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हमें संविधान की ज़रूरत क्यों है

यह लेख Adhila Muhammed Arif द्वारा लिखा गया है और Adv. Devshree Dangi द्वारा इसमें संशोधन किया गया है। यह लेख यह समझाने का प्रयास करता है कि संविधान क्या है और आधुनिक विश्व में इसकी प्रासंगिकता क्या है। इसमें संविधान के उद्देश्यों का भी वर्णन किया गया है। इसमें विभिन्न देशों के संविधानों और संविधान पर प्रौद्योगिकी के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

बी.आर. अंबेडकर के शब्दों में, “संविधान महज वकीलों का दस्तावेज नहीं है; यह जीवन का माध्यम है, और इसकी आत्मा हमेशा युग की आत्मा होती है।” आधुनिक विश्व में संविधान की उपस्थिति अत्यंत प्रासंगिक हो गई है। ऐसा देश मिलना अत्यंत दुर्लभ है, विशेषकर लोकतांत्रिक देश, जो संविधान के बिना काम करता हो। प्रत्येक देश में नागरिकों के हितों को सदैव उचित महत्व दिया जाना चाहिए तथा सत्ता में बैठे लोगों की मनमानी कार्रवाइयों से उनकी रक्षा की जानी चाहिए। किसी देश में राजनीतिक स्थिरता के लिए उसकी संप्रभुता अक्षुण्ण (इंटेक्ट) होनी चाहिए। अर्थात्, राज्यों और  प्रजा के बीच तथा प्रजा और प्रजाओं के बीच संबंधों को ठीक से परिभाषित किया जाना चाहिए। संविधान मूलतः किसी राज्य की राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने का एक साधन है। 

संविधान क्या है?

संविधान मूलतः एक राजनीतिक समुदाय के मूल सिद्धांतों और कानूनों का समुच्चय है, जो या तो एक राष्ट्र या एक राज्य है, जो अपनी सरकार की शक्तियों और कर्तव्यों और अपने नागरिकों को गारंटीकृत अधिकारों को निर्धारित करता है। यह सरकारी निकायों की संरचना और संचालन तथा प्रणाली के राजनीतिक सिद्धांतों को निर्धारित करता है। लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “किसी राज्य या राष्ट्र का संविधान कानूनों या नियमों से मिलकर बना होता है जो उसकी सरकार के स्वरूप तथा नागरिकों के प्रति उसके संबंधित अधिकारों और कर्तव्यों तथा सरकार के प्रति नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करते हैं।” सामान्यतः अन्य सभी कानून संविधान के अधीन होते हैं। अर्थात्, अन्य सभी कानूनों को वैध होने के लिए संविधान के अनुरूप होना चाहिए। 

जब कोई सरकार पूरी तरह संविधान के अनुसार संचालित और सीमित होती है, तो हम कह सकते हैं कि उस राजनीतिक समाज की व्यवस्था संवैधानिक है। संविधान द्वारा सीमित सरकार की अवधारणा को संविधानवाद कहा जाता है। संवैधानिक प्रणालियाँ हमेशा लोकतांत्रिक नहीं होतीं, क्योंकि गैर-लोकतांत्रिक राष्ट्र भी अपने संविधान बना सकते हैं और उनका पालन कर सकते हैं। वह राजनीतिक व्यवस्था जो गैर-लोकतांत्रिक है लेकिन संवैधानिकता का पालन करती है, उसे संवैधानिक कुलीनतंत्र कहा जाता है। 

संविधान का इतिहास

संविधान, जो राज्य और शासन प्रणाली की स्थापना करने वाला सर्वोच्च कानून है, का विचार प्राचीन काल से चला आ रहा है। फिर भी, कानून और सरकार का विचार प्राचीन ग्रीस और रोम में पहले से ही विकसित हो चुका था, हालांकि लिखित दस्तावेज के रूप में संविधान की धारणा बाद की शताब्दियों में ही सामने आई है। 1787 में अपनाए गए संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान को अक्सर इस प्रक्रिया में प्रगति के परिभाषित दस्तावेज़ के रूप में उद्धृत किया जाता है। इसने संघीय सरकार की प्रणाली तथा नियंत्रण एवं संतुलन की प्रणाली भी स्थापित की तथा संघवाद और न्यायपालिका जैसे विचार सामने रखे। इसके कारण, अन्य देशों ने लिखित संविधान अपनाने में अमेरिकी संविधान की सफलता का अनुसरण किया। भारत, एक विशाल एवं बहुसांस्कृतिक देश, इसका एक और उदाहरण है। दरअसल, 1950 में तैयार इसका संविधान दुनिया के सबसे लंबे और सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है। इसमें अन्य प्रणालियों के कुछ पहलुओं को भी शामिल किया गया है, जैसे ब्रिटिश संसदीय प्रणाली, अमेरिका की संघीय प्रणाली और आयरलैंड के राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत। आधुनिक संविधान में ऐसे प्रावधान हैं जो राज्य के संगठन, नागरिकों के अधिकारों और देश के मूल सिद्धांतों को परिभाषित करते हैं। यद्यपि इन दस्तावेजों के विशिष्ट प्रावधान काफी भिन्न हैं, तथापि उन सभी का लक्ष्य एक ही है: वे न्यायोचित एवं उपयुक्त प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करेंगे। यही कारण है कि दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों के संविधान बहुत प्रभावी माने जाते हैं, क्योंकि उनमें मानवाधिकारों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है और लोगों के बीच सामाजिक और आर्थिक अंतर पर भी ध्यान दिया गया है। 

संविधान का उद्देश्य

सरकार का बुनियादी ढांचा तैयार करना

संविधान वह ढांचा है जिसके अंतर्गत किसी राष्ट्र का शासन किया जाता है। संविधान सरकार के ढांचे को समझाने और सरकार के विभिन्न अंगों और शाखाओं, जैसे संसद, राष्ट्रपति पद और न्यायिक प्रणाली, की शक्तियों का सीमांकन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें केन्द्र सरकार की स्थिति को भी रेखांकित किया गया है तथा यह भी बताया गया है कि इसे राज्यों या प्रान्तों जैसे अन्य उप-राष्ट्रीय खंडों से किस प्रकार जोड़ा जा सकता है। इससे एक स्थान पर शक्ति के संचय को रोकने तथा दक्षताओं और अधिकार क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने में मदद मिलती है। 

अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए

अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा संविधान की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक है। यह अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता, संघ बनाने और समान सुरक्षा जैसी बुनियादी नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है। वे राज्य के अतिरेक के विरुद्ध एक बाधा के रूप में भी काम करते हैं तथा व्यक्तियों और समूहों के प्रति अनुचित व्यवहार को रोकते हैं। इस प्रकार, जब इन अधिकारों को संविधान में शामिल कर लिया जाता है, तो इनका आसानी से उल्लंघन नहीं किया जा सकता क्योंकि ये संवैधानिक रूप से संरक्षित होते हैं। 

यह सुनिश्चित करना कि सभी को न्याय मिले और समान अधिकार प्रदान किए जाएं

संविधान की अवधारणाओं को सर्वोच्च स्तर तक ले जाना एक निष्पक्ष समाज की स्थापना का साधन है। यह सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि उनके साथ बिना किसी भेदभाव के समान व्यवहार किया जाए। यह उचित प्रक्रिया और कानून के शासन के प्राथमिक सिद्धांतों को निर्धारित करता है तथा न्याय तक समान पहुंच के लिए औपचारिक आधार प्रदान करता है। इसके अलावा, यह समाज में जातिगत भेदभाव और अन्याय तथा दूसरों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को दूर करने के लिए कुछ सकारात्मक कार्रवाई या अन्य चीजें निर्धारित करता है। 

केंद्रीय और राज्य कानूनों के लिए आधार स्थापित करना

संविधान एक ढांचे के रूप में कार्य करता है जिसके अंतर्गत अन्य सभी कानून बनाए जाते हैं। यह उस ढांचे को परिभाषित करता है जिसके अंतर्गत विधायिका कानून बना सकती है। न्यायपालिका संविधान के विरुद्ध किसी भी कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इसका अर्थ यह है कि सभी कानून संविधान में निहित आधारभूत सिद्धांतों और शासन मूल्यों के अनुरूप हैं। 

एक स्थिर राजनीतिक वातावरण और सीमाएँ बनाना

यह माना जाता है कि एक अच्छी तरह से निर्मित संविधान राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है क्योंकि यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की रूपरेखा स्थापित करता है। यह शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण के साधन प्रदान करता है, यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारी अन्य अधिकारियों पर हावी न हो जाएं, तथा इसमें विवाद समाधान के तरीके शामिल हैं। यह राजनीतिक संकटों और परिवर्तनों की संभावनाओं को न्यूनतम करता है क्योंकि यह शासन पर एक सुसंगत मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसके अलावा, यह सरकार के अधिकारों को सीमित करके उसकी शक्तियों पर नियंत्रण और संतुलन स्थापित करता है। 

संविधान के प्रकार

निम्नलिखित कुछ विभिन्न श्रेणियाँ हैं जिनके द्वारा संविधानों को वर्गीकृत किया जा सकता है:

लिखित और अलिखित

संविधान को आमतौर पर एक ही दस्तावेज़ में या विभिन्न दस्तावेज़ों में संहिताबद्ध (कोडिफाइड) किया जाता है जिन्हें सामूहिक रूप से संविधान कहा जा सकता है। विश्व के अधिकांश संविधान एक ही दस्तावेज़ में लिखित या संहिताबद्ध हैं। भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है, अर्थात् इसे एक ही दस्तावेज़ में संहिताबद्ध किया गया है। ये औपचारिक लिखित दस्तावेज हैं जिनमें देश के केंद्रीय कानूनों, सरकार के स्वरूपों और उस देश के नागरिकों के लिए कानूनी प्राधिकारियों की रूपरेखा शामिल होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी जैसे कुछ अन्य देश भी हैं जिनके पास लिखित संविधान है। अलिखित संविधान लिखित रूप में नहीं होते हैं, और इसलिए उन्हें एक ही दस्तावेज़ में संकलित नहीं किया जाता है। दूसरी ओर, अधिकार गतिशील होते हैं और पत्थर की लकीर नहीं होते, बल्कि वे समय के साथ उदाहरणों, संस्कृति, प्रयोग, कानूनी मामलों और संविधि के माध्यम से विकसित होते हैं। यद्यपि ये सिद्धांत लिखित नहीं हैं, फिर भी इन्हें संवैधानिक माना जाता है क्योंकि ये देश के शासन को शामिल करते हैं। 

कुछ देशों के संविधान अलिखित या असंहिताबद्ध हैं, उदाहरण के लिए यूनाइटेड किंगडम का संविधान हैं। यूनाइटेड किंगडम को लंबे समय से असंहिताबद्ध संविधान वाले देश का विश्व का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता रहा है। यूनाइटेड किंगडम में, ऐतिहासिक संवैधानिक दस्तावेज, संवैधानिक महत्व के न्यायिक उदाहरण, संवैधानिक स्थिति के संसदीय क़ानून, तथा संवैधानिक रीति-रिवाज और परंपराएं सामूहिक रूप से उसके संविधान का प्रतिनिधित्व करती हैं। अन्य देश जिनके संविधान में आंशिक रूप से अलिखित विशेषताएं हैं, उनमें न्यूजीलैंड, इजरायल और सऊदी अरब शामिल हैं। हालांकि, इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि अधिकांश देशों में लिखित संविधान का अस्तित्व भी अलिखित संवैधानिक परंपरा के घटकों के साथ संयुक्त है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक दल और शासन से संबंधित उनके कार्य, हालांकि संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं हैं, लेकिन अब उन्हें कई राजनीतिक प्रणालियों का महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। दूसरी ओर, इनमें से कुछ देशों के पास पूर्णतः लिखित संविधान नहीं हो सकता है, लेकिन फिर भी उनके पास कुछ कानून या कुछ दस्तावेज होंगे जो उनकी संवैधानिक प्रणाली के विशिष्ट भागों को निर्धारित करते हैं। 

कठोर और लचीला

कठोर संविधानों में संशोधन करना अत्यंत कठिन होता है, जबकि लचीले संविधानों में संशोधन करना कठिन नहीं होता हैं। कठोर संविधानों के लिए संशोधन प्रक्रिया सामान्य कानून में संशोधन के समान नहीं है। जिन संविधानों में संशोधन करना कठिन होता है उन्हें कठोर कहा जाता है, जबकि जिन संविधानों में आसानी से संशोधन किया जा सकता है उन्हें लचीला कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत की तरह कठोर संविधान में संशोधन करना चुनौतीपूर्ण है और इसके प्रावधानों में परिवर्तन के लिए विशेष प्रावधान हैं, जिससे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा होती है। दूसरी ओर, यूनाइटेड किंगडम द्वारा प्रस्तुत लचीले संविधानों को विधायी प्रक्रियाओं के माध्यम से परिवर्तित किया जा सकता है और इस प्रकार उन्हें वर्तमान बदलते समय के अनुरूप परिवर्तित किया जा सकता है। हालांकि, भारतीय संविधान सहित अधिकांश संविधानों को लचीलेपन और कठोरता दोनों के बीच संतुलित माना जाता है, अर्थात मौलिक अधिकारों को अलग रखते हुए, संशोधन की अनुमति दी जाती है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि आदर्श संविधान दोनों विशेषताओं का मिश्रण है। भारत में संविधान संशोधन प्रक्रिया यद्यपि अलग है, फिर भी बहुत कठिन नहीं है। इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। 

एकात्मक और संघीय

सरकार की शक्तियों के विभाजन और शक्तियों के केंद्रीकरण की स्तर के आधार पर संविधान को एकात्मक या संघीय में वर्गीकृत किया जाता है। एकात्मक प्रणालियों में, केंद्रीय सरकार सर्वोच्च होती है और निचली सरकारों की सभी शक्तियां केंद्रीय सरकार द्वारा उन्हें सौंप दी जाती हैं। दूसरी ओर, संघीय व्यवस्था में, केन्द्र सरकार और निचली सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है। संघीय व्यवस्था में केन्द्र सरकार निचली सरकारों की शक्तियां नहीं छीन सकती है। भारतीय संविधान ने भारतीय राजनीतिक प्रणाली को अर्ध-संघीय बनाया है, अर्थात, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है, जिसमें केंद्र सरकार स्पष्ट रूप से अधिक शक्तिशाली है। 

संसदीय और राष्ट्रपति

दुनिया के अधिकांश देशों में या तो संसदीय या राष्ट्रपति शासन प्रणाली है, जिसका निर्णय उनके संविधान द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति की सरकार में कार्यपालिका शाखा विधायिका से पूर्णतः पृथक होती है, जबकि संसदीय सरकार में कार्यपालिका शाखा विधायिका से जुड़ी होती है। भारतीय संविधान ने भारत को संसदीय शासन प्रणाली के अनुरूप बनाया है। 

निर्देशात्मक और प्रक्रियात्मक

प्रकृति और उद्देश्य के आधार पर संविधानों को प्रक्रियात्मक और निर्देशात्मक में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रक्रियात्मक संविधान सरकारी संस्थाओं की कानूनी और राजनीतिक संरचनाओं को परिभाषित करते हैं और सरकार की शक्ति की सीमाएँ निर्धारित करते हैं। ऐसा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किया जाता है। ऐसी स्थिति में, जहां संविधान निर्माता उन मूल्यों पर आम सहमति पर नहीं पहुंच पाते, जिनके साथ राज्य को जुड़ना चाहिए या जिनके लिए काम करना चाहिए, वहां संविधान को एक प्रक्रियात्मक दस्तावेज तक सीमित रखना बेहतर है। प्रक्रियात्मक संविधान का एक उदाहरण कनाडा का संविधान, 1982 है। कनाडा का संविधान एक अच्छे समाज की परिकल्पना नहीं करता है। यह केवल विवादों और नीतिगत मुद्दों को निपटाने के लिए प्रतिबद्ध है। निर्देशात्मक संविधान राष्ट्र निर्माण की अवधारणा को नहीं छूते है। दूसरी ओर, निर्देशात्मक संविधान राज्य की पहचान और लक्ष्यों पर जोर देते हैं। संविधान निर्माता कुछ सामान्य मूल्यों और आकांक्षाओं की कल्पना करते हैं और उन्हें राज्य पर थोपते हैं। राज्य को सामाजिक-आर्थिक मामलों पर कानून बनाते समय इन मूल्यों और लक्ष्यों पर विचार करना चाहिए। दक्षिण अफ़्रीकी संविधान, 1996 एक निर्देशात्मक संविधान का उदाहरण है। किसी संविधान को किसी एक श्रेणी में ही फिट होने की आवश्यकता नहीं है। कई संविधानों में निर्देशात्मक और प्रक्रियात्मक दोनों विशेषताएं होती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय संविधान में निर्देशात्मक और प्रक्रियात्मक दोनों ही तत्व सम्मिलित हैं। 

संविधान के कार्य

संविधान के कुछ कार्य निम्नलिखित हैं: 

राजनीतिक समुदाय की सीमाओं को परिभाषित करना

संविधान राष्ट्र या राज्य की भौगोलिक और बाह्य-क्षेत्रीय सीमाओं को परिभाषित करता है। यह यह भी परिभाषित और मानदंड निर्धारित कर सकता है कि किसे उस राष्ट्र का ‘नागरिक’ कहा जा सकता है। इस प्रकार, यह राष्ट्र-राज्य के भौगोलिक क्षेत्र तथा भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और लोगों पर उसके नियंत्रण को परिभाषित करता है। 

इसके अलावा, संविधान के माध्यम से सरकार की शक्ति की सीमा स्थापित की जाती है। यह परिभाषित करता है कि कौन इसके प्राधिकार के अंतर्गत आता है तथा कौन इसके कानूनों और विनियमों के अधीन है। यहां नागरिकता, निवासी स्थिति और किसी विशिष्ट क्षेत्र पर राज्य की संप्रभुता का स्तर जैसी अवधारणाओं पर विचार किया जाता है। संविधान द्वारा प्रदत्त ये मापदंड क्षेत्रीय विवादों को खत्म करने के साथ-साथ राजनीतिक अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट मानचित्र तैयार करने में भी मदद करते हैं। 

राजनीतिक समुदाय के अधिकार की मूल संरचना को परिभाषित करना

राजनीतिक समुदाय की कुछ आवश्यक विशेषताएं होती हैं, जैसे कि संविधान द्वारा निर्धारित सरकार का स्वरूप, जो उसके कामकाज के लिए मौलिक होती हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान उस आधारभूत ढांचे को निर्धारित करता है जिस पर भारतीय राजनीतिक प्रणाली कार्य करती है, जो संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति, शक्तियों का पृथक्करण, संघवाद, लोकतंत्र, कल्याणकारी राज्य आदि को स्थापित करता है। 

राजनीतिक समुदाय के अधिकार को परिभाषित करना

अधिकांश संविधान यह भी घोषित करते हैं कि राजनीतिक समुदाय की संप्रभुता किस पर निर्भर है। भारतीय संविधान ने अपनी प्रस्तावना में घोषित किया है कि भारत की संप्रभुता उसके लोगों पर टिकी हुई है। संविधान की भूमिका सरकारों के गठन और शक्तियों के आवंटन के माध्यम से एक राजनीतिक समुदाय की संप्रभुता को निर्धारित करने में प्रारंभिक भूमिका निभाना है। यह सरकार की संरचनाओं, विशेषकर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, सरकार के तीन अंगों तथा उनके कार्यों को परिभाषित करता है। 

इसके अतिरिक्त, यह सरकार की शक्ति का आधार भी स्थापित करता है – जनता से, अधिकृत सम्राट से, या दैवी विधि से। इसमें उन शर्तों का भी उल्लेख किया गया है जिनके अंतर्गत सरकारी कार्रवाई की जा सकती है तथा इसमें सरकार के विवेकाधिकार पर अंकुश लगाने तथा व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास किया गया है। इसके कारण, संविधान प्राधिकार के संदर्भ में संरचना में अस्पष्टता को समाप्त करता है, जिससे उत्तरदायित्व, दृश्यता और व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है। 

राजनीतिक समुदाय के आदर्शों को परिभाषित करना

कुछ ऐसे आदर्श होते हैं जिनकी आकांक्षा राजनीतिक समुदाय के संविधान निर्माता अपने देश के लिए रखते हैं, जैसे न्याय, समानता, निष्पक्षता आदि, जिनकी घोषणा संविधान में की जाती है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान में घोषित मूल सिद्धांत धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, समानता आदि हैं। संविधान एक राजनीतिक समाज के आदर्शों, लक्ष्यों और सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है। संवैधानिक कानून के रूप में घोषित यह प्राथमिक कानूनी संहिता है जो राज्य की प्रगति के आधार का वर्णन करती है। ये आमतौर पर देश के इतिहास, संस्कृति और दर्शन पर आधारित होते हैं। 

उदाहरण के लिए, एक संविधान उदार (जेनरस) लोकतंत्र, मानवाधिकार, न्याय और कानून के शासन का प्रावधान कर सकता है। इसका उपयोग विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों जैसे कल्याण, पर्यावरण या लैंगिक मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। इस प्रकार, इन सामान्य मूल्यों की पहचान करके, संविधान नागरिकों के बीच उद्देश्य की एकता स्थापित करने में मदद करता है। 

राजनीतिक समुदाय की पहचान को परिभाषित करना

कुछ संविधान राष्ट्रीय ध्वज, गान, प्रतीक और राष्ट्र-राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीकों को भी परिभाषित कर सकते हैं। चूंकि संविधान राजनीतिक समाज का एक आधारभूत दस्तावेज है, इसलिए इसकी भूमिका उस समाज की पहचान स्थापित करना और उसे बनाए रखना है। यह चरित्र, मूल्यों, राष्ट्र और उसके लोगों का मूर्त रूप है। इस संबंध में, संविधान राष्ट्र के इतिहास को स्थापित करने, सांस्कृतिक विरासत की सराहना करने तथा नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

इसके अतिरिक्त, यह देश के भीतर विविधता के विभिन्न रूपों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकता है, इस प्रकार बहुसांस्कृतिक नीतियों का समर्थन कर सकता है। उदाहरण के लिए, यह स्वदेशी लोगों और उनके अधिकारों, भाषाई अल्पसंख्यकों या धार्मिक समुदायों को मान्यता दे सकता है, जिससे राष्ट्र की पहचान में कई परतें जुड़ सकती हैं। 

नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों की घोषणा और परिभाषा करना

अधिकांश संविधानों में देश के नागरिकों के लिए कुछ मौलिक अधिकारों की घोषणा की गई है। इनका मसौदा राज्य की अपनी प्रजा पर शक्ति को नियंत्रित करने तथा व्यक्तियों के रूप में उनकी गरिमा की रक्षा करने की उसकी जिम्मेदारी को नियंत्रित करने के लिए तैयार किया गया है। सामान्यतः ये मूलभूत स्वतंत्रताएं हैं जो लोकतंत्र में आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, जीवन का अधिकार आदि। कुछ संविधानों में तो हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए विशेष अधिकार घोषित किए गए हैं। भारतीय संविधान का भाग III भारत के सभी नागरिकों को दिए जाने वाले मौलिक अधिकारों की घोषणा और परिभाषा करता है। 

राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना और विनियमन

संविधान सरकार के विभिन्न अंगों, उनकी संरचना, उनकी शक्तियों, उनके बीच संबंधों आदि को परिभाषित करता है। यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की रूपरेखा तैयार करता है तथा यह भी बताता है कि उन्हें किस प्रकार कार्य करना चाहिए। ऐसी संस्थाएं भी हो सकती हैं जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, सरकार की पारदर्शिता आदि सुनिश्चित करें। इसमें चुनावों तथा सत्ता में बैठे लोगों के महाभियोग (इमपीचमेंट) और उनकी प्रक्रियाओं का भी प्रावधान किया जा सकता है। 

सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच शक्तियों के विभाजन पर निर्णय लेना

संविधान में सरकार का स्वरूप या तो एकात्मक या संघीय निर्धारित किया गया है। कई संविधानों ने अपनी सरकार के स्वरूप को संघीय या अर्ध-संघीय घोषित किया है। ऐसी राजनीतिक व्यवस्थाओं में सरकार के प्रत्येक स्तर के लिए विषयों की एक निश्चित सूची होना आवश्यक है, ताकि राजनीतिक व्यवस्था स्थिर रहे और केन्द्रीय सरकार निचले स्तर की सरकार पर हावी न हो। 

राज्य का धर्म के साथ संबंध घोषित करना

अधिकांश संविधान अपने राष्ट्र-राज्यों को धर्मनिरपेक्ष या किसी विशेष धर्म से संबद्ध घोषित करते हैं। भारतीय संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया है। अर्थात् राज्य किसी भी धर्म का पक्ष नहीं लेता है। धर्मशासित राज्यों में, धार्मिक कानून व्यक्तिगत स्थिति और व्यक्तियों के बीच विवादों पर निर्णय लेता है। 

कुछ सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता की घोषणा करना

संविधान निर्माता राज्य के लोगों के कल्याण के लिए कार्य करने हेतु कुछ विकासात्मक लक्ष्य भी शामिल कर सकते हैं। भारतीय संविधान के भाग IV में राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत शामिल हैं, जिनका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के लोगों को सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्त हो। 

हमें एक संविधान की ज़रूरत क्यों है

निम्नलिखित कुछ कारण हैं कि संविधान का होना क्यों अच्छा है:

निरंकुशता को रोकना

एक संविधान अपने राजनीतिक समुदाय के लिए एक आधारभूत संरचना प्रदान करता है। यह निर्णय लेता है कि उसे किस प्रकार की सरकार अपनानी चाहिए, राजनीतिक समुदाय में उसकी भूमिका क्या होनी चाहिए, साथ ही उसके अधिकार की सीमाएं भी तय करता है। इससे सरकार को मनमाने ढंग से कार्य करने से रोकने में मदद मिलती है। इससे सत्ता में बैठे लोगों को अधिक शक्तिशाली और दमनकारी बनने से रोका जा सकेगा। संविधानवाद निरंकुशता का विपरीत है। निरंकुश सरकारें वे सरकारें होती हैं जो किसी उच्चतर कानून या संविधान से बंधी नहीं होतीं है। ऐसी सरकारें अपने स्वार्थी हितों को सुरक्षित रखने के इरादे से शासन करती हैं, यहां तक कि अपनी प्रजा के बुनियादी मानवाधिकारों की कीमत पर भी शासन करती हैं। 

संतुलित सरकार

संविधान सरकार की संस्थाओं के बीच शक्ति या अधिकार को अलग करने और वितरित करने में मदद करता है। यह सुनिश्चित करता है कि इन सभी संस्थाओं की शक्ति सीमित रहे तथा वे एक-दूसरे पर अंकुश भी लगाएं। इससे किसी भी संस्था का अन्य संस्थाओं पर प्रभुत्व समाप्त हो जाता है। यह अनियंत्रित राजनीतिक शक्ति के प्रयोग को रोकता है।

संविधान एक सामाजिक साधन के रूप में

संविधान का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक ढांचा प्रदान करना है। दुनिया भर के कई संविधान, विशेषकर भारतीय संविधान, यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण रहे हैं कि हाशिए पर पड़े समूहों को समानता और न्याय मिले। भारतीय संविधान के भाग IV में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों ने सरकार को ऐसे कानून बनाने के लिए प्रेरित किया है जो पर्यावरण की रक्षा, श्रम अधिकारों को कायम रखने, बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा तक पहुंच को बढ़ावा देने आदि के साधन के रूप में काम करते हैं। 

स्थिर सरकार और संप्रभुता की रक्षा

चूंकि संविधान का उद्देश्य किसी राजनीतिक समुदाय के लिए सामाजिक और राजनीतिक आधार निर्धारित करना होता है, इसलिए यह राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करता है और समुदाय की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखता है। यदि किसी राष्ट्र का राजनीतिक ढांचा मजबूत नहीं है तो वह बाहरी शक्तियों के हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। इस प्रकार, जो राजनीतिक समुदाय संवैधानिकता का पालन नहीं करते, उनके बिखर जाने की संभावना अधिक होती है। 

मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रखना

आधुनिक लोकतांत्रिक विश्व में संविधान का बहुत महत्व है। कई लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्यों के संविधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता में बैठे लोगों के चयन की प्रक्रिया भ्रष्टाचार मुक्त और निष्पक्ष हो। यह लोगों को वोट देने का अधिकार और सत्ता में बैठे लोगों की आलोचना करने की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। चुनाव, प्रतिनिधि सरकार और सत्ता में बैठे लोगों की आलोचना करने का अधिकार लोकतांत्रिक समाज की मूलभूत विशेषताएं हैं। संविधान का उद्देश्य नागरिकों के मौलिक मानवाधिकारों की गारंटी देना भी है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सरकार अपने नागरिकों के हितों से समझौता करते हुए कार्य न करे। 

व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा में संविधान की भूमिका

संविधान वह आधार है जिस पर सरकार लोगों की नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के दस्तावेज “संविधान में मानवाधिकारों की सुरक्षा” में इस महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया है। संविधान आमतौर पर इस सुरक्षा को कई तरीकों से प्राप्त करता है: 

सामाजिक-आर्थिक अधिकार

ये वे अधिकार हैं जो एक मानव के रूप में उसकी गरिमा और मूल्य पर आधारित हैं। विभिन्न संविधानों में शिक्षा, चिकित्सा उपचार, आश्रय और सभ्य जीवन जीने की स्वतंत्रता शामिल है। हालांकि कुछ कानूनों को कुछ देशों में लागू करना कानूनी हो सकता है, लेकिन अन्य में नहीं, फिर भी, उनका समावेश (इंक्लूजन) सामाजिक न्याय की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए राज्य की तैयारी और क्षमता को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान के प्रावधानों में इन अधिकारों के लिए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का प्रावधान किया गया है, हालांकि वे न्यायोचित नहीं हैं। 

पर्यावरण अधिकार

मानव अधिकारों और पर्यावरण अधिकारों के बीच यह संबंध हाल के दिनों में बहुत लोकप्रिय रहा है, इसलिए कई संविधानों में गैर-पर्यावरणीय अधिकारों पर भी ध्यान दिया गया है। इनमें से कुछ अधिकारों में स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण का अधिकार, पर्यावरण पर सूचना तक समान पहुंच का अधिकार, तथा पर्यावरण तक पहुंच और उसके सुझावों पर विचार किए जाने का अधिकार शामिल हैं। इस संबंध में, संविधान सतत विकास के साथ-साथ अंतर-पीढ़ीगत जिम्मेदारी की अवधारणा को आगे बढ़ाने में मदद करता है। 

अल्पसंख्यक अधिकार

  • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार: संस्कृति, पूजा और भाषा के उपयोग के आधार पर संविधान के माध्यम से नाबालिगों के अधिकारों को बढ़ाया जा सकता है। इसमें अल्पसंख्यक भाषा में शिक्षा का अधिकार, प्रतिष्ठानों (एस्टैब्लिश्मेन्ट) और विद्यालयों तक पहुंच का अधिकार, धार्मिक समारोह मनाने का अधिकार और नैतिक संगठन स्थापित करने का अधिकार शामिल हो सकता है। (उदाहरण, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30)। 
  • राजनीतिक भागीदारी: यद्यपि समानता और मानवाधिकारों की सुरक्षा एक सार्वभौमिक अधिकार है, फिर भी कुछ संविधान राज्य से सकारात्मक कार्रवाई की मांग करते हैं ताकि अल्पसंख्यकों को सरकार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जा सके। इसका अर्थ यह हो सकता है कि संसद में अल्पसंख्यकों के लिए एक अलग पीठ होगी या सिविल सेवा में अल्पसंख्यकों के लिए एक स्वीकार्य कोटा होगा। 

महिलाओं के अधिकार

  • कानून के समक्ष समानता: संविधान महिलाओं को हर तरह से पुरुषों के समान अधिकार प्रदान करता है; यह राजनीतिक सक्रियता, संपत्ति के स्वामित्व और यहां तक कि उत्तराधिकार के मुद्दे में भी है। इससे उन कानूनी ढांचों को नुकसान पहुंचता है, जो ऐतिहासिक रूप से पुरुषों को श्रेष्ठता प्रदान करते रहे हैं।
  • भेदभाव न करना: संविधान लिंग के आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर सकता है, ताकि लोगों को शिक्षा, नौकरियों और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में समान व्यवहार मिल सके।
  • प्रजनन (रिप्रोडक्टिव) अधिकार: कुछ प्रगतिशील संविधानों को महिलाओं को अपनी शारीरिक अखंडता और प्रजनन संबंधी निर्णयों पर नियंत्रण रखने के अधिकार को मान्यता देनी चाहिए। 

स्वदेशी लोगों के अधिकार

  • भूमि अधिकार: चूंकि संविधान स्वदेशी लोगों के अपने क्षेत्रों पर अधिकारों को स्वीकार करता है, इसलिए उन्हें अलगाव से बचाया जा सकता है या उन्हें भूमि पर स्वामित्व या उपयोग के अधिकार दिए जा सकते हैं। इससे उन्हें जबरन बेदखली और संसाधनों की कमी से सुरक्षा मिलती है।
  • सांस्कृतिक संरक्षण: संविधान स्वदेशी लोगों के सांस्कृतिक अधिकारों को मान्यता दे सकता है और उनकी रक्षा कर सकता है, जिसमें उनकी संस्कृतियां, भाषाएं और ज्ञान प्रणालियां शामिल हैं। इसमें सांस्कृतिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए शर्तें शामिल हो सकती हैं, जैसे कि मूल समुदायों के पवित्र स्थल या स्कूलों में उनकी मूल भाषाओं के प्रयोग के प्रावधान। 

विकलांग व्यक्तियों के अधिकार

  • सुगम्यता: सामान्य कल्याण को बढ़ावा देना, क्योंकि संविधान में यह अपेक्षा की गई है कि विकलांगों के लाभ के लिए आसानी से सुलभ संरचनाएं स्थापित की जानी चाहिए, ताकि वे समाज में भाग लेने में सक्षम हो सकें।
  • उचित समायोजन: संस्थागत और संगठनात्मक नीतियां तथा कानूनी नीतियां नियोक्ताओं और संस्थानों को विकलांग व्यक्तियों के लिए समायोजन करने तथा ऐसे व्यक्तियों का शिक्षा और/या नौकरियों से बहिष्कार समाप्त करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।
  • भेदभाव-विरोधी: अन्य समूहों की तरह, संविधान कार्यस्थल, शिक्षा और सामाजिक सेवाओं तक पहुंच में विकलांगता के आधार पर भेदभाव पर रोक लगा सकता है। 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता

संविधान को उन मुख्य कानूनी दस्तावेजों के रूप में वर्णित किया जा सकता है जो देशों की एकता और अखंडता को परिभाषित करते हैं। इस संबंध में, वे समुदायों को शासन के तरीकों को परिभाषित करने, सत्ता को साझा करने और इन समाजों के लिए एक सार्वभौमिक मार्गदर्शक के रूप में व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने में सहायता करते हैं। फ्रांसीसी संविधान के संहिताबद्ध सिद्धांतों से लेकर ब्रिटिश संविधान के विकासात्मक ढांचे तक, ये दस्तावेज लोगों के लिए एक साझा दृष्टिकोण प्रदान करते हैं; इस तरह, वे एक राष्ट्र का निर्माण करते हैं। अमेरिकी संविधान के आधार पर, हम यह बता सकते हैं कि संविधान को किस प्रकार लिखा जाना चाहिए, जिसमें संघवाद के सिद्धांतों के साथ-साथ राष्ट्रीय संप्रभुता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है और सामाजिक न्याय के मूल्यों पर दृढ़ता से आधारित है, जो यह दर्शाने का एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे एक संविधान सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता की अनुमति देते हुए समावेशन को प्रोत्साहित कर सकता है। हालाँकि, आर्थिक असमानता के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में असमानता के मुद्दे अभी भी मौजूद हैं। संविधान इस बात पर मार्गदर्शन प्रदान करता है कि किस प्रकार संस्थागत शासन के माध्यम से, तर्क/विवाद का मुकाबला करके तथा सामाजिक कल्याण के लिए प्रावधान करके ऐसे मुद्दों से निपटा जाए। अंततः, संविधान अनंत काल के लिए निर्धारित नहीं होते क्योंकि समाज गतिशील होते हैं; वे प्रगति पर रहने वाले कार्य होते हैं जिन्हें राष्ट्र की प्रगति को अपनाने के साथ-साथ राष्ट्र की एकता, न्याय और प्रगति के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करने के लिए उचित समय पर पुनः तैयार किया जाता है। 

विभिन्न संवैधानिक प्रणालियों का तुलनात्मक विश्लेषण

संघवाद

संघवाद सरकार का एक सिद्धांत है जहां अंतिम शक्ति केंद्रीय प्राधिकरण में निहित होती है, जो देश के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है, जबकि सत्ता के अन्य स्रोत गठित राज्य होते हैं। संघवाद का सबसे प्रमुख प्रतिनिधित्व संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया जाता है। संविधान में संघीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच विकेंद्रीकृत शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इनमें सरकार की संघीय प्रणाली शामिल है जिसमें सीनेट राज्यों की समानता पर आधारित है जबकि प्रतिनिधि सभा जनसंख्या पर आधारित है। अधिकार विधेयक में दसवां संशोधन यह प्रावधान करता है कि जो शक्तियां संघीय प्राधिकरण को नहीं दी गई हैं, वे राज्यों या लोगों को वापस मिल जाएंगी। इस प्रकार, यह प्रणाली देश के भीतर तथा क्षेत्रों के भीतर शक्ति संबंधों को संतुलित करने में प्रभावी है। 

भारत एक अन्य उल्लेखनीय संघीय देश है, हालांकि यह देश सहकारी संघवाद की ओर अधिक झुकाव रखता है। संविधान व्यापक शक्तियों के साथ एक अत्यधिक केंद्रीकृत सरकार प्रदान करता है, साथ ही राज्य के अधिकारों के सिद्धांत को भी मान्यता देता है, विशेष रूप से आपराधिक न्याय, कृषि और स्कूली शिक्षा जैसे क्षेत्रों में। भारतीय संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण के कारण सहकारी संघवाद के साथ-साथ प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद की भी विशेषता है। 

जर्मनी संघवाद का एक दिलचस्प उदाहरण प्रस्तुत करता है जो मुख्यतः सहकारी संघवाद पर निर्भर करता है। इसका अर्थ यह है कि शक्तियां संघीय सरकार और लैंडर (राज्य) के बीच वितरित की जाती हैं। जबकि अंतिम शक्तियां संघीय सरकार के पास निहित हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है कि लैंडर (राज्य) राज्यों को भी कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। फिर भी, यह कहना होगा कि लैंडर को कई नीति क्षेत्रों में काफी स्वतंत्रता प्राप्त है। जर्मनी में द्विसदनीय संसद है, जिसमें दूसरा सदन, जिसे बुन्देसरात के नाम से जाना जाता है, लैंडर/राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 

संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसे देश का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसमें केन्द्रीय सरकार के साथ-साथ राज्य के अधिकारों पर भी अत्यधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि भारत को एक ऐसे देश के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जहां केन्द्रीय प्राधिकारी शक्तिशाली हैं तथा राज्यों के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाता है। जर्मनी, अपनी ओर से, संघीय और एकात्मक दोनों प्रणालियों के सिद्धांतों को विकसित करता है, लेकिन साथ ही, सहयोग में योगदान भी देता है। ये राष्ट्र न केवल केंद्रीकरण के स्तर, दूसरे सदन की स्थिति, राजकोषीय संबंधों और असाधारण उपायों की स्थिति में भिन्न हैं। राजनीतिक प्रणालियों की संरचना की तुलना करें तो अमेरिका दोहरी राजनीति के मॉडल के अधिक निकट है; हालांकि, भारत और जर्मनी अधिक केन्द्रीकृत हैं। यहां तक कि इन विभिन्न संघीय प्रणालियों में भी, वित्तीय संसाधनों का वितरण तथा संकट के दौरान केंद्रीकृत नियंत्रण की मात्रा भिन्न होती है। 

संसदीय प्रणाली

संसदीय प्रणाली में सरकार की विधायिका और कार्यपालिका शाखाओं के बीच मजबूत संबंध शामिल होता है। जबकि राष्ट्रपति प्रणाली में सरकार की शाखाएँ अलग-अलग होती हैं, संसदीय प्रणाली में उन सभी के कुछ तत्व सम्मिलित होते हैं। सरकार का मुखिया, जो आमतौर पर प्रधानमंत्री होता है, विधायी शाखा का सदस्य होता है और संसद के भीतर मतदान के आधार पर उसकी नियुक्ति होती है। यह प्रणाली यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में आम है। 

यूनाइटेड किंगडम, जो संसदीय प्रणाली की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है, में एक संवैधानिक राजतंत्र है जिसमें सम्राट बिना अधिक शक्ति के राज्य के प्रमुख के रूप में कार्य करता है। सरकार का मुखिया प्रधानमंत्री होता है, जो हाउस ऑफ कॉमन्स में सबसे अधिक सीटों वाले दल का मुखिया होता है। कनाडा एक संघीय संसदीय लोकतंत्र है और यद्यपि इसमें ब्रिटेन से कई समानताएं हैं, फिर भी इसकी मुख्य विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता है, तथा ब्रिटेन की तुलना में इसमें अपेक्षाकृत अधिक शक्तियां प्रत्यायोजित हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जो संसदीय प्रणाली चलाता है जिसमें वेस्टमिंस्टर मॉडल की कुछ विशेषताओं को संघीय प्रणाली के साथ समाहित किया गया है। ऑस्ट्रेलिया एक अन्य ऐसा देश है जिसकी ब्रिटेन में गहरी जड़ें हैं तथा संसदीय संघीय प्रणाली भी है; न्यूजीलैंड का भी ब्रिटेन से गहरा संबंध है, लेकिन वहां सामाजिक नीतियों पर अधिक ध्यान देते हुए एकात्मक प्रणाली अपनाई गई है। 

ये राष्ट्र संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को साझा करते हुए, संघवाद, संवैधानिक संरचनाओं और सम्राट या राष्ट्रपति की भूमिका के संदर्भ में भिन्नताएं प्रदर्शित करते हैं। ये अंतर प्रत्येक देश के विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करते हैं। 

अर्द्ध-राष्ट्रपति प्रणाली

अर्द्ध-राष्ट्रपति प्रणाली को एक ऐसी शासन प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें राष्ट्रपति और संसदीय दोनों प्रणालियों की विशेषताएं देखी जाती हैं। इस राजनीतिक प्रणाली में एक राष्ट्रपति होता है, जो प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता है तथा प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के साथ-साथ सरकार के अन्य अंगों, जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी होते हैं, के साथ सत्ता साझा करता है। दोहरी कार्यपालिका की यह प्रणाली सत्ता के वितरण में जटिलताएं पैदा कर सकती है तथा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सत्ता संबंधों में बदलाव ला सकती है। 

अर्द्ध-राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने वाले देशों में फ्रांस, रूस, पोलैंड और रोमानिया आदि शामिल हैं। फ्रांसीसी मॉडल, जिसका अक्सर चर्चा में प्रयोग किया जाता है, राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्रदान करता है, जिनमें संसद को भंग करने का अधिकार भी शामिल है। लेकिन कार्यपालिका शाखा के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री दिन-प्रतिदिन के प्रशासनिक कार्यों में शामिल होते हैं और उन्हें विधायी शाखा के विश्वास की आवश्यकता होती है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा एक ही कार्यकारी शाखा को साझा करने के इस संबंध के कारण अलग-अलग दल बन सकते हैं, जिससे देश पर शासन करने में समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 

एकात्मक प्रणाली

एकात्मकता उस प्रकार के शासन को कहते हैं जहां राजनीतिक सत्ता का प्रयोग केवल केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाता है। इसका तात्पर्य उन राष्ट्रों से है जिन्होंने अपने कुछ अधिकार क्षेत्रीय या स्थानीय सरकारों को वितरित कर दिए हैं, लेकिन केंद्रीय नियंत्रण श्रेष्ठ बना हुआ है। एकात्मक प्रणाली में, अधिकांश नीतियां केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में होती हैं और इनमें रक्षा नीतियां, विदेश नीतियां, आर्थिक नीतियां और पुलिस या कानून प्रवर्तन नीतियां शामिल होती हैं। 

विकेन्द्रित एकात्मक राज्यों में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान और चीन शामिल हैं। ये राष्ट्र प्रीफेक्चर, प्रांतों या विभागों में विभाजित हो सकते हैं, लेकिन वे उपराष्ट्रीय हैं, और इसलिए उनकी संरचना और अधिकार क्षेत्र को केंद्रीय सरकार द्वारा बदला या हटाया जा सकता है। समन्वयकारी प्रभाव और नीतिगत एकरूपता के लिए एकात्मक प्रणालियों को लाभकारी माना जा सकता है, लेकिन साथ ही, वे क्षेत्रों की आवश्यकताओं और मांगों के लिए उतने अनुकूल नहीं भी हो सकते हैं। 

शक्तियों का पृथक्करण

मूलतः, यह सिद्धांत अनेक आधुनिक संविधानों का एक अनिवार्य हिस्सा है; यह एक सरकारी शाखा में सत्ता के संकेन्द्रण से बचने का एक प्रयास है। इसमें यह अपेक्षा की गई है कि सरकार के कार्यों को विभिन्न शाखाओं में विभाजित किया जाए, जिनमें से प्रत्येक की अपनी शक्तियां और अधिकार क्षेत्र होंगे। आमतौर पर, इनमें संसद की शाखाएँ शामिल होती हैं, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायिक शाखाएँ होती हैं। 

संयुक्त राज्य अमेरिका इस संबंध में एक उत्कृष्ट उदाहरण बना हुआ है, जो उनके संविधान का एक तत्व है। सरकार की कार्यकारी शाखा राष्ट्रपति पद है, जबकि सरकार की न्यायपालिका शाखा सर्वोच्च न्यायालय और अन्य निचली अदालतों से बनी है। सरकार की इस शाखा के नेता राष्ट्रपति होते हैं, जिनकी भूमिका कानूनों को लागू करने और विदेशी मामलों का संचालन करने की होती है। न्यायपालिका, जिसका नेतृत्व सर्वोच्च न्यायालय करता है, कानूनों को लागू करती है, उनकी व्याख्या करती है तथा कानूनी मामलों का निपटारा करती है। यह विभाजन सरकार की किसी भी विशेष शाखा के लिए अन्य दो पर प्रभुत्व जमाना असंभव बना देता है, क्योंकि इसमें नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली अंतर्निहित है। 

यह देखा जा सकता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका शक्तियों के पृथक्करण का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है; तथापि, इस सिद्धांत का क्रियान्वयन किस हद तक किया जाएगा, इसका मापन भी विभिन्न देशों में अलग-अलग समय पर किया जाता है। इसलिए, फ्रांस में भी, जो एक अर्द्ध-राष्ट्रपति गणतंत्र है, राष्ट्रपति और सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री के बीच संबंधों में शक्तियों का बहुत अधिक बंटवारा शामिल होता है। ब्रिटेन और कनाडा जैसी संसदीय प्रणालियों में सरकार विधायिका शाखा से निकलती है, जिससे कार्यपालिका को विधायिका शाखा से पूरी तरह अलग करना कठिन हो जाता है। 

भारत, ब्राजील और जर्मनी ने कई संघीय प्रणालियों की तरह शक्ति वितरण की दोहरी संरचना अपनाई है। भारतीय शासन की संरचना संघीय है, जो शक्ति के पृथक्करण के क्षेत्र के विश्लेषण के स्तर पर भी शक्ति के विभाजन पर विचार करना जटिल बना देती है: केंद्र सरकार और राज्य के बीच शक्ति के वितरण का उपयोग और निर्धारण करना आवश्यक है। इस संबंध में, यह काफी असाधारण बात है कि ब्राजील की राजनीतिक प्रक्रिया संयुक्त राज्य अमेरिका से इतनी अधिक प्रभावित रही है। ब्राजील में नियंत्रण और संतुलन की काफी कठोर प्रणाली है, जबकि जर्मनी, एक संसदीय देश होने के नाते, शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा के प्रति अधिक उदार दृष्टिकोण रखता है। 

संशोधन प्रक्रिया

संशोधन प्रक्रिया संविधान में परिवर्तन की प्रक्रिया से संबंधित है। यह किसी भी राष्ट्र की शासन प्रणाली के संरचनात्मक तत्वों में से एक है; इसलिए, यह स्थिरता के पहलुओं को संबोधित करने के साथ-साथ गतिशील संदर्भों पर प्रतिक्रिया देने में दक्षता से भी संबंधित है। 

संशोधनों का उल्लेख करते हुए, संविधानों को संशोधन विनियमन की स्पष्टोक्ति (ओपननेस)  के स्तर के संबंध में विभेदित किया जा सकता है। मजबूत संविधान के लिए लंबी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें अधिकांश मामलों में विधायी अंग में दो-तिहाई बहुमत या लोकप्रिय मतदान शामिल होता है। संशोधन की प्रक्रिया विभिन्न देशों में काफी भिन्न होती है; उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में यह लगभग असंभव है। इसका अर्थ यह है कि संविधान एक रूपरेखा दस्तावेज है जिसे अल्प अंतराल पर बदला नहीं जा सकता है। 

इस प्रकार, जैसा कि पहले बताया गया है, लचीले संविधान सामान्य कानून के माध्यम से संशोधन को सक्षम करते हैं और इसलिए अधिक बहुमुखी होते हैं। यूनाइटेड किंगडम एक सामान्य कानून वाला देश है, तथा इसका संविधान असंहिताबद्ध है, इसलिए इसके संविधान के नियमों को संसद के एक अधिनियम द्वारा बदला जा सकता है। एक ओर, इससे परिवर्तन की संभावना खुलती है और संविधान को वर्तमान संदर्भ के अनुरूप ढाला जा सकता है; दूसरी ओर, इससे प्रमुख संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करने का आधार तैयार होता है। 

इन दो ध्रुवों के बीच अनेक तथाकथित मध्यवर्ती प्रणालियाँ हैं जिनमें कठोर और लचीली दोनों प्रणालियों के तत्व सम्मिलित होते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के संविधान में संशोधन के लिए अनेक प्रावधान हैं, जिनमें साधारण बहुमत, विशेष बहुमत तथा राज्य अनुमोदन की आवश्यकता वाले प्रावधान शामिल हैं। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य आवश्यक स्थिरता प्राप्त करना है, साथ ही परिवर्तन की क्षमता भी रखना है। 

न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा किसी कानून, राजनीतिक कार्यों और निर्णयों की वैधता पर निर्णय लेने का न्यायालय का कार्य है। यह विधायिका और यहां तक कि कार्यपालिका शाखा पर निगरानी रखने की भूमिका निभाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत कार्य करें। 

इसलिए न्यायिक समीक्षा की अवधारणा के लिए अक्सर संयुक्त राज्य अमेरिका को मान्यता दी जाती है। मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) वह मामला है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ कानूनों को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार हासिल किया था। इस शक्ति ने कुछ हद तक अमेरिकी संवैधानिक कानून के विकास को चिह्नित किया है। 

हालांकि, न्यायिक समीक्षा नामक इस संवैधानिक उपाय का स्तर, संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अधिकांश देशों में कुछ हद तक मौजूद है, लेकिन अन्य देशों में यह उतना व्यापक नहीं है। कुछ देशों की न्यायपालिकाओं को विधायी और कार्यकारी आचरण की जांच करने के लिए व्यापक क्षमता प्रदान की गई है, जबकि अन्य देशों में न्यायिक समीक्षा की क्षमता सीमित है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन की कानूनी प्रणाली को अभी भी संसदीय संप्रभुता प्राप्त है, तथा इस प्रकार, इसमें न्यायिक जांच का स्वरूप हमेशा से कम कठोर माना जाता रहा है। फिर भी, यूरोपीय संघ के कानून के स्वागत से यूनाइटेड किंगडम में न्यायिक समीक्षा के स्तर में कुछ हद तक विस्तार हुआ है। 

विशाल जनसंख्या को न्याय प्रदान करने के लिए, भारत में सामाजिक न्याय के साथ-साथ एक मजबूत न्यायपालिका भी है, जिसे न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्राप्त है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ संविधान के कार्यान्वयन में भी केन्द्रीय भूमिका निभाता रहा है। हालाँकि, न्यायपालिका और सरकार के अन्य अंगों के बीच संतुलन विवादास्पद बना हुआ है, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में बना हुआ है। 

हालाँकि, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि न्यायिक समीक्षा के अपने आलोचक भी हैं। आलोचकों का दावा है कि यह न्यायपालिका के प्रतिनिधियों को बहुत अधिक शक्ति प्रदान करता है, जो जन प्रतिनिधियों के निर्णयों को निरस्त कर सकते हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि केंद्र सरकार द्वारा अतिक्रमण से सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है। यह हमेशा एक नाजुक प्रश्न होता है: न्यायपालिका द्वारा विधायी प्राधिकार को कितना सीमित किया जाना चाहिए? अति-एकाग्रता एक और महत्वपूर्ण विषय है जो वैश्विक स्तर पर संवैधानिक कानून और सरकारी प्रणालियों को परिभाषित करता है। 

संविधान एक जीवंत दस्तावेज है

संविधान किसी विशेष राज्य या देश को नियंत्रित करने वाले नियमों, कानूनों या कानूनी कार्यवाहियों की प्रणाली को संदर्भित कर सकता है, लेकिन यहां इस शब्द का अर्थ इससे कहीं अधिक है; यह समाज के ढांचे को परिभाषित करता है और एक दस्तावेज का गठन करता है जो उस समाज के साथ विकसित होता है जिसकी वह सेवा करता है। यह दस्तावेज के विचार को जीवंत बताता है, तथा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में निरंतर परिवर्तन के ढांचे के भीतर विकास और शिक्षा के मुद्दे पर जोर देता है। 

अतः, उल्लिखित कारकों के कारण, संविधान को जीवंत चरित्र वाला माना जा सकता है। सबसे पहले, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि समाज के सदस्यों के बीच मूल्यों, मानदंडों और अपेक्षाओं का समग्र मूल्यांकन निरंतर विकसित होता रहता है। एक कठोर संविधान यह निर्धारित करने के लिए उपयुक्त है कि एक सामान्य ढांचे को बनाए रखने के लिए क्या आवश्यक है, जो समाज की आवश्यकताओं में परिवर्तन का समर्थन करने के लिए अच्छी तरह से काम नहीं कर सकता है। दूसरा, ऐसी नई परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे तकनीकी, वैश्विक या अन्य परिस्थितियां जो समाज में अभूतपूर्व (अन्प्रेसिडेन्टिड) हों, या हमें ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए नया संविधान बनाने की आवश्यकता हो सकती है। 

दरअसल, सामान्य कानून प्रणाली के एक भाग के रूप में न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करने की भूमिका भी निभाती है और इस प्रकार संविधान की विषय-वस्तु को प्रभावित करती है। इसलिए, वर्तमान घटनाओं के आधार पर संविधान की व्याख्या करके, न्यायपालिका संशोधन के तरीके पर विधायिका शाखा की स्पष्ट अनुमति के बिना संविधान में परिवर्तन कर देती है। न्यायपालिका और संविधान के बीच यह अंतर्सम्बन्ध यह सुनिश्चित करता है कि कानून के स्रोत के रूप में इस कार्य को लागू करने वाला यह दस्तावेज़ एक गतिशील समाज में संचालित होता है। 

फिर एक जीवंत संविधान का सिद्धांत है, जो इस तथ्य पर जोर देता है कि समाज स्थिर संस्थाएं नहीं हैं। लोकतांत्रिक ढंग से लागू किए जाने वाले संविधान की आवश्यकताएं भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त उदार होनी चाहिए। यह सापेक्ष (रिलेटिव) स्वतंत्रता को दर्शाता है, जो दस्तावेज़ को उन मौलिक विचारों को खोए बिना विस्तारित करने की अनुमति देता है। 

इस प्रकार, संविधान केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है जो एक निश्चित समयावधि के लिए दिया जाता है, बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है जो समाज के साथ सीखता और बढ़ता है। इस गतिशीलता के लिए यह आवश्यक है कि संविधान विकासशील समाज में अपनी भूमिकाओं के स्थान पर कार्यों के निष्पादन में प्रभावी बना रहे। 

प्रौद्योगिकी संविधान को कैसे प्रभावित कर सकती है

डिजिटल युग में मौलिकता की चुनौती

मूलवाद एक प्रकार की संवैधानिक व्याख्या है जिसका उद्देश्य उस अर्थ पर लौटना है जो संविधान के लिखे जाने के समय था। हालाँकि, प्रौद्योगिकी के विकास की तीव्र दर के परिणामस्वरूप नई चुनौतियाँ और परिस्थितियाँ उभरीं है। यह एक बड़ी समस्या है कि मौलिक न्यायशास्त्र को इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल युग में गोपनीयता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के विनियमन जैसे मुद्दों पर किस प्रकार विचार करना चाहिए। 

न्यायिक विवेकाधिकार और बदलते मानदंड

सतत विकसित होती सहिष्णुता (टॉलरेंस) उन कानूनी सिद्धांतों में से एक है जिसका संविधान के संबंध में प्रयोग किया जाना आवश्यक है। समकालीन परिस्थितियों को संबोधित करने और उनके अनुकूल ढलने के लिए इस दृष्टिकोण का उपयोग करने के लाभों के बावजूद, आलोचकों का तर्क है कि इस दृष्टिकोण में पूर्वाग्रह और न्यायिक सक्रियता के मुद्दे हैं। इस प्रकार, संविधान की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रौद्योगिकी के प्रकाश में उभरते मानकों के उपयोग के अवसरों और तरीकों के संबंध में पर्याप्त रूप से दिशानिर्देश स्थापित करना महत्वपूर्ण है। 

दीर्घकालिक संवैधानिक सिद्धांतों की आवश्यकता

संविधान का उद्देश्य यह है कि यह पीढ़ियों तक राष्ट्र का शासकीय ढांचा बना रहे। समाज में प्रौद्योगिकी के उपयोग में तेजी से हो रही प्रगति के साथ, आधुनिक समाज पर लागू बुनियादी संवैधानिक मूल्यों की खोज करना प्रासंगिक हो जाता है। इस प्रकार, ऐसे सामान्य दिशानिर्देशों पर ध्यान केंद्रित करके, विभिन्न प्रकार के न्यायालय संविधान को संभालने के दृष्टिकोण को रेखांकित कर सकते हैं जो संविधान निर्माताओं के इरादों और दृष्टिकोण के अनुरूप होगा। 

आधुनिक विश्व में गोपनीयता के मुद्दे

निगरानी और डाटा संग्रहण में प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों में सुधार, व्यक्तिगत गोपनीयता के मामले में एक मुख्य मुद्दा बना हुआ है। आधुनिक समाज में सार्वजनिक हित और गोपनीयता की सुरक्षा दो प्रमुख चिंताएं हैं: सरकार को निजी नागरिकों के मामलों की जांच करने का अधिकार देना सार्वजनिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह डिजिटल युग में व्यक्तिगत संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करता है। 

साइबर स्वतंत्रता और इसके नियंत्रण सिद्धांत

इस परिघटना के लिए काफी हद तक सोशल मीडिया मंच को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसने सार्वजनिक संवाद के वर्तमान रुझान को बदलने में काफी काम किया है। इस क्षेत्र में कुछ संवैधानिक मुद्दे इस प्रकार हैं कि क्या सरकार इन मंचो के उपयोग को नियंत्रित कर सकती है और किस हद तक वह मुक्त भाषण की सुरक्षा को बढ़ावा दे सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे उदार मूल्यों को जब आधुनिक प्रौद्योगिकी पर लागू किया जाता है, तो प्रत्येक मुद्दे के आधार पर उन पर विचार किया जाना चाहिए, जैसे कि फर्जी समाचार, नस्लवाद, दुर्व्यवहार आदि। 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संवैधानिक निहितार्थ

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सृजन कार्यबल, अर्थव्यवस्था और समाज की सुविचारित संरचनाओं को और अधिक मौलिक चुनौती देता है। प्रणालियों में निरंतर प्रगति से यह प्रश्न उठता है कि वे प्रत्येक राष्ट्र में व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित करेंगे। एल्गोरिदम के निर्णय-निर्माता या निर्णय-सहायक होने, स्वायत्त हथियारों के उपयोग, तथा कानून के तहत एआई संस्थाओं की मान्यता से संबंधित चिंताएं नई कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां प्रस्तुत करती हैं। 

आलोचनात्मक विश्लेषण

संविधान लोकतंत्र का ढांचा तैयार करता है क्योंकि यह सरकार की शक्ति की सीमाओं को रेखांकित करता है और लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। यह शासकों द्वारा जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों और कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए कानूनी विशेषाधिकार सुनिश्चित करता है, जो आमतौर पर दुस्साहसी होते हैं। संविधान में कुछ अधिकार शामिल हैं, और उनमें सामाजिक-आर्थिक, पर्यावरणीय और अल्पसंख्यक अधिकार शामिल हैं, जो सामाजिक न्याय के लिए राष्ट्र के उत्साह को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, संविधान में पर्यावरण संबंधी अधिकारों में टिकाऊ उपयोग तथा भावी पीढ़ियों के लिए इसके उपयोग पर जोर दिया गया है। 

अल्पसंख्यक अधिकारों की गारंटी में सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार शामिल हैं जो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के साथ-साथ स्थायी लोकतांत्रिक पहल को भी बढ़ाते हैं। महिलाओं के अधिकारों से संबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधान लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने और महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास करते हैं, तथा स्वदेशी लोगों से संबंधित प्रावधान उनकी भूमि और सांस्कृतिक कार्यप्रणाली की रक्षा करने का भी प्रयास करते हैं। विकलांग व्यक्तियों के अधिकार उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति और बिना किसी भेदभाव के समाज में एकीकरण में मदद करते हैं। 

संविधान शासन प्रणालियों को भी परिभाषित करता है, क्योंकि संघीय प्रणालियाँ हैं जो केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच शक्ति को विभाजित करती हैं तथा एकात्मक प्रणालियाँ हैं, हालांकि वे राज्यों के केन्द्र में शक्ति को केन्द्रित करती हैं। शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, जिसका उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका है, का उद्देश्य विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की कार्य-पद्धति को परिभाषित करके निरंकुश शक्ति से बचना है। न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करने में भी भूमिका निभाती है कि विधायिका द्वारा पारित कानून संविधान के अनुरूप हों; इस प्रकार, हमें संवैधानिक सर्वोच्चता और अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त होती है। 

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान को एक ‘जीवित’ दस्तावेज मानने का विचार परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है। इस संबंध में, न्यायिक व्याख्या की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संविधान परिवर्तन के ऐसे पहलुओं के भीतर अनुकूलन कर सके, ताकि वे परिवर्तनोन्मुख (चेंज ओरिएंटेड) समाजों के भीतर प्रासंगिक बन सकें। यह लचीलापन आज अधिकारों की सुरक्षा और सरकार में संविधान की प्रासंगिकता को दर्शाता है। 

निष्कर्ष

किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में संविधान का प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के सिद्धांतों को बरकरार रखा जाए। संविधान के माध्यम से सरकार की शक्ति की घोषणा होती है तथा सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति का विभाजन और वितरण होता है, साथ ही एक स्थिर सरकार का गठन भी होता है। वे सामाजिक-आर्थिक विकास तथा व्यक्तियों के अधिकारों की प्राप्ति और सुविधा प्रदान करने के अग्रणी हैं। इसलिए, कानूनी कृत्यों के अलावा, संविधान सामाजिक अनुबंध के दस्तावेज हैं जो किसी समाज में लोगों की अपेक्षाओं को निर्दिष्ट करते हैं। वे अन्याय और उत्पीड़न को चुनौती देने के तरीके प्रदान करते हैं, जिससे सुरक्षा की भावना पैदा होती है और सरकार में विश्वास पैदा होता है। इस प्रकार, सरकार के सभी कार्यों को नियंत्रित करते हुए, संविधान कानूनी आधार और लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है। 

इसके अलावा, हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि संविधान की अवधारणा एक कागजी दस्तावेज की अवधारणा नहीं है जिसे बदला नहीं जा सकता, बल्कि यह एक प्रभावी दस्तावेज है जिसे दी गई परिस्थितियों में बदला जा सकता है, परिवर्तन लाया जा सकता है क्योंकि इसका उद्देश्य उस समाज की आवश्यकताओं को पूरा करना है जहां इसे लागू किया गया है। यह महत्वपूर्ण है और उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के माध्यम से राष्ट्रों को आगे बढ़ाने में प्रासंगिक और सक्षम बनाता है। इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकालना काफी तर्कसंगत लगता है कि संविधान लोगों के लिए अधिकारों और स्वतंत्रता तथा राजनीतिक और आर्थिक समानताओं के साथ एक ऐसा समाज बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक है, जिसका उद्देश्य उनके सभ्य और एकीकृत जीवन को सुनिश्चित करना है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

संविधान में व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा कैसे की गई है?

संविधान उन संवैधानिक अधिकारों को सूचीबद्ध करके स्वतंत्रता की रक्षा करता है जो व्यक्ति की महत्वपूर्ण स्वतंत्रताएं हैं, जैसे कि भाषण, धर्म और सभा की स्वतंत्रता हैं। यह उन प्रथा को वैध बनाता है जो भेदभाव और सरकार द्वारा मनमाने निर्णय लेने की अनुमति नहीं देते हैं। उदाहरण के लिए, जहां राष्ट्रों की न्यायिक प्रणालियां न्यायिक सक्रियता की अनुमति देती हैं, वहीं न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि सरकार के कानून और सभी कार्य लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संविधान के अनुसार हों। 

सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का वास्तव में क्या अर्थ है और संविधान के तहत उन्हें कैसे संरक्षित किया जा सकता है?

सामाजिक-आर्थिक अधिकार मानव अधिकार हैं जो लोगों के जीवन से संबंधित हैं और उनके जीवन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करते हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पर्याप्त भोजन के अधिकार। ये अधिकार आमतौर पर राज्य के सामाजिक न्याय के प्रति पालन को दर्शाने के लिए संविधान में लिखे जाते हैं। यद्यपि सभी देशों में व्यावहारिक रूप से कार्यान्वयन योग्य नहीं होते, लेकिन ऐसे सिद्धांतों को अपनाना राज्य की अपनी जनसंख्या के बीच सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार के क्षेत्र में सरकारी नीतियों को आकार देते समय इन सिद्धांतों का पालन करने की इच्छा को दर्शाता है। 

संविधान किस प्रकार नियंत्रण और संतुलन के पहलुओं को विनियमित करता है?

संविधान में यह सामान्य बात है कि यह सुनिश्चित करने के लिए नियंत्रण और संतुलन स्थापित किया जाए कि सरकार का कोई अंग प्रभावी न हो। यह सरकार की कार्यपालिका, विधायी और न्यायिक शाखाओं की शक्तियों के पृथक्करण के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। आज की दुनिया में, इसे इसलिए अपनाया गया ताकि हमारे पास एक नियंत्रण और संतुलन प्रणाली हो सके ताकि सरकार की हर शाखा को सरकार की अन्य शाखाओं की जांच करने की शक्ति मिले। 

न्यायपालिका संविधान के संरक्षण में किस प्रकार भाग लेती है?

न्यायिक समीक्षा में कानूनी जांच शामिल होती है, जिसके तहत न्यायालय सरकार के कानून और कार्यों की संविधान के साथ अनुकूलता का आकलन करता है। इस प्रकार यह जाँच करता है कि क्या सभी कानून और प्रशासनिक प्रक्रियाएं संविधानवाद का पालन करती हैं। यह निरीक्षण कार्य संविधान का उल्लंघन करने वाले कानूनों और संस्थाओं की कार्रवाइयों को निरस्त करके व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा में सहायता करता है। 

संवैधानिक संशोधनों का समावेश किस प्रकार संविधान के निरंतर परिवर्तन को दर्शाता है?

अतः संवैधानिक संशोधन से तात्पर्य समाज के वर्तमान स्वरूप के अनुरूप संविधान में किए गए परिवर्तनों से है। यहां संशोधन प्रक्रिया संविधान के प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) को समय के साथ बदलते हुए, मूल सिद्धांतों को नकारे बिना, एक अलग रूप लेने में सक्षम बनाती है। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि संविधान किस प्रकार अद्यतनों (अपडेट्स) या संशोधनों के माध्यम से समसामयिक और सक्रिय बना रहता है, जैसा कि इस प्रक्रिया में देखा जा सकता है। 

संदर्भ

 

 

आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की विषय-वस्तु

यह लेख Vyoma Mehta द्वारा लिखा गया है और इसे Trisha Prasad. द्वारा आगे अद्यतन (अपडेट) किया गया है। यह लेख आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रमुख तत्वों और विषय-वस्तु को रेखांकित करता है, इसके महत्व और संरचना पर जोर देता है। यह आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की आवश्यक विषय-वस्तु, जैसे शेयर पूंजी (शेयर कैपिटल), आंतरिक प्रबंधन (इंटरनल मैनेजमेंट), लाभ आवंटन (प्रॉफिट एलोकेशन) और संशोधनों का गहन विश्लेषण प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

कभी आपने सोचा है कि कोई कंपनी पर्दे के पीछे आसानी से कैसे काम करती है, भले ही वह एक छोटी कंपनी हो या बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी? एओए जवाब है! जैसा कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 5 में निर्धारित किया गया है, एओए आंतरिक प्रशासन को नियंत्रित करता है और एमओए का पूरक है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कंपनी सुचारू रूप से और अपने घोषित उद्देश्यों के अनुपालन में संचालित होती है। 

मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए), जो किसी कंपनी के मूलभूत दस्तावेज होते हैं, कंपनी के निगमन और प्रशासन के लिए आवश्यक होते हैं। जबकि एमओए के विवरण कंपनी के दायरे और उद्देश्यों को रेखांकित करती है, एओए कंपनी के मामलों के प्रबंधन के लिए आवश्यक आंतरिक नियम और विनियम प्रदान करता है। 

एक मानक एओए के विवरण में जाने से पहले, हमारे लिए यह समझना आवश्यक है कि एओए क्या है।

आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन क्या है

किसी कंपनी का एओए मुख्य रूप से उस कंपनी के आंतरिक प्रबंधन और दैनिक मामलों को नियंत्रित करता है। यह दस्तावेज़ एमओए को पूरक करता है और शेयरधारकों और निदेशकों के साथ-साथ कंपनी के सदस्यों के बीच संबंध निर्धारित करता है। यह शेयरधारकों और निदेशकों की शक्तियों, भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को स्थापित करता है, निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रदान करता है, और नियामक आवश्यकताओं का अनुपालन सुनिश्चित करता है। 

एओए इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक परिचालन ढांचा प्रदान करता है। अंततः, कंपनी के कामकाज के संबंध में कंपनी के भीतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एओए महत्वपूर्ण है। सभी आंतरिक हितधारक, अर्थात, कंपनी के शेयरधारक और निदेशक एओए के आधार पर कार्य करते हैं और कंपनी के समग्र प्रबंधन को इस दस्तावेज़ में रेखांकित किया गया है जो कंपनी के भीतर सभी के लिए सुलभ है।

आइए अब हम एओए के  विषय-वस्तु पर विस्तार से चर्चा करें।

आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की विषय-वस्तु

प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों, पब्लिक लिमिटेड कंपनियों, असीमित (अनलिमिटेड) कंपनियों, होल्डिंग कंपनियों, धर्मार्थ (चैरिटेबल) कंपनियों आदि सहित सभी प्रकार की कंपनियों का अपना एओए होना चाहिए। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 5(1) और धारा 5(2) में एओए की विषय-वस्तु का प्रावधान है। आर्टिकल्स में केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मामलों के साथ-साथ कंपनी के प्रबंधन के लिए नियम शामिल होने चाहिए। अधिनियम की अनुसूची-I जिसमें एओए के नमूना मसौदे (ड्राफ्ट) शामिल हैं, एओए की आवश्यक विषय-वस्तु में एक स्पष्ट अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। 

एओए सभी कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और कंपनी के गठन और समग्र प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। हमारे लिए यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में निम्नलिखित पर विशिष्ट विवरण होना चाहिए:

  1. व्‍याख्‍या (इंटरप्रिटेशन)
  2. कंपनी का नाम और पंजीकृत कार्यालय
  3. शेयर पूंजी और शेयर 
  • शेयरों की श्रेणियाँ
  • अधिकारों की भिन्नता
  • शेयरों का आवंटन और शेयर प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट)
  • शेयरों का हस्तांतरण और पारेषण (ट्रांसमिशन)
  • शेयरों पर कॉल 
  • शेयरों पर ग्रहणाधिकार (लियन)
  • शेयरों की जब्ती

4. पूंजी का परिवर्तन

5. शेयरों की पुनर्खरीद (बायबैक)

6. कंपनी का प्रबंधन

  • निदेशक मंडल
  • मंडल की बैठकें
  • स्वतंत्र निदेशक
  • अतिरिक्त निदेशक
  • अन्य प्रमुख अधिकारी

7. सामान्य बैठकें

  • सामान्य बैठकों की प्रक्रिया
  • मतदान का अधिकार
  • मुख्‍़तारी (प्रॉक्सी)
  • कोरम
  • बैठकों का स्थगन

8. उधार लेने की शक्तियां

9. लाभ और लाभांश (डिविडेंड्स)

10. मुनाफे का पूंजीकरण

11.खातों की पुस्तक और लेखा परीक्षा (ऑडिट्स)

12. गैर-याचना और गोपनीयता (सीक्रेसी एंड कॉन्फिडेंशीएलिटी)

13. क्षतिपूर्ति

14. उपसंहार (समेटना)

15. विवाद समाधान

16. एओए में संशोधन

आइए अब हम उन प्रमुख खंडों पर ध्यान दें जिन्हें प्रत्येक एओए में शामिल किया जाना चाहिए।

संस्थान के विवरण

एओए में आम तौर पर कंपनी के नाम और दस्तावेज़ के परिचयात्मक भाग में उसके पंजीकृत कार्यालय के स्थान सहित कंपनी का विवरण होता है। कंपनी के नाम का उल्लेख किया गया है क्योंकि यह निगमन के प्रमाण पत्र में दिखाई देता है और रजिस्ट्रार के साथ पंजीकृत नाम के साथ संरेखित होना चाहिए। यह पंजीकृत कार्यालय के स्थान को शामिल करने पर भी लागू होता है जो मुख्य रूप से कंपनी के संचालन और कंपनियों के संबंधित रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करने के उद्देश्य से शामिल है। इस खंड को निम्नलिखित तरीके से तैयार किया जा सकता है:

“कंपनी का नाम XYZ प्राइवेट लिमिटेड है जिसका पंजीकृत कार्यालय बैंगलोर, कर्नाटक में स्थित है।”

शेयर पूंजी और शेयर

एओए कंपनी और उसके सदस्यों के बीच संबंधों को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह शेयरधारक के अधिकारों, शेयरों को जारी करने, शेयरों के हस्तांतरण और शेयरों की जब्ती को परिभाषित करता है। एओए कंपनी में शेयरों और शेयरधारिता के सभी पहलुओं को रेखांकित करता है।

शेयर पूंजी से तात्पर्य किसी कंपनी द्वारा निवेशकों को शेयर जारी करके जुटाई गई धनराशि से है, जिनमें से प्रत्येक कंपनी में स्वामित्व और संबंधित अधिकारों का एक प्रतिशत दर्शाता है। शेयर स्वामित्व की आवश्यक व्यक्तिगत इकाइयाँ हैं जो शेयरधारकों को कंपनी में कुछ अधिकारों के एक हिस्से का हकदार बनाती हैं। एओए के विवरण शेयर पूंजी और शेयर होल्डिंग के निम्नलिखित पहलुओं पर गहराई से चर्चा करती है:

  • शेयरों का आवंटन और शेयर प्रमाणपत्र: शेयर जारी करने पर, मंडल सब्सक्राइबर या निवेशकों (इन्वेस्टर) को शेयर आवंटित करता है और इस आवंटन को प्रमाणित करने वाला एक औपचारिक दस्तावेज जारी किया जाता है जिसे शेयर प्रमाणपत्र कहा जाता है। यह प्रमाणपत्र संबंधित शेयरों पर शेयरधारकों के स्वामित्व का प्रमाण है और आम तौर पर शेयरधारक का विवरण, आवंटित शेयरों की संख्या और प्रत्येक आवंटित शेयर से मेल खाने वाली विशिष्ट संख्या शामिल है। इसका उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता है:

“कंपनी ने एक बयान में कहा, ‘कंपनी के पास अपने विवेक से शेयर जारी करने और आवंटित करने की शक्ति होगी, जो कंपनी अधिनियम, 2013, आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के अधीन होगा। शेयरों का आवंटन कंपनी द्वारा निर्धारित किया जाएगा”

“प्रत्येक व्यक्ति जिसका नाम सदस्यों के रजिस्टर में सदस्य के रूप में दर्ज किया गया है, दो महीने की अवधि के भीतर, बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के भुगतान के अपने सभी शेयरों का एक प्रमाण पत्र और प्रति कॉपी 20 रुपये की दर से प्रमाणपत्र की कई प्रतियां प्राप्त करने का हकदार होगा। प्रत्येक प्रमाणपत्र में उन शेयरों का उल्लेख होगा जिनसे वह संबंधित है तथा उन पर भुगतान की गई राशि का उल्लेख होगा तथा उस पर दो निदेशकों या एक निदेशक और कंपनी सचिव, जैसा भी लागू हो, द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे।”

उपर्युक्त खंडों में दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से धारित शेयरों, विनाश, टूट-फूट या शेयर प्रमाणपत्र के गुम होने की स्थिति में परिणाम और उपाय के बारे में विवरण भी शामिल होंगे।

  • शेयरों पर ग्रहणाधिकार: यदि किसी शेयरधारक पर कंपनी का ऋण बकाया है, तो कंपनी का संबंधित शेयरधारक द्वारा धारित शेयरों पर ग्रहणाधिकार या दावा होता है। अंशों के ग्रहणाधिकार का अर्थ है यदि सदस्य कंपनी को अपने ऋण का भुगतान करने में असमर्थ है तो शेयरों का कब्जा बनाए रखना। अनुसूची I के अनुसार, उदाहरण के लिए इस खंड को निम्नानुसार शामिल किया जा सकता है: 

” कंपनी का पहला और सर्वोपरि ग्रहणाधिकार होगा- 

(a) प्रत्येक शेयर पर (पूरी तरह से भुगतान किया गया शेयर नहीं होने के नाते), उस शेयर के संबंध में सभी पैसे (चाहे वर्तमान में देय हों या नहीं) के लिए, या एक निश्चित समय पर देय; और

(b) किसी एकल व्यक्ति के नाम पर पंजीकृत सभी शेयरों (पूरी तरह से भुगतान किए गए शेयर नहीं) पर, वर्तमान में कंपनी को उसके या उसकी संपत्ति द्वारा देय सभी धन के लिए: 

बशर्ते कि निदेशक मंडल किसी भी समय किसी भी शेयर को इस खंड के प्रावधानों से पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट देने की घोषणा कर सकता है। 

(ii) किसी शेयर पर कंपनी का ग्रहणाधिकार, यदि कोई हो, ऐसे शेयरों के संबंध में समय-समय पर घोषित सभी लाभांश और बोनस तक विस्तारित होगा।

“यदि शेयरों के किसी विशेष वर्ग का शेयरधारक शेयरों पर कॉल का जवाब देने में विफल रहता है या कंपनी के प्रति बकाया ऋण है, तो कंपनी को शेयरों पर ग्रहणाधिकार का अधिकार होगा जब तक कि अवैतनिक (भुगतान न की गई) राशि का भुगतान नहीं किया जाता है।”

एओए में इस खंड की विषय-वस्तु में यह भी उल्लेख हो सकता है कि शेयरों के साथ किस प्रकार व्यवहार किया जाएगा या उनका निपटान किया जाएगा, यदि बकाया ऋण, जिसके बदले में ग्रहणाधिकार का प्रयोग किया गया है, का भुगतान शेयरधारक द्वारा नहीं किया जाता है।

  • अधिकारों की विविधता: कंपनी द्वारा प्रत्येक प्रकार या शेयर के वर्ग से जुड़े अधिकारों को विविध (वेरिड) और परिवर्तित किया जा सकता है। यह आम तौर पर शेयरधारकों के वर्ग द्वारा एक विशेष संकल्प के माध्यम से किया जाता है जो परिवर्तन से प्रभावित होने जा रहे हैं या एओए में उल्लिखित किसी अन्य तरीके से।

“यदि शेयर पूंजी को शेयरों के विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है, तो शेयरों के किसी भी वर्ग से जुड़े अधिकारों को शेयरों के उस विशिष्ट वर्ग को धारण करने वाले शेयरधारकों के कम से कम दो-तिहाई की सहमति से या उस वर्ग के शेयरधारकों द्वारा आयोजित एक सामान्य बैठक में पारित संकल्प के माध्यम से भिन्न किया जा सकता है”

  • शेयरों पर कॉल: कंपनी को जब भी धन की आवश्यकता हो, वह किस्तों में मांग कर सकती है। शेष अवैतनिक शेयरों का पूरा या आंशिक हिस्सा शेयरों पर मांग में शामिल किया जाएगा और शेयरधारकों द्वारा मांग किए जाने पर उसका भुगतान किया जाना चाहिए। इस खंड को निम्नलिखित तरीके से शामिल किया जा सकता है:

“निदेशक मंडल समय-समय पर इस तरह के कॉल कर सकता है क्योंकि वे आयोजित शेयरों पर भुगतान न किए गए किसी भी पैसे के संबंध में सदस्यों पर उचित समझते हैं, और ऐसे शेयरधारक कंपनी को ऐसी राशि का भुगतान समय पर करेंगे जैसा कि निर्दिष्ट किया गया है।”

  • शेयरों का हस्तांतरण और प्रेषण: शेयरों को किसी भी शेयरधारक द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या अपनी पसंद की संस्था को हस्तांतरित किया जा सकता है। यह एओए में निहित एक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है सामान्यतः एक हस्तांतरण फॉर्म दाखिल करके, कंपनी से अनुमोदन प्राप्त करके और सदस्यों के रजिस्टर को अद्यतन करके। एओए में शेयरधारक द्वारा हस्तांतरिती (ट्रांसफरी) को शेयरों के हस्तांतरण की प्रक्रिया शामिल है। एओए निम्नलिखित तरीके से शेयरों को स्थानांतरित करने के साधनों को अधिकृत कर सकता है।

“कंपनी में किसी भी शेयर के हस्तांतरण का साधन हस्तांतरणकर्ता (ट्रांसफ़रर) और हस्तांतरिती दोनों की ओर से निष्पादित किया जाएगा और हस्तांतरणकर्ता शेयर का मालिक तब तक रहेगा जब तक कि हस्तांतरिती का नाम कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में दर्ज नहीं किया जाता है।”

इसके अतिरिक्त, एओए में उन स्थितियों के विवरण भी शामिल होंगे जब कंपनी हस्तांतरण के साधन को मान्यता देने से इनकार कर सकती है या सदस्यों के रजिस्टर में हस्तांतरिती का नाम पंजीकृत करने से इनकार कर सकती है। हस्तांतरणकर्ता या अन्तरिती द्वारा ऐसे निर्णयों के विरुद्ध अपील करने की प्रक्रिया या शर्तें भी इस खंड की विषय-वस्तु में सम्मिलित की जाएँगी।

दूसरी ओर, यदि शेयरधारक की मृत्यु हो जाती है, दिवालिया हो जाता है, या मानसिक अक्षमता से पीड़ित होता है, तो उसके शेयर उसके संबंधित कानूनी प्रतिनिधि, उत्तराधिकारियों या प्रशासकों को प्रेषित किए जाते हैं। इसमें शेयरधारक की ओर से प्रत्यक्ष और जानबूझकर कार्य शामिल नहीं है, बल्कि इसके बजाय कानूनी उत्तराधिकार का आधार बनता है।

  • नामांकन (नॉमिनेशन): एओए में शेयरों के नामांकन खंड को शामिल करने से एक शेयरधारक को एक नामांकित व्यक्ति का नाम देने की अनुमति मिलती है जो शेयरधारक की मृत्यु की स्थिति में शेयर प्राप्त करेगा। यह खंड विशेष रूप से एक व्यक्ति कंपनी (ओपीसी) के मामले में अनिवार्य है।
  • शेयरों की जब्ती: एओए में आम तौर पर शेयरों पर कॉल का जवाब देने में विफल रहने के दंड और परिणामों पर विवरण भी शामिल होता है। जब्ती के परिणामस्वरूप आमतौर पर शेयरधारक शेयरों पर स्वामित्व खो देता है और इन शेयरों को कंपनी द्वारा फिर से जारी और बेचा जा सकता है। सरल शब्दों में, एओए शेयरों की जब्ती के लिए प्रदान करता है यदि खरीद आवश्यकताओं जैसे किसी भी आवंटन या कॉल मनी का भुगतान नहीं किया जाता है।

“यदि शेयरों के किसी विशेष वर्ग का शेयरधारक शेयरों पर कॉल का जवाब देने में विफल रहता है या कंपनी के प्रति बकाया ऋण है, तो कंपनी किसी भी समय शेयरधारक को एक और तारीख का नाम देते हुए एक नोटिस देगी, जिस पर भुगतान की गई राशि देय होगी। नोटिस में यह भी निर्दिष्ट किया जाएगा कि नामित दिन को या उससे पहले भुगतान न करने की स्थिति में, जिन शेयरों के संबंध में कॉल किया गया था, वे जब्त किए जाने के लिए उत्तरदायी होंगे।”

पूंजी का परिवर्तन

पूंजी का परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसके द्वारा एक कंपनी अपनी पूंजी को बढ़ा सकती है, घटा सकती है या पुनर्व्यवस्थित कर सकती है। एओए प्रक्रियाओं को निर्दिष्ट करता है और शेयर पूंजी के परिवर्तन के विभिन्न योजनाओं और तरीकों की योजना और निष्पादन पर दिशानिर्देश प्रदान करता है।

अधिनियम की धारा 61 के अधीन कंपनी को उपलब्ध शेयरों के परिवर्तन के तरीके भी एओए में शामिल हैं। एक कंपनी निम्नलिखित तरीकों से अपने शेयरों को बदल सकती है:

  • नए शेयर जारी करके शेयर पूंजी बढ़ाएं
  • सभी पूर्ण रूप से भुगतान किए गए शेयरों को स्टॉक में बदलें और फिर उन्हें अलग-अलग मूल्यांकन वाले शेयरों में बदल दें
  • शेयरों की पूंजी को बड़े मूल्यवर्ग या मूल्य के शेयरों में समेकित करें। ऐसी स्थिति में, जबकि कुल शेयर पूंजी समान रहती है, शेयरों की संख्या कम हो जाती है।
  • शेयर पूंजी को छोटे मूल्य या संप्रदाय के शेयरों में उप-विभाजित करें। इस मामले में, जबकि कुल शेयर पूंजी अपरिवर्तित रहती है, शेयरों की संख्या बढ़ जाएगी।
  • शेयर पूंजी में कमी उन शेयरों को रद्द करके की जा सकती है जिन्हें लिया नहीं गया है या जिन पर सदस्यता नहीं ली गई है या जिन्हें जब्त कर लिया गया है।

अधिनियम की अनुसूची I के अनुसार इस खंड को निम्नलिखित तरीके से तैयार किया जा सकता है:

“कंपनी, समय-समय पर, साधारण संकल्प द्वारा, शेयर पूंजी को ऐसी राशि से बढ़ा सकती है, जिसे ऐसी राशि के शेयरों में विभाजित किया जा सकता है, जैसा कि संकल्प में निर्दिष्ट किया जा सकता है। 

कंपनी, साधारण संकल्प द्वारा, – 

(a) अपनी सभी या किसी भी शेयर पूंजी को अपने मौजूदा शेयरों की तुलना में बड़ी राशि के शेयरों में समेकित और विभाजित करना; 

(b) अपने सभी या किसी भी पूरी तरह से भुगतान किए गए शेयरों को स्टॉक में परिवर्तित करें, और उस स्टॉक को किसी भी मूल्यवर्ग के पूरी तरह से भुगतान किए गए शेयरों में पुन: परिवर्तित करें; 

(c) अपने विद्यमान अंशों या उनमें से किन्हीं को ज्ञापन द्वारा नियत की गई राशि से कम राशि के अंशों में उप-विभाजित कर सकेगा; 

(d) ऐसे किन्हीं अंशों को रद्द कर सकेगा जो संकल्प पारित किए जाने की तारीख को किसी व्यक्ति द्वारा लिए नहीं गए हैं अथवा लिए जाने के लिए सहमत नहीं हुए हैं।” 

शेयरों की पुनर्खरीद

शेयरों की पुनर्खरीद एक कंपनी द्वारा शेयरधारकों या शेयर बाजार से अपने स्वयं के शेयरों को पुनर्खरीद करने की एक क्रिया है। एओए कंपनी द्वारा शेयरों की पुनर्खरीद की विशिष्ट शर्तों, प्रक्रियाओं और निहितार्थों को रेखांकित करता है। 

एओए के विवरण शेयरों की पुनर्खरीद के पीछे उद्देश्य या रणनीति को परिभाषित कर सकती है और विशिष्ट शर्तों को निर्धारित कर सकती है जिन्हें शेयरों की बायबैक की अनुमति या प्रतिबंधित करने के लिए पूरा करना होगा। इस खंड को निम्नलिखित तरीके से शामिल किया जा सकता है:

“कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 68 के प्रावधानों के अनुसार कंपनी अपने स्वयं के शेयर खरीद सकती है, जो एक सामान्य बैठक में एक विशेष प्रस्ताव के माध्यम से शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन है।”

आंतरिक प्रबंधन संरचना को परिभाषित करना

एओए शेयरधारकों और निदेशकों की शक्तियों, भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को निर्दिष्ट करके आंतरिक प्रबंधन के लिए समग्र ढांचे की रूपरेखा तैयार करता है। यह निदेशकों की नियुक्ति के तरीके, निदेशक मंडल के लिए बैठक की आवश्यकताओं और वार्षिक सामान्य बैठक, निर्णय लेने के तंत्र और कंपनी के आंतरिक संगठन के विभिन्न स्तरों पर प्राधिकरण के दायरे को परिभाषित करता है।

एओए निदेशकों की भूमिकाओं, जिम्मेदारियों और शक्तियों को परिभाषित करता है। निदेशकों की नियुक्ति की प्रक्रिया, निदेशकों को प्रदत्त शक्तियों की रूपरेखा, निदेशकों का पारिश्रमिक और निदेशकों की योग्यता कुछ ऐसे पहलू हैं जिन्हें एओए में शामिल किया गया है।

निदेशक मंडल

एओए, एक दस्तावेज के रूप में जो किसी कंपनी के आंतरिक कामकाज को परिभाषित करता है, में कंपनी के नेतृत्व से संबंधित प्रमुख प्रावधान शामिल हैं जिसमें कंपनी के प्रबंधकीय और अन्य निदेशक और निर्णय लेने की प्रक्रिया शामिल है। 

उदाहरण के लिए, एओए में निम्न खंड हो सकता है:

कंपनी को न्यूनतम दो निदेशकों और अधिकतम पांच निदेशकों की नियुक्ति करनी चाहिए। निदेशकों की नियुक्ति कंपनी अधिनियम और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के अनुसार की जाएगी।”

इस संबंध में, प्रत्येक एओए में निम्नलिखित के विवरण पाई जा सकती है:

  • निदेशक मंडल: एओए उन निदेशकों की संख्या निर्दिष्ट करता है जो कंपनी के पास हो सकते हैं और कंपनी के निगमित होने के बाद ग्राहकों द्वारा पहले निदेशक की नियुक्ति की जा सकती है। निदेशक कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कार्यों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं। एओए में निदेशक मंडल का गठन करने वाले निदेशकों की अर्हता, कार्यकाल, पारिश्रमिक और नियुक्ति की प्रक्रिया भी विनिदष्ट की गई है।
  • अतिरिक्त निदेशक: अतिरिक्त निदेशकों को मंडल द्वारा विशिष्ट कौशल लाने या अस्थायी रूप से मंडल रिक्ति को भरने के लिए नियुक्त किया जाता है। एओए अतिरिक्त निदेशक के लिए आवश्यकताओं, नियुक्ति की प्रक्रिया, कार्यकाल और अतिरिक्त निदेशक के अधिकार को निर्धारित कर सकता है।
  • नामांकित निदेशक: एक नामित निदेशक को आम तौर पर एक हितधारक के हित का प्रतिनिधित्व करने के लिए मंडल में नियुक्त किया जाता है, चाहे वह एक व्यक्ति या एक संस्था हो। एओए आम तौर पर संविदात्मक आवश्यकताओं के अनुसार मंडल में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करता है, उन हितधारकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करता है जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। एओए विशेष रूप से नामित निदेशक की जिम्मेदारियों, दायित्वों और अधिकारों को रेखांकित कर सकता है, इसके अलावा उस व्यक्ति या निकाय के हित का प्रतिनिधित्व कर सकता है जिसने उन्हें नियुक्त किया था। नामांकित निदेशक की अधिकांश आवश्यकताएं और शर्तें संविदात्मक आवश्यकताओं के अधीन हैं और यह एओए के विवरण में परिलक्षित होती है।
  • अन्य प्रमुख अधिकारी: एओए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ), मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) आदि सहित प्रबंध निदेशकों और अन्य प्रमुख अधिकारियों की भूमिका पर भी विवरण प्रदान करता है। कंपनी के कामकाज में इन अधिकारियों की जिम्मेदारियों, कार्यकाल, पारिश्रमिक, योग्यता और अधिकारियों के साथ-साथ कंपनी को सौंपने और प्रतिनिधित्व करने की उनकी शक्तियों को एओए में रेखांकित किया गया है।
  • मंडल की बैठकें: निदेशक मंडल को रणनीतिक निर्णय लेने और कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कामकाज को करने के लिए नियमित रूप से मिलना चाहिए। इन बैठकों का कोरम कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार तय किया जाता है। एओए मंडल की प्रत्येक बैठक के लिए मतदान, बैठकों के मिनट्स को बनाए रखने और अन्य रिकॉर्ड आवश्यकताओं पर विवरण भी निर्दिष्ट कर सकता है।

