैसे क्षेत्रों को शामिल  करते हैं। सेबी इन विनियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए मध्यस्थों का नियमित निरीक्षण और लेखा परीक्षण (ऑडिट) भी करता है।

इसके अलावा, सेबी भारत में स्टॉक आदान-प्रदान पर सूचीबद्ध उद्यमों से जुड़े विलय और अधिग्रहण को विनियमित करने में एक भूमिका निभाता है। ऐसे लेनदेन के लिए मंडल की मंजूरी आवश्यक है, और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावों की समीक्षा करता है कि वे निवेशकों और बाजार के सर्वोत्तम हित में हैं।

कुल मिलाकर, सेबी के नियम और प्रवर्तन कार्रवाइयां भारत के प्रतिभूति बाजारों की अखंडता और दक्षता बनाए रखने, निवेशकों के विश्वास को बढ़ावा देने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में मदद करती हैं। कुछ प्राथमिक विनियम जो सेबी को अपने कार्यों को ठीक से करने की अनुमति देते हैं:

निष्कर्ष

अंत में, समामेलन एक सामान्य रणनीति है जिसका उपयोग कंपनियों द्वारा विकास प्राप्त करने और अपनी मौजूदा स्थिति को ऊपर उठाने के लिए किया जाता है। विलय और अधिग्रहण कभी-कभी पूरा होने तक एक व्यस्त प्रक्रिया बना सकते हैं, इसलिए उन्हें पूर्व-संगठित और उचित वैधता के साथ किया जाना चाहिए। रणनीतिक फिट, गतिशील प्रबंधन, संचार और नेतृत्व कुछ महत्वपूर्ण चीजें हैं जो विलय के परिणाम को निर्धारित करती हैं। यह कहते हुए कि यह बहुत महत्वपूर्ण है कि कंपनियों को विलय और अधिग्रहण के लाभों और आवश्यकताओं का गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए। जबकि वे विस्तार और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकते हैं, अगर ठीक से संभाला नहीं जाता है, तो वे कठिनाइयों और चुनौतियों का निर्माण कर सकते हैं। निश्चित रूप से, विलय और अधिग्रहण की सफलता उन कंपनियों के उद्देश्य में निहित है जिनका विलय किया जा रहा है। यदि वे शेयरधारकों के लिए सर्वोत्तम परिणाम बनाने के लिए समान लक्ष्यों और विचारों को साझा करते हैं, तो यह आधा हो गया है। इसके अलावा, भारत में सभी प्रकार के समेकन के संबंध में नियम और विनियम बहुत जटिल हैं। इसलिए, ऐसे लेनदेन में शामिल पक्षों को कानूनी सलाह लेने और प्रासंगिक कानूनों और विनियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। इस तरह की कार्रवाइयां करके, पक्ष गैर-अनुपालन के परिणामों से बच सकते हैं और एक सहज और सफल लेनदेन सुनिश्चित कर सकते हैं।

संदर्भ

 

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत

यह लेख Akash Krishnan द्वारा लिखा गया है और Shreya Patel द्वारा आगे अद्यतन किया गया है। यह लेख भावी अधिनिर्णय (प्रॉस्पेक्टिव ओवररूलिंग) के सिद्धांत की उत्पत्ति, अर्थ, दायरा और लाभों पर चर्चा करता है। इस सिद्धांत के अनुप्रयोग के मुख्य सिद्धांतों पर भी बेहतर समझ के लिए विचार किया गया है। लेख में भारत में उन मामलों का भी अध्ययन किया गया है, जहाँ इस सिद्धांत का उपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त, यह लेख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था में इस सिद्धांत के विकास और इसे मिलने वाली आलोचनाओं पर भी प्रकाश डालता है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

परिचय

क्या आप जानते हैं कि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय केवल उस विशेष मामले पर ही लागू नहीं होते, बल्कि भविष्य में आने वाले उन सभी मामलों पर भी लागू होते हैं जो वर्तमान मामले के समान होते हैं। जब न्यायाधीश किसी मामले में निर्णय लेते हैं, तो वे केवल उस मामले का समाधान नहीं करते बल्कि भविष्य के समान मामलों के निर्णय का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।  

एक न्यायिक घोषणा उस विशेष मामले पर लागू होती है जिसमें वह दी गई थी, साथ ही भविष्य में आने वाले अन्य मामलों पर भी। यह “पूर्व उदाहरण (प्रीसीडेंट)” की धारणा का केंद्रीय पहलू है। जब किसी कानून की घोषणा न्यायालय द्वारा की जाती है, तो वह वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) और निर्देशात्मक (प्रिस्क्रिप्टिव) दोनों होती है। निर्देशात्मक होने का अर्थ है कि कानून का उपयोग भविष्य के मामलों में भी न्यायाधीशों द्वारा किया जाएगा। पूर्व उदाहरण, कानून के प्रमुख स्रोतों में से एक हैं और इन्हें उच्च महत्व दिया जाता है। ये कानून के रचनात्मक और घोषणात्मक दोनों हैं। परंपरागत रूप से, स्वीकृत मानक यह है कि नियम को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) माना जाता है। जब न्यायालय द्वारा कोई निर्णय लिया जाता है, तो आमतौर पर यह माना जाता है कि ऐसे निर्णय पिछले मामलों को भी प्रभावित करेंगे।

यही है कि कानूनी पूर्व उदाहरणों की अवधारणा कैसे काम करती है। कानूनी पूर्व उदाहरण भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं और पहले से ही कानून के रूप में माने जाते हैं। ये स्वतः ही उन मामलों पर लागू होते हैं जो उस निर्णय के पारित होने से पहले हुए थे।  ब्लैकस्टोनियन सिद्धांत का मानना है कि न्यायाधीश कानून का निर्माण नहीं करते, वे केवल कानून की घोषणा करते हैं। घोषणात्मक सिद्धांत पूर्व उदाहरण के पूर्वव्यापी प्रभाव की वकालत करता है। इसलिए, जब किसी कानून को अमान्य माना जाता है, तो इसे आमतौर पर उस तारीख से अमान्य माना जाता है जिस दिन कानून अस्तित्व में आया या अधिनियमित हुआ। 

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत की उत्पत्ति  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को सबसे पहले 1900 के दशक की शुरुआत में अमेरिका में मान्यता दी गई, जब देश की विधिक न्यायशास्त्र ने प्राचीन ब्लैकस्टोनियन सिद्धांत से हटकर एक नया रूप अपनाया। यह सिद्धांत अमेरिका में धीरे-धीरे विकसित हुआ और जल्द ही इसे अंग्रेजी न्यायविदों (ज्यूरिस्ट) और अंग्रेजी न्यायालयों द्वारा स्वीकार कर लिया गया। अंग्रेजी कानून में यह व्यापक रूप से माना जाता है कि न्यायपालिका ऐसे न्यायिक  पूर्व उदाहरण बनाती है जो पूर्वव्यापी और भावी दोनों मामलों को प्रभावित करेंगे, जबकि विधायिका केवल ऐसे कानून बनाती है जो आने वाले मामलों को प्रभावित करेंगे। भावी अधिनिर्णय की धारणा को कुछ न्यायालयों द्वारा इस विचार के एक अपवाद के रूप में विकसित किया गया, ताकि उन मामलों में न्यायपूर्ण निर्णय सुनिश्चित किया जा सके, जहाँ स्थापित मानदंडों का पालन करने से अनुचित समाधान हो सकता है।  

भारत में भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत की उत्पत्ति  

भारत में इस सिद्धांत को पहली बार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आई.सी. गोलकनाथ और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (संबंधित याचिकाओं सहित) (1967) के मामले में मान्यता दी गई और अपनाया गया। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत के उपयोग के लिए कई दिशानिर्देश निर्धारित किए। इन दिशानिर्देशों को एक पूर्व उदाहरण के रूप में अपनाया गया और वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सिद्धांत को कई बार लागू किया गया।  

आइए अब इस सिद्धांत के अर्थ और इसके लाभों को समझें।

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत क्या है  

‘भावी’ शब्द भविष्य में होने वाली घटना को संदर्भित करता है, और ‘अधिनिर्णय’ का अर्थ है किसी निर्णय को पलट देना। भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत न्यायालय को यह अधिकार देता है कि वह किसी पूर्व उदाहरण को पलटकर एक नया कानून लागू कर सके, लेकिन यह नया कानून केवल भविष्य के मामलों पर लागू होगा, पिछले किसी भी मामले पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस क्रिया का अतीत में लिए गए किसी भी निर्णय पर पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं होगा। इस सिद्धांत का उपयोग करने का मुख्य उद्देश्य न्याय प्राप्त करना है। पूर्वव्यापी प्रभाव कई बार निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से वंचित कर देता है।  

न्यायमूर्ति बेंजामिन एन. कार्डोज़ो के अनुसार, यदि इस सिद्धांत को लागू नहीं किया गया, तो इससे अन्याय हो सकता है। समय के साथ कानून बदलते रहते हैं, और भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के माध्यम से इन नए परिवर्तनों को अपनाना आसान हो जाता है और समाज में न्याय सुनिश्चित होता है।  

इस सिद्धांत के सबसे प्रमुख समर्थकों में से एक न्यायमूर्ति के. सुब्बा राव थे, जिन्होंने कहा कि इस सिद्धांत को स्वीकार करने से आने वाले मामलों के लिए आधारभूत संरचना तैयार करने में मदद मिलेगी। इसका उपयोग बेहतर और नए मानदंडों को पहचानने में सहायक होगा। यह सिद्धांत न्यायालयों को न्याय प्राप्त करने और यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि सुनवाई निष्पक्ष हो।  

उदाहरण के लिए, यदि एक सिद्धांत X को abc बनाम xyz के मामले में लागू किया गया। कुछ समय बाद न्यायालय ने उसी सिद्धांत से असहमति व्यक्त की और उसकी जगह एक नया सिद्धांत लागू किया। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करेगा कि abc बनाम xyz मामले में दिए गए निर्णय पर इसका प्रभाव न पड़े और नया सिद्धांत केवल भविष्य के मामलों पर लागू हो।  

अब आइए इस सिद्धांत के अनुप्रयोग के कुछ प्रमुख सिद्धांतों पर चर्चा करें।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के अनुप्रयोग के प्रमुख सिद्धांत 

  • भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को केवल संवैधानिक मामलों में लागू किया जा सकता है।  
  • इस सिद्धांत को लागू करने का एक अन्य सिद्धांत यह है कि अदालत द्वारा पहले लिए गए उन निर्णयों को मान्यता देना, जिन्हें अब पलट दिया गया है।  
  • भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि केवल सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के तहत ऐसा अधिकार प्राप्त है कि वह कानून की घोषणा कर सके जो पूरे भारत में सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी हो।  
  • यह सिद्धांत उन संस्थानों और निकायों को समय प्रदान करता है जो किसी कानून के पलटे जाने से प्रभावित होते हैं। इस समय के दौरान वे नई कानूनी स्थिति के अनुरूप आवश्यक बदलाव कर सकते हैं।  
  • यह सिद्धांत बहुत उपयोगी है क्योंकि यह अतीत में पहले से तय किए गए सभी मामलों को फिर से खोलने की आवश्यकता को समाप्त करता है और बार-बार अदालती कार्यवाही से बचाव करता है।  
  • अदालत को पिछली अवधि के संचालन को निर्धारित करने की शक्ति है। अदालतें यह तय कर सकती हैं कि इसे किस प्रकार लागू किया जाए, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह सभी संबंधित पक्षों के लिए न्यायसंगत और उचित हो।  

भारत में भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को अपनाना और इसकी प्रासंगिकता से जुड़े परीक्षण  

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत उन मामलों में लागू किया जाता है जहाँ न्यायालय यह मानता है कि यदि निर्णय को पूर्वव्यापी रूप से लागू किया गया, तो इससे भ्रम पैदा होगा और पहले से तय मामलों में व्यवधान (डिस्रप्शन) आएगा। न्यायालय के पास यह अधिकार होता है कि वह यह तय करे कि नए कानून और नियम किस सीमा तक लागू होंगे, ताकि न्याय बना रहे। यह माना गया कि भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत भारत की कानूनी प्रणाली और शुरुआत से शून्य सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। भारत में असंवैधानिक घोषित कानूनों को ऐसा माना जाता है जैसे वे शुरू से ही अमान्य थे।

ऐसे में, इन कानूनों के तहत की गई सभी कार्रवाइयों को अमान्य माना जाएगा, जो समाज में व्यवधान पैदा कर सकती हैं, क्योंकि लंबे समय से इन्हीं कानूनों का पालन किया जा रहा था। यह सिद्धांत न्यायालय को यह अनुमति देता है कि वह कुछ कानूनों को उस दिन से असंवैधानिक घोषित करे जब यह निर्णय दिया गया हो, और उनके किसी भी पूर्वव्यापी प्रभाव को रोकता है। इसलिए, इस सिद्धांत को उन मामलों में लागू किया जाता है जहाँ बदलाव अत्यधिक आवश्यक होते हैं।  

यह सिद्धांत अक्सर केवल ऐसे मामलों में लागू किया जाता है जो जनता के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। भारत में, इस सिद्धांत को केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है। यह मुख्य रूप से संवैधानिक मामलों में लागू होता है, जहाँ पलटने वाले मामले का अतीत के मामलों और समाज पर प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पहली बार भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को मान्यता दी और अपनाया।

आई.सी. गोलकनाथ और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (संबंधित याचिकाओं के साथ) (1967)

मामले का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में कई संशोधन पहले संविधान संशोधन अधिनियम (1951) के तहत किए गए थे। इस संशोधन को श्री शंकरि प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य (1951) के मामले में चुनौती दी गई थी। इस मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है और क्या यह अनुच्छेद 13 के तहत आता है या इसे उल्लंघित करता है। यह मामला न्यायपालिका और संसद के बीच एक विवाद की शुरुआत का कारण बना। 1978 में, यह मुद्दा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के फैसले के साथ समाप्त हुआ।  

इसी तरह, सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (संबंधित याचिकाओं के साथ) (1964) के मामले में भी संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम, 1964 को चुनौती दी गई थी। इस मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने यह विचार व्यक्त किया कि मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता, जो एक पूर्व उदाहरण बन गया। आई.सी. गोलकनाथ और अन्य बनाम पंजाब राज्य (1967) का मामला भी इसी विचार पर आधारित था।  

तथ्य

याचिकाकर्ता और उनके परिवार जलंधर, पंजाब में 500 एकड़ से अधिक भूमि के मालिक थे। हालांकि, पंजाब भूमि धारणा अधिनियम, 1953 के लागू होने के बाद सरकार ने उन्हें एक सूचना पत्र जारी किया, जिसमें कहा गया कि वे प्रत्येक केवल 30 एकड़ भूमि रख सकते हैं और शेष भूमि को छोड़ना होगा। छोड़ी गई भूमि को अधिशेष (सरप्लस) भूमि माना जाएगा। इसके कारण, इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को निम्नलिखित मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई:  

  1. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(f) में संपत्ति प्राप्त करने और रखने का अधिकार।  
  2. संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार और कानून के समक्ष समान संरक्षण।  
  3. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत किसी भी पेशे का अभ्यास करने का अधिकार।  

मुद्दा

क्या संसद के पास संविधान के तहत नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर कानून बनाने और संशोधन करने का अधिकार है?  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के खिलाफ उठाई गई आपत्तियां

न्यायालय द्वारा पारित निर्णय पर चर्चा करने से पहले भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के खिलाफ उठाई गई निम्नलिखित आपत्तियों को समझना आवश्यक है:  

  1. सामान्य कानून संशोधनों पर भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के उपयोग का कोई प्रमाण नहीं है। यह सिद्धांत केवल संवैधानिक कानून संशोधनों से संबंधित निर्णयों पर लागू हो सकता है। 
  2. भारतीय न्यायशास्त्र एक पूर्व उदाहरण आधारित प्रणाली का अनुसरण करता है। इस दृष्टिकोण से हटकर अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत को अपनाना उचित नहीं होगा।  
  3. अनुच्छेद 13 के अनुसार, यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो इसे उस सीमा तक शून्य माना जाएगा। दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कोई भी कानून जो संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, वह एक मृतजात कानून (स्टील बॉर्न लॉ) है। इसलिए, कोई भी कानून जिसे असंवैधानिक घोषित किया गया है, उसे उसके अधिनियमित होने के समय से शून्य माना जाना चाहिए। इस प्रकार, भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत अनुच्छेद 13 के तहत निर्धारित दिशा-निर्देशों के खिलाफ होगा।  

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू करने के लिए तीन महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित कीं, जो इस प्रकार हैं:  

  • भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत केवल संविधान की व्याख्या से संबंधित मामलों में ही लागू किया जा सकता है।  
  • इस सिद्धांत को केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही लागू किया जा सकता है।  
  • न्यायालय अपने निर्णय के भावी अनुप्रयोग के पहलुओं को, उसके समक्ष प्रस्तुत मामले या कारण के अनुसार, संशोधित कर सकता है।  

उपरोक्त शर्तों को लागू करते हुए, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि वह पूर्वव्यापी अधिनिर्णय  (रेट्रोस्पेक्टिव ओवररूलिंग) के सिद्धांत का पालन करता है, तो यह अराजकता उत्पन्न करेगा और पुराने नियम के तहत किए गए कई लेन-देन को प्रभावित करेगा। इसलिए, वर्तमान मामले में भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू किया जाएगा। 

इस मामले ने सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (संबंधित याचिकाओं के साथ) (1964) और श्री शंकरि प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य (1951) में दिए गए फैसलों को पलट दिया। साथ ही, यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 13 का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है और संविधान संशोधन, अनुच्छेद 12 के तहत, एक वैध कानून है। अदालत के इस निर्णय से पहले किए गए संवैधानिक संशोधनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। केवल भविष्य के संशोधनों को इस मामले में निर्धारित सिद्धांतों का पालन करना होगा।  

विभिन्न न्यायाधीशों के असहमति वाले विचार इस मामले में कई न्यायाधीशों ने असहमति व्यक्त की। न्यायमूर्ति बच्छावत ने कहा कि अनुच्छेद 368, संविधान संशोधनों के लिए शक्ति और प्रक्रिया दोनों प्रदान करता है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं। संसद को संविधान संशोधन का अधिकार दिया गया है। हालांकि, संविधान के कुछ हिस्से जैसे कि स्वतंत्रता का सिद्धांत, धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत, और संविधान की मुख्य संरचना को किसी भी परिस्थिति में संशोधित नहीं किया जा सकता, और ऐसा करने का अधिकार संसद को नहीं दिया जाना चाहिए।  

केशवानंद भारती श्रीपदगलावरु और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (1973) के मामले में यह निर्णय दिया गया कि संविधान को संशोधित करने की शक्ति संसद को दी गई है, लेकिन यह शक्ति अनंत नहीं है। न्यायमूर्ति वांचू ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 368 के तहत किए गए संशोधनों की प्रकृति अन्य सामान्य कानूनों के संशोधनों से अलग है। उनके अनुसार, संसद के पास एक विशेष शक्ति है जिसे “संविधान निर्माण शक्ति” कहा जाता है। यह शक्ति संविधान में संशोधन करने की अनुमति देती है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं।  

मामले का परिणाम 

इस फैसले के बाद, 1971 में 24वें संविधान संशोधन को लागू किया गया, जिसने इस निर्णय को पलट दिया। अनुच्छेद 368 में संशोधन किए गए, जिसमें “शक्ति” शब्द और अनुच्छेद 13(4) जोड़ा गया। गोलकनाथ मामले में कहा गया था कि संसद संविधान में संशोधन नहीं कर सकती क्योंकि अनुच्छेद 368 में केवल संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख है, शक्ति का नहीं। 24वें संविधान संशोधन के बाद, संसद को संविधान में संशोधन करके मौलिक अधिकारों को सीमित या समाप्त करने की शक्ति प्राप्त हो गई।  

आइए एक हालिया निर्णय पर चर्चा करें, जहां इस सिद्धांत को लागू किया गया था क्योंकि इससे संबंधित पक्षों के अधिकार प्रभावित हुए थे और इसे पलटने से उन पूर्व मामलों पर प्रभाव पड़ सकता है जो पहले ही न्यायालयों द्वारा निर्णय किए जा चुके हैं।

खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकरण आदि बनाम मैसर्स भारतीय इस्पात प्राधिकरण(2024)

यह मामला 9044 दिनों से लंबित मामलों में से एक था। केंद्र सरकार ने 1957 में खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (‘खान अधिनियम’) पारित किया। खान अधिनियम की धारा 9 के तहत, खान पट्टा (लीज) धारकों को रॉयल्टी का भुगतान करना पड़ता था, जब भी कोई खनिज क्षेत्र से उपभोग किया जाता था या हटाया जाता था।  

तमिलनाडु सरकार ने 1963 में इंडिया सीमेंट लिमिटेड को खनन के लिए पट्टा दिया। इस पर एक रॉयल्टी तय की गई, जिसके ऊपर मद्रास पंचायत अधिनियम, 1958 के तहत स्थानीय उपकर (सेस) भी देना पड़ता था। कंपनी ने इसे चुनौती दी, यह कहते हुए कि राज्य को रॉयल्टी पर उपकर लगाने का अधिकार नहीं है। एकल-न्यायाधीश पीठ ने निर्णय दिया कि सरकार इस प्रकार का उपकर लगा सकती है, क्योंकि यह भूमि पर कर है। इस फैसले से असंतुष्ट होकर, इंडिया सीमेंट लिमिटेड ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। 1989 में, सात-न्यायाधीश पीठ ने इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में कहा कि रॉयल्टी अप्रत्यक्ष रूप से खनिजों से संबंधित है।  

इसी प्रकार, खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकरण बिहार में खनन पर रॉयल्टी से संबंधित समान समस्या का सामना कर रही थी। यह मुद्दा अब एक श्रृंखलाबद्ध विवाद में बदल गया, जिसमें 80 से अधिक मामले जुड़े हुए थे। तीन-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि यह मामला मुख्य रूप से इंडिया सीमेंट लिमिटेड के फैसले से संबंधित है और इसे नौ-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा गया।  

इस मामले में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बा राव ने सुझाव दिया कि निर्णय को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने से अराजकता उत्पन्न होगी और न्यायालय की स्थिरता पर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि निर्णय को केवल भविष्य के मामलों पर लागू करना एक समझदारी भरा कदम होगा, जिससे जटिल परिस्थितियों को संभाला जा सके।  

अब, वर्तमान मामले में, नौ-न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने की। उन्होंने इस सिद्धांत को लागू करने के लिए सात मुख्य सिद्धांत बताए:  

  1. इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक हित में किए गए पिछले कार्यों की रक्षा करना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अमान्य कानूनी सिद्धांतों को वैध माना जाएगा। केवल भविष्य की तारीख तय की जाती है, जब से सिद्धांत प्रभावी होगा। 
  2. अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को मामलों में राहत देने की शक्ति प्राप्त है।
  3. सिद्धांत केवल तभी लागू किया जाएगा, जब पूर्व उदाहरण पलटे जाएं और नए मुद्दों पर निर्णय हो। 
  4. संस्थानों और पक्षों को नए कानूनी सिद्धांतों के साथ समायोजित करने के लिए समय दिया जाता है, जो आर्थिक और सामाजिक व्यवधान को रोकने में मदद करता है। 
  5. इस सिद्धांत के अनुप्रयोग के तहत, पिछले मामलों में निपटाए गए मुद्दों को फिर से खोलने से रोका जाता है। यह अवैध कानूनों के लिए वापसी की आवश्यकता को सीमित करता है और मुकदमों की बहुलता से बचाता है। 
  6. यह सिद्धांत कानूनों के बदलाव के समय सुचारू संक्रमण में मदद करता है और सुनिश्चित करता है कि लोग पुराने नियमों का पालन करके अनुचित रूप से प्रभावित न हों। 
  7. पूरी तरह से हल किए गए मामलों को फिर से नहीं खोला जाएगा, ताकि जटिलता और कठिनाइयों से बचा जा सके।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का न्यायिक अनुप्रयोग

वामन राव और अन्य बनाम भारत संघ (1981) के मामले में, महाराष्ट्र कृषि भूमि (होल्डिंग्स पर सीमा) अधिनियम, 1961 ने महाराष्ट्र राज्य में लोगों की कृषि भूमि पर कुछ सीमाएँ लगाई थीं। यह अधिनियम संविधान की नौवीं अनुसूची का हिस्सा था। इस अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय में 2000 से अधिक याचिकाएँ दायर की गईं। उच्च न्यायालय ने यह माना कि इस अधिनियम को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

न्यायालय ने कहा कि यह कानून केशवानंद भारती श्रीपदगलवारु और अन्य बनाम केरल राज्य (1973) के मामले के निर्णय से पहले नौवीं अनुसूची में जोड़े गए थे। न्यायालय ने निर्णयों के बीच एक रेखा खींची जो इस निर्णय से पहले और बाद में दिए गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि फैसले से पहले निर्णय किए गए सभी मामलों को यह कहते हुए चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। केवल वे मामले जो इस निर्णय के बाद आए, उन्हें न्यायालय में उठाया जा सकता है।

पिछले कानून सामाजिक असमानता को कम करने और राष्ट्र के विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे। इसलिए, केवल पहले के मामलों को कानूनी चुनौती नहीं दी जाएगी। यद्यपि अधिनियम के पहले के नियम असंवैधानिक घोषित कर दिए गए थे, लेकिन इस सिद्धांत के न्यायिक अनुप्रयोग के कारण अधिनियम के तहत हुए पूर्व लेन-देन वैध बने रहेंगे।

भारत संघ और अन्य बनाम मोहम्मद रमज़ान खान (1990) के मामले में, संविधान के अनुच्छेद 311 को 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधित किया गया। इस संशोधन के तहत, किसी अभियुक्त को उसकी अनुशासनात्मक (डिसिप्लिनरी) कार्यवाही की जाँच रिपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया। अभियुक्त को बिना कारण बताए बर्खास्त किया जा सकता था। इस संशोधन को अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई।

न्यायालय ने भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि इस निर्णय की तारीख से, किसी भी निकाय द्वारा ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता, जिसमें दिए गए दंड के लिए कारण प्रदान किए बिना आदेश पारित किया गया हो।

न्यायालय ने कर्मचारियों को राहत प्रदान की। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसे पद से निलंबित/हटाने का कारण क्या है। बिना कारण बताए आदेश पारित करना, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

इस मामले में बने सिद्धांत की वैधता को न्यायालय ने ईसीआईएल, हैदराबाद के प्रबंध निदेशक बनाम बी. करूणाकर और अन्य (1993) के मामले में परखा। एक सरकारी कर्मचारी को बिना उचित कारण बताए और जाँच रिपोर्ट दिए बर्खास्त कर दिया गया। इस बर्खास्तगी को अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई।

जब इस मामले में भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू किया गया, तो सबसे महत्वपूर्ण कारक यह था कि पुराने शासन के तहत हुए पूर्ववर्ती लेन-देन को कोई नुकसान या असमानता नहीं होनी चाहिए। भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि न्यायालय का निर्णय केवल भविष्य में लागू होगा।

चूंकि वर्तमान मामले में सरकारी कर्मचारी को भारत संघ बनाम मोहम्मद रमज़ान खान (1990) के मामले के निर्णय से पहले बर्खास्त किया गया था, इसलिए इस निर्णय के भावी प्रभाव के कारण बर्खास्तगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हालांकि, कर्मचारी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर आदेश को चुनौती दे सकता था और मामले में नई कार्यवाही की मांग कर सकता था। इस प्रकार, इस मामले में भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत लागू नहीं किया गया, क्योंकि बर्खास्तगी उस निर्णय से पहले हुई थी। उस समय ऐसा कोई नियम, कानून या सिद्धांत अस्तित्व में नहीं था, इसलिए निर्णय से पहले की गई कोई भी कार्यवाही प्रभावित नहीं होती।  

ओडिशा सीमेंट लिमिटेड बनाम ओडिशा राज्य (1991) के मामले में, आवेदक-आकलनकर्ता (असेसी) ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश राज्यों द्वारा खनन भूमि से प्राप्त रॉयल्टी के आधार पर लगाए गए उपकर की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। यह दावा किया गया कि यह राज्य विधायिकाओं की विधायी क्षमता के बाहर है। इसके अलावा, उपकर/रॉयल्टी की वापसी की मांग भी की गई। जिन कानूनों को चुनौती दी गई, वे थे ओडिशा उपकर अधिनियम, 1962 और उसके तहत नियम, बंगाल उपकर अधिनियम, 1880, मध्य प्रदेश उपकर अधिनियम, 1981, और मध्य प्रदेश कराधान अधिनियम, 1982।  

यह देखा गया कि इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य (1989)  के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि यदि किसी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जाता है और उस अधिनियम के प्रावधानों के तहत कुछ धनराशि अधिनियम के असंवैधानिक घोषित होने से पहले वसूल की गई हो, तो राज्य उन धनराशियों को वापस करने के लिए बाध्य नहीं है।  

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि न्यायालय के निर्णय को भविष्य में प्रभावी माना जाना चाहिए, न कि पूर्वव्यापी प्रभाव दिया जाना चाहिए। चूंकि अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया गया था, इसलिए केवल इस आदेश की तिथि से लगाए गए उपकर/रॉयल्टी को ही वापस किया जाएगा। अधिनियम के असंवैधानिक घोषित होने से पहले राज्य द्वारा लगाए गए उपकर/रॉयल्टी को वापस करने का प्रावधान नहीं था।

इंद्रा साहनी आदि बनाम भारत संघ और अन्य (1992) का मामला, जिसे प्रसिद्ध रूप से मंडल आयोग मामला कहा जाता है, आरक्षण के मुद्दों पर आधारित है। मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ बी सी) के लिए 27% आरक्षण और सामाजिक, शैक्षिक/आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (एस ई बी सी) के लिए 10% अतिरिक्त आरक्षण की सिफारिश की थी। लोगों ने तर्क दिया कि केवल जाति के आधार पर आरक्षण देना समानता और भेदभाव-निषेध के सिद्धांत का उल्लंघन है। इंद्रा साहनी और उनके समर्थकों ने यह तर्क दिया कि आरक्षण केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर होना चाहिए, न कि व्यक्ति की जाति के आधार पर।  

इस मामले में रंगाचारी का निर्णय पलट दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि निर्णय को पूरी तरह अमान्य घोषित करने के बजाय, उसमें कुछ मामूली बदलाव किए जा सकते हैं। इस मामले में न्यायिक सृजनात्मकता (क्रिएटिविटी) का उपयोग किया गया ताकि यह परिवर्तन बिना किसी रुकावट के किया जा सके, क्योंकि इस मामले में कई लोगों और उनके अधिकार शामिल थे। परिणामस्वरूप, भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का उपयोग किया गया ताकि पिछले लेन-देन प्रभावित न हों।  

इस मामले का निर्णय नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किया गया, जिसमें 6:3 के मत से फैसला लिया गया। उन्होंने आरक्षण से संबंधित कुछ ऐतिहासिक दिशानिर्देश दिए। यह माना गया कि इस निर्णय का प्रभाव, निर्णय की तारीख से केवल 5 साल बाद लागू होगा। भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि इस निर्णय का प्रभाव पिछली घटनाओं पर न पड़े।  

हर्ष ढींगरा बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2001) के मामले में, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1977 की धारा 30 को चुनौती दी गई। इस धारा के तहत, हरियाणा के मुख्यमंत्री को अपनी इच्छा से भूखंड आवंटित करने का पूर्ण अधिकार दिया गया था। यह विवेकाधिकार किसी भी प्रकार की न्यायिक समीक्षा से मुक्त था। इस कानून को मनमानेपन और संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू करते हुए, न्यायालय ने पहले से तय मुद्दों को फिर से खोलने और कार्यवाही की बहुलता को रोकने का प्रयास किया। यह सिद्धांत अनिश्चितता और अनावश्यक मुकदमों से बचने में भी सहायता करता है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करने से पहले किए गए सभी कार्य/लेन-देन इस सिद्धांत के तहत व्यापक जनहित (लार्जर पब्लिक इंटरेस्ट) में वैध माने जाते हैं।

अधीनस्थ न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे उच्च न्यायालयों द्वारा स्थापित कानून के भावी प्रभाव को भविष्य के मामलों में लागू करें। भावी अधिनिर्णय न केवल संवैधानिक नीति का हिस्सा है, बल्कि यह स्टेयर डिसीसिस (पूर्व निर्णयों पर टिके रहना) का विस्तारित पहलू है और यह न्यायिक कानून निर्माण नहीं है।  

अमेरिकी न्यायशास्त्र में भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का स्थान  

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत अमेरिकी न्यायशास्त्र से उत्पन्न हुआ है। इस सिद्धांत के लागू होने और मान्य होने से पहले, अमेरिकी न्याय प्रणाली ब्लैकस्टोनियन सिद्धांत का पालन करती थी। इस सिद्धांत के अनुसार, अदालतों के पास नए कानून बनाने की शक्ति नहीं थी। यह माना गया कि अदालतों का कर्तव्य केवल पहले से मौजूद कानूनों की व्याख्या करना और स्पष्टीकरण देना है। हालांकि, कई अमेरिकी न्यायविद इस सिद्धांत के खिलाफ थे, और इस विरोध ने भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को अपनाने का मार्ग प्रशस्त किया। अमेरिकी न्यायविद जॉर्ज एफ. कैनफील्ड ने कहा था कि अदालत का कर्तव्य है कि वह किसी पुराने नियम को, यदि वह अप्रभावी या वर्तमान कानूनी ढांचे में असंगत हो चुका है, पहचान कर एक नया नियम प्रस्तावित करे।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत की उत्पत्ति के पीछे मुख्य व्यक्ति न्यायधीश कार्डोजो थे। उन्होंने इस सिद्धांत को पहली बार ग्रेट नॉर्दर्न रेलवे बनाम सनबर्स्ट ऑयल एंड रिफाइनिंग कंपनी (1932) के मामले में पेश किया। इस मामले में, संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार इस सिद्धांत को अपनाया। न्यायालय ने यह माना कि किसी पूर्व कानून/निर्णय को पलटते समय, न्यायालय अपने निर्णय को भविष्य में प्रभावी बनाने का अधिकार रखता है। इस सिद्धांत को अपनाने के पीछे न्यायालय ने यह तर्क दिया कि किसी भी पक्ष को कानून में बदलाव या न्यायालय के रुख में परिवर्तन के कारण हानि नहीं होनी चाहिए। अर्थात्, यदि किसी निर्णय को पूर्वव्यापी प्रभाव दिया जाता है, तो पुराने कानून के तहत किए गए सभी लेन-देन अमान्य माने जाएंगे। इसलिए, पिछले लेन-देन पर ऐसे प्रभाव को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायालय के निर्णय केवल भविष्य में प्रभावी हों।

इस मामले में न्यायाधीश ने अपने निर्णय को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने से इनकार कर दिया। भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का उद्देश्य किसी पूर्व उदाहरण को निरस्त करना है, बिना अतीत में दिए गए निर्णयों को प्रभावित किए। यदि भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को लागू नहीं किया गया, तो कानून के विकसित होने की प्रकृति कमजोर पड़ जाएगी और यह न्यायिक सक्रियता के विपरीत होगा।

न्यायाधीश बेंजामिन एन. कार्डोजो का यह भी मानना था कि कानूनों को समय के साथ समाज में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार विकसित होना चाहिए यदि कानून स्थिर रहेंगे, तो वे उपयोगी नहीं होंगे। यदि समाज बदलता और विकसित होता रहे, लेकिन कानून पुराने बने रहें, तो इससे अन्याय उत्पन्न होगा। कानूनों को समाज के वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार बदला जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता, तो लोग अन्याय का सामना करेंगे। इसलिए, भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत नागरिकों को समय पर और निष्पक्ष समाधान प्रदान करने में सहायक उपकरण के रूप में कार्य करता है।  

चिकोट काउंटी ड्रेनेज डिस्ट्रिक्ट बनाम बैक्सटर स्टेट बैंक (1940) के मामले में, ह्यूजेस की अध्यक्षता वाली अदालत ने यह माना कि किसी कानून के तहत हुई पिछली कार्रवाइयों/लेन-देन पर उस कानून को असंवैधानिक घोषित करने का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। अतीत में हुए लेन-देन को एक नए न्यायिक निर्णय के आधार पर प्रभावित या शून्य नहीं किया जा सकता।  

ग्रिफिन बनाम इलिनोइस (1956) के मामले में, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी मामले की संवैधानिक वैधता का निर्धारण करते समय अदालत “या तो/या” दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य नहीं है। वे मामले को अपने अनुसार उपयुक्त तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं और एक भावी प्रभाव वाला निर्णय दे सकते हैं।

 

अंग्रेजी न्यायशास्त्र में भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत

अमेरिका में प्रचलित ब्लैकस्टोनियन सिद्धांत की आलोचना अंग्रेजी न्यायविदों जैसे जेरेमी बेंथम और जॉन ऑस्टिन ने की थी। ऑस्टिन ने कहा कि केवल यह विचारधारा कि कानून अदालत द्वारा नहीं बनाया गया और यह चमत्कारिक रूप से अस्तित्व में है, केवल एक कल्पना है। कानून पहले भी न्यायाधीशों द्वारा अदालतों में बनाया गया था और भविष्य में भी समय-समय पर ऐसा ही होगा।  

प्रैक्टिस स्टेटमेंट (ज्यूडिशियल प्रिसीडेंट) (1966) में हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने देखा कि ब्लैकस्टोनियन सिद्धांत समय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और अदालतें मौजूदा कानूनों और निर्णयों में संशोधन करने और उनसे अलग होने के लिए अधिकृत हैं यदि उन्हें ऐसा करना उचित लगे। मिलांगास बनाम जॉर्ज टेक्सटाइल्स लिमिटेड (1976) एसी 433 के मामले में, हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने निर्धारित (लिक्विडेट) हर्जाने के दावे पर विचार करते हुए यह माना कि भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का अनुप्रयोग करने से किसी भी पूर्व लेन-देन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि यह केवल निर्णय की तिथि से भविष्य के लेन-देन पर प्रभाव डालेगा।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के लाभ

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के कई लाभ हैं, जिसके कारण यह सिद्धांत केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्वभर में कई वर्षों से प्रचलन में है।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का एक प्रमुख लाभ यह है कि यह अन्याय को रोकने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, यदि न्यायालय पूर्वव्यापी रूप से कार्य करते हैं, तो जब कोई नया कानून अस्तित्व में आता है, तो इस कानून से पहले दिए गए निर्णय अमान्य माने जाएंगे, जो कि सही नहीं है और इसमें संबंधित पक्षों के अधिकारों को नुकसान होगा। यह उन पक्षों के लिए अनुचित होगा जिन्होंने उस समय मान्य कानूनों का पालन किया था। इसलिए, भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के सिद्धांत से एक सहज संक्रमण सुनिश्चित किया जा सकता है।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का अगला लाभ यह है कि यह न्यायिक नवाचार को प्रोत्साहित करता है। इस सिद्धांत के प्रचलन में होने से, कानूनों और अन्य नियमों को समय की आवश्यकता के अनुसार आसानी से संशोधित किया जा सकता है। यह सिद्धांत उन अस्थिरताओं और अराजकता को रोकता है जो किसी ऐतिहासिक निर्णय के साथ उत्पन्न होती हैं, जब वर्तमान कानूनी सिद्धांतों को अदालती पूर्व उदहारण को पलटकर बदला जाता है।  

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत यह भी सुनिश्चित करता है कि संबंधित पक्षों को नवप्रवर्तित (न्यूली इंट्रोड्यूस्ड) कानूनों को अपनाने के लिए पर्याप्त समय मिले, जिससे कोई अव्यवस्था न हो। पुराने मामलों को फिर से खोलने की कठिनाई को भी रोका जा सकता है। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि सभी पक्षों के अधिकार संरक्षित रहें और नए नियमों या कानूनों से उन्हें अनुचित रूप से प्रभावित न किया जाए।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत की आलोचना

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत की, विश्वभर में इसके उपयोग के बावजूद, अक्सर आलोचना की जाती है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि इस सिद्धांत के अनुसार, जो कानून असंवैधानिक घोषित किया गया है, वह भविष्य के मामलों पर लागू नहीं होगा, लेकिन चल रहे मामलों पर लागू होगा। ऐसे मामलों में शामिल पक्षों को यह निश्चित रूप से अनुचित लग सकता है। यह अस्थिरता और असंगति भी पैदा करता है। इसके अलावा, क्योंकि ऐसे कानून केवल भविष्य के मामलों पर लागू होते हैं, इसकी अनुकूलन प्रक्रिया बहुत धीमी हो सकती है, जिससे भ्रम उत्पन्न होता है और न्याय में बाधा आती है।  

निष्कर्ष 

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत का मतलब केवल यह है कि किसी न्यायालय का निर्णय भावी प्रभाव का होगा और न्यायालय द्वारा निर्णय सुनाए जाने से पहले हुए किसी भी लेन-देन को प्रभावित नहीं करेगा। इस सिद्धांत को लागू करते समय जिन मुख्य शर्तों का पालन किया जाना चाहिए, वे निम्नलिखित हैं: 

  • इसे केवल संविधान की व्याख्या से संबंधित मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए। 
  • इसे केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही लागू किया जाना चाहिए। 
  • अदालत अपने निर्णय के संभाव्य अनुप्रयोग की विशेषताओं को, उसके सामने कारण या विषय की न्यायिक आवश्यकता के अनुसार, संशोधित कर सकती है।  

यह सिद्धांत भारतीय न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह सुनिश्चित करता है कि किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करने से अतीत के लेन-देन को अमान्य कर सार्वजनिक हित को प्रभावित न किया जाए। आई.सी. गोलकनाथ और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (1967) जैसे ऐतिहासिक मामलों ने इस सिद्धांत को कैसे और किस सीमा तक लागू किया जाता है, इस पर स्पष्टता प्रदान की है।  

यह भी देखा जा सकता है कि यह सिद्धांत भारतीय संविधान को आकार देने में सहायक रहा है। इस सिद्धांत के उपयोग से देश में हो रहे विकास और निष्पक्षता के बीच संतुलन बना रहता है। यह सिद्धांत संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है और नए कानूनों को लागू करते समय असंगतियों से बचने में मदद की है।  

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ ए क्यूस) 

सिद्धांत को कैसे लागू किया जाता है? 

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को तब लागू किया जाता है जब संवैधानिक अदालतें किसी पूर्व निर्णय को खारिज कर एक नया कानून लागू करती हैं, जो सभी भविष्य के मामलों में लागू होगा। यह नया कानून केवल भविष्य के मामलों में लागू किया जाएगा, जबकि पहले से दिए गए निर्णयों वाले मामलों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को पहली बार किस देश ने पेश किया? 

संयुक्त राज्य अमेरिका वह पहला देश था जिसने भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को पेश किया। इसे ग्रेट नॉर्दर्न रेलवे बनाम सनबर्स्ट ऑयल एंड रिफाइनिंग कंपनी (1932) के मामले में अपनाया गया।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को कब लागू किया जा सकता है? 

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत को केवल संवैधानिक मामलों में लागू किया जा सकता है।  

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत कैसे लाभकारी है?

भावी अधिनिर्णय का सिद्धांत एक नए कानून के लागू होने के बाद मामलों की बहुलता की कार्यवाही से बचने में मदद करता है। यह सिद्धांत उन मामलों को दोबारा खोलने से भी रोकता है, जो पहले ही निपटाए जा चुके हैं।  

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के मुख्य नियम क्या हैं?

भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत के मुख्य नियम यह हैं कि इसे केवल संवैधानिक मामलों में और केवल देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा उपयोग किया जा सकता है। अदालतें इस सिद्धांत का उपयोग यह तय करने के लिए भी कर सकती हैं कि नए नियम और विनियम कितने समय तक भूतकाल में लागू किए जाने चाहिए।  

संदर्भ

 

भारतीय दंड संहिता के तहत राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के अपराध का एक अवलोकन 

यह लेख Harsha Shashwat द्वारा लिखा गया है, जो लॉसीखो से “उच्चतम न्यायालय प्रैक्टिस और मुकदमेबाजी में उन्नत डिप्लोमा: ड्राफ्टिंग, प्रक्रिया और रणनीति प्लस अधिवक्ता ऑन रिकॉर्ड परीक्षा को क्रैक करने के लिए व्यापक प्रशिक्षण” पाठ्यक्रम कर रही हैं।  इस लेख में हम भारतीय दंड संहिता के तहत राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने का एक अवलोकन करेंगे। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

परिचय  

भारतीय दंड संहिता 1860 की स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद इसे कानूनी प्रणाली की नींव के रूप में अपनाया गया। भारतीय दंड संहिता अपराधों के लिए सजा निर्धारित करती है, इसलिए इसे सभी कानूनों की ‘माता’ कहा जा सकता है।  

मूल रूप से इसमें 23 अध्याय और 511 धाराएं थीं, लेकिन नवीनतम भारतीय न्याय संहिता 2023 (बी एन एस) के साथ अब इसे घटाकर 358 धाराओं तक सीमित कर दिया गया है और यह 1 जुलाई 2024 से लागू हो गई।  

राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना क्या है?

