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सीआरपीसी की धारा 174 

यह लेख Amit Garg द्वारा लिखा गया है और Monesh Mahndiratta द्वारा अपडेट किया गया है। यह लेख आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174 की व्याख्या करता है। यह लेख इस धारा की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी), इसके उद्देश्य और धारा के तहत की जाने वाली रिपोर्ट के विवरण की व्याख्या करता है। इसके अलावा, यह धारा से संबंधित महत्वपूर्ण मामले भी प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

कल्पना कीजिए, एक स्वस्थ युवक, जिसे कोई बीमारी नहीं है और उसका कोई हानिकारक चिकित्सीय इतिहास नहीं है, अचानक से मर जाता है। क्या यह चौंकाने वाला होगा? क्या उनकी मौत पर कोई संदेह होगा?

जाहिर है, अगर कोई स्वस्थ और तंदुरुस्त व्यक्ति अचानक मर जाए तो उसकी मौत को लेकर संदेह तो होगा ही। इसमें संदेह रहेगा कि मौत अप्राकृतिक है या उसके साथ कोई अपराध किया गया है। अगर किसी व्यक्ति की अचानक मृत्यु हो जाए तो इन सभी सवालों का जवाब देना होगा। इस कारण से, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 पुलिस को अंवेषण (इन्वेस्टिगेशन) करने और मृतक की मृत्यु के कारण के बारे में रिपोर्ट बनाने का अधिकार देती है। यह संहिता की धारा 174 के तहत दिया गया है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 174 एक कानूनी प्रावधान है जो उस प्रक्रिया से संबंधित है जिसका, पुलिस और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में पालन करने की आवश्यकता होती है।

वर्तमान लेख संहिता की धारा 174 से संबंधित है और प्रावधान को विस्तार से बताता है। यह उन परिस्थितियों की व्याख्या करता है जिनके तहत अंवेषण रिपोर्ट बनाई जानी है, रिपोर्ट के विवरण क्या है, रिपोर्ट बनाने का अधिकार किसे है, उद्देश्य क्या है, और मामलो के माध्यम से प्रक्रिया में शामिल पेचीदगियां क्या हैं।

अप्राकृतिक मृत्यु क्या है

जब किसी व्यक्ति की मृत्यु प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण नहीं होती है, तो उस व्यक्ति को अप्राकृतिक मृत्यु का शिकार माना जाता है। अप्राकृतिक मौतों के कई कारण हैं: जैसे आकस्मिक मृत्यु, हत्याएं, जानवरों द्वारा हमला, सर्जरी की जटिलताएं, आत्महत्या और भी बहुत कुछ। आत्महत्या को जानबूझकर हत्या करना या स्वयं की मृत्यु का कारण बनना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। भारतीय कानून के तहत आत्महत्या की अनुमति नहीं है, और इसलिए यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करने का प्रयास करता है तो भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 309 सजा का प्रावधान करती है। यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है, तो उसे एक वर्ष की जेल होगी या अदालत के विवेक के अनुसार जुर्माना लगाया जाएगा, या दोनों होगा। आईपीसी की धारा 309 को हटाने की कई कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन कोशिशें नाकाम होती नजर आ रही हैं। हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023 में आत्महत्या करने के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है, लेकिन उक्त विधेयक की धारा 224 वैध शक्ति के प्रयोग को मजबूर करने या रोकने के लिए आत्महत्या के प्रयास को अपराध मानती है।

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु स्वाभाविक रूप से होती है, तो उसकी मृत्यु पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन अप्राकृतिक मृत्यु के मामले में, मृत्यु परिस्थितियों के कारण होती है जिसे स्पष्ट करने और जांच करने की आवश्यकता होती है। देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य और जीवन को सुरक्षित करना राज्य का दायित्व है। यदि कोई अपराध होता है तो वह अपराध राज्य के विरुद्ध होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु अप्राकृतिक परिस्थितियों के कारण होती है, तो राज्य पर मृत्यु के कारण की पहचान करने का दायित्व होता है और यदि मृत्यु के कारण के बारे में कोई संदेह है, तो राज्य को दोषियों को दंडित करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु के मामले में प्रक्रिया प्रदान करने के लिए, धारा 174 बनाई गई थी जो उस प्रक्रिया को निर्धारित करती है जिसका पुलिस अधिकारी और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को असामयिक मृत्यु के मामले में पालन करना चाहिए।

सीआरपीसी की धारा 174 के बारे में सब कुछ

धारा की प्रयोज्यता

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174(1) पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा सशक्त किसी अन्य पुलिस अधिकारी को मौत के स्पष्ट कारण के बारे में जानकारी प्राप्त होने पर जांच करने और अन्वीक्षा (इंक्वेस्ट) करने के लिए सशक्त कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचित करने का अधिकार निम्नलिखित परिस्थितियों में देती है:

  • किसी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली या,
  • किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मारा गया या,
  • किसी जानवर द्वारा मारा गया या,
  • मशीनरी या दुर्घटना से मारा गया या,
  • व्यक्ति की मृत्यु से यह उचित संदेह पैदा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध किया है।

सीआरपीसी की धारा 174 का उद्देश्य

इस धारा का प्राथमिक उद्देश्य मृतक की मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाना है, और इसलिए जांच का दायरा सीमित होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने पेद्दा नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1975) के मामले में माना कि धारा का दायरा सीमित है और केवल यह निर्धारित करने तक ही सीमित है कि मृत्यु अप्राकृतिक थी या मृतक की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी।

आगे रवि @ रविचंद्रन बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा राज्य प्रतिनिधि (2007) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संहिता की धारा 174 के तहत रिपोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृतक की मृत्यु प्रकृति में हत्या थी या नहीं। ब्रह्म स्वरूप बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2011) के एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174 के तहत बनाई गई एक अंवीक्षा रिपोर्ट का उद्देश्य मृतक की मृत्यु के स्पष्ट कारण और शरीर पर घावों के तरीके का अंवेषण करना है।

इस धारा के उद्देश्य को इस प्रकार संक्षेपित किया जा सकता है:

  • मृतक की मृत्यु के कारणों के संबंध में प्राथमिक अंवेषण करना।
  • मृत्यु का स्पष्ट कारण निर्धारित करने के लिए एक अंवीक्षा रिपोर्ट तैयार करना।
  • शरीर पर घाव, फ्रैक्चर, चोट या अन्य चोटों का विवरण।
  • यह बताने के लिए कि चोट पहुंचाने के लिए किस प्रकार हथियार का उपयोग किया गया था।

सीआरपीसी की धारा 174 की अनिवार्यताएँ

धारा 174 की अनिवार्यताएँ निम्नलिखित हैं:

  • किसी व्यक्ति की मृत्यु होनी चाहिए और इसकी सूचना पुलिस को दी जानी चाहिए।
  • मृत्यु के संबंध में निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाना चाहिए।
  • मजिस्ट्रेट को जांच करने में सक्षम होना चाहिए।
  • पुलिस को उस स्थान पर जाना चाहिए जहां शव मिला था।
  • अंवेषण पड़ोस के दो या दो से अधिक सम्मानित निवासियों की उपस्थिति में की जानी चाहिए।
  • अंवेषण मृत्यु के कारण और घाव, फ्रैक्चर, खरोंच आदि, यदि कोई हो, के विवरण तक ही सीमित होनी चाहिए।
  • इसका उल्लेख एक रिपोर्ट में किया जाना चाहिए, जिस पर अंवेषण करने वाले पुलिस अधिकारी और अंवेषण के दौरान उपस्थित अन्य व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए, जैसा कि संहिता की धारा 174(2) के तहत दिया गया है।
  • रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट या उपविभागीय मजिस्ट्रेट को भेजी जाएगी।

सीआरपीसी की धारा 174 के तहत अंवीक्षा रिपोर्ट

अप्राकृतिक मौतों के प्रयोजन के लिए, कार्यकारी मजिस्ट्रेट, स्टेशन हाउस अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य पुलिस अधिकारी की सूचना पर, एक अंवीक्षा रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें किसी की मौत के कारण के बारे में सूक्ष्म विवरण शामिल होंगे। एक अंवीक्षा रिपोर्ट एक जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, या कार्यकारी मजिस्ट्रेट जो विशेष रूप से राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में सशक्त है, द्वारा तब तैयार की जाती है जब मौतें अचानक और अस्पष्ट होती हैं।

रिपोर्ट का विवरण

जैसा कि ऊपर कहा गया है, पुलिस को घटना स्थल पर रहने वाले दो या दो से अधिक सम्मानित निवासियों की उपस्थिति में अंवेषण करने पर मृतक की मृत्यु के स्पष्ट कारण के बारे में एक रिपोर्ट बनानी होगी। रिपोर्ट के विवरण निम्नलिखित हैं:

  1. रिपोर्ट में निम्नलिखित जानकारी होनी चाहिए-
  • उस क्षेत्र की प्रकृति जहां शव पाया गया है।
  • मृत्यु का कारण;
  • वे हथियार जिनका प्रयोग चोट पहुँचाने के लिए किया जाता था;
  • चोट पहुँचाने का ढंग;
  • चोटों की संख्या और उनकी स्थिति; और
  • शरीर पर पाए गए घाव, चोट, जलन, फ्रैक्चर या चोट के किसी अन्य निशान का विवरण।

2. रिपोर्ट पर हस्ताक्षर होना चाहिए:

  • अंवेषण कर रहे पुलिस अधिकारी; और
  • अन्य व्यक्ति जिनकी उपस्थिति में अंवेषण की जाती है।

3. रिपोर्ट विधिवत जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत की जानी चाहिए।

अमर सिंह बनाम बलविंदर सिंह (2003), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि रिपोर्ट में अभियुक्त का नाम या घटना के तरीके का उल्लेख किया जाना चाहिए, बल्कि इसमें केवल मौत के स्पष्ट कारण और घावों के विवरण पर विचार किया जाना चाहिए।

धारा के अंतर्गत किन परिस्थितियों में पोस्टमार्टम किया जा सकता है

संहिता की धारा 174(3) कुछ परिस्थितियाँ प्रदान करती है जिसके तहत पुलिस अधिकारी शव को पोस्टमार्टम के लिए निकटतम सिविल सर्जन या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किसी अन्य योग्य चिकित्सा व्यक्ति को भेज सकता है। यह केवल तभी किया जाता है जब ऐसे चिकित्सकीय व्यक्ति से दूरी तय करते समय शरीर के सड़ने का कोई खतरा न हो या अन्यथा परीक्षण बेकार हो जाएगी। हालाँकि, यह चिकित्सा परीक्षण हर मामले में नहीं किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है जैसा कि नीचे दिया गया है:

  • यदि मामला किसी महिला की शादी के 7 साल के भीतर आत्महत्या से संबंधित है।
  • शादी के 7 साल के भीतर एक महिला की मृत्यु, एक उचित संदेह पैदा करती है कि मृत महिला के साथ किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध किया गया था।
  • मामला शादी के 7 साल के भीतर एक महिला की मौत से संबंधित है, लेकिन महिला के किसी रिश्तेदार ने पुलिस से इसका अनुरोध किया है।
  • परिस्थितियाँ मृत्यु के कारण के संबंध में उचित संदेह पैदा करती हैं।
  • किसी अन्य कारण से अंवेषण करने वाला पुलिस अधिकारी शव को परीक्षण के लिए भेजना उचित समझता है।

कौन अन्वीक्षा कर सकता है

संहिता की धारा 174(4) के अनुसार, निम्नलिखित लोगों को मृतक की मृत्यु के कारण के बारे में अंवीक्षा या पूछताछ करने का अधिकार है:

  • जिला मजिस्ट्रेट या,
  • उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या,
  • राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसा करने के लिए अधिकृत कोई भी कार्यकारी मजिस्ट्रेट।

सीआरपीसी की धारा 174 के तहत एक मजिस्ट्रेट के कर्तव्य

धारा 174 उन कर्तव्यों का वर्णन करती है जो एक मजिस्ट्रेट को अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों की पुलिस अधिकारी द्वारा सूचना मिलने पर करना चाहिए। पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु के संबंध में सूचना प्राप्त होने पर निकटतम मजिस्ट्रेट जिसे पूछताछ करने का अधिकार है, को सूचना देने के लिए बाध्य है:

  • एक मजिस्ट्रेट का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य अप्राकृतिक मृत्यु का कारण निर्धारित करना है। मजिस्ट्रेट किसी भी शरीर का परीक्षण करेगा और अंवेषण के बाद यह निष्कर्ष निकालेगा कि किस कारण से व्यक्ति की मृत्यु हुई। मृत्यु सीआरपीसी की धारा 174 (1) में उल्लिखित किसी भी कारण से हो सकती है।
  • चूंकि धारा 174 का दायरा बहुत सीमित है, इसलिए यह उन संदिग्ध परिस्थितियों तक ही सीमित है जो किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मौत का कारण बनीं और मजिस्ट्रेट के पास इस धारा के तहत उस व्यक्ति जो मौत का कारण बना, का पता लगाने की कोई गुंजाइश या अधिकार नहीं है। राधा मोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 174 मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाने तक सीमित है। इसलिए मजिस्ट्रेट धारा 174 के सीमित दायरे से बंधा हुआ है और उसे उस व्यक्ति का पता लगाने की ज़रूरत नहीं है जो मौत का कारण बना है या यह निर्धारित नहीं किया है कि मृत व्यक्ति पर किसने या किस तरीके से या किन परिस्थितियों में हमला किया, आदि।
  • ऐसे मामलों में जहां धारा 174(3) के तहत उल्लिखित मृतक की मृत्यु पर संदेह हो तो शव को पोस्टमॉर्टम के लिए सरकारी चिकित्सा अधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए।
  • अप्राकृतिक मौत के कारण का अंवेषण करते समय मजिस्ट्रेट को सभी गवाहों का परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं है। शकीला खादर बनाम नौशीर कामा (1975) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अंवीक्षा रिपोर्ट तैयार करने के उद्देश्य से, सभी गवाहों के परीक्षण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अंवीक्षा का उद्देश्य केवल मौत का कारण स्थापित करना है। यदि अंवीक्षा रिपोर्ट में किसी व्यक्ति के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है, तो इससे यह धारणा नहीं बनती है कि वह घटना का प्रत्यक्षदर्शी (आई विटनेस) नहीं था। एक अंवीक्षा रिपोर्ट का संबंध मौत का कारण स्थापित करने से है, और इसे स्थापित करने के लिए केवल सबूत सामने लाने की जरूरत है।
  • रिपोर्ट मजिस्ट्रेट द्वारा एक निर्धारित प्रारूप में तैयार की जानी चाहिए। लेकिन यदि कोई रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप में तैयार नहीं की गई है, तो रिपोर्ट को अस्वीकार्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
  • मजिस्ट्रेट को पड़ोस के दो या अधिक सम्मानित निवासियों की उपस्थिति में अंवेषण करना चाहिए। ऐसे मामले में जब मौके पर कोई निवासी नहीं है या जब कोई भी अंवेषण का गवाह बनने के लिए तैयार नहीं है, तो अंवीक्षा रिपोर्ट सम्मानित निवासियों की उपस्थिति के बिना तैयार की जा सकती है।
  • रिपोर्ट पूरी होने पर, मजिस्ट्रेट को ऐसी रिपोर्ट पर उस पुलिस अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर करवाना चाहिए जिसने उसे मौत की सूचना दी थी और अन्य व्यक्तियों से भी जो अंवेषण का हिस्सा थे। फिर रिपोर्ट को जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को भेजा जाना चाहिए।

दहेज हत्या के मामले में पुलिस अंवेषण 

वर्ष 1983 में दहेज की मांग के कारण हुई मौतों के बड़ी संख्या में मामले सामने आए थे। जो महिलाएं शादी के बाद मांग पूरी नहीं कर पाती थीं उनके साथ या तो क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता था या फिर उनकी हत्या कर दी जाती थी। दहेज हत्या की भड़काऊ स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, संसद ने दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1860 में धारा 304B शामिल की। आईपीसी की धारा 304B में कहा गया है कि यदि किसी महिला की मृत्यु ऐसी शारीरिक चोट के कारण या सामान्य परिस्थितियों के अलावा किसी अन्य कारण से होती है या यदि वह दहेज की मांग के लिए क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार होती है और यदि ऐसी मृत्यु या क्रूरता का कार्य शादी के सात साल के भीतर होता है फिर पति को या उसके रिश्तेदार को उसकी मृत्यु का कारण माना जाएगा। यह अनुमान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113B के तहत लगाया जाएगा।