सामान्य बैठक और मतदान

एओए कंपनी के भीतर निर्णय लेने के सभी स्तरों के लिए संरचना प्रदान करता है जो सामान्य बैठकों में शेयरधारक निर्णयों और निदेशक मंडल द्वारा निर्णयों दोनों को शामिल करता है। यह बैठकों में शेयरधारकों या सदस्यों के मतदान अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं का विवरण देता है।

 

सामान्य बैठकें एक कंपनी के शेयरधारकों की आधिकारिक बैठकें होती हैं जहां कंपनी के संचालन के बारे में महत्वपूर्ण निर्णयों पर चर्चा की जाती है और मतदान किया जाता है। सामान्य बैठकें दो प्रकार की होती हैं: वार्षिक सामान्य बैठक (एजीएम) और असाधारण सामान्य बैठक (ईजीएम)। सामान्य बैठकों से संबंधित सभी प्रावधान और जिस तरीके से उन्हें संचालित किया जाना है, उन्हें आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में निहित किया जाना है। एओए आम तौर पर एक सामान्य बैठक के निम्नलिखित पहलुओं पर विस्तृत जानकारी प्रदान करता है:

  • सामान्य बैठकों की प्रक्रिया: सभी एजीएम और ईजीएम को एओए और कंपनी अधिनियम दोनों के अनुसार बुलाया जाना चाहिए। वित्तीय विवरणों, लाभांश की घोषणा और निदेशकों की नियुक्ति सहित प्रमुख पहलुओं पर चर्चा करने के लिए सालाना एजीएम आयोजित की जाती है। मंडल द्वारा या कुछ परिस्थितियों में, शेयरधारकों द्वारा ईजीएम को तत्काल मामलों पर चर्चा करने के लिए बुलाया जा सकता है जो एजीएम तक इंतजार नहीं कर सकते है। इसके अलावा, सामान्य बैठकों के लिए कोरम भी एओए और कंपनी अधिनियम के अनुसार तय किया जाता है।
  • मतदान (वोटिंग) का अधिकार: कुछ कंपनी मामलों पर मतदान करने का सदस्यों का अधिकार और मतदान करने का तरीका एओए में प्रदान किया गया है। सामान्य तौर पर, एक बैठक में मतदान हाथ दिखाने या मतदान के माध्यम से हो सकता है। विधि और प्रक्रिया को एओए में और विस्तृत किया जा सकता है। एओए इलेक्ट्रॉनिक मतदान की भी अनुमति दे सकता है, जिससे शेयरधारकों को दूरस्थ रूप से अपना मतदान डालने में सक्षम बनाया जा सके। यह खंड आम तौर पर निम्नानुसार प्रदान किया जाता है:

“प्रत्येक सदस्य को कंपनी में उनके द्वारा रखे गए शेयरों की संख्या के अनुपात में मतदान करने का अधिकार होगा और प्रत्येक शेयर एक मतदान का होगा। यह कंपनी द्वारा शेयरों के विभिन्न वर्गों से जुड़े अधिकारों के अधीन है।

  • मुख्‍़तारी: शेयरधारक जो सामान्य बैठक में भाग नहीं ले सकते हैं, वे अपनी ओर से बैठक में भाग लेने के लिए मुख्‍़तारी नियुक्त कर सकते हैं। मुख्‍़तारी को मुख्‍़तारी फॉर्म को एओए द्वारा निर्दिष्ट समय सीमा के भीतर जमा करना होगा।

“मुख्‍़तारी नियुक्त करने वाला उपकरण, धारा 105 के अनुसार, कंपनी के पंजीकृत कार्यालय में बैठक या स्थगित बैठक आयोजित करने के समय से कम से कम 48 घंटे पहले जमा किया जाएगा, जिस पर उपकरण में नामित व्यक्ति मतदान देने का प्रस्ताव करता है, या,  मतदान लेने के लिए नियुक्त समय से कम से कम 24 घंटे पहले”

  • कोरम और बैठकों का स्थगन: यदि किसी बैठक में कोरम पूरा नहीं होता है, तो बैठक को उस दिन के लिए स्थगित कर दिया जाएगा और किसी अन्य तिथि को, आमतौर पर अगले सप्ताह उसी दिन, पुनः बुलाया जाएगा।

“यदि कोरम पूरा नहीं होता है तो सामान्य बैठक में कोई व्यवसाय जारी नहीं रखा जाएगा। अन्यथा प्रदान किए गए को छोड़कर, एक सामान्य बैठक के लिए कोरम अधिनियम की धारा 103 के तहत प्रदान किया जाएगा।”

“बैठक का स्थगन: 

(i)अध्यक्ष, किसी भी बैठक की सहमति से, जिस पर एक कोरम मौजूद है, और यदि बैठक द्वारा ऐसा निर्देश दिया जाता है, तो समय-समय पर और स्थान से स्थान पर बैठक स्थगित कर सकता है। 

(ii) जिस बैठक से स्थगन हुआ था, उसमें अधूरा रह गया कार्य छोड़कर किसी स्थगित बैठक में कोई कार्य नहीं किया जाएगा। 

(iii) जब कोई बैठक तीस दिन या उससे अधिक के लिए स्थगित की जाती है, तो स्थगित बैठक की सूचना मूल बैठक के मामले में दी जाएगी। 

(iv) पूर्वोक्त के सिवाय, और जैसा कि अधिनियम की धारा 103 में प्रावधान किया गया है, स्थगित बैठक में स्थगन या कार्य के संव्यवहार की कोई सूचना देना आवश्यक नहीं होगा।”

उधार लेने की शक्तियां

एओए में उधार लेने की शक्तियां खंड आम तौर पर किसी भी धन को उधार लेने के लिए निदेशक मंडल के अधिकार को परिभाषित करता है। यह इन उधारों पर सीमाएं और शर्तें निर्धारित करता है, इस तरह के उधार की अनुमति के लिए विशिष्ट प्रक्रियाओं का पालन करता है। विवरण आम तौर पर निर्दिष्ट करती है कि किसके पास उधार लेने का अधिकार है, उधार लेने की सीमाएं जिसमें अनुमतियों के लिए प्रक्रियाएं और एक निर्धारित सीमा से अधिक उधार के लिए विशेष संकल्प शामिल हो सकते हैं।

लाभ और लाभांश

कंपनी का एओए शेयरधारकों को लाभांश के वितरण के लिए भी प्रदान करता है। कंपनी के मुनाफे को लाभांश के माध्यम से शेयरधारकों को वितरित किया जा सकता है। निदेशक मंडल द्वारा निर्धारित किए जाने के बाद एजीएम में लाभांश घोषित किए जाते हैं। लाभांश का भुगतान प्रत्येक शेयरधारक के व्यक्तिगत शेयरधारिता के अनुपात में किया जाता है। एओए उस प्रक्रिया को रेखांकित करता है जिसके द्वारा लाभांश घोषित किए जाते हैं। लाभांश अर्जित लाभ से घोषित किए जाते हैं और एओए में निर्दिष्ट सालाना, त्रैमासिक या अंतराल पर वितरित किए जा सकते हैं। एओए शेयरधारकों के लाभांश के अधिकार को भी निर्धारित करता है और अंतरिम लाभांश को भी अधिकृत कर सकता है।

“निदेशक मंडल कंपनी के मुनाफे पर लाभांश की सिफारिश करने के हकदार हैं। कंपनी किसी भी सामान्य बैठक में लाभांश घोषित कर सकती है बशर्ते कि यह मंडल द्वारा अनुशंसित राशि से अधिक न हो। धारा 123 के प्रावधानों के अधीन, मंडल समय-समय पर सदस्यों को ऐसे अंतरिम लाभांश का भुगतान कर सकता है जो इसे कंपनी के मुनाफे से उचित प्रतीत होते हैं।”

एओए मंडल को विभाजित के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि की सिफारिश करने से पहले रिजर्व के रूप में लाभ की एक निश्चित राशि को अलग करने की अनुमति दे सकता है। यह आम तौर पर एओए में निम्नानुसार शामिल है:

“मंडल, किसी लाभांश की सिफारिश करने से पहले कंपनी के मुनाफे में से ऐसी राशि को आरक्षित निधि के रूप में अलग रख सकता है, जिसे वह उचित समझे, जो बोर्ड के विवेक पर किसी भी उद्देश्य के लिए लागू होगी, जिसके लिए कंपनी के मुनाफे को उचित रूप से लागू किया जा सकता है।”

लाभांश और आरक्षित निधियों के संदर्भ में, एओए में ऐसे प्रावधान भी शामिल हो सकते हैं जो निर्दिष्ट करते हैं कि लाभांश, किसी भी बकाया राशि को छोड़कर, सदस्य द्वारा धारित शेयरों के अनुपात में देय होगा। भुगतान का तरीका और ढंग भी एओए में विशेष रूप से शामिल किया जाएगा।

लाभांश और आरक्षित निधियों के संदर्भ में, एओए में ऐसे प्रावधान भी शामिल हो सकते हैं जो निर्दिष्ट करते हैं कि लाभांश सदस्य द्वारा रखे गए शेयरों के अनुपात में देय है, किसी भी बकाया राशि को छोड़कर। भुगतान का तरीका और तरीका भी एओए में विशेष रूप से शामिल किया जाएगा।

मुनाफे का पूंजीकरण

लाभ का पूंजीकरण खंड आम तौर पर एओए में शामिल किया जाता है ताकि किसी कंपनी को अपने लाभ और / या आरक्षित शेयर पूंजी को परिवर्तित करने की अनुमति मिल सके। यह अक्सर पूरी तरह से भुगतान किए गए बोनस शेयर जारी करके किया जाता है। इस खंड में आम तौर पर इस बात का विवरण शामिल होता है कि बोर्ड पूंजीकरण की सिफारिश कैसे करेगा, शेयरधारक अनुमोदन प्रक्रिया क्या होगी, तथा सदस्यों की मौजूदा होल्डिंग के अनुपात में शेयर कैसे जारी किए जाएँगे। एओए निम्नलिखित तरीके से कंपनी के मुनाफे के पूंजीकरण को अधिकृत कर सकता है:

“कंपनी ने कहा, ‘कंपनी निदेशक मंडल की सिफारिश पर और शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन मौजूदा शेयरधारकों को उनकी मौजूदा हिस्सेदारी के अनुपात में पूर्ण चुकता शेयर जारी कर अपने लाभ के किसी भी हिस्से का लाभ उठा सकती है।”

लेखा और अभिलेखों की पुस्तक

एओए उस तरीके को निर्दिष्ट करता है जिसमें एक कंपनी को अपने खातों की पुस्तकों को बनाए रखना चाहिए और जिस तरीके से इसका निरीक्षण किया जा सकता है। एओए यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि कंपनी आवश्यक कानूनी और नियामक अनुपालन आवश्यकताओं का अनुपालन करती है, जो कंपनी की पहचान के अनुरूप होती है, जिसमें वार्षिक रिटर्न दाखिल करना, कंपनी की रिपोर्टिंग आवश्यकताओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्र-विशिष्ट नियमों को निर्दिष्ट करना शामिल है। इसे निम्नानुसार शामिल किया जा सकता है:

“कंपनी अपने पंजीकृत कार्यालय में खातों की उचित पुस्तकों का रखरखाव करेगी। पुस्तकों को व्यावसायिक घंटों के दौरान निदेशकों द्वारा निरीक्षण के लिए खुला रखा जाएगा और कंपनी के नियुक्त लेखा परीक्षकों द्वारा वार्षिक लेखा परीक्षा के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।”

एओए में स्थापित मानकों के अनुसार ऑडिट और वित्तीय विवरणों की तैयारी के लिए विवरण और आवश्यकताएं भी शामिल हो सकती हैं।

गैर-याचना और गोपनीयता

किसी कंपनी के एओए में व्यापार रहस्यों, कंपनी की जानकारी और अन्य गोपनीय जानकारी की रक्षा के लिए गोपनीयता खंड शामिल हो सकते हैं। इन प्रावधानों में कंपनी के प्रत्येक प्रमुख अधिकारी, निदेशक या सदस्य की विशिष्ट आवश्यकताएं भी शामिल हो सकती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कंपनी की जानकारी की गोपनीयता बनी रहे और साथ ही इन प्रावधानों के उल्लंघन के लिए दंड भी लगाया जा सके। गोपनीयता और गैर-याचना के संदर्भ में समाप्ति या रोजगार की आवश्यकताओं को भी इस खंड के विवरण में शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए:

कंपनी के निदेशक, अधिकारी और कर्मचारी कंपनी के व्यवसाय, वित्त, आंतरिक प्रक्रियाओं, बौद्धिक संपदा और गोपनीय समझी जाने वाली किसी भी अन्य मालिकाना जानकारी से संबंधित किसी भी जानकारी के संबंध में सख्त गोपनीयता के लिए बाध्य होंगे। कानून द्वारा आवश्यक के अलावा, कोई भी सदस्य, निदेशक या कर्मचारी मंडल से पूर्व लिखित सहमति के बिना तीसरे पक्ष को किसी भी गोपनीय जानकारी का खुलासा नहीं करेगा। इस दस्तावेज के इस प्रावधान के उल्लंघन से संबंधित व्यक्ति (व्यक्तियों) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”

क्षतिपूर्ति 

एओए में, एक क्षतिपूर्ति खंड आम तौर पर कंपनी के निदेशकों, प्रमुख अधिकारियों और कर्मचारियों को अच्छे विश्वास में अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते समय किए गए देनदारियों से बचाने के लिए शामिल किया जाता है। अधिनियम की अनुसूची I के अनुसार, इस खंड का मसौदा निम्नानुसार तैयार किया जा सकता है:

“कंपनी के प्रत्येक अधिकारी को किसी भी कार्यवाही का बचाव करने में उसके द्वारा किए गए किसी भी दायित्व के खिलाफ कंपनी की संपत्ति से क्षतिपूर्ति की जाएगी, चाहे वह सिविल हो या आपराधिक, जिसमें निर्णय उसके पक्ष में दिया गया है या जिसमें उसे बरी कर दिया गया है या जिसमें न्यायालय या अधिकरण द्वारा उसे राहत दी गई है। यह सद्भाव में अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रदर्शन के दौरान उसके द्वारा किए गए किसी भी दायित्व तक सीमित होगा।”

उपसंहार

एओए में कंपनी अधिनियम के प्रावधानों की आवश्यकताओं के अनुरूप कंपनी को बंद करने की प्रक्रिया का विवरण दिया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि बंद होने की स्थिति में कंपनी की परिसंपत्तियों को कंपनी के शेयरधारकों के बीच कैसे वितरित किया जाएगा। इस खंड को निम्नलिखित तरीके से तैयार किया जा सकता है:

कंपनी का समापन अधिनियम के अध्याय 20 या दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के प्रावधानों और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार किया जाएगा।

इन प्रावधानों के अधीन, यदि कंपनी को बंद कर दिया जाएगा, तो परिसमापक, कंपनी के एक विशेष संकल्प की मंजूरी के साथ, सदस्यों के बीच, कंपनी की संपत्ति के पूरे या किसी भी हिस्से को विभाजित कर सकता है।”

विवाद समाधान

एओए में विवाद समाधान प्रावधान कंपनी, निदेशकों और शेयरधारकों के बीच संभावित संघर्षों को संबोधित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एओए आम तौर पर मुकदमेबाजी जैसी पारंपरिक कानूनी प्रथाओं का सहारा लेने से पहले आंतरिक रूप से विवादों को हल करने के लिए तंत्र की रूपरेखा तैयार करता है। एओए किसी भी विवाद के लिए लागू क्षेत्राधिकार और शासी कानून को भी निर्दिष्ट कर सकता है। ये विवाद समाधान खंड संघर्षों को कम करने में मदद करते हैं, प्रक्रिया पर स्पष्टता प्रदान करते हैं और इसमें शामिल सभी हितधारकों के हितों की रक्षा करते हैं। एओए में विवाद समाधान खंड के विवरण  पक्षों के बीच किसी भी समझौते के समान है और इसे निम्नानुसार तैयार किया जा सकता है:

“इन अनुच्छेदों से उत्पन्न होने वाले किसी भी विवाद या दावे की स्थिति में या किसी भी सदस्य या कंपनी के अधिकारों और दायित्वों के संबंध में, पक्ष पहले आपसी परामर्श के माध्यम से विवाद को हल करने का प्रयास करेंगे। यदि अनसुलझा है, तो विवाद को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के अधीन मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा। मध्यस्थता का स्थान बैंगलोर, भारत होगा और मध्यस्थ निर्णय सभी पक्षों पर अंतिम और बाध्यकारी होगा।”

एओए में संशोधन

अब जब हमने कंपनी के आंतरिक प्रबंधन और गतिविधियों से संबंधित एओए के विवरण पर विस्तार से बताया है, तो सवाल उठता है कि क्या इन प्रावधानों को एक बार मसौदा तैयार करने और जारी करने के बाद संशोधित किया जा सकता है। एओए में एओए के संशोधन के लिए प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं। आम तौर पर, एओए यह रेखांकित करता है कि इसके प्रावधानों में किसी भी संशोधन, परिवर्धन या विलोपन के लिए एक विशेष प्रस्ताव के माध्यम से शेयरधारकों की मंजूरी की आवश्यकता होती है। संशोधित एओए को निर्धारित समय अवधि के भीतर रजिस्ट्रार के पास दायर किया जाना चाहिए। कंपनी अधिनियम, 2013 की सांविधिक अपेक्षाओं का अनुपालन करने के लिए एओए के संशोधन की सभी प्रक्रियाओं के लिए यह आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रस्तावित परिवर्तन और एओए में स्थापित प्रक्रियाएं कंपनी की व्यावसायिक योजना, रणनीति और उद्देश्यों के अनुरूप हैं। 

उदाहरण के लिए, एओए के संशोधन से संबंधित एओए खंड को निम्नलिखित तरीके से तैयार किया जा सकता है:

“एओए में किए गए बदलावों के लिए कंपनी अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुसार एक विशेष प्रस्ताव के माध्यम से शेयरधारकों की मंजूरी की आवश्यकता होती है।”

खाई प्रावधान

एओए में प्रवेश प्रावधान शामिल हो सकते हैं। प्रवेश की अवधारणा को पहली बार कंपनी अधिनियम, 2013 में पेश किया गया था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, “प्रवेश” शब्द का अर्थ है एक दृष्टिकोण, आदत या विश्वास को इतनी दृढ़ता से स्थापित करना कि परिवर्तन बहुत मुश्किल या असंभव हो। एक अतिक्रमण खंड एक प्रावधान को संदर्भित करता है जो एओए के कुछ प्रावधानों में संशोधन करना मुश्किल या असंभव बनाता है। 

कंपनी के पास अपने एओए में प्रवेश प्रावधानों को शामिल करने का विवेक है। ऐसा प्रावधान इस आशय से संबंधित हो सकता है कि लेखों के निर्दिष्ट प्रावधानों को केवल तभी बदला जा सकता है जब शर्तों या प्रक्रियाओं को विशेष संकल्प के मामले में लागू होने की तुलना में अधिक प्रतिबंधात्मक माना जाता है या उनका अनुपालन किया जाता है। कंपनी के निगमन के समय, या कंपनी के एओए में संशोधन के माध्यम से कंपनी के निगमन के बाद एक प्रवेश प्रावधान किया जा सकता है।

किसी कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का प्रारूप कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची I में प्रदान किए गए फॉर्म द्वारा निर्धारित तरीके से होना चाहिए।

आम तौर पर, एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी का एओए शुरू से ही विशेषज्ञों और पेशेवर सलाह के मार्गदर्शन में तैयार किया जाता है। निजी सीमित कंपनियां जो अपने स्वयं के एओए को फ्रेम करती हैं, उन्हें सतर्क रहना चाहिए और एओए का मसौदा तैयार करते समय निम्नलिखित पर नजर रखनी चाहिए:

  • मॉडल लेख कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत प्रदान किए जाते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी कंपनी के निगमन के चरण में “लेखों की तैयारी” का अर्थ अनिवार्य रूप से उन मॉडल लेखों को अपनाना है, शायद प्रवर्तक द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधित रूप में। 
  • प्रवर्तक को मॉडल लेखों में किसी भी प्रावधान को जोड़ने, बदलने या हटाने की अत्यधिक अनुशंसा नहीं की जाती है। वास्तव में कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची I में विभिन्न प्रकार की कंपनियों के लिए मानक लेख निर्दिष्ट किए गए हैं, ताकि मॉडल लेखों में बुनियादी प्रावधान हों। 
  • संशोधन केवल तभी किया जाना चाहिए जब किसी नए कानून को लागू करने या किसी कंपनी के उद्देश्य में सहायता करने के लिए यह बिल्कुल आवश्यक हो। 
  • मॉडल लेख में किए गए किसी भी परिवर्धन या परिवर्तन को कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों की सावधानीपूर्वक जांच के साथ किया जाना चाहिए।

अब जब हम एओए के आवश्यक विवरण को समझ गए हैं जो किसी कंपनी के आंतरिक कामकाज को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने के लिए आवश्यक हैं, तो यह स्पष्ट है कि एओए एक कंपनी के मूलभूत दस्तावेज के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तथापि, एओए का प्राधिकार पूर्ण नहीं है। तो, क्या होता है जब एओए और एमओए के बीच संघर्ष होता है?

एओए के विवरण पर एमओए का अधिभावी प्रभाव

जैसा कि आपने लेख में पहले देखा होगा, एओए को हमेशा किसी भी कंपनी के एमओए के साथ पढ़ा जाना चाहिए और दोनों के बीच किसी भी संघर्ष के मामले में, एमओए के विवरण एओए पर प्रबल होती है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि एमओए कंपनी की गतिविधियों की मुख्य शक्तियों और दायरे को परिभाषित करता है, और एओए यह बताता है कि कंपनी को उन परिभाषित शक्तियों के भीतर कैसे प्रबंधित किया जाएगा।

उदाहरण के लिए, यदि एमओए ने कंपनी के उद्देश्य को विनिर्माण क्षेत्र में गतिविधियों को करने के रूप में परिभाषित किया है, तो एओए कंपनी या उसके किसी भी अधिकारी और निदेशकों को वित्तीय गतिविधियों को करने के लिए अधिकृत नहीं कर सकता है।

  • एमओए और एओए के विवरण के बीच संबंध को इन प्रमुख सिद्धांतों के माध्यम से समझा जा सकता है:
  • अधिकारातीत सिद्धांत: इस सिद्धांत का अर्थ है कि यदि किसी कंपनी द्वारा अपने एमओए के दायरे से बाहर कुछ भी किया जाता है, तो इसे अधिकारातीत या कंपनी की शक्तियों से परे कहा जाएगा, और इसलिए यह शून्य है। किसी कंपनी का एओए किसी भी कार्रवाई को मंजूरी नहीं दे सकता है जिसे एमओए मना करता है, इस प्रकार एओए पर एमओए के ओवरराइडिंग प्रभाव को दोहराता है। 
  • यह सिद्धांत एशबरी रेलवे कैरिज एंड आयरन कंपनी बनाम रिचे (1875) के मामले में स्थापित किया गया था जिसमें कंपनी ने रेलवे के निर्माण के लिए धन उपलब्ध कराने के लिए एक समझौता किया था, एक ऐसा कार्य जो मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) में बताए गए उद्देश्यों का हिस्सा नहीं था। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुबंध कंपनी की शक्तियों से परे था और इसलिए अमान्य था।
  • रचनात्मक सूचना (कंस्ट्रक्टिव नोटिस) का सिद्धांत: एमओए एक सार्वजनिक दस्तावेज है, और जो कोई भी कंपनी के साथ काम करता है उसे इसके विवरण के बारे में पता माना जाता है। इस प्रकार, यदि किसी कंपनी का एओए एमओए द्वारा निर्धारित शक्तियों से परे कुछ अधिकृत करता है, तो यह कंपनी के खिलाफ लागू करने योग्य नहीं है, क्योंकि तीसरे पक्ष को एमओए के विवरण को जानने के लिए माना जाता है।
  • इनडोर प्रबंधन का सिद्धांत: यह एक ऐसा सिद्धांत है जो अनिवार्य रूप से एओए के विवरण द्वारा परिभाषित कंपनी के आंतरिक प्रबंधन में अनियमितताओं से तीसरे पक्ष को प्रभावित होने से बचाता है। तीसरे पक्ष को कंपनी के एमओए के बारे में पता होना चाहिए, लेकिन एओए में प्रदान किए गए आंतरिक प्रबंधन के विवरण के बारे में नहीं। यदि तीसरे पक्ष अच्छे विश्वास में अनुबंध में प्रवेश करते हैं, तो वे मान सकते हैं कि कंपनी ने एओए के विवरण में निर्धारित आंतरिक नियमों का अनुपालन किया है। उदाहरण के लिए, यदि कोई निदेशक कंपनी की ओर से अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है, तो कोई तीसरा पक्ष यह पूछताछ करने के लिए कर्तव्यबद्ध नहीं है कि क्या निदेशक का अधिकार एओए के तहत उचित रूप से प्रत्यायोजित किया गया था।

यह सिद्धांत रॉयल ब्रिटिश बैंक बनाम टर्कंद (1856) के मामले में स्थापित किया गया था, जहां न्यायालय ने विशेष रूप से फैसला सुनाया था कि किसी कंपनी के साथ सद्भाव में काम करने वाला कोई भी तीसरा पक्ष यह मान सकता है कि एओए के विवरण में उल्लिखित सभी आंतरिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार तीसरे पक्ष को संरक्षित किया जाता है बशर्ते कि अधिनियम अपने आप में अधिकारातीत न हो।

निष्कर्ष 

एओए एक कंपनी के आंतरिक प्रबंधन की रीढ़ के रूप में कार्य करता है, जो इसके शासन और संचालन के लिए एक विस्तृत ढांचा प्रदान करता है। यह निदेशकों, शेयरधारकों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं की भूमिका सहित आंतरिक मामलों को विनियमित करके एमओए को पूरक करता है। यह सुनिश्चित करता है कि कंपनियां पारदर्शी, कुशलतापूर्वक और कानूनी आवश्यकताओं के अनुपालन में काम करती हैं। यह कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि किसी कंपनी का एओए एमओए या कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के विवरण का खंडन या ओवरराइड नहीं कर सकता है। इसके अतिरिक्त, एओए एमओए के अनुरूप होना चाहिए। 

इसलिए, हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि जब किसी कंपनी को निगमित किया जा रहा है और एओए का मसौदा तैयार किया जाता है, तो उस एओए के विवरण को कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों और उस समय लागू किसी भी अन्य प्रासंगिक कानूनों के अनुसार एमओए के साथ संरेखित होना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या एओए के विवरण  कंपनी अधिनियम 2013 के वैधानिक प्रावधानों को ओवरराइड कर सकती है?

नहीं, एओए के विवरण कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत किसी भी वैधानिक प्रावधान को ओवरराइड नहीं कर सकती है। कंपनी अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, यदि एओए का कोई प्रावधान कंपनी अधिनियम के किसी वैधानिक प्रावधान का खंडन करता है, तो एओए कंपनी अधिनियम के किसी वैधानिक प्रावधान पर प्रबल होगा। 

उदाहरण के लिए, कंपनी अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि 1000 या उससे कम सदस्यों वाली सार्वजनिक कंपनी द्वारा आयोजित एक सामान्य बैठक के लिए कम से कम 5 सदस्यों के कोरम की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उस सार्वजनिक कंपनी का एओए कहता है कि एक सामान्य बैठक के लिए आवश्यक कोरम 2 सदस्य है, तो यह एक वैध खंड नहीं होगा। 

एओए विभिन्न वर्गों के शेयरों को जारी करने को कैसे नियंत्रित करता है?

एओए इक्विटी शेयरों और वरीयता शेयरों सहित शेयरों के विभिन्न वर्गों के निर्माण और जारी करने को विनियमित करने के लिए नियमों की रूपरेखा तैयार करता है। यह शेयरों के इन वर्गों में से प्रत्येक से जुड़े अधिकारों को भी निर्दिष्ट करता है, जैसे कि मतदान अधिकार, विभाजित अधिकार और समापन और विघटन से संबंधित अधिकार। इन अधिकारों में कोई भी परिवर्तन, जैसे वरीयता शेयर लाभांश में फेरबदल, को एओए में निर्धारित अलग-अलग वर्ग अधिकारों के लिए प्रक्रियाओं और कंपनी अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों का पालन करना चाहिए।

एओए कंपनी के निदेशकों और अन्य अधिकारियों की क्षतिपूर्ति को कैसे संबोधित कर सकता है?

एओए में क्षतिपूर्ति प्रावधान हो सकते हैं। ये प्रावधान निदेशकों, अधिकारियों और अन्य प्रमुख कर्मचारियों की उनके आधिकारिक कर्तव्यों से उत्पन्न होने वाली किसी भी देनदारियों के खिलाफ क्षतिपूर्ति से निपट सकते हैं, बशर्ते कि इस तरह की क्षतिपूर्ति कानून के अनुरूप हो।

क्या किसी कंपनी का एओए उस कंपनी और उसके सदस्यों की उधार लेने की शक्तियों को विनियमित कर सकता है?

एओए में ऐसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं जो कंपनी की उधार सीमा और शक्तियों को नियंत्रित करते हैं, जिससे निदेशक मंडल को पूंजी जुटाने, बांड या डिबेंचर जारी करने और ऋण प्राप्त करने का अधिकार मिलता है। यह कुछ थ्रेसहोल्ड भी निर्धारित कर सकता है और कंपनी को शेयरधारक की मंजूरी के बिना सीमा से परे उधार लेने से प्रतिबंधित कर सकता है।

संदर्भ

व्यापार चिन्ह अधिनियम 1999 की धारा 17 

यह लेख Janvi Badiyani द्वारा लिखा गया है, जिसमें व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें समग्र व्यापार चिन्ह (कॉम्पोज़िट ट्रेडमार्क) पर दिए गए विशिष्ट अधिकारों और व्यावहारिक प्रभावों को उजागर करने के लिए प्रासंगिक (रिलेवेंट) मामलों का विवरण दिया गया है। इसके अलावा, लेख व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 और धारा 15 के बीच तुलना करता है, जो व्यापार चिन्ह संरक्षण में उनकी संबंधित भूमिकाओं पर केंद्रित है।  इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

परिचय

व्यापार चिन्ह पंजीकरण बौद्धिक संपदा अधिकार (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण शाखाओं में से एक है, जो मालिक को उन वस्तुओं और सेवाओं के संदर्भ में व्यापार चिन्ह का विशेष अधिकार प्रदान करता है, जिनके लिए इसे पंजीकृत किया गया है। जब किसी व्यापार चिन्ह में शब्दों, लोगो या डिज़ाइनों जैसे कई भाग होते हैं, तो संरक्षण का दायरा जटिल हो सकता है।  

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 (जिसे आगे टी.एम.अधिनियम कहा गया है) इस प्रकार के व्यापार चिन्ह के केवल कुछ विशिष्ट भागों के पंजीकरण के परिणामों को स्पष्ट करती है। यह धारा इस बात पर जोर देती है कि टी.एम. अधिनियम के तहत प्रदान किया गया संरक्षण पूरे व्यापार चिन्ह को उसके पंजीकृत रूप में शामिल करता है। यदि व्यापार चिन्ह एक समग्र चिह्न है, तो अधिकार उसके संयुक्त रूप तक फैले होते हैं। हालांकि, यह ध्यान देना आवश्यक है कि यदि व्यापार चिन्ह के व्यक्तिगत भागों को अलग से पंजीकृत नहीं किया गया है, तो उन्हें पूरे चिह्न के समान स्तर का संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता है।  

धारा 17 व्यापार चिन्ह से संबंधित कानूनी कार्यवाही में भी स्पष्टता प्रदान करती है। यह संरक्षण और प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) के दायरे को निर्धारित करने में मदद करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पंजीकृत व्यापार चिन्ह को उसके पूर्ण रूप में अनधिकृत उपयोग या उल्लंघन से सुरक्षित किया गया है। यह समग्र संरक्षण व्यापार चिन्ह मालिकों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बाजार में उनके चिह्नों की विशिष्टता और अखंडता बनाए रखता है।

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17: चिह्न के भागों के पंजीकरण का प्रभाव 

व्यापार चिन्ह के विभिन्न भागों का संरक्षण उनके विशिष्टता और अलग से पंजीकृत होने पर निर्भर करता है। टी. एम. अधिनियम की धारा 17, जो चिह्न के भागों के पंजीकरण के परिणामों से संबंधित है, स्पष्ट रूप से कहती है कि एक समग्र चिह्न (कॉम्पोजिट मार्क) का पंजीकरण पूरे चिह्न को संरक्षण प्रदान करता है, लेकिन पूरे चिह्न के किसी भाग को तभी संरक्षित किया जाएगा जब वह अलग से पहचानने योग्य हो और पंजीकृत हो।  

इसका मतलब यह है कि व्यापार चिन्ह के प्रत्येक घटक (एलिमेंट) के संरक्षण के लिए, व्यवसाय को अलग-अलग पंजीकरण पर विचार करना चाहिए, भले ही व्यवसाय में प्रतीक चिन्ह (लोगो), नारे (स्लोगन्स) और  बिल्ले (बैज) शामिल हों, जो किसी व्यवसाय के महत्वपूर्ण भाग होते हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि व्यवसाय समग्र व्यापार चिन्ह के संरक्षण के लिए आवेदन करता है, तो प्रतीक चिन्ह और टैगलाइन अन्य कंपनियों द्वारा उल्लंघन का शिकार हो सकते हैं।  

इसके अलावा, यह जानना आवश्यक है कि केवल वे शब्द और डिज़ाइन जो स्पष्ट माने जा सकते हैं, स्वतंत्र रूप से व्यापार चिन्ह कानूनों द्वारा संरक्षित नहीं हो सकते। हालांकि, जब इन्हें अन्य विशिष्ट विशेषताओं के साथ जोड़ा जाता है, तो ये तत्व सामूहिक रूप से एक अद्वितीय समग्र चिह्न बना सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धियों के लिए इसका उल्लंघन करना कठिन हो जाता है।

 धारा 17 का उपधारा-वार विश्लेषण

टी. एम. अधिनियम की धारा 17 व्यापार चिन्ह के पंजीकरण के प्रभाव से संबंधित है, जिसमें विभिन्न भाग शामिल होते हैं। यह जानने के लिए यह धारा महत्वपूर्ण है कि एक समग्र व्यापार चिन्ह किस हद तक संरक्षित होगा, जिसमें शब्द, डिज़ाइन, प्रतीक चिन्ह या कोई अन्य ग्राफिक विशिष्ट चिह्न शामिल हो सकते हैं। नीचे धारा 17 का उपधारा-वार विश्लेषण दिया गया है:  

धारा 17(1) कहती है कि व्यापार चिन्ह को दिए गए अधिकारों को दूसरों द्वारा अनधिकृत उपयोग से संरक्षित किया जाना चाहिए। जैसा कि दुनिया के अधिकांश देशों में होता है, ये सुरक्षा अत्यावश्यक हैं। टी.एम. अधिनियम की धारा 17(1) व्यापार चिन्ह के उस मालिक को, जिसका व्यापार चिन्ह कई तत्वों से बना होता है, उसके उपयोग के लिए विशेष अधिकार प्रदान करती है। जब कोई व्यापार चिन्ह पंजीकृत किया जाता है, तो यह पूरे चिह्न की सुरक्षा करता है, जिसमें इसके सभी भाग शामिल होते हैं, जैसे ब्रांड का नाम, प्रतीक चिन्ह या रंग, न कि प्रत्येक भाग को अलग-अलग संरक्षित करता है। इन प्रावधानों का मुख्य प्रभाव यह है कि पूरे व्यापार चिन्ह को तीसरे पक्ष द्वारा अतिक्रमण से बचाया जाता है, और मालिक को चिह्न के उपयोग का विशेष अधिकार प्रदान किया जाता है।

यह धारा विशेष रूप से संयुक्त व्यापार चिन्ह के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें कई घटक शामिल होते हैं, जो मिलकर व्यापार चिन्ह बनाते हैं। संयुक्त चिह्न का पंजीकरण यह सुनिश्चित करता है कि प्रतिद्वंद्वी किसी ऐसे संकेत का उपयोग नहीं कर सकते, जो इस अधिनियम के तहत पंजीकृत चिह्न के समान या उससे मेल खाता हो। विस्तृत सुरक्षा दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि चिह्न के किसी भी पहलू का ऐसा उपयोग न किया जाए, जो उपभोक्ताओं में भ्रम पैदा करे, और इस प्रकार व्यापार चिन्ह की विशिष्टता और प्रतिष्ठा की रक्षा की जा सके।

संयुक्त व्यापार चिन्ह का मालिक किसी तीसरे पक्ष द्वारा पंजीकृत व्यापार चिन्ह से मिलते-जुलते चिह्न के उपयोग के खिलाफ कानूनी उपाय प्राप्त कर सकता है। इस सुरक्षा का औचित्य (जस्टिफिकेशन) ब्रांड की विश्वसनीयता बनाए रखना और ग्राहकों को गुमराह होने से बचाना है। यहां, अदालत बाजार में भ्रम की संभावना पर विचार करेगी, जब वह चिह्न की समानता का मूल्यांकन करेगी। व्यापार चिन्ह की उत्पत्ति को संरक्षित किया जाता है और प्रतिस्पर्धियों को इसके उपयोग या इसके मूल्य को कम करने से रोका जाता है, जैसा कि धारा 17(1) के तहत दी गई सुरक्षा में प्रावधान है।    

धारा 17(2) चिह्न के खंडों के लिए विशेष स्थिति प्रदान करती है। यह समग्र चिह्न के भागों पर मालिक द्वारा लागू किए जाने वाले संरक्षण अधिकारों पर महत्वपूर्ण सीमाएँ (लिमिटेशंस) लगाती है। यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यापार चिन्ह कई विशेषताओं को शामिल करता है, तो उनमें से केवल कुछ ही को व्यक्तिगत रूप से संरक्षित किया जाता है, और केवल इन्हीं तत्वों पर विशेष अधिकार हो सकते हैं।  

यदि व्यापार चिन्ह में ऐसे तत्व शामिल हैं जो व्यक्तिगत रूप से पंजीकृत नहीं हैं, तो मालिक उन विशिष्ट भागों पर विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, यदि तत्व सामान्य या व्यापार में प्रचलित हैं, तो पंजीकरण प्रत्येक व्यक्तिगत घटक पर स्वामित्व अधिकार प्रदान नहीं करता।  

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यापार चिन्ह किसी प्रतीक चिन्ह के रूप में आकृति और उत्पाद के नाम को शब्द के रूप में शामिल करता है, तो शब्द स्वयं तब तक संरक्षित नहीं होगा जब तक उसे अलग से पंजीकृत न किया जाए। यह दर्शाता है कि समग्र व्यापार चिन्ह के मालिकों को व्यापक कानूनी संरक्षण प्राप्त करने के लिए व्यापार चिन्ह के प्रत्येक भाग को पंजीकृत कराने की आवश्यकता है।  

व्यावहारिक उदाहरण और अनुप्रयोग

समग्र चिह्न : यह एक ऐसा चिह्न है जो शब्दों, अंकों या किसी प्रतीक को एक आकृतिबद्ध या साहित्यिक उपकरण के साथ संयोजित करता है। उदाहरण के लिए, एक कंपनी ‘फ्रेश फ्रूट’ नामक ब्रांड के साथ एक व्यापार चिन्ह पंजीकृत करना चाहती है, जिसमें एक सेब और पत्ते की आकृति का चित्रण किया गया है। धारा 17(1) के अनुसार, कंपनी को पूरे व्यापार चिन्ह पर पूर्ण अधिकार हैं।  

धारा 17(2) के अनुसार, यदि “फ्रेश फ्रूट” जैसा वाक्यांश (फ्रेस) अपने आप में पंजीकृत नहीं है, तो व्यापार चिन्ह का मालिक दूसरों को इसका उपयोग करने से नहीं रोक सकता। इसी प्रकार, यदि पारले का प्रतीक चिन्ह बिस्किट उद्योग में आमतौर पर उपयोग किया गया हो, तो पारले विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता जब तक कि इसे अलग से विशिष्ट रूप से पंजीकृत न किया जाए।  

कानूनी विवादों में अनुप्रयोग: व्यापार चिन्ह उल्लंघन से संबंधित कानूनी विवादों में, अदालतें अक्सर समग्र चिह्न का मूल्यांकन करती हैं कि क्या किसी अन्य चिह्न के साथ भ्रम की संभावना है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि प्रतिवादी केवल पंजीकृत व्यापार चिन्ह के कुछ हिस्से का उपयोग करता है, जैसे कि कुछ ग्राफिक या साहित्यिक तत्व, तो यह हमेशा उल्लंघन नहीं माना जाता।  

यदि उन तत्वों का उपयोग उद्योग में अन्य व्यवसायों द्वारा व्यापक रूप से किया जाता है, तो अदालत यह निष्कर्ष निकाल सकती है कि वे विशेष रूप से मूल व्यापार चिन्ह द्वारा संरक्षित नहीं हो सकते। इस प्रकार, पंजीकृत चिह्न के आंशिक उपयोग से तब तक उल्लंघन नहीं होता जब तक कि यह उपभोक्ताओं को भ्रमित नहीं करता या वस्तुओं या सेवाओं के स्रोत के बारे में गुमराह नहीं करता। यह दृष्टिकोण व्यापार चिन्ह मालिकों के अधिकारों की रक्षा और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाए रखता है।

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 के प्रभाव और प्रायोगिक अनुप्रयोग  

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 उन जटिल या समग्र व्यापार चिन्ह, जिनमें शब्द, प्रतीक चिन्ह, प्रतीक, रंग और टैगलाइन शामिल हैं, के मामले में भ्रम को कम करने के लिए अत्यधिक प्रभावी है। जैसा कि धारा 17 द्वारा प्रदान किया गया है, जब एक समग्र व्यापार चिन्ह पंजीकृत होता है, तो पूरे चिह्न को एक सम्पूर्ण रूप में संरक्षण दिया जाता है। हालांकि, यदि चिह्न के व्यक्तिगत घटक अलग से पहचानने योग्य नहीं होते और चिह्न को अलग से पंजीकृत नहीं किया गया है, तो वे संरक्षित नहीं होते।  

यह विशेष रूप से  बहुमाध्यम (मल्टीमीडिया) व्यापार चिन्ह के मामले में होता है, और अब लगभग किसी भी आधुनिक ब्रांडिंग में, जब कंपनियां दृश्य, पाठ और डिज़ाइन तत्वों के जटिल संयोजन का उपयोग करती हैं। धारा 17 ब्रांड मालिकों द्वारा उत्पाद के कुछ पहलुओं पर एकाधिकार (मनॉपली) करने के प्रयासों के खिलाफ संरक्षण प्रदान करती है और दूसरों को समान तत्वों के उपयोग से रोकती है, यह कहती है कि उन्हें प्रत्येक अलग घटक को पंजीकृत करना होगा। उदाहरण के लिए, जब एक ब्रांड प्रतीक चिन्ह और एक नारे को समग्र व्यापार चिन्ह के घटक के रूप में उपयोग करता है, तो प्रत्येक भाग को अलग से पंजीकरण के लिए आवेदन करना होगा ताकि उनके संरक्षण में कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकें।

 

अन्य प्राधिकरणों ने नए न्यायिक निर्णयों के अनुसार धारा 17 के अर्थ को मजबूती से पुष्ट किया है। अदालतों ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि हालांकि समग्र व्यापार चिन्ह का पंजीकरण व्यापक कवरेज प्रदान करता है, इस संरक्षण की सीमाएं चिह्न के गैर-विशिष्ट या किसी भी अपंजीकृत भाग को शामिल नहीं करतीं। व्यापार चिन्ह मालिक को यह साबित करना होगा कि इसके तत्व, जैसे शब्द, वाक्यांश, या प्रतीक, उपयोग के माध्यम से विशिष्टता प्राप्त कर चुके हैं, ताकि उन्हें अलग से पंजीकरण और संरक्षण प्राप्त हो सके।  

व्यापार चिन्ह कानून में धारा 17 का व्यापक संरक्षण 

व्यापार चिन्ह मालिकों के लिए जो समग्र चिह्न और इसके व्यक्तिगत तत्वों दोनों का व्यापक संरक्षण चाहते हैं, मुख्य कानूनी प्रावधान व्यापार चिन्ह अधिनियम के तहत पाया जाता है। समग्र व्यापार चिन्ह के मामले में, इसके प्रत्येक घटक को तब तक रोका नहीं जा सकता जब तक कि, अपनी अलग स्थिति में, वह एक अलग रूप न ले और उसे व्यक्तिगत रूप से पंजीकृत न किया जाए। यह विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो प्रतीक चिन्ह, आकर्षक वाक्यांशों, और रंग संयोजनों सहित बहु-तत्व व्यापार चिन्ह का उपयोग करके ब्रांड जागरूकता पैदा करती हैं। फिर भी, इन व्यक्तिगत तत्वों का संरक्षण विशिष्टता और अलग पंजीकरण के लिए विशिष्ट मानदंडों का पालन करने पर निर्भर है।  

धारा 17 का व्यापार चिन्ह सुरक्षा के लिए प्रायोगिक अनुप्रयोग है। उदाहरण के लिए, एक व्यवसाय एक व्यापार चिन्ह पंजीकृत कर सकता है जिसमें यादगार ग्राफिक और सूचनात्मक नारे शामिल हैं। जबकि कंपनी को संयुक्त चिह्न पर विशेष अधिकार प्राप्त हैं, प्रतिस्पर्धी अभी भी एक समान वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) टैगलाइन का उपयोग कर सकते हैं, जब तक कि वह टैगलाइन अलग से पंजीकृत नहीं हो और द्वितीयक अर्थ प्राप्त न कर लिया हो।  

व्यापार चिन्ह मालिकों के लिए जो समग्र चिह्न और इसके व्यक्तिगत तत्वों दोनों का व्यापक संरक्षण चाहते हैं, मुख्य कानूनी प्रावधान व्यापार चिन्ह अधिनियम के तहत पाया जाता है। समग्र व्यापार चिन्ह के मामले में, इसके प्रत्येक घटक को तब तक रोका नहीं जा सकता जब तक कि, अपनी अलग स्थिति में, वह एक अलग रूप न ले और उसे व्यक्तिगत रूप से पंजीकृत न किया जाए। यह विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो लोगो, आकर्षक वाक्यांशों, और रंग संयोजनों सहित बहु-तत्व व्यापार चिन्ह का उपयोग करके ब्रांड जागरूकता पैदा करती हैं। फिर भी, इन व्यक्तिगत तत्वों का संरक्षण विशिष्टता और अलग पंजीकरण के लिए विशिष्ट मानदंडों का पालन करने पर निर्भर है।  

 

धारा 17 का व्यापार चिन्ह सुरक्षा के लिए व्यावहारिक अनुप्रयोग है। उदाहरण के लिए, एक व्यवसाय एक व्यापार चिन्ह पंजीकृत कर सकता है जिसमें यादगार ग्राफिक और सूचनात्मक नारे शामिल हैं। जबकि कंपनी को संयुक्त चिह्न पर विशेष अधिकार प्राप्त हैं, प्रतिस्पर्धी अभी भी एक समान वर्णनात्मक टैगलाइन का उपयोग कर सकते हैं, जब तक कि वह टैगलाइन अलग से पंजीकृत नहीं हो और द्वितीयक अर्थ प्राप्त न कर लिया हो।  

एक व्यापार चिन्ह के भाग 

एक व्यापार चिन्ह केवल इस कारण से मूल्यवान (वैल्यूएबल) नहीं है क्योंकि यह जनता को किसी कंपनी के उत्पादों या सेवाओं को प्रतिस्पर्धियों के उत्पादों या सेवाओं से आसानी से अलग पहचानने में मदद करता है, बल्कि इस कारण से भी कि व्यापार चिन्ह के प्रत्येक व्यक्तिगत घटक इसके अद्वितीयता (यूनीकनेस) में योगदान करते हैं। इन घटकों की विशिष्टता ब्रांड की समग्र मूल्य और पहचान को बढ़ाती है। एक कंपनी का यह विशिष्ट चिह्न शब्दों या प्रतीक चिन्ह, रंगों, रूपों और ध्वनियों से मिलकर बन सकता है, और ये सभी तत्व व्यापार चिन्ह का हिस्सा होते हैं। इसलिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि इन व्यक्तिगत घटकों का क्या भूमिका है और व्यापार चिन्ह और कानूनी नीति तैयार करते समय इन्हें किस सीमा तक सुरक्षा प्राप्त होगी।

  1. शब्द चिन्ह (वर्ड मार्क्स): व्यापार चिन्ह का सबसे बुनियादी रूप शब्द चिन्ह है। यह अक्सर ब्रांड नाम या एक लोकप्रिय टैगलाइन होती है जो उत्पाद या सेवा के साथ जुड़ी होती है, जिसे प्रचारित किया जा रहा होता है। शब्द चिन्ह शक्तिशाली होते हैं क्योंकि, शब्द के माध्यम से, उपभोक्ता चिह्न को समझ सकते हैं, याद रख सकते हैं और उससे जुड़ सकते हैं।  एक व्यापार चिन्ह केवल नाम या प्रतीक चिन्ह से अधिक होता है; यह एक ब्रांड की पहचान को दर्शाता है। प्रसिद्ध व्यापार चिन्ह जैसे कोका-कोला, एप्पल, या नाइकी खुद कंपनियों के साथ पर्याय बन चुके हैं। शब्द चिन्ह को इस आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है कि वे कितने विशिष्ट हैं।
    • आकस्मिक (आर्बिट्ररी) या काल्पनिक (फैंसीफुल) चिन्ह: यह दोनों व्यापार चिन्ह ऐसे होते हैं जिनका उनके द्वारा प्रदत्त उत्पादों या सेवाओं से कोई सीधा संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए, “एप्पल” कंप्यूटर के लिए और “कोडक” कैमरे के लिए। आकस्मिक चिन्ह सामान्य शब्दों का उपयोग अप्रासंगिक संदर्भों में करते हैं, जबकि काल्पनिक चिन्ह पूरी तरह से आविष्कृत या बनाए गए शब्द होते हैं। दोनों प्रकार के व्यापार चिन्ह बहुत विशिष्ट होते हैं और व्यापार चिन्ह कानून के तहत मजबूत सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • संकेतक (सजेस्टिव) चिन्ह: ये चिन्ह यह सुझाव देते हैं कि किस प्रकार का उत्पाद या सेवा प्रचारित किया जा रहा है, बिना यह घोषित किए कि वह क्या है। प्रतीक चिन्ह के विपरीत, इन चिन्हों को उपभोक्ता से कुछ स्तर की सोच की आवश्यकता होती है, जो नाम को विशेष उत्पाद से जोड़ता है। उदाहरण के लिए, हालांकि नेटफ्लिक्स एक इंटरनेट-आधारित सेवा है जो फिल्में और शो प्रसारित करती है, “स्ट्रीमिंग” शब्द का नेटफ्लिक्स से कोई संबंध नहीं है। संकेतक चिन्ह व्यापार चिन्ह के रूप में पहचाने जाते हैं और वे वाणिज्य से जुड़े विचार को संदर्भित करते हैं।
    • वर्णनात्मक चिन्ह: ये चिन्ह उत्पाद या सेवा की विशेषता को पहचानते हैं या उसका वर्णन करते हैं और सामान्यतः इन्हें सुरक्षा नहीं दी जाती है; यह तब होता है जब यह उपयोग के माध्यम से विशिष्ट बन जाता है (जैसे, “बेस्ट बाय” एक इलेक्ट्रॉनिक्स रिटेलर के लिए)।  
    • सामान्य चिन्ह: यह सामान्य शब्दों को संदर्भित करते हैं जो उत्पाद या सेवा का वर्णन करते हैं, जिससे वे व्यापार चिन्ह सुरक्षा के लिए अयोग्य हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, “कंप्यूटर” शब्द को व्यापार चिन्ह के रूप में पंजीकरण नहीं कराया जा सकता जब इसे कंप्यूटर की एक श्रृंखला के ब्रांड के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हो। 
  2. प्रतीक चिन्ह और ग्राफिक तत्व: प्रतीक चिन्ह व्यापार चिन्ह के विचार के साथ हाथ से हाथ मिलाकर चलते हैं। एक प्रतीक चिन्ह एक ग्राफिक प्रतीक या एक प्रतीक है जिसे किसी ब्रांड का प्रतिनिधित्व करने के लिए उपयोग किया जाता है, जो इसके उपयोग के समय शब्द चिन्ह के साथ जोड़ा जाता है। आइकन दृश्य भेदभाव के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, समय के साथ, विचार प्रतिष्ठित ब्रांड लोगो में विकसित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, टाटा का लोगो एक शैलीबद्ध “T” प्रदर्शित करता है, अमूल का लोगो एक लाल बोल्ड फ़ॉन्ट है, और अमूल गर्ल कुछ सबसे पहचाने गए प्रतीक चिन्ह हैं जो दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। लोगो को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
    • अवधारणा आधारित (एब्सट्रेक्ट): ये प्रतीक चिन्ह ग्राफिक्स को शामिल करते हैं जो उत्पाद से संबंधित नहीं होते, लेकिन किसी न किसी रूप में इससे जुड़ जाते हैं (जैसे: नाइकी का रनिंग प्रतीक)।
    • शाब्दिक (लिटरल): ये प्रतीक चिन्ह वस्तुओं को प्रदर्शित करते हैं जो बिकने वाले उत्पाद या सेवा से संबंधित होते हैं (जैसे फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी सेवा के लिए कैमरे की तस्वीर)।
    • संयोजन चिन्ह (कॉम्बिनेशन चिन्ह): ये लोगो शब्द चिन्ह और ग्राफिक डिज़ाइन दोनों को शामिल करते हैं, और ये पूरे ब्रांड की पहचान को प्रस्तुत करते हैं (जैसे, स्टारबक्स का प्रतीक चिन्ह जिसमें ब्रांड नाम के साथ जलपरी की आकृति है)।
  3. रंग योजना (कलर स्कीम्स):  रंग ब्रांडिंग में एक भूमिका निभा सकते हैं और जब समय के साथ लगातार उपयोग किए जाते हैं तो ये व्यापार चिन्ह का हिस्सा बन सकते हैं। जब रंगों का संयोजन विपणन (मार्केटिंग) रणनीतियों या उत्पाद लेबल और बाहरी पैकेजिंग में उपयोग किया जाता है, तो ब्रांड की एक विशिष्ट विशेषता उभरती है। 

हालांकि, रंग चिन्ह को पंजीकरण कराना ब्रांड मालिक के लिए एक आसान कार्य नहीं है क्योंकि ब्रांड मालिक को यह साबित करना पड़ता है कि रंग को बाजार में उनके उत्पाद से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए, भारत में कैडबरी डेयरी मिल्क में उपयोग किया गया बैंगनी रंग एक पहचान योग्य व्यापार चिन्ह है। 

उसी तरह, एशियन पेंट्स ब्रांड, यह कंपनी अपने कर्मचारियों पर निर्भर है ताकि वह एक विशिष्ट रंग को ब्रांड करे, जो पेंट उद्योग में निगम का प्रतिनिधित्व करता है। ये रंग चिन्ह वर्णनात्मक हो गए हैं लेकिन इन्हें द्वितीयक अर्थ प्राप्त हो गया है, यानी इन्हें संरक्षित व्यापार चिन्ह के रूप में पहचाना जा सकता है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि यह दर्ज किया जाए कि रंग चिन्ह सामान्यतः उस विशिष्ट उत्पाद या सेवा के संदर्भ में संरक्षित होते हैं, जो चिन्ह से संबंधित होते हैं उदाहरण के लिए, कैडबरी ने अपने आकार और रंग, पैकिंग में उपयोग किए गए बैंगनी रंग को एक रंग व्यापार चिन्ह के रूप में सुरक्षा प्राप्त करने का प्रयास किया है, जिससे कानूनी विवाद उत्पन्न हुआ है कि क्या रंगों को व्यापार चिन्ह के रूप में माना जा सकता है।

4. आकृतियाँ और पैकेजिंग (व्यापार पोषक (ट्रेड ड्रेस)): व्यापार पोषक, अर्थात उत्पाद या इसके कंटेनर की बाहरी उपस्थिति, को भी एक व्यापार चिन्ह के द्वारा संरक्षित किया जा सकता है, जब तक कि ऐसी उपस्थिति किसी आकार के रूप में न हो जो उत्पाद के व्यावहारिक कार्य को न करे। व्यापार पोशाक उस उत्पाद की उपस्थिति और उसके तत्काल वातावरण या कंटेनर को वर्णित करने के लिए प्रयुक्त शब्द है, जिसे उपभोक्ता उसके निर्माता से जोड़ने की संभावना रखते हैं।  

भारत में लोकप्रिय उदाहरणों में पैराशूट नारियल तेल है, जो नीले टब में पैक किया जाता है, बिसलेरी पानी, जो अपनी डिजाइन की बोतल में पैक किया जाता है; और मैगी पैकेट्स का रंग संयोजन – यहाँ, लाल और पीला रंग। ऐसी छवियाँ ब्रांड को उत्पाद की एक स्पष्ट दृश्य संबंध प्रदान करती हैं, ठीक उसी तरह जैसे हम कोका-कोला की बोतल के आकार या टोबलेरोन चॉकलेट त्रिकोण के प्रतीकात्मक आकार को देखते हैं। 

एक आकार या पैकेजिंग को व्यापार चिन्ह द्वारा संरक्षित किया जाने के लिए, इसे विशिष्ट होना चाहिए और उपयोगकर्ताओं के लिए स्रोत पहचानकर्ता के रूप में कार्य करना चाहिए। यह कार्यात्मक नहीं हो सकता है; अर्थात, आकार या पैकेजिंग उत्पाद के कार्यक्षमता या उपयोग के लिए पूर्वापेक्षी (प्रीरिक्विजिट) नहीं हो सकती, न ही यह उत्पाद की कीमत या गुणवत्ता को प्रभावित करती है। 

5. ध्वनि चिन्ह: यह एक कम सामान्य लेकिन तेजी से पहचानी जाने वाली व्यापार चिन्ह प्रकार है। ये वे ध्वनियाँ हैं जो किसी ब्रांड या उत्पाद से जुड़ी होती हैं, जिससे उपभोक्ता उन्हें आसानी से पहचान सकते हैं, जैसे कि टाइटन वॉच की झंकार वाली ध्वनि या एचडीएफसी बैंक के प्रचारात्मक विज्ञापनों से जुड़ी ध्वनि। एक ध्वनि चिन्ह को विशिष्ट होना चाहिए और इसे उस उत्पाद या सेवा के बारे में उपभोक्ताओं को भ्रमित नहीं करना चाहिए, जिसे यह प्रतिनिधित्व करता है।

ध्वनि मार्क्स आमतौर पर शब्दों के साथ पंजीकरण कराए जाते हैं जो ध्वनि का वर्णन करते हैं, और यह सामान्यत: एक ग्राफिकल नोट (उदाहरण के लिए, संगीत नोटेशन) के साथ होता है। ध्वनि और उत्पाद या सेवा के बीच का विशिष्टता और संबंध व्यापार चिन्ह संरक्षण प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

6. नारे: नारे या टैगलाइन छोटे, आकर्षक वाक्यांश होते हैं, जो आमतौर पर शब्दों की न्यूनतम संख्या में होते हैं, और इन्हें एक ब्रांड द्वारा अपने संदेश को संप्रेषित करने के लिए बनाया जाता है। एक नारा व्यापार चिन्ह का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है क्योंकि यह केवल कुछ शब्दों में ब्रांड की पहचान या वादा को पकड़ता है। उदाहरणों में टाटा टी: “जागो रे!” और एमटीआर फूड्स: “स्वाद की परंपरा,” जो सभी पंजीकृत व्यापार चिन्ह हैं।  यह ध्यान में रखना चाहिए कि व्यापार चिन्ह, जिसमें नारा भी शामिल हैं, यदि वर्णनात्मक नहीं होते हैं तो ही संरक्षित किए जा सकते हैं। उन्हें उद्योग में उपयोग किए जाने वाले सामान्य वाक्यांश का दावा नहीं करना चाहिए, जब तक कि उसने व्यापक उपयोग के माध्यम से एक अद्वितीय अर्थ न प्राप्त कर लिया हो।

7. अन्य गैर-परंपरागत चिह्न: ऊपर बताए गए व्यापार चिन्ह के गैर-परंपरागत तत्वों के अलावा, खुशबू चिन्ह, बनावटी (टेक्सचर) चिन्ह, और यहां तक कि गति (मोशन) चिन्ह भी हैं। ऐसे व्यापार चिन्ह वर्तमान में अपेक्षाकृत सीमित हैं और इन्हें प्राप्त करना कठिन हो सकता है क्योंकि, जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्लोगन्स की विशिष्टता को कड़े मानदंडों के अनुसार प्रमाणित किया जाना चाहिए।  

    • खुशबू चिन्ह: किसी उत्पाद की खुशबू को व्यापार चिन्ह किया जा सकता है यदि यह कार्यात्मकता (डिस्टिंक्टिवनेस) की अनुपस्थिति और विशिष्टता के दो मुख्य योग्यताओं को पूरा करता है।  
    • बनावट चिन्ह: यह एक व्यापार चिन्ह है जो उत्पाद की विशिष्ट स्पर्शीय (टैक्टाइल) अनुभूति की रक्षा करता है। भारत में, वर्तमान में भारतीय व्यापार चिन्ह प्रणाली में बनावट चिन्ह के लिए कोई पंजीकरण नहीं है। 
    • गति चिन्ह: गति चिन्ह वे व्यापार चिन्ह होते हैं जो गतिमान तत्वों को शामिल करते हैं, जैसे कि वियाकॉम 18 का एनीमेटेड लोगो।

व्यापार चिन्ह के भागों का पंजीकरण  

इसका मतलब है कि कम से कम व्यापार चिन्ह के एक निश्चित खंड को अन्य खंडों से अलग और/या अन्य भागों के साथ अलग से पंजीकृत किया जाए। यह उस स्थिति में लागू होता है जब यह सवाल होता है कि क्या व्यापार चिन्ह के पूरे रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन करना संभव है, जैसा कि टी.एम. अधिनियम की धारा 17 के तहत है। 

 

संयोजन चिन्ह : जो व्यापार चिन्ह संयोजन हो सकता है, वह असल में शब्द, प्रतीक चिन्ह, रंग और डिजाइन का संयोजन होता है। पंजीकरण का मतलब है कि चिन्ह को एक समग्र इकाई के रूप में पंजीकृत किया जाता है; इसका मतलब है कि पूरे चिन्ह को एक इकाई के रूप में सुरक्षा दी जाती है।  

भागों के पंजीकरण का प्रभाव 

टी.एम. अधिनियम की धारा 17 में उल्लेखित है कि जब व्यापार चिन्ह पंजीकृत किया जाता है और इसमें एक से अधिक भाग होते हैं, तो उस पंजीकृत व्यापार चिन्ह के मालिक को उसके किसी भी भाग पर विशेष अधिकार नहीं होते, भले ही वह विशिष्ट हो, जब तक कि उसे अलग से पंजीकृत न किया गया हो। इसलिए, अधिकांश मामलों में, ऊपर उल्लेखित विशेष अधिकार केवल तभी लागू होते हैं जब पंजीकृत संयोजन शामिल हो।  

भागों को अलग-अलग पंजीकृत करने के लाभ  

इस उपाय को निम्नलिखित लाभों द्वारा समझाया जा सकता है:  

  • अधिक सुरक्षा: व्यापार चिन्ह का मालिक अपने व्यापार चिन्ह के प्रत्येक भाग को अलग से पंजीकृत करके अपनी सुरक्षा को मजबूत कर सकता है, जिसमें शब्द, लोगो और यहां तक कि नारे भी शामिल हैं। इस प्रकार, मालिक खुद को प्रतिस्पर्धियों से बचा सकता है जो समान तत्वों का उपयोग करते हैं, भले ही वे तत्व पूर्ण ब्रांड नाम का प्रतिनिधित्व न करते हों। 
  • उपयोग में लचीलापन: इसका मतलब है कि व्यापार चिन्ह को विभिन्न भागों में पंजीकृत करने से कुछ तत्वों का उपयोग करने में अधिक स्वतंत्रता मिलती है। यह मूल व्यापार चिन्ह के बुनियादी हिस्सों पर स्वामित्व के दावे से भी बच सकता है। उदाहरण के लिए, जबकि एक कंपनी शब्द चिन्ह को बनाए रखते हुए अपने नाम या प्रतीक चिन्ह को बदल या छोटा कर सकती है। 
  • अनुकरण से सुरक्षा: फिर भी, प्रतिद्वंदी एक लोकप्रिय संयोजन चिन्ह के व्यक्तिगत भागों का उपयोग करने का प्रयास कर सकते हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए प्रत्येक भाग को अलग से पंजीकृत करना आवश्यक है। 
  • न्यायिक व्याख्या: अदालतें इस धारा की व्याख्या इस प्रकार करती हैं कि यदि संयोजन व्यापार चिन्ह के व्यक्तिगत भागों के लिए सुरक्षा प्राप्त की जाती है, तो प्रत्येक भाग को अलग से पंजीकृत किया जाना चाहिए। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपने विभिन्न निर्णयों में पुनः पुष्टि की है और स्पष्ट रूप से कहा है कि व्यापार चिन्ह के भाग के लिए सुरक्षा केवल तभी प्राप्त की जा सकती है यदि उस भाग को अलग से पंजीकृत किया गया हो। 
  • मामलों के उदाहरण: एस. सैयद मोहद्दीन बनाम पी. सुलोचना बाई (2013) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक संयोजन व्यापार चिन्ह का रजिस्ट्रेशन किसी विशेष भाग के लिए अलग से सुरक्षा नहीं देता जब तक कि प्रत्येक भाग को व्यक्तिगत रूप से पंजीकृत नहीं किया जाता। 
  • व्यापार चिन्ह रणनीति पर प्रभाव: एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो कंपनियों के लिए यह विचार करने के लिए उभरा है कि क्या उन्हें संयोजन चिन्ह के अलग-अलग भागों को पंजीकृत करना चाहिए। यह उन ब्रांडों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जहां कुछ व्यक्तिगत ब्रांड तत्व अपने आप में मूल्य रखते हैं।  

जब केवल संयोजन के गुणों का पंजीकरण उत्पाद की उपस्थिति और उत्पाद की सुरक्षा की गारंटी देता है, तो प्रत्येक घटक को अलग से पंजीकृत करने का विकल्प फायदेमंद है क्योंकि यह व्यापक और अधिक लचीली कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। यह विशेष रूप से ब्रांड की पहचान और इसके बाजार मूल्य की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जो खुलेआम अनुकरण और विज्ञापन की शक्ति से पीड़ित हैं।

धारा 15 और धारा 17 के बीच का अंतरसंबंध  

टी.एम. अधिनियम की धारा 15 और धारा 17 व्यापार चिन्ह पंजीकरण और संयोजन व्यापार चिन्ह और उनके घटक भागों पर प्रदान किए गए अधिकारों के संदर्भ में कई अन्य तथ्यों में समाहित हैं। जब एक व्यापार चिन्ह पंजीकृत होता है, तो इसे एक समग्र के रूप में माना जाता है। टी.एम. अधिनियम की धारा 17 के तहत, यदि एक व्यापारी अपने व्यापार चिन्ह पर विशेष अधिकार चाहता है, तो उस व्यापार चिन्ह के प्रत्येक विशिष्ट भाग को अलग से पंजीकरण करना होगा।  

धारा 15 एक संयोजन चिन्ह के पंजीकरण का प्रभाव समझाती है। इसका मतलब है कि व्यापार चिन्ह के विभिन्न घटकों को व्यक्तिगत रूप से संरक्षित किया जा सकता है। इन सभी भागों को मिलाकर, पंजीकरण के साथ प्रदान किए गए अधिकारों को निर्दिष्ट करने के संबंध में पर्याप्त दिशा मिलती है, साथ ही यह भी बताया जाता है कि संयोजन चिन्ह के कुछ घटकों को कैसे सुरक्षा दी जा सकती है।  

जैसा कि धारा 15 में समझाया गया है, संयोजन चिन्ह के लिए, मालिक को उस चिन्ह के प्रत्येक विशिष्ट तत्व के लिए अलग से व्यापार चिन्ह पंजीकरण के लिए आवेदन करना होता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो भले ही व्यापार चिन्ह समग्र रूप से पंजीकृत हो, मालिक किसी व्यक्तिगत घटक पर विशेष अधिकार नहीं जता सकता जब तक वह अलग से पंजीकृत न हो।  

धारा 17 यह संकेत देती है कि यदि एक व्यापार चिन्ह को पूरी तरह से पंजीकृत किया जाता है, तो वह संयोजन चिन्ह को समग्र रूप से सुरक्षा देता है, लेकिन किसी व्यक्तिगत भाग को सुरक्षा नहीं दी जाती जब तक कि उसने विशिष्टता प्राप्त नहीं की हो या उसे अलग से पंजीकरण नहीं किया गया हो। इस धारा के अनुसार, व्यापार चिन्ह के समग्र भाग को सुरक्षा दी जाती है, और इसलिए, कोई भी कमजोर या केवल मार्गदर्शक तत्व जो संयोजन चिन्ह का हिस्सा है, उसे सुरक्षा नहीं दी जा सकती, जब तक वह तत्व धारा 15 के तहत अलग से पंजीकृत न हो।  

व्यापार चिन्ह रणनीति में धारा 15 संयोजन चिन्ह के घटकों के अलग-अलग पंजीकरण की अनुमति देती है ताकि पूरी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। वहीं, धारा 17 यह बताती है कि यदि सामान्य या गैर-विशिष्ट भागों को अलग से पंजीकरण नहीं कराया गया है, तो संयोजन चिन्ह के विशेष अधिकार उन सामान्य भागों को कवर नहीं करेंगे।  

यह अंतर्संबंध यह दिखाता है कि यह कितना महत्वपूर्ण है कि यह विचार किया जाए कि क्या व्यापार चिन्ह के कुछ तत्वों को पृथक रूप से पंजीकरण कराना चाहिए ताकि कानूनी मजबूती और प्रवर्तन रणनीति की प्रभावशीलता अधिकतम हो सके।

दृष्टिकोण धारा 15 धारा 17
प्राथमिक केंद्र  संयोजन व्यापार चिन्ह के भागों को अलग-अलग पंजीकरण करने का विकल्प प्रदान करती है। एक संयोजन व्यापार चिन्ह को समग्र रूप से पंजीकरण करने के प्रभाव को संबोधित करती है।
पंजीकरण का क्षेत्र संयोजन चिह्न के व्यक्तिगत तत्वों को पंजीकृत करने की अनुमति देती है। पूरे संयोजन चिह्न पर अधिकार देती है, सिर्फ इसके अपंजीकृत भागों पर नहीं।
विशेष अधिकार प्रत्येक अलग से पंजीकृत भाग पर विशेष अधिकार प्रदान करती है। समग्र चिह्न पर विशेष अधिकार सीमित करती है, जब तक भाग अलग से पंजीकृत न हों।
अधिकारों का आवेदन प्रत्येक पंजीकृत तत्व के लिए स्वतंत्र रूप से अधिकार लागू किए जा सकते हैं। अधिकार संयोजन मार्क की समग्र छाप पर लागू होते हैं, इसके भागों पर नहीं।
गैर-विशिष्ट भागों की सुरक्षा यदि भागों को अलग से पंजीकृत किया जाता है तो सुरक्षा प्रदान करती है। गैर-विशिष्ट (नॉन एक्सक्लूसिव) या सामान्य तत्वों पर कोई विशेष अधिकार नहीं होते जब तक वे पंजीकृत न हों।
रणनीतिक महत्व महत्वपूर्ण ब्रांड तत्वों की व्यापक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक। महत्वपूर्ण तत्वों को व्यक्तिगत रूप से पंजीकरण करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
कानूनी प्रवर्तन व्यक्तिगत भागों के उल्लंघन पर अधिकारों को लागू करना आसान है। उल्लंघन के मामले समग्र संयोजन चिह्न पर केंद्रित होते हैं।

विरोधी विच्छेदन (एंटी-डिसेक्शन) नियम  

विरोधी विच्छेदन नियम, जो कि टी.एम. अधिनियम की धारा 15 और 17 पर आधारित है, एक व्यापार चिन्ह का मूल्यांकन पूरे के रूप में करने पर जोर देता है, न कि उसे व्यक्तिगत भागों में विभाजित करने पर।  

धारा 15 व्यापार चिन्ह के भागों और व्यापार चिन्ह को एक श्रृंखला के रूप में पंजीकरण से संबंधित है। यह एक व्यापार चिन्ह मालिक को पूरे व्यापार चिन्ह और इसके व्यक्तिगत भागों को अलग से पंजीकरण करने की अनुमति देता है, यदि वे उन भागों पर विशेष अधिकार का दावा करते हैं। प्रत्येक भाग को एक स्वतंत्र व्यापार चिन्ह के रूप में शर्तों को पूरा करना होता है।  

धारा 17 व्यापार चिन्ह के भागों के पंजीकरण के प्रभाव पर केंद्रित है। यह कहता है कि जब एक व्यापार चिन्ह में कई तत्व होते हैं, तो मालिक को पूरे व्यापार चिन्ह के उपयोग का विशेष अधिकार प्राप्त होता है। यदि व्यापार चिन्ह का कोई हिस्सा अलग से पंजीकृत नहीं है या यदि उसमें सामान्य या गैर-विशिष्ट तत्व शामिल हैं, तो मालिक को उन व्यक्तिगत भागों पर विशेष अधिकार नहीं मिलेगा।  

विरोधी विच्छेदन नियम का अर्थ है कि जब दो व्यापार चिन्ह की तुलना की जाती है, तो हमें उन्हें उनके पूर्ण रूप में देखना चाहिए, न कि उन्हें व्यक्तिगत घटकों में विभाजित करना चाहिए। यह दृष्टिकोण इस विचार पर आधारित है कि उपभोक्ता औसत बुद्धिमत्ता और अधूरी याददाश्त के साथ एक व्यापार चिन्ह की समग्र छाप को महसूस करते हैं, न कि उसके व्यक्तिगत भागों को। इसलिए, विरोधी व्यापार चिन्ह की तुलना समग्र रूप से की जानी चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वे धोखाधड़ी से समान हैं या नहीं।  

जीटीजेड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम आर्टेक सर्फिंस केमिकल्स लिमिटेड एवं अन्य.(2024) मामले में, अदालत ने विरोधी विच्छेदन नियम को लागू किया। उन्होंने जीटीजेड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और आर्टेक सर्फिंस केमिकल्स लिमिटेड के व्यापार चिन्ह की तुलना पूर्ण रूप में की। अदालत ने जोर दिया कि उपभोक्ता व्यापार चिन्ह के प्रत्येक घटक का अलग से विश्लेषण नहीं करेंगे। इसके बजाय, वे व्यापार चिन्ह की समग्र दृष्टि, ध्वनि और संरचना को महसूस करेंगे, इस प्रकार यह निर्धारित करेंगे कि व्यापार चिन्ह अपने पूरे रूप में धोखाधड़ी से समान थे या नहीं।

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 की वैधता 

व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो संयोजन व्यापार चिन्ह को विनियमित करती है, जिसमें शब्दों, लोगो या प्रतीकों जैसे कई घटक होते हैं। इस धारा का मुख्य उद्देश्य व्यापार चिन्ह के पूरे रूप को सुरक्षा प्रदान करना है। यह प्रत्येक व्यक्तिगत तत्व को एक अलग स्तर की सुरक्षा नहीं देती, सिवाय इसके कि वे घटक अलग से पंजीकृत हों या समय के साथ द्वितीयक अर्थ प्राप्त कर चुके हों।  

धारा 17 की वैधता इसके द्वारा संयोजन व्यापार चिन्ह के सामान्य या वर्णनात्मक तत्वों के संप्रभुकरण (मोनोपोलाइज़ेशन) को रोकने की क्षमता में है। यह सुनिश्चित करती है कि व्यापार चिन्ह मालिक सामान्य शब्दों या प्रतीकों पर विशेष अधिकार का दावा करके अनुचित लाभ नहीं उठाते, जो बाजार में सभी प्रतिस्पर्धियों द्वारा उपयोग किए जाने चाहिए।  

इसके अतिरिक्त, धारा 17 व्यापार चिन्ह मालिकों को यह अनुमति देती है कि वे व्यापार चिन्ह के प्रत्येक घटक की सुरक्षा के लिए अलग से आवेदन करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि जितने संभव हो उतने पहलू सुरक्षित रहें। यह तीसरे पक्षों को ऐसे भागों का उपयोग करने की अनुमति भी देती है जो महत्वपूर्ण या अद्वितीय नहीं हैं। धारा 17 के सामान्य उद्देश्य में व्यापार चिन्ह की सुरक्षा, भ्रम की रोकथाम, और बाजार में उचित प्रतिस्पर्धा और नवाचार को प्रोत्साहित करना शामिल है।  

धारा 17 की आवश्यकता सार्वजनिक हित से उत्पन्न होती है, जो व्यापार चिन्ह मालिकों को व्यापक अधिकार प्रदान करने की अनुमति नहीं देती, जैसा कि कुछ हालिया न्यायालय निर्णयों से स्पष्ट है। इसी संदर्भ में धारा 17 व्यापार चिन्ह मालिकों के लिए सुरक्षा प्रदान करती है, जबकि व्यापार के अन्य पहलुओं को दूसरों के उपयोग के लिए उपलब्ध कराती है। यह संयोजन व्यापार चिन्ह के संदर्भ में व्यापार चिन्ह सुरक्षा की सीमा पर आवश्यक स्पष्टता प्रदान करती है।

संबंधित मामले के कानून 

यूनाइटेड बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम ऑर्किड केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (2012)

तथ्य

इस मामले में, यूनाइटेड बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम ऑर्किड केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड. के खिलाफ व्यापार चिन्ह उल्लंघन का मुकदमा दायर किया। विवाद “फॉर्जिड” नामक व्यापार चिन्ह के उपयोग को लेकर था, जिसे यूनाइटेड बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड ने पंजीकृत किया था। ऑर्किड केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स ने “आर्जिड” नामक उत्पाद लॉन्च किया था, जिसे यूनाइटेड बायोटेक ने यह दावा किया था कि यह उनके व्यापार चिन्ह “फॉर्जिड” से धोखाधड़ी रूप से मिलता-जुलता है। यूनाइटेड बायोटेक का तर्क था कि दोनों नामों के बीच समानता उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न कर सकती है, जिससे वे यह मान सकते हैं कि दोनों उत्पाद संबंधित हैं।  

मुद्दा

  • क्या ऑर्किड केमिकल्स द्वारा “आर्जिड” व्यापार चिन्ह का उपयोग यूनाइटेड बायोटेक के पंजीकृत व्यापार चिन्ह “फोर्जिड” का उल्लंघन करता है?  
  • क्या ऑर्किड केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स अपने उत्पाद को यूनाइटेड बायोटेक का उत्पाद बताकर धोखाधड़ी कर रहे थे, क्योंकि वे धोखाधड़ी रूप से समान व्यापार चिन्ह का उपयोग कर रहे थे?

निर्णय  

अदालत ने माना कि “फोर्जिड” और “आर्जिड” व्यापार चिन्ह अव्यक्त रूप से मिलते-जुलते थे, क्योंकि उनका रूप धोखाधड़ी रूप से समान था, और दोनों व्यापार चिन्ह फार्मास्युटिकल उत्पादों से संबंधित थे, जिससे उपभोक्ताओं में अधिक भ्रम पैदा होता है। इसलिए, न्यायालय ने ऑर्किड केमिकल्स को “आर्जिड” नामक व्यापार चिन्ह का उपयोग करने से रोकने का आदेश दिया।  

यह मामला व्यापार चिन्ह अधिनियम, 1999 की धारा 17 के तहत आता है, जो यह कहती है कि पंजीकृत व्यापार चिन्ह कानून के अनुसार सम्पूर्ण व्यापार चिन्ह को सम्मिलित करता है और इसके किसी भी भाग को तब तक नहीं माना जाता, जब तक वह भाग पंजीकृत न हो। कुल मिलाकर, न्यायालय ने प्रत्येक अक्षर या व्यापार चिन्ह के भाग पर विचार नहीं किया, बल्कि उसने व्यापार चिन्ह को एक संपूर्ण रूप में देखा ताकि दो या अधिक भ्रमित करने वाले व्यापार चिन्ह के बीच भ्रम न उत्पन्न हो।

अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड और अन्य बनाम डालमिया सीमेंट भारत लिमिटेड (2016)  

तथ्य  

अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड और अन्य बनाम डालमिया सीमेंट भारत लिमिटेड (2016) के मामले में अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड और ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड (अभियुक्त) ने डालमिया सीमेंट भारत लिमिटेड (प्रतिवादी) के खिलाफ व्यापार चिन्ह उल्लंघन और धोखाधड़ी के लिए मुकदमा दायर किया। अभियुक्तों का दावा था कि प्रतिवादी द्वारा ‘अल्ट्रा’ शब्द का उपयोग उनके व्यापार चिन्ह ‘Dalmia ULTRA’ और ‘DALMIA ULTRA’ में अभियुक्तों के पंजीकृत व्यापार चिन्ह ‘अल्ट्राटेक’ का उल्लंघन था। अभियुक्तों ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी द्वारा ‘अल्ट्रा’ का उपयोग उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न कर सकता है और अभियुक्तों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है।  

मुद्दे

  • क्या प्रतिवादी द्वारा उनके व्यापार चिन्ह में ‘अल्ट्रा’ शब्द का उपयोग अभियुक्तों के पंजीकृत व्यापार चिन्ह ‘अल्ट्राटेक’ का उल्लंघन करता है?  
  • क्या प्रतिवादी का ‘अल्ट्रा’ शब्द का उपयोग धोखाधड़ी के तहत उनके उत्पादों को अभियुक्तों के उत्पादों के रूप में प्रस्तुत करने के बराबर था?  

निर्णय 

न्यायालय ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और तर्कों की जांच की। न्यायालय ने पाया कि ‘अल्ट्रा’ शब्द एक सामान्य वर्णनात्मक शब्द है और यह इतने विशिष्ट नहीं है कि इसे केवल अभियुक्तों द्वारा उपयोग किया जा सके। अभियुक्तों के व्यापार चिन्ह ‘अल्ट्राटेक’ एक उपकरण/लेबल मार्क है जिसमें ‘अल्ट्राटेक’ पूरी तरह से शामिल है, और ‘अल्ट्रा’ शब्द स्वतंत्र रूप से उपयोग नहीं किया जाता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रतिवादी का ‘Dalmia ULTRA’ का उपयोग उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि ‘डालमिया’ शब्द प्रतिवादी के साथ वर्षों से जुड़ा हुआ है। इसलिए, न्यायालय ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा व्यापार चिन्ह उल्लंघन या धोखाधड़ी का कोई प्रथम दृष्टया (प्राइमा फैसी) मामला नहीं था। अभियुक्तों के द्वारा दायर नोटिस को कोई आदेश दिए बिना खारिज कर दिया गया।

कैडबरी इंडिया लिमिटेड एवं अन्य बनाम नीरज फ़ूड प्रोडक्ट्स,(2007)

तथ्य

कैडबरी इंडिया लिमिटेड एवं अन्य बनाम नीरज फ़ूड प्रोडक्ट्स, (2007) के मामले में कैडबरी इंडिया लिमिटेड और अन्य (अभियुक्त) ने नीरज फ़ूड प्रोडक्ट्स (प्रतिवादी) के खिलाफ मुकदमा दायर किया, जो लगभग 24 अगस्त, 2005 को दायर किया गया था। अभियुक्तों का दावा था कि प्रतिवादी ने बाजार में चॉकलेट उत्पादों को ऐसे पैकेजिंग के साथ पेश किया, जो अभियुक्तों के विशिष्ट पिलो पैक की हूबहू नकल करती थी। प्रतिवादी ने ‘जेम्स बॉन्ड’ व्यापार चिन्ह का उपयोग किया, जो ध्वन्यात्मक और दृश्य रूप से अभियुक्तों के पंजीकृत व्यापार चिन्ह ‘जम्स’ से समान था। अभियुक्तों ने तर्क दिया कि यह समानता उपभोक्ताओं में भ्रम और धोखाधड़ी उत्पन्न कर सकती है, जो उनके व्यापार चिन्ह का उल्लंघन करती है और प्रतिवादी के उत्पादों को अभियुक्तों के उत्पादों के रूप में पेश करती है।  

मुद्दे 

  • क्या प्रतिवादी द्वारा ‘जेम्स बॉन्ड’ व्यापार चिन्ह का उपयोग अभियुक्तों के पंजीकृत व्यापार चिन्ह ‘जम्स’ का उल्लंघन करता है?  
  • क्या प्रतिवादी की पैकेजिंग अभियुक्तों के विशिष्ट पिलो पैक की नकल करती थी, जो कि धोखाधड़ी के बराबर था?  
  • क्या ‘जम्स’ और ‘जेम्स’ के बीच ध्वन्यात्मक समानता उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न करेगी?  

निर्णय  

न्यायालय ने पाया कि अभियुक्तों ने व्यापार चिन्ह उल्लंघन और धोखाधड़ी के लिए मजबूत मामला स्थापित किया था। प्रतिवादी के पिलो पैक लगभग अभियुक्तों के पैक जैसे थे, जिसमें आकार, पृष्ठभूमि रंग, और बहुरंगी चॉकलेट टैबलेट्स का दृश्य प्रभाव समान था, केवल ‘जम्स’ और ‘जेम्स बॉन्ड’ व्यापार चिन्ह में अंतर था। ‘जम्स’ और ‘जेम्स’ के बीच ध्वन्यात्मक समानता उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न कर सकती थी।  

न्यायालय ने कहा कि अभियुक्तों का ‘जम्स’ का व्यापक उपयोग और प्रचार महत्वपूर्ण सद्भावना प्राप्त कर चुका था और प्रतिवादी द्वारा समान पैकेजिंग और ‘जेम्स बॉन्ड’ का उपयोग अभियुक्तों की बाजार उपस्थिति से लाभ प्राप्त करने का एक बेईमानी प्रयास था।  

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्तों ने व्यापार चिन्ह उल्लंघन, धोखाधड़ी और कॉपीराइट उल्लंघन का प्रथम दृष्टया मामला पेश किया था। प्रतिवादी को ‘जेम्स बॉन्ड’ व्यापार चिन्ह और समान पैकेजिंग के उपयोग से रोक दिया गया, और अभियुक्तों के पक्ष में एक अंतरिम आदेश जारी किया गया।

निष्कर्ष 

टी.एम. अधिनियम, 1999 की धारा 17 व्यापार चिन्ह के हिस्सों के पंजीकरण से संबंधित है। यह कहती है कि जब एक व्यापार चिन्ह में कई तत्व होते हैं, तो पंजीकरण मालिक को पूरे व्यापार चिन्ह का उपयोग करने के लिए विशेष अधिकार देता है। हालांकि, यदि व्यापार चिन्ह के किसी हिस्से के लिए अलग से आवेदन या पंजीकरण नहीं किया गया है, या यदि इसमें सामान्य या गैर-विभेदक तत्व शामिल हैं, तो पंजीकरण उन व्यक्तिगत हिस्सों पर विशेष अधिकार प्रदान नहीं करता है।  

यह समग्र व्यापार चिन्ह के संरक्षण के स्तर का निर्धारण करने में भी मदद करता है, और इस प्रकार, इसके विश्लेषण के दौरान इसे पूरी तरह से विचार करना चाहिए। इस प्रकार, जब व्यापार चिन्ह का उपयोग किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करता है कि पंजीकृत मालिक व्यापार चिन्ह के व्यक्तिगत हिस्सों पर विशेष दावे नहीं कर सकते जब तक कि उन हिस्सों के व्यापार चिन्ह भी पंजीकृत न हों। दूसरे शब्दों में, यदि कई अधिकार प्रदान नहीं किए गए हैं, तो पहचान स्वाभाविक रूप से सही होती है, और उल्लंघन व्यापार चिन्ह के हिस्सों पर आधारित नहीं हो सकता।  

इसके उदाहरण के रूप में कई न्यायिक तरीकों को दिखाया गया है, जो यह दर्शाते हैं कि यहां तक कि जब एक समग्र व्यापार चिन्ह को पूर्ण रूप में पंजीकृत किया गया है, तो इसका कोई हिस्सा जो उक्त पूर्ण रूप का महत्वपूर्ण हिस्सा है और जिसे बिना अनुमति के किसी व्यक्ति या पक्ष द्वारा उपयोग किया जाता है और जो सार्वजनिक में भ्रम या धोखाधड़ी उत्पन्न कर सकता है, उल्लंघन माना जाएगा। हालांकि, यदि मालिक अधिकतम संरक्षण चाहता है, तो धारा 17 में यह समझाया गया है कि प्रत्येक हिस्से को अलग-अलग पंजीकरण कराना सलाहकार होगा।  

टी.एम. अधिनियम उन अधिकारों को नियंत्रित करता है जो समग्र व्यापार चिन्ह के मामले में व्यापार चिन्ह के मालिकों को दिए जाते हैं, और यह यह भी सुनिश्चित करता है कि उन्हें अधिक संरक्षण मिलता है क्योंकि वे विशिष्ट वस्तुओं को पंजीकरण नहीं कर सकते जब तक कि वे सुरक्षा नहीं चाहते। इसका परिणामस्वरूप कंपनियों को व्यापार चिन्ह का व्यापक रूप से पंजीकरण करने में मदद मिलती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ब्रांड बाजार में बाहर निकलने के बाद भी पर्याप्त रूप से संरक्षित हैं।  

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ ए क्यू)

1. क्या व्यापार के लिए समग्र व्यापार चिन्ह के पंजीकरण के अलावा और कोई लाभ हैं?  

अधिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिए, समग्र व्यापार चिन्ह के मूल घटक, जिसमें लोगो या कुछ शब्द शामिल हो सकते हैं, को अलग से पंजीकरण कराया जा सकता है। कानूनी सुरक्षा को सुधारने के लिए, सलाह दी जाती है कि व्यापार चिन्ह के हिस्सों को अलग से पंजीकरण कराया जाए, न कि समग्र व्यापार चिन्ह को।

2. हम कैसे जान सकते हैं कि एक बदलाव हमारे विवेकाधिकार पर किया जा सकता है?  

जब किसी समग्र व्यापार चिन्ह के किसी हिस्से में परिवर्तन किया जाता है, तो मूल व्यापार चिन्ह वैध और संरक्षित रहता है जब तक कि उसमें कोई बदलाव न हो। हालांकि, नया व्यापार चिन्ह तभी संरक्षित किया जा सकता है जब उसे पंजीकरण कराया जाए। इसका मतलब है कि यदि कोई महत्वपूर्ण बदलाव किया जाता है, तो हमें अद्यतन (अपडेटेड) संस्करण की सुरक्षा के लिए एक नया आवेदन जमा करना होगा।

3. क्या समग्र व्यापार चिन्ह का पंजीकरण प्रभावी रूप से उत्पाद को धोखाधड़ी से बचा सकता है, जिस पर इस प्रकार का व्यापार चिन्ह उपयोग किया जाता है?

वास्तव में, धोखाधड़ी केवल एक उत्पाद से दूसरे उत्पाद पर व्यापार चिन्ह के पंजीकरण के आधार पर प्रदान की जाती है। फिर भी, अधिकांश मामलों में प्रतिष्ठा और सद्भावना की अवधारणाएँ मानी जाती हैं। जहां तक धोखाधड़ी के दावे हैं, कुछ सिद्धांत हैं जिन्हें विचार में लिया जाना चाहिए। हालांकि, यहां अदालतें अधिकतर यह निर्धारित करती हैं कि इसके किसी हिस्से का उपयोग सार्वजनिक में भ्रम उत्पन्न करने की संभावना रखता है, भले ही पंजीकरण सहायक हो।

4. उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति या संगठन मेरे समग्र व्यापार चिन्ह के किसी हिस्से का उपयोग करता है, तो क्या होता है? 

जहां ऐसे अंश उपभोक्ताओं में भ्रम उत्पन्न करते हैं या जहां उपयोगकर्ता का उद्देश्य भ्रम उत्पन्न करना होता है और जहां समग्र व्यापार चिन्ह प्रसिद्ध या विशिष्ट होता है, तो आपके पास उल्लंघन का मामला हो सकता है। हालांकि, यदि प्रत्येक हिस्सा अलग से पंजीकृत है, तो यह कुछ हिस्सों पर अधिकार सुरक्षित करने में सहायक होता है। प्रत्येक मामला विशेष होता है, और इसलिए अदालत यह निर्धारित करेगी कि उपयोग उल्लंघन है या नहीं।

5. क्या मैं केवल एक प्रतीक चिन्ह के घटक का दावा कर सकता हूं जिसे मैंने बनाया है और वह मेरा पूर्ण व्यापार चिन्ह प्रतीक है? 