एक ऐसा हिंसक कृत्य जो किसी देश की शांति और पवित्रता को भंग करता है, राजद्रोह (ट्रीसन) के रूप में जाना जाता है। इसमें देश के प्रति अविश्वास प्रदर्शित करने वाले विभिन्न प्रकार के व्यवहार शामिल होते हैं। राजद्रोह कई रूपों में प्रकट हो सकता है, जैसे कि पृथकतावाद (सेसेशन), विद्रोह (इंस्रैक्शन), विध्वंसक गतिविधियाँ, अलगाववाद (सेपरेटिस्म) और देश की संप्रभुता को खतरे में डालने वाले कार्य।   

पृथकतावाद में किसी क्षेत्र या व्यक्तियों के समूह का देश से अलग होकर एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई स्थापित करने का प्रयास शामिल है। यह मौजूदा राजनीतिक संरचना के खिलाफ एक स्पष्ट चुनौती है और केंद्र सरकार के अधिकार को चुनौती देता है। पृथकतावादी आंदोलन अक्सर जातीय, धार्मिक, या सांस्कृतिक मतभेदों, या अधिक स्वायत्तता (ऑटोनोमी) की इच्छा के कारण उत्पन्न होते हैं। 

 

दूसरी ओर, विद्रोह स्थापित सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह या बगावत है। इसमें मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को बलपूर्वक गिराने और उसे एक नई व्यवस्था से बदलने के लिए बल या हिंसा का उपयोग शामिल है। विद्रोह अक्सर राजनीतिक शिकायतों, सरकार की नीतियों से असंतोष, या प्रतिनिधित्व की कमी के कारण प्रेरित होते हैं।   

विध्वंसक गतिविधियाँ राजद्रोह का एक और रूप हैं, जिसमें सरकार के अधिकार और स्थिरता को कमजोर करने के उद्देश्य से गुप्त कार्य शामिल हैं। इनमें प्रचार और गलत जानकारी फैलाने से लेकर तोड़फोड़ और जासूसी तक की गतिविधियाँ शामिल हो सकती हैं। विध्वंसक तत्व अक्सर गुप्त रूप से कार्य करते हैं, सरकार को भीतर से अस्थिर करने का प्रयास करते हैं।  

अलगाववाद एक बड़े राजनीतिक ढांचे से अलग होने की वकालत या प्रयास है। अलगाववादी आंदोलन जातीय, धार्मिक, या भाषाई मतभेदों के आधार पर एक स्वतंत्र राज्य या स्वायत्त क्षेत्र बनाने की कोशिश करते हैं। अलगाववाद हिंसक संघर्षों को जन्म दे सकता है, क्योंकि यह देश की क्षेत्रीय अखंडता और एकता को चुनौती देता है।  

अंततः, देश की संप्रभुता को खतरे में डालने वाले किसी भी कार्य में स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता, या राष्ट्र की राजनीतिक स्वायत्तता को धमकी देना शामिल है। इसमें विदेशी हस्तक्षेप, सैन्य कब्जा, या ऐसे अनुचित समझौते शामिल हो सकते हैं जो देश की संप्रभुता को कमजोर करते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कार्य, जैसे विदेशी शक्तियों को संवेदनशील जानकारी प्रदान करना, भी राजद्रोह माना जा सकता है।  

राजद्रोह एक गंभीर अपराध है जो किसी देश की स्थिरता और सुरक्षा पर प्रहार करता है। यह कानून के शासन को कमजोर करता है, सरकार के अधिकार को घटाता है, और नागरिक अशांति और हिंसा को जन्म दे सकता है। देश आमतौर पर राजद्रोह के कार्यों को रोकने और दंडित करने के लिए कड़े कानून बनाते हैं, क्योंकि इसे उच्चतम स्तर का विश्वासघात माना जाता है।  

  • पृथकतावाद का मतलब किसी बड़े राजनीतिक निकाय या संगठन से औपचारिक रूप से अलग होना है। इसमें स्वयं को एक स्वतंत्र पक्ष घोषित करना शामिल है। इस लक्ष्य को शांति या हिंसा के किसी भी माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।  
  • विद्रोह का मतलब बड़े पैमाने पर हिंसा के माध्यम से सरकार के प्रति गुस्सा प्रदर्शित करना है, जैसे कि प्रदर्शन या जुलूस। 
  • विध्वंसक गतिविधियाँ वे हिंसात्मक क्रियाएँ हैं जो केवल डर और अस्थिरता पैदा करने के उद्देश्य से की जाती हैं। 
  • अलगाववाद तब होता है जब लोग धर्म, संस्कृति, जाति, और लिंग के आधार पर विभाजित होते हैं। इसमें ऐसे समूहों को जानबूझकर समाप्त करने या उनके जीने के अधिकार को किसी भी रूप में नियंत्रित करने का डर हो सकता है, जैसे कि उन्हें उनके मौलिक अधिकारों, सम्मान के साथ जीने के अधिकार आदि से वंचित करना, जो विद्रोह का रूप ले सकता है। 
  • किसी देश की संप्रभुता को खतरे में डालने का मतलब किसी भी ऐसे माध्यम से देश को खतरे में डालना है जिससे देश की नींव कमजोर हो। उदाहरण के लिए, अलगाववादियों की मदद करना, अंतरराष्ट्रीय संधियों की अनदेखी करना, व्यापार पर प्रतिबंध लगाना, प्रोटोकॉल का उल्लंघन करना आदि।  

यहाँ भारतीय दंड संहिता की क्या भूमिका है  

भारतीय दंड संहिता, जिसे अब भारतीय न्याय संहिता 2023 के नाम से जाना जाता है, सभी समस्याओं का समाधान है। भारतीय न्याय संहिता 2023 में आई पी सी के उन प्रावधानों को बड़े पैमाने पर शामिल किया गया है जो देश में शांति और सौहार्द (हार्मनी) को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों से संबंधित हैं।  

पहले, आई पी सी का अध्याय VI उन अपराधों से संबंधित था जो राज्य के खिलाफ किए गए थे। इन धाराओं में 121, 121A, 122, 123, 124 और 124A शामिल थीं। अब भारतीय न्याय संहिता 2023  में ये अपराध अध्याय VII के तहत आते हैं, जो कि धारा 147, 148, 149, 150 और 151 में शामिल हैं।  

राजद्रोह की धारा को भारतीय न्याय संहिता 2023 से हटा दिया गया है। लेकिन नए अपराध, जैसे पृथकतावाद, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियाँ, अलगाववादी गतिविधियाँ, या देश की संप्रभुता या एकता को खतरे में डालना, भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत धारा 150 में संबोधित किए गए हैं और धारा 152 के तहत अपराध घोषित किए गए हैं।  

सार्वजनिक शांति को समान महत्व दिया गया है और इसे आई पी सी के अध्याय VIII में विस्तार से संबोधित किया गया था। इसमें दंगे (राइट्स), आंतरिक अशांति और अन्य अवैध सभा शामिल हैं। जिन धाराओं का उपयोग किया जा सकता था, वे 153, 153A, 153B, 157, और 158 थीं। अब भारतीय न्याय संहिता 2023 में ये अपराध अध्याय IX के तहत आते हैं, जो कि धारा 192, 196, 197, 189(7), और 189(8) में शामिल हैं।  

आई पी सी का अध्याय XV उन सभी गैरकानूनी कार्यों से संबंधित था जो धर्म या किसी विशेष विचारधारा के नाम पर किए जाते हैं। इसमें धारा 296, 295A, 295 और 298 का उपयोग किया जा सकता था। अब भारतीय न्याय संहिता 2023 में ये अपराध अध्याय XVI के तहत आते हैं, जो कि धारा 300, 299, 298 और 302 में शामिल हैं।  

कुछ महत्वपूर्ण कानूनी मामले 

नजीर खान बनाम दिल्ली राज्य का मामला एफआईआर नंबर 658/1994 से संबंधित है, जो पी.एस. कनॉट प्लेस, दिल्ली में दर्ज की गई थी। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सभी छह आरोपियों को आतंकवादी और विघटनकारी (डिस्रप्टिव) गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (टी ए डी ए) की धारा 3(1) और 3(5) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी पाया गया। विशेष रूप से, नजीर खान (A-1) और नासिर महमूद सोदोज़े (A-8) को बिना वैध दस्तावेज़ और पासपोर्ट के भारत में प्रवेश करने के लिए विदेशी अधिनियम की धारा 14 के तहत भी दोषी ठहराया गया।  

राज्य (दिल्ली एनसीटी) बनाम नवजोत संधू उर्फ अफ़सान गुरु का मामला 13/12/2001 को संसद पर हमले से संबंधित है। चार लोग— मोहम्मद अफ़ज़ल, शौकत हुसैन गुरु, एस.ए.आर. गिलानी, और नवजोत संधू (अफ़सान गुरु)— पर आरोप लगाया गया था। वे स्वचालित राइफल्स, पिस्तौल, हैंड ग्रेनेड और इलेक्ट्रॉनिक विस्फोटक (डेटोनेटर) से भारी हथियारों से लैस थे। यह हमला लगभग 30 मिनट तक चला, जिसमें 9 लोगों की मौत हुई और 16 घायल हुए। नवजोत संधू पर भारतीय सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश से संबंधित साक्ष्य छिपाने का आरोप लगाया गया था। यह अपराध आईपीसी की धारा 123 के तहत था, जो अब भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 150 के तहत आता है, और उन्हें 5 साल की कैद की सजा सुनाई गई।  

सीमाएँ  

राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना केवल देश के भीतर किसी भी असामाजिक तत्वों द्वारा उत्पन्न आंतरिक अशांति और उपद्रव तक सीमित नहीं है। कोई भी विदेशी इकाई या समूह, जो देश की शांति को घुसपैठ, बमबारी, हथियार और गोलाबारूद भेजने या साइबर आतंकवाद जैसे किसी डिजिटल माध्यम से बाधित करने का प्रयास करता है, इसमें शामिल है। एक हालिया मामले में, भारत ने चीनी कंपनी टिक टॉक पर प्रतिबंध लगाया, क्योंकि यह आशंका थी कि यह शॉर्ट-फॉर्म वीडियो ऐप के माध्यम से संवेदनशील उपयोगकर्ता डेटा तक पहुँच सकता है। यही पब्बजी के साथ भी किया गया। सुरक्षा कारणों से भारतीय सरकार ने 581 ऐप्स और 174 सट्टेबाजी और जुआ ऐप्स को ब्लॉक कर दिया।  

भारतीय इतिहास में निर्णायक रहे कुछ प्रमुख मामले :-

  • खालिस्तान आंदोलन का मामला, जिसमें सिखों के लिए एक अलग मातृभूमि की मांग की गई थी। 1970 के दशक के दौरान, यह आंदोलन तेजी से बढ़ा, जिसमें बमबारी, अपहरण और कई मौतें हुईं, जिसमें एयर इंडिया की फ्लाइट 182 की बमबारी भी शामिल थी, जिसमें 329 लोग मारे गए थे। 1984 में, ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में छिपे कई आतंकवादियों को मार गिराया। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख बॉडीगार्ड द्वारा की गई। सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों के कारण, खालिस्तान आंदोलन कमजोर हो गया। हाल ही में, यह फिर से जोर पकड़ रहा है। कनाडा में रहने वाले सिखों का एक बड़ा समूह विरोध प्रदर्शन कर रहा है और भारत में सिखों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन भारत से प्यार करने वाले अधिकांश सिख इसका विरोध कर रहे हैं।  
  • अन्य दो महत्वपूर्ण मामले 13/12/2001 का भारतीय संसद हमला और 26/11/2008 का मुंबई आतंकवादी हमला थे। इसका प्रभाव केवल दिल्ली, मुंबई या भारत तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसकी आलोचना विश्व स्तर पर की गई। इस प्रकार की गतिविधियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए कई संशोधन और अधिनियम पारित किए गए। संसद ने दो विधेयक भी पारित किए—एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एन आई ए) की स्थापना के लिए, जिसे विशेष शक्तियाँ दी गईं, और दूसरा कानूनों में संशोधन करने के लिए ताकि इस प्रकार की गतिविधियों के खिलाफ अधिक सख्त कार्रवाई की जा सके। भारतीय सेना ने समय-समय पर इन आतंकवादी संगठनों का जवाब उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक के माध्यम से दिया।  

सुझाव

भारत, जिसकी 140 करोड़ की जनसंख्या और व्यापक भौगोलिक संरचना है, उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर, दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैली हुई है। यह नौ पड़ोसी देशों—अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका—से जुड़ा हुआ है। भारत की विशाल भूमि सीमाएँ, विविध भूभाग जैसे रेगिस्तान, उपजाऊ भूमि, दलदली क्षेत्र, बर्फ से ढके और उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) सदाबहार वन, और भौगोलिक जटिलताएँ (कॉम्प्लेक्सिटी) देश की सुरक्षा बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।  

हमारे देश के सामने कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं:  

  • सीमापार आतंकवाद (क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म): यह पड़ोसी देशों के बीच असहमति के प्रमुख कारणों में से एक है। संघर्षविराम (सीजफायर) उल्लंघन और बमबारी की हमेशा संभावना रहती है, जिसके लिए सरकार ने मजबूत निगरानी तकनीक तैयार की है।  
  • घुसपैठ (इन्फिलटेरेशन): पाकिस्तान जैसे देशों में राजनीतिक अस्थिरता और संकट सीमापार घुसपैठ में वृद्धि का कारण बनते हैं। बार-बार होने वाली घुसपैठ राष्ट्र के लिए खतरा है। अवैध प्रवास, तस्करी, और हथियार, गोला-बारूद और ड्रग्स की बिक्री आम प्रथाएँ बन गई हैं। इसके लिए सरकार ने दीवारों और बाड़ (फेंसिंग) जैसे भौतिक अवरोध बनाए हैं ताकि सीमा पार कोई अनधिकृत पारगमन न हो। और चेकपॉइंट्स पर उचित बैरिकेड्स, सतर्कता टीम और उपकरणों की व्यवस्था की गई है। हाल ही में जम्मू और कश्मीर के रियासी जिले में एक तीर्थयात्रियों की बस पर एक आतंकवादी समूह ने हमला किया।  
  • साइबर आतंकवाद: कई ऑनलाइन ऐप्स, गेम्स, और दुर्भावनापूर्ण (मलेशियस) लिंक लॉन्च करना, जो किसी भी तरह से देश के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। इसके लिए सरकार ने साइबर फोरेंसिक क्षमताओं के विकास में निवेश किया है। गृह मंत्रालय ने साइबर अपराध से निपटने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करने हेतु I4C लॉन्च किया है।  

इसे केवल मजबूत कानूनों और मशीनरी के माध्यम से ही शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है। कुछ उपाय, राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर और क्षेत्र और उसके लोगों के भीतर, इस सुधार में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। आर्थिक विकास लोगों को अवैध गतिविधियों में शामिल होने से रोक सकता है। शिकायतों को संबोधित करके और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देकर कट्टरता को रोका जा सकता है। समुदायों को अहिंसक विकल्पों और विवाद समाधान (कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन) के तरीकों के बारे में शिक्षित करना। हाल ही में सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन में, एक विशेष समुदाय इस कानून के लागू होने से नाराज हो गया। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा इसके लाभ और हानि के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता थी, बजाय इसके कि कुछ राजनीतिक और धार्मिक पक्ष लोगों को गलत जानकारी देकर गुमराह करें, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे विरोध प्रदर्शन हुए।

निष्कर्ष  

समय-समय पर कानूनों को मजबूत करने के लिए अधिनियमों और संशोधनों के माध्यम से कदम उठाए गए हैं ताकि देश में शांति और व्यवस्था का माहौल बना रहे। किसी व्यक्ति या समाज के अनैतिक और बेईमान व्यवहार पर अंकुश लगाने और नियंत्रण रखने के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचे की आवश्यकता है और भारतीय दंड संहिता, अब भारतीय न्याय संहिता 2023, ऐसा आधार प्रदान करती है। कानूनों में विनियमन बहुत आवश्यक है ताकि कोई अपराधी किसी भी खामी के कारण स्वतंत्र न घूम सके।  

संदर्भ

 

अनुबंध के 20 उल्लेखनीय मामले

यह लेख Oishika Banerji द्वारा लिखा गया है और Sakshi Kuthari द्वारा इसे और अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख उल्लेखनीय अनुबंध मामले पर चर्चा करने से पहले अनुबंध के विभिन्न पहलुओं और आयामों, और इसके आवश्यक तत्वों के साथ-साथ इसकी वैधता और शून्यता पर चर्चा करता है। यह उनके तथ्यों, मुद्दों और निर्णयों पर विस्तार से चर्चा करता है। ये मामले प्रस्ताव और स्वीकृति, अवयस्कता (माइनॉरिटी), प्रतिफल जैसे मौलिक सिद्धांतों से लेकर अनुबंध को पूरा करने की असंभवता तक के हैं। इन मामलों ने न्यायालय को विभिन्न मामलों में कानूनी सिद्धांतों के अनुप्रयोग में स्थिरता बनाए रखने में मदद की है।  इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है। 

परिचय

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (इसके बाद 1872 के अधिनियम के रूप में संदर्भित) भारत में अनुबंध कानून की नींव रखता है। यह निजी व्यक्तियों के बीच होने वाले किसी भी प्रकार के वाणिज्यिक (कमर्शियल) लेनदेन में निष्पक्षता और स्पष्टता सुनिश्चित करता है। अनुबंध कानून प्रस्ताव, स्वीकृति, प्रतिफल, योग्यता, वैध उद्देश्य, आदि से संबंधित नियमों में निहित है। 1872 का अधिनियम एक वैध अनुबंध में प्रवेश करने वाले पक्षों को कई अधिकार और दायित्व प्रदान करता है। भारतीय न्यायालयों ने अनुबंध कानून के विकास को आकार देने वाले विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से अनुबंध कानून के सिद्धांतों की व्याख्या और विस्तार किया है।

अनुबंध कानून आम तौर पर व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित होता है जिसका अर्थ है “निजी अधिकार। इसका मतलब है कि एक अनुबंध केवल दो निजी व्यक्तियों के बीच बनता है जो एक दूसरे के साथ अनुबंध में प्रवेश करते हैं। विभिन्न मामलों में, न्यायालय ने इस विचार को मजबूत किया है कि अनुबंध केवल दो निजी व्यक्तियों के बीच करार नहीं हैं, बल्कि संविदात्मक दायित्वों (कॉन्ट्रैक्चुअल ओब्लिगेशंस) को पूरा करने के लिए बाजार में विश्वास बनाए रखने के लिए भी बनाए जाते हैं। समय के विकास और समाज की जरूरतों के साथ, अनुबंध कानून की व्याख्या और लागू करने में न्यायपालिका की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

प्रत्येक मामला किसी न किसी तरह से अनुबंध कानून की समझ को आगे बढ़ाता है, अस्पष्ट प्रावधानों पर स्पष्टता प्रदान करके और अनुबंध के समय उत्पन्न होने वाली वाणिज्यिक जटिलताओं को भी संबोधित करता है। अनुबंध कानून के संबंध में विभिन्न अवधारणाएं हैं जिन्हें मामलो की मदद से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इस लेख का उद्देश्य अपने पाठकों को समान प्रदान करना है। 

एक वैध अनुबंध की अनिवार्यता

1972 के अधिनियम की धारा 2 (h) “अनुबंध” को दो या दो से अधिक पक्षों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी करार के रूप में परिभाषित करती है। इसके प्रदर्शन से पहले एक वैध अनुबंध के सभी आवश्यक तत्वों का होना आवश्यक है, क्योंकि यह अनुबंध के लिए पक्षों के बीच निर्धारित नियमों और शर्तों को निर्धारित करता है। महत्वपूर्ण मामलों में शामिल होने से पहले, आइए मामलों की बेहतर समझ के लिए एक वैध अनुबंध की अनिवार्यताओं को समझें, जो इस प्रकार हैं:

  1. प्रस्ताव: “प्रस्ताव” शब्द को 1872 के अधिनियम की धारा 2 (a) के तहत परिभाषित किया गया है, और यह कुछ करने (या नहीं करने) का वादा है, बशर्ते प्रस्तावग्रहिता बदले में कुछ करता है (या नहीं करता है)। 
  2. स्वीकृति: 1872 के अधिनियम की धारा 2 (b) “स्वीकृति” शब्द को परिभाषित करती है। एक प्रस्ताव, जब स्वीकार किया जाता है, तो एक करार में परिवर्तित हो जाता है। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो दोनों पक्षों के बीच एक अनुबंध का गठन होता है।
  3. प्रतिफल: सरल शब्दों में प्रतिफल का अर्थ है “बदले में कुछ”। इसे 1872 के अधिनियम की धारा 2 (d) के तहत परिभाषित किया गया है। इस प्रावधान में यह प्रदान किया गया है कि प्रतिफल भूत, वर्तमान या भविष्य के लेन-देन हो सकते हैं। 1872 के अधिनियम की धारा 25 के तहत, एक सामान्य नियम है कि कुछ अपवादों के अधीन बिना प्रतिफल के एक करार शून्य है।
  4. वैध उद्देश्य: यदि किसी करार का प्रतिफल या उद्देश्य गैरकानूनी है, तो करार को अवैध या गैरकानूनी माना जाता है। उदाहरण के लिए, वैध लाइसेंस के बिना शराब की बिक्री अवैध मानी जाती है।
  5. अनुबंध करने वाले पक्षों की योग्यता: 1872 के अधिनियम की धारा 11 में यह प्रावधान है कि एक नाबालिग, अस्वस्थ दिमाग के व्यक्ति और कानून द्वारा अनुबंध में प्रवेश करने से अयोग्य व्यक्ति को छोड़कर सभी व्यक्ति अनुबंध करने के लिए सक्षम हैं।
  6. सहमति और स्वतंत्र सहमति: 1872 के अधिनियम की धारा 13 के तहत, “सहमति” शब्द को परिभाषित किया गया है। पक्षों को 1872 के अधिनियम की धारा 14 के तहत परिभाषित अपनी स्वतंत्र सहमति के साथ अनुबंध में प्रवेश करना चाहिए। 
  7. वैध इरादा: 1872 के अधिनियम की धारा 10 को मात्र पढ़ने से, यह समझा जा सकता है कि एक वैध अनुबंध बनाने के लिए आवश्यक अनिवार्यता, सामग्री में से एक के रूप में ‘कानूनी संबंध बनाने के इरादे’ को निर्दिष्ट नहीं करती है।
  8. अनुबंध को शून्य घोषित नहीं किया गया : कोई करार यद्यपि ऐसी प्रकृति का हो कि वह वैध अनुबंध की सभी शर्तों को पूरा करता हो, तथापि उसे देश में प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित नहीं किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय मामले 

नीचे चर्चा किए गए मामले अनुबंध कानून न्यायशास्त्र से संबंधित हैं और वे अनुबंधों के कानून पर अत्यधिक महत्व रखते हैं।

बालफोर बनाम बालफोर (1919)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, एक जोड़े ने अगस्त, 1900 में शादी कर ली। पति सीलोन (अब श्रीलंका) सरकार के कर्मचारी थे और वर्ष 1915 तक एक साथ वहां रहते थे। पति के छुट्टी पर होने के कारण नवंबर 1915 में दोनों वापस इंग्लैंड आ गए। वे अगस्त, 1916 तक एक साथ इंग्लैंड में रहे, जब पति की छुट्टी समाप्त हो गई और उन्हें वापस लौटना पड़ा।
  • डॉक्टर की सलाह के अनुसार, पत्नी को इंग्लैंड में कुछ और महीनों तक रहना था। वह रूमेटाइड अर्थराइटिस से पीड़ित थी। 8 अगस्त, 1916 को, जब पति नौकायन की तैयारी कर रहा था, उसने अपनी पत्नी को प्रति माह तीस पाउंड प्रदान करने का मौखिक वादा किया, जब तक कि वह सीलोन में उसके साथ शामिल नहीं हो जाती।
  • पति और पत्नी के बीच अलग रहने के लिए कोई करार नहीं हुआ था। इसके बाद पत्नी ने प्रतिवादी से प्रति माह तीस पाउंड भुगतान करने के वादे को लागू कराने के लिए मुकदमा दायर किया।
  • पति ने दलील दी कि उसके द्वारा किया गया वादा कानूनी संबंध और अनुबंध संबंधी दायित्वों को बनाने के इरादे के बिना एक घरेलू व्यवस्था थी।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या पति और पत्नी के बीच कोई वैध अनुबंध मौजूद था?

मामले का फैसला 

  • इस मामले में अपील की न्यायालय ने माना कि कोई अनुबंध नहीं था क्योंकि कानूनी संबंध बनाने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए, पति उत्तरदायी नहीं था। एक सामान्य धारणा मौजूद है कि पति-पत्नी के बीच किए गए घरेलू और सामाजिक करार कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुबंध नहीं हैं। इसने भविष्य में इसी तरह के घरेलू करार के लिए एक निहित अनुमान भी स्थापित किया।
  • इस मामले ने “कानूनी प्रतिक्रिया सिद्धांत (लीगल रिएक्शन थ्योरी)” स्थापित किया। इस सिद्धांत का अर्थ है कि एक वैध कार्य बाद के कानूनी कार्य के प्रभावी होने के लिए जिम्मेदार होगा। यह निर्धारित करना भी न्यायालय का कर्तव्य है कि मुकदमे के पक्षों का करार करने का इरादा है या नहीं और दायित्वों के अपने हिस्से को पूरा करें। 
  • लॉर्ड जस्टिस एटकिन ने कहा कि पति और पत्नी के बीच किए गए करार, खास तौर पर निजी पारिवारिक रिश्तों में, उन्हें भरण-पोषण लागत और अन्य लागतें प्रदान करने के लिए आमतौर पर अनुबंध नहीं माने जाते। इसका कारण यह है कि करार के पक्ष ऐसा करार करने का इरादा नहीं रखते जिसे कानूनी रूप से लागू किया जाना चाहिए।
  • घरेलू करार को कानूनी रूप से बाध्यकारी बताने का दावा करने वाले पक्ष पर यह दायित्व है। उसे यह भी साबित करना चाहिए कि मुकदमे के पक्षों का कानूनी संबंध बनाने का इरादा था। इस मामले में, यह पाया गया कि पत्नी यह साबित करने में सक्षम नहीं थी कि उसके पति का इरादा कानूनी रूप से लागू करने योग्य करार बनाने का था। इस मामले में यह माना गया कि अनुबंध को लागू करने की मांग करने वाले पक्ष पर सबूत का बोझ है।
  • यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वे व्यापक दृष्टिकोण को ध्यान में रखें और घरेलू करार के निर्माण के पीछे की वस्तु का मूल्यांकन करते समय मौजूदा परिस्थितियों पर विचार करें। न्यायालय द्वारा मामले के तथ्यों और पति-पत्नी के बीच मौजूद वैवाहिक संबंधों की स्थिति की जांच करना भी आवश्यक समझा गया था, यह मानते हुए कि कानूनी संबंध बनाने का इरादा मौजूद था।
  • इस मामले ने सामाजिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी करार के बीच भेदभाव को जन्म दिया।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख को देखें बालफोर बनाम बाल्फोर (1919)

लालमन शुक्ल बनाम गौरी दत्त (1913)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, प्रतिवादी का भतीजा घर से भाग गया। अभियुक्त ने अपने नौकरों से अलग-अलग जगहों पर अपने भतीजे की तलाश करने के लिए कहा। इनमें वादी भी था, जिसे उसकी फर्म में मुनीम नियुक्त किया गया था।
  • वादी को प्रतिवादी के भतीजे की तलाश में हरिद्वार भेजा गया। उसने वादी को उसके रेलवे किराए और अन्य खर्चों के लिए पैसे दिए। बाद में, प्रतिवादी ने विभिन्न स्थानों पर पर्चे जारी कर उसके भतीजे को ढूंढने वाले को 501 रुपये का इनाम देने की घोषणा की।
  • वादी ने प्रतिवादी के भतीजे को ऋषिकेश में ढूंढ़ निकाला और उसे वहीं पाया। उसने पर्चा देखने से पहले प्रतिवादी के भतीजे को लौटा दिया और इस तरह 501 रुपये का इनाम नहीं मांगा। करीब छह महीने बाद वादी को बर्खास्त कर दिया गया और फिर उसने प्रतिवादी से इनाम की राशि का दावा किया। वादी ने तर्क दिया कि अनुबंध, मकसद या ज्ञान की गोपनीयता आवश्यक नहीं थी।
  • प्रतिवादी ने तर्क दिया कि वादी का दावा केवल एक अनुबंध के आधार पर बनाए रखा जा सकता है। प्रस्ताव की स्वीकृति और उस पर सहमति होनी चाहिए। इस मामले में पक्षों के बीच कोई अनुबंध नहीं था और किसी भी मामले में वादी पहले से ही वह करने के लिए बाध्य था जो उसने किया था और इसलिए, वसूली का हकदार नहीं था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या वादी की कार्रवाई को प्रतिवादी के प्रस्ताव की वैध स्वीकृति के रूप में माना जाए?
  • क्या यह कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुबंध है या नहीं?
  • क्या वादी को 501 रुपये दिए जाने चाहिए?

मामले का फैसला

  • माननीय न्यायालय ने पाया कि वादी प्रतिवादी द्वारा विज्ञापित इनाम की राशि से अनजान था। प्रतिवादी के भतीजे को वापस लाना वादी की ओर से प्रस्ताव की स्वीकृति का गठन नहीं करता था। वादी को 501 रुपये के इनाम का दावा करने का अधिकार नहीं था।
  • इस मामले ने अनुबंध के गठन के समय ज्ञान और संचार के महत्व पर जोर दिया। किसी मामले को कानूनी रूप से लागू करने योग्य होने के लिए, यह आवश्यक है कि प्रस्ताव के संबंध में ज्ञान और सहमति दोनों मौजूद हों। इसके बाद ही प्रस्ताव समझौते में परिवर्तित होता है।
  • इस मामले में, वैध करार को लागू करने की कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई, क्योंकि वादी इससे अनजान था और प्रतिवादी के प्रस्ताव से सहमत नहीं था। यह अनुबंध कानून में सामान्य प्रस्तावों को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण सिद्धांत भी है, और एक सामान्य प्रस्ताव का एक उत्कृष्ट उदाहरण एक खोए हुए सामान को खोजने के लिए विज्ञापन के माध्यम से इनाम की पेशकश करना है। प्रस्तावक (ऑफ़रर) द्वारा आवश्यक कार्य पूरा करने वाले व्यक्ति को प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए कहा जाता है।
  • यह भी कहा गया कि भतीजे की तलाश करने के लिए वादी पर पहले से ही एक मौजूदा दायित्व था। इसलिए, 501 रुपये के इनाम के लिए पात्र होने के लिए आवश्यक कार्य के प्रदर्शन को प्रतिवादी के वादे के प्रतिफल के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस कारण वादी का आवेदन खारिज कर दिया गया।

अधिक जानकारी के लिए यह लेख लालमन शुक्ल बनाम गौरी दत्त (1913) देखें।

हार्वे बनाम फेसी (1893)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, श्री हार्वे श्री फेसी के स्वामित्व वाली जमीन का एक टुकड़ा खरीदना चाहते थे। 7 अक्टूबर, 1892 को, हार्वे से एक टेलीग्राम फेसी को भेजा गया था जिसमें पूछा गया था कि क्या वह जमीन के टुकड़े की कीमत के साथ वापस आकर बम्पर हॉल पेन को बेच देगा। फेसी ने उसी दिन टेलीग्राम के माध्यम से जवाब दिया कि बम्पर हॉल पेन की सबसे कम कीमत नौ सौ पाउंड थी। जैसे ही श्री हार्वे को यह जवाब मिला, उन्होंने आगे एक टेलीग्राम भेजा, जिसमें कहा गया था, “हम आपके द्वारा पूछे गए नौ सौ पाउंड के लिए बम्पर हॉल पेन खरीदने के लिए सहमत हैं”। उन्होंने श्री फेसी द्वारा उस भूमि के शीर्षक विलेख (डीड) के लिए भी कहा।
  • हार्वे एक विश्वास के तहत था कि फेसी ने उसे जवाब देकर नौ सौ पाउंड के लिए जमीन बेचने का स्पष्ट प्रस्ताव दिया था। हार्वे का मानना था कि उन दोनों के बीच एक अनुबंध का गठन किया गया था और हार्वे के अंतिम संदेश के लिए फेसी से कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।
  • फेसी पर हार्वे द्वारा इस आधार पर मुकदमा दायर किया गया था कि उनकी पूछताछ के लिए फेसी की प्रतिक्रिया ने जमीन बेचने का प्रस्ताव पेश किया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था, जिससे एक वैध अनुबंध बन गया।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या फेसी ने हार्वे को नौ सौ पाउंड में जमीन बेचने की स्पष्ट पेशकश की थी?
  • क्या फेसी द्वारा सबसे कम कीमत का हवाला देते हुए भेजा गया टेलीग्राम, स्वीकार्य प्रस्ताव था?
  • क्या हार्वे और फेसी के बीच एक अनुबंध बनाया गया था?

मामले का फैसला

  • यह प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति द्वारा आयोजित किया गया था कि फेसी ने हार्वे को जमीन बेचने के लिए एक स्पष्ट प्रस्ताव नहीं दिया था। हार्वे यह मानने में गलत धारणा के तहत था कि फेसी ने एक प्रस्ताव दिया था, जब वास्तव में, उसने नहीं किया था। न्यूनतम बिक्री मूल्य का मात्र विवरण केवल पेशकश के लिए एक निमंत्रण है, प्रस्ताव नहीं। नतीजतन, टेलीग्राम ने कोई संविदात्मक और कानूनी दायित्व नहीं बनाया।
  • नौ सौ पाउंड स्वीकार करने वाले हार्वे की प्रतिक्रिया, वास्तव में अपने आप में एक प्रस्ताव था, जिसे फेसी स्वीकार या अस्वीकार करने के विवेक के तहत था। जैसा कि फेसी ने हार्वे के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, उनके बीच कोई अनुबंध नहीं बनाया गया था। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उनके बीच कोई अनुबंध नहीं बनाया गया था क्योंकि फेसी ने हार्वे के पहले सवाल का जवाब नहीं दिया था कि क्या वह जमीन का टुकड़ा बेचेगा।

इसके बजाय, उन्होंने केवल जमीन की कीमत के बारे में जानकारी प्रदान की, जो एक प्रस्ताव का गठन नहीं करता है। यह माना गया कि जब तक कोई स्पष्ट प्रस्ताव नहीं दिया जाता है, तब तक कोई स्वीकृति नहीं हो सकती है। प्रस्ताव और स्वीकृति दोनों के बिना, एक वैध अनुबंध नहीं हो सकता है।

  • हार्वे द्वारा जमीन खरीदने का अनुरोध करने वाला संचार एक प्रस्ताव था जिसे फेसी ने वापस नहीं किया। फेसी की प्रतिक्रिया ने हार्वे के प्रस्ताव को स्वीकार करने का कोई इरादा दिखाए बिना, केवल संपत्ति की सबसे कम कीमत प्रदान की। फेसी की प्रतिक्रिया एक वैध प्रस्ताव नहीं थी, बल्कि केवल पेशकश करने का निमंत्रण था। इसलिए, हार्वे और फेसी के बीच कोई वैध अनुबंध नहीं बनाया गया था, जो हार्वे के संपत्ति हासिल करने के प्रयास का विरोध करता था।
  • इस ऐतिहासिक मामले ने “प्रस्ताव के लिए आमंत्रण” की अवधारणा और प्रस्ताव के लिए आमंत्रण और प्रस्ताव के बीच अंतर को स्थापित किया। प्रस्ताव के लिए आमंत्रण का मतलब है कि यह केवल उन शर्तों का प्रारंभिक विवरण है जिन पर वे अनुबंध के संबंध में आगे की चर्चा में शामिल होने के लिए तैयार हो सकते हैं।
  • प्रस्ताव की स्वीकृति की जानकारी उस व्यक्ति को अवश्य दी जानी चाहिए जिसने प्रस्ताव रखा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कानूनी रूप से लागू करने योग्य करार के लिए पक्षों के कार्यों को अनुबंध बनाने की आवश्यकता होती है। दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति (सर्वसम्मति विज्ञापन विचार) की अनुपस्थिति यही कारण है कि यह एक प्रस्ताव का गठन नहीं करता है। इस प्रकार, इस मामले ने स्पष्ट रूप से समझाया कि प्रस्ताव का निमंत्रण एक वैध प्रस्ताव का गठन नहीं कर सकता है और एक वैध अनुबंध का आधार नहीं बनता है।

फ़ेल्टहाउस बनाम बिंडले (1862) 

मामले के तथ्य

  • इस मामले में याचिकाकर्ता पॉल फ़ेल्टहाउस ने अपने भतीजे जॉन फ़ेल्टहाउस से उसके घोड़े को खरीदने के बारे में बात की थी। पॉल ने जॉन को एक पत्र लिखकर जवाब दिया। पत्र में कहा गया था कि अगर पॉल को घोड़े के बारे में कोई जवाब नहीं मिलता है, तो वह मान लेगा कि घोड़ा उसका है।
  • याचिकाकर्ता के पत्र पर जॉन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। जॉन नीलामी में व्यस्त था और उसने अपने नीलामीकर्ता बिंडले को सूचित किया कि वह उक्त घोड़े को रखना चाहता है और उसे घोड़ा नहीं बेचने के लिए कहा।
  • नीलामीकर्ता (बिंदले) ने गलती से घोड़े को किसी और को बेच दिया।
  • फेल्टहाउस ने बिंडले पर मुकदमा दायर किया और घोड़े के स्वामित्व का दावा किया।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या पॉल फेल्टहाउस को घोड़े का वैध मालिक माना जाना चाहिए?
  • क्या चुप्पी या किसी प्रस्ताव को अस्वीकार करने में विफलता एक स्वीकृति का गठन करती है?

मामले का फैसला

  • यह माना गया कि कोई अनुबंध नहीं बनाया गया था क्योंकि भतीजे ने पॉल फेल्टहाउस को अपनी स्वीकृति के बारे में नहीं बताया था। इसका तात्पर्य यह है कि पॉल फेल्टहाउस घोड़े का मालिक नहीं बना, और न ही उसकी कार्रवाई को न्यायालय ने स्वीकार किया।
  • यह देखा गया कि भतीजे का प्रस्ताव स्वीकार करने या नीलामीकर्ता को उस इरादे को सूचित करने का इरादा अनुबंध बनाने के लिए अपर्याप्त था।
  • यह भी माना गया कि प्रस्तावक प्रस्तावकर्ता से प्रस्ताव के आमंत्रण का उत्तर देने की मांग नहीं कर सकता। इसलिए, चुप्पी को प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं माना जा सकता।
  • यह प्रस्तावग्रहिता का अधिकार है कि वह निर्दिष्ट समय के भीतर प्रस्ताव को स्वीकार न करके प्रस्ताव को व्यपगत (लैप्स्ड) होने दे। 
  • न्यायालय द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया था कि एक प्रस्ताव की स्वीकृति के संचार के संबंध में एक पूर्ण स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि एक वैध अनुबंध के गठन की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। 

फार्मास्युटिकल सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन बनाम बूट्स कैश केमिस्ट (दक्षिणी) लिमिटेड (1953)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, दुकानदार (प्रतिवादी) का “स्वयं सेवा की दुकान” में व्यवसाय था। दुकान में सामान को कीमत की चिट के साथ प्रदर्शित किया गया था। दुकान में प्रवेश करने पर, प्रत्येक ग्राहक को एक बैरियर पार करना पड़ता था और फिर दुकान के दो निकासों में से एक पर जाना पड़ता था।
  • प्रत्येक निकास द्वार पर एक चेक डेस्क था। प्रत्येक डेस्क पर एक कैशियर ग्राहकों द्वारा चुनी गई वस्तुओं का प्रबंधन करता था, उनके मूल्य की जांच करता था और चयनित वस्तुओं के लिए भुगतान की प्रक्रिया करता था। 
  • दुकान के एक हिस्से को दवाओं के लिए अलग रखा गया था, जिसे रसायनज्ञ (केमिस्ट) विभाग के रूप में वर्णित किया गया था। कुछ दवाओं में ज़हर भी था, जिसे पंजीकृत फार्मासिस्ट द्वारा ही बेचा जाना चाहिए।
  • दुकान में एक पंजीकृत फार्मासिस्ट ड्यूटी पर था। फार्मासिस्ट द्वारा वस्तुओं का निरीक्षण किया गया और उन्हें कैशियर को दिखाया गया। कैशियर के पास प्रतिवादी का अधिकार था कि अगर वह आवश्यक समझे तो किसी भी ग्राहक को दुकान के परिसर से दवा खरीदने से रोक सकता था। 
  • एक दिन, दो ग्राहकों ने उल्लिखित प्रक्रिया का पालन किया और कुछ जहर युक्त दवाएँ चुनीं।
  • वादी ने तर्क दिया कि अलमारियों पर सामान प्रदर्शित करना दुकानदार द्वारा एक प्रस्ताव था, जिसे ग्राहक ने एक वस्तु उठाकर स्वीकार कर लिया। 
  • दुकानदार ने तर्क दिया कि केवल बिक्री के लिए सामान प्रदर्शित करना प्रस्ताव नहीं बल्कि प्रस्ताव के लिए आमंत्रण है। इसलिए, ग्राहक एक वस्तु उठाकर खरीदने का प्रस्ताव देता है।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या बातचीत शुरू करने वाला प्रस्ताव दुकानदार का प्रस्ताव है या खरीदार का प्रस्ताव है?

मामले का फैसला

  • न्यायालय ने माना कि “स्वयं सेवा” स्टोर में भी वस्तुओं को प्रदर्शित करना, प्रस्ताव नहीं माना जाता बल्कि यह केवल प्रस्ताव के लिए आमंत्रण है। जब कोई ग्राहक कोई वस्तु चुनता है और उसे कैश डेस्क पर लाता है, तो इसे खरीदने का प्रस्ताव माना जाता है, जिसे दुकानदार स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
  • लॉर्ड गोडार्ड, सीजे द्वारा इस बात पर जोर दिया गया था कि बिक्री के लिए सामान का प्रदर्शन मात्र जनता के लिए एक संकेत है कि वह सामान की पेशकश करने के लिए तैयार है। लेकिन, यह बेचने की पेशकश का गठन नहीं करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सिद्धांत ‘स्वयं सेवा योजना’ से प्रभावित नहीं है। यह कहना गलत होगा कि दुकानदार दुकान में हर सामान को किसी भी व्यक्ति को बेचने का प्रस्ताव दे रहा है जो आ सकता है और वह व्यक्ति किसी भी वस्तु को खरीदने पर जोर दे सकता है। एक अनुबंध को तभी पूरा माना जाता है जब दुकानदार वस्तु बेचने की इच्छा व्यक्त करता है।
  • यह भी देखा गया कि जब कोई ग्राहक दुकानदार के पास कोई वस्तु लाता है, तो यह बेचने के प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं है, बल्कि ग्राहक द्वारा खरीदने के लिए एक प्रस्ताव है, और तब तक कोई बिक्री नहीं होती है जब तक कि खरीदार का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाता है। दुकानदार के पास ग्राहक के प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का विवेक है। 
  • न्यायालय ने कहा कि इसमें ग्राहकों को दवाएं दिखाना “प्रस्ताव के बजाय प्रस्ताव का आमंत्रण” है।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख को देखें ग्रेट ब्रिटेन की फार्मास्युटिकल सोसायटी बनाम मेसर्स बूट्स कैश केमिस्ट्स (दक्षिणी) लिमिटेड (1953)

भगवानदास गोवर्धनदास केडिया बनाम मेसर्स गिरधारीलाल पुरुषोत्तमदास एंड कंपनी (1966)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, वादी द्वारा प्रतिवादियों से कपास के बीज केक खरीदने के लिए अहमदाबाद से टेलीफोन पर एक प्रस्ताव दिया गया था।
  • प्रतिवादियों ने खामगांव में टेलीफोन द्वारा वादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। प्रतिवादियों ने वादी को कपास के बीज केक की आपूर्ति नहीं की। वादी ने अहमदाबाद में मुकदमा दायर किया और अनुबंध के उल्लंघन के लिए 31,150 रुपये की मुआवजे की राशि का दावा करते हुए प्रतिवादियों पर मुकदमा किया।
  • प्रतिवादी द्वारा यह तर्क दिया गया था कि अहमदाबाद न्यायालय के पास मामले की सुनवाई करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था क्योंकि अनुबंध टेलीफोन पर स्वीकृति द्वारा पूरा किया गया था।
  • वादी ने इसके विपरीत तर्क दिया कि अनुबंध तब पूरा हो गया था जब अहमदाबाद में उसे स्वीकृति दी गई थी (उसने टेलीफोन पर स्वीकृति सुनी)। इसलिए, मुकदमा अहमदाबाद न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या अनुबंध को स्वीकृति के स्थान पर या उस स्थान पर जहां स्वीकृति प्राप्त हुई थी, पूरा माना गया था?

मामले का फैसला

  • माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि टेलीफोन पर बातचीत के मामले में, अनुबंध की स्थिति वैसी ही होती है जैसे कि अनुबंध के पक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। अनुबंध तब पूरा माना जाता है जब प्रस्तावक को प्रस्तावकर्ता की ओर से स्वीकृति मिल जाती है, न कि तब जब प्रस्तावक प्रस्ताव देता है।
  • न्यायालय ने कहा कि क्यूंकि प्रतिवादी की स्वीकृति अहमदाबाद में संप्रेषित की गई थी, और अनुबंध के उल्लंघन के लिए कार्रवाई का कारण उसी स्थान से उत्पन्न हुआ था, इसलिए, मामला अहमदाबाद न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आया।
  • टेलीफोन पर बातचीत के मामले में, यह माना जाता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के साथ मौजूद हैं क्योंकि अनुबंध के दोनों पक्ष एक दूसरे की आवाज़ सुन सकते हैं। भाषण का तत्काल संचार, चाहे वह प्रस्ताव हो, स्वीकृति हो, अस्वीकृति हो या प्रति-प्रस्ताव हो, इलेक्ट्रॉनिक मोड द्वारा सुगम बनाया जाता है। इससे बातचीत की प्रकृति डाक या टेलीग्राफ के माध्यम से संचार जैसी नहीं हो जाती।
  • इसी मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया है कि फैक्स द्वारा भी पत्राचार तात्कालिक है और वास्तव में टेलीफोन संचार के माध्यम से किया जाता है। टेलेक्स द्वारा संचार के मामले में, सामान्य नियम लागू होगा और अनुबंध केवल तभी पूरा किया जाएगा जब प्रस्तावक द्वारा स्वीकृति प्राप्त की गई हो।
  • भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने मामले का निर्णय करते समय 1872 के अधिनियम की धारा 2, 3 और 4 को ध्यान में रखा। यह भी देखा गया कि यदि प्रस्ताव बनाने का स्थान अलग है और प्रस्ताव को स्वीकार करने का स्थान अलग है, तो यह अनुबंध के उल्लंघन या हर्जाने का दावा करने के मामले में कार्रवाई के कारण का हिस्सा नहीं बनता है। आम तौर पर, एक अनुबंध प्रस्ताव की स्वीकृति द्वारा लागू करने योग्य हो जाता है और स्वीकृति की सूचना उसी बाहरी अभिव्यक्ति द्वारा होनी चाहिए जिसे कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है, या कानून की दृष्टि में पर्याप्त है।

केदारनाथ भट्टाचार्जी बनाम गोरी मोहम्मद (1886)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, हावड़ा, कोलकाता में टाउन हॉल बनाने के लिए एक प्रस्ताव दिया गया था, बशर्ते कि सार्वजनिक सदस्यता के माध्यम से 40,000 रुपये का पर्याप्त धन उपलब्ध होगा।
  • वादी सहित आयुक्तों, जो नगर पालिका के उपाध्यक्ष भी थे, ने टाउन हॉल के निर्माण के लिए ठेकेदार के साथ एक अनुबंध किया। सदस्यता 40,000 रुपये की आवश्यक राशि के लिए प्राप्त हुई थी।
  • प्रतिवादी उन ग्राहकों में से एक था जिसने उक्त उद्देश्य के लिए सदस्यता पुस्तक में अपना नाम हस्ताक्षर करके 100 रुपये का भुगतान करने का वादा किया था।
  • वादे के अनुसार, एक ठेकेदार को काम पर रखा गया और प्रस्तावित टाउन हॉल का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
  • बाद में प्रतिवादी ने अपनी सदस्यता का हिस्सा देने से इनकार कर दिया, यह तर्क देते हुए कि प्रतिफल के अभाव के कारण वह कानूनी रूप से अपने वादे से बंधा नहीं था।
  • वादी (केदारनाथ) ने नगर पालिका के उपाध्यक्ष और हावड़ा टाउन हॉल फंड के ट्रस्टी के रूप में, प्रतिवादी पर उसके गैर-प्रदर्शन के लिए मुकदमा दायर किया।

 उठाए गए मुद्दे

  • क्या वादी का मुकदमा कानूनी रूप से बनाए रखने योग्य है?
  • क्या प्रतिवादी सदस्यता राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य है?

मामले का फैसला

  • माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि एक वैध अनुबंध में प्रवेश करने और वादे के विश्वास पर निर्माण कार्य शुरू करने के बाद वादे को लागू करने के लिए पर्याप्त प्रतिफल था। इसलिए, प्रतिवादी उसके द्वारा वादा की गई राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य था।
  • इस मामले में, व्यक्तियों को उस उद्देश्य को जानने के लिए सदस्यता लेने के लिए कहा गया था जिसके लिए धन का उपयोग किया जाना था। वे जानते हैं कि उनकी सदस्यता के विश्वास पर ठेकेदार को काम के लिए भुगतान करने के लिए एक दायित्व वहन किया जाना था।
  • यह देखा गया कि ऐसी परिस्थितियों में जहां भवन बनाने के लिए सदस्यता के माध्यम से उपक्रम (अंडरटेक्निंग) लिया जाता है, यह कहा जा सकता है कि इस तरह का वादा या उपक्रम प्रतिफल या वादा के बराबर है। एक वादा भी एक प्रतिफल है।
  • यह माना गया कि यह एक वैध अनुबंध था और इसका वैध प्रतिफल था। अनुबंध में एक अनुबंध के सभी आवश्यक तत्व शामिल थे जो कानून द्वारा लागू करने योग्य हैं और व्यक्तियों पर वादे के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए एक वैध दायित्व बनाया गया है।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख केदारनाथ भट्टाचार्जी बनाम गोरी मोहम्मद (1886) का संदर्भ लें।

दुर्गा प्रसाद बनाम बलदेव और अन्य (1880)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, वादी दुर्गा प्रसाद द्वारा उस स्थान के कलेक्टर के कहने पर एक बाजार में कुछ दुकानों का निर्माण किया गया था। बाद में, बलदेव और अन्य दुकानदारों, प्रतिवादियों ने बाजार में दुकानों में से एक पर कब्जा कर लिया।
  • क्यूंकि वादी ने बाजार के निर्माण के लिए पैसा खर्च किया था, इसलिए प्रतिवादियों ने उस बाजार में उसकी (प्रतिवादी की) एजेंसी के माध्यम से बेची गई वस्तुओं पर वादी दलाली (कमीशन) को भुगतान करने का वादा किया। प्रतिवादियों ने वादा किए गए दलाली का भुगतान नहीं किया।
  • वादी ने प्रतिवादी से दलाली वसूलने के लिए एक कार्रवाई की।

 उठाए गए मुद्दे

  • क्या दुर्गा प्रसाद और बलदेव के बीच मौखिक करार कानूनी रूप से बाध्यकारी है?
  • क्या मौखिक करार 1872 के अधिनियम के तहत एक वैध अनुबंध की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है, विशेष रूप से प्रतिफल से संबंधित?