सांसदों ने आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1983 द्वारा भारतीय दंड संहिता में धारा 498A भी शामिल की, जो किसी संपत्ति या मूल्यवान सुरक्षा के लिए किसी गैरकानूनी मांग के लिए किसी महिला पर पति या उसके रिश्तेदार द्वारा क्रूरता या ऐसी मांग को पूरा करने में उसकी या उससे संबंधित किसी व्यक्ति द्वारा विफलता के कारण होता है, जो उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर करती है या गंभीर चोट पहुंचाती है या उसकी जान के लिए खतरा बनती है, को दंडित करती है।

अप्राकतिक दहेज हत्या के मामले में पुलिस अधिकारी के कर्तव्य

दहेज हत्या की बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए 1983 के आपराधिक संशोधन अधिनियम ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 में धारा 174(3) को शामिल किया। इस उपधारा में कहा गया है कि अगर किसी महिला की मौत शादी के सात साल के भीतर हुई है और अगर महिला की मौत पर कोई उचित संदेह है कि इस संबंध में आईपीसी की धारा 304B और 498A के तहत अपराध किया गया है, तो पुलिस अधिकारी को ऐसे नियमों के अधीन रहना चाहिए जो राज्य सरकार इस संबंध में निर्धारित कर सकती है, मृत महिला के किसी भी रिश्तेदार द्वारा किए गए अनुरोध पर शव को निकटतम सिविल सर्जन के पास चिकित्सा परीक्षण के लिए भेजना चाहिए।

पुलिस को इस विवेक का प्रयोग करने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा:

  • महिला की मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर हो जाती है।
  • इस संबंध में महिला के किसी रिश्तेदार द्वारा अनुरोध किया जाता है।

धारा के तहत चिकित्सा परीक्षण केवल तभी किया जा सकता है जब ऐसे चिकित्सा व्यक्ति तक पहुंचने की दूरी तय करते समय शरीर के सड़ने का कोई खतरा न हो, या अन्यथा परीक्षण बेकार हो।

आत्महत्या के मामले में पुलिस का अंवेषण

आत्महत्या से सम्बंधित कानूनी प्रावधान

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के अधिनियमन ने आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। उक्त अधिनियम की धारा 115 आईपीसी की धारा 309 के प्रावधान को खत्म कर देती है; आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए। इसलिए, अब किसी व्यक्ति को आत्महत्या का प्रयास करने के लिए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और न ही कोई एफआईआर दर्ज की जाएगी। आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में एफआईआर दर्ज करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यदि ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्ति ने आत्महत्या की है, तो सबसे पहले यह चिकित्सा परीक्षक का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति की मृत्यु का कारण निर्धारित करे चाहे वह प्राकृतिक, आकस्मिक, मानव वध या आत्मघाती के कारण हुई हो। यह निर्धारित होने के बाद कि मृत्यु आत्महत्या के कारण हुई है, पुलिस अधिकारी को कदम उठाने और आवश्यक कार्य करने की आवश्यकता है। वह मामले का अंवेषण कर आत्महत्या के कारणों का पता लगाएंगे। हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023 भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के विपरीत आत्महत्या करने के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं करता है।

सीआरपीसी की धारा 174 के तहत अंवेषण और रिपोर्ट दी जाएगी

किसी भी अपराध में अंवेषण अहम भूमिका निभाता है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद अंवेषण शुरू होता है। हालाँकि, धारा 174 के तहत अंवेषण अलग है। यह धारा पुलिस अधिकारी को किसी भी व्यक्ति की मौत के संबंध में कोई सूचना मिलने पर अंवेषण करने की शक्ति देती है, जिससे मौत के बारे में संदेह पैदा होता है या व्यक्ति ने आत्महत्या की है। राज्य सरकार द्वारा पुलिस को किसी व्यक्ति की मृत्यु के स्पष्ट कारण के संबंध में पूछताछ करने और अंवेषण करने में सक्षम निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचित करने का अधिकार दिया गया है। उस स्थान से निम्नलिखित जानकारी एकत्र की जानी है जहां से शव बरामद किया गया है:

  • शव की हालत।
  • घावों, चोटों, जलने या अन्य चोटों की संख्या, उनके आकार, स्थिति, लंबाई और चौड़ाई के साथ।
  • फ्रैक्चर की प्रकृति, यदि कोई हो।
  • शरीर पर या उसके आस-पास पाए जाने वाले सामान।
  • पहचान चिह्न जिसमें शामिल हैं:
  1. पुरुष के मामले में, ऊंचाई, बाल, मूंछें आदि के साथ शरीर का उचित वर्णन किया जाना चाहिए।
  2. शरीर की विशेषताएं।
  3. जूते के निशान।
  4. कोई निशान, जन्मचिह्न, तिल आदि उनकी स्थिति के साथ।
  • कोई अन्य जानकारी जो मृतक की पहचान करने में मदद कर सके।

आत्महत्या के मामले में पुलिस अधिकारी के कर्तव्य

आत्महत्या के कारण मौत के तरीके के बारे में सबूत इकट्ठा करना पुलिस अधिकारी का कर्तव्य है। साक्ष्य भौतिक, दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य हो सकता है। भौतिक साक्ष्य में उंगलियों के निशान, रक्त आदि शामिल हैं। दस्तावेजी साक्ष्य में गवाही या कागज पर मौजूद रिकॉर्ड शामिल हैं। परिस्थितिजन्य साक्ष्य में तथ्यों की कालानुक्रमिक (क्रोनोलॉजिकल) प्रस्तुति शामिल होती है।

यदि अंवेषण में कहा गया है कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या के लिए उकसाया है, तो ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी, और उसे भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 306 के तहत गिरफ्तार किया जाएगाय। पुलिस एफआईआर दर्ज करने में अनिच्छुक है, तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में एक निजी शिकायत की जा सकती है, और मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और अंवेषण करने का निर्देश दे सकता है।

सीआरपीसी की धारा 174 के तहत बनाई गई रिपोर्ट का साक्ष्य मूल्य

गवाहों की सत्यता की जांच करना

इस समय, जहां हम जानते हैं कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174 के तहत बनाई गई रिपोर्ट केवल मृतक की मृत्यु का स्पष्ट कारण निर्धारित करने के लिए है, इसके साक्ष्य मूल्य और क्या अदालत में इसका सबूत के तौर पर उपयोग किया जा सकता है, को समझना महत्वपूर्ण है। कुलदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य (1992) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा के तहत की गई रिपोर्ट को सबूत के रूप में नहीं माना जा सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल गवाह की सत्यता का परीक्षण करने के लिए किया जा सकता है। शकीला खादर बनाम नौशेर कामा (1975) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अन्वीक्षा के तहत सभी गवाहों का परीक्षण नहीं की जा सकता, क्योंकि धारा का उद्देश्य केवल मौत के कारण का पता लगाना है।

पुष्ट करना या खण्डन करना

रजाक राम बनाम जे.एस. चौहान (1975), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 174 के तहत दिए गए बयान या रिपोर्ट को ठोस सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, लेकिन विचारण के दौरान किसी व्यक्ति के बयान की पुष्टि या खंडन करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मधु बनाम कर्नाटक राज्य (2013), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 174 के तहत बनाई गई रिपोर्ट को ठोस सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। बिमला देवी बनाम राजेश सिंह (2016) के मामले में भी यही दोहराया गया था। इसके अलावा, योगेश सिंह बनाम महावीर सिंह (2017), के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अन्वीक्षा, अंवेषण का एक हिस्सा थी। इसे साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता है, लेकिन विचारण के दौरान गवाह की सत्यता का परीक्षण करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।

शेओ दयाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2007) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि अन्वीक्षा रिपोर्ट के तहत किसी गवाह का बयान दर्ज करने की कोई आवश्यकता नहीं है। एकमात्र उद्देश्य मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाना है और यह पता लगाना है कि क्या यह आकस्मिक, मानव वध या आत्मघाती थी। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अन्वीक्षा रिपोर्ट में अभियुक्त के नाम का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है। राम संजीवन सिंह बनाम बिहार राज्य (1996) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि अभियुक्तों या हमलावरों के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है तो रिपोर्ट में कोई अनियमितता नहीं है।

सीआरपीसी की धारा 174 से संबंधित अन्य धाराएं

सीआरपीसी की धारा 175 

धारा 174 के तहत अंवेषण के प्रयोजन के लिए, पुलिस अधिकारी के पास संहिता की धारा 175(1) के तहत लिखित आदेश द्वारा किसी भी व्यक्ति को बुलाने की शक्ति है। अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति को भी बुला सकता है जो मामले के तथ्यों से परिचित हो, और बुलाए गए लोगों को उन सभी सवालों के जवाब देने की आवश्यकता होती है जो उन्हें किसी अपराध में उजागर कर सकते हैं।

धारा में यह भी प्रावधान है कि यदि मामला जिस पर धारा 170 लागू है, किसी संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध का खुलासा नहीं करता है, तो पुलिस अधिकारियों द्वारा बुलाए गए लोगों को अदालत में आने की आवश्यकता नहीं है। संहिता की धारा 170 ऐसे मामलों से संबंधित है जिन्हें मजिस्ट्रेट जो पर्याप्त सबूत होने पर पुलिस रिपोर्ट पर अपना संज्ञान लेने का अधिकार रखता है के पास भेजा जाना चाहिए।

सीआरपीसी की धारा 176 

धारा 176 मजिस्ट्रेट को संहिता की धारा 174 में पुलिस अधिकारी द्वारा की गई अंवेषण के अलावा जांच करने का अधिकार देती है। इसके अलावा, जब भी कोई व्यक्ति मर जाता है या गायब हो जाता है या पुलिस हिरासत में या मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा अधिकृत किसी अन्य हिरासत में किसी महिला के खिलाफ बलात्कार का अपराध करता है, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को अपराध के बारे में जांच करने का अधिकार होता है।

मजिस्ट्रेट को साक्ष्य रिकॉर्ड करने की भी आवश्यकता होती है और वह मौत का कारण पता लगाने के लिए शव के पोस्टमॉर्टम का आदेश भी दे सकता है। इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या कार्यकारी मजिस्ट्रेट 24 घंटे के भीतर शव को निकटतम सिविल सर्जन को देंगे। उसका यह भी कर्तव्य है कि वह मृतक के रिश्तेदारों को सूचित करे ताकि वे ऐसी जांच में उपस्थित हो सकें।

हाल ही के मामले

राधा मोहन सिंह @ लाल साहब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

मामले के तथ्य

इस मामले में अभियुक्तों ने एक व्यक्ति पर हमला किया था और मृतक का भाई इस घटना का गवाह था। अभियुक्तों द्वारा मृतक से अनुरोध किया गया था कि वह उनके खिलाफ कोई बयान न दे, जिस पर उसने कहा कि उसका भाई गवाह है और निश्चित रूप से उनके खिलाफ बयान देगा। इससे नाराज होकर अभियुक्त ने उसे धमकी दी। जब दोनों भाई अपने गांव में होली मनाकर लौट रहे थे तो अभियुक्तों ने उन पर हमला कर दिया, जिससे उनमें से एक की मौत हो गई।

मृतक के भाई ने एफआईआर दर्ज करायी, जिसके बाद अंवेषण की गयी। अभियुक्तों को सत्र न्यायालय के समक्ष पेश किया गया और अपराध के लिए सजा दी गई। सत्र न्यायालय के फैसले से व्यथित होकर, खंडपीठ में अपील की गई, जहां इसे खारिज कर दिया गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एक और अपील दायर की गई।

मामले में शामिल मुद्दा 

क्या अपील की अनुमति दी जाएगी और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया जाएगा?

न्यायालय का फैसला

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संहिता की धारा 174 के दायरे और उद्देश्य के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। यह माना गया कि प्रावधान की भाषा सरल और अस्पष्टता से मुक्त है। धारा के तहत अंवेषण का दायरा सीमित है। यह केवल मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाने के लिए है। यह केवल यह निर्धारित करने तक ही सीमित है कि मृत्यु आकस्मिक, मानव वध या आत्मघाती थी और इस कारण से, मामले के तथ्यों से परिचित लोगों को संहिता की धारा 175 के तहत बुलाया जाता है।

अदालत ने यह भी माना कि संहिता की धारा 174 के तहत बनाई गई रिपोर्ट में अभियुक्त का नाम, जिसने पीड़ित पर हमला किया आदि जैसे विवरण शामिल करना आवश्यक नहीं है। वर्तमान मामले के संबंध में, अदालत ने माना कि अंवेषण से पता चला कि मृतक की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उसे अभियुक्तों द्वारा चाकू मारा गया था और हमला किया गया था, और इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

मनोज कुमार शर्मा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2016)

मामले के तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता, जो अभियुक्त भी था, भारतीय वायु सेना में कार्यरत था, जब उसने मृतिका से शादी की, जिसने अपने वैवाहिक घर में आत्महत्या कर ली थी। पुलिस ने अंवेषण के बाद एक रिपोर्ट पेश की जिसमें कहा गया कि मृतक की मौत के बारे में कोई संदेह नहीं था जिसे मजिस्ट्रेट ने स्वीकार कर लिया और इसलिए, मामला बंद कर दिया गया।

हालाँकि, पाँच साल बाद, मृतक के भाई द्वारा अपीलकर्ता और उसके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इससे व्यथित होकर, अपीलकर्ता द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र को रद्द करने के लिए एक रिट याचिका दायर की गई थी। हालाँकि, रिट याचिका खारिज कर दी गई और इस प्रकार, अपील सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गई।

मामले में शामिल मुद्दा 

क्या अपील की अनुमति दी जाएगी?

न्यायालय का फैसला

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 और 174 के तहत अंवेषण के मुद्दे से निपटते समय, सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित टिप्पणियां कीं। न्यायालय ने कहा कि धारा 174 के तहत अंवेषण का दायरा धारा 154 की तुलना में सीमित है। अंवेषण का एकमात्र उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु अप्राकृतिक रूप से हुई या संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, अर्थात मृत्यु का स्पष्ट कारण। मुख्य संदिग्ध कौन है, अभियुक्त आदि जैसे प्रश्न इसके दायरे से बाहर हैं। यह धारा केवल वहीं लागू होती है जहां अंवेषण रिपोर्ट बनाई जा सकती है और यदि शव नहीं पाया जा सकता है, तो ऐसी कोई अंवेषण नहीं हो सकती है। दूसरी ओर, जैसे ही सीआरपीसी की धारा 154 के तहत किसी संज्ञेय अपराध के संबंध में एफआईआर दर्ज की जाती है, पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी की धारा 173 के तहत अंवेषण और अंतिम रिपोर्ट या आरोप पत्र के गठन के साथ आगे बढ़ना होता है। अदालत ने माना कि धारा 174 के तहत की गई अंवेषण आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 के तहत पूरी तरह से अलग है।

अदालत ने माना कि सबूतों से किसी अपराध के घटित होने का खुलासा नहीं हुआ, और इसलिए अपीलकर्ता के खिलाफ कोई मामला नहीं बनाया जा सकता। यह भी देखा गया कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ उसकी मृत्यु के पांच साल बाद मृतक के भाई द्वारा स्थापित दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का पता चलता है, और वह भी गुमनाम पत्रों के आधार पर। अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप अस्पष्ट हैं और इसलिए, एफआईआर को रद्द किया जाना चाहिए।

मनोहारी बनाम जिला पुलिस अधीक्षक और अन्य (2018)

मामले के तथ्य

इस मामले में, उन मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में एक सामान्य मुद्दे पर विचार किया गया जहां आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174 के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है। यह मुद्दा विभिन्न आपराधिक मामलों में उठाया गया था:

  • एक आपराधिक मामले में, याचिकाकर्ता को अपने बेटे की मृत्यु के बारे में गहरा संदेह था। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि शरीर में एक विशेष जहर फैला हुआ था और इसलिए, पुलिस से अंवेषण कराना चाहती थी। हालाँकि, पुलिस ने मजिस्ट्रेट के पास एक समापन रिपोर्ट दायर की, जिसे याचिकाकर्ता ने चुनौती दी।
  • एक अन्य मामले में, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसकी बेटी, जो 9 महीने की गर्भवती थी, दहेज के कारण उसके दामाद द्वारा उत्पीड़न के कारण मर गई। हालाँकि, जाँच ठीक से नहीं की गई और 2016 से लंबित है।
  • एक अन्य याचिका में शादी के 8 महीने के भीतर लड़की की मौत का खुलासा हुआ और इसकी सूचना उसके माता-पिता ने क्षेत्र के पंचायत अध्यक्ष को दी, जो उस स्थान पर गए जहां शव मिला था। पता चला कि मृतक के बाएं हाथ की कलाई टूटी हुई थी। एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन पुलिस ने मजिस्ट्रेट के पास समापन रिपोर्ट दायर कर दी।

मामले में शामिल मुद्दा 

क्या उपरोक्त मामलों के अंवेषण में पुलिस द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया सही है?