हालांकि, जैसा कि देखा गया है, बिना तत्वों के अलग पंजीकरण के, कोई व्यक्ति समग्र व्यापार चिन्ह के किसी विशेष हिस्से के स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता, जैसा कि आवेदन के परिणामस्वरूप होता है। यही वह कार्य है जो धारा 17 करती है; यह बिना किसी विशेष पहलू को चिह्नित किए व्यापार चिन्ह के सभी क्षेत्रों के संरक्षण का विस्तार करती है।

संदर्भ 

 

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत तलाक

यह लेख Deyasini Chakrabarti द्वारा लिखा गया है और Sakshi Kuthari द्वारा और अधिक अद्यतन (अपडेट)  किया गया है। यह लेख मुख्य रूप से हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित है। इसमें भारत में तलाक की अवधारणा और उसके विकास, तलाक के विभिन्न सिद्धांतों, तलाक से संबंधित समाजशास्त्रीय (सोशियोलॉजिकल) पहलुओं, उक्त अधिनियम के तहत तलाक से संबंधित सभी प्रावधानों, तलाक के लिए दाखिल करने की प्रक्रिया, तलाक की कार्यवाही में उपलब्ध वैकल्पिक राहत और तलाक से संबंधित न्यायिक निर्णयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है।

परिचय  

विवाह एक महत्वपूर्ण संस्था है, जो न केवल दो व्यक्तियों को जोड़ती है बल्कि उनके परिवारों को भी आपस में जोड़ती है, और यह केवल साथ रहने से बढ़कर प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) का प्रतीक है। पारंपरिक रूप से, कई समाजों, विशेष रूप से हिंदू समुदायों में, विवाह को एक पवित्र और स्थायी बंधन के रूप में देखा जाता था, जिसके प्रभाव इस जीवन से परे भी माने जाते थे। हिंदू संस्कृति में विवाह की अवधारणा को ऐतिहासिक रूप से लगभग अटूट माना गया है, जो वैवाहिक प्रतिज्ञाओं की पवित्रता और उनके आध्यात्मिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ाव को दर्शाती है। इस पारंपरिक दृष्टिकोण ने तलाक के खिलाफ एक मजबूत सामाजिक कलंक (स्टीग्मा) को जन्म दिया, जिससे तलाक एक दुर्लभ घटना बन गया। हालांकि, समाज में हो रहे निरंतर परिवर्तन और बदलती आवश्यकताओं ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (जिसे आगे अधिनियम कहा गया है) की शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया।  

यह अधिनियम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव था, जिसने कानूनी रूप से एक विवाहित जोड़े के बीच तलाक की संभावना को मान्यता दी और इसके लिए एक संरचित (स्ट्रक्चर्ड) प्रक्रिया प्रदान की। यह अधिनियम विवाह से संबंधित आधुनिक जीवन की समस्याओं का समाधान करने के लिए पारित किया गया था, जबकि इसमें सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान भी किया गया था और सामाजिक मानदंडों और कानूनी ढांचों की गतिशील प्रकृति को प्रतिबिंबित किया गया था। अधिनियम में तलाक से संबंधित प्रावधानों की शुरुआत वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं के साथ कानूनी प्रथाओं को व्यवस्थित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसमें परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया। अधिनियम के तहत, धारा 13 सबसे क्रांतिकारी प्रावधानों में से एक है। 1955 में इसकी शुरुआत के बाद से इसमें कई बार संशोधन किए गए हैं, बल्कि इसे समाज की बदलती जरूरतों के अनुकूल बनाने के लिए कई बार उदार (लीब्रेलाईस्ड) बनाया गया है। विशेष परिस्थितियों में तलाक से लेकर सहमति से तलाक तक, भारतीय समाज अब विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन (ब्रेकडाउन) के आधार पर तलाक की ओर अग्रसर हो रहा है।

तलाक की अवधारणा

तलाक शब्द का उद्गम (डिराइव्ड) लैटिन शब्द डायवर्टियम से हुआ है, जिसका अर्थ है “पथभ्रष्ट होना” या “अलग होना।” यह वैवाहिक संबंध के कानूनी समाप्ति को संदर्भित करता है। यद्यपि वैधानिक प्रावधानों में तलाक को विशेष रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, इसे विवाह के माध्यम से स्थापित वैवाहिक संबंधों के कानूनी विघटन के रूप में वर्णित किया जा सकता है। सभी कानूनी प्रणालियाँ यह मानती हैं कि सार्वजनिक नीति, नैतिक मानदंड और सामाजिक हित यह मांग करते हैं कि वैवाहिक संबंधों की व्यापक सुरक्षा के साथ रक्षा की जाए और विवाह का विघटन केवल कानून द्वारा निर्दिष्ट तरीके और कारणों से ही होना चाहिए। तलाक तीन अक्षरों का एक ऐसा शब्द है, जो किसी जोड़े को उनकी इच्छा और सहमति से अलग कर देता है। इस प्रकार, तलाक को न केवल दो व्यक्तियों बल्कि दो परिवारों के बीच विवाह को तोड़ने का एक माध्यम माना जा सकता है। तलाक से संबंधित विभिन्न सुधार निम्नलिखित हैं:  

पारंपरिक हिंदू अवधारणा में तलाक  

असंगठित (अनकोडिफाईड) हिंदू कानून के तहत तलाक का प्रावधान मान्यता प्राप्त नहीं था। पारंपरिक हिंदू विवाह कानून तलाक को मान्यता नहीं देता था क्योंकि विवाह को पति और पत्नी के बीच एक स्थायी और अटूट संबंध माना जाता था। मनु का मानना था कि पत्नी को न तो बिक्री के माध्यम से और न ही परित्याग (अबंडॉनमेंट) के माध्यम से अपने पति से अलग किया जा सकता है। यह विचार विवाह संबंध को शाश्वत और अटूट मानने पर आधारित था। हिंदुओं के बीच विवाह को एक संस्कारात्मक बंधन, अर्थात एक अटूट, स्थायी, अजेय (इंडिफेसिबल) और अविनाशी संबंध माना जाता था ।  

प्राचीन हिंदू कानून के तहत तलाक की कोई संभावना नहीं थी, हालांकि कुछ हिंदू समुदायों और जनजातियों में प्रथागत तलाक को मान्यता प्राप्त थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आपसी वैमनस्य के आधार पर और दोनों पक्षों की सहमति से तलाक की अनुमति दी गई थी।  

ब्रिटिश शासन के दौरान तलाक की अवधारणा

प्रारंभिक ब्रिटिश प्रयास हिंदुओं के बीच कथित सामाजिक कुप्रथाओं और बुराइयों को कम करने पर केंद्रित थे। यह विधवाओं को पुनर्विवाह करने में मदद करने पर ध्यान केंद्रित करते थे, न कि व्यक्तियों को विवाह तोड़ने में। जनता की नकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण, ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि हिंदू विवाह और तलाक कानूनों में हस्तक्षेप करना खतरनाक हो सकता है। ब्रिटिशों ने संभावित जनविरोध के डर से मौजूदा कानूनों में संशोधन करने में हिचकिचाहट दिखाई। परिणामस्वरूप, ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदुओं के लिए तलाक से संबंधित कोई सुधार लागू नहीं किया गया।  

स्वतंत्र भारत में आधुनिकतावादी तलाक सुधार 

औपनिवेशिक युग के बाद के हिंदू अभिजात वर्ग, जिसने अंततः सभी हिंदुओं के लिए नया तलाक कानून दिया, प्रगतिशीलता और आधुनिकता की छवि बनाए रखने को लेकर अत्यधिक चिंतित था। हिंदू तलाक कानून में सुधार से संबंधित चर्चाओं और साहित्य में मुख्य ध्यान सभी हिंदुओं के लिए अधिनियम के माध्यम से वैधानिक तलाक की शुरुआत पर रहा। पहली बार, अधिनियम की धारा 13 ने सभी भारतीय हिंदुओं के लिए तलाक का प्रावधान आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराया। धारा 13 में समय-समय पर कई संशोधन किए गए हैं, जिनमें तलाक के लिए अतिरिक्त आधार शामिल किए गए हैं। नतीजतन, धारा 13 ने हिंदू विवाह कानूनों में महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी बदलाव लाए हैं और ऐसे विशिष्ट परिस्थितियां स्थापित की हैं जिनके तहत तलाक प्रदान किया जा सकता है।  

तलाक के सिद्धांत 

तलाक के विभिन्न प्रकार के सिद्धांत निम्नलिखित हैं:  

इच्छानुसार तलाक सिद्धांत  

इस सिद्धांत के अनुसार, कोई व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से अपने जीवनसाथी को तलाक दे सकता है। हालांकि, यह अवधारणा हिंदू कानून या अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके विपरीत, मुस्लिम कानून इस दृष्टिकोण को स्वीकार करता है, जहां एक पति अपनी मर्जी से बिना किसी परामर्श के अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है।  

अपराध, दोष या गलती का सिद्धांत

तलाक का यह सिद्धांत अपराध सिद्धांत या दोष सिद्धांत के रूप में भी जाना जाता है। इसके अनुसार, यदि किसी एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के विरुद्ध ‘वैवाहिक अपराध’ किया जाता है, तो विवाह का विघटन तलाक के माध्यम से हो सकता है, बशर्ते कि दूसरा पक्ष निर्दोष हो। इस सिद्धांत में दोषी और निर्दोष पक्षों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाया गया है, जहां केवल निर्दोष पक्ष ही तलाक के लिए आवेदन कर सकता है। यदि पति और पत्नी दोनों ही दोषी हों, तो इस सिद्धांत के तहत कोई पक्ष राहत प्राप्त नहीं कर सकता है।

अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त ‘वैवाहिक अपराध’ निम्नलिखित हैं: 

 

  • परित्याग (डिजर्शन):  परित्याग का अर्थ है एक साथ रहने से इंकार करना, जो वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार है। यह अन्यायपूर्ण है और वैवाहिक राहत का आधार बनता है। परित्याग का मुख्य तत्व एक साथी द्वारा दूसरे साथी को छोड़ देना या त्याग देना है। यह विवाह के दायित्वों का पूर्ण अस्वीकार है। यदि उत्तरदाता ने याचिका दायर करने से ठीक पहले लगातार दो वर्षों तक याचिकाकर्ता को छोड़ दिया है, तो तलाक दिया जा सकता है।  
  • क्रूरता: वैवाहिक कानून में क्रूरता साबित करने के लिए, आरोपी का आचरण इतना “गंभीर और महत्वपूर्ण” होना चाहिए कि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि याचिकाकर्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने साथी के साथ रह सके। यह साधारण वैवाहिक जीवन के “सामान्य टूट-फूट (वियर एंड टियर)” से अधिक होना चाहिए।  
  • बलात्कार : बलात्कार का अर्थ है, पीड़ित की सहमति के बिना यौन संबंध या यौन प्रवेश करना। यदि पति बलात्कार के अपराध में दोषी पाया गया हो, तो यह एक वैवाहिक अपराध माना जाएगा।  
  • पुरूषमैथुन (सोडोमी) :  यदि पति विवाह के बाद से पुरूषमेथुन (अप्राकृतिक यौन संबंध) का दोषी पाया जाता है, तो यह वैवाहिक अपराध होता है। पुरूषमेथुन का अर्थ है, किसी अन्य व्यक्ति को मौखिक या गुदा मैथुन (ऐनल) करने के लिए मजबूर करना।  
  • पशुविकर्म (बेस्टीलिटी): यदि पति पशुविकर्म (जानवरों के साथ यौन संबंध) का दोषी पाया गया हो, तो यह एक वैवाहिक अपराध होगा।  
  • पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने के लिए अदालत के आदेश का पालन करने में विफलता:  यदि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत या आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत एक मुकदमे में पति के खिलाफ पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश पारित किया गया हो, और आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक दोनों के बीच सहवास फिर से शुरू नहीं हुआ हो, तो यह वैवाहिक अपराध माना जाएगा।
  • अवैध आयु में विवाह करना: यदि पत्नी का विवाह (चाहे उसका पालन किया गया हो या नहीं) पंद्रह वर्ष की आयु से पहले संपन्न हुआ हो, और उसने विवाह को अस्वीकार कर दिया हो, तो यह अपराध तब माना जाएगा जब उसने पंद्रह वर्ष की आयु के बाद और अठारह वर्ष की आयु से पहले विवाह को अस्वीकार कर दिया हो।   

उपरोक्त वैवाहिक अपराधों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैवाहिक संबंध में व्यक्तिगत क्षति स्पष्ट होनी चाहिए ताकि इसे इस सिद्धांत के तहत रखा जा सके। यदि निर्दोष साथी दोषी साथी की गलती को माफ कर देता है, तो ऐसे मामले में तलाक प्रदान नहीं किया जा सकता।  

विवाह के विफल होने का सिद्धांत  

यदि किसी वैवाहिक अपराध की अनुपस्थिति में विवाह विफल हो जाता है, तो यह तब होता है जब पति-पत्नी में से कोई एक शारीरिक बीमारी, मानसिक अस्वस्थता, धर्म परिवर्तन, सन्यास ले चुका हो, या लंबे समय से उसका कोई पता न हो। ऐसे में दूसरे जीवनसाथी को तलाक लेकर विवाह समाप्त करने का अधिकार होता है। इस सिद्धांत को अधिनियम द्वारा निम्नलिखित रूप में अपनाया गया है: 

 

  • अस्वस्थ मानसिक स्थिति: धारा 13(1)(iii) में यह प्रावधान है कि याचिकाकर्ता को यह सिद्ध करना होगा कि उत्तरदाता लाइलाज मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है या लगातार ऐसी मानसिक बीमारी से पीड़ित है जो इस प्रकार की है और इस सीमा तक है कि याचिकाकर्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह उत्तरदाता के साथ रह सके।
  • संचारी (कम्युनिकेबल) रूप में यौन रोग: धारा 13(1)(v) संचारी रूप में यौन रोग के लिए प्रावधान करती है। “संचारी रोग” वह होता है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक स्पर्श, एक-दूसरे की वस्तुओं का उपयोग करने, और घनिष्ठ शारीरिक संबंधों के माध्यम से फैलता है। इस आधार पर सफल होने के लिए याचिकाकर्ता को यह सिद्ध करना होगा, साथ ही चिकित्सा साक्ष्य के साथ, कि उत्तरदाता जिस यौन रोग से पीड़ित है, वह संचारी है। 
  • धर्मसंघ (रिलीजियस ऑर्डर) में प्रवेश द्वारा संसार का त्याग (रीनंसिएशन): धारा 13(1)(vi) पति या पत्नी के विवाह को तलाक की डिक्री द्वारा भंग करने का आधार बनाती है, यदि विवाह के दूसरे पक्ष ने संसार का त्याग कर दिया हो। इस खंड के तहत तलाक की याचिका में याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि, पहला उत्तरदाता ने किसी धार्मिक संघ में प्रवेश किया है, और  दूसरा कि उसने संसार का त्याग कर दिया है। 

आपसी सहमति के सिद्धांत 

यह तलाक का सिद्धांत अन्य सिद्धांतों से भिन्न है। आपसी सहमति से तलाक का अर्थ है कि मामला सामान्य मामलों की तरह नहीं होता, जहां एक पक्ष दूसरे के खिलाफ तलाक के लिए याचिका दायर करता है और दूसरा पक्ष इसका विरोध करता है। यहां, दोनों पक्ष तलाक के लिए अदालत में संयुक्त याचिका दाखिल करते हैं। वे एक-दूसरे से छुटकारा पाना चाहते हैं और आपसी भलाई के लिए सौहार्दपूर्ण (अमिकेबली) तरीके से अलग हो जाते हैं। यदि तलाक नहीं दिया जाता है, तो उनके जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, जिससे नैतिक गिरावट हो सकती है।  

इस प्रकार के तलाक के खिलाफ यह आपत्ति की जाती है कि अनिच्छुक पक्ष की सहमति बल, धोखाधड़ी, या अन्य किसी उपाय से प्राप्त की जा सकती है, और यह एक छलपूर्वक किया गया तलाक है। जबकि छल में सहमति शामिल होती है, सहमति का हर उदाहरण छल नहीं होता। छल का अर्थ है दो या अधिक व्यक्तियों के बीच गुप्त समझौता जो धोखाधड़ी के परिणामस्वरूप एक परिणाम प्राप्त करता है। यह गुप्त समझौता धोखाधड़ी के माध्यम से एक कानूनी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। छल, जबरदस्ती से अलग है, क्योंकि जबरदस्ती में एक पक्ष दूसरे पर अपनी इच्छा थोपता है।  

आपसी सहमति से तलाक को विवाह अधिनियम, 1976 में जोड़ा गया। इस संशोधन ने हिंदू विवाह की पारंपरिक प्रथाओं, जिन्हें स्मृतियों में एक अटूट बंधन के रूप में रेखांकित किया गया था, से एक बदलाव लाया, और इसे अधिनियम के तहत एक अधिक सहमति-आधारित संघ बना दिया। इस सिद्धांत की आलोचना की गई है कि यह अनैतिकता को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि यह जल्दबाजी में तलाक का कारण बन सकता है। आलोचकों का तर्क है कि आपसी सहमति से तलाक पक्षों को अपेक्षाकृत (रिलेटिवली) छोटे विवादों पर अपने विवाह को समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन का सिद्धांत  

विवाह, जैसा कि कई बार उल्लेख किया गया है, पति और पत्नी के बीच आजीवन बंधन है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह संबंध इतना खराब हो सकता है कि अलगाव की आवश्यकता हो। विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन का सिद्धांत तब सामने आता है जब पति-पत्नी के बीच का वैवाहिक संबंध ऐसे हालातों के कारण समाप्त हो गया हो जिनसे सुलह की संभावना न के बराबर हो। ऐसे समय में पति और पत्नी का एक साथ रहना असंभव हो जाता है। जब विवाह इस स्तर पर विफल हो जाए कि उसे सुधारने की कोई संभावना न बचे, तो इसे समाप्त कर देना चाहिए, चाहे विघटन के कारणों की जांच की जाए या न की जाए और किसी भी पक्ष को दोष न दिया जाए। ऐसी परिस्थितियों में, जीवनसाथियों को अलग करने की आवश्यकता, प्रेम, स्नेह और निष्ठा जैसे पारंपरिक मूल्यों पर हावी हो जाती है, जो आदर्श रूप से पति-पत्नी के बीच होने चाहिए। विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन सिद्धांत का मूल सिद्धांत यह है कि यदि एक पक्ष विवाह में बने रहने की इच्छा नहीं रखता है, तो इसे भंग कर देना चाहिए। इसका उद्देश्य न्यूनतम कड़वाहट, पीड़ा और अपमान के साथ संबंध को समाप्त करना है। माननीय केरल उच्च न्यायालय ने ए. यूसुफ रावत बनाम सोवरम्मा (1971) के मामले में इस सिद्धांत के संदर्भ में कहा था कि,  

“जब आपके पास केवल कांटे हों और कोई गुलाब न हो, तो उसे फेंक देना ही बेहतर है। तलाक का आधार वैवाहिक दोष नहीं बल्कि विवाह का विघटन है।” 

कुछ देशों में इस सिद्धांत के आधार पर तलाक के दावों का समर्थन करने के लिए “स्वभाव की असंगतता” और “गंभीर और स्थायी विघटन” जैसे अतिरिक्त आधार जोड़े गए हैं। न्यायालय पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह जांच करे कि विवाह वास्तव में विघटित हुआ है या नहीं। कुछ मामलों में, विधान ने विवाह के विघटन का आकलन करने के लिए कुछ मानदंड निर्धारित किए हैं। यदि न्यायालय की राय में वे मानदंड पूरे होते हैं, तो तलाक दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अधिनियम की धारा 13(1A)(i) में याचिकाकर्ता को यह दिखाने की आवश्यकता होती है कि वे न्यायिक अलगाव या वैवाहिक अधिकारों की बहाली (रेस्टीट्यूशन) के लिए एक मामले में प्रतिवादी से कम से कम एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हैं।

विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन के सिद्धांत के लाभ

यदि वैवाहिक बंधन में बंधे व्यक्ति यह महसूस करते हैं कि उनका विवाह सफल नहीं हो रहा है, तो आपसी सहमति से दोनों को यह अधिकार मिल सकता है कि वे अलग होकर अपनी-अपनी ज़िंदगी स्वतंत्र और सुखद तरीके से जी सकें, बिना किसी परेशानी के। जब साथ रहने की कोई उचित संभावना नहीं होती, तो यह दोनों को अपनी-अपनी इच्छाओं के अनुसार स्वतंत्र रूप से और अलग-अलग जीवन शुरू करने का अवसर प्रदान करता है। 

विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन के सिद्धांत की हानि  

  • विवाह का अपरिवर्तनीय टूटना एक बहाना बन सकता है, जहां विवाहित जोड़े हमेशा महसूस कर सकते हैं कि छोटी-छोटी बहसें अनुचित हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके एक साथ रहने की कोई संभावना नहीं बचती। इसलिए, मेरी राय में, विवाह के अपरिवर्तनीय टूटने के सिद्धांत के आधार पर तलाक की प्रक्रिया न्यायोचित नहीं है। 
  • यह अचानक मनमाने और अनुचित निर्णयों का परिणाम हो सकता है। 
  • यह कभी-कभी अस्थायी भावनाओं जैसे गुस्सा, अपमान आदि पर आधारित हो सकता है, जो बहस के दौरान दंपत्ति महसूस कर सकते हैं। 
  • यह जीवनसाथियों के बीच संवाद प्रक्रिया को प्रोत्साहित नहीं करता। 
  • यह केवल विवाह का विघटन नहीं है; यह विवाह के समय एकजुट हुई दो परिवारों का भी पतन है। 
  • यदि उस विवाह से बच्चे उत्पन्न हुए हों और माता-पिता अब यह सोचते हों कि साथ रहने की कोई उचित संभावना नहीं है, तो ऐसी टूटी हुई परिवार संरचनाएं उस विवाह से जन्मे बच्चे के लिए भी तनाव का कारण बन सकती हैं।

अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त तलाक के प्रकार

वैधानिक तलाक  

उपरोक्त वर्णित तलाक के सिद्धांत समकालीन हिंदू कानून में मान्यता प्राप्त हैं, जो किसी भी आधार पर तलाक को आगे बढ़ाने की अनुमति देते हैं। प्रारंभ में, अधिनियम ने दोष सिद्धांत के आधार पर तलाक को स्थापित किया, जिसमें धारा 13(1) के तहत दोनों में से किसी भी पक्ष के लिए नौ आधार और धारा 13(2) के तहत पत्नी के लिए दो अतिरिक्त आधार प्रदान किए गए थे। वर्ष 1964 में, धारा 13(1A) को जोड़कर तलाक के लिए दो और आधार शामिल किए गए। 1976 के संशोधन में पत्नी के लिए दोष-आधारित दो अतिरिक्त आधार और धारा 13B को जोड़ा गया, जो आपसी सहमति से तलाक की अनुमति देता है।  

1955 के अधिनियम के तहत, तलाक के लिए जिन आधारों को शामिल किया गया, वे थे व्यभिचार (एडल्ट्री), क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन, पागलपन, संक्रामक बीमारी, और संन्यास, साथ ही मृत्यु की संभावना। पत्नी के लिए अतिरिक्त आधारों में पति की बहुविवाहिता या विवाह के बाद बलात्कार, कुकर्म, या पशुगमन का अपराध करना शामिल था। विशेष रूप से, 5 अगस्त 2021 को, माननीय केरल उच्च न्यायालय ने XXX बनाम XXX (2021) के मामले में, वैवाहिक बलात्कार को तलाक का वैध आधार माना, भले ही इसे भारत में आपराधिक नहीं ठहराया गया हो।  

यदि किसी दंपत्ति के बीच आपसी सहमति से वैधानिक तलाक हो रहा है, तो दोनों पक्षों को परिवार न्यायालय में संयुक्त रूप से याचिका दाखिल करनी होगी। याचिका में यह उल्लेख होना चाहिए कि वे या तो कम से कम एक वर्ष की अवधि से अलग रह रहे हैं या विवाह को भंग करने के लिए सहमत हो गए हैं। उस स्थिति में, न्यायालय याचिका और सहायक दस्तावेजों की समीक्षा करेगा। न्यायालय दंपत्ति के बीच सुलह का प्रयास भी कर सकता है। यदि सुलह के प्रयास सफल नहीं होते, तो न्यायालय बिना किसी देरी के तलाक की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा।  

याचिका की समीक्षा के बाद, दोनों पक्षों के बयान शपथ के तहत दर्ज किए जाते हैं और पहला चरण स्वीकृत किया जाता है। विवाह के पक्षकारों के पास छह महीने का समय होता है कि वे अगली याचिका दाखिल करें, और प्रारंभिक तलाक याचिका की तारीख से अधिकतम अठारह महीने की समय सीमा के भीतर इसे दाखिल करना होता है। जब दोनों पक्ष तैयार होते हैं, तो सुनवाई शुरू हो सकती है। अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने की प्रतीक्षा अवधि अनिवार्य नहीं है। आपसी सहमति से तलाक के मामलों में, आम तौर पर पति और पत्नी तलाक निपटारे, बच्चों की अभिरक्षा (कस्टडी), और संपत्ति जैसे मामलों पर सहमति तक पहुंचते हैं, बशर्ते वे विवाह को भंग करने से पहले एक व्यापक समझ रखते हों।

प्रथागत तलाक

सर्वप्रथम, पारंपरिक हिंदू कानून तलाक की अवधारणा को मान्यता नहीं देता था। इसे केवल कुछ समुदायों में प्रथा के रूप में स्वीकार किया गया था, और अदालतें इन प्रथाओं को तब तक मान्यता देती थीं जब तक वे सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं होती थीं। अधिनियम का उद्देश्य ऐसी प्रथाओं को समाप्त करना नहीं है जो इसकी प्रावधानों द्वारा वैध मानी गई हैं। कुछ मामलों में, प्रथागत आधारों के कारण पति-पत्नी को तलाक प्राप्त करने के लिए अदालत में उपस्थित होना आवश्यक नहीं होता।  

अधिनियम की धारा 29(2) प्रथागत तलाक को संरक्षित करती है, यह दर्शाते हुए कि अधिनियम के प्रावधान किसी भी प्रथा या किसी विशेष कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रभावित नहीं करते, जो हिंदू विवाह को भंग करने से संबंधित हैं। संजना कुमारी बनाम विजय कुमार (2023) के मामले में, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि प्रथागत अधिकार साबित किया जा सके, तो हिंदू विवाह एक प्रथागत तलाक पत्र के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है। अदालत में इस प्रकार के प्रथागत अधिकार के अस्तित्व का स्पष्ट दावा किया जाना चाहिए और इसे पर्याप्त व उपयुक्त साक्ष्यों द्वारा समर्थन देना आवश्यक है। यह तय करना कि पक्षकार प्रथागत तलाक की अनुमति देने वाली प्रथा से शासित हैं या नहीं, तथ्य का विषय है, जिसे न्यायाधीशों के समक्ष स्पष्ट रूप से पेश किया जाना चाहिए और ठोस साक्ष्यों से प्रमाणित किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों की सुनवाई आमतौर पर सिविल अधिकार क्षेत्र वाली अदालतों द्वारा की जाती है। प्रथागत तलाक को साबित करने का भार उस पक्ष पर होता है जो इस पर निर्भर करता है।  

1955 के अधिनियम से पहले, हिंदू केवल तभी तलाक प्राप्त कर सकते थे जब किसी समुदाय-विशिष्ट प्रथा द्वारा इसकी अनुमति दी गई हो। इस अधिनियम ने प्रथागत तलाक को मान्यता दी और निर्दिष्ट किया कि इसके प्रावधान उन पर लागू नहीं होते।  अधिनियम की निम्नलिखित प्रावधान प्रथागत तलाक पर लागू नहीं होतीं:  

  • शून्य विवाह : शून्य विवाह वह होता है जिसे प्रारंभ से ही अवैध माना जाता है, जिसे वाइड एब इनिशियो कहा जाता है। धारा 11 के अनुसार, यदि कोई विवाह अधिनियम की धारा 5(i), (iv), और (v) की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसे शून्य और अमान्य घोषित किया जाएगा। 
  • तलाकशुदा व्यक्ति का पुनर्विवाह : धारा 15 तलाकशुदा व्यक्तियों के पुनर्विवाह का प्रावधान करती है। यह निर्दिष्ट करती है कि तलाक की डिक्री प्राप्त करने वाला व्यक्ति पुनर्विवाह कर सकता है जब डिक्री अंतिम हो जाए, अपील अवधि समाप्त होने के बाद या किसी अपील के खारिज होने के बाद। 
  • कार्रवाई में डिक्री : अधिनियम की धारा 23 में निर्दिष्ट किया गया है कि किसी विवाह को शून्य या शून्यकरणीय (वोयडेबल) नहीं घोषित किया जा सकता जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि सहमति बल, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के माध्यम से प्राप्त की गई थी। दूसरे शब्दों में, यदि दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से अपनी सहमति दी है, तो विवाह वैध माना जाएगा और सहमति से संबंधित किसी भी दोष के आधार पर इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • मुकदमे की कार्यवाही के दौरान भरण-पोषण और खर्च: अधिनियम की धारा 24 उस प्रावधान से संबंधित है जो चल रही कानूनी कार्यवाही के दौरान आश्रित जीवनसाथी को अस्थायी आर्थिक सहायता प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, यह सुनिश्चित करता है कि पत्नी या पति को उनकी कानूनी कार्यवाही के दौरान आवश्यक जीवन यापन के खर्च और आर्थिक सहायता मिले। यह सहायता आश्रित जीवनसाथी को मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के उद्देश्य से दी जाती है।  
  • स्थायी भरण-पोषण और गुजारा भत्ता: अधिनियम की धारा 25 अदालत को किसी भी जीवनसाथी को स्थायी भरण-पोषण और गुजारा भत्ता प्रदान करने का अधिकार देती है। अदालत भरण-पोषण या गुजारा भत्ता की राशि का निर्धारण या तो डिक्री जारी करते समय या उसके बाद कभी भी कर सकती है। 
  • बच्चों की अभिरक्षा: अधिनियम की धारा 26 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह बच्चों की अभिरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के संबंध में आदेश जारी करे या व्यवस्था करे, चाहे वह बच्चों के माता-पिता से संबंधित मामलों में चल रही कार्यवाही के दौरान हो या डिक्री जारी होने के बाद। जहां ऐसी कोई कार्यवाही नहीं चल रही होती, वहां केवल अभिभावक न्यायालयों को इन निर्णयों का अधिकार होता है।

ऐतिहासिक रूप से, कई निम्न जाति के हिंदू प्रथा के माध्यम से तलाक को अपनाते थे, विवाह के धार्मिक पहलू को औपचारिकता मानते हुए, न कि एक वास्तविकता के रूप में। हालांकि, हिंदू धर्म में तलाक की कोई सार्वभौमिक परंपरा नहीं है, और प्रथाएं विभिन्न जातियों और क्षेत्रों के आधार पर अलग-अलग होती हैं। जब प्रथागत तलाक की मांग की जाती है, तो यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित पक्ष ऐसी परंपरा को पूरा करने के लिए बाध्य हैं। 1955 के अधिनियम से पहले की तरह, प्रथागत तलाक अभी भी गाँव पंचायतों, जाति पंचायतों, निजी समझौतों, या लिखित घोषणाओं जैसे त्याग पत्र के माध्यम से किया जा सकता है। यदि कोई प्रथा एक पक्ष को एकतरफा रूप से दूसरे को तलाक देने की अनुमति देती है, तो वह अमान्य मानी जाती है, यदि वह अनुचित और सार्वजनिक नीति के खिलाफ हो। प्रथागत तलाक सामान्य तलाक कानूनों का एक अपवाद है, लेकिन इसे साबित करना और स्थापित करना आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के तलाक को मान्यता देने वाले प्रथाएं मौजूद हैं, जो आपसी सहमति से हो सकते हैं या, कुछ मामलों में, एक पक्ष द्वारा संदिग्ध कारणों से हो सकते हैं। स्वीकृत तलाक के प्रकारों की सीमा जटिल और विविध है।  

यमनजी एच. जाधव बनाम निर्मला (2002) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रथागत तलाक तभी वैध है, जब यह संबंधित प्रथा द्वारा अनुमति प्राप्त हो, या तलाक उस परंपरा के भीतर एक मान्यता प्राप्त प्रथा हो। एक बार जब ऐसी प्रथा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है, तो पक्षकार अदालत में एक घोषणात्मक (डिक्लेरेटरी) कार्रवाई दाखिल कर सकते हैं, यह पुष्टि करने के लिए कि उनका तलाक पत्र वैध, विधिसंगत और उपयुक्त है।

समाज में तलाक के कारण (एक सामाजिक दृष्टिकोण)

भारतीय समाज में तलाक की दर काफी हद तक बढ़ गई है। तलाक के कई कारण हैं, और साथ ही समाज के इन पारंपरिक विचारों के प्रति बदलते दृष्टिकोण को भी देखा जा सकता है। तलाक के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • भारतीय महिलाओं की स्वतंत्रता 

पहले, महिलाएं तथाकथित ‘परिवार की इज्जत और समाज में प्रतिष्ठा’ के लिए समाज द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करती थीं और सिर झुकाकर उन्हें बिना सवाल किए स्वीकार कर लेती थीं। हालांकि, बढ़ती आधुनिकता, औद्योगिकीकरण (इंडस्ट्रालाइजेशन) और शहरीकरण (अर्बनाइजेशन) के साथ, महिलाएं शिक्षित होने लगीं और सामाजिक घटनाओं के प्रति अधिक जागरूक हो गईं। इसलिए, अपने लिए खड़े होने की आवश्यकता को समझते हुए, महिलाओं ने अपना जीवनयापन स्वयं कमाना शुरू किया और स्वतंत्र बन गईं। उन्होंने अपने ससुराल वालों और पतियों द्वारा किए गए अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी और खुशी और स्वतंत्रता के साथ जीने लगीं। परिणामस्वरूप, महिलाएं खुद के लिए खड़े होने और अपने अत्याचारी पतियों को तलाक देने से नहीं डरती थीं। इस प्रकार, तलाक की दर बढ़ती चली गई।

  • विवाहों में संवाद की कमी  

संवाद विवाहों में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार, जब दो भागीदारों के बीच उचित संवाद नहीं होता है, तो गलतफहमियां और झगड़े होना तय होते हैं। इस प्रकार, संवाद की कमी कभी-कभी तलाक का कारण बन जाती है।

  • धोखा और प्रसंग (अफेयर)  

विश्वास कभी भी तब तक पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता, जब यह टूट चुका हो। इस प्रकार, जब एक धोखेबाज साथी ईमानदार साथी का विश्वास तोड़ता है, तो उसे कभी भी फिर से बहाल नहीं किया जा सकता और परिणामस्वरूप, तलाक होना तय है। धोखा देना और विवाहेतर संबंध रखना एक रिश्ते को नष्ट, ध्वस्त और खराब कर सकता है जो दोनों पक्षों के बीच मौजूद हो सकता था। भारत में, पति या पत्नी के साथ धोखा करने के लिए दंडात्मक प्रावधान भी हैं।

  • ससुराल वालों से समस्याएं  

एक लड़की के लिए यह बहुत कठिन हो जाता है जो अपने घर को छोड़कर एक नए परिवार में आती है और बाद में यह पता चलता है कि उसके ससुराल वाले सहयोग नहीं कर रहे, उसे परेशान कर रहे हैं और उसका जीवन जीना असंभव बना रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय दंड संहिता, 1860 में इसके लिए एक वैधानिक प्रावधान है जैसे कि धारा 498A, जो ‘महिला को क्रूरता का सामना कराने वाले पति या पति के रिश्तेदार’ के बारे में बताती है। साथ ही, बहुत सी घटनाएं हैं जिसमें पत्नी को उसके पिता के घर से पैसे लाने के लिए मजबूर किया जाता है, और जब वह इसे नकारती है या इतनी बड़ी धनराशि लाने में असमर्थ होती है, तो ससुराल वाले उसे मार डालते हैं। इसके लिए हमारे पास धारा 304B के दंडात्मक प्रावधान भी हैं, जो दहेज मृत्यु के लिए है।  

यह भी उल्लेखनीय है कि धारा 498A का गलत उपयोग बहुत सी घटनाओं में होता है; इस प्रकार, दो वास्तविक मामलों में, जब वास्तविक यातना और कानून का दुरुपयोग होता है, तो तलाक होना तय होता है। 

  • विवाह में प्रजनन संबंधी समस्याएं  

भारतीय समाज इस तरह से बनाया गया है कि समाज न केवल जोड़े को एक बड़ी सीमा तक प्रेरित और प्रभावित करता है, बल्कि यह भी निर्धारित करता है कि एक जोड़ा कब बच्चे को जन्म दे। इससे बहुत अधिक तनाव उत्पन्न होता है और अगर ऐसी समस्याएं साझेदारों के बीच हल नहीं की जाती हैं, तो यह तलाक का कारण बन सकती हैं।

तलाक के कानून का उद्देश्य 

परंपरागत भारतीय संस्कृति में तलाक को एक स्वीकृत अवधारणा नहीं माना जाता था। समाज में बदलाव के साथ, तलाक का उद्देश्य दोषी पक्ष को दंडित करना और विवाह में निर्दोष या वफादार साथी की सुरक्षा करना विकसित हुआ है। एक जोड़े को शादी करने का असली उद्देश्य दोनों व्यक्तियों के बीच एक सामंजस्यपूर्ण और सहायक साझेदारी बनाना है। यदि यह उद्देश्य विवाह की अवधारणा द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता; तो विवाह के रिश्ते को बनाए रखना निरर्थक है। इसलिए, तलाक की अवधारणा विकसित हुई ताकि पहले विवाह के बंधनों में बंधे व्यक्तियों को एक संपूर्ण, स्वतंत्र और अलग जीवन जीने की अनुमति मिल सके।

1955 के अधिनियम के तहत तलाक से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान 

भारतीय समाज के विकास के साथ, तलाक की अवधारणा को अधिनियम के तहत औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया। इसके परिणामस्वरूप, उक्त अधिनियम के तहत कई धाराएं तलाक के लिए प्रावधान प्रदान करती हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

हिंदू विवाह के लिए वैध शर्तें  

हिंदू विवाह को वैध रूप से संपन्न करने के लिए आवश्यक शर्तें अधिनियम की धारा 5 में दी गई हैं। इस प्रकार, इसे इस तरह से भी व्याख्यायित किया जा सकता है कि यदि इन शर्तों में से कोई एक भी उल्लंघन या पूर्ण नहीं की जाती है, तो यह तलाक का कारण बन सकती है। ये शर्तें इस प्रकार हैं:

  1. जब विवाह संपन्न किया जाता है, तो किसी भी पक्ष के पास जीवित पति/पत्नी नहीं होनी चाहिए;
  2. विवाह के समय, कोई भी पक्ष:
  • मानसिक अस्वस्थता के कारण वैध सहमति देने में सक्षम नहीं है;  
  • यदि वैध सहमति देने में सक्षम है, तो मानसिक बीमारी इतनी गंभीर है कि विवाह और प्रजनन पूरी तरह से असंभव है;
  • मानसिक विकार के लगातार दौरे से गुजर चुका है;
  1. दूल्हे की आयु विवाह के समय न्यूनतम   21 वर्ष होनी चाहिए, और दुल्हन की आयु न्यूनतम 18 वर्ष होनी चाहिए;
  2. दोनों पक्ष एक-दूसरे के साथ निषिद्ध रिश्तों की डिग्रियों के भीतर नहीं होने चाहिए, जब तक कि उनके विवाह के लिए कोई प्रथा या उपयोगिता लागू न हो;
  3. दोनों पक्ष एक-दूसरे के ‘सपिंडा’ नहीं होने चाहिए, जब तक कि उन दोनों पर लागू कोई प्रथा या परंपरा उनके विवाह की अनुमति न देती हो।

दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना  

“दाम्पत्य (कंजूगल) अधिकार” शब्द से तात्पर्य है प्रत्येक पति-पत्नी का एक-दूसरे के साथ साहचर्य (कंपेनियनशिप) और वैवाहिक अंतरंगता में रहने का अधिकार। “दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना,” दूसरी ओर, उन अधिकारों की पुनः स्थापना को दर्शाता है जिन्हें पक्षों ने पहले आनंदित किया था। अधिनियम की धारा 9 वैवाहिक रिश्ते में साहचर्य के अधिकार को औपचारिक रूप से मान्यता देती है। यदि कोई पति-पत्नी बिना किसी न्यायसंगत कारण के दूसरे पति-पत्नी को छोड़ देता है, तो पीड़ित पक्ष दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए अदालत से आदेश प्राप्त कर सकता है। यह प्रावधान अंग्रेजी कानून से अनुकूलित किया गया है। यह अधिनियम के तहत उपलब्ध केवल सकारात्मक उपचार है क्योंकि अन्य उपलब्ध उपचार विवाह को कमजोर या विघटित कर सकते हैं। दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना तब दी जा सकती है यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी की जाती हैं:

  • प्रतिवादी अब याचिकाकर्ता के साथ नहीं रह रहा है।
  • प्रतिवादी का प्रस्थान बिना किसी वैध कारण के हुआ है।
  • अदालत इस बात से संतुष्ट है कि याचिकाकर्ता के दावे वैध हैं।
  • दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन को अस्वीकार करने के लिए कोई कानूनी कारण नहीं है।  

धारा 9 के अनुसार, प्रस्थान के न्यायसंगत या उचित कारण का प्रमाण देना उस पक्ष पर है जिसके खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। इस धारा में यह निर्धारित किया गया है कि एक बार याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्थान (विथड्रावल) स्थापित हो जाने के बाद, प्रस्थान करने वाले पति-पत्नी को अपनी कार्रवाई के लिए न्यायसंगत कारण देना होगा।  

न्यायिक पृथक्करण (सेपरेशन) 

“न्यायिक पृथक्करण” को एक कानूनी प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया जा सकता है जिसमें एक विवाहित जोड़ा आधिकारिक रूप से अलग हो जाता है लेकिन फिर भी कानूनी रूप से विवाहित रहता है। इस अवधारणा का वर्णन अधिनियम की धारा 10 में किया गया है। कोई भी पति या पत्नी, चाहे विवाह अधिनियम के लागू होने से पहले हुआ हो या बाद में, धारा 13(1) में उल्लिखित किसी भी कारण से न्यायिक पृथक्करण के लिए याचिका दायर कर सकता है, और पत्नी के लिए, धारा 13(2) में उल्लिखित किसी भी कारण से भी।  

धारा 10(2) के अनुसार, जब अदालत द्वारा न्यायिक पृथक्करण के लिए आदेश दिया जाता है, तो याचिकाकर्ता को प्रतिवादी के साथ एक साथ रहने का कोई दायित्व नहीं होता। हालांकि, अदालत के पास आदेश को खारिज करने या निरस्त करने का अधिकार है यदि वह याचिकाकर्ता की याचिका की समीक्षा करने और बयानों की सत्यता की जांच करने के बाद इसे उचित और तर्कसंगत पाती है।  

तलाक  

तलाक विवाह का कानूनी अंत है। तलाक प्राप्त करने के लिए उचित अधिकारक्षेत्र वाली अदालत में याचिका दायर की जा सकती है। अधिनियम की धारा 13(1) तलाक के कारणों को रेखांकित करती है, जो दोनों पति-पत्नी पर लागू होते हैं। जब ये शर्तें पूरी होती हैं, तो तलाक अनिवार्य हो जाता है। विवाह तब तक कानूनी रूप से वैध रहता है जब तक अदालत तलाक का आदेश नहीं देती, और इस तलाक के आदेश के बिना कोई भी पक्ष पुनः विवाह नहीं कर सकता। धारा 13 का यह प्रावधान उन विवाहों पर भी लागू होता है जो अधिनियम के लागू होने से पहले हुए थे। कोई भी पक्ष तलाक के लिए निम्नलिखित कारणों में से किसी एक के आधार पर याचिका दायर कर सकता है: 

 

तलाक के कारण  

व्यभिचार  

व्यभिचार को अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत परिभाषित किया गया है। यह निर्धारित करता है कि यदि कोई विवाहित व्यक्ति अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, तो इसे व्यभिचार माना जाएगा। ऐतिहासिक रूप से, भारत में व्यभिचार भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497 के तहत भी एक अपराध था। इस धारा ने किसी ऐसे व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाने को अपराध माना था, जो विवाहित हो और जिसे व्यक्ति जानता या यह मानता है कि वह किसी अन्य का पति या पत्नी है, बिना पति की अनुमति के। इस अपराध के लिए सजा में पांच साल तक की कैद, जुर्माना, या दोनों हो सकते थे, और पत्नी को अपराधी सहायक नहीं माना जाता था। इसके अलावा, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 198(2) ने विवाह से संबंधित अपराधों के अभियोजन का प्रावधान किया था। हालांकि, जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018) के मामले में, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198(2) को असंवैधानिक घोषित किया, जिसके परिणामस्वरूप इन्हें अमान्य कर दिया गया।  

क्रूरता  

क्रूरता, साधारण शब्दों में, किसी के खिलाफ अत्याचार या अव्यवहारिक क्रूर व्यवहार को कहा जाता है। अधिनियम की धारा 13(1)(ia) कहती है कि विवाह के संकल्प के बाद भी याचिकाकर्ता के साथ क्रूरता से व्यवहार करना तलाक के कारण के रूप में माना जा सकता है। क्रूरता भी एक अपराध है और इसके लिए वैधानिक प्रावधान हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 और 86 में पति या पति के रिश्तेदार द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता के बारे में कहा गया है। क्रूरता करने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 की व्याख्या में कहा गया है कि कोई भी जानबूझकर ऐसा कृत्य जिससे एक महिला आत्महत्या करने की ओर प्रेरित हो सकती है, उसे क्रूरता माना जाएगा। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 86 क्रूरता को इस प्रकार परिभाषित करती है:

  • कोई जानबूझकर व्यवहार जो एक महिला को आत्महत्या करने या उसकी शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक भलाई या जीवन को महत्वपूर्ण नुकसान या खतरा पहुँचाने की संभावना उत्पन्न करता हो; या  
  • एक महिला को या उसके रिश्तेदारों को संपत्ति या मूल्यवान संपत्तियों के लिए अवैध मांगों को पूरा करने के लिए उत्पीड़न करना, या उन मांगों को पूरा न करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न उत्पीड़न।

शोभा रानी बनाम माधुकर रेड्डी (1988) के ऐतिहासिक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह दर्ज किया कि “क्रूरता” शब्द को अधिनियम में कहीं भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। इसे वैवाहिक कर्तव्यों या दायित्वों से संबंधित आचरण या व्यवहार के रूप में वर्णित किया गया है। तलाक के कारण के रूप में क्रूरता को विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा पेश किया गया था। इस संशोधन से पहले, क्रूरता केवल न्यायिक पृथक्करण का कारण थी, उत्तर प्रदेश राज्य को छोड़कर। धारा 13(1)(ia) में कहा गया है कि जो क्रूरता पति या पत्नी के द्वारा की गई हो, उसे शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना चाहिए। यह न्यायालय की विवेकाधीनता है कि वे प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर यह निर्धारित करें कि वह व्यवहार क्रूरता है या नहीं।  

एस. हनुमथ राव बनाम एस. रामानी (1999) के मामले में पत्नी का व्यवहार अपने वैवाहिक घर में और पति के साथ सौहार्दपूर्ण नहीं था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में यह माना कि मानसिक क्रूरता का अर्थ है जब विवाह के किसी भी पक्ष द्वारा मानसिक पीड़ा, कष्ट या तनाव उत्पन्न किया जाता है, जिससे पति-पत्नी के बीच संबंध टूट जाते हैं और परिणामस्वरूप एक साथ रहना असंभव हो जाता है।  

क्रिस्टिन लाजरस मेनेज़ेस बनाम श्री लाजरस पीटर मेनेज़ेस (2017) के मामले में माननीय बंबई उच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A के तहत झूठे मामले दायर करना क्रूरता का कारण बनता है और यह तलाक के लिए एक आधार हो सकता है। मामले का विवरण इस प्रकार है:  

  • याचिकाकर्ता की पत्नी ने कुटुंब न्यायालय के निर्णय को चुनौती दी था, जिसने प्रतिवादी की तलाक की याचिका को मंजूरी दी थी। माननीय बंबई उच्च न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया, अपील को खारिज करते हुए और “क्रूरता” के आधार पर दिया गया तलाक बरकरार रखा।  
  • अदालत ने देखा कि कार्यवाही के दौरान पत्नी ने शपथ के तहत यह स्वीकार किया कि उसने मुंबई के खेरवाड़ी पुलिस स्टेशन में अपने पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 406 के तहत एफ आई आर दर्ज की थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने अपराधी शिकायत केवल अपने पति को उनके वैवाहिक घर में वापस लाने के लिए दर्ज की थी;  
  • इन तथ्यों को देखते हुए, अदालत ने यह दर्ज किया कि यदि पत्नी द्वारा दायर की गई आपराधिक शिकायत सत्य नहीं थी और केवल अपने पति को वापस घर लाने के लिए दबाव डालने के उद्देश्य से थी, जिसके कारण पति की गिरफ्तारी हुई और सात दिन की सजा हुई, तो यह पत्नी द्वारा पति के प्रति क्रूरता मानी जाएगी।    

क्रूरता से संबंधित प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 117 में भी प्रदान किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि यदि यह स्थापित हो जाए कि एक महिला की आत्महत्या उसके पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा प्रोत्साहित की गई थी, और यदि उसने अपने पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता सहने के बाद विवाह के सात वर्षों के भीतर आत्महत्या की, तो अदालत, सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करते हुए, यह निष्कर्ष निकाल सकती है कि उसकी आत्महत्या में उनका सहयोग था।

परित्याग

स्पष्ट रूप से, परित्याग का अर्थ है किसी व्यक्ति को छोड़ देना। परित्याग का मूलभूत सिद्धांत यह है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को छोड़ दिया है, जो त्याग किए गए पक्ष की इच्छा के खिलाफ है और विवाहिक कर्तव्यों का पूर्ण त्याग दिखाता है। परित्याग तभी दावा किया जा सकता है जब विवाह समारोह के बाद दोनों पक्षों ने अपनी आपसी जिम्मेदारियाँ स्वीकार की हों और उन्हें पूरा किया हो, जिसमें विवाह की संपूर्णता के उद्देश्य से सहवास करना शामिल है। सहवास एक वैध विवाह का आवश्यक तत्व है, और यदि दंपत्ति के बीच कोई सहवास नहीं हुआ है, तो परित्याग का दावा नहीं किया जा सकता। हालांकि, कुछ अपवाद हैं, जैसे मानसिक या शारीरिक अक्षमता वाले मामले या अन्य विशिष्ट स्थितियाँ।  

अधिनियम के तहत, परित्याग शुरू में केवल न्यायिक पृथक्करण के लिए एक कारण था, लेकिन अब यह धारा 13(1)(ib) के तहत तलाक का एक कारण भी है। धारा 13(1)(ib) के अनुसार, तलाक तभी दिया जा सकता है यदि याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी ने दो साल की लगातार अवधि के लिए उसे त्याग दिया हो, जो याचिका की तिथि से ठीक पहले की हो। जोथी पाई बनाम पी.एन. प्रताप कुमार राय (1987) में कर्नाटका उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि बिना उचित कारण के परित्याग को साबित करने का बोझ याचिकाकर्ता पर है। इसी तरह, कंचन साहू बनाम परमंनदा साहू (1999) में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि यदि पति ने वैवाहिक घर में एक प्रेमिका को रखा हो, तो वह अपनी पत्नी द्वारा परित्याग का दावा नहीं कर सकता। इस प्रकार, ऐसे मामलों में पत्नी परित्याग के आधार पर तलाक के लिए आवेदन कर सकती है।  

धर्म परिवर्तन  

धर्म परिवर्तन या अज्ञेयवाद (अपोस्टेसी) को तलाक के आधार के रूप में अधिनियम की धारा 13(1)(ii) के तहत परिभाषित किया गया है। यह तब होता है जब एक पक्ष जानबूझकर अपने धर्म को त्यागकर एक अलग और विशिष्ट धर्म अपनाता है, जो विवाह समारोहों के बाद होता है। इस अधिनियम के तहत, धर्म परिवर्तन का मतलब है हिंदू धर्म के अलावा एक प्रमुख धर्म अपनाना। तलाक के लिए इस आधार का उपयोग करने के लिए, याचिकाकर्ता को निम्नलिखित स्थापित करना होगा:

  • दूसरा पक्ष अब हिंदू नहीं रहा है, और 
  • दूसरे पक्ष ने ऐसा एक अलग धर्म अपनाकर किया है।

यह तलाक का आधार केवल उस पक्ष के लिए उपलब्ध है जिसने धर्म परिवर्तन नहीं किया है। धर्म परिवर्तन करने वाले पक्ष को अपने धर्म परिवर्तन के आधार पर तलाक प्राप्त करने की अनुमति देना अपने ही अपराध या दोष से लाभ उठाने के समान होगा, जैसा कि अधिनियम की धारा 23(1)(a) में उल्लिखित है। इसलिए, धारा 13(1)(ii) के तहत यह अधिकार केवल गैर-परिवर्तित पक्ष के लिए है, जो धर्म परिवर्तन करने वाले पक्ष से तलाक लेने या विवाह जारी रखने का चयन कर सकता है। वैकल्पिक रूप से, यदि गैर-परिवर्तित पक्ष पत्नी है, तो वह हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत अलग रहने और भत्ते की मांग कर सकती है। यदि पति ने किसी अन्य धर्म में धर्म परिवर्तन करके पुनः विवाह किया, जैसे कि इस्लाम, तो उसे कानूनी परिणामों का सामना करना होगा, और उसका नया विवाह उसके मौजूदा हिंदू पति या पत्नी के कानूनी अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा।  

सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) में, पति ने इस्लाम धर्म अपनाया और दूसरी पत्नी से विवाह किया। इस मामले में यह सवाल उठा कि क्या धर्म परिवर्तन के कारण पहले विवाह को निरस्त किया जा सकता है या वह शून्य हो जाता है और क्या पति को द्विविवाह का अपराध करना पड़ेगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि पहले विवाह को निरंतर मान्यता प्राप्त होगी और पति द्विविवाह के अपराध के लिए जिम्मेदार होगा। पति द्वारा एक अपील दायर की गई थी, जो कि लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000) मामले में एक साथ निपटाई गई थी। याचिकाकर्ता, सुशिता घोष, ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि वह श्री एम.सी. घोष से 1984 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाहित थीं। हालांकि, 1992 में, श्री घोष ने इस्लाम धर्म अपनाने के बाद अपनी दूसरी पत्नी, श्रीमती विनिता गुप्ता से विवाह करने के लिए आपसी सहमति से तलाक की मांग की थी, जो एक तलाकशुदा महिला थीं और दो बच्चों की माँ थीं। चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 द्विविवाह या द्विपत्नीत्व (बाईगेमी) विवाह की अनुमति नहीं देता, श्री घोष ने इस्लाम धर्म अपनाने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। तथ्य यह बताते हैं कि श्री घोष का धर्म परिवर्तन केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से था, न कि नए धर्म को सच्चे मन से अपनाने के लिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने देखा कि जब एक पक्ष पहले विवाह के रहते हुए दूसरी शादी करता है, तो वह भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 82) के तहत द्विविवाह के अपराध का दोषी होगा। 

मानसिक अस्वस्थता  

एक व्यक्ति जो सही और गलत में अंतर नहीं कर सकता या जो अपने चारों ओर हो रहे घटनाओं पर सहमति देने या उसे रोकने में असमर्थ है, उसे वैवाहिक बंधनों में प्रवेश करने के लिए सक्षम नहीं माना जाता है। मानसिक अस्वस्थता, तलाक के आधार के रूप में, धारा 13(1)(iii) के तहत परिभाषित है। 1976 के संशोधन से पहले, “मानसिक अस्वस्थता” एक वर्ष के लिए न्यायिक पृथक्करण का कारण थी, और तलाक के मामले में तीन वर्षों के लिए थी। अब, उक्त संशोधन के बाद, कोई पूर्व अवधि निर्धारित नहीं की गई है। “मानसिक अस्वस्थता” का शब्द “सभी प्रकार के मानसिक मामलों” को शामिल करता है, जिसमें सामान्यता और असामान्यता शामिल हैं। इस खंड के तहत राहत का दावा करने के लिए, याचिकाकर्ता को निम्नलिखित साबित करना होगा:

  • प्रतिवादी मानसिक अस्वस्थता से ग्रस्त है;
  • वह अस्वस्थता इलाज योग्य नहीं है; और  
  • मानसिक विकार इस प्रकार का है और इतनी गंभीरता से है कि याचिकाकर्ता से अपेक्षाएँ नहीं की जा सकतीं कि वह प्रतिवादी के साथ रह सके।  

 

इस खंड की व्याख्या में निम्नलिखित कहा गया है:

  1. “मानसिक विकार (डिसऑर्डर)” का मतलब है असामान्य व्यवहार, मस्तिष्क का अपर्याप्त या अविकसित विकास, मानसिक विक्षोभ या मस्तिष्क का अन्य कोई मसला या अक्षमता, और इसमें स्किजोफ्रेनिया भी शामिल है;  
  2. इसी प्रकार, “मनोरोगी (साइकोपैथिक) विकार” का मतलब है मस्तिष्क का एक स्थायी समस्या या अक्षमता (चाहे इसमें बुद्धिमत्ता की असामान्यता शामिल हो या नहीं) जो दूसरे के प्रति असामान्य रूप से आक्रामक या शारीरिक रूप से लापरवाह व्यवहार का कारण बनती है, और चाहे वह चिकित्सा उपचार की आवश्यकता हो या न हो। इस प्रकार, जब कोई व्यक्ति इस प्रकार की मानसिक अस्थिरता से पीड़ित होता है, तो वह विवाह में अपने अधिकारों और कर्तव्यों का पालन कभी नहीं कर सकता। यह तलाक के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है।  

माननीय गुजरात उच्च न्यायालय ने अजीत्राई शिवप्रसाद मेहता बनाम बाई वासुमती (1969) के मामले में निर्णय दिया कि मानसिक अस्वस्थता के आधार पर वैवाहिक राहत की मांग करते समय यह साबित करना चाहिए कि अदालत को पूरी तरह से संतुष्ट करने के लिए यह संदेह से परे है। 

त्र्यंबक नारायण भागवत बनाम कुमुदिनी त्र्यंबक भागवत (1967) के मामले में, पति ने पागलपन के दौरे के दौरान पत्नी के भाई का गला घोंटने की कोशिश की और एक अलग अवसर पर पत्नी की मौजूदगी में उसके छोटे बेटे का गला घोंटने का प्रयास किया। माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि पति के ये कृत्य क्रूरता की श्रेणी में आते हैं, भले ही उसमें जानबूझकर क्रूरता करने का कोई इरादा न हो।  

इसी प्रकार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. एन.जी. दस्ताने बनाम श्रीमती एस. दस्ताने (1975) के मामले में पति की याचिका खारिज कर दी, क्योंकि मानसिक अस्थिरता का कोई सबूत नहीं पाया गया। हालांकि, प्रतिवादी ने विवाह से पहले कुछ मानसिक विकारों का अनुभव किया था, लेकिन विवाह के समय तक वह पूरी तरह से ठीक हो चुकी थी। 

संक्रमणीय रूप में यौन रोग 

धारा 13(1)(v) के तहत, यौन रोग, जिसे सामान्य रूप से यौन संचारित रोग (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़) (एस टी डी) कहा जाता है, तलाक का एक कारण हो सकता है। यदि एक पति या पत्नी को गंभीर, इलाज योग्य और संक्रामक रोग है, तो पति या पत्नी तलाक के लिए याचिका दायर कर सकता है। यौन रोगों को विशेष रूप से परिभाषित किया गया है, जैसे कि एआईडीएस, जो इस प्रावधान के तहत आते हैं। इस आधार पर सफल होने के लिए, याचिकाकर्ता को चिकित्सा प्रमाणों के साथ यह साबित करना होगा कि प्रतिवादी जिस यौन रोग से ग्रस्त है, वह संक्रामक रूप में है।  

बीरेंद्र कुमार बनाम हेमा लता बिस्वास (1921) के मामले में, तलाक पति को दिया गया क्योंकि पत्नी को अनुपचारित सिफलिस थी, जो उसने विवाह से पहले पाई थी और पति से इसका खुलासा नहीं किया था। इसके अलावा, चूंकि विवाह को संपूर्ण नहीं किया गया था, कोलकाता उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि निरस्तीकरण (ऐनलमेंट) किया जाएगा, भले ही उसके पास इलाज के लिए कई छोटे मौके उपलब्ध थे।

त्याग  

धारा 13(1)(vi) के तहत, यदि पति या पत्नी सांसारिक कार्यों को त्याग कर किसी धार्मिक या अन्य विश्वास को अपनाता है, तो वह तलाक के लिए याचिका दायर कर सकता है। जो व्यक्ति सांसारिक कार्यों को त्यागता है, वह मास्लो द्वारा वर्णित आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में पहुंचता है। जब कोई व्यक्ति विवाह, रिश्तों और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने का चयन नहीं करता, तो इसे भी तलाक के लिए वैध आधार माना जा सकता है। इस खंड के तहत दायर तलाक की याचिका में यह सिद्ध करना आवश्यक है कि प्रतिवादी ने किसी धार्मिक आदेश को अपनाया है, जैसे कि उसने किसी आश्रम में स्थायी रूप से रहने की मंशा से प्रवेश किया हो। केवल संन्यासी का वस्त्र धारण करना, किसी मंदिर में पुजारी या महंत के कर्तव्यों का पालन करना, या गुरुद्वारे में ग्रंथी का कार्य करना, किसी व्यक्ति को संन्यासी नहीं बनाता और इस प्रकार यह खंड की शर्तों को पूरा नहीं करता। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सितल दास बनाम संत राम और अन्य (1954) मामले में यह निर्णय दिया कि हिंदू कानून के तहत, सांसारिक कार्यों को त्यागकर किसी धार्मिक आदेश में प्रवेश करना सामान्यतः नागरिक मृत्यु के समान होता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह प्रमाणित किया जाए कि धार्मिक संप्रदाय या आदेश में प्रवेश के लिए सभी आवश्यक समारोहों को सही तरीके से पूरा किया गया हो।

मृत्यु का अनुमान  

धारा 13(1)(vii) के तहत, यदि किसी व्यक्ति के बारे में जो लोग सामान्यतः उसके ठिकाने के बारे में जानते हैं, सात वर्षों तक कोई जानकारी नहीं मिलती है, तो उसे कानूनी रूप से मृत माना जाएगा। यह अनुमान इस विश्वास पर आधारित है कि यदि वह व्यक्ति जीवित होता, तो वह निश्चित रूप से अपने मित्रों या रिश्तेदारों से संपर्क करता। यदि करीबी रिश्तेदार शपथपूर्वक प्रमाणित करते हैं कि सात वर्षों तक उस व्यक्ति से कोई जानकारी नहीं मिली, तो व्यक्ति को मृत माना जाता है और याचिकाकर्ता को तलाक का आदेश दिया जा सकता है। इसी तरह, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 111 के तहत, यदि यह प्रमाणित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति जो सामान्यतः उस व्यक्ति के बारे में जानता हो, सात वर्षों में उससे कोई संपर्क नहीं किया है, तो जीवित होने का प्रमाण प्रस्तुत करने का बोझ दावे करने वाले पर होगा।

यदि किसी व्यक्ति को सात वर्षों तक वह लोग जो सामान्यतः उसके बारे में जानते हैं, उन्होंने उस व्यक्ति को न तो देखा है और न सुना है, तो उसे कानूनी रूप से मृत माना जाएगा। यह अनुमान धारा 13(1)(vii) के तहत तलाक का आधार बनता है। जब करीबी रिश्तेदार शपथपूर्वक यह प्रमाणित करते हैं कि वह व्यक्ति सात वर्षों से लापता है, तो उसे मृत माना जाता है और न्यायालय याचिकाकर्ता के पक्ष में तलाक का आदेश दे सकता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 111 के अनुसार, यदि यह प्रमाणित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति जो सामान्यतः उस व्यक्ति के बारे में जानता हो, सात वर्षों में उससे कोई संपर्क नहीं किया है, तो जीवित होने का बोझ दावे करने वाले पर होगा।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि तलाक की याचिकाओं में धारा 13 के उपधारा (1) के खंड (vi) और (vii) के तहत दायर किए गए मामलों में प्रतिवादी को न्यायालय में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होती है। इन मामलों में न्यायालय याचिकाकर्ता के खर्च पर समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस जारी करता है और प्रतिवादी को उत्तर देने के लिए उचित समय प्रदान करता है।

विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन का आधार  

न्यायिक पृथक्करण के निर्णय के बाद सहवास का न होना 

1955 के अधिनियम की धारा 13(1A)(i) के तहत यह प्रावधान है कि यदि न्यायिक अलगाव के निर्णय के पारित होने के बाद, पति और पत्नी के बीच सहवास को एक वर्ष या उससे अधिक समय तक पुनः शुरू नहीं किया गया है, तो कोई भी पक्ष तलाक की याचिका दायर कर सकता है। सहवास का अर्थ है पति और पत्नी के रूप में एक साथ रहना। केवल कुछ अवसरों पर मंदिरों या दोस्तों के स्थानों पर साथ जाना सहवास नहीं माना जाता। न्यायिक अलगाव का आदेश धारा 13(1A) के तहत न्यायालय की विवेकाधिकार के तहत पारित किया जा सकता है, जो याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए तलाक के आदेश के स्थान पर होता है।

दाम्पत्य (कंजूगल) अधिकारों की पुनर्स्थापना के आदेश का पालन न करना 

1955 के अधिनियम की धारा 13(1A)(ii) के तहत यह प्रावधान है कि यदि संयुगिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के आदेश के पारित होने के बाद, एक वर्ष या उससे अधिक समय तक संयुगिक अधिकारों की पुनर्स्थापना नहीं हुई है, तो कोई भी पक्ष इस आधार पर तलाक की याचिका दायर कर सकता है। संयुगिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का अर्थ है कि पक्षों को सहवास फिर से शुरू करना चाहिए। पति और पत्नी को एक-दूसरे के प्रति पति-पत्नी के रूप में व्यवहार करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य के बहाने बिना वास्तव में संयुगिक संबंध में शामिल हुए केवल यह वादा करता है कि वह जुड़ जाएगा, तो इसे संयुगिक अधिकारों की पुनर्स्थापना नहीं माना जाता। यद्यपि यौन संबंध सहवास का महत्वपूर्ण या बाध्यकारी प्रमाण हो सकते हैं, फिर भी सहवास तब भी हो सकता है जब कोई यौन संबंध न हुआ हो, बशर्ते इसका उचित कारण हो।

“निर्णय का पारित होना” शब्द 1955 के अधिनियम की धारा 13(1A)(i) और (ii) में न्यायालय के निर्णय को जारी करने का संकेत करता है, न कि केवल निर्णय का औपचारिक रूप से मसौदा तैयार करना। स्मिता देवी बनाम सिंह राज (1976) के मामले में माननीय पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि यदि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा धारा 9 के तहत पारित निर्णय के खिलाफ अपील की जाती है और उसकी निष्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है, तो एक वर्ष की अवधि उस दिन से मानी जाएगी जब निर्णय पारित किया गया था। अपील की प्रक्रिया एक वर्ष की समय सीमा को प्रभावित नहीं करती है। धारा 13(1A) कोई निरपेक्ष अधिकार नहीं प्रदान करती है, बल्कि यह अधिनियम की धारा 23(1)(a) की सीमाओं के अधीन है। इसका उद्देश्य तलाक की याचिका दायर करने के अधिकार को विस्तारित करना है, न कि यह गारंटी देना कि केवल सहवास या पुनर्स्थापना की अवधि के अभाव पर तलाक की याचिका को मंजूरी दी जाएगी।

पत्नी के लिए तलाक के विशेष आधार 

1955 के अधिनियम की धारा 13(2) में तलाक के चार अतिरिक्त आधार प्रदान किए गए हैं, जो केवल पत्नी के लिए उपलब्ध हैं, इसके अतिरिक्त अन्य आधारों के अलावा जो धारा 13(1) और (1A) में दिए गए हैं:

पति की द्विपत्नीत्व  

1955 के अधिनियम के लागू होने से पहले, हिंदू कानून में एक समय में किसी व्यक्ति के पास कितनी पत्नियां हो सकती थीं, इसका कोई प्रतिबंध नहीं था। 1955 के अधिनियम ने धारा 5 और 18 के तहत द्विपत्नीत्व को अपराध बना दिया है। अधिनियम की धारा 13(2)(i) में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति की सहपत्नी तलाक की याचिका दायर कर सकती है, बशर्ते कि:

  • दोनों पत्नियाँ उस व्यक्ति से उस अधिनियम के लागू होने से पहले विवाहित थीं;
  • दोनों पत्नियाँ तलाक की याचिका दायर किए जाने पर जीवित हों, और
  • उपर्युक्त दोनों विवाह एक साथ कानूनी रूप से अस्तित्व में हों।

इस धारा के तहत, पिछले विवाह का स्पष्ट प्रमाण प्रदान करना आवश्यक है, क्योंकि केवल पति और पत्नी के रूप में एक साथ रहना अपर्याप्त है। प्रमाण का बोझ पत्नी पर है कि वह पिछले विवाह की वैधता को सिद्ध कर सके।

बलात्कार, मैथुन या पशुविकर्म 

1955 के अधिनियम की धारा 13(2)(ii) में यह प्रावधान है कि पत्नी तलाक की याचिका दायर कर सकती है यदि विवाह के बाद उसके पति ने बलात्कार, मैथुन या पशुविकर्म किया हो। ये अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत भी अपराध माने गए हैं, जो इनके लिए दंड निर्धारित करती है। यह आवश्यक नहीं है कि पति को इन अपराधों के लिए आपराधिक अदालत में दोषी ठहराया गया हो; मुख्य बात यह है कि अपराध याचिकाकर्ता के विवाह के बाद हुआ हो। इन तीनों वैवाहिक अपराधों की परिभाषा इस प्रकार है:

  • बलात्कार: बलात्कार का अर्थ है एक पुरुष द्वारा महिला के साथ सहमति के बिना यौन संबंध बनाना। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 63 के अपवाद 2 के तहत यह प्रावधान है कि यदि महिला की आयु अठारह वर्ष से कम है, तो पुरुष को अपनी पत्नी के बलात्कार के लिए दंडित किया जा सकता है। इस प्रकार के वैवाहिक बलात्कार के मामलों में, पत्नी बलात्कार के आधार पर तलाक की याचिका दायर कर सकती है।
  • मैथुन: मैथुन को परिभाषित किया गया है, एक पुरुष और उसकी पत्नी, किसी अन्य महिला, या किसी अन्य पुरुष के बीच गुदा संबंध के रूप में। इन मामलों में पीड़िता की सहमति या आयु को विचार करने के लिए प्रासंगिक मानदंड नहीं है।
  • पशुविकर्म: पशुविकर्म का अर्थ है एक जानवर के साथ यौन संबंध बनाना, और यह एक असामान्य अपराध के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

भरण-पोषण आदेश के बाद सहवास का न होना 

1955 के अधिनियम की धारा 13(2)(iii) के तहत यह प्रावधान है कि यदि एक आदेश या निर्णय पारित किया गया है, जिसमें पति को पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया है, और  

  1. वह अलग रह रही है; और  
  2. निर्णय या आदेश के बाद सहवास एक वर्ष या उससे अधिक समय तक फिर से शुरू नहीं हुआ है, तो पत्नी इन आधारों पर तलाक की याचिका दायर करने का अधिकार रखती है।  

धारा 18 के तहत हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के तहत अलग रहने और भरण-पोषण का आदेश प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए कानून एक ऐसी पत्नी को, जिसने यह आदेश प्राप्त किया है, तलाक की याचिका दायर करने का अधिकार प्रदान करता है यदि उसका पति निर्णय या आदेश की तिथि से एक वर्ष के भीतर सहवास पुनः शुरू नहीं करता है।  

जहां हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के तहत पत्नी के पक्ष में आदेश पारित किया गया है, वहां पति का कर्तव्य है कि वह उसे भरण-पोषण दे, और उसे एक वर्ष के भीतर सहवास पुनः शुरू करना होगा। यदि पति ऐसा करने में विफल रहता है, तो पत्नी तलाक की याचिका दायर कर सकती है। यदि पति सहवास का प्रस्ताव करता है और पत्नी प्रतिक्रिया नहीं देती है, तो यह उसके अधिकार में है; उसे प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना कानून द्वारा निर्धारित प्रावधानों का उल्लंघन होगा, जो उसे भरण-पोषण के साथ अलग रहने का अधिकार देते हैं।

विवाह का खंडन (यौवन का विकल्प) 

1955 के अधिनियम की धारा 13(2)(iv) के तहत, यह अधिकार उन लड़कियों को प्रदान किया जाता है, जो पंद्रह वर्ष से पहले विवाह करती हैं, उन्हें विवाह के खंडन का अधिकार होता है। विवाह का समापन इस मामले में अप्रासंगिक है। इस धारा के तहत, पत्नी तलाक प्राप्त कर सकती है यदि:  

  • विवाह के समय, वह पंद्रह वर्ष से कम आयु की थी; और 
  • इसके बाद, लेकिन अठारह वर्ष से पहले, उसने विवाह का खंडन किया।  

इस धारा या अधिनियम के तहत विवाह के खंडन के लिए कोई विशेष प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है। खंडन के तथ्य को पत्नी को प्रमाणित करना होगा। यह धारा केवल खंडन का अधिकार देती है, जैसा कि उसमें उल्लेख किया गया है, लेकिन इस आधार पर विवाह की समाप्ति के लिए याचिका उसे अठारह वर्ष की आयु पूर्ण करने के बाद ही दायर की जा सकती है। यह धारा 1976 के विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम द्वारा जोड़ी गई थी। संशोधन से पहले ऐसा कोई अधिकार नहीं था। अतः यदि उसने विवाह का खंडन करने का विकल्प चुना है, तो वह इस आधार पर तलाक की याचिका दायर कर सकती है। 1955 का अधिनियम अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है कि एक नाबालिग का विवाह अमान्य नहीं है (हालाँकि दंडनीय) क्योंकि, यदि यह अमान्य होता, तो तलाक की अनुमति देने का प्रश्न नहीं उठता।  

तलाक की कार्यवाही में वैकल्पिक राहत  

1955 के अधिनियम की धारा 13(1)(ii), (vi), और (vii) के तहत, याचिकाकर्ता के पास न्यायिक पृथक्करण या तलाक में से कोई एक विकल्प चुनने का अधिकार होता है। यदि याचिकाकर्ता इन आधारों पर तलाक दायर करने का निर्णय लेता है, तो अदालत को इसके लिए पर्याप्त और उचित साक्ष्य के साथ दावों की पुष्टि करने के बाद तलाक प्रदान करना होता है। अदालत केवल तब न्यायिक पृथक्करण को वैकल्पिक राहत के रूप में विचार कर सकती है यदि प्रतिवादी ने किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया हो, किसी धार्मिक संप्रदाय से जुड़ा नहीं हो, या सात वर्षों या अधिक समय तक गुमनाम न रहा हो।  

तलाक और आपसी पृथक्करण के आधार लगभग समान होते हैं। इसलिए, अदालत तलाक के लिए आदेश पारित करने से पहले विवेक का प्रयोग कर सकती है, भले ही तलाक की कार्यवाही अधिनियम की धारा 13(A) के तहत शुरू की गई हो। इसके बजाय, अदालत न्यायिक पृथक्करण का आदेश पारित कर सकती है। इसलिए, कानून हमेशा आशा बनाए रखता है और पक्षों के बीच विवादों को हल करके उन्हें एक साथ लाने का अंतिम प्रयास करने की कोशिश करता है। हालांकि, यदि तलाक की कार्यवाही धर्मांतरण, त्याग या सात वर्षों तक किसी पार्टी के न लौटने के कारण मृत मानने के आधार पर की जा रही हो, तो अदालत द्वारा कोई वैकल्पिक राहत या प्रयास नहीं किया जा सकता है।

 

बालवीर सिंह बनाम हरजीत कौर (2017) के मामले में, माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि रेस जूडिकाटा का सिद्धांत 1955 के अधिनियम की धारा 13 के तहत दायर किए गए बाद के मुकदमों पर लागू नहीं होता। मामले का विवरण निम्नलिखित है:  

  • अपीलकर्ता ने विवाह के विघटन के लिए 1955 के अधिनियम की धारा 13A के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय के लिए मुख्य मुद्दा यह था कि क्या इस याचिका को 1908 के सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के तहत प्रतिबंधित किया जाएगा, यह देखते हुए कि 1955 के अधिनियम की धारा 9 (कुटुंब अधिकारों के पुनर्स्थापन के लिए) के तहत पहले ही कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी। 1908 की सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 में यह प्रावधान है कि कोई भी अदालत किसी ऐसे मुकदमे या मुद्दे पर सुनवाई नहीं करती जो पहले किसी अन्य मुकदमे में सीधे और महत्वपूर्ण रूप से निर्णयित हो चुका हो;
  • उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे को संबोधित करते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया:  
  1. धारा 9 का उद्देश्य अलग है। यह उन मामलों को संबोधित करती है जहां विवाहित जोड़ा अपने वैवाहिक कर्तव्यों को पूरा करने से अन्यायपूर्ण तरीके से हट जाता है, और इस प्रकार की राहत का उद्देश्य पुन: मिलन और वैवाहिक कर्तव्यों के पुनरारंभ को प्रोत्साहित करना है;  
  2. धारा 9 और 13-A के उद्देश्य अलग हैं। धारा 9 का उद्देश्य वैवाहिक संबंधों को पुनर्स्थापित करना है, जबकि धारा 13A का उद्देश्य विवाह को कानूनी रूप से समाप्त करना है;  
  3. उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 1955 के अधिनियम की धारा 9 या धारा 13A के तहत बाद में दायर किए गए मुकदमे पर प्रतिबंध नहीं लगाती;  
  4. यदि धारा 9 के तहत कार्यवाही समाप्त या खारिज कर दी जाती है, तो इससे पक्ष को 1955 के अधिनियम की धारा 13-A के तहत विवाह के विघटन के लिए याचिका दायर करने से वंचित नहीं किया जा सकता है।  

आपसी सहमति से तलाक  

1955 के अधिनियम की धारा 13B, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 28 के समान है। यह प्रावधान विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। यह संशोधन ऐतिहासिक और भविष्यात्मक दोनों रूप से लागू होता है। इसलिए, विवाह के पक्षकार, चाहे वह संशोधन अधिनियम से पहले या बाद में संपन्न हुआ हो, इस प्रावधान का लाभ उठा सकते हैं। इस प्रावधान का उद्देश्य जोड़े को अपनी शादी को आपसी सहमति से समाप्त करने की अनुमति देना है, यदि यह अयोग्य हो गया है और पुनः स्थिर नहीं हो सकता, और उन्हें विभिन्न उपलब्ध विकल्पों के माध्यम से पुनर्वास में सहायता करना है। यह संशोधन इस विचार से उत्पन्न हुआ था कि अव्यक्त जोड़ीदारों (पार्टनर्स) को शादी में मजबूर करना कोई रचनात्मक उद्देश्य नहीं पूरा करता। कूलिंग-ऑफ अवधि का उद्देश्य जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचाना था, जब संभवतः सुलह का एक अवसर हो सकता था। इसका उद्देश्य एक निरर्थक शादी को लागू करना या पक्षों के कष्टों को बढ़ाना नहीं था, जब सुलह असंभव हो। हालांकि प्रयास किया जाना चाहिए कि शादी बचाई जाए, यदि सुलह असंभव प्रतीत हो और पुनर्वास के लिए नए अवसर हों, तो अदालत को पक्षों को एक अधिक अनुकूल विकल्प प्रदान करने से अक्षम नहीं होना चाहिए।

1955 के अधिनियम की धारा 13B की आवश्यकताएँ 

धारा 13B(1) के तहत, आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त रूप से दायर की जानी चाहिए। इसी तरह, धारा 13B(2) कहती है कि मुकदमे के दोनों पक्षों को संयुक्त रूप से अदालत से तलाक याचिका की सुनवाई के लिए तारीख निर्धारित करने का अनुरोध करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित आवश्यकताएँ पूरी करनी चाहिए:  

  • पक्षों को कम से कम एक वर्ष तक अलग रहना चाहिए;  
  • वे एक साथ सुलह करने और एक साथ रहने में असमर्थ रहे हैं;  
  • उन्होंने आपसी सहमति से विवाह को समाप्त करने का निर्णय लिया है;  
  • याचिका दायर करने की तारीख से छह महीने का न्यूनतम समय बीत चुका होना चाहिए।  
  • वे संयुक्त रूप से अदालत से यह अनुरोध करेंगे कि याचिका दायर करने की तारीख से अठारह महीने पहले तलाक का आदेश जारी किया जाए।  
  • तलाक दोनों पक्षों की आपसी सहमति से होना चाहिए। यह दबाव, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव से मुक्त होना चाहिए।

यह तर्क तीन तथ्यों पर आधारित है   

1955 के अधिनियम की धारा 13B(1) के तहत, विवाह के विघटन के लिए तलाक के आदेश की याचिका दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त रूप से जिला न्यायालय में निम्नलिखित आधारों पर दायर की जा सकती है:  

  • एक वर्ष तक अलग रहना: पक्षों को “अलग रहना” चाहिए, एक वर्ष की अवधि के लिए या याचिका प्रस्तुत करने से ठीक पहले। यदि वे जीवन के किसी समय एक वर्ष से अधिक समय तक अलग रहे हैं, लेकिन याचिका के ठीक पहले नहीं, तो यह आधार लागू नहीं होता। यह आवश्यक है कि याचिका दायर करने से ठीक पहले, पक्षों को अलग रहना चाहिए। इस संदर्भ में, “अलग रहने” का अर्थ है “पति और पत्नी के रूप में एक साथ नहीं रहना।” मुख्य तत्व यह है कि वैवाहिक कर्तव्यों को पूरा करने की कोई मंशा नहीं है, और उनकी अलगाव इस मानसिक स्थिति को दर्शाता है। अंततः, यह उनकी आपसी मानसिकता है जो यह निर्धारित करती है कि वे जीवनसाथी के रूप में एक साथ रह रहे हैं या अलग हो रहे हैं।  
  • पक्ष एक साथ नहीं रह पाए हैं: एक साथ न रहने की अयोग्यता आंतरिक या व्यक्तिगत कारणों से हो सकती है। हो सकता है कि वे एक-दूसरे को पसंद न करते हों या उनमें से कोई अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को पसंद करता हो। हो सकता है कि उनका जीवन दर्शन, या सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण, या जीवन जीने के तरीके, आदि एक-दूसरे से मेल न खाते हों या शारीरिक रूप से वे अपने वैवाहिक जीवन का आनंद नहीं ले पा रहे हों, या उनकी विभिन्न प्राथमिकताएँ हों, जिससे वे विवाह में बने रहना नहीं चाहते। इस शर्त का सार यह है कि उनका विवाह टूट चुका है और उन्हें खुद को सुलह करना संभव नहीं है।  
  • आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने का निर्णय लिया है: पक्षों ने आपसी सहमति से यह निर्णय लिया है कि उनका विवाह समाप्त हो। 1955 के अधिनियम की धारा 23(1)(bb) में यह प्रावधान है कि इस पर उनकी आपसी सहमति बल, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव से प्राप्त नहीं होनी चाहिए। यह सहमति एक पक्ष से दूसरे पक्ष तक, या तीसरे पक्ष से दोनों पक्षों तक पहुंच सकती है।  

याचिका पर विचार करने के लिए प्रतीक्षा अवधि 

1955 के अधिनियम की धारा 13B(2) प्रदान करती है कि अदालत ऐसी याचिका पर छह महीने तक कोई ध्यान नहीं देगी। यह एक अनिवार्य प्रावधान है। इसका उद्देश्य पक्षों को इस गंभीर कदम पर पुनर्विचार करने के लिए समय देना है। पक्षों को तलाक याचिका दायर किए जाने के बाद छह महीने से पहले और अठारह महीने से अधिक समय के भीतर एक संयुक्त याचिका दायर करनी चाहिए। यह याचिका अदालत को मामले के साथ आगे बढ़ने की अनुमति देती है ताकि याचिकाकर्ता के दावे की वैधता की पुष्टि की जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि सहमति बल, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव से प्राप्त नहीं की गई है। अदालत याचिकाकर्ता के बयानों की सटीकता की पुष्टि करने के लिए सुनवाई और पक्षों की जांच जैसी पूछताछ कर सकती है। यदि अदालत का मानना है कि सहमति स्वतंत्र रूप से दी गई थी और पक्षों ने आपसी सहमति से विवाह को समाप्त करने का निर्णय लिया है, तो उसे तलाक का आदेश देने की जिम्मेदारी होती है।  

छह महीने के बाद, अदालत याचिका पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी, जब तक कि पक्ष अदालत से आगे बढ़ने के लिए सक्रिय रूप से आग्रह न करें। याचिका संयुक्त रूप से दोनों पक्षों द्वारा दायर की जानी चाहिए; यदि केवल एक पक्ष इसे दायर करता है, तो तलाक के लिए सहमति की आपसी प्रकृति संदिग्ध हो सकती है।  

मान्य सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) मामले में यह निर्णय दिया है कि वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी अपवादिक शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, ताकि 1955 के अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए सामान्य छह से अठारह महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ किया जा सके।  

प्रतीक्षा अवधि को माफ करने की विवेकाधिकार न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है, विशेष रूप से जब सुलह असंभव प्रतीत हो, पक्ष काफी समय से अलग रह रहे हों, या मुकदमा धारा 13B(2) में निर्धारित समय से अधिक समय तक चल चुका हो। अदालत को निम्नलिखित कारकों पर विचार करना चाहिए:  

  • विवाह की अवधि;  
  • मुकदमा लंबित होने का समय;  
  • पक्षों के अलग रहने का समय;  
  • क्या पक्षों के बीच कोई अन्य प्रक्रिया चल रही है;  
  • क्या पक्षों ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) या सुलह प्रक्रिया में भाग लिया है;  
  • क्या पक्षों ने भरण-पोषण, बाल संरक्षण, या अन्य लंबित मामलों को सुलझाने के लिए समझौता किया है।  

अदालत ने यह भी कहा कि प्रतीक्षा अवधि को माफ करने के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विवाह के पक्षों ने निर्धारित वैधानिक अवधि से अधिक समय तक अलग रहकर सुलह और मध्यस्थता के सभी प्रयास समाप्त कर दिए हैं, और अब सुलह संभव नहीं है। इसके अलावा, अदालत को यह विश्वास होना चाहिए कि प्रतीक्षा अवधि बढ़ाने से केवल दोनों पक्षों के कष्टों में और वृद्धि होगी।

आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया

चरण आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया
चरण 1 सबसे पहले, तलाक की याचिका दायर करनी होती है।

प्रारंभ में, दोनों पक्षों द्वारा कुटुंब न्यायालय में आपसी तलाक के लिए एक संयुक्त याचिका दायर की जाती है। यह याचिका यह बताती है कि वे या तो एक साथ नहीं रह पाए और विवाह समाप्त करने पर आपसी सहमति बनी है या वे एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हैं। याचिका पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होने चाहिए।

चरण 2 इसके बाद, अदालत में उपस्थिति और दस्तावेजों की जांच होती है।

दोनों पक्षों को याचिका दायर करने के बाद कुटुंब न्यायालय में उपस्थित होना चाहिए।

वे अपने कानूनी सलाहकारों द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाते हैं।

अदालत याचिका की समीक्षा करेगी और दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक जांच करेगी।

यदि पक्ष अपने अंतर को हल नहीं करते हैं, तो अदालत तलाक की कार्यवाही जारी रखेगी और उपयुक्त कदम उठा सकती है।

चरण 3 फिर, शपथ पर बयान दर्ज करने का आदेश दिया जाता है।

अदालत याचिका की समीक्षा करने के बाद, दोनों पक्षों के बयान शपथ के तहत दर्ज किए जाते हैं।

चरण 4 पहले कदम की स्वीकृति के बाद, दूसरे कदम के लिए याचिका दायर करने से पहले छह महीने की प्रतीक्षा अवधि की आवश्यकता होती है।

एक बार दोनों पक्षों के बयान दर्ज हो जाने के बाद, अदालत पहला कदम जारी करती है। इसके बाद, दोनों पक्षों को छह महीने तक अलग रहने का समय दिया जाता है, इससे पहले कि वे दूसरा कदम दायर कर सकें।

अधिकतम समय जो दूसरे कदम को दायर करने के लिए अनुमत है, वह कुटुंब न्यायालय में तलाक याचिका दायर करने की तारीख से अठारह महीने तक बढ़ सकता है।

चरण 5 दूसरा कदम और अंतिम सुनवाई।

एक बार जब पक्ष निर्णय लेते हैं कि वे आगे बढ़ेंगे और दूसरे कदम के लिए उपस्थित होंगे, तो वे अंतिम सुनवाई जारी रख सकते हैं।

इसमें पक्षों का उपस्थित होना और कुटुंब न्यायालय में बयान और शपथ दर्ज करना शामिल है।

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया है कि छह महीने की जो प्रतीक्षा अवधि पक्षों को दी जाती है, उसे अदालत की पसंद पर नकारा जा सकता है।

इस प्रकार, वे पक्ष जिन्होंने वास्तव में अपने अंतर को सुलझा लिया है, जिसमें तलाक समझौता, बाल संरक्षण या अन्य लंबित मुद्दे शामिल हैं, उन्हें इस छह महीने की अवधि को स्थगित करने की संभावना होती है। यदि अदालत को लगता है कि छह महीने की अवधि उनके कष्टों को बढ़ा देगी, तो वह इसे माफ कर सकती है।

चरण 6 तलाक का आदेश।

आपसी तलाक में, दोनों पक्ष अधिकतर सहमति देने की संभावना रखते हैं और तलाक समझौते, बाल संरक्षण, भरण-पोषण, संपत्ति आदि के संबंध में मतभेद नहीं होंगे।

इस प्रकार, विवाह के विघटन पर आधिकारिक निर्णय लेने के लिए पतियों के बीच पूर्ण समझ होनी चाहिए।

धारा 14

इस अधिनियम की धारा 14(1) में यह निर्धारित किया गया है कि विवाह के पहले वर्ष में तलाक की कोई याचिका दायर नहीं की जा सकती। एक वर्ष कि समय अवधि कानून द्वारा दिया गया अंतराल है ताकि पक्ष एक-दूसरे के साथ समस्याओं को हल, समझ और संवाद कर सकें। इस प्रकार, कोई भी अदालत तलाक की याचिका पर विचार करने के लिए सक्षम नहीं होगी जब तक कि एक वर्ष का समय पूरा न हो जाए।  

हालांकि, उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार आवेदन प्राप्त करने पर, अदालत याचिका को एक वर्ष से पहले दायर करने की अनुमति दे सकती है यदि याचिकाकर्ता के लिए असाधारण कठिनाई या प्रतिवादी द्वारा असाधारण दुराचार हो। यदि अदालत सुनवाई के दौरान किसी भी तथ्य की गलत प्रस्तुति या छुपाने का पता लगाती है, तो वह याचिका को बिना पूर्वाग्रह के अस्वीकार कर सकती है, जैसा कि वह उचित समझे।  

“असाधारण कठिनाई” और “असाधारण गंभीरता” जैसे शब्दों को 1955 के अधिनियम में कहीं परिभाषित नहीं किया गया है। ये शब्द असामान्य और असाधारण परिस्थितियों को संबोधित करते हैं। यदि याचिकाकर्ता यह सिद्ध कर सकता है कि कठिनाइयाँ इतनी गंभीर हैं कि उनका जीवन असहनीय हो गया है, या यदि प्रतिवादी ने कोई गंभीर नैतिक अपराध किया है जिसने स्थिति को असहनीय बना दिया है, तो अदालत बिना एक साल की अवधि पूरी होने का इंतजार किए तलाक का आदेश दे सकती है।  

धारा 14(2) में यह निर्धारित किया गया है कि इस धारा के तहत आवेदन का निर्णय करते समय, अदालत को विवाह से जन्मे किसी भी बच्चे के कल्याण और पक्षों के बीच मेल-मिलाप की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। अदालत को यह ध्यान में रखना चाहिए कि पति-पत्नी के बीच सुलह (रिकॉन्सिलिएशन) की क्या वास्तविक संभावना है। ये विचार असाधारण कठिनाई या पतन के विचार से अलग हैं। प्रत्येक मामले में, मेल-मिलाप की संभावना को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि पति-पत्नी का संबंध तनावपूर्ण हो और सुलह का तत्काल कोई अवसर न हो, बच्चे का हित सर्वोत्तम प्राथमिकता पर होना चाहिए।  

धारा 15 

धारा 15 1955 के अधिनियम में यह निर्धारित करती है कि तलाकशुदा व्यक्ति फिर से विवाह कर सकता है। यह निर्धारित करती है कि एक बार तलाक के आदेश से विवाह को समाप्त किया जाता है, और या तो अपील का अधिकार नहीं है या यदि है, तो अपील की अवधि समाप्त हो चुकी है या यदि अपील दायर की गई थी परंतु खारिज कर दी गई, तो दोनों पक्षों को कानूनी रूप से पुनर्विवाह करने की अनुमति है।  

तलाक की प्रक्रियाएं (हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत विस्तृत अध्ययन) 

धारा 19 इस अधिनियम में यह बताती है कि तलाक की याचिका किस अदालत में प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह यह भी स्पष्ट करती है कि इस अधिनियम के तहत दायर की गई प्रत्येक याचिका को सामान्य मौलिक नागरिक क्षेत्राधिकार की सीमाओं के भीतर जिला अदालत में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस प्रकार, याचिका निम्नलिखित स्थानों में से किसी एक में दायर की जा सकती है:  

  • जहाँ विवाह हुआ था;  
  • जहाँ प्रतिवादी याचिका दायर करते समय रहता है;  
  • जहाँ युगल ने एक साथ आखिरी बार निवास किया था;  
  • जहाँ याचिकाकर्ता की पत्नी आखिरी बार निवास करती थी; या  
  • यदि प्रतिवादी उस स्थान पर निवास कर रहा है जो अधिनियम की क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर है या 7 वर्षों से जीवित रहने की कोई सूचना नहीं मिली हो, तो याचिकाकर्ता उस स्थान पर याचिका दायर कर सकता है जहाँ वह वर्तमान में निवास कर रहा हो।  

धारा 20 इस अधिनियम में याचिका के विषय और सत्यापन के बारे में बताती है।  

  • धारा 20(1) में यह कहा गया है कि प्रत्येक तलाक की याचिका जो इस अधिनियम के तहत प्रस्तुत की जाती है, उसे मामले की प्रकृति और तथ्यों के आधार पर विशिष्ट रूप से जांचा जाना चाहिए, जिसके आधार पर राहत के लिए दावा तय किया जाएगा।  
  • धारा 20(2) में यह कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत प्रत्येक याचिका में दिए गए बयान को याचिकाकर्ता या किसी अन्य सक्षम व्यक्ति द्वारा उस प्रकार से सत्यापित किया जाना चाहिए जैसा कि कानून द्वारा याचिकाओं के सत्यापन के लिए प्रस्तुत किया गया है, और सुनवाई के दौरान इसे प्रमाण के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।  

धारा 21A इस अधिनियम में जोड़ी गई है ताकि कई कार्यवाहियों और असुविधाओं से बचा जा सके जो पूरे वैवाहिक जीवन में हो सकता हैं। इस धारा के उप-धारा (1) में दो खंड दिए गए हैं:  