मामले का फैसला

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पियर्सन और ओल्डफील्ड ने कहा कि क्यूंकि प्रतिवादी (इस मामले में वचनदाताकर्त्ता) की ओर से प्रतिफल नहीं दिया गया था, इसलिए यह एक वैध प्रतिफल नहीं था। इस कारण से, प्रतिवादियों के पास उनके द्वारा किए गए वादे के संबंध में कोई दायित्व नहीं था।
  • इस मामले में, “कानून के शासन” का सिद्धांत लागू किया गया था। यह मामला 1872 के अधिनियम की धारा 2 (d) से जुड़ा है। 1872 के अधिनियम की धारा 25 के साथ धारा 2 (d) में कहा गया है कि “बिना प्रतिफल के कोई भी करार शून्य है”। 
  • इस प्रकार, जब कानून स्वयं एक वैध करार की आवश्यकताओं को साफ करता है, तो ऐसा कोई मामला मौजूद नहीं हो सकता है जो वैधानिक नियमों के खिलाफ चलता हो। 

लेस्ली लिमिटेड बनाम शील (1914) 3 के.बी.607

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, प्रतिवादी, एक नाबालिग, ने खुद को एक वयस्क होने का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वादी (साहूकारों) से 200-200 पाउंड के दो ऋण प्राप्त किए।
  • वादी द्वारा 475 पाउंड की वसूली के लिए एक कार्रवाई की गई थी, जो कि ली गई ऋण की राशि और उस पर ब्याज की राशि थी।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या एक नाबालिग जिसने धोखाधड़ी से खुद को एक वयस्क के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, एक अनुबंध में प्रवेश कर सकता है और उस अनुबंध के तहत प्राप्त धन को चुकाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

मामले का फैसला

  • इंग्लिश न्यायालय ऑफ अपील ने “न्यायसंगत बहाली के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ एक्विटेबल रेस्टीटूशन)” की व्याख्या की। यह अंग्रेजी कानून कहता है कि यदि किसी नाबालिग ने किसी भी लेनदेन में अनुचित लाभ प्राप्त किया है, तो वह इस प्रकार प्राप्त लाभ को वापस करने के लिए बाध्य है। उक्त नियम केवल नाबालिग द्वारा प्राप्त वस्तुओं या संपत्ति पर लागू होता है, जब तक कि उनका पता लगाया जा सकता है, और अभी भी नाबालिग के कब्जे में हैं।
  • यह सिद्धांत पैसे पर लागू नहीं होता है क्योंकि पैसे की पहचान करना और यह साबित करना मुश्किल है कि यह वही पैसा है या अलग।
  • माल या संपत्ति के मामले में, यदि उनका उपभोग या हस्तांतरण किया गया है और उनका पता नहीं चल पाया है, तो बहाली का सिद्धांत लागू नहीं होता है।
  • बहाली के सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य अनुबंध को लागू करने के बजाय नाबालिग द्वारा लिए गए गैरकानूनी लाभ को बहाल करना है। यदि किसी नाबालिग को उस पैसे का भुगतान करने के लिए कहा जाता है जो उसने अवैध रूप से कमाया था, जिसका पता नहीं लगाया जा सकता है और उसके कब्जे में नहीं है, तो इसके परिणामस्वरूप करार को लागू किया जाता है।
  • न्यायालय ने आगे कहा कि जब भी पुनर्भुगतान शुरू होता है तो बहाली बंद हो जाती है, और समानता का सिद्धांत नाबालिग के खिलाफ किसी भी प्रकार के संविदात्मक दायित्वों को लागू नहीं करते हैं। 

टेलर बनाम कैलडवेल (1863)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, टेलर, वादी और कैलडवेल, प्रतिवादी ने एक अनुबंध में प्रवेश किया था जिसके द्वारा प्रतिवादी ने वादी को चार भव्य संगीत कार्यक्रमों की एक श्रृंखला देने के उद्देश्य से चार दिनों के लिए संगीत हॉल का उपयोग करने देने पर सहमति व्यक्त की थी, और वादी प्रत्येक दिन के लिए एक सौ पाउंड का भुगतान करने के लिए सहमत हुए।
  • करार करने के बाद और पहले दिन से पहले, जिसमें एक अनुबंध दिया जाना था, हॉल गलती से किसी भी पक्ष की गलती के बिना आग से नष्ट हो गया था। विनाश इतना पूर्ण था कि परिणामस्वरूप, गीत कार्यक्रम अपेक्षित रूप से आयोजित नहीं किया जा सका।
  • वादी ने करार के उल्लंघन के लिए नुकसान के लिए प्रतिवादी पर मुकदमा दायर किया।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या हॉल के विनाश जिसने अनुबंध के प्रदर्शन को असंभव बना दिया, के बावजूद कैलडवेल नुकसान के लिए उत्तरदायी है?

मामले का फैसला

  • किसी भी पक्ष की गलती के बिना, संगीत हॉल का अस्तित्व समाप्त हो गया। यह माना गया था कि कैलडवेल की ओर से किसी भी हिस्से के बिना संगीत हॉल के विनाश के कारण अनुबंध शून्य हो गया था। अनुबंध का प्रदर्शन असंभव हो गया था और इसलिए, कैलडवेल अनुबंध के गैर-प्रदर्शन के लिए उत्तरदायी नहीं था।
  • इस मामले में, यह भी पाया गया कि पक्षों ने इस आधार पर अनुबंध किया था कि जिस समय संगीत कार्यक्रम दिए जाने थे, उस समय संगीत हॉल का अस्तित्व बना रहना उनके प्रदर्शन के लिए आवश्यक था।

मोहोरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, वादी-प्रतिवादी, धर्मोदास घोष, जब वह नाबालिग था, ने प्रतिवादी, ब्रह्म दत्त के पक्ष में अपने घरों को  बंधक कर दिया, जो 12% ब्याज पर 20,000 रुपये का ऋण वसूलने के लिए साहूकार था।
  • इस राशि का एक हिस्सा वास्तव में वादी को अग्रिम दिया गया था। साहूकार ने स्वयं वार्ता में भाग नहीं लिया। उनकी ओर से बातचीत उनके वकील द्वारा की गई थी।
  • प्रस्तावित अग्रिम पर विचार करते समय, वकील को जानकारी मिली कि प्रतिवादी अभी भी नाबालिग था। जिस दिन बंधक को निष्पादित किया गया था, वकील ने नाबालिग को एक लंबी घोषणा पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा, जिसे उसने तैयार किया था, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग ने लगभग एक महीने पहले वयस्कता की आयु प्राप्त की थी। इस पर भरोसा करते हुए, साहूकार नाबालिग को 20,000 रुपये देने के लिए सहमत हो गया।
  • बंधक को निष्पादित किए जाने के समय वकील प्रतिवादी के नाबालिग होने के बारे में पूरी तरह से अवगत था।
  • बाद में, नाबालिग ने साहूकार के खिलाफ यह कहते हुए कार्रवाई की कि जब उसने बंधक को अंजाम दिया तो वह नाबालिग था। उन्होंने एक घोषणा के लिए प्रार्थना की कि बंधक विलेख शून्य और निष्क्रिय था, और इसलिए, रद्द कर दिया जाए।
  • प्रतिवादी द्वारा यह तर्क दिया गया था कि वादी ने धोखे से अपनी उम्र को गलत तरीके से प्रस्तुत किया था, और विबंधन (एस्टोपेल) का सिद्धांत उसके खिलाफ लागू होता है। संक्षेप में, वादी को यह दलील देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि अनुबंध में आने के समय वह नाबालिग था और इसलिए, इस मामले में नाबालिग को कोई राहत नहीं दी जानी चाहिए।
  • प्रतिवादी द्वारा यह भी तर्क दिया गया था कि भले ही नाबालिग द्वारा अनुरोध के अनुसार बंधक-विलेख रद्द कर दिया गया हो, नाबालिग को भी उस ऋण की राशि वापस करने के लिए बाध्य होना चाहिए जो उसने ली थी।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या उक्त मामले में बंधक विलेख 1872 के अधिनियम की धारा 2, 10 (5), और 11 (6) के तहत शून्य है?
  • क्या प्रतिवादी द्वारा शुरू किया गया बंधक शून्यकरणीय (वॉयडेबल) है?
  • क्या प्रतिवादी को बंधक विलेख के तहत प्राप्त ऋण राशि वापस करना आवश्यक था?

मामले का फैसला

  • नाबालिग के साथ करार को शून्य घोषित किया गया था क्योंकि बंधक का निष्पादन एक नाबालिग व्यक्ति द्वारा किया गया था, और नाबालिग को ऋण राशि चुकाने के लिए नहीं कहा जा सकता था।
  • न्यायालय ने करार करने के समय वादी को नाबालिग पाया और यह तथ्य प्रतिवादी के एजेंट को पता था। यह माना गया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 11 में दिया गया एस्टोपेल का कानून इस मामले में लागू नहीं होता है, क्योंकि इस मामले में उम्र से संबंधित बयान एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया था जो वास्तविक तथ्यों को जानता था और असत्य बयान से गुमराह नहीं हुआ था।
  • प्रतिवादी द्वारा यह भी तर्क दिया गया था कि यदि वादी के बंधक को रद्द करने का आदेश देने के दावे की अनुमति दी जाती है, तो नाबालिग 1872 के अधिनियम की धारा 64 और 65 के तहत उसके द्वारा लिए गए ऋण की राशि वापस करेगा है। प्रिवी काउंसिल ने माना कि 1872 के अधिनियम की धारा 64 के तहत धन की बहाली नहीं दी जा सकती क्योंकि एक नाबालिग का करार बिल्कुल शून्य है और शून्यकरणीय नहीं है। इसी प्रकार 1872 के अधिनियम की धारा 65 के तहत कोई राहत नहीं दी गई। 
  • प्रतिवादी ने एक अन्य प्रावधान अर्थात विशिष्ट अनुतोष (स्पेसिफिक रेलीफ) अधिनियम, 1877 की धारा 41 के तहत भी बंधक राशि की वापसी का दावा किया। उक्त धारा न्यायालय को मुआवजा देने का विवेकाधिकार देती है। इस मामले में, न्याय के लिए नाबालिग को अग्रिम धन की वापसी की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वादी की शैशवावस्था के पूर्ण ज्ञान के साथ धन अग्रिम किया गया था। विशिष्ट राहत अधिनियम, 1877 के अंतर्गत राहत के दावे को अस्वीकृत कर दिया गया था।

डोनोग्यू बनाम स्टीवेन्सन (1932)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, श्रीमती डोनोग्यू की दोस्त 26 अगस्त, 1928 को स्कॉटलैंड के पैस्ले में वेलमेडो कैफे से उनके लिए अदरक बीयर की एक बोतल लाई थी। बोतल गहरे रंग के अपारदर्शी कांच से बनी थी और उसमें अदरक बीयर के अलावा किसी और चीज का कोई संकेत नहीं था।
  • श्रीमती डोनोग्यू ने लगभग आधी अदरक बीयर का सेवन किया था; उसने शेष को एक गिलास में डाला और पाया कि उसमें घोंघे के मृत, सड़े हुए अवशेष थे। इससे श्रीमती डोनोग्यू को गहरा सदमा लगा और उन्हें गैस्ट्रो-एंटेराइटिस हो गया।
  • मामला शुरू में स्कॉटलैंड के सत्र न्यायालय के दूसरे विभाजन के समक्ष लाया गया था, जहां लॉर्ड ऑर्डिनरी ने कार्रवाई का वैध कारण पाते हुए सबूत के लिए एक मध्यस्थ (इंटरनेटलोकयूटर) जारी किया था। हालाँकि, बाद में बहुमत वाले मध्यस्थ ने पहले के निर्णय को वापस ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप मामला खारिज हो गया। 
  • हाउस ऑफ लॉर्ड्स में एक अपील दायर की गई थी। अपीलकर्ताओं द्वारा यह तर्क दिया गया था कि प्रतिवादी अपनी जिम्मेदारियों में विफल रहे, जिससे दुर्घटना हुई।
  • इसके अलावा, अपीलकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि इस मामले में रेस इप्सा लोक्विटुर का सिद्धांत लागू होता है। बोतल में घोंघे के अवशेषों की उपस्थिति ने निर्माता की लापरवाही को स्पष्ट रूप से इंगित किया। 
  • अपीलकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि लापरवाही के सामान्य सिद्धांत के अपवाद बहुत प्रतिबंधात्मक और सीमित थे।
  • प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता के चोट के दावे अतिरंजित थे और यह घोंघे के कथित अवशेषों के कारण नहीं, बल्कि पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण थे।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या अदरक बीयर निर्माता को उत्पाद में एक दोष के बारे में पता था जिसने इसे उपभोग के लिए अयोग्य बना दिया था, और क्या यह दोष उपभोक्ता से छुपाया गया था?
  • क्या उत्पाद को स्वाभाविक रूप से खतरनाक माना जाता है, और क्या निर्माता उपभोक्ता को इस जोखिम के प्रति सचेत करने में विफल रहा?
  • क्या इस मामले में लापरवाही के लिए कार्रवाई लागू होगी, यह देखते हुए कि वादी और निर्माता के बीच कोई अनुबंध मौजूद नहीं था?
  • प्रतिवादी का वादी के प्रति देखभाल का कर्तव्य था या नहीं?

मामले का फैसला

  • हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने अपीलकर्ता श्रीमती डोनोग्यू के पक्ष में फैसला सुनाया। इसमें कहा गया कि निर्माता का अपने उत्पाद के सभी अंतिम उपभोक्ताओं के प्रति देखभाल का कर्तव्य है। प्रतिवादी की देयता केवल तभी उत्पन्न हो सकती है जब उत्पाद के मध्यवर्ती (इंटरमीडिएट) निरीक्षण का कोई तरीका न हो, और इस प्रकार क्षति कर्तव्य के उल्लंघन का एक निकटतम कारण थी।
  • यद्यपि निर्माता का अपीलकर्ता के प्रति कोई संविदात्मक दायित्व नहीं था (अनुबंध की गोपनीयता के सिद्धांत के अनुरूप), फिर भी उत्पाद की सुरक्षा और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए देखभाल का सामान्य कर्तव्य उनका था।
  • इस मामले ने तीन कानूनी सिद्धांतों पर जोर दिया:
  1. लापरवाही: यह स्थापित किया गया था कि लापरवाही केवल कर्तव्य का उल्लंघन या सामान्य विवेक के व्यक्ति के रूप में कार्य करने में विफलता दिखाकर साबित की जा सकती है, बिना संविदात्मक संबंध में आने की आवश्यकता के, और इस उल्लंघन के परिणामस्वरूप कानूनी चोट लगी।
  2. देखभाल करने का कर्तव्य: लॉर्ड एटकिन ने कहा कि निर्माता का यह कर्तव्य है कि वह अपने उत्पाद खरीदने वाले ग्राहकों का ख्याल रखे। उन्होंने कहा कि जो निर्माता अपने उत्पाद को अंतिम उपभोक्ता तक उसके मूल रूप में पहुंचाता है, उसका उनके प्रति देखभाल का कर्तव्य बनता है। इस सिद्धांत ने उपभोक्ता संरक्षण और उनके अधिकारों के क्षेत्र में भी प्रगति की।
  3. “पड़ोसी” सिद्धांत: “पड़ोसी सिद्धांत” लॉर्ड एटकिन द्वारा लागू किया गया था, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि देखभाल का कर्तव्य किस पर लगाया गया है। उन्होंने ‘पड़ोसी’ को उन व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया जो किसी के कार्यों से प्रत्यक्ष और निकटता से प्रभावित होते हैं। उचित दूरदर्शिता के सिद्धांत का उपयोग उन व्यक्तियों की पहचान करने के लिए किया गया था जो किसी भी चोट के कारण और हर्जाने का दावा करने के लिए दूसरे पर किसी के कार्यों के प्रभाव का अनुमान लगा सकते थे।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख को देखें डोनोग्यू बनाम स्टीवेन्सन (1932).

फिलिप्स बनाम ब्रूक्स (1919) 2 केबी 243

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, एक व्यक्ति, नॉर्थ, फिलिप (वादी) की दुकान पर गया और 2,550 पाउंड के कुछ मोती और 450 पाउंड की एक अंगूठी का चयन किया। उन्होंने 3,000 पाउंड की राशि का चेक लिखा।
  • चेक लिखते समय उन्होंने वादी को बताया कि वह “सर जॉर्ज बुलो” हैं और उन्होंने सर जॉर्ज बुलो के आवासीय पते का भी उल्लेख किया है। वादी ने सर जॉर्ज बुलो के बारे में सुना था, जो क्रेडिट के व्यक्ति थे और उन्होंने निर्देशिका (डिरेक्ट्री) से पते की पुष्टि की।
  • नॉर्थ ने वादी से एक एहसान मांगा, कि वह अंगूठी अपने साथ ले जाना चाहता है क्योंकि अगले दिन उसकी पत्नी का जन्मदिन था। उसने फिलिप्स से कहा कि चेक क्लियर होने के बाद वह उससे मोती ले लेगा। वादी ने इस धारणा के तहत नॉर्थ को अंगूठी दी कि वह सर जॉर्ज बुलो था।
  • नॉर्थ ने 350 पाउंड के लिए प्रतिवादियों ब्रूक्स को अंगूठी बंधक रखी, जिन्होंने सद्भावना में और धोखाधड़ी की सूचना के बिना इसे लिया।
  • वादी ने प्रतिवादी पर मुकदमा दायर किया और अंगूठी को वापस मांगने का दावा किया, इस आधार पर कि उसकी पहचान के संबंध में गलती के कारण नॉर्थ में कोई स्वामित्व अधिकार निहित नहीं था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या पहचान की गलती, एक अनुबंध की अनिवार्यता अनुबंध को शून्य बनाती है या नहीं?
  • क्या प्रतिवादी याचिकाकर्ता को अंगूठी वापस करने के लिए बाध्य है?
  • ऐसी स्थिति में अंगूठी का सही मालिक कौन होगा?

मामले का फैसला

  • न्यायमूर्ति होरिज ने कहा कि वादी इस धारणा के तहत था कि जिस व्यक्ति को वह अंगूठी सौंप रहा था वह सर जॉर्ज बुलो था। उन्होंने वास्तव में इसे बेचने और उस व्यक्ति को देने का अनुबंध किया जो उनकी दुकान में आया था और जो सर जॉर्ज बुलो नहीं था, बल्कि नॉर्थ के नाम का एक व्यक्ति था, जिसने झूठे बहाने के माध्यम से बिक्री और वितरण प्राप्त किया था कि वह सर जॉर्ज बुलो था।
  • विक्रेता उपस्थित व्यक्ति के साथ अनुबंध करने का इरादा रखता था, और उस व्यक्ति के रूप में एक त्रुटि थी जिसके साथ उसने अनुबंध किया था, हालांकि वादी ने अपनी सहमति नहीं दी होती यदि कोई धोखाधड़ी गलत बयानी हुई थी। इस मामले में संपत्ति का पारित होना था और खरीदार के पास एक अच्छा शीर्षक था।
  • करार को शून्य नहीं माना गया था। गलती के कारण इसे शून्य घोषित नहीं किया गया था क्योंकि वादी ने दुकान में मौजूद व्यक्ति को अंगूठी बेचने और वितरित करने का अनुबंध किया था। यह अनुबंध धोखाधड़ी के आधार पर शून्यकरणीय प्रकृति का था।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति शून्यकरणीय अनुबंध के तहत कुछ सामान प्राप्त करता है और वह अनुबंध समाप्त होने से पहले सामान को किसी वास्तविक हस्तान्तरिती (ट्रांसफरी) को हस्तांतरित कर देता है, जो सद्भावनापूर्वक कार्य करता है और हस्तान्तरणकर्ता (ट्रांस्फरर) के दोषपूर्ण शीर्षक के बारे में कोई सूचना नहीं देता है, तो हस्तान्तरिती को शीर्षक मिल जाता है। इसलिए, प्रतिवादियों ने इस मामले में (माल बिक्री अधिनियम, 1930 की धारा 29) एक अच्छा शीर्षक हासिल किया था।
  • न्यायालय ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया और देखा कि दावेदार ने अपने सामने वाले आदमी को अंगूठी बेचने का इरादा किया था, जो कि आमने-सामने का अनुबंध है, चाहे वह आदमी कोई भी निकला हो। 

डनलप न्यूमेटिक टायर कंपनी लिमिटेड बनाम सेल्फ्रिज एंड कंपनी (1915)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, ड्यू एंड कंपनी ने अपीलकर्ताओं (डनलप कंपनी) के साथ अनुबंध किया कि वे उनसे उनकी सूची में दी गई कीमत पर टायर और अन्य सामान खरीदेंगे, ताकि कुछ छूट प्राप्त की जा सके। ड्यू एंड कंपनी ने यह भी वचन दिया कि वे सूची में दी गई कीमत से कम पर सामान नहीं बेचेंगे, सिवाय उन लोगों के जो मोटर व्यापार में लगे हुए हैं।
  • उन्होंने आगे यह भी सहमति व्यक्त की कि जब वे मोटर व्यापारियों को सूची मूल्य से कम पर कोई सामान बेचेंगे, तो वे उस ओर से डनलप कंपनी के एजेंट के रूप में, व्यापारी से एक लिखित वचनदाताकर्त्ताता प्राप्त करेंगे, जो डनलप कंपनी की सूची मूल्य का भी पालन करेगी, और इस वचनदाताकर्त्ताता को डनलप कंपनी को भेज देगी।
  • ड्यू एंड कंपनी ने यह सामान प्रतिवादियों (सेल्फ्रिज एंड कंपनी) को बेचा था, जिन्होंने लिखित रूप से सहमति व्यक्त की थी कि वे किसी भी निजी ग्राहक को सूची मूल्य से कम कीमत पर टायर नहीं बेचेंगे। सेल्फ्रिज एंड कंपनी ने सूची मूल्य के उल्लंघन में प्रत्येक बिक्री के लिए डनलप कंपनी को पांच पाउंड का भुगतान करने का भी वचन दिया।
  • डनलप कंपनी ने करार के उल्लंघन के लिए निषेधाज्ञा (इन्जंक्शन) और हर्जाना प्राप्त करने के लिए सेल्फ्रिज एंड कंपनी पर मुकदमा दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ड्यू एंड कंपनी ने सेल्फ्रिज एंड कंपनी के साथ करार करने में उनके एजेंट के रूप में काम किया।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या डनलप एंड कंपनी के लिए ड्यू एंड कंपनी और सेल्फ्रिज एंड कंपनी के बीच हुए करार की शर्तों के अनुसार हर्जाने की वसूली करना संभव है?

मामले का फैसला

  • यह हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा आयोजित किया गया था कि डनलप कंपनी और सेल्फ्रिज कंपनी के बीच कोई अनुबंध नहीं था। इंग्लैंड के कानून के तहत, कुछ सिद्धांत मौलिक हैं। वे इस प्रकार हैं:
  1. केवल वह व्यक्ति जो अनुबंध का पक्ष है, उस पर मुकदमा कर सकता है; तथा
  2. यदि कोई व्यक्ति सीलबंद अनुबंध के अलावा किसी अन्य अनुबंध को लागू करना चाहता है, तो यह आवश्यक है कि इसके लिए कुछ प्रतिफल भी प्रदान किया गया हो।
  • मुकदमा करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए, उसे या तो व्यक्तिगत रूप से या वचनग्रहीता के माध्यम से, उसके प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए, प्रतिफल देना होगा।
  • यह मामला इस प्रस्ताव के लिए अच्छा कानून बना हुआ है कि केवल एक व्यक्ति जो अनुबंध का पक्ष है, इस पर मुकदमा कर सकता है।
  • अनुबंध की निजता के संबंध में, न्यायालय ने यह देखा कि अनुबंध के उल्लंघन के मामले में केवल अनुबंध के पक्ष ही एक-दूसरे पर मुकदमा कर सकते हैं, तथा इस सामान्य नियम का एकमात्र अपवाद प्रिंसिपल-एजेंट संबंध के मामले में होगा, जहां एजेंट का नाम उस पक्ष द्वारा अज्ञात रखा गया हो जिसके अधीन उसे नियुक्त किया गया था।

हेडले बनाम बैक्सेंडेल (1854) 9 एक्सच 341

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, वादी हेडले की इंग्लैंड के ग्लूसेस्टर में एक व्यावसायिक मिल थी। मिल में होने वाला सारा काम भाप इंजन की मदद से किया जाता था। एक क्रैंकशाफ्ट के टूटने के कारण वादी की मिल बंद कर दी गई थी। टूटे हुए क्रैंकशाफ्ट को नया तैयार करने के लिए इंग्लैंड के ग्रीनविच में निर्माताओं को भेजा गया था।
  • हेडले ने क्रैंकशाफ्ट को पिकफोर्ड एंड कंपनी (आम वाहकों (कैरियर्स) की एक फर्म) को भेजा। पिकफोर्ड एंड कंपनी का प्रतिनिधित्व बैक्सेंडेल द्वारा किया गया था। वाहकों को दी गई एकमात्र जानकारी यह थी कि ले जाने वाली वस्तु एक मिल का टूटा हुआ शाफ्ट था और वादी उस मिल के मिलर्स थे। बैक्सेंडेल को कभी नहीं बताया गया था कि ग्रीनविच में इंजीनियरों को वितरण में देरी होने पर हेडले मुनाफा खो देगा।
  • वाहकों ने अगले दिन ग्रीनविच में शाफ्ट देने का वादा किया और इस कार्य को करने के लिए दो पाउंड को ध्यान में रखा। क्रैंकशाफ्ट को तब रेल के बजाय नहर द्वारा वाहक द्वारा भेजा गया था। आम विमान कंपनियों की इस लापरवाही के कारण पांच दिन का विलंब हुआ। नतीजतन, नए शाफ्ट को हेडले को देर से पहुंचाया गया।
  • इस देरी के कारण मिल लंबे समय तक बंद रही, अगर शाफ्ट को बिना किसी देरी के ग्रीनविच में वितरित किया गया होता।
  • वादी ने देरी के कारण होने वाले मुनाफे के नुकसान के लिए हर्जाने की वसूली के लिए प्रतिवादी की लापरवाही के कारण कार्रवाई की।

उठाया गया मुद्दा 

  • क्या बैक्सेंडेल मिल के गैर-संचालन के परिणामस्वरूप होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए बाध्य था?

मामले का फैसला

  • पीठ ने फैसला सुनाया कि हेडली बैक्सेंडेल से खोए हुए मुनाफे की भरपाई नहीं कर सकता क्योंकि अनुबंध के उल्लंघन के परिणामस्वरूप मिल के बंद होने की उम्मीद नहीं थी। हेडली ने बैक्सेंडेल के साथ अनुबंध करते समय यह संकेत नहीं दिया था कि जब तक नया शाफ्ट नहीं लगाया जाता तब तक मिल चालू नहीं रहेगी। मुकदमे में शामिल किसी पक्ष को उन नुकसानों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जो उस समय उचित रूप से ज्ञात नहीं थे जब पक्षों ने अनुबंध में प्रवेश किया था।
  • न्यायाधीशों ने कहा कि अन्य मामलों में, एक मिल मालिक के पास आम तौर पर मिल को चालू रखने के लिए एक अतिरिक्त हिस्सा होता है या विशिष्ट घटक की अनुपस्थिति में मिल चालू रहती है। घटक की महत्वपूर्ण प्रकृति को देखते हुए, हेडले को वितरण में देरी होने पर संभावित नुकसान के बारे में बैक्सेंडेल को सूचित करना चाहिए था। किसी पक्ष के लिए स्पष्ट रूप से सूचित किए बिना इस तरह के विशिष्ट परिणामों की आशा करना उचित नहीं है।
  • न्यायमूर्ति सर एडवर्ड हॉल एल्डरसन ने अनुबंध के उल्लंघन के कारण हुए नुकसान के संबंध में एक राय दी। उन्होंने कहा कि जब दो पक्ष एक अनुबंध में प्रवेश करते हैं और एक पक्ष अनुबंध की किसी भी या सभी शर्तों का उल्लंघन करता है, तो दूसरे पक्ष को होने वाला नुकसान उन लोगों को होना चाहिए जिन्हें यथोचित और निष्पक्ष रूप से या तो उल्लंघन से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने के रूप में माना जा सकता है, घटनाओं के सामान्य पाठ्यक्रम के अनुसार, या उन लोगों के रूप में जो दोनों पक्ष उस समय उल्लंघन के परिणामस्वरूप यथोचित रूप से अनुमान लगा सकते थे जब अनुबंध किया गया था।
  • नियम, जैसा कि ऊपर कहा गया है, दो प्रकार के नुकसान के बारे में बात करता है, अर्थात्:
  1. सामान्य नुकसान: ये नुकसान के प्रकार हैं जिन्हें स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने पर उचित और यथोचित रूप से माना जा सकता है, अर्थात, चीजों के सामान्य पाठ्यक्रम के अनुसार। अनुबंध के पक्ष संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने में विफलता के स्वाभाविक परिणाम के रूप में आसानी से अनुमान लगा सकते हैं और गैर-उल्लंघन करने वाले पक्ष द्वारा दावा किया जा सकता है; और
  2. परिणामी नुकसान: अनुबंध में प्रवेश करते समय प्रत्येक पक्ष के विभिन्न प्रकार के हित हो सकते हैं जो हमेशा दूसरे पक्ष द्वारा साझा या ज्ञात नहीं होते हैं। ऐसी स्थितियों में, एक संविदात्मक उल्लंघन पक्षों पर कई नकारात्मक प्रभाव पैदा कर सकता है, जबकि सीधे उल्लंघन के परिणामस्वरूप नहीं, फिर भी परिणामी हैं। किसी भी प्रकार के अप्रत्यक्ष या दूरस्थ नुकसान की भरपाई के लिए परिणामी नुकसान किए जाते हैं। सामान्य क्षति की तुलना में इन नुकसानों को आसानी से निर्धारित नहीं किया जा सकता है।
  • इस मामले में अंग्रेजी न्यायालय ने अनुबंध के उल्लंघन पर परिणामी नुकसान का निर्धारण किया। गैर-उल्लंघन करने वाले पक्ष केवल परिणामी नुकसान का दावा कर सकते है, यदि अनुबंध के दोनों पक्ष अनुबंध गठन के समय संभावित नुकसान से अवगत थे। यह नियम अनुबंध में प्रवेश करने के समय पक्षों के ज्ञान पर आधारित है और इसका मूल्यांकन उचित व्यक्ति के मानकों द्वारा किया जाता है। यह पक्षों की देयता को सीमित करने का इरादा रखता है जब एक संविदात्मक उल्लंघन होता है।
  • धारा 73 (पैरा 1) में निहित प्रावधान हेडले बनाम बैक्सेंडेल में उपर्युक्त निर्णय में निहित नियम के समान है। 

पॉवेल बनाम ली (1908)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, पॉवेल, वादी, प्रधानाध्यापक पद के लिए एक उम्मीदवार था। उन्होंने इस पद के लिए आवेदन किया था और उनका चयन भी इस पद के लिए हो गया था। मंडल के सदस्यों ने दो के मुकाबले तीन मतों से प्रस्ताव पारित किया कि वादी को नियुक्त किया जाना चाहिए।
  • वादी के मतदान के परिणामों को संप्रेषित करने के लिए सदस्यों द्वारा आधिकारिक तौर पर कोई संचार नहीं किया गया था।
  • मंडल के सदस्यों में से एक, जिसे इस निर्णय को संप्रेषित करने के लिए अधिकृत नहीं किया गया था, ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हुए, पॉवेल को पद के लिए उनके चयन के बारे में सूचित किया।
  • इसके बाद, प्रबंधकों के मंडल ने फिर से मुलाकात की और पॉवेल की नियुक्ति को रद्द करने और पॉवेल के स्थान पर एक अन्य उम्मीदवार पार्कर को नियुक्त करने का निर्णय लिया।
  • पॉवेल द्वारा ली और प्रबंधक मंडल के अध्यक्ष दोनों के खिलाफ अनुबंध उल्लंघन के लिए मुकदमा दायर किया गया था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या वादी और प्रतिवादी दोनों के बीच प्रधानाध्यापक के रूप में नियुक्त करने के लिए एक अनुबंध मौजूद था?
  • क्या प्रबंधक मंडल ने अनुबंध का उल्लंघन किया था या नहीं, जैसा कि पॉवेल ने कहा था?
  • क्या कोई अनधिकृत व्यक्ति अनुबंध के संबंध में विवरण संप्रेषित करने में सक्षम है?

मामले का फैसला

  • किंग्स खण्ड पीठ ने माना कि प्रबंधक मंडल द्वारा पारित प्रस्ताव को उनके द्वारा या उनकी ओर से किसी अधिकृत व्यक्ति द्वारा पॉवेल को सूचित नहीं किया गया था। यह एक अनुबंध को प्रवर्तन नहीं दे सकता है। इसलिए, पॉवेल द्वारा लाई गई कार्रवाई ने विफलता घोषित की।
  • यह माना गया था कि एक वैध स्वीकृति के लिए, इसे अधिकृत क्षमता में कार्य करने वाले व्यक्ति द्वारा संप्रेषित किया जाना चाहिए। न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया था कि अनुबंध के उल्लंघन को चुनौती नहीं दी जा सकती है, क्योंकि स्वीकृति कभी संप्रेषित नहीं की गई थी। इसलिए, अनुबंध के उल्लंघन का मुद्दा प्रश्न में नहीं आया।
  • वैध स्वीकृति के लिए, यह आवश्यक है कि एक अधिकृत व्यक्ति हो जो वादी को वही बताता है। पॉवेल के पास प्रबंधक मंडल के फैसले के खिलाफ कोई बचाव नहीं था। यह जानकारी अभी तक उन्हें आधिकारिक तौर पर नहीं दी गई थी।
  • न्यायालय ने कहा कि एक वैध अनुबंध का गठन करने के लिए, इसे एक अधिकृत इकाई द्वारा प्रस्तावग्रहिता को सूचित किया जाना चाहिए। इस मामले में मंडल के सदस्य वे व्यक्ति थे जिनके पास ऐसा करने का अधिकार था। इसलिए, यह माना गया कि पहली जगह में कार्रवाई में कोई अनुबंध नहीं था जिसे उल्लंघन माना जा सकता है।
  • अनुबंध के उल्लंघन के लिए वादी की याचिका खारिज कर दी गई थी।

कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी (1893)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, प्रतिवादियों ने अपने उत्पाद “कार्लिल स्मोक बॉल” के लिए एक विज्ञापन बनाया। यह उत्पाद इन्फ्लूएंजा के खिलाफ एक निवारक उपाय था। विज्ञापन में उन्होंने मुद्रित निर्देशों के अनुसार, दो सप्ताह के लिए दिन में तीन बार स्मोक बॉल का उपयोग करने के बाद, किसी भी व्यक्ति को इन्फ्लूएंजा, सर्दी या सर्दी पकड़ने के कारण होने वाली किसी भी बीमारी होने पर इनाम के रूप में एक सौ पाउंड की राशि का भुगतान करने की पेशकश की। उन्होंने यह भी घोषणा की कि इस मामले में अपनी गंभीरता दिखाने के लिए एलायंस बैंक के पास एक हजार पाउंड की राशि जमा की गई थी।
  • श्रीमती कार्लिल ने विज्ञापन पर भरोसा करते हुए एक रसायनज्ञ से स्मोक बॉल खरीदा। उन्होंने उत्पाद का इस्तेमाल निर्धारित निर्देशों के अनुसार किया, लेकिन फिर भी उन्हें इन्फ्लूएंजा हो गया। उन्होंने प्रतिवादियों पर उनके द्वारा विज्ञापित एक सौ पाउंड के इनाम का दावा करने के लिए मुकदमा दायर किया।
  • उसे इस आधार पर इनाम के दावे से वंचित कर दिया गया था कि वे विज्ञापन को वास्तविक प्रस्ताव के रूप में कार्य करने का इरादा नहीं रखते थे। प्रतिवादियों द्वारा यह तर्क दिया गया था कि उनका प्रस्ताव न तो कानूनी रूप से बाध्यकारी था और न ही वैध अनुबंध था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विज्ञापन में इस्तेमाल की गई भाषा एक वादे या एक संविदात्मक करार का गठन करने के लिए बहुत अस्पष्ट थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विज्ञापन में एक विशिष्ट समय सीमा का अभाव था और यह सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं था कि उपभोक्ताओं ने दिए गए निर्देशों के अनुसार कार्बोलिक स्मोक बॉल का सही उपयोग किया था या नहीं।
  • उन्होंने अपने प्रस्ताव को कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना क्योंकि अनुबंध की मूलभूत आवश्यकता स्वीकृति का संचार है, जिसे कार्लिल ने न तो स्पष्ट रूप से या निहित रूप से संप्रेषित किया था, न ही उसने अपनी स्वीकृति दिखाने के लिए कोई अन्य कार्य किया था। कंपनी ने यह भी कहा कि विज्ञापन केवल एक विपणन (मार्केटिंग) रणनीति थी, और जब उन्होंने बड़े पैमाने पर जनता के लिए प्रस्ताव दिया तो उनका अनुबंध बनाने का कोई इरादा नहीं था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या अनुबंध का वाद के पक्षों पर बाध्यकारी प्रभाव पड़ा?
  • क्या दावेदार से स्वीकृति की औपचारिक अधिसूचना की आवश्यकता थी?
  • क्या वैध अनुबंध बनाने के लिए प्रस्ताव की शर्तों को स्वीकार करना पर्याप्त है?
  • क्या कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी द्वारा दिए गए एक सौ पाउंड के इनाम के बदले दावेदार द्वारा कोई प्रतिफल प्रदान किया गया था?

मामले का फैसला

  • प्रतिवादी के तर्कों को न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने माना कि इन्फ्लूएंजा से बचाव उस समय था जब स्मोक बॉल का उपयोग किया जा रहा था। प्रस्ताव पर्याप्त और निश्चित दोनों था। विज्ञापन में कहा गया था कि पुरस्कार के उद्देश्य से एलायंस बैंक में एक हजार पाउंड जमा किए गए थे। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि एक सौ पाउंड का भुगतान करने का कथन मात्र दिखावा था। विज्ञापन का उद्देश्य जनता द्वारा एक प्रस्ताव के रूप में समझा जाना था जिस पर कार्रवाई की जानी थी।

  • यह माना गया कि यह पूरी दुनिया के लिए किया गया एक प्रस्ताव था जो आगे आने वाले और शर्त को पूरा करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ अनुबंध में परिवर्तित होना था। प्रतिवादी द्वारा किए गए विज्ञापन ने एक प्रस्ताव का गठन किया। विज्ञापन की शर्तों को पूरा करने से पीछे हटने से पहले प्रतिवादी किसी के लिए भी उत्तरदायी हो गए।
  • इस प्रकार, विशेष रूप से किसी को भी प्रस्ताव देने की आवश्यकता नहीं है। इस मामले में, प्रस्ताव पूरी जनता के लिए किया गया था, और वादी को जनता का सदस्य होने के नाते विज्ञापन की शर्तों का पालन करने के बाद विज्ञापन की शर्तों को स्वीकार करने का अधिकार था।
  • यह भी माना गया कि जहां कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को स्पष्ट रूप से या निहित रूप से एक प्रस्ताव देता है, अनुबंध को बाध्यकारी बनाने के लिए स्वीकृति के एक विशेष तरीके को सूचित करता है, यह केवल दूसरे व्यक्ति के लिए आवश्यक है जिसे इस तरह का प्रस्ताव स्वीकृति की संकेतित विधि का पालन करने के लिए किया जाता है। यदि प्रस्ताव देने वाला व्यक्ति, स्पष्ट रूप से या निहित रूप से, अपने प्रस्ताव को सूचित करता है, तो इन शर्तों के प्रदर्शन पर अधिसूचना के बिना पर्याप्त स्वीकृति के रूप में कार्य करना पर्याप्त होगा। इस प्रकार, इस मामले में प्रस्ताव की स्वीकृति की सूचना की आवश्यकता नहीं थी।
  • अंत में, यह माना गया कि प्रस्ताव में वादे के लिए एक प्रतिफल मौजूद था। प्रस्ताव में स्मोक बॉल का उपयोग करने का अनुरोध किया गया था। दूसरे के अनुरोध पर एक पक्ष को होने वाली असुविधा एक प्रतिफल बनाने के लिए पर्याप्त है। यह एक प्रतिफल है कि वादी ने स्मोक बॉल का सेवन करने का कष्ट उठाया। प्रतिवादियों को अतिरिक्त लाभ भी मिला। ऐसा इसलिए था क्योंकि स्मोक बॉल की खपत ने उनकी बिक्री को बढ़ावा दिया था।
  • इसलिए, कार्लिल को कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी से एक सौ पाउंड का इनाम वसूलने की अनुमति दी गई।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी (1892) को देखें।

चिन्नया राव बनाम रमैया (1882) आई.एल.आर.

मामले के तथ्य

9800

  • इस मामले में ‘A’, एक बूढ़ी औरत ने अपनी बेटी (प्रतिवादी) को इस निर्देश के साथ एक संपत्ति दी कि बेटी ‘A’ के भाई (वादी) को 653 रुपये की वार्षिकी का भुगतान करेगी।
  • उसी दिन, प्रतिवादियों ने वादी के साथ एक वादा किया कि वह ‘A’ द्वारा निर्देशित वार्षिकी का भुगतान करेगी। प्रतिवादी निर्धारित राशि का भुगतान करने में विफल रहा। वादी द्वारा उसके खिलाफ एक कार्रवाई में उसने तर्क दिया कि क्यूंकि वादी ने स्वयं कोई प्रतिफल नहीं दिया था, इसलिए उन्हें कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं था।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या इस मामले में प्रिविटी का नियम लागू होता है?
  • क्या प्रतिवादी ‘A’ से संपत्ति उपहार के बदले वादी को वार्षिक राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य है?

मामले का फैसला

  • माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि प्रतिवादी की मां द्वारा प्रतिफल प्रस्तुत किया गया था और यह वादी और प्रतिवादी के बीच किए गए वादे को लागू करने के लिए पर्याप्त प्रतिफल का गठन करता है।
  • न्यायालय ने पाया कि ‘A’ ने अपनी बेटी के साथ एक अनुबंध किया था, जिससे वादी अनुबंध में तीसरा पक्ष बन गया। चूँकि माँ ने संपत्ति के उपहार के माध्यम से बेटी को अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिफल प्रदान किया था, इसलिए बेटी माँ के भाई को सहमत राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य थी।
  • न्यायालय ने डटन बनाम पूले (1688) के अंग्रेजी मामले में स्थापित मिसाल पर भरोसा किया और कहा कि, भारत में, प्रतिफल की गोपनीयता के नियम का कोई अनुप्रयोग नहीं है। इसका मतलब है कि प्रतिफल के लिए तीसरे पक्ष अनुबंधों के प्रवर्तन के लिए मुकदमा कर सकते हैं।
  • न्यायालय ने 1872 के अधिनियम की धारा 2 (d) के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। यह प्रदान करता है कि वचनगृहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रतिफल प्रदान किया जा सकता है। इस प्रावधान के आधार पर, न्यायालय ने प्रतिवादी को वादी को राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।

अधिक जानकारी के लिए इस लेख को चिन्नया राव बनाम रमैया (1882) देखें

सत्यब्रत घोष बनाम मुगनीराम बांगुर एंड कंपनी, और अन्य (1953)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, प्रतिवादी कंपनी ग्रेटर कलकत्ता में झीलों के आसपास के क्षेत्र में स्थित भूमि के एक बड़े पथ का मालिक था। कंपनी ने आवासीय उद्देश्यों के लिए इस भूमि के विकास के लिए एक योजना शुरू की और इस योजना को आगे बढ़ाते हुए, पूरे क्षेत्र को कंपनी की बड़ी संख्या में कार्य योजनाओं में विभाजित किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि भूमि के इन भूखंडों की बिक्री के लिए विभिन्न क्रेताओं के साथ करार किया जा रहा था और करार के समय बयाना राशि के रूप में उनसे प्रतिफल राशि का केवल एक छोटा सा भाग स्वीकार किया जा रहा था।
  • कंपनी ने इमारतों और आवासीय उद्देश्यों के लिए भूमि को उपयुक्त बनाने के लिए आवश्यक सड़कों और नालियों का निर्माण करने का बीड़ा उठाया। जैसे ही वे पूरे हो जाएंगे, खरीदारों को प्रतिफल राशि के शेष भुगतान द्वारा हस्तांतरण पूरा करने के लिए कहा जाएगा। अपीलकर्ता ने योजना के तहत शामिल की गई भूमि का एक भूखंड खरीदने के लिए कंपनी के साथ एक अनुबंध किया। उसने बयाना राशि के रूप में 101 रुपये का भुगतान किया। लेकिन इससे पहले कि कुछ भी किया जा सके, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य उद्देश्यों के लिए सरकार द्वारा भूमि का एक बड़ा हिस्सा लेने की आवश्यकता थी।
  • कंपनी ने क्रेता को अनुबंध को रद्द करने के रूप में मानने के लिए एक नोटिस दिया क्योंकि पर्यवेक्षण परिस्थितियों के कारण अनुबंध का प्रदर्शन असंभव हो गया था। खरीदार ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और 1946 में प्रतिवादी कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया।
  • अपीलकर्ता ने निम्नलिखित तर्क दिया: 
    • अनुबंध की हताशा (फ़्रस्ट्रेशन) से संबंधित अंग्रेजी विधि के सिद्धांत का भारत में 1872 के अधिनियम की धारा 56 में प्रदान सांविधिक प्रावधान के मद्देनजर कोई अनुप्रयोग नहीं है;
    • यहां तक कि अगर अंग्रेजी कानून लागू होता है, तो इसमें भूमि की बिक्री के लिए अनुबंध के लिए कोई आवेदन नहीं हो सकता है;
    • मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर, ऐसी कोई हताशा घटना नहीं थी जिसे अनुबंध के आधार को छीन लिया गया हो या इसके निष्पादन को असंभव बना दिया गया हो।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या भूमि की बिक्री के लिए अनुबंध का निर्वहन किया गया था और पर्यवेक्षण परिस्थितियों के कारण समाप्त हो गया था जिसने अनुबंध के भौतिक भाग के प्रदर्शन को प्रभावित किया था?
  • क्या 1857 के अधिनियम की धारा 56 के अंतर्गत अनुबंध रद्द कर दिया गया था?
  • क्या अपीलकर्ता के पास प्रतिवादी के खिलाफ मुकदमा लाने का अधिकार था?