न्यायालय का निर्णय

इस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के पास संहिता की धारा 174 के तहत मामलों में अंवेषण करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में कुछ दिशानिर्देश हैं:

  • धारा 174 के तहत किसी अपराध के घटित होने के संबंध में कोई भी सूचना प्राप्त होने पर, पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी होती है और फिर घटना स्थल पर जाकर अंवीक्षा रिपोर्ट बनानी होती है।
  • यदि प्राप्त जानकारी से पता चलता है कि पीड़ित मरा नहीं है बल्कि गंभीर हालत में पड़ा है, तो पुलिस को पीड़ित को बचाने के लिए अपराध स्थल पर जाना चाहिए और यदि उसके बाद पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो एक अंवीक्षा रिपोर्ट बनाई जानी चाहिए। इस रिपोर्ट में शरीर पर पाए गए घावों, फ्रैक्चर अन्य चोटों और ऐसी चोटें पहुंचाने के लिए किस हथियार का इस्तेमाल किया गया था, का विवरण होना चाहिए।
  • पुलिस को उस स्थान का कच्चा नक्शा भी तैयार करना होगा जहां शव मिला था।
  • यह अंवीक्षा रिपोर्ट और कच्चा नक्शा उस क्षेत्र में जहां शव मिला था, में रहने वाले दो या दो से अधिक सम्मानित लोगों की उपस्थिति में बनाया जाना चाहिए।
  • ऐसी रिपोर्ट बनाने का उद्देश्य केवल मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाना है और क्या मृत्यु अप्राकृतिक थी। रिपोर्ट में अभियुक्तों का विवरण, पीड़ित के साथ मारपीट के तरीके आदि को शामिल करना आवश्यक नहीं है। यह जानकारी अंवीक्षा कार्यवाही का हिस्सा नहीं है, बल्कि पुलिस द्वारा की जाने वाली अंवेषण का हिस्सा है।
  • रिपोर्ट बनते ही उसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सौंपना होगा।
  • अंवेषण के निष्कर्ष पर, पुलिस को संहिता की धारा 173(2) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट को एक अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
  • यदि पुलिस समापन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आगे बढ़ती है, तो इसकी सूचना पीड़ित परिवार को एक नोटिस के माध्यम से दी जानी चाहिए।

न्यायालय ने आगे कहा कि उपरोक्त मामलों में की गई अंवेषण संहिता में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन है। न्यायालय ने आदेश दिया कि उपरोक्त सभी मामलों में इस न्यायालय द्वारा जारी प्रक्रिया और दिशानिर्देशों के अनुसार उचित अंवेषण की जानी चाहिए।

के. कृष्णन बनाम केरल राज्य और अन्य (2023)

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपनी बेटी की मौत की प्रभावी अंवेषण की मांग की, जिसकी शादी 2017 में हुई थी और 2021 में अपने बेडरूम में लटकी हुई पाई गई थी। साथ ही, अपनी मृत्यु से पहले, उसने दहेज और अन्य वैवाहिक मुद्दों के लिए अपने ससुराल वालों और पति द्वारा उत्पीड़न के बारे में शिकायत की थी। हालाँकि, जब याचिकाकर्ता ने पुलिस से पूछताछ की, तो उसे पता चला कि वे मामले को बंद करने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए उसने मामले की प्रभावी अंवेषण की मांग की।

मामले में शामिल मुद्दा 

क्या प्रभावी अंवेषण का अनुरोध स्वीकार किया जाएगा या नहीं?

न्यायालय का फैसला

इस मामले में केरल उच्च न्यायालय ने पाया कि संहिता की धारा 174 के तहत अंवेषण का दायरा केवल मृतक की मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाने तक ही सीमित है। न्यायालय ने माना कि जिन मामलों में अंवेषण के बाद कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आता है, वहां कार्यकारी मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह मृतक के रिश्तेदारों को संहिता की धारा 174 के तहत की गई अंवेषण के परिणामों के बारे में सूचित करे। इसके अलावा, यदि कार्यकारी मजिस्ट्रेट को किसी संज्ञेय अपराध से संबंधित कोई जानकारी मिलती है, तो उसे तुरंत न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचित करना चाहिए, जो उसके अनुसार मामले को आगे बढ़ाएगा। मौजूदा मामले की अंवेषण क्राइम ब्रांच की एक विशेष टीम को सौंपी गई थी।

निष्कर्ष

संक्षेप में, धारा 174 का दायरा बहुत सीमित है; यह उस प्रक्रिया को निर्धारित करती है जिसका एक पुलिस अधिकारी को किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु पर पालन करना चाहिए। जब एक अज्ञात शव पाया जाता है, तो पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा जो व्यक्ति की मृत्यु के कारण की अंवेषण करेगा और ऐसी अंवेषण पर, एक अंवीक्षा रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें मजिस्ट्रेट को अंवेषण के दौरान मिले विवरण शामिल होंगे। यह धारा उन आवश्यकताओं को भी निर्धारित करती है जिन्हें मजिस्ट्रेट को एक अंवीक्षा रिपोर्ट तैयार करने के लिए पूरा करना होगा जो व्यक्ति की मृत्यु का कारण निर्दिष्ट करेगी। यह धारा अभियुक्त का पता लगाने की प्रक्रिया निर्धारित नहीं करती है। यह धारा दहेज हत्या के मामले में एक पुलिस अधिकारी की ओर से विशेष निष्पादन का प्रावधान करती है, यानी दहेज की मांग के लिए शादी के सात साल के भीतर एक महिला की मौत। इस प्रकार, यह धारा अप्राकृतिक मृत्यु या किसी अन्य कारण जिसे पुलिस अधिकारी उचित समझता है, तक ही सीमित है।

संहिता की धारा 174, हालांकि दायरे में सीमित है, पुलिस अधिकारी को मामले की स्पष्ट गहराई का पता लगाने के लिए प्राथमिक अंवेषण करने का अधिकार देती है और यह भी पता लगाती है कि क्या व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना, आत्महत्या या मृतक के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध से हुई थी। यदि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो इससे अंवेषण में मदद मिलती है। हालाँकि, संहिता की धारा 174 और धारा 154 के तहत की गई अंवेषण में अंतर है। पुलिस को एक अंवीक्षा रिपोर्ट बनाने की भी आवश्यकता होती है जिसमें मौत का स्पष्ट कारण, चोटों और घावों का विवरण और ऐसी चोटें पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार जैसे विवरण शामिल होते हैं।

अंवेषण और रिपोर्ट उस क्षेत्र जहां शव मिला था, में रहने वाले दो या दो से अधिक लोगों की उपस्थिति में की जानी चाहिए। इसके अलावा, संहिता की धारा 175 पुलिस को उन लोगों को बुलाने की शक्ति देती है जिन्हें मामले के तथ्यों के बारे में कोई जानकारी है। दूसरी ओर, धारा 176, मजिस्ट्रेट को संहिता की धारा 174 में पुलिस अधिकारी द्वारा की गई अंवेषण के अलावा जांच करने का अधिकार देती है। जहां किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई अपराध तब किया जाता है जब वह पुलिस हिरासत में या मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत किसी अन्य हिरासत में होता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट जांच कर सकते हैं। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि यह धारा मामले में निष्पक्ष अंवेषण के आपराधिक कानून के उद्देश्य को कायम रखती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

एक अंवीक्षा रिपोर्ट क्या है?

यह मौत के स्पष्ट कारण का पता लगाने, कि क्या यह अप्राकृतिक थी या मृतक की मौत के बारे में कोई संदेह है, के लिए पुलिस द्वारा संहिता की धारा 174 के तहत तैयार की गई एक रिपोर्ट है।

अंवीक्षा रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या अंतर है?

अंवीक्षा रिपोर्ट मृत्यु के स्पष्ट कारण का पता लगाने के लिए बनाई जाती है और केवल यह निर्धारित करने के लिए बनाई जाती है कि मृत्यु आकस्मिक थी, मानव वध थी या आत्मघाती थी। दूसरी ओर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट सावधानीपूर्वक चिकित्सीय परीक्षण के बाद तैयार की जाती है, जिसमें मौत के वास्तविक कारण जैसे जहर, चोटों का प्रभाव आदि का पता चलता है।

सीआरपीसी की धारा 174 के तहत अंवीक्षा रिपोर्ट पर किस-किस को हस्ताक्षर करना होगा?

इसे अंवेषण करने वाले पुलिस अधिकारी और अंवेषण के दौरान उपस्थित लोगों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए, जैसा कि संहिता की धारा 174(2) के तहत दिया गया है।

सीआरपीसी की धारा 154 और धारा 174 के बीच क्या अंतर है?

सीआरपीसी की धारा 154 संज्ञेय अपराधों के मामले में एफआईआर दर्ज करने से संबंधित है, जिसकी अंवेषण पुलिस द्वारा की जाती है। दूसरी ओर धारा 174 आत्महत्या आदि के मामले में पुलिस जांच और रिपोर्ट प्रस्तुत करने से संबंधित है। धारा 174 का दायरा सीमित है और यह केवल यह बताने से संबंधित है कि क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है या यह एक अप्राकृतिक मौत थी, साथ ही मृत्यु के स्पष्ट कारण के बारे में भी बताती है।

संदर्भ

 

क्या शिक्षा मौलिक अधिकार है

यह लेख Shreya Singh द्वारा लिखा गया है। इसमें शिक्षा के अधिकार को हम सभी के लिए मौलिक अधिकार बनने तक की यात्रा पर विस्तार से चर्चा करने का प्रयास किया गया है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है।

परिचय

“शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं” – नेल्सन मंडेल

मौलिक अधिकार,भारत के संविधान, 1949 में निहित हैं जिसमें अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 शामिल हैं। इसे आमतौर पर भारत के मैग्ना कार्टा के रूप में जाना जाता है। साथ ही, इन्हें सबसे महत्वपूर्ण रूप से मौलिक माना जाता है क्योंकि ये किसी व्यक्ति के भौतिक, बौद्धिक, नैतिक और साथ ही आध्यात्मिक विकास और प्रगति के समग्र सुधार के लिए आवश्यक हित में हैं। समय बीतने के साथ, शिक्षा, इसकी महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक होने के नाते, एक मौलिक अधिकार के रूप में अपना उचित स्थान पा चुकी है।

प्रारंभ में, शिक्षा का अधिकार भारत के सर्वोच्च कानून, यानी भारत के संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल नहीं था, लेकिन यह उसी कानून के अनुच्छेद 45 के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के रूप में हमेशा से मौजूद था।

उपर्युक्त निर्देशक सिद्धांत अनिवार्य रूप से राज्य को देश के सर्वोच्च कानून की शुरुआत से 10 साल की अवधि के भीतर, 14 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क  और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करने के लिए प्रदान करता है। यह प्रयास केवल प्राथमिक शिक्षा तक ही सीमित नहीं है, इसका विस्तार हर बच्चे की प्रारंभिक बचपन की देखभाल तक है। इसके साथ ही, यह व्यावसायिक और सामान्य शिक्षा दोनों के संबंध में माध्यमिक स्कूली शिक्षा को भी बढ़ावा देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राज्य पर न केवल अपने इरादों और सद्भावना को आगे बढ़ाने का कर्तव्य रखता है, बल्कि संविधान के तहत प्रदान किए गए शिक्षा के मौलिक अधिकार को बनाए रखने के लिए नीतियों और संसाधनों को भी सामने रखता है।

शिक्षा को बढ़ावा देने में भारत की भूमिका का एक संक्षिप्त इतिहास

भारत में शिक्षा ने वैदिक काल से लेकर आज के प्रौद्योगिक युग तक एक लंबा सफर तय किया है। हालाँकि, चाहे जो भी हो, शिक्षा का महत्व बरकरार है। आखिरकार, भारत को एहसास हुआ कि यह शिक्षा ही है जो देश के भविष्य को आकार देने में मदद करेगी और युवाओं को उनके सशक्तिकरण के लिए सबसे अधिक लक्षित किया जाएगा, जो सकारात्मक और उल्लेखनीय परिवर्तन लाने की क्षमता प्राप्त करेंगे। एक बार जब शिक्षा के महत्व को बहुसंख्यकों ने पहचान लिया, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा गया। आज तक, शिक्षा के प्रति प्रावधानों, नीतियों, दिशानिर्देशों, योजनाओं या कार्यक्रमों में प्रत्येक बदलाव के पीछे अंतर्निहित लक्ष्य केवल और केवल एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली और अच्छे अवसरों का निर्माण है ताकि इसके परिणामस्वरूप युवाओं का विकास हो सके। इस सुधार से देश को बेहतर बनाने और इसके भविष्य को बेहतर आकार देने में भी मदद मिलेगी।

संवैधानिक युग के पहले 

पीढ़ियों को मिलने वाले ज्ञान का बड़ा हिस्सा वैदिक साक्षरता से प्राप्त होता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, यह गुरुकुल प्रणाली थी जो ज्ञान प्रदान करने का सबसे प्रमुख तरीका था क्योंकि छात्र और शिक्षक दोनों एक साथ रहते थे। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक सब कुछ गुरुकुल में सबसे अनुशासित तरीके से सिखाया जाता था। हालाँकि, हर किसी को ऐसी शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनने का विशेषाधिकार नहीं था क्योंकि उच्च जातियाँ, जैसे राजघराने या ब्राह्मण ही इसका लाभ उठा सकते थे।

इसके बाद मुगल काल आया जिसने शिक्षा पर इस्लामी प्रभाव डाला और फिर ब्रिटिश राज काल आया जिसने कई ईसाई विद्यालय और महाविद्यालय खोले।

ब्रिटिश राज के बाद जब औपनिवेशिक (कोलोनियल) व्यवस्था अस्तित्व में आई, तो अंग्रेजी भाषा का उपयोग बढ़ गया और अब यह दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली, स्वीकृत और अपेक्षित भाषा भी है। इस अवधि में, 20वीं शताब्दी के दौरान उच्च शिक्षा ने अपनी जड़ें और आधार तैयार किया क्योंकि इसने शिक्षा प्रणाली को बदल दिया। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के अलावा, भारत में सरकारी विद्यालयों ने भी शिक्षा को अपनाया क्योंकि वे किसी भी पृष्ठभूमि के छात्रों को शिक्षा प्रदान करते थे, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण। फिर बाद में, निजी संस्थान भी अस्तित्व में आए जो आवश्यक और संपूर्ण सुविधाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते थे।

अगर हम पीछे मुड़कर देखें कि भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनने के संदर्भ में कहाँ से शुरू किया गया था हालाँकि, वैदिक काल में, पत्तों का उपयोग किया जाता था, जिन पर ज्ञान अवतरित (इनकार्नेटेड ) होता था। हालाँकि, इसे एक समान प्रथा बनाने के लिए, 1813 का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश भारत के शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अधिनियम साबित हुआ क्योंकि यह भारत में शिक्षा के अधिकार की पहली विधायी शुरुआत थी जो जनता की नज़रों तक पहुंची।

  • भारत में शिक्षा के हित में ब्रिटिश सरकार की पहली घोषणा लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा पारित मार्च 1835 का प्रस्ताव था जिसने भारत में शिक्षा की आवश्यकता को मान्यता दी और साथ ही पश्चिमी कला और विज्ञान को बढ़ावा दिया। इसमें यह भी कहा गया कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होगा।
  • इसके अलावा, जैसा कि ब्रिटिश शासकों ने प्रशासन और वाणिज्य (कॉमर्स) को चलाने के लिए शिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता को पहचाना, उन्होंने डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन सिद्धांत की नीति अपनाई, जिसका उद्देश्य लोगों को प्रशासन में नौकरियों के लिए कुशल बनने के लिए शिक्षित करना था।
  • फिर, ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर अधिनियम की समीक्षा करने और भारत के लिए उपयुक्त शैक्षिक नीति का सुझाव देने के लिए एक विशेष संसदीय समिति नियुक्त की। वुड का डिस्पैच नीति दस्तावेज तैयार किया गया और इसका नाम भारतीय नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष चार्ल्स वुड के नाम पर रखा गया। इसका उद्देश्य न केवल नौकरी की उपयुक्तता के लिए शिक्षा प्रदान करना था, बल्कि व्यक्ति के नैतिक चरित्र को बढ़ाने के साथ-साथ उनके लिए नौकरों के रूप में उपयुक्त होना भी था। इस नीति का परिणाम 1857 का विश्वविद्यालय अधिनियम था जिसे कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए पारित किया गया था।
  • भारतीय शिक्षा के इस विक्टोरियन युग में, शिक्षा में रुचि की रोशनी लंदन से कलकत्ता की ओर स्थानांतरित हो गई, लेकिन भारत की शिक्षा में संसदीय रुचि न्यूनतम हो गई।
  • लॉर्ड रिप्पन ने 1882 में भारत सरकार के प्रस्ताव द्वारा विलियम हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग की नियुक्ति की। आयोग ने 10 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जो वुड की नीति का एक विस्तृत और संशोधित संस्करण था। आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसरण में सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा और हाई स्कूल शिक्षा को विकसित करने के कारणों पर अनिवार्य रूप से विचार किया गया।