  • खंड (a) में कहा गया है कि यदि एक पक्ष द्वारा जिला अदालत में एक याचिका दायर की जाती है, जिसमें या तो न्यायिक पृथक्करण के लिए धारा 10 के तहत या तलाक के लिए धारा 13 के तहत आदेश की मांग की जाती है;  
  • खंड (b) में कहा गया है कि बाद में दूसरा पक्ष भी इस अधिनियम के तहत याचिका दायर करता है, जिसमें न्यायिक पृथक्करण के लिए धारा 10 के तहत या तलाक के लिए धारा 13 के तहत आदेश की मांग की जाती है, किसी भी कारण से। यह याचिका उसी जिला अदालत में या उसी राज्य में किसी अन्य अदालत में दायर की जा सकती है।  इन याचिकाओं को उपधारा (2) के प्रावधानों के अनुसार निपटाया जाएगा।  

धारा 21A के उपधारा (2) में यह प्रावधान है कि ऐसी स्थिति में जहां उपधारा (1) लागू होती है:  

  1. यदि दोनों याचिकाएं एक ही जिला न्यायालय में दायर की गई हैं, तो उन्हें एकसाथ समेकित (कंसोलिडेट) कर उसी न्यायालय द्वारा निपटाया जाएगा।  
  2. यदि याचिकाएं अलग-अलग जिला न्यायालयों में दायर की गई हैं, तो बाद में दायर की गई याचिका को उस जिला न्यायालय में स्थानांतरित किया जाएगा, जहां पहले याचिका दायर की गई थी। इसके बाद, दोनों याचिकाओं को समेकित कर उस जिला न्यायालय द्वारा निपटाया जाएगा, जहां प्रारंभिक याचिका दायर की गई थी।  

धारा 21A की उपधारा (3) के अनुसार, यदि उपधारा (2) की शर्त (b) लागू होती है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत सामान्य रूप से किसी वाद या कार्यवाही को एक जिला न्यायालय से दूसरे जिला न्यायालय में स्थानांतरित करने का अधिकार रखने वाली अदालत या सरकार अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए बाद की याचिका को स्थानांतरित करेगी, जैसे कि उसे उपरोक्त संहिता के तहत ऐसा करने का अधिकार प्राप्त हो।

धारा 21B इस अधिनियम के तहत दायर याचिकाओं के परीक्षण को शीघ्रता से पूरा करने का प्रयास करती है। इसमें निम्नलिखित दिया गया है:  

  • सब-धारा (1) में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत याचिका का परीक्षण न्याय सुनिश्चित करते हुए, निरंतर दिन-प्रतिदिन किया जाना चाहिए, जब तक कि यह समाप्त न हो जाए। हालांकि, यदि अदालत को आवश्यक समझे तो परीक्षण को अगले दिन तक स्थगित किया जा सकता है, इसके लिए कारण दर्ज किए जाएंगे;  
  • सब-धारा (2) में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत प्रत्येक याचिका को अत्यधिक गति से निपटाना चाहिए, ताकि याचिका की सूचनापत्र प्राप्ति के 6 महीने के भीतर परीक्षण समाप्त हो सके;  
  • सब-धारा (3) में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत प्रत्येक अपील को अत्यधिक गति से निपटाना चाहिए, ताकि अपील की नोटिस प्राप्ति के 3 महीने के भीतर सुनवाई समाप्त हो सके।  

धारा 21C इस अधिनियम में दस्तावेजी प्रमाणों के बारे में कहती है। इसमें यह कहा गया है कि किसी अन्य कानून के किसी प्रावधान के विपरीत, यदि कोई दस्तावेज उचित स्टाम्प या पंजीकरण के बिना है, तो उसे इस अधिनियम के तहत याचिका की सुनवाई के दौरान प्रमाण के रूप में अस्वीकार नहीं किया जाएगा।

इस अधिनियम की धारा 22 में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत सभी कार्यवाही गोपनीय रूप से की जानी चाहिए, और इसे प्रकाशित या छापना गैरकानूनी है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति इस प्रावधान के विपरीत कार्य करता है तो उसे एक हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इस धारा में ‘कैमरा प्रक्रिया’ का अर्थ है कि सभी कार्यवाही केवल न्यायाधीश की उपस्थिति, दोनों पक्षों के संबंधित वकीलों और दोनों पक्षों, अर्थात् याचिकाकर्ता और प्रतिवादी की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए। इस प्रकार, यह एक खुले न्यायालय में नहीं होती है जहां किसी को प्रवेश की अनुमति हो।  

धारा 23 इस अधिनियम में वैवाहिक राहत पर रोक लगाने का प्रावधान करती है। यह उन शर्तों को स्पष्ट करती है जिनके तहत अदालत वैवाहिक राहत प्रदान नहीं करेगी। शर्तें इस प्रकार हैं:

  • खंड (a) उपधारा (1) की धारा 23 में कहा गया है कि याचिकाकर्ता को यह दिखाना होगा कि वह अपनी गलतियों का लाभ नहीं उठा रहा है। अदालत को यह यकीन होना चाहिए कि राहत देने के लिए वैध आधार मौजूद हैं, और, उन मामलों को छोड़कर जहां राहत उपखंड (ii) के खंड (a), (b) या (c) के आधार पर मांगी जाती है, याचिकाकर्ता अपनी गलतियों या अक्षमता का लाभ उठाकर राहत प्राप्त नहीं कर रहा है। उदाहरण के लिए, यदि याचिकाकर्ता लगातार प्रतिवादी को पीड़ा दे रहा था, और प्रतिवादी ने भी याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ अत्याचार किया था, तो याचिका अत्याचार के आधार पर राहत नहीं मांग सकती, क्योंकि याचिकाकर्ता ही वह व्यक्ति था जिसने प्रतिवादी को परेशान करना और प्रताड़ित करना शुरू किया था। इसलिए, इस संदर्भ में, अदालत यह सिद्धांत लागू करती है कि जो व्यक्ति न्याय के लिए आता है, उसे स्वच्छ हाथों के साथ आना चाहिए।
  • खंड (b) उपधारा (1) की धारा 23 में कहा गया है कि यदि याचिका विवाहेतर संबंध के आधार पर दायर की गई है, तो याचिकाकर्ता ने इस प्रकार के अपराध में किसी भी प्रकार से सहायक नहीं किया है। ‘सहायक (एक्सेसरी)’ का अर्थ है अपराध में मदद करना, सहायता करना या सक्रिय रूप से भाग लेना। यदि याचिकाकर्ता ने अपराध में भाग लिया है, तो अदालत कोई राहत नहीं देगी। इसी प्रकार, ‘सहिष्णुता (कन्निवेंस)’ का मतलब है विवाहेतर अपराध को सहन करना। इसलिए, यदि एक पति या पत्नी जानबूझकर, जानबूझकर या लापरवाही से विवाहेतर अपराध को होने दे रहे हैं, तो अदालत कोई राहत नहीं देगी। अंततः, ‘क्षमादान’ का अर्थ है माफ करना। यदि उस पति या पत्नी का पुनर्वास किया गया है जिसने वैवाहिक अपराध का सामना किया है, तो अदालत यह देखेगी कि क्या क्षमादान की संभावना है और संबंध का सुचारू रूप से कार्य करना संभव है, इसलिए राहत नहीं दी जाएगी।
  • खंड (bb) उपधारा (1) की धारा 23 में कहा गया है कि यदि तलाक आपसी सहमति से दिया गया हो और वह सहमति किसी धोखे, बल या अनुचित प्रभाव से प्राप्त नहीं की गई हो, तो ऐसे रिश्ते को किसी भी प्रकार की राहत से वंचित कर दिया जाएगा।
  • खंड (c) उपधारा (1) की धारा 23 में कहा गया है कि यदि दो पक्ष विवाह के संबंध में तलाक पर सहमत हुए हैं, लेकिन राहत प्राप्त करने के लिए उन्होंने अदालत को धोखा दिया है, तो ऐसे मामलों में राहत नहीं दी जाएगी।
  • खंड (d) उपधारा (1) की धारा 23 में कहा गया है कि यदि तलाक या न्यायिक पृथक्करण के लिए याचिका दायर करने में अकारण या अनुचित देरी हो, तो राहत नहीं दी जाएगी।
  • धारा 23(2) कहती है कि अदालत का यह कर्तव्य है कि वह मामले की प्रकृति और परिस्थितियों को देखे और पक्षों के बीच मेल-मिलाप कराने के लिए हर संभव प्रयास करे। हालांकि, यह उपधारा उन कार्यवाहियों पर लागू नहीं होती है जहां राहत धारा 13 के उपखंड (1) के खंड (ii), (iii), (iv), (v), (vi) या (vii) में निर्दिष्ट कारणों पर आधारित है।  
  • धारा 23(3) कहती है कि मेल-मिलाप को बढ़ावा देने के लिए, अदालत कार्यवाही को पंद्रह दिनों तक स्थगित कर सकती है और मामले को किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेज सकती है जिसे पक्षों ने चुना हो या जिसे अदालत ने नियुक्त किया हो यदि पक्षों ने खुद किसी को नहीं चुना हो। यह व्यक्ति यह मूल्यांकन करेगा कि क्या मेल-मिलाप संभव है और क्या वह हासिल किया गया है, और अदालत इस मूल्यांकन को कार्यवाही निपटाने में ध्यान में रखेगी।
  • धारा 23(4) कहती है कि यदि विवाह को तलाक के आदेश द्वारा समाप्त कर दिया जाता है, तो अदालत द्वारा पारित तलाक के आदेश की प्रति दोनों पक्षों को मुफ्त में दी जाएगी।

अधिनियम के तहत तलाक से संबंधित निर्णय

श्रीमती सुरेश्ता देवी बनाम ओम प्रकाश (1991) 

इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह प्रश्न था कि क्या दोनों पक्षों में से कोई भी तलाक की याचिका से अपनी सहमति को किसी भी समय आदेश जारी होने से पहले वापस ले सकता है। इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों में भिन्न मत थे, जिसके चलते सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 13B(2) अदालत पर यह अनिवार्यता डालती है कि वह दोनों पक्षों की सुनवाई करें। यदि बाद में कोई पक्ष अपनी सहमति वापस लेता है या तलाक के साथ आगे न बढ़ने की इच्छा व्यक्त करता है, तो अदालत आपसी सहमति से तलाक का आदेश नहीं दे सकती। केवल प्रारंभिक याचिका के आधार पर आदेश जारी करना आपसी सहमति के सिद्धांत से समझौता करेगा। आपसी सहमति अधिनियम की धारा 13B के तहत आदेश जारी करने के लिए महत्वपूर्ण है, और इसे पूरी प्रक्रिया के दौरान बनाए रखा जाना चाहिए। अदालत के लिए तलाक के आदेश को अंतिम रूप देने के लिए आपसी सहमति बनाए रखना आवश्यक है।

  

निरजानी रोशन राव बनाम रोशन मार्क पिंटो (2013)  

इस मामले में याचिकाकर्ता, मूल याचिकाकर्ता और पत्नी ने अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह की शून्यता का आदेश प्राप्त करने के लिए याचिका दायर की, और वैकल्पिक रूप से अपने पति के खिलाफ धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दी। दोनों का विवाह 13 जनवरी 1999 को हिंदू विवाह परंपराओं के अनुसार हुआ था। विवाह के तुरंत बाद, दोनों ने अपनी-अपनी धर्मों का पालन करना जारी रखा। पत्नी ने तर्क दिया कि विवाह अवैध था क्योंकि यह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 की एक महत्वपूर्ण शर्त का उल्लंघन करता था, जिसमें यह कहा गया है कि दोनों जोड़ीदार विवाह के समय हिंदू होने चाहिए। माननीय परिवार न्यायालय ने सीपीसी की आदेश 7, नियम 11 के तहत याचिका खारिज कर दी, क्योंकि इसमें वैध कारण नहीं था, और इसके परिणामस्वरूप याचिका को अस्वीकार कर दिया।  

इस मामले में यह सवाल था कि शून्यता का आदेश या वैकल्पिक रूप से तलाक का आदेश दायर किया जा सकता था या नहीं। माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय लिया कि याचिका में वैध कारण नहीं था और अधिनियम के तहत अदालत की अधिकारिता सीमित थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसकी शादी की सहमति धोखे से प्राप्त की गई थी, क्योंकि प्रतिवादी ने अपनी ईसाई पहचान छिपाई थी। इसलिए, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसे धोखे के आधार पर शून्यता का आदेश मिलना चाहिए। माननीय अपीलीय न्यायालय ने याचिकाकर्ता की अपील को बिना किसी आदेश के खारिज कर दिया और परिवार न्यायालय के निर्णय को वैध माना।  

X बनाम Y (2024) 

इस मामले में, पक्षों के बीच विवाह 25 मार्च 1999 को हुआ था। पति ने 17 दिसंबर 2008 को वैवाहिक मतभेद के बाद पुनः मिलन की याचिका दायर की। 15 मई 2013 को, अदालत ने पुनः मिलन के लिए आदेश जारी किया, जिसमें पत्नी को तीन महीने के भीतर पति के साथ सहवास फिर से शुरू करने का निर्देश दिया। चूंकि पत्नी ने आदेश का पालन नहीं किया, पति ने 23 अगस्त 2013 को परिवार न्यायालय में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। 2015 में, उच्च न्यायालय ने पत्नी की अपील को खारिज कर पुनः मिलन के आदेश को बरकरार रखा। परिवार न्यायालय ने 2016 में पति की तलाक याचिका को मंजूरी दी, लेकिन इस निर्णय को 2019 में उच्च न्यायालय ने पलट दिया, क्योंकि परित्याग के आधार को प्रमाणित नहीं किया गया था।  

फिर याचिकाकर्ता ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी अपील को मंजूरी दी गई। दो न्यायधीशों की पीठ ने देखा कि प्रतिवादी ने 15 मई 2013 के बाद से, तलाक याचिका दायर होने तक, सहवास फिर से शुरू नहीं किया। उसने यह नहीं कहा कि पुनः मिलन के आदेश जारी होने के बाद कोई ऐसा घटना घटी थी जिससे वह याचिकाकर्ता के साथ फिर से जुड़ने में असमर्थ थी। इसलिए, याचिकाकर्ता का परित्याग, कम से कम 2008 से लेकर तलाक याचिका दायर होने तक, बिना उचित कारण के जारी रहा। इसलिए, धारा 13(1)(ib) के तहत परित्याग के आधार पर तलाक का आदेश दिया जाना चाहिए था। न्यायधीशों का मानना था कि उच्च न्यायालय को विवाह के पूरी तरह टूटने के कारण तलाक का आदेश बरकरार रखना चाहिए था, जो पिछले 16 वर्षों से अधिक समय से था।

डॉ. निर्मल सिंह पनेसर बनाम श्रीमती परमजीत कौर पनेसर @ अजिंदर कौर पनेसर (2023)  

इस मामले में, परमजीत कौर पनेसर, एक 82 वर्षीय पत्नी, 1984 में भारतीय वायु सेना द्वारा अपने पति के चेन्नई स्थानांतरण के बाद उनके साथ चेन्नई जाने से इंकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, 1996 में उनके पति निर्मल ने अधिनियम की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। हालांकि, जिला न्यायालय ने 2000 में तलाक दिया, परमजीत ने अपील की, जिससे निर्णय पलट गया। श्रीमती परमजीत कौर पनेसर, प्रतिवादी, ने अपने 89 वर्षीय पति डॉ. पनेसर की देखभाल करने की इच्छा व्यक्त की और “तलाकशुदा” के रूप में संदर्भित किए जाने का विरोध किया। इस दंपति के तीन बच्चे हैं। प्रतिवादी की मानसिक स्थिति को देखते हुए, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने जिला न्यायालय का आदेश पलटते हुए यह निर्णय दिया कि अपूरणीय टूटने के आधार पर तलाक एक उचित समाधान नहीं होगा। केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या यह आवश्यक है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का उपयोग किया जाए ताकि एक विवाह को विघटित किया जा सके जो अपूरणीय रूप से टूट चुका है, भले ही यह टूटना अधिनियम 1955 के तहत तलाक के आधार के रूप में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।  

याचिकाकर्ता ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील की। अपीलीय न्यायालय ने शिल्पा सैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासा (2023) मामले का हवाला देते हुए यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत विवाहित जीवन के अपूरणीय टूटने के आधार पर विवाह को विघटित करने के लिए विवेकाधीन शक्ति का उपयोग किया जा सकता है, ताकि “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित किया जा सके, भले ही एक पक्ष विवाह को विघटित करने के खिलाफ हो। न्यायालय ने यह भी माना कि न्यायालय के पास प्रक्रियात्मक और मूल (सब्सटेंटिव) कानूनों से अलग हटने की और विवेकाधिकार का प्रयोग कर विवाह को हल करने की क्षमता है, जिससे विवादों के बीच समानता बनी रहे। हालांकि, इस विवेकाधिकार का उपयोग बहुत सावधानी और ध्यान से किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि विवाह अभी भी पति और पत्नी के बीच एक पवित्र, आध्यात्मिक और गहरे भावनात्मक बंधन के रूप में माना जाता है। यह केवल कानूनी विधान से ही नहीं, बल्कि सामाजिक मानदंडों द्वारा भी मार्गदर्शित होता है। समाज में कई अन्य रिश्ते वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न होते हैं और उन पर निर्भर करते हैं। इसलिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत “विवाह का अपूरणीय टूटने” को तलाक देने के लिए एक कठोर मानक के रूप में लागू करना उचित नहीं हो सकता। इसलिए, अपील खारिज कर दी गई।

श्री र. नलियप्पन बनाम श्री. काल्विन जोन्स, मेसर्स अजमल एसोसिएट्स (2023)  

इस मामले में याचिकाकर्ता पत्नी है और प्रतिवादी पति है। शुरुआत में, प्रतिवादी ने क्रूरता के आधार पर याचिकाकर्ता से तलाक की मांग की। इसके साथ ही, याचिकाकर्ता ने विवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की। कुटुंब न्यायालय ने इस याचिका को मंजूरी दी और तलाक की याचिका खारिज कर दी। अपीलीय न्यायालय ने इस निर्णय को पलटते हुए तलाक की याचिका मंजूर की और विवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने बाद में दूसरी अपील दायर की, जिसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय ने अपीलीय न्यायालय का निर्णय पलटते हुए तलाक की याचिका को खारिज कर दिया और विवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका को फिर से मंजूरी दी।  

इसके बाद, नए कारण और विभिन्न आधारों पर—विशेष रूप से परित्याग और बाद के घटनाओं से जुड़ी हुई क्रूरता—प्रतिवादी ने 2018 में तलाक की नई याचिका दायर की। जबकि यह याचिका लंबित थी, याचिकाकर्ता ने इसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 11 के तहत पुनर्विचार के आधार पर खारिज करने की मांग की। निचली अदालत ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने वर्तमान सिविल संशोधन याचिका दायर की। प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि पिछले तलाक की याचिका खारिज होने के बाद, याचिकाकर्ता ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत कई याचिकाएं दायर की थीं और प्रतिवादी और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ शिकायतें की थीं। इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता द्वारा निरंतर उत्पीड़न किया गया, जिसके कारण प्रतिवादी ने निरंतर क्रूरता और लंबे समय तक परित्याग के आधार पर तलाक की नई याचिका दायर की। इसलिए, विचारण न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका को सही तरीके से खारिज किया और वकील ने इस याचिका को भी खारिज करने की मांग की।  

याचिकाकर्ता का एकमात्र तर्क यह था कि दूसरी तलाक याचिका पुनर्विचार के आधार पर प्रतिबंधित है, क्योंकि प्रतिवादी ने पहले तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। 

हालांकि, माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने तलाक की याचिका की जांच करते हुए यह पाया कि कारण पिछली याचिका से भिन्न था। इसलिए, वर्तमान तलाक याचिका वैध है और पुनर्विचार का सिद्धांत लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि विवाहिक मामलों को समाप्त करने के आधार अक्सर निरंतर या पुनरावृत्त स्वभाव के होते हैं। क्रूरता, परित्याग या व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका को फिर से दायर करने से रोकने का कोई प्रतिबंध नहीं होता, जब तक याचिका नए तथ्यों पर आधारित हो। एक कारण कार्रवाई वह तथ्यों का सेट होता है जिसे एक पक्ष अदालत से राहत प्राप्त करने के लिए प्रमाणित करना चाहिए। क्रूरता, परित्याग, या व्यभिचार के आरोपों के पीछे तथ्य बदल सकते हैं, जिससे प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर विभिन्न कारण कार्यवाही उत्पन्न हो सकते हैं। जब एक कारण कार्यवाही निरंतर और पुनरावृत्त होती है, तो एक ही आधार पर तलाक की नई याचिका को पुनर्विचार द्वारा निषेधित नहीं किया जा सकता, भले ही पिछली याचिका खारिज हो चुकी हो।

निष्कर्ष  

“अविश्वसनीय भारत” वाक्य वास्तव में अपने आप में सटीक है। हर एक संस्कृति, धर्म, व्यक्तिगत कानून, और संहिताबद्ध कानून समाज और इसके पालन-पोषण को आकर्षित करते हैं। हिंदू समाज में बदलाव और गतिशील समाज में बदलाव को स्वीकार करना भारतीय होने के नाते गर्व और खुशी की बात है। पहले तलाक का विचार स्वीकार्य नहीं था और यह माना जाता था कि एक लड़की को समायोजित और समझौता करना होगा। लेकिन अधिनियम के जन्म के साथ, धीरे-धीरे तलाक का विचार और समाज की बदलती जरूरतों के अनुसार संबंधित प्रावधान भी स्थापित किए गए। इस प्रकार, एक अपमानजनक विवाह में रहना बुनियादी मौलिक अधिकारों जैसे शांति से जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि का उल्लंघन है। अंत में, यह केवल लोगों से अपेक्षित है कि वे कानून द्वारा दिए गए इन अधिकारों का दुरुपयोग न करें, बल्कि वे कानूनों और मानवीय भावनाओं जैसे प्रेम, विश्वास, वफादारी और दया का सम्मान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ ए क्यूस)

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 क्या है? 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक भारतीय कानून है जो हिंदुओं के बीच विवाह और तलाक को नियंत्रित करता है। यह हिंदू समुदाय के भीतर विवाह के आयोजन, वैधता और विघटन के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत किसे शामिल किया जाता है?

यह अधिनियम हिंदुओं पर लागू होता है, जिसमें बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। यह उन व्यक्तियों पर भी लागू होता है जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी तलाक में क्या अंतर है?  

प्रतिस्पर्धी तलाक तब होता है जब पक्ष तलाक के आधार या शर्तों पर सहमत नहीं होते, जिसके लिए अदालत की मध्यस्थता की आवश्यकता होती है। गैर-प्रतिस्पर्धी तलाक तब होता है जब दोनों पक्ष तलाक की शर्तों पर आपसी सहमति से सहमत होते हैं।

तलाक की प्रक्रिया में कुटुंब न्यायालय की भूमिका क्या है? 

कुटुंब न्यायालय तलाक के मामलों को संभालने, पक्षों के बीच मध्यस्थता की सुविधा देने और यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होता है कि सभी कानूनी आवश्यकताएँ पूरी हों। अदालत निर्वाह निधि (अलीमनी), बच्चों की अभिरक्षा और संपत्ति के विभाजन जैसे मुद्दों पर भी निर्णय लेती है।

संदर्भ

 

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का अवलोकन

यह लेख Oishika Banerji द्वारा लिखा गया है और Shubham Choube द्वारा संशोधित किया गया है। इस लेख में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 पर विस्तार से चर्चा की गई है तथा इसके प्रत्येक प्रावधान का अन्वेषण किया गया है, साथ ही प्रासंगिक संबंधी कानूनी कानूनों पर भी चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक ऐतिहासिक कानून है जो भारत में हिंदुओं के बीच विवाह के लिए कानूनी प्रावधान निर्धारित करता है। यह अधिनियम भारतीय संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था और यह विवाह के पारंपरिक और प्रथागत दृष्टिकोण से अलग था जो कई पीढ़ियों से हिंदू संस्कृति पर हावी था। यह भारत में स्वतंत्रता के बाद कानूनी सुधारों की प्रक्रिया के दौरान शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य न्याय, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के आधुनिक मानदंडों का पालन करते हुए व्यक्तिगत कानूनों को संहिताबद्ध करना था। 

हिंदू विवाह अधिनियम के लागू होने से पहले, हिंदू विवाह संस्था और पति-पत्नी के संबंधित अधिकारों और कर्तव्यों को नियंत्रित करने के लिए लगभग कोई संहिताबद्ध प्रावधान नहीं थे। इससे समाज में विवाह संबंधी कानून, दम्पतियों के अधिकार और बच्चों के संबंध में भ्रम और अस्पष्टता पैदा हो गई। इन समस्याओं का समाधान हिंदू विवाह अधिनियम बनाकर किया जाना था, जिसका उद्देश्य वैध हिंदू विवाह के लिए शर्तों और औपचारिकताओं, तलाक और न्यायिक पृथक्करण के आधारों तथा विवाहित जोड़े के अधिकारों और दायित्वों का विवरण देने वाले कानूनी प्रावधान निर्धारित करना था। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 भारत में एक ऐतिहासिक कानून है, जिसका उद्देश्य विवाह से संबंधित हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में सुधार करना और उन्हें व्यवस्थित रूप से संहिताबद्ध करना था। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (जिसे आगे ‘एचएमए’ कहा जाएगा) का उद्देश्य न केवल विवाह को एक पवित्र संस्था के रूप में संरक्षित करना है, बल्कि यह एक ऐसा कानून भी है जो विवाह में महिलाओं और व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह भारतीय समाज की बदलती गतिशीलता को भी दर्शाता है, जिससे कानूनों में न्याय की बेहतर समझ सुनिश्चित होती है तथा यह सुनिश्चित होता है कि कानूनी प्रणाली में पारंपरिक कानून और रीति-रिवाज शामिल हों। प्रस्तुत लेख एचएमए, 1955 का अवलोकन प्रस्तुत करता है, साथ ही इसमें वर्तमान घटनाक्रम की व्याख्या भी करता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की संरचना

एचएमए भारतीय संसद का एक अधिनियम है जिसे 18 मई, 1955 को अनुमोदित किया गया था। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 को कानूनी रूप से विवाहित हिंदू महिला और पुरुष की कानूनी स्थिति की रक्षा के लिए अधिनियमित किया गया था। कानून द्वारा यह निर्धारित नहीं किया गया है कि किस प्रकार का समारोह आयोजित किया जाना चाहिए, क्योंकि हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार एक पुरुष और एक महिला कई तरीकों से विवाह कर सकते हैं। 

एचएमए, 1955 को छह अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिसमें कुल 29 धाराएँ हैं। इसका अभिन्यास (लेआउट) नीचे दिया गया है: 

  1. अध्याय I: प्रारंभिक
  2. अध्याय II: हिंदू विवाह
  3. अध्याय III: वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना और न्यायिक पृथक्करण
  4. अध्याय IV: विवाह की अमान्यता और तलाक
  5. अध्याय V: अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया
  6. अध्याय VI: व्यावृत्तियाँ और निरसन

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 से पहले हिंदू विवाहों का शासन

यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के लागू होने तक हिंदू कानून के तहत विवाह न केवल रीति-रिवाजों, संस्कारों और अनुष्ठानों द्वारा नियंत्रित और विनियमित होते थे, बल्कि विभिन्न प्रांतों और विभिन्न जातियों और समुदायों में प्रचलित विभिन्न प्रथाओं द्वारा भी नियंत्रित और विनियमित होते थे। हिंदू परंपरा में विवाह की संस्था को सदैव अत्यंत पवित्र माना गया है तथा इसे सदैव एक संस्कारात्मक बंधन के रूप में देखा गया है। विवाह के दौरान किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण संस्कार और अनुष्ठान थे ‘सप्तपदी’ (एक साथ सात कदम चलना) और ‘कन्यादान’ (दुल्हन को विदा करना) है। 

वर्ष 1955 से पहले कानूनी ढांचा कठोर था और इसमें मनुस्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रों का प्रभुत्व था, जो पतियों और पत्नियों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को निर्दिष्ट करते थे। इन ग्रंथों में महिलाओं को निम्नतर प्राणी के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्हें अपने अस्तित्व के सभी पहलुओं में सदैव पुरुष समर्थन की आवश्यकता होती है। तलाक एक बहुत ही दुर्लभ और असामान्य घटना थी; अलगाव तो और भी अधिक असामान्य था और इसे पाप माना जाता था। 

हालाँकि, समाज में विवाह की पवित्रता के बावजूद, कई कुरीतियाँ आम थीं, जैसे बाल विवाह, बहुविवाह और दहेज प्रथा। विवाहित महिलाओं के पास बहुत कम अधिकार थे और वैवाहिक विवादों के मामले में कानून और रीति-रिवाजों द्वारा उन पर बहुत अधिक प्रतिबंध लगाए गए थे। यह वह समय था जब कोई सार्वभौमिक संहिता नहीं थी, जिसका अर्थ था कि वैवाहिक कानूनों और संबंधों में अन्याय और असमानताएं थीं। 

1955 से पूर्व की इस स्थिति ने ऐसे भेदभावों को समाप्त करने तथा सदियों पुरानी परंपराओं को न्याय और समानता के आधुनिक कानूनी मानदंडों के समतुल्य लाने के लिए कानूनों के संहिताकरण की आवश्यकता पर बल दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1955 में एचएमए का संहिताकरण हुआ है। 

भारत में हिंदू विवाहों को नियंत्रित करने के लिए एक समान कानून की आवश्यकता

1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के अधिनियमित होने से पहले भारत में हिंदू विवाह के विषय पर एक समान कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इससे पहले, हिंदू विवाह अनेक क्षेत्रीय प्रथाओं, समारोहों और पवित्र ग्रंथों के आदेशों द्वारा विनियमित होते थे, जिसके परिणामस्वरूप कानूनी असमानताएं और भ्रम की स्थिति पैदा होती थी। इससे मानकीकरण में कमी आई, जिसका अर्थ था कि पुरुष द्वारा महिला के विरुद्ध अनुचित व्यवहार किया जा सकता था, तथा अक्सर कानूनी समाधान बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता था। 

समान नागरिक कानून की आवश्यकता के सभी प्रस्तावित कारणों में से एक सबसे अधिक प्रेरक कारण लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की आवश्यकता थी। पिछली प्रथाओं में महिलाओं पर विवाह, तलाक और यहां तक कि संपत्ति के अधिकार के मामले में भी प्रतिबंध थे। इन अन्यायों को दूर करने के लिए, महिलाओं को बहुविवाह, बाल विवाह और दहेज जैसी प्रथाओं से बचाने के लिए एक समान कानून बनाया गया था। इस प्रकार, एचएमए ने विवाह कानूनों को औपचारिक बनाने का प्रयास किया तथा महिलाओं को उचित आधार पर तलाक के साथ-साथ भरण-पोषण का अधिकार देने का प्रयास किया था। 

एक अन्य महत्वपूर्ण कारक सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण परिवर्तन करने की आवश्यकता थी, विशेष रूप से कानूनी ढांचे में सुधार करना। रीति-रिवाजों और प्रथाओं में अंतर के कारण भ्रम और विरोधाभासी कानून पैदा हुए और इसलिए विवाह से संबंधित मामलों को निष्पक्ष रूप से सुलझाने में समस्याएं उत्पन्न हुईं। एक समान कानून ने विवाह, तलाक और अन्य संबंधित मुद्दों को कानूनी अर्थ देने के उद्देश्य की पूर्ति की, जिससे पिछले समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय की संभावनाओं के बिना कानूनी रूप से उनका प्रशासन किया जा सके। 

फिर भी, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कानून के एकीकरण की ओर संक्रमण सामाजिक परिवर्तन के निर्धारित उद्देश्य से प्रेरित था। स्वतंत्र भारत को समानता, न्याय और मानवाधिकार जैसे मूल्यों के नए युग को अपनाने के लिए एक प्रगतिशील कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी, जो ब्रिटिश शासन के दौरान अस्तित्व में नहीं थे। एचएमए, 1955 इस परिवर्तन की दिशा में एक प्रगतिशील कदम था, जिसने प्रगतिशील-उन्मुख कानून के साथ प्रथागत मानदंडों को संश्लेषित करके समाज में न्याय स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की थीं। 

इस प्रकार, हिंदू विवाह के लिए समान कानून स्थापित करने की आवश्यकता को व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और नव-उभरते स्वतंत्र भारत की सामाजिक संरचनाओं की परिवर्तनशील प्रकृति को प्रतिबिम्बित करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करने के हितों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का उद्देश्य

इस अधिनियम का मुख्य लक्ष्य हिंदुओं के बीच विवाह को नियंत्रित करने वाले कानून को अद्यतन और संहिताबद्ध करना था। एचएमए, 1955 के उद्देश्य निम्नलिखित हैं: 

  1. हिंदू विवाह से संबंधित कानूनों में एकता और मानकीकरण लाना, जिससे सरकार अधिक कुशल तरीके से कानून बना सके। इससे अस्पष्टता और असंगति के मुद्दे समाप्त हो गए जो भिन्न-भिन्न रीति-रिवाजों और प्रथाओं के कारण उत्पन्न होते थे।
  2. उस कानूनी ढांचे का पता लगाना जिसके माध्यम से हिंदू विवाहों को स्वीकार और वैध बनाया जा सके। अधिनियम में विभिन्न प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं और शिष्टाचारिता निर्धारित की गई थीं, जिन्हें विवाह को वैध बनाने के लिए पूरा किया जाना आवश्यक था। 
  3. विवाह संस्था के भीतर लैंगिक असमानता की चुनौतियों का समाधान करना था। इस अधिनियम का उद्देश्य विवाह, तलाक और भरण-पोषण सहित विभिन्न पहलुओं में महिलाओं की सुरक्षा करना था ताकि उन्हें पुरुषों के समान कानूनी दर्जा दिया जा सके।
  4. बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज आदि जैसी सामाजिक रूप से अवांछनीय और अमानवीय पारंपरिक प्रथाओं में सुधार करना और उन पर अंकुश लगाना था। इस अधिनियम में विवाह की स्वीकार्य आयु को भी परिभाषित किया गया तथा हिंदुओं में द्विविवाह को प्रतिबंधित किया गया था। 
  5. वैवाहिक विवादों और मुद्दों को कानूनी समाधान प्रदान करना था। इस अधिनियम में वैवाहिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को कानूनी उपचार देने के लिए न्यायिक पृथक्करण, तलाक और वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के प्रावधान शामिल किए गए थे। 
  6. पारंपरिक हिंदू विवाह प्रथाओं को सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप लाना था। इस अधिनियम का उद्देश्य विवाह की प्रकृति को उदार बनाना था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विवाह भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वर्तमान गतिशीलता के अनुकूल हो।
  7. विवाह के अंतर्गत दोनों पति-पत्नी की व्यक्तिगत स्वायत्तता को स्वीकार करके उनकी सुरक्षा करना था। इसमें बताया गया कि पति और पत्नी को क्या करना चाहिए और इसका उद्देश्य दोनों पक्षों के अधिकारों की रक्षा करना था।
  8. विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाना तथा विवाह की कानूनी कार्यवाही को अधिक कुशल बनाना था। इस अधिनियम ने कानूनी प्रक्रिया में स्पष्ट दिशा-निर्देशों और प्रक्रियाओं को परिभाषित करने में मदद की तथा उन्हें अधिक समझने योग्य और व्यापक बनाया था। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की आवश्यक विशेषताएं

एचएमए,1955 की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. द्विविवाह का निषेध: कानून किसी व्यक्ति को एक समय में कई पत्नियां रखने से रोकता है। अधिनियम की धारा 5 में द्विविवाह का उल्लेख है, जिसका तात्पर्य एक ही समय में दो जीवित पत्नियाँ रखना है। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति पहले अपना विवाह विच्छेद (तलाक) किए बिना किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकता है। यदि वह ऐसा करता है, तो यह गैरकानूनी है और उसे भारतीय दंड संहिता, 1860 (जिसे आगे ‘आईपीसी’ कहा जाएगा) की धारा 494 और 495 के तहत दंडित किया जाएगा।
  2. विवाह योग्य आयु निर्धारित: विवाह की आयु संविधि में परिभाषित की गई है। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(iii) के अनुसार विवाह के समय दूल्हे की आयु कम से कम 21 वर्ष तथा दुल्हन की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए। जो विवाह सम्पन्न नहीं होता है उसे अमान्य माना जाता है तथा उसका कोई कानूनी बल नहीं होता है।
  3. 1955 का अधिनियम पक्षकार के विवाह की रक्षा करने का इरादा रखता है: वैवाहिक अधिकारों की बहाली एचएमए, 1955 की धारा 9 के तहत प्रदान की जाती है। दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का अर्थ है पक्षकारों का सहवास का अधिकार है। दाम्पत्य अधिकार का अर्थ है वैवाहिक संबंध से उत्पन्न होने वाले अधिकार है। धारा 9 में इस तथ्य को संबोधित किया गया है कि विवाहित साथी को संबंधित परिसर पर कब्जा करने और अपने विवाह की रक्षा करने का अधिकार है।
  4. विवाह करने वाले पक्षों की मानसिक स्थिरता पर ध्यान दें: इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति विवाह के समय मानसिक रूप से बीमार था, तो उसका विवाह वैध नहीं माना जाएगा। विवाह से पहले व्यक्ति को कानूनी सहमति भी देनी होगी। मानसिक स्वास्थ्य और क्षमता के संबंध में हिंदू विवाह की शर्तें धारा 5(ii)(a), (b), (c) में उल्लिखित हैं। 
  5. विवाह में शामिल समारोहों का महत्व: इसका मतलब यह है कि यदि दो लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों और अधिकारों के साथ विवाह करते हैं तो वे कानूनी रूप से विवाहित हैं। पिता की यह जिम्मेदारी है कि वह विवाह के बाद पैदा हुए बच्चों की देखभाल और सुरक्षा करे, क्योंकि उन्हें जीवित रहने का कानूनी अधिकार है।
  6. विवाह का पंजीकरण: एचएमए, 1955 की धारा 8 में प्रावधान है कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, लेकिन कानूनी उद्देश्यों और विवाह के प्रमाण के रूप में इसकी सिफारिश की जाती है। यह विवाह की कानूनी मान्यता में सहायता करता है, जो कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जिसमें कानूनी पहचान और पासपोर्ट, वीजा, संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त करने की क्षमता और विवाह को साबित करना या समाप्त करना जैसी सेवाएं शामिल हैं। यह कानूनी साक्ष्य प्रदान करता है जिससे विवाह की वैधता या अस्तित्व से संबंधित मुद्दों पर मुकदमेबाजी से बचा जा सकता है।
  7. न्यायिक पृथक्करण और तलाक: यह अधिनियम एचएमए, 1955 की धारा 10 के अंतर्गत विवाह के वास्तविक कानूनी विच्छेद के बिना अलगाव की मांग करने वाले पक्षों को आधार प्रदान करता है। ये हैं व्यभिचार, क्रूरता, कम से कम दो साल तक पति का परित्याग और मानसिक विकार। तलाक की अवधारणा हिंदू पारंपरिक कानून के लिए विदेशी थी। यह अधिनियम धारा 13 के अंतर्गत तलाक के लिए आधार निर्धारित करता है; ये हैं व्यभिचार, क्रूरता, दो या अधिक वर्षों तक परित्याग, धर्म परिवर्तन, पागलपन और सहमति। प्रत्येक आधार की अपनी कानूनी शर्तें होती हैं जिन्हें अदालत में साक्ष्य द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
  8. भरण-पोषण और गुजारा भत्ता: यह अधिनियम पति-पत्नी में से किसी को भी वित्तीय सहायता मांगने का अधिकार देता है, जबकि धारा 24 के तहत तलाक या न्यायिक अलगाव जैसी कानूनी प्रक्रियाएं चल रही हों। इससे यह गारंटी मिलती है कि मामले पर निर्णय होने तक आश्रित पति या पत्नी आर्थिक रूप से स्थिर रहेंगे। इस अधिनियम की धारा 25 के अंतर्गत उस पति या पत्नी के वित्तीय भरण-पोषण का भी प्रावधान किया गया है जो तलाक के बाद अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है। स्थायी गुजारा भत्ता दोनों पति-पत्नी की आय और आवश्यकताओं के साथ-साथ विवाह के दौरान उनकी जीवनशैली पर भी निर्भर करता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए), 1955 द्वारा लाए गए परिवर्तन

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में विवाहों के प्रति जो दृष्टिकोण अपनाया जाता था, उसके संबंध में एचएमए, 1955 द्वारा निम्नलिखित परिवर्तन किए गए:

  1. आज हिंदू विवाहों में धर्म पर कम ध्यान दिया जाता है। संस्कारात्मक होने के विपरीत, यह आपसी समझौते का परिणाम है [धारा 5(ii), (iii), 11 से 13, और 7]।
  2. हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध संघों को अब कानूनी रूप से वैध हिंदू संघों के रूप में मान्यता दी गई है (धारा 2)। इसे राष्ट्रीय एकता और एकीकरण तथा सम्पूर्ण भारत के लिए समान नागरिक संहिता की स्थापना की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
  3. विवाह के प्रयोजन के लिए “सम्बन्ध की निषिद्ध डिग्री” वाक्यांश के बारे में मिताक्षरा और दायभाग विद्यालयों के बीच मतभेद को धारा 3 के अनुसार समाप्त कर दिया गया है। सपिंड संबंध की सीमा के अंदर विवाह पर स्मृतियों के कड़े प्रतिषेध को बहुत हद तक शिथिल कर दिया गया है। इसमें रिश्तेदारी की कुछ नई डिग्री भी जोड़ी गई हैं। इसलिए अब कोई किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकता जो दूसरे के भाई की पत्नी हो।
  4. इस अधिनियम के तहत पहली बार हिंदुओं में एकपत्नीत्व प्रथा को लागू किया गया है। भारतीय दंड संहिता, 1860 में द्विविवाह के लिए दंड का प्रावधान है। एचएमए, 1955 की धारा 5 और 17 के प्रावधान दर्शाते हैं कि वैध विवाह के लिए नियमों और पूर्वापेक्षाओं को कितना सरल बना दिया गया है।
  5. अब चूंकि अंतरजातीय और अंतर-सामुदायिक विवाहों के लिए जातिगत कारक अप्रासंगिक हो गए हैं, इसलिए इन पर लगे सभी प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। 
  6. यद्यपि प्राचीन हिंदू कानून में विवाह के लिए कोई आयु सीमा निर्दिष्ट नहीं की गई थी, लेकिन अब यह आवश्यक है कि दूल्हा और दुल्हन दोनों 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर लें। (धारा 5)।
  7. अधिनियम अब कानूनी विवाह के लिए आवश्यकताएं स्थापित करता है तथा किसी विशिष्ट प्रकार के हिंदू विवाह को मान्यता नहीं देता (धारा 5)। 
  8. अधिनियम में वैध हिंदू विवाह के लिए कोई विशिष्ट समारोह निर्दिष्ट नहीं किया गया है। धारा 5 और 7 के अनुसार, ऐसा विवाह किसी भी पक्ष के प्रथागत अधिकारों और रीति-रिवाजों के अनुसार किया जा सकता है। 
  9. पहली बार हिंदू विवाहों के पंजीकरण का प्रावधान किया गया है (धारा 8)। 
  10. अधिनियम से पहले, विभिन्न प्रकार की वैवाहिक व्यवस्थाएं लोकप्रिय थीं। वे अब अप्रासंगिक हैं, और पक्षों द्वारा उनकी संस्कृति में प्रचलित एकमात्र प्रकार का विवाह ही मान्यता प्राप्त होगा (धारा 7)।
  11. यह अधिनियम न्यायिक पृथक्करण, तलाक और विवाह निरस्तीकरण का प्रावधान करता है, जबकि गोत्र, प्रवर और सपिंड संबंधों पर आधारित निषेधों को हटाता है (धारा 10 से 14)। 
  12. पक्षकारों के वैवाहिक अधिकारों की पुनर्प्राप्ति के लिए प्रावधान (धारा 9)। 
  13. कानूनी तलाक के बाद, पति या पत्नी में से कोई भी पुनर्विवाह कर सकता है (धारा 15)। 
  14. विवाह से पैदा हुए बच्चों की वैधता के प्रावधानों को बाद में निरर्थक, शून्य या शून्यकरणीय माना जा सकता है (धारा 16)। 
  15. पति-पत्नी के भरण-पोषण तथा न्यायालयीन लागत के लिए प्रावधान (धारा 24)।
  16. स्थायी गुजारा भत्ता और सहायता (धारा 25)।
  17. कानूनी प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान तथा निर्णय होने के बाद भी छोटे बच्चों की देखभाल, सहायता और निर्देश (धारा 26)।
  18. यह अधिनियम अब कुंवारी विवाह और विधवा विवाह के बीच कोई अंतर नहीं करता है।

अधिनियम की प्रयोज्यता

1955 के एचएमए की धारा 2 में प्रावधान है कि अधिनियम लागू होता है:

  1. कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म के किसी भी रूप का पालन करता है, जिसमें वीरशैव, लिंगायत, और ब्रह्मो, प्रार्थना या आर्य समाज के अनुयायी शामिल हैं;
  2. जो कोई भी बौद्ध धर्म, जैन धर्म या सिख धर्म का पालन करता है; तथा,
  3. जब तक यह सिद्ध न कर दिया जाए कि यदि यह अधिनियम पारित न हुआ होता तो कोई व्यक्ति हिंदू विधि या किसी रीति-रिवाज या प्रथा के अधीन नहीं होता जो इसमें वर्णित किसी विषय के संबंध में उस विधि का भाग है, तब तक यह उन अन्य व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा जो उन राज्यक्षेत्रों में रहते हैं जिन पर यह अधिनियम लागू होता है और जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं। 

इस अधिनियम को रूढ़िवादी माना गया क्योंकि इसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के आधार पर अन्य धर्मों (जैन, बौद्ध या सिख) को भी शामिल किया गया था, साथ ही यह उन सभी पर भी लागू होता था जो किसी भी रूप में हिंदू हैं। फिर भी, आनंद विवाह (संशोधन) विधेयक, 2012 के मद्देनजर सिखों के पास विवाह के लिए अपना अलग कानून है। इसलिए, जब तक यह नहीं दिखाया जा सकता कि ऐसे व्यक्तियों को रीति-रिवाजों और प्रथाओं के तहत अधिनियम से बाहर रखा गया है, यह धारा किसी भी रूप के हिंदुओं पर और शब्द की व्यापक व्याख्या के भीतर उन हिंदुओं पर लागू होती है जैसे बौद्ध, जैन या सिख है। दरअसल, इसमें भारत में रहने वाले ऐसे सभी व्यक्ति शामिल हैं जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं। यह अधिनियम केवल उन हिंदुओं पर लागू होता है जो भारतीय क्षेत्र में रहते हैं और जो अन्यथा नहीं रहते हैं। 

धर्म से हिन्दू

हिंदू धर्म के अनुयायी

धर्म के अनुसार हिन्दू निम्नलिखित को दर्शाते हैं: 

जो लोग बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म, हिंदू धर्म या जैन धर्म के मूल धर्म का पालन करते हैं

कोई भी व्यक्ति जो धर्म से हिंदू, जैन, बौद्ध या सिख है, हिंदू है यदि:

  • वह इनमें से किसी भी धर्म का पालन, प्रचार या अनुसरण करता है; और,
  • वह हिन्दू ही बना रहता है, भले ही वह इनमें से किसी भी धर्म का पालन, प्रचार या पालन न करता हो।

वी. टी. एस. चंद्रशेखर मुदलियार बनाम कुलंदैवेलु मुदलियार एवं अन्य (1962) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह बात सही कही थी। दूसरे शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति नास्तिक हो जाए, हिंदू धर्म के प्रमुख सिद्धांतों के खिलाफ विद्रोह करे, मानक प्रथाओं का पालन करने में विफल हो जाए, पश्चिमी जीवन शैली को आत्मसात कर ले, या गोमांस खाए, तो भी वह व्यक्ति हिंदू ही रहेगा। 

जो लोग पहले हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो गए थे

जो व्यक्ति गैर-हिंदू धर्म अपनाकर अपनी हिंदू पहचान खो देता है, वह यदि चार हिंदू धर्मों में से किसी एक को अपना लेता है, तो उसे अपनी हिंदू पहचान पुनः प्राप्त हो जाएगी। 

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि एक गैर-हिंदू निम्नलिखित तरीकों से धर्म परिवर्तन करके हिंदू बन सकता है: 

  1. यदि वह उस जाति या समूह द्वारा अपेक्षित आधिकारिक धर्मांतरण या पुनःधर्मांतरण अनुष्ठान से गुजरता है जिसमें वह धर्मांतरित या पुनःधर्मांतरित होता है।
  2. यदि वह हिंदू धर्म अपनाने की सच्ची इच्छा प्रदर्शित करता है और इस प्रकार कार्य करता है जिससे उसकी इच्छा स्पष्ट हो जाती है, साथ ही यदि उसे उस समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है जिसमें उसका स्वागत किया गया है। 

इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति सचमुच कहता है कि वह बिना किसी गुप्त उद्देश्य या इरादे के हिंदू धर्म का पालन करता है, तो इसका अर्थ है कि वह ईश्वर के बारे में हिंदू समझ को स्वीकार करता है। जब वह धर्म परिवर्तन करता है तो वह हिन्दू बन जाता है। 

जन्म से हिन्दू

समकालीन हिंदू कानून के तहत कोई व्यक्ति जन्म से हिंदू होगा यदि:

  1. उनका पालन-पोषण उनके माता-पिता में से किसी एक ने, जो स्वयं हिन्दू हैं, हिन्दू रूप में किया; या,
  2. उनके माता-पिता दोनों हिंदू हैं।

चाहे बच्चा वैध हो या अप्राकृतिक, वे हिंदू हैं। यदि बच्चे के जन्म के बाद माता-पिता दोनों या उनमें से कोई एक किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है, तो बच्चा तब तक हिंदू ही रहेगा, जब तक कि माता-पिता अपने पैतृक अधिकारों का प्रयोग करने का निर्णय नहीं लेते और बच्चे को भी नए धर्म में परिवर्तित नहीं कर देते हैं। 

मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी (1984) में सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित कारणों से यह निर्धारित किया कि संजय गांधी हिंदू थे: 

  1. उनकी मां हिंदू थीं, जो माता-पिता में से एक थीं; और,
  2. उनका पालन-पोषण खुले तौर पर एक हिन्दू के रूप में हुआ।

यदि केन्द्रीय सरकार आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन द्वारा भिन्न रूप से विनिर्दिष्ट नहीं करती है, तो इस अधिनियम की कोई भी बात किसी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होगी (भले ही वे हिन्दू हों)। अनुसूचित जनजातियों के अधिकांश लोग अभी भी अपने पारंपरिक कानूनों का पालन करते हैं। 

धर्मांतरित और पुनः धर्मांतरित

धर्मांतरित व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जो जैन, बौद्ध या सिख के अलावा किसी अन्य धर्म से हिंदू धर्म में परिवर्तित हुआ है। पुनः धर्मांतरित व्यक्ति वह होता है जो पहले हिंदू था, लेकिन बाद में हिंदू धर्म में वापस आने से पहले किसी अन्य धर्म को अपना लिया है। अधिनियम ऐसे व्यक्तियों को हिन्दू मानता है तथा उनके विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत आते हैं। 

हिंदू धर्म अधिनियम की धारा 2 के स्पष्टीकरण में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, बौद्ध, जैन या सिख धर्म में परिवर्तित या पुनः धर्मांतरित हुआ है।” 

दूसरे शब्दों में, यह अधिनियम हिन्दू धर्म में धर्मांतरित और पुनः धर्मांतरित लोगों को भी शामिल करता है, जिसका अर्थ है कि उनके कानूनी अधिकार और कर्तव्य जन्म से हिन्दुओं के समान ही वैध हैं। इस वर्गीकरण से अधिनियम का दायरा धर्मांतरित और पुनः धर्मांतरित लोगों तक विस्तारित हो गया हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैवाहिक मुद्दों को कानूनी रूप से यथासंभव व्यापक रूप से संबोधित किया जाए, क्योंकि भारत में धार्मिक पहचान की प्रकृति गतिशील है। यह हिंदू धर्म में धर्मांतरित और पुनः धर्मांतरित लोगों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करता है, अर्थात जो लोग हिंदू धर्म को अपनाना या वापस आना चुनते हैं, उन पर विवाह, तलाक और इससे संबंधित अन्य मुद्दों के संबंध में अन्य हिंदुओं के समान ही कानून लागू होंगे। 

अनुसूचित जनजातियाँ

जहां तक अनुसूचित जनजातियों का संबंध है, हिंदू अधिनियम, 1955 के प्रावधान संपूर्ण नहीं हैं। यद्यपि यह अधिनियम हिंदुओं तथा बौद्ध, जैन या सिख धर्म का पालन करने वालों के बीच विवाह को विनियमित करता है, लेकिन अनुसूचित जनजातियों पर इसका लागू होना कुछ शर्तों पर निर्भर करता है। अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को इसके दायरे से बाहर रखती है, जब तक कि केंद्र सरकार अन्यथा निर्देश न दे। इस बहिष्करण में अनुसूचित जनजातियों के उचित रीति-रिवाजों, परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों का प्रावधान किया गया है। लेकिन यदि अनुसूचित जनजाति की कोई महिला हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह करना चाहती है, या यदि किसी विशेष जनजाति के व्यक्तिगत कानून हिंदू कानून के अनुरूप हैं, तो यह अधिनियम लागू होगा। इस लचीलेपन से अनुसूचित जनजातियों की सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप होने के साथ-साथ इसे चुनने वालों को कानूनी ढांचा मिलने की उम्मीद है। 

अधिनियम के अंतर्गत महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

प्रथा और प्रचलन

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 3(a) के अनुसार, “प्रथा” और “प्रचलन” का तात्पर्य किसी ऐसे नियम से है, जो लंबे समय से लागू है और जिसे किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, समुदाय, समूह या किसी हिंदू परिवार में कानून के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिनियम के तहत किसी प्रथा या उपयोग को मान्यता देने के लिए यह आवश्यक है कि वह निश्चित, उचित हो तथा सार्वजनिक नीति के प्रतिकूल न हो। इसके अतिरिक्त, इसे अपेक्षाकृत लम्बे समय तक लगातार अभ्यास में लाया जाना चाहिए तथा इसे जारी रखा जाना चाहिए, ताकि यह दर्शाया जा सके कि जिस विशेष समूह पर यह लागू होता है, उसके भीतर इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है। इसका अर्थ यह है कि यद्यपि अधिनियम का उद्देश्य हिंदू विवाह को विनियमित करना है, तथापि यह भी स्वीकार किया गया है कि विभिन्न समाजों में प्रथाओं में अंतर होता है। इस तरह यह रीति-रिवाजों और प्रथाओं को कानूनी प्रणाली के भाग के रूप में मान्यता प्रदान करता है, यदि वे निर्धारित आवश्यकताओं का अनुपालन करते हैं, जिससे इस विशाल संरचना के भीतर हिंदू कानून प्रणाली के भाग के रूप में संस्कृति और पारंपरिक प्रथाओं की निरंतरता को सक्षम किया जा सके। 

सपिंड संबंध

“सपिंड संबंध” शब्द को एचएमए, 1955 की धारा 3(f) के तहत परिभाषित किया गया है, जो माता की ओर से तीसरी पीढ़ी तक और पिता की ओर से पांचवीं पीढ़ी तक के संबंधों को निर्धारित करता है, जिससे एक व्यक्ति दूसरे का सपिंड बन जाता है। विशेष रूप से, सपिंड संबंधों की गणना इस प्रकार की जाती है: 

  • पिता के माध्यम से: आरोही रेखा के पांचवें अंश तक गणना की जाती है। 
  • माता के माध्यम से: आरोहण की तीसरी पीढ़ी तक गणना की जाती है।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति सपिंड होता है, जिसके पिता की ओर से उसके परदादा होते हैं और माता की ओर से उसकी परदादी होती हैं। 

निषिद्ध संबंध की डिग्री

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 3(g) हिंदू विवाह के संदर्भ में निषिद्ध संबंधों को वर्गीकृत करती है। इस धारा से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दो व्यक्ति निषिद्ध रिश्ते में हैं यदि एक दूसरे के सीधे वंशज हैं या यदि किसी व्यक्ति की पत्नी या पति दूसरे व्यक्ति या कम से कम तीसरी पीढ़ी के सीधे वंशज हैं। इसका तात्पर्य यह है कि निषिद्ध डिग्री के अंतर्गत विवाह निषिद्ध हैं, जिसमें माता-पिता और बच्चों, दादा-दादी और पोते-पोतियों, परदादा-परदादी और परपोते-परपोतियों आदि का विवाह शामिल है। इसके अलावा, कोई भी रिश्ता जो कानून द्वारा निषिद्ध है, जिसमें भाई-बहन या सौतेले भाई-बहन से विवाह करना, चाचाओं का भतीजी से विवाह करना, चाचीओं का भतीजे से विवाह करना आदि शामिल हैं, इस परिभाषा के तहत निषिद्ध संबंधों के उदाहरण हैं। इस तरह के प्रतिबंधों का उद्देश्य विवाह की पवित्रता को बनाए रखना तथा ऐसे विवाहों को रोकना है, जो हिंदू संस्कृति में सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से अवांछनीय हैं। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह एक अवधारणा है

विवाह दो व्यक्तियों के बीच एक पवित्र एवं वैध बंधन है। यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के बीच विवाह को विनियमित करता है तथा देश में कानूनी विवाह के लिए आवश्यक औपचारिकताओं को निर्धारित करता है। यह सहमति, शामिल पक्षों की क्षमता तथा सांस्कृतिक प्रथाओं और परंपराओं के अनुपालन पर केंद्रित है। अधिनियम के अनुसार, विवाह एकपत्नीक होना चाहिए तथा लोगों की एक निश्चित आयु होनी चाहिए तथा सामाजिक और नैतिक मानकों को बनाए रखने के लिए उन्हें करीबी रिश्तेदारों से विवाह नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, यह अधिनियम वैवाहिक विवादों और विवाह-भंग  (डिसोल्यूशन ऑफ मैरिज) से निपटने के लिए कानूनी उपायों के साथ पति-पत्नी के अधिकारों और जिम्मेदारियों के क्षेत्र को भी शामिल करता है, इसमें न्यायिक पृथक्करण, विवाह विच्छेद और भरण-पोषण के मुद्दों को भी शामिल किया गया है। 

हिंदू विवाह की प्रकृति

हिंदू विवाह को “एक धार्मिक संस्कार के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके तहत एक पुरुष और एक महिला धर्म, प्रजनन और यौन सुख के आनंद के शारीरिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उद्देश्य के लिए एक स्थायी मिलन में प्रवेश करते हैं।” इस संस्कारात्मक प्रकृति की तीन विशेषताएं हैं: 

  1. स्थायित्व: पति और पत्नी के बीच का रिश्ता स्थायी होता है, और कुछ संस्कृतियों में, यह कहा जाता है कि वे मृत्यु के बाद भी विवाहित रहते हैं।
  2. अविच्छेद्यता: संक्षेप में, एक बार विवाह बंधन स्थापित हो जाने पर उसे तोड़ा नहीं जा सकता, जिससे विवाह एक ऐसा बंधन बन जाता है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता हैं।
  3. धार्मिक संस्कार: इस मिलन को धार्मिक संस्कारों और प्रथाओं के माध्यम से संपन्न किया जाना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि इसे पवित्र विवाह क्यों कहा जाता है। 

इसलिए हिंदू भारतीय परंपरा में विवाह एक अत्यंत पवित्र संस्कार है। प्राचीन समय में, विवाह के मामले में दुल्हन की कोई भूमिका नहीं होती थी; पिता ही उसके लिए उपयुक्त वर का चयन करता था। ऐसा विवाह, जो विवाह के समय नाबालिग या अस्वस्थ पक्षों के बीच हुआ हो, शून्य घोषित नहीं किया जाता। हालाँकि, आधुनिक कानूनों में, दोनों पक्षों की सहमति और शामिल पक्षों की समझदारी को हिंदू विवाह के वैध तत्व माना जाता है। इनके बिना, विवाह को रद्द किया जा सकता है या ऐसा माना जा सकता है कि वह कभी अस्तित्व में ही नहीं था, इसलिए वैध नहीं है। 

समकालीन हिंदू विवाह में कुछ संविदात्मक पहलू शामिल हैं जिन्हें पश्चिम से उधार ली गई समानता और स्वतंत्रता की अवधारणाओं के अनुरूप बनाया गया है। विवाह के लिए पुरुष और महिला दोनों की सहमति आवश्यक है, जो इस तथ्य को उजागर करता है कि आधुनिक विवाह संविदात्मक होते हैं। इसलिए, आज हिंदू विवाह एक संस्कार, जो एक पवित्र समारोह है, और एक अनुबंध, जिसमें अधिक धर्मनिरपेक्ष पहलू शामिल हैं, के बीच का मामला है। यह धार्मिक रूप से पवित्र बना हुआ है, लेकिन सहमति और समानता की आधुनिक अवधारणाओं का भी सम्मान करता है, तथा पुरानी दुनिया के धर्म को नई दुनिया के कानूनों के साथ जोड़ता है। 

वैध विवाह की अनिवार्यताएं

हिंदू कानून के तहत वैध विवाह के लिए शर्तें नीचे दी गई हैं:

विवाह के दोनों पक्ष हिंदू होने चाहिए

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार, हिंदू विवाह के लिए कानूनी आवश्यकताएं और शर्तें हैं, जिनमें से एक यह है कि प्रस्तावित विवाह के पक्षकार हिंदू होने चाहिए। यदि भागीदारों में से कोई एक ईसाई या मुस्लिम है, तो यह विवाह एचएमए, 1955 के तहत वैध नहीं होगा। इस प्रकार, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत, यदि दोनों पक्ष हिंदू नहीं हैं तो वैध विवाह नहीं हो सकता। यमुनाबाई अनंत राव अधाव बनाम अनंत राव शिवराम अधाव (1988) में यह स्पष्ट किया गया कि अधिनियम की धारा 5 केवल दो हिंदुओं के बीच विवाह की अनुमति देती है। 

विवाह में शामिल पक्षों को मानसिक विकृति, मानसिक विकार या पागलपन से ग्रस्त नहीं होना चाहिए

इस प्रकार, हिंदू विवाह में, सहमति को 1995 के अधिनियम की धारा 5(ii)(a) के अनुसार कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। यदि दम्पति मानसिक विकलांगता के कारण वैध सहमति नहीं दे पाते हैं, तो दूसरा पक्ष विवाह को रद्द मान सकता है। अधिनियम की धारा 5(ii)(b) में प्रावधान है कि यदि कोई एक पक्ष, कानूनी सहमति देने में सक्षम होने के बावजूद मानसिक विकार से ग्रस्त है और वह विवाह करने या बच्चे पैदा करने के लिए अयोग्य है, तो दूसरे पक्ष के कहने पर विवाह को विघटित किया जा सकता है। 

श्रीमती अलका शर्मा बनाम अभिनेश चंद्र शर्मा (1991) में पत्नी ने कहा कि शादी की पहली रात को वह डरी हुई, सिकुड़ी हुई और ठंडी महसूस कर रही थी। उसने यौन क्रिया करने से इनकार कर दिया। वह परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं और मांगों को पूरा करने में विफल रही और यह कारण भी नहीं बता सकी कि उसने पूरे परिवार की उपस्थिति में बरामदा क्यों गीला किया। इसलिए, पति ने विवाह को समाप्त करने के लिए कानूनी उपाय की मांग की थी। अदालत ने विवाह को रद्द कर दिया था। 

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अधिनियम की धारा 5(ii)(c) के तहत, जहां एक साथी बार-बार पागलपन की स्थिति से ग्रस्त हो, तो दूसरे साथी को तलाक मांगने का अधिकार है। विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1999 ने एचएमए, 1955 की इस धारा को बदल दिया, और “मिर्गी” शब्द अस्तित्व में नहीं है। इस कारण से, वर्तमान समाज में, यदि विवाह में शामिल व्यक्ति को बार-बार दौरे पड़ते हैं, तो विवाह अभी भी वैध है, और व्यक्ति को इसे भंग करने का कोई अधिकार नहीं है। 

विवाह एकपत्नीवत् होना चाहिए

एचएमए, 1955 के अनुसार, धारा 5(i) के अनुसार विवाह के समय किसी भी पक्ष का जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए। यदि किसी भी पक्ष का जीवनसाथी विवाह के समय जीवित था तो विवाह को शून्य माना जाता है। अतः द्विविवाह गैरकानूनी है। यदि पहला विवाह मृत्यु या तलाक के कारण समाप्त हो गया हो तो दूसरा विवाह वैध हो सकता है। 

इस धारा में यह प्रावधान है कि कानून आने से पहले दो हिंदुओं के बीच किया गया कोई भी विवाह शून्य है, यदि उनमें से कोई पहले से ही विवाहित है या विवाह के समय उसका कोई जीवनसाथी है। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली शादी के रहते हुए किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करता है तो उस पर आईपीसी की धारा 494 और 495 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है और उसे दंडित किया जा सकता है। 

विवाह के पक्षकारों ने वयस्कता प्राप्त कर ली है

अधिनियम की धारा 5(iii) के अनुसार विवाह के समय दुल्हन की आयु कम से कम 18 वर्ष तथा पति की आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। इन मानकों के विपरीत किया गया कोई भी विवाह शून्य या शून्यकरणीय नहीं होगी। इसके अलावा, जो कोई भी ऐसा विवाह संपन्न कराएगा, उसे इस अधिनियम की धारा 18 के तहत गिरफ्तार किया जा सकता है और उसे दो साल तक की जेल या एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। 

पिन्निंटी वेंकटरमण बनाम राज्य (1976) के मामले में धारा 5(iii) के आयु प्रावधानों का उल्लंघन करके किया गया विवाह शून्य या शून्यकरणीय नहीं माना गया। फिर भी, एचएमए,1955 की धारा 18 के अनुसार इसकी शर्तों का उल्लंघन करना गैरकानूनी है। 

विवाह के पक्षकार सपिंड के रूप में संबंधित नहीं होने चाहिए

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(v) के अनुसार, यदि दो लोग, जो सपिंड के रूप में जुड़े हुए हैं, के बीच विवाह अवैध है, यदि वह विधिपूर्वक किया गया हो। दूसरे शब्दों में कहें तो पति और पत्नी का वंश एक नहीं होना चाहिए। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 3(f) के अनुसार, सपिंड संबंध वह है जिसमें व्यक्ति माता के माध्यम से वंश की तीसरी पीढ़ी (सहित) तक और पिता के माध्यम से वंश की पांचवीं पीढ़ी (सहित) तक फैला होता है, प्रत्येक मामले में वंश संबंधित व्यक्ति से ऊपर की ओर जाता है, जिसे पहली पीढ़ी के रूप में गिना जाता है। 

यद्यपि सपिंड के बीच विवाह अमान्य है, फिर भी यह वैध हो सकता है यदि कोई वैध प्रथा या प्रचलन हो जो उनमें से प्रत्येक को नियंत्रित करती हो और ऐसे मिलन की अनुमति देती हो। ऐसी प्रथा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध और अनैतिक नहीं होनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि विवाह करने का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है और यह कुछ शर्तों के अधीन है जो विवाह की पवित्रता को बनाए रखती हैं। अन्यथा, समाज में अनाचारपूर्ण रिश्ते उभर सकते हैं। यदि कोई प्रथा अनैतिक है तो उसका लम्बे समय तक पालन करने से उस पर कानून लागू नहीं होता हैं। अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, सपिंड से संबंधित दो पक्षों के बीच किया गया विवाह अमान्य है तथा दोनों पक्षों को दण्डित किया जा सकता है, जिसमें एक माह का साधारण कारावास तथा 1,000 रुपये का जुर्माना या दोनों शामिल हो सकते हैं। 

पक्षों को निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में नहीं आना चाहिए

अधिनियम की धारा 5(iv) के अंतर्गत पक्षों को प्रतिबंधित रिश्ते में नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि उनकी संबंधित संस्कृतियां या परंपराएं उनके बीच विवाह की अनुमति न दें। एचएमए, 1955 की धारा 3(g) के अनुसार, दो लोगों को प्रतिबंधित रिश्ते में माना जाता है यदि वे:

  • यदि एक दूसरे का लग्न है या
  • यदि कोई दूसरे के पूर्वज से विवाहित था या उसका कोई वंशज था;
  • यदि कोई दूसरे के भाई, पिता, माता, दादा, दादी या किसी अन्य रिश्तेदार का जीवनसाथी था; या
  • यदि दोनों में से कोई एक भाई या बहन, चाचा या भतीजी, चाची या भतीजा, भाई या बहन का बच्चा या दो भाइयों या बहनों का बच्चा है। 

दो व्यक्तियों के बीच विवाह पूर्णतः अमान्य माना जाता है, जहां यह संबंध की निषिद्ध श्रेणी में आता है। हालाँकि, विवाह तब तक वैध है जब तक दोनों पक्षों को नियंत्रित करने वाले कानून के अनुसार वैध प्रथा या प्रचलन मौजूद है। जो प्रथा या प्रचलन अपनाई जा रही है वह निश्चित, उचित होनी चाहिए तथा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। भारत में कई सांस्कृतिक प्रथाएं प्रचलित हैं जो निषिद्ध संबंधों के संदर्भ में विवाह को वैध बनाती हैं। उदाहरण के लिए, भाई-बहन की संतानों का विवाह कर देना केरल क्षेत्र में अभी भी एक आम परंपरा है। 

बालू स्वामी रेड्डीर बनाम बालकृष्ण (1956) मामले में न्यायालय ने माना कि किसी व्यक्ति द्वारा अपनी बेटी की बेटी से विवाह करना गैरकानूनी और सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, जैसा कि रेड्डीर समुदाय में प्रचलित था, जो मद्रास राज्य में सुप्रसिद्ध थे। अधिनियम की धारा 18 के तहत दो व्यक्तियों के बीच विवाह सम्पन्न होना अवैध माना जाता है तथा अपराध की गंभीरता के आधार पर अपराधियों को एक हजार रुपए का जुर्माना या एक माह का कारावास या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। 

विवाह परम्परागत रीति-रिवाजों और समारोहों के अनुसार सम्पन्न होना चाहिए

अधिनियम की धारा 7 में कहा गया है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधान के अंतर्गत शासित हिंदू विवाह तभी वैध है, जब विवाह किसी भी पक्ष के रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया हो। यदि ऐसे अनुष्ठानों और समारोहों में सप्तपदी और बंधन शामिल हैं तो सातवां चरण पूरा होने के बाद विवाह पूरा माना जाता है। 

जैसा कि बिब्बे बनाम राम कली (1982) के मामले में देखा गया, अदालत ने घोषणा की कि जोड़ों को विवाहित बनाने के इरादे से इन समारोहों को करना कानूनी समारोहों के रूप में योग्य नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की परम्परा के आधार पर समारोह अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, केरल में नायर जाति द्वारा मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण गैर-संस्कारात्मक अनुष्ठानों में से एक है दुल्हन को कपड़े का एक टुकड़ा देना (पुडवा कोडुकल)। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत संरक्षकता

विवाह के लिए संरक्षकता का उल्लेख एचएमए, 1955 की धारा 6 में किया गया है। जब इस अधिनियम के तहत दुल्हन को विवाह के लिए अभिभावक की सहमति लेने की आवश्यकता होती है, तो निम्नलिखित व्यक्ति ऐसा करने के लिए पात्र हैं:

  1. दुल्हन की माँ,
  2. पिता,
  3. दादा,
  4. दादी,
  5. पूरे खून का भाई,
  6. अर्ध-रक्त का भाई, आदि।

1978 में बाल विवाह निरोधक संशोधन के पारित होने के बाद, विवाह के लिए संरक्षकता समाप्त कर दी गई हैं। बाल विवाह को हतोत्साहित करने के लिए, इस संशोधन द्वारा विवाह की कानूनी न्यूनतम आयु बढ़ा दी गई हैं। 

हिंदू विवाह को मान्य करने के लिए समारोह

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो हिंदू विवाह के अनुष्ठान के लिए आवश्यक समारोहों से संबंधित है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के अनुसार, वैध हिंदू विवाह के लिए कुछ समारोह अनिवार्य हैं। इसमें इस तथ्य को भी स्वीकार किया गया है कि हिंदू धर्म में एक समुदाय से दूसरे समुदाय में विवाह समारोह भिन्न हो सकते हैं। धारा 7 में प्रावधान है कि हिंदू विवाह किसी भी पक्ष के प्रथागत रीति-रिवाजों और समारोहों के अनुसार किया जा सकता है। ऐसे संस्कारों और समारोहों में सामान्यतः महत्वपूर्ण अनुष्ठान शामिल होते हैं जो हिंदू विवाहों की विशेषता है। 

इन समारोहों से जुड़ी सबसे अधिक पहचानी जाने वाली चीजों में से एक है ‘सप्तपदी’, या सात कदम। यह धारा परिभाषित करती है कि जहां सप्तपदी विवाह संस्कार के भाग के रूप में मौजूद है, वहां सातवें कदम के साथ ही विवाह पूर्ण और वैध हो जाता है। यह एक ऐसा समारोह है जिसमें दूल्हा और दुल्हन पवित्र अग्नि के चारों ओर सात बार घूमते हैं, जो पति-पत्नी के रूप में एक-दूसरे से किए गए वादों का प्रतीक है, तथा प्रत्येक कदम एक-दूसरे से किए गए विशेष वादे को दर्शाता है। 

धारा 7 में यह मान्यता दी गई है कि हिंदू प्रथाओं के संबंध में विभिन्न समुदायों की अपनी-अपनी रीति-रिवाज और प्रथाएं हैं तथा प्रथाओं में भिन्नता की अनुमति दी गई है। इससे हिंदू समूहों की विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं के पक्ष में कानून की समझ और कार्यान्वयन में लचीलापन आता है। 

एचएमए, 1955 के तहत विवाहों का पंजीकरण

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 हिंदू विवाहों के पंजीकरण की प्रक्रिया से संबंधित है। यद्यपि अधिनियम विवाह पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाता, फिर भी कानूनी उद्देश्यों और रिकार्ड रखने के लिए इसकी अनुशंसा करता है। यह धारा राज्य सरकारों को विवाह पंजीकरण के संबंध में नियम बनाने की अनुमति देती है, जिसमें विवाह पंजीयक की नियुक्ति और विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया शामिल हो सकती है। 

अधिनियम की धारा 8 के अनुसार, राज्य सरकार हिंदू विवाहों के पंजीकरण के संबंध में प्रावधान कर सकती है, जिसके तहत किसी भी ऐसे विवाह के पक्षकार अपने विवाह के विवरण को हिंदू विवाह पंजिका में निर्धारित तरीके और शर्तों के अधीन दर्ज करा सकते हैं। यह पंजीकरण हिंदू विवाह को प्रमाणित करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए किया जा रहा है। इस प्रावधान के अंतर्गत बनाए गए किसी भी नियम को राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। हिंदू विवाह पंजिका में दर्ज विवरण सत्य माने जाएंगे और पंजिका को उचित समय पर संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 

विवाहों को पंजीकृत करने का मुख्य कारण विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान करना है, जो उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है जिनमें विवाह, उत्तराधिकार या अधिकारों के कानूनी मुद्दे शामिल हों। यह कानूनी मामलों में भी सहायता करता है जहां किसी को पासपोर्ट और वीजा जैसे औपचारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की आवश्यकता हो सकती है, जिसके लिए वैवाहिक प्रमाण की आवश्यकता हो सकती है। धारा 8 यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि विवाह के मामले में केवल वैध दावे ही पंजीकृत किए जाएं, जिससे साझेदारी के संबंध में किए जाने वाले फर्जी दावों की संख्या सीमित हो सके, जिससे वैवाहिक संबंधों को कानूनी मान्यता मिलती है और यह सुनिश्चित होता है कि दोनों पति-पत्नी के अधिकारों और हितों की रक्षा हो। यद्यपि पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, फिर भी कई कारणों से कानूनी और प्रशासनिक कारणों से यह उचित है। 

सीमा बनाम अश्विनी कुमार (2006) मामला देश में सभी धर्मों के लिए विवाह पंजीकरण अनिवार्य बनाने की आवश्यकता पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक और ऐतिहासिक निर्णय था। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को सभी विवाहों के पंजीकरण के लिए नियम बनाने का आदेश दिया और कहा कि यह महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और बाल विवाह, द्विविवाह और तस्करी को रोकने के लिए एक आवश्यक कदम है। फैसले में इस बात पर भी जोर दिया गया कि स्थापित विवाह कानूनी समस्याएं पैदा करते हैं तथा जीवनसाथी और बच्चों को कोई कानूनी मान्यता नहीं मिलती है। इस फैसले का उद्देश्य कानूनी निश्चितता प्रदान करना, स्वायत्तता प्रदान करना, वैवाहिक अधिकारों को लागू करना तथा वैवाहिक संबंधों में उत्तरदायित्व बढ़ाना था। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना

वैवाहिक विवाह अधिनियम, 1955, अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत वैवाहिक अधिकारों की बहाली को मान्यता देता है।  वैवाहिक अधिकारों के संबंध में, उपर्युक्त अधिनियम की धारा 9 के तहत प्रदान किए गए संघ के अधिकार को न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है और संरक्षित किया जाता है, जहां पति या पत्नी अपने अधिकार की रक्षा के लिए मुकदमा दायर कर सकते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत घायल पति या पत्नी को उपलब्ध महत्वपूर्ण राहत में से एक हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत भरण-पोषण मांगने की शक्ति है। 

भारतीय व्यक्तिगत कानून के कई प्रावधानों में विवाह में वैवाहिक अधिकारों की भूमिका को अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है। शब्द के संकीर्णतम अर्थ में, विवाह अधिकार का अर्थ है वैवाहिक साथी के साथ रहने और यौन क्रियाकलाप में संलग्न होने का अधिकार होना। पत्नी और पति को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए और साथ रहना चाहिए, जो शायद विवाह के मौलिक कर्तव्यों में से एक है। “वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना” एक कानूनी प्रावधान है जो अपमानित पति या पत्नी को विवाह से बाहर चले गए साथी को सहवास पुनः शुरू करने के लिए मजबूर करने की अनुमति देता है। यह आमतौर पर विवाह को बनाए रखने के विचार से जुड़ा होता है, यदि कोई हो। विवाह कई वैवाहिक कर्तव्यों को निर्धारित करता है और सभी वैवाहिक कानूनों के तहत प्रत्येक पति या पत्नी को कानूनी क्षमता प्रदान करता है। अधिनियम में इस खंड को पूरा करने में काफी समय लगा, क्योंकि अधिनियम की संवैधानिकता पर विवाद की गुंजाइश थी। 

धारा 9 की अनिवार्यताएं

एचएमए, 1955 में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना को धारा 9 के अंतर्गत पर्याप्त कारण के बिना दूसरे पति या पत्नी से अलग रह रहे पति या पत्नी के किसी भी कानूनी उपाय के रूप में परिभाषित किया गया है। धारा 9 की तीन आवश्यकताएं इस प्रकार हैं: 

समाज से अलगाव

धारा 9 के लागू होने के लिए पहली शर्त यह है कि पति या पत्नी में से एक को दूसरे के समाज से अलग हो जाना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि वैवाहिक बंधन से जानबूझकर और मनमाने ढंग से बहिष्कार किया जा रहा है। यह वापसी शारीरिक (स्थानिक) हो सकती है, इस अर्थ में कि एक साथी वैवाहिक घर छोड़ देता है, या भावनात्मक इस अर्थ में कि एक साथी अपने वैवाहिक दायित्वों को पूरा करने से विमुख हो जाता है। 

उचित कारण का अभाव

याचिका के सफल होने के लिए यह साबित करना होगा कि अलगाव बिना किसी उचित कारण के वापस ली गई है। उचित कारण क्रूरता, व्यभिचार या कोई अन्य दुराचार हो सकता है, जो पति या पत्नी के लिए एक दूसरे के साथ रहना असहनीय बना देता है। याचिका लाने वाले पक्ष (प्रतिपूर्ति की मांग करने वाला पीड़ित पति या पत्नी) पर यह साबित करने का दायित्व होता है कि दूसरे पति या पत्नी के पास कोई उचित कारण नहीं था। 

न्यायालय की संतुष्टि

अदालत को याचिका की वास्तविक प्रकृति तथा उसे वापस लेने के कारणों के बारे में आश्वस्त होना होगा। न्यायालय पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियों का भी आकलन करता है, तथा यह भी देखता है कि क्या आवेदन में पर्याप्त योग्यता है, तथा क्या आवेदन वापस लेने का कोई उचित कारण था। यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि वापसी वास्तव में वैध कारण के बिना की गई है, तो न्यायालय वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दे सकता है, जिसके तहत प्रतिवादी को याचिकाकर्ता के साथ रहना पुनः शुरू करना होगा। 

धारा 9 का उद्देश्य और प्रभाव

वैवाहिक अधिकारों की बहाली विवाह संबंध को बनाए रखने के साथ-साथ पति-पत्नी के पुनर्मिलन की संभावना को बढ़ावा देने के लिए उपयोगी है। लेकिन इसकी आलोचना इस डर से की गई है कि इसका इस्तेमाल महिलाओं को, विशेषकर यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने के तौर पर किया जाएगा। न्यायाधीशों ने इस तथ्य पर भी ध्यान केंद्रित किया है कि यदि क्षतिपूर्ति का आदेश दमनकारी या अन्यायपूर्ण माना जाए तो उसे नहीं दिया जाना चाहिए। हालाँकि, अधिनियम में तलाक के लिए अन्य आधार भी दिए गए हैं, जिनमें क्षतिपूर्ति के आदेश का पालन करने से इनकार करना भी शामिल है। 

संक्षेप में, धारा 9 एक वैधानिक प्रावधान है जो विवाह की पवित्रता को बनाए रखने के लक्ष्य को पूरा करता है और कानूनी साधन प्रदान करता है जिसके माध्यम से युगल के बीच वैवाहिक बंधन को पुनः स्थापित किया जा सकता है, यदि वापसी अनुचित थी। 

धारा 9 की संवैधानिक वैधता

यद्यपि इसे विवाह बंधन में पक्षकारों की सुरक्षा के लिए विकसित किया गया था, फिर भी इस खंड को कई तरीकों से चुनौती दी गई और इसकी आलोचना की गई थी। इस प्रावधान की संवैधानिकता आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष टी. सरिता बनाम टी. वेंकटसुब्बैया (1983) मामले में बहस का मुद्दा था। इस मुकदमे से यह भी पता चलता है कि वादी का आरोप है कि एचएमए की धारा 9 संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। न्यायालय ने माना कि यह धारा महिलाओं के लिए विशेष रूप से अमानवीय एवं अमानुषिक है। यह जबरन सहवास उसे अपने शरीर पर अधिकार तथा यौन आचरण के मामले में निर्णय लेने की स्वतंत्रता से वंचित करता है। इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश अनुच्छेद 21 के तहत उसके अधिकारों का उल्लंघन करेगा जो उसे निजता के अधिकार की गारंटी देता है। चूंकि विवाह में सहवास पति-पत्नी के बीच गोपनीयता का मामला है, इसलिए 1983 में न्यायालय ने उपर्युक्त प्रावधान को गैरकानूनी माना था। इसलिए, राज्य को ऐसे निजी विकल्पों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 

फिर भी, दिल्ली उच्च न्यायालय उक्त निर्णय के संबंध में भिन्न राय रखता था। अदालत ने यह भी कहा कि धारा 9 के संबंध में कई गलत धारणाएं हैं और इस धारा की संवैधानिकता एक ऐसा मुद्दा है जिस पर बहस हुई है। अदालत ने कहा है कि विवाह एक धार्मिक संस्था है और कानून द्वारा इसकी पवित्रता को बनाए रखने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार, वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का खंड, विवाह में पक्षकारों से विघटन की शक्ति को हटाकर पति और पत्नी को एक साथ रखने के लिए पेश किया गया था। दो व्यक्तियों के बीच विवाह संबंध की सुरक्षा इस विनियमन का मुख्य लक्ष्य है, इसलिए इसकी संवैधानिकता सुनिश्चित करते समय इस पर विचार किया जाना चाहिए। 

इस प्रकार, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 9 अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन नहीं करती है, क्योंकि इसे तलाक के लिए एक नए कारण के रूप में जोड़ा गया था। यौन क्रियाकलाप को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि यह विवाह संस्था के तत्वों में से एक है, जो सहवास और संगति पर आधारित है। 

सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने सभी विवादों को समाप्त कर दिया। इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार कर लिया गया तथा आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया। न्यायालय के अनुसार, संबंधित धारा “विवाह भंग को टालने में सहायता के रूप में एक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति करती है” तथा एक उपाय के रूप में कार्य करती है। यद्यपि यह उपाय पुराना हो सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य तलाक के लिए आधार प्रदान करना है, यदि संबंधित पक्ष ऐसी क्षतिपूर्ति देने से इनकार कर दें। इसके अलावा, न्यायालय का मानना था कि उपाय के रूप में धारा 9 को निरस्त करना विधायिका का काम है, न कि न्यायालय का। इस प्रकार, इस ऐतिहासिक निर्णय में धारा 9 को संवैधानिक रूप से वैध पाया गया था। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि यद्यपि धारा 9 का उद्देश्य विवाह को सुरक्षित रखना है, लेकिन इसका प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि इसमें रुचि न रखने वाले जीवनसाथी को बाध्य किया जाए। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि समकालीन सामाजिक प्रवृत्तियों और भारत के संविधान में निहित स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए वैवाहिक अधिकारों का प्रवर्तन असभ्य और दमनकारी नहीं होना चाहिए।

अंत में, धारा 9 के संवैधानिक प्रावधानों की पुष्टि करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि धारा 9 का कार्यान्वयन निष्पक्षता, तर्कसंगतता और संविधान में निहित मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। न्यायालय ने सलाह दी कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आदेश औपचारिकता नहीं है, तथा वैवाहिक मामलों में न्याय और समता निर्धारित करने के लिए वैवाहिक समाज से हटने की परिस्थितियों या कारणों को बरकरार रखा जाना चाहिए तथा उनकी समीक्षा की जानी चाहिए। इस निर्णय में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि वैवाहिक एकता के सिद्धांतों और हिंदू कानून के तहत व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता देने में सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत न्यायिक पृथक्करण

1955 के एचएमए की धारा 10 के अंतर्गत विशेष रूप से उन पति-पत्नी को कानूनी उपाय प्रदान किया गया है जो तलाक नहीं चाहते हैं, लेकिन अलग-अलग रहना चाहते हैं। जबकि तलाक एक कानूनी कार्यवाही है जो वैवाहिक बंधन को तोड़ देती है, न्यायिक पृथक्करण दम्पति को तकनीकी रूप से विवाहित रहते हुए भी शारीरिक रूप से अलग रहने की अनुमति देता है। यह कानूनी स्थिति इस तथ्य को स्वीकार करती है कि ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब साथी अब साथ नहीं रह सकते, लेकिन वे अपनी शादी को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए तैयार या इच्छुक नहीं हैं। 

न्यायिक पृथक्करण की मांग के आधार

धारा 10(1) में यह प्रावधान है कि न्यायिक पृथक्करण का आदेश उन सभी आधारों पर मांगा जा सकता है जिन पर विवाह विच्छेद यानी तलाक का आदेश मांगा जा सकता है। न्यायिक पृथक्करण के लिए निम्नलिखित आधार हैं:

  1. क्रूरता: न्यायिक पृथक्करण का एक कारण क्रूरता है। इसमें शारीरिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार शामिल है, जिसके कारण एक साथी के लिए दूसरे के साथ रहना लगभग असंभव या खतरनाक हो जाता है। न्यायालय क्रूरता को उदार अर्थ में परिभाषित करते हैं, जिसमें एक साथी द्वारा दूसरे साथी पर किया गया कोई भी गैरकानूनी हिंसक आचरण या मानसिक दुर्व्यवहार शामिल होता है।
  2. व्यभिचार: यदि पति या पत्नी में से किसी एक ने विवाह के बाहर किसी अन्य व्यक्ति के साथ सहमति से यौन संबंध बनाए हैं, तो पीड़ित पक्ष न्यायिक अलगाव की मांग करता है। व्यभिचार को विवाह अनुबंध का उल्लंघन माना जाता है और इससे विवाह को गंभीर नुकसान हो सकता है।
  3. परित्याग: परित्याग वह स्थिति है जब एक पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण या अनुमति के दूसरे को छोड़ देता है। न्यायिक पृथक्करण को नियंत्रित करने वाले कानून में प्रावधान के अनुसार, परित्याग निरंतर अवधि के लिए होना चाहिए।
  4. धर्मांतरण: यदि पति या पत्नी में से कोई एक अन्य धर्म अपना लेता है और इस प्रकार हिंदू नहीं रह जाता है, तो दूसरा पति या पत्नी न्यायिक पृथक्करण की डिक्री की मांग कर सकता है।
  5. मानसिक विकृति: इन मामलों में ऐसी स्थिति शामिल होती है, जहां पति या पत्नी में से कोई एक असाध्य मानसिक विकृति से ग्रस्त हो या लगातार या रुक-रुक कर इस तरह के मानसिक विकार से पीड़ित हो और इस हद तक कि याचिकाकर्ता से प्रतिवादी के साथ रहने की उचित रूप से अपेक्षा नहीं की जा सकती हो। 
  6. संसार का त्याग: यदि जीवनसाथी किसी धार्मिक संप्रदाय में शामिल होकर संसार का त्याग कर देता है।
  7. मृत्यु की धारणा: यदि पति या पत्नी के बारे में सात वर्ष या उससे अधिक समय से उन लोगों द्वारा नहीं सुना गया है जो सामान्यतः प्रतिवादी के बारे में सुनते यदि वे जीवित होते है।

नीचे कुछ अन्य आधार दिए गए हैं जो केवल पत्नी के लिए उपलब्ध हैं, पति के लिए नहीं: 

  1. अधिनियम-पूर्व बहुविवाह
  2. बलात्कार, गुदामैथुन या पशुगमन
  3. सहवास की बहाली न करना और विवाह से इनकार करना

न्यायिक पृथक्करण के प्रभाव

एचएमए, 1955 के तहत न्यायिक पृथक्करण प्राप्त करने से विवाह संबंध और पक्षों पर विभिन्न प्रतिकूल प्रभाव पड़े। सबसे पहले, यह विवाहित रहते हुए पति-पत्नी की अलग रहने की इच्छा को कानूनी स्वीकृति प्रदान करता है। इससे दोनों में से किसी भी साथी को भरण-पोषण की मांग करने की अनुमति मिल जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अलगाव के समय आर्थिक सहायता मिलती रहेगी। 

दूसरे, न्यायिक पृथक्करण बच्चों के कल्याण और भलाई को ध्यान में रखते हुए बच्चों की हिरासत के अधिकार स्थापित करता है। तीसरा, यह पुनर्विवाह पर प्रतिबंध लगाता है, क्योंकि इस मामले में कोई भी किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकता क्योंकि दोनों कानूनी रूप से एक दूसरे से विवाहित हैं। न्यायिक पृथक्करण से विवाह समाप्त नहीं होता, अपितु यह वैवाहिक विवादों और पृथक्करण के प्रभाव से निपटने के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, यह एचएमए के तहत एक कानूनी उपाय है जो वास्तविक पति-पत्नी के अलग होने की आवश्यकता को संबोधित करता है, साथ ही पति-पत्नी के कुछ अधिकारों और कर्तव्यों को मान्यता देता है। 

न्यायिक पृथक्करण की याचिका

एचएमए, 1955 की धारा 13 के अंतर्गत कोई भी पति या पत्नी पारिवारिक न्यायालय में न्यायिक पृथक्करण के लिए याचिका दायर कर सकता है। इस याचिका में बुनियादी जानकारी होनी चाहिए जैसे कि दोनों पति-पत्नी के नाम और पते, विवाह की तिथि और स्थान, तथा विवाह को रद्द करने के कारणों का विवरण जैसे कि व्यभिचार, क्रूरता या परित्याग आदि। कथित आधारों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए तथा ऐसी घटनाओं का विवरण या याचिकाकर्ता के पास उपलब्ध कोई अन्य साक्ष्य भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, इसमें मांगी गई राहत को भी निर्दिष्ट किया जाना चाहिए जो न्यायिक पृथक्करण हो सकता है, तथा बच्चों के भरण-पोषण या अभिरक्षा के लिए कोई संबंधित आदेश भी हो सकता है। याचिका के साथ आरोपों की सत्यता की पुष्टि करने वाला एक हलफनामा भी संलग्न किया जाना चाहिए। दाखिल करने के बाद, न्यायालय न्यायिक पृथक्करण का आदेश देने से पहले ऐसी याचिका और प्रस्तुत साक्ष्य पर विचार करेगा। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत शून्य और शून्यकरणीय विवाह

शून्य विवाह

जैसा कि हमने देखा है, एचएमए, 1955 की धारा 11, धारा 5(i),(iv) और (v) के तहत परिस्थितियों को प्रदान करती है जिसमें विवाह को शून्य माना जाता है, अर्थात यह कानून में अस्तित्व में नहीं था। इन आधारों को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उन परिस्थितियों को रेखांकित करते हैं जहां विवाह शुरू से ही कानूनी रूप से अवैध होता है। 

विवाह को शून्य घोषित करने के आधार

द्विविवाह

धारा 5(i) में कहा गया है कि यदि विवाह के समय किसी भी पक्ष का कोई अन्य जीवित जीवनसाथी हो तो विवाह शून्य हो जाता है। द्विविवाह से तात्पर्य उस स्थिति से है जब पहला विवाह अभी भी वैध और कानूनी है, तथा यह भारत में एक अपराध है। इस धारा का उद्देश्य हिंदू विवाहों में एकपत्नीत्व की रक्षा करना तथा एकाधिक वैध विवाहों से जुड़ी कानूनी जटिलताओं और अनुचितताओं से बचना है। 