मामले का फैसला

  • माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अंग्रेजी कानून के तहत मान्यता प्राप्त हताशा के सिद्धांत के कारण अपीलकर्ता के पहले तर्क को स्वीकार नहीं किया। यह 1872 के अधिनियम की धारा 56 के दायरे में नहीं आता है। 
  • दूसरे तर्क को खारिज कर दिया गया था क्योंकि भारत में भूमि की बिक्री के लिए अनुबंध के लिए पक्षों के संविदात्मक दायित्व अन्य सामान्य अनुबंधों के मामले में समान हैं।
  • न्यायालय ने अपीलकर्ता के तीसरे तर्क को स्वीकार कर लिया और कहा कि मांग आदेश अस्थायी प्रकृति के थे। यह माना गया कि सरकार द्वारा भूमि की अस्थायी आवश्यकता पर्यवेक्षण असंभवता के कारण भूमि की बिक्री के अनुबंध को शून्य नहीं बनाती है।
  • भारत में मामलों का फैसला करने के उद्देश्य से, लागू होने वाला एकमात्र सिद्धांत अपने व्यावहारिक अर्थों में असंभवता या “असंभव” का पर्यवेक्षण करना है, न कि इसके शाब्दिक अर्थ में। तथापि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि धारा 56 सकारात्मक कानून का नियम निर्धारित करती है और मामले को पक्षों के इरादों के अनुसार निर्धारित करने के लिए नहीं छोड़ती है।
  • जहां अनुबंध में अपने आप में, परोक्ष (इम्प्लीसिटली) रूप से या स्पष्ट रूप से, एक शब्द होता है जिसके अनुसार अनुबंध का निर्वहन किया जाएगा, ऐसे मामलों में अनुबंध 1872 के अधिनियम की धारा 32 के प्रावधानों अथवा अधिनियम के समान अन्य संबंधित प्रावधानों द्वारा शासित होती है। हालांकि अंग्रेजी कानून में, इन्हें हताशा के मामलों के रूप में माना जाता है। नतीजा यह हुआ कि अपील को अनुमति दे दी गई।
  • कई मामलों में, हताशा का सिद्धांत इस आधार पर लागू नहीं किया जाता है कि पक्षों स्वयं एक निहित शर्त के लिए सहमत हुए जो उन्हें अनुबंध के प्रदर्शन से मुक्त करने के लिए संचालित होती हैं। न्यायालयों द्वारा राहत बाद की असंभवता के आधार पर दी जाती है और जब यह पता चलता है कि अनुबंध का पूरा उद्देश्य या आधार घुसपैठ या अप्रत्याशित घटना या परिस्थितियों के परिवर्तन से हताशा था, जो उस समय पक्षों द्वारा विचार किए जाने से परे था जब उन्होंने करार किया था।

हाजी अब्दुल रहमान अल्लारखिया बनाम द बॉम्बे एंड पर्शिया स्टीम नेविगेशन कंपनी (1892)

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, वादी अब्दुल रहमान को हज के पंद्रह दिन बाद जेद्दा से जाने के लिए स्टीमर की आवश्यकता थी, ताकि तीर्थयात्रियों को बॉम्बे लौटने के लिए लाया जा सके। उन्होंने उस उद्देश्य के लिए जून, 1891 में प्रतिवादी से एक स्टीमर किराए पर लिया।
  • प्रतिवादियों ने अपने स्टीमर को अंग्रेजी तिथियों द्वारा चार्टर्ड किया। चार्टर-पक्ष में डाली गई तारीख 10 अगस्त, 1892 (हज के पंद्रह दिन बाद) थी। उक्त तारीख वादी द्वारा दी गई थी, इस धारणा के तहत कि यह हज के बाद पंद्रहवें दिन के अनुरूप है।
  • प्रतिवादियों को इस विषय के बारे में जानकारी नहीं थी और उन्होंने केवल अंग्रेजी तारीख के संबंध में ही अनुबंध किया था। 19 जुलाई, 1892 की तारीख, न कि 10 अगस्त, 1892 की तारीख, हज के बाद पंद्रहवें दिन से मेल खाती थी।
  • मार्च, 1892 में वादी को तारीख से संबंधित अपनी गलती का पता चला और उसने 10 अगस्त, 1892 की गलत तारीख के स्थान पर सही तारीख, यानी 19 जुलाई, 1892 डालकर सुधार के लिए चार्टर-पक्ष के समक्ष वाद दायर किया।

उठाए गए मुद्दे

  • क्या 10 अगस्त, 1892 की तारीख गलती से चार्टर के ज्ञापन में डाली गई थी?
  • क्या ऐसी तारीख वादी के निर्देश से नहीं डाली गई थी?
  • क्या उक्त तिथि सही तारीख नहीं है?
  • क्या वादी किसी राहत के हकदार हैं और इस वाद में क्या राहत है?

मामले का फैसला

  • माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि करार 10 अगस्त, 1892 के लिए था। चूंकि वह तारीख करार को भौतिक रूप से प्रेरित करने वाली थी, इसलिए कोई सुधार नहीं हो सकता, बल्कि केवल रद्दीकरण हो सकता है, भले ही दोनों पक्षों की गलती रही हो।
  • आगे यह माना गया कि यह द्विपक्षीय गलती नहीं थी। इसके बजाय यह केवल वादी की ओर से एक गलती थी। इसलिए, कोई सुधार नहीं हो सकता है। सुधार की मांग करने वाले वादी को यह दिखाना होगा कि लिखत को ठीक करने के लिए एक वास्तविक अनुबंध पूर्ववर्ती था, और इस तरह के अनुबंध को लिखत में गलत तरीके से दर्शाया गया है।

निष्कर्ष

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 कानून का एक गतिशील और विकसित क्षेत्र है। अनुबंध कानून को लगातार विभिन्न न्यायिक घोषणाओं और व्याख्याओं द्वारा आकार दिया जा रहा है। इन ऐतिहासिक मामलों से पता चलता है कि भारत में अनुबंध कानून बदलती आर्थिक और वाणिज्यिक परिस्थितियों के लिए अधिक मजबूत और अनुकूल हो गया है। न्यायपालिका ने लगातार न्याय की मांगों के साथ कानून के सख्त पत्र को संतुलित करने की मांग की है।

ये मामले कुछ महत्वपूर्ण मिसाल कायम करते हैं जो यह निर्धारित करने में मदद करते हैं कि भविष्य में अनुबंधों से कैसे संपर्क किया जाए और उनकी व्याख्या की जाए, साथ ही संविदात्मक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर दिया जाए और साथ ही साथ विपरीत पक्ष को उनके संविदात्मक और कानूनी दायित्वों की याद दिलाई जाए। वे न केवल अनुबंध कानून के महत्व को दर्शाते हैं, बल्कि उन चुनौतियों से निपटने में भी इसके लचीलेपन को दर्शाते हैं जो अक्सर न्यायालय के सामने आती हैं।

इसके अलावा, कानून के छात्रों के लिए इन अनुबंध कानून के मामलों से परिचित होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर कई प्रतियोगी कानून परीक्षाओं में पूछते हैं। यद्यपि इस लेख में प्रदान किए गए बीस मामलों की सूची संपूर्ण नहीं है, लेकिन वे निश्चित रूप से अनुबंध कानून को सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

एक अनुबंध क्या है?

अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2 (h) एक अनुबंध को कानून द्वारा लागू करने योग्य करार के रूप में परिभाषित करती है। सर विलियम अनसन के अनुसार, एक अनुबंध दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किया गया एक कानूनी रूप से बाध्यकारी करार है, जिसके द्वारा एक या एक से अधिक द्वारा दूसरे या दूसरों की ओर से कार्य या निषेध के अधिकार प्राप्त किए जाते हैं। 

अनुबंध अधिनियम, 1872 क्या है?

अनुबंध अधिनियम, 1872 अनुबंधों के निर्माण, प्रवर्तन और निरस्तीकरण को परिभाषित और विनियमित करता है। यह अनुबंध के उल्लंघन के समय संविदात्मक दायित्वों और उपायों के लिए एक कानूनी ढांचा स्थापित करता है। उक्त अधिनियम के अधिनियमन की तिथि 01 सितंबर, 1872 है।

क्या सभी करार को अनुबंध कहा जा सकता है?

1872 के अधिनियम की धारा 2 (e) “करार” को हर वादे और वादों के हर सेट जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल बनाते है, के रूप में परिभाषित करती है। 1872 के अधिनियम की धारा 2 (h) “अनुबंध” को कानून द्वारा लागू करने योग्य करार के रूप में परिभाषित करती है। यह कहा जा सकता है कि सभी करार अनुबंध नहीं हैं। एक करार को एक अनुबंध बनने के लिए, कुछ शर्तों को पूरा करना चाहिए जो एक वैध अनुबंध के आवश्यक तत्व हैं।

एक शून्य करार और एक शून्यकरणीय अनुबंध क्या है?

एक शून्य करार शुरू से ही कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है और इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। उदाहरण के लिए, अवैध करार। धारा 2 (g) एक शून्य करार को परिभाषित करता है।

एक शून्यकरणीय अनुबंध शुरू में मान्य होता है, लेकिन गलत बयानी या जबरदस्ती जैसे कारकों के कारण किसी भी समय एक पक्ष द्वारा शून्य घोषित किए जा सकते है। इस तरह के कृत्य से प्रभावित पक्ष को अनुबंध को लागू करने या रद्द करने का अधिकार है। धारा 2 (i) एक शून्यकरणीय अनुबंध को परिभाषित करती है।

क्या मौखिक अनुबंध लागू करने योग्य हैं?

मौखिक अनुबंध लागू करने योग्य हैं। गैर-पंजीकृत या मौखिक अनुबंधों का दोष यह है कि लिखित और पंजीकृत अनुबंधों की तुलना में इसे साबित करना अक्सर कठिन होता है। कुछ प्रकार के अनुबंध जैसे कि वित्तीय लेनदेन शामिल हैं, केवल लिखित रूप में होने चाहिए।

अनुबंध के प्रदर्शन का क्या अर्थ है?

अनुबंध का प्रदर्शन अनुबंध के पक्षों द्वारा सहमत नियमों और शर्तों की पूर्ति को संदर्भित करता है। यह पूर्ण या आंशिक हो सकता है। पक्षों के बीच सहमति के अनुसार संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने में विफलता, अनुबंध का उल्लंघन कर सकती है।

एकतरफा अनुबंध क्या है?

एक “एकतरफा अनुबंध” एक प्रकार का अनुबंध है जहां एक पक्ष दूसरे पक्ष द्वारा किसी कार्य के प्रदर्शन के बदले में वादा करता है। उदाहरण के लिए, एक इनाम अनुबंध में, एक खोई हुई वस्तु की वापसी के लिए भुगतान का वादा किया जाता है।

संविदात्मक और अनुबंध के पर्याप्त प्रदर्शन के बीच अंतर क्या है?

संविदात्मक प्रदर्शन से तात्पर्य संविदात्मक दायित्वों के अनुरूप है। पर्याप्त प्रदर्शन तब होता है जब एक पक्ष ने अनुबंध के अधिकांश दायित्वों को पूरा कर लिया है लेकिन अनुबंध की मामूली शर्तों का पालन नहीं किया है। अनुबंध के लिए पक्ष अभी भी भुगतान के हकदार है, लेकिन कटौती अपूर्ण संविदात्मक प्रदर्शन के लिए की जा सकती है।

संदर्भ

  • Contract – I by Dr. R.K. Bangia
  • Contract and Specific Relief by Avtar Singh

 

विनियमन अधिनियम 1773 और निपटान अधिनियम 1781

यह लेख Aditi Shrivastava द्वारा लिखा गया है और Sneha Arora द्वारा इसका अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख विनियमन अधिनियम, 1773 और निपटान अधिनियम, 1781 की अवधारणा पर प्रकाश डालता है। यह ऐतिहासिक संदर्भ, प्रमुख प्रावधानों और ब्रिटिश सरकार पर दोनों अधिनियमों के प्रभाव का गहन विश्लेषण प्रदान करता है। यह लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे इन अधिनियमों ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार लाए। यह इन अधिनियमों की सीमाओं और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति (कोलोनियल पॉलिसी) पर उनके दीर्घकालिक प्रभाव की जांच करता है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

परिचय 

1770 के दशक की शुरुआत में, ईस्ट इंडिया कंपनी के भीतर वित्तीय संकट के कारण भारतीय आबादी को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसे भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण क्षण के रूप में चिह्नित किया गया, जिससे औपनिवेशिक शासन और कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। उस समय तक, कंपनी गहरे वित्तीय संकट में फंस गई थी और इसलिए कंपनी को ढहने से बचाने के लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार से 1 मिलियन पाउंड का ऋण मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा। कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) और कुप्रबंधन (मिसमैनेजमेंट) के आरोप बड़े पैमाने पर लगे, जिससे इसकी प्रतिष्ठा और खराब हो गई। इसके अलावा, 1770 में बंगाल में भयावह अकाल के बढ़ने से यह क्षेत्र तबाह हो गया, जिससे लाखों लोगों की मृत्यु हो गई।

रॉबर्ट क्लाइव द्वारा शुरू की गई कंपनी की प्रशासन की दोहरी प्रणाली, जहां उसके पास दीवानी अधिकार थे, उसमें गहरी खामियां थीं। वास्तव में, दोनों शक्तियों को कंपनी द्वारा नियंत्रित किया गया था, जो मुख्य रूप से स्थानीय आबादी की कीमत पर अपने मुनाफे को अधिकतम करने पर केंद्रित थी। परिणामस्वरूप, इन बढ़ती जटिलताओं के कारण अराजकता फैल गई और यह एक स्थायी मुद्दा बनकर उभरा। 

इसके अलावा, 1769 में हैदर अली के हाथों कंपनी की सैन्य हार के कारण जटिलताएँ बढ़ गईं। ब्रिटिश सरकार, इन विकासों और प्रभावी शासन चलाने में कंपनियों की अक्षमता से चिंतित होकर, 1773 के विनियमन अधिनियम की शुरूआत के लिए मंच तैयार किया। यह अधिनियम कंपनी के मामलों को विनियमित करने में ब्रिटिश सरकार का प्रमुख कदम था, जिसका लक्ष्य था भ्रष्टाचार और उसकी अक्षमताओं को संबोधित करना। यह प्रशासन और न्याय में महत्वपूर्ण सुधार लाने वाला पहला कानून था। 

इसके बाद, पहले अधिनियमित कानून की कमियों को दूर करने के लिए 1781 का निपटान अधिनियम लागू किया गया था। इसने सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों के प्रयोग को सीमित कर दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि ब्रिटिश कानून स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं के साथ टकराव नहीं करता, खासकर कराधान और राजस्व के मामलों में। इन दोनों अधिनियमों ने भारत पर ब्रिटिश कानूनी प्रशासनिक नियंत्रण की नींव रखी। 

इन अधिनियमों को पूरी तरह से समझने के लिए आइए इन पर विस्तार से चर्चा करें

विनियमन अधिनियम, 1773 

1773 का विनियमन अधिनियम ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भीतर बढ़ती प्रशासनिक और वित्तीय जरूरतों को हल करने और संबोधित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा अधिनियमित एक ऐतिहासिक कानून था। इसने कई प्रमुख सुधारों की शुरुआत की, विशेष रूप से गवर्नर-जनरल और परिषद के पदों का निर्माण, जिसमें वॉरेन पहले गवर्नर-जनरल बने। हालाँकि ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में लाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन इसकी कई सीमाएँ थीं। आइए एक-एक करके इस पर चर्चा करें। 

अधिनियम, 1773 से पहले की परिस्थितियाँ 

पहले, कंपनी मुख्य रूप से भारत में व्यापार और वाणिज्य (कॉमर्स) पर ध्यान केंद्रित करती थी लेकिन धीरे-धीरे अपनी स्वायत्तता बनाने के लिए राजनीतिक मामलों और क्षेत्रीय लाभ में विकसित हुई। 1759 में, लॉर्ड क्लाइव ने पिट को पत्र लिखकर सुझाव दिया कि क्राउन को कंपनी के कब्जे वाले क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए या यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अबाधित रहें। इस घटना के घटित होने के बाद संसद ने तीन दृष्टिकोणों के आधार पर इसे आगे बढ़ाने के लिए इस प्रकार कई कदम उठाए: 

  • पहला दृष्टिकोण यह था कि कंपनी के अधिकारा बरकरार रहने चाहिए। 
  • दूसरा यह था कि आगे के विकास को सुविधाजनक बनाने के लिए क्राउन को भारत में कंपनी की क्षेत्रीय हिस्सेदारी पर पूर्ण संप्रभुता लेनी चाहिए। 
  • तीसरे दृष्टिकोण में सुझाव दिया गया कि क्राउन सभी प्रमुख मामलों में नियंत्रक भागीदार की भूमिका निभाते हुए कंपनी के साथ साझेदारी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, इसे ब्रिटिश संसद ने स्वीकार कर लिया और अंततः इसकी प्रासंगिकता को समझने के लिए हर संभव प्रयास किया।

1767 में, कंपनी ने सौदेबाजी की अपनी नई भावना के साथ शुरुआत की, जब अंग्रेजों ने कंपनी को दो साल के लिए अपनी क्षेत्रीय शक्तियां बरकरार रखने की अनुमति दी, बशर्ते कि कंपनी बदले में क्राउन को सालाना £400,000 की राशि का भुगतान करेगी। 

इसके अलावा, संसद की मांग धीरे-धीरे बढ़ती गई और कंपनी का राजस्व घटने लगा और वह कर्ज में डूबने लगी। कंपनी की बिगड़ती वित्तीय स्थिति के बावजूद, संसद ने लाभ देखा और भारतीय क्षेत्रों पर संप्रभुता के अपने अधिकारों का दावा करने की मांग की। इस क्रमिक प्रक्रिया के दौरान, निम्नलिखित कारक कंपनी पर कब्ज़ा करने के प्रमुख कारणों के रूप में उभरे:

  • कंपनी के नौकरों में भ्रष्टाचार की बढ़ती जा रही मात्रा।
  • कंपनी के खिलाफ बढ़ती जनमत।
  • कंपनी के संचालन की देखरेख और निर्देशन के लिए कुशल और प्रभावी प्रशासन और एक केंद्रीय प्राधिकरण का अभाव।
  • 1769 में मैसूर के हैदर अली के हाथों कंपनी की हार।
  • जटिल प्रशासनिक संरचना एवं दोहरी सरकार की समस्याएँ।
  • 1772 में कंपनी ने दस लाख पाउंड के ऋण के लिए अनुरोध किया। 

विनियमन अधिनियम, 1773 के अधिनियमन की आवश्यकता

ऐसी कई परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण इस अधिनियम को लागू करना आवश्यक हो गया था। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालन की देखरेख में ब्रिटिश सरकार का पहला प्रत्यक्ष हस्तक्षेप था। 

  • सबसे पहले, रॉबर्ट क्लाइव द्वारा स्थापित प्रशासन के दोहरे स्वरूप की अवधारणा जटिल थी और इससे भारत के लोगों को परेशानी हुई। इस प्रणाली के तहत, कंपनी को बंगाल में दीवानी अधिकार प्राप्त थे और नवाब को निज़ामत अधिकार (न्यायिक और पुलिस अधिकार) प्राप्त थे। पर्दे के पीछे, निज़ामत के अधिकार भी कंपनी के हाथ में थे, क्योंकि नवाब कंपनी के एजेंट के रूप में कार्य करता था। इस सब से केवल लोगों को कष्ट ही हुआ, क्योंकि नवाब और कंपनी दोनों द्वारा उनका शोषण किया जा रहा था।
  • दूसरा यह कि, बंगाल में भयानक अकाल पड़ा, जिसके कारण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया, जिससे क्षेत्र में गंभीर आर्थिक गिरावट, सामाजिक अशांति और दीर्घकालिक अस्थिरता पैदा हुई।
  • तीसरा, इस अधिनियम के लागू होने का एक प्रमुख कारण 1773 तक कंपनी में उत्पन्न हुआ वित्तीय संकट था और कंपनी ने 1772 में ब्रिटिश सरकार से 1 मिलियन पाउंड के ऋण का अनुरोध किया।
  • चौथा, कंपनी को, पहले के चार्टर के माध्यम से, केवल ब्रिटिश संसद द्वारा व्यापारिक अधिकार दिए गए थे। लेकिन, धीरे-धीरे, जैसे-जैसे इसने अधिक क्षेत्रों पर कब्ज़ा करना शुरू किया, इसने एक शासक संस्था की तरह काम करना शुरू कर दिया। इंग्लैंड में, ब्रिटिश संसद ने इस स्थिति को अस्वीकार्य पाया और कंपनी के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने की मांग की। और, कंपनी की इस प्रवृत्ति को समाप्त करने के लिए, यानी व्यापारिक अधिकारों के नाम पर राजनीतिक शक्तियों का उपयोग करने के लिए, कंपनी ने सोचा कि यह आवश्यक है कि इन क्षेत्रों को क्राउन के नियंत्रण में लाया जाए। उस समय देश में बंगाल, मद्रास और बम्बई तीन प्रेसीडेंसियाँ मौजूद थीं। परंतु ये तीनों नगर एक-दूसरे से स्वतंत्र थे और इन्हें नियंत्रित करने के लिए भारत में किसी केंद्रीकृत प्राधिकरण की उपलब्धता नहीं थी। इस प्रकार, इन तीनों शहरों के प्रशासन में एकरूपता लाना आवश्यक हो गया।

इन परिस्थितियों ने ब्रिटिश सरकार को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालन की निगरानी के लिए 1773 का विनियमन अधिनियम पारित करने के लिए मजबूर किया।

लॉर्ड नॉर्थ (उस समय इंग्लैंड के प्रधान मंत्री) ने विनियमन अधिनियम के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी में सुधार करने का फैसला किया, और इसलिए मई 1773 में, लॉर्ड नॉर्थ ने ब्रिटिश संसद में एक विधेयक पेश किया, जो पारित होने पर, ‘1773’ का विनियमन अधिनियम’ के रूप में जाना गया। यहां ध्यान देने वाली एक दिलचस्प बात यह है कि इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश संसद ने कंपनी के मामलों को केवल ‘विनियमित’ किया, लेकिन सारी शक्ति पूरी तरह से अपने पास नहीं ली।

विनियमन अधिनियम, 1773 के उद्देश्य

1773 का विनियमन अधिनियम 18 मई 1773 को हाउस ऑफ कॉमन्स में लॉर्ड नॉर्थ द्वारा विनियमन विधेयक (बिल) के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसमें तीन प्रमुख उद्देश्यों को रेखांकित किया गया था: 

  • कंपनी की संरचना में संशोधन करना
  • भारत में कंपनियों की सरकार का नाम बदलना 
  • और भारत में कंपनी के कर्मचारियों द्वारा किए गए कार्यों और कदाचारों के लिए उपचार की पेशकश करना। 

यह अधिनियम कंपनी की संरचना को बदलने और भारत सरकार की संरचना में बदलाव लागू करने पर केंद्रित है। हालाँकि, यह कुछ हद तक अप्रभावी रूप से कंपनी की देखरेख के लिए एक मंत्रालय स्थापित करता है। विधेयक को हाउस ऑफ कॉमन्स में कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा; हालाँकि, इसे 10 जून, 1773 को एक महत्वपूर्ण बहुमत द्वारा अधिनियमित किया गया था, और बाद में हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा अनुमोदित किया गया था, जिसे 21 जून, 1773 को शाही सहमति प्राप्त हुई थी।

1773 के विनियमन अधिनियम को लागू करने के मूल उद्देश्य नीचे सूचीबद्ध हैं।

  • ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों को नियंत्रित और विनियमित करना
  • व्यापारिक कंपनी के हाथ से राजनीतिक शक्ति को हटाना
  • नए प्रशासनिक सुधार प्रदान करना जो एक केंद्रीय प्रशासन प्रणाली द्वारा प्रदान किए गए थे
  • कंपनी की निरंकुश स्थिति में सुधार करना
  • द्वैध शासन (डुअल गवर्नमेंट) व्यवस्था लागू होने से उत्पन्न अराजकता को दूर करना
  • अधिनियम के माध्यम से कंपनी के नौकरों को किसी भी प्रकार के निजी व्यापार में शामिल होने और लोगों से रिश्वत, उपहार और तौफे स्वीकार करने पर रोक लगाकर भ्रष्टाचार विरोधी प्रथाओं को लाना।

विनियमन अधिनियम, 1773 की मुख्य विशेषताएं

इस अधिनियम ने भारतीय मामलों में संसदीय निरीक्षण की शुरुआत की। इस अधिनियम के प्रावधान पहले और दूसरे उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए बनाये गये थे, जो इस प्रकार थे: 

निदेशकों के लिए चुनाव

विनियमन अधिनियम ने इंग्लैंड में कंपनियों के संविधान में महत्वपूर्ण बदलाव पेश किए। धारा 6 के तहत, निदेशकों को चार साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता था, जिनमें से एक-चौथाई हर साल सेवानिवृत्त हो जाते थे। सेवानिवृत्त निदेशक भी पुनः चुनाव के लिए अयोग्य थे। 

पत्राचार (कॉरेस्पॉन्डेंस) पर नियंत्रण

निदेशक को भारतीय अधिकारियों के साथ दीवानी और सैन्य मामलों का पत्राचार प्रस्तुत करना आवश्यक था; यह संसद से लेकर कंपनी तक सभी शक्तियों पर कब्ज़ा करने के मुख्य उद्देश्य से किया गया था। भारत में राजस्व संबंधी सभी मामलों को क्राउन की निगरानी में सुनिश्चित करने के लिए इंग्लैंड के राजकोष (ट्रेज़री) में जमा करना पड़ता था।

गवर्नर-जनरल और परिषद 

धारा 8 और धारा 9 के तहत, कलकत्ता में, एक गवर्नर-जनरल और चार पार्षदों (काउंसलर्स) सहित एक परिषद का चयन किया गया। परिषद के सभी निर्णय बहुमत की राय से लिये जाते थे। समान विभाजन के मामलों में, गवर्नर-जनरल और उसकी अनुपस्थिति में, सबसे वरिष्ठ पार्षद के पास निर्णायक वोट हुआ करता था।

मद्रास एवं बम्बई पर नियंत्रण

मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी की सरकारें गवर्नर-जनरल और परिषद के अधिकार के अधीन थीं, जिसका अर्थ था कि वे गवर्नर-जनरल की पूर्व सहमति के बिना शत्रुता में शामिल नहीं हो सकते थे, युद्ध की घोषणा नहीं कर सकते थे, या किसी भी भारतीय प्रिंस और परिषद के साथ शांति संधि नहीं कर सकते थे। हालाँकि, आपात स्थिति, आसन्न आवश्यकता या कंपनी के विशिष्ट आदेशों के मामलों में, पूर्व सहमति की इस आवश्यकता को माफ किया जा सकता है। 

परिषद् की शक्तियाँ एवं कर्त्तव्य

कलकत्ता, साथ ही बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रांतों के क्षेत्रीय अधिग्रहण और राजस्व की निगरानी और शासन सहित सभी दीवानी और सैन्य प्रशासन, गवर्नर-जनरल और परिषद को सौंपे गए थे। 

परिषद की विधायी शक्ति

गवर्नर-जनरल और परिषद को कलकत्ता के सुशासन और रखरखाव के लिए कोई भी नियम, शर्त और अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) बनाने की शक्ति दी गई थी, जिसे वे उचित और निष्पक्ष मानते थे। ऐसे किसी भी नियम के उल्लंघन के मामले में, वे दंड दे सकते हैं। हालाँकि, इन शक्तियों से संबंधित कुछ प्रतिबंध थे:

  • नियम और विनियम इंग्लैंड के कानून द्वारा बनाए गए नियमों और विनियमों के प्रतिकूल नहीं होने चाहिए। 
  • उन्हें तब तक वैध नहीं माना जाएगा जब तक वे आवश्यक मंजूरी और सहमति के साथ सर्वोच्च न्यायालय में आधिकारिक तौर पर पंजीकृत नहीं हो जाते। 
  • नियम, विनियम और अध्यादेश उनकी सार्वजनिक घोषणा या पोस्टिंग के 20 दिन बीत जाने के बाद ही पंजीकृत किए गए थे। 
  • यदि कोई भी आवेदन उनके पंजीकरण के 60 दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है, तो नियमों, विनियमों और अध्यादेशों को किंग और परिषद द्वारा रद्द या निरस्त किया जा सकता है। यदि उन्हें दोषपूर्ण माना जाता है तो किंग के पास ऐसे कानूनों को रद्द करने और उन्हें निरस्त करने की  शक्ति होती है (धारा 36)।
  • गवर्नर-जनरल और परिषद को सभी नियमों, विनियमों और उत्तरों की प्रतियां इंग्लैंड के राज्य सचिव को प्रस्तुत करनी होती थीं, जो पूरी तरह से किंग या क्राउन के विवेक पर निर्भर करता था।
  • कंपनी के अधिकारियों को निजी व्यापार में भाग लेने और किसी भी रूप में कोई उपहार प्राप्त करने से मना किया गया था। भारत में कंपनी के अधीन काम करते समय किए गए अपराधों के लिए ब्रिटिश नागरिकों पर मुकदमा चलाने का अधिकार अंग्रेजी अदालतों को दिया गया। 

ये योग्यताएँ ब्रिटिश व्यक्तियों के हितों की रक्षा करने और उन पर नियंत्रण रखने और उसे बनाए रखने में गवर्नर-जनरल और परिषद के ऐतिहासिक कार्यों की जाँच करने के लिए लगाई गई थीं। दूसरे शब्दों में, इसका उद्देश्य कंपनी से भारत में उसकी राजनीतिक शक्तियाँ छीनना और निश्चित रूप से उस अधिकार को संसद को हस्तांतरित करना था।

सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना

विनियमन अधिनियम की धारा 13 किंग जॉर्ज द्वितीय द्वारा अधिकृत कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के प्रावधानों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इस धारा ने 1774 के चार्टर के माध्यम से कलकत्ता के फोर्ट विलियम में सर्वोच्च न्यायालय बनाने की शक्ति प्रदान की। इस प्रावधान को बनाने के पीछे का उद्देश्य न्यायपालिका की त्रुटिपूर्ण स्थितियों को खत्म करना था क्योंकि यह 1752 के चार्टर के तहत संचालित होती थी। सर्वोच्च न्यायालय एक मुख्य न्यायाधीश और तीन प्यूनी न्यायाधीशो बना है, जिनमें से सभी को कम से कम 5 साल के अनुभव के साथ बैरिस्टर होना चाहिए। 

यह न्यायालय सभी दीवानी, आपराधिक, नौवाहनविभाग (एडमिरेल्टी) और चर्च संबंधी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने की शक्तियों और अधिकार का हकदार था। इसके अलावा, इसे अधीनस्थ न्यायालयों के लिए ऐसे नियम बनाने के लिए अधिकृत किया गया था जो न्याय प्रशासन और चार्टर में निर्दिष्ट सभी शक्तियों के उचित निष्पादन से संबंधित थे और औपचारिक रूप से रिकॉर्ड न्यायालय के रूप में मान्यता प्राप्त थे। 

सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र संबंधित अधिनियम में परिभाषित व्यक्तियों की विशिष्ट श्रेणियों तक ही सीमित था। इसका विस्तार बंगाल, बिहार और उड़ीसा में रहने वाले सभी ब्रिटिश प्रजा पर भी हुआ, जिससे अपराधों और अन्याय से संबंधित शिकायतों को संबोधित करने का अधिकार मिल गया। धारा 38 ने गवर्नर-जनरल, परिषद के सदस्यों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अधिकार दिया, जिनकी नियुक्तियाँ तत्कालीन महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) थुरलो की सिफारिश पर चांसलर लॉर्ड बाथर्स्ट द्वारा की गईं। 

गवर्नर-जनरल, पार्षद, न्यायाधीश, कंपनी के नौकरों और ब्रिटिश प्रजा पर किंग की पीठ का अधिकार क्षेत्र

यदि इन सभी व्यक्तियों पर अधिनियम के विरुद्ध किसी भी अपराध का आरोप लगाया गया तो उन पर इंग्लैंड में किंग्स बेंच में मुकदमा चलाया जा सकता है। इसका मतलब यह था कि उन पर अंग्रेजी कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता था, चाहे घटना कहीं भी हुई हो, ताकि कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके। इस प्रावधान की बाह्यक्षेत्रीय (एक्स्ट्रा टेरीटोरियल) पहुंच का उद्देश्य नियंत्रण बनाए रखना और उपनिवेशों (कॉलोनीज) में अधिनियम के किसी भी उल्लंघन को हतोत्साहित करना था। 

विनियमन अधिनियम, 1773 के महत्वपूर्ण प्रावधान

प्रावधान  स्पष्टीकरण
बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के पहले गवर्नर जनरल थे, उनका काम 4 सदस्यों की कार्यकारी परिषद की सहायता करना था जो बहुमत के नियम के अनुसार कार्य करते थे।
सत्ता का केंद्रीकरण मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीनस्थ माना जाता है, इसलिए केंद्रीकृत प्राधिकरण की स्थापना की जाती है।
कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय फोर्ट विलियम, कलकत्ता में, ब्रिटिश कानूनी सिद्धांतों को प्रशासित करने के लिए, एक मुख्य न्यायाधीश और उनके अधीनस्थ तीन न्यायाधीशों के साथ सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी।
रिपोर्ट देने के लिए आवश्यकताएँ भारत पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को मजबूत करने के लिए निदेशकों की अदालत को राजस्व और दीवानी सैन्य मामलों पर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था।
कंपनियों के अधिकारियों पर नियंत्रण भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कंपनी के सभी नौकरों को निजी व्यापार या रिश्वत लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
वित्तीय विनियमन सरकारी ऋण का निपटान होने तक कंपनी का लाभांश (डिविडेंड) 6% तक सीमित था, और निदेशक मंडल का कार्यकाल 4 साल तक सीमित था।

भारतीय कानूनी इतिहास पर अधिनियम का प्रभाव

  • इस अधिनियम को एक ऐतिहासिक अधिनियम माना जाता है क्योंकि इसने देश में न्यायपालिका की संरचना में कई गतिशील और महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए। 
  • इस अधिनियम द्वारा कई बदलाव आए जैसे कि निदेशक न्यायालय (सीओडी) की संरचना।
  • पहली बार कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यों को मान्यता दी गई।
  • इस अधिनियम ने देश में केंद्रीय प्रशासन के लिए आधार भी स्थापित किया। 
  • इस अधिनियम ने पहली बार कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की। वहां औपचारिक न्यायिक व्यवस्था बनाकर और न्यायपालिका को कुछ हद तक विनियमित किया गया। इसने भारत में सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों के रूप में इंग्लैंड के विद्वान न्यायाधीशों की शुरूआत को भी चिह्नित किया। 
  • इसने गवर्नर-जनरल और परिषद के कर्मियों को प्रतिबंधित कर दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि कंपनी के नौकरों के कार्यों की निगरानी अब जिले को ठीक से संचालित करने में व्यक्तिगत रुचि वाले व्यक्तियों द्वारा की जाएगी, जो कंपनी के नौकरों के वर्ग पूर्वाग्रहों से मुक्त थे। 
  • इस अधिनियम ने किंग के न्यायाधीशों और कानूनी पेशेवरों की अदालत को कंपनी के नौकरों से बनी अदालत से बदल दिया, जिन्हें उनके समकक्ष लोगो द्वारा बर्खास्त किया जा सकता था ।

विनियमन अधिनियम, 1773 की सीमाएँ और आलोचनाएँ

हालाँकि विनियमन अधिनियम के लक्ष्य और उद्देश्य नेक इरादे वाले थे, लेकिन समय के साथ कई खामियाँ सामने आईं। ये मुद्दे भारतीय मामलों में नीति निर्माता की अनुभवहीनता और अधिनियम के प्रावधानों का मसौदा तैयार करने में कमियों से उत्पन्न हुए हैं। विनियमन अधिनियम कई मामलों में विशेष रूप से अस्पष्ट था। एक ओर गवर्नर-जनरल अपनी परिषद के सदस्यों से अक्सर भिड़ते रहते थे, तो दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय से। 

गवर्नर-जनरल और पार्षदों के बीच विवाद 

विनियमन अधिनियम ने एक गवर्नर-जनरल और परिषद के चार सदस्यों को इस उम्मीद के साथ नियुक्त किया कि यह नया सेटअप पिछली स्थिति की तुलना में दक्षता में वृद्धि करेगा। हालाँकि, ब्रिटिश संसद ने तीन पार्षदों- क्लेवरिंग, मॉन्सन और फ्रांसिस को भेजने की गलती की, जो भारतीय मामलों में पूरी तरह से नए और अनुभवी नहीं थे। वे इंग्लैंड में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नेताओं के आदेश पर भारत पहुंचे और विशेष रूप से वॉरेन हेस्टिंग्स और कंपनी के अधिकारियों के प्रति पक्षपाती थे। इसके कारण गवर्नर-जनरल और परिषद के सदस्यों के साथ-साथ विभिन्न अन्य लोगों के बीच विवाद चल रहे थे।

आसन्न आवश्यकता अपरिभाषित

विनियमन अधिनियम ने कलकत्ता प्रेसीडेंसी के गवर्नर-जनरल को अन्य दो प्रेसीडेंसी, बॉम्बे और मद्रास पर नियंत्रण स्थापित करने का अधिकार दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनके बीच विवाद हुआ। एक साथ सीमाएँ थोपते हुए शक्ति प्रदान करना एक गलती थी। इन प्रतिबंधों ने, मुख्य प्रावधानों के साथ, बॉम्बे और मद्रास के प्रेसीडेंसियों को आसन्न आवश्यकता के मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने की अनुमति दी। दुर्भाग्य से, अधिनियम यह परिभाषित करने में विफल रहा कि ऐसी आवश्यकता क्या थी; जिससे राष्ट्रपतियों के बीच सामंजस्य और समन्वय की कमी हो गई।

कंपनी की स्थिति अपरिभाषित थी

कंपनी ने ब्रिटिश क्राउन और मुगल एंपरर के अधीन भारत में अपनी सत्ता कायम रखी और मुगल एंपरर के दीवान के रूप में कार्य किया। इस स्थिति ने ब्रिटिश संसद को भारत पर पूर्ण संप्रभुता सुनिश्चित करने में झिझकने पर मजबूर कर दिया, जिसके कारण ब्रिटिश संसद को कंपनियों के अधिकारों के आधार पर संप्रभुता प्रदान करनी पड़ी। संसद ने विनियमन अधिनियम में मुग़ल एंपरर की संप्रभुता को मान्यता देने से इनकार कर दिया, विशेष रूप से यह देखते हुए कि मुग़ल शक्ति कम हो रही थी। कंपनी की दीवानी भूमि पर अपने संप्रभु अधिकारों का दावा करने का संसद का प्रयास मुगल संप्रभुता के पूर्ण विलुप्त होने के बाद ही हो सकता था जिसे वे देखना पसंद करते थे। इसके अलावा, यह अधिनियम उन भारतीय मूल निवासियों की चिंताओं को दूर करने में विफल रहा, जो वास्तव में पीड़ित थे।

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच विवाद

1774 के चार्टर के तहत सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के बाद, गवर्नर-जनरल और परिषद का गठन क्राउन के एक अन्य अधिनियम द्वारा किया गया। इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका की कार्यप्रणाली के बीच गंभीर टकराव पैदा हो गया, क्योंकि हर एक ने दूसरे पर श्रेष्ठता का दावा किया। इसमें सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र के संबंध में काफी आलोचना और भ्रम था।

अस्पष्ट शब्द और व्यापक व्याख्याएँ

सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र ब्रिटिश प्रजा के दृष्टिकोण से प्रभावित था, जो मूल निवासियों से अनभिज्ञ थे। व्यापक कानूनी शब्दों के उपयोग ने न्यायाधीशों को अपनी शक्तियों की व्यापक रूप से व्याख्या करने की अनुमति दी, जिससे स्थानीय संदर्भ के लिए उपयुक्त क्षेत्र से परे उनके अधिकार क्षेत्र का विस्तार हुआ। 

कंपनी की अदालतों और सर्वोच्च न्यायालय के बीच विवाद 

विनियमन अधिनियम के निर्माता कंपनी न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के बीच संबंधों को संबोधित करने वाले किसी भी प्रावधान को निर्धारित करने में विफल रहे, जिसे क्राउन द्वारा स्थापित किया गया था। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र आंशिक रूप से अदालत के साथ समवर्ती (कंकरेंट) था, जो भी संप्रभुता के स्रोतों को स्पष्ट किए बिना, जहां से प्रत्येक ने अपना अधिकार प्राप्त किया था। 

इसलिए, इसे 1774 से 1780 तक के विनियमन के बाद की अवधि में प्रतिबिंबित किया जा सकता है, जिसने विवादित समस्याओं और स्थितियों की एक श्रृंखला को जन्म दिया। कई प्रभावशाली हस्तियों, जैसे किंग नंद कुमार, पटना मामला, कासिजुराह के किंग, कमाल-उद-दीन, बर्दवान की रानी आदि ने विनियमन अधिनियम के प्रावधानों में कमियों पर प्रकाश डाला। लॉर्ड मैकाले ने 1774 से 1780 की अवधि के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को “आतंक का शासनकाल” बताया।

बाद के कार्य और मामले

1774 का चार्टर और कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय 

विनियमन अधिनियम 1773 में 1753 के चार्टर के प्रावधानों की एक श्रृंखला शामिल थी, जो क्राउन को सर्वोच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्रदान करती थी। अधिनियम की धारा 13 के तहत, किंग जॉर्ज III ने 26 मार्च 1774 को एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिसने कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की। चार्टर ने सर एलिजा इम्पे को पहले मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया, स्टीफन सी. ले ​​मैस्त्रे, रॉबर्ट चेम्बर्स और जॉन हाइड ने तीन प्यूनी न्यायाधीशों के रूप में कार्य किया। 

इन्हें अदालत को अभ्यास और प्रक्रिया के नियमों को स्थापित करने के लिए भी अधिकृत किया गया था और गवर्नर जनरल की सहमति से अदालत को विनियमित करने के लिए आवश्यक अधीनस्थ कर्मचारियों को नियुक्त करने की शक्ति भी दी गई थी। चार्टर ने सर्वोच्च न्यायालय को दीवानी अधिकार क्षेत्र प्रदान किया, जिससे उसे उन मामलों की सुनवाई की अनुमति मिल गई जहां कार्रवाई 500 रुपये से अधिक थी। 

इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय मुफस्सिल न्यायालय के फैसले को दोहरा सकता है। इसके अलावा, यदि मुकदमे का मूल्यांकन 1000 पैगोडा से अधिक है, तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के 6 महीने के भीतर परिषद में किंग के समक्ष अपील की जा सकती है।

आपराधिक अधिकार क्षेत्र के संबंध में, सर्वोच्च न्यायालय को कलकत्ता शहर, फोर्ट विलियम और संबंधित अधीनस्थ कारखानों के लिए ओयर और टर्मिनर (खुली जगह में अदालत) और गॉल-डिलीवरी के न्यायालय के रूप में नामित किया गया था। इसे कलेक्टर न्यायालय, जल सत्र और अनुरोध न्यायालय की निगरानी करने का अधिकार दिया गया था और इन न्यायालयों को उत्प्रेषण (सर्टियोररी), परमादेश (मैंडमस), त्रुटि, निषेध (प्रोहिबिशन) और कार्यवाही (प्रोसिडेंडो) की रिट जारी कर सकता था। 

इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय को कंपनी के अधिकार क्षेत्र के तहत बंगाल, बिहार और उड़ीसा और अन्य क्षेत्रों और द्वीपों के लिए साम्य (इक्विटी) न्यायालय और नौवाहनविभाग न्यायालय की शक्तियां प्रदान की गईं। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय को चार अलग-अलग प्रकार के अधिकार क्षेत्र दिए गए: दीवानी, फौजदारी, चर्च संबंधी और नौवाहनविभाग। इस प्रकार, कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय को व्यापक अधिकार क्षेत्र प्राप्त था और उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियाँ थीं। 

ऐतिहासिक मामले 

4000

सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना करने वाले विनियमन अधिनियम में ऊपर उल्लिखित दोषों के कारण स्थिति और खराब हो गई। सर्वोच्च न्यायालय के खुलने के दो साल बाद भी, सदस्यों में से एक, फिलिप फ्रांसिस ने कहा कि संप्रभुता का महत्वपूर्ण प्रश्न अनसुलझा है। इस अवधि के दौरान हुए विवादों और आतंक के माहौल को भारत के कानूनी इतिहास में कई ऐतिहासिक मामलों के आलोचनात्मक विश्लेषण के माध्यम से उदाहरण दिया जा सकता है। ये मामले सर्वोच्च न्यायालय के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाते हैं और इस जबरदस्त समय के दौरान न्यायपालिका और अन्य अधिकारियों के बीच तनाव को उजागर करते हैं। 

किंग नंद कुमार का मुकदमा (1775)

इस मामले को न्यायिक हत्या के रूप में भी जाना जाता है और इसने बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्व प्राप्त किया है, क्योंकि यह उन आरोपों का एक अभिन्न हिस्सा था, जिस पर वॉरेन हेस्टिंग्स और इम्पे पर इंग्लैंड लौटने के बाद हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा महाभियोग (इंपीच) लगाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के संचालन से जुड़े विवादों और उसके अधिकार क्षेत्र और कंपनी के बीच टकराव ने औपनिवेशिक भारत में शासन के मुद्दों और जटिलताओं को रेखांकित किया, जिससे अंततः हेस्टिंग्स और इम्पे के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक नतीजे सामने आए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दो पक्षों के इर्द-गिर्द घूमता रहा, एक किंग नंद कुमार और दूसरे गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स थे। 

किंगनंद कुमार एक हिंदू ब्राह्मण, एक प्रमुख जमींदार और बंगाल में एक प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्होंने हुगली के गवर्नर के रूप में कार्य किया और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के एक वकील और भरोसेमंद सदस्य के रूप में पहचाने गए, कंपनी के साथ उनके घनिष्ठ संबंध और इसके प्रशासन में उनकी भूमिका के कारण उन्हें “ब्लैक कर्नल” उपनाम मिला। उनकी स्थिति और प्रभाव ने उन्हें भारत में औपनिवेशिक शासन की जटिल गतिशीलता में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया।

वॉरेन हेस्टिंग्स (जी-जी), और उनके चार सदस्य: फ्रांसिस (विरोध), क्लेवरिंग (विरोध), मॉन्सन (विरोध), और बेयरवेल (पक्ष)। फ्रांसिस, क्लेवरिंग और मॉन्सन के प्राथमिक गुटों ने नंद कुमार से परिषद के समक्ष वॉरेन हेस्टिंग्स के खिलाफ रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के आरोप दायर करने का आग्रह किया।

मामले के तथ्य

हेस्टिंग्स के अनुरोध पर साजिश के लिए नंद कुमार पर आरोप लगाए जाने और गिरफ्तार किए जाने के कुछ ही समय बाद, उन्होंने किंग नंद कुमार की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उनके खिलाफ एक और जालसाजी का मामला गढ़ा। 

परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय ने ब्रिटिश संसद के एक अधिनियम के तहत उन्हें मौत की सजा सुनाई। किंग नंद कुमार के जीवन को बचाने और संरक्षित करने का अनुरोध करने वाली कई याचिकाओं के बावजूद, अदालत ने सभी को खारिज कर दिया, जिसने अंततः 5 अगस्त, 1775 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई।

इसलिए, हेस्टिंग्स अपने एक मित्र, सर एलिजा इम्पे, जो उस समय भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे, उनकी मदद से किंग नंदकुमार को खत्म करने में कामयाब रहे। 

मामले की आलोचनात्मक सराहना

किंग नंद कुमार के मुकदमे को न्यायिक हत्या माना गया और यह माना गया कि तथ्यों और गवाहों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। लेकिन सर एलिजा इम्पे ने विभिन्न प्रावधानों पर ब्रिटिश संसद के जालसाजी अधिनियम, 1728 के तहत जालसाजी के अपराध के लिए नंद कुमार के मुकदमे को उचित ठहराया।