संवैधानिक युग के बाद 

भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत की शिक्षा प्रणाली में समस्याओं की समीक्षा करने और लोगों की बदलती जरूरतों को पूरा करने और विकसित होते समाजों के हित में उन्हें प्रभावी और कुशल बनाने के लिए सिफारिशें करने के लिए कई समितियों और आयोगों की स्थापना की गई। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण किया कि छात्र अपनी उच्च शिक्षा के लिए विदेश में शिक्षा पर निर्भर न रहें। सरकारी विद्यालयों से लेकर आईआईटी और आईआईएम तक सभी आवश्यक संस्थान बच्चों की उचित शिक्षा के लिए बनाए गए।

शैक्षिक अधिकारों पर समितियाँ और आयोग

  • राशकृष्णन समिति

1948 में, राधाकृष्णन आयोग की स्थापना की गई जिसे स्वतंत्र भारत में उच्च शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने में ऐतिहासिक माना गया, इसकी अध्यक्षता डॉ. श्री एस राधाकृष्णन ने की। इसकी सबसे महत्वपूर्ण सिफ़ारिश यह थी कि शिक्षा का उद्देश्य किसी व्यक्ति की क्षमता को बढ़ावा देना और उसे लोकतांत्रिक दृष्टिकोण और स्वयं दोनों के विकास के लिए प्रशिक्षित (ट्रेंड) करना होना चाहिए। आयोग ने भारत में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएट) शिक्षा के साथ-साथ ज्ञान की वृद्धि के लिए प्रशिक्षण और अनुसंधान (रिसर्च) के महत्व पर बहुत जोर दिया। इसने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत में शिक्षा का माध्यम सिर्फ एक अंग्रेजी भाषा का सीधा सहारा नहीं हो सकता, यही कारण है कि इसने सिफारिश की, कि माध्यम को भारतीय भाषा से बदल दिया जाना चाहिए।

  • मुदलियार आयोग

1952 तक कई आयोग और समितियाँ नियुक्त की गईं, जब माध्यमिक शिक्षा आयोग, जिसे मुदलियार आयोग के नाम से जाना जाता था, की स्थापना डॉ. ए.एल. स्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में की गई। वर्ष 1953 में अपनी रिपोर्ट में इसने कहा कि चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास को माध्यमिक शिक्षा का मुख्य मानदंड बनाया जाना चाहिए जो 11 से 17 वर्ष की आयु वर्ग के लिए होना चाहिए। इसने ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि को एक अनिवार्य विषय बनाने और लड़कियों के लिए गृह विज्ञान को एक अनिवार्य विषय बनाने की भी सिफारिश की। इसने भारत की क्षेत्रीय भाषाओं को अधिक महत्व दिया और इसे शिक्षा प्रदान करने का माध्यम बनाने की परिकल्पना की।

  • राममूर्ति समीक्षा समिति

मौजूदा शिक्षा प्रणाली की कमियों को देखने के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति के तहत एक राममूर्ति समीक्षा समिति नियुक्त की गई थी। इसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को भारत में शिक्षा के अधिकार पर पहला आधिकारिक दस्तावेज़ माना जाता है। इसने भारत के सार्वजनिक और निजी शैक्षिक क्षेत्रों में सामाजिक न्याय और समानता सुनिश्चित करने के लिए एक सामान्य स्कूली शिक्षा प्रणाली की सिफारिश की। उनका विचार यह था कि शिक्षा का प्रबंधन केंद्रीकृत (सेंट्रलाइज्ड) नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रकृति में विकेंद्रीकृत (डिसेंट्रलाइज) होना चाहिए, केंद्र से राज्य तक, राज्य से जिले तक और आगे भी। इसने शिक्षा के क्षेत्र में कार्यबल के लिए सशक्तिकरण, सहभागी सामाजिक व्यवस्था और समानता और सामाजिक न्याय के साथ सहानुभूतिशील सिद्धांतों और मूल्यों की शुरूआत की भी सिफारिश की।

  • जनार्दन रेड्डी समिति

फिर 1992 में जनार्दन रेड्डी समिति की नियुक्ति की गई, जिसने उपेक्षित वर्ग के लोगों को भी सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के मद्देनजर सरकारी विद्यालयों के विकास की सिफारिश की।

  • तापस मजूमदार समिति

अंततः, भारतीय संविधान में अनुच्छेद 21A को सम्मिलित करने के उद्देश्य से 1999 में तापस मजूमदार समिति की स्थापना की गई। समिति ने सिफारिश की कि समाज के सबसे गरीब तबके के बच्चों को भी यथासंभव सर्वोत्तम गुणवत्ता की शिक्षा मिलनी चाहिए।

शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968

1968 में, पहली बार, भारत में विभिन्न क्षेत्रों की संरचना करते हुए शिक्षा पर एक राष्ट्रीय नीति (एनपीई, 1968) बनाई गई थी। इसके दायरे में नि:शुल्क  और अनिवार्य शिक्षा, भारतीय भाषाओं की सुरक्षा और विकास के साथ-साथ प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान, खेल-कूद आदि सहित शैक्षिक अवसरों में समानता थी।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986

20 वर्षों के बाद, भारत ने समाज की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए बदलाव किए और 1986 में एक नई शिक्षा नीति की घोषणा की, जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के रूप में जाना जाता था, जिसमें महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, विकलांगों और अन्य अल्पसंख्यक समूह जो लड़कों को शिक्षा प्रदान करने के बहाने शिक्षा से वंचित थे, के लिए शिक्षा के बीच असमानताओं को लक्षित किया गया।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020

अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्च शिक्षा में स्कूली शिक्षा के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंजूरी दे दी और इसने पुरानी नीति को बदल दिया। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य भारत को एक ‘वैश्विक ज्ञान महाशक्ति’ बनाना है, यही कारण है कि यह मूल रूप से चार बहुत महत्वपूर्ण लेकिन बुनियादी स्तंभों पर खड़ा है, जो हैं, पहुंच, समानता, गुणवत्ता और जवाबदेही। इस नीति के पीछे सरकार का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली को ऐसा बनाना है जो अपने सभी पहलुओं में बहु-विषयक होने के साथ-साथ अधिक लचीली हो, जिससे इसकी अद्वितीय क्षमताओं में वृद्धि होगी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, 1953

आज हम इस विचारधारा के साथ जी रहे हैं कि समानता, सामाजिक, न्याय और लोकतंत्र के मूल्यों तथा एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण केवल और केवल सभी के लिए समावेशी (इंक्लूसिव) प्रारंभिक शिक्षा के प्रावधानों के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार, भारत सरकार शिक्षा के आलोक में भारत में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आवश्यक वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था, आवंटन (एलोकेट) और वितरण करने के लिए बाध्य है। इतना ही नहीं, भारत में उच्च शिक्षा की समानता में सुधार और भारत के हर क्षेत्र में शिक्षा को अधिक से अधिक सुलभ बनाने के लिए नीतियां बनाने की भी आवश्यकता है।

निर्देशक सिद्धांत के रूप में शिक्षा

भारत के संविधान के भाग IV में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत नागरिकों और समाज के कल्याण के लिए नीतियां बनाते समय राज्य के लिए विचार करने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित करते हैं। हालाँकि ये प्रकृति में लागू करने योग्य नहीं हैं, लेकिन इन्हें बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य एक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज का निर्माण करके लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 41 समाजवादी सिद्धांत पर आधारित है, अर्थात यह लिंग, नस्ल, जाति, धर्म या भाषा के आधार पर भेदभाव को खारिज करने की दिशा में आगे बढ़ता है। इसका लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक समानता है। अनुच्छेद 41 राज्य को बेरोजगारी, बुढ़ापा, विस्थापित विकलांगता और बीमारी जैसे मामलों में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार सुरक्षित करने का निर्देश देता है।

यह 1950 की बात है जब भारत के संविधान में अनुच्छेद 45 के तहत शिक्षा को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में से एक के रूप में प्रदान किया गया था, लगभग 43 साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के दायरे में पाया था। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 45 जो उदारवादी (लिबरल) बौद्धिक सिद्धांत पर आधारित है जिसका अर्थ है कि नागरिकों को उदारता और समानता का अधिकार किसी भी प्रकार के भेदभाव से रहित होना चाहिए। यह सिद्धांत इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ अन्य अधिकार और स्वतंत्रताएं निहित हैं जिनकी रक्षा करना आवश्यक है। उपरोक्त सिद्धांत के आलोक में, अनुच्छेद 45 सभी बच्चों को चौदह वर्ष की आयु तक प्रारंभिक बचपन की देखभाल के साथ-साथ शिक्षा प्रदान करने का निर्देश देता है।

दूसरी ओर अनुच्छेद 46 गांधीवादी सिद्धांत पर आधारित है, जो ‘सर्वोदय’ के बारे में है, यानी सभी के लिए कल्याण, और यह कमजोर वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर वर्ग यानी विशेष रूप से लोगों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का इरादा रखता है। यह उन्हें सभी प्रकार के शोषण और सामाजिक अन्याय से बचाने का भी निर्देश देता है।

शिक्षा मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28 और अनुच्छेद 30 ने भारत के धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) राष्ट्र होने के आलोक में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को सुरक्षा प्रदान की। इसके अलावा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को धर्म या भाषा के आधार पर उनकी पसंद के स्थापित शैक्षणिक संस्थान के संबंध में उनके सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार के लिए शिक्षा संस्थानों में अवसर की समानता दी गई थी। अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 46 ने नागरिकों के सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिक्षा को बढ़ावा दिया, साथ ही अनुच्छेद 29 ने नागरिकों को भाषा और शैक्षिक सुरक्षा प्रदान की। जिस तरह अनुच्छेद 15 कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करता है, उसी तरह अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे वे शिक्षा सहित किसी भी चीज के लिए किसी भी भेदभाव से मुक्त रहने के योग्य बन जाते हैं।

मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (1992) जिसे कैपिटेशन मामले के रूप में भी जाना जाता है, के मामले में, उसी वर्ष, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न अंग है। भारत का संविधान जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। कहा गया कि किसी की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा का अधिकार जरूरी है। माननीय न्यायालय ने आगे बढ़कर फैसला सुनाया कि संविधान के तहत शिक्षा एक मौलिक अधिकार है और किसी भी उच्च लागत को लागू करके किसी व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है। फिर 1993 में, उन्नी कृष्णन जे.पी. बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (1993) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस देश का नागरिक होने के नाते प्रत्येक बच्चे को अपनी 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त  शिक्षा का अधिकार प्राप्त है, हालाँकि, उसका यह अधिकार राज्य की आर्थिक क्षमता की सीमाओं के अधीन है।

मौलिक कर्तव्य के रूप में शिक्षा

जहां मौलिक अधिकार, अन्य अधिकार जो राज्य द्वारा राष्ट्र के लोगों को दिए जाते हैं और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत ऐसे सिद्धांत हैं जो राज्य को यह देखने के लिए प्रदान किए जाते हैं कि समाज के कल्याण के लिए नीतियां क्यों बनाई जा रही हैं, यह केवल अधिकार है राष्ट्र के समग्र कल्याण को सुविधाजनक बनाने के लिए नागरिकों पर कुछ कर्तव्य डालना उचित है। मौलिक कर्तव्य नागरिकों की अपने देश के प्रति जिम्मेदारियाँ हैं।

यह स्वर्ण सिंह समिति ही थी जिसने 1976 में आंतरिक आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 की अवधि के दौरान आवश्यकता पड़ने पर हमारे संविधान के लिए मौलिक कर्तव्यों की सिफारिश की थी। इसके अनुसरण में, 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 51A के रूप में 10 मौलिक कर्तव्यों को भारतीय संविधान में पेश किया गया था, लेकिन 2002 के 86वें संशोधन अधिनियम द्वारा 11वें मौलिक कर्तव्य, यानी अनुच्छेद 51A(k) को सूची में जोड़ा गया, जो कि 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच अपने बच्चे या वार्ड को शिक्षा के अवसर प्रदान करना माता-पिता का मौलिक कर्तव्य है। इस प्रावधान ने शिक्षा के मामले में माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी के साथ-साथ कर्तव्य भी सौंपा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम

संसद ने बच्चों को नि:शुल्क  और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 अधिनियमित किया, जो एक औपचारिक विद्यालय में संतोषजनक और न्यायसंगत गुणवत्ता की पूर्णकालिक प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है जो कुछ आवश्यक मानदंडों और मानकों को पूरा करता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 भारत में एक बहुत ही ऐतिहासिक कानून है। इसका मुख्य उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के नि:शुल्क  और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है। यह एक ऐतिहासिक है क्योंकि इसका जोर न केवल शिक्षा के अधिकार पर है बल्कि किसी भी भेदभाव से मुक्त शिक्षा के अधिकार पर भी है। इसका लक्ष्य यह है कि प्रत्येक बच्चे को उसकी जाति, धर्म, लिंग, क्षमता या विकलांगता और उसकी सामाजिक या वित्तीय पृष्ठभूमि के बावजूद शिक्षा के मामले में वंचित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

हालिया विकास

जब दुनिया में कोविड-19 महामारी आई थी तो स्पष्ट कारणों और एहतियात के तौर पर स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए थे। पूरी दुनिया को हर चीज़ को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से करने के लिए मजबूर होना पड़ा और शिक्षा भी इसमें से एक थी। महामारी का प्रभाव ऐसा था कि छात्रों को लगभग दो शैक्षणिक वर्षों तक ऑनलाइन या दूर से पढ़ाई करनी पड़ी। बदलती जरूरतों के आलोक में, राष्ट्रीय नीति का फोकस और उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को बदलने और सीखने के परिणामों में सुधार लाने की ओर स्थानांतरित हो गया है।

ई-लर्निंग या ऑनलाइन शिक्षा के उद्भव ने छात्रों को इस हद तक नए अवसर प्रदान किए कि आज हम देखते हैं कि लगभग हर शैक्षणिक संस्थान युवाओं के लाभ और उज्ज्वल भविष्य के लिए दूर के पाठ्यक्रमों के साथ-साथ विकास कार्यक्रम भी प्रदान करता है। इसके अलावा दूरस्थ (रिमोट) और वैयक्तिकृत (पर्सनलाइज्ड) डिजिटल शिक्षा केवल अपने देश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कुछ ही क्लिक के साथ हमें ऑनलाइन शिक्षा के रूप में विदेशों के विश्वविद्यालयों से ऐसे पाठ्यक्रम प्राप्त करने का अवसर भी दिया जाता है जो हम चाहते हैं।

साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की अवधारणा दुनिया भर में शिक्षा सहित सभी क्षेत्रों के लिए क्रांतिकारी साबित हुई है और यूनेस्को यह स्वीकार करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) और सही पूर्ण उपयोग करना अपने आप में एक चुनौती है, फिर भी इसमें आने वाले समय में शिक्षा के सामने आने वाली चुनौतियों पर अंकुश लगाने की आवश्यक क्षमता है जैसे कि ज्ञान साझा करना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच के बीच मौजूद अंतर, सुधार आदि।

भूलने की बात नहीं है, आभासी (वर्चुअल) वास्तविकता का उपयोग भी एक तेजी से बढ़ती अवधारणा है और शिक्षा क्षेत्रों में उच्च गति से प्रासंगिक होता जा रहा है।

भारत में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में लागू करना

“बच्चा एक आत्मा है जिसका अपना एक अस्तित्व, एक स्वभाव और क्षमताएं हैं, जिन्हें उन्हें खोजने, उनकी परिपक्वता (मैच्योरिटी) तक बढ़ने, शारीरिक और महत्वपूर्ण ऊर्जा की परिपूर्णता और उसकी भावनात्मक (इमोशनल), बौद्धिक और आध्यात्मिक अस्तित्व को अधिकतम चौड़ाई, गहराई और ऊंचाई तक पहुंचने में मदद की जानी चाहिए, अन्यथा राष्ट्र का स्वस्थ विकास नहीं हो सकता है।”

          -भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, पी एन भगवती

भारत में शिक्षा के महत्व को आज के समय में कोई भी व्यक्ति कम नहीं आंक सकता। हमने बार-बार इसके मूल्य को पहचाना है, यह लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के साथ-साथ मानव सभ्यता की उन्नति का कारक भी है।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शिक्षा का अधिकार