निषिद्ध संबंध

धारा 5(iv) के अनुसार विवाह शून्य और अमान्य है यदि ऐसा विवाह अधिनियम की धारा 3(g) में परिभाषित निषिद्ध रिश्ते के अंतर्गत है। निकट संबंधियों जैसे पूर्वजों और वंशजों, भाई-बहनों, चाचा-भतीजियों, चाची-भतीजों के साथ अंतर्जातीय विवाह करना अवैध है। इन संबंधों को अनाचार कहा जाता है और हिंदू समाज में व्यवस्था और नैतिकता को बनाए रखने के लिए इन्हें अपनाने की अनुमति नहीं है। 

सपिंड संबंध

धारा 5(v) के अनुसार विवाह को शून्य और अमान्य माना जाएगा यदि विवाह के पक्षकार अधिनियम की धारा 3(f) के अंतर्गत दिए गए सपिंड रिश्ते के अंतर्गत आते हैं। सपिंड संबंधों से तात्पर्य रक्त संबंध से है, जिसमें पिता की ओर से पांच पीढ़ियों तक और माता की ओर से तीन पीढ़ियों तक रक्त संबंधों की डिग्री शामिल होती है। इन प्रतिबंधित डिग्री के भीतर के विवाहों को अमान्य माना जाता है, ताकि रक्त-संबंधी विवाहों को हतोत्साहित किया जा सके, जो आनुवंशिक समस्याओं या सामाजिक मुद्दों का कारण बनते हैं। 

शून्य विवाह का प्रभाव

जब किसी विवाह को एचएमए, 1955 की धारा 11 के अंतर्गत शून्य घोषित किया जाता है, तो इसके कई महत्वपूर्ण प्रभाव होते हैं:

विवाह की अमान्यता

अमान्य विवाह वह है जो प्रारम्भ से ही अमान्य है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि विवाह प्रारम्भ से ही कानूनी रूप से वैध नहीं था। यह माना जाता है कि दोनों पक्षों के बीच कभी भी वैधानिक विवाह नहीं हुआ, इसलिए उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता हैं। 

कानूनी परिणाम

इसमें कोई भी वैवाहिक अधिकार या कर्तव्य नहीं है जिसका कोई भी पक्ष दावा कर सके, क्योंकि विवाह को शुरू से ही शून्य माना जाता है। 

बच्चों की स्थिति

भारत में शून्य विवाह से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाता है। उन्हें वैध विवाह से उत्पन्न बच्चों को मिलने वाली विरासत, उत्तराधिकार और अन्य विशेषाधिकारों पर कानूनी मान्यता और दावा प्राप्त है। 

तलाक की कोई जरूरत नहीं

यह ध्यान देने योग्य बात है कि वैध विवाहों के लिए तलाक के माध्यम से विघटन की आवश्यकता होती है, जबकि शून्य विवाह के लिए कानूनी अलगाव अनिवार्य नहीं है। दोनों पक्ष अदालत में जाकर यह निर्णय ले सकते हैं कि विवाह शून्य है और इसलिए औपचारिक तलाक की आवश्यकता नहीं है। 

शून्यकरणीय विवाह

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 के अनुसार, ऐसे आधार हैं जिनके आधार पर किसी विवाह को शून्यकरणीय घोषित किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि विवाह आरम्भ में वैध है, लेकिन पति या पत्नी में से किसी एक के कहने पर न्यायालय में याचिका दायर करके उसे भंग किया जा सकता है। शून्यकरणीय विवाह वह विवाह है जिसे पक्षकार कानूनी रूप से संपन्न कर सकते हैं, जब तक कि किसी एक पक्ष ने विवाह को रद्द करने के लिए आवेदन न कर दिया हो और तलाक का आदेश प्राप्त न कर लिया हो। 

दूसरी ओर, शून्यकरणीय विवाहों को तब तक विवाह के रूप में मान्यता दी जाती है जब तक कि कानूनी कार्रवाई के माध्यम से उन्हें रद्द करने की मांग न की जाए। यह प्रावधान किसी व्यक्ति को गंभीर कठिनाइयों के कारण विवाह को रद्द करने में सक्षम बनाता है, जो सहमति और क्षमता की वैधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, इस प्रकार यह विवाह से उत्पन्न बच्चों की वैधता से समझौता किए बिना विवाह को रद्द करने के लिए कानूनी उपाय प्रदान करता है। 

शून्यकरणीय विवाह के आधार

शून्य विवाहों के विपरीत, शून्यकरणीय विवाह तकनीकी रूप से तब तक वैध होते हैं जब तक कि न्यायालय उन्हें शून्य न कर दे। धारा 12(1) में निर्दिष्ट आधार नीचे दिए गए हैं:

नपुंसकता के कारण संभोग न हो पाना

यदि कोई भी पक्ष नपुंसकता के कारण संभोग करने में असफल रहा है तो इसे विवाह को रद्द करने का कारण माना जा सकता है। साथ ही, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नपुंसकता विवाह के समय ही होनी चाहिए और इसका इलाज नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में, नपुंसकता शब्द का प्रयोग इसके कानूनी अर्थ में किया जाता है, जिसका अर्थ है कि भागीदारों में से एक शारीरिक रूप से संभोग के माध्यम से विवाह को पूरा करने में असमर्थ है। यह आधार इस तथ्य को स्वीकार करता है कि संभोग विवाह के महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है और इस पहलू का अभाव विवाह को रद्द करने का आधार हो सकता है। 

याचिकाकर्ता को नपुंसकता का मामला साबित करना होगा, यदि यह साबित हो जाता है तो अदालत विवाह को अमान्य घोषित कर सकती है, जिसका अर्थ यह होगा कि विवाह कभी वैध नहीं था। वे व्यक्ति को एक अवसर देते हैं कि वह ऐसे विवाह में न बंधे जिसमें एक या दूसरी आवश्यकता का अभाव हो। 

मानसिक विकार

यदि विवाह का कोई भी पक्ष मानसिक रोग से इस हद तक प्रभावित हो कि वह यौन संबंध बनाने और संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो, तो विवाह को रद्द किया जा सकता है। एचएमए, 1955 विशेष रूप से गंभीर, अक्षम करने वाली तथा लगातार मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों को विवाह करने से रोकता है, क्योंकि वे विवाह और संतानोत्पत्ति के लिए अनुपयुक्त होंगे। इसके अतिरिक्त, इसमें यह भी कहा गया है कि व्यक्ति मानसिक रोग के कारण कानूनी अनुमति देने में असमर्थ होना चाहिए। हालांकि, जो विवाह आदर्श से हटकर होता है, उसे केवल दूसरे पक्ष के अनुरोध पर ही रद्द किया जा सकता है, जिसे विवाह को रद्द करने के लिए याचिका दायर करनी होगी तथा दूसरे व्यक्ति की मानसिक स्थिति को स्थापित करने का भार भी उठाना होगा। 

बलपूर्वक या धोखाधड़ी से सहमति

इसका अर्थ यह है कि यदि किसी भी पक्ष ने जबरदस्ती, धोखाधड़ी के कारण विवाह के लिए वैध सहमति नहीं दी है, या विवाह करते समय उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, तो विवाह को रद्द किया जा सकता है। ऐसे मामलों में जहां विवाह के लिए सहमति बलपूर्वक, प्रभावित या धोखाधड़ी से ली गई हो, विवाह को शून्यकरणीय घोषित किया जा सकता है। धारा 5(i)(c) के अनुसार, विवाह शून्यकरणीय है जहां याचिकाकर्ता की सहमति समारोह की प्रकृति या प्रतिवादी के साथ विवाह के किसी अन्य भाग के संबंध में बल या धोखाधड़ी से प्राप्त की गई थी। 

बल प्रयोग में बल प्रयोग की धमकी और बल प्रयोग दोनों शामिल हैं। धोखाधड़ी का मुख्य तत्व छल है। प्रासंगिक सूचना से तात्पर्य उन सभी तथ्यों और परिस्थितियों से है जो किसी पक्ष को विवाह के लिए सहमति देने या न देने के लिए प्रभावित या राजी कर सकती हैं। इसलिए, साधारण झूठ बोलना धोखाधड़ी नहीं है। इसी तरह, सभी झूठ या छल-कपट प्रकृति में धोखाधड़ी नहीं होते हैं। इसलिए, धारा 12 के अनुसार विवाह को रद्द करने का आधार केवल इस तथ्य को छिपाने तक सीमित नहीं है कि पति का किसी अन्य महिला से विवाह हो चुका है। 

पूर्व गर्भावस्था

यदि विवाह के समय पत्नी किसी अन्य पुरुष के बच्चे से गर्भवती थी और पुरुष को इसकी जानकारी नहीं थी, तो इसे विवाह को रद्द करने का कारण माना जा सकता है। एचएमए, 1955 के अनुसार, विवाह के समय किसी अन्य पुरुष द्वारा गर्भधारण करना विवाह को रद्द करने का वैध आधार माना जाता है। यदि विवाह के समय पत्नी किसी अन्य पुरुष से गर्भवती थी और पति को इसकी जानकारी नहीं थी, तो वह विवाह को रद्द करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। इससे यह गारंटी मिलती है कि पति द्वारा विवाह के लिए सहमति किसी धोखाधड़ी से प्रेरित होकर नहीं ली गई थी। 

इन आधारों का उद्देश्य उन व्यक्तियों के अधिकारों को सुरक्षित करना है जो विवाह करने के लिए सहमत होते हैं तथा यह गारंटी देना है कि विवाह स्वैच्छिक है तथा सह-पक्षों के लिए उपयुक्त है। दूसरी ओर, शून्यकरणीय विवाह तब तक वैध रहते हैं जब तक कि पीड़ित पक्ष के आवेदन के माध्यम से न्यायालय द्वारा उन्हें शून्य घोषित नहीं कर दिया जाता है। यह आवश्यक है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह को रद्द करने के संबंध में कानूनी समाधान चाहने वाले लोग इन आधारों को समझते है।

एचएमए, 1955 की धारा 12(2) उन परिस्थितियों को रेखांकित करती है जिनके तहत अदालत किसी विवाह को रद्द करने की किसी भी याचिका पर विचार नहीं करेगी। सबसे पहले, उपधारा (1) के खंड (c) में निर्दिष्ट मामलों में, दबाव की समाप्ति या धोखाधड़ी का पता चलने के एक वर्ष की समाप्ति के बाद या यदि याचिकाकर्ता दबाव की समाप्ति या धोखाधड़ी का पता चलने के बाद क्रमशः अपनी इच्छा के विरुद्ध अपने पति या पत्नी के साथ सहवास करता है, तो अदालत में कोई याचिका प्रस्तुत नहीं की जा सकती है। 

दूसरा, उपधारा (1) के खंड (d) में सूचीबद्ध कारणों से, याचिका पर तब तक विचार नहीं किया जाएगा जब तक कि अदालत को यह विश्वास न हो जाए कि याचिकाकर्ता को विवाह के समय याचिका में दिए गए तथ्यों की कोई जानकारी नहीं थी, अधिनियम से पहले हुए विवाहों के लिए कार्यवाही अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के भीतर शुरू हो गई थी और अधिनियम के बाद हुए विवाहों के लिए विवाह की तारीख से एक वर्ष के भीतर कार्यवाही शुरू हो गई थी और पति-पत्नी के बीच कोई सहवास नहीं हुआ है। 

शून्यकरणीय विवाह का प्रभाव

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 के अंतर्गत शून्यकरणीय विवाह के मामले में, विवाह को प्रारम्भ में वैध माना जाता है, लेकिन किसी भी पक्ष के आवेदन पर न्यायालय द्वारा इसे विघटित किया जा सकता है। शून्यकरणीय विवाह के प्रभाव इस प्रकार हैं: 

सशर्त वैधता

जब तक विवाह न्यायालय में विघटित नहीं हो जाता, तब तक विवाह वैध बना रहता है। इसका अर्थ यह है कि विवाह रद्द होने तक, दोनों पक्ष कानूनी रूप से विवाहित होते हैं और उन्हें कुछ वैवाहिक लाभ/वैवाहिक जिम्मेदारियां भी प्राप्त हो सकती हैं। 

निरस्तीकरण प्रक्रिया

शून्यकरणीय विवाह को रद्द करने के प्रयोजन के लिए, पक्षों में से किसी एक को धारा 12 में निम्नलिखित आधारों में से किसी एक का उल्लेख करते हुए न्यायालय में लिखित रूप से याचिका दायर करनी होगी। इसके बाद अदालत साक्ष्यों और परिस्थितियों का पता लगाकर यह तय करेगी कि विवाह को रद्द किया जाए या नहीं। 

कानूनी परिणाम

जब कोई विवाह रद्द कर दिया जाता है तो ऐसा लगता है जैसे कानून की नजर में वह विवाह कभी हुआ ही नहीं था। इसका तात्पर्य यह है कि विवाह से जुड़े सभी विशेषाधिकार या जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती हैं, जैसे संपत्ति का स्वामित्व, संपत्ति का उत्तराधिकार या जीवनसाथी की स्थिति से है। 

तलाक की कोई जरूरत नहीं

दरअसल, जहां तलाक की कार्यवाही में एक बार वैध विवाह को समाप्त करना शामिल होता है, वहीं शून्यकरणीय विवाह को निरस्त करना वास्तव में उस चीज को समाप्त करना है जो कानूनी रूप से कभी अस्तित्व में ही नहीं थी। इसलिए, वैवाहिक बंधन को तोड़ने के लिए तलाक की प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता नहीं है। 

इन प्रभावों को समझना उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो ऐसे विवाह में हैं, जो एचएमए में परिभाषित शून्यकरणीय विवाह की श्रेणी में आते हैं। यह विवाह में अधिकारों के कानूनी अनुपालन और संरक्षण को बढ़ाने के लिए धारा 12 के तहत दिए गए आधारों के आधार पर विवाह को रद्द करने में सक्षम कानूनी प्रक्रियाओं को सामने लाता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक

तलाक एक ऐसी अवधारणा है जिसे आज की दुनिया में किसी प्रस्तावना की आवश्यकता नहीं है। यह विवाह के कड़वे और बदसूरत विघटन को संदर्भित करता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यद्यपि तलाक को एक कानूनी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है जिसके द्वारा विवाह को विघटित या समाप्त किया जाता है, परन्तु इस प्रक्रिया में इससे कहीं अधिक शामिल है। 

आजकल यह सुनना आम बात है कि कई जोड़े तलाक लेने का निर्णय ले लेते हैं, और यह आश्चर्य की बात है कि उनमें से अधिकांश लोग ऐसा बहुत जल्दी कर लेते हैं। प्रारंभिक वैदिक हिंदू सभ्यता में विवाह को दो व्यक्तियों के बीच अनुबंध से अधिक एक समारोह माना जाता था। इसे इतना नैतिक माना जाता था, या ऐसा माना जाता था मानो यह देवताओं से निकला हो, कि इसका एक निश्चित अंत और आरंभ हो। इसलिए, भारत में प्राचीन हिंदू कानून द्वारा विवाह में साझेदारों के बीच तलाक या अलगाव की अनुमति नहीं थी। 

तलाक के प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम के माध्यम से प्रस्तुत किए गए थे, जिसे वर्ष 1955 में पारित किया गया था और यह पहली बार था कि हिंदू कानून ने तलाक को मान्यता दी थी। इस मामले में, कानून बनने से पहले तलाक से संबंधित कोई कानून नहीं था। यह उन परिस्थितियों को परिभाषित करता है जिनके तहत कोई भी पति या पत्नी आधार साबित करने पर विवाह को अमान्य घोषित करने के लिए आवेदन कर सकता है। 

हिंदू कानून किसी भी व्यक्ति को तलाक लेने की अनुमति नहीं देता है जब तक कि अदालत इसकी अनुमति न दे। 1955 के एचएमए की धारा 10 न्यायिक पृथक्करण के लिए आधार प्रदान करती है, तथा धारा 13 तलाक के लिए आधार प्रदान करती है। यह पाया गया कि कुछ विवाह धारा 11 और 12 के अंतर्गत अमान्य एवं निरस्तीकरणीय हैं, क्योंकि विचाराधीन विवाह इस अधिनियम के अंतर्गत विवाह की कानूनी वैधता के लिए निर्धारित अपेक्षाओं को पूरा नहीं करते थे या उनमें धारा 12 में निर्धारित दोष विद्यमान थे। 

भारत में, 1955 के एचएमए में निर्दिष्ट किया गया है कि धारा 13 में तलाक के लिए आठ आधार उपलब्ध हैं, जो दोष-आधारित हैं। उनमें से कुछ में व्यभिचार, परित्याग, क्रूरता, पागलपन, यौन रोग, और धर्म परिवर्तन या दुनिया को अस्वीकार करना शामिल हैं जो अपराध सिद्धांत पर आधारित हैं और तलाक के दोष के आधार माने जाते हैं। तलाक प्राप्त करने के लिए, किसी भी पक्ष को विवाह भंग के लिए कम से कम एक कानूनी आधार साबित करना होगा। 

दोष के आधार पर तलाक धारा 13(1) के तहत निहित एक अन्य वैवाहिक राहत है। यदि विपक्षी पक्ष दूसरे पक्ष की ओर से किसी भी प्रकार का कदाचार साबित कर सके तो वह विवाह विच्छेद की मांग कर सकता है। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम को 1964 में धारा 13(1A) जोड़कर संशोधित किया गया, जो पति और पत्नी दोनों को तलाक का अवसर प्रदान करता है। विवाह से संबंधित कानून में 1976 में संशोधन किया गया तथा न्यायिक पृथक्करण और तलाक के लिए निर्दिष्ट आधारों को एक दूसरे के समान बना दिया गया था। 

इसके अलावा, विवाह कानून संशोधन अधिनियम, 1976 में शामिल धारा 13B में प्रावधान है कि विवाह के पक्षकार आपसी सहमति के आधार पर तलाक की मांग कर सकते हैं, जिसका अर्थ है कि दम्पति धारा 13 के तहत किसी भी पक्ष की गलती साबित किए बिना तलाक की मांग कर सकते हैं। इसलिए यह जानना प्रासंगिक है कि विवाह और तलाक पर कानून इन दो कानूनी प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है। इस प्रकार, विवाह के अपूरणीय विघटन की अवधारणा के आने से तलाक कानून में इसकी आवश्यकता और महत्व पर प्रश्न उठते हैं। 

तलाक के आधार

न्यायालय ने राजेंद्र भारद्वाज बनाम श्रीमती अनीता शर्मा (1992) में कहा कि वैवाहिक संबंध (विवाह) को 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल नहीं किए गए किसी कारण से समाप्त या विघटित नहीं किया जा सकता हैं। एचएमए, 1955 के अंतर्गत तलाक के आधार नीचे दिए गए हैं: 

व्यभिचार

एचएमए, 1955 धारा 13(1)(i) के तहत व्यभिचार को तलाक के आधार के रूप में मान्यता देता है। यदि पति या पत्नी स्वेच्छा से अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ अंतरंग संबंध रखते हैं, तो पीड़ित जीवनसाथी व्यभिचार के आधार पर कानूनी रूप से तलाक की मांग कर सकता है। याचिकाकर्ता को स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करना होगा कि प्रतिवादी व्यभिचारी संबंध में संलिप्त रहे हैं। व्यभिचार विवाह की पवित्रता का उल्लंघन करता है जिसके तहत दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति वफादार रहने का वादा करते हैं। यह आधार वैवाहिक संबंधों में वफादारी और निष्ठा के महत्व पर जोर देता है, तथा ऐसे विश्वासघात से प्रभावित लोगों के लिए कानूनी उपाय प्रदान करता है। 

क्रूरता

बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार, क्रूरता की कानूनी परिभाषा समय के साथ और समाज दर समाज बदलती रही है। क्रूरता एचएमए की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का एक महत्वपूर्ण आधार है, जिसमें अन्य आधार भी सूचीबद्ध हैं। क्रूरता विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में सूचीबद्ध तलाक के 12 आधारों में से एक है, तथा मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 में मुस्लिम पुरुष से विवाहित महिला के लिए तलाक प्राप्त करने के लिए सूचीबद्ध आठ आधारों में से एक है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने रवि कुमार बनाम जुल्मीदेवी (2005) मामले में कहा कि क्रूरता की कोई परिभाषा नहीं है और इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है। यह असीमित विविधता में आ सकता है, ठीक वैसे ही जैसे वैवाहिक स्थितियों में होता है। दूसरे शब्दों में, क्रूरता की परिभाषा अत्यधिक व्यक्तिगत है। यह परिवेश, समय तथा लोगों की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर बदल सकता है। क्रूरता कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, इसलिए इसे परिभाषित करने के लिए कोई सीधा-सादा फॉर्मूला नहीं हो सकता है। आज जो क्रूरता है, उसे कुछ समय बाद क्रूरता नहीं माना जा सकता है। यह एक व्यक्तिपरक धारणा है और प्रत्येक व्यक्ति की सहनशीलता के स्तर पर निर्भर करती है। 

परित्याग

1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 की उपधारा (1)(ib) के अनुसार, परित्याग को एक पति या पत्नी द्वारा दूसरे की अनुमति के बिना और बिना किसी उचित कारण के जानबूझकर स्थायी रूप से त्यागने और परित्यागने के रूप में परिभाषित किया गया है। यह विवाह की जिम्मेदारियों को पूरी तरह से अस्वीकार करना है। परित्याग का अपराध करने के लिए, परित्याग करने वाले पति या पत्नी को दो आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी: 

  1. पृथक्करण का तथ्य; और,
  2. सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा (एनिमस डेसेरेन्डी)।

धर्मांतरण

1955 के हिंदू धर्म अधिनियम के तहत धर्मांतरण का तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति ने कोई अन्य प्रमुख धर्म अपना लिया है, जिसे हिंदू धर्म नहीं माना जा सकता है। अधिनियम की धारा 13(1)(ii) में सूचीबद्ध आधारों में से किसी एक पर आधारित तलाक का आदेश ही कानूनी रूप से बाध्यकारी विवाह को भंग कर सकता है, चाहे यह अधिनियम के कार्यान्वयन से पहले या बाद में किया गया हो। धारा 13 (1) (ii) के तहत यह आधार है कि दूसरा व्यक्ति “दूसरे धर्म में धर्मांतरण करके हिंदू नहीं रह गया है”। अधिनियम के अनुसार संपन्न विवाह को अधिनियम की धारा 13 के अंतर्गत स्वीकृत आधारों के अलावा अन्य किसी आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है।

पागलपन

श्रीमती सोना बनाम करमबीर (1995) मामले में डॉक्टरों के एक बोर्ड ने कहा कि पत्नी को मध्यम स्तर की मानसिक विकलांगता थी, उसकी मानसिक अस्वस्थता लाइलाज थी, वह अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में असमर्थ थी और उसने सवालों के पूरी तरह से झूठे और निरर्थक जवाब दिए थे। उनका मामला 1955 के एचएमए की धारा 13 (1)(iii) के अंतर्गत आता पाया गया है। 

कुष्ठ रोग

1955 के एचएमए के अनुसार, एक पति या पत्नी इस आधार पर तलाक की मांग कर सकता है कि दूसरा “घातक और लाइलाज” कुष्ठ रोग से पीड़ित है। “विषाक्त एवं असाध्य कुष्ठ रोग” की अवधि को एचएमए, 1955 में 1976 के संशोधन के माध्यम से हटा दिया गया है। 

इस उप-धारा को व्यक्तिगत कानून (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा हटा दिया गया है, जो कुष्ठ रोग के उपचार और प्रबंधन में सामाजिक दृष्टिकोण और चिकित्सा प्रगति में परिवर्तन को दर्शाता है। 

यौन रोग

यौन रोग वे रोग हैं जो यौन संपर्क के माध्यम से सबसे आसानी से फैलते हैं, जिसमें गुदा, मुख और योनि संभोग शामिल हैं। इसलिए, अधिकांश भारतीय समूहों के मौजूदा वैवाहिक कानून और धारा 13(1)(v) के तहत हिंदू विवाह अधिनियम यौन रोग को तलाक और न्यायिक अलगाव के आधार के रूप में मान्यता देता है। इसमें कई संक्रामक रोग शामिल हैं जो मुख्य रूप से यौन संपर्क के माध्यम से फैलते हैं। 

संसार का त्याग

धारा 13(1)(vi) के अनुसार, यदि एक पति या पत्नी किसी धार्मिक संप्रदाय में शामिल हो जाता है और संसार त्याग देता है, तो दूसरा पति या पत्नी तलाक के लिए याचिका प्रस्तुत कर सकता है। इस आधार पर तलाक के लिए आवेदन करने हेतु निम्नलिखित दो आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिए: 

  1. प्रतिवादी ने सामान्यतः जीवन (संन्यास) त्याग दिया होगा,
  2. वह अवश्य ही किसी धार्मिक संगठन में शामिल हो गया होगा। 

सीतल दास बनाम संत राम एवं अन्य (1954) के मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार, किसी व्यक्ति को धार्मिक आदेश में शामिल माना जाता है, जब वह अपने धर्म के अनुसार कुछ अनुष्ठानों और समारोहों में भाग लेता है। 

मृत्यु की धारणा

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(vii) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के बारे में कम से कम सात वर्षों तक जीवित होने की सूचना नहीं दी जाती है, तो उसे मृत मान लिया जाता है। सभी वैवाहिक कानूनों के तहत, यह दर्शाना याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी है कि प्रतिवादी का ठिकाना अपेक्षित समय से ज्ञात नहीं है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 107 और 108 की मृत्यु की धारणा इस खंड के लिए आधार का काम करती है। निरमू बनाम निक्करम (1968) में यह निर्णय लिया गया था कि यदि कोई व्यक्ति अपने पति की मृत्यु के बाद तलाक की डिक्री प्राप्त किए बिना किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर लेता है, तो उसका जीवनसाथी बाद में दूसरे विवाह की वैधता को चुनौती दे सकता है। 

तलाक के लिए पत्नी के विशेष आधार

पति और पत्नी दोनों के लिए उपलब्ध आधारों के अलावा, हिंदू महिला को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक या न्यायिक पृथक्करण के लिए कुछ अतिरिक्त आधार प्रदान किए गए हैं। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(2) के तहत पहली बार पत्नियों को तलाक के लिए दो विशेष आधार प्रदान किए गए थे। विवाह कानून संशोधन अधिनियम, 1976 के तहत पत्नियों को दोष देने के दो नए कारण प्राप्त हुए थे। इसलिए, केवल एक हिंदू महिला ही चार विशेष कारणों में से किसी पर विवाह -भंग के लिए मुकदमा दायर कर सकती है। 

  1. अधिनियम-पूर्व बहुविवाह।
  2. बलात्कार, गुदामैथुन या पशुगमन।
  3. भरण-पोषण के आदेश/आदेश के बाद सहवास पुनः शुरू न करना, तथा
  4. विवाह का खंडन

हिंदू कानून के तहत विवाह का अपरिवर्तनीय विघटन

जैसा कि कानूनी शब्दों में वर्णित है, जब दो विवाहित लोगों में एक-दूसरे के प्रति स्नेह नहीं रह जाता, वे एक-दूसरे के प्रति कोई अच्छी या बुरी भावना नहीं रख सकते; दूसरे शब्दों में, विवाह पूरी तरह से बिखर चुका है। अब वहां स्वीकृति, प्रेम, चिंता और सम्मान का कोई चिह्न नहीं बचा है। जब दोनों साथी साथ रहने की इच्छा नहीं रखते, उनके बीच कोई संबंध नहीं रह जाता, तथा उनके साथ वापस आने की कोई संभावना नहीं रह जाती, तो यह कहा जा सकता है कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है। हालाँकि, यह उल्लेखनीय तथ्य है कि हिंदू धर्म ने 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने तक तलाक की अवधारणा को कभी स्वीकार नहीं किया था। 

आज, हर विवाहित व्यक्ति के पास स्थापित आधारों में से किसी एक पर तलाक लेने की कानूनी क्षमता है। तलाक के विभिन्न कारण हैं, दोष-आधारित, दोष-रहित और आपसी सहमति। फिर भी, विचाराधीन मामला एक पक्ष द्वारा विवाह को पूर्णतः और अपूरणीय क्षति पहुंचाकर विवाह विच्छेद का है, जो कि पुनः दोष-रहित आधार पर है। यह पहलू न्यायिक पृथक्करण और वैवाहिक संबंधों की गैर-पुनर्स्थापना के लिए एचएमए की धारा 13(1A) के तहत प्रदान किया गया है। हालाँकि, इसे अभी भी तलाक के आधार के रूप में नहीं गिना गया है। 

न्यायालय ने संघमित्रा घोष बनाम काजल कुमार घोष (2007) में कहा, “हम पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि स्वभाव की असंगति के कारण पक्षों के बीच विवाह पूरी तरह से टूट चुका है।” वास्तव में, विवाह का भावनात्मक आधार पूरी तरह से खत्म हो चुका है। क्योंकि विवाह को बचाने की कोई संभावना नहीं है और पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध सुधार से परे है, इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना और जो पहले से ही वास्तव में अमान्य है उसे विधिवत् अमान्य घोषित करना सभी के हित में है। 

नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली (2006) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने विधानमंडल से आग्रह किया कि वह विवाह के अपूरणीय विघटन को एचएमए के तहत तलाक के आधार के रूप में शामिल करे। इसमें कहा गया है, “निस्संदेह, यह न्यायालय और सभी संबंधित पक्षों का दायित्व है कि विवाह की स्थिति को, जहां तक संभव हो, जब तक संभव हो, और जब भी संभव हो, बनाए रखा जाना चाहिए, लेकिन जब विवाह पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो उस स्थिति में, इसे बचाने की कोशिश करने से कुछ हासिल नहीं होता हैवर्तमान स्थिति में विवाह का भावनात्मक आधार पूरी तरह से लुप्त हो चुका है। यह विवाह सुधार से परे है, और यह सभी के और जनता के हित में है कि इस सत्य को स्वीकार किया जाए तथा जो वास्तव में समाप्त हो चुका है उसे विधिवत समाप्त घोषित कर दिया जाए। नकली विवाह को बनाए रखना अनैतिक व्यवहार को बढ़ावा देता है और विवाह अनुबंध को समाप्त करने से भी अधिक सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचा सकता है।” 

तलाक के मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग

संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय को यह सुनिश्चित करने का अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है कि न्याय हो, तथा किसी भी न्यायालय को अधिकार क्षेत्र या कानूनी प्राधिकार के अभाव के कारण अपने समक्ष आने वाले पक्षों को न्याय प्रदान करने से रोका नहीं जा सकता है। 

कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निहित अधिकार का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए, मनीष गोयल बनाम रोहिणी गोयल (2010) में, न्यायालय ने घोषित किया कि “विवाह पूरी तरह से अव्यवहारिक है, भावनात्मक रूप से मृत है, उसे बचाया नहीं जा सकता, तथा यह पूरी तरह से टूट चुका है, भले ही मामले के तथ्य कानूनी आधार प्रदान न करते हों, जिसके आधार पर तलाक दिया जा सके।” 

ऋषिकेश शर्मा बनाम सरोज शर्मा (2006) में न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी, जो विवाहित जोड़े हैं, को साथ रहने के लिए बाध्य करने का कोई मतलब नहीं है, यदि वे 17 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे हैं। 

सुखेंदु दास बनाम रीता मुखर्जी (2017) में, पति के तलाक के आवेदन को खारिज कर दिया गया क्योंकि वह अपनी पत्नी की क्रूरता साबित करने में विफल रहा हैं। अपील को खारिज करने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि विवाह का पूरी तरह टूट जाना, विवाह भंग का आधार नहीं हो सकता हैं। लिखित बयान दाखिल करने के बाद पत्नी कभी भी निचली अदालत के समक्ष पेश नहीं हुई हैं। वह उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में भी अनुपस्थित रहीं हैं। न्यायालय ने उसके उपरोक्त व्यवहार पर गौर किया और कहा कि इससे पता चलता है कि वह अपने पति के साथ सहवास में रुचि नहीं रखती थी। समर घोष बनाम जया घोष (2007) का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि तलाक की प्रक्रिया में भाग लेने से इनकार करना और अपीलकर्ता को मृत विवाह में बने रहने के लिए मजबूर करना, दोनों ही मानसिक क्रूरता के कृत्य माने जाएंगे। 

अदालत ने आगे कहा कि विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन के आधार पर तलाक का आदेश देने का अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है, तथा किसी अन्य अदालत के पास यह अधिकार नहीं है। उपरोक्त निर्णयों से यह स्पष्ट है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय और भारत के विधि आयोग ने समय-समय पर विधानमंडल को 1955 के एचएमए में परिवर्तन करने की सलाह दी है, ताकि विवाह के पूरी तरह टूट जाने को भी तलाक के कारण के रूप में शामिल किया जा सके। 

28 सितंबर 2022 से, न्यायमूर्ति एस.के. कौल की अध्यक्षता वाली 5 न्यायाधीशों की पीठ ने न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, ए.एस. ओका, विक्रम नाथ और जे.के. माहेश्वरी के साथ शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2022) की सुनवाई शुरू की, जहां भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को भंग करने के अपने अधिकार के दायरे का मूल्यांकन करने के लिए इसकी अनुमति का अनुरोध किया गया है। मामला अभी भी जारी है। 

तलाक में वैकल्पिक राहत

एचएमए, 1955 की धारा 13A तलाक के मामलों में वैकल्पिक राहत प्रदान करती है। जब किसी पक्ष ने धारा 13 में उल्लिखित किसी भी आधार पर तलाक के लिए आवेदन किया है और अदालत यह निर्धारित करती है कि धारा 13 (ii), (vi), (vii) के तहत उल्लिखित मामलों को छोड़कर तलाक के बजाय न्यायिक पृथक्करण प्रदान करना पक्षों के सर्वोत्तम हित में है। यह प्रावधान न्यायालय के लिए याचिकाकर्ता को कुछ प्रकार का निवारण प्रदान करना संभव बनाता है, यहां तक कि उन परिस्थितियों में भी जहां न्यायालय के पास विवाह को पूर्ण रूप से विघटित करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं होंगे, क्योंकि यह न्यायिक पृथक्करण की अनुमति देता है, जो एक कानूनी प्रक्रिया है जो विवाहित रहते हुए पक्षों को अलग करती है। 

न्यायिक पृथक्करण, पक्षकारों को विवाह को विघटित किए बिना बच्चों के भरण-पोषण और अभिरक्षा के संबंध में अपनी आवश्यकताओं और स्थिति को सुलझाने की अनुमति देता है। वैवाहिक विवादों के मामले में यह धारा कम कठोर प्रतीत होती है, क्योंकि यह स्वीकार करती है कि कुछ मामलों में, दम्पति के लिए अलग हो जाना, लेकिन कानूनी रूप से विवाहित बने रहना सर्वोत्तम होगा। 

आपसी सहमति से तलाक

एचएमए 1955 में पारित किया गया था और 1976 में इसमें संशोधन किया गया था, संशोधन के तहत धारा 13B को शामिल किया गया जो आपसी सहमति से तलाक का आधार था। धारा 13B(1) के अनुसार, दोनों पक्षों के लिए तलाक के लिए एक साथ याचिका प्रस्तुत करना अनिवार्य है। जैसा कि धारा 13B(2) के मामले में है, जिसमें प्रावधान है कि दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करना होगा। 

हालांकि, 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उक्त अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका को पक्षों की आपसी सहमति से तलाक की याचिका में परिवर्तित किया जा सकता है। यहां तक कि अपीलीय स्तर पर भी, न्यायालय तलाक देने वाले पक्षों को धारा 13 या किसी अन्य धारा के तहत राहत के लिए याचिका को संशोधित करने की अनुमति दे सकता है, ताकि इसे आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका में बदला जा सके। याचिका धर्मांतरण के इन मामलों में पद्मिनी बनाम हेमंत सिंह (1993) और धीरज कुमार बनाम पंजाब राज्य (2018) शामिल हैं। इन मामलों में, अदालत ने माना कि दोनों पक्षों ने बाद में आपसी सहमति से तलाक लेने पर सहमति जताई थी। अदालत ने मूल धारा 13 याचिका को धारा 13B याचिका में बदलने की अनुमति दे दी। निर्णय में आपसी सहमति की आवश्यकता तथा दोनों पति-पत्नी की सौहार्दपूर्ण तरीके से विवाह समाप्त करने की इच्छा पर बल दिया गया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा परिवर्तन, 1976 के संशोधन की भावना के अनुरूप, सहज और कम विवादास्पद पृथक्करण के लिए स्वीकार्य है। 

अधिनियम के तहत तलाक से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

धारा 14

एचएमए, 1955 की धारा 14 तलाक के लिए आवेदन करने की सीमाओं से संबंधित है। यह धारा तलाक के लिए आवेदन करने की संख्या को सीमित करती है तथा विवाह को बचाए रखने की आवश्यकता पर बल देती है। इसमें प्रावधान है कि कोई भी पक्षकार कम से कम एक वर्ष तक विवाहित रहे बिना तलाक के लिए याचिका दायर नहीं कर सकता है। इस प्रावधान का उद्देश्य दम्पति को विवाह को स्थायी रूप से समाप्त करने का निर्णय लेने से पहले, मेल-मिलाप करने तथा अपनी वैवाहिक समस्याओं को सुलझाने का पर्याप्त अवसर प्रदान करना है। इस शर्त के पीछे का कारण विवाह संस्था की रक्षा करना और जोड़ों को वैवाहिक समस्याओं को सुलझाने के सभी संभव तरीकों को तलाशने के लिए प्रोत्साहित करना है। 

धारा 14 उन लोगों द्वारा तलाक याचिका के अनुचित प्रयोग को रोकने से संबंधित है जो जल्दबाजी में अपना विवाह समाप्त करना चाहते हैं। तलाक के लिए आवेदन करने से पहले वैवाहिक जीवन की न्यूनतम अवधि तय करने के पीछे मुख्य रूप से विवाह में स्थिरता सुनिश्चित करने और लोगों को तुच्छ या जल्दबाजी के आधार पर तलाक के लिए आवेदन करने से हतोत्साहित करने की आवश्यकता पर केंद्रित है। यह धारा इस बात पर प्रकाश डालती है कि अधिनियम का एक व्यापक लक्ष्य विवाह संस्था की सुरक्षा करना तथा पारिवारिक स्थिरता को बढ़ावा देना है, तथा यह स्पष्ट करता है कि तलाक की मांग आकस्मिक रूप से नहीं की जा सकती, बल्कि अंतिम उपाय के रूप में की जा सकती है, जब विवाह को ठीक करना संभव न हो। 

इस नियम के दो अपवाद हैं, जहां प्रस्तावित विवाह को तर्कसंगत रूप से एक असाधारण कठिनाई माना जा सकता है और विवाह उस बिंदु पर पहुंच गया है जहां इसे बचाया नहीं जा सकता है। यह दृष्टिकोण अधिनियम के उस स्वरूप को दर्शाता है जो विवाह की पवित्रता को कायम रखने का प्रयास करता है, साथ ही उन कानूनी तरीकों को मान्यता देता है जिनके माध्यम से कुछ शर्तों को पूरा करने पर विवाह को समाप्त किया जा सकता है। 

धारा 15

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अंतर्गत धारा 15 उन परिस्थितियों से संबंधित है जिनके तहत विवाह भंग हो चुके पक्षकार पुनः विवाह कर सकते हैं। इस धारा में कहा गया है कि जहां विवाह तलाक के आदेश के माध्यम से कानूनी रूप से विघटित हो गया है और आदेश के खिलाफ अपील का कोई अधिकार नहीं है या जहां अपील का अधिकार है, लेकिन अपील दायर किए बिना अपील का समय बीत गया है या यदि अपील दायर की गई है और खारिज कर दी गई है, तो कोई भी पक्ष दूसरे व्यक्ति से विवाह कर सकता है। 

यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी विवाह से तलाक ले चुके व्यक्ति को कानूनी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता तथा वह पुनर्विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। ऐसा करने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि प्रथम विवाह का विघटन पूर्ण हो गया है तथा इसके बाद कोई भी कानूनी कार्यवाही संबंधित पक्षों की स्थिति में हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी। यह स्पष्टता नए जीवनसाथी और नए विवाह से उत्पन्न बच्चों के कानूनी अधिकारों को मान्यता देने में भी सहायता करती है। 

दूसरे शब्दों में, धारा 15 तलाकशुदा लोगों को निर्धारित कानूनी शर्तों के अंतर्गत पुनर्विवाह करने में सक्षम बनाती है, जिससे वे नए विवाह में प्रवेश करने से पहले पिछले विवाह की सभी जिम्मेदारियों का प्रभावी और निर्णायक रूप से निर्वहन कर सकते हैं। यह प्रावधान तलाक की अंतिमता के सिद्धांत को कायम रखता है, तथा इसमें शामिल व्यक्तियों के पुनर्विवाह करने और नई शुरुआत करने के अधिकारों का सम्मान करता है। 

शून्य और शून्यकरणीय विवाहों से पैदा हुए बच्चों की वैधता

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 16 शून्य या शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न बच्चों की वैधता के प्रश्न से संबंधित है। इसमें प्रावधान है कि अधिनियम के तहत शून्य या शून्यकरणीय घोषित विवाह से पैदा हुए बच्चे अभी भी वैध बच्चे हैं और उन्हें संरक्षण दिया जाएगा। विशेष रूप से, धारा 16(1) में कहा गया है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विवाह शून्य है या शून्यकरणीय है, ऐसे विवाहों से उत्पन्न बच्चे वैध हैं, यदि विवाह सद्भावनापूर्वक किया गया हो। यह प्रावधान बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों की स्थिति और उनके अधिकारों की रक्षा करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि उनके माता-पिता के विवाह के शून्य होने के कारण उन्हें कोई कष्ट न उठाना पड़े। 

धारा 16(2) इसकी पुष्टि करते हुए कहती है कि भले ही विवाह रद्द कर दिया गया हो, लेकिन इससे पैदा हुए बच्चे अभी भी वैध हैं। इसमें यह भी सुनिश्चित किया गया है कि ऐसे विवाह से पैदा हुए बच्चे वैध माने जाएंगे तथा उन्हें वैध विवाह से पैदा हुए बच्चों के समान दर्जा प्राप्त होगा, भले ही बाद में विवाह को अवैध घोषित कर दिया गया हो। यह धारा इस विचार को पुष्ट करती है कि माता-पिता के विवाह की कानूनी स्थिति के कारण बच्चों के कल्याण को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए तथा बच्चों के उत्तराधिकार और सामाजिक मान्यता के अधिकार की मांग करती है। 

कुल मिलाकर, धारा 16 पारिवारिक कानून के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति के रूप में समझ में आती है, जिसका उद्देश्य शून्य या शून्यकरणीय विवाहों से उत्पन्न बच्चों को जाति से बहिष्कृत होने या वैध रूप से विवाहित माता-पिता के बच्चों के समान अधिकारों से वंचित होने से रोकना है। 

रेवनसिद्दप्पा बनाम मल्लिकार्जुन (2011) मामले में, न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली की सर्वोच्च न्यायालय की विशेष पीठ ने यह टिप्पणी की थी कि माता-पिता के बीच संबंध चाहे जो भी हो, ऐसे संबंध से बच्चे के जन्म को माता-पिता के बीच संबंध से स्वतंत्र रूप से देखा जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसे रिश्ते से पैदा हुआ बच्चा निर्दोष है और उसे कानूनी रूप से बाध्यकारी विवाह से पैदा हुए बच्चे को मिलने वाले सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (संशोधित) की धारा 16 इसी सिद्धांत पर आधारित है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी करते हुए कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 शून्य या शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न बच्चों को वैध घोषित करती है, किन्तु स्पष्ट रूप से यह भी कहती है कि वे केवल अपने माता-पिता की संपत्ति पर दावा करने के हकदार हैं, किसी अन्य संबंधियों की संपत्ति पर नहीं। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे बच्चों को बिना किसी भेदभाव के वैध विवाह से उत्पन्न वैध संतानों के समान माना जाएगा तथा उन्हें संपत्ति में सभी अधिकार प्राप्त होंगे। एकमात्र प्रतिबंध यह है कि ऐसे बच्चों को अपने माता-पिता के निधन से पहले विभाजन का अनुरोध करने की अनुमति नहीं है। 

एचएमए के तहत द्विविवाह, 1955

एचएमए के अनुसार, 1955 द्विविवाह का अर्थ है, पहली शादी के रहते हुए तथा पति या पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करना। धारा 5(i) के अनुसार विवाह के समय पक्षकारों के पास कोई जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए। यह शर्त यह सुनिश्चित करती है कि अधिनियम के तहत किया गया कोई भी विवाह एक पुरुष से एक महिला का होगा तथा ऐसा पुरुष या महिला एक साथ किसी अन्य विवाह में नहीं रह सकते है। 

ऐसे कड़े प्रावधानों का कारण हिंदुओं में विवाह की पवित्रता और संस्था को बनाए रखना है। द्विविवाह न केवल वैवाहिक विश्वास का उल्लंघन है, बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी है जो समाज की स्थिरता को नष्ट करता है। कानून को बहुत कठोर बनाकर इसका उद्देश्य लोगों को बहुविवाह प्रथा से रोकना है, जिसमें एक ही समय में कई पत्नियां या पति रखना शामिल है। 

इसलिए, भारतीय संस्कृति के एकेश्वरवादी सिद्धांत का पालन करते हुए हिंदू विवाह संघ द्विविवाह से रहित है। भारतीय दंड संहिता के अनुसार, उल्लंघनकर्ताओं के लिए कानूनी परिणाम बहुत गंभीर हैं और इसमें कारावास और जुर्माना भी शामिल है। यह कानूनी ढांचा एक जीवनसाथी के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत करता है, तथा विवाह को नैतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनाए रखता है। 

द्विविवाह के लिए सजा

दंड का प्रावधान एचएमए की धारा 17 के तहत किया गया है, जो आईपीसी की दंडात्मक धारा 494 और 495 से संबंधित है। ये धाराएं द्विविवाह के परिणामों को संबोधित करती हैं:

आईपीसी की धारा 494

इस धारा में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जीवनकाल में किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करता है तो उसे सात वर्ष तक के कारावास की सजा दी जाएगी तथा जुर्माना भी देना होगा। दूसरा विवाह तब होना चाहिए जब पहला विवाह अभी भी अस्तित्व में हो और उसे रद्द नहीं किया गया हो, तथा अभियुक्त को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनका जीवनसाथी अभी भी जीवित है। 

आईपीसी की धारा 495

यह धारा वहां लागू होती है जहां पहली शादी के अस्तित्व को छिपाने के इरादे से दूसरी शादी की जाती है। इसकी सज़ा अधिक कठोर है, जिसमें दस वर्ष तक के कारावास के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह धारा यह बताती है कि जब धोखा होता है तो अपराध को अधिक गंभीर माना जाता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत भरण-पोषण

एचएमए, 1955 यह भी दर्शाता है कि वैवाहिक भरण-पोषण का विषय वास्तव में बहुत जटिल है। अक्सर कुछ महिलाओं पर गुजारा भत्ता मांगकर अपने पतियों से पैसे ठगने का आरोप लगाया जाता है। जैसा कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 में निर्धारित है, कोई भी पक्ष अन्य बातों के साथ-साथ मुकदमे के दौरान भरण-पोषण, अर्थात सहायता की मांग कर सकता है। इसके अलावा, अधिनियम की धारा 25 उन शर्तों पर प्रकाश डालती है जिनके तहत स्थायी गुजारा भत्ता दिया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में पति द्वारा अपनी पत्नी को कानूनी तौर पर दी जाने वाली धनराशि को भरण-पोषण कहा जाता है। 

विवाह के दौरान ही नहीं, बल्कि तलाक के दौरान भी भरण-पोषण का भुगतान करना आवश्यक हो सकता है। भरण-पोषण की पहली शर्त यह निर्धारित करना है कि भरण-पोषण प्राप्त करने वाला पक्ष अपने लिए भरण-पोषण उपलब्ध कराने में सक्षम है या नहीं। कुछ भारतीय वैवाहिक कानूनों के विपरीत, इनमें से कोई भी अधिनियम भरण-पोषण के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि या इस उद्देश्य के लिए किए जाने वाले व्यय के बारे में नहीं बताता है, सिवाय तलाक अधिनियम, 1869 के बारे में नहीं बताता है। 

एचएमए, 1955 की धारा 24

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24, लंबित भरण-पोषण तथा कार्यवाही के व्यय से संबंधित है। यदि मामले के लंबित रहने के दौरान पति या पत्नी में से कोई भी अपना भरण-पोषण नहीं कर सकता है, तो उन्हें 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत भरण-पोषण और लागत दी जा सकती है। 

धारा 24 न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह पति-पत्नी में से किसी को, जो अपना खर्च स्वयं वहन करने में असमर्थ हैं, कार्यवाही की लागत तथा अंतरिम भरण-पोषण के लिए योगदान देने का निर्देश दे सकती है। किसी भी अधिनियम प्रक्रिया में इस पर भरोसा किया जा सकता है, जिसमें एचएमए, 1955 की धारा 11 में निर्दिष्ट शून्यता का आदेश प्राप्त करने का उद्देश्य भी शामिल है। 

कार्यवाही से संबंधित अन्य व्ययों में वकील की लागत तथा डाक, लिपिकीय कार्य और यात्रा व्यय के लिए अन्य धनराशियां शामिल हैं। धारा 24 के अंतर्गत आदेश देने से पहले न्यायालय दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति पर विचार करेगा। चाहे ऐसा पति या पत्नी मुख्य कार्यवाही में प्राथमिक आवेदक के रूप में शामिल हो या नहीं, यह नियम प्रासंगिक बना रहता है। भरण-पोषण की राशि निर्धारित करने से पहले विचार करने योग्य एकमात्र मानदंड यह है कि दावेदार स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है या नहीं। 

जैसा कि चित्रा लेखा बनाम रंजीत राय (1976) के मामले में देखा गया था, धारा 24 का उद्देश्य निर्धन पति या पत्नी को वित्तीय सहायता प्रदान करना है, ताकि वे कार्यवाही चलने के दौरान अपना भरण-पोषण कर सकें और उनके पास मुकदमे का बचाव करने या उसे जारी रखने के लिए पर्याप्त धन हो, ताकि धन की कमी के कारण पति या पत्नी को मामले के संचालन में अत्यधिक कष्ट न उठाना पड़े। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के अंतर्गत, न्यायालय इस आधार पर अंतरिम भरण-पोषण और कार्यवाही की लागत देने से इनकार नहीं कर सकता कि आवेदक के विवाद में जीतने की संभावना नहीं है। धारा 24 में सम्पूर्ण सुनवाई के बजाय संक्षिप्त जांच की परिकल्पना की गई है। धारा 24 से जुड़ी शर्त के अनुसार, अंतरिम भरण-पोषण और कार्यवाही व्यय के भुगतान के लिए आवेदन का निपटारा, अधिकांश मामलों में, पक्षकार को नोटिस दिए जाने की तिथि से साठ दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। 

एचएमए, 1955 की धारा 25

जब भी अधिनियम, 1955 के अंतर्गत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना, न्यायिक पृथक्करण, तलाक या विवाह को रद्द करने का आदेश पारित किया जाता है, तो यदि पक्षकार स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के अंतर्गत भरण-पोषण और स्थायी गुजारा भत्ता प्रदान किया जा सकता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 से 13 के अंतर्गत प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को धारा 25 के अंतर्गत गुजारा भत्ता और भरण-पोषण पाने का हकदार बनाने से पहले आवश्यक न्यायालय आदेश जारी किया जाना चाहिए। चांद धवन बनाम जवाहरलाल धवन (1993) में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि “कोई भी डिक्री बनाने” शब्दों का अर्थ है कि स्थायी गुजारा भत्ता के लिए आदेश केवल तभी पारित किया जा सकता है जब अधिनियम के तहत निर्णय पारित किया जाता है, जहां कोई अन्य ठोस राहत दी जाती है और तब नहीं जब मुख्य याचिका खारिज कर दी जाती है या वापस ले ली जाती है। शब्द “डिक्री” अधिनियम की धारा 9 से 13 के अंतर्गत दिए गए निर्णय को संदर्भित करता है जो पक्षों की वैवाहिक स्थिति को प्रभावित करता है। 

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि उपर्युक्त किसी भी धारा के तहत राहत को अस्वीकार कर दिया गया है तो धारा 25 के तहत गुजारा भत्ता और रखरखाव की राहत नहीं दी जा सकती है। यदि मुख्य कार्यवाही असफल हो जाती है और पति या पत्नी को धारा 25 के तहत कोई राहत नहीं मिलती है, तो पति या पत्नी हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 18 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। 

जैसा कि अधिनियम की धारा 25(2) में उल्लेख किया गया है, न्यायालय स्थायी गुजारा भत्ते के किसी भी आदेश को बदल या रद्द कर सकता है, जहां यह देखा जाता है कि पक्षों की परिस्थितियों में बदलाव आया है। हालाँकि, सकल-राशि भुगतान आदेश एक सरल भुगतान है और इसलिए इसे किसी भी तरह से संशोधित या परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, धारा 25(3) में यह प्रावधान है कि निम्नलिखित दो घटनाओं की स्थिति में, धारा 25(1) के तहत भरण-पोषण रद्द किया जा सकता है यदि जिस पक्ष के पक्ष में आदेश दिया गया है, उसने: 

  1. दोबारा शादी कर ली हो
  2. पत्नी के मामले में, उसने अपना ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ा है।
  3. पति के मामले में, उसने किसी अन्य महिला के साथ यौन क्रियाकलाप किया है जो उससे संबंधित नहीं है। 

अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

तलाक याचिका का अधिकार-क्षेत्र

इनमें एचएमए, 1955 की धारा 19 के प्रावधान शामिल हैं, जो उन स्थानों पर प्रकाश डालते हैं जहां तलाक के लिए याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। अधिनियम की धारा 19 का उद्देश्य तलाक की याचिका पर विभिन्न अधिकार क्षेत्र प्रदान करके लचीलापन और सुविधा प्रदान करना है। यह प्रावधान वैवाहिक मामलों में विचार किए जाने वाले मुद्दों को संबोधित करता है तथा दोनों पक्षों के लिए यथासंभव कानूनी कार्यवाही के लिए तर्कसंगत और कुशल दृष्टिकोण प्राप्त करने का प्रयास करता है। 

पति या पत्नी उस स्थानीय अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत जिला न्यायालय में तलाक के लिए याचिका दायर कर सकते हैं जहां विवाह संपन्न हुआ था, क्योंकि न्यायालय का विवाह से संबंध होना आवश्यक है। यह प्रावधान याचिका में लगाए गए आरोपों के समर्थन में आवश्यक गवाहों और साक्ष्यों की व्यवस्था करने में सहायता करता है। 

 

इसके अलावा, याचिका उस जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है जिसमें प्रतिवादी याचिका के समय रहता है। इससे प्रतिवादी पर कोई दबाव नहीं पड़ता और उसे अदालती कार्यवाही में उपस्थित होना पड़ता है, जिससे निष्पक्षता और न्याय कायम रहता है। यह प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है यदि प्रतिवादी उस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं रह रहा है जहां विवाह सम्पन्न हुआ था, ताकि मामला सुचारू रूप से आगे बढ़ सके। 

ऐसी परिस्थितियों में जहां प्रतिवादी वैवाहिक घर से दूर चला गया है और वर्तमान में उस न्यायालय के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता है जिसमें विवाह सम्पन्न हुआ था या जहां याचिकाकर्ता रहता है, याचिका उस क्षेत्र के जिला न्यायालय में भी प्रस्तुत की जा सकती है जहां याचिकाकर्ता याचिका प्रस्तुत करते समय रह रहा था। यह उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां एक पति या पत्नी को वैवाहिक विवाद के कारण छोड़ दिया गया हो या उन्होंने अलग-अलग घरों में रहने का निर्णय लिया हो। 

इसके अतिरिक्त, यदि दोनों सहमत हों तो याचिका उस जिला न्यायालय में भी दायर की जा सकती है जहां वे अंतिम बार रहते थे। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि जिस न्यायालय को दम्पति के जीवन के उन पहलुओं पर प्राथमिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है, जो उनके बीच सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से साझा हैं, वही न्यायालय मामले की सुनवाई करेगा। जहां प्रतिवादी भारत से बाहर रह रहा हो, वहां याचिका उस स्थान के जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है जहां याचिकाकर्ता रहता है। 

बंद कमरे में कार्यवाही

धारा 22 में बंद कमरे में की जाने वाली कार्यवाही की चर्चा की गई है, जो मूलतः न्यायालय में की जाने वाली सुनवाई है, लेकिन यह जनता और प्रेस के लिए खुली नहीं होती है। एचएमए, 1955 वैवाहिक मामलों में शामिल पक्षों की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा के लिए बंद कमरे में कार्यवाही की अनुमति देता है। इससे यह गारंटी मिलती है कि क्रूरता, व्यभिचार या किसी अन्य संवेदनशील मुद्दे को सार्वजनिक शर्मिंदगी से बचाने के लिए बंद दरवाजों के पीछे निपटाया जाएगा। बंद कमरे में कार्यवाही का उद्देश्य पक्षों को सुरक्षित वातावरण में अपनी बात कहने का अवसर प्रदान करना है और कभी-कभी इससे पक्षों को बेहतर न्याय मिल सकता है। 

बच्चों की अभिरक्षा

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 26 के अनुसार, न्यायालय को नाबालिग बच्चों से संबंधित आदेश पारित करने का अधिकार है, जैसे कि उनकी हिरासत, भरण-पोषण और शिक्षा। पहला निर्धारक बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण है। इस मामले में, न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार माता-पिता में से किसी एक को या किसी तीसरे पक्ष को बच्चे की अभिरक्षा प्रदान कर सकता है। जब बच्चा अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए स्वीकार्य आयु तक पहुंच जाता है, तो हिरासत का निर्धारण करने वाले कारकों में बच्चे की आयु, अपने माता-पिता के प्रति उसके स्नेह का स्तर और माता-पिता की उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता शामिल होती है। अदालत मामले की सुनवाई लंबित रहने तक मुलाकात या पहुंच तथा अस्थायी शारीरिक हिरासत के आदेश भी दे सकती है। 

संपत्ति का निपटान

1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 उस अवसर को कवर करती है जब संपत्ति, जो पति और पत्नी दोनों के संयुक्त स्वामित्व में हो सकती है, विवाह के समय या उसके आसपास प्रस्तुत की जाती है। इसमें आभूषण, उपहार और अन्य व्यक्तिगत संपत्तियां शामिल हैं जिनका विवाह के दौरान उपयोग किया गया था और जो संयुक्त रूप से स्वामित्व में हैं। न्यायालय को पक्षकारों के लाभ के लिए ऐसी संपत्ति के निपटान और विभाजन के संबंध में आदेश देने का अधिकार है। 

स्त्रीधन का अर्थ है वह संपत्ति जो एक महिला अपने जीवन के किसी भी समय, लेकिन ज्यादातर अपने विवाह के दौरान अर्जित करती है, उस पर केवल उसका ही स्वामित्व होता है। इसमें उपहार, आभूषण और अन्य प्रकार की संपत्ति शामिल है, जिसे उसके माता-पिता, रिश्तेदारों और यहां तक कि उसके पति द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए। स्त्रीधन अभी भी महिला का है और उस पर उसका नियंत्रण है। तलाक के दौरान, महिला अपना स्त्रीधन रख सकती है और पति का उस पर कोई अधिकार नहीं होता है। महिला की वित्तीय स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा के लिए, अदालत यह सुनिश्चित करती है कि स्त्रीधन उसे वापस कर दिया जाए। 

अपील

एचएमए, 1955 की धारा 28 में उन आधारों और प्रक्रियाओं का विवरण दिया गया है जिनके माध्यम से न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील दायर की जा सकती है। कोई भी पक्ष जो जिला न्यायालय के निर्णय से असंतुष्ट है, उसके पास उच्च न्यायालय में निर्णय के विरुद्ध अपील करने का कानूनी विकल्प है। अपील एक विशेष समय-सीमा के भीतर दायर की जानी चाहिए, जो कि डिक्री या आदेश की तारीख से तीस दिन है। 

अपीलीय प्रक्रिया में उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत के फैसले पर पुनर्विचार किया जाता है, तथा अपील के आधारों के साथ-साथ प्रस्तुत साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया जाता है। अपीलीय न्यायालय को ऐसे निष्कर्षों के आधार पर निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि करने, उसे उलटने या उसे वापस भेजने का अधिकार है। इससे यह संभव हो जाता है कि न्यायिक समीक्षा को बढ़ाया जा सके, जिससे प्रथम सुनवाई में हुई किसी भी अनियमितता या अनुचितता को सुधारने या दंडित करने में मदद मिल सके। 

इसके अलावा, अधिनियम के तहत किसी आदेश से व्यथित किसी भी व्यक्ति को कानून के किसी भी महत्वपूर्ण प्रश्न पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की अनुमति देता है। यह वैवाहिक विवादों में महत्वपूर्ण कानूनी मामलों से निपटने के लिए देश में अंतिम अपीलीय न्यायालय की उपलब्धता की भी गारंटी देता है, जिससे न्याय और समता का प्रावधान बढ़ता है। 

प्रथागत तलाक

1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 29(2) हिंदुओं में प्रथागत तलाक के मुद्दे से संबंधित है। यहां, यह प्रावधान यह मानता है कि औपचारिक कानून और अधिनियम के अलावा, कुछ समुदायों में प्रथागत कानून के तहत तलाक की प्रथाएं भी हैं, जहां वे अधिनियम की कानूनी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन नहीं कर सकते हैं, लेकिन फिर भी वे अपने प्रथागत कानून के दायरे में कानूनी हैं। 

यह धारा कुछ हिन्दू समाजों में विशेष प्रथागत कानून के तहत दिए गए तलाक को मान्यता प्रदान करती है। इसका अर्थ यह है कि यदि तलाक किसी समुदाय की संस्कृति के अनुसार किया जाता है और ऐसी संस्कृति उक्त समुदाय द्वारा अनुमोदित है, तो इस प्रावधान के तहत तलाक वैध है। इसमें यह अपेक्षित शर्त है कि ऐसी कोई भी प्रथा अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं होगी, अर्थात प्रचलित प्रथाओं को एचएमए द्वारा प्रदत्त सामान्य कानूनी ढांचे के अनुरूप होना होगा। 

लिव-इन-रिलेशनशिप और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

भारत की हालिया पीढ़ी के लिए हिंदू विवाह से जुड़े मुद्दों में लिव-इन रिलेशनशिप भी शामिल है। जिन संस्कृतियों में सहवास का यह स्वरूप स्वीकार्य है, वहां लिव-इन रिलेशनशिप को दायित्व-मुक्त जीवन जीने का तरीका माना जाता है, क्योंकि यह विवाह संस्था पर विवाद को जन्म देता है। हालाँकि, इस समस्या को हल करने के लिए संस्थागत और कानूनी आवश्यकताएं भी अपर्याप्त हैं। इस प्रणाली के लिए 1955 के हिंदू विवाह कानून में कोई सुधार नहीं किया गया है। 

1955 के हिंदू विवाह अधिनियम में वर्णित भारत में पारंपरिक हिंदू विवाह के दो प्रमुख घटकों के रूप में अग्नि और सात-चरणीय समारोह को मान्यता देना महत्वपूर्ण है। यहां रेखांकित भावना ब्रह्म संस्कृति के अनुसार विवाह में पत्नी के सार को व्यक्त करती है। दूल्हा दुल्हन से ‘विवाह’ कहकर विवाह समाप्त करता है और फिर अपने शेष जीवन के लिए सात संकल्प लेता है, प्रत्येक संकल्प के बाद कहता है, “चूंकि तुम मेरे साथ हो, मेरे विचार और कार्य; अनेक संतानें दीर्घायु हों।”

आज भी विश्व में भारत के बारे में यह धारणा है कि यहां विवाह को धार्मिक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टियों से पवित्र माना जाता है। लेकिन समय के परिवर्तन के साथ विवाह की पारंपरिक अवधारणा भी धीरे-धीरे बदल गई है, और हम धीरे-धीरे जबरन विवाह से लेकर साथ रहने और फिर समलैंगिक विवाह की ओर बढ़ रहे हैं। यद्यपि कुछ समलैंगिक या लिव-इन संबंधों में बदलाव आया है और उन्हें वैधानिक मान्यता मिल गई है, फिर भी हमारी संस्कृति में इस प्रकार के संबंधों को अभी भी अनैतिक माना जाता है। इस प्रकार के रिश्तों में साझेदारों को अक्सर समस्याओं का सामना करना पड़ता है, क्योंकि भारत में लिव-इन रिश्तों से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है। अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मुद्दों के समाधान के लिए न्यायपालिका को अंतिम उपाय माना गया है। 

लिव-इन रिलेशनशिप वह संबंध है, जिसमें दो व्यक्ति बिना कानूनी रूप से विवाहित हुए एक साथ रहते हैं, जो कि विवाह जैसा ही होता है तथा जिसे भारत में पिछली शताब्दी के वर्षों से सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता रहा है। यद्यपि इन संबंधों को एचएमए, 1955 या भारत के अन्य पारंपरिक व्यक्तिगत कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, फिर भी इन्हें विभिन्न मामलों के कानूनों के माध्यम से कानूनी मान्यता प्रदान की गई है। 

इंद्रा शर्मा बनाम वी. के. वी. शर्मा (2013) मामला एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय है जो भारत में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं की कानूनी स्थिति और प्रतिष्ठा को परिभाषित करता है। यह आज के रिश्तों की गतिशीलता के साथ रूढ़िवादी मूल्यों को सामंजस्य स्थापित करने के न्यायालय के प्रयास को पुष्ट करता है, तथा ऐसे रिश्तों में महिलाओं को संस्थागत सहारा और संरक्षण प्रदान करता है, साथ ही साथ एक योग्य लिव-इन रिलेशनशिप के मापदंडों को स्थापित करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत संरक्षण प्राप्त है। यह गैर-वैवाहिक संबंधों में रहने वाली महिलाओं को मान्यता दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जो अब भरण-पोषण के साथ-साथ दुर्व्यवहार के लिए सुरक्षा आदेश के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटा सकती हैं। निर्णय में भारत में सामाजिक संरचना में  बदलाव पर भी प्रकाश डाला गया तथा यह भी बताया गया कि कानून को संबंधों में नए रुझानों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसने पारंपरिक एकल परिवार के अलावा अन्य प्रकार के पारिवारिक ढांचे को अपनाने पर प्रगतिशील दृष्टिकोण दिया। निर्णय में न्यायालय इस बात पर अड़ा रहा कि यद्यपि लिव-इन संबंध विवाह के समकक्ष नहीं हैं, फिर भी उन्हें कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। फैसले में प्रावधानों के दुरुपयोग के मामले में रणनीतिक व्यावसायिक साझेदारी और संक्षिप्त संघों के बीच अंतर करने की कानूनी आवश्यकता पर बल दिया गया है। 

एचएमए से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय, 1955

भारत भर के न्यायालयों ने बार-बार एचएमए, 1955 के प्रावधानों की व्याख्या की है, ताकि विधायी मंशा स्पष्ट हो सके, और इस प्रकार कानून के पीछे का उद्देश्य प्राप्त हो सके। नीचे अनुपात निर्णय के साथ-साथ कुछ ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा की गई है। 

लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2006)

लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2006) के मामले में, पहली शादी की स्थिति के बारे में एक सवाल सर्वोच्च न्यायालय की याचिका के माध्यम से उठाया गया था, जहां गैर-मुस्लिम ने ‘मुस्लिम’ धर्म को अपनाया, हालांकि बिना अपने विश्वास को बदले या पहली पत्नी को तलाक दिए। यह निर्णय लिया गया कि जब तक तलाक नहीं हो जाता, तब तक किसी जोड़े का विवाह धर्मांतरण के कारण हिंदू कानून के तहत रद्द नहीं किया जा सकता है। 

मुद्दा

  • यदि कोई गैर-मुस्लिम व्यक्ति आस्था या विश्वास में कोई वास्तविक परिवर्तन महसूस किए बिना, तथा केवल किसी मौजूदा विवाह से बचने या दूसरा विवाह करने के लिए, ‘मुस्लिम’ धर्म अपना लेता है, तो क्या ऐसे धर्म परिवर्तन के बाद किया गया उसका विवाह अमान्य हो जाएगा?
  • क्या प्रतिवादी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अंतर्गत द्विविवाह का मुकदमा चलाया जा सकता है?
  • क्या समान नागरिक संहिता लागू करना अच्छा विचार होगा? 

निर्णय

कोई भी विवाह जो पति उस विवाह के अस्तित्व के दौरान करता है, चाहे उसने किसी अन्य धर्म में धर्म परिवर्तन किया हो, वह एक अपराध होगा, जिस पर 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, क्योंकि द्विविवाह गैरकानूनी है और इसे एक अपराध बना दिया गया है। दो हिंदुओं के बीच कोई भी विवाह अमान्य माना जाएगा यदि निम्नलिखित मानदंड पूरे हों: 

  • यदि किसी भी साथी का जीवनसाथी विवाह के समय जीवित था; तथा,
  • यह समारोह अधिनियम के कार्यान्वयन के बाद आयोजित किया गया है।

यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली शादी के चालू रहने के दौरान दूसरी शादी करता है तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है। यह दूसरा विवाह भी एचएमए, 1955 की धारा 11 और 17 के अंतर्गत अवैध होगा। रोबासा खानम बनाम खोदादाद ईरानी (1946) का मामला भी लाया गया, जिसमें विद्वान न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि इस्लाम में धर्मांतरित होने वाले जीवनसाथी के व्यवहार का मूल्यांकन न्याय, अधिकार या समानता के सिद्धांतों के साथ-साथ अच्छे विवेक के अनुसार किया जाना चाहिए। 

यद्यपि एक समान कानून बनाना अत्यधिक पसंद किया जाता है, लेकिन ऐसा करना कभी-कभी राष्ट्र की अखंडता को नुकसान पहुंचा सकता है। कानून के शासन वाले लोकतंत्र में, इससे लंबे समय में प्रगतिशील परिवर्तन और व्यवस्था की ओर अग्रसर होना चाहिए। इस कारण, यह अपेक्षा करना अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा कि सभी कानून एक ही समय में एक जैसे बनाये जा सकें। हालाँकि, कानूनी प्रणाली को अपने संचालन के दौरान सामने आने वाली किसी गलती या दोष को सुधारने में सक्षम होना चाहिए। जहां तक समान नागरिक संहिता का प्रश्न है, पीठ के अन्य माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. सहाय ने कुछ उपाय सुझाए हैं, जिन्हें सरकार को ऐसे लोगों द्वारा धर्म का दुरुपयोग करने से बचाने के लिए करना चाहिए, जो बहुविवाही पाए गए हैं, हालांकि उनका दावा है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है। 

जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जयसवाल मजूमदार (2021)

जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल (2021) के हालिया मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी ने पति के खिलाफ झूठे आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं, जिससे न केवल उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है, बल्कि उसकी नौकरी भी प्रभावित हो सकती है, जो मानसिक क्रूरता का एक स्पष्ट उदाहरण होगा। प्रतिवादी एक सरकारी महाविद्यालय में प्राध्यापक (प्रोफेसर) और पीएचडी धारक था, जबकि अपीलकर्ता एक सेना अधिकारी और एम.टेक था। उनकी शादी 27 सितम्बर 2006 को हुई थी और वे कुछ समय तक ही विशाखापत्तनम और लुधियाना में साथ रहे थे। हालाँकि, विवाह के बाद से ही दोनों पक्षों के बीच अक्सर मतभेद होते रहे और 15 सितम्बर 2007 से दम्पति ने अलग रहने का निर्णय ले लिया था।  

तलाक के दौरान, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी ने उसके खिलाफ कई झूठे आरोप लगाए थे, जिससे उसके करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, उसकी छवि धूमिल हुई और मानसिक क्रूरता हुई। तथापि, प्रतिवादी ने वैवाहिक अधिकारों को रद्द करने के लिए दायर याचिका में कहा कि उसके पति ने उसे बिना पर्याप्त कारण बताए छोड़ दिया था, इसलिए उसने वैवाहिक जीवन को बहाल करने के लिए अपीलकर्ता से सलाह मांगी थी। 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि यदि किसी विवाह को पति या पत्नी द्वारा मानसिक क्रूरता का आरोप लगाने पर विवाह भंग करने पर विचार किया जाता है, तो मानसिक क्रूरता का परिणाम ऐसा होना चाहिए कि विवाह संबंध को जारी रखना असंभव हो जाए। इस प्रकार यह अपेक्षा करना अनुचित है कि किसी गलत कार्य के पीड़ित से यह अपेक्षा की जाए कि वह अपराधी के साथ विवाहित रहते हुए भी उस व्यवहार का समर्थन करे। 

इस निर्णय को भी चुनौती दी गई और न्यायालय ने कहा कि ऐसे उचित साक्ष्य मौजूद हैं, जिनके आधार पर उच्च न्यायालय के निर्णय और पारिवारिक न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को पलट दिया जाना चाहिए, क्योंकि प्रतिवादी ने अपीलकर्ता के साथ क्रूरता की थी। परिणामस्वरूप, वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए प्रतिवादी की प्रार्थना को खारिज कर दिया गया और अपीलकर्ता को तलाक के आदेश का हकदार माना गया था। 

अमरजीत सिंह बनाम भारत संघ (2022)

तलाक की कार्यवाही के दौरान, अपीलकर्ता ने कहा कि प्रतिवादी ने उसके खिलाफ कई झूठे बयान दिए, जिससे उसके करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई, तथा उसे मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा था। प्रतिवादी ने अपनी ओर से तर्क दिया कि उसने वैवाहिक अधिकारों के आवेदन से संबंधित एक मामले में बिना किसी उचित कारण के उसे छोड़ दिया था और इसलिए उसने अपीलकर्ता से प्रार्थना की कि वह कैसे विवाहित जीवन में वापस जा सकती है। 

याचिका में किए गए कथनों के अनुसार, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, एचएमए आदि जैसे कानूनी कानूनों में विभिन्न प्रावधान हैं। जहां भरण-पोषण के भुगतान की अनुमति दी जा सकती है। इसके परिणामस्वरूप एक जटिल स्थिति उत्पन्न हो गई, जिससे रखरखाव भुगतान करने वाले पक्षों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। 

रिट याचिका में यह शर्त रखी गई थी कि सभी सुविधाएं एक व्यापक श्रेणी के अंतर्गत प्रदान की जाएंगी। रजनेश बनाम नेहा (2021) के मामले में, सीजेआई ललित ने बताया कि मुद्दा सुलझा लिया गया है। उपर्युक्त निर्णय अधिकार क्षेत्र के टकराव की समस्या को दूर करने, विभिन्न कार्यवाहियों में निर्णय में असंगति को रोकने और पारिवारिक न्यायालयों और जिला न्यायालयों के साथ-साथ दण्डाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के कामकाज में सामंजस्य बनाए रखने के लिए सुझाव प्रदान करता है। नियमों में निम्नलिखित बातें कही गई हैं: 

  1. जब कोई पक्ष विभिन्न क़ानूनों के तहत भरण-पोषण के लिए कई दावे करता है, तो अदालत अगले मामले में कोई अतिरिक्त राशि देने का निर्णय लेते समय पिछली सुनवाई में दी गई राशि के समायोजन या व्यतिरेक  (सेट-ऑफ) को ध्यान में रखेगी;
  2. आवेदक द्वारा भविष्य की प्रक्रिया में पूर्व कार्यवाही और उसमें जारी किसी भी आदेश का खुलासा अनिवार्य है;
  3. पूर्व प्रक्रियाओं में जारी आदेशों में कोई भी संशोधन या परिवर्तन उसी कार्यवाही में किया जाना चाहिए।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के लिए सामान्य सिफारिशें

आदर्श रूप से, विवाह की आयु दोनों लिंगों के लिए समान होनी चाहिए, क्योंकि भारत में चिकित्सा, कानून या इंजीनियरिंग जैसे किसी भी क्षेत्र में स्नातक बनने के लिए 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले ऐसा करना आवश्यक है। जब विवाह की बात आती है तो लिंग भेद क्यों मौजूद होता है, जबकि अठारह वर्ष की आयु में एक युवा व्यक्ति अपना जीवनसाथी चुन सकता है? भारत में 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद उन्हें वयस्क माना जाता है और वे लिंग की परवाह किए बिना अनुज्ञप्ति (लाइसेंस), आधार कार्ड और पैन कार्ड प्राप्त करने के योग्य हो जाते हैं। लेकिन शादी की उम्र अलग-अलग क्यों होती है? विवाह की आयु में परिवर्तन के कारण बालिकाओं के जन्म लेते ही समाज में उनके प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है, जबकि घर में बालिकाओं को जन्म से ही भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 

विवाह को मानव समाज में सबसे महत्वपूर्ण संस्था माना जाता है। यह अक्सर होता है। यह मानव सभ्यता की नींव रही है। विवाह से विवाहित जोड़े के बीच नए प्रकार के सामाजिक संबंधों और पारस्परिक अधिकारों का सृजन होता है। एक बार बच्चे पैदा हो जाएं तो उन्हें अधिकार दिए जाते हैं और कुछ निश्चित दर्जा दिया जाता है। प्रत्येक समुदाय में ऐसे संबंधों और अधिकारों को विकसित करने के लिए अपनी ज्ञात प्रक्रियाएं होती हैं। यह नए अधिकारों और कर्तव्यों के साथ एक नई स्थिति की मान्यता को भी संदर्भित करता है जिसे अन्य लोग भी मान्यता देते हैं। विवाह एक सामाजिक रूप से स्वीकृत रिश्ता है जिसे सभी समाजों में सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है। विवाह दो लोगों के बीच सबसे गहरा और जटिल सहयोग है। 

कानूनी और नैतिक निहितार्थों के संदर्भ में हिंदू विवाह की पारंपरिक अवधारणा दयालु धार्मिक विश्वासों पर आधारित है और मनोविज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित है। लेकिन हाल के दिनों में, आत्म-दृढ़ता और व्यक्तिवादी दृष्टिकोण ने विवाह में तनाव और घर्षण पैदा किया है और विभिन्न प्रकार के विवादो को जन्म दिया है। 

समकालीन समाज में, विवाह की इस महत्वपूर्ण संस्था की सुरक्षा के लिए सामाजिक और कानूनी ढांचे तैयार किए जा सकते हैं। सक्रिय और प्रतिक्रियात्मक दोनों तरह के उपाय किए जाने चाहिए। इस रणनीति का मूल यह है कि नई पीढ़ी को कम उम्र से ही शिक्षित करने से अधिक प्रभावी कोई उपाय नहीं है। नैतिकता को उच्च माध्यमिक के साथ-साथ महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी पढ़ाया जाना चाहिए। 

हिंदू विवाह की इस पवित्रता को दम्पतियों, परिवारों, बच्चों और सामान्य रूप से समाज के लाभ के लिए संरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है कि सार्वजनिक शिक्षा इसमें हस्तक्षेप करे। मीडिया, विशेषकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सांस्कृतिक शिष्टाचार का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वैवाहिक परामर्शदाताओं के लिए एक स्वतंत्र शैक्षिक कार्यक्रम, जो पश्चिमी मनोविज्ञान पर आधारित न हो तथा हिंदू संस्कृति पर आधारित सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी संरचना वाला हो, विश्वविद्यालय स्तर पर तैयार किया जाना चाहिए। कुंडली के स्थान पर वैवाहिक परामर्शदाताओं की प्रणाली को पूरे समाज में फैलाया जाना चाहिए। 

निष्कर्ष

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक ऐसा कानून है जो हिंदू विवाह से संबंधित कानूनों को पुनः अधिनियमित और समेकित करता है। इसलिए, दिए गए अधिनियम के अनुसार, सभी हिंदू विवाह नहीं कर सकते है। अधिनियम की धारा 5 में हिंदू विवाह के तत्वों का उल्लेख है तथा धारा 13 में कई वैवाहिक उपचारों का प्रावधान है, जैसे वैवाहिक अधिकारों की बहाली, विवाह को अमान्य घोषित करना, न्यायिक पृथक्करण और तलाक। हालाँकि, मानसिक विकारों के मामले में विवाह के संबंध में कुछ प्रतिबंध हैं। 

आजकल, विवाह अधिकांशतः एक कानूनी रिश्ता है और यह अब पहले जैसी पवित्र संस्था नहीं रही हैं। इसके अलावा, यह स्पष्ट है कि विधायकों को यह एहसास हो गया था कि यदि बाल विवाह जैसे सामाजिक मानक और धारणाएं कायम रहीं, तो वैधानिक साधन पूरी तरह से निरर्थक हो जाएंगे। इसलिए, यद्यपि बाल विवाह निषिद्ध है, फिर भी उन्हें कानूनी रूप से तब तक अमान्य नहीं माना जाता जब तक कि अदालत में ऐसी याचिका प्रस्तुत न की जाए। हिंदू विवाह के लिए प्रमाण प्रस्तुत करना आसान बनाने के लिए पंजीकरण का प्रावधान है। हालाँकि, अधिनियम के लागू होने के लगभग 70 वर्ष बाद भी भारत में हिंदू विवाहों का पंजीकरण न कराने की प्रथा अभी भी प्रचलित है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 कब स्वीकृत हुआ था?

भारत के राष्ट्रपति ने 18 मई, 1955 को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 को मंजूरी दी थी।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का उद्देश्य क्या है?

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का उद्देश्य हिंदू विवाह नियमों को संहिताबद्ध और संशोधित करना है, ताकि हिंदुओं और संबद्ध धार्मिक समुदायों के बीच विवाह के लिए एक सुसंगत कानूनी आधार तैयार किया जा सके। यह विवाह, तलाक, वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना, न्यायिक पृथक्करण और अन्य वैवाहिक कठिनाइयों जैसे विषयों पर चर्चा करता है। 

क्या इस अधिनियम के तहत हिंदू विवाह पंजीकृत किया जा सकता है?