मामले का फैसला

किंग नंद कुमार के मामले में, कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ब्रिटिश कानून के तहत 1775 में जालसाजी का दोषी ठहराया। व्यापक धारणा के बावजूद कि यह आरोप राजनीति से प्रेरित था और इसमें दी गई सज़ा अत्यधिक कठोर थी, उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। सर एलिजा इम्पे के नेतृत्व वाली अदालत ने दया के अनुरोध के बावजूद हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। किंग नंद कुमार को 5 अगस्त 1775 को फाँसी दे दी गई, जो भारत के ब्रिटिश इतिहास में पहला विवादास्पद कानूनी मामला था। 

कोसिजुराह मामला 

कोसिजुराह का मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद को संदर्भित करता है जो 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश भारत में उभरा था, जो औपनिवेशिक शासन की जटिलताओं और 1773 के विनियमन अधिनियम द्वारा स्थापित कानूनी ढांचे पर प्रकाश डालता है। 

काशीनाथ बाबू एक प्रमुख व्यापारी थे और उन्होंने परिषद के खिलाफ कार्रवाई की। कोसिजुराह का किंग व्यापारी के कर्ज में डूबा हुआ था। 

काशीनाथ बाबू, कलकत्ता में परिषद की वसूली पद्धति के माध्यम से अपने ऋणों की वसूली करने में विफल रहे, उन्होंने वसूली के लिए सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया। उन्होंने कैपियास की एक रिट दायर की।

मामले के तथ्य

किंग सुंदरनारायण उड़ीसा राज्य के मिदनापुर जिले के कोसिजुराह के जमींदार थे। उन्हें कंपनी को भू-राजस्व  के रूप में सालाना एक निश्चित राशि का भुगतान करना था। काशीनाथ बाबू एक प्रमुख व्यापारी थे, और वे किंग सुंदरनारायण के प्रतिभू (श्योरीटी) थे।

किंग पर काशीनाथ बाबू के दो बांडों का भारी कर्ज था, जिसे उन्होंने काशीनाथ बाबू के पक्ष में कलकत्ता में निष्पादित किया था। कलकत्ता में राजस्व बोर्ड के माध्यम से किंग से धन वापस पाने में असफल होने की वजह से काशीनाथ ने 13 अगस्त, 1779 को कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय में किंग के विरुद्ध ऋण का मुकदमा दायर किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने किंग सुंदरनारायण के खिलाफ कैपियास की रिट जारी की, जिसका अर्थ है गिरफ्तारी का वारंट। मिदनापुर के कलेक्टर ने गवर्नर-जनरल और परिषद को मामले की सूचना देते हुए शिकायत की कि किंग के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्रवाई के कारण राजस्व संग्रह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। 

इसके अलावा, वॉरेन हेस्टिंग और उनकी परिषद ने उनकी सलाह पर महान्यायवादी से परामर्श किया; सर्वोच्च परिषद ने जमींदार (किंग) को सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया का पालन न करने का निर्देश दिया। पहली रिट बिना निष्पादित किए लौटा दी गई, उस वजह से सर्वोच्च न्यायालय ने किंग के खिलाफ एक और रिट जारी की, और अदालत के प्रधान (शेरिफ़) के साथ 60 लोगों को रिट निष्पादित करने के लिए भेजा गया।

बाद में, किंग ने आरोप लगाया कि प्रधान के लोग उसके घर में घुस गए, उसके नौकरों को घायल कर दिया और जबरन दरवाजा तोड़ दिया। इसके बाद सर्वोच्च परिषद ने सैनिकों की कमान संभालने वाले अधिकारी को प्रधानो को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया।

अंत में, मिदनापुर के कलेक्टर ने प्रधान और उसके लोगों को गिरफ्तार कर लिया, उन्हें 3 दिनों तक कारावास में रखा, और फिर उन्हें कैदी के रूप में कलकत्ता भेज दिया। प्रधान और उसके लोगों को अंततः सर्वोच्च परिषद द्वारा रिहा कर दिया गया, लेकिन गवर्नर जनरल ने उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की रिट जारी करने से रोक दिया।

मामले में हस्तक्षेप करने में सर्वोच्च परिषद की कार्रवाई से व्यथित काशीनाथ बाबू ने परिषद के सदस्यों में गवर्नर जनरल के खिलाफ एक कार्रवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने प्रधान और उसके लोगों पर हमला किया और जब्त की गई संपत्ति वापस ले ली ताकि उन्हें संपत्ति से वंचित किया जा सके। किंग से अपने ऋण की वसूली के लिए।

मामले की आलोचनात्मक सराहना

कोसिजुराह मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या जमींदार सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अधीन थे या नहीं। कोसिजुराह के मामले ने सर्वोच्च न्यायालय और सर्वोच्च परिषद के बीच मतभेदों को बढ़ा दिया। यह स्पष्ट हो गया कि न्यायपालिका और कार्यपालिका एक-दूसरे के विरोध में काम कर रहे थे। 

मामले का फैसला

कोसिजुराह के फैसले में फैसला सुनाया गया कि कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र कोसिजुराह जैसे शहर के बाहर के क्षेत्रों तक विस्तारित नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन स्थानीय अधिकारी, अदालत के आदेश से बंधे नहीं थे, जो कंपनी के क्षेत्रों और अदालत के अधिकार के बीच स्पष्ट अंतर दर्शाता था।

“राधा चरण मित्र” मामला 

राधा चरण मित्र मामला हिंदू उत्तराधिकार कानून की व्याख्या और हिंदू कानून के तहत विधवाओं के अधिकारों से संबंधित एक ऐतिहासिक भारतीय कानूनी मामला है। यह मामला पुरुष उत्तराधिकारियों की अनुपस्थिति में विधवाओं को अपने मृत पति की संपत्ति प्राप्त करने के अधिकारों पर प्रकाश डालता है। इसने पारंपरिक कानूनों के तहत हिंदू विधवाओं के विरासत अधिकारों को स्पष्ट करने में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम की।

मामले के तथ्य

1775 में सदर आपराधिक अदालत को कलकत्ता से मुर्शिदाबाद में स्थानांतरित करने के बाद, आपराधिक न्याय प्रशासन को नवाब मुबारिकुद्दौला के तहत स्थानांतरित कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से मुक्त एक संप्रभु राजकुमार के रूप में माना जाता है। नतीजतन, वॉरेन हेस्टिंग्स ने राधा चरण और नवाब न्यायवादी सहित कई व्यक्तियों के खिलाफ साजिश की शिकायत खो दी। हालाँकि, परिषद के सदस्यों ने सर्वोच्च न्यायालय को यह तर्क देते हुए सूचित किया कि राधा चरण, नवाब के वकील के रूप में, राष्ट्रीय कानूनों द्वारा दिए गए अधिकारों और कई प्रतिरक्षा के हकदार थे। 

मामले का फैसला

यह मामला 28 जून, 1775 को चला, जहां आपराधिक न्याय, शाही टकसाल और सच्चे नियमों पर अधिकार के साथ एक संप्रभु राजकुमार के रूप में नवाब की स्थिति का तर्क प्रस्तुत किया गया था। 

फिर भी, अदालत ने वॉरेन हेस्टिंग्स और अन्य के लिए गवर्नर जनरल द्वारा दिए गए तर्कों का समर्थन करते हुए इन दावों को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नवाब पूरी तरह से कंपनी के नियंत्रण में था और उसे सेना बनाए रखने या शाही टकसाल (ट्रूप्स) संचालित करने का अधिकार नहीं दिया गया था। अदालत ने आगे तर्क दिया कि नवाब संप्रभुता का कोई कार्य नहीं कर सकता।

जैन के अनुसार, यह मामला किंग नंदकुमार के उल्लेखनीय रूप से मान्यता प्राप्त मामले के अग्रदूत (प्रीक्यूर्सर) के रूप में कार्य करता है। भारत में अंग्रेजी कानून लागू करने के हानिकारक प्रभावों को दर्शाते हुए, जालसाजी के लिए 1765 में राधा चरण को मौत की सजा दी गई थी। 

निपटान अधिनियम, 1781

निपटान अधिनियम यह एक ब्रिटिश संसद द्वारा 5 जुलाई 1781 को अधिनियमित किया गया कानून रहा है, जिसका उद्देश्य विनियमन अधिनियम 1773 की कमियों को दूर करना था। इसे घोषणात्मक (डिक्लेरेटरी) अधिनियम, 1781 के रूप में भी जाना जाता है।

वे परिस्थितियाँ जिनके कारण निपटान अधिनियम पारित हुआ

हालाँकि 1773 के विनियमन अधिनियम ने मामलों और न्यायपालिका दोनों के विनियमन में बड़े स्तर पर बदलाव लाया, लेकिन इसमे कुछ महत्वपूर्ण खामियाँ थीं जिन्हें यह अधिनियम हल करने में विफल रहा। विनियमन अधिनियम 1773 के दोषों को दूर करने के लिए निपटान अधिनियम 1781 अधिनियमित किया गया।

  • सबसे पहले, वॉरेन हेस्टिंग्स प्रशासन के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दे थे। उल्लेखनीय उदाहरणों में पटना मामला, कोसिजुराह मामला और विशेष रूप से किंग नंदकुमार मामला शामिल है, जिसमें नंदकुमार को फांसी दी गई थी। इन घटनाओं के कारण हेस्टिंग्स प्रशासन की व्यापक आलोचना हुई।
  • दूसरा यह की, सर्वोच्च न्यायालय और परिषद में गवर्नर-जनरल के बीच एक बड़ा झगड़ा हुआ, जिसने प्रशासन के संतुलन को काफी हद तक बिगाड़ दिया।
  • साथ ही, समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में भी हस्तक्षेप किया गया, जिससे लोग उत्तेजित हो गये।

इसके अलावा, वर्ष 1777 में कंपनी के निदेशकों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ एक शिकायत की गई, क्योंकि उनके लिए प्रशासन चलाना मुश्किल था। इस शिकायत को संबोधित करने के लिए, हाउस ऑफ कॉमन्स ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रशासन की जांच के लिए एक समिति नियुक्त की। इस समिति को टौचेट समिति के नाम से जाना जाने लगा।

इस समिति की रिपोर्ट के फलस्वरूप 1781 का निपटान अधिनियम लागू हुआ।

निपटान अधिनियम, 1781 की मुख्य विशेषताएं

यह अधिनियम विनियमन अधिनियम के हानिकारक प्रभावों को संबोधित करने के लिए अधिनियमित किया गया था। इसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के तहत कलकत्ता में मौजूद कुछ व्यक्तियों को राहत देना और गवर्नर-जनरल और परिषद और उनके आदेशों या अधिकार के तहत काम करने वाले सभी अधिकारियों की प्रतिपूर्ति (रिइंबर्स) करना था। 1781 के अधिनियम का उद्देश्य विनियमन अधिनियम के प्रावधानों को स्पष्ट और संशोधित करना था। विनियमन अधिनियम के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान और विशेषताएं यह थीं: 

  • अधिनियम ने घोषणा की कि गवर्नर-जनरल और परिषद सार्वजनिक क्षमता और गवर्नर-जनरल और परिषद के रूप में कार्य करने के संबंध में भारत में उनके द्वारा किए गए या आदेशित सभी कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार और अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर सकते हैं। हालाँकि, अंग्रेजी अदालतों के समक्ष गवर्नर-जनरल और परिषद या उनके कारण कार्य करने वाले किसी अन्य व्यक्ति को कोई शक्ति नहीं दी गई थी।
  • अधिनियम की धारा 17 के तहत, अंग्रेजी कानून मूल हिंदुओं पर उनके व्यक्तिगत कानूनों के संबंध में लागू नहीं था, यह संरक्षित करते हुए कि वे भूमि, किराए और माल के उत्तराधिकार और विरासत से संबंधित कानून हैं, साथ ही पक्षों के बीच अनुबंध और लेनदेन के मामले भी हैं।  
  • ऐसे मामलों में जहां पक्ष को एक अलग धर्म के तहत लाया जाता है, वहां मामलों को प्रतिवादियों के कानूनों और उपयोग के अनुसार निपटाया जाना चाहिए। 
  • सर्वोच्च न्यायालय को गलत अतिचार (ट्रेसपास) के लिए कार्रवाई और फिर दीवानी मामलों में अधिकार क्षेत्र सौंपा गया था, जहां पक्ष अपना मामला सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए लिखित रूप में सहमत हुए थे।
  • यह भी सूचीबद्ध किया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक निर्णय द्वारा किए गए किसी भी गलती के लिए किसी भी अदालत में न्यायिक कार्यालय रखने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ किसी भी मामले पर विचार नहीं करेगा; धारा 24 में कहा गया है कि न्यायिक अधिकारियों के अधिकार के तहत काम करने वाले व्यक्तियों को भी इस प्रावधान से छूट दी गई है। 
  • इस अधिनियम ने विनियमन अधिनियम की नीति को उलट दिया और दीवानी और आपराधिक प्रांतीय अदालतों को महत्वपूर्ण मान्यता दी। 
  • इसके अलावा, अपील की अदालत को सदर दीवानी अदालत के रूप में निर्धारित किया गया था। इसे अभिलेख न्यायालय (कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड्स) यानी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता दी गई थी।
  • 1781 के अधिनियम ने गवर्नर-जनरल और परिषद को प्रांतीय अदालतों और परिषदों के लिए नियम बनाने के लिए अधिकृत किया। इसके अतिरिक्त, यह अधिनियम, परिवार के सदस्यों पर दंड लगाने के लिए परिवार, मुखिया या प्रबंधक के अधिकारों को मान्यता देता है।
  • अधिनियम क्षतिपूर्ति (इंडेमनिटी) की अवधारणा को मान्यता देता है। इसमें यह भी निर्धारित किया गया कि गवर्नर जनरल, परिषद, महान्यायवादी और उनके आदेशों के तहत काम करने वाले अन्य सभी व्यक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन से उत्पन्न होने वाली किसी भी कार्रवाई या अभियोजन से क्षतिपूर्ति और हानिरहित रखा जाएगा। 
  • कंपनी के कर्मचारी जो पहले सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अधीन थे, अब उन्हें इससे छूट मिल गयी। इस अधिनियम के लागू होने से न्यायालय का भौगोलिक अधिकार क्षेत्र कलकत्ता तक सीमित हो गया। न्यायालय अब राजस्व संबंधी मामलों पर अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता, जिससे सरकार को इन मामलों में न्यायालय के नियंत्रण से स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति मिल जाएगी।
  • अपीलीय अधिकार क्षेत्र गवर्नर-जनरल और परिषद को स्थानांतरित कर दिया गया। नतीजतन, अपीलें अब प्रांतीय अदालतों से परिषद में गवर्नर जनरल के पास चली जाती हैं।

निपटान अधिनियम, 1781 के महत्वपूर्ण प्रावधान

प्रावधान स्पष्टीकरण
गवर्नर-जनरल और परिषद गवर्नर-जनरल और परिषद के सार्वजनिक कार्य सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं थे।
आपराधिक और दीवानी दायित्व से छूट गवर्नर जनरल और परिषद के लिखित आदेशों का पालन करने वाले व्यक्तियों को दीवानी और आपराधिक दायित्व से छूट दी गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में बदलाव  सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में राजस्व मामलों और राजस्व संग्रह से संबंधित कार्यों को शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा, भूमि मालिक और किराएदार केवल संपत्ति के कारण सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं थे।
दीवानी मामलों में अधिकार क्षेत्र  कंपनी के कर्मचारी और ब्रिटिश नागरिक दीवानी मामलों में स्वचालित रूप से सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं थे।
सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार  कलकत्ता के निवासियों पर सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार था।
न्यायिक अधिकारियों को प्रतिरक्षा न्यायिक अधिकारियों को उनके फैसले और अदालती आदेशों से गलत कार्रवाई के मुकदमों से सुरक्षा मिली।
सदर दीवानी अदालत की कार्यप्रणाली  सदर दीवानी अदालत को उनकी महिमा के लिए अपील योग्य निर्णयों के साथ, दीवानी अपीलों और संदर्भों को संभालने के लिए मान्यता दी गई थी। 

निपटान अधिनियम, 1781 का उद्देश्य

इस अधिनियम को लागू करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:

  • विनियमन अधिनियम और चार्टर के प्रावधानों में अस्पष्टता को दूर करना जो न्यायिक प्रणाली और सरकार के बीच विभाजन पैदा करते हैं।
  • सुचारू राजस्व संग्रह की सुविधा के लिए बंगाल, बिहार और उड़ीसा का वैध और प्रभावी प्रशासन सुनिश्चित करना। 
  • स्थानीय आबादी के कानूनों और रीति-रिवाजों को बनाए रखना और उनकी सुरक्षा करना। 

निपटान अधिनियम, 1781 के दोष 

निपटान अधिनियम अंग्रेजी संसद द्वारा पारित एक ऐतिहासिक क़ानून था। हालाँकि इसने आधुनिक संवैधानिक राजतंत्र को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसमें कई खामियाँ भी थीं। जिसमें धर्म के आधार पर इसके बहिष्करण संबंधी प्रावधान और संसदीय संप्रभुता के संबंध में इसकी सीमित पहुंच शामिल है। निपटान अधिनियम के प्रमुख दोष इस प्रकार हैं: 

  • अंग्रेजों ने माना कि भारत में क्षेत्र हासिल करने और ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के लिए गवर्नर-जनरल और परिषद का समर्थन करना आवश्यक था। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिससे भारत में स्वतंत्रता और कानून के शासन के अंग्रेजी सिद्धांत कमजोर हो गए। इसने अंततः कार्यकारी शाखा का पक्ष लेकर कानून के शासन में अक्षमता को जन्म दिया।
  • हालाँकि 1781 का अधिनियम विनियमन अधिनियम की कई खामियों को दूर करने में सफल रहा, लेकिन कुछ मुद्दे कायम रहे। निपटान अधिनियम के बाद भी, भारतीय क्षेत्रों और ब्रिटिश क्राउन के बीच संबंधों में विवाद उत्पन्न होते रहे।
  • दोनों अधिनियमों में “ब्रिटिश प्रजा” के संबंध में अस्पष्ट शब्दावली थी, जिससे यह अस्पष्ट हो गया कि क्या भारतीय मूल निवासियों को इस शब्द के तहत शामिल किया गया था। इस विवाद ने सुझाव दिया कि हिंदू और मुस्लिम दोनों निवासियों को “ब्रिटिश प्रजा” की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
  • 1781 के निपटान अधिनियम का एक और दोष यह था कि इस प्रश्न के संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं था कि प्रांतीय न्यायालयों का सर्वोच्च न्यायालय के साथ समवर्ती अधिकार क्षेत्र होगा या एक विशेष अधिकार क्षेत्र होगा। 

निपटान अधिनियम, 1781 का प्रभाव

इस अधिनियम के प्रमुख प्रभाव थे:

  • अधिनियम ने परिषद को अदालत के मुकाबले बेहतर अधिकार प्रदान किया, जिससे शासन के मामलों में परिषद को लाभ हुआ।
  • इस अधिनियम ने परिषद की स्थिति को मजबूत किया। जैसे इसके द्वारा भारतीय साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने और विनियमित करने की अनुमति देना। 
  • यह कार्यपालिका को उनके अधिकार क्षेत्र के क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से अलग करके न्यायपालिका से अलग करने का पहला प्रयास था। 

फिर भी, यह अधिनियम एक जीवंत प्रभाव देने और 1773 के विनियमन अधिनियम की सभी खामियों को दूर करने में विफल रहा।

निष्कर्ष

इन दो अधिनियमों ने प्रशासन और न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए। 1773 का विनियमन अधिनियम पूर्व भारत के कंपनी मामलों में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप में एक महत्वपूर्ण कदम था। इसका उद्देश्य बंगाल के गवर्नर-जनरल और परिषद की स्थिति की स्थापना के साथ भारत में एक केंद्रीकृत प्रशासन शुरू करके भ्रष्टाचार और अक्षमताओं के मुद्दों को संबोधित करना था। इस अधिनियम ने कंपनी मामलों पर ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण की शुरुआत में एक कुशल कदम उठाया, जो अधिक विनियमित शासन की दिशा में एक कदम का प्रतीक है।

इसी प्रकार, विनियमन अधिनियम से उत्पन्न कानूनी जटिलता और विवाद को संबोधित करने के लिए 1781 का निपटान अधिनियम पेश किया गया था। यह सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करता है। जिससे कंपनी अधिकारियों और भारतीय विषयों के बीच विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी। इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों को ब्रिटिश अदालत द्वारा न्यायिक अतिक्रमण से बचाना था और न्यायिक और कार्यकारी शक्ति के पृथक्करण (सेपरेशन) को सुनिश्चित करना था। 

इन अधिनियमों ने ब्रिटिश-नियंत्रित भारत में अधिक संरचित शासन की नींव रखी, विनियमन अधिनियम ने कानूनी प्रशासन को परिष्कृत करने की शुरुआत की, जिससे ब्रिटिश नियंत्रण और मजबूत हुआ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

1773 का विनियमन अधिनियम क्या था?

यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा बनाया गया पहला कानून था जिसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों को विनियमित करना था। इसने प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत की और भारत में एक केंद्रीकृत शासन संरचना की स्थापना की।

विनियमन अधिनियम को लागू करने के लिए किसने प्रेरित किया?

ईस्ट इंडिया कंपनी के भीतर बढ़ता भ्रष्टाचार, वित्तीय कठिनाइयाँ, और कंपनी के कब्जे वाले क्षेत्रों में बेहतर शासन की आवश्यकता, विशेष रूप से बंगाल के अकाल और सैन्य हार के बाद की स्थिति में।

विनियमन अधिनियम के मुख्य उद्देश्य क्या थे?

मुख्य उद्देश्य कंपनी के संविधान में संशोधन करना, भारत में शासन में सुधार करना और कंपनी के अधिकारियों द्वारा कदाचार को संबोधित करना है।

1781 के निपटान अधिनियम ने विनियमन अधिनियम में कैसे संशोधन किया?

निपटान अधिनियम का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करके और गवर्नर-जनरल और परिषद को उनकी आधिकारिक क्षमता में किए गए कार्यों के लिए प्रतिरक्षा प्रदान करके विनियमन अधिनियम की खामियों को दूर करना था।

इन अधिनियमों का भारतीय शासन पर क्या प्रभाव पड़ा?

इन अधिनियमों ने ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण के लिए आधार तैयार किया, एक केंद्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली की शुरुआत की और भारत में एक औपचारिक न्यायिक ढांचा स्थापित किया।

विनियमन अधिनियम और निपटान अधिनियम की कुछ आलोचनाएँ क्या थीं?

अधिनियमों की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. यह कि दोनों अधिनियम अस्पष्ट प्रकृति के हैं।
  2. कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव को जन्म देते है।
  3. वे भारतीय मूल निवासियों के अधिकारों और चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित करने में भी विफल रहे।

इन अधिनियमों ने भारत में भावी ब्रिटिश नीतियों को किस प्रकार प्रभावित किया?

विनियमन अधिनियम और निपटान अधिनियम ने आगे के विधायी उपायों और सुधारों के लिए मिसाल कायम की, अंततः ब्रिटिश भारत की शासन संरचना को आकार दिया और बाद के कानूनों और नीतियों को प्रभावित किया।

संदर्भ

  • V.D Kulshrestha, Constitutional History of India 
  • Rama Jois, Legal Constitutional History of India 
  • “The Making of Modern History: From Marx to Gandhi”: by R.C. Dutt

 

मुस्लिम कानून के तहत वक्फ

यह लेख Aparajita Balaji द्वारा लिखा गया है और Dilpreet Kaur Kharbanda द्वारा अद्यतन किया गया है। यह मुस्लिम कानून के तहत वक्फ की अवधारणा को गहराई से समझने का एक प्रयास है। इसमें वक्फों के निर्माण, उनके प्रकार और उनके प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। मुतवल्ली की नियुक्ति, शक्तियों और कर्तव्यों पर भी चर्चा की गई है। विषय के विधायी पहलू पर विचार करने के लिए वक्फ अधिनियम, 1913 और 1995 दोनों पर चर्चा की गई है। इसके अलावा, भारत में वक्फ की अवधारणा के विकास को देखने के लिए महत्वपूर्ण उदाहरणों पर भी चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

वक्फ की अवधारणा इस्लामी कानून के तहत विकसित हुई है। इस्लाम के आगमन से पहले अरब में वक्फ की कोई अवधारणा नहीं थी। यद्यपि कुरान में वक्फ का कोई उल्लेख नहीं है, फिर भी दान से संबंधित कुरानिक आदेश वक्फ के विकास और विस्तार के मूल में हैं। अमीर अली ने वक्फ कानून को “मुस्लिम कानून की सबसे महत्वपूर्ण शाखा” बताया है, क्योंकि यह मुसलमानों के संपूर्ण धार्मिक जीवन और सामाजिक अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। वक्फ का शाब्दिक अर्थ है हिरासत या रोक। 

हनफ़ी स्कूल के स्वीकृत सिद्धांत के अनुसार वक्फ की परिभाषा यह है कि समर्पित वस्तु में मालिक के स्वामित्व का विलोपन (इक्स्टिंगशन) हो जाना और उसे ईश्वर के निहित स्वामित्व में इस तरह से रोक लेना कि लाभ वापस लौटकर मानव जाति के लाभ के लिए लगाया जा सके। पैगम्बर मुहम्मद की एक हदीस में आया है कि एक व्यक्ति पैगम्बर के पास गया और कहा कि उसके पास संपत्ति है, वह उसका क्या करे? पैगम्बर ने कहा, इसे अल्लाह के नाम पर दे दो और इसकी रसीदें दान में दे दो। 

मुस्लिम कानून के अनुसार, वक्फ की उत्पत्ति पैगंबर द्वारा स्थापित सिद्धांतों से होती है। इसमें संपत्ति को ईश्वर के स्वामित्व में समर्पित करना शामिल है। सर्व शक्तिमान, और मानव के लाभ के लिए लाभ की भक्ति। 

वक्फ का मतलब

यदि हम ‘वक्फ’ शब्द को देखें तो इसका शाब्दिक अर्थ ‘हिरासत’, ‘रोक’ या ‘बांधना’ है। कानूनी परिभाषा के अनुसार, इसका अर्थ है किसी संपत्ति को किसी पवित्र उद्देश्य के लिए हमेशा के लिए समर्पित करना है। इस प्रकार हस्तांतरित संपत्ति धार्मिक या धर्मार्थ प्रयोजनों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। ऐसी संपत्ति हमेशा के लिए बंधी रहती है और हस्तांतरणीय नहीं होती है। 

एम काजिम बनाम ए असगर अली, एआईआर 1932 11 पटना 238 के मामले में यह देखा गया है कि कानूनी अर्थ में वक्फ का अर्थ किसी पवित्र उद्देश्य या धार्मिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ विशिष्ट संपत्ति का निर्माण करना है। 

कई प्रतिष्ठित मुस्लिम विधिवेत्ता (ज्यूरिस्ट) ने वक्फ को अपने तरीके से परिभाषित किया है। अबू हनीफा के अनुसार, “वक्फ एक विशिष्ट वस्तु का निरोध है जो वाकिफ या विनियोगकर्ता (एप्प्रोप्रिएटर) के स्वामित्व में है और उसके लाभ या उपभोग को दान, गरीबों या अन्य अच्छी वस्तुओं को ऋण देने के लिए समर्पित किया जाता है”। 

इसके अलावा, जैसा कि अबू यूसुफ ने परिभाषित किया है, वक्फ के तीन मुख्य तत्व हैं: 

  • ईश्वर का स्वामित्व,
  • संस्थापक के अधिकार का विलोपन और
  • मानव जाति का लाभ

मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम, 1913 की धारा 2 में वक्फ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, “मुस्लिम धर्म को मानने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किसी भी संपत्ति को मुसलमान कानून द्वारा धार्मिक, पवित्र या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से समर्पित करना हैं।” 

वक्फ अधिनियम, 1954 की धारा 3(l) के अनुसार, वक्फ की परिभाषा किसी इस्लाम धर्मावलंबी द्वारा किसी चल या अचल संपत्ति को मुस्लिम कानून द्वारा धार्मिक, पवित्र या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से समर्पित करना है। 

वक्फ लिखित रूप में या मौखिक प्रस्तुति द्वारा किया जा सकता है। मौखिक समझौते के मामले में, पक्षों के इरादे पर जोर देने वाले शब्दों की उपस्थिति एक पूर्वापेक्षा है। 

वक्फ का उद्देश्य और लक्ष्य

वक्फ के कई उद्देश्य हो सकते हैं; कुछ वैध हो सकते हैं और कुछ अवैध भी हो सकते हैं। यदि कोई वक्फ वैध उद्देश्य के लिए बनाया गया है तो वह वैध वक्फ होगा और यदि कोई वक्फ अवैध उद्देश्य के लिए बनाया गया है तो वह अवैध वक्फ होगा। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मजहर हुसैन खान बनाम अब्दुल हादी खान (1911) के मामले में माना कि वक्फ का गैरकानूनी हिस्सा वापस वाकिफ को लौटना चाहिए। 

यदि कोई वक्फ किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया गया है तो उस उद्देश्य की पूर्ति होनी चाहिए। किन्तु यदि वह उद्देश्य किसी भी तरह, किसी वास्तविक कारण से, पूरा न हो सके, तो दूसरा सर्वोत्तम उद्देश्य पूरा किया जाना चाहिए। 

यहाँ साइप्रेस का सिद्धांत कार्यान्वित होता है। सिद्धांत का मूल अर्थ है ‘जितना संभव हो सके उतना निकट’। यदि दाता की इच्छाओं को अक्षरशः पूरा नहीं किया जा सकता तो उन्हें यथासंभव पूरा किया जा सकता है। इसलिए, यदि विश्वविद्यालय स्थापित करने के उद्देश्य से वक्फ बनाया गया था, यदि ऐसा संभव नहीं था और इसके स्थान पर एक महाविद्यालय खोला गया था, तो इसका अर्थ उक्त सिद्धांत के तहत वक्फ के उद्देश्य को पूरा करना होगा। इस सिद्धांत पर लेख में आगे चर्चा की गई है। 

वक्फ का उद्देश्य धार्मिक, दानशील या पवित्र होना चाहिए। बुनियादी मापदंड यह है कि किसे धार्मिक, दानशील या पवित्र माना जाए। ये तीनों शब्द समानार्थी लग सकते हैं, लेकिन ये समानार्थी नहीं हैं। धार्मिक का अर्थ है पूर्णतः धर्म पर आधारित, जबकि दान का अर्थ है दयालु कार्य, और पवित्र का अर्थ है नैतिकतावादी या ऐसा कुछ जो अल्लाह द्वारा अनुमोदित हो। 

वक्फ के पक्ष

वक्फ में मुख्यतः तीन पक्ष होते हैं: 

  • वक्फ के संस्थापक को ‘वाकिफ’ कहा जाता है।
  • जिस लाभार्थी के लिए वक्फ बनाया जाता है उसे ‘मौक़ुफ़ अलैह’ के नाम से जाना जाता है। लाभार्थी को कानूनी रूप से संपत्ति का मालिक होने में सक्षम होना चाहिए। 
  • वक्फ के प्रशासन के लिए नियुक्त व्यक्ति को ‘मुतवल्ली’ कहा जाता है। मुतवल्ली पर लेख में आगे विस्तार से चर्चा की गई है। 

वैध वक्फ की अनिवार्यताएं

सुन्नी कानून के तहत वक्फ

हनफ़ी कानून (सुन्नी कानून) के अनुसार, वैध वक्फ की आवश्यक शर्तें हैं:

औपचारिकताएँ

वक्फ के निर्माण के लिए कोई औपचारिकताएं नहीं हैं। इसे मौखिक रूप से या कार्य द्वारा बनाया जा सकता है। हालाँकि, वक्फ में संपत्ति देने का इरादा साबित होना चाहिए। बेली राम एवं ब्रदर्स तथा अन्य बनाम चौधरी मोहम्मद अफजल एवं अन्य (1948) के मामले में प्रिवी काउंसिल ने कहा कि वक्फ की वैधता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि वाकिफ किस इरादे से उस वक्फ का निर्माण करता है। अदालत ने कहा कि यदि ऐसी स्थिति हो, जहां वाकिफ वक्फनामा को अमल में नहीं लाता है, तो अदालत द्वारा यह स्पष्ट रूप से माना जा सकता है कि संपत्ति को समर्पित करना वाकिफ का इरादा नहीं था और उक्त संपत्ति को अपने पास रखने के लिए वाकिफ का कोई अन्य दुर्भावनापूर्ण इरादा था। 

वक्फ बिना शर्त होना चाहिए

बनाया गया वक्फ आकस्मिक नहीं होना चाहिए। संपत्ति का दान तत्काल और पूर्ण होना चाहिए तथा किसी शर्त पर आधारित नहीं होना चाहिए। आकस्मिक वक्फ अवैध हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खलील उद्दीन बनाम सर राम एवं अन्य (1933) के मामले में माना कि केवल एक ही स्थिति है जहां एक शर्त की अनुमति है और जो वक्फ को अवैध नहीं बनाती है, वह है संपत्ति को वक्फ में देने से पहले ऋण का भुगतान। 

वक्फ अपरिवर्तनीय होना चाहिए

हिदायत में यह प्रावधान है कि एक बार जब संपत्ति वक्फ के लिए दे दी जाती है, तो वह अविभाज्य हो जाती है, अर्थात उसे आगे बेचा, पट्टे (लीज) पर या बंधक (मॉर्टगेज) नहीं रखा जा सकता है। इसके बाद संपत्ति ईश्वर या अल्लाह के पास निहित हो जाती है। 

संपत्ति का स्थायी समर्पण

वैध वक्फ की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यह संपत्ति का स्थायी समर्पण होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित पूर्वापेक्षाएँ हैं:

  • समर्पण होना चाहिए,
  • समर्पण स्थायी होना चाहिए और
  • समर्पण किसी भी संपत्ति का होना चाहिए।

वाकिफ को स्वयं ऐसी संपत्ति दान करने तथा मुस्लिम कानून के तहत मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए देने का अधिकार है। यदि वक्फ सीमित अवधि के लिए किया गया है तो उसे वैध वक्फ नहीं माना जा सकता है। 

कर्नाटक वक्फ बोर्ड बनाम मोहम्मद नजीर अहमद (1982) के मामले में यह माना गया कि “यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति यात्रियों को उनके धर्म और स्थिति की परवाह किए बिना उनके ठहरने के लिए अपना घर प्रदान करता है, तो इसे इस आधार पर वैध वक्फ नहीं माना जा सकता है कि मुस्लिम कानून के तहत एक वक्फ का धार्मिक मकसद होता है और इसे मुस्लिम समुदाय के लाभ के लिए बनाया जाना चाहिए। जब कोई वक्फ बनता है, तो हमेशा यह मान लिया जाता है कि यह ईश्वर के पक्ष में दी गई किसी संपत्ति का उपहार है। यह एक कानूनी कल्पना है।” 

इसके अलावा, श्रीमती पीरान बनाम हाफिज मोहम्मद इशाक (1966) के मामले में, माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पट्टे पर दी गई संपत्ति और क्या उस पट्टे पर दी गई संपत्ति को वक्फ में परिवर्तित किया जा सकता है, से निपटते हुए कहा कि पट्टे पर दी गई संपत्ति वक्फ के लिए नहीं दी जा सकती है, अगर दी जाती है, तो यह अवैध होगी क्योंकि यह स्थायी चरित्र का समर्पण नहीं होगा। 

वाकिफ की योग्यता

  • वाकिफ मुसलमान होना चाहिए।
  • उसका मानसिक संतुलन ठीक होना चाहिए, अर्थात वह अपने कार्य के परिणामों को समझने में सक्षम होना चाहिए।
  • भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 के अनुसार उसकी आयु वयस्क (18 वर्ष या उससे अधिक) होनी चाहिए।

कोई व्यक्ति क्षमता का दावा तो कर सकता है, लेकिन उसे वक्फ गठित करने का कोई अधिकार नहीं हो सकता है। ऐसा व्यक्ति वैध वक्फ नहीं बन सकता है। वक्फ की विषय-वस्तु का स्वामित्व उसी समय वक्फ के गठन के समय वाकिफ के पास होना चाहिए। किसी विशेष व्यक्ति द्वारा वक्फ बनाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित करने के लिए समर्पितकर्ता के पास कानूनी अधिकार मौजूद है या नहीं। 

आइये कुछ स्थितियों पर विचार करें: 

किसी विधवा द्वारा अपने अवैतनिक (अनपेड) मेहर के बदले में ली गई संपत्ति को वह मेहर के प्रयोजन के लिए नहीं दे सकती, क्योंकि वह उस संपत्ति की पूर्ण  मालकिन नहीं है। 

इसके अलावा, यदि वाकिफ पर्दानशीं महिला हो। वह वक्फ के प्रयोजन के लिए संपत्ति दे सकती है, लेकिन लाभार्थियों और मुतवल्ली का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे साबित करें कि महिला ने लेन-देन की प्रकृति को पूरी तरह से समझने के बाद वक्फ के गठन के लिए स्वतंत्र रूप से अपने दिमाग का प्रयोग किया था। 

वाकिफ को संपत्ति का मालिक होना चाहिए

वाकिफ को संपत्ति का मालिक होना चाहिए; इस प्रकार, संपत्ति पूरी तरह से समर्पितकर्ता की होनी चाहिए। पट्टे पर दी गई या बंधक रखी गई संपत्ति वक्फ के उद्देश्य के लिए नहीं दी जा सकती है। हालाँकि, प्रत्याशित संपत्ति को वक्फ के प्रयोजन के लिए अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते कि संपत्ति की बिक्री अंततः पूरी हो जाए। 

शिया कानून के तहत वक्फ

शिया कानून के अनुसार वैध वक्फ बनाने के लिए आवश्यक शर्तें हैं:

  1. यह शाश्वत (ईटरनल) होना चाहिए,
  2. यह पूर्ण और बिना शर्त होना चाहिए,
  3. विनियोजित वस्तु का कब्ज़ा अवश्य दिया जाना चाहिए और
  4. वक्फ संपत्ति को वक्फ से पूरी तरह बाहर कर दिया जाना चाहिए।

साइप्रेस का सिद्धांत

साइप्रेस शब्द का अर्थ है ‘जितना संभव हो सके उतना करीब।’ साइप्रेस का सिद्धांत अंग्रेजी न्यास (ट्रस्ट) कानून का एक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अंतर्गत, किसी न्यास को, उसमें निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार, निष्पादित किया जाता है, या यथासंभव निकटतम रूप से कार्यान्वित किया जाता है। 

जहां किसी व्यवस्थापक (सेटलर) ने कोई वैध उद्देश्य निर्दिष्ट किया है जो पहले ही पूरा हो चुका है या उद्देश्य को आगे निष्पादित नहीं किया जा सकता है, वहां न्यास को विफल होने की अनुमति नहीं है। ऐसे मामलों में, साइप्रेस के सिद्धांत को लागू किया जाता है, और संपत्ति की आय का उपयोग ऐसी वस्तुओं के लिए किया जाता है जो पहले से दी गई वस्तु के यथासंभव निकट हों। 

साइप्रेस का सिद्धांत वक्फ पर भी लागू होता है। जहां किसी भी वक्फ को जारी रखना संभव नहीं है 

  • समय का बीतना
  • बदली हुई परिस्थितियाँ,
  • कुछ कानूनी कठिनाई या
  • जहां निर्दिष्ट उद्देश्य पहले ही पूरा हो चुका है 

साइप्रेस के सिद्धांत को लागू करके वक्फ को आगे भी जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है। 

रतिलाल पानाचंद गांधी बनाम बॉम्बे राज्य (1954) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जब किसी विशेष उद्देश्य के लिए वक्फ बनाया जाता है और किसी कारणवश उस विशेष उद्देश्य को कार्यान्वित नहीं किया जा सकता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है और न्यास को साइप्रेस तरीके से, अर्थात् यथासंभव उस तरीके से निष्पादित करने की अनुमति दे सकता है, जैसा कि न्यास के लेखक ने आशय किया था।

वक्फ बनाने के तरीके

वक्फ निम्नलिखित तरीकों से बनाया जा सकता है:

जीवित व्यक्तियों के बीच

इस प्रकार का वक्फ जीवित व्यक्तियों के बीच बनाया जाता है, वाकिफ के जीवनकाल के दौरान गठित होता है, और उसी क्षण से प्रभावी हो जाता है। हनफ़ी कानून एकतरफा घोषणा के माध्यम से वक्फ के निर्माण का प्रावधान करता है। 

निरस्तीकरण: जीवित व्यक्तियों के बीच वक्फ को निरस्त नहीं किया जा सकता है। 

वसीयत से

वसीयत से निर्मित वक्फ, जीवित व्यक्तियों के बीच  कार्य द्वारा निर्मित वक्फ के विरोधाभासी है। यह वाकिफ की मृत्यु के बाद प्रभावी होता है और इसे ‘वसीयतनामा वक्फ’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा वक्फ उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना शुद्ध परिसंपत्तियों के एक तिहाई से अधिक का नहीं हो सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मोहम्मद यासीन बनाम रहमत इलाही (1947) के मामले में कहा कि एक वाकिफ स्वयं वसीयत बना सकता है और उस संपत्ति का प्रबंधक या न्यासी (ट्रस्टी) बना रह सकता है। 

निरस्तीकरण: वसीयतनामा वक्फ को वसीयतकर्ता द्वारा उसकी मृत्यु से पहले किसी भी समय निरस्त किया जा सकता है। 

मृत्यु या बीमारी के दौरान (मर्ज-उल-मौत)

दानकर्ता के मृत्युशैया पर पड़े होने पर दिए गए उपहारों के समान, इन परिस्थितियों में बनाया गया वक्फ उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना संपत्ति के एक तिहाई हिस्से तक लागू हो सकता है। 

निरस्तीकरण: बीमारी के दौरान बनाए गए वक्फ को केवल उस स्थिति में निरस्त किया जा सकता है जब वक्फकर्ता बीमारी से ठीक हो जाए। 

अनादि काल से उपयोग

समय की सीमा वक्फ संपत्ति के निर्माण पर भी लागू होती है, लेकिन वक्फ संपत्ति प्राचीन उपयोग के माध्यम से स्थापित की जा सकती है। 

वक्फ का समापन

एक वक्फ निम्नलिखित तरीकों से पूरा किया जा सकता है: 

  1. जहां किसी तीसरे व्यक्ति को प्रथम मुतवल्ली नियुक्त किया जाता है। ऐसे मामले में, वक्फ तभी पूरा होता है जब दान की गई संपत्ति का कब्जा नियुक्त मुतवल्ली को सौंप दिया जाता है।
  2. जहां संस्थापक स्वयं को प्रथम मुतवल्ली नियुक्त करता है। इस मामले में, संपत्ति के भौतिक हस्तांतरण या मालिक के नाम से मुतवल्ली के नाम पर संपत्ति के हस्तांतरण की कोई आवश्यकता नहीं है। 

वक्फ के प्रकार

मोटे तौर पर वक्फ के दो प्रकार हैं: 

सार्वजनिक वक्फ

इसे सार्वजनिक, धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए बनाया जाता है। अंतिम लाभ सीधे तौर पर आम लोगों को मिलता है, तथा वाकिफ के वंशज और बच्चे इसका लाभ नहीं ले सकते है। 

निजी वक्फ

इस प्रकार का वक्फ बसने वाले के अपने परिवार और उसके वंशजों के लिए बनाया जाता है और इसे ‘वक्फ-अल-औलाद’ के नाम से भी जाना जाता है। पैगम्बर मुहम्मद के शब्दों में, “सबसे उत्तम सदक़ा जो एक व्यक्ति अपने परिवार को दे सकता है, वह वक्फ-अल-औलाद” है। जब तक उत्तराधिकारी जीवित हैं, संपत्ति उनके पास ही रहती है। परिवार के खत्म हो जाने पर शेष राशि गरीबों को मिलती है, अर्थात् अंतिम लाभ दान में जाता है। 

इज्मा ने वक्फ-अल-औलाद को अस्तित्व दिया। मुस्लिम कानून के तहत, अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता और उन रिश्तेदारों का भरण-पोषण करना कर्तव्य है जो खुद की देखभाल करने में असमर्थ हैं। पैगम्बर मुहम्मद के अनुसार, “जब कोई मुसलमान अपने परिवार को देता है, तो वह दान बन जाता है; यद्यपि वह दान या गरीब लोगों को नहीं दे रहा है, फिर भी यह एक पवित्र दायित्व है“। 

अबुल फता महोमेद इस्हाक एवं अन्य बनाम रसमाया धुर चौधरी एवं अन्य (1891) के मामले में, दो मुस्लिम भाइयों ने एक दस्तावेज तैयार किया, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके बच्चों और वंशजों के लिए अचल संपत्ति का वक्फ होने का दावा करता था। यदि प्रतिवादियों का पूर्ण विनाश हो जाए तो संपत्ति अनाथों, गरीबों, विधवाओं आदि के लाभ के लिए जाएगी। माननीय प्रिवी काउंसिल ने माना कि सभी प्रतिवादियों का विलुप्त होना भ्रमपूर्ण और बहुत दूर की बात और अनिश्चित है, क्योंकि परिवार ‘n’ वर्षों तक विलुप्त नहीं हो सकता है, और उस समय के भीतर, संपत्ति पूरी तरह से गायब हो सकती है। यह माना गया कि इस तरह का वक्फ बनाना कानून की अवहेलना के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए ऐसे वक्फ को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। 

प्रिवी काउंसिल के इस फैसले के बाद मुसलमानों में हंगामा मच गया। यह निर्णय प्राचीन मुस्लिम कानून के अनुरूप नहीं था। उपरोक्त निर्णय को उलटने के लिए मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम, 1913 पारित किया गया। इस अधिनियम पर आगे लेख में विस्तार से चर्चा की गई है। 

उद्देश्य की दृष्टि से वक्फ के प्रकार

वक्फ अहली

यह वक्फ मूलतः वक्फ के संस्थापक के बच्चों और उनके वंशजों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया है। लेकिन नामांकित व्यक्तियों को संपत्ति जो कि वक्फ का विषय है को बेचने या निपटाने का अधिकार नहीं है। 

वक्फ खैरी

इस प्रकार का वक्फ धर्मार्थ और परोपकारी उद्देश्यों के लिए स्थापित किया जाता है। इस प्रकार के वक्फ के लाभार्थियों में समाज के उच्च आर्थिक वर्ग से संबंधित लोग शामिल हो सकते हैं। इसका उपयोग मस्जिदों, आश्रय गृहों, स्कूलों, मदरसों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए निवेश के रूप में किया जाता है। यह सब आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण व्यक्तियों की सहायता और उत्थान के लिए बनाया गया है। 

वक्फ अल-सबील

ऐसे वक्फ के लाभार्थी आम जनता हैं। यद्यपि वक्फ खैरी के समान, इस प्रकार के वक्फ का उपयोग आम तौर पर सार्वजनिक उपयोगिताओं (मस्जिद, बिजली संयंत्र (प्लांट), जल आपूर्ति, कब्रिस्तान, विद्यालय, आदि) की स्थापना और निर्माण के लिए किया जाता है। 

वक्फ अल-अवरीद

इस प्रकार के वक्फ में उपज को सुरक्षित रखा जाता है ताकि इसका उपयोग आपातकाल या किसी अप्रत्याशित घटना के समय किया जा सके, जो किसी विशेष समुदाय की आजीविका और भलाई को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हो। उदाहरण के लिए, वक्फ को समाज की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है, जैसे बीमार लोग जो महंगी दवाइयां नहीं खरीद सकते है को दवा उपलब्ध कराना। 

वक्फ अल-अवरिध का उपयोग किसी विशेष गांव या पड़ोस की उपयोगिता सेवाओं के रखरखाव के वित्तपोषण (फाइनेंसिंग) के लिए भी किया जा सकता है। 

आउटपुट प्रकृति की दृष्टि से वक्फ के प्रकार

वक्फ-इस्तिथमार

इस प्रकार का वक्फ निवेश उद्देश्यों के लिए परिसंपत्तियों का उपयोग करने के लिए बनाया जाता है। उक्त परिसंपत्तियों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाता है कि आय का उपयोग वक्फ संपत्तियों के निर्माण और पुनर्निर्माण के लिए किया जाता है। 