चूँकि भारत का संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित है और सामाजिक क्रांति का लक्ष्य है, इसके भाग III और IV, जो क्रमशः मौलिक अधिकार और निर्देशक सिद्धांत हैं, उक्त क्रांति की प्रतिबद्धता की आत्मा हैं। इसके अलावा, चूंकि भारत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा 1948 का एक हस्ताक्षरकर्ता है, इसलिए मानवाधिकारों के विभिन्न पहलुओं के साथ-साथ, भारत ने शिक्षा पर भी अपना रुख शामिल किया। इसके आलोक में, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत भारत ने अपने संविधान में शिक्षा को कम से कम प्राथमिक और मौलिक चरणों के लिए निःशुल्क रखने का प्रावधान किया है। संविधान शिक्षा को राज्य के दायित्व के रूप में भी उपयोग करता है और अनुच्छेद 41 में प्रावधान है कि राज्य आर्थिक क्षमता की सीमाओं के अनुसार, कई अन्य चीजों के अलावा शिक्षा के अधिकार के लिए कुशल सुरक्षा उपाय प्रदान करेगा। अनुच्छेद 45 राज्य पर राज्य की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का अधिक महत्वपूर्ण दायित्व बनाता है।

जिस प्रकार अधिकार कर्तव्यों से पूरक होते हैं, उसी प्रकार जब कोई अधिकार निर्धारित किया जाता है या उसके संबंध में कोई अधिनियम बनाया जाता है तो वह उसके कार्यान्वयन से पूरक होता है। इसलिए, इस अधिकार की दक्षता (एफिशिएंसी) के लिए इसकी फंडिंग, कार्यान्वयन और निगरानी सर्वोपरि हो जाती है।

सरकार अधिकार के कार्यान्वयन और प्रभावकारिता के लिए धन आवंटित करती है। हालाँकि इस अधिकार के कार्यान्वयन में बुनियादी ढांचे की कमी और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँचने में कठिनाई के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रूढ़िवादी मानसिकता होने के कारण भी, पहले छात्रों को उन केंद्रों तक लाना मुश्किल था जहां शिक्षा दी जाती थी क्योंकि माता-पिता इस विचारधारा के साथ जी रहे थे कि अगर वे बच्चों की शिक्षा पर पैसा लगाएंगे तो यह बर्बाद हो जाएगा। आज हम जिन परिस्थितियों में रह रहे हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए, चाहे शहरी हो या ग्रामीण क्षेत्र, लोग अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए अधिक खुले हैं। नज़र रखने के लिए विभिन्न निकाय बने हुए हैं, जैसे तीन राष्ट्रीय निकाय, अर्थात्- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग। इसके साथ ही शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रत्येक राज्य का अपना विभाग होता है।

अब हम एक महत्वपूर्ण प्रभाव देख रहे हैं क्योंकि भारत में विद्यालयों में नामांकन दर में वृद्धि हुई है और इसके बारे में सबसे खूबसूरत बात यह है कि लड़कियों का नामांकन भी बढ़ रहा है। सरकारी सुविधाओं और योजनाओं के कारण विद्यालय छोड़ने की दर में भी कमी आई है। विशेष रूप से बालिकाओं के बारे में बात करते हुए, सरकार ने उन्हें छात्रावास और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली कई योजनाएं शुरू की हैं। इसी तरह, अल्पसंख्यक समूहों और विकलांग बच्चों को भी छात्रवृत्ति और अन्य आवश्यक सहायता के लिए सरकारी योजना द्वारा लक्षित किया गया है ताकि उन्हें अपनी स्कूली शिक्षा न छोड़नी पड़े।

मध्याह्न भोजन की शुरुआत इसलिए की गई ताकि बच्चों की पढ़ाई में भूख बाधा न बने। इसके साथ ही यदि किसी भवन में बुनियादी ढांचे की औपचारिक गुणवत्ता भी लागू की जाएगी तो उसमें शिक्षा का आयात होना चाहिए। इसके अतिरिक्त शौचालय, पेयजल सुविधा और खेल का मैदान भी आवश्यक माना गया।

शिक्षा के अधिकार के सिद्धांत

शिक्षा के अधिकार की रूपरेखा 4 सिद्धांतों पर आधारित है, जो नीचे दिए गए हैं-

  1. उपलब्धता – शिक्षा को प्रत्येक बच्चे का अभिन्न अंग बनाने के लिए इसकी उपलब्धता महत्वपूर्ण है। शिक्षा प्रभावी ढंग से प्रदान करने के लिए उचित संसाधन, बुनियादी ढाँचा और पर्याप्त शिक्षक होने चाहिए।
  2. सुलभता- इसे इस तरह से बनाया गया था कि विद्यालय सभी छात्रों के लिए सुलभ हों। प्रवेश पाने वाले छात्रों के लिए किसी भी संभावित आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  3. स्वीकार्यता- जब यह माना गया कि शिक्षा एक आवश्यकता है, तो हमें इसे एक अश्वाशित मौलिक अधिकार के रूप में मिला। इसके साथ ही, राज्य को उस अधिकार की देखभाल करने के लिए बाध्य किया गया जो हमें दिया गया था। इसी तरह, यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चा शिक्षित होने का हकदार है और उसकी क्षमता या विकलांगता कभी भी यह जांचने के लिए भौतिक गुण नहीं होनी चाहिए कि वह शिक्षा प्राप्त करने के योग्य है या नहीं।
  4. अनुकूलनशीलता- जैसे-जैसे समय बदलता है, हम पहले ही पत्तों से कागजों, किताबों से लेकर सॉफ्ट नोट्स तक का बदलाव देख चुके हैं और यह सूची अंतहीन है। इसी प्रकार शिक्षा प्रणाली भी है और शिक्षण संस्थानों को बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक परिवर्तनों का पालन करना चाहिए और उन्हें अनुकूलित करना चाहिए।

शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में पेश करने में न्यायपालिका की भूमिका

हमारी भारतीय न्यायपालिका हमेशा की तरह सक्रिय रही है, अजय गोस्वामी बनाम भारत संघ और अन्य (2006) के मामले में शिक्षा के महत्व को पहचाना, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डॉ. ए.के. लक्ष्मणन ने कहा कि शिक्षा राज्य और स्थानीय सरकार के कार्य में सबसे महत्वपूर्ण है उन्होंने शिक्षा को अच्छी नागरिकता की नींव के रूप में मान्यता दी। इसके अलावा, अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ और अन्य (2008) के एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामले में, माननीय न्यायालय ने एक बहुत ही सही टिप्पणी की कि भारत को अतीत में उच्च शिक्षा में कम निवेश के कारण नुकसान उठाना पड़ा है। इस अवलोकन पर, इसने सिफारिश की कि राष्ट्र के लिए शिक्षा प्रणाली को सावधानीपूर्वक मजबूत करने और प्रभावी मरम्मत की आवश्यकता है।

भारत के संविधान को इस तरह से रचा गया है कि इसकी मूल संरचना में ही सामाजिक न्याय की अवधारणा है, जिससे शिक्षा इसका अभिन्न अंग बन गई है।

सरकार और न्यायपालिका दोनों ने बार-बार माना है कि शिक्षा न केवल एक व्यक्ति के बल्कि पूरे देश के विकास और वृद्धि की सीढ़ी है।

यह मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य के ऐतिहासिक फैसले में था, कि शिक्षा के अधिकार को एक नया आयाम दिया गया था और इसे स्पष्ट रूप से भारतीय संविधान के भाग III के अनुच्छेद 21 में एक मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया था। अदालत आगे बढ़ी और माना कि जीवन के अधिकार का सार शिक्षा का अधिकार है और यह सीधे अनुच्छेद 21 से आता है। इसने यह भी बताया कि कैसे गरिमा तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब इसे शिक्षा के महत्व के साथ जोड़ा जाए। उसी में, जैसा कि शिक्षा में शुल्क की सीमा को चुनौती दी गई थी, अदालत ने माना है कि शिक्षा बिक्री का उत्पाद नहीं है और अलग-अलग लोगों से अलग-अलग शुल्क नहीं ली जा सकती है। और यह कि छात्रों को अधिकार के रूप में शिक्षा संस्थान में प्रवेश दिया जाना चाहिए, भले ही यह राज्य के स्वामित्व वाला हो या उनके शिक्षा के अधिकार जो भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत है, के अनुसरण में मान्यता प्राप्त हो, आगे बढ़कर कहा कि शिक्षा संस्थान में प्रवेश के संबंध में कैपिटेशन शुल्क लेना नागरिकों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन होगा।

फिर उन्नी कृष्णन जे.पी. बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के एक और ऐतिहासिक फैसले में, पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि एक नागरिक के शिक्षा के अधिकार में उन्हें शिक्षा की सुविधाओं के लिए राज्य को बुलाने का अधिकार भी शामिल है। चूँकि अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ-साथ चलते हैं, उसी रास्ते पर इस मामले में माननीय न्यायालय की टिप्पणी थी।

संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का अधिकार

उपर्युक्त मामले के बाद, संविधान (86वाँ) संशोधन अधिनियम, 2002 ने भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 21A डाला, जिसमे मौलिक अधिकारों को शिक्षा के लिए समर्पित किया। पहले उक्त अधिकार महत्वपूर्ण अनुच्छेद 21 के दायरे में आता था जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता था लेकिन उक्त संशोधन अधिनियम द्वारा शिक्षा के अधिकार को समग्र रूप से एक अलग पहचान दी गई।

अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ (2009) के मामले में, माननीय न्यायालय ने कहा कि नया अनुच्छेद जो कि अनुच्छेद 21A है, इसलिए डाला गया है ताकि प्रत्येक बच्चा सुरक्षा और संरक्षा के किसी भी डर से मुक्त होकर शिक्षा प्राप्त कर सके।

बाद में वर्ष 2002 में, संविधान में 86वें संशोधन के साथ, अनुच्छेद 21A को यह सुनिश्चित करने के लिए जोड़ा गया था कि राज्य उन सभी बच्चों को नि:शुल्क  और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करता है जिनकी आयु 6 से 14 वर्ष है। परिणामस्वरूप, बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भी लागू किया गया।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि शिक्षा का अधिकार एक नागरिक के याचिका दायर करने के अधिकार को शामिल करता है कि राज्य को अपनी आर्थिक क्षमताओं के अनुसार राज्य के विकास के लिए शैक्षिक सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।

शिक्षा का अधिकार गरीबों और वंचितों के लिए एक महत्वपूर्ण और पवित्र अधिकार बन गया क्योंकि इसका उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों के लिए प्रत्येक प्राइवेट स्कूल में 25% सीटें आरक्षित करना भी था, जहां वंचित समूहों में शामिल हैं: एससी और एसटी, सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग और अलग-अलग विकलांग ताकि विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने में आर्थिक तंगी परेशानी न बने। इसके साथ-साथ प्रावधान में ही इष्टतम (ऑप्टिमम) शिक्षक-छात्र अनुपात और बुनियादी ढांचे की न्यूनतम आवश्यकता सहित अन्य सुविधाओं की आवश्यकता के बारे में बताकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की गई।

इसमें निहित अधिकार स्वाभाविक रूप से लिंग, जाति, पंथ, धर्म या वित्तीय स्थिति के आधार पर भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करने का प्रावधान करता है। इसमें निश्चित रूप से आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन यह स्पष्ट अंतर पर आधारित वर्गीकरण के अनुसार था जो भारत के संविधान में निहित है।

सरकारी योजनाएं जो शिक्षा के अधिकार को बढ़ावा देती हैं

भारत में शिक्षा प्रणाली के विकास के साथ, सरकार ने विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कार्यक्रमों की एक विस्तृत श्रृंखला पेश की।

प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु योजनाएँ

प्रारंभिक शिक्षा के लिए, सरकार ने विभिन्न योजनाएँ लाईं, जिनमें से कुछ के बारे में नीचे बताया गया है

  • सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देकर इसका प्रसार करना और शिक्षा में लिंग के साथ-साथ सामाजिक अंतर पर अंकुश लगाना है।
  • मध्याह्न भोजन कार्यक्रम सरकारी स्कूलों में दोपहर का भोजन उपलब्ध कराकर बच्चों के शरीर के स्वास्थ्य, दिमाग और शिक्षा की दिशा में एक अद्भुत पहल है। इसका उद्देश्य छात्रों को कक्षा में भूख से बचाना है।
  • महिला समाख्या योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण करना है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित हैं।

माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु योजनाएँ

शिक्षा प्रणाली के अगले और सबसे महत्वपूर्ण चरण, अर्थात् माध्यमिक शिक्षा, के लिए सरकारी पहल अनगिनत हैं। इसका उद्देश्य 14 वर्ष से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा को अधिक से अधिक अच्छी गुणवत्ता, सुलभ और किफायती बनाना है। इस संबंध में कुछ योजनाएँ नीचे दी गई हैं –

  • राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान पूरे भारत में माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक मिशन है। यह बच्चों को ज्ञान के वितरण के लिए सार्वजनिक विद्यालयों के कुशल विकास के लिए 2009 में अस्तित्व में आया।
  • माध्यमिक शिक्षा के लिए लड़कियों को प्रोत्साहन की एक राष्ट्रीय योजना वर्ष 2008 में लड़कियों को किसी भी अन्य बच्चे के समान स्तर पर लाने की दृष्टि से शुरू की गई थी, जो पहली बार में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त विशेषाधिकार प्राप्त थी। इसने 14 से 18 वर्ष के आयु वर्ग को लक्षित किया और माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों के नामांकन को बढ़ावा देने पर काम किया।
  • माध्यमिक स्तर पर विकलांगों के लिए समावेशी शिक्षा वर्ष 2009 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य विकलांग छात्रों को अन्य सभी छात्रों के साथ शामिल करना था। इसके अलावा, इसने उनकी माध्यमिक स्कूली शिक्षा में उनके लिए एक समावेशी और सक्षम वातावरण प्रदान किया।
  • व्यावसायिक शिक्षा की योजना सामान्य शैक्षणिक शिक्षा के साथ संयोजन के उद्देश्य से शुरू की गई थी ताकि छात्रों को न केवल शैक्षणिक ज्ञान दिया जाए बल्कि उन्हें कुशल शिल्प से भी समृद्ध किया जाए।
  • राष्ट्रीय मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति योजना 2008 में तत्कालीन प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को उनकी योग्यता के आधार पर छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए लाई गई थी ताकि उन्हें आर्थिक कमजोरी के करण कक्षा छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। इसका उद्देश्य छात्रों को शिक्षा के माध्यमिक स्तर पर अपनी पढ़ाई बंद न करने के लिए प्रोत्साहित करना था।
  • 2012 में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों के लिए गर्ल्स हॉस्टल के निर्माण और संचालन के लिए एक योजना लाई गई थी, ताकि छात्राओं को छात्रावास प्रदान करके उनकी शिक्षा को बनाए रखा जा सके। जब दूरस्थ शिक्षा और वित्तीय कमजोरी के साथ-साथ अन्य सामाजिक भय व्याप्त हो जाता है, तब भी यदि कोई लड़की पढ़ना चाहती है, तो उनके माता-पिता उन्हें रोक देते हैं। यह योजना ऐसी लड़कियों के लिए एक मित्र के रूप में शुरू की गई थी।
  • अल्पसंख्यक छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं ऐसे छात्रों को शिक्षा में ड्रॉपआउट दर को कम करने और वित्त को उनकी शिक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बनने देने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करती हैं।

उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु योजनाएँ

उच्च शिक्षा में सिर्फ डिग्री के अलावा और भी बहुत कुछ है। यह वह राज्य है जो न केवल व्यक्तिगत विकास बल्कि सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ तकनीकी और आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का संकेत भी देता है। यह किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास और वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है। तीसरे और अंतिम चरण के लिए सरकार ने कई कार्यक्रम शुरू किए, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिए गए हैं-

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009

वर्ष 2009 में, भारतीय संसद ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 पारित किया, जिसे आमतौर पर आरटीई अधिनियम 2009 के रूप में जाना जाता है। यह प्राथमिक विद्यालयों के लिए बुनियादी मानक स्थापित करता है, गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों के संचालन को गैरकानूनी घोषित करता है, और प्रवेश शुल्क और बच्चों के साक्षात्कार (इंटरव्यू) का विरोध करता है। नियमित सर्वेक्षणों के माध्यम से, अधिनियम हर पड़ोस की निगरानी करता है और उन बच्चों की पहचान करता है जिन्हें किसी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश का अवसर मिलना चाहिए लेकिन नहीं मिलता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम अन्य बातों के अलावा शैक्षणिक संस्थानों, लड़कों और लड़कियों के शौचालयों, पीने के पानी की सुविधाओं और शिक्षकों के लिए स्कूल के दिनों और काम के घंटों की संख्या के लिए दिशानिर्देश और आवश्यकताएं स्थापित करता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आवश्यक न्यूनतम मानक को बनाए रखने के लिए भारत के प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय) द्वारा आवश्यकताओं के उपरोक्त समूह का पालन किया जाना चाहिए।

यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक विद्यालय में निर्दिष्ट छात्र-शिक्षक अनुपात बिना किसी शहरी-ग्रामीण विसंगति के बरकरार रहे, जिससे शिक्षकों के विवेकपूर्ण रोजगार की अनुमति मिलती है। इसके अतिरिक्त, इसके लिए ऐसे शिक्षकों की भर्ती की आवश्यकता होती है जिनके पास आवश्यक शैक्षणिक और व्यावसायिक योग्यताएँ हों। अधिनियम में यह भी आवश्यक है कि जो बच्चा स्कूल में नामांकित नहीं है, उसे उसकी उम्र के अनुसार कक्षा में प्रवेश दिया जाए और उसे आयु-उपयुक्त सीखने के स्तर तक पहुंचने में मदद करने के लिए विशेष निर्देश प्राप्त किए जाएं। इसके अलावा, यह सभी प्रकार की पिटाई और मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार, लिंग, जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर असमानता, कैपिटेशन कार्यक्रमों में बच्चों के नामांकन के लिए मूल्यांकन प्रक्रियाओं, निजी शिक्षण सुविधाओं और गैर-मान्यता प्राप्त विद्यालय के संचालन को गैरकानूनी घोषित करता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के आवश्यक तत्व

अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार हैं-

  • 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चे निःशुल्क और अनिवार्य स्कूली शिक्षा के हकदार हैं।
  • प्राथमिक विद्यालय समाप्त होने तक एक भी बच्चे को रोका नहीं जाना चाहिए, निष्कासित नहीं किया जाना चाहिए, या बोर्ड परीक्षा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
  • प्रवेश के लिए आवश्यक आयु का प्रमाण: प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश के लिए बच्चे की उम्र जन्म, मृत्यु और विवाह पंजीकरण अधिनियम 1856 के प्रावधानों के अनुपालन में जारी जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर या किसी अन्य निर्धारित दस्तावेज के आधार पर तय की जाएगी।
  • प्राथमिक विद्यालय पूरा करने पर, बच्चे को एक प्रमाणपत्र प्राप्त होगा।
  • हर तीन साल में, अगर ज़रूरत पड़े, तो विद्यालय के बुनियादी ढांचे को ठीक करना होगा; अन्यथा मान्यता रद्द कर दी जायेगी।
  • छह वर्ष से अधिक आयु का बच्चा जो कभी विद्यालय नहीं गया या जो प्राथमिक विद्यालय पूरा करने में असमर्थ था, उसे ऐसी कक्षा में रखा जाना चाहिए जो उसकी उम्र के लिए उपयुक्त हो। हालाँकि, यदि किसी बच्चे को उसकी उम्र के अनुरूप कक्षा में तुरंत नामांकित किया जाता है, तो उस बच्चे को दूसरों के बराबर होने के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर विशेष निर्देश प्राप्त करने का अधिकार होगा। इसके अतिरिक्त, एक युवा जिसे प्राथमिक विद्यालय में स्वीकार किया जाता है वह नि:शुल्क शिक्षा के लिए पात्र होगा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रमुख प्रावधान

अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधान हैं-

  • इस अधिनियम द्वारा निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रारम्भ किया गया है। यह किसी बच्चे को अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल शुल्क या कैपिटेशन शुल्क या शुल्क का भुगतान नहीं करने का प्रावधान प्रदान करके इसका समर्थन करता है। यह स्कूल में प्रवेश की प्रक्रिया के लिए बच्चे या उसके माता-पिता की किसी भी जांच को करने से रोकता है। यह बच्चे को एक विद्यालय से सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय में स्थानांतरण की सुविधा भी प्रदान करता है यदि विद्यालय उस बच्चे के लिए प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के लिए सही सुविधा प्रदान नहीं कर रहा है। मुफ़्त शिक्षा का समर्थन करने के लिए, प्रत्येक बच्चा मुफ़्त पाठ्यपुस्तकें, वर्दी और आवश्यक रूप से पूरक सामग्री पाने का भी हकदार है।
  • अधिनियम ‘उपयुक्त सरकार’ शब्द को उन स्कूलों के लिए अपनी केंद्र सरकार में शामिल करके परिभाषित करता है जो केंद्र सरकार या विधायिका के बिना केंद्र शासित प्रदेश क्षेत्र के स्वामित्व और नियंत्रित हैं और राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकार अपने क्षेत्र में स्थापित स्कूलों के लिए विधायिका के साथ हैं।

उपयुक्त सरकार या स्थानीय प्राधिकारी को ग्रामीण क्षेत्र में कक्षा 1 से 5वीं तक के बच्चों के लिए 1 किमी की पैदल दूरी के भीतर और कक्षा छठी से आठवीं तक के बच्चों के लिए 3 किमी के भीतर एक विद्यालय उपलब्ध कराना होगा। जहां क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं, वहां 6 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों की संख्या के आधार पर एक से अधिक विद्यालय आवश्यक हो सकते हैं और दूरदराज के क्षेत्रों के लिए जहां दूरी निर्धारित किलोमीटर से अधिक है, वहां आवश्यक नि:शुल्क परिवहन या निवास की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। अधिनियम आगे बढ़ता है और निजी विद्यालयों के लिए एक दिशानिर्देश देता है कि उन्हें समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के 25% छात्रों का नामांकन करना होगा और उन्हें नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करनी होगी जिसके लिए वे सरकार से प्रतिपूर्ति का दावा करने के पात्र होंगे, हालाँकि, उन्होंने जो व्यय किया, वह व्यय उस राशि से अधिक नहीं हो सकता जो एक सरकारी विद्यालय इसके लिए वसूल करेगा। अधिनियम के उद्देश्यों के कार्यान्वयन के लिए धन उपलब्ध कराने का दायित्व भी सरकार पर डाला गया है।

  • इसमें प्रत्येक सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय को अनिवार्य रूप से एक स्कूल प्रबंधन समिति का गठन करना होगा, जिसके 75% सदस्य स्कूल के छात्रों के माता-पिता और अभिभावकों में से होंगे। शेष 25% सदस्यों में से एक तिहाई स्थानीय प्राधिकारी के निर्वाचित प्रतिनिधियों में से, एक तिहाई स्कूल के शिक्षकों में से और शेष एक तिहाई स्कूल के स्थानीय बच्चों में से होंगे। इसमें एक व्यापक प्रतिबंध यह है कि समिति के 50% सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए।

इस समिति को महीने में एक बार बैठक करनी होगी और बैठक का विवरण सार्वजनिक डोमेन पर उपलब्ध कराया जाएगा। यह समिति की जिम्मेदारी है कि वह स्कूल के आस-पास की आबादी को बच्चे के परिभाषित अधिकार और अधिनियम के बारे में प्रभावी ढंग से बताए और स्कूल में रहने के दौरान भी बच्चे के अधिकार की रक्षा करे।

  • यह शिक्षकों के कर्तव्यों को परिभाषित करते हुए कहता है कि उन्हें कर्तव्यनिष्ठा से स्कूलों में आना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि पाठ्यक्रम निर्धारित समय के भीतर पूरा हो जाए। उन्हें प्रत्येक बच्चे की क्षमता के अनुसार विशेष प्रशिक्षण की सिफारिश करनी चाहिए और प्रत्येक बच्चे की उपस्थिति और प्रगति पर माता-पिता की प्रशंसा करने के लिए अभिभावक-शिक्षक बैठक आयोजित करनी चाहिए।
  • यह मानदंडों को निर्दिष्ट करने के साथ-साथ स्कूलों के लिए कर्तव्य भी निर्धारित करता है। इसमें कहा गया है कि कक्षा 1 से 5वीं तक प्रत्येक तीस छात्रों पर एक शिक्षक और कक्षा 6वीं से 8वीं तक प्रत्येक पैंतीस छात्रों पर एक शिक्षक होना चाहिए। इसमें सौ से अधिक छात्रों वाले स्कूल के लिए एक पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक की मांग की गई है।

इसके अलावा प्रत्येक स्कूल में सभी प्रकार के मौसम के लिए उपयुक्त एक इमारत होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक शिक्षक के लिए एक कक्षा, एक कार्यालय या मुख्य शिक्षक कक्ष, लड़कों और लड़कियों के लिए एक अलग शौचालय और मध्य-तैयारी के लिए एक रसोईघर के साथ एक स्वच्छ पेयजल की सुविधा होनी चाहिए। दिन का भोजन, एक खेल का मैदान, एक पुस्तकालय, सभी आवश्यक शिक्षण और सीखने के उपकरण और साथ ही खेल उपकरण हों।

इंटरनेट का अधिकार – शिक्षा के अधिकार का एक पहलू

डिजिटलीकरण और प्रौद्योगिकी के निरंतर विकास के युग में, यह कहना सही होगा कि इंटरनेट शिक्षा की गुणवत्ता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाता है क्योंकि यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक बन गया है। इंटरनेट एक छात्र को विभिन्न प्रकार की शैक्षिक सामग्री प्रदान कर सकता है जो ज्ञान प्राप्त करने के उसके पारंपरिक तरीके की सराहना कर सकता है। ई-सामग्री या इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों को पुस्तकालयों के पूरक के रूप में देखा जा सकता है जो हमें हमारी जिज्ञासा को पूरा करने और समझने में मदद करने के लिए किताबें प्रदान करते हैं। एक मामला जिसमें इंटरनेट के अधिकार को एक बहुत ही महत्वपूर्ण अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी वह फहीम शिरीन.आर.के. बनाम केरल राज्य (2019) का मामला था। न्यायमूर्ति पी वी आशा ने कहा कि इंटरनेट का अधिकार शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ निजता के अधिकार का भी हिस्सा है।

कोविड-19 महामारी के समय के दौरान जब देश बंद थे और शिक्षा के पारंपरिक संसाधनों तक पहुंच बहुत कठिन हो गई थी तब एक विकल्प के रूप में उपयोग किए जाने की सीमा तक ई-लर्निंग अधिक से अधिक लोकप्रिय हो गया, फिर युवा पीढ़ी की शिक्षा को सुविधाजनक बनाने के लिए ई-लर्निंग शुरू करने की पहल की गई।

इंटरनेट के कारण इलेक्ट्रॉनिक समाचार, किताबें आदि पढ़ने की सुविधा के अलावा, आज के समय में, कोई भी व्यक्ति अपने घर या हॉस्टल में बैठकर भी पाठ्यक्रमों में अपना नामांकन करा सकता है, जैसे स्वयं, जो विश्वविद्यालयों अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त है और ऐसे पाठ्यक्रम तब भी किए जा सकते हैं जब कोई छात्र नियमित कक्षा अध्ययन में नामांकित होता है, जो शिक्षा के लिए इंटरनेट को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

और यह केवल एक देश तक ही सीमित नहीं है, इंटरनेट के कारण आज हमारे पास शैक्षिक सामग्री और पाठ्यक्रम तक पहुंच है जो दुनिया भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों द्वारा प्रदान की जा रही है।

हम जितना अधिक दुनिया और प्रौद्योगिकी का अन्वेषण (एक्सप्लोर) करेंगे, उतना ही अधिक हम पाएंगे कि इंटरनेट अब किसी के जीवन में एक विलासिता (लक्जरी) नहीं रह गया है। हालाँकि निश्चित रूप से इसका दुरुपयोग होने की भी संभावना है, लेकिन एक बार जब हम इसका सही और निष्पक्ष तरीके से उपयोग करते हैं तो यह हमारे जीवन में जो चमत्कार करने में सक्षम होता है, उसे नज़रअंदाज़ और दरकिनार नहीं किया जा सकता है, इस प्रकार, यह वर्तमान समय में शिक्षा के संदर्भ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण अधिकार बन जाता है,या यूं कहें कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त होती हैं।

भारत में शिक्षा के लिए इंटरनेट का महत्व

वर्तमान डिजिटल युग में, शिक्षा के लिए इंटरनेट के फायदों पर जोर नहीं दिया जा सकता है। इसने लोगों के शैक्षणिक संसाधनों से जुड़ने, नए कौशल हासिल करने और जानकारी तक पहुंचने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है।

  • इंटरनेट की बदौलत छात्रों और शिक्षकों को दुनिया भर में प्रचुर मात्रा में ज्ञान संसाधनों तक पहुंच होने से लाभ होता है। विशिष्ट कक्षा संसाधनों के अलावा, इसमें ऑनलाइन पुस्तकालय, शोध पत्र, पाठ्यपुस्तकें, लेख और मल्टीमीडिया सामग्री शामिल हैं।
  • छात्र इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में अपने साथियों और प्रोफेसरों के साथ संवाद कर सकते हैं। युवाओं को कई अलग-अलग दृष्टिकोणों, संस्कृतियों और विचारों से अवगत कराकर, यह वैश्विक परिप्रेक्ष्य उनके शैक्षिक अनुभवों को बढ़ा सकता है।
  • लोग अब इंटरनेट की मदद से त्रुटिहीन शैक्षिक पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों तक ऑनलाइन पहुँच सकते हैं। ई-लर्निंग प्रणाली में विभिन्न प्रकार के विषय शामिल हैं, जो छात्रों को अपने घरों में आराम से रहते हुए औपचारिक डिग्री प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं। ऑनलाइन शिक्षा के साथ उपलब्ध शेड्यूलिंग और स्थान की संभावनाएं लचीली हैं। छात्र अपनी गति से सीख सकते हैं, जो विशेष रूप से उन वयस्कों के लिए फायदेमंद है जो काम कर रहे हैं या अन्य प्रतिबद्धताओं वाले हैं।
  • ऑनलाइन संसाधन जैसे कि पाठों की योजनाएँ, सीखने के लिए उपकरण और शिक्षण संसाधन शिक्षकों के लिए उनकी कक्षा शिक्षण विधियों को बढ़ाने के लिए उपयोग करने के लिए उपलब्ध हैं। इंटरनेट पर संसाधन शैक्षिक जुड़ाव और व्यावसायिक विकास के लिए भी अवसर प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रकार के मल्टीमीडिया, अभ्यास, वर्चुअल लैब और शैक्षिक अनुप्रयोगों के माध्यम से, इंटरनेट इंटरैक्टिव और दिलचस्प सीखने के अनुभव को संभव बनाता है। ये संसाधन सीखने की प्रभावशीलता और आनंद में सुधार करते हैं।
  • अकादमिक खोज इंजन और ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग करके, छात्र अधिक प्रभावी ढंग से अनुसंधान कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, उनके पास सहयोग के लिए टूल और संसाधनों तक पहुंच है जो क्लाउड-आधारित हैं और साथ ही साथियों के साथ समूह परियोजनाओं पर सहयोग करते हैं। डेटा एनालिटिक्स के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग अक्सर इंटरनेट-आधारित शैक्षिक प्लेटफार्मों द्वारा प्रत्येक छात्र के लिए सीखने को निजीकृत करने के लिए किया जाता है, जिससे उन्हें अपनी गति से आगे बढ़ने और उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति मिलती है जिनमें सुधार की आवश्यकता होती है।
  • ऑनलाइन शिक्षा की लागत आमतौर पर सीखने के पारंपरिक तरीकों की तुलना में कम है। यह व्यापक स्तर के व्यक्तियों, विशेषकर अविकसित अर्थव्यवस्थाओं में रहने वाले लोगों को शिक्षा तक पहुंच प्रदान कर सकता है।
  • इंटरनेट लोगों को जीवन भर नए कौशल और ज्ञान सीखने की संभावनाएं प्रदान करके निरंतर व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास को बढ़ावा देता है। ऑनलाइन सीखने से विकलांग लोगों के लिए पहुंच में सुधार हुआ है। मदद करने वाली प्रौद्योगिकी और विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने वाले ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से अधिक लोग सीखने में भाग ले सकते हैं।
  • आधुनिक कार्यबल की जरूरतों के लिए छात्रों को तैयार करने के लिए, ऑनलाइन शिक्षा अक्सर वास्तविक दुनिया और व्यावहारिक कौशल के उदाहरणों को जोड़ती है जो व्यवसायों और दैनिक जीवन पर तुरंत लागू होते हैं। अपनी पहुंच, अनुकूलनशीलता और छात्रों को ढेर सारे ज्ञान और संसाधनों से जोड़ने की क्षमता के कारण, इंटरनेट शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभरा है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी विकसित होती है और सीखने की प्रक्रिया में और अधिक एकीकृत हो जाती है, शिक्षा में इसकी भूमिका संभवतः विस्तारित होती रहेगी।