हां, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हिंदू विवाह पंजीकृत किया जा सकता है। इस अधिनियम में हिंदू विवाहों के स्वैच्छिक पंजीकरण का प्रावधान है। 

संदर्भ

 

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 2

यह लेख Shafaq Gupta द्वारा अद्यतन किया गया है। यह लेख भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2 पर विस्तार से चर्चा करता है तथा अधिनियम में लागू विभिन्न परिभाषाओं को परिभाषित करता है। किसी विशेष परिभाषा की पूरी समझ प्रदान करने के लिए उनसे संबंधित विभिन्न धाराओं पर भी संक्षेप में चर्चा की गई है। अंत में, यह लेख प्रासंगिक मामलों और प्रत्येक प्रावधान के उदाहरणों पर चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

अनुबंध कानून व्यापारिक कानून की सबसे महत्वपूर्ण शाखाओं में से एक है जिसके बिना हमारे देश की अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकती है। यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक हमारे दैनिक व्यवहार को विनियमित करके हमारी अर्थव्यवस्था को नियमित रखता है। लगभग हर लेन-देन, हर सौदे में एक अनुबंध शामिल होता है। 

उदाहरण के लिए, उबर ऐप से कैब बुक करना, लाइब्रेरी से किताब जारी करना, बाजार से सामान खरीदना, एक महीने के लिए अखबार की सदस्यता खरीदना और उसे रोजाना अपने घर तक पहुंचाना, ये सभी अनुबंध हैं। इन सभी अनुबंधों को अनुबंध कानून के अनुसार बनाया जाना आवश्यक है। 

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (जिसे आगे “अधिनियम या आई.सी.ए.” कहा जाएगा) 25 अप्रैल 1872 को विधानमंडल द्वारा अधिनियमित किया गया तथा 1 सितम्बर 1872 को लागू हुआ है। जैसा कि हम वर्ष 1872 से ही देख सकते हैं, यह भारत के सबसे पुराने कानूनों में से एक है, जिसे हमारे देश को 1947 में स्वतंत्रता मिलने से भी पहले लागू किया गया था। इसे 1861 में सर जॉन रोमिली के नेतृत्व में तीसरे ब्रिटिश विधि आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था और उसके बाद अधिनियम के मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए कई परिवर्तन किए गए थे। 

अनुबंध कानून को नियमों और सिद्धांतों के एक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो पक्षों के बीच लेनदेन को नियंत्रित करता है, तथा इन पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित करता है। यह अधिनियम भारत में संविधि कानूनों को विनियमित एवं नियंत्रित करने वाला क़ानून है। यह अनुबंधों से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं जैसे प्रस्ताव, स्वीकृति, वैध अनुबंध की शर्तें, निरसन, प्रतिफल आदि से संबंधित है। इस लेख में हम अनुबंध कानून में दी गई विभिन्न परिभाषाओं पर चर्चा करेंगे। 

धारा 2 का खंडवार विश्लेषण

अनुबंध की धारणा हमारी संपूर्ण अर्थव्यवस्था का आधार है, और इसलिए, अनुबंध के हर पहलू का विश्लेषण और सही ढंग से समझना आवश्यक है। किसी अनुबंध को धारा 2 से पृथक करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इससे उसकी ढीली व्याख्या हो जाएगी, जिससे अनुबंध के आवश्यक तत्वों की अनदेखी हो सकती है। 

अधिनियम की धारा 2 व्याख्या संबंधी खंड है जो अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों और अभिव्यक्तियों की सामान्य परिभाषा प्रदान करता है। जब तक संदर्भ अन्यथा संकेत न दे, आमतौर पर इन परिभाषाओं का पालन किया जाता है। प्रत्येक उपधारा का खंडवार विश्लेषण इस प्रकार है: 

धारा 2(a): प्रस्ताव

‘प्रस्ताव’ शब्द को अधिनियम की धारा 2(a) के तहत परिभाषित किया गया है। इसमें प्रस्ताव को किसी व्यक्ति द्वारा कोई कार्य करने या कार्य करने से प्रविरत (ऐब्स्टेन) रहने की इच्छा के रूप में परिभाषित किया गया है और ऐसा उस विशेष कार्य या विरत रहने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह करार बनाने की दिशा में पहला कदम है। उदाहरण के लिए, A, B से प्रश्न पूछता है, “क्या आप मेरी कार 2 लाख रुपए में खरीदेंगे?” इस प्रश्न के माध्यम से A, B को एक प्रस्ताव दे रहा है। 

प्रस्ताव का संचार

किसी प्रस्ताव को कानून की दृष्टि में वैध बनाने के लिए, उसे प्रस्ताव प्राप्तकर्ता (अर्थात् प्रस्ताव प्राप्त करने वाले पक्ष) को अवश्य सूचित किया जाना चाहिए। करार करने के लिए दूसरे पक्ष की सहमति प्राप्त करना स्पष्ट एवं सटीक होना चाहिए। आईसीए की धारा 3 में कहा गया है कि प्रस्ताव को संप्रेषित करने का इरादा होना चाहिए या ऐसा कोई कार्य या चूक की जानी चाहिए जो प्रस्ताव को संप्रेषित करने की प्रवृत्ति रखती हो। आईसीए की धारा 4 में आगे कहा गया है कि कोई प्रस्ताव तभी पूर्ण माना जाता है जब वह उस दूसरे पक्ष को ज्ञात हो जिसे प्रस्ताव दिया गया था। 

उदाहरण के लिए, A, B को पत्र के माध्यम से एक निश्चित कीमत पर अपना मकान बेचने का प्रस्ताव रखता है। जैसे ही B को पत्र प्राप्त होता है, प्रस्ताव का संप्रेषण पूरा हो जाता है। इसका एक अन्य उदाहरण यह हो सकता है कि यदि A ने B के विरुद्ध तार भेजकर अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। यह निरसन A की ओर से तब पूर्ण माना जाएगा जब तार भेजा गया था, लेकिन B को इसकी सूचना तभी दी गई मानी जाएगी जब वह तार प्राप्त कर लेगा।

कानूनी संबंध बनाने का आशय

प्रस्ताव के संबंध में ध्यान रखने योग्य एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्ताव कानूनी संबंध बनाने के आशय से किया जाना चाहिए। अनुबंध कानून के अंतर्गत मात्र सामाजिक निमंत्रण को प्रस्ताव नहीं माना जाता है। किसी करार में प्रवर्तनीयता के लिए आवश्यक सभी बातें मौजूद हो सकती हैं, लेकिन इस आशय के बिना वह अनुबंध नहीं बन सकता है। आशय की कमी के कारण ही घरेलू, सामाजिक और धार्मिक करारों को प्रवर्तनीयता के मामले में अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है। 

उदाहरण के लिए, A, B को रविवार को साथ में फिल्म देखने का प्रस्ताव देता है और B इसके लिए सहमत हो जाता है। यद्यपि A ने B को प्रस्ताव दिया है, यह केवल एक सामाजिक निमंत्रण है और यदि A, B के साथ फिल्म देखने का कार्यक्रम स्थगित या रद्द करता है तो उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। 

इस संबंध में एक ऐतिहासिक ऑस्ट्रेलियाई मामला बाल्फोर बनाम बाल्फोर (1919) है। इस मामले में, प्रतिवादी सीलोन में एक सरकारी कर्मचारी था और वह अपनी पत्नी के साथ छुट्टियों में इंग्लैंड गया था। उनकी पत्नी अस्वस्थ हो गईं और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण वह उनके साथ सीलोन वापस नहीं आ सकीं। प्रतिवादी ने उससे वादा किया कि वह अलग रहने की अवधि के दौरान उसे प्रति माह 30 पाउंड की राशि भरण-पोषण के रूप में देगा। 

अंततः वह उस राशि का भुगतान करने में असफल रहा और उसकी पत्नी ने उस पर मुकदमा दायर कर दिया। लॉर्ड एटकिन द्वारा मामले का निर्णय प्रतिवादी (पति) के पक्ष में किया गया, क्योंकि कानूनी संबंध बनाने का कोई आशय नहीं था। यह पति-पत्नी के बीच उनके घरेलू वैवाहिक रिश्ते के अंतर्गत किया गया एक सामान्य करार था। 

प्रस्ताव के प्रकार

  • सामान्य या विशिष्ट प्रस्ताव

परिस्थितियों के आधार पर प्रस्ताव सामान्य या विशिष्ट हो सकता है। यह एक विशिष्ट प्रस्ताव है जब यह किसी विशेष व्यक्ति को दिया जाता है, किसी अन्य को नहीं। लेकिन सामान्य प्रस्ताव आम जनता के लिए किया गया प्रस्ताव होता है। उदाहरण के लिए, A ने दक्षिण दिल्ली में अपने 2 बीएचके अपार्टमेंट को 21 लाख रुपये में बेचने का विज्ञापन दिया है। यह एक सामान्य प्रस्ताव है जिसे कोई भी व्यक्ति स्वीकार कर सकता है। हालाँकि, यदि A ने अपने किसी रिश्तेदार को अपना अपार्टमेंट विशेष रूप से देने का प्रस्ताव किया होता, तो यह एक विशिष्ट प्रस्ताव होता है।

  • परस्पर प्रस्ताव

जब समान नियम व शर्तों वाले दो प्रस्ताव पोस्ट में एक-दूसरे को काटते हैं, तो उन्हें परस्पर प्रस्ताव कहा जाता है। दोनों ही प्रस्ताव हैं, इनमें से किसी को भी दूसरों के लिए स्वीकृति नहीं माना जाएगा, हालांकि दोनों में नियम और शर्तें समान हैं। उदाहरण के लिए- A, B को अपना मकान 7 लाख में बेचने का प्रस्ताव देता है और B इस बात से अनभिज्ञता में उसी मकान को 7 लाख में खरीदने का प्रस्ताव देता है, तो उन्हें परस्पर प्रस्ताव कहा जाता है, और इस मामले में कोई स्वीकृति नहीं है, इसलिए यह पारस्परिक स्वीकृति नहीं हो सकती हैं। 

  • व्यक्त या निहित प्रस्ताव 

एक प्रस्ताव तब व्यक्त प्रस्ताव माना जाएगा जब वह मौखिक रूप से या लिखित रूप में किया जाए। शब्दों के अलावा किसी अन्य रूप में किया गया प्रस्ताव निहित प्रस्ताव कहलाता है। उदाहरण के लिए- बस या ट्रेन सेवाएं या किसी स्वचालित मशीन में सिक्के डालना या किसी यात्री का बस में चढ़ना। 

  • प्रति-प्रस्ताव (काउंटर ऑफर)

जब प्रस्ताव प्राप्तकर्ता मूल प्रस्ताव के अनुसार संशोधनों और विविधताओं के अधीन प्रस्ताव की अर्हतापूर्वक स्वीकृति प्रदान करता है, तो कहा जाता है कि उसने प्रति प्रस्ताव दिया है। प्रति-प्रस्ताव मूल प्रस्ताव की अस्वीकृति है। उदाहरण के लिए – A, B को 10 लाख में कार देने का प्रस्ताव करता है, B 8 लाख में खरीदने के लिए सहमत होता है, यह प्रति-प्रस्ताव के बराबर है और इसका मतलब मूल प्रस्ताव की अस्वीकृति है। बाद में, यदि B 10 लाख रुपये में खरीदने के लिए सहमत हो जाता है, तो A मना कर सकता है।  प्रति प्रस्ताव वैध प्रस्ताव नहीं है क्योंकि प्रस्ताव की स्वीकृति पूर्णतया और बिना शर्त होनी चाहिए। 

  • प्रस्ताव हेतु आमंत्रण

कभी-कभी कोई व्यक्ति अपने माल या सेवाओं को बेचने का प्रस्ताव नहीं करता है, लेकिन दूसरों को उस आधार पर प्रस्ताव देने के लिए आमंत्रित करने के उद्देश्य से कुछ बयान देता है या कुछ जानकारी देता है। इन बयानों को प्रस्ताव के लिए आमंत्रण माना जाता है। उदाहरण के लिए- पुस्तकों की सूची, नीलामी बिक्री, किसी संस्था या कंपनी की निविदा (टेंडर) की सूचना आदि। 

लालमन शुक्ला बनाम गौरी दत्त (1913) के मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना था कि किसी प्रस्ताव को तभी स्वीकार किया जा सकता है जब उसे प्रस्ताव प्राप्तकर्ता को सूचित कर दिया गया हो। मामले के संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि वादी को प्रतिवादी का गुम हुआ बच्चा मिल गया और उसने इनाम के बारे में जाने बिना ही बच्चे को प्रतिवादी को सौंप दिया। 

प्रतिवादी ने अपने लापता बच्चे को ढूंढने वाले को 501 रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी। लेकिन वादी को इसकी जानकारी नहीं थी और वह प्रतिवादी के अधीन नौकर के रूप में छह महीने तक अपनी सेवाएं देता रहा था। 

बाद में जब उन्हें उस इनाम के बारे में पता चला तो उन्होंने उसे वापस पाने के लिए न्यायालय में मुकदमा दायर किया लेकिन न्यायालय ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया क्योंकि वादी को इनाम की जानकारी नहीं दी गई थी। इसलिए वह इसका लाभ नहीं उठा सका था।

धारा 2(b): वचन

अधिनियम की धारा 2(b) वचन को परिभाषित करती है। कोई प्रस्ताव उस पक्ष द्वारा स्वीकार किया गया माना जाता है जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया गया था, जब वह उस पर अपनी सहमति व्यक्त करता है। एक प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद, एक वचन बन जाता है। प्रस्ताव प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति दिए जाने के बाद, अनुबंध के दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति कानूनी रूप से उत्तरदायी हो जाते हैं। 

प्रस्ताव की तरह स्वीकृति भी व्यक्त या निहित हो सकती है। प्रस्ताव प्राप्तकर्ता के लिए प्रस्ताव स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। वह अपनी इच्छानुसार इसका इन्कार कर सकता है। उदाहरण के लिए, A, B को अपना घर खरीदने का प्रस्ताव देता है और बदले में B 1.5 लाख रुपये की राशि पर प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है। यह एक वचन है।  

वचन के आवश्यक तत्व

एन्सन के शब्दों में, “स्वीकृति वह है जो बारूद की गाड़ी के लिए जलती हुई माचिस है।” यह कुछ ऐसा उत्पन्न करता है जिसे वापस नहीं लाया जा सकता, या पूर्ववत नहीं किया जा सकता है। वैध स्वीकृति के लिए कुछ अनिवार्य बातों का पालन किया जाना चाहिए, जिनमें से कुछ पर नीचे चर्चा की गई है। ये अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत आते हैं।  

संप्रेषित किये जाने की आवश्यकता है

स्वीकृति की सूचना वचनग्रहीता द्वारा वचनदाता को अवश्य दी जानी चाहिए। तभी इसे वैध स्वीकृति माना जाएगा। इसे मौखिक रूप से, लिखित रूप में, या उचित समयावधि के भीतर आचरण द्वारा संप्रेषित किया जा सकता है। इसकी सूचना वचनग्रहीता द्वारा स्वयं या उसके अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से दी जा सकती है। यदि वचनदाता को इसकी सूचना नहीं दी जाती है तो वचनदाता इसके लिए बाध्य नहीं है। 

पूर्ण और अयोग्य

स्वीकृति पूर्ण एवं बिना किसी शर्त के होनी चाहिए। किसी करार के प्रस्ताव को बिना किसी शर्त को जोड़े या संशोधित किए, उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यह बिना किसी शर्त के होना चाहिए, अन्यथा यदि वचनग्रहीता इसमें कोई अन्य शर्त जोड़ना चाहे तो इसे प्रति-प्रस्ताव के रूप में गिना जाएगा। प्रस्ताव को समग्र रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। इसका एक हिस्सा स्वीकार करके दूसरे को छोड़ना संभव नहीं है। 

उचित तरीके से बनाया गया

स्वीकृति किसी सामान्य एवं उचित तरीके से की जानी चाहिए, जब तक कि प्रस्ताव में स्वीकृति का तरीका निर्धारित न किया गया हो। किसी प्रस्ताव की स्वीकृति मौखिक अथवा लिखित रूप में की जा सकती है। स्वीकृति का सामान्य और उचित तरीका अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता है। 

मान लीजिए, A, जो एक ग्रामीण है, द्वारा डाक द्वारा एक प्रस्ताव दिया जाता है। इसलिए, यदि B को पता है कि उस गांव में टेलीफोन सिग्नल कमजोर हैं या हैं ही नहीं, तो वह A को प्रस्ताव स्वीकार करने के बारे में संदेश नहीं भेज सकता है। उसे अपनी स्वीकृति केवल डाक द्वारा ही भेजनी होगी। 

यदि स्वीकृति का कोई विशिष्ट तरीका दिया गया है (उदाहरण के लिए, पत्र या टेलीफोन कॉल के माध्यम से), तो संचार निर्धारित तरीके से ही होना चाहिए। यदि स्वीकृति निर्धारित तरीके से संप्रेषित नहीं की जाती है, तो वचनदाता अनुबंध को रद्द कर सकता है। 

उदाहरण के लिए, A अपना आईफोन B को बेचना चाहता है और कहता है कि प्रस्ताव की स्वीकृति टेलीग्राम संदेश के माध्यम से की जाएगी। लेकिन, B ने कॉल करके अपनी स्वीकृति की सूचना दी। A या तो इसे वैसे ही स्वीकार कर सकता है जैसा वह है या उसे उचित समय के भीतर निर्धारित तरीके से ऐसा करने के लिए कह सकता है। अन्यथा, A इसे रद्द कर सकता है। 

प्रस्ताव अभी भी जारी रहना चाहिए

प्रस्ताव तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कि वचनग्रहीता द्वारा स्वीकृति संप्रेषित न कर दी जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि वचनग्रहीता, स्वीकृति की सूचना मिलने से पहले किसी भी समय अपना प्रस्ताव वापस ले सकता है। 

स्वीकृति के संप्रेषण का मुद्दा फेल्थहाउस बनाम बिंडले (1862) के मामले में उठाया गया था। इस मामले में, फेल्थहाउस ने अपने भतीजे को एक पत्र लिखकर उसका घोड़ा 30-15 डॉलर में खरीदने की पेशकश की। उन्होंने लिखित पत्र में यह भी कहा कि यदि उनका भतीजा जवाब में कुछ नहीं कहता है तो वह घोड़े को अपना घोड़ा मान लेंगे। 

उनके भतीजे ने फेल्थहाउस को कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन अपने नीलामीकर्ता बिंडले से कहा कि वह चाहता है कि वह घोड़ा उसके चाचा को दे दिया जाए और उसने बिंडले को निर्देश दिया कि वह अपना घोड़ा किसी और को न बेचे। लेकिन, गलती से बिंडले ने घोड़ा उसके चाचा के बजाय किसी और को बेच दिया। अब, फेल्थहाउस ने बिंडले पर धर्मांतरण का अपकृत्य का मुकदमा दायर किया और उसने तर्क दिया कि वह घोड़े का मालिक था। 

यह माना गया कि चूंकि प्रस्ताव की स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक को नहीं दी गई थी, इसलिए उनके बीच कोई अनुबंध नहीं हुआ। इसलिए, बिंडले फेल्थहाउस के प्रति उत्तरदायी नहीं है। यह भी माना गया कि केवल चुप्पी स्वीकृति नहीं मानी जा सकती। प्रस्ताव प्राप्तकर्ता ने जवाब न देने का निर्णय लिया और समय बीतने के साथ प्रस्ताव समाप्त हो गया। 

धारा 2(c): वचनदाता और वचनग्रहीता

अधिनियम की धारा 2(c) किसी अनुबंध के दो पक्षों को परिभाषित करती है। वह व्यक्ति जो दूसरे पक्ष के समक्ष प्रस्ताव या पेशकश करता है, उसे वचनदाता कहते हैं तथा वह पक्ष जिसे प्रस्ताव या पेशकश की जाती है, उसे वचनग्रहीता कहते हैं। उदाहरण के लिए, A, B को टेलीग्राम के ज़रिए कोई प्रस्ताव देता है। इस मामले में, A वचनदाता होगा और B वचनग्रहीता होगा। 

धारा 2(d): प्रतिफल

अधिनियम की धारा 2(d) के अनुसार, किसी वचन के लिए प्रतिफल को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि, वचनदाता की इच्छा पर, वचनग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य या चूक प्रतिफल कहलाती है। उस कार्य या चूक को प्रतिफल कहा जाता है। यह वर्तमान, भूतकाल या भविष्य का प्रतिफल हो सकता है। उदाहरण के लिए, A ने महीने के अंत में 50 सीमेंट बैग देने के लिए B के साथ अनुबंध किया। बदले में, B ने वितरण (डिलीवरी) पर 5000 रुपये का भुगतान करने का वचन किया। यहां, अनुबंध के लिए 5000 रुपये प्रतिफल है। 

प्रतिफल के आवश्यक तत्व

प्रतिफल किसी चीज़ के बदले में कुछ प्राप्त करना है, अर्थात पारस्परिक लाभ। यह ऐसी चीज़ होनी चाहिए जिसका कानून की नज़र में मूल्य हो। वैध प्रतिफल के लिए आवश्यक बातों पर निम्नानुसार चर्चा की गई है:

यह  वचनदाता की इच्छा पर ही होना चाहिए

प्रतिफल स्वयं वचनदाता के अनुरोध या मांग पर दिया जाना चाहिए, किसी अन्य व्यक्ति के अनुरोध या मांग पर नहीं। यदि वचनग्रहीता द्वारा स्वेच्छा से प्रतिफल दिया गया हो, तो भी वह वैध नहीं होगा, क्योंकि वह वचनदाता की इच्छा से नहीं दिया गया है। उदाहरण के लिए, A ने एक सार्वजनिक नोटिस प्रदर्शित किया है कि जो कोई भी उसके लापता बच्चे को ढूंढ़ेगा, उसे 1000 रुपये का इनाम दिया जाएगा। यह एक वैध प्रतिफल है। 

वचनग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया गया

अधिनियम की धारा 2(d) के अनुसार प्रतिफल वचनग्रहीता द्वारा स्वयं अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि केवल अनुबंध के पक्ष ही प्रतिफल दें। प्रतिफल देने वाले तीसरे पक्ष का अनुबंध में कुछ हित हो सकता है, लेकिन अनुबंध की गोपनीयता के कारण वह इसके उल्लंघन के मामले में मुकदमा नहीं कर सकता है। 

उदाहरण के लिए, A ने B के साथ एक अनुबंध किया, जिसमें A वचनदाता था और B वचनग्रहीता था। हालाँकि, यह C ही था जिसने A की इच्छा के अनुसार प्रतिफल का भुगतान किया। यह एक वैध प्रतिफल है, यद्यपि अनुबंध के उल्लंघन के मामले में C मुकदमा नहीं कर सकता है।

इसे भूतकाल, वर्तमानकाल या भविष्यकाल में बनाया जा सकता है

भूतपूर्व प्रतिफल से तात्पर्य किसी कार्य के लिए किए गए प्रतिफल से है, जो अनुबंध किए जाने से पहले ही किया जा चुका है। उदाहरण के लिए, A ने एक महीने तक B के लॉ चैंबर में अपनी सेवाएं प्रदान कीं और इसके अंत में B ने A को 5000 रुपये का भुगतान किया। 

वर्तमान प्रतिफल से तात्पर्य उस प्रतिफल से है जो निष्पादित कार्य के साथ-साथ दिया जाता है। उदाहरण के लिए, A एक स्थानीय दुकान से एक दीवार घड़ी खरीदता है और दुकानदार को इसके लिए 2000 रुपये का भुगतान करता है। 

भावी प्रतिफल से तात्पर्य उस प्रतिफल से है जो भविष्य में तब दिया जाना आवश्यक है जब वचनग्रहीता द्वारा निर्दिष्ट कार्य किया जाएगा। उदाहरण के लिए, A अपनी फसल कटने पर B को बेचने का वचन देता है और उस समय B इसके लिए आवश्यक राशि का भुगतान करेगा। 

वचनग्रहीता द्वारा किया गया कार्य, संयम या वचन

वचनग्रहीता को कोई कार्य करना होगा या कुछ करने से रोकना होगा या कोई वचन देना होगा जो वैध प्रतिफल का भाग बनता है। प्रतिफल किसी चीज़ के लिए कुछ है। इसलिए, वचनग्रहीता को वचनदाता द्वारा दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार करने के बदले में कुछ करना पड़ता है। 

प्रतिफल पर्याप्त होना आवश्यक नहीं है

प्रतिफल के लिए एक सामान्य सिद्धांत है जो कहता है कि “प्रतिफल की पर्याप्तता पर पक्षों को करार करते समय विचार करना होता है, न्यायालय को नहीं जब इसे लागू करने की मांग की जाती है।” उदाहरण के लिए, A ने अपना घोड़ा B को मात्र 10 रुपये में बेच दिया, जबकि घोड़े की कीमत लगभग 1000 रुपये थी। यहां दोनों पक्षों की सहमति स्वतंत्र थी और कानून की नजर में 10 रुपये की राशि का भी कुछ मूल्य है। यद्यपि यह पर्याप्त प्रतिफल नहीं है, फिर भी यह कानून के अनुसार वैध है। 

हालांकि, यदि यह पर्याप्त न भी हो तो भी दोनों पक्षों की ओर से कुछ दायित्व और प्रतिफल अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए, A, B को 1000 रुपये की राशि देने का वचन देता है, बदले में कोई प्रतिफल दिए बिना या वचन दिए बिना। यह एक शून्य अनुबंध है क्योंकि इसमें कम से कम कुछ प्रतिफल अवश्य होना चाहिए। 

वैध प्रतिफल के आवश्यक तत्वों को समझने के लिए, आइए हम कानूनी मामलों पर नजर डालते है। दुर्गा प्रसाद बनाम बलदेव (1880) के मामले में, वादी ने कलेक्टर के कहने पर एक बाजार में कुछ दुकानों का निर्माण किया। इसके बाद, एक दुकान पर प्रतिवादी ने कब्जा कर लिया। चूंकि वादी ने निर्माण पर पैसा खर्च किया था, इसलिए प्रतिवादी ने बेची गई वस्तुओं पर कुछ दलाली देने का वचन  दिया। 

वह वादी को दलाली देने में असफल रहे और इसके लिए उन पर मुकदमा चलाया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि भवन कलेक्टर की इच्छा से बनाया गया था, वादी की इच्छा से नहीं। चूंकि प्रतिफल वादी की इच्छा पर नहीं दिया गया था, इसलिए वह दलाली पाने का हकदार नहीं था। 

अब्दुल अज़ीज़ बनाम मासूम अली (1914) के एक अन्य मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि करार में क्विड प्रो क्यो (कुछ के बदले कुछ) पहलू अनुपस्थित था, इसलिए, कोई वैध प्रतिफल नहीं था, और करार को लागू नहीं किया जा सकता था। 

राजलुखी दबी बनाम भूतनाथ मुखर्जी (1900) के मामले में, प्रतिवादी ने अपनी पत्नी को भरण-पोषण के रूप में एक निश्चित राशि देने का वचन दिया था। उन्होंने इस विषय पर एक अलग करार किया जिसमें करार की शर्तों के साथ उनके बीच की स्थितियों का विस्तार से उल्लेख किया गया था। 

बाद में, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि यह करार प्रेम और स्नेह के कारण किया गया था और इसमें कानूनी संबंध बनाने का कोई इरादा नहीं था। हालांकि, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच कोई प्रेम और स्नेह नहीं था और भरण-पोषण राशि के भुगतान के लिए एक लिखित करार किया गया था। इसलिए, यह बाध्यकारी प्रकृति वाला एक वैध प्रतिफल है। 

अधिनियम की प्रतिफल से संबंधित अन्य धाराओं का भी संक्षेप में अध्ययन किया जाना आवश्यक है। आईसीए, 1872 की धारा 23 में कहा गया है कि प्रतिफल वैध होना चाहिए। इसका अर्थ है कि प्रतिफल का उद्देश्य वैध होना चाहिए। इसमें यह भी बताया गया है कि कब किसी प्रतिफल को गैरकानूनी माना जाएगा: 

  1. यह कानून द्वारा निषिद्ध है; या
  2. ऐसी प्रकृति का जो किसी कानून के किसी प्रावधान को पराजित करता हो; या
  3. कपट; या
  4. किसी अन्य व्यक्ति या संपत्ति को चोट पहुंचाना; या
  5. न्यायालय द्वारा अनैतिक या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध माना गया। 

अधिनियम की धारा 24 के अनुसार, इनमें से प्रत्येक मामले में, गैरकानूनी प्रतिफल के कारण, अनुबंध को शून्य घोषित किया जाएगा। यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए एकल प्रतिफल का एक भाग गैरकानूनी है या यदि किसी एक उद्देश्य के लिए कई प्रतिफलों में से एक या उसका एक भाग गैरकानूनी है, तो अनुबंध शून्य हो जाएगा। 

उदाहरण के लिए, A, B के साथ 10 ग्राम गांजा और डॉक्टर द्वारा निर्धारित अन्य दवाइयां 10,000 रुपये में बेचने का अनुबंध करता है। यह अनुबंध शून्य है क्योंकि इसका उद्देश्य कुछ भागों में गैरकानूनी है। यदि हम इसमें से गांजा हटा दें तो यह एक वैध अनुबंध होगा। 

धारा 2(e): करार

करार शब्द को आईसीए की धारा 2(e) द्वारा परिभाषित किया गया है। यह करार को एक वादे या वादों के समूह के रूप में परिभाषित करता है जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल का निर्माण करते हैं। सरल शब्दों में, करार एक प्रस्ताव है जिसे दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। इसलिए, किसी करार के लिए कम से कम दो पक्षों की आवश्यकता होती है। 

किसी भी अनुबंध में दो पक्ष होने चाहिए, क्योंकि एक पक्ष प्रस्ताव दे रहा होता है और दूसरा पक्ष उसे स्वीकार कर रहा होता है। उदाहरण के लिए, A, B को दक्षिण दिल्ली स्थित अपना मकान 1,00,000 रुपये में बेचने का प्रस्ताव देता है और B इससे सहमत हो जाता है। यह कहा जा सकता है कि A और B एक दूसरे से सहमत हैं। 

ध्यान देने योग्य एक और बात यह है कि करार में दोनों पक्षों को एक ही बात पर सहमत होना चाहिए। इसमें विचारों का मिलन अर्थात सर्वसम्मति होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, A, B को दक्षिण दिल्ली स्थित अपना मकान 1,00,000 रुपये में बेचने का प्रस्ताव देता है, लेकिन B, A के उत्तर दिल्ली स्थित मकान को खरीदने के लिए सहमत हो जाता है, जिसके लिए कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया था। वे एक ही बात पर सहमत नहीं हैं। इसलिए, उनके बीच कोई करार नहीं है। 

इसके विपरीत, अनुबंध एक विशिष्ट प्रकार का करार है जो अपनी शर्तों और तत्वों के आधार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी और न्यायालय में लागू करने योग्य होता है। यद्यपि प्रत्येक अनुबंध एक करार है, किन्तु प्रत्येक करार एक अनुबंध नहीं है। एक करार में मोटे तौर पर एक प्रस्ताव और उसकी स्वीकृति शामिल होती है, और इन सभी को एक उचित अवधि के भीतर संचार द्वारा एक साथ बांधा जाना चाहिए। 

धारा 2(f): व्यतिकारी (रेसिप्रोकल) वचन 

आईसीए की धारा 2(f) व्यतिकारी वचन को उन वादों के रूप में परिभाषित करती है जो या तो संपूर्ण प्रतिफल या उसका एक भाग होते हैं। दूसरे शब्दों में, एक पक्ष के दायित्व का निष्पादन दूसरे पक्ष द्वारा अपने व्यक्त या निहित दायित्व को पूरा करने पर निर्भर है। 

उदाहरण के लिए, X, Y से 25 लाख रुपये मूल्य का मकान खरीदना चाहता है। Y उक्त राशि पर अपना मकान X को बेचने के लिए सहमत हो जाता है। यहां, X राशि का भुगतान करने का वचन देता है और Y घर का स्वामित्व X को हस्तांतरित करने का वचन देता है, जिससे यह दोनों तरफ से एक व्यतिकारी वचन बन जाता है। 

ये व्यतिकारी वचन एक वैध प्रतिफल बनाते हैं। अधिनियम की धारा 51 से धारा 57 में उन शर्तों को निर्दिष्ट किया गया है जिन्हें व्यतिकारी अनुबंधों के निष्पादन के लिए पूरा किया जाना आवश्यक है। बेहतर समझ के लिए प्रावधानों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है: 

  • धारा 51: यदि किसी अनुबंध का कोई पक्ष अपने वचन का पालन करने के लिए तैयार नहीं है, तो विरोधी पक्ष भी अपने वचन का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है। 
  • धारा 52: वचनों  का पालन अनुबंध में दिए गए अनुक्रम में किया जाना चाहिए। यदि कोई निश्चित क्रम नहीं है, तो वचनों की प्रकृति से निष्पादन के क्रम का पता लगाना आवश्यक है। 
  • धारा 53: यदि किसी अनुबंध का एक पक्ष दूसरे पक्ष को उसके दायित्व को पूरा करने से रोकता है या उसके लिए असंभव बनाता है, तो प्रभावित पक्ष के पास या तो अनुबंध को शून्य घोषित करने या मुआवजे की मांग करने का विकल्प होता है। 
  • धारा 54: जब व्यतिकारी वचन इस शर्त पर निर्भर होते हैं कि एक कार्य के बाद दूसरे कार्य को निष्पादित करना आवश्यक है, तो जिस पक्ष को पहले कार्य करना है, वह अपना वचन पूरा किए बिना दूसरे पक्ष से अपना वचन निष्पादित करने के लिए नहीं कह सकता है। 
  • धारा 55: दिए गए समय के भीतर वचन पूरा करने में विफल रहने की स्थिति में, प्रभावित पक्ष या तो अनुबंध को शून्य घोषित कर सकता है या हुई हानि के लिए मुआवजे का दावा कर सकता है। 
  • धारा 56: किसी असंभव कार्य के लिए किए गए व्यतिकारी वचन शून्य हैं। 
  • धारा 57: पक्ष वैध कार्यों के लिए अनुबंध में प्रवेश करते हैं लेकिन बाद में, वे कुछ गैरकानूनी कार्य करने का वचन देते हैं। अतः पहले किए गए वैध कार्य वैध होंगे तथा बाद के कार्य शून्य होंगे।

धारा 2(g): शून्य करार

धारा 2(g) के अनुसार, वे सभी करार जो कानून द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, शून्य करार हैं। शून्य शब्द का मूलतः अर्थ है कि इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। कुछ ऐसे करार हैं जिन्हें भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित किया गया है। इसमें दांव लगाने (वेजरिंग) संबंधी करार, व्यापार या विवाह पर रोक लगाने के लिए किए गए करार, ऐसे करार जिनमें दोनों पक्षों को किसी तथ्य के बारे में गलतफहमी हो, आदि शामिल हैं। 

उदाहरण के लिए, A और B ने एक पालतू कुत्ते के झुंड की खरीद के संबंध में एक करार किया। हालाँकि, करार के समय कुत्ते की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी। चूंकि दोनों पक्षों को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी, इसलिए यह करार शून्य हो गया। 

धारा 2(h): अनुबंध

धारा 2(h) अनुबंध को एक ऐसे करार के रूप में परिभाषित करती है जो कानून द्वारा प्रवर्तनीय है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी अनुबंध के दो प्राथमिक तत्व होते हैं: करार और प्रवर्तनीयता। यह अनुबंध के पक्षों के बीच समतुल्य अधिकार और दायित्व स्थापित करता है। यदि उनमें से कोई एक पक्ष अपने दायित्वों का पालन करने में विफल रहता है, तो दूसरे पक्ष को अदालत में कार्रवाई का अधिकार होगा। 

दूसरे शब्दों में, अनुबंध एक औपचारिक दस्तावेज है जिसे दोनों पक्षों, वचनदाता और वचनग्रहीता द्वारा स्वीकार किया जाता है, और यह किसी भी व्यापारिक लेन-देन की आधारशिला है। यह दो या अधिक पक्षों के बीच एक निश्चित कार्य करने या उससे प्रविरत करने का करार है। सर विलियम एन्सन ने अनुबंध को इस प्रकार परिभाषित किया है, “दो व्यक्तियों के बीच एक कानूनी रूप से लागू करने योग्य करार जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्तियों को कानूनी अधिकार मिलता है और कुछ को कानूनी जिम्मेदारियां पूरी करनी होती हैं।”

इसलिए, अनुबंध दो या दो से अधिक सक्षम पक्षों के बीच आपसी वादों के आधार पर किया गया एक करार है, जिसमें किसी विशेष कार्य को करने या न करने का प्रावधान है, जो न तो अवैध है और न ही असंभव है। इस करार के परिणामस्वरूप कोई दायित्व या कर्तव्य उत्पन्न होता है जिसे न्यायालय में लागू किया जा सकता है। इस करार के परिणामस्वरूप कानूनी रूप से लागू करने योग्य अनुबंध सामने आए, क्योंकि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति व्यक्त की हैं।  

वैध अनुबंध की अनिवार्यताएं

केवल वैध अनुबंध ही कानून द्वारा प्रवर्तनीय होता है, तथा वैध होने के लिए अनुबंध को कुछ शर्तों को पूरा करना होता है। यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती तो वह अनुबंध शून्य माना जाएगा। इस उपधारा का परिमाण धारा 10 से धारा 30 तक 20 धाराओं में परिकल्पित है। 

आईसीए की धारा 10 यह निर्धारित करती है कि कौन से करार कुछ शर्तों की पूर्ति के आधार पर अनुबंध हैं। यदि अलग से देखा जाए तो धारा 2(h) का वास्तविक जीवन में कोई व्यावहारिक अनुप्रयोग नहीं होगा, यही कारण है कि धारा 2(h) को आईसीए की अन्य प्रासंगिक धाराओं के संदर्भ में पढ़ना आवश्यक हो जाता है। धारा 10 के अंतर्गत एक वैध अनुबंध के आवश्यक तत्वों पर निम्नानुसार चर्चा की गई है: 

पक्षों के बीच समझौता

पक्षों के बीच सहमति अर्थात सर्वसम्मति होनी चाहिए। दोनों पक्षों को एक ही बिंदु पर परस्पर सहमत होना होगा। 

स्वतंत्र सहमति

किसी अनुबंध के निर्माण में शामिल सभी पक्षों को स्वतंत्र रूप से सहमति देनी होगी। उन्हें एक ही बात पर एक ही अर्थ में सहमत होना चाहिए। धारा 14 में स्वतंत्र सहमति की व्याख्या की गई है, और निम्नलिखित धाराओं में स्वतंत्र सहमति में क्या शामिल नहीं है, इसकी विशेष परिभाषा दी गई है। यदि इनमें से कोई भी पांच कारक सहमति को प्रभावित करते हैं तो अदालत द्वारा सहमति को स्वतंत्र सहमति नहीं माना जाएगा: 

  1. प्रपीड़न (कोअर्शन) (धारा 15) – प्रपीड़न का अर्थ है किसी के साथ अनुबंध करने के उद्देश्य से उसे धमकाना। इसमें ऐसा कार्य करना या निष्पादित करना शामिल है जो कानून द्वारा निषिद्ध है, जैसे कि किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने वाली संपत्ति को अवैध रूप से रोकना या उसे अपने कब्जे में रखने की धमकी देना। 

उदाहरण के लिए, A और B बाजार में खरीदारी करने गए। अचानक, चार लोगों का एक समूह आया और उन पर बंदूक तान दी तथा उनसे नकदी के साथ-साथ अपने सभी सोने के आभूषण सौंपने को कहा। यहाँ, A और B को धमकी देकर उनकी सहमति प्राप्त की जाती है।

2. अनुचित प्रभाव (धारा 16) – किसी अनुबंध के किसी पक्ष को अनुचित प्रभाव में तब माना जा सकता है जब उनके बीच विश्वास का रिश्ता हो तथा पक्षों में से एक पक्ष दूसरे पर प्रभुत्व रखता हो। प्रभावशाली व्यक्ति को दूसरे से अनुचित लाभ पाने का प्रयास करना चाहिए। 

उदाहरण के लिए, श्री एंड्रयू, जो एक बूढ़े व्यक्ति थे, अपनी भतीजी सना के साथ रहते थे। वह पूरे दिन उसकी देखभाल करती थी और उसके दैनिक कामों में उसकी मदद करती थी। एक दिन सना ने उससे संपत्ति के कागजात पर हस्ताक्षर करने की मांग की क्योंकि वह अपना सारा समय उसकी देखभाल में लगा रही थी। उसने उसे ऐसा करने के लिए मजबूर भी किया। इसलिए, इस मामले में, अनुबंध वैध नहीं होगा क्योंकि यह अनुचित प्रभाव से प्रभावित हुआ है। 

3. कपट (धारा 17) – कपट के मामले में, अनुबंध के पक्षों में से एक का दूसरे पक्ष को धोखा देने का दुर्भावनापूर्ण आशय होता है। ऐसा वह या तो झूठा बयान देकर करता है, जिसके बारे में वह जानता है कि वह झूठा है, या फिर महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर करता है। कपट के मामले में, अनुबंध उस पक्ष के विकल्प पर शून्यकरणीय (वायडेबल) है जिसके साथ कपट किया गया है। उदाहरण के लिए, एक नीलामी में A अपना घोड़ा बेचता है और जानता है कि उसका दिमाग विकृत चित्त है। लेकिन, वह खरीददार B से कहता है कि उसका घोड़ा स्वस्थ और ठीक है।  A को कपट के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

एक और बात जो ध्यान में रखने योग्य है वह यह है कि किसी बात पर केवल चुप रहना कपट नहीं है, जब तक कि परिस्थितियां ऐसी न हों कि मौन रहना बोलने के बराबर हो। उदाहरण के लिए, A, B से कहता है कि वह उसका मकान 10 लाख रुपये में खरीदना चाहता है और “यदि आप कुछ नहीं कहते हैं, तो मैं मान लूंगा कि आप इसे मुझे बेच रहे हैं।” B ने कुछ नहीं कहा और बाद में उसे किसी और को बेच दिया। यह कपट है, क्योंकि इस स्थिति में मौन रहना बोलने के बराबर है। 

4. दुर्व्यपदेशन ( मिसरिप्रजेंटेशन) (धारा 18) – दुर्व्यपदेशन से तात्पर्य मूलतः अनुबंध से संबंधित तथ्य को गलत तरीके से प्रस्तुत करना है और इसके परिणामस्वरूप, ऐसी सूचना दूसरे पक्ष को अनुबंध में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करती है। सबसे पहले, जो व्यक्ति ऐसा बयान देता है, वह उसे सत्य मानता है, हालांकि वह जानकारी झूठी होती है और वह इसकी गारंटी नहीं दे सकता है। 

दूसरे, इसमें ऐसे व्यक्ति द्वारा दिए गए बयान भी शामिल हैं, जिसका कोई कपटपूर्ण आशय नहीं है, लेकिन वह अपने कर्तव्य का उल्लंघन करता है और दूसरे को गुमराह करके उस पर कुछ लाभ प्राप्त करता है। तीसरा, दुर्व्यपदेशन तब भी की जा सकती है जब बयान देने वाला व्यक्ति दूसरे पक्ष को अनुबंध में किसी महत्वपूर्ण चीज के संबंध में गलती करने के लिए प्रेरित करता है। वह अनुबंध जो मिथ्या-बयान से प्रभावित होता है, उस पक्ष के विकल्प पर शून्यकरणीय होता है, जो ऐसे दुर्व्यपदेशन से हानि उठाता है। 

उदाहरण के लिए, A ने अपना टेलीविजन B को यह कहकर बेचा कि यह बिल्कुल ठीक काम करता है। B को A पर भरोसा था और उसने उचित मूल्य पर इसे खरीद लिया। एक महीने के बाद, इसने काम करना बंद कर दिया और B को लगा कि A उसे गुमराह कर रहा है। बाद में, A ने बताया कि उसका उसे धोखा देने का कोई आशय नहीं था, क्योंकि उसका मानना था कि यह पूरी तरह से काम करने की स्थिति में है। अतः, यहां A ने तथ्यों दुर्व्यपदेशन किया है। 

5. गलती (धारा 20, धारा 21, धारा 22) – अधिनियम के अंतर्गत ‘गलती’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। इसका मूलतः अर्थ है अनुबंध से संबंधित किसी महत्वपूर्ण तथ्य के संबंध में गलती, तथा यह गलती अनुबंध के किसी भी पक्ष द्वारा की जा सकती है। यह जानबूझकर नहीं किया गया है तथा यह भ्रम या लापरवाही के कारण किया गया हो सकता है। ऐसे अनुबंध शून्य होते हैं क्योंकि पक्षों में कोई सर्वसम्मति (एक ही अर्थ में एक ही बात पर सहमत होना) नहीं होती। 

लेकिन कानून की गलती को गलती नहीं माना जाता है और ऐसा अनुबंध शून्य है क्योंकि यह इग्नोरेंटिया ज्यूरिस नॉन-एक्सक्यूसैट के सिद्धांत का पालन करता है, अर्थात कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है। उदाहरण के लिए, फ्रांस से जापान को माल निर्यात किया जाना था लेकिन जहाज बीच में ही भटक गया। दोनों पक्षों को इसकी जानकारी नहीं थी और किसी ने भी जानबूझकर ऐसा नहीं किया। तो, यह तथ्य की गलती थी। 

चिक्कम शेषम्मा बनाम चिक्कम अम्मीराजू (1917) के मामले में, यह माना गया कि आत्महत्या की धमकी प्रपीड़न के समान है। अनुबंध को शून्य घोषित कर दिया गया क्योंकि दी गई सहमति स्वतंत्र नहीं थी। हालाँकि, अस्करी मिर्ज़ा बनाम बीबी जय किशोरी (1912) 16 आईसी 344 के मामले में, यह माना गया कि आपराधिक अभियोजन एक धमकी नहीं है, बल्कि उनके खिलाफ गलत किए जाने के मामले में पीड़ित पक्ष का अधिकार है, और इस प्रकार पक्षों के बीच अनुबंध वैध था। 

अनुबंध करने में सक्षम

अधिनियम की धारा 11 के अनुसार, किसी करार को वैध अनुबंध तब कहा जाता है जब उस करार में प्रवेश करने वाले पक्ष अनुबंध करने के लिए सक्षम हों, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति वयस्कता की आयु से अधिक होना चाहिए, स्वस्थ दिमाग का होना चाहिए, तथा कानून द्वारा अयोग्य नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि कोई नाबालिग भूमि की बिक्री के संबंध में कोई अनुबंध करता है, तो उसे आरंभ से ही शून्य घोषित कर दिया जाएगा – यह सिद्धांत मोहोरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903) के मामले में स्थापित किया गया था। 

वैध प्रतिफल

प्रतिफल एक ऐसी चीज है जिसका कानून की दृष्टि में कुछ मूल्य होता है और पक्षों के बीच अनुबंध वैध प्रतिफल पर किया जाना चाहिए। इसमें वर्तमान में लागू किसी कानून का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, ऐसा कोई कार्य या चूक नहीं होनी चाहिए जिसे कानून द्वारा प्रतिबंधित किया गया हो, कपटपूर्ण नहीं होना चाहिए, तथा नैतिक या सार्वजनिक नीति के विपरीत नहीं होना चाहिए। अनुबंध के लिए प्रतिफल पर्याप्त होना आवश्यक नहीं है, परंतु इतना अवश्य होना चाहिए कि उसका कुछ मूल्य हो।

मान लीजिए, A, B से कहता है कि वह उसे किसी सरकारी संगठन में नौकरी दिला सकता है और इसके लिए उसे 1 लाख रुपये देने होंगे। यह प्रतिफल गैर-कानूनी है क्योंकि यह रिश्वतखोरी के समान है और सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है। 

करार के वैध उद्देश्य

यह आवश्यक है कि अनुबंध का उद्देश्य कानूनी होना चाहिए। न्यायालय ऐसे अनुबंध को लागू नहीं करेगा जो अवैध या सार्वजनिक नीति के विपरीत हो। अवैध अनुबंधों को या तो क़ानून द्वारा या सामान्य कानून द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। उदाहरण के लिए, यदि दो व्यक्ति सक्रिय इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथेनेसिया) के लिए अनुबंध करते हैं, तो न्यायालय द्वारा उस अनुबंध को शून्य घोषित कर दिया जाएगा। 

उधू दास बनाम प्रेम प्रकाश (1963) के मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक प्रतिफल या उद्देश्य वैध है जब तक कि उसे कानून द्वारा निषिद्ध न किया गया हो या वह ऐसी प्रकृति का न हो कि यदि उसे अनुमति दी गई तो वह किसी भी कानून के प्रावधानों को पराजित कर देगा। 

किसी भी कानून द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित नहीं किया गया

कुछ ऐसे करार हैं जिन्हें कानून द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित किया गया है। ऐसे करार प्रवर्तनीय नहीं होते और पक्षों पर बाध्यकारी नहीं माने जाते है। उदाहरण के लिए, व्यापार पर प्रतिबंध लगाने वाले करार, विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाले करार, दांव लगाने के करार, असंभव कार्य करने के करार, बिना किसी स्पष्ट अर्थ वाले करार, या असंभव कार्य करने की शर्त पर निर्भर करार। 

उदाहरण के लिए, A और B दोनों भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व कप फाइनल मैच देख रहे हैं। A शर्त लगाता है कि अगर भारत जीतता है, तो B को A को 5000 रुपये देने होंगे और इसके विपरीत। ऐसा करार शून्य है क्योंकि यह एक दांव लगाने वाला करार है। 

करार और अनुबंध के बीच अंतर

करार और अनुबंध के बीच अंतर को बेहतर ढंग से समझने के लिए, आइए निम्नलिखित तालिका देखें: 

कारक करार अनुबंध
परिभाषा करार को एक प्रस्ताव के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसे विचार-विमर्श के बाद दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। अनुबंध को कानून द्वारा प्रवर्तनीय करार के रूप में परिभाषित किया जाता है।
प्रतिफल के आधार पर इसे बिना किसी प्रतिफल के बनाया जा सकता है। इसे बिना प्रतिफल के नहीं बनाया जा सकता है।
प्रवर्तनीयता यह कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज़ नहीं है। जब कोई करार अधिनियम की धारा 10 के अंतर्गत निर्धारित सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है, तो वह अनुबंध बन जाता है और कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज बन जाता है।
अधिनियम की किस धारा के अंतर्गत परिभाषित अधिनियम की धारा 2(e) के तहत करार को परिभाषित किया गया है। अनुबंध को अधिनियम की धारा 2(h) के तहत परिभाषित किया गया है।
दस्तावेज़ का तरीका करार मौखिक या लिखित हो सकता है। लिखित अनुबंधों को आम तौर पर प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि उनके उल्लंघन के मामले में उन्हें आसानी से साबित किया जा सकता है। लेकिन मौखिक अनुबंध भी हो सकते हैं जिन्हें ‘मौखिक या पैरोल  अनुबंध’ के रूप में जाना जाता है।
प्रकृति सामाजिक और घरेलू परिदृश्यों में उपयोग किए जाने के कारण करार अनौपचारिक भी हो सकते हैं। अनुबंध अधिक औपचारिक प्रकृति के होते हैं।
साक्ष्य मूल्य करार प्रवर्तनीय नहीं होते और इसलिए उनका कोई साक्ष्यात्मक मूल्य नहीं होता। अनुबंध, करारों की तुलना में साक्ष्य के रूप में अधिक प्रभावी और ठोस होते हैं, विशेषकर यदि करार मौखिक रूप से किया गया हो।

डिजिटल युग में अनुबंध

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 एक उत्कृष्ट कानून है, लेकिन अन्य सभी चीजों की तरह, इसे भी प्रासंगिक और उपयोगी बने रहने के लिए समय के साथ बदलने की आवश्यकता है। वर्तमान कारोबारी माहौल में इसका महत्व कई गुना बढ़ गया है, क्योंकि विभिन्न पक्षों के बीच अनुबंधों में उल्लेखनीय वृद्धि के कारण विवाद उत्पन्न हो रहे हैं। यद्यपि धारा 2 के अंतर्गत इसे परिभाषित नहीं किया गया है फिर भी आज के समय में इसे समझना महत्वपूर्ण है। 

आज की दुनिया डिजिटल वातावरण से घिरी हुई है, जहां सब कुछ ऑनलाइन हो रहा है, यहां तक कि अनुबंध भी ऑनलाइन हो रहे है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इंटरनेट हर किसी के लिए चीजों को आसानी से उपलब्ध कराता है, यहां तक कि घर बैठे भी। इलेक्ट्रॉनिक अनुबंधों का जन्म गति, आसानी और उत्पादकता की आवश्यकता से हुआ है। यद्यपि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत ई-अनुबंध वैध हैं, फिर भी ऑनलाइन अनुबंधों के निष्पादन में कुछ असुरक्षा की भावना बनी रहती है। 

ई-अनुबंधों के निर्माण के संबंध में नियमों को और अधिक स्पष्टता प्रदान करते हुए, संशोधन में ई-अनुबंधों में अधिकार क्षेत्र, पक्षों के अधिकारों और दायित्वों तथा एक पक्ष द्वारा एकतरफा गलतियों के मामलों से संबंधित प्रश्नों का समाधान करने की आवश्यकता है। 

नाबालिग का दायित्व

यहां तक कि नाबालिग भी डिजिटल अनुबंध कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल मंच तक पहुंच है। लेकिन हमें यह देखना होगा कि यदि नाबालिग कोई अनुबंध करते हैं तो उनकी जिम्मेदारी क्या है। नाबालिगों के प्रति भारतीय कानून की वर्तमान स्थिति (जैसा कि विशिष्ट अनुतोष  (रिलीफ) अधिनियम, 1963 की धारा 33 से व्याख्या की गई है) में ऐसी खामियां पैदा हो गई हैं, जिनका उपयोग नाबालिग उत्तरदायित्व से बचने के लिए कर सकते हैं और अधिनियम में स्वयं इस संबंध में कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। 

मोहिरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903) के मामले में, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 65 के आवेदन को चुनौती दी गई थी। प्रिवी काउंसिल ने माना कि यह तर्क तभी मान्य हो सकता है जब पक्ष कानूनी रूप से अनुबंध करने में सक्षम हों। 

हालांकि, अपनी 13वीं रिपोर्ट में भारतीय विधि आयोग ने कहा कि उनका मानना है कि प्रिवी काउंसिल द्वारा गलत व्याख्या की गई है और सिफारिश की गई है कि यदि कोई नाबालिग इस गलत बयान पर करार करता है कि वह बालिग है तो इसमें स्पष्टीकरण जोड़ा जाना चाहिए। 

अनुबंध की अनुचित शर्तों का विनियमन

अनुबंधों में अनुचितता को विनियमित करने वाले सिद्धांतों को विकसित करना आवश्यक है, क्योंकि आजकल ऑनलाइन धोखाधड़ी एक आम बात हो गई है।  इसका विभिन्न अनुबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, जिनमें ऋण करार, बिल्डर-डेवलपर करार, ऋण उपकरण, मकान मालिक-किराएदारी करार, सरकारी अनुबंध और मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) करार शामिल हैं। 

अधिकांश विकसित प्रणालियों ने अनुबंधों में अनुचितता से निपटने के तरीके विकसित कर लिए हैं तथा प्रक्रियागत और वास्तविक अनुचितता की संभावना को मान्यता दे दी है। कानूनी विशेषज्ञ इस बात पर आम सहमति रखते हैं कि अदालतों को अनुचितता के मुद्दे से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए, भले ही पक्षों ने ऐसी दलील न दी हो। अपनी 103वीं रिपोर्ट में विधि आयोग ने अनुचित शर्तों के मामले पर विचार किया, जिस पर निर्णय लंबित है। 

धारा 2(i): शून्यकरणीय अनुबंध

आईसीए की धारा 2(i) शून्यकरणीय अनुबंधों को ऐसे अनुबंधों के रूप में परिभाषित करती है जो एक या अधिक पक्षों के विकल्प पर प्रवर्तनीय होते हैं, लेकिन दूसरे या अन्यों के विकल्प पर नहीं। इस प्रकार के करार शुरू में वैध होते हैं और करार में त्रुटि के कारण नुकसान उठाने वाले पक्ष के विकल्प पर इन्हें रद्द किया जा सकता है। 

उदाहरण के लिए, A, B पर बंदूक तानता है और उससे अपने नाम की संपत्ति के कागजात पर हस्ताक्षर करने के लिए कहता है। अपनी जान जाने के डर से B ने कागजात पर हस्ताक्षर कर दिये। यह अनुबंध B के विकल्प पर शून्यकरणीय है क्योंकि यह अनुबंध स्वतंत्र सहमति से नहीं किया गया था। 

बावल्फ ग्रेन बनाम रॉस (1917) के ऐतिहासिक मामले में, एक गेहूं उत्पादक ने एक व्यक्ति के साथ गेहूं की आपूर्ति करने का अनुबंध किया, जबकि वह व्यक्ति नशे में था। परिणामस्वरूप, वह अपना वचन पूरा करने में असफल रहे क्योंकि इस बीच बाजार में गेहूं की कीमतें बढ़ गईं। 

अदालत ने माना कि अनुबंध उस समय किया गया था जब अनुबंध का एक पक्ष नशे में था। इसलिए, दूसरे पक्ष के पास यह विकल्प है कि वह या तो अनुबंध को वैध मान ले या उसे शून्य घोषित कर दे। यह शून्यकरणीय अनुबंध का एक उदाहरण है। 

अधिनियम के अनुसार कुछ अनुबंध शून्यकरणीय हैं: 

  • स्वतंत्र सहमति के अभाव के कारण निरस्तीकरण योग्य (धारा 19), जैसे कि प्रपीड़न, अनुचित प्रभाव, दुर्व्यपदेशन और कपट से किए गए अनुबंध 
  • अनुचित प्रभाव से प्रेरित अनुबंध को रद्द करने की शक्ति (धारा 19A)
  • किसी एक पक्ष द्वारा बाद में किए गए चूक के कारण शून्यकरणीय, जैसे कि वचन पूर्णतः पूरा करने से इनकार करना (धारा 39)।
  • एक पक्ष के कार्य से निर्मित अनुबंध के निष्पादन की असंभवता के कारण शून्यकरणीय (धारा 53)।
  • निर्धारित समय पर अनुबंध पूरा न होने के कारण शून्यकरणीय किया जा सकता है (धारा 55)। 

धारा 2(j): शून्य अनुबंध

आईसीए की धारा 2(j) में कहा गया है कि जो करार पहले वैध थे, वे तब शून्य हो जाएंगे जब उनका कानूनी प्रभाव समाप्त हो जाएगा। अब यह कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। 

उदाहरण के लिए, A, B को पांच वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपये का ऋण देता है। अनुबंध के अनुसार, B को ऋण राशि 5% प्रति वर्ष ब्याज दर के साथ चुकानी होगी। B की मृत्यु पांच वर्ष की अवधि से पहले हो जाती है। इसलिए, यह अनुबंध शून्य हो जाता है और इसे लागू नहीं किया जा सकता है। 

निष्कर्ष

बाध्यकारी अनुबंधों की संभावना के बिना आधुनिक समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अनुबंध न केवल व्यवसायों को वस्तुओं का व्यापार करने और सेवाएं प्रदान करने की अनुमति देते हैं, बल्कि नागरिक भी दैनिक जीवन में चीजों को प्राप्त करने के लिए अनुबंधों का उपयोग करते हैं, भले ही उन्हें हमेशा इसका एहसास न हो। अनुबंध कानून वर्तमान समाज का एक हिस्सा है और इसके बिना समाज की कल्पना करना लगभग असंभव है। 

समग्र दृष्टिकोण से देखने पर यह बात समझ में आती है कि आवश्यक शर्तों को पूरा करने से अनुबंध पूरी तरह से सहमति और कानूनी रूप से बनता है, तथा अपवादस्वरूप परिस्थितियों को छोड़कर, इसका उल्लंघन या गैर-निष्पादन अस्वीकार्य है। यह समझ भारतीय अनुबंध अधिनियम के व्याख्या खंड का इसमें मौजूद अन्य धाराओं के संदर्भ में गहन विश्लेषण करने के बाद ही आती है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2 का क्या महत्व है?

अधिनियम की धारा 2 काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाठकों को अन्य प्रावधानों के विवरण में प्रवेश करने से पहले अधिनियम में प्रयुक्त विभिन्न शब्दों के अर्थ के बारे में जानकारी देती है। यह अधिनियम को पूरी तरह से समझने के लिए एक कदम है और अनुबंधों के गठन  के लिए एक रूपरेखा के रूप में कार्य करता है। जब अधिनियम के अन्य प्रावधानों की व्याख्या इसके साथ की जाती है, तो यह धारा कार्य करने के लिए अधिक स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है। 

न्यायिक व्याख्याओं ने भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2 में परिभाषित शब्दों की समझ को किस प्रकार प्रभावित किया है?

विभिन्न उच्च न्यायालयों और भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इन परिभाषाओं में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों के अर्थ की व्याख्या इस प्रकार की है कि वे अधिक व्यावहारिक बन सकें। यह कानून के कई महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर भी देता है जो किसी भी व्यक्ति के मन में उठ सकते हैं और यदि कोई भ्रम हो तो उसे भी स्पष्ट करता है। हालाँकि, एक ही विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों में मतभेद हो सकता है। ऐसी स्थिति में, सर्वोच्च न्यायालय को इस मुद्दे को हल करने की आवश्यकता है और उसके निर्णय को एक मिसाल के रूप में अपनाया जाएगा। 

शून्य और शून्यकरणीय अनुबंधों के बीच क्या अंतर है?

कारक शून्य अनुबंध शून्यकरणीय अनुबंध
परिभाषा शून्य अनुबंध वह अनुबंध है जिसे किसी भी पक्ष द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है और कानून की दृष्टि में इसका कोई कानूनी मूल्य नहीं है। शून्यकरणीय अनुबंध वह अनुबंध है जो उस पक्ष के विकल्प पर प्रवर्तनीय होता है जिसे उस अनुबंध के कारण हानि होती है।
कानूनी प्रावधान अधिनियम की धारा 2(j) शून्य अनुबंधों को परिभाषित करती है। अधिनियम की धारा 2(i) में शून्यकरणीय अनुबंधों को परिभाषित किया गया है।
अनुबंध की प्रकृति ये अनुबंध कानूनी प्रकृति के नहीं हैं। हालाँकि जब इन्हें बनाया गया था तब ये वैध थे, लेकिन बाद में वैध अनुबंध की कुछ आवश्यक शर्तों को पूरा न कर पाने के कारण ये शून्य हो गए। ये अनुबंध अनियमित प्रकृति के हैं। उनकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि पीड़ित पक्ष उचित समयावधि के भीतर उसे अस्वीकार करना चाहता है या नहीं।
हर्जाना शून्य अनुबंध से किसी हर्जाने का दावा नहीं किया जा सकता है। यदि पीड़ित पक्ष को ऐसे अनुबंध से हानि होती है तो वह हर्जाने का दावा कर सकता है। 
उदाहरण यदि कोई प्रतिफल न हो तथा केवल एक पक्ष को ही दायित्व पूरा करना हो तो अनुबंध शून्य हो सकता है। यदि सहमति को  प्रपीड़न या अनुचित प्रभाव द्वारा दूषित किया गया हो तो अनुबंध शून्यकरणीय हो सकता है।

संदर्भ

  • Law of Contract and Specific Relief by Avtar Singh, Seventh edition, 2019

 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर सिद्धांत 

यह लेख Amber Kotnala द्वारा लिखा गया है और Moiz Akhtar द्वारा इसका अद्यतन किया गया है। यह लेख प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ द्वारा प्रतिपादित कराधान के सिद्धांतों पर प्रकाश डालता है और विस्तार से चर्चा करता है कि ये सिद्धांत आज भी कितने प्रासंगिक हैं। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla के द्वारा किया गया है। 

परिचय 

भारत जैसे देशों में, कर बुनियादी ढांचे, विकास और सरकार द्वारा संचालित जनहित योजनाओं का आधार बनते हैं। कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में कार्य करते हैं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, सड़कें, खाद्य सुरक्षा आदि जैसी जन-केंद्रित सुविधाएं सरकार द्वारा संचालित और वित्त पोषित (फंडेड) होती हैं। भारत सरकार रेलवे, परिवहन, मालवाहक गलियारे (फ्राइट कॉरिडोर्स), ऊर्जा बुनियादी ढांचे, स्वदेशी फार्मा उत्पादन, विभिन्न ऑटोमोबाइल घटकों के स्वदेशी निर्माण, और इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उपकरणों के निर्माण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विशाल योजनाएं चलाती है। इन सभी विकास कार्यों में, भारतीय सरकार ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से एकत्र की गई धनराशि का निवेश किया है।  

कर लगाने की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 265 द्वारा दी गई है। अनुच्छेद 265 कहता है कि केवल कानून के अधिकार से ही कर लगाया और एकत्रित किया जा सकता है। इसलिए, प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह कर का भुगतान करे। कर से प्राप्त आय भारत के समेकित कोष (कंसोलिडेटेड फंड) में जाती है, जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 में किया गया है।  

कर का भुगतान (सरकार की आय) नागरिकों पर बोझ नहीं माना जाता है। जैसा कि अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमुर्ति होम्स ने सही कहा था, “कर सभ्यता की कीमत हैं।” अब समय आ गया है कि कर को बोझ न मानकर सभ्यता की कीमत समझा जाए। इसके लिए, सरकार को कर संग्रह को इतना सरल बनाना होगा कि नागरिक इसे लेकर परेशान या बोझिल महसूस न करें।  

आइए, एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों पर चर्चा करने से पहले समझते हैं कि कराधान का वास्तव में क्या अर्थ है।  

कराधान क्या है?

कराधान एक अनैच्छिक (इन्वॉलंटरी) भुगतान है, जिसे प्रशासन/सरकार अपने नागरिकों पर अनिवार्य बनाती है। आमतौर पर, कराधान के लिए करदाता की सहमति आवश्यक नहीं होती है, और कर के बदले में प्रशासन द्वारा करदाताओं को कोई प्रत्यक्ष सेवा प्रदान नहीं की जाती है। यदि देश का कानून इस संग्रह को वैध ठहराता है, तो सरकार/प्रशासन द्वारा कर लगाना या एकत्र करना वैध माना जाता है। सरकारों को अपने नागरिकों से विभिन्न प्रकार के कर लगाने और एकत्रित करने का अधिकार और शक्ति होती है। प्राचीन काल से ही कर भूमि, आवास जैसी भौतिक संपत्तियों और वस्तुओं की बिक्री और लेन-देन पर लगाए जाते रहे हैं।  

कराधान का अर्थ समझने के बाद, आइए जानें कि पूरी दुनिया में कर लगाने की आवश्यकता क्यों होती है।  

कर लगाने की आवश्यकता 

21वीं सदी तकनीकी प्रगति और वित्तीय सुधारों का युग है, जिसके कारण विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में तेजी आई है। किसी राज्य द्वारा अपनाई गई राजकोषीय सतर्कता (फिसकल प्रूडेंस) और पारदर्शी कर नीतियां सरकार के आर्थिक दर्शन को दर्शाती हैं। भारत में कर संग्रह और कर लगाना कोई नई अवधारणा नहीं है; यह प्राचीन काल से अस्तित्व में है। कराधान एक राजकोषीय उपकरण है, जिसका उपयोग सरकार सदियों से राज्य की प्रशासनिक तंत्र को चलाने के लिए करती आ रही है। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य को संसाधनों और साधनों की आवश्यकता होती है। नागरिकों से एकत्र किया गया कर सरकार के लिए संसाधन के रूप में कार्य करता है।  

कराधान के सिद्धांतों की विशेषताएँ

एक अच्छा कराधान प्रणाली किसी भी अर्थव्यवस्था का उत्पादक आधार होती है। एक अच्छी कराधान प्रणाली को प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण प्रतिबिंबित करना चाहिए। कर कानूनों को तैयार करते समय, कराधान तंत्र के निर्माताओं को समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए और उसी के अनुसार कानून बनाना चाहिए। एक अच्छी कर प्रणाली को सभी के लिए न्यायसंगत और निष्पक्ष होना चाहिए ताकि देश के नागरिकों पर कर का भार समान रूप से विभाजित हो। निष्पक्ष वितरण का अर्थ समान वितरण नहीं बल्कि न्यायोचित वितरण होता है।  

हालाँकि, कराधान के सिद्धांतों की कई विशेषताएँ हैं, इनमें से कुछ नीचे दी गई हैं:  

  • कर प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति से उसकी कमाई और खर्च करने की क्षमता के अनुसार कर लिया जाए। कम आय अर्जित करने वाले व्यक्ति पर कम दरों से कर लगाया जाना चाहिए।  
  • कर भुगतान का तरीका सरल और सुविधाजनक होना चाहिए। इसे अधिक तकनीकी और प्रक्रियात्मक जटिलताओं से मुक्त रखा जाना चाहिए।
  • कर देयता की गणना (कंप्यूटेशन) का तरीका सरल और आसान होना चाहिए। जितनी सरल गणना की प्रक्रिया होगी, लोग कर नीति के कार्यप्रणाली के प्रति उतने ही जागरूक होंगे। 
  • कर ढाँचा इतना लचीला (फ्लेक्सिबल) होना चाहिए कि विभिन्न परिस्थितियों में अपवादों को समायोजित कर सके। जैसे कोविड-19 महामारी के दौरान, जब देश की अर्थव्यवस्था गिरावट की ओर थी, ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए कर संरचना लचीली होनी चाहिए।  
  • एक अच्छी कर प्रणाली की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह देश में कर संग्रह के लिए विविध तरीके अपनाती है। कर संरचना जितनी विविध होगी, लोगों को कर भुगतान का बोझ उतना ही कम महसूस होगा।  
  • कर संरचना का प्राथमिक उद्देश्य ऐसे कर कानून और नीतियाँ बनाना होना चाहिए जो सामान्य रूप से अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिए प्रतिकूल न हों।  
  • यदि कर खरीद और खर्च के आधार पर लगाया जाए, तो कर संरचना अधिक व्यापक और विस्तृत हो जाएगी।  
  • व्यक्तियों पर उनकी आय के आधार पर कर लगाना न्यायसंगत और कराधान क्षेत्र में एक उन्नत दृष्टिकोण है। अधिकांश देश आयकर वसूलते हैं और मानते हैं कि आय कर किसी व्यक्ति की कर भुगतान क्षमता का आधार होना चाहिए।  
  • कर प्रणाली करदाताओं के लिए तार्किक होनी चाहिए। बिना किसी कारण या उद्देश्य के मनमाने तरीके से लगाया गया कर, कर के रूप में अर्ह (क्वालीफाई) नहीं हो सकता। किसी भी अनुचित कर का जनता द्वारा तीव्र विरोध होगा।  
  • एक अच्छी कर प्रणाली लागत प्रभावी होनी चाहिए और कर संग्रह की लागत, एकत्रित कर राशि की तुलना में नगण्य (मिगर) होनी चाहिए।  

अब, कराधान के अर्थ और आवश्यकता को समझने के बाद, लेख के अन्य हिस्सों को समझना हमारे लिए आसान होगा।  

आइए अब मुख्य विषय की ओर बढ़ते हैं, जो एडम स्मिथ द्वारा दिए गए कराधान के सिद्धांत हैं।  

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत

विभिन्न प्रकार के कराधान के सिद्धांतों को समझने से पहले, आइए जानें कि एडम स्मिथ कौन थे।  

एडम स्मिथ कौन थे?

एडम स्मिथ एक स्कॉटिश दार्शनिक (फिलॉसफर) थे, जिनके विचार और सिद्धांत स्कॉटिश प्रबोधन (एनलाइटेंमेंट) की कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका जन्म 1723 में हुआ था और वे शास्त्रीय उदारवाद (लिब्रेलिज्म) के प्रमुख समर्थकों में से एक माने जाते हैं। उनके आर्थिक और राजनीतिक दर्शन से संबंधित विचारों ने वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाला, विशेष रूप से 1776 में प्रकाशित उनकी पुस्तक “द वेल्थ ऑफ नेशंस” के बाद। एडम स्मिथ ने ग्लासगो विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड के बैलिओल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। उनके द्वारा प्रतिपादित विचारों को लगभग सभी आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों द्वारा अंततः स्वीकार किया गया।  

उनके दो मुख्य विचार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था और अदृश्य हाथ के सिद्धांत थे। उनके अनुसार, बाजार और व्यापार के क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए ताकि बाजार स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके और विकास किसी भी सरकारी नीति द्वारा सीमित न हो। उनका मानना था कि किसी देश की अर्थव्यवस्था बेहतर तरीके से तब काम करती है जब उस पर राजनीतिक व्यवस्था का हस्तक्षेप न्यूनतम या शून्य हो।   

उनके अदृश्य हाथ के सिद्धांत का सार यह था कि बाजार और लोगों की भावनाएं ही वस्तुओं की कीमतें निर्धारित करने और समग्र अर्थव्यवस्था के विकास का एहसास कराने के लिए पर्याप्त हैं। लोगों की अपनी जरूरतों को पूरा करने और अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने से बाजार में ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जो समग्र रूप से अर्थव्यवस्था और समाज के लिए लाभदायक होती है।  

अपनी पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ में उन्होंने कराधान के सिद्धांतों का भी वर्णन किया है, जो आधुनिक कर प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य विशेषताएं हैं। इन सिद्धांतों को भारत सहित कई आधुनिक कराधान अर्थव्यवस्थाओं ने अपनाया और कार्यान्वित किया है।  

कराधान के सिद्धांत का अर्थ

कराधान के सिद्धांत वे विशेषताएँ हैं जो एक अच्छी कर प्रणाली में होनी चाहिए। एक अच्छी कर प्रणाली कहलाने के लिए, कर में समानता, निश्चितता, सरलता, और सुविधा जैसी विभिन्न विशेषताएँ आवश्यक हैं। जब कोई सरकार अपने राष्ट्र के लिए एक विस्तृत कराधान प्रणाली तैयार करती है, तो उसे इन सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए।  

इन सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वाले व्यक्ति के बारे में जानने के बाद, हम एडम स्मिथ द्वारा दिए गए चार प्रमुख कराधान के सिद्धांतों को समझेंगे।  

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत  

कराधान के सिद्धांत कर संग्रह प्रणाली को प्रभावी और कार्यात्मक बनाने के लिए मार्गदर्शक नियम और सिद्धांत हैं। सरकार को एक ऐसी संरचना बनानी होती है जो कर संग्रह को सरल और प्रभावी बना सके। इसके लिए कुछ नियमों और सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है। लेकिन कोई भी सिद्धांत पूर्ण और अंतिम नहीं हो सकता, क्योंकि समाज की प्रकृति गतिशील (डायनामिक) है।  

एक प्रगतिशील समाज में हमेशा परिवर्तन होते रहते हैं, और इन परिवर्तनों को सरकार को अपनाना होता है ताकि कर संग्रह तंत्र प्रभावी और कुशल बना रहे। एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वेल्थ ऑफ नेशंस’ में चार सिद्धांत दिए थे। इन्हें एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत भी कहा जाता है। 

ये चार सिद्धांत निम्नलिखित हैं:  

  • समानता का सिद्धांत 
  • निश्चितता (सर्टेनिटी) का सिद्धांत
  • सुविधा का सिद्धांत  
  • अर्थव्यवस्था का सिद्धांत

अब हम इन प्रत्येक सिद्धांतों को विस्तार से समझेंगे।  

समानता का सिद्धांत  

समानता का अर्थ है सभी को समान रूप से देखना, लेकिन यहां समानता का तात्पर्य उनकी भुगतान करने की क्षमता से है। सभी को समान मानने का मतलब होगा कि कम आय वाले वर्ग को अधिक कर देना पड़ेगा, या उच्च आय वर्ग को कम कर देना पड़ेगा। इसलिए, कर लगाते समय सरकार को यह समझना चाहिए कि व्यक्ति किस आय वर्ग से संबंधित है और उसी के अनुसार कर लगाया जाना चाहिए।  

एडम स्मिथ ने तर्क दिया कि कर आय के अनुपात में होना चाहिए, यानी नागरिकों को अपनी आय के अनुसार कर चुकाना चाहिए, जो वे राज्य की सुरक्षा के तहत अर्जित करते हैं। उनका मानना था कि यह सिद्धांत अमीर और गरीब के बीच के  अंतर को कम करेगा। यदि ऐसा सिद्धांत न हो, तो समय के साथ अमीर और गरीब के बीच का अंतर और बढ़ता जाएगा। सरल शब्दों में, किसी व्यक्ति पर उसकी भुगतान क्षमता के अनुसार कर लगाने से अर्थव्यवस्था में धन का समान वितरण होता है।  

एडम स्मिथ के इस सिद्धांत के आधार पर सरकार ने विभिन्न कर स्लैब बनाए हैं, ताकि व्यक्तियों द्वारा किए गए वित्तीय बलिदान का भार समान हो। समानता का यह सिद्धांत एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के कराधान दर्शन को आधार प्रदान करता है।  

एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था में एक ऐसा कराधान तंत्र होना चाहिए जो न्यायपूर्ण और तर्कसंगत हो, यहां तक कि आय की पंक्ति में खड़े सबसे अंतिम व्यक्ति के लिए भी। कराधान प्रणाली में समानता समाज के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है। भारत एक 5 ट्रिलियन डॉलर की नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी) की ओर बढ़ रहा है, और जल्द ही इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा।  

किसी देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के विकास के लिए कैसी नीतियां अपनाता है। भारत में कर लगाने और संग्रह करने के लिए करदाताओं को वार्षिक आय के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक आय श्रेणी के लिए अलग-अलग कर स्लैब निर्धारित किए गए हैं। इन स्लैब के तहत व्यक्ति को अपनी वार्षिक आय के अनुसार कर का एक निश्चित प्रतिशत देना होता है। आय जितनी अधिक होगी, कर स्लैब और कर प्रतिशत उतना ही अधिक होगा।  

व्यक्तियों को विभिन्न कर श्रेणियों में वर्गीकृत करना भारत के आयुपरि (प्रॉपर्शनल) कराधान प्रणाली को सही ठहराता है। हालांकि, उच्च स्तरीय लेखा सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण, अक्सर निम्न आय वर्ग को अधिक कर देना पड़ता है। भारत में उच्च और निम्न कर स्लैब के निवासियों की क्रय शक्ति समान हो सकती है, लेकिन उनके पास बची हुई व्यय योग्य आय असमान रहती है।

भारत में करों के प्रकार

 

भारत में करों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:  

प्रत्यक्ष कर 

प्रत्यक्ष कर वे कर हैं जो सरकार द्वारा व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थाओं पर लगाए जाते हैं, जिनका बोझ और दायित्व पूरी तरह से करदाता पर ही होता है। यह कर व्यक्ति द्वारा देश में आय अर्जित करने के आधार पर लगाया जाता है। यह प्रणाली इस तरह से डिज़ाइन की गई है कि कर स्लैब प्रगतिशील रूप में तय किए गए हैं, जिससे जैसे-जैसे आय बढ़ती है, कर की दर भी बढ़ती जाती है, जैसे कि व्यक्तिगत आय कर।  

प्रत्यक्ष करों को केंद्र सरकार सीधे एकत्र करती है और इनका नियमन केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा किया जाता है।  

प्रत्यक्ष करों के उदाहरण: आय कर, निगमित (कॉर्पोरेट) कर, प्रतिभूति (सिक्योरिटीज) लेनदेन कर, पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) कर, उपहार कर, संपत्ति कर है। भारत में आय कर की दरें हर आगामी वर्ष के लिए सरकार द्वारा तय की जाती हैं और इन्हें बजट में घोषित किया जाता है। पिछले वर्ष की तुलना में कर दरों में संशोधन, आय कर अधिनियम, 1961 में संशोधन करके और नए वित्तीय अधिनियमों तथा सर्कुलर के माध्यम से किया जाता है।  

संशोधित और अद्यतन कर व्यवस्थाएं और छूटें नए वित्तीय अधिनियम में उल्लिखित होती हैं, और नया अधिनियम पिछले अधिनियमों को प्रतिस्थापित करता है। आय कर अधिनियम, 1961 और संबंधित कानूनों में पूरे वर्ष संशोधन किए जाते हैं ताकि कर प्रणाली को उन्नत और अद्यतन बनाया जा सके।  

वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए आय कर की अद्यतन दरें वार्षिक बजट 2024-25 और वित्त (संख्या 2) अधिनियम 2024 के आधार पर वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए लागू आय कर की दरें निम्नलिखित हैं:  

आय कर स्लैब (रु. में) आय कर दर (%)
0 से 3,00,000 तक 0%
3,00,001 से 7,00,000 तक 5%
7,00,001 से 10,00,000 तक 10%
10,00,001 से 12,00,000 तक 15%
12,00,001 से 15,00,000 तक 20%
15,00,001 और उससे अधिक 30%

यह ऊपर की तालिका से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे किसी व्यक्ति की आय बढ़ती है, वैसे-वैसे कर दर भी बढ़ती है। इसके अलावा, ये कर उन लोगों पर लागू होते हैं जो आय उत्पन्न करने वाली आयु (18-60 वर्ष) में आते हैं। वरिष्ठ नागरिक समूह अर्थात् 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग और सुपर वरिष्ठ नागरिक समूह अर्थात् 80 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग अलग-अलग कर दरों और छूटों के पात्र होते हैं।  

अप्रत्यक्ष कर 

अप्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जो सरकार द्वारा वस्त्रों और सेवाओं की बिक्री और खरीद पर लगाए जाते हैं। यह कर हस्तांतरणीय होता है क्योंकि इसे आसानी से कर प्रणाली की श्रृंखला में किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को आसानी से उत्पाद के अंतिम उपभोक्ता को हस्तांतरित किया जा सकता है और उपभोक्ता को कर चुकाने की जिम्मेदारी होती है। जी एस टी को भारतीय कर प्रणाली का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है और इसने अगस्त 2024 में 1.50 लाख करोड़ रुपये का राजस्व (रेवेन्यू) उत्पन्न किया, जो अगस्त 2023 में संग्रहित 1.41 लाख करोड़ रुपये से 6.5% अधिक था।  

भारत में अप्रत्यक्ष करों के उदाहरण हैं: वी ए टी, जी एस टी, उत्पाद शुल्क, कस्टम शुल्क आदि। हालांकि भारत में अप्रत्यक्ष करों की विविधताएं हैं, जिनमें जी एस टी प्रमुख है। जी एस टी के लागू होने के बाद, इसने कई केंद्रीय करों को प्रतिस्थापित कर दिया जैसे कि अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, चिकित्सा और शौचालय तैयारी (उत्पाद शुल्क) अधिनियम 1955 के तहत उत्पाद शुल्क और वस्त्र उत्पादों के तहत अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त कस्टम शुल्क, सेवा कर, सरचार्ज और सेस, साथ ही केंद्रीय बिक्री कर।  

जबकि राज्यों द्वारा लगाए गए कर जैसे राज्य वीएटी/विक्रय कर, खरीद कर, मनोरंजन कर, विलासिता कर, प्रवेश कर (सभी रूपों में), लॉटरी पर कर (जुआ और सट्टेबाजी सहित), सरचार्ज/सेस और विज्ञापन पर कर भी जी एस टी द्वारा प्रतिस्थापित किए गए।  

जहां तक अप्रत्यक्ष करों की बात है, 2021-2022 के वित्तीय वर्ष में अप्रत्यक्ष कर संग्रह में पिछले वर्ष के संग्रह की तुलना में 216946 करोड़ रुपये (20%) का इजाफा हुआ। अप्रत्यक्ष करों की वार्षिक वृद्धि दर जो वित्तीय वर्ष-2018 में 5.8% से घटकर वित्तीय वर्ष-2020 में 1.76% हो गई थी, वित्तीय वर्ष-21 और वित्तीय वर्ष-22 में ऊपर की ओर बढ़ी।  

अप्रत्यक्ष करों की वृद्धि ने जी एस टी और कस्टम शुल्क के संग्रह में वृद्धि में योगदान दिया है। 2022 में जी एस टी संग्रह में 27% की वृद्धि हुई और कस्टम शुल्क में वित्तीय वर्ष-21 की तुलना में 48% की वृद्धि हुई।  

कोविड वर्षों के दौरान, अप्रत्यक्ष करों का जी डी पी के अनुपात के रूप में हिस्सा वित्तीय वर्ष-18 में 5.35% से घटकर वित्तीय वर्ष-20 में 4.76% हो गया। हालांकि, वित्तीय वर्ष-21 और वित्तीय वर्ष-22 के दौरान अप्रत्यक्ष करों का जी डी पी अनुपात बढ़कर 5.47% हो गया। अप्रत्यक्ष कर उपभोग आधारित होते हैं और एक अर्थव्यवस्था और बाजार की उपभोग क्षमता पर निर्भर होते हैं।  

उपभोग का निर्भर होना बड़े आर्थिक कारकों जैसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सी पी आई) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यू पी आई) और विभिन्न अन्य कारकों पर होता है। कोविड-19 महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई और भारत ने आर्थिक क्षेत्र में तेजी से सुधार देखा। मजबूत आर्थिक सुधार और कर पालन में सुधार के प्रयासों ने वित्तीय वर्ष-22 में परोक्ष कर संग्रह में वृद्धि की।

निश्चितता का सिद्धांत 

एडम स्मिथ द्वारा दिया गया एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत निश्चितता का सिद्धांत है। उनके अनुसार, “जो कर एक व्यक्ति को चुकाना है, वह निश्चित और मनमाना नहीं होना चाहिए।” कर की राशि, भुगतान का तरीका, और जिसे यह भुगतान किया जाना है, ये सब निश्चित होना चाहिए ताकि व्यक्ति को पहले से यह जानकारी हो कि उसे कितना कर चुकाना है। यदि कर प्रणाली निश्चित नहीं है, तो यह व्यक्ति के उत्पीड़न का कारण बन सकती है।  

इस निश्चितता के सिद्धांत का यह कहना है कि कर को आयकर अधिकारियों द्वारा मनमाना रूप से तय या लागू नहीं किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कर प्रणाली में निश्चितता की कमी, जैसा कि स्मिथ ने संकेत किया, कर प्रशासन में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इसलिए, एक अच्छे कर प्रणाली में, “व्यक्तियों को उनके वेतन या अन्य आय पर अप्रत्याशित करों से सुरक्षित होना चाहिए; कानून स्पष्ट और विशिष्ट होना चाहिए; कर संग्रहकों को यह निर्णय करने में कम विवेकाधिकार (डिस्क्रिशन) होना चाहिए कि उन्हें करदाताओं का कितना मूल्यांकन करना है; क्योंकि यह एक बहुत बड़ी शक्ति है और इसका दुरुपयोग होने का खतरा होता है।”  

भारतीय कर प्रणाली इस प्रकार से रूपांतरित की गई है कि हर साल का कर स्लैब, चाहे वह प्रत्यक्ष कर जैसे आयकर हो या अप्रत्यक्ष कर जैसे जी एस टी, पहले से ही जुलाई महीने में वार्षिक बजट में घोषित किया जाता है। हालांकि अंतिम केंद्रीय बजट जुलाई महीने में संसद में प्रस्तुत किया जाता है, सरकार का आगामी वित्तीय वर्ष के लिए दृष्टिकोण वाला अंतरिम बजट फरवरी में ही प्रस्तुत किया जाता है।  

बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है और इसे लाइव प्रसारित किया जाता है ताकि नागरिकों को सरकार द्वारा बनाई गई वित्तीय योजना के बारे में जानकारी हो सके और वे विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित नीतियों और निवेश की जानकारी प्राप्त कर सकें, जो कार्यान्वित (एक्जीक्यूट) होने वाली हैं। एक जागरूक नागरिक जानता है कि वह किस आय वर्ग में आता है और वह यह भी देख और गणना कर सकता है कि उसे सरकार को कितने कर का भुगतान करना है। कर संरचना पूरी तरह से समान और स्थिर रहती है और एक बार घोषित किए जाने के बाद पूरे वर्ष के लिए लागू होती है ताकि लोग व्यापार और वित्तीय योजना कर सकें, जैसा कि सरकार द्वारा घोषित कर दरों और स्लैब के आधार पर।  

इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्यक्ति को कर का भुगतान करने में कोई मनमानी नहीं हो। हालांकि, भारत में कर की गणना और आकलन सरल है, कटौती और छूट का दावा करना काफी जटिल है। नागरिकों को अक्सर इन छूटों का दावा करने के लिए कर विशेषज्ञों और पेशेवरों की सहायता की आवश्यकता होती है। कटौती और छूट के विभिन्न प्रकार लोगों को अधिक आय अर्जित करने और अपनी आय पर कर बचाने के लिए प्रेरित करते हैं।  

अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि एक व्यक्ति जो कर चुका रहा है, यदि उसे जटिल तरीके से भुगतान करना पड़ता है, तो यह उसे रोक सकता है क्योंकि उसे कर चुकाने में कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी व्यक्ति को अपने आय से पहले से कटने वाले कर की राशि का पता नहीं होता, तो यह उसे उच्च जोखिम वाले निवेश करने के लिए हतोत्साहित कर सकता है, यदि वह एक व्यवसायी है। इसलिए, कर प्रणाली को निश्चित होना चाहिए और मनमाना नहीं होना चाहिए। अनिश्चितता और मनमानी कर प्रणाली के उद्देश्य को ही नष्ट कर देंगी।

सुविधा का सिद्धांत  

कराधान का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘सुविधा का सिद्धांत’। जैसा कि शब्द ‘सुविधा’ का अर्थ है इसे आसान, सरल, और आरामदायक बनाना। उनके अनुसार, “हर कर को उस समय या उस तरीके से लिया जाना चाहिए, जब या जिस तरीके से वह योगदानकर्ता के लिए इसे चुकाना सबसे अधिक सुविधाजनक हो।” कर की राशि का भुगतान और भुगतान करने का तरीका उस व्यक्ति के लिए सुविधाजनक होना चाहिए जो इसे चुकता कर रहा है। यदि कर संग्रहण तंत्र जटिल होगा, तो यह योगदानकर्ता को निराशा और असंतोष का कारण बनेगा।  

एक अच्छा कराधान प्रणाली वह है जो योगदानकर्ता के लिए सुविधाजनक हो। आयकर हमेशा निर्धारण वर्ष के पूर्व वर्ष में एकत्र किया जाता है। इसका मतलब है कि कर केवल तभी काटा जाता है जब व्यक्ति द्वारा आय अर्जित की जाती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां कर का बोझ उस योगदानकर्ता पर पड़ेगा, जिसने आय अर्जित नहीं की है।  

आयकर प्राधिकरण उस राशि पर कर नहीं लगा सकता जो अर्जित नहीं की गई है। इससे एक हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां उस राशि पर कर काटा जाए, जो अस्तित्व में नहीं है। इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण पहलू है, आय अर्जित करने के बाद कर संग्रह कैसे किया जाए ताकि यह सुविधाजनक हो। इसका सर्वोत्तम उदाहरण है “स्रोत पर की गई कर कटौती” (टी डी एस)। टी डी एस का मतलब है “कर की कटौती उस स्रोत से, जहां से यह उत्पन्न हुआ हो।”  

यह नियोक्ता की जिम्मेदारी होती है कि वह कर्मचारी के वेतन को उसके खाते में जमा करने से पहले कर की कटौती करें और वह कटौती की गई कर राशि सरकार को समय पर भुगतान करें। यह कर्मचारी को कर चुकाने से मुक्त करता है। प्रौद्योगिकी की तेजी से बढ़ती वृद्धि के कारण, इंटरनेट ने अधिक लोकप्रियता हासिल की है और आजकल यह आसानी से सुलभ है। इसने प्रत्यक्ष करों के ई-भुगतान की शुरुआत की।  

आयकर विभाग कुल लेन-देन की राशि के आधार पर कर की गणना करता है जो एक वित्तीय वर्ष में एक करदाता के स्थायी खाता संख्या (पैन) पर किया जाता है। आजकल सभी बैंक खाते पैन से जुड़े होते हैं और इस कारण आयकर विभाग के कर्मचारियों के लिए यह बहुत आसान हो गया है कि वे किसी व्यक्ति या व्यवसाय पर वित्तीय वर्ष में कुल आय और कर की गणना कर सकें।

व्यक्तियों और व्यवसायों के पास अगर आय के एक से अधिक स्रोत हों तो उन्हें अपनी आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए कर विशेषज्ञों की मदद की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन वेतनभोगी व्यक्तियों के लिए कर की गणना सरल होती है और वे इसे स्वयं दाखिल कर सकते हैं। यदि उन्होंने पिछले वर्ष में अपनी आय वर्ग के आधार पर अपनी कर देनदारी से अधिक कर का भुगतान किया हो, तो वे आयकर रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इस प्रकार, कर का भुगतान और कर रिटर्न दाखिल करना भारत में बहुत सरल हो गया है। इसके अलावा, कर का नियमित रूप से भुगतान करना व्यक्तियों और व्यवसायों की स्वच्छ और विश्वसनीय क्रेडिट पुनर्भुगतान क्षमता को दर्शाता है।  

करों का ई-भुगतान करने के लिए केवल दो चीजों की आवश्यकता होती है, एक इंटरनेट कनेक्शन और एक नेट बैंकिंग सक्षम खाता एक अनुमोदित बैंक में। यदि करदाता के पास नेट बैंकिंग सक्षम खाता नहीं है, तो वह किसी अन्य व्यक्ति के नेट बैंकिंग सक्षम खाते का उपयोग करके ई-भुगतान कर सकता है, लेकिन कर उसके नाम पर ही भुगतान किया जाना चाहिए। जो योगदानकर्ता है, उसे बस आयकर विभाग की वेबसाइट पर लॉगिन करके प्रक्रिया का पालन करना होता है। इन सभी बातों ने कर संग्रहण तंत्र को सुविधाजनक बना दिया है।  

अगर करदाता और आयकर विभाग के बीच कर की गणना और हिसाब को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो वह कर कार्यालय में कर अधिकारी से संपर्क कर सकता है। यदि कर अधिकारी के तहत मामला हल नहीं होता है, तो करदाता के पास कर आयुक्त और फिर अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) तथा उच्च न्यायालय तक जाने का अधिकार होता है। इस प्रकार, सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या व्यवसाय पर लगाए गए कर की राशि अंतिम नहीं होती। इस संदर्भ में संस्थाएं और अदालतें हैं जहाँ कोई भी प्रभावित पक्ष कर संबंधी मामलों के समाधान के लिए अपील कर सकता है और राहत प्राप्त कर सकता है।  

आर्थिकता का सिद्धांत  

एक अच्छी कर प्रणाली वह है जहाँ कर एकत्र करने की लागत एकत्रित राशि के मुकाबले बहुत कम हो। सरकार हमेशा कर संग्रहण पर होने वाले खर्च को कम करने का प्रयास करेगी ताकि उसके खजाने में बड़ी राशि जमा हो सके। कर संग्रहण का मुख्य उद्देश्य सरकार के लिए राजस्व उत्पन्न करना है, लेकिन जब खर्च बढ़ जाता है, तो यही उद्देश्य विफल हो जाता है। एगडम स्मिथ का कहना है, “हर कर को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि यह लोगों की जेब से जितना संभव हो उतना कम निकाल कर राज्य के सार्वजनिक खजाने में डाले।” 

 

इसलिए, कर संग्रहण के तरीके को अपनाते समय यह आर्थिकता का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। जैसा कि पहले बताया गया, तकनीकी प्रगति के कारण कर का भुगतान करना अब एक सरल कार्य बन गया है। सरकार के दृष्टिकोण से, तकनीकी प्रगति ने उन खर्चों को कम किया है जो अगर तकनीकी का अभाव होता तो कर संग्रहण में होने वाले थे। बिना तकनीकी प्रगति के कर प्रणाली में, हम यह नहीं सोच सकते कि सरकार कर संग्रहण में कितनी बड़ी राशि खर्च कर सकती थी।  

एडम स्मिथ के कर सिद्धांतों के अलावा, अर्थशास्त्री चार्ल्स एफ. बैस्टेबल ने भी हमें आधुनिक कर सिद्धांत दिए हैं। एडम स्मिथ के सिद्धांत कर प्रणाली के मौलिक सिद्धांत थे, जबकि ये बाद में आधुनिक समस्याओं को हल करने के लिए जोड़े गए थे।

आधुनिक कर सिद्धांत  

सरलता का सिद्धांत  

एक साधारण कर संरचना सरकार के लिए अधिक राजस्व उत्पन्न करना चाहिए। जहाँ कर संरचना पूरी तरह से सरल होती है, वहाँ यह भ्रम उत्पन्न नहीं करती और समझने में आसान होती है। कर दरें सरल होनी चाहिए। जहाँ यह जटिल होती है, वहाँ यह भ्रम उत्पन्न कर सकती है और इसके परिणामस्वरूप योगदानकर्ता उस कर का भुगतान करने से बच सकता है।  

सरलता का सिद्धांत अन्य सिद्धांतों के साथ कर प्रणाली के प्रभावी और कुशल संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जीएसटी एक ऐसा उदाहरण है जो लोगों को विभिन्न करों की जटिलताओं में उलझे बिना कर चुकाने के लिए प्रोत्साहित करता है। जीएसटी ने कर संरचना को सरल और उत्पादक बना दिया है।  

उत्पादकता का सिद्धांत  

कर लगाने से उत्पादकता के नियमों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, अर्थात अर्थव्यवस्था में उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए। कर राशि को मनमाने तरीके से तय और लागू नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे लोगों को अर्थव्यवस्था में और निवेश करने से हतोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह कर देश के बड़े प्रभावशाली लोगों के पक्ष में लगाया जाए। सरकार को इस तरह से कर लागू करना चाहिए कि वह उत्पादक हो, यानी पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करे।  

एक देश तभी फलता-फूलता है जब सरकार नागरिकों को उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए निजी संपत्ति बनाने की अनुमति देती है। चूँकि भारत एक कल्याणकारी (वेलफेयर) लोकतंत्र है, यह कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी राज्य के सिद्धांत को बढ़ावा देता है। भारतीय राजनीति-आर्थिक प्रणाली पूंजीवाद और समाजवाद का मिश्रण है। भारत आर्थिक समृद्धि और समाज के समग्र उत्थान के लिए लक्षित है।

लोच (इलास्टिसिटी) का सिद्धांत  

कर संरचना को इस हद तक लचीला होना चाहिए कि यह आर्थिक वृद्धि के साथ साथ चले। जब लोगों की आय में वृद्धि होती है, तो सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा। यह अप्रत्यक्ष करों के मामले में सबसे अच्छा लागू होता है। उदाहरण के लिए, उच्च मूल्य वाले सामान या विलास वस्त्रों और सेवाओं पर उच्च कर लगाना। इसी तरह, जब लोगों की आय में कमी आती है, तो कर भी उसी हिसाब से घटा दिया जाएगा।  

उपरोक्त व्याख्या को भारतीय सरकार की उस पहल से बेहतर तरीके से समर्थन मिलता है जिसमें जुआ, अटकलें और अनियंत्रित क्रिप्टोकरेंसी व्यापार पर 30% कर दर लगाया गया है, बिना किसी कटौती के। विलास कर भी उच्चतम विलास कारों, उच्चतम उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स आदि पर 28% जीएसटी कर स्लैब पर लगाया जाता है। इस प्रकार, जो लोग विलास उत्पादों को वहन कर सकते हैं, उन्हें उच्च कर राशि का भुगतान करना होता है, जो अंततः सरकार के खजाने में जमा होती है।  

विविधता का सिद्धांत  

विविधता का सिद्धांत यह कहता है कि एक ऐसा कर नहीं होना चाहिए जिसकी दरें बहुत उच्च हों, बल्कि कई करों को कम दरों के साथ होना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि उच्च कर चुकाने वाला व्यक्ति कर से बचने का प्रयास करेगा। विविधता का सिद्धांत निवेशों को बढ़ावा देता है और आर्थिक विकास की दिशा में योगदान करता है। मानव मनोविज्ञान के संदर्भ में, एक व्यक्ति एक उच्च दर वाले कर का भुगतान करने से बच सकता है, लेकिन कई कम दर वाले करों का भुगतान करने से नहीं बचता।  

विविधता के नियम का एक अन्य लाभ यह है कि कई कम दर वाले करों को लागू करने से अन्य लोग, जिनकी आय कम है, कर प्रणाली के दायरे में आ सकते हैं, जिससे निम्न आय समूह द्वारा राज्य के खजाने में योगदान होगा।

तत्कालिता (एक्सपीडियंसी) का सिद्धांत  

इस सिद्धांत के अनुसार, करों का निर्धारण राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तत्कालिता के आधार पर नहीं होना चाहिए। कुछ व्यावहारिक विचार होते हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए। करों को सभी क्षेत्रों जैसे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक से स्वीकार्य होना चाहिए। यह सिद्धांत जन स्वीकृति प्राप्त करने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जो कर लगाए जाते हैं, वे अन्यायपूर्ण नहीं होते और देश के लोगों पर बोझ नहीं डालते।  

क्या ये करों के सिद्धांत जो एडम स्मिथ द्वारा दिए गए थे, अभी भी भारत के आधुनिक कर प्रणाली में प्रासंगिक हैं? चलिए, इसके उत्तर को जानने के लिए अगले शीर्षक की ओर बढ़ते हैं।  

एडम स्मिथ के करों के सिद्धांतों का आधुनिक भारतीय कर प्रणाली से संबंध  

कोई संदेह नहीं है कि करों के सिद्धांतों ने आधुनिक अर्थव्यवस्था में कई तरीकों से मदद की है। कर प्रणाली को सरल बनाने से लेकर, ताकि अधिक लोग कर चुकाने के लिए तैयार हों, से लेकर, तकनीकी क्षेत्र में प्रगति तक ताकि कर रिटर्न दाखिल करना परेशानी मुक्त और आसान हो सके। भारत में कर प्रणाली में 1991 के बाद महत्वपूर्ण बदलाव आए, जब भारतीय अर्थव्यवस्था एक नियोजित और घरेलू अर्थव्यवस्था से खुली बाजार अर्थव्यवस्था में बदल गई।  

एडम स्मिथ एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के समर्थक थे, जहाँ सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो। भारत में कर प्रणाली को इस प्रकार क्रांतिकारी रूप से बदला गया ताकि यह एक बाजार अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों को पूरा कर सके। भारत में, कर प्रणाली इस तरह से विकसित की गई है कि इसमें एडम स्मिथ द्वारा बताए गए सिद्धांतों की कई विशेषताएँ हैं। योजना और वित्त आयोग ने हमेशा नागरिक केंद्रित कर कानून बनाने की कोशिश की ताकि उन्हें बिना किसी जटिलता के लागू किया जा सके। एक समान कर प्रणाली, उचित और निश्चित कर भुगतान की राशि, कर का ऑनलाइन भुगतान जो आसान भुगतान को बढ़ावा देता है, ये कुछ विशेषताएँ हैं जो एडम स्मिथ के सिद्धांतों में शामिल हैं और जिन्हें भारतीय कर प्रणाली ने अपनाया है।  

अप्रत्यक्ष करों की प्रणाली को सुव्यवस्थित करना और जीएसटी का कार्यान्वयन, कर के परिसंचारी (कैसकेडिंग) प्रभावों को समाप्त करने और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के प्रभावी कार्यान्वयन में मदद करता है। कर नियमों और प्रासंगिक कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो सभी करों के सिद्धांतों को संतुष्ट करता हो, हालांकि नीति निर्माता जितना संभव हो सके कर सिद्धांतों के साथ मेल करने की कोशिश करते हैं। एक अच्छी कर प्रणाली और कर संग्रहण में पारदर्शिता सरकार को अधिक धन प्रदान करती है।  

अधिक धन के साथ सरकार आसानी से देश के बुनियादी ढांचे और प्रशासन की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। इससे अन्य देशों से कर्ज लेने की संभावना कम हो जाती है। यह सरकार के कर्ज पोर्टफोलियो को कम करने में मदद करता है और लंबे समय में अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बना देता है।  

हालांकि एडम स्मिथ ने लगभग 200 साल पहले करों के सिद्धांत दिए थे, ये आधुनिक समय में भी काफी प्रासंगिक हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं वाले देश आज भी स्मिथ द्वारा दिए गए इन कर सिद्धांतों को अपनाते हैं। ये सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगे क्योंकि ये कर प्रणाली के मूलभूत और पारंपरिक गुण हैं।

निष्कर्ष  

ये करों के सिद्धांत सफल कर प्रणाली का असली रहस्य हैं। इनका पालन न करने से पूरी संरचना ध्वस्त हो सकती है और समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं जिनका केवल एक समाधान है, अर्थात् उपर्युक्त सिद्धांतों का पालन करना। लेकिन, हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि ये सिद्धांत समग्र नहीं हैं। समय के साथ, नए सिद्धांतों का विकास हो सकता है जो उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सबसे उपयुक्त होंगे। भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, इसलिए नए सिद्धांतों का विकसित होना स्वाभाविक है।  

चूंकि भारत $5 ट्रिलियन के नाममात्र जीडीपी के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है, विभिन्न तरीकों और कर उपायों के माध्यम से व्यवसाय और आय वर्ग के लोगों का समर्थन न केवल नागरिकों में सकारात्मक भावना उत्पन्न करेगा, बल्कि उन विदेशी निवेशकों के मन में भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा जो भारत में निवेश के अवसर तलाश रहे हैं। पूरी दुनिया भारत को एक संभावित ‘डार्क हॉर्स’ के रूप में देखती है, जो निवेशों पर महत्वपूर्ण लाभ उत्पन्न कर सकता है।  

कर प्रणाली का सरलीकरण और व्यवसाय करने में आसानी के विचारों का पालन करना केवल उस धक्के को बढ़ाएगा जो अर्थव्यवस्था को ऊपर की ओर धकेलता है। हालांकि भारतीय कर प्रणाली ने बहुत बेहतर स्तर तक विकास और उन्नति की है, फिर भी हर समय हो रहे उच्च स्तर के वित्तीय लेनदेन को पूरा करने के लिए बहुत अधिक प्रगति की आवश्यकता है।  

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (एफ ए क्यूस)

कर प्रोत्साहन क्या है?

कर प्रोत्साहन एक वित्तीय उपकरण है जिसका उपयोग सरकार किसी विशेष लेनदेन या व्यापार पर कर दर को घटाने या पूरी तरह से कर से छूट देने के लिए करती है ताकि उसे जनता के बीच बढ़ावा दिया जा सके और उसे प्रोत्साहित किया जा सके। यदि किसी विशेष क्षेत्र/व्यवसाय को करमुक्त कर दिया जाता है, तो उस क्षेत्र के तहत वित्तीय लेनदेन बढ़ेंगे, जो अंततः उस व्यवसाय को बढ़ावा देंगे। कर प्रोत्साहन और छूट भी सरकार द्वारा विशेष उद्योगों को प्रदान की जाती हैं यदि वे गिरावट के कगार पर हों या वर्षों से नकारात्मक राजस्व दिखा रहे हों।

जी एस टी क्या है?