वक्फ-मुबाशहर

ऐसे वक्फ की परिसंपत्तियों का उपयोग ऐसी सेवाएं उत्पन्न करने के लिए किया जाता है, जो कुछ दान प्राप्तकर्ताओं या अन्य लाभार्थियों के लिए लाभकारी हों। ऐसी परिसंपत्तियों के उदाहरणों में विद्यालय, उपयोगिताएं आदि शामिल हैं।  

वक्फ का प्रशासन

मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम, 1913

1913 के इस अधिनियम ने वक्फ-अल-औलाद को वैधानिकता और मान्यता प्रदान की हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य मुसलमानों को अपनी संपत्ति का अपने परिवार, बच्चों या वंशजों के पक्ष में निपटान करने के अधिकार की घोषणा करना था। इसके अलावा, ‘परिवार’ शब्द को व्यापक व्याख्या दी गई है और इसमें बहुएं या अन्य मुस्लिम परिवार के सदस्यों से जुड़े लोग भी शामिल हैं।  

अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, वक्फ-अल-औलाद को धार्मिक उद्देश्यों के लिए वक्फ माना जाएगा। हालाँकि, अंतिम लाभ स्पष्ट रूप से या निहित रूप से गरीबों की मदद करना, दान में उपभोक्ता को लाभ पहुँचाना, या पवित्र या धार्मिक दायित्वों को पूरा करना है। 

हनफ़ी अपने जीवनकाल के दौरान अपने भरण-पोषण या सहायता के लिए या ऋण के भुगतान के लिए ऐसी संपत्ति से वक्फ बना सकते हैं, जिससे वक्फ बनाया गया है। 

अधिनियम की धारा 4 में आगे स्पष्ट किया गया है कि मात्र लाभ की दूरी या अनिश्चितता के कारण, वक्फ कानून की दृष्टि में अवैध नहीं हो जाता है। हालाँकि, अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, यदि किसी संप्रदाय की कोई प्रथा या रीति रिवाज अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है, तो वह अधिनियम को रद्द कर देगा। 

राधाकांत देब एवं अन्य बनाम हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती आयुक्त, उड़ीसा (1981) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वक्फ-अल-औलाद में अंतिम लाभ भगवान के लिए आरक्षित है, लेकिन संपत्ति लाभार्थियों में निहित है, और संपत्ति से प्राप्त आय का उपयोग संस्थापक और उसके वंशजों के परिवार के रखरखाव और सहायता के लिए किया जाता है। 

मुसलमान वक्फ वैधता अधिनियम, 1913 द्वारा लाए गए परिवर्तनों को संक्षेप में इस प्रकार बताया जा सकता है: 

  • 1913 का अधिनियम वक्फ को वाकिफों, बच्चों, परिवार और वंशजों के पक्ष में वैध बनाता है। हालाँकि, अंतिम लाभ धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। 
  • इस बात पर संदेह था कि क्या कोई मुसलमान अपने वक्फ से खाना खा सकता है, क्योंकि सुन्नियों और शियाओं, विशेषकर हनफियों के बीच विचारों में विरोधाभास है। 1913 के अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि हनफ़ी लोग वक्फ संपत्ति में आजीवन हिस्सेदारी रख सकते हैं या अपने कर्ज का भुगतान कर सकते हैं। 
  • यह अधिनियम वक्फ की संपत्ति से प्राप्त किराये और मुनाफे से वाकिफों के ऋणों के भुगतान को भी वैध बनाता है। 
  • वक्फ में संपत्ति चल या अचल हो सकती है या नहीं, इस पर भ्रम को 1913 के अधिनियम द्वारा सुलझा लिया गया। अधिनियम के तहत वक्फ की परिभाषा में ‘कोई संपत्ति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। 
  • धार्मिक, पवित्र और धर्मार्थ उद्देश्यों को मुस्लिम कानून के अनुसार समझा जाना चाहिए, न कि अंग्रेजी कानून के अनुसार समझा जाना चाहिए। 

वक्फ अधिनियमों के कालक्रम और उनमें किए गए संशोधनों को निम्नलिखित मानचित्र के माध्यम से समझा जा सकता है: 

          वक्फ अधिनियम, 1954

                     |

      वक्फ ( संशोधन) अधिनियम, 1964

                     |

         वक्फ अधिनियम 1995

                     |

     वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013

वक्फ अधिनियम, 1995

वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा वक्फ अधिनियम, 1995 में किया गया सबसे प्रथम दृष्टया संशोधन ‘वक्फ’ शब्द के स्थान पर ‘औकाफ’ शब्द रखना है। अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया है, “औकाफ के बेहतर प्रशासन तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक (इंसीडेंटल) विषयों के लिए प्रावधान करने हेतु अधिनियम” है। 

अधिनियम में केंद्रीय वक्फ परिषद (धारा 9 के तहत) और राज्य वक्फ बोर्ड (धारा 14 के तहत) के गठन और स्थापना का प्रावधान है। 

केंद्रीय वक्फ परिषद

केंद्रीय वक्फ परिषद की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। केंद्रीय वक्फ परिषद की मुख्य भूमिका राज्यों के वक्फ बोर्डों को सलाह देना और वक्फ के प्रशासन का ध्यान रखना है। परिषद में निम्नलिखित शामिल हैं: 

पदेन अध्यक्ष

वक्फ के लिए जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री केंद्रीय वक्फ परिषद का पदेन अध्यक्ष होता है। 

मुस्लिम समुदाय से केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति

  • मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि – अखिल भारतीय उपस्थिति और राष्ट्रीय महत्व वाले संगठनों से तीन व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है। 
  • प्रख्यात व्यक्ति
  • निम्नलिखित क्षेत्रों में मान्यता प्राप्त चार प्रतिष्ठित व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है 
    • प्रशासन या प्रबंधन
    • वित्तीय प्रबंधन
    • इंजीनियरिंग या वास्तुकला
    • दवा
  • संसदीय प्रतिनिधित्व – तीन संसद सदस्य, जिनमें शामिल हैं:
    • लोक सभा से दो
    • राज्य सभा से एक
  • न्यायिक और कानूनी विशेषज्ञता
    • दो पूर्व न्यायाधीश, या तो सर्वोच्च न्यायालय से या उच्च न्यायालय से। 
    • राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त एक अधिवक्ता। 
  • बोर्ड के अध्यक्ष और विद्वान 
    • तीन बोर्डों के अध्यक्ष, चक्रीय आधार पर चुने जाएंगे।
    • मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ तीन प्रख्यात विद्वान। 
  • मुतवल्ली प्रतिनिधित्व – मुतवल्लियों का एक प्रतिनिधि 5 लाख रुपये या उससे अधिक वार्षिक आय वाली वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करता है। 

महिला प्रतिनिधित्व

सभी श्रेणियों से चयनित सदस्यों में से कम से कम दो महिलाएं होनी चाहिए। 

परिषद के सदस्यों का कार्यकाल, उनके कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया तथा आकस्मिक रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित नियमों द्वारा निर्धारित की जाती है। 

इसके अलावा, राज्य सरकार या बोर्ड को परिषद को वक्फ बोर्ड के प्रदर्शन के बारे में जानकारी प्रदान करनी चाहिए, जिसमें शामिल हैं: 

  • वित्तीय प्रदर्शन, 
  • सर्वेक्षण परिणाम, 
  • वक्फ विलेखों (डीड) का रखरखाव, 
  • राजस्व रिकॉर्ड, 
  • अतिक्रमण मुद्दे और 
  • वार्षिक एवं लेखापरीक्षा (ऑडिट) रिपोर्ट

परिषद उन मुद्दों पर भी विशिष्ट जानकारी मांग सकता है जहां अनियमितता या अधिनियम के उल्लंघन का स्पष्ट साक्ष्य हो। 

यदि परिषद द्वारा जारी निर्देशों से कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो उसे न्याय निर्णय बोर्ड को भेजा जाता है। बोर्ड की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश करते हैं। 

राज्य वक्फ बोर्ड

राज्य वक्फ बोर्ड और उसके सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। राज्य बोर्ड में निम्नलिखित शामिल होते हैं: 

  • एक अध्यक्ष – बोर्ड के सदस्य एक बैठक के दौरान अपने बीच से एक अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। 
  • सदस्य – निर्वाचक मंडल (प्रत्येक से अधिकतम दो सदस्य): 
    • दिल्ली राज्य/राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से मुस्लिम संसद सदस्य।
    • राज्य विधानमंडल के मुस्लिम सदस्य।
    • बार काउंसिल के मुस्लिम सदस्य (या यदि कोई सदस्य नहीं है तो वरिष्ठ मुस्लिम अधिवक्ता)। 

इन तीन श्रेणियों के सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से एकल संक्रमणीय (ट्रांसिटिव) मत द्वारा किया जाता है। 

  • औकाफ के मुतवल्ली जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख या उससे अधिक हो। 

यदि निर्वाचक मंडल का गठन करना अव्यावहारिक लगता है तो राज्य सरकार सीधे सदस्यों को नामित कर सकती है; हालांकि, ऐसा करने के लिए कारण लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। इसके अलावा, निर्वाचित सदस्यों की संख्या हमेशा नामांकित सदस्यों से अधिक होनी चाहिए, सिवाय उन मामलों को छोड़कर जब नामांकित सदस्यों को व्यावहारिक मुद्दों के कारण सीधे नियुक्त किया गया हो। 

  • मनोनीत सदस्य
    • नगर नियोजन, व्यवसाय प्रबंधन, सामाजिक कार्य, वित्त, राजस्व, कृषि या विकास में अनुभव रखने वाले एक मुस्लिम पेशेवर को राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाता है। 
    • शिया इस्लामी धर्मशास्त्र में एक मुस्लिम विद्वान और सुन्नी इस्लामी धर्मशास्त्र में एक विद्वान को राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाता है।
    • राज्य सरकार से एक मुस्लिम अधिकारी, जो संयुक्त सचिव स्तर से नीचे का न हो, नामित किया जाता है। 
  • केंद्र शासित प्रदेश के मामले में
    • बोर्ड में केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त 5-7 सदस्य होने चाहिए।
    • कम से कम दो सदस्य महिलाएं होनी चाहिए।
    • जहां मुतवल्ली प्रणाली मौजूद है, वहां एक मुतवल्ली को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए। 
  • शिया और सुन्नी औकाफ का प्रतिनिधित्व – शिया और सुन्नी सदस्यों की संख्या शिया और सुन्नी औकाफ की संख्या और मूल्य को प्रतिबिंबित करनी चाहिए। 
  • कार्यालय की अवधि – वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 15 के अनुसार, बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना की तारीख से पांच वर्ष का होता है। 

राज्य वक्फ बोर्ड में तीन समितियाँ शामिल हैं:

  • राज्य वक्फ बोर्ड
    • जिला वक्फ समिति
    • मंडल वक्फ समिति
    • व्यक्तिगत वक्फ संस्था

इसके अलावा, जैसा कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 13(2) के तहत प्रावधान किया गया है, यदि किसी राज्य में शिया औकाफ की हिस्सेदारी कुल औकाफ की संख्या या आय का 15% से अधिक है, तो राज्य सरकार सुन्नी और शिया औकाफ के लिए अलग-अलग बोर्ड स्थापित कर सकती है। ऐसा करने से पहले सर्वेक्षण आयुक्त द्वारा राज्य में वक्फों का समुचित सर्वेक्षण कराया जाता है। राज्य वक्फ बोर्ड की शुद्ध आय का एक प्रतिशत केन्द्रीय वक्फ परिषद को दिया जाता है। 

वक्फ न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल)

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83 में वक्फ न्यायाधिकरणों के गठन का प्रावधान है। धारा 83 को इस प्रकार बताया गया है:

वक्फ न्यायाधिकरणों का गठन

  • राज्य सरकारें न्यायाधिकरणों के गठन को अधिसूचित करती हैं।
  • न्यायाधिकरणों का गठन निम्नलिखित का निर्धारण करने के लिए किया जाता है: 
    • वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित विवाद, प्रश्न या मामले,
    • किरायेदारों को बेदखल करना और
    • पट्टादाताओं और पट्टाधारकों (लेसर और लेसी) के अधिकार और दायित्व। 

न्यायाधिकरण को आवेदन

  • वक्फ से संबंधित कोई भी मुतवल्ली या पीड़ित व्यक्ति न्यायाधिकरण में आवेदन कर सकता है।
  • आवेदन निर्दिष्ट समय के भीतर या यदि निर्दिष्ट समय न हो तो निर्धारित समय के भीतर किया जाना चाहिए। 

एकाधिक न्यायाधिकरणों के मामलों में अधिकार क्षेत्र

  • जहां एक वक्फ संपत्ति कई न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आती है, वहां आवेदन निम्नलिखित में किया जाना चाहिए:
    • मुतवल्ली निवास करता है या
    • व्यवसाय संचालित करता है या
    • वह कहां कार्य करता है।
  • अन्य न्यायाधिकरण उसी आवेदन पर तब तक विचार नहीं कर सकते जब तक कि संबंधित राज्य सरकार द्वारा उसे स्थानांतरित न कर दिया जाए।

न्यायाधिकरण की संरचना

  • राज्य न्यायिक सेवा सदस्य (अध्यक्ष) जो जिला, सत्र या सिविल न्यायाधीश, श्रेणी-I रैंक से नीचे न हो।
  • अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के समकक्ष एक राज्य सिविल सेवा अधिकारी।
  • एक व्यक्ति जिसे मुस्लिम कानून और न्यायशास्त्र का ज्ञान हो।

शक्तियां और प्रक्रियाएं

  • न्यायाधिकरण एक माना गया सिविल न्यायालय है, जिसके पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत सिविल न्यायालय के समान शक्तियां होती हैं।
  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के बावजूद न्यायाधिकरण एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हैं। 

न्यायाधिकरण के निर्णयों की अंतिमता और क्रियान्वयन

  • न्यायाधिकरण के निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी होते हैं तथा उनमें सिविल न्यायालय की डिक्री  के समान ही बल होता है।
  • न्यायाधिकरण के निर्णयों का निष्पादन उस सिविल न्यायालय द्वारा किया जाता है, जिसके पास निर्णय निष्पादन के लिए भेजा जाता है और यह कार्य सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अनुसार किया जाता है। 

अपील

  • न्यायाधिकरण के निर्णयों या आदेशों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती है।
  • उच्च न्यायालय किसी न्यायाधिकरण के रिकॉर्डों की शुद्धता, वैधानिकता या औचित्य सुनिश्चित करने के लिए उसकी समीक्षा कर सकता है, तथा पुष्टि, उन्हें उलटने, संशोधित करने या अन्य आदेशों को पारित करने का कार्य कर सकता है। 

इस बात पर लगातार कानूनी लड़ाई चलती रही है कि विशिष्ट परिस्थितियों से निपटने का अधिकार किसको है, वक्फ बोर्ड को या वक्फ न्यायाधिकरण को है। रशीद वली बेग बनाम फ़रीद पिंडारी (2021) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार करते हुए कि क्या वक्फ न्यायाधिकरण के पास वक्फ संपत्ति से निपटने का अधिकार क्षेत्र है या नहीं, यह टिप्पणी की, “यह कहना कि न्यायाधिकरण के पास अधिकार क्षेत्र तभी होगा जब विषयगत संपत्ति वक्फ संपत्ति होने के लिए विवादित हो और तब नहीं जब इसे वक्फ संपत्ति माना जाता है, वक्फ अधिनियम की धारा 83(1) के तहत मानने योग्य नहीं है।” इसके अलावा, अदालत ने धारा 83(1) को दो भागों में विभाजित करके कहा कि न्यायाधिकरण को वक्फ और वक्फ संपत्ति दोनों के संबंध में अधिकार क्षेत्र प्राप्त है। 

एक अन्य महत्वपूर्ण हालिया निर्णय एस.वी.चेरियाकोया थंगल बनाम एस.वी.पी.पोकोया एवं अन्य (2024) है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर निर्णय दिया कि क्या वक्फ बोर्ड या वक्फ न्यायाधिकरण को मुत्तवल्लीशिप पर निर्णय लेने का अधिकार है। माननीय न्यायालय ने कहा कि वक्फ न्यायाधिकरण एक सिविल न्यायालय की तरह कार्य करता है, तथा इसका प्राधिकार सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत सिविल न्यायालय के समान है। 

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83(7) के अनुसार न्यायाधिकरण के निर्णय अंतिम होते हैं तथा उनका महत्व सिविल न्यायालय की डिक्री के समान होती है। अधिनियम की धारा 3(i) में उल्लिखित शब्द ‘सक्षम प्राधिकारी’ स्पष्ट करता है कि अधिकार क्षेत्र वक्फ बोर्ड के पास है न कि वक्फ न्यायाधिकरण के पास है। न्यायाधिकरण विवादों का निपटारा करता है, जबकि वक्फ बोर्ड प्रशासनिक मामलों को संभालता है। बोर्ड का अधिकार क्षेत्र केवल नियमित मामलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संपत्ति प्रबंधन के दौरान उत्पन्न होने वाले विवादों तक भी विस्तृत है, जिसमें मुतवल्ली के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति और वक्फ के प्रशासन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के बारे में निर्णय शामिल हैं। इस प्रकार, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि मुतवल्ली की नियुक्ति या उससे संबंधित किसी अन्य मामले के संबंध में अधिकार क्षेत्र वक्फ बोर्ड के पास है, न्यायाधिकरण के पास नहीं है। 

मुतवल्ली

वक्फ की संपत्ति अल्लाह के पास निवेशित है। भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के तहत संपत्ति न्यासी के पास निवेशित होती है, लेकिन वक्फ के मामले में ऐसा नहीं है। यहां तक कि प्रबंधक शब्द का प्रयोग भी पूर्ण न्याय नहीं करेगा, क्योंकि प्रबंधक को पारिश्रमिक दिया जाता है, जबकि मुतवल्ली का पद मानदेय (हॉनरेरियम) वाला कार्य है। इस प्रकार, इसे एक भूमिका में दो (न्यासी और प्रबंधक) का संयोजन कहा जा सकता है। मुतवल्ली को दिया जाने वाला मानदेय वक्फनामा में वाकिफ द्वारा तय किया जाता है। आमतौर पर वक्फ विलेख (डीड) में पारिश्रमिक दिए जाने का प्रावधान होता है, हालांकि, जहां वेतन तय नहीं है या कम दर पर तय किया गया है, वहां अदालत उक्त राशि तय कर सकती है। इसके अलावा, मुतवल्ली को दिया जाने वाला पारिश्रमिक वक्फ की कुल आय के 1/10वें भाग से अधिक नहीं हो सकता है। 

वक्फ के प्रबंधक या अधीक्षक को ‘मुतवल्ली’ के नाम से जाना जाता है। नियुक्त किए गए ऐसे व्यक्ति को न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना वक्फ संपत्ति को बेचने, विनिमय करने या बंधक रखने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि उसे वक्फ विलेख द्वारा ऐसा करने के लिए स्पष्ट रूप से सशक्त नहीं किया गया हो। 

मुतवल्ली के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र व्यक्ति

कोई भी व्यक्ति जो वयस्क हो गया है, स्वस्थ मस्तिष्क का है, तथा किसी विशेष वक्फ के अधीन निर्वहन किए जाने वाले कार्यों को करने में सक्षम है, उसे वक्फ का मुतवल्ली नियुक्त किया जा सकता है। किसी विदेशी को भारत में संपत्ति का न्यासी नियुक्त नहीं किया जा सकता है। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एजाज अहमद बनाम खातून बेगम (1917) के मामले में माना कि जहां मुतवल्ली का पद वंशानुगत (हेरेडिटरी) है, तो उस स्थिति में एक नाबालिग को भी मुतवल्ली नियुक्त किया जा सकता है। 

एक महिला को भी मुतवल्ली नियुक्त किया जा सकता है। शाहर बानो बनाम आगा मोहम्मद जाफर बिंदानीम (1906) के मामले में प्रिवी काउंसिल ने माना कि किसी महिला को मुतवल्ली नियुक्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन नियुक्ति पूरी तरह से वक्फ की प्रकृति पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, यदि वक्फ का उद्देश्य धार्मिक गतिविधियां हैं, तो महिला की नियुक्ति नहीं की जा सकती है। 

इसके अलावा, मद्रास उच्च न्यायालय ने मुन्नावरु बेगम साहिबु बनाम मीर महापल्ली साहिब और दो अन्य (1918) के मामले में और कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कासिम हसन बनाम हाजरा बेगम (1920) के मामले में माना कि महिलाओं को मुतवल्ली के रूप में नियुक्त करने की अनुमति है। यदि किसी महिला को नियुक्त किया जाता है और कुछ आध्यात्मिक या धार्मिक कार्य ऐसे हैं जिन्हें महिला नहीं कर सकती, तो ऐसी स्थिति में ऐसे धार्मिक कार्यों को पूरा करने के लिए एक डिप्टी की नियुक्ति की जानी चाहिए। कानूनी प्रतिनिधि द्वारा मोहम्मद जैनुलाबुद्दीन (अब मृत) बनाम सैयद अहमद मोहिंदीन एवं अन्य (1989) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी बात को बरकरार रखा था कि किसी महिला को कहीं भी मुतवल्ली नियुक्त किया जा सकता है और वक्फ के आध्यात्मिक कार्यों को पूरा करने या निष्पादित करने के लिए एक सहायक नियुक्त किया जा सकता है। 

मुतवल्ली नियुक्त करने के लिए पात्र व्यक्ति

  • वाकिफ द्वारा नियुक्त किया जा सकता है
  • जनता या मण्डली द्वारा
  • मुत्तवली द्वारा
  • न्यायालय द्वारा 

वाकिफ द्वारा नियुक्ति 

चूंकि वक्फ की संपत्ति वाकिफ की होती है, इसलिए उसे अपनी पसंद का कोई भी मुतवल्ली नियुक्त करने का पूरा अधिकार होता है। वह मुतवल्ली (उत्तराधिकार) की एक श्रृंखला भी निर्धारित कर सकता है। वाकिफ अपने द्वारा तय किए गए नाम या व्यक्तियों के वर्ग के आधार पर उत्तराधिकारी को नामित कर सकता है। वाकिफ नियुक्ति की यह शक्ति किसी अन्य को भी प्रदान कर सकता है। 

मुतवल्ली की नियुक्ति में वाकिफ को पूर्ण विवेकाधिकार प्राप्त है और वह मुतवल्ली के रूप में नियुक्ति के लिए कुछ निर्धारित योग्यता मानदंड भी निर्धारित कर सकता है। 

जनता या मण्डली द्वारा नियुक्ति

कुछ परिस्थितियों में, जनता या मण्डली भी वक्फ संपत्ति के लिए मुतवल्ली नियुक्त कर सकती है। ऐसा ही एक उदाहरण वह है जहां वक्फ संपत्ति पर मस्जिद बनाई जाती है या उसे कब्रिस्तान में बदल दिया जाता है; उस स्थिति में मुतवल्ली की नियुक्ति जनता या मण्डली द्वारा की जा सकती है। 

किसी अन्य मुतवल्ली द्वारा नियुक्ति

यदि वाकिफ की मृत्यु हो गई है और मुतवल्ली की नियुक्ति के संबंध में कोई योजना नहीं है, तो वर्तमान मुतवल्ली यह निर्णय ले सकता है कि अगला मुतवल्ली कौन होगा, लेकिन ऐसा केवल तब किया जा सकता है जब उसकी मृत्यु हो रही हो। यदि वाकिफ यह निर्णय ले कि मुतवल्ली की नियुक्ति वंशानुगत आधार पर नहीं होगी, बल्कि मौजूदा प्रथा इसके बिल्कुल विपरीत प्रावधान करती है, तो उस स्थिति में वाकिफ के निर्णय पर प्रथा ही प्रभावी होगी। 

यदि दो या अधिक मुतवल्ली चुने गए हों और उनमें से एक की मृत्यु हो जाए, तो उत्तरजीविता के आधार पर दूसरा मुतवल्ली बन जाएगा। इसी बात को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने हाजी अब्दुल रज्जाक बनाम शेख अली बख्श (1948) के मामले में निपटाया था, जहां यह माना गया था कि यदि संयुक्त मुतवल्ली का प्रावधान है, तो मुतवल्ली में से किसी एक की मृत्यु की स्थिति में, कार्यालय जीवित मुतवल्ली को हस्तांतरित हो जाएगा, न कि वंशानुगत मुतवल्ली को हस्तांतरित हो जाएगा। 

न्यायालय द्वारा नियुक्ति

सार्वजनिक वक्फ के मामले में मुतवल्ली की नियुक्ति न्यायालय द्वारा की जाती है। विवेकाधिकार पूरी तरह से अदालत के पास है, लेकिन वाकिफ की मंशा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। महोमेद इस्माइल आरिफ बनाम हाजी अहमद मूला दाऊद (1916) के मामले में प्रिवी काउंसिल ने माना कि अदालतों के पास वक्फ के प्रबंधन नियमों को संशोधित करने की शक्ति है और सार्वजनिक हित के पक्ष में नए नियम बनाए जा सकते हैं। 

मुतवल्ली की नियुक्ति करते समय न्यायालय को निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए: 

  • वाकिफ की नियंत्रण
  • नियुक्ति जनहित को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।

मुतवल्ली की शक्तियां और कर्तव्य

वक्फ का प्रबंधक होने के नाते वह संपत्ति के उपयोग का प्रभारी होता है। उसके पास निम्नलिखित अधिकार हैं: 

  • उसके पास वक्फ के सर्वोत्तम हित के लिए उपयोग करने का अधिकार है। वह सद्भावपूर्वक सभी उचित कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतिम लाभार्थी वक्फ से सभी लाभों का आनंद ले सकें। चूंकि वह संपत्ति का मालिक नहीं है, इसलिए उसे संपत्ति बेचने पर रोक लगा दी गई है। हालाँकि, वाकिफ द्वारा उसे ऐसे अधिकार वक्फनामा में स्पष्ट उल्लेख के माध्यम से प्रदान किये जा सकते हैं।
  • वह उचित कारण बताकर तथा न्यायालय से पूर्वानुमति लेकर वक्फ संपत्ति को हस्तांतरित कर सकता है। यदि वह न्यायालय की अनुमति के बिना संपत्ति का हस्तांतरण करता है, तो यह प्रारम्भ से ही शून्य नहीं होगा; बल्कि, यह किसी भी पक्ष के कहने पर शून्यकरणीय (वॉयडेबल) होगा। यदि न्यायालय पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) रूप से अलगाव की पुष्टि कर दे तो यह वैध हो जाएगा। 

  • वह तात्कालिकता के लिए उचित आधारों का अस्तित्व दिखाकर न्यायालय से बेचने या धन उधार लेने के लिए प्राधिकरण प्राप्त कर सकता है।
  • वह वक्फ के हितों की रक्षा के लिए सिविल मुकदमा दायर कर सकता है। वक्फ अधिनियम, 1934 से पहले, एक मुतवल्ली किसी भी समय मुकदमा दायर कर सकता था। लेकिन, 1934 के अधिनियम के बाद, वक्फ बोर्ड ने मुकदमे दायर किये। 
  • उसके पास कृषि प्रयोजन के लिए तीन वर्ष से कम अवधि के लिए तथा गैर-कृषि प्रयोजन के लिए एक वर्ष से कम अवधि के लिए संपत्ति पट्टे पर देने का अधिकार भी है। वह अदालत से अनुमति लेकर इसकी अवधि बढ़ा सकते हैं। अगर वक्फनामा में लंबी अवधि के पट्टे का प्रावधान है तो वह वैध होगा। अन्यथा बाकी स्थितियों में न्यायालय की अनुमति जरूरी है। इसके अलावा, यदि मुतवल्ली कोई अवैध पट्टा जारी कर दे, तो बाद में न्यायालय द्वारा इसकी पुष्टि की जा सकती है तथा इसे वैध बनाया जा सकता है। 
  • वक्फ के कानूनी और आर्थिक पहलुओं के संबंध में उनके पास पूर्ण शक्ति है। 

मुतवल्ली को हटाना

न्यायालय द्वारा हटाना 

मुतवल्ली को हटाने की अदालत की शक्ति पूर्ण है। वाद जिला न्यायालय में दायर किया जाना चाहिए, तथा ऐसे वाद पर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया लागू होगी। मुतवल्ली को न्यायालय द्वारा केवल निम्नलिखित आधारों पर हटाया जा सकता है:

  • वह संपत्ति के वक्फ चरित्र को नकारता है और उस पर स्वयं प्रतिकूल अधिकार स्थापित करता है।
  • यद्यपि उनके पास पर्याप्त धन है, फिर भी वे वक्फ परिसर की मरम्मत कराने में लापरवाही बरतते हैं और उन्हें विरान होने देते है।
  • वह जानबूझकर वक्फ संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है या  न्यास का उल्लंघन करता है।
  • वह दिवालिया (इंसॉल्वेंट) हो गया है।

वक्फ बोर्ड द्वारा

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 64 के अनुसार, वक्फ बोर्ड को निम्नलिखित शर्तों के तहत मुतवल्ली को उसके पद से हटाने का अधिकार है:

  • वह अस्वस्थ्य दिमाग का है
  • वह आपराधिक विश्वासघात के अपराध में दोषी ठहराया गया है 
  • अधिनियम की धारा 61 के अंतर्गत एक से अधिक बार दोषी ठहराया जाना 
  • अनुमोदित दिवालिया
  • नशे का आदी
  • कानूनी कार्यवाही में वक्फ के खिलाफ कार्रवाई 
  • वक्फ के कर्तव्यों की उपेक्षा
  • वक्फ की संपत्ति का दुरुपयोग 

वाकिफ द्वारा

वाकिफ द्वारा मुतवल्ली को हटाने के संबंध में अलग-अलग विचार हैं। अबू यूसुफ के अनुसार, भले ही वाकिफ ने वक्फ विलेख में मुतवल्ली को हटाने का अधिकार सुरक्षित नहीं रखा हो, फिर भी वह मुतवल्ली को हटा सकता है। हालाँकि, इमाम मोहम्मद इस पर अलग राय रखते हैं और उनका मानना है कि जब तक कोई आरक्षण न हो, वाकिफ ऐसा नहीं कर सकता है।

हालाँकि, लागू होने वाला सामान्य नियम यह है कि यदि वाकिफ जीवित है, तो मुतवल्ली को किसी भी समय हटाया जा सकता है, लेकिन यदि वाकिफ मर चुका है, तो मुतवल्ली को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि वक्फनामा में इसके लिए स्पष्ट प्रावधान न हो। 

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024

सत्तारूढ़ सरकार के अनुसार, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 द्वारा वक्फ अधिनियम, 1995 में प्रस्तावित संशोधन, वक्फ अधिनियम, 1995 की खामियों को दूर करने और वक्फ बोर्डों पर कथित कब्जे को रोकने के उद्देश्य से किया गया है, जो कि सरकार द्वारा संदर्भित रिपोर्टों के अनुसार, कुछ स्थानों पर माफियाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं। 

प्रस्तावित एक संशोधन के अनुसार वक्फ का नाम बदलकर “एकीकृत वक्फ प्रबंधन सशक्तीकरण दक्षता विकास” या “उम्मीद” रखा जाएगा। संक्षिप्त नाम ‘उम्मीद’ मुस्लिम समुदाय के लिए बेहतर न्याय और कल्याण हेतु प्रणाली में सुधार लाने की सरकार की मंशा का प्रतीक है। 

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में कहा गया है कि वर्ष 2013 में किए गए संशोधनों के बावजूद, वक्फ अधिनियम, 1995 से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। प्रस्तावित परिवर्तन सचार समिति, वक्फ पर संयुक्त संसदीय समिति और केंद्रीय वक्फ परिषद की सिफारिशों पर आधारित हैं।

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 द्वारा प्रस्तावित प्रमुख संशोधन

परिभाषाओं में परिवर्तन

  1. धारा 3(r) के तहत “वक्फ” शब्द को पुनः परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है किसी भी व्यक्ति द्वारा संपत्ति का स्थायी समर्पण, चाहे वह चल हो या अचल, जिसने कम से कम पांच वर्षों तक इस्लाम का पालन किया हो और मुस्लिम कानून द्वारा पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त उद्देश्यों के लिए संपत्ति का स्वामित्व रखता हो।
  2. धारा 3(r)(iv) के तहत वक्फ-अल-औलाद की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है, जिसमें कहा गया है कि यदि उत्तराधिकार की रेखा समाप्त हो जाती है, तो वक्फ की आय को शिक्षा, विकास और कल्याण की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए, जिसमें विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और अनाथों के रखरखाव सहित केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मुस्लिम कानून द्वारा मान्यता प्राप्त अन्य उद्देश्यों के साथ-साथ शामिल होना चाहिए।
  3. धारा 3(da) में एक कलेक्टर की भूमिका प्रस्तुत की गई है, जो औकाफ बोर्ड के पास पहले से मौजूद कुछ शक्तियों को ग्रहण करेगा।

वक्फ संपत्तियों के विनियमन के लिए नए प्रावधान जोड़े गए

धारा 3A

धारा 3A में वक्फ बनाने के लिए दो शर्तें निर्धारित की गई हैं। 

  • केवल वे व्यक्ति ही वक्फ स्थापित कर सकते हैं जो संपत्ति के वैध मालिक हैं और संपत्ति को हस्तांतरित या समर्पित करने की क्षमता रखते हैं।
  • वक्फ-अल-औलाद के सृजन से महिला उत्तराधिकारियों सहित उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकार अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा। 

धारा 3B

धारा 3B में यह अनिवार्य किया गया है कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2024 से पहले पंजीकृत सभी वक्फों का विवरण 6 महीने की अवधि के भीतर ऑनलाइन पोर्टल और डाटाबेस पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसमें वाकिफ का नाम और पता, वक्फ विलेख, संपत्तियों से वार्षिक आय, लंबित अदालती मामले, मुतवल्ली का वेतन, कर और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अन्य जानकारी शामिल हैं।

धारा 3C

धारा 3C में यह निर्दिष्ट किया गया है कि कोई भी सरकारी संपत्ति, चाहे वह संशोधन से पहले या बाद में वक्फ के रूप में पहचानी या घोषित की गई हो, स्वचालित रूप से वक्फ संपत्ति नहीं मानी जाएगी। ऐसी संपत्ति के स्वामित्व के संबंध में विवाद की स्थिति में, कलेक्टर जांच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। रिपोर्ट प्रस्तुत होने तक संपत्ति वक्फ के रूप में अवर्गीकृत रहेगी। 

सर्वेक्षण आयुक्त की भूमिका कलेक्टर को हस्तांतरित

धारा 4

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 4 के अनुसार राज्य सरकार को औकाफ का सर्वेक्षण करने के लिए एक सर्वेक्षण आयुक्त नियुक्त करना आवश्यक है। प्रस्तावित संशोधन इस भूमिका को कलेक्टर की भूमिका से प्रतिस्थापित करता है, जो अब अधिकार क्षेत्र की देखरेख करेगा। 

इसके अलावा, वक्फ के वर्गीकरण को व्यापक बनाते हुए इसमें शिया या सुन्नी वक्फ के अतिरिक्त ‘आगाखानी वक्फ’ या ‘बोहरा वक्फ’ को भी शामिल किया गया है।

धारा 5

धारा 5 में औकाफ़ की सूची के प्रकाशन का प्रावधान है। अधिनियम की धारा 4 के तहत सर्वेक्षण आयुक्त द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की जांच वक्फ बोर्ड द्वारा की जाती है और 6 महीने के भीतर वक्फ बोर्ड रिपोर्ट को प्रकाशन के लिए राज्य सरकार को भेज देता है और तदनुसार राजस्व अधिकारी भूमि रिकॉर्ड को अद्यतन (अपडेट) करते हैं। अब, प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, वक्फ संपत्तियों को शामिल करने के लिए भूमि रिकॉर्डों को अद्यतन करने से पहले, राजस्व अधिकारियों को दो दैनिक समाचार पत्रों में 90-दिवसीय सार्वजनिक नोटिस जारी करना होगा, जिसमें एक नोटिस क्षेत्रीय भाषा में होगा, ताकि प्रभावित पक्षों को आपत्तियां उठाने का अवसर मिल सके। 

कानूनी विवाद और चुनौतियाँ

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 6 के अनुसार, वक्फ के रूप में सूचीबद्ध संपत्ति वास्तव में वक्फ है या नहीं और यह शिया या सुन्नी वक्फ है या नहीं, इन विवादों का समाधान न्यायाधिकरण द्वारा किया जाता है, जिसका निर्णय अंतिम होता है। प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार, न्यायाधिकरण के निर्णयों को सूची के प्रकाशन के दो वर्ष के भीतर चुनौती दी जा सकेगी। यदि विलंब का वैध कारण बताया जाए तो दो वर्ष की अवधि के बाद भी आवेदन दायर किया जा सकता है। 

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 40, जो बोर्ड को वक्फ से संबंधित संदिग्ध किसी भी संपत्ति के बारे में जानकारी एकत्र करने की अनुमति देती है, को हटाने का प्रस्ताव है। 

वक्फ काउंसिल और औकाफ बोर्ड की संरचना में बदलाव

धारा 9 के तहत केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना को ज्यादातर अपरिवर्तित छोड़ दिया गया है, लेकिन इसमें दो आवश्यकताएं प्रस्तावित की गई हैं: 

  • दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना और
  • केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त सदस्यों में दो महिला सदस्यों को शामिल किया जाना। 

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 14 के अंतर्गत औकाफ बोर्ड की संरचना को संशोधित करने का प्रस्ताव है, जिसमें निम्नलिखित शामिल होंगे: 

  • दो गैर-मुस्लिम सदस्य
  • दो महिला सदस्य
  • मुस्लिम समुदायों में शिया, सुन्नी और अन्य पिछड़े वर्गों से कम से कम एक प्रतिनिधि।
  • बोहरा या अगाखानी समुदायों के एक सदस्य को भी नामित किया जाएगा, यदि उनका राज्य में औकाफ कार्यरत है। 

वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण और लेखा परीक्षा

धारा 36 के तहत प्रस्तावित परिवर्तनों के अनुसार, आधिकारिक वक्फ विलेख के बिना कोई वक्फ स्थापित नहीं किया जाएगा। पंजीकरण प्रक्रिया, जो पहले औकाफ बोर्ड द्वारा विनियमित की जाती थी, अब ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से संचालित की जाएगी। कलेक्टर को आवेदन की वैधता की पुष्टि करनी होगी, और यदि संपत्ति विवादित है या सरकारी स्वामित्व वाली है, तो पंजीकरण तब तक निलंबित कर दिया जाएगा जब तक कि अदालत विवाद का समाधान नहीं कर देती है। 

धारा 47 के तहत प्रस्तावित परिवर्तनों के अनुसार, लेखा परीक्षा प्रक्रिया को संशोधित किया जाएगा और यह आवश्यक होगा कि औकाफ बोर्ड द्वारा नियुक्त लेखा परीक्षकों का चयन राज्य सरकार द्वारा तैयार पैनल में से किया जाए। इसके अतिरिक्त, केन्द्र सरकार भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कंप्टरोलर एंड ऑडिटर जनरल) द्वारा लेखापरीक्षा का आदेश दे सकती है तथा अपनी इच्छानुसार लेखापरीक्षा रिपोर्ट के प्रकाशन की मांग कर सकती है। 

विधेयक की आलोचनाएँ

प्रस्तावित विधेयक पर काफी बहस हुई है, जिससे कई चिंताएं सामने आई हैं जो संभावित खामियों को उजागर करती हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया गया है:

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

कई विपक्षी सदस्यों ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए कहा है कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को कमजोर करता है। यह तर्क दिया गया कि यह विधेयक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक समुदायों को अपने मामलों का प्रबंधन स्वयं करने के अधिकार की रक्षा करता है। यह बताया गया कि वक्फ परिषद और औकाफ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने से धार्मिक स्वायत्तता समाप्त हो जाती है। 

इसके अलावा, संसद में विपक्षी सदस्यों ने दावा किया कि यह विधेयक अनुच्छेद 30 का उल्लंघन करता है, जो अल्पसंख्यकों को अपनी संस्थाओं का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। 

संघवाद और राज्य के अधिकार

विपक्ष ने तर्क दिया कि यह विधेयक राज्य सरकारों के अधिकारों का अतिक्रमण करता है, क्योंकि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन संविधान में राज्य सूची के अंतर्गत आता है। केंद्र सरकार के पास वक्फ संपत्तियों के लिए नियम बनाने का अधिकार नहीं है, इन्हें राज्य के अधिकार क्षेत्र में रहना चाहिए। 

आलोचना का एक अन्य बिन्दु यह था कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन मुसलमानों के लिए एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है। राज्य द्वारा कोई भी हस्तक्षेप धार्मिक भेदभाव को जन्म दे सकता है, जिससे अनुच्छेद 14 और 15(1) जो समानता के अधिकार की रक्षा करता है और भेदभाव का निषेध करता है, का उल्लंघन हो सकता है। 

परामर्श का अभाव

आलोचना का एक अन्य बिन्दु यह है कि विधेयक को हितधारकों के साथ पर्याप्त परामर्श के बिना ही प्रस्तुत किया गया है। वक्फ न्यायाधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध अपील की अनुमति देने वाला प्रावधान, केंद्र सरकार को वक्फ पर अधिक नियामक नियंत्रण देकर सहकारी संघवाद को कमजोर करता है। 

सरकार ने आलोचनाओं का जवाब वक्फ जांच रिपोर्ट, 1976 का हवाला देकर दिया, जिसमें मुतवल्लियों द्वारा वक्फ संपत्तियों के बड़े पैमाने पर कुप्रबंधन की बात कही गई है, जिसके परिणामस्वरूप लाभों का असमान वितरण हुआ है। रिपोर्ट में वक्फ न्यायाधिकरणों की अप्रभावीता के कारण उन्हें समाप्त करने की सिफारिश की गई है। 

इसके अलावा, समवर्ती (कंकर्रेंट) सूची (सूची III) की प्रविष्टि 10 (न्यास और न्यासी) और प्रविष्टि 28 (धर्मार्थ और धर्मार्थ संस्थान, धर्मार्थ और धार्मिक बंदोबस्ती (एंडोमेंट), और धार्मिक संस्थान) के तहत प्रदत्त शक्तियों को रेखांकित करके केंद्र सरकार की विधायी क्षमता के मुद्दे का प्रतिवाद किया गया। 

संसद के मानसून सत्र में प्रस्तुत विधेयक को मिली आलोचनाओं के कारण, विधेयक के संबंध में विपक्ष द्वारा उठाई गई चिंताओं पर विचार करने के लिए इसे संयुक्त संसदीय स्थायी समिति को भेज दिया गया है। 

सदक़ा  और वक्फ के बीच अंतर

क्र.सं. आधार सदक़ा वक्फ
1 अर्थ सदक़ा  अल्लाह के नाम पर दिया गया स्वैच्छिक दान है। वक्फ धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संपत्ति का दान है। 
2 हस्तांतरण की सीमा कानूनी संपदा, न कि केवल लाभकारी हित, दानकर्ता द्वारा नियुक्त न्यासियों के पास हस्तांतरित हो जाती है। कानूनी संपत्ति या स्वामित्व न्यासी या मुतवल्ली में निहित नहीं है, बल्कि ईश्वर को हस्तांतरित है।
3 विमुख करने की शक्ति संपत्ति और उपभोग दोनों ही दे दिए जाते हैं। इसलिए, न्यासी को संपत्ति स्वयं बेचने का अधिकार है।  वक्फ के न्यासी संपत्ति का हस्तांतरण नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि ऐसा करना आवश्यक हो, तथा इसके लिए न्यायालय की पूर्व अनुमति की आवश्यकता हो, या जब  व्यवस्थापक द्वारा ऐसा करने के लिए अधिकृत किया गया हो।
4 प्रकृति यह दान या उपहार के रूप में होता है।  यह एक दान है।
5 प्रबंधन इसमें कोई प्रबंधन शामिल नहीं है। दानकर्ता सीधे सदक़ा दे सकता है।  वक्फ के प्रशासन और प्रबंधन के लिए एक उचित औपचारिक व्यवस्था है। मुतवल्ली को वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करने में निराशा हुई।
6 कानूनी पहलू सदक़ा इस्लाम में दान के सामान्य सिद्धांतों द्वारा शासित होता है। ऐसा कोई विशिष्ट अधिनियम या प्रावधान नहीं है जो सदक़ा को संहिताबद्ध करता हो।  वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा वक्फ को नियंत्रित किया जाता है।

हिबा और वक्फ के बीच अंतर

क्र.सं. आधार हिबा वक्फ
1 मालिक का अधिकार वस्तु पर प्रभुत्व एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को हस्तांतरित होता है। वाकिफ का अधिकार समाप्त हो जाता है और ईश्वर के पक्ष में चला जाता है।
2 कब्ज़ा कब्जे का वितरण आवश्यक है। जीवित व्यक्तियों के बीच वक्फ में संपत्ति के लिए कब्जे का हस्तांतरण आवश्यक नहीं है। इसका निर्माण  मालिक द्वारा मात्र दान की घोषणा से ही हो जाता है।
3 उद्देश्य जिस उद्देश्य के लिए इसे बनाया गया है, उस संबंध में कोई सीमा नहीं है। यह अनुबंध केवल धार्मिक, धर्मार्थ या पवित्र उद्देश्यों के लिए किया जाता है। पारिवारिक उद्देश्यों के लिए किया गया वक्फ भी दान होना चाहिए।
4 स्वामित्व हस्तांतरण संपत्ति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित होती है, और पूर्ण अधिकार हस्तांतरित हो जाता है। उपहार प्राप्तकर्ता अपनी इच्छानुसार संपत्ति का उपयोग, बिक्री या निपटान कर सकता है।  वाकिफ का अधिकार पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और ईश्वर के पक्ष में चला जाता है, तथा वक्फ को प्रशासित करने के लिए एक मुतवल्ली नियुक्त किया जाता है। संपत्ति को किसी भी तरह से बेचा, विरासत में या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। 

न्यास और वक्फ के बीच अंतर

क्र.सं आधार न्यास वक्फ
1 धार्मिक उद्देश्य न्यास के लिए धार्मिक उद्देश्य का अस्तित्व आवश्यक नहीं है। वक्फ बनाने के पीछे धार्मिक उद्देश्य होना चाहिए।
2 लाभार्थी एक न्यासी लाभार्थी हो सकता है।  हनफ़ी कानून को छोड़कर, एक व्यवस्थापनकर्ता (सेटलर) को अपने लिए कोई लाभ अलग रखने का अधिकार नहीं है।
3 विषय इसका एक वैध उद्देश्य होना चाहिए। उद्देश्य मुस्लिम आस्था के अनुसार दानशील, पवित्र या धार्मिक होना चाहिए।
4 स्वामित्व इसमें दोहरा स्वामित्व, समतामूलक (इंगेलिटेरियन) और कानूनी स्वामित्व शामिल है। संपत्ति न्यासी में निहित होती है। वक्फ का स्वामित्व समाप्त हो जाता है, और स्वामित्व ईश्वर में निहित हो जाता है।
5 अलगाव की शक्ति न्यासी के पास अलगाव की बेहतर शक्तियां होती हैं क्योंकि वह कानूनी मालिक होता है। मुतवल्ली मात्र गृहीता और प्रबंधक होता है तथा वह संपत्ति का हस्तांतरण नहीं कर सकता है।
6 पारिश्रमिक  न्यासी को पारिश्रमिक मांगने का अधिकार नहीं है। मुतवल्ली को पारिश्रमिक मांगने का अधिकार है।
7 अवधि यह आवश्यक नहीं है कि न्यास शाश्वत, अपरिवर्तनीय या अविभाज्य हो।  संपत्ति अविभाज्य, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।
8 किस कानून द्वारा शासित न्यास भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 द्वारा शासित होते हैं।  वक्फ, वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा शासित होते हैं।