हालाँकि यह मान्यता बढ़ती जा रही है कि शिक्षा के लिए इंटरनेट तक पहुंच आवश्यक है, फिर भी कई क्षेत्रों में अभी भी डिजिटल विभाजन से जुड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जैसे सामर्थ्य, बुनियादी ढांचे और डिजिटल साक्षरता के मुद्दे।

भारत में शिक्षा के लिए सरकारी पहल

आज हमारी सरकार ने भी शिक्षा के लिए इंटरनेट के महत्व को पहचाना है और अपनी पहल के तहत ई-लर्निंग को बढ़ावा देने में बहुत सक्रिय है। यह कई योजनाएं लेकर आया है जहां यह छात्रों को स्मार्टफोन और लैपटॉप प्रदान करता है ताकि संबंधित लड़कों और लड़कियों को सीखने में आसानी हो।

छात्रों के लिए इंटरनेट शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई पहल चल रही हैं और शुरू की गई हैं।

पीएम ईविद्या योजना एक ऐसी पहल है जिसे वर्ष 2020 में शुरू किया गया था। इसे डिजिटल, ऑनलाइन या प्रसारण शिक्षा से संबंधित सभी पहलों का आयोजन करके शिक्षा में उपलब्ध निष्पक्ष मल्टीमॉड को बढ़ावा देने के लक्ष्य के साथ लाया गया था।

ज्ञान साझा करने के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचा, जिसे दीक्षा के नाम से जाना जाता है, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा ई-लर्निंग के लिए की गई सबसे महत्वपूर्ण पहल में से एक है। भारत में स्कूली शिक्षा के लिए इसका आदर्श वाक्य ‘एक राष्ट्र, एक डिजिटल प्लेटफॉर्म’ है। यह एक राष्ट्रीय मंच है जो सभी राज्यों के स्कूलों में कक्षा 1 से 12 तक के लिए उपलब्ध है। यह राष्ट्र के युवाओं के लिए शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शिक्षकों को सीखने की सुविधा प्रदान करता है। यह शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के साथ-साथ शिक्षकों के लिए शिक्षण संसाधन और मूल्यांकन भी देता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहल ई-पाठ्यपुस्तकें हैं जो ई-पाठशाला मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल की मदद से प्रदान की जाती हैं, जिन तक सभी छात्र, शिक्षक और अभिभावक पहुंच सकते हैं।

ऐतिहासिक फैसले

टी.एम.ए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002)

सर्वोच्च न्यायालय का एक बहुत ही ऐतिहासिक मामला, टी.एम.ए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002), इस बात से संबंधित था कि भारत में निजी संस्थान या सरकार द्वारा सहायता प्राप्त नहीं होने वाली संस्था पर सरकार का कितना नियंत्रण होना चाहिए। 2002 में निर्णय आने के बाद इस मामले का भारत में शिक्षा पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा।

मामले के तथ्य

कर्नाटक राज्य में, टीएमए पाई फाउंडेशन द्वारा कई शैक्षणिक संस्थान चलाए गए, जिनमें मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ इंजीनियरिंग कॉलेज भी शामिल थे। ये सभी शिक्षा संस्थान किसी भी सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं थे और स्ववित्तपोषित संस्थान थे।

कर्नाटक राज्य ने सरकारी आदेश जारी करके ऐसे निजी पेशेवर कॉलेजों के प्रवेश, शुल्क और प्रबंधन पर नियम लागू कर दिए जो स्ववित्तपोषित थे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 30(1) के आधार पर, टीएमए पाई फाउंडेशन ने इसे अदालत में चुनौती दी और इसे उपर्युक्त अनुच्छेदों में प्रदान किए गए गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ उनकी स्वायत्तता का हनन बताया। 

उठाए गए मुद्दे 

जब मामला अदालत में आया तो मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सरकार उन शैक्षणिक संस्थानों पर नियम लागू करेगी जिन्हें प्रवेश और शुल्क के संबंध में विशेष सहायता नहीं मिली थी। एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह तय करना था कि इन स्व-वित्तपोषित निजी शिक्षण संस्थानों को प्रशासन और प्रबंधन के मामले में कितनी स्वायत्तता मिलेगी।

अदालत का फैसला

भारत का माननीय सर्वोच्च न्यायालय इन मुद्दों को संबोधित करता है और इन गैर-सहायता प्राप्त निजी शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांतों को निर्धारित करता है। माननीय न्यायालय ने कहा कि इन शैक्षणिक संस्थानों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 30(1) के तहत अपने स्वयं सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थानों को स्थापित करने के साथ-साथ प्रशासक करने की भी स्वायत्तता प्राप्त है, इसका सीधा सा अर्थ है कि उन्हें यह अधिकार है की वह यह निर्धारित कर सकते है कि वे कौन सी शुल्क उनकी प्रबंधन प्रक्रियाएँ और उनके प्रवेश मानदंड लेना चाहते हैं, यह कहते हुए, अदालत ने आगे कहा कि प्रवेश प्रबंधन की इच्छा पर आधारित नहीं होना चाहिए और योग्यता आधारित प्रवेश की आवश्यकता निर्धारित की गई है।

अदालत ने आगे बढ़कर उचित नियम लागू करने के सरकार के अधिकार को मान्यता दी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये निजी संस्थान अपने शिक्षा के स्तर को बनाए रखें और किसी भी कदाचार (मालप्रेक्टिस) में लिप्त न हों। इन नियमों के पीछे का इरादा निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना होगा, लेकिन इन स्व-वित्तपोषित संस्थानों की आवश्यक स्वायत्तता में हस्तक्षेप करना नहीं होगा।

निर्णय यह स्पष्ट धारणा देता है कि स्व-वित्तपोषित निजी शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित करने और प्रशासित करने की स्वतंत्रता है, लेकिन सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए उचित नियम लागू कर सकती है कि शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता न हो और संस्थान अपने प्रबंधन के काम में अच्छा अभ्यास जारी रखे। 

इस्लामिक शिक्षा अकादमी बनाम कर्नाटक राज्य (2003)

भारत में, जहां हर अधिकार को मान्यता दी जाती है और उसका जश्न मनाया जाता है, वहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों से और भी अधिक सावधानी से निपटा जाता है और इस्लामिक शिक्षा अकादमी बनाम कर्नाटक राज्य (2003) का मामला ऐसा ही एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इस एक और ऐतिहासिक मामले में, अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों और उनके अधिकारों से निपटा गया।

मामले के तथ्य

एक शैक्षणिक संस्थान होने के नाते इस्लामिक शिक्षा अकादमी ने कर्नाटक राज्य में मेडिकल कॉलेज सहित कई स्कूल और कॉलेज चलाए और यह एक अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान होने का दावा करता था जो मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय को एक अल्पसंख्यक संस्था के रूप में शिक्षा प्रदान करता था और इस प्रकार, उसने अपनी स्वायत्तता और अधिकारों की सुरक्षा की मांग की। एक सरकारी आदेश द्वारा, कर्नाटक राज्य ने इस्लामिक शिक्षा अकादमी द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेज के लिए छात्रों के प्रवेश और चयन पर कुछ नियम लागू किए। इस विनियमन को इस्लामिक शिक्षा अकादमी ने यह कहते हुए चुनौती दी कि यह अल्पसंख्यक संस्थान होने के उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

उठाए गए मुद्दे 

जब मामला अदालत में आया तो मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सरकार उन शैक्षणिक संस्थानों पर नियम लागू करेगी जिन्हें प्रवेश और शुल्क के संबंध में विशेष सहायता नहीं मिली थी। एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह तय करना था कि इन स्व-वित्तपोषित निजी शिक्षण संस्थानों को प्रशासन और प्रबंधन के मामले में कितनी स्वायत्तता मिलेगी।

अदालत का फैसला

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए और भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत संस्थान को संचालित करने और अपनी स्वयं की प्रवेश प्रक्रिया स्थापित करने के अधिकार को मान्यता देने वाले इस्लामिक शिक्षा अकादमी के दावे को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि इस्लामिक शिक्षा अकादमी को अपने द्वारा संचालित संस्थानों के लिए प्रवेश मानदंड निर्धारित करने में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त है।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक सरकार यह प्रदर्शित नहीं कर पाती कि उसके द्वारा लागू किए गए नियम शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं और वे संस्थानों की स्वायत्तता में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करते हैं, राज्य सरकार अपने प्रवेश नियमों को अल्पसंख्यक संस्थानों पर नहीं थोप सकती। हालाँकि, अदालत ने आगे कहा कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का अपने समुदाय से अपनी पसंद के छात्र को प्रवेश देने का अधिकार पूर्ण नहीं है और प्रवेश प्रक्रिया में अनिवार्य रूप से निष्पक्षता, पारदर्शिता की आवश्यकता है और इसे अन्य योग्य उम्मीदवारों के खिलाफ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं माना जाना चाहिए। 

और यह भी निर्धारित किया गया कि सरकार अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान में प्रवेश के संबंध में नियम लागू कर सकती है, लेकिन उन्हें यह सुनिश्चित करने तक ही सीमित होना चाहिए कि प्रवेश प्रक्रिया निष्पक्ष, गैर-शोषक थी और यह भारत के संविधान के तहत निहित सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करती थी।

पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005)

पी.ए.  इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) के मामले में भारत में सर्वोच्च न्यायालय का एक महत्वपूर्ण निर्णय है जो निजी गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश को विनियमित करने में सरकार की भूमिका के मुद्दे से संबंधित है। इस मामले का फैसला 2005 में हुआ और इसका भारत में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव पड़ा।

मामले के तथ्य

यह मामला महाराष्ट्र राज्य में मेडिकल और डेंटल कॉलेजों सहित निजी गैर-सहायता प्राप्त व्यावसायिक कॉलेजों में प्रवेश के विनियमन के इर्द-गिर्द घूमता है। महाराष्ट्र सरकार ने इन कॉलेजों में प्रवेश के लिए एक सामान्य प्रवेश परीक्षा लागू की थी। सीटों का एक निश्चित प्रतिशत राज्य के सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए आरक्षित था, और दूसरा प्रतिशत सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के छात्रों के लिए आरक्षित था। बाकी सीटें ओपन मेरिट और मैनेजमेंट कोटा के लिए उपलब्ध थीं। पी.ए. इनामदार द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए निजी गैर सहायता प्राप्त कॉलेजों  ने सरकार के नियमों, विशेष रूप से सामान्य प्रवेश परीक्षा और सीट आरक्षण को को चुनौती, क्योंकि उनका मानना था कि यह उनकी स्वायत्तता और भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 30(1) के तहत गारंटीकृत अधिकार के अनुसार उनके संस्थानों को प्रशासित करने के उनके अधिकार का उल्लंघन है।

उठाए गए मुद्दे 

इस मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या निजी गैर-सहायता प्राप्त पेशेवर कॉलेजों में एक सामान्य प्रवेश परीक्षा और सीट आरक्षण लागू करने सहित प्रवेश का सरकार का विनियमन संवैधानिक रूप से मान्य था।

अदालत का फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में, केंद्रीय मुद्दे को संबोधित किया और निजी गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के विनियमन के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए:

अदालत ने निजी गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता को मान्यता दी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 30(1) के तहत अपने संस्थानों को स्थापित करने और प्रशासित करने के उनके अधिकार को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि हालांकि सरकार निष्पक्षता, पारदर्शिता और कदाचार की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए इन संस्थानों में प्रवेश को विनियमित कर सकती है, लेकिन ऐसे नियमों को इन संस्थानों के प्रशासन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

अदालत ने फैसला सुनाया कि सरकार द्वारा एक सामान्य प्रवेश परीक्षा लागू करना तब तक वैध था जब तक कि यह निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थानों के अपनी पसंद के छात्रों को प्रवेश देने के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के छात्रों के लिए आरक्षण संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है, लेकिन ऐसे आरक्षण का प्रतिशत उचित होना चाहिए और अत्यधिक नहीं होना चाहिए।

माननीय न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि योग्यता-आधारित प्रवेश आदर्श होना चाहिए, और प्रबंधन कोटा सीटें अनुचित सरकारी हस्तक्षेप के अधीन नहीं होनी चाहिए।

पी.ए.इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले ने भारत में निजी गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता की पुष्टि की और अपने संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने के उनके अधिकार को बरकरार रखा। हालाँकि, इसने निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रवेश को विनियमित करने में सरकार की भूमिका को भी मान्यता दी। यह मामला भारत में निजी पेशेवर कॉलेजों में प्रवेश के लिए कानूनी ढांचे को आकार देने में महत्वपूर्ण रहा है।

शिक्षा क्षेत्र में भारत का भविष्य

वर्तमान परिदृश्यों और समाज और प्रौद्योगिकी दोनों की बदलती जरूरतों को देखते हुए, शिक्षा प्रणाली में आने वाला कोई भी बदलाव निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ होगा।

2023 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत की शिक्षा प्रणाली में एक क्रांतिकारी आंदोलन है क्योंकि शिक्षा मंत्रालय ने पुराने समय से चले आ रहे पुराने मानदंडों को बदलने की कोशिश की है।

5 + 3 + 3 + 4 संरचना का उद्देश्य मौजूदा 10 + 2 संरचना की पारंपरिक प्रणाली को बदलने के लिए शैक्षिक ढांचा बनना है। इसका उद्देश्य नींव चरण, तैयारी चरण, मध्य विद्यालय चरण, माध्यमिक चरण आदि को संरचना में लाना है।

मौजूदा शिक्षा प्रणाली में उपर्युक्त संरचनात्मक परिवर्तन लाकर, नई शिक्षा नीति उस प्रणाली का परिचय देती है जहां छात्रों को नींव चरण के लिए 5 साल लगेंगे, उनके तीन साल प्रारंभिक चरण में निवेश किए जाएंगे, मध्य चरण के लिए 3 साल की आवश्यकता होगी और शेष 4 वर्ष उनके माध्यमिक चरण के लिए समर्पित होंगे। यह भारत में शिक्षा प्रणाली के इतिहास में एक प्रमुख परिवर्तनकारी बदलाव है।

नींव स्टेज 3 साल से 8 साल की उम्र के छात्रों के लिए होगा और इसका मूल उद्देश्य गतिविधि-आधारित शिक्षा और भाषा कौशल में बच्चे के विकास पर होगा।

8 से 11 वर्ष के आयु समूहों के लिए, प्रारंभिक चरण में शारीरिक शिक्षा, पढ़ना, लिखना, बोलना, कला आदि के साथ-साथ कक्षा में बातचीत की पेशकश की जाएगी।

मध्य चरण 11 से 14 वर्ष के आयु वर्ग को लक्षित करता है, जो बच्चों की महत्वपूर्ण शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करता है। इसके अलावा, यह विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, मानविकी, कला आदि में अनुभवात्मक शिक्षा प्रदान करता है।

अंतिम चरण, यानी माध्यमिक चरण, 14 वर्ष से 18 वर्ष की आयु के बच्चों में आलोचनात्मक सोच, नम्यता (फ्लेक्सिबिलिटी) और विषयों की पसंद के विकास के साथ-साथ बहु-विषयक शिक्षा प्रदान करता है।

इस नई नीति का प्राथमिक उद्देश्य भारत में शिक्षा के मानकों को वैश्विक स्तर पर लाना है जिससे हमारा देश ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरेगा क्योंकि हमारी नजर शिक्षा नीति के सार्वभौमिकरण (यूनिवर्सिलाइजेशन) पर भी है। नई नीतियों को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह प्रत्येक बच्चे की क्षमता को निर्धारित और पोषित करेगी, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करेगी और बच्चों को उनकी अपनी संस्कृति से परिचित कराएगी जो कि भारतीय संस्कृति है। इसका उद्देश्य आवश्यक और कुशल तरीके से प्रौद्योगिकी का उपयोग करना है। एक ऐतिहासिक बदलाव जो नीति में लाया जाना है, वह यह है कि विज्ञान, वाणिज्य और कला जैसी सीमित धाराएँ नहीं होंगी उन विषयों के साथ विशेष स्ट्रीम जो एक अलग विशेष स्ट्रीम के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, समय की आवश्यकता को पहचानते हुए, हमें उन विषयों के मिश्रण से परिचित कराया जाएगा जो केवल एक के लिए डिज़ाइन किए गए थे। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनकी प्रतिभा पर भी विशेष जोर दिया जाएगा।