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जी एस टी) एक अप्रत्यक्ष कर सुधार (रिफॉर्म) है जिसे भारत सरकार ने केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 के तहत पेश किया। इसे भारत में अधिकांश वस्तुओं और सामग्रियों पर वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) को समाप्त करने और प्रतिस्थापित करने के लिए पेश किया गया था। जी एस टी ने वस्तुओं और सेवाओं के लिए अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बना दिया है और कर की गणना उत्पादन के अंत में किया जाता है जब उपभोक्ता वस्तु को खरीदता है। जी एस टी ने वस्तुओं और सामग्रियों को पांच कर स्लैब्स में विभाजित किया है, अर्थात् 0%, 5%, 12%, 18%, और 28% क्रमशः।

सी बी डी टी क्या है? 

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सी बी डी टी) एक सांविधिक निकाय है जिसे 1963 में केंद्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 के तहत स्थापित किया गया था। यह निकाय आयकर विभाग की संरचना का कार्यक्रम बनाता है, कर संग्रहण और आकलन के उपायों का निर्माण करता है, कर चोरी और कर बचाव की नीतियों को लागू करने को सुनिश्चित करता है, शिकायत समाधान से संबंधित कार्य करता है, और निरीक्षण विभाग आदि का संचालन करता है।

आकलन वर्ष क्या है? 

भारत में, कर संग्रहण की सुविधा के लिए वर्तमान वर्ष की 1 अप्रैल से लेकर अगले वर्ष की 31 मार्च तक का समय अवधि को आकलन वर्ष कहा जाता है। इस अवधि के दौरान जो भी कर देयताएँ व्यवसायों और व्यक्तियों पर बनती हैं, उन्हें एकत्र किया जाता है और उनके संबंधित पैन अपडेट किए जाते हैं। आकलन वर्ष के अंत में, यदि वे पात्र होते हैं, तो व्यक्तियों और व्यवसायों को आयकर रिटर्न दाखिल करने की अनुमति दी जाती है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर है?

प्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जो सरकार व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थाओं पर लगाती है, जिनका बोझ और देयता आकलनकर्ता (असेसी) पर ही होता है। व्यक्ति यह कर इस देश में आय अर्जित करने के कारण चुकाता है। जबकि अप्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जो उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर एकत्र किए जाते हैं और उपयोग किए जाते हैं।

टी ए एन क्या है? 

टी ए एन का मतलब है कर संग्रह और कटौती खाता संख्या, जो आयकर विभाग द्वारा उन व्यवसायों या व्यक्तियों को जारी किया जाता है जो स्रोत पर कर संग्रहण या स्रोत पर कर कटौती के लिए जिम्मेदार होते हैं। टी ए एन एक 10 अंकों का अल्फ़ान्यूमैरिक नंबर होता है, जिसमें चार अक्षर, पाँच अंक और अंत में एक अक्षर होता है। टी ए एन भारत में प्रत्येक कटौतीकर्ता (डिडक्टर) के लिए अनिवार्य है।

पैन क्या है? 

पैन का मतलब है स्थाई खाता संख्या , जो आयकर विभाग द्वारा करदाताओं को जारी किया जाने वाला 10 अंकों का अल्फ़ान्यूमैरिक नंबर है। पैन के माध्यम से आयकर विभाग व्यक्तियों और व्यवसायों द्वारा अर्जित आय पर लगने वाले कर की गणना और आकलन करता है।

अच्छे कराधान के सिद्धांत क्या हैं? 

कराधान एक आधुनिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है, इसके बिना एक देश अपनी सर्वोत्तम क्षमता तक कार्य नहीं कर सकता। अच्छे कराधान प्रणाली के सिद्धांतों के संदर्भ में, संग्रहण की कम लागत, गणना में सरलता, कर का भुगतान सरल, आनुपातिक और प्रगतिशील कराधान, देश के सम्पूर्ण क्षेत्र में दरों का सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) आवेदन, और कर विवादों का सुलझाने के लिए आसान और सुलभ उपाय कुछ ऐसे सिद्धांत हैं जो अच्छे कराधान प्रणाली के होते हैं।

क्या एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत निरपेक्ष हैं? 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांत निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि ये सलाहकारी और अनुशंसा स्वरूप होते हैं। ये कर संरचनाओं के निर्माण में शामिल नीति निर्धारण संस्थाओं के लिए एक निर्देशिका के रूप में कार्य करते हैं। ये सिद्धांत नीति निर्माण में इस तरह मदद करते हैं कि करदाताओं को कर का बोझ कम महसूस हो।

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों के अलावा और कौन से कराधान के सिद्धांत हैं? 

एडम स्मिथ के कराधान के सिद्धांतों के अलावा, अन्य कराधान के सिद्धांत हैं – सरलता का सिद्धांत, उत्पादकता का सिद्धांत, लचीलापन का सिद्धांत, और विविधता का सिद्धांत। ये सिद्धांत चार्ल्स एफ. बासटेबल द्वारा दिए गए हैं।

कराधान के सिद्धांत किसी भी कर संरचना के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?

कराधान के सिद्धांत किसी भी आधुनिक कराधान प्रणाली का अभिन्न हिस्सा हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि कर प्रणाली सबसे अनुकूल तरीके से काम करे। ये सिद्धांत यह सुनिश्चित करते हैं कि कर प्रणाली इस तरह रूपांतरित की गई हो, जो सरलता, पारदर्शिता, न्यायसंगत, आर्थिक रूप से व्यावहारिक और अंततः उत्पादक हो।

सरलता का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?

सरलता का सिद्धांत कर प्रणाली के ढांचे को रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कर प्रणाली जटिल न हो और कर देयता की गणना करना आसान हो। एक सरल और आसान कर प्रणाली हमेशा एक जटिल और अत्यधिक जटिल कर गणना संरचना से बेहतर मानी जाती है।

विविधता के सिद्धांत का क्या महत्व है?

विविधता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि कर का बोझ एक ही उच्च दर वाले कर पर न डालकर विभिन्न करों में बांटा जाए। एक उच्च दर वाला कर हानिकारक हो सकता है और यह सार्वजनिक भावनाओं को आहत कर सकता है। इसके अलावा, यह व्यक्तिगत करदाताओं पर एकल उच्च कर बोझ के बारे में असंतोष उत्पन्न कर सकता है। इसलिए, यह हमेशा आवश्यक होता है कि कर का बोझ विभिन्न करों में वितरित किया जाए।

संदर्भ

राष्ट्रीय औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम का विस्तृत विश्लेषण

यह लेख एमिटी लॉ स्कूल, नोएडा के विधि छात्र Nikunj Arora और Yash Singhal द्वारा लिखा गया है। यह लेख स्वापक (नारकोटिक्स) औषधि (ड्रग्स) और मन:प्रभावी (साइकोट्रोपिक) पदार्थ अधिनियम, 1985 (एनडीपीएस अधिनियम) का गहन विश्लेषण प्रदान करता है। लेख में अधिनियम के उद्देश्यों, अधिनियम के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं, महत्वपूर्ण धाराओं के साथ संबंधित संशोधनों को सूचीबद्ध किया गया है। इसका अनुवाद Pradyumn singh के द्वारा किया गया है।

परिचय

हाल के वर्षों में, औषधि के दुरुपयोग की समस्या ने सार्वजनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी जड़ें फैला दी हैं और उन समाजों पर विनाशकारी प्रभाव डाले हैं जहां यह सबसे अधिक प्रचलित है। अन्य सामाजिक बुराइयों की तुलना में औषधि के दुरुपयोग की समस्या को अधिक गंभीर समस्या के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यह संगठित अपराध, मानव तस्करी और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) जैसे अन्य अपराधों के साथ-साथ एचआईवी-एड्स जैसे स्वास्थ्य खतरों के साथ अटूट रूप से जुड़ी हुई है। भारत का सामाजिक, आध्यात्मिक और औषधीय संदर्भों में भांग और अफीम के उपयोग का लंबा इतिहास रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों से समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो दर्शाता है कि वर्ष 2010 और 2009 में क्रमशः 19.51 करोड़ रुपये और 17.05 करोड़ रुपये मूल्य के स्वापक औषधि जब्त किए गए थे। यह समस्या विशेष रूप से पंजाब और मणिपुर राज्यों में अधिक गंभीर है, जहां अनुमानों के अनुसार क्रमशः लगभग 18,000 और 25,000 अंतःशिरा (इंट्रावीनस) औषधि के उपयोगकर्ता (आईडीयू) हैं।

भारत में औषधि  नियंत्रण कानूनों का अवलोकन

भारत में औषधि नियंत्रण कानूनों की उत्पत्ति का पता 1857 के अफीम अधिनियम से लगाया जा सकता है। इसके बाद 1878 का अफ़ीम अधिनियम और 1930 का खतरनाक औषधि अधिनियम आया। इन कानूनों को कुछ विशिष्ट औषधियों  के उपयोग को विनियमित और देखरेख करने के लिए बनाया गया था। सीमित संदर्भों में; वे किसी भी सही तरह से परिभाषित सिद्धांतों पर आधारित नहीं थे और समग्र रूप से स्वापक  औषधियों के दुरुपयोग की समस्या से निपटने के लिए कोई व्यापक प्रावधान नहीं थे। इसके अलावा, प्रावधान के उल्लंघन के लिए मामूली सजा का प्रावधान किया, जो पहली बार अपराध करने वालों के लिए तीन साल की कैद और बार-बार अपराध करने वालों के लिए 4 साल की कैद थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद l, देशों ने मानवाधिकार कानून को अधिनियमित करने पर सामूहिक रूप से काम करना शुरू कर दिया, जो व्यक्तियों को सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ जीने की अनुमति देने के लिए बनाए गए थे। स्वास्थ्य के संदर्भ में इस सामान्य सिद्धांत का सबसे स्पष्ट प्रकटीकरण मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 25 और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ट्रीटी) के अनुच्छेद 12 में पाया जा सकता है, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम प्राप्त करने योग्य मानकों को बढ़ावा देने की मांग करते हैं। इस पृष्ठभूमि के खिलाफ, स्वापक औषधि पर एकल सम्मेलन, 1961 और अधिक महत्वपूर्ण रूप से, मन:प्रभावी पदार्थ पर सम्मेलन, 1971 जैसे कई अंतरराष्ट्रीय कानूनों ने औषधि के दुरुपयोग की समस्या से निपटने के लिए नियामक शासन और प्रणालियों को लागू करने की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से मान्यता दी है। भारत के स्वापक औषधि नियंत्रण कानून को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने और इन संधियों के लक्ष्यों को प्रभावी बनाने के लिए, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम को व्यापक रूप से एक निषेधवादी (प्रोहिबिटरी) कानून के रूप में माना जाता है जो दो प्रकार के अपराधों से निपटने का प्रयास करता है: जो की निषिद्ध पदार्थों की तस्करी यानी खेती, निर्माण, वितरण और बिक्री, साथ ही उनका उपभोग करना, है।

भारत सरकार स्वापक औषधि पर संयुक्त राष्ट्र एकल सम्मेलन (1961),  मन:प्रभावी पदार्थों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1971), और स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1988), का हस्ताक्षरकर्ता है। जो चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ के उपयोग को सीमित करने और उनके दुरुपयोग को रोकने के दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार के उपाय निर्धारित करता है। एनडीपीएस अधिनियम साथ ही साथ संविधान के अनुच्छेद 47 को लागू करते समय तीन संयुक्त राष्ट्र औषधि सम्मेलनों के तहत भारत के दायित्वों को ध्यान में रखा गया था। यह अधिनियम पूरे भारत के साथ-साथ भारत के बाहर रहने वाले सभी भारतीय नागरिकों और भारत में पंजीकृत जहाजों और विमानों पर यात्रा करने वाले सभी व्यक्तियों को शामिल करता है।

भारत उन पहले विकासशील देशों में से था जिन्होंने कम आय वाले व्यक्तियों के लिए औषधि  की पहुंच में सुधार के लिए एक राष्ट्रीय औषधि नीति (एनडीपी) तैयार की थी, हालांकि औषधि कंपनियों ने धीरे-धीरे चिकित्सकों के पर्चे के माध्यम से बाजार पर कब्जा कर लिया है। बाजार में औषधि  की कीमतों को विनियमित करने के लिए 1963 में भारत सरकार द्वारा एक औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) पारित किया गया था। हालांकि डीपीसीओ का बहुत कम प्रभाव था, कई दवा कंपनियां देश से हट गई। नतीजतन, कुछ औषधि  का उत्पादन भारत से चीन चला गया। 2013 में, डीपीसीओ में एक बड़ा सुधार हुआ। 2013 में, डीपीसीओ को गैर-नियंत्रित उत्पादों के लिए अधिक अनुकूल माना गया, क्योंकि कोई नया निवेश नहीं किया गया था।

प्रारंभ में, अफ़ीम और मॉर्फ़ीन का उपयोग गृहयुद्ध के दौरान चिकित्सा तैयारी के लिए किया जाता था और इससे स्वापक औषधि की लत लग गई। इन युद्धों में भाग लेने वाले अनुभवी सैनिक इन औषधियों  के आदी हो गए, जिसके कारण सैनिक रोग का निदान किया गया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, भले ही 1937 में भांग के उत्पादन पर प्रभावी ढंग से प्रतिबंध लगा दिया गया था, परन्तु कुछ सरकारों ने जल्द ही पाया कि उन्हें रस्सी और डोर जैसी आवश्यकताओं के लिए इसकी आवश्यकता है। 

भारत सरकार ने स्वापक औषधियों पर एकल सम्मेलन (1961) का  विरोध किया, इसलिए सम्मेलन द्वारा यह निर्णय लिया गया कि भारत को केवल वैज्ञानिक और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए भांग उपलब्ध कराने के लिए 25 वर्ष की छूट दी जाएगी, किसी अन्य कारण से नहीं। मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए, भारत अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों के प्रति बाध्य हो गया था। इसने भारत सरकार को भांग के गहरे उपयोग को खत्म करने के लिए मजबूर किया। परिणामस्वरूप, 14 नवंबर 1985 को अधिनियमित एनडीपीएस अधिनियम ने बहुत कम विरोध के साथ भारत में सभी स्वापक  औषधियों  पर प्रतिबंध लगा दिया।

अधिनियम के घटक

अधिनियम को 6 अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक अधिनियम के तहत अलग-अलग भागों को शामिल करता है। इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए निम्नलिखित सभी अध्याय हैं:

अध्याय I: प्रारंभिक

यह अधिनियम के उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण परिभाषाओं और मन:प्रभावी पदार्थों में वस्तुओं को जोड़ने या हटाने से संबंधित शक्तियों के साथ-साथ अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

अध्याय II: प्राधिकारी और अधिकारी

यह अध्याय स्वापक  औषधियों की अवैध तस्करी को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार की शक्तियों पर चर्चा करता है। यह आगे केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के अधिकारियों की शक्तियों के बारे में बात करता है जो किसी भी अपराध की जांच करने में सक्षम हैं और स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों पर सलाहकार समिति की संरचना पर दिशा निर्देश भी देते हैं।

अध्याय II A: औषधियों  के दुरुपयोग के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कोष

यह भाग स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के दुरुपयोग को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय कोष के गठन का प्रावधान करता है। इस कोष के तहत गतिविधियों के लिए वित्त की वार्षिक रिपोर्ट की भी वकालत करता है।

अध्याय III: निषेध, नियंत्रण और विनियमन

यह अध्याय स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के कब्जे को नियंत्रित करने और/या विनियमित करने के प्रावधानों के साथ-साथ अधिनियम के तहत निषिद्ध सभी गतिविधियों का एक विस्तृत विवरण देता है। यह अधिनियम के तहत निषेध, नियंत्रण और विनियमन में केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों की भूमिका का भी वर्णन करता है। यह किसी व्यक्ति या संगठन या किसी प्राधिकारी द्वारा औषधियों में बाहरी लेनदेन को प्रतिबंधित करता है।

अध्याय IV: अपराध और दंड

इस अध्याय में इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए विभिन्न अपराधों और उनके बाद के दंडों से निपटा गया है। अपराधों को सभी गतिविधियों के साथ परिभाषित किया गया है जो विशेष अपराध का गठन करते हैं। अधिनियम के तहत अपराधों को आपराधिक अपराधों के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसलिए दंड कठोर और कारावास के रूप में हैं। यह भाग अधिनियम के इस अध्याय के अंतर्गत आने वाले मामलों में परीक्षण प्रक्रिया की भी गणना करता है।

अध्याय V: प्रक्रिया

इस अध्याय में जांच के लिए आवश्यक सटीक प्रक्रिया निर्धारित की गई है। जांच प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्राधिकरण द्वारा इस अध्याय के प्रावधानों से परे कोई भी गतिविधि, उस प्राधिकरण की ओर से कानूनी उल्लंघन का कारण बनेगी। यह वर्णन करता है:

  • वारंट जारी करने की प्रक्रिया;
  • किसी भी दोषी की संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया;
  • अवैध खेती के बारे में सूचित करने का कर्तव्य;
  • कई अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के बीच नियंत्रित वितरण करने की शक्तियाँ;
  • कुछ परिस्थितियों में बयानों की प्रासंगिकता; और
  • जब्त की गई वस्तुओं का प्रभार लेने की पुलिस की शक्ति। 

अध्याय V A: अवैध रूप से अर्जित संपत्ति की जब्ती

यह भाग पुलिस अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को जब्त करने की प्रक्रिया से संबंधित है। इस प्रक्रिया में ऐसी संपत्ति की पहचान, उसके बाद उसकी जब्ती और प्रबंधन और अंत में अपराधी को नोटिस जारी करना और ऐसी अन्य प्रक्रियाएं शामिल हैं। यह दर्शाता है कि सबूत का भार किस पक्ष पर है। जब्ती पर देय जुर्माना और विशेष हस्तांतरण शून्य और अवैध हैं। इसमें अपील के मामलों में अपना अधिकार क्षेत्र प्रदान करते हुए अपराधों पर फैसला देने की न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की शक्ति भी बताई गई है। पुलिस के पास किसी मामले में अवैध संपत्तियों और खोजी हुई चीजों को अपने कब्जे में लेने की शक्ति है और कुछ मामलों में संपत्ति को छोड़ सकती है।

अध्याय VI: विविध

यह अध्याय अधिनियम के तहत सभी कम विशिष्ट प्रावधानों से संबंधित है।  यह एक प्रावधान प्रदान करता है जिसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपने विषय क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र के लिए नियम और नीतियां बनाते समय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का ध्यान रखेंगी। यह सरकार को नशे की लत से उबरने के लिए केंद्रों की पहचान करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार भी देता है। केंद्र सरकार के पास नियम बनाने या इस शक्ति को अन्य प्राधिकरणों को सौंपने की शक्ति है। अधिनियम के तहत किसी भी प्रावधान के संबंध में नियम और अधिसूचनाएं सभी सदस्यों के विचार के लिए संसद के समक्ष रखी जाएंगी। इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के समान शक्तियां, कर्तव्य और जिम्मेदारियां सौंपी गई है।

एनडीपीएस अधिनियम का उद्देश्य

निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए, एनडीपीएस अधिनियमित किया गया था:

  • स्वापक औषधियों  के उपयोग और कब्जे को नियंत्रित करने वाले कानूनों को संशोधित और समेकित करना।
  • स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के अवैध कब्जे, बिक्री, पारगमन (ट्रांजिट) और उपभोग के नियंत्रण, विनियमन और पर्यवेक्षण (सूपर्विजन) के लिए कड़े प्रावधान स्थापित करना।
  • स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के साथ-साथ अवैध स्वापक  औषधियों  की तस्करी से प्राप्त या उपयोग की जाने वाली संपत्तियों को जब्त करने के लिए एक तंत्र प्रदान करना।
  • स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रावधानों के कार्यान्वयन के साथ-साथ उससे जुड़े अन्य उद्देश्यों के लिए एक तंत्र स्थापित करना।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

स्वापक औषधि:

एनडीपीएस अधिनियम का धारा 2 पूरे कानून में प्रयुक्त विभिन्न शब्दों को परिभाषित करता है। स्वापक औषधि को एक कानूनी अवधारणा के रूप में परिभाषित करना उन्हें चिकित्सकीय रूप से नींद लाने वाले एजेंट के रूप में वर्णित करने से बहुत अलग है। अधिनियम की धारा 2 (xiv) में स्वापक औषधियों  को कोका पत्ती, गांजा, अफीम, खसखस ​​के तने, इनमें से किसी भी पदार्थ के व्युत्पन्न (डेरिवेटिव)/सांद्रण (कॉन्सन्ट्रेशन) और सरकार द्वारा अपने आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित अन्य पदार्थों के रूप में परिभाषित किया गया है।

दिनांक 13.3.2019 के एस.ओ 1350 (E) के अनुसार मौजूदा अधिसूचित निर्मित औषधियों के साथ, पदार्थों, लवणों (साल्टस) और उनकी तैयारियों में कुछ अतिरिक्त पदार्थों को भी निर्मित औषधि घोषित किया गया है। 

स्वापक पदार्थ ऐसे पदार्थ हैं जो इंद्रियों की प्रभावशीलता को कम करते हैं और असुविधा को शांत करते हैं। अतीत में, ‘स्वापक पदार्थ’ शब्द को आम तौर पर सभी औषधियों  के रूप में माना जाता था, लेकिन आजकल, इस शब्द का अर्थ हेरोइन, हेरोइन व्युत्पन्न और उनके अर्ध-सिंथेटिक संस्करणों (एडिशन) में बदल दिया गया है। ओपिओइड शब्द भी है जो इन औषधियों  का वर्णन करता है। कुछ उदाहरणों में हेरोइन और निर्धारित औषधि जैसे विकोडिन, कोडीन, मॉर्फिन आदि शामिल हैं।

औषधियों  को अक्सर ओपिओइड दर्द निवारक के रूप में भी जाना जाता है। उनका प्राथमिक उद्देश्य गंभीर दर्द का इलाज करना है जिसे अन्य दर्द निवारक औषधियों  द्वारा पर्याप्त रूप से इलाज नहीं किया जा सकता है। जब तक इन औषधियों  का उपयोग सावधानी के साथ और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता की करीबी निगरानी में किया जाता है, तब तक ये दर्द के इलाज में काफी फायदेमंद हो सकती हैं।

मन:प्रभावी पदार्थ

इसके अलावा, ‘मन:प्रभावी पदार्थ’ शब्द का प्रयोग किसी भी पदार्थ को संदर्भित करने के लिए किया जाता है जो मन को बदलता करता है। धारा 2(xxiii) में, ‘मन:प्रभावी पदार्थ’ को किसी भी पदार्थ के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्राकृतिक हो या सिंथेटिक या कोई प्राकृतिक व्युत्पन्न हो या उस पदार्थ या व्युत्पन्न से तैयार किया गया पदार्थ जो एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट मन:प्रभावी पदार्थ की सूची में हो। उदाहरण के लिए एम्फ़ैटेमिन, मेथाक्वालोन, डायजेपाम, अल्प्राजोलम, केटामाइन, आदि।

एनडीपीएस अधिनियम के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू

सकारात्मक पहलू:

इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक तथ्य यह है कि स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थों को सूची से बहुत आसानी से जोड़ा या हटाया जा सकता है। सरकार को इन परिवर्तनों को प्रभावी करने के लिए किसी औपचारिक विधेयक या संशोधन को पारित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परिवर्तन उपलब्ध जानकारी के आधार पर या आधिकारिक राजपत्र में सरल प्रकाशन द्वारा किए जा सकते हैं।

भारत सरकार ने धारा 4 के उप-खंड 3 के अनुसार पूरे देश में स्वापक औषधि कानून प्रवर्तन के समन्वय के लिए विशिष्ट जिम्मेदारी के साथ स्वापक औषधि नियंत्रण ब्यूरो की स्थापना की है। राष्ट्रीय योजना मापदंडों के आधार पर, एनसीबी राष्ट्रीय संपर्क के समन्वयक और खुफिया जानकारी एकत्र करने और प्रसारित करने के लिए एक केंद्रीय बिंदु के रूप में कार्य करता है।

विशेष रूप से, अधिनियम मजिस्ट्रेटों और केंद्र और राज्य सरकारों के विशेष रूप से नियुक्त अधिकारियों दोनों को तलाशी और गिरफ्तारी वारंट जारी करने का अधिकार देता है। इस तकनीक का उपयोग करके, किसी भी जानकारी का त्वरित और उचित तरीके से जवाब देना और वारंट जारी करने की आवश्यकता से बचना संभव होना चाहिए। नतीजतन, किसी भी जानकारी के लिए समय पर और प्रभावी प्रतिक्रिया की गारंटी है।

नकारात्मक पहलू

अधिकांश मामलों में, सजा उन कार्यों के लिए दी जाती है जो दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं, जैसे हत्या और चोरी। कानून द्वारा बनाए गए अपराध, जैसे कि एनडीपीएस अधिनियम में उल्लिखित, निराधार अपराधों की श्रेणी में आते हैं। जिस व्यक्ति के पास गाँजा है या वह अफीम युक्त पेय पीता है, वह खुद को या दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाता है। एक सामान्य नियम के रूप में, एक अपराध में दो तत्व शामिल होते हैं: विशिष्ट कार्य और दोषपूर्ण मन या कपटपूर्ण इरादा जिसने कार्य को जन्म दिया।

हालांकि, एनडीपीएस अधिनियम के धारा 35 के तहत दोषपूर्ण इरादे की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है और अदालत को अधिनियम के तहत सभी अपराधों के लिए दोषी मानसिक स्थिति की उपस्थिति मानने का निर्देश देता है। इस प्रकार, ऐसी स्थिति में जहां कब्जा अधिनियम के तहत अपराध है, वहां सचेत कब्जे को इस अपराध के श्रेणी मे रखा जाएगा।

एनडीपीएस अधिनियम के आधार पर, यह माना जाता है कि प्रतिवादी को सामग्री का ज्ञान है। अधिनियम की धारा 54 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वापक औषधियों, मन:प्रभावी पदार्थों, या किसी अन्य आपत्तिजनक वस्तु के कब्जे का संतोषजनक हिसाब देने में विफल रहता है, तो यह माना जाएगा कि उसने अपराध किया है।

दूसरे दोषसिद्धि के मामले में, जो कि उकसाने या अपराध करने के प्रयास तक सीमित हो सकता है, धारा 31-A आजीवन कारावास के बजाय अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान करती है।

नागरिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि एनडीपीएस अधिनियम की समीक्षा नागरिक स्वतंत्रता के परिप्रेक्ष्य से की जानी चाहिए क्योंकि इसमें मृत्युदंड, जमानत का लगभग इनकार, इरादे और ज्ञान की पूर्वधारणा जैसे अत्यधिक कठोर दंड हैं, प्रभावी रूप से अभियुक्त  पर उनकी बेगुनाही साबित करने का बोझ डालते हैं।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण धाराएँ

एनडीपीएस अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण धाराएं निम्नलिखित हैं:

धारा 3: 

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, केंद्र सरकार को मन:प्रभावी पदार्थों की सूची से ऐसे पदार्थों या प्राकृतिक सामग्री या लवण या ऐसे पदार्थों या सामग्री की तैयारियों को जोड़ने या हटाने का अधिकार है। बहुत ही सरल तरीके से, सरकार किसी भी समय बिना कोई कानून पारित किए या उपलब्ध जानकारी के आधार पर कानूनों में संशोधन किए बिना या किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के आधार पर निर्णय लिए बिना आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना जारी करके ऐसा कर सकती है। 

धारा 7A और धारा 7B: 

धारा 7A के तहत केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्वापक औषधि दुरुपयोग नियंत्रण कोष नामक एक कोष बनाने का अधिकार है। विशेष रूप से, इस कोष का उपयोग स्वापक  औषधियों  और मन:प्रभावी पदार्थों की अवैध तस्करी से निपटने के लिए किए गए उपायों के संबंध में किए गए व्यय को शामिल करने के लिए किया गया है। धारा 7B के प्रावधानों में, केंद्र सरकार को इस कोष  द्वारा वित्त पोषित गतिविधियों पर एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।   

धारा 8(c): 

धारा 8(c), के अनुसार किसी के लिए भी कोका के पौधे की खेती करना या कोका के पौधे के किसी भी हिस्से को इकट्ठा करना, या अफीम पोस्ता या किसी भी भांग के पौधे की खेती करना या उत्पादन, निर्माण, स्वामित्व, बिक्री, खरीद, परिवहन, भंडारण, उपयोग, उपभोग, अंतर-राज्य आयात, अंतर-राज्य निर्यात, भारत में आयात, भारत से निर्यात या किसी भी स्वापक  औषधि या मन:प्रभावी पदार्थ को स्थानांतरित करना करना गैरकानूनी है।

हालाँकि, निम्नलिखित धारा का अपवाद है:

‘चिकित्सा या वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए और इस अधिनियम के प्रावधानों या इसके तहत बनाए गए नियमों या आदेशों द्वारा प्रदान किए गए तरीके और सीमा तक।’

उत्तरांचल राज्य बनाम राजेश कुमार गुप्ता (2006) में  यह माना गया कि अपवादों को दो मानदंडों पर आंका जाना चाहिए: पहला, क्या औषधियों का उपयोग औषधीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है, और दूसरा, क्या वे स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ नियम, 1985 के अध्याय VI और VII में निहित नियामक प्रावधानों के दायरे में आते हैं। 

भारत संघ बनाम संजीव वी देशफान्डे  (2014), मे न्यायालय ने माना कि धारा 8(C) के तहत, उन औषधियों पर प्रतिबंध लागू होगा जो एनडीपीएस नियमों की अनुसूची I में उल्लिखित नहीं हैं, लेकिन एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची I में उल्लिखित हैं, और उन औषधियों पर भी लागू होंगी जो औषधीय और वैज्ञानिक उद्देश्य के लिए है, क्योंकि वे एनडीपीएस अधिनियम द्वारा निषिद्ध हैं। एनडीपीएस अधिनियम में स्वापक औषधियों  और मन:प्रभावी  पदार्थों से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कोई नियम नहीं बनाया गया है। ऐसे पदार्थों से निपटने के संबंध में, इसमें केवल ऐसे नियम बनाना शामिल है जो ऐसी गतिविधियों को विनियमित और अनुमति देते हैं। धारा 8(c) के तहत, कुछ गतिविधियों को स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है (जैसे कि वर्तमान मामले में भारत से बाहर स्वापक औषधि  और मन:प्रभावी पदार्थों का आयात और निर्यात)। एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपनाए गए नियमों की व्याख्या इस तरह नहीं की जानी चाहिए कि वे मूल अधिनियम में पाए जाने वाले अधिकारों और दायित्वों को खत्म कर दें। इसके अलावा, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए कि स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों को चिकित्सा या वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए नियंत्रित किया जा रहा है, यह अपने आप में धारा 8(c) के तहत बनाए गए निषेध को नहीं हटा सकता है। इसलिए एनडीपीएस अधिनियम, नियमों और आदेशों के अनुसार, निर्दिष्ट तरीकों के तहत उनके सीमा तक की जानी चाहिए। 

धारा 27: 

इस धारा में  स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों के सेवन के लिए विभिन्न दंड निर्धारित किए गए हैं, जैसे कि 1 साल तक का कठोर कारावास, या बीस हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों, और कोकीन, डायसेटाइल-मोर्फिन या किसी अन्य  स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थ के अलावा किसी भी स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थ के सेवन पर, 6 महीने तक का कारावास या 10,000 रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

गौंटर एडविन किर्चर बनाम गोवा राज्य, सचिवालय पणजी, गोवा, मे न्यायालय ने धारा 27 को सही साबित करने के लिए माना कि  निम्नलिखित आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए:

  • किसी व्यक्ति के पास कोई स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों पाया गया है, भले ही मात्रा ‘छोटी’ हो;
  • इसलिए ऐसी वस्तुओं को रखना भी अधिनियम के प्रावधान, और उसके तहत बनाए गए किसी नियम या आदेश या इसके तहत जारी किसी सरकारी आदेश का उल्लंघन होगा; और
  • ऐसी कोई भी स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ जो किसी भी व्यक्ति के पास पाया जाएगा, उसका उद्देश्य उसके व्यक्तिगत उपयोग के लिए होगा, न कि पुनर्विक्रय/वितरण के लिए होना चाहिए।

अनिल कुमार बनाम पंजाब राज्य (2017), में न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जो पहले से ही जेल में बंद है, उसे बाद के आपराधिक अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो जेल की अवधि आम तौर पर तब शुरू होगी जब व्यक्ति ने मूल सजा काट ली होगी। यदि मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह उचित हो तो अदालत पिछली सजा के साथ ही सजा चला सकती है। यह आवश्यक है कि न्यायालय इस तरह के विवेक का प्रयोग ठोस न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार करे न कि यंत्रवत् । यह अपराध की प्रकृति और प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि सजा को एक साथ चलाने का निर्देश देने में विवेक का प्रयोग किया जाना है या नहीं।

धारा 36A: 

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36A में एक खंड जिसे ‘गैर-बाधाकारी (नॉन-ऑब्स्टेंट)’ कहा जाता है, विशेष अदालत को तीन साल से अधिक के कारावास योग्य मामलों की सुनवाई करने का अधिकार देता है। यह प्रावधान शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए है। निम्नलिखित कुछ विशेषताएं हैं: 

  • एनडीपीएस अधिनियम के तहत, सरकार अपराधों के अभियोजन में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित कर सकती है।
  • आधिकारिक राजपत्र की अधिसूचना के माध्यम से इसे विशेष क्षेत्रों या स्थानों में स्थापित किया जाएगा। 
  • विशेष न्यायालय को सत्र न्यायालय माना जाएगा।
  • विशेष न्यायालय का एक न्यायाधीश होगा, जिसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा। विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए योग्यता प्राप्त करने के लिए, एक न्यायाधीश को पहले सत्र न्यायाधीश या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश होना चाहिए।
  • एनडीपीएस अधिनियम के तहत, तीन साल से अधिक कारावास की सजा वाले सभी अपराधों की सुनवाई एक विशेष अदालत द्वारा की जा सकती है।
  • किसी पुलिस रिपोर्ट या किसी राज्य अधिकारी या केंद्रीय अधिकारी द्वारा की गई शिकायत की समीक्षा करके, एक विशेष अदालत यह निर्धारित करेगी कि कोई अपराध था या नहीं।
  • एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपराधों के अलावा, विशेष अदालत को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के तहत अन्य आपराधिक अपराधों के अभियुक्त  व्यक्ति पर भी मुकदमा चलाने का अधिकार दिया गया है। 
  • विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाही सीआरपीसी के प्रावधानों द्वारा शासित होगी, जिसमें जमानत और बॉन्ड  से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
  • विशेष न्यायालय के मामले में, मुकदमा चलाने वाले व्यक्ति को लोक अभियोजक माना जाएगा।       

धारा 41:

अधिनियम की धारा 41 के अनुसार, मजिस्ट्रेटों के साथ-साथ केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग, स्वापक औषधि विभाग, सीमा शुल्क विभाग, राजस्व खुफिया इकाई या राज्य के किसी अन्य विभाग के विशेष रूप से नामित राजपत्रित अधिकारियों को तलाशी वारंट जारी करने का अधिकार है। परिणामस्वरूप, सूचना प्राप्त होने पर तुरंत और प्रभावी ढंग से कार्रवाई की जा सकती है।

धारा 50:

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी द्वारा तलाशी लेने का अनुरोध कर सकता है और अधिकारी उस व्यक्ति को तब तक हिरासत में रख सकता है जब तक कि मजिस्ट्रेट को नहीं लाया जाता है। हालांकि, अधिकारी के लिए व्यक्ति की तलाशी लेना दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के धारा 100 के अनुसार संभव है की यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि उस व्यक्ति को किसी भी स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ के साथ पाए जाने की संभावना के बिना निकटतम गठित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास नहीं ले जाया जा सकता है। तलाशी वारंट में ऐसे विश्वास के कारण बताए जाएंगे, और उसकी एक प्रति 72 घंटों के भीतर उसके तत्काल पर्यवेक्षक (सूपर्वाइज़र) को भेजी जाएगी। 

धारा 64 A:

यह सरकार की ओर से एक सराहनीय पहल है जिसके तहत नशे के आदी लोगों को चिकित्सा उपचार लेने का मौका दिया जाता है और इसके लिए वे उत्तरदायी नहीं हैं। उपयोग करने के लिए धारा 64A किसी नशेड़ी पर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 27 के तहत या थोड़ी मात्रा में स्वापक औषधियों  या मन:प्रभावी  पदार्थों से जुड़े अपराध का आरोप लगाया जाना चाहिए। इसके अलावा, वह नशामुक्ति के लिए स्वैच्छिक चिकित्सा उपचार लेगा; यदि वह नशामुक्ति के लिए चिकित्सा उपचार कराता है, तो उसे धारा 27 के प्रावधानों के तहत या कम संख्या में स्वापक औषधि या मन:प्रभावी  पदार्थों से जुड़े अपराधों के लिए किसी अन्य प्रावधान के तहत दोषी नहीं ठहराया जाएगा। हालाँकि, यदि नशे के आदि को लत पर काबू पाने के लिए पूर्ण उपचार नहीं मिलता है, तो यह प्रतिरक्षा खो सकती है।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत जमानत

कानून के मुताबिक, यह अच्छी तरह से स्थापित है कि स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ के क्षेत्र में उदार दृष्टिकोण अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में ऐसे मानक निर्धारित किए हैं, जिनके माध्यम से यह प्रदान किया गया है कि एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपराध के लिए अभियुक्त  जमानत मांग रहा है तो क्या विचार किया जाना चाहिए।

भारत संघ बनाम रामसमुझ और अन्य (1999) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने गौर किया कि 

“…ध्यान रहे कि हत्या के मामले में अभियुक्त  एक या दो व्यक्तियों की हत्या करता है, जबकि स्वापक औषधि का कारोबार करने वाले लोग कई निर्दोष युवा पीड़ितों की मौत का कारण बनने या उन पर जानलेवा हमला करने में सहायक होते हैं, जो असुरक्षित हैं; यह समाज पर हानिकारक और घातक प्रभाव डालता है; वे समाज के लिए खतरा हैं; भले ही उन्हें अस्थायी रूप से रिहा कर दिया जाए, सभी संभावनाओं में, वे तस्करी और/या स्वापक औषधि के अवैध कारोबार को गुप्त रूप से जारी रखेंगे।”

तदनुसार, स्वापक औषधि के मामलों में जमानत का व्यवहार सामान्य रूप से अलग होता है। आम तौर पर, जमानत एक नियम है और जेल अपवाद श्रेणी से संबंधित है, जबकि एनडीपीएस  के मामलों में, जेल नियम श्रेणी से संबंधित है और जमानत अपवाद श्रेणी से संबंधित है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एनडीपीएस  अधिनियम की धारा 37  संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और गैर-जमानती अपराधों के मुद्दे से संबंधित है। एनडीपीएस  अधिनियम की धारा 27 में कहा गया है कि अधिनियम के तहत दंडनीय सभी अपराध संज्ञेय हैं और अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध के अभियुक्त  किसी व्यक्ति को कुछ शर्तों के पूरा होने तक जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा या उसकी जमानत नहीं होगी। यह धारा 19 या धारा 24 या धारा 27A के तहत अपराधों और वाणिज्यिक (कमर्शियल) वाले अपराधों पर भी लागू होती है।

अधिनियम के तहत जमानत दिए जाने से पहले निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए:

  • अभियुक्त के पास यह विश्वास करने का उचित आधार है कि वह अपराध का दोषी नहीं है।
  • तथ्य यह है कि यदि जमानत दे दी जाती है, तो प्रतिवादी द्वारा जमानत पर बाहर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।

केरल राज्य बनाम राजेश  के एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि,

“धारा 37 की योजना से पता चलता है कि जमानत देने की शक्ति का प्रयोग न केवल सीआरपीसी की धारा 439 के तहत निहित सीमाओं के अधीन है, बल्कि धारा 37 द्वारा रखी गई सीमा के अधीन भी है जो एक गैर-बाध्यकारी खंड से शुरू होती है।”

उक्त धारा के तहत, कार्यकारी भाग नकारात्मक रूप में है जो यह निर्धारित करता है कि अधिनियम के तहत अपराध करने का अभियुक्त  कोई भी व्यक्ति तब तक जमानत के विस्तार का हकदार नहीं है जब तक कि निम्नलिखित दोनों शर्तें पूरी न हो जाएं:

  • अभियोजन पक्ष को आवेदन पर आपत्ति जताने का मौका मिलना चाहिए।
  • निर्णय केवल तभी किया जा सकता है जब अदालत यह मनाने के लिए सहमत हो, कि अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध दोषी मानने के लिए उचित आधार नहीं है।

इनमें से कोई भी शर्त पूरी न होने पर जमानत देना संभव नहीं है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि, जब एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की  धारा 439  के बीच विरोधाभास होता है, तो एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 लागू होती है।

हकीम@पिल्ला बनाम राजस्थान राज्य एस.बी. (2019) के मामले में न्यायालय ने कहा कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 का शीर्षक ‘संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध’ है। हालांकि, यह धारा एक गैर-बाध्यकारी खंड से शुरू होती है जिसमें कहा गया है कि अधिनियम के तहत जो भी अपराध दंडनीय हैं वे संज्ञेय होंगे। कानून हर अपराध के लिए जमानत पर रोक नहीं लगाता है। सीआरपीसी की अनुसूची I में चर्चा किए गए अन्य कानूनों के तहत भी अपराध हैं। पहली अनुसूची के भाग II में, आइटम नंबर 3 में कहा गया है कि यदि विचाराधीन अपराध अन्य कानून के तहत तीन साल से कम कारावास से दंडनीय है, तो यह जमानती और गैर-संज्ञेय है।

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21 के तहत, थोड़ी मात्रा में गांजा (1 किलो तक) रखने के अपराध में छह महीने की जेल की सजा और जुर्माना हो सकता है। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37(1) के आधार पर अपराध संज्ञेय है, हालांकि जैसा कि सूची में आइटम नंबर 3 (पहली अनुसूची के भाग II में) में कहा गया है, अपराध जमानती है।

रिया चक्रवर्ती बनाम भारत संघ और अन्य (2020) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम बलदेव सिंह (1999) के निर्णयों को आधार बनाया। अदालत के अनुसार, पंजाब कारावास अधिनियम की धारा 37 अधिनियम के तहत सभी अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध दोनों बनाती है और जमानत देने के लिए कठोर शर्तें प्रदान करती है। इसी पर भरोसा करते हुए, न्यायमूर्ति कोटवाल ने नोट किया कि “1999 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ये टिप्पणियां किए जाने के बाद से स्थिति नहीं बदली है”। इसलिए ये टिप्पणियां आज के परिदृश्य पर अधिक बल के साथ लागू होती हैं, यही कारण है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का बलदेव सिंह में फैसला बाध्यकारी है और  एनडीपीएस अधिनियम के तहत सभी अपराध गैर-जमानती हैं।

एनडीपीएस अधिनियम में संशोधन

अधिनियम में किए गए संशोधन निम्नलिखित थे:

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 1988 (1989 का 2) 1989:

एनडीपीएस अधिनियम में एक प्रमुख संशोधन किया गया है, जिसमें धारा 27A के तहत अवैध तस्करी के वित्तपोषण के लिए कड़े प्रावधान और खंडों को जोड़ा गया है। अवैध पदार्थों की तस्करी में उत्पादन, कब्जा, बिक्री, खरीद, परिवहन, भंडारण और धारा 27A के तहत दर्ज कोई भी व्यक्ति शामिल है।

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 2001:

इस संशोधित अधिनियम का उद्देश्य सजा को और अधिक उद्देश्यपूर्ण बनाकर उसे युक्तिसंगत बनाना है। अब नशेबाज के लिए कानून को लागू करना आसान हो गया था, और जमानत को भी उदार बनाया गया था।

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 2014:

1 मई, 2014 को एनडीपीएस संशोधन 2014 लागू हुआ।  एनडीपीएस अधिनियम की धारा 71 में वर्णित है कि औषधि मामलों को कैसे संभाला जाना चाहिए, जिसमें उपचार सुविधा नियम भी शामिल हैं। पिछले संशोधनों के हिस्से के रूप में, अधिनियम के तहत उच्च-स्तरीय अपराधों को औषधि के सेवन को अपराधी बनाने के साथ-साथ अधिक गंभीर रूप से दंडित किया गया था। पहले की प्रक्रिया के विपरीत, जिसमें लंबे चरणों और विभिन्न वैधता अवधि के कई लाइसेंसों की आवश्यकता होती थी, परन्तु अब मॉर्फिन उत्पादकों को केवल संबंधित राज्य औषधि नियंत्रक से एक ही लाइसेंस की आवश्यकता होती है।

संशोधन के परिणामस्वरूप, पूरे देश में एक समान विनियमन लागू किया गया, जिससे राज्य-दर-राज्य संघर्ष को रोका जा सका। कई आवश्यक स्वापक औषधि जो चिकित्सकीय तैयारियों में उपयोग किए जाते हैं, जैसे मॉर्फिन, फेंटेनल और मेथाडोन, को रोगियों के लिए अधिक सुलभ बना दिया गया है। एक समझौते के रूप में, बड़ी मात्रा में स्वापक औषधियों  की तस्करी के लिए बार-बार आपराधिक दोषसिद्धि के लिए मौत की सजा को घटाकर 30 साल की अलग सजा कर दिया गया। इस संशोधन के बाद, “छोटी मात्रा” अपराधों के लिए अधिकतम जुर्माना 6 महीने से बढ़ाकर 1 वर्ष कर दिया गया है।

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) विधेयक, 2021:

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) विधेयक, 2021 6 दिसंबर, 2021 को लोकसभा में पेश किया गया। इसके पीछे का उद्देश्य स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अध्यादेश (ऑर्डिनेंस), 2021 को प्रतिस्थापित करना है। विधेयक के माध्यम से स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 में एक मसौदा त्रुटि को ठीक किया गया है। यह अधिनियम स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ से संबंधित कुछ कार्यों (जैसे इन पदार्थों का निर्माण, परिवहन और उपभोग) से संबंधित नियमों और विनियमों की रूपरेखा तैयार करता है।

2014 में जब अधिनियम में संशोधन किया गया था तो अवैध गतिविधियों की परिभाषा बदल दी गई थी। इस धारा में संशोधन नहीं किया गया, और इसमें ऐसी अवैध गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए सजा के बारे में पहले की धारा संख्या का उल्लेख जारी रहा। विधेयक में दंड पर धारा में एक नया खंड संख्या जोड़ा गया है।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी मानसिक स्थिति का अनुमान

आपराधिक कानून में, एक मौलिक सिद्धांत है जिसे ‘निर्दोषता की धारणा’ के रूप में जाना जाता है, जो बताता है कि एक अभियुक्त  तब तक निर्दोष है जब तक कि दोषी साबित न हो जाए। यह मौलिक सिद्धांत सेमपर नेसेसिटस प्रॉबेेन्डी इनकमबिटे क्वी एजिट” कहावत से लिया गया है। इसका मतलब यह है कि सबूत का भार उस व्यक्ति पर है जो आप पर आरोप लगा रहा है। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 35 एक अभियुक्त  की दोषी मानसिक स्थिति के अनुमान से संबंधित है। इसका तात्पर्य यह है कि अदालत यह मान लेगी कि अभियुक्त के पास अभियोजन आगे बढ़ाने के लिए ऐसी मानसिक स्थिति है।

इस धारा के तहत, एक स्पष्टीकरण दिया गया है जिसमें कहा गया है कि “इस धारा में दोषी मानसिक स्थिति में इरादा मकसद, किसी तथ्य का ज्ञान और किसी तथ्य पर विश्वास या विश्वास करने का कारण शामिल है।” इसलिए, एनडीपीएस अधिनियम के तहत किसी अपराध के अभियुक्त  व्यक्ति को अपने खिलाफ लगाए गए अनुमान का खंडन करना होगा और यह दिखाना होगा कि उसने कोई अपराध नहीं किया है।

नरेश कुमार उर्फ ​​नीटू बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य  में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 35 के तहत अपराध की मान्यता और धारा 54 के तहत कब्जे के संतोषजनक स्पष्टीकरण की आवश्यकता खंडनीय है। फिर भी, अभियोजन किसी भी उचित संदेह से परे आरोपों को साबित करने के लिए जिम्मेदार बना रहता है। विशेष रूप से, धारा 35(2) में कहा गया है कि एक तथ्य को तभी सिद्ध माना जा सकता है जब वह किसी भी उचित संदेह से परे स्थापित हो न कि संभावनाओं की प्रबलता से।

इसके अलावा, नूर आगा बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2008), में  सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 35 और 54 अभियुक्त  पर उलटा बोझ डालती हैं, और इस प्रकार, संवैधानिक हैं। अभियुक्त  द्वारा अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए आवश्यक प्रमाण का मानक अभियोजन द्वारा आवश्यक प्रमाण से कम है।

एनडीपीएस अधिनियम के तहत स्वापक औषधियों का सचेत कब्जा

एनडीपीएस अधिनियम में ‘सचेत कब्जा’ शब्द का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी विभिन्न न्यायिक निर्णयों ने इसे व्यक्तिगत मामले की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के आलोक में विकसित किया है। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 35 निम्नलिखित बताती है:

  • इस अधिनियम के तहत किसी घोर अपराध के लिए अभियोजन की स्थिति में, अदालत यह मान लेगी कि अभियुक्त की मानसिक स्थिति दोषी थी, लेकिन प्रतिवादी सबूत के साथ जवाब दे सकता है कि वह आरोपित अपराध के संबंध में दोषी मानसिक स्थिति में नहीं था। इसमें, मन की दोषी स्थिति शब्द में किसी तथ्य का इरादा, मकसद और ज्ञान, साथ ही किसी तथ्य पर विश्वास करने का कारण शामिल है।
  • किसी तथ्य को इस धारा के प्रयोजनों के लिए तभी सिद्ध माना जाता है जब अदालत की राय हो कि यह उचित संदेह से परे अस्तित्व में है, न कि केवल तब जब इसके अस्तित्व को साक्ष्य की प्रबलता द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सचेत कब्जे का अर्थ है कि स्वापक औषधि के भौतिक कब्जे के साथ-साथ कब्जे की मानसिक स्थिति भी हो। आपराधिक कानून के तहत, ‘ आपराधिक कृत्य (एक्टस रियस)’ और ‘आपराधिक मनःस्थिति (मेंस रिया)’ के तत्व एक आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व हैं। इसी तरह, एनडीपीएस अधिनियम के तहत, स्वापक औषधि का भौतिक और मानसिक कब्जा एक अपराध का गठन करने के लिए आवश्यक तत्व हैं।

‘चेतना’ मन की एक जानबूझकर या इच्छित स्थिति को संदर्भित करता है। गुणवंतलाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य, में यह बताया गया था कि किसी दिए गए उदाहरण में कब्जा जरूरी नहीं है कि भौतिक हो, बल्कि रचनात्मक भी हो सकता है जैसे कि जिस व्यक्ति के पास भौतिक रूप से होता है, वह ऐसी शक्ति या नियंत्रण के अधीन होगा। ‘कब्जा’ का तात्पर्य कब्जे के अधिकार से है। जैसा कि सुलिवन बनाम अर्ल ऑफ कैथनेस, में घोषित किया गया है।  जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी बंदूक अपनी माँ के अपार्टमेंट में रखी थी, जो उसके अपने घर की तुलना में अधिक सुरक्षित वातावरण में थी, उसे उस बंदूक के कब्जे में माना जाना चाहिए। कब्जे की स्थापना करने पर, दावा करने वाला व्यक्ति कि यह सचेत कब्जा नहीं था, उसे इसकी प्रकृति का प्रदर्शन करना चाहिए, क्योंकि उसके पास कब्जे में आने के तरीके का ज्ञान उसे ऐसा करने में सक्षम बनाता है। अधिनियम की धारा 35 कानूनी अनुमान के आधार पर इस स्थिति को वैधानिक मान्यता प्रदान करती है। धारा 54 के अनुसार, अवैध वस्तुओं के कब्जे के साक्ष्य के आधार पर अपराध का अनुमान लगाना भी संभव है।

उक्त शब्द के संबंध में कई न्यायिक घोषणाएँ की गई हैं। ये सभी आपस में जुड़े हुए हैं लेकिन तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हैं। धर्मपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2010), के मामले में, यह पता चला कि सह-अभियुक्त एक कार चला रहा था जिसमें 65 किलोग्राम अफ़ीम थी। अदालत द्वारा यह स्वीकार किया गया कि कार एक सार्वजनिक वाहन नहीं थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता था कि यात्री के पास बरामद औषधि अनजाने मे थी। इसके अलावा, यह कहा गया कि एक बार कब्जा स्थापित हो जाने पर, अदालत यह मान सकती है कि अभियुक्त की मानसिक स्थिति दोषपूर्ण थी और अपराध किया गया था।

इसे भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सोलाखान गांधखान पठान बनाम गुजरात राज्य (2003) में, सचेत कब्जे की वैधता के मुद्दे थे जब अभियुक्त  केवल एक ऑटोरिक्शा में यात्रा कर रहा था और साथ ही उसके पास अवैध औषधि भी थी। हालांकि, अदालत ने सचेत कब्जे की वैधता को बरकरार रखा। यह माना गया कि संदिग्ध के पास न तो भौतिक कब्जा था और न ही पूर्वकल्पित धारणा या निर्धारित वैधानिक प्रावधान के तहत अपराध करने का मकसद था। अभियुक्त को बरी कर दिया गया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपराध होने के लिए भौतिक और मानसिक दोनों प्रकार का कब्जा आवश्यक था।

मदन लाल और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2003), में अदालत ने माना कि एक ही कार्य को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20 के तहत आपराधिक अपराध नहीं माना जाएगा जब तक कि भौतिक कब्जे के साथ मन की मानसिक स्थिति जुड़ी न हो, और कब्जा कब्जे की प्रकृति के संज्ञान के बिना लिया गया हो।

इसलिए, अदालतों ने बार-बार माना है कि स्वापक औषधियों या मनो-सक्रिय अवयवों पर भौतिक कब्जे को मानसिक नियंत्रण के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने यहां तक ​​कहा कि अभिव्यक्ति ‘कब्जा’ के कई अलग-अलग अर्थ है, यह उस संदर्भ पर निर्भर करता है जिसमें इसका उपयोग किया गया है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ‘सचेत कब्जा’ शब्द व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) है और इसलिए इसे विभिन्न मामलों में तदनुसार और कुछ सावधानी के साथ संभालने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारत में स्वापक औषधियों की समस्या दिखने से कहीं ज्यादा गंभीर है। प्राचीन भारत में, गांजा, चरस और अन्य मनो-सक्रिय पदार्थों का उपयोग उपचार, दर्द निवारण और यहां तक ​​कि मनोचिकित्सा के लिए किया जाता था। 1985 से पहले भारत में स्वापक औषधि के कब्जे या उपयोग को अपराध बनाने वाला कोई कानून नहीं था। अब, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एनडीपीएस अधिनियम में कई प्रावधान है, जो गंभीर दंड निर्दिष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए, धारा 37 के अनुसार, अधिक गंभीर अपराधों के लिए जमानत का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। 1976 के गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1976 (यूएपीए) की तुलना में, यह कानून अधिक कठोर था और परिणामस्वरूप अदालतें लोगों को जमानत पर रिहा करने में हिचकिचाती थीं।

कई कानून सामाजिक समस्याओं को हल करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, हालांकि, जब उनका दुरुपयोग किया जाता है, तो वे क्रूर हो सकते हैं। कानून के अधिक सख्त होने पर कठोर कानून के उभरने की अधिक संभावना होती है। अपनी सख्त प्रकृति के आलोक में, एनडीपीएस का अधिक दुरुपयोग होने की संभावना है। इसलिए, अदालतों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि कानून का हथियार न बनाया जाए और समाज के सभी वर्गों को न्याय मिले।

संदर्भ

 

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

यह लेख M.S.Sri Sai Kamalini द्वारा लिखा गया है, और इसे Sakshi Kuthari द्वारा आगे अद्यतन किया गया है। भारतीय संविधान हमारे देश का मौलिक कानून है और इसमें विभिन्न उद्देश्यों का उल्लेख है जिन्हें राज्य भारत के लोगों के लिए प्राप्त करना चाहता है। यह विभिन्न स्तरों पर सरकार की विभिन्न संरचनाओं और अंगों का भी निर्धारण करता है तथा नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को रेखांकित करता है। इस लेख में संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं, मौलिक अधिकारों, राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक कर्तव्यों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत का संविधान हमारे विधिनिर्माताओं की एक गतिशील एवं उल्लेखनीय उपलब्धि है। चूंकि भारतीय संविधान देश का सर्वोच्च कानून है, इसलिए प्रत्येक नागरिक के लिए इसके सिद्धांतों और प्रावधानों का पालन करना आवश्यक है। इसका दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति संविधान के व्याख्याताओं द्वारा समझी और व्यक्त की जाती है तथा इसे गतिशील होना चाहिए तथा बदलते समय के साथ तालमेल रखना चाहिए। यद्यपि संविधान की मूल बातें और बुनियादी तत्व अपरिवर्तनीय हैं, फिर भी संविधान के लचीले प्रावधानों की व्याख्या गतिशीलता के साथ की जा सकती है, जब कोई विवाद उत्पन्न हो, तो कमजोर या अधिक जरूरतमंद व्यक्ति की सुरक्षा के लिए। 

मोंटेवीडियो सम्मेलन के अनुच्छेद 1 के तहत “राज्य” को एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है, जो एक निर्धारित क्षेत्र पर कब्जा करता है, जिसके सदस्य बाहरी ताकत का विरोध करने और आंतरिक व्यवस्था के संरक्षण के उद्देश्य से एकजुट होते हैं। यह परिभाषा राज्य के ‘पुलिस कार्यों’ पर जोर देती है। एक राज्य के रूप में भारत में ये सभी विशेषताएं मौजूद हैं। 

भारतीय संविधान का निर्माण

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं के बारे में जानने के लिए हमें इसके निर्माण के बारे में जानना भी महत्वपूर्ण है। संविधान सभा की पहली बैठक 26 नवम्बर 1946 को हुई और संविधान पर कार्य शुरू हुआ। इसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई। बैठक में 211 सदस्यों ने भाग लिया था। सबसे बुजुर्ग सदस्य डॉ. सचदानंद सिन्हा को विधानसभा का अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और एच.सी. मुखर्जी को विधानसभा का स्थायी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुना गया। बाद में, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और एच.सी. मुखर्जी क्रमशः विधानसभा के स्थायी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने गए। संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे महत्वपूर्ण डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति थी। 

प्रारूप समिति ने विभिन्न समितियों के प्रस्तावों पर विचार करने के बाद 21 फरवरी, 1948 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उस समय प्रारूप संविधान में 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। भारत के लोगों को चर्चा करने, मसौदा तैयार करने और संशोधन प्रस्तावित करने के लिए 8 महीने का समय दिया गया। इसमें 7,635 संशोधन प्रस्तावित किये गये। सार्वजनिक टिप्पणियों, आलोचनाओं और सुझावों के आलोक में प्रारूप समिति ने दूसरा मसौदा तैयार किया, जिसे अक्टूबर, 1948 को प्रकाशित किया गया और 4 नवंबर, 1948 को संविधान सभा के समक्ष प्रथम वाचन या विचार के लिए प्रस्तुत किया गया था। 

प्रथम वाचन में सामान्य चर्चा शामिल थी जो 4 नवम्बर, 1948 को आरम्भ हुई तथा 9 नवम्बर, 1948 तक जारी रही। इसके बाद मसौदे के खंडों का दूसरा वाचन या विचार शुरू हुआ और यह 15 नवंबर 1948 से 17 अक्टूबर 1949 तक जारी रहा। इस चरण के दौरान, प्रस्तावित 7,635 संशोधनों में से 2,473 पर वास्तव में विधानसभा में चर्चा की गई। इसके बाद सभा पुनः 14 नवम्बर, 1949 को मसौदे के तीसरे वाचन के लिए बैठी और यह 26 नवम्बर, 1949 को समाप्त हुई। 

इस तिथि को संविधान पर संविधान सभा के अध्यक्ष के हस्ताक्षर हुए और इसे पारित घोषित किया गया। इसमें 22 भागों और 12 अनुसूचियों में फैले 395 अनुच्छेद शामिल थे। विधानसभा के कुल 299 सदस्यों में से केवल 284 ही उस दिन उपस्थित थे और उन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किये। संविधान के कुछ प्रावधान 26 नवम्बर, 1949 को ही लागू हो गये थे। 

संविधान सभा का अंतिम सत्र 24 जनवरी, 1950 को आयोजित किया गया, जिसमें सर्वसम्मति से डॉ. राजेंद्र प्रसाद को नए संविधान के तहत भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चुना गया, जो 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने के विशाल कार्य को पूरा करने में संविधान सभा को 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे। संविधान सभा द्वारा लगभग तीन वर्षों तक चलाए गए लंबे समय के पीछे मुख्य कारण सही संतुलन बनाना था, ताकि संविधान द्वारा निर्मित संस्थाएं अव्यवस्थित या अस्थायी व्यवस्था न हों, बल्कि लंबे समय तक भारत के लोगों की आकांक्षाओं को समायोजित करने में सक्षम हों। 

इस लेख में हम भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं के साथ-साथ प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक कर्तव्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। 

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

विश्व का सबसे लम्बा लिखित संविधान

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है और यह बहुत विस्तृत भी है। लिखित संविधान किसी भी देश में संवैधानिक कानून का औपचारिक स्रोत होता है। इसे देश का सर्वोच्च या मौलिक कानून माना जाता है क्योंकि यह देश की प्रत्येक संस्था को नियंत्रित करता है और उसमें व्याप्त है। देश के प्रत्येक अंग को अपने संविधान में निहित सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। भारत के संविधान में विश्व भर के संविधानों से प्रेरणा लेकर विभिन्न अनुच्छेदों को शामिल किया गया है। मूलतः इसमें 395 अनुच्छेद थे, जिन्हें 22 भागों और 8 अनुसूचियों में व्यवस्थित किया गया था। वर्तमान में, कई संशोधनों के बाद, भारतीय संविधान में 448 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं। यह संभवतः दुनिया भर में मौजूद, मौजूदा कानूनों में सबसे लंबा है। इसके विस्तृत होने लंबाई में कई कारक योगदान करते हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • सबसे पहले, भारतीय संविधान केंद्र और राज्य सरकारों दोनों के संगठन और संरचना से संबंधित है;
  • दूसरे, संघीय संविधान में केन्द्र-राज्य संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है। इसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245-255 से इस मामले पर विस्तृत मानदंड हैं जबकि अन्य संघीय संविधानों में केवल अल्प प्रावधान हैं; 
  • तीसरा, भारतीय संविधान ने ब्रिटिश संविधान की कई अलिखित परंपराओं को लिखित सिद्धांतों में बदल दिया है, उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत मंत्रियों की सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत; 
  • चौथा, भारत में विभिन्न समुदाय और समूह हैं। इसलिए उनके बीच आपसी अविश्वास को दूर करने के लिए, संविधान में मौलिक अधिकारों में विस्तृत प्रावधान शामिल करना आवश्यक समझा गया, जो अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों को सुरक्षा प्रदान करेगा; 
  • पांचवां, यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारतीय संरचना सामाजिक कल्याण की अवधारणा पर आधारित है, भारतीय संविधान में राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत शामिल किए गए। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत देश के शासन में राज्य द्वारा अपनाए जाने वाले लक्ष्यों और उद्देश्यों का वर्णन करते हैं; और
  • अंततः, भारतीय संविधान में न केवल शासन के मूल सिद्धांत शामिल हैं, बल्कि इसमें कई प्रशासनिक विवरण भी शामिल हैं, जैसे नागरिकता, आधिकारिक भाषा, सरकारी सेवाएं, चुनावी तंत्र आदि से संबंधित प्रावधान। विविध सांस्कृतिक विविधताओं वाली विशाल भारतीय आबादी के कारण, भ्रम से बचने और उचित प्रशासनिक कार्यप्रणाली के लिए अलग प्रावधान प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की गई है। 

प्रस्तावना

संविधान की प्रस्तावना इसके स्रोत, उद्देश्यों, लक्ष्यों, इसके द्वारा स्थापित राजनीति की प्रकृति और स्रोतों के पीछे निहित निर्देशों को निर्धारित करती है। प्रस्तावना संविधान को कोई शक्ति प्रदान नहीं करती बल्कि संविधान को केवल दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। प्रस्तावना में संविधान के मूल तत्व समाहित हैं। संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य घोषित किया गया है। सरकार को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करने के लिए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘संप्रभु’ शब्द शामिल किया गया था। ‘संप्रभुता’ का सिद्धांत हमारे भारतीय संविधान की रीढ़ है जो लोगों के अधिकार की रक्षा करता है।

1976 में संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा, प्रस्तावना में “समाजवादी” शब्द जोड़ा गया। इसका अर्थ है उत्पादन और वितरण के साधनों पर राज्य का किसी न किसी रूप में स्वामित्व। राज्य नियंत्रण का स्तर यह निर्धारित करता है कि यह एक लोकतांत्रिक राज्य है या समाजवादी राज्य। इस शब्द का अर्थ निजी उद्यम का पूर्ण बहिष्कार तथा पूर्णतः स्वयं का उद्यम और राष्ट्र के भौतिक संसाधनों पर पूर्णतः राज्य का स्वामित्व नहीं है। ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द मूलतः प्रस्तावना में मौजूद नहीं था। इसे 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। राज्य स्वयं को किसी विशेष धर्म से संबद्ध नहीं मानता है, न ही उसका पक्षधर है। राज्य को सभी धर्मों और धार्मिक संप्रदायों के साथ समान व्यवहार करने का आदेश दिया गया है। 

भारतीय संविधान को लोगों द्वारा स्वयं अपनाया, अधिनियमित और लागू किया गया है। यह एक प्रतिनिधि लोकतंत्र के लिए तंत्र स्थापित करता है, जिसे जनता द्वारा, जनता के लिए तथा जनता की सरकार के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक अपनी सरकार चुन सकते हैं, जो उनके प्रति जवाबदेह और उत्तरदायी होगी। सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) वयस्क मताधिकार, नियमित चुनाव, मौलिक अधिकार और एक जिम्मेदार सरकार के माध्यम से लोकतांत्रिक सिद्धांतों को मजबूत किया जाता है। “गणतंत्र” शब्द से तात्पर्य ऐसे राज्य से है जहां सर्वोच्च शक्ति जनता और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है। राजतंत्र के विपरीत, जहां राज्य का प्रमुख वंशानुगत सम्राट होता है, गणतंत्र में राज्य का प्रमुख निर्वाचित होता है। संप्रभुता जनता के पास होती है तथा राज्य का मुखिया एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। उच्चतम से निम्नतम तक सभी सार्वजनिक पद, बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए सुलभ हैं। प्रस्तावना में इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भारत को एक गणराज्य के रूप में नामित किया गया है। 

सामान्यतः प्रस्तावना को क़ानून का हिस्सा नहीं माना जाता था। इसलिए, एक समय ऐसा माना गया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है, जैसा कि इन रे बेरुबारी यूनियन एंड एक्सचेंज ऑफ एन्क्लेव्स (1960) के मामले में माना गया था। लेकिन वह दृष्टिकोण अब अस्तित्व में नहीं है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने कहा है कि प्रस्तावना वास्तव में संविधान का एक हिस्सा है। अधिकांश न्यायाधीशों का मत था कि भारतीय संविधान के किसी भी प्रावधान में संसद द्वारा संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते कि ऐसे संशोधन से भारतीय संविधान के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन न हो। 

कठोरता और लचीलेपन का अनोखा मिश्रण

भारतीय संविधान न तो कठोर है और न ही लचीला, इसी कारण हमारा संविधान सबसे लंबा है। एक कठोर संविधान को इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है कि उसके किसी भी प्रावधान में संशोधन के लिए एक विशेष विधि की आवश्यकता होती है। ए.वी. डाइसी के अनुसार, “कठोर संविधान” का अर्थ है कि इसे सामान्य कानूनों की तरह नहीं बदला जा सकता है। लचीले संविधान के मामले में, किसी भी संवैधानिक प्रावधान को सामान्य विधायी प्रक्रिया द्वारा संशोधित किया जा सकता है। 

लिखित संविधान को आमतौर पर कठोर माना जाता है क्योंकि इसमें लिखित शब्दों को बदलना कठिन होता है। हालाँकि, भारतीय संविधान, लिखित होने के बावजूद, पर्याप्त लचीला है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368(2) में प्रावधान है कि कुछ मामलों में संशोधन के लिए आधे राज्य विधानमंडलों की सहमति आवश्यक है। शेष प्रावधानों को संसद के विशेष बहुमत द्वारा संशोधित किया जा सकता है। 

कठोर संविधान का एक प्रसिद्ध उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है, और इसे कठोर संविधान के रूप में जाना जाता है क्योंकि इसमें संशोधन प्रक्रिया बहुत कठिन है। भारतीय संविधान में संशोधन करना संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान जितना कठिन नहीं है। भारतीय संविधान में अब तक 106 संशोधन हो चुके हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान कठोरता और लचीलेपन का अनूठा मिश्रण है। 

संघीय संविधान

किसी देश का संविधान संघीय अथवा एकात्मक प्रकृति का हो सकता है। संघीय संविधान में, एक केन्द्रीय सरकार होती है जिसके पास कुछ शक्तियां होती हैं जिनका प्रयोग वह पूरे देश पर करती है और ये शक्तियां राज्यों की शक्तियों का स्थान ले लेती हैं। फिर राज्य सरकारें हैं और प्रत्येक सरकार का राज्य के भीतर अधिकार क्षेत्र होता है जिसे केंद्र द्वारा अधिरोहित नहीं किया जा सकता है। भारत का संविधान न तो संघीय है और न ही एकात्मक है। इसलिए, भारत एक अर्ध-संघीय संविधान का उदाहरण है। 

संघीय संविधान एकात्मक संविधान की तुलना में बहुत अधिक जटिल दस्तावेज है, क्योंकि यह केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों तथा केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों के वितरण का प्रावधान करता है, जिससे एकात्मक संविधान का कोई सरोकार नहीं होता है। संघीय ढांचे के अंतर्गत, भारतीय संविधान में पर्याप्त मात्रा में केन्द्रीकरण का प्रावधान है। केन्द्र सरकार का कार्यक्षेत्र बड़ा है और इस प्रकार वह राज्यों की तुलना में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाती है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची VII में केंद्र और राज्य दोनों के समान हित के विषय शामिल हैं। 

भारत सरकार को एकात्मक कहने के कारण निम्नलिखित हैं: 

  • शक्तियों का विभाजन समान नहीं है। केंद्र सरकार के पास राज्य सरकार की तुलना में अधिक शक्तियां हैं, जिसका निर्धारण इस तथ्य से किया जा सकता है कि संघ सूची में राज्य सूची की तुलना में अधिक मामले शामिल हैं; 
  • संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे संघों में, राज्यों को अपना संविधान बनाने का अधिकार है, जो भारत में संभव नहीं है क्योंकि पूरा देश एक ही संविधान का पालन करता है;
  • आपातकाल के समय राज्य केंद्र के नियंत्रण में आ जाते हैं। आपातकालीन प्रावधान सामान्य संघीय ढांचे को लगभग एकात्मक प्रणाली में बदलने का एक सरल तरीका प्रदान करते हैं ताकि राष्ट्रीय आपात स्थितियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके; 
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय सेवा का प्रावधान है। यह संसद को एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाएँ बनाने की अनुमति देता है जो संघ और राज्यों दोनों के लिए समान हैं; 
  • किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है; 
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में भारत के चुनाव आयोग की चर्चा की गई है जिसमें चुनाव संबंधी मामलों के लिए सर्वोच्च प्राधिकार भारत के राष्ट्रपति के पास है; 
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 

भारतीय संविधान को विभिन्न कारणों से संघीय माना जाता है: 

  • एक लिखित संविधान है जो संघीय प्रणाली का पालन करने वाले प्रत्येक देश की एक आवश्यक विशेषता है; 
  • संविधान की सर्वोच्चता सदैव सुरक्षित रहेगी;
  • भारतीय संविधान की अनुसूची VII केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कानून बनाने की शक्ति वितरित करती है; और
  • अनुच्छेद 214 से 231 राज्यों में उच्च न्यायालयों का प्रावधान करते हैं और अनुच्छेद 233 से 237 अधीनस्थ न्यायालयों का प्रावधान करते हैं; 

इस प्रकार, भारतीय संविधान को “अर्ध-संघीय” या एक मजबूत केंद्रीकरण प्रवृत्ति वाले संघ के रूप में वर्णित किया जा सकता है। “अर्ध-संघीय” संविधान से तात्पर्य एक प्रकार के संविधानवाद से है, जहां केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति समान रूप से वितरित नहीं होती है। भारत को एकात्मक पूर्वाग्रह वाला संघ माना जाता है, यही कारण है कि इसकी मजबूत केंद्रीय शासन व्यवस्था के कारण इसे अर्ध-संघीय राज्य कहा जाता है। 

वयस्क मताधिकार

वयस्क मताधिकार की अवधारणा हमारे देश के अठारह वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को चुनावों में वोट देने का अधिकार देती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 देश के सभी वयस्कों को इस अधिकार की गारंटी देता है। यह प्रावधान संविधान (इकसठवां संशोधन) अधिनियम, 1988 द्वारा जोड़ा गया था। इस संशोधन से पहले मतदान के लिए स्वीकृत आयु सीमा इक्कीस वर्ष थी; बाद में इसे बदलकर 18 वर्ष कर दिया गया। 

यह कहना सही होगा कि मतदान का अधिकार न तो सामान्य कानूनी अधिकार है और न ही मौलिक अधिकार है। हालाँकि, यह मात्र एक वैधानिक अधिकार नहीं है बल्कि इसका अधिक महत्वपूर्ण महत्व है। मतदान का अधिकार न केवल विधायिका द्वारा दिया गया विशेषाधिकार है बल्कि यह भारतीय संविधान में भी निहित है। ऐसा निम्नलिखित कारणों से कहा जा सकता है: 

  • सबसे पहले, इंदिरा नेहरू गांधी बनाम श्री राज नारायण एवं अन्य (1975) के मामले में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को संविधान की आधारभूत विशेषता घोषित किया गया है। इसका अर्थ है कि कोई भी कानून मतदान के अधिकार को पूरी तरह से नकार नहीं सकता है;
  • दूसरा, मतदान का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत निहित है। अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला कोई भी व्यक्ति मतदान देने का “हकदार” है। अनुच्छेद 325 में प्रावधान है कि किसी भी मतदाता को “केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर” मतदान करने से नहीं रोका जा सकता है। इसके अलावा, इसका अर्थ यह है कि मतदान के अधिकार को विनियमित करने के लिए विधायिका द्वारा पारित किसी भी कानून को अनुच्छेद 325 और 326 द्वारा निर्धारित मापदंडों के अंतर्गत आना होगा। इन मापदंडों का उल्लंघन करने वाला कोई भी कानून शून्य होगा; 
  • तीसरा, अनुच्छेद 84(b) और 173(b) चुनाव लड़ने का अधिकार देते हैं। वह आवश्यक योग्यता जो पच्चीस वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को लोक सभा या राज्य विधानसभा में सीट के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति देती है, तथा राज्य सभा या राज्य सभा में सीट के लिए तीस वर्ष से कम आयु नहीं होनी चाहिए। जबकि क़ानून उम्मीदवारों के लिए विशिष्ट योग्यताएं और अयोग्यताएं स्थापित कर सकते हैं [अनुच्छेद 102(1)(e) और 190(1)(e)] और नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए प्रक्रियात्मक नियम निर्धारित कर सकते हैं, वे अनुच्छेद 84 और 173 के तहत आवश्यक योग्यता को पूरी तरह से नकार नहीं सकते हैं; तथा 
  • चौथा, चुनाव याचिका के माध्यम से चुनाव को चुनौती देने का अधिकार अनुच्छेद 329(b) द्वारा प्रदत्त है और इस प्रकार यह एक संवैधानिक अधिकार है। विधानमंडल को अब चुनाव याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए मंच और प्रक्रिया निर्धारित करनी है। कोई भी विधायिका चुनाव याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए कोई तंत्र स्थापित करने से इनकार नहीं कर सकती है। 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

भारत में न्यायपालिका को एक महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है। भारतीय न्यायालयों को न केवल व्यक्ति के मामलों में बल्कि विवादित राज्यों और उसके नागरिकों के संबंध में भी न्याय प्रदान करने का कर्तव्य सौंपा गया है। यह संविधान और देश के अन्य कानूनों की व्याख्या करता है तथा सभी प्राधिकारियों अर्थात् विधायी, कार्यकारी, प्रशासनिक, न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों को सीमाओं के भीतर रखकर उनके संरक्षक के रूप में कार्य करता है। भारतीय न्यायपालिका को सरकारी कार्रवाई की जांच करने का अधिकार है ताकि यह आकलन किया जा सके कि यह संविधान और देश को नियंत्रित करने वाली मूल संरचना के अनुरूप है या नहीं। न्यायपालिका देश में प्रशासनिक प्रक्रियाओं की निगरानी करती है तथा अंतर-सरकारी विवादों का निपटारा करके संघवाद के संतुलन चक्र के रूप में कार्य करती है। 

न्यायपालिका के पास सरकार के किसी भी अंग द्वारा किसी भी अनुचित अतिक्रमण से लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की शक्ति है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय, विशेष रूप से, लोगों के मौलिक अधिकारों के संरक्षक एवं संरक्षक के रूप में कार्य करता है। अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत करने वाला व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार का सीधे आह्वान कर सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों को बिना किसी भय या पक्षपात के निष्पक्ष रूप से अपना कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए संविधान में न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के प्रावधान हैं।

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा स्वयं न्यायाधीशों की सलाह पर की जाती है। एक बार नियुक्त होने के बाद, न्यायाधीश संविधान द्वारा निर्धारित सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की आयु तक पद पर बने रहेंगे। अनुच्छेद 124 और 217 के अंतर्गत न्यायाधीशों को अक्षमता या दुर्व्यवहार के आधार पर हटाने के लिए एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित की गई है। 

एकल नागरिकता

भारतीय संविधान का भाग II, अर्थात् अनुच्छेद 5 से अनुच्छेद 11 नागरिकता से संबंधित है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विभिन्न संघीय देशों की तरह भारत में राज्यों और केंद्र के लिए अलग-अलग नागरिकता नहीं है। भारतीय नागरिकों को एकल नागरिकता प्रदान की जाती है। एकल नागरिकता व्यक्तियों को देश भर में विभिन्न पहलुओं में समान अधिकारों का आनंद लेने की अनुमति देती है। 

अनुच्छेद 5 के अनुसार, यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि व्यक्तियों को भारत के क्षेत्र का नागरिक माना जाएगा, जो यह सुनिश्चित करता है कि केवल एकल नागरिकता होगी। भारतीयों की नागरिकता काफी हद तक जस सैंग्विनिस के सिद्धांत से निर्धारित होती है, अर्थात नागरिकता माता-पिता की नागरिकता पर आधारित होती है। एकल नागरिकता में, एक व्यक्ति के पास केवल एक ही नागरिकता होती है। इसके विपरीत, दोहरी नागरिकता के मामले में, प्रत्येक व्यक्ति केंद्र और राज्य दोनों का नागरिक होता है। 

न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा की अवधारणा भारतीय संविधान की एक आवश्यक विशेषता है जो संविधान को ठीक से काम करने में मदद करती है।  अनुच्छेद 13 भारत में सभी पूर्ववर्ती एवं भावी कानूनों की “न्यायिक समीक्षा” का प्रावधान करता है। मौलिक अधिकारों के संबंध में मौजूदा कानूनों और विधानों का मूल्यांकन करना न्यायालयों का कार्य है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी कानून मूल ढांचे का उल्लंघन न करे। यदि कोई कानून मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित करने का कठिन कार्य करते हैं। 

केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं अन्य (1973) तथा मिनर्वा मिल्स लिमिटेड एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (1980) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 13(2) के तहत अपनी सुरक्षात्मक भूमिका को मजबूत करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की ‘मूल’ विशेषता है। इसका अर्थ यह है कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति को किसी भी भावी संवैधानिक संशोधन द्वारा कम नहीं किया जा सकता या टाला नहीं जा सकता है। संविधान के कई अनुच्छेद, जैसे अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 136, अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227, विधायी और प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा की गारंटी देते हैं। 

यह भी एक स्थापित सिद्धांत है कि नीतिगत मामलों में कोई न्यायिक समीक्षा नहीं होनी चाहिए, तथा राज्य या उसके प्राधिकारियों द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं। ऐसा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि निर्णय मनमाना, अनुचित न पाया जाए या यह वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न करता हो या यह कानून के तहत गारंटीकृत व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन न करता हो। नीतिगत निर्णय वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं हो सकता, क्योंकि यदि विधानमंडल अपने ज्ञान में किसी विशेष अधिकार का प्रावधान करता है, तो नीति के संबंध में निर्णय लेने वाला प्राधिकारी उसे निरस्त नहीं कर सकता हैं। 

मोनार्क इंफ्रास्ट्रक्चर (प्राइवेट) लिमिटेड बनाम कमिश्नर, उल्हासनगर नगर निगम (2000) के मामले में भी यही सिद्धांत व्यक्त किया गया था। इस मामले में कहा गया था कि प्रशासनिक कार्रवाई या बदलाव के मामले में कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा।  

न्यायिक समीक्षा पर ऐतिहासिक निर्णय

  • मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) में, माननीय अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया कि विधायी कार्यों की न्यायपालिका द्वारा समीक्षा की जा सकती है, भले ही अमेरिकी संविधान में न्यायिक समीक्षा के लिए कोई विशिष्ट संवैधानिक प्रावधान न हो। 
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यद्यपि संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है, फिर भी उसे मूल ढांचे के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि संवैधानिक संशोधनों में संविधान के मूल ढांचे का सम्मान किया जाना चाहिए।
  • ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि निवारक निरोध से संबंधित कानून सीमित न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। 
  • वी.जी. रो बनाम मद्रास राज्य (1950) में, माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने विधायी सर्वोच्चता पर एक सीमा के रूप में न्यायिक समीक्षा पर चर्चा की, और कहा कि यह संवैधानिक ढांचे का एक मूलभूत घटक है। न्यायालय की भूमिका यह है कि यदि कोई कानून संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उसे निरस्त घोषित कर दिया जाए। 
  • बिनॉय विश्वम बनाम भारत संघ (2017) में विधायी कार्यों की न्यायिक समीक्षा के दायरे की विस्तार से जांच की गई थी। 
  • शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए और बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार इसकी व्याख्या की जानी चाहिए। 
  • एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 226 के तहत माननीय उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोग की जाने वाली न्यायिक समीक्षा की शक्ति को संवैधानिक संशोधन द्वारा बाहर नहीं किया जा सकता है। 
  • इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स (बॉम्बे) प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (1984) मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अधीनस्थ विधान की समीक्षा की तथा टिप्पणी की कि ऐसे विधान को सक्षम विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के समान प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है। 
  • तमिलनाडु राज्य बनाम पी. कृष्णमूर्ति (2004) में, माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ विधान की न्यायिक समीक्षा के प्रयोजनों के लिए विभिन्न मानदंड स्थापित किए है।

सरकार का संसदीय स्वरूप

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रतिपादित लोकतांत्रिक आदर्शों को प्रभावी बनाने के लिए, केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना की गई है। हमारे देश में द्विसदनीय विधायिका प्रणाली अपनाई जाती है। नॉर्वे जैसे देशों में एकसदनीय विधायिका प्रणाली का पालन किया जाता है। इस प्रकार की विधायी प्रणाली में केवल एक सदन या विधानसभा होती है। द्विसदनीय विधायिका प्रणाली में, विधायी प्रणाली दो सदनों या विधानसभाओं में विभाजित होती है। द्विसदनीय विधायिका की तुलना में एकसदनीय विधायिका में कानून बनाने की प्रक्रिया आसान है। द्विसदनीय व्यवस्था में कानून बनाने से पहले काफी चर्चा और विचार-विमर्श होगा। 

अनुच्छेद 74 और अनुच्छेद 75 केन्द्र में संसदीय प्रणाली से संबंधित हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 में प्रावधान है कि प्रधानमंत्री के साथ एक मंत्रिपरिषद होनी चाहिए तथा मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सहायता और सलाह दे सकती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 75 मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित अन्य प्रावधानों से संबंधित है। अनुच्छेद 163 और अनुच्छेद 164 राज्यों में संसदीय प्रणाली से संबंधित हैं। अनुच्छेद 163 में प्रावधान है कि राज्यपाल को अपने कर्तव्यों के निर्वहन के समय सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिपरिषद होगी। अनुच्छेद 164 में प्रावधान है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाएगी। मंत्रीगण राज्यपाल की इच्छानुसार पद धारण करेंगे। 

संसदीय ओर राष्ट्रपति शासन प्रणाली के बीच अंतर 

संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में राष्ट्रपति शासन प्रणाली का पालन किया जाता है। राष्ट्रपति शासन प्रणाली में राष्ट्रपति राज्य का मुखिया होता है। संसदीय प्रणाली एक लोकतांत्रिक प्रकार की सरकार है। इस प्रणाली में बहुमत वाली पक्ष सरकार बनाती है। राष्ट्रपति प्रणाली की तुलना में संसदीय प्रणाली को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि यह सत्ता का समान वितरण सुनिश्चित करती है और सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होती है। हमारे संविधान के प्रारूपकारों ने राष्ट्रपति प्रणाली को प्राथमिकता नहीं दी थी, क्योंकि इससे कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से स्वतंत्र हो जाएंगी। 

शक्तियों का पृथक्करण (सेपरेशन)

अमेरिका के विपरीत, भारत में शक्तियों के सख्त पृथक्करण के स्थान पर कार्यों के पृथक्करण पर ध्यान दिया जाता है। यद्यपि भारत में शक्तियों के पृथक्करण के सख्त सिद्धांत को कठोरता से लागू नहीं किया जाता है, फिर भी नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था लागू है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि न्यायपालिका को विधायिका द्वारा पारित किसी भी असंवैधानिक कानून को अमान्य करने का अधिकार है। 

मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान का भाग III भारत के नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। मौलिक अधिकार संविधान की प्रस्तावना में की गई इस घोषणा का आवश्यक परिणाम हैं कि भारत के लोगों ने भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता सुनिश्चित करने का सत्यनिष्ठा से संकल्प लिया है। भारतीय संविधान में उल्लिखित मौलिक अधिकार इस प्रकार हैं: 

  • समानता का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार की गारंटी दी गई है। अनुच्छेद 14 न केवल नागरिकों पर बल्कि गैर-नागरिकों, निगमों और विदेशियों पर भी लागू होता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी व्यक्ति को कानून की दृष्टि में समानता से वंचित न करे तथा भारत के राज्यक्षेत्र में उन्हें कानूनों का समान संरक्षण प्रदान करे। 
  • धर्म आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं: अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 14 द्वारा गारंटीकृत समानता का एक विशेष पहलू है और नागरिकता से जुड़े अधिकारों, विशेषाधिकारों और प्रतिरक्षा के संबंध में भेदभाव से मुक्त होने का अधिकार प्रदान करता है। इस प्रकार, अनुच्छेद 15 भेदभाव का निषेध करता है।
  • सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता: अनुच्छेद 16 राज्य के तहत “रोजगार” या “किसी भी कार्यालय में नियुक्ति” से संबंधित मामलों में सभी नागरिकों को अवसर की समानता की गारंटी देता है और सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अनुच्छेद 15 (1) द्वारा भेदभाव के निषेध की गारंटी दी गई है। 
  • अस्पृश्यता का उन्मूलन (ऐबलिशन): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है तथा किसी भी रूप में इसका पालन करना निषिद्ध करता है। शास्त्री यज्ञपुरुषदासजी बनाम मूलदास भूंदरदास वैश्य एवं अन्य (1959) मामले में यह माना गया कि ‘अस्पृश्यता अंधविश्वास, अज्ञानता और हिंदू धर्म की सच्ची शिक्षाओं की पूर्ण गलतफहमी पर आधारित है।’
  • उपाधियों का उन्मूलन: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 18 उपाधियों को समाप्त करता है। यह राज्य को सैन्य या शैक्षणिक सम्मान के अलावा किसी भी “उपाधि” को प्रदान करने से रोकता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी विदेशी राज्य से उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है। 
  • स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 भारतीय संविधान के भाग III की रीढ़ है। यह अनुच्छेद भारत के नागरिकों को स्वतंत्र रहते हुए कुछ नागरिक स्वतंत्रताओं के उपभोग की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्राप्त स्वतंत्रता का दावा केवल नागरिक ही कर सकते हैं।
  • अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण: अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है।
  • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। अनुच्छेद 21 एक महत्वपूर्ण अधिकार है जो नागरिकों और गैर-नागरिकों की सुरक्षा करता है।
  • शिक्षा का अधिकार: अनुच्छेद 21A, 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। यह प्रावधान संविधान (छियासीवां संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था। अनुच्छेद 21A के अनुसार सरकार के लिए संवैधानिक संशोधन को प्रभावी करने के लिए केन्द्रीय कानून बनाना अनिवार्य है। 
  • कुछ मामलों में गिरफ्तारी और हिरासत के विरुद्ध संरक्षण: अनुच्छेद 22 निवारक निरोध कानून का प्रावधान करता है। निवारक निरोध कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोकना है, न कि उसे दंडित करना जैसा कि दंडात्मक निरोध के तहत किया जाता है। 
  • मानव तस्करी और जबरन श्रम पर प्रतिषेध: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी और किसी भी प्रकार के मानव द्वारा जबरन श्रम पर प्रतिषेध करता है। 
  • कारखानों आदि में बच्चों के नियोजन पर प्रतिषेध: अनुच्छेद 24 कारखानों, खानों या किसी अन्य खतरनाक प्रकार के रोजगार में चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर प्रतिषेध करता है। 
  • धर्म को मानने या आचरण करने की स्वतंत्रता: अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। प्रस्तावना के अंतर्गत प्रदत्त धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को इस अनुच्छेद द्वारा समर्थित किया गया है। 
  • धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता: अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता प्रदान करता है। 
  • किसी धर्म को बढ़ावा देने के लिए कोई कर नहीं: अनुच्छेद 27 किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने के लिए कर का भुगतान करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। भारतीय राजनीति के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए, भारतीय संविधान न केवल व्यक्तियों और समूहों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, बल्कि यह संविधान की सामान्य नीति के भी विरुद्ध है कि किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने या बनाए रखने के लिए सार्वजनिक निधि से कोई धनराशि दी जाए। 
  • शैक्षिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध: अनुच्छेद 28 कुछ शैक्षिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक पूजा में भाग लेने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति को संस्थान में दी जाने वाली किसी भी धार्मिक शिक्षा का हिस्सा बनने के लिए बाध्य किया जा सकता है। 
  • अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण: अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करता है। 
  • अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार: अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार प्रदान करता है और राज्य अनुदान प्रदान करते समय किसी भी ऐसे अल्पसंख्यक संस्थान के विरुद्ध भेदभाव नहीं करेगा। 
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार की गारंटी देता है। इस अनुच्छेद के तहत रिट के रूप में विभिन्न संवैधानिक उपचार उपलब्ध हैं। यदि मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन होता है, तो पीड़ित व्यक्ति इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त अधिकारों के तहत सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। 

राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत

भारतीय संविधान का भाग IV (अनुच्छेद 3651) राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों से संबंधित है। प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह कोई भी नया कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करे। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत भारत सरकार अधिनियम, 1935 में उल्लिखित ‘निर्देशों के साधन’ के समान हैं। ये मूलतः विधायिका और कार्यपालिका के लिए निर्देश हैं जिनका राज्य द्वारा नये कानून बनाते समय पालन किया जाना होता है। अनुच्छेद 36 में यह प्रावधान है कि भाग IV में प्रयुक्त शब्द ‘राज्य’ का वही अर्थ होगा जो मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के प्रयोजन के लिए अनुच्छेद 12 में दिया गया है, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो। 

ये निर्देश उन नियमों को निर्धारित करते हैं जिनके अनुसार राज्य को, जिसमें विधायिका और कार्यपालिका दोनों शामिल हैं, तथा जिसका अर्थ है संघ और राज्य दोनों को संविधान के अंतर्गत काम करना चाहिए। ये सिद्धांत नई सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के बारे में संविधान सभा की अवधारणा की मुख्य विशेषताओं को व्यक्त करते हैं जिसे संविधान के माध्यम से लाना चाहा गया था। हमारे संविधान द्वारा परिकल्पित कल्याणकारी राज्य की अवधारणा तभी प्राप्त की जा सकती है जब राज्य नैतिक कर्तव्य की उच्च भावना के साथ इसे क्रियान्वित करने का प्रयास करे। 

केशवानंद भारती मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक अधिकारों के बीच कोई संघर्ष नहीं है तथा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय संविधान के भाग III और भाग IV दोनों को एक साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण होना चाहिए, तभी व्यक्ति की गरिमा प्राप्त की जा सकती है। 

मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A विभिन्न मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान करता है। संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 ने संविधान में भारतीय नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की नवीन अवधारणा प्रस्तुत की है। मौलिक अधिकारों की तरह मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिए न्यायालयों में कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं हैं, लेकिन मौलिक कर्तव्यों का पालन करना भी आवश्यक है। एम्स छात्र संघ बनाम एम्स एवं अन्य (2002) मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि मौलिक कर्तव्य मौलिक अधिकारों के समान ही महत्वपूर्ण हैं। भारत के नागरिक को विभिन्न कर्तव्यों का पालन करना होता है: 

  1. संविधान और उसके सिद्धांतों का सम्मान करना तथा संवैधानिक प्रावधानों का पालन करना; 
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को संजोए रखना और उनका पालन करना; 
  3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना;
  4. आवश्यकता पड़ने पर अपने देश की रक्षा करना तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा प्रदान करना;
  5. सद्भाव और सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; 
  6. अपने देश की समृद्ध विरासत का महत्व समझें; 
  7. पर्यावरण की रक्षा करना तथा उसमें सुधार के उपाय करना; 
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और निष्पक्षता एवं सुधार की भावना को आगे बढ़ाना; 
  9. जनता की संपत्ति की रक्षा करना;
  10. व्यक्तिगत और सामूहिक सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर प्रयास करना, ताकि राष्ट्र निरंतर प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तर तक पहुंच सके; 
  11. माता-पिता या संरक्षक को अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को, जैसा भी मामला हो, छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच शिक्षा के अवसर प्रदान करने होंगे। 

अनुच्छेद 51A केवल भारत के नागरिकों से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 14 और 21 जैसे कुछ मौलिक अधिकार सभी व्यक्तियों पर लागू होते हैं, चाहे उनकी नागरिकता का स्तर कुछ भी हो। 

विभिन्न स्रोतों से उधार लिया गया

क्रम संख्या स्त्रोत उधार ली गई विशेषताएं 
1 भारत सरकार अधिनियम, 1935 संघीय योजना, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन प्रावधान और प्रशासनिक विवरण।
2 ब्रिटिश संविधान संसदीय सरकार, कानून का शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, कैबिनेट प्रणाली, रिट, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनीयता
3 अमेरिकी संविधान मौलिक अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा, राष्ट्रपति पर महाभियोग (इंपिचमेंट), सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और उपराष्ट्रपति को हटाना।
4 आयरिश संविधान राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत, राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव, राष्ट्रपति के चुनाव की पद्धति।
5 कनाडा का संविधान एक मजबूत केंद्र के साथ संघ, केंद्र सरकार की अवशिष्ट शक्तियां, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और सर्वोच्च न्यायालय का सलाहकार अधिकार-क्षेत्र 
6 ऑस्ट्रेलिया का संविधान समवर्ती सूची, व्यापार, वाणिज्य (कमर्शियल) और समागम (गैदरिंग) की स्वतंत्रता, तथा संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
7 जर्मनी का वाइमर संविधान आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन।
8 सोवियत संविधान (सोवियत संघ, रूस नहीं)  प्रस्तावना में मौलिक कर्तव्य और न्याय का आदर्श (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक)।
9 फ़्रांसीसी संविधान गणतंत्र और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श।
10 दक्षिण अफ़्रीकी संविधान संविधान संशोधन की प्रक्रिया
11 जापानी संविधान कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया

आपातकालीन से संबंधित प्रावधान

भारत में आपातकालीन प्रावधान संवैधानिक उपाय हैं जो राष्ट्रपति को आपातकाल के समय असाधारण कार्रवाई करने की अनुमति देते हैं। ये प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352, 354 और 360 में विस्तार से दिए गए हैं। ये प्रावधान संघीय प्रणाली को अधिक एकात्मक स्वरूप की ओर ले जाते हैं। आपातकाल के दौरान, केन्द्र सरकार को राज्यों के प्रति अधिक शक्तियां एवं अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। 

कानून का शासन

“कानून का शासन” प्राकृतिक कानून का एक सजीव रूप है और एक ऐतिहासिक आदर्श बना हुआ है जो आज भी एक शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि कानून द्वारा शासित होने की अधिक शक्तिशाली अपील करता है। इसे आम तौर पर “राज्य राजनीतिक नैतिकता” के सिद्धांत के रूप में समझा जाता है जो किसी भी स्वतंत्र और नागरिक समाज में “अधिकारों” और “शक्तियों” के बीच, व्यक्तियों के बीच और व्यक्तियों और राज्य के बीच “सही संतुलन” सुनिश्चित करने में कानून के शासन पर ध्यान केंद्रित करता है। यह समाज और व्यक्ति की जरूरतों को संतुलित करता है। 

निष्कर्ष

भारतीय संविधान में कई प्रमुख विशेषताएं हैं जो इसे विशिष्ट बनाती हैं। विधिनिर्माताओं ने सभी कारकों को ध्यान में रखा है तथा हमारे देश में सभी मतभेदों को समायोजित करने का प्रयास किया है। भारतीय संविधान और संविधान में प्रदत्त विभिन्न अधिकार हमारे नागरिकों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं। किसी देश का संविधान विभिन्न भूमिकाएं निभाता है तथा समाज को आकार देने वाले सिद्धांत स्थापित करता है। यह देश की स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। भारतीय संविधान एक स्वतंत्र राष्ट्र के शासन के लिए रूपरेखा और संरचना की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं, नियमों और प्रक्रियाओं के माध्यम से विभिन्न समूहों और समुदायों के बीच आम सहमति बनाई जाती है। संवैधानिक विशेषताएँ और नियम किसी देश का भाग्य तय करते हैं। इनमें कुछ आदर्श निर्धारित किये गये हैं जिन्हें देश को कायम रखना चाहिए। हमारे देश के संदर्भ में, प्रस्तावना में प्रतिबिंबित मूल मूल्य और दृष्टिकोण, मौलिक अधिकार, राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत और मौलिक कर्तव्य संविधान के उद्देश्यों के रूप में व्यक्त किए गए हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

भारतीय संविधान के जनक कौन हैं?