प्रासंगिक मामले 

नवाब ज़ैन यार जंग और अन्य बनाम बंदोबस्ती निदेशक और अन्य (1962)

इस मामले में, न्यायालय ने कहा कि किसी समर्पण को वक्फ कहने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उससे केवल मुसलमानों या किसी विशिष्ट समुदाय को ही लाभ पहुंचे। जब तक समर्पण मुस्लिम कानून के तहत धर्मार्थ उद्देश्य के लिए किया गया है और संपत्ति या परिसंपत्ति स्थायी रूप से समर्पित है, तब तक वह वक्फ के रूप में योग्य है। 

अदालत ने एक कदम आगे बढ़कर अंग्रेजी कानून में न्यास की अवधारणा और मुस्लिम कानून में वक्फ की अवधारणा के बीच अंतर पर भी चर्चा की है। अदालत ने विद्या वरुथी तीर्थ बनाम बालूसामी अय्यर (1921) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि न्यास और वक्फ पूरी तरह से अलग हैं। न्यास के मामले में, संपत्ति का प्रबंधन करने का दायित्व न्यासी के कंधों पर डाल दिया जाता है, जबकि वक्फ के मामले में, संपत्ति को स्थायी रूप से ईश्वर के नाम पर समर्पित कर दिया जाता है, और वाकिफ को संपत्ति पर कोई स्वामित्व अधिकार नहीं दिया जाता है, और इसके अलावा, तहलका वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करने के लिए एक मुतवल्ली नियुक्त किया जाता है। 

रामजस फाउंडेशन एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2010)

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार करते हुए इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या कोई गैर-मुस्लिम व्यक्ति वक्फ बना सकता है, तथा कहा कि एक बार जब किसी संपत्ति को वक्फ घोषित कर दिया जाता है, या यदि दस्तावेज से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए है, तो मूल मालिक के अधिकार समाप्त हो जाते हैं तथा स्वामित्व ईश्वर को हस्तांतरित हो जाता है। अदालत ने अमीर अली द्वारा लिखित मोहम्मडन कानून पर पुस्तक को ध्यान में रखा, जिसमें कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, वक्फ बना सकता है, लेकिन समर्पण का उद्देश्य उसके अपने धर्म और इस्लामी कानून दोनों के अनुसार वैध होना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि चूंकि वक्फ के लिए ईश्वरीय स्वीकृति महत्वपूर्ण है, इसलिए यदि इसका उद्देश्य इस्लामी कानून या निर्माता के धर्म द्वारा पापपूर्ण माना जाता है तो यह वैध नहीं होगा। इसका अर्थ यह है कि कोई गैर-मुस्लिम व्यक्ति धार्मिक उद्देश्य के लिए वक्फ बना सकता है, लेकिन यह उसकी अपनी मान्यताओं के अनुसार वैध भी होना चाहिए। 

फ़सीला एम. बनाम मुन्नेरुल इस्लाम मदरसा समिति और अन्य (2014)

इस मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या किरायेदार के खिलाफ बेदखली का मुकदमा सिविल न्यायालय या वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा सुना जा सकता है, जहां मामला वक्फ संपत्ति से संबंधित है। माननीय न्यायालय ने कहा कि विधायी मंशा की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करने के लिए वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83, 85, 6 और 7 को एक साथ पढ़ने की आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 6 और धारा 7, औकाफ से संबंधित कुछ विवादों के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण को विशेष अधिकार क्षेत्र प्रदान करती हैं, तथा साथ ही, ऐसे विवादों के संबंध में सिविल न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को छीन लेती हैं। 

इसके अलावा, न्यायालय ने कानूनी प्रतिनिधि द्वारा रमेश गोबिंदराम (मृत) बनाम सुगरा हुमायूं मिर्जा वक्फ (2010) के फैसले का हवाला दिया, जहां माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वक्फ अधिनियम, 1995 का विश्लेषण किया था, तथा वक्फ न्यायाधिकरण के साथ-साथ सिविल न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र की व्याख्या की थी। अदालत ने कहा कि वक्फ संपत्ति से किरायेदार को बेदखल करने का मुकदमा सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है, क्योंकि यह अधिनियम की धारा 6 या धारा 7 के अंतर्गत नहीं आता है। इसके अलावा, माननीय न्यायालय ने कहा, “हर मामले में जहां सिविल न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बहिष्कार के बारे में दलील उठाई जाती है, वहां महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दिया जाना चाहिए कि क्या न्यायाधिकरण सिविल न्यायालय के समक्ष लाए जाने वाले मामले से निपटने के लिए आवश्यक अधिनियम या नियमों के अधीन हैयदि ऐसा नहीं है, तो सिविल न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र समाप्त नहीं होता। लेकिन यदि न्यायाधिकरण को मामले पर निर्णय लेना आवश्यक हो तो सिविल न्यायालय का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाएगा। 

महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड बनाम शेख यूसुफ भाई चावला एवं अन्य (2012)

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम सार्वजनिक न्यास और वक्फों के बीच एक रेखा खींचने की आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि सभी मुस्लिम सार्वजनिक न्यास को एक ही रंग में रंगना और उन्हें वक्फ बताना पूरी तरह से कानून के खिलाफ है। 

इसके अलावा, यह निर्धारित करना कि कोई संस्था वक्फ है या सार्वजनिक न्यास, इसमें तथ्य और कानून दोनों शामिल हैं। कोई मुसलमान या तो सार्वजनिक न्यास या वक्फ बना सकता है और यह वैध रहेगा। न्यास की मुख्य विशेषता यह है कि संपत्ति का प्रबंधन न्यासी द्वारा न्यास दस्तावेज़ की शर्तों के अनुसार किया जाता है। यदि दस्तावेज़ संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण की अनुमति नहीं देता है, तो यह संकेत दे सकता है कि संस्था एक वक्फ है, खासकर यदि अन्य आवश्यक विशेषताएं भी मौजूद हों। वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 1964 में स्पष्ट किया गया कि वक्फ के लाभ केवल मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं हैं, तथा इस बात पर बल दिया गया कि यदि उद्देश्य सार्वजनिक उपयोगिता है, तो न्यास और वक्फ के बीच अंतर कम महत्वपूर्ण हो जाता है। 

सलेम मुस्लिम दफन भूमि संरक्षण समिति बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य (2023)

इस मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या किसी विशेष भूमि को, जिसका उपयोग कब्रिस्तान के रूप में किया जाता है, वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 5 की आवश्यकता को पूरा किए बिना वक्फ में परिवर्तित किया जाना चाहिए या नहीं। माननीय न्यायालय ने बताया कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 4 और 5 के संयुक्त वाचन से यह प्रावधान है कि धारा 5 (वक्फों की सूचियों की घोषणा) के तहत अधिसूचना, अधिनियम की धारा 4 के तहत सर्वेक्षण पूरा होने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद ही प्रकाशित की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने के लिए अधिनियम की धारा 4 के अनुसार सर्वेक्षण कराना अनिवार्य है। 

अदालत ने कहा कि सर्वेक्षण कराने के चरण को छोड़ देना और अधिनियम की धारा 5 के तहत अधिसूचना जारी कर देना, विवादित भूमि के संबंध में वैध वक्फ नहीं माना जाएगा। 

निष्कर्ष

वक्फ की अवधारणा 9वीं और 10वीं शताब्दी से चली आ रही है, और आज भी वक्फ इस्लामी धर्मार्थ प्रथा का आधार बना हुआ है, जिसका मुख्य ध्यान सामाजिक कल्याण और सामुदायिक विकास पर केन्द्रित है। वक्फ से संबंधित सभी अवधारणाएं, इसके प्रकार, मुतवल्ली द्वारा इसका प्रशासन, तथा वक्फ बोर्डों और न्यायाधिकरणों द्वारा सुलझाए जाने वाले विवादों पर ऊपर विस्तार से चर्चा की गई है। हमने वक्फ से संबंधित अधिनियमों में विधानमंडल द्वारा लाए गए अनेक परिवर्तन भी देखे हैं। 

8 दिसंबर, 2023 को वक्फ निरसन विधेयक, 2022 राज्यसभा में पेश किया गया हैं। उद्देश्यों एवं कारणों के विवरण में यह रेखांकित किया गया कि वक्फ अधिनियम, 1995 ने वक्फ बोर्डों को व्यापक शक्तियां प्रदान की हैं। ये बोर्ड देश में भूमि के तीसरे सबसे बड़े मालिक हैं, और इससे अक्सर स्वामित्व को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं तथा आम जनता के निजी संपत्ति अधिकारों पर अतिक्रमण होता है। अधिनियम में यह प्रावधान है कि वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष राज्य सरकार का अधिकारी होना चाहिए, तथा बोर्ड के सदस्यों में पेशेवर और मान्यता प्राप्त विद्वान शामिल होने चाहिए, लेकिन दूसरी ओर, समय के साथ मुसलमानों की सदस्यता सीमित कर दी गई है।

इस अधिनियम की आलोचना इस कारण की गई है कि यह वक्फ बोर्डों को अनियंत्रित स्वायत्तता प्रदान करता है, जिससे दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है, तथा यह राज्य की स्वायत्तता का हनन करता है (वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 28 और 29)। यह बताया गया है कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और वक्फ संपत्तियों के निष्पक्ष प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए सुधार की आवश्यकता है। 

विधेयक अभी पारित होना बाकी है। अगर विधेयक में बताई गई समस्याएं और खामियां वास्तव में जमीनी स्तर पर मौजूद हैं, तो निश्चित रूप से विधायी बदलाव लाने की जरूरत है, ताकि वक्फ के वास्तविक उद्देश्य और सार को सुरक्षित रखा जा सके। 

वर्तमान स्थिति को देखते हुए, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 को 8 अगस्त, 2024 को लोकसभा में पेश किया गया और प्रस्तावित संशोधनों पर ऊपर चर्चा की गई है। संयुक्त संसदीय समिति का निर्णय उत्सुकतापूर्ण है, क्योंकि यदि विधेयक पारित हो जाता है तो कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकते हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या वक्फ की कोई अनुमान हो सकता है?

हां, कुछ परिस्थितियों में वक्फ का अस्तित्व माना जा सकता है। इसका एक उदाहरण संपत्ति का प्राचीन काल से उपयोग हो सकता है। मान लीजिए कि कोई भूमि 100 वर्षों से अधिक समय से कब्रिस्तान है। यह माना जा सकता है कि वह भूमि वक्फ संपत्ति है।

क्या मुतवल्ली वक्फ संपत्ति पर ऋण ले सकता है?

नहीं, मुतवल्ली वक्फ संपत्ति पर कर्ज नहीं ले सकता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि सामान्य परिस्थितियों में वक्फ संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता है। यदि मुतवल्ली किसी वक्फ संपत्ति के विरुद्ध ऋण लेता है, तो भी वह ऋण की राशि का भुगतान करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होगा। इसके अलावा, मुतवल्ली के खिलाफ जारी आदेश को वक्फ संपत्ति के खिलाफ लागू नहीं किया जा सकता है। 

क्या मुशा (संपत्ति में अविभाजित हिस्सा) वक्फ का हिस्सा बन सकता है?

हां, मुशा वक्फ का विषय बन सकता है। यह अप्रासंगिक है कि संपत्ति का बंटवारा हो सकता है या नहीं। मोहम्मद अयूब अली बनाम आमिर खान (1939) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी यही फैसला सुनाया है। हालाँकि, इसका एक अपवाद भी है। किसी मस्जिद या कब्रिस्तान के लिए वक्फ के रूप में मुशा को समर्पित नहीं किया जा सकता। ऐसा वक्फ अवैध होगा क्योंकि वक्फ की संपत्ति में निरंतर भागीदारी ईश्वर को समर्पित संपत्ति के मूल तत्व के प्रतिकूल है, क्योंकि ऐसी संपत्ति पर अल्लाह का विशेष अधिकार है। 

क्या वक्फ को वक्फ बोर्ड में पंजीकृत कराना आवश्यक है?

हां, प्रत्येक वक्फ/औकाफ को वक्फ बोर्ड के कार्यालय में पंजीकृत कराना आवश्यक है। वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 36 के तहत भी यही प्रावधान किया गया है। इसमें प्रावधान है कि वक्फ के पंजीकरण के लिए आवेदन सामान्यतः मुतवल्ली द्वारा किया जाना चाहिए, लेकिन इसे वाकिफ, उसके वंशज, लाभार्थी या वक्फ जिस संप्रदाय से संबंधित है, उसी संप्रदाय के किसी भी मुसलमान द्वारा भी दायर किया जा सकता है। आवेदन के साथ बोर्ड को कुछ विवरण भी उपलब्ध कराने होंगे। बोर्ड, वक्फ को पंजीकृत करने से पहले प्रस्तुत आवेदन और उसके साथ दिए गए विवरण की वास्तविकता और वैधता के बारे में आवश्यक जांच करता है। यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि वक्फ के निर्माण के समय वक्फ बोर्ड अस्तित्व में न हो, तो ऐसी स्थिति में वक्फ के पंजीकरण के लिए आवेदन वक्फ बोर्ड की स्थापना के तीन माह के भीतर प्रस्तुत करना होगा। 

क्या वक्फनामा को भारतीय पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत पंजीकृत कराना आवश्यक है?

यदि वक्फ-नामा किसी अचल संपत्ति को वक्फ करता है, जिसका मूल्य 100 रुपये या उससे अधिक है, तो उसे पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत पंजीकृत होना आवश्यक है। इसके अलावा, वक्फ नामा, वक्फ बनाते समय, संपत्ति में वाकिफ के स्वामित्व को समाप्त कर देता है, और इस प्रकार इसे अधिनियम की धारा 17 (1) (b) के तहत पंजीकृत किया जाना चाहिए। 

संदर्भ

  • Manzar Saeed, Commentary on Muslim Law in India, (Orient Publishing Company, 2011, New Delhi).
  • I.B. Mulla, Commentary on Mohammedan Law, (2nd Ed, Dwivedi Law Agency, 2009, Allahabad).
  • Prof. I.A. Kan, Mohammedan Law, (23rd Ed, Central law agency, 2010 Allahabad).
  • Dr. Paras Diwan, Muslim Law in Modern Indian, (Allahabad Law Agency, 2021, New Delhi).

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम 1996 की धारा 11

यह लेख Adhila Muhammed Arif द्वारा लिखा गया है और Shreya Patel द्वारा अद्यतन (अपडेट) किया गया है। इस लेख का उद्देश्य मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11, वर्षों के दौरान हुए संशोधनों, मध्यस्थों की नियुक्ति तथा मध्यस्थों की नियुक्ति के मामले में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे पर प्रकाश डालना है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

वे विधियां जिनके माध्यम से किसी विवाद को न्यायालय में जाए बिना पक्षों के बीच सुलझाया जा सकता है, वैकल्पिक विवाद समाधान विधियां हैं। वैकल्पिक विवाद समाधान हैं वार्ता (नेगोशिएशन), बिचवई (मिडिएशन), लोक अदालत और सुलह (कॉन्सिलिएशन)। वैकल्पिक विवाद समाधान के इन विविध तरीकों का उपयोग करने के पीछे मुख्य उद्देश्य भारत में न्यायपालिका के कार्यभार को कम करना और पक्षों को विवादों को तेजी से सुलझाने में मदद करना है। भारत में मध्यस्थता की अवधारणा नई नहीं है। पक्षों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की प्रथा का इतिहास बृहदारण्यक उपनिषद से मिलता है। हिंदू कानून के अनुसार, मध्यस्थता का सबसे पुराना और पहला उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है। 

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (जिसे आगे ‘अधिनियम’ कहा जाएगा) की धारा 11, मध्यस्थता निपटान में मध्यस्थों की नियुक्ति के प्रावधान से संबंधित है। अधिनियम में विभिन्न प्रक्रियाओं का प्रावधान है जिसके माध्यम से मध्यस्थों की नियुक्ति की जा सकती है। धारा 11 पक्षों को नियुक्ति की प्रक्रिया पर सहमत होकर मध्यस्थों को चुनने की अनुमति देती है। यदि पक्षकार स्वयं मध्यस्थ नियुक्त नहीं कर सकते तो वे धारा 11 में निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से मध्यस्थ नियुक्त करवा सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, इस धारा में मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 और मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 में संशोधनों के माध्यम से कई परिवर्तन हुए हैं, जिससे मध्यस्थता में न्यायपालिका का प्रभाव काफी हद तक कम हो गया है। 

इस लेख में हम अधिनियम की धारा 11 के प्रावधानों के साथ-साथ इसके संबंध में पारित ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा करेंगे। लेख में यह भी बताया गया है कि कितने मध्यस्थों की नियुक्ति की जानी आवश्यक है, नियुक्त मध्यस्थों की शुल्क क्या है, मध्यस्थता की नियुक्ति न होने की स्थिति में क्या कदम उठाए जाने चाहिए, मध्यस्थता और उसके निर्णय के मामले में न्यायालय कितना हस्तक्षेप कर सकता है, तथा अन्य महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई है। 

मध्यस्थता का अर्थ

मध्यस्थता अनिवार्यतः वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) के तरीकों में से एक है, जिसके तहत दो पक्षों के बीच विवाद की सुनवाई और निर्णय, न्यायालय को शामिल किए बिना, तीसरे पक्ष द्वारा किया जाता है। यह पक्षकारों को मुकदमेबाजी जैसे विवादों का शीघ्र निपटारा करने की अनुमति देता है। हालाँकि, मुकदमेबाजी के विपरीत, यह अदालत के बाहर होता है और निर्णय अंतिम होता है तथा इसे चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसके परिणामस्वरूप न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के समान ही निर्णय की घोषणा होती है। मध्यस्थता से संबंधित मामले अधिनियम द्वारा शासित होते हैं। 

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) मध्यस्थता को इस प्रकार परिभाषित करता है –

“मध्यस्थता एक प्रक्रिया है जिसमें पक्षकार एक समझौते के द्वारा विवाद को एक या एक से अधिक मध्यस्थों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जो विवाद पर पक्षों के लिए बाध्यकारी निर्णय देते हैं। मध्यस्थता विवादों को अदालत में जाने के बजाय निजी विवाद समाधान के माध्यम से सुलझाने की एक विधि है। 

धारा 2(1)(a) में कहा गया है कि मध्यस्थता का अर्थ किसी स्थायी मध्यस्थता संस्था द्वारा प्रशासित या न प्रशासित कोई भी मध्यस्थता है।

पक्षकार अपने विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता पद्धति का चयन करते हैं, क्योंकि यह मुकदमेबाजी पद्धति की तुलना में अधिक लचीलापन और दक्षता प्रदान करती है। मध्यस्थता की प्रक्रिया पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते का मसौदा तैयार करने से शुरू होती है। इस मध्यस्थता समझौते का संदर्भ तब लिया जाता है जब पक्षों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है। इस समझौते में सभी महत्वपूर्ण नियम व शर्तें उल्लिखित हैं। ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें कोई समझौता नहीं होता और विवाद उत्पन्न होने के बाद पक्षकार मध्यस्थता का तरीका चुनकर विवाद को सुलझाने का निर्णय लेते हैं। ऐसे मामलों में अधिनियम की धारा 11 में मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए पालन किये जाने वाले प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। 

आइये धारा 11 के अंतर्गत उल्लिखित विभिन्न प्रावधानों पर नजर डालें। 

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 11 के तहत प्रावधान

उप-धारा 1

मध्यस्थ किसी भी राष्ट्रीयता का हो सकता है, जब तक कि पक्षों द्वारा किसी विशिष्ट बात पर सहमति न हो। यदि विवाद के दोनों पक्ष इस पर सहमत हों तो मध्यस्थ की राष्ट्रीयता पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यहां ध्यान रखने योग्य मुख्य बात यह है कि मध्यस्थ की नियुक्ति विवाद के पक्षों के बीच आपसी सहमति के बाद ही की जाती है। इस उप-धारा में यह भी उल्लेख किया गया है कि मध्यस्थ की राष्ट्रीयता का भी समझौते में पहले से उल्लेख किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, विभिन्न देशों में काम करने वाली दो कंपनियों के बीच विवाद की स्थिति में, उनके समझौते में एक खंड हो सकता है जिसमें कहा गया हो कि विवाद की स्थिति में वे एक विशिष्ट राष्ट्रीयता से मध्यस्थ की नियुक्ति करेंगे। यदि मध्यस्थता भारत में हो रही है तो ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है कि मध्यस्थ भारत का नागरिक होना चाहिए। 

उप-धारा 2

धारा की उपधारा (6) के अधीन, पक्षकार मध्यस्थ या मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से तय कर सकते हैं। पक्षकार स्वयं मध्यस्थता की प्रक्रिया और मध्यस्थता की नियुक्ति का निर्णय लेते हैं। दोनों पक्ष अपनी इच्छानुसार कोई भी तरीका अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं, जो दोनों पक्षों के लिए सुविधाजनक हो तथा विवाद का समाधान भी सुनिश्चित करे। 

पक्षकार मध्यस्थता का स्थान, मध्यस्थता की भाषा, मध्यस्थ की नियुक्ति कैसे करना चाहते हैं, मध्यस्थता कार्यवाही के दौरान वे कौन सी प्रक्रिया अपनाना चाहते हैं, आदि का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। ये विवरण अक्सर समझौते में भी जोड़ दिए जाते हैं। यदि समझौते में किसी विशिष्ट स्थान या प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है तो उसका पालन किया जाना चाहिए। बीजीएस एसजीएस सोमा जेवी बनाम एनएचपीसी लिमिटेड (2019) के मामले में यह माना गया कि जब समझौते में मध्यस्थता के लिए एक विशिष्ट स्थान निर्दिष्ट किया जाता है और कोई अन्य खंड नहीं होते हैं जो इसके विपरीत कार्य करते हैं, तो मध्यस्थता के लिए स्थान वह होना चाहिए जो विशिष्ट हो। 

उपधारा 3

नियुक्ति की प्रक्रिया पर सहमति न बन पाने की स्थिति में, उपधारा (3) तीन मध्यस्थों की नियुक्ति के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया निर्धारित करती है:

  1. प्रत्येक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करता है। 
  2. इसके बाद दोनों मध्यस्थ संयुक्त रूप से तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति करते हैं, जो पीठासीन मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है। 

इस उप-धारा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मध्यस्थों की नियुक्ति के मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए। जब पक्षों के बीच समझौते में यह कहा गया हो कि तीन मध्यस्थ नियुक्त किए जाएंगे, तो उस स्थिति में प्रत्येक पक्ष अपनी ओर से एक मध्यस्थ नियुक्त करेगा, तथा तीसरे मध्यस्थ को अन्य दो नियुक्त मध्यस्थों द्वारा पीठासीन मध्यस्थ के रूप में नियुक्त किया जाएगा। 

तालेड़ा स्क्वायर प्राइवेट लिमिटेड बनाम रेल भूमि विकास प्राधिकरण (2023) के मामले में अदालत द्वारा निष्पक्षता और स्वतंत्रता के सिद्धांत पर जोर दिया गया था। इस मामले में समाधान खंड में कहा गया है कि पक्षों को प्रतिवादी द्वारा प्रदान की गई सूची में से मध्यस्थ का चयन और नामांकन करना होगा। और पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति के लिए, प्रतिवादी ही उसे नियुक्त करेगा। प्रतिवादी द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण प्रतिबंधात्मक था तथा दावेदार के अधिकारों का भी उल्लंघन करता था। अदालत ने कहा कि इस तरह का खंड स्वतंत्र चुनाव के अधिकार का उल्लंघन करता है तथा पक्षों के बीच पक्षपात पैदा करता है। मध्यस्थों की नियुक्ति की ऐसी प्रक्रिया वैध नहीं है। 

उप-धारा 3A

समय-समय पर मध्यस्थ न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) नामित करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में निहित है। इन मध्यस्थ न्यायाधिकरणों को धारा 43-I के अंतर्गत परिषद द्वारा वर्गीकृत किया जाएगा। बशर्ते कि यदि किसी उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में कोई श्रेणीबद्ध मध्यस्थ न्यायाधिकरण मौजूद नहीं है, तो संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एक मध्यस्थ पैनल बनाए रख सकते हैं जो मध्यस्थ संस्था के सभी कर्तव्यों और कार्यों का निर्वहन करता है। 

जब कोई संदर्भ मध्यस्थों को भेजा जाता है, तो यह माना जाएगा कि यह मध्यस्थ न्यायाधिकरण को भेजा गया है। इस धारा के अंतर्गत नियुक्त मध्यस्थ चौथी अनुसूची में निर्धारित शुल्क पाने के हकदार होंगे। संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मध्यस्थता न्यायाधिकरण की आवधिक आधार पर समीक्षा भी की जाती है। 

उप-धारा 4

यदि उपधारा (3) में नियुक्ति की प्रक्रिया लागू होती है –

  1. प्रत्येक पक्ष को दूसरे पक्ष से अनुरोध प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर एक मध्यस्थ नियुक्त करना होगा। 
  2. दोनों मध्यस्थों को नियुक्ति की तिथि से तीस दिनों के भीतर तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति पर सहमति बनानी होगी। मध्यस्थ की नियुक्ति तब की जाएगी जब पक्षकार इसके लिए आवेदन करेगा। अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक (कमर्शियल) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थों की नियुक्ति करेगा, जबकि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मामले के अलावा अन्य मामलों में, उच्च न्यायालय मध्यस्थों की नियुक्ति करेगा। 

जब पक्षकार मध्यस्थ नियुक्त करने में असफल होते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय मध्यस्थ नियुक्त करके पक्षों की सहायता करते हैं। पारंपरिक अदालतों की तुलना में विवाद को तेजी से निपटाने के लिए प्रक्रिया को त्वरित बनाने हेतु समयसीमा प्रदान की जाती है। पक्षपात बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों को मध्यस्थ चुनने का अधिकार दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय मध्यस्थता का विकल्प चुनने वाले पक्षकारों की तब मदद करेंगे जब उन्हें मध्यस्थ की नियुक्ति में समस्या हो। 

उप-धारा 5

यह उपधारा बताती है कि जब किसी मध्यस्थता में एकमात्र मध्यस्थ होता है और विवाद के पक्षकार नियुक्ति की प्रक्रिया पर सहमति नहीं बना पाते हैं, तो उस स्थिति में यदि मध्यस्थ की नियुक्ति उस दिन से तीस दिन के भीतर नहीं की जाती है, जिस दिन एक पक्षकार ने दूसरे पक्षकार से सहमति जताने का अनुरोध किया था, तो ऐसी नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा की जाएगी, यदि मध्यस्थता एक गैर-अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के मामले में मध्यस्थ की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित संस्था द्वारा की जाएगी। 

उप-धारा 6

इस उपधारा में कहा गया है कि जहां पक्षों द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया पर समझौता किया गया है, यदि

  1. कोई पक्ष प्रक्रिया द्वारा निर्धारित अनुसार कार्य करने में विफल रहता है, या 
  2. पक्षकार या नियुक्त मध्यस्थ प्रक्रिया द्वारा निर्धारित समझौते पर पहुंचने में विफल रहते हैं, या
  3. प्रक्रिया द्वारा सौंपे गए किसी कार्य को करने में असफल रहने पर मध्यस्थ की नियुक्ति तब की जाएगी जब पक्षकार इसके लिए आवेदन करेगा। अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मामले में, सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थों की नियुक्ति करेगा, जबकि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मामलों के अलावा अन्य मामलों में, उच्च न्यायालय आवश्यक उपाय करने के लिए नियुक्ति करेगा, जब तक कि समझौते के अनुसार नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए कोई अन्य साधन न हो। 

ब्राह्मणी रिवर पेलेट्स लिमिटेड बनाम कमाची इंडस्ट्रीज लिमिटेड (2019) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल वे न्यायालय जो अनुबंध के अनुसार अधिकार क्षेत्र को पूरा करते हैं, उनके पास उस मामले के संबंध में अधिकार क्षेत्र होगा।  विवाद से संबंधित पक्षों ने पहले ही मध्यस्थता के लिए स्थान तय कर लिया था, जो कि भुवनेश्वर था। इससे यह साबित होता है कि पक्षकारों का इरादा अन्य न्यायालयों को अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने का था। मध्यस्थ के लिए आवेदन की नियुक्ति के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय को अधिनियम की धारा 11(6) के तहत कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। 

उप-धारा 6A

इस उप-धारा को 2019 के संशोधन में हटा दिया गया था। 

उप-धारा 6B

जब सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति या संस्था को नामित करता है, तो इससे ऐसे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक शक्तियों का प्रत्यायोजन नहीं होगा। 

उप-धारा 7

इस उप-धारा को 2019 के संशोधन में हटा दिया गया था। 

उपधारा 8

मध्यस्थ नियुक्त करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय या न्यायालय द्वारा नामित संस्था या व्यक्ति को धारा 12(1) के अनुसार भावी मध्यस्थ से लिखित में प्रकटीकरण करवाना होगा और निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना होगा 

  1. पक्षों के समझौते के अनुसार मध्यस्थ के लिए आवश्यक योग्यताएं,
  2. स्वतंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए प्रकटीकरण की विषय-वस्तु और अन्य विचार 

उपधारा 9

यदि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मामलों में मध्यस्थ की नियुक्ति की जानी हो तथा एकमात्र मध्यस्थ या तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति की आवश्यकता हो, तो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा नामित मध्यस्थ संस्था पक्षकारों की राष्ट्रीयता के अलावा किसी अन्य राष्ट्रीयता के मध्यस्थ की नियुक्ति कर सकती है। 

यह उप-धारा यह नियंत्रित करती है कि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के मामले में, पक्ष मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के मामले में, न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित व्यक्ति या संस्था किसी तीसरे मध्यस्थ या एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति कर सकती है। नियुक्त किया जाने वाला मध्यस्थ पक्षकारों की राष्ट्रीयता के अलावा किसी अन्य राष्ट्रीयता का होना चाहिए। 

मेसर्स कॉमेड केमिकल्स लिमिटेड बनाम सीएन रामचंद (2008) के मामले में याचिकाकर्ता द्वारा धारा 11 के तहत याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से एक पीठासीन मध्यस्थ या एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त करने की प्रार्थना की है। पसंदीदा मध्यस्थ का उल्लेख किया गया था और याचिकाकर्ता द्वारा 2005 में नोटिस भेजकर इसकी जानकारी दी गई थी। प्रतिवादी द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया गया। प्रतिवादी ने कहा कि चूंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मामला है, इसलिए इसे उच्च न्यायालय के पास न भेजकर मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाना चाहिए। चूंकि यह अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता का मामला था, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। 

उपधारा 10

इस उप-धारा को 2019 के संशोधन के साथ हटा दिया गया था। 

उपधारा 11

यदि उपधारा (4), (5), (6) के अधीन किए गए आवेदन के दौरान विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों या पदाभिहित व्यक्तियों को एक से अधिक अनुरोध या आवेदन किए गए हैं, तो प्रथम अनुरोध प्राप्त करने वाला उच्च न्यायालय सक्षम होगा। 

उपधारा 12

जब अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता या अन्य मध्यस्थता के संबंध में उप-धारा (4), (5), (6) और (8) के तहत संदर्भित मामले, मध्यस्थ संस्था को संदर्भित किया जाता है, वह मध्यस्थ संस्था है जिसे उप-धारा 3A के तहत नामित किया गया था। 

उपधारा 13

मध्यस्थों की नियुक्ति के लिए आवेदन या अनुरोध का निपटारा मध्यस्थ संस्था द्वारा शीघ्रता से किया जाएगा। इसका निपटारा विपक्षी पक्ष को नोटिस की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर किया जाएगा। 

मुकदमेबाजी के बजाय मध्यस्थता का विकल्प चुनने का मुख्य उद्देश्य यह है कि मध्यस्थता विवाद का अधिक शीघ्र समाधान प्रदान करती है, इसलिए मध्यस्थता एक बहुत ही समय-संवेदनशील अवधारणा है। मध्यस्थता की नियुक्ति में प्रायः पहले से ही समय लग जाता है। मध्यस्थता प्रक्रिया में अलग-अलग समयसीमा होने से विवाद को शीघ्रता से सुलझाने में मदद मिलती है। 2019 के संशोधन के साथ, जब पक्षकार ऐसा करने में विफल होते हैं तो मध्यस्थ की नियुक्ति का अधिकार यदि अब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय को न देकर मध्यस्थ संस्था को दिया जाता है, तो यह कदम मध्यस्थता की नियुक्ति प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। 

उपधारा 14

मध्यस्थ संस्था अधिनियम की चौथी अनुसूची में निर्धारित दरों पर विचार करने के पश्चात मध्यस्थ न्यायाधिकरण को शुल्क और उसके भुगतान के तरीके का निर्धारण करेगी। तथापि, इस उपधारा की व्याख्या में यह प्रावधान है कि गैर-वाणिज्यिक मामलों में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के मामले में, पक्षकार मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार शुल्क निर्धारित करने पर सहमत हो सकते हैं। 

सर्वोच्च न्यायालय ने ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम एफकॉन्स गुनानुसा जेवी (2022) के मामले में मध्यस्थों के लिए भुगतान के कानून को स्पष्ट किया है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि देय शुल्क पर लगाई गई 30,00,000 रुपये की सीमा अधिनियम की चौथी अनुसूची के अंतर्गत व्यक्तिगत मध्यस्थों के लिए है, न कि पूरे न्यायाधिकरण के लिए है। अदालत ने यह भी कहा कि मध्यस्थों की शुल्क का निर्णय एकतरफा नहीं किया जा सकता, इसमें पक्षों की सहमति पर भी विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी सलाह दी कि मध्यस्थ की शुल्क पहले ही निर्धारित कर ली जानी चाहिए ताकि उससे संबंधित किसी भी विवाद से बचा जा सके। 

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 11 में प्रावधानों का विकास

2015 संशोधन अधिनियम से पहले

ऐसी स्थिति में जहां पक्षकारों ने नियुक्ति नहीं की थी, वहां यह नियुक्ति उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों या उनके द्वारा नामित (डेजिग्नेट) व्यक्तियों द्वारा की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के मामलों में नियुक्तियां भारत के मुख्य न्यायाधीश ही करते थे। 

2015 संशोधन अधिनियम द्वारा लाए गए महत्वपूर्ण परिवर्तन

  • संशोधन द्वारा “मुख्य न्यायाधीश” शब्दों के स्थान पर “सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय” शब्द प्रतिस्थापित किया गया। 
  • उप-धारा 6A और 6B को सम्मिलित करके, मध्यस्थता-पूर्व चरण में न्यायिक भागीदारी की भूमिका कम कर दी गई। नई उप-धारा 6A के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश को अपनी भूमिका को मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व की जांच तक सीमित करना होगा। उप-धारा 6B स्पष्ट करती है कि पदनाम न्यायिक क्षमता के प्रत्यायोजन (डेलिगेशन) के बराबर नहीं है।
  • उप-धारा 7 में संशोधन के माध्यम से यह जोड़ा गया कि न्यायालय या उसके नामित व्यक्ति के निर्णय के विरुद्ध किसी भी रूप में अपील करना संभव नहीं होगा। इस संशोधन से पहले धारा में केवल यही कहा गया था कि निर्णय “अंतिम” है। संशोधन से आदेशों की अंतिमता को संशोधन से पहले की धारा की तुलना में अधिक कठोर बना दिया गया। 
  • संशोधन में मध्यस्थ की नियुक्ति करते समय प्रकटीकरण की विषय-वस्तु को एक आवश्यकता के रूप में स्पष्ट किया गया। 
  • दो नई उपधाराएँ भी जोड़ी गईं। उपधारा 13 में साठ दिनों के भीतर आवेदन का शीघ्र निपटारा करने का प्रावधान है, तथा उपधारा 14 में यह प्रावधान है कि संबंधित उच्च न्यायालय को शुल्क निर्धारित करने का अधिकार है। 

2019 संशोधन अधिनियम द्वारा लाए गए परिवर्तन

इस संशोधन ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया जब इसने नियुक्ति की शक्ति को न्यायालयों से हटाकर न्यायालयों द्वारा नामित मध्यस्थ संस्थाओं को सौंप दिया, इस प्रकार भारत में मध्यस्थता को संस्थागत बना दिया है। 

इस संशोधन के साथ उप-धारा 3A जोड़ी गई है। उप-धारा में कहा गया है कि मध्यस्थता संस्था को नामित करने की शक्ति समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के पास होगी, जिन्हें धारा 43-i के तहत परिषद द्वारा वर्गीकृत किया जाता है। 

बशर्ते कि यदि उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में कोई मध्यस्थ संस्था (श्रेणीबद्ध) उपलब्ध नहीं है, तो उस स्थिति में ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मध्यस्थों का एक पैनल बनाए रखा जा सकता है, जो मध्यस्थ संस्था के कर्तव्यों और कार्यों का निर्वहन करेगा। बशर्ते कि मध्यस्थ के पैनल की समीक्षा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा समय-समय पर की जा सकेगी। 

मध्यस्थ को किया गया कोई भी संदर्भ मध्यस्थ संस्था माना जाएगा तथा पक्षों द्वारा नियुक्त मध्यस्थ चौथी अनुसूची में उल्लिखित शुल्क के अधीन होगा। 

उप-धारा 6A और 7 को हटा दिया गया। उप-धारा 6A मध्यस्थ समझौते के अस्तित्व की न्यायिक जांच से संबंधित थी। उपधारा 7 में प्रावधान था कि न्यायालय का आदेश अंतिम होगा तथा उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी। 

उप-धारा 6A को हटाने से यह स्पष्ट हो गया है कि मध्यस्थ संस्थाओं को मध्यस्थों की नियुक्ति करते समय अपनी जांच को मध्यस्थ समझौते के अस्तित्व तक ही सीमित नहीं रखना होगा। उप-धारा 7 को हटाने से यह व्याख्या की जा सकती है कि मध्यस्थ संस्थाओं द्वारा दिए गए नियुक्ति आदेश को चुनौती दी जा सकती है। 

इस संशोधन के तहत उप-धारा 10 को भी हटा दिया गया था। 

मध्यस्थ की नियुक्ति

मध्यस्थता का उपयोग अधिक लचीले और शीघ्र विवाद समाधान के लिए किया जाता है। वाणिज्यिक मामलों से संबंधित विवादों का समाधान अक्सर मुकदमेबाजी के बजाय मध्यस्थता से किया जाता है, क्योंकि इससे समय की बचत होती है तथा यह त्वरित और कुशल होता है। मध्यस्थता प्रक्रिया में मध्यस्थ की नियुक्ति महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है। अधिनियम, 1996 की धारा 11 मध्यस्थता की प्रक्रिया के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति से संबंधित है। यह धारा उन सभी संभावित कार्यवाही के बारे में बताती है, जिन्हें पक्षकार अपनी मध्यस्थता कार्यवाही के लिए मध्यस्थ चुनने के लिए अपना सकते हैं। यदि पक्षकार स्वयं मध्यस्थों का चयन करने में सक्षम नहीं हैं, तो प्रावधान में अन्य तरीके भी बताए गए हैं जिनके माध्यम से मध्यस्थ नियुक्त किया जा सकता है। 

मध्यस्थ की नियुक्ति में पक्षकार स्वायत्तता (ऑटोनामी) का सिद्धांत 

पक्षकार स्वायत्तता का सिद्धांत मध्यस्थता में मौलिक अवधारणाओं में से एक है। यह सिद्धांत पक्षों को मध्यस्थता की प्रक्रिया में नियंत्रण और स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह सिद्धांत पक्षों को अपनी आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और आपसी समझौतों के अनुसार मध्यस्थता की कार्यवाही के विभिन्न पहलुओं पर निर्णय लेने की अनुमति देता है। भारत में पक्षों की स्वायत्तता का सिद्धांत विधायिका में ही सन्निहित है। पक्षों की स्वायत्तता मध्यस्थता समझौते में प्रतिबिंबित होती है जो मध्यस्थता कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

मध्यस्थता समझौते के कारण पक्षकार अपने विवाद को सुलझाने के लिए न्यायालय की ओर नहीं बल्कि मध्यस्थता की ओर जाते हैं। समझौते में यह तय किया जाता है कि मध्यस्थता प्रक्रिया किस प्रकार आगे बढ़ेगी। पक्षकार की स्वायत्तता का प्रयोग मध्यस्थ न्यायाधिकरण के संगठन और नियुक्ति के समय देखा जा सकता है। पक्षकार अपनी विशेषज्ञता, निष्पक्षता, अनुभव और अन्य प्रासंगिक कारकों के अनुसार अपने मध्यस्थों का चयन कर सकते हैं और निर्णय लेने में सहायता कर सकते हैं जो इस सिद्धांत के साथ पक्षों के बीच विवाद को हल करने में सहायता करता है। पक्षों द्वारा मध्यस्थों को चुनने की स्वतंत्रता, पक्षकार  स्वायत्तता सिद्धांत के मुख्य पहलुओं में से एक है। 

स्वायत्तता का सिद्धांत तब भी देखा जाता है जब पक्ष गोपनीयता, निजता, व्यावसायिक रहस्य और संवेदनशील जानकारी को बनाए रखने और इसे जनता के सामने प्रकट होने से बचाने के लिए सहमत होते हैं। पक्षकार विवाद समाधान पद्धति के रूप में मध्यस्थता का चयन करते हैं, क्योंकि पारंपरिक मुकदमेबाजी प्रक्रिया की तुलना में इसमें गोपनीयता बनाए रखी जाती है। मध्यस्थता कार्यवाही में पक्षकार मध्यस्थता का स्थान भी चुनते हैं। दोनों पक्ष एक ऐसा स्थान चुनते हैं जहां हस्तक्षेप कम हो। यदि मध्यस्थता का स्थान भारत से बाहर है तो भारत की अदालतें अंतरिम राहत नहीं दे सकतीं है। पक्षकार स्वायत्तता की अवधारणा पर भी कुछ प्रतिबंध हैं। अधिनियम में पक्षकार स्वायत्तता की परिकल्पना की गई है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने एसवीजी मोलासेस कंपनी बी.वी. बनाम मैसूर मर्केंटाइल कंपनी लिमिटेड एवं अन्य (2006) के मामले में स्वीकार किया है। 

हाल के वर्षों में पक्षकार स्वायत्तता के महत्व को महत्व दिया गया है, तथा भारतीय न्यायालयों ने मध्यस्थता के पक्ष में रुख अपनाया है। स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (2020) के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि पक्षकारों ने अपने विवादों को हल करने के लिए एक विशिष्ट तंत्र पर सहमति व्यक्त की है, जिसमें मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शामिल है, तो अदालतों के लिए इसकी अवहेलना करना और स्वप्रेरणा से मध्यस्थ नियुक्त करना गलत होगा। 

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता में पक्षकार स्वायत्तता का सिद्धांत भी एक मान्यता प्राप्त अवधारणा है, जो एक प्रमुख कारण है कि पक्षकार, विशेष रूप से वाणिज्यिक मामलों में, पारंपरिक मुकदमेबाजी के स्थान पर विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का चयन करते हैं। पक्षकार अपनी आवश्यकताओं और मध्यस्थता में वादों की आवश्यकताओं के अनुसार तंत्र को परिभाषित और संशोधित कर सकते हैं। जो तंत्र अपनाया जाता है, उसे सार्वजनिक नीति और कानून के नियमों के अनुरूप होना चाहिए। अदालतें पक्षकारों को इस प्रणाली के तहत आगे बढ़ने की अनुमति देंगी और उसका सम्मान करेंगी, बशर्ते कि इससे कानून के नियमों का उल्लंघन न हो तथा मामले में यथासंभव न्यूनतम हस्तक्षेप होना चाहिए।

मध्यस्थों की संख्या

अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, पक्षकारों को मध्यस्थता प्रक्रिया में नियुक्त किए जाने वाले मध्यस्थों की संख्या तय करने की स्वतंत्रता है, बशर्ते कि मध्यस्थता प्रक्रिया में मध्यस्थों की संख्या सम संख्या नहीं होनी चाहिए। प्रक्रिया एक सम (इवन) संख्या नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, तीन मध्यस्थ नियुक्त किए जा सकते हैं, जहां एक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करता है और फिर दोनों मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ को नियुक्त करते हैं जिसे पीठासीन मध्यस्थ के रूप में जाना जाता है। मध्यस्थों की संख्या दो या चार नहीं हो सकती है। जब पक्षकार विषम संख्या में मध्यस्थों की नियुक्ति करने में सक्षम नहीं होते हैं तो उस स्थिति में मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन एकमात्र मध्यस्थ के साथ किया जाएगा। यदि पक्षकार मध्यस्थ नियुक्त करने में असफल रहते हैं या तीन मध्यस्थों के बीच सहमति होने पर दोनों मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर सकते हैं तो न्यायालय मध्यस्थ नियुक्त करेगा। 

आईबीआई कंसल्टेंसी इंडिया बनाम डीएससी लिमिटेड (2018) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अधिनियम का मूल सिद्धांत यह है कि पक्ष इस शर्त पर मध्यस्थों की संख्या निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं कि यह विषम संख्या होनी चाहिए और अधिनियम के अनुसार नियुक्ति की प्रक्रिया होनी चाहिए। जब पक्षकार आपसी सहमति से मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन करने में सक्षम नहीं होते हैं, तो कोई भी पक्षकार उपाय के लिए अधिनियम की धारा 11 का सहारा ले सकता है, जहां न्यायिक हस्तक्षेप के साथ मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए विवरण प्रदान किया गया है। 

एकमात्र मध्यस्थ

मध्यस्थता में एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति हमेशा एक तर्कपूर्ण मुद्दा होता है। मध्यस्थता में दोनों पक्ष आपसी समझ और आपसी सहमति से एकमात्र मध्यस्थ का चयन करते हैं। एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष से अनुरोध कर सकता है। जब दूसरा पक्ष भी इससे सहमत हो जाता है तो एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति की जाती है। 

यदि पक्षकार इसके लिए सहमत नहीं होता है और पक्षकार दूसरे पक्षकार द्वारा अनुरोध किए जाने के दिन से तीस दिन के भीतर एकमात्र मध्यस्थ के लिए सहमत नहीं होते हैं, तो पक्षकार के अनुरोध पर मध्यस्थ की नियुक्ति उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय या ऐसे न्यायालय द्वारा नामित किसी संस्था या व्यक्ति द्वारा की जाएगी। मध्यस्थता के दायरे में कानून के सिद्धांत यह हैं कि एक पक्ष द्वारा मध्यस्थ की एकतरफा नियुक्ति का निषेध किया जाता है। 

न्यायालयों ने इस सिद्धांत को बहुत दृढ़ता से बरकरार रखा और यह सुनिश्चित किया कि मध्यस्थता प्रक्रिया में निष्पक्षता और अखंडता बनी रहे। मध्यस्थता का मुख्य सार यह है कि यह विवादों को सुलझाने का एक निष्पक्ष और तटस्थ तरीका होना चाहिए। पर्किन्स ईस्टमैन आर्किटेक्ट्स डीपीसी और अन्य बनाम एचएससीसी इंडिया लिमिटेड (2022) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि “यदि एक पक्ष को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार है, तो विवाद को हल करने के लिए रणनीति बनाते समय या निर्धारण करते समय पक्षकार द्वारा किए गए विकल्प में हमेशा विशिष्टता का कारक होगा।” विवाद में रुचि रखने वाले पक्ष को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त नहीं करना चाहिए। विवाद के परिणाम में किसी भी प्रकार का हित रखने वाले पक्ष को निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सिवांश इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बनाम आर्मी वेलफेयर हाउसिंग ऑर्गनाइजेशन (2021) के मामले में यह दोहराया कि किसी भी पक्ष को जो मध्यस्थता प्रक्रिया का हिस्सा है, उसे एकतरफा मध्यस्थ नियुक्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि यह विवाद के पक्षों के बीच निष्पक्ष निर्णय के मुख्य उद्देश्य को प्रभावित करेगा। 