भारतीय संविधान के जनक डॉ. भीम राव अम्बेडकर हैं। वह उस समय कानून मंत्री थे, जिन्होंने संविधान का अंतिम मसौदा संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया था। 

क्या मौलिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है?

बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त (1958) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि राज्य को संबोधित निषेध की प्रकृति के मौलिक अधिकार को किसी व्यक्ति द्वारा नहीं छोड़ा जा सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं हैं, बल्कि ये सार्वजनिक नीति का विषय भी हैं। यह संविधान द्वारा राज्य पर लगाया गया दायित्व है। कोई भी व्यक्ति राज्य को इस दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता, क्योंकि भारत के अधिकांश नागरिक आर्थिक रूप से गरीब, शैक्षणिक रूप से पिछड़े और राजनीतिक रूप से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हैं। 

संप्रभुता और स्वतंत्रता में क्या अंतर है?

संप्रभुता का तात्पर्य किसी राज्य के बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के स्वशासन के सर्वोच्च अधिकार से है, जबकि स्वतंत्रता का तात्पर्य राज्य के किसी अन्य देश के नियंत्रण से मुक्त होने से है। 

अनुच्छेद 19 और 21 में क्या अंतर है?

ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, भारत संघ (1950) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों अनुच्छेदों के बीच निम्नलिखित अंतर किए: 

  • अनुच्छेद 19 और 21 अलग-अलग विषयों से संबंधित हैं। अनुच्छेद 19 व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर “प्रतिबंधों” से संबंधित है। अनुच्छेद 21 इसके “वंचन” से संबंधित है; 
  • अनुच्छेद 19 केवल नागरिकों के लिए उपलब्ध है, अनुच्छेद 21 नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए उपलब्ध है;
  • यदि किसी व्यक्ति ने अनुच्छेद 21 के तहत विधिपूर्वक हिरासत में लिए जाने के कारण अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता खो दी है, तो उसे अनुच्छेद 19 के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता का आनंद नहीं लिया जा सकता है; 
  • अनुच्छेद 21 के तहत कानून द्वारा वंचन की वैधता का मूल्यांकन अनुच्छेद 19(5) में निर्धारित परीक्षण के तहत नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 19 निवारक निरोध के कानून पर लागू नहीं होता है, भले ही निरोध के आदेश के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 19 के तहत किसी नागरिक के अधिकार प्रतिबंधित या कम हो सकते हैं। 

मेनका गांधी के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जो कानून किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है और अनुच्छेद 21 के तहत ऐसा करने के लिए एक प्रक्रिया स्थापित करता है, उसे अनुच्छेद 19 द्वारा गारंटीकृत एक या अधिक मौलिक अधिकारों का भी पालन करना चाहिए। 

संदर्भ

  • “Constitutional Law of India” by Dr. J.N. Pandey

 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226

यह लेख  Sneha Mahawar द्वारा लिखा गया है, और आगे Shubham Choube के द्वारा संशोधित (मॉडिफाईड)  किया गया है। यह लेख अनुच्छेद 226 की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करता है। यह लेख अनुच्छेद 226 के दायरे पर चर्चा करता है जिसमें सभी रिट और संबंधित कानूनी मामले शामिल हैं। लेख में अनुच्छेद 227 का वर्णन और अनुच्छेद 226 से इसके अंतर को भी समझाया गया है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है। 

परिचय

न्यायपालिका भारत में लोकतंत्र के कामकाज में सहायक है क्योंकि यह नागरिकों को सरकार द्वारा सत्ता के दुरुपयोग से बचाती है और भारतीय संविधान की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। नतीजतन, भारत का संविधान न्यायपालिका की एक मजबूत, स्वायत्त (ऑटोनॉमस) और केंद्रीकृत प्रणाली प्रदान करता है। 

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 किसी भी नागरिक के अधिकारों और स्वतंत्रता का उल्लंघन होने पर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को किसी भी सरकारी निकाय (बॉडी) के खिलाफ मुकदमा दायर करने का अधिकार देते है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, उच्च न्यायालय के पास किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी को रिट और आदेश देने का अधिकार क्षेत्र है। सबसे पहले, जो पक्ष रिट या आदेश की मांग कर रहा है उसे यह स्थापित करना होगा कि उसके पास एक अधिकार है जिसका उल्लंघन गैरकानूनी तरीके से किया जा रहा है। ऐसे मामले में जहां कार्रवाई का कारण आंशिक रूप से उसके अधिकार क्षेत्र में है। उच्च न्यायालय के पास किसी भी सरकार, प्राधिकरण या व्यक्ति को रिट और निर्देश जारी करने की शक्ति है, भले ही सरकार, प्राधिकरण या व्यक्ति उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में न हो। 

एक सामान्य नियम के रूप में, उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करता है जब मामला अनिवार्य रूप से तथ्य का प्रश्न ना हो। इसी तरह, जहां याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय है, अदालतें अनुच्छेद 226 याचिकाओं पर विचार नहीं करेंगी। इसके अलावा, यदि अदालत तक पहुंचने में अनुचित देरी होती है, तो अदालत इस अनुच्छेद के तहत राहत देने से इनकार कर सकती है। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226

भारत के संविधान के भाग V के तहत निहित, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार देते हैं, जहां रिट बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) , परमादेश (मैंडमस), निषेधाज्ञा (प्रोहिबिशन) , अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो) और उत्प्रेषण लेख (सर्टियोरारी) या उनमें से किसी के रूप में किसी व्यक्ति या प्राधिकरण, सरकार सहित को जारी की जाती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अनुसार, उच्च न्यायालयों को भारत के संविधान, 1949 के भाग III के तहत किसी भी मौलिक अधिकार को लागू करने या किसी अन्य कारण के लिए शक्ति और क्षमता प्राप्त है।

जैसा कि अनुच्छेद 226(1) में कहा गया है, प्रत्येक उच्च न्यायालय को भारत के किसी भी हिस्से में संविधान के भाग III के किसी भी प्रावधान या उनके क्षेत्र के भीतर किसी भी कानूनी अधिकार के उल्लंघन के आधार पर आदेश, निर्देश या रिट जारी करने की क्षमता और अधिकार है।

अनुच्छेद 226(2) उच्च न्यायालयों को किसी भी सरकारी प्राधिकरण या किसी व्यक्ति को उसके क्षेत्रीय सीमा से परे उचित आदेश, निर्देश या रिट पारित करने में सक्षम बनाता है यदि कार्य का कारण आंशिक रूप से या पूरी तरह से उसके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के भीतर स्थित है, भले ही ऐसे सरकार या प्राधिकरण या संबंधित व्यक्ति का मुख्यालय या निवास स्थान क्षेत्र से बाहर हो।

अनुच्छेद 226(3), के अनुसार, जब प्रतिवादी के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में अंतरिम आदेश जारी किया जाता है:

  • प्रतिवादी को याचिका की एक प्रति और कोई भी प्रासंगिक साक्ष्य प्रदान करना; और,
  • प्रतिवादी को सुनवाई का अवसर प्रदान करना।

उच्च न्यायालय आवेदन प्राप्त होने की तारीख से या दूसरे पक्ष द्वारा आवेदन का जवाब देने की तारीख से, जो भी बाद में हो, दो सप्ताह के भीतर आवेदन का निर्धारण करेगा। यदि आवेदन का इस प्रकार निपटारा नहीं किया जाता है, तो अंतरिम आदेश उस अवधि की समाप्ति पर रद्द कर दिया जाएगा, या, यदि उच्च न्यायालय उस अवधि के अंतिम दिन बंद हो जाता है, तो अगले दिन की समाप्ति से पहले, जिस दिन उच्च न्यायालय खुला है, अंतरिम आदेश निरस्त कर दिया जाएगा। 

अनुच्छेद 226(4) के अनुसार अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को दिया गया क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32(2) के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करने से नहीं रोकता है।

अनुच्छेद 226 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्पत्ति 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 जिसके माध्यम से उच्च न्यायालय कुछ रिट जारी कर सकते हैं, उसका भारत की कानूनी और स्वतंत्रता-पूर्व न्यायिक प्रणाली से जुड़ा एक व्यापक इतिहास है। इसकी जड़ें ब्रिटिश उपनिवेशवाद (कोलोनिजम) में हैं और यह भारत की कानूनी संरचना में सबसे बुनियादी परिवर्तनों में से एक है। 

औपनिवेशिक विरासत और भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 

भारत में उच्च न्यायालयों की उत्पत्ति ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1861 के भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम से मानी जा सकती है। इस अधिनियम ने कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में पूर्व सर्वोच्च न्यायालय और इन प्रांतों में सदर न्यायालयों को बदलने के लिए उच्च न्यायालयों की स्थापना किया । उच्च न्यायालयों को दीवानी और आपराधिक मामलों में अधिकार क्षेत्र था और वे रिट जारी कर सकते थे। हालांकि, ये शक्तियाँ उतनी स्पष्ट या व्यापक नहीं थीं जितनी कि बाद के समय में भारतीय संविधान को सौंपी गई थी।  

1935 का भारत सरकार अधिनियम 

भारत सरकार अधिनियम 1935 को न्यायिक शक्ति के विकेंद्रीकरण का एक उपाय कहा जा सकता है। इसने भारत के संघीय न्यायालय का निर्माण किया, जिसके सीमित मूल अधिकार क्षेत्र थे लेकिन संवैधानिक व्याख्या और प्रांतों और केंद्र के बीच विवादों पर अमूल्य निर्णय दिए। उच्च न्यायालय इस अधिनियम के तहत बढ़े हुए अधिकार और कार्यवाहियों में भूमिकाओं के साथ संचालित होते रहे। हालांकि, रिट प्रदान करने की शक्ति, जिसकी तुलना बाद के अनुच्छेद 226 से की जा सकती है, अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी। 

संविधान सभा की बहस

भारतीय संविधान का मसौदा (ड्रैफ्टिंग) तैयार करना संविधान सभा के भीतर बहुत विवाद और चर्चा से घिरा हुआ था। इस प्रकार, बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा और न्यायिक पर्यवेक्षण (सूपर्विशन) को शामिल करने के लिए ऐसे तंत्र के महत्व पर ध्यान दिया जा सकता है। मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए न्यायिक समाधान के महत्व पर प्रकाश डाला। 

संविधान सभा के विचार-विमर्श कुछ संविधान निर्माण सामग्रियों पर आधारित थे जिनमें ब्रिटिश कानूनी प्रणाली, संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान और भारत सरकार अधिनियम, 1935 शामिल थे। नागरिक स्वतंत्रता को लागू करने और व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी करने की शक्ति को आवश्यक माना गया था। इसलिए, अनुच्छेद 226 को मौलिक अधिकारों को लागू करने और किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी करने के लिए उच्च न्यायालयों के अधिकार को स्थापित करने के लिए शामिल किया गया था, जिसका उद्देश्य न्यायिक समीक्षा की अवधारणा को बढ़ाना था।

भारत के संविधान को अपनाना और प्रासंगिकता  

यह 26 जनवरी, 1950 को संविधान के लागू होने के बाद भारत के संविधान का हिस्सा बन गया। इसने उच्च न्यायालयों को ऐसे उच्च न्यायालय के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण को रिट, आदेश या निर्देश जारी करने का अधिकार दिया। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 32 से व्यापक था जो मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय को रिट जारी करने का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 226 इस अधिकार को व्यक्ति के संवैधानिक और अन्य अधिकारों के प्रवर्तन तक विस्तृत करता है।

विकास और न्यायिक व्याख्या

पिछले कुछ वर्षों में, अनुच्छेद 226 की भूमिका, सीमा और उपयोग को कई महत्वपूर्ण मामलों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। इस प्रकार न्यायपालिका ने न्याय और व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा का सुझाव देते हुए अनुच्छेद 226 की उदार व्याख्या की है। अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति का उपयोग गैरकानूनी हिरासत, सरकारी अधिकारियों और अंगों द्वारा शक्ति का दुरुपयोग, संवैधानिक और अन्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन के मुद्दों से निपटने के लिए किया गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 का दायरा

बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) में यह माना गया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में बहुत व्यापक है, क्योंकि यह उच्च न्यायालयों को न केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी आदेश, निर्देश और रिट जारी करने की शक्ति देता है। वंचितों को कानून द्वारा प्रदान किया गया है और यह मौलिक अधिकारों जितना ही महत्वपूर्ण है।

वीरप्पा पिल्लई बनाम रमन और रमन लिमिटेड (1952), में, यह माना गया था कि अनुच्छेद 226 में उल्लिखित रिट के दायरे का उद्देश्य उच्च न्यायालय को सशक्त बनाना था ताकि वह ऐसे मामलों में जारी कर सके जहां अधीनस्थ निकाय या अधिकारी बिना अधिकार क्षेत्र के या उसके अतिरिक्त या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन में कार्य करते हैं या जहां वे उनमें निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से इनकार करते हैं या जहां रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि है और उक्त अधिनियम या चूक या त्रुटि या अतिरेक से अन्याय हुआ है। हालांकि अधिकार क्षेत्र व्यापक रूप से लागू किया जाता है, लेकिन यह उच्च न्यायालय को अपील न्यायालय में बदलने और चुनौती दिए गए निर्णयों की सत्यता का स्वयं आकलन करने और क्या सही स्थिति लेनी है या क्या आदेश दिया जाना है, यह तय करने के लिए पर्याप्त व्यापक नहीं माना जा सकता है।

चंडीगढ़ प्रशासन बनाम मनप्रीत सिंह (1991), में यह देखा गया कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते समय अधीनस्थ प्राधिकारियों के आदेशों/कार्यों पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में नहीं बैठता और/या कार्य करता है। इसका प्राधिकार केवल प्रकृति में पर्यवेक्षी (सूपर्वाइज़री) है, जिसका अर्थ है कि इसके पास कार्यकारी शक्तियां नहीं हैं। इसमें सरकार और कई अन्य एजेंसियों और अदालतों को उनके संबंधित अधिकार क्षेत्र में बनाए रखने का लक्ष्य शामिल है। हालांकि, इस कर्तव्य का पालन करते समय उच्च न्यायालय को उच्च न्यायालय की आवाज़ और निर्धारित कानूनी क्षेत्राधिकार से आगे नहीं बढ़ना चाहिए।

बर्मा कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाम उड़ीसा राज्य (1961), में यह माना गया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के पास किसी अपकृत्य (टॉर्ट) या अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के उल्लंघन के लिए दावेदार को राशि का भुगतान करने के लिए नागरिक उपचार (रेमिडी) लागू करने के लिए याचिका पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और ऐसे मामले को दीवानी मुकदमे के तरीके से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन वैधानिक दायित्व निभाने के लिए अनुच्छेद 226 के तहत राज्य या राज्य के किसी अधिकारी के खिलाफ याचिका दायर की जा सकती है जिसमें पैसे के भुगतान के लिए आदेश पारित किया जा सकता है।

जगदीश प्रसाद शास्त्री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1970), में यह माना गया कि यदि कोई रिट याचिका तथ्यात्मक समस्याओं को उठाती है, जिसे उच्च न्यायालय मानता है कि उच्च विशेषाधिकार रिट के लिए याचिका में निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए, तो उच्च न्यायालय को ऐसे मामलों को हल करने से इनकार करने और निवारण की मांग करने वाले पक्ष को उसकी सामान्य स्थिति में मुकदमेबाजी प्रक्रिया में भेजने का अधिकार है। याचिका को खारिज करने का उच्च न्यायालय का निर्णय निर्विवाद रूप से गैरकानूनी है,क्योंकि इसमें विवादित तथ्यात्मक मामले निपटाए जाने थे।

मद्रास राज्य बनाम सुंदरम (1964) में यह माना गया कि जहां यह स्थापित किया गया है कि जो निष्कर्ष लगाए गए हैं वे किसी भी सबूत पर आधारित नहीं थे। उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, तथ्य के निष्कर्षों के खिलाफ जो एक सक्षम न्यायाधिकरण द्वारा उचित रूप से आयोजित विभागीय जांच में पाया गए है, एसे अपील पर विचार नहीं कर सकता है। जबकि उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्ति का प्रयोग करने के लिए अपने विवेक का उपयोग करता है, आरोप को साबित करने के लिए  सबूत की पर्याप्तता कोई चिंता का विषय नहीं है।

कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018), मे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय को अधिकार दिया गया है और वह मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए या अन्यथा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश, उत्प्रेषण लेख, निषेधाज्ञा, अधिकार पृच्छा और बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रकृति में आवश्यक रिट जारी कर सकता है। नतीजतन, उच्च न्यायालय न केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए राहत दे सकता है, बल्कि किसी अन्य कारण से भी, जिसका अर्थ सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक जिम्मेदारियों को लागू करना हो सकता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट

रिट किसी न्यायालय द्वारा जारी किया गया एक लिखित आदेश है जो किसी को कुछ करने या न करने का निर्देश देता है। इसके पास अधिकार और अनुपालन के लिए बाध्य करने की क्षमता है। हम सभी के पास विभिन्न अधिकार हैं, जैसे जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सम्मान का अधिकार इत्यादि, लेकिन इन अधिकारों का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब वे सुरक्षित हों। हमारे संविधान में मुख्य रूप से चार अनुच्छेदों में हमारे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का उल्लेख है: 

  • अनुच्छेद 13 भारत के संविधान में न्यायिक समीक्षा की चर्चा की गई है;
  • अनुच्छेद 359 भारत के संविधान में कहा गया है कि आपातकाल की स्थिति को छोड़कर किसी भी समय मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं की जा सकती; 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हमारे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का उल्लेख है;
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालयों द्वारा हमारे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का उल्लेख है। 

भारतीय संविधान का भाग III मौलिक अधिकारों से संबंधित है, यह अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक चलता है। यह अनिवार्य रूप से इंगित करता है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 32, जो मौलिक अधिकारों के संरक्षण का निर्धारण करता है, अपने आप में एक मौलिक अधिकार है।

अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उपलब्ध रिट के प्रकार

बंदी प्रत्यक्षीकरण

यह एक लैटिन शब्द है, जिसका अनुवाद “शरीर धारण करना या शरीर पेश करना” होता है। “यह सभी रिटों में सबसे मजबूत है, और इसका उपयोग सबसे अधिक बार किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को सरकार द्वारा गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया है, तो वह व्यक्ति, या उसके रिश्तेदार या दोस्त हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट के माध्यम से अदालतों से संपर्क कर सकते हैं। जब इस रिट का प्रयोग किया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय राज्य से यह बताने के लिए कहता है कि उस व्यक्ति विशेष को हिरासत में क्यों लिया गया है। यदि आधार को तर्कहीन माना जाता है तो व्यक्ति को तुरंत पुलिस हिरासत से रिहा कर दिया जाता है। यह अदालत का आदेश है कि गिरफ्तारी की वैधता का निर्धारण करने के लिए बंदी को उस विशेष अदालत के समक्ष पेश किया जाए। इस प्रकार की रिट का मुख्य उद्देश्य उस व्यक्ति की रिहाई सुनिश्चित करना है जिसे गैरकानूनी तरीके से उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया गया है या गैरकानूनी तरीके से कैद किया गया है। यह रिट महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परिभाषित करता है कि किसी व्यक्ति को समाज में स्वतंत्रता का अधिकार है या नहीं।

जारी करने के लिए आधार:

  • गैरकानूनी हिरासत: इसका उपयोग अक्सर तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति को बिना किसी कानूनी औचित्य के या कानून के प्रावधानों के खिलाफ हिरासत में रखा जाता है। हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को यह बताने के लिए बंदी को अदालत के समक्ष पेश करना आवश्यक है कि हिरासत वैध क्यों थी।
  • मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: क्या उक्त हिरासत किसी बंदी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उसके मौलिक अधिकार से वंचित करती है।
  • कानूनी औचित्य का अभाव: जब किसी संदिग्ध को पकड़ने के लिए कोई कानूनी औचित्य या उचित वारंट नहीं होता है।

इस रिट का उपयोग निम्नलिखित चार स्थितियों में नहीं किया जा सकता: 

  • हिरासत (डिटेन्शन) कानूनी है;
  • न्यायालय की अवज्ञा;
  • हिरासत पर न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है;
  • एक सक्षम न्यायालय हिरासत का प्रभारी है।

रिट के लिए कौन आवेदन कर सकता है:

  • वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से कैद या जेल में रखा गया है;
  • वह व्यक्ति जो मामले से संबंधित लाभ से अवगत है;
  • जिस व्यक्ति को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के बारे में जानकारी है वह स्वेच्छा से अनुच्छेद 32 और 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट दायर करता है।

रुदुल साह बनाम बिहार राज्य (1983)

इस मामले,में एक व्यक्ति जो पहले ही अपनी सजा काट चुका था, उसे अतिरिक्त चौदह वर्षों के लिए गलत तरीके से जेल में रखा गया था। बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट का उपयोग करने के बाद व्यक्ति को तुरंत जेल से मुक्त कर दिया गया और उसे अनुकरणीय (इग्ज़ेम्प्लरी) हर्जाना दिया गया।

सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980)

इस मामले में यह कहा गया था कि बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए एक रिट याचिका न केवल कैदी की रिहाई की मांग के लिए इस आधार पर दायर की जा सकती है कि उसे अनुचित या अवैध रूप से हिरासत में लिया गया था, बल्कि उसे किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार या दुर्भावना से बचाने के उद्देश्य से भी दायर किया जा सकता है। जिस अधिकार के तहत उन्हें हिरासत में लिया गया है। इसलिए, यहां गलत हिरासत के लिए याचिका दायर करने की संभावना है, और हिरासत की प्रकृति की भी जांच की जा सकती है।

नीलाबती बेहरा बनाम नीलाबती बेहरा उड़ीसा राज्य (1993)

इस मामले में याचिकाकर्ता के बेटे का अपहरण कर लिया गया और पूछताछ के लिए उड़ीसा पुलिस ले गई। इस बार उसके ठिकाने का पता लगाने के सभी प्रयास विफल रहे। नतीजतन, अदालत के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। जबकि याचिका लंबित थी, याचिकाकर्ता ने अपने बेटे को खो दिया, जो एक रेलवे ट्रैक पर मृत पाया गया। याचिकाकर्ता को 1,50,000 रुपये का मुआवजा दिया गया।

परमादेश

यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका हिन्दी में अनुवाद करने पर इसका अर्थ है ‘हम आदेश देते हैं’। यह एक प्रकार का आदेश है जिसका उपयोग किसी संवैधानिक या वैधानिक या गैर-वैधानिक, विश्वविद्यालयों या अदालतों या निकाय द्वारा सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन के लिए किया जा सकता है। यह रिट यह सुनिश्चित करने के लिए नियोजित की जाती है कि एक सार्वजनिक अधिकारी उसे सौंपे गए कार्यों को निष्पादित करता है। इस रिट की पूर्व शर्त यह है कि सार्वजनिक कर्तव्य होना चाहिए। परमादेश की रिट किसी भी प्राधिकारी को उन्हें सौंपे गए सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए मजबूर करने के लिए जारी की जाती है। यह किसी व्यक्ति, कंपनी, निचली अदालत या सरकार को वह कार्य करने का आदेश है जो उन्हें कानूनी रूप से करने की आवश्यकता है। सार्वजनिक कर्तव्य के उल्लंघन या दुरुपयोग से पीड़ित कोई भी व्यक्ति और जिसके पास इस कर्तव्य के प्रदर्शन को बाध्य करने की कानूनी शक्ति और अधिकार है, वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में परमादेश की याचिका दायर कर सकता है।

जारी करने के लिए आधार:

  • कर्तव्य पालन में विफलता: इस रिट का उपयोग तब किया जाता है जब किसी सार्वजनिक प्राधिकरण या अधिकारी ने वह नहीं किया है जो कानून के तहत उससे अपेक्षित था।
  • कानूनी दायित्व: यह क़ानून या कानूनी मामलों में निर्धारित कानूनी कर्तव्य होना चाहिए, जिसका निर्वहन करना प्राधिकारी का दायित्व है।
  • कोई विवेकाधिकार नहीं: जहां कर्तव्य विवेकाधीन है या जहां प्राधिकारी के पास कर्तव्य का निर्वहन करना है या नहीं करना है, वहां परमादेश का आदेश नहीं दिया जा सकता है।

इस रिट का उपयोग निम्नलिखित तीन स्थितियों में नहीं किया जा सकता: 

  • जब किसी निजी निकाय को सार्वजनिक दायित्व सौंपा जाता है; 
  • जब कर्तव्य विवेकाधीन हो;  
  • जब कर्तव्य अनुबंध पर आधारित हो। 

गुजरात राज्य वित्तीय निगम बनाम लोटस होटल्स (1983)

इस मामले में गुजरात राज्य वित्तीय निगम ने लोटस होटल्स के साथ एक समझौता किया, जिसमें कहा गया कि धन जारी किया जाएगा ताकि भवन निर्माण कार्य आगे बढ़ सके। हालांकि, उन्होंने बाद में पैसा जारी नहीं किया। परिणामस्वरूप, लोटस होटल्स ने गुजरात उच्च न्यायालय में एक अपील दायर की, जिसने गुजरात राज्य वित्तीय निगम को वादे के अनुसार अपना सार्वजनिक कर्तव्य निभाने का आदेश देते हुए एक परमादेश जारी किया।

हेमेन्द्र नाथ पाठक बनाम गौहाटी विश्वविद्यालय (2008)

इस मामले में याचिकाकर्ता ने उस संस्थान के खिलाफ परमादेश की मांग की जहां उसने अध्ययन किया था क्योंकि विश्वविद्यालय ने उसे इस तथ्य के बावजूद अनुउत्तीर्ण कर दिया था कि उसे विश्वविद्यालय के वैधानिक मानकों के तहत अपेक्षित उत्तीर्ण ग्रेड प्राप्त हुए थे। विश्वविद्यालय को उसे विश्वविद्यालय के मानदंडों के अनुसार उत्तीर्ण घोषित करने का आदेश दिया गया और परमादेश की रिट जारी की गई।

शरीफ अहमद बनाम एचटीए, मेरठ (1977)

इस मामले में प्रतिवादी न्यायाधिकरण के निर्देशों का पालन करने में विफल रहा, और याचिकाकर्ता न्यायाधिकरण के आदेशों को लागू कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गया। सर्वोच्च न्यायालय ने एक परमादेश जारी किया, जिसमें प्रतिवादी को न्यायाधिकरण के निर्देशों का पालन करने की आवश्यकता बताई गई।

एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)

इस मामले में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि भारत के राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने और रिक्तियों को भरने का निर्देश देने वाला रिट नहीं भेजा जा सकता है। अदालतें राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे व्यक्तियों के विरुद्ध परमादेश रिट जारी नहीं कर सकतीं। न्यायाधीशों के स्थानांतरण मामले के रूप में भी जाना जाने वाला, इस जनहित याचिका ने न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मामले ने कानून के शासन और संवैधानिक शासन को बनाए रखने में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका के महत्व पर जोर दिया।

उत्प्रेषण लेख 

यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद ‘प्रमाणित होना’ है। ‘इस रिट के साथ, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय को जांच के लिए रिकॉर्ड पेश करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। ये समीक्षाएँ यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हैं कि निचली अदालत द्वारा दिए गए निर्णय कानूनी हैं या नहीं। उनके निर्णय गैरकानूनी हो सकते हैं जहां ऐसे निर्णय क्षेत्राधिकार से परे, क्षेत्राधिकार के बिना, असंवैधानिक क्षेत्राधिकार में या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए किए जाते हैं। यदि उनके निर्णय असंवैधानिक, या अवैध पाए जाते हैं तो उन निर्णयों को रद्द कर दिया जाएगा। 

जारी करने के लिए आधार:

  • क्षेत्राधिकार से बाहर जाना: इस मुद्दे पर निर्णय लेने की कानूनी शक्ति और न्यायिक रूप से कार्य करने की जिम्मेदारी के साथ एक अदालत, न्यायाधिकरण या एक अधिकारी होना चाहिए; जब वह निचली अदालत या न्यायाधिकरण अपनी शक्तियों से अधिक बढ़ जाता है या क्षेत्राधिकार ग्रहण कर लेता है जो उसके पास नहीं है।
  • प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: यदि निचली अदालत या न्यायाधिकरण इस तरह से व्यवहार करता है जो प्राकृतिक न्याय के विपरीत है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, जिसमें निष्पक्ष सुनवाई की पेशकश करने में विफलता भी शामिल है।
  • कानून की त्रुटि: ऐसी स्थितियों में जहां निचली अदालत या न्यायाधिकरण की कार्यवाही में कोई विवादास्पद कानूनी दोष उत्पन्न हुआ हो।

ए.के. क्रेपक बनाम भारत संघ (1970)

इस मामले में निचली अदालतों को उत्प्रेषण लेख की रिट जारी की गई और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को रद्द कर दिया गया। जिन मामलों की समीक्षा की गई, उन्हें अवैध करार दिया गया और भविष्य के उद्देश्यों के लिए रद्द और अमान्य माना गया। 

सीमा शुल्क कलेक्टर बनाम ए.एच.ए. रहिमन (1956)

इस मामले में सीमा शुल्क कलेक्टर ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या जांच के जब्ती आदेश जारी कर दिया। मद्रास उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कलेक्टर का आदेश मामले के सभी तथ्यों को सुने या समझे बिना दिया गया था और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था। परिणामस्वरूप, मद्रास उच्च न्यायालय ने कलेक्टर के आदेश को रद्द करने के लिए उत्प्रेषण लेख रिट जारी किया गया।

सैयद याकूब बनाम राधाकृष्णन (1964)

इस मामले में, न्यायालय ने माना कि उत्प्रेषण लेख का रिट कानून की एक त्रुटि को ठीक कर सकता है जो रिकॉर्ड में स्पष्ट है, लेकिन तथ्य की त्रुटि नहीं, चाहे वह कितनी भी बुरी क्यों न हो।

ए. रंगा रेड्डी बनाम महाप्रबंधक सहकारी विद्युत आपूर्ति संस्था लिमिटेड (1977) 

इस मामले में न्यायालय ने पाया कि किसी भी परिस्थिति में किसी निजी संस्था के विरुद्ध उत्प्रेषण रिट नहीं बनाई जा सकती। यह अपीलकर्ता, सहकारी विद्युत आपूर्ति संस्था लिमिटेड,सार्वजनिक प्राधिकरण के अलावा सार्वजनिक कार्य करने वाली एक निजी संस्था है; इस प्रकार, ऐसी निजी संस्था के खिलाफ रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।

निषेधाज्ञा 

सभी इरादों और उद्देश्यों के लिए, निषेधाज्ञा और उत्प्रेषण लेख के बीच का अंतर मामूली है। कहावत “एक औंस रोकथाम इलाज से बेहतर है” दोनों रिट के बीच के अंतर को उपयुक्त रूप से दर्शाती है। इस मामले में, शब्द निवारक निषेधाज्ञा से जुड़ा हुआ है जिसे ‘मना करना’ के रूप में परिभाषित किया गया है जबकि शब्द उत्प्रेषण लेख इलाज से जुड़ा है। यदि कोई निर्णय दिया जाता है और वह गलत है, तो उसे वापस बुला लिया जाता है और उत्प्रेषण लेख रिट जारी की जाती है। फिर भी, यदि निर्णय अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है तो उक्त गलती से बचने के लिए, निषेधाज्ञा का सहारा लिया जाता है। इस रिट का उपयोग केवल उस बिंदु तक किया जा सकता है जब तक कि निर्णय नहीं दिया गया हो। निषेधाज्ञा एक निचली अदालत/न्यायाधिकरण को अधिकार क्षेत्र ग्रहण करने या उसके अधिकार क्षेत्र से अधिक होने या पक्षों को प्राकृतिक न्याय प्रदान करने से रोकने के लिए मांगी जाती है। यह रिट निचली अदालत में सामान्य प्रक्रियाओं को निलंबित कर देती है और उन्हें रोक देती है। एक सामान्य नियम के रूप में, जहां ये आधार लागू होते हैं, निषेधाज्ञा रिट को उत्प्रेषण लेख रिट के समान आधार पर प्रदान किया जा सकता है, सिवाय इसके कि जहां रिकॉर्ड मे प्रत्यक्ष कानूनी गलती नहीं हो।

जारी करने के लिए आधार:

  • क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि: रिट का उपयोग तब किया जाता है जब किसी निचली अदालत या किसी न्यायाधिकरण ने अधिकार क्षेत्र के ऐसे क्षेत्र में कदम रखा है जिसका वह हकदार नहीं था, या अपने जनादेश की सीमा से परे चला गया था।
  • कानून का उल्लंघन: जब निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई कानूनी दोष हो, उदाहरण के लिए, जब कानून में कोई त्रुटि हो।
  • प्रक्रियात्मक अनियमितता: यह वह जगह हो सकती है जहां निचली अदालत या न्यायाधिकरण ने कानूनी प्रक्रियाओं या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया है।

ईस्ट इंडिया कंपनी कमर्शियल लिमिटेड बनाम सीमा शुल्क कलेक्टर (1962)

इस में मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निषेधाज्ञा रिट की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक उच्च न्यायालय द्वारा जारी किया गया एक आदेश है जो निचली अदालत को इस आधार पर कार्यवाही रोकने का आदेश देता है कि अदालत के पास या तो अधिकार क्षेत्र का अभाव है या वह मामला निर्धारित करने में अपने क्षेत्राधिकार से आगे बढ़ रही है।

पी.एस. सुब्रमण्यम चेट्टियार बनाम संयुक्त वाणिज्यिक कर अधिकारी (1966)

इस मामले में अदालत ने कहा कि निषेधाज्ञा केवल तभी जारी की जा सकती है जब याचिकाकर्ता यह दिखा सके कि किसी सरकारी अधिकारी पर उसका कर्तव्य था जो उसके अधिकार क्षेत्र में था लेकिन उसे पूरा नहीं किया गया।

बृज खंडेलवाल बनाम भारत संघ (1975) 

इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को श्रीलंका के साथ सीमा विवाद समझौता करने से रोकने वाला आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। इस फैसले का आधार यह प्रस्ताव था कि निषेधाज्ञा सरकार को कार्यकारी कर्तव्यों को पूरा करने से नहीं रोकता है, और निषेधाज्ञा का उद्देश्य कार्यकारी शक्तियों के विपरीत अर्ध-न्यायिक शासन करना है।

हालांकि, प्राकृतिक न्याय के विचार के उद्भव और प्रशासनिक कार्य के दौरान भी निष्पक्षता के विचार की स्थापना के साथ, यह रुख अब टिकाऊ नहीं है और निषेधाज्ञा की कठोरता भी समाप्त हो गई है। यदि परमादेश मांगे जाने के किसी भी आधार को सिद्ध किया जाता है, तो अब रिट किसी भी व्यक्ति को जारी किया जा सकता है, भले ही वह किसी भी प्रकार के कार्य का प्रदर्शन कर रहा हो। आज निषेधाज्ञा को अर्ध-न्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक निगरानी से संबंधित एक व्यापक उपाय के रूप में देखा जाता है जो अधिकारों में हस्तक्षेप करते हैं।

अधिकार पृच्छा

यह एक लैटिन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘किस प्राधिकार द्वारा’ ,न्यायालय किसी भी सार्वजनिक अधिकारी से यह जानकारी प्राप्त करने के लिए यह रिट जारी कर सकता है कि उस अधिकारी ने किस प्राधिकार के आधार पर वह विशिष्ट सार्वजनिक पद ग्रहण किया है। इस मामले में, यदि यह पाया जाता है कि सार्वजनिक पद गैरकानूनी तरीके से प्राप्त किया गया था, तो सार्वजनिक अधिकारी को नौकरी छोड़नी होगी। अन्य पाँच रिटों के विपरीत, यह किसी भी व्यक्ति द्वारा जारी की जा सकती है।

अधिकार पृच्छा की रिट जारी करने के लिए संतुष्ट होने वाली शर्तें:

  • कार्यालय जनता के लिए खुला होना चाहिए, और इसे क़ानून या संविधान द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए;
  • कार्यालय ठोस होना चाहिए। 
  • ऐसे व्यक्ति को पद पर नियुक्त करने में, संविधान या कानून, या वैधानिक नियम का उल्लंघन हुआ हो।
  • ग़ैरक़ानूनी दावा: यह रिट तब जारी की जाती है जब कोई व्यक्ति ग़ैरक़ानूनी तरीके से या वैधानिक या संवैधानिक उपायों के बिना किसी सार्वजनिक पद का प्रयोग कर रहा हो।
  • कानूनी प्राधिकरण: याचिकाकर्ता को यह साबित करने में सक्षम होना होगा कि वह व्यक्ति गैरकानूनी तरीके से कार्यालय पर काबिज है, और नियुक्ति को चुनौती देने के लिए कानूनी उपाय है।

जमालपुर समाज बनाम डॉ दी राम और अन्य (1954)

इस मामले में एक निजी संस्था, बिहार राज आर्य समाज प्रतिनिधि सभा की कार्य समिति के विरुद्ध एकअधिकार पृच्छा रिट लाया गया था। न्यायालय ने याचिका खारिज कर दिया और ,पटना उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अधिकार पृच्छा की रिट केवल उस व्यक्ति के खिलाफ जारी की जा सकती है जो सार्वजनिक पद पर अन्यायपूर्ण तरीके से कब्जा कर रहा है। निजी कार्यालय की स्थिति में, यह लागू नहीं है।

जी वेंकटेश्वर राव बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (1966)

इस मामले में अदालत ने माना कि एक निजी व्यक्ति अधिकार पृच्छा रिट के लिए आवेदन कर सकता है। रिट दायर करने वाले व्यक्ति पर सीधे तौर पर प्रभाव नहीं पड़ता है या मुद्दे में शामिल नहीं होता है।

पूरनलाल बनाम पी.सी.घोष (1970)

इस मामले में अदालत ने माना कि किसी व्यक्ति का किसी विशेष पद पर चुनाव या नियुक्ति अधिकार पृच्छा जारी करने के लिए अपर्याप्त है जब तक कि वह व्यक्ति उस पद को स्वीकार नहीं करता है।

परमादेश और निषेधाज्ञा के बीच अंतर

  • परमादेश की रिट न्यायिक, अर्ध-न्यायिक और प्रशासनिक प्राधिकरण के विरुद्ध जारी की जाती है। जबकि, निषेधाज्ञा की रिट न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के विरुद्ध जारी की जाती है। 
  • परमादेश रिट निचली अदालत को कुछ करने का आदेश है। जबकि, निषेधाज्ञा निचली अदालत को कुछ न करने का आदेश है। 
  • परमादेश का रिट गतिविधि को निर्देशित करता है। जबकि, निषेधाज्ञा निष्क्रियता को निर्देशित करती है। 
  • परमादेश का रिट सार्वजनिक कर्तव्यों के निष्पादन को निर्देशित करता है। जबकि, निषेधाज्ञा उनके अधिकार क्षेत्र से अधिक काम जारी रखने पर रोक लगाती है। 

उत्प्रेषण लेख और निषेधाज्ञा के बीच अंतर 

  • निषेधाज्ञा की रिट प्रक्रिया में किसी निर्णय या प्रशासनिक कार्रवाई को आगे बढ़ने से रोकने के लिए जारी की जाती है, जबकि उत्प्रेषण लेख की रिट का उपयोग पहले से किए गए निर्णय को रद्द करने के लिए किया जाता है।
  • जब एक अधीनस्थ न्यायालय किसी ऐसे विषय की सुनवाई करता है जिस पर उसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो जिस व्यक्ति पर मुकदमा चल रहा है वह सर्वोच्च न्यायालय में निषेधाज्ञा दायर कर सकता है, और निचली अदालत को मामले को जारी रखने से रोकने के लिए एक आदेश जारी किया जाएगा। जब एक अधीनस्थ अदालत किसी कारण या मामले की सुनवाई करती है और ऐसे मामले पर निर्णय देती है जिस पर उसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो पीड़ित पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय में उत्प्रेषण लेख  की रिट दायर करनी होगी, जो निचली अदालत के फैसले को रद्द करने का आदेश जारी करेगी।
  • कार्यवाही के समापन से पहले निषेधाज्ञा जारी की जाती है। उत्प्रेषण लेख  की रिट तब जारी की जाती है जब एक अधीनस्थ न्यायालय या न्यायाधिकरण, या न्यायिक या अर्ध-न्यायिक जिम्मेदारियों का प्रयोग करने वाली कोई अन्य संस्था कोई ऐसा निर्णय लेती है जो उसके अधिकार से बाहर हो।
  • निषेधाज्ञा का उद्देश्य उपचार के बजाय रोकथाम करना है। जबकि, निचली अदालत द्वारा दिए गए फैसले को रद्द करने के लिए उत्प्रेषण लेख  रिट का उपयोग किया जाता है।
  • केवल न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संगठन ही निषेधाज्ञा रिट के अधीन हैं। दूसरी ओर, उत्प्रेषण लेख  की रिट केवल कार्यकारी या प्रशासनिक क्षमता में कार्य करने वाले सार्वजनिक प्राधिकरण, साथ ही विधायी निकायों, न्यायिक और अर्ध-न्यायिक संगठनों के खिलाफ जारी की जाती है।

अनुच्छेद 226: चुनौतियाँ और समसामयिक महत्व 

न्यायिक प्रक्रिया में देरी और बकाया कार्य 

भारत की न्यायिक प्रणाली के सामने आने वाली समस्याओं में से एक विशेष रूप से अनुच्छेद 226 से संबंधित देरी और बकाये कानूनी मामले है। जिन उच्च न्यायालयों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, उन्हें बड़ी संख्या में मामलों का सामना करना पड़ता है। इस भीड़ भाड़ के परिणामस्वरूप सुनवाई में देरी होती है जिसके परिणामस्वरूप न्याय मिलने में देरी होती है। ये देरी अनुच्छेद 226 के तर्क का खंडन करती है, जिसका उद्देश्य अधिकारों के प्रवर्तन के लिए एक कुशल कानूनी समाधान प्रदान करना है। जिन लेनदारों (क्रेडिटर्स) के अधिकारों का उल्लंघन किया गया है, उन्हें अंतरिम आदेश की आवश्यकता है, जैसे कि गैरकानूनी कारावास या हिरासत के मामलों में, उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। बकाये मामले  के लिए पर्याप्त न्यायिक कर्मियों की कमी, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रक्रियाओं में देरी जैसे कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया गया है। इन समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक न्यायिक सुधारों की आवश्यकता है जिसमें न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना, अदालती सुविधाओं में सुधार करना और मामलों को जल्द से जल्द निपटाने के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाना शामिल है।  

हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए पहुंच 

जबकि अनुच्छेद 226 भारत में जरूरतमंदों को न्याय तक पहुंचने में मदद करने के लिए सार्वजनिक अधिकारियों को व्यापक शक्तियां प्रदान करता है, यह प्रक्रिया अभी भी जरूरतमंदों, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए बोझिल बनी हुई है। सामाजिक-आर्थिक पहुंच, कानूनी चेतना और भौतिक पहुंच की कमी लोगों के इन समूहों को अनुच्छेद 226 के तहत उपलब्ध न्यायिक उपचारों का पूरी तरह से उपयोग करने से रोकती है। ज्यादातर मामलों में उच्च न्यायालय शहरी केंद्रों में स्थित है और ग्रामीण क्षेत्र और अलग-थलग व्यक्तियों की पहुंच नहीं है। इसके अलावा, मुकदमेबाजी में शामिल कानूनी खर्च, जिसमें वकील की शुल्क के साथ-साथ अन्य आकस्मिक खर्च भी शामिल हैं, जो एक और चुनौती पेश करते हैं। ऐसे पक्षों, जैसे आर्थिक रूप से दबे हुए लोग, महिलाएँ और अल्पसंख्यक, कानूनी निवारण पाने का जोखिम नहीं उठा सकते। इस अंतर को भरने के लिए कानूनी सहायता, कानूनी जागरूकता और मोबाइल न्यायालय और ई-न्यायालय सहित अदालतों तक पहुंच में सुधार करने की आवश्यकता है। अल्पसंख्यक समूहों के लिए कानूनी ढांचे को मजबूत करने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि अनुच्छेद 226 के प्रावधान सभी के लिए सुलभ और उपयोगी हों। 

आधुनिक कानूनी मुद्दों की जटिलता 

समकालीन कानूनी वातावरण जटिल है और अनुच्छेद 226 के कार्यान्वयन के संबंध में कठिनाइयाँ पैदा करता है। प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) में प्रगति, वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) और लगातार बदलते सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण, कानूनी मामले जटिल हैं। उच्च न्यायालयों को अब साइबर कानून, बौद्धिक संपदा अधिकार, पर्यावरण कानून और जटिल वित्तीय साधनों जैसे जटिल मुद्दों से निपटने के लिए शामिल किया जाता है। ऐसी समस्याओं के लिए विशेष ज्ञान और अनुभव की आवश्यकता होती है, और इससे पारंपरिक न्यायपालिका प्रणालियों पर दबाव पड़ सकता है। हालाँकि, अनुच्छेद 226 की भविष्य की दिशा के लिए न्यायिक सक्रियता और न्यायिक आत्म-संयम के बीच नाजुक संतुलन को विकृत किए बिना नई कानूनी जरूरतों को पूरा करने के लिए इसके व्याख्यात्मक क्षेत्र के विस्तार की आवश्यकता है। इस चुनौती से पार पाने के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि कानून के नए क्षेत्रों की समझ विकसित करके न्यायाधीशों को निरंतर प्रशिक्षण दिया जाए। इसके अलावा, न्यायिक प्रणाली में नई तकनीकों को लागू करने से, उदाहरण के लिए, एआई और कानूनी डेटा विश्लेषण, बड़े और जटिल मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने में मदद मिल सकती है। केवल नई कानूनी स्थितियों में समायोजन के माध्यम से, न्यायपालिका यह गारंटी दे सकती है कि अनुच्छेद 226 आधुनिक दुनिया में एक प्रभावी सुधारात्मक कानूनी शक्ति बनी रहेगी।  

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के संबंध में उच्च न्यायालय और उनके कार्य 

क्षेत्राधिकार

बेंडिक्ट डेनिस किन्नी बनाम ट्यूलिप ब्रायन मिरांडा (2020) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में उच्च न्यायालय के व्यापक दायरे और विशेष स्थिति को रेखांकित किया है। यह निर्णय पुष्टि करता है कि अन्य वैधानिक उपायों के विचार के बावजूद, वे किसी भी तरह से कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी करने में उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को सीमित नहीं करते हैं। इसलिए उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करने में सक्षम हैं कि संवैधानिक प्रावधानों का पालन किया जाता है और अधिकारी किसी अन्य क़ानून की परवाह किए बिना कानूनी व्यवहार करते हैं। यह मामला भारत के कानूनी ढांचे में संवैधानिक उपायों के प्रभुत्व को सुनिश्चित करने और सर्वोच्च न्यायालय में अपील के अधिकार के संरक्षण में एक मील का पत्थर है।

रिट क्षेत्राधिकार में तथ्य का प्रश्न

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार से संबंधित दिए गए मामले में, उच्च न्यायालय का प्राथमिक कर्तव्य सार्वजनिक अधिकारियों के गैरकानूनी कार्यों और निर्णयों के खिलाफ व्यक्तियों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि वे निष्पक्ष और कानूनी है। चूंकि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों को लागू करने के लिए रिट जारी करने की शक्ति है, इसलिए यह जांचना महत्वपूर्ण हो जाता है कि न्यायालय इस क्षेत्र के भीतर तथ्य के सवालों से कैसे निपटता है। 

रिट क्षेत्राधिकार का प्राथमिक उद्देश्य तथ्यात्मक विवादों का निर्णय करना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा की गई कार्रवाई के संबंध में उठाए गए कानूनी सवालों से निपटना है। उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार प्रशासनिक निर्णयों की वैधता, कानून, नियमों और विनियमों और प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों के अनुरूप उनकी अनुरूपता (कन्फॉर्मिटी) निर्धारित करना है। इस संदर्भ में, उच्च न्यायालय आमतौर पर मामले की आगे की तथ्यात्मक जांच या पुनर्विचार पर ध्यान नहीं देता है। बल्कि, यह मायने रखता है कि निर्णय लेना वैध था और प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कार्य कर रहा था।  

इस प्रकार, अनुच्छेद 226 के तहत समीक्षा को किसी भी अर्थ में अपीलीय समीक्षा नहीं कहा जा सकता है। जबकि प्रथम दृष्टया अदालतें तथ्यों और संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया पर विचार या विश्लेषण करती हैं, उच्च न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार कानून के मुद्दों और किसी निर्णय या कार्रवाई की कानूनी औचित्य को संबोधित करता है। इस अंतर का तात्पर्य यह है कि उच्च न्यायालयों से आम तौर पर पहली बार में पेश किए गए सबूतों की संभावित सत्यता की समीक्षा करने की उम्मीद नहीं की जाती है। इसके बजाय, वे यह निर्धारित करते हैं कि क्या प्रशासकों की कार्रवाई कानूनी थी और क्या प्रक्रिया उचित और न्यायसंगत थी। 

हालाँकि, उच्च न्यायालय निम्नलिखित कारकों के कारण केवल एक निश्चित सीमा तक ही वास्तविक तथ्य के प्रश्नों का समाधान कर सकता है। उदाहरण के लिए, न्यायालय को आम तौर पर तथ्यात्मक मुद्दों की बारीकी से जांच करने की आवश्यकता नहीं होती है, जिसमें साक्ष्य की समीक्षा करने में समय लग सकता है। जोर इस बात पर रहता है कि क्या कोई न्यायिक त्रुटि है, शक्ति का दुरुपयोग है, या प्रक्रियात्मक निष्पक्षता से इनकार किया गया है। यह सीमा इस तथ्य पर आधारित है कि रिट क्षेत्राधिकार का उद्देश्य सामान्य अपीलीय प्रक्रिया का विकल्प बनना या तथ्य-खोज आयोग के रूप में कार्य करना नहीं है। 

मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में उच्च न्यायालय 

भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अनुसार, उच्च न्यायालयों पर मौलिक अधिकारों की रक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस प्रावधान के अनुसार, उच्च न्यायालयों को भारतीय संविधान के भाग III में शामिल अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारत के क्षेत्रों के भीतर किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण को रिट, आदेश और निर्देश जारी करने का अधिकार है। इन अधिकारों के संरक्षक के रूप में, उच्च न्यायालयों को किसी भी समय राज्य या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उक्त अधिकारों का उल्लंघन या संभावित उल्लंघन होने पर कार्रवाई करने का विशेषाधिकार है। 

उच्च न्यायालयों की रिट में शामिल हैं बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेधाज्ञा, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण लेख , जो न्याय दिलाने में कारगर हैं। उदाहरण के लिए, बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट आपके पास एक शरीर है  किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए ग़ैरकानूनी कारावास के संबंध में संविधान के उल्लंघन को ठीक करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। इसी तरह, परमादेश का रिट सार्वजनिक अधिकारियों को उनके वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने का आदेश देकर समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार को लागू कर सकता है। 

न्यायिक सक्रियता एक तरह का विशेषता है जिसके तहत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के संरक्षण में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। वे कभी-कभी सार्वजनिक महत्व के मामलों और मौलिक अधिकारों के संबंध में मूल अधिकार क्षेत्र ग्रहण करते हैं, जिसका अर्थ है कि जीवन में उनके पद की परवाह किए बिना सभी को न्याय मिलना चाहिए। उच्च न्यायालयों ने भारत में संवैधानिक मौलिक अधिकारों के विकास और प्रवर्तन में महान भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया फैसले नाज फाउंडेशन मामले में आईपीसी के धारा 377 को खारिज कर दिया गया, जो समान लिंग के दो वयस्कों के बीच सहमति से यौन संबंध को अपराधी बनाता था, इस प्रकार समानता और गैर-भेदभाव के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता था।  

इसके अलावा, उच्च न्यायालयों के पास उन प्रशासनिक निर्णयों और कानूनों पर दोबारा विचार करने का अधिकार है जो मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण कर सकते हैं। रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के दौरान, वे यह सुनिश्चित करते हैं कि कार्यकारी कार्य और कानून संविधान के अनुरूप हों, जिससे संविधान की संवैधानिकता बरकरार रहे। 

दूसरे शब्दों में, उच्च न्यायालय व्यापक जागृत (अवैक) संरक्षक की भूमिका निभाते हैं, जो यह देखते हैं कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन न हो। अनुच्छेद 226 के तहत यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकार की तीन शाखाओं और विशेष रूप से न्यायपालिका के बीच नियंत्रण और संतुलन कायम रहे। इस तरह, उच्च न्यायालय निष्पक्षता बनाए रखते हैं और किसी भी गैरकानूनी आचरण के खिलाफ लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। 

मौलिक अधिकारों से परे क्षेत्राधिकार का विस्तार 

हालांकि अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों को लागू करने में माहिर है, लेकिन उच्च न्यायालयों को ऐसा करने की शक्ति देकर कानूनी अधिकारों के किसी भी उल्लंघन में इसका उपयोग किया जाता है। यह व्यापक क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालयों को किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी करने में सक्षम बनाता है क्योंकि यह न्यायिक समीक्षा और जनता के उपचार के क्षेत्र में एक समग्र दृष्टिकोण देता है। 

अनुच्छेद 226 के तहत यह व्यापक क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालयों को ऐसे कदम उठाने का अधिकार देता है जहां प्रशासनिक निर्णय, वैधानिक निर्माण और अन्य सार्वजनिक निकायों के संचालन को लागू किया जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कार्यकारी और प्रशासनिक निकायों की कार्रवाई कानूनी, आनुपातिक और गैर-भेदभावपूर्ण है। उच्च न्यायालय कुछ प्रशासनिक आदेशों को अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) घोषित कर सकते हैं, जिससे सत्ता का दुरुपयोग रोका जा सकता है और कानून का शासन कायम रखा जा सकता है।

विस्तृत क्षेत्राधिकार के सकारात्मक परिणामों में, जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार का विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालयों ने प्रदूषण, भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्याओं सहित समाज की एक बड़ी आबादी को प्रभावित करने वाले संरचनात्मक अन्याय से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं पर विचार किया है। इस प्रकार उन्होंने विशेष रूप से सामाजिक और आर्थिक न्याय के क्षेत्रों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरा किया है जिसे सरकार की कार्यकारी और विधायी शाखाओं ने उपेक्षित छोड़ दिया है। 

उदाहरण के लिए, परमादेश के अधिकार का प्रयोग करते समय सार्वजनिक प्राधिकारियों को उनके वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाध्य करना संभव है। यह उन स्थितियों में उपयोगी रहा है जहां सरकारी विभागों ने कल्याण कार्यक्रम शुरू करने, विनियमन लागू करने या उचित रूप से सेवाएं प्रदान करने में उपेक्षा की है। उदाहरण के लिए, उत्प्रेषण लेख  का रिट उच्च न्यायालयों को न्याय को बनाए रखने और की गई गलतियों को सुधारने के लिए निचली अदालतों और न्यायाधिकरणों द्वारा लिए गए निर्णयों को रद्द करने में सक्षम बनाता है। 

उच्च न्यायालयों ने भी वैधानिक अधिकारों को अर्थ देने और लागू करने के लिए अपने रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल किया है। उदाहरण के लिए, श्रम अधिकारों और उपभोक्ता अधिकारों के मामलों और शिक्षा नीतियों में, उच्च न्यायालयों ने निर्देश दिए हैं कि वैधानिक कानूनों का अक्षरशः पालन किया जाना चाहिए। यह व्यापक निरीक्षण विभिन्न विधायी उपायों की गुणवत्ता और दक्षता को बनाए रखने में सहायक है। 

इसके अलावा “किसी अन्य उद्देश्य” के लिए रिट जारी करने की शक्ति ने उच्च न्यायालयों को नए और जटिल कानूनी मामलों से निपटने में सहायता की है। नई प्रौद्योगिकियों, वैश्वीकृत दुनिया और बदलती संस्कृतियों का सामना करते हुए, नए प्रकार के कानूनी मुद्दे सामने आए हैं जो अदालतों में प्रगतिशील और नए दृष्टिकोण की मांग करते हैं। उच्च न्यायालयों ने भी इन परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया है, इसलिए डेटा सुरक्षा, साइबर अपराध और कॉर्पोरेट धोखाधड़ी जैसी आधुनिक बुराइयों को कानूनी समाधान देने के लिए व्यापक क्षेत्राधिकार का उपयोग किया जा रहा है।

वैकल्पिक उपाय

न्यायिक समीक्षा का एक सिद्धांत यह है कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का तथ्य भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के प्रयोग को बाधित नहीं करता है। यह सिद्धांत बताता है कि उच्च न्यायालय कानून के शासन और मौलिक या कानूनी अधिकारों में हस्तक्षेप न करने के अनुपालन के लिए प्रशासनिक कार्यों और निर्णयों की समीक्षा में भाग लेते हैं, भले ही अन्य कानूनी उपचार उपलब्ध हों।

उच्च न्यायालय को विभिन्न मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने का अधिकार प्राप्त है। यह प्रावधान अभी भी रिट याचिकाओं के तहत प्रदान किए गए उपाय की विशिष्ट प्रकृति को दर्शाता है, जो सार्वजनिक कानून और प्रशासनिक गतिविधियों के अंतर्गत आने वाली चिंताओं से संबंधित है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि रिट अधिकार क्षेत्र का दायरा पूरी तरह से पर्याप्त उपायों की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर नहीं करता है। इसके बजाय, यह इस बात से संबंधित है कि विचाराधीन कार्य कानूनी या संवैधानिक है या नहीं।

इस प्रकार, जहां अपील का कोई उपाय उपलब्ध है, वहां भी यह उच्च न्यायालयों को रिट याचिका पर विचार करने से नहीं रोक सकता क्योंकि यह एक ऐसा तत्व है जिस पर उच्च न्यायालय अपने विवेक का प्रयोग करते हुए विचार कर सकते हैं। सहायक राहत की उपलब्धता के बावजूद, उच्च न्यायालय यह निर्धारित करने का विवेक रखता है कि अनुच्छेद 226 के तहत राहत दी जानी चाहिए या नहीं। इस विवेक का प्रयोग कुछ कारकों के आधार पर किया जाता है जिसमें शिकायत की प्रकृति, उपलब्ध कानूनी समाधान की  पर्याप्तता और सार्वजनिक हित पर संभावित असर शामिल है। 

हालाँकि, व्यवहार में, ऐसे असाधारण मामले हैं जिनमें उच्च न्यायालय वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर भी रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार कर सकता है। उदाहरण के लिए, जहां ऐसा वैकल्पिक उपाय प्रभावकारी, उचित है और राहत का उचित मौका देता है, उच्च न्यायालय हस्तक्षेप से इनकार कर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वैकल्पिक उपाय मौजूद होने पर रिट क्षेत्राधिकार लागू नहीं होगा। इसलिए, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि रिट याचिका पर विचार करने या अस्वीकार करने का निर्णय संविधान में निहित अधिकारों को बनाए रखने के प्रयास में न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के साथ किया जाता है। 

जनहित याचिका (पीआईएल) में उच्च न्यायालयों की भूमिका 

अनुच्छेद 226 के तहत अधि स्थिति 

अधि स्थिति (लोकस स्टैंडाई) या कोई कार्रवाई करने या अदालत में सुनवाई का अधिकार, कानूनी न्यायशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, जो उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है,अधि स्थिति का सिद्धांत यह निर्धारित करता है कि मौलिक अधिकारों या अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए कौन पात्र है।

जनहित याचिकाओं का विकास और महत्व 

जनहित याचिका ने आम आदमी को सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर न्याय पाने में सक्षम बनाकर भारत में समकालीन न्यायिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लाया है। पीआईएल का विचार सत्तर के दशक के उत्तरार्ध और अस्सी के दशक की शुरुआत में विकसित हुआ था क्योंकि भारतीय न्यायपालिका ने समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक बुराइयों से लड़ने का बीड़ा उठाया था। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर दोनों ने इस अवधारणा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके तहत कोई अन्य व्यक्ति या समूह किसी ऐसे व्यक्ति की ओर से याचिका दायर कर सकता था जो सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण ऐसा नहीं कर सकता था। 

जनहित याचिकाओं के महत्व को इस अर्थ में समझा जा सकता है कि यह सभी के लिए न्याय प्रदान करने की सुविधा प्रदान करती है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि व्यक्तियों और कंपनियों के बीच व्यक्तिगत विवादों को संबोधित करने वाली पारंपरिक मुकदमेबाजी के विपरीत, जनहित याचिकाएं लोगों के बड़े समूहों को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान करती हैं। उन्होंने अदालतों को पर्यावरणवाद, मानवाधिकारों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार और अधिकारियों के बीच जवाबदेही की कमी जैसी अन्य बुराइयों सहित व्यवस्थित समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने के अवसर प्रदान किए हैं। जनहित याचिकाओं ने न्यायिक भागीदारी की संभावनाओं का दायरा बढ़ा दिया है और न्यायपालिका को सार्वजनिक हितों का रक्षक और सामाजिक परिवर्तन का अग्रदूत (हर्बिंगेर) बनने में मदद की है।

जनहित याचिकाओं ने भारत में सामाजिक न्याय और सुधार प्रक्रिया में क्रांति ला दी है। समाज में वंचितों और शोषितों के लिए सार्वभौमिक चिंताओं से निपटने के माध्यम से, जनहित याचिकाओं ने समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की खोज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नीति और विधायी सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

एक अन्य क्षेत्र जो जनहित याचिकाओं से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है वह है पर्यावरण। विभिन्न पीआईएल के बाद न्यायपालिका ने सरकार को प्रदूषण को नियंत्रित करने, वनों और वन्यजीवों का संरक्षण करने के लिए पर्याप्त कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया है। सुधार आदेशों में खतरनाक कारखानों को स्थानांतरित करना और दिल्ली में कार के निकास उत्सर्जन (एमिशन) को विनियमित करना शामिल था, जो एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ (1986) मामले का परिणाम था।

न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा की शक्ति भारत की कानूनी प्रणाली की एक अभिन्न विशेषता है जो न्यायपालिका को सरकार की कार्यकारी और विधायी शाखा की गतिविधियों की जांच करने का अधिकार देती है। यह सुनिश्चित करता है कि कानून और कार्य संविधान और व्यक्तियों के अधिकारों का अपमान नहीं करते हैं। भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों या किसी अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए कुछ रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है जो उच्च न्यायालयों को कानून का शासन बनाए रखने में मदद करता है।

अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को उचित निर्देश, आदेश या रिट पारित करने का अधिकार देता है, जिसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण लेख रिट शामिल हैं। ये रिट व्यक्तियों को कानूनी सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य या उसकी एजेंसियों ने गैरकानूनी तरीके से काम किया है और उनके कानूनी और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। 

अनुच्छेद 226 में अनुच्छेद 32 की तुलना में उच्च न्यायालयों द्वारा व्यापक समीक्षा शक्तियाँ शामिल हैं जिसके तहत अकेले सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान के तहत आवश्यक अधिकारों की रक्षा कर सकता है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को न केवल मौलिक अधिकारों बल्कि कानूनी प्रणाली के किसी अन्य अधिकार के उल्लंघन से जुड़े मामलों से निपटने का अधिकार देता है। यह उच्च न्यायालयों को एक महत्वपूर्ण स्थान बनाता है जहां लोग प्रशासन द्वारा अपने अधिकारों के उल्लंघन के लिए न्याय मांगते हैं।

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के बीच अंतर

अनुच्छेद 32, संवैधानिक उपचारों के अधिकार का एक हिस्सा होने के नाते, व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सुरक्षा की संवैधानिक अवधारणा का आधार है। इसे अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने से भी इसे अतिरिक्त महत्व मिलता है, जो ऐसे अधिकारों की सुरक्षा के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खोलता है। हालांकि, अनुच्छेद 226 सर्वोपरि महत्व का है, यह एक संवैधानिक अधिकार है। इस वर्गीकरण का अर्थ है कि यद्यपि यह न्यायपालिका के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह मौलिक अधिकारों की तरह स्वचालित (ऑटमैटिक्ली)  और अंतर्निहित रूप से व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) नहीं है।

निलंबन 

आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 32 को निलंबित करने का पहलू उन विवेकाधीन शक्तियों को दर्शाता है जो विशेष परिस्थितियों के दौरान सरकार को दी जाती हैं। हालांकि, इस निलंबन को आपातकालीन स्थितियों के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरे के रूप में भी देखा जा सकता है। इसके विपरीत, अनुच्छेद 226 का कोई निलंबन नहीं है, जिसका अर्थ है कि उच्च न्यायालय राष्ट्रीय आपदाओं के मामले में, विशेष रूप से कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के लिए, एक निरंतर कानूनी उपाय के रूप में मौजूद हैं। 

दायरा 

अनुच्छेद 32 का मौलिक अधिकारों तक सीमित अनुप्रयोग इन बुनियादी स्वतंत्रताओं की प्राथमिक और प्रत्यक्ष सुरक्षा के उद्देश्य के अनुरूप है। जबकि अनुच्छेद 226 दूरगामी है, उच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 की तुलना में कानूनी समस्याओं के कई अधिक पहलुओं पर हस्तक्षेप कर सकते हैं, जो इसे न्याय प्राप्त करने के लिए अधिक लचीला साधन बनाता है। यह लचीलापन विशेष रूप से एक जटिल कानूनी वातावरण में महत्वपूर्ण है जहां राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण न्यायिक कार्रवाई की आवश्यकता केवल बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा से अधिक व्यापक क्षेत्रों में हो सकती है।  

क्षेत्राधिकार 

अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के पास मूल अधिकार क्षेत्र है जो पूरे देश में समान रूप से मौलिक अधिकारों के प्रावधानों को लागू करना और बनाए रखना संभव बनाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह मौलिक अधिकारों के अर्थ और अनुप्रयोग को केंद्रीकृत करता है, इस प्रकार यह सुनिश्चित करता है कि समझ सुसंगत है। हालाँकि, अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों का दायरा क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार तक ही सीमित है,इसलिए यह अधिक लचीला है क्योंकि यह क्षेत्रीय विविधताओं को ध्यान में रखता है। हालांकि, यह विभिन्न राज्यों में कानूनी सिद्धांतों के अनुप्रयोग में भिन्नता (वेरीऐशन)  का कारण भी बन सकता है।

विवेक 

अनुच्छेद 32 का अनिवार्य चरित्र मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय की ओर रुख करने के व्यक्तियों के गैर-अपमानजनक (डेरोगेबल) अधिकार पर जोर देता है। यह सुनिश्चित करता है कि इन अधिकारों के उल्लंघन के लिए न्याय की एक स्पष्ट और अप्रतिबंधित पहुंच है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को दी गई विवेकाधीन शक्तियां उन्हें निराधार या अस्थिर कार्रवाई के कारणों को छानने में सक्षम बनाती हैं, जिससे न्यायिक समय और जनशक्ति का इष्टतम (ऑप्टीमल) उपयोग होता है। हालांकि, यह विवेक निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यक्तिपरकता लाता है, जिससे न्यायिक प्रणाली में असंगतता का विकल्प पैदा होता है। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 227

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों को नियंत्रित और पर्यवेक्षण करने की शक्ति से संबंधित है। इसका मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि उनके अधिकार क्षेत्र के भीतर निचली अदालतें और अन्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण कुशलतापूर्वक और निष्पक्ष रूप से कार्य करें और वैधता के सिद्धांतों का पालन करें। यह उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करने के लिए पर्यवेक्षण का प्रयोग करने में सक्षम बनाता है कि न्यायिक प्रणाली के भीतर न्याय का उचित प्रशासन हो और कानून के शासन का पालन हो। 

जहाँ तक अनुच्छेद 227 के सामान्य अर्थ की बात है, यह आवश्यक रूप से अधीनस्थ सिविल, आपराधिक और राजस्व अदालतों के साथ-साथ अन्य अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों और न्यायाधिकरणों के कामकाज पर नियंत्रण की उच्च न्यायालय की शक्ति से संबंधित है। जबकि अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का उद्देश्य मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों की सुरक्षा करना है, अनुच्छेद 227 का उद्देश्य यह देखना है कि निचली अदालतें और न्यायाधिकरण ऐसे अधिकार क्षेत्र नहीं लेते हैं जिनके वे कानूनी रूप से हकदार नहीं हैं और वे कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग और करते हैं। यह पर्यवेक्षी भूमिका एक अपीलीय कार्य की कल्पना नहीं करती है, बल्कि क्षेत्राधिकार संबंधी गलतियों, प्रक्रिया के उल्लंघन या कानून के गैर-अनुपालन को ठीक करने के लिए एक सामान्य भूमिका निभाती है।

उच्च न्यायालय इस पर्यवेक्षी शक्ति को कई तरीकों से नियोजित कर सकते हैं जैसे निर्देश देना या निचली अदालतों की प्रक्रियाओं में गलतियों को सुधारना। इसमें किसी अधीनस्थ न्यायालय को किसी मामले को वैध तरीके से जारी रखने का आदेश देना या किसी कानूनी त्रुटि को दूर करना शामिल हो सकता है। हालांकि, इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि अनुच्छेद 227 के अनुसार, उच्च न्यायालय निचली अदालतों के निर्णयों की योग्यता में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक कि क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या प्रक्रियात्मक अनौचित्य न दिखाई दे।

इसलिए, कानूनी प्रणाली की एकता और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 227 के तहत पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार आवश्यक है। यह ये सुनिश्चित करने में सहायता करता है कि सभी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अंग अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर काम करते हैं और प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र के मामलों पर किसी भी कथित अन्याय के निवारण के लिए एक मंच प्रदान करते हैं। इसके बाद यह न्यायिक प्रणाली के भीतर कुछ जांच और संतुलन को मजबूत करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्याय का वितरण अधिक प्रभावी और निष्पक्ष हो।

जैकी बनाम टिनी @ एंटनी और अन्य (2014), के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय और एस.ए. बोबडे की पीठ के साथ भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के दायरे को स्पष्ट किया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जहां अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को कानूनी और मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए रिट जारी करने का निर्देश देता है, वहीं अनुच्छेद 227 पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का विस्तार करता है। अनुच्छेद 227 के अनुसार, उच्च न्यायालय के पास अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों की न्यायिक गतिविधियों की निगरानी करने की शक्ति है जो कानूनी प्राधिकरण और कानूनी सिद्धांतों के दायरे से परे हैं। 

न्यायालय ने शालिनी श्याम शेट्टी और अन्य बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल (2010) के मामले में अपने पिछले फैसलों में से एक का हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि उच्च न्यायालयों को निजी कानून से उत्पन्न मामलों और जहां प्रतिवादी एक निजी पक्षकार है, उसमे हस्तक्षेप करने से इनकार करना चाहिए। अदालत ने कहा कि “इस शक्ति का अनुचित और लगातार प्रयोग उल्टा पड़ेगा और इस असाधारण शक्ति को उसकी ताकत और जीवन शक्ति से वंचित कर देगा।” अदालत ने यह भी बताया कि संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों पर सुधारात्मक क्षेत्राधिकार रखने में सक्षम बनाता है, लेकिन इसका उद्देश्य दो पक्षों के बीच व्यक्तिगत शिकायत के लिए नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि गहन व्यक्तिगत विवादों को निपटाने के लिए अनुच्छेद 226 और 227 के तहत रिट याचिकाओं पर विचार नहीं किया जा सकता है। इसके विपरीत, निचली अदालतों और न्यायाधिकरणों को अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने और कानून का सम्मान करने के लिए मजबूर करने के लिए उच्च न्यायालयों द्वारा अनुच्छेद 227 का उपयोग किया जाना चाहिए, खासकर जहां गंभीर गलतियाँ या अन्याय हुआ हो।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के बीच अंतर

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सूर्या देवी राय बनाम राम चंदर राय के मामले में माननीय शीर्ष अदालत के कई पिछले संवैधानिक निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें से एक उमाजी केशाव मेषराम और अन्य बनाम श्रीमती राधिकाबाई और अन्य  था, जिसने अनुच्छेद 226 और 227 के दायरे, शक्ति और अंतर स्थापित किया।

सूर्या देवी राय बनाम राम चंदर राय के मामले में अपने पूर्व निर्णयों की समीक्षा करने के बाद  सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित मतभेद निर्धारित किए:

  • अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी को निर्देश, आदेश और रिट जारी करने की क्षमता देता है। जबकि, अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालयों को उस क्षेत्र की सभी अदालतों और न्यायाधिकरणों पर अधीक्षण (सुप्रीटेन्डेन्स) की शक्ति देता है, जिस पर उनका अधिकार क्षेत्र है।
  • दोनों अनुच्छेदों के बीच सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट अंतर यह है कि अनुच्छेद 226 के तहत कार्रवाई उच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार के अभ्यास में होती है, जबकि अनुच्छेद 227 के तहत प्रक्रियाएं पूरी तरह से पर्यवेक्षी होती हैं।
  • उत्प्रेषण लेख  का रिट उच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार का एक प्रयोग है (अनुच्छेद 226); पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 227) एक मूल क्षेत्राधिकार नहीं है और इस संबंध में अपीलीय पुनरीक्षण (रीविजन) या सुधारात्मक क्षेत्राधिकार के अधिक अनुरूप है।
  • संविधान के अनुच्छेद 226 द्वारा दिए गए अधिकार का प्रयोग पीड़ित पक्ष द्वारा या उसकी ओर से की गई याचिका पर किया जा सकता है, हालांकि अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का प्रयोग स्वत: संज्ञान से भी किया जा सकता है।

तकनीकी प्रगति और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 

न्यायालय प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण 

उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी), पहुंच (एक्सेसिबिलिटी) और पारदर्शिता में सुधार के मामले में विभिन्न अदालतों की कार्यवाही के डिजिटलीकरण की अवधारणा को भारतीय न्यायपालिका की सुधार प्रक्रिया में नया मॉडल माना जा सकता है। यह परिवर्तन बढ़ते बकाये कानूनी मामले और न्याय वितरण को तर्कसंगत बनाने की अनिवार्यता को दर्शाता है। डिजिटलीकरण में कई तत्व शामिल हैं जैसे; विभिन्न उपकरणों और डिजिटल कानूनी मामले प्रबंधन प्रणालियों के माध्यम से मामलों की इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग, मामले की स्थिति और निर्णय आदि। 

डिजिटलीकरण समय लेने वाली प्रक्रियाओं को कम करने के लिए जाना जाता है। कागज़ रहित प्रणालियों का उपयोग अदालतों द्वारा मामलों के संचालन और प्रसंस्करण की दक्षता में वृद्धि कर सकता है। इसका परिणाम सम्मन, नोटिस और अन्य न्यायिक प्रक्रियाओं के उत्पादन में बेहतर होता है, जो बदले में न्याय वितरण में तेजी लाता है। इसके अलावा, डिजिटाइज्ड रिकॉर्ड को भौतिक रिकॉर्ड की तुलना में बहुत आसानी से व्यवस्थित, पहुच और नियंत्रित किया जा सकता है जो आसानी से क्षतिग्रस्त या खो सकते हैं। 

दूसरा महत्वपूर्ण लाभ अदालत द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की बेहतर उपलब्धता है। यह वादियों, वकीलों और जनता के लिए कानूनी मामले के विवरण और अदालती सुनवाई को उनके सुविधाजनक समय और स्थान पर देखना आसान बनाता है। यह उन लोगों के लिए सबसे अधिक मददगार है जो ग्रामीण या अलग-थलग क्षेत्रों में रहते हैं क्योंकि शारीरिक रूप से अदालत संरचनाओं तक पहुंचना उनके लिए बहुत कठिन हो सकता है। साथ ही, डिजिटलीकरण जवाबदेही बढ़ाता है क्योंकि उपयोगकर्ता आसानी से न्यायिक डेटा का उपयोग कर सकते हैं और न्यायपालिका के प्रदर्शन की जांच कर सकते हैं।

प्रौद्योगिकी के उपयोग से संगठन की दृष्टि से न्यायालयों के प्रबंधन में भी सुधार होता है। स्वचालित कानूनी मामले प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग अदालत की तारीखों की बुकिंग, मामलों की निगरानी और अदालत सूचियों में सहायता कर सकता है। ऐसी प्रणालियाँ न्यायाधीशों और अन्य अदालत कर्मियों को आने वाली समय-सीमाओं और प्रक्रियात्मक दायित्वों के बारे में सूचित कर सकती हैं जिनके अनुपालन की आवश्यकता होती है, इस प्रकार समय लेने वाली अव्यवस्था को कम किया जा सकता है।

ई-फाइलिंग और आभासी सुनवाई 

ई-फाइलिंग और आभासी सुनवाई (वर्चुअल हियरिंग) महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे न्यायिक डिजिटलीकरण का मूल हैं, जिसने भारत में कानूनी पेशे और अदालती कार्यवाही की गतिशीलता में गहरा बदलाव किया है। ई-फाइलिंग, जिसे इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वकील और मुकदमेबाज अपने कानूनी दस्तावेज और कानूनी मामले के दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमा कर सकते हैं, न कि भौतिक रूप से। इससे न केवल अधिक समय और कम मेहनत बचाने में मदद मिलती है बल्कि गलतियों और कागजात के खोने की संभावना भी कम हो जाती है।

 

ई-फाइलिंग प्रणाली के कार्यान्वयन के माध्यम से, कानूनी मामलों को शुरू करने या आगे बढ़ाने की प्रक्रिया आसान हो गई है। इस तथ्य को देखते हुए कि ई-फाइलिंग केंद्रीय भंडारण और फाइलिंग प्रणाली में मामलों के संकलन को सक्षम बनाती है, सभी हितधारक वास्तविक समय में दस्तावेजों और अद्यतन (अपडेट) तक पहुंचने में सक्षम होते हैं। इससे मामलों के बेहतर संगठन में मदद मिलती है और अदालत कर्मियों पर बोझ कम होता है, जिन्हें कागजी दस्तावेज को छांटने और संसाधित करने की आवश्यकता नहीं होती है। 

दूरस्थ कार्यवाही, जो पोर्टेबल संचार अनुप्रयोगों या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित की जाती है, विशेष रूप से कोविड-19 के प्रकोप के बाद मानक या सामान्य हो गई है। ये सुनवाई अदालतों को कार्यवाही को आभासी रूप से संचालित करने की अनुमति देती है, जिससे शारीरिक सीमाओं के दौरान भी उनके कार्य जारी रहते हैं। आभासी सुनवाई को निम्नलिखित लाभों के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है: सुविधा, लागत में कमी और बेहतर पहुंच। इसका मतलब है कि अदालत सत्र के प्रतिभागी किसी भी स्थान पर शारीरिक रूप से मौजूद हो सकते हैं और यात्रा पर होने वाले खर्चों और इससे जुड़ी संगठनात्मक समस्याओं से बच सकते हैं। 

आभासी सुनवाई इस मायने में भी फायदेमंद है कि वे गतिशीलता प्रतिबंध वाले या दूरदराज के क्षेत्रों के प्रतिभागियों को शामिल करने में मदद करते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि इमारतों के कारण न्याय में देरी न हो और जिन मामलों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, उन्हें ऐसे ही संभाला जा सके। इसके अलावा, आभासी सुनवाई जनता को अदालत में होने वाली कार्यवाही के बारे में बेहतर जानकारी देकर उनकी भागीदारी बढ़ाती है। 

हालांकि, ई-फाइलिंग और आभासी सुनवाई के कार्यान्वयन से जुड़ी निम्नलिखित चुनौतियां हैं। कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करने की आवश्यकता है: डिजिटल सूचना की सुरक्षा और इसका गैर-प्रकटीकरण, आभासी सुनवाई की विश्वसनीयता और अंत में, डिजिटल अंतर की समस्या। इस तरह की प्रगति के क्षेत्र को बढ़ाने की क्षमता स्पष्ट है; फिर भी, तकनीकी ढांचे को मजबूत करने, कानूनी कार्यबल को प्रशिक्षित करने और सुरक्षित और शक्तिशाली साइबर सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए निरंतर काम की आवश्यकता है।

कानूनी मामले के प्रबंधन के लिए एआई और कानूनी तकनीक 

मामलों से निपटने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और कानूनी प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग ने कार्य और निर्णय लेने के मामले में न्यायपालिका को एक नया चेहरा दिया है। इंटेलिजेंट तंत्र बड़ी मात्रा में कानूनी जानकारी का विश्लेषण कर सकते हैं, संबंध ढूंढ सकते हैं और न्यायिक प्रदर्शन और दक्षता में सुधार करने वाली सिफारिशें पेश कर सकते हैं। 

कानूनी मामलों के प्रबंधन में एआई का एक अन्य प्रमुख उपयोग पूर्वानुमानित (प्रेडिक्टिव) विश्लेषण के क्षेत्र में है। विभिन्न मामलों के संबंध में अंतर्दृष्टि हैं जिनसे एआई एल्गोरिदम मामले की संभावनाओं का अनुमान लगा सकते हैं और न्यायाधीशों और वकीलों की मदद कर सकते हैं। ये पूर्वानुमानित मॉडल विभिन्न कानूनी तर्कों की सफलता की संभावना का मूल्यांकन करने, संभावित खतरों को पहचानने और कार्रवाई का सर्वोत्तम तरीका प्रस्तावित करने में सक्षम हैं। यह न केवल किसी मामले की तैयारी में सहायक है बल्कि न्यायाधीशों द्वारा लिए गए निर्णयों को मानकीकृत (स्टैंडर्डाइज) करने में भी मदद करता है। 

यह दस्तावेज़ समीक्षा (रिव्यू), कानूनी अनुसंधान (रिसर्च) और मामलों के नियमित सुनवाई (शेड्यूलिंग) जैसे अधिक सांसारिक कार्यों पर खर्च होने वाले समय को भी कम कर सकता है। प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) (एनएलपी) जैसी प्रौद्योगिकियां कानूनी दस्तावेजों को व्याख्या (पार्स) कर सकती हैं, जानकारी प्राप्त कर सकती हैं और यहां तक ​​कि कानूनी मामलों के फ़ोल्डरों को सॉर्ट कर सकती हैं, जिससे दस्तावेजों को मैन्युअल रूप से संभालने की तुलना में अधिक समय और प्रयास की बचत होती है। यह कानूनी पेशेवरों को कार्यों के संदर्भ में उच्च मूल्य वाली गतिविधियों को प्राथमिकता देने में सक्षम बनाता है। 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग के माध्यम से, कानूनी चैटबॉट और आभासी सहायक अदालत या वकीलों को तत्काल सहायता प्रदान कर सकते हैं। ये उपकरण सरल कानूनी प्रश्नों के उत्तर प्रदान कर सकते हैं, प्रासंगिक कागजी कार्रवाई को पूरा करने में मदद कर सकते हैं और मामले की स्थिति की जानकारी दे सकते हैं। इस तरह, एआई-आधारित समाधानों का त्वरित समर्थन ग्राहकों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और कानूनी सहायता तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है। 

साथ ही, एआई बुद्धिमान मामले पर नजर रखना (ट्रैकिंग) और निगरानी को सक्षम करके न्याय प्रशासन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। ये प्रणालियाँ न्यायाधीशों और अदालत कर्मियों को कुछ संभावित आगामी समय-सीमाओं, प्रक्रियात्मक नियमों और मामलों में घटनाओं के बारे में अनुस्मारक (रिमाइंडर) प्रदान कर सकती हैं और ऐसी चूक को रोक सकती हैं।

हालांकि एआई और कानूनी तकनीक के कार्यान्वयन से लाभ मिलता है, इसके नैतिक या व्यावहारिक मुद्दे हैं। मॉडल के अंशांकन (कैलिब्रेशन), एआई एल्गोरिदम की निष्पक्षता, डेटा की सुरक्षा और स्वचालित वितरण में पूर्वाग्रह की समस्या महत्वपूर्ण चिंताएं हैं। इस प्रकार, यह कहना संभव है कि निरंतर निगरानी, ​​खुला और स्पष्ट एआई उपयोग और नैतिक ढांचे का अनुपालन न्यायिक प्रणाली में एआई का उपयोग करने के लिए अधिकतम प्रभावशीलता और न्यूनतम हानि के लिए महत्वपूर्ण है।

अनुच्छेद 226 के तहत न्यायालय किसी नीति का सुझाव नहीं दे सकता 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के अनुसार उच्च न्यायालयों को मौलिक और अन्य अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति है। फिर भी, इस शक्ति को सार्वजनिक नीति बनाने या प्रस्तावित करने के कार्य के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 226 के तहत, न्यायपालिका की भूमिका यह जांचना है कि सार्वजनिक प्राधिकरण कानूनी और संवैधानिक ढांचे के भीतर अपने कार्य करते हैं और वे अनुचित या गैरकानूनी तरीके से कार्य नहीं करते हैं। कानूनी अधिकारों के उल्लंघन और/या सत्ता के दुरुपयोग के कारण उत्पन्न होने वाले प्रशासनिक कार्यों और विवादों की वैधता पर विचार करना न्यायालय की संवैधानिक भूमिका है, जिसमें नीतिगत निर्णय लेना शामिल नहीं है। 

शक्तियों के पृथक्करण (सेपरेशन) सिद्धांत का मानना ​​है कि नीति निर्धारण कार्यकारी शाखा और विधायी शाखा का अधिकार है। पाठक को यह याद दिलाना जरूरी है कि अदालतें कोई नीति नहीं बना सकती हैं या सुझाव भी नहीं दे सकती हैं क्योंकि ऐसी भूमिकाएं उनके कर्तव्य के दायरे में नहीं हैं। हालांकि, अदालतें इस बात की समीक्षा कर सकती हैं कि क्या मौजूदा नीतियां और प्रक्रियाएं कानून और संविधान के अनुरूप हैं। जब कोई नीतिगत निर्णय कानूनी/संवैधानिक उल्लंघन की ओर ले जाता है, तो न्यायालय उपचारात्मक उपाय निर्धारित कर सकता है या कार्रवाई को रद्द कर सकता है। लेकिन इसका मतलब नीतियों का प्रतिस्थापन (सब्स्टिटूशन) या नये नीति प्रतिमानों का निर्माण नहीं है। 

ऐसा करके, न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि वह कानूनी प्रक्रिया में एक तटस्थ भागीदार बनी रहे और विधायकों (पॉलिसी मेकर) और कार्यकारी शाखाओं से संबंधित नीति-निर्माण क्षेत्र का अतिक्रमण न करे। इस तरह न्यायपालिका अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करती है और केवल कानूनी और संवैधानिक अन्याय और असंतुलन को ठीक करने का प्रयास करती है और इस प्रकार न्यायिक सक्रियता और शासन में नीति निर्माण भूमिकाओं के बीच सही अनुपात बनाए रखती है।

निष्कर्ष 

मार्टिन लूथर किंग ने एक बार कहा था, “कहीं का भी अन्याय हर जगह के न्याय के लिए खतरा है”। 

इसका अर्थ है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाला कोई भी अन्यायपूर्ण व्यवहार या अन्याय संक्रामक हो जाएगा और कहीं भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए, की गई सभी न्याय धूमिल हो जाएगी और बाकी सभी लोग यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि उन्हें कैसे उसी अन्याय के अधीन किया जा सकता है। इसके अलावा, यह आवश्यक है कि लोगों के साथ कोई भेदभाव न हो और व्यवस्था में कोई भेदभाव न हो। इसलिए, प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर नियंत्रण रखने के लिए रिट की धारणा को सामान्य कानून में शामिल किया गया था। इसलिए, भारतीय संविधान अनुच्छेद 226 और 32 द्वारा लोगों को सशक्त बनाता है जो लोगों के बुनियादी अधिकारों के रिट को निष्पादित (एक्जीक्यूट) करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

अनुच्छेद 226 के तहत किस प्रकार की रिट दी जा सकती हैं? 

अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित सामान्य प्रकार की रिटें जारी की जा सकती हैं:

बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेधाज्ञा , अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण लेख।

क्या अनुच्छेद 226 का प्रयोग निजी व्यक्तियों के विरुद्ध किया जा सकता है? 

किसी भी मामले में, अनुच्छेद 226 आम तौर पर मुख्य सार्वजनिक संस्थाओं के खिलाफ रिट जारी करने के मामलों से संबंधित है। हालांकि, यह अन्य निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध है जब तक वे सार्वजनिक कार्य/कार्यालय का प्रयोग कर रहे हों। 

अनुच्छेद 226 के निहितार्थ क्या है? 

अनुच्छेद 226 सार्वजनिक प्राधिकारियों द्वारा उल्लंघन के मामले में नागरिकों को उच्च न्यायालयों तक पहुँचने का सीधा और त्वरित तरीका प्रदान करके उनके अधिकारों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।

क्या अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने के लिए कोई सीमा अवधि है? 

संविधान उस समय सीमा के बारे में कुछ नहीं कहता है जिसके भीतर अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की जानी चाहिए। हालांकि, यदि दायर करने में अनुचित देरी होती है तो उच्च न्यायालय विशेष याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर सकते हैं।

संदर्भ