न्यू यूरेका ट्रैवल्स क्लब बनाम साउथ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (2022) मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि कोई भी हितबद्ध पक्ष न तो किसी विवाद का मध्यस्थ हो सकता है और न ही धारा 11 के तहत किसी विवाद के लिए मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है। 

मध्यस्थ नियुक्त करते समय सहमति का विफल होना

मध्यस्थता प्रक्रिया के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति के समय दोनों पक्षों को आपसी सहमति पर पहुंचना होगा। जब मध्यस्थ की नियुक्ति के समय पक्षकार एक आम सहमति पर नहीं पहुंच पाते हैं तो वे इसके लिए सहायता लेने हेतु न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यदि दूसरा पक्ष अनुरोध किए जाने के तीस दिनों के भीतर मध्यस्थ नियुक्त करने में विफल रहता है, तो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय या ऐसे न्यायालय द्वारा नामित कोई संस्था या व्यक्ति धारा 11 (4) (a) के तहत मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है। इसी प्रकार, जब दो मध्यस्थ, अपनी नियुक्ति की तिथि से तीस दिनों के भीतर पारस्परिक रूप से किसी तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर सकते, तो ऊपर वर्णित नियम का पालन किया जाता है। 

आवेदन की अस्वीकृति

यदि सीमा अवधि समाप्त हो गई है तो न्यायालयों में मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए पक्षों द्वारा किया गया आवेदन अस्वीकार किया जा सकता है। मेसर्स उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड बनाम नॉर्दर्न कोल फील्ड लिमिटेड (2019) के मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या उच्च न्यायालय मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए किए गए आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर सकता है कि यह सीमा अवधि पर रोक लगाता है। 2015 के संशोधन के बाद, धारा 11 के आवेदनों के अंतर्गत न्यायालय की एकमात्र भूमिका यह देखना है कि कोई मध्यस्थता समझौता मौजूद है या नहीं। विवाद से संबंधित अन्य सभी मामलों का निर्णय मध्यस्थ द्वारा स्वयं किया जाना है। इसमें कॉम्पटंज -कॉमपेतेन के सिद्धांत पर जोर दिया गया है। भारत में मध्यस्थता कानूनों के तहत यह सिद्धांत मध्यस्थ न्यायाधिकरणों को अपना अधिकार क्षेत्र तय करने की शक्ति देता है। हालाँकि, 2019 में अधिनियम में किए गए संशोधन के साथ, इस प्रतिबंधात्मक दायरे को हटा दिया गया है।

न्यायालय पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत आवेदन को केवल तभी अस्वीकार कर सकता है, जब आवेदन पूरी तरह से समय-बाधित हो या पूर्व-दृष्टया अमान्य हो। मेसर्स आरिफ अजीम कंपनी लिमिटेड बनाम मेसर्स एप्टेक लिमिटेड (2024) के मामले में भी यही माना गया है। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सीमा अवधि को छोटा करने के लिए विधायी कार्रवाई की जाए, क्योंकि इससे विवादों को शीघ्रता से निपटाने में मदद मिलेगी। 

मध्यस्थ की नियुक्ति में न्यायालय का हस्तक्षेप

भारत में पक्षकारों द्वारा प्रायः तदर्थ मध्यस्थता का विकल्प चुना जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि मध्यस्थता और इसकी प्रक्रिया से संबंधित सभी महत्वपूर्ण निर्णय पक्षों द्वारा स्वयं निर्धारित किए जाएंगे। कोई विशिष्ट न्यायालय, बोर्ड या संस्था नहीं है जो मध्यस्थों की नियुक्ति करती हो। मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार विवाद के पक्षों में निहित प्राथमिक अधिकार है। जब पक्षों को मध्यस्थों की नियुक्ति में किसी समस्या का सामना करना पड़ता है तो वे अधिनियम की धारा 11 के तहत उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में जा सकते हैं। 

न्यायालयों की एकमात्र भूमिका मध्यस्थों की नियुक्ति करके या इसके लिए किसी मध्यस्थ संस्था या व्यक्ति को नामित करके पक्षों को समय पर सहायता प्रदान करना है। मध्यस्थता के संबंध में भारत में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता पर अनसिट्रल मॉडल कानून के अनुरूप है। 

मध्यस्थों को देय शुल्क

जब कोई मध्यस्थ मध्यस्थता प्रक्रिया संचालित करता है और कोई निर्णय पारित किया जाता है, तो उस स्थिति में मध्यस्थ शुल्क के लिए उत्तरदायी होता है। मध्यस्थों की शुल्क विवाद समाधान में शामिल दोनों पक्षों द्वारा अदा की जानी है। शुल्क, उसकी राशि और भुगतान के तरीके पर निर्णय विवाद के सभी पक्षों के बीच किया जाता है। इन सभी विवरणों का उल्लेख मध्यस्थता समझौते में किया जा सकता है या मध्यस्थ की नियुक्ति के समय पक्षों द्वारा आपसी सहमति से तय किया जा सकता है। विवाद में शामिल राशि के योग के अनुसार मध्यस्थों को देय शुल्क से संबंधित सभी जानकारी चौथी अनुसूची में संदर्भित की गई है। 

मध्यस्थ द्वारा प्रकटीकरण

मध्यस्थ द्वारा प्रकटीकरण का नियम बहुत सामान्य नियम है। मध्यस्थों को नियुक्त होने से पहले कुछ जानकारी का खुलासा करना होता है। मध्यस्थ द्वारा प्रकटीकरण अनिवार्य माना जाता है तथा यह विवेकाधीन नहीं है। मध्यस्थ को लिखित रूप में यह बताना होगा कि क्या मामले में या विवाद में शामिल पक्षों में उसका कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित है, क्या उसका दोनों पक्षों में से किसी के साथ या विवाद के पक्षों से संबंधित किसी व्यक्ति के साथ कोई पुराना संबंध है, क्या उसका विषय-वस्तु में कोई व्यापारिक, व्यक्तिगत या पेशेवर हित है या नहीं।

यदि मध्यस्थ के विरुद्ध कोई न्यायोचित संदेह हो तो ऐसे मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है। इसलिए यह सलाह दी जाती है कि नियुक्ति से पहले सब कुछ लिखित रूप में बता दिया जाए। इस प्रकटीकरण के पीछे मुख्य कारण यह सुनिश्चित करना है कि हितों में कोई विवाद न हो, मध्यस्थ द्वारा लिए गए निर्णय पूर्वाग्रह से मुक्त हों, लिए गए निर्णय पर कोई बाहरी या आंतरिक प्रभाव न हो, और मध्यस्थ निष्पक्ष होना चाहिए ताकि वह न्यायसंगत और निष्पक्ष निर्णय ले सके। 

मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती देने के आधार

कुछ ऐसे आधार हैं जिनके आधार पर विवाद के पक्षकारों द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है। विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की विधि को चुना जाता है, क्योंकि मुकदमेबाजी की तुलना में यह विवाद समाधान की तीव्र, निष्पक्ष और कुशल विधियों में से एक है। मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती देने के कुछ आधार इस प्रकार हैं: 

  • यदि दोनों पक्षों में से किसी एक का मानना है कि मध्यस्थ के पास अपेक्षित योग्यताएं नहीं हैं।
  • यदि कुछ परिस्थितियां ऐसी हों जिनसे मध्यस्थ की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता हो तो नियुक्ति को चुनौती भी दी जा सकती है।
  • यदि मध्यस्थ का विवाद के किसी एक पक्ष के साथ किसी प्रकार का संबंध है, और नियुक्ति के बाद दूसरे पक्ष को इसकी जानकारी होती है, तो ऐसी नियुक्ति को भी चुनौती दी जा सकती है।
  • यदि मध्यस्थ का विवाद के परिणाम में किसी प्रकार का हित है, जिसे उसने अपनी नियुक्ति के समय छुपाया है, तो ऐसी नियुक्ति को किसी भी पक्ष द्वारा चुनौती दी जा सकती है। 

मध्यस्थ की नियुक्ति की सीमा अवधि

मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए आवेदन करने के संबंध में 2015 और 2019 के संशोधनों के बाद भी अधिनियम में कोई सीमा अवधि निर्धारित नहीं की गई है। इस अंतर को संबोधित करते हुए, भारत संचार निगम लिमिटेड बनाम मेसर्स नॉर्टेल नेटवर्क इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2021) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 11 के तहत मध्यस्थों की नियुक्ति के लिए आवेदन भरने की सीमा अवधि, परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 के तहत शासित होगी। जब किसी अधिनियम में कोई परिसीमा अवधि का उल्लेख नहीं होता है, तो ऐसे मामलों में सामान्य नियम के रूप में अनुच्छेद 137 का पालन किया जाता है। यदि मध्यस्थों की नियुक्ति के संबंध में आवेदन दाखिल करने के लिए कोई सीमा अवधि निर्धारित नहीं की गई है, तो आवेदन दाखिल करने के लिए ऐसे अनुरोध प्राप्त होने की तारीख से तीन वर्ष की समयावधि मानी जाएगी। 

अदालत ने यह भी कहा कि जब पक्षकार निर्धारित समय अर्थात तीस दिन के भीतर मध्यस्थ नियुक्त करने में विफल रहते हैं, तभी इसके लिए आवेदन भरने की समय सीमा उत्पन्न होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 11 के तहत आवेदन की तीन वर्ष की समयावधि बहुत लंबी है। अदालत ने कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया का चयन करने का मुख्य कारण विवाद का शीघ्र समाधान करना है और यह सीमा अवधि प्राथमिक उद्देश्य को विफल कर देती है। संसद को धारा 11 में संशोधन करने की आवश्यकता है, जिसमें मध्यस्थता नियुक्ति के लिए आवेदन करने हेतु पक्षों के लिए अदालत में जाने की एक विशिष्ट सीमा अवधि निर्धारित की गई है। 

न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा

2015 से पूर्व संशोधन

नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम बोघारा पॉलीफैब (2008) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता से संबंधित मुद्दों को इस आधार पर वर्गीकृत किया कि अदालत किसमें हस्तक्षेप कर सकती है और किसमें हस्तक्षेप कर सकती है। निर्णय में मुद्दों की तीसरी श्रेणी को भी निर्दिष्ट किया गया है, जिसका निर्णय केवल मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा किया जा सकता है, जो अनिवार्यतः धारा 11 के अनुसार नियुक्त एकमात्र मध्यस्थ या मध्यस्थों का पैनल होता है। मुद्दों की श्रेणियां नीचे सूचीबद्ध हैं: 

प्रथम श्रेणी

मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत व्यक्ति द्वारा तय किये जाने वाले मुद्दे:

  1. क्या पक्ष द्वारा उच्च न्यायालय में दायर किया गया निर्णय उचित है या नहीं।
  2. क्या कोई मध्यस्थता समझौता मौजूद है और क्या आवेदन करने वाला पक्ष समझौते का पक्ष है। 

दूसरी श्रेणी

वे मुद्दे जिन पर मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत व्यक्ति निर्णय कर सकते हैं या मध्यस्थ न्यायाधिकरण के निर्णय पर छोड़ सकते हैं:

  1. क्या दावा जीवित दावा है या मृत दावा है। 
  2. क्या पक्षों ने अपनी संतुष्टि दर्ज करके या बिना किसी आपत्ति के भुगतान प्राप्त करके लेनदेन पूरा कर लिया है। 

तीसरी श्रेणी

मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा पूरी तरह से तय किये जाने वाले मुद्दे:

  1. क्या दावा मध्यस्थता खंड के दायरे में आता है।
  2. मध्यस्थता में किसी गुण-दोष या किसी दावे का शामिल होना। 

दीपक गैल्वनाइजिंग एंड इंजीनियरिंग बनाम भारत सरकार एवं अन्य (1997) और कॉन्टिनेंटल कंस्ट्रक्शन लिमिटेड बनाम नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (1998) के मामलों में यह माना गया कि यदि पक्षकार स्वयं मध्यस्थ नियुक्त करने में असफल हो जाते हैं, तो इससे उनकी नियुक्ति का अधिकार समाप्त हो जाता है। इससे मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत व्यक्ति को नियुक्ति का अधिकार मिल जाता है। 

2015 के बाद संशोधन

धारा 6A के सम्मिलन से न्यायिक हस्तक्षेप कम हो गया, जिसके तहत न्यायालयों को अपनी भूमिका मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व की जांच तक सीमित करनी पड़ी है। नया खंड अदालत को इसकी वैधता की जांच करने की अनुमति नहीं देता है। यह प्रावधान कार्यवाही में देरी से बचने में मदद करता है। 

मेसर्स डूरो फेलगुएरा एस.ए. बनाम मेसर्स गंगावरम पोर्ट लिमिटेड (2017) के मामले में, उप-धारा 6A की शाब्दिक व्याख्या को अपनाया गया था, जिससे न्यायिक जांच को समझौते के अस्तित्व तक सीमित कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त, निर्णय में अस्तित्व का निर्धारण करने के लिए महत्वपूर्ण बिंदु निर्धारित किया गया है, जिसके तहत यह जांच की जाएगी कि क्या समझौते में विवाद की स्थिति में मध्यस्थता के लिए कोई खंड मौजूद है। उप-धारा 6A की प्रतिबंधात्मक प्रकृति के बावजूद, न्यायालयों ने कई निर्णयों में इसे नजरअंदाज किया है। 

गरवारे वॉल रोपर्स लिमिटेड बनाम कोस्टल मरीन कंस्ट्रक्शन एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड (2019) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि समझौते पर पर्याप्त मुहर लगनी चाहिए। प्राइम मार्केट रीच प्राइवेट लिमिटेड बनाम सुप्रीम एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड (2019) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह पाते हुए कि समझौता अवैध था क्योंकि यह अधिनियम की धारा 7 में निर्धारित आवश्यकताओं का पालन नहीं करता था, पक्षों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने से इनकार कर दिया था। 

2019 के बाद का संशोधन

इस संशोधन से नियुक्ति की जिम्मेदारी मध्यस्थ संस्थाओं को सौंपकर महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया गया था। इस संशोधन ने न्यायिक हस्तक्षेप को काफी हद तक कम कर दिया तथा मध्यस्थता प्रणाली को संस्थागत बना दिया। आवेदनों के निपटान के लिए दी गई समयावधि में कमी से न केवल शीघ्र निपटान संभव होगा, बल्कि ऐसे आवेदनों में न्यायिक हस्तक्षेप भी कम होगा। 

हालाँकि, इस संशोधन अधिनियम के प्रारूपण में कुछ कमियाँ हैं। मध्यस्थों के पैनल की समीक्षा करने संबंधी न्यायालयों की शक्ति के बारे में स्पष्टता का अभाव है, तथा क्या यह शक्ति मध्यस्थ संस्थाओं द्वारा गठित मध्यस्थों तक भी विस्तारित है। 

इससे पहले, धारा 11 के तहत नियुक्ति के आदेश को प्रशासनिक न मानकर न्यायिक माना जाता था। एस.बी.पी. एंड कंपनी बनाम पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड (2005) के मामले में भी इसे न्यायिक प्रकृति का माना गया था। 2019 संशोधन अधिनियम के साथ, मध्यस्थता के संस्थागतकरण के कारण मध्यस्थों की नियुक्ति का आदेश प्रशासनिक हो गया है। 

अन्य प्रासंगिक निर्णय

विश्राम वरु एवं अन्य बनाम भारत संघ (2022)

मामले के तथ्य

इस मामले में जब अपीलकर्ता कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। धारा 11(6) के तहत दायर आवेदन को अदालत ने खारिज कर दिया। अपीलार्थी को वर्ष 1982 में कार्य आदेश प्राप्त हुआ था, जो वर्ष 1986 में पूरा हुआ। अपीलकर्ता द्वारा दावा किया गया कि उसने निर्धारित मात्रा से अधिक कार्य किया है तथा इसके लिए उसे अतिरिक्त भुगतान दिया जाना है। 

दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक ने 2018 के बाद से अपीलकर्ता द्वारा किए गए किसी भी पत्राचार का जवाब नहीं दिया। अपीलकर्ता ने मध्यस्थता या भुगतान का अनुरोध किया था। जब दूसरे पक्ष की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपीलकर्ता द्वारा 2019 में मध्यस्थता के लिए याचिका दायर की गई। याचिका को खारिज कर दिया गया क्योंकि इसकी समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि भारत संचार निगम लिमिटेड बनाम मेसर्स नॉर्टेल नेटवर्क्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2021) के निर्णय के अनुसार आवेदन करने के अधिकार के लिए सीमा अवधि तीन वर्ष थी। 

उठाए गए मुद्दे  

क्या अपीलकर्ता द्वारा दायर मध्यस्थता याचिका समय सीमा पार कर चुकी थी या नहीं?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 11 की उपधारा 6 के अंतर्गत किया गया आवेदन समय-सीमा द्वारा वर्जित है। इस मामले में, विवाद के उभरने के लगभग बत्तीस वर्ष बाद मध्यस्थता खंड लागू किया गया है। 

ओवरनाइट एक्सप्रेस लिमिटेड बनाम दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (2022)

मामले के तथ्य

इस मामले में, विवाद समाधान के लिए याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए अधिनियम की धारा 11 के तहत याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता को नई दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन में एक स्थान (वाणिज्यिक) के लिए अनुबंध दिया गया था। याचिकाकर्ता को बोली-पूर्व की तुलना में कम क्षेत्रफल और क्षति से संबंधित संयुक्त माप के समय कई विसंगतियां मिलीं। इन मुद्दों को सुधारने के लिए कई अनुरोध किए गए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिसके कारण याचिकाकर्ता को दिल्ली उच्च न्यायालय में जाकर अंतरिम राहत मांगने के लिए बाध्य होना पड़ा था। 

नई दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने केवल आंशिक सुधार कार्य किया तथा पूरा कार्य पूरा नहीं किया। मामले को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाने का निर्णय लिया गया। नई दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने याचिकाकर्ता के समक्ष पांच मध्यस्थों का एक पैनल प्रस्तुत किया, जिसमें से एक का चयन किया जाना था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इससे सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है तथा यह निष्पक्षता नहीं है। यह अधिनियम की धारा 11(6) के विरुद्ध था। 

उठाए गए मुद्दे

  1. क्या नई दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन याचिकाकर्ता को पांच मध्यस्थों में से चयन करने का विकल्प दे सकता है?
  2. क्या इस मामले में अधिनियम की धारा 11(6) का उल्लंघन हुआ है?

निर्णय

इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष को मध्यस्थों का एक संकीर्ण पैनल नहीं दे सकता है, जो इस मामले में पांच मध्यस्थों का था। याचिकाकर्ता को मध्यस्थों का चयन करने के लिए बहुत सीमित विकल्प दिए गए हैं, जो प्रतिबंधात्मक है और धारा 11(6) का भी उल्लंघन करता है। अंततः विवाद को सुलझाने के लिए दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र ने एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया था। 

ऑलवेज रिमेम्बर प्रॉपर्टीज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाम रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड और अन्य (2022)

मामले के तथ्य

इस मामले में आवेदक ने अधिनियम की धारा 11 के तहत आवेदन दायर किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा एक अंतरिम आदेश पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि प्रतिवादी के विरुद्ध सीआईआरपी (कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया) शुरू की गई। प्रतिवादी के विरुद्ध सभी कार्यवाही बंद हो जाएंगी तथा स्थगन अवधि शुरू हो जाएगी। आवेदक इस आदेश से संतुष्ट नहीं है तथा उसने इसकी समीक्षा की मांग की है।

उठाए गए मुद्दे

क्या अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत पारित आदेश की समीक्षा करने की शक्ति न्यायालय के पास है या नहीं?

निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय अधिनियम की धारा 11 के तहत न्यायिक कार्य करता है न कि प्रशासनिक कार्य करता है। इसलिए, धारा 11 के तहत पारित आदेश की उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा की जा सकती है यदि इसमें कोई तथ्यात्मक त्रुटि है जो स्पष्ट है और वह किसी ऐसे बयान पर आधारित है जो गलत है और वकील द्वारा दिया गया है। 

ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम मेसर्स नरभेरम पावर एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड (2018)

मामले के तथ्य

इस मामले में मेसर्स नरभेरम पावर एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड (एनपीएसएल) का ओडिशा में एक कारखाना था। कंपनी ने बीमाकर्ता (ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) के साथ एक नीति (फायर इंडस्ट्रियल ऑल रिस्क पॉलिसी) पर हस्ताक्षर किए थे। नीति के अनुसार, बीमाकर्ता ओडिशा कारखाने में होने वाले सभी नुकसान की क्षतिपूर्ति करेगा। अक्टूबर में आए भीषण चक्रवात के कारण ओडिशा स्थित कारखाना को भी भारी नुकसान हुआ था। कंपनी को लगभग 39,336,224 रुपये का नुकसान हुआ था। बीमा कंपनी को नुकसान के बारे में सूचित कर दिया गया तथा नुकसान का सर्वेक्षण करने के लिए एक सर्वेक्षक नियुक्त किया गया था। 

बीमाकर्ता ने दावे का निपटान नहीं किया, इसलिए एनपीएसएल ने इस विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का अनुरोध किया। बीमा कंपनी द्वारा मध्यस्थता का अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया गया। एनपीएसएल द्वारा अधिनियम की धारा 11(6) के तहत एक आवेदन दायर किया गया था। उच्च न्यायालय द्वारा एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मध्यस्थ नियुक्त किया गया था। 

मध्यस्थता खंड 13 में विवाद समाधान खंड को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है: 

  1. दावे की मात्रा से संबंधित विवादों को निपटाने के लिए मध्यस्थता पद्धति का उपयोग किया जाएगा।
  2. यदि बीमा कंपनी द्वारा दावा की गई जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जाता है, तो कोई मध्यस्थता नहीं होगी।
  3. बीमाकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई के अधिकार या वाद के अधिकार के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई आरंभ करने के लिए, दावे की राशि पर मध्यस्थता निर्णय प्राप्त किया जाना चाहिए। 

उठाए गए मुद्दे

क्या मध्यस्थ की नियुक्ति तब उचित थी जब बीमा कंपनी ने दावे को अस्वीकार कर दिया था और दायित्व को स्वीकार नहीं किया था?

निर्णय

उच्च न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थता से संबंधित धाराएं अत्यंत अस्पष्ट प्रकृति की हैं। अदालत ने खंड के भाग 1 और 2 को अलग कर दिया और निर्णय दिया कि मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है तथा इसके लिए एक मध्यस्थ नियुक्त किया। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया और कहा कि अनुबंध की व्याख्या, विशेष रूप से बीमा अनुबंधों के मामले में, ठीक उसी प्रकार की जानी चाहिए, जैसा कि व्यक्त किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने वल्कन इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम महाराज सिंह एवं अन्य (1975) के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मामले में भी यही बात स्पष्ट की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थ की नियुक्ति पर आपत्ति का समर्थन किया। इस मामले में खंड 13 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि मध्यस्थता के लिए कोई संदर्भ नहीं दिया जाएगा, बीमाकर्ता दायित्व से इनकार करता है। अदालत का मानना था कि एनपीएसएल को इसके लिए सिविल मुकदमा शुरू करना होगा। 

इस मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन मामलों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर किया है, जहां दावा की गई राशि पर बीमाकर्ता द्वारा विवाद किया जाता है, तथा उन मामलों के बीच जहां बीमाकर्ता द्वारा उत्तरदायित्व से पूर्णतः इनकार किया जाता है। 

यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य बनाम हुंडई इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड और अन्य (2018)

मामले के तथ्य

इस मामले में, प्रतिवादी गैमन इंडिया और हुंडई इंजीनियरिंग द्वारा 2,13,58,76,000 रुपये की एक ठेकेदार समस्त जोखिम बीमा पॉलिसी निष्पादित की गई थी। नीति में एक खंड था जिसमें कहा गया था कि जब दावे की मात्रा के संबंध में कोई विवाद उत्पन्न होगा, तो उन विवादों को मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा। यदि कंपनी द्वारा दायित्व से इनकार किया जाता है तो उस स्थिति में मध्यस्थता का सहारा नहीं लिया जाएगा। 

एक दुर्घटना घटी और दावेदार को 1,51,59,94,543 रुपये की क्षति हुई। उक्त राशि के लिए कंपनी द्वारा दावा किया गया था। दो पक्षों (अपीलकर्ता और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय) ने सर्वेक्षण किया था और उस पर रिपोर्ट तैयार की थी। यह निष्कर्ष निकाला गया कि क्षति डिजाइन में त्रुटि और दोषपूर्ण कारीगरी के कारण हुई थी। रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए अपीलकर्ता द्वारा धारा 7 के तहत कंपनी के दावे को खारिज कर दिया गया।

उठाए गए मुद्दे

क्या समझौते में मौजूद खंड की सख्ती से व्याख्या की जानी चाहिए या नहीं?

निर्णय

मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा लिए गए निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया। उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि ठेकेदार की समस्त जोखिम बीमा नीति का खंड केवल तभी समाप्त किया जाता है जब विवाद दावे की राशि से संबंधित हो, न कि देयता से संबंधित हो। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि उच्च न्यायालय को यह पता लगाने के लिए और अधिक जांच करनी चाहिए थी कि क्या अपीलकर्ता ने समग्र रूप से दायित्व से इनकार किया था या फिर उसने स्वीकृति का प्रभाव दिखाया था, लेकिन वह विवाद के समाधान तक ही सीमित था। 

निष्कर्ष

धारा 11 के अंतर्गत मध्यस्थों की नियुक्ति न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भागीदारी से शुरू हुई। हालाँकि, अब यह मध्यस्थ संस्थाओं की जिम्मेदारी बन गई है। यह स्पष्ट है कि 2019 संशोधन अधिनियम धारा 11 के विकास में एक महत्वपूर्ण हिस्सा  रहा है, जिसने मध्यस्थता प्रणाली को संस्थागत बनाया और न्यायिक हस्तक्षेप को कम करने के उद्देश्य को वास्तव में प्राप्त करने में मदद की है। हालाँकि, अधिनियम के प्रारूप में कुछ खामियां हैं। 2015 और 2019 में किए गए संशोधनों की शब्दावली अधिक स्पष्ट हो सकती है, क्योंकि अस्पष्टता के कारण अधिक न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश है। 

मध्यस्थों की नियुक्ति निष्पक्षता और स्वायत्तता का उपयोग करके की जानी चाहिए। मध्यस्थता के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब विवाद के पक्षकारों को मध्यस्थता नियुक्ति या किसी अन्य कारण से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है, अदालत यह सुनिश्चित करती है कि प्रक्रिया किसी एक पक्ष के प्रति पक्षपातपूर्ण न हो। संपूर्ण अधिनियम मध्यस्थता प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर जोर देता है। पक्षों की स्वायत्तता की कुछ सीमाएं होती हैं, जिनका उल्लंघन पक्षों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। मध्यस्थ नियुक्त करने की शक्ति होने के बावजूद, कुछ बुनियादी दिशानिर्देश हैं जिन्हें मध्यस्थ की नियुक्ति के समय पूरा किया जाना चाहिए। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या धारा 11 के अंतर्गत नियुक्ति आदेश को चुनौती देना संभव है?

उप-धारा 7 को हटा दिए जाने के कारण धारा 11 के तहत की गई नियुक्ति को चुनौती देने में कोई बाधा नहीं रह गई है। इसलिए, कोई भी पक्ष ऐसी नियुक्ति को अदालत में चुनौती देने के लिए कार्यवाही शुरू कर सकता है। इसके अलावा, मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती देने के आधार अधिनियम की धारा 12 में निर्धारित किए गए हैं। 

क्या मध्यस्थता समझौते का कोई पक्ष स्वयं एक एकल मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है तथा उसे दूसरे पक्ष पर थोप सकता है?

यद्यपि किसी विवाद से संबंधित पक्ष के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त करना संभव है, परंतु ऐसा करने के लिए पक्षों के बीच सहमति होनी चाहिए तथा इसके द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस प्रकार, यदि सहमत प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है तो कोई पक्ष एकल मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर सकता है तथा नियुक्ति का दायित्व दूसरे पक्ष पर नहीं थोप सकता है। 

मध्यस्थ की नियुक्ति की सीमा अवधि क्या है?

मध्यस्थों की नियुक्ति की एक सीमा अवधि होती है। मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए पक्षों के पास 3 वर्ष का समय होता है। यदि वे मध्यस्थ नियुक्त करने में असफल रहते हैं, तो न्यायालय पक्षों की ओर से मध्यस्थ नियुक्त करता है।

क्या किसी मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है?

किसी मध्यस्थ की नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है यदि मध्यस्थ पक्षपातपूर्ण प्रतीत होता है, उसके पास अपेक्षित योग्यता या अनुभव नहीं है, उसका किसी पक्ष के साथ कोई अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष संबंध है, आदि। 

अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत आवेदन दायर करने के बाद क्या कोई पक्षकार मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है?

जब अधिनियम की धारा 11(6) के तहत उच्च न्यायालय में मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए आवेदन दायर किया जाता है, तो मध्यस्थ नियुक्त करने का पक्षकार का अधिकार समाप्त हो जाता है। उच्च न्यायालय को धारा 11(6) के तहत शक्ति का प्रयोग करके मध्यस्थ नियुक्त करने का एकमात्र अधिकार है। मध्यस्थता समझौते की शर्तों के अनुसार मध्यस्थ की नियुक्ति न करने का क्या प्रभाव होता है?

मेसर्स दक्षिण शेल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम गीता एस जौहरी (2012) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मध्यस्थ समझौते की शर्तों के अनुसार मध्यस्थ की नियुक्ति करने से इनकार करना मध्यस्थ की नियुक्ति में विफलता के समान होगा। समझौते के तहत मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार समाप्त हो गया है। इस मामले में, प्रतिवादी मध्यस्थता समझौते की शर्तों के अनुसार मध्यस्थ नियुक्त करने में विफल रहा था। इसका अर्थ यह है कि प्रतिवादी का अधिकार समाप्त हो गया है। 

मध्यस्थ की नियुक्ति पूर्व दृष्टया वैध होनी चाहिए अथवा धारा 11(6) के तहत अधिकार क्षेत्र रखने वाले न्यायालय को संतुष्ट करना चाहिए। नियुक्ति को तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा यह अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत भी नहीं आएगा। 

संदर्भ

 

भारतीय अनुबंधों में शर्तों और वारंटियों को समझना

यह लेख लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, निगोशिएशन और डिस्प्यूट रेजोल्यूशन में डिप्लोमा कर रहे Sumit Kumar द्वारा लिखा गया है। इस लेख मे भारतीय अनुबंधों में शर्तों और वारंटियों, भारतीय अनुबंध की भूमिका और इनसे संबंधित कमामलों की चर्चा विस्तृत रूप मे की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

इस लेख में शर्तों और वारंटियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी, साथ ही कानूनी प्रभावों और उपलब्ध उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 और माल विक्रय अधिनियम, 1930 के तहत शर्तों और वारंटियों को नियंत्रित करने वाले प्रासंगिक कानूनों के बारे में बताना महत्वपूर्ण है। नवीनतम मामले के साथ-साथ कानूनों के अंतर्गत प्रासंगिक धाराओं पर भी संक्षेप में चर्चा की जाएगी। लेख में अनुबंध के तत्वों जिन पर अनुबंध करते समय विचार किया जाना आवश्यक है और उसके महत्व का भी विश्लेषण किया जाएगा। विवरणों का विश्लेषण करने के बाद, अनुबंध की पूर्ति हो जाती है क्योंकि पक्षों के बीच संबंध स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हो जाता है। 

किसी भी हस्तांतरण या लेन-देन का आधार अनुबंध ही होता है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि पक्ष समझौते का पालन करें और तय किए गए वादे को पूरा करें। शर्तें और वारंटियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि वे अनुबंध की शर्तों को परिभाषित करती हैं। इनके बीच भ्रमित होना बहुत आसान है क्योंकि ये एक दूसरे के समान लगते हैं, लेकिन वास्तव में इनके कानूनी अर्थ अलग-अलग हैं। इन दोनों शब्दों के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है। एक बार अंतर समझ में आ जाए तो शर्तें स्पष्ट हो जाएंगी और अनुबंध का निष्पादन प्रभावित नहीं होगा। 

शर्तें और वारंटी एक साथ चलते हैं, और अनुबंध करने वाले पक्ष उनके बीच के अंतर्सम्बन्ध को नहीं समझ पाते हैं। शर्तों में, यदि शर्तों का उल्लंघन किया जाता है, तो इससे अनुबंध की समाप्ति और क्षतिपूर्ति हो सकती है, जबकि वारंटी में केवल क्षतिपूर्ति के लिए दावा किया जाता है। 

शर्तें और वारंटी

शर्त

शर्त शब्द उन अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है जिन्हें किसी अनुबंध में पूरा किया जाना आवश्यक होता है। यदि निर्धारित शर्तों या प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है, तो इससे अनुबंध के निष्पादन में बाधा उत्पन्न होगी। ये बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये किसी भी अनुबंध और उसके निष्पादन की नींव रखते हैं। विभिन्न प्रकार की शर्तों पर नीचे चर्चा की गई है: 

पूर्ववर्ती (प्रेसिडेंट) शर्त

पूर्ववर्ती शर्तें वे शर्तें हैं जिन्हें अनुबंध की समय-सीमा समाप्त होने से पहले पूरा किया जाना चाहिए। यदि ये शर्तें पूरी नहीं की जातीं तो अनुबंध लागू नहीं होगा। 

अनुवर्ती (सबसीक्वेंट) शर्त

अनुवर्ती शर्तें वे शर्तें हैं, जो यदि घटित होती हैं, तो अनुबंध के प्रभावी होने पर वह स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

समवर्ती (कंकर्रेंट) शर्त

समवर्ती शर्तें वे हैं जहाँ पारस्परिक दायित्वों का पालन एक साथ किया जाना चाहिए।

वारंटी

वारंटी अनुबंध में द्वितीयक शर्तें हैं, अर्थात वे अतिरिक्त शर्तें हैं जो मुख्य अनुबंध की पूरक (सप्लीमेंट्री) हैं। वारंटी के उल्लंघन की स्थिति में, प्रभावित पक्ष को हुई हानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा करने का अधिकार है। हालाँकि, वारंटी का उल्लंघन होने पर अनुबंध स्वतः ही समाप्त नहीं हो जाता है। वारंटी की प्रकृति और उनसे जुड़ी अपेक्षाओं को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है। 

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वारंटी के सभी उल्लंघनों को समान रूप से नहीं माना जाता है। उल्लंघन की गंभीरता उसके परिणाम निर्धारित करती है। सामान्यतः, किसी छोटे उल्लंघन से अनुबंध को समाप्त करने का अधिकार नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी भी अनुबंध पक्ष का प्राथमिक उद्देश्य लेनदेन की स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करना है। यद्यपि छोटे-मोटे उल्लंघनों से असुविधा या निराशा हो सकती है, लेकिन वे अनुबंध के मूल उद्देश्य को महत्वपूर्ण रूप से कमजोर नहीं करते हैं। 

हालाँकि, ऐसे मामलों में जहां वारंटी का उल्लंघन पर्याप्त या मौलिक है, प्रभावित पक्ष के पास अनुबंध को समाप्त करने का विकल्प हो सकता है। मौलिक उल्लंघन तब होता है जब उल्लंघन अनुबंध के मूल तक पहुंच जाता है और निर्दोष पक्ष को उन लाभों से वंचित कर देता है जिनकी उन्हें उम्मीद थी। ऐसे मामलों में, गैर-उल्लंघन करने वाले पक्ष के हितों की रक्षा करने तथा उन्हें हुई भारी हानि की भरपाई के लिए अनुबंध को समाप्त करना आवश्यक हो सकता है। 

अनुबंधात्मक संबंधों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए वारंटियों की प्रकृति को समझना, जिसमें मामूली और मौलिक उल्लंघनों के बीच का अंतर भी शामिल है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पक्षों को उल्लंघन के संभावित जोखिमों और परिणामों का आकलन करने तथा अपने अधिकारों और उपायों के बारे में सूचित निर्णय लेने की अनुमति देता है। 

शर्तों और वारंटियों में भारतीय अनुबंध की भूमिका

यह समझने से पहले कि भारतीय अनुबंध शर्तों और वारंटियों में क्या भूमिका निभाते हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है कि वैध अनुबंध क्या है? 

एक वैध अनुबंध के सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है कानूनी संबंध बनाने का आशय रखना है। एक बार जब ऐसा हो जाता है, तो फिर प्रस्ताव और स्वीकृति आती है; उसके बाद मन की बैठक होनी चाहिए, जिसका अर्थ समान अर्थ में समान चीजें हैं। एक बार जब अनुबंध का आधार निर्धारित हो जाता है, तो उसके बाद प्रतिफल का एक महत्वपूर्ण पहलू आता है। प्रतिफल का अर्थ है ऐसी वस्तु जिसका कानून की दृष्टि में मूल्य हो या वह वस्तु जो किसी व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन के बदले प्राप्त हो। 

एक वैध अनुबंध के आवश्यक तत्वों को समझने के बाद, पक्षों के बीच अनुबंधात्मक संबंध की संरचना करना आसान हो जाता है। निम्नलिखित प्रस्ताव समझौते को संरचना देने में मदद करते हैं। 

अनुबंध प्रारूपण (ड्राफ्टिंग)

अनुबंध तैयार करते समय शर्तों और वारंटियों के बीच अंतर को समझना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि बाद में पक्षों के बीच किसी प्रकार का भ्रम या विवाद न हो। यदि दायित्वों को स्पष्ट रूप से समझा जा सके तो इससे अनुबंध का शांतिपूर्ण निष्पादन होगा। 

जोखिम प्रबंधन

जोखिम प्रबंधन से संबंधित मामलों में, शर्तों और वारंटियों को समूहीकृत करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अनुबंध के उल्लंघन से जुड़े जोखिमों को कम करने या प्रबंधित करने में मदद मिलेगी और साथ ही अनुबंध के समग्र प्रदर्शन पर इसके प्रभाव को भी कम करने में मदद मिलेगी। 

विवाद समाधान

विवाद समाधान से संबंधित मामलों में, शर्त और वारंटी के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे विभिन्न प्रकार के उल्लंघनों के लिए उचित उपायों के साथ विभिन्न तंत्रों के माध्यम से विवाद को हल करने में मदद मिलेगी। 

वाणिज्यिक (कमर्शियल) लेनदेन

वाणिज्यिक लेनदेन से संबंधित मामलों में शर्तें और वारंटी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि वे सुचारू व्यावसायिक संचालन में मदद करती हैं, जिससे विश्वास और विश्वसनीयता सुनिश्चित होती है। एक बार जब लेन-देन का आधार स्पष्ट हो जाता है, तो कानूनी ढांचे के माध्यम से उल्लंघनों को संबोधित करना आसान और सुविधाजनक हो जाता है। 

शर्तों और वारंटियों के बीच अंतर को समझने से, भारतीय अनुबंध अनुबंधात्मक दायित्वों को प्रबंधित करने में मदद करेगा और समझौतों को सुव्यवस्थित करने में भी मदद करेगा। 

शर्त के उल्लंघन के परिणाम

समाप्ति का अधिकार: जब किसी अनुबंध की किसी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो पीड़ित पक्ष (वह पक्ष जिसने अनुबंध का उल्लंघन नहीं किया है) को सामान्यतः अनुबंध को समाप्त करने का अधिकार होता है। इसका अर्थ यह है कि पीड़ित पक्ष अनुबंध को समाप्त करने का विकल्प चुन सकता है और अनुबंध के तहत अपने दायित्वों से मुक्त हो सकता है। 

  • तत्काल समाप्ति: कुछ मामलों में, किसी शर्त का उल्लंघन इतना गंभीर हो सकता है कि इससे पीड़ित पक्ष को अनुबंध को तत्काल समाप्त करने का अधिकार मिल जाता है। उदाहरण के लिए, यदि बेचने वाला ऐसी वस्तुएं वितरित करता है जो सहमत मूल्य से काफी भिन्न होती हैं, तो क्रेता को अनुबंध को तुरंत समाप्त करने का अधिकार हो सकता है। 
  • समाप्ति की सूचना: अन्य मामलों में, पीड़ित पक्ष को अनुबंध समाप्त करने से पहले उल्लंघन करने वाले पक्ष को समाप्ति की सूचना देनी पड़ सकती है। सूचना अवधि अनुबंध में निर्दिष्ट की जा सकती है या कानून द्वारा निर्धारित की जा सकती है। 

क्षतिपूर्ति का अधिकार: अनुबंध समाप्त करने के अधिकार के अतिरिक्त, पीड़ित पक्ष शर्त के उल्लंघन के कारण हुई हानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा भी कर सकता है। क्षतिपूर्ति का उद्देश्य उल्लंघन के परिणामस्वरूप पीड़ित पक्ष को हुई वित्तीय हानि की भरपाई करना है। 

  • क्षतिपूर्ति के प्रकार: पीड़ित पक्ष को विभिन्न प्रकार की क्षतिपूर्ति मिल सकती है, जिनमें शामिल हैं:
    • प्रतिपूरक (कंपनसेटरी) क्षतिपूर्ति: इन क्षतिपूर्ति का उद्देश्य पीड़ित पक्ष को उस स्थिति में बहाल करना है, जिसमें वे तब होते यदि अनुबंध सहमति के अनुसार निष्पादित किया गया होता है।
    • परिणामी क्षतिपूर्ति: ये क्षतिपूर्ति उन हानियों को शामिल करती है जो अनुबंध के उल्लंघन का प्रत्यक्ष और पूर्वानुमानित परिणाम हैं।
    • नाममात्र क्षतिपूर्ति: यह क्षतिपूर्ति तब की जाती है जब पीड़ित पक्ष के साथ कोई कानूनी गलत हुआ हो, लेकिन उसे कोई वास्तविक वित्तीय नुकसान न हुआ हो। 

अन्य उपाय: अनुबंध समाप्त करने और क्षतिपूर्ति का दावा करने के अधिकार के अलावा, शर्त के उल्लंघन की स्थिति में पीड़ित पक्ष के पास अन्य उपाय भी उपलब्ध हो सकते हैं। इन उपायों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं: 

  • विशिष्ट निष्पादन: कुछ परिस्थितियों में, पीड़ित पक्ष न्यायालय से आदेश प्राप्त कर सकता है, जिसमें उल्लंघन करने  पक्ष को अनुबंध के तहत अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए बाध्य किया जा सके।
  • निषेधाज्ञा (इंजंक्शन): निषेधाज्ञा एक न्यायालय आदेश है जो उल्लंघन करने वाले पक्ष को अनुबंध का उल्लंघन जारी रखने या आगे ऐसी कार्रवाई करने से रोकता है जिससे स्थिति और खराब हो सकती है। 
  • निरसन (रिसेशन): निरसन एक न्यायालय आदेश है जो अनुबंध को रद्द कर देता है और पक्षों को उस स्थिति में बहाल कर देता है जिसमें वे अनुबंध में प्रवेश करने से पहले थे।

किसी शर्त के उल्लंघन के परिणाम गंभीर हो सकते हैं, और किसी अनुबंध के दोनों पक्षों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे उल्लंघन की स्थिति में अपने अधिकारों और दायित्वों के बारे में जागरूक रहें। 

मामले 

अशोक कुमार बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2023) के मामले में, यह माना गया है कि दावे को अस्वीकार करने के लिए शर्तों का उल्लंघन मौलिक उल्लंघन की प्रकृति का होना चाहिए। इस मामले में मुद्दा वाहन चोरी से संबंधित था लेकिन बीमा कंपनी ने बीमा कंपनी को देरी से सूचित करने का हवाला देते हुए दावा अस्वीकार कर दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि यदि कुछ लापरवाही हुई भी थी, तो यह बीमा दावे को पूरी तरह से अस्वीकार करने के लिए शर्त का मौलिक उल्लंघन नहीं था। इसलिए, 75% तक का दावा गैर-मानक आधार पर दिया जाना चाहिए। 

उपरोक्त मामले के अलावा, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की एक लंबी श्रृंखला है जिसके अनुसार शर्त का कोई भी उल्लंघन मौलिक उल्लंघन की प्रकृति का होना चाहिए ताकि दावेदार को किसी भी राशि से वंचित न किया जा सके। [देखें मनजीत सिंह बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य (2018); बी.वी. नागराजू बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, डिवीजनल ऑफिसर, हसन, [(1996) 4 एससीसी 647] नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम स्वर्ण सिंह और 9 अन्य (2004) और लखमी चंद बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस, (2016) 

सुझाव (माल विक्रय अधिनियम)

इस लेख के सुझाव भाग में माल विक्रय अधिनियम, 1930 का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। शर्तों और वारंटियों से संबंधित धाराएं माल विक्रय अधिनियम, 1930 की धारा 11 से धारा 17 तक शर्तों और वारंटियों के लिए बताई गई हैं।  

उपरोक्त धाराओं के अलावा, कैविएट एम्प्टर के नियम की अवधारणा भी है, जिसका मूल रूप से अर्थ है कि खरीदार सावधान रहें या खरीदार को सामान का ध्यान रखना चाहिए। 

  1. धारा 16(1) के तहत खरीद के लिए उत्पाद की उपयुक्तता
  2. विवरण के अनुसार बेचा गया सामान 
  3. धारा 16(2) के अंतर्गत माल की व्यापारिक गुणवत्ता
  4. व्यापरिक नाम
  5. धारा 16(3) के तहत व्यापार उपयोग
  6. नमूना निरीक्षण
  7. धोखा

कैविएट एम्प्टर के नियम पर नवीनतम मामलों में से एक पी. किशोर कुमार बनाम विट्ठल के. पाटकर सिविल अपील संख्या (2011) है, जहां माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि “कैविएट एम्प्टर का सिद्धांत खरीदार को उस शीर्षक की सावधानीपूर्वक जांच करने का कर्तव्य सौंपता है जिसे वह खरीद रहा है, लेकिन वर्तमान मामले में वादी ने स्पष्ट रूप से ऐसे कर्तव्य से परहेज किया है जिसके लिए कानून उसकी मदद नहीं कर सकता है।” 

सीमा शुल्क आयुक्त (निवारक) बनाम मेसर्स आफ्लोट टेक्सटाइल्स (आई) प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य के मामले में, जाली विशेष आयात अनुज्ञप्ति (लाइसेंस) के तहत सोना खरीदने के लिए खरीदार पर जुर्माना लगाया गया है। खरीदार ने कहा है कि उसे जालसाजी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जबकि राजस्व विभाग ने कैविएट एम्प्टर के नियम पर भरोसा किया है और कहा है कि खरीदार को माल खरीदते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी, क्योंकि उससे जुड़े जोखिमों की जिम्मेदारी भी उसी की है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि “क्या खरीदार ने अपने विशेष ज्ञान में अनुज्ञप्ति की वास्तविकता के बारे में कोई जांच की थी।” उसे यह साबित करना होगा कि उसने खरीदारी करते समय एसआईएल की वास्तविकता जानने के लिए जांच की थी और सावधानी बरती थी। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो परिणाम भुगतने होंगे।”

यह ध्यान देने योग्य है कि, व्यापार के तरीकों में विकास और परिवर्तन के कारण, खरीदार के लिए खरीदने से पहले प्रत्येक उत्पाद की जांच करना संभव नहीं है। आज बाजार नए उत्पादों से भरे पड़े हैं जिनमें विशिष्ट गुण हैं और ग्राहकों से प्रत्येक उत्पाद की जांच करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। प्रतिमान बदलाव के कारण, आज के परिदृश्य में कैविएट एम्प्टर का नियम अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। 

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में, यह कहा जा सकता है कि शर्तों और वारंटियों के संबंध में भारतीय अनुबंध की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नियम और शर्तों, निष्पादन और विवाद समाधान तंत्र को परिभाषित करता है। एक बार सभी मुद्दों का समाधान हो जाए तो इससे व्यवसाय का संचालन सुचारू हो जाएगा और कानूनी सुरक्षा भी मिलेगी। 

संदर्भ