शिक्षा के अधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय रुख

शिक्षा का अधिकार एक आवश्यक मानव अधिकार है जिसे कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों और एजेंसियों द्वारा स्वीकार किया गया है और इसकी वकालत की गई है। शिक्षा के अधिकार पर दुनिया की स्थिति कई अंतरराष्ट्रीय संधियों, घोषणाओं और समझौतों पर आधारित है जो एक मौलिक मानव अधिकार और अर्थव्यवस्था की वृद्धि और समाज की उन्नति में एक महत्वपूर्ण चर (वेरिएबल) के रूप में शिक्षा के मूल्य को रेखांकित करती है। ये समझौते देशों को प्राथमिक स्कूली शिक्षा और महिलाओं और पुरुषों की समानता पर ध्यान देने के साथ उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच के लक्ष्यों को साकार करने की दिशा में काम करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं।

शिक्षा के अधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के कुछ उल्लेखनीय पहलू नीचे सूचीबद्ध हैं:

  • दुनिया भर में क्रांतियाँ

यह फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति थी जिसने अपने आप में शिक्षा को एक सार्वजनिक समारोह के रूप में स्थापित किया, जिसके पहले 18वीं और 19वीं शताब्दी के युग में, शिक्षा की जिम्मेदारी माता-पिता के कंधों पर थी, जिसमें कई लोगों के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं थी।

19वीं शताब्दी तक, सर कार्ल मार्क्स ने समाजवाद पर अपने विचारों को व्यक्त करते हुए शिक्षा को व्यक्ति के कल्याणकारी अधिकारों में से एक के रूप में संदर्भित किया, जब उन्होंने कहा कि एक लाभकारी संस्थान होने के नाते राज्य का एक प्राथमिक कार्य है जो न केवल सकारात्मक सरकारी हस्तक्षेपों और विनियमों के माध्यम से समुदाय के आर्थिक बल्कि सामाजिक कल्याण को भी सुनिश्चित करना है।

इसके अलावा 1917 में रूसी क्रांति के बाद, समाजवादी विचार स्वीकार्य हो गए और 1936 के सोवियत संविधान का अनुच्छेद 121 पहला प्रावधान था जिसने स्पष्ट रूप से शिक्षा के अधिकार को मान्यता दी और राज्यों को भी इसे प्रदान करने के लिए बाध्य किया।

  • मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा, 1948

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 26 द्वारा, शैक्षिक अधिकार के लिए नैतिक आधार स्थापित किए गए क्योंकि यह स्पष्ट रूप से बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है और यह कम से कम प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर मुफ़्त होना चाहिए। इसके अलावा, इसमें कहा गया है कि प्राथमिक स्कूली शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए और तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा व्यापक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए और बिना किसी भेदभाव के उच्च शिक्षा योग्यता के आधार पर सभी के लिए खुली होनी चाहिए।

  • संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद, 1945

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा शिक्षा के अधिकार पर विशेष प्रतिवेदक (रापपोर्टर) की प्रारंभिक रिपोर्ट में माना गया कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की परिकल्पना है कि प्रत्येक बच्चे को बिना किसी भेदभाव के नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का अधिकार होना चाहिए।

  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, 1945

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) का एक लक्ष्य सभी लोगों को शैक्षिक अवसर प्रदान करना और उनमें सभी को समान अवसर, व्यवहार और शिक्षा की शर्तों को बढ़ावा देना है। चूंकि लगभग सभी राज्य यूनेस्को के सदस्य हैं, इसलिए यह कहना व्यवहार्य है कि वे उपर्युक्त लक्ष्य के अनुरूप भी हैं।

1974 के मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय समझ सहयोग और शांति और शिक्षा के लिए शिक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन के अनुच्छेद 1 (a) में ‘शिक्षा’ शब्द का बहुत व्यापक अर्थ सामने रखा गया है। इसमें कहा गया है कि शिक्षा की पूरी प्रक्रिया सामाजिक जीवन की एक प्रक्रिया है जो व्यक्तियों के साथ-साथ सामाजिक प्राणियों के समूहों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय दोनों के लाभ के लिए अपने भीतर सचेत रूप से, अपने दृष्टिकोण, अपने गुणों, अपने ज्ञान और अपनी पूरी क्षमताओं को विकसित करना सिखाती है।

  • मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए यूरोपीय सम्मेलन, 1950

मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए यूरोपीय सम्मेलन, 1950 का अनुच्छेद 2 शिक्षा के अधिकार को व्यक्त नहीं करता है, लेकिन यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय द्वारा इस हद तक व्यापक रूप से व्याख्या की गई है कि इसमें शिक्षा का अधिकार भी शामिल है।

  • बाल अधिकारों की घोषणा, 1959

फिर प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद, राष्ट्र संघ ने बाल अधिकारों की घोषणा को अपनाया, जिसे व्यापक रूप से और सबसे प्रसिद्ध जिनेवा घोषणा के रूप में भी जाना जाता है। हालाँकि, इसमें शिक्षा के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई थी, लेकिन इसके तीन सिद्धांत समान थे, जिसमें बताया गया था कि एक बच्चे को उसके विकास के लिए आवश्यक संसाधन कैसे प्रदान किए जाने चाहिए, पिछड़े बच्चों की सहायता कैसे की जानी चाहिए और ऐसी स्थिति में रखा जाए कि वह जीविकोपार्जन कर सके और एक बच्चे को कैसे सहायता प्रदान की जानी चाहिए। उपरोक्त दिशा के आलोक में, इस घोषणा को एक बच्चे के लिए शिक्षा के विकास की दिशा में पहला कदम माना जाता है।

इसके अलावा, ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन (1954) के मामले में, संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक जिम्मेदारियों के प्रदर्शन के साथ-साथ इन्हें नागरिकों को दिए गए अधिकारों के प्रयोग के लिए भी इसके महत्व को पहचानकर शिक्षा की जीवन शक्ति को मान्यता दी। माननीय न्यायालय ने आगे बढ़कर कहा कि शिक्षा सामाजिक मूल्यों को भावी पीढ़ियों तक प्रसारित करने का प्राथमिक साधन है।

  • अर्थशास्त्र, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध, 1976

अर्थशास्त्र, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के अनुच्छेद 13 के तहत गरिमा और शिक्षा के बीच एक कड़ी स्थापित है, जिसका उद्देश्य यह था कि शिक्षा मानव व्यक्तित्व के पूर्ण विकास और इसकी गरिमा की भावना की दिशा में निर्देशित करती है, शिक्षा को किसी व्यक्ति के गरिमापूर्ण अस्तित्व की आवश्यकता के रूप में मान्यता देती है।

  • 1960 का शिक्षा में भेदभाव के विरुद्ध सम्मेलन 

1960 का शिक्षा में भेदभाव के विरुद्ध सम्मेलन, बिना किसी भेदभाव के एक अंतर्राष्ट्रीय मानदंड के रूप में समान शिक्षा के अवसरों की मौलिक अवधारणा की परिकल्पना करता है।

  • बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, 1991

लिंग, जाति, पंथ, नस्ल, आर्थिक पृष्ठभूमि, धर्म आदि की परवाह किए बिना किसी भी व्यक्ति के जीवन में शिक्षा एक बहुत ही बुनियादी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण अधिकार है। यह अधिकार बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन  में अपना स्थान पाता है, जो इतिहास में सबसे व्यापक रूप से अनुमोदित मानवाधिकार संधियों में से एक है क्योंकि इसे संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़कर सभी राज्यों द्वारा अनुमोदित किया गया था। हर देश का मानना है कि एक चीज जो गरीबी को खत्म कर सकती है वह शिक्षा है क्योंकि यह एक बच्चे को न केवल जीवन कौशल सीखने की अनुमति देती है बल्कि उस ज्ञान को भी प्राप्त करने की अनुमति देती है जो जीवन में आने वाली चुनौतियों के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

“शिक्षित बनो, उत्तेजित रहो, संगठित रहो, आत्मविश्वासी रहो, कभी हार मत मानो, ये हमारे जीवन के पाँच सिद्धांत हैं”।

                                      -डॉ। बी.आर. अम्बेडकर

शिक्षा अपने आप में एक बहुत शक्तिशाली शब्द है, भले ही हम इसकी बात करें। बिना शिक्षा के व्यक्ति का दिमाग केवल खोखला हो सकता है लेकिन शिक्षा से उस खोखलेपन को पूरा किया जा सकता है। और शुक्र है कि इसे न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियमों, मानदंडों, दिशानिर्देशों और विभिन्न अन्य रूपों में मान्यता दी गई है।

शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जो व्यक्ति के साथ-साथ समाज की वृद्धि और विकास, बेहतर वर्तमान और बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक है।

यही कारण है कि मेरा देश बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में इतना सक्रिय रूप से शामिल रहा है। आज कई स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं, चाहे वे सरकारी हों या निजी संस्थान, सभी का एक ही उद्देश्य है- किसी भी तरह के भेदभाव से मुक्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, ताकि बच्चे के भविष्य को आकार दिया जा सके, जो बदले में देश के भविष्य को आकार देने में सक्षम होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या शिक्षा एक अधिकार है या विशेषाधिकार?

अक्सर यह वकालत की जाती है कि शिक्षा एक अधिकार है न कि विशेषाधिकार। शिक्षा को एक मानव अधिकार माना जाता है और इसे एक बहुत शक्तिशाली हथियार के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि शिक्षा किसी भी चीज़ से ऊपर लोगों की मानसिक क्षमता का मार्गदर्शन करती है। यूनिसेफ का मानना है कि हमारी शिक्षा प्रणाली का प्रक्षेप पथ (ट्रेजेक्टरी) भविष्य का प्रक्षेप पथ है और आज सीखने के निम्न स्तर का मतलब कल कम अवसर है।

मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत में, आबादी का एक बड़ा हिस्सा पढ़ने-लिखने से बहुत दूर है, यहाँ तक कि वे अपने दस्तावेज़ों पर अपने हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते हैं और इसके स्थान पर उनके लिए अंगूठे के निशान का उपयोग किया जाता है। इस पर अंकुश लगाने के लिए, यदि शिक्षा मुफ़्त और अनिवार्य हो तो यह किसी भी व्यक्ति पर बोझ नहीं बनेगी जो शिक्षा प्राप्त करने के बारे में एक सेकंड के अंश के लिए भी सोचता है। इसके परिणामस्वरूप वह व्यक्ति प्रवेश लेने और अपनी साक्षरता में सुधार करने के लिए कदम उठा सकता है।

शिक्षा नीति का क्या महत्व है?

जैसे प्रक्रियात्मक कानून, मूल कानून के लिए महत्वपूर्ण है, वैसे ही शिक्षा के अधिकार की गारंटी के लिए शिक्षा नीति महत्वपूर्ण है। यह शिक्षा प्रदान करने के लिए अपनाए जाने वाले मानक स्थापित करने के बजाय एक नीति के रूप में काम करता है। इसका उद्देश्य केवल एक बच्चे को शिक्षित करना नहीं है, बल्कि उस बच्चे को यथासंभव नवीनतम और सबसे कुशल तरीके से शिक्षा प्रदान करना है।

क्या बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का शिक्षा के अधिकार से कोई मेल है?

हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2014 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पहल शुरू की। इसका उद्देश्य बालिकाओं के बीच जागरूकता फैलाना और बड़े पैमाने पर महिलाओं के कल्याण में सुधार करना है। यह माना गया है कि शिक्षा महिलाओं को सशक्त बनाती है, यही कारण है कि इसे इस योजना के एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू के रूप में शामिल किया जा रहा है।

संदर्भ

  • Justice Jasti Chelameswar and Justice Dama Seshadri Naidu, M P Jain Indian Constitutional Law 1280 (Saurabh Printers Pvt. Ltd., Greater Noida, 8th ed., 2018)

 

लोकतंत्र के सिद्धांत

यह लेख पैरालीगल एसोसिएट डिप्लोमा कर रहे Mukhtar Ahmad द्वारा लिखा गया है और Shashwat Kaushik द्वारा संपादित किया गया है। इस ब्लॉग पोस्ट मे लोकतंत्र क्या है और लोकतंत्र के सिद्धांत, विशेषताओ के बारे मे चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

सुशासन एक ऐसी चीज़ है जो हर कोई चाहता है। प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति, लोगों की सामाजिक आवश्यकताएं, जनता की आर्थिक चिंताएं, नागरिकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों का निर्धारण, संस्कृति को अपनाना और रीति-रिवाजों के अनुसार रहना मानव जीवन के सभी महत्वपूर्ण पहलू हैं जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है, जीवन के सामान्य क्रम में आवश्यक लोगों के हितों और इच्छाओं के अनुसार विनियमित, संरक्षित और प्रचारित किया जाता है। लोकतांत्रिक सरकार शासन का एक रूप है जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक माहौल में लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। 

सरकार के विभिन्न रूप हैं जिनका प्रयोग राज्य कर रहे हैं; हालाँकि, उन सभी में, सरकार का लोकतांत्रिक स्वरूप जनता द्वारा अच्छी तरह से स्वीकार किया जाता है क्योंकि यह लोगों की इच्छाओं और हितों की गारंटी देता है। सरल शब्दों में, लोकतंत्र को ‘कानूनों और नीतियों के शासन में जनता की अप्रत्यक्ष भागीदारी’, या “लोगों द्वारा प्रशासन” के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। 

लोकतंत्र क्या है 

लोकतंत्र जिसे अंग्रेजी में डेमोक्रेसी कहते हैं, ग्रीक शब्द ‘डेमोस’ और ‘क्रटिया’ से बना है, जिसका अर्थ है लोगों का शासन। यह सरकार का एक रूप है जहां लोग समय पर चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। ऐसी प्रक्रिया में, बहुमत के पास शक्ति होती है। सरकार का लोकतांत्रिक स्वरूप प्रशासनिक कार्यों में कानून के शासन और लोगों की इच्छा का पालन करता है। लोगों को स्वतंत्र भाषण और अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक संघ बनाने के अधिकार की गारंटी दी जाती है। 

मुख्य रूप से, लोकतांत्रिक सरकार लोगों के साझा हितों में कार्य करती है और सरकार चलाने के लिए राजनेताओं के एक विशेष समूह को पूरी शक्ति देने की अनुमति नहीं देती है, जैसा कि राजशाही और तानाशाही में होता है। 

संवैधानिक रूप से, सरकार के अंगों के बीच शक्ति का पृथक्करण (सेपरेशन) होना चाहिए ताकि कोई दूसरे को प्रभावित न कर सके, और सरकार का प्रत्येक अंग बिना किसी प्रभाव के पारंपरिक और सुविधाजनक रूप से काम करता है। 

लोकतंत्र की विशेषताएँ

एक लोकतांत्रिक सरकार में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए; 

कानून का शासन

कानून की सर्वोच्चता लोकतंत्र की मूलभूत विशेषताओं में से एक है। राजनीतिक हस्तियों सहित लोगों को अपने जीवन के दौरान कानून की सर्वोच्चता का पालन करना चाहिए। कानून के समक्ष सभी को समान माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति राज्य के सर्वोच्च आदेश के रूप में कानून का पालन करने के लिए संवैधानिक दायित्व के तहत रहता है, और कोई भी कानून से बच नहीं सकता है। 

समानता

लोकतंत्र का एक आवश्यक पहलू समानता है। समानता लोगों के बीच निष्पक्षता लाती है; यह शक्तिशाली लोगों और कमजोर वर्गों के बीच संतुलन बनाने में भी मदद करता है। जाति, धर्म, लिंग, भाषा, लिपि, संस्कृति या इनमें से किसी के आधार पर बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को समान रूप से देखने और व्यवहार करने के लिए राज्य पर संवैधानिक प्रतिबंध हैं। 

मौलिक अधिकार

लोकतंत्र में, यह सरकार का कर्तव्य है कि वह कुछ प्रकार के अधिकारों, जैसे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मानव अधिकारों, जो अविभाज्य हैं, की गारंटी के लिए संवैधानिक प्रावधान बनाए। गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए मौलिक स्वतंत्रता अनिवार्य है। मौलिक स्वतंत्रताएं राज्य को यह नकारात्मक धारणा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं कि राज्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता है और व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं कर सकता है और अधिकारों के उल्लंघन और उन अधिकारों पर अतिक्रमण के मामलों में, अधिकारों को लागू करने का एक उपाय है। मौलिक अधिकार राज्य में सत्तावादी शासन की स्थापना को भी रोकते हैं। ये अधिकार वैश्विक स्तर पर व्यक्तियों और राज्य के समग्र विकास के लिए आवश्यक हैं। 

न्यायपालिका

लोकतंत्र में न्यायपालिका सरकार के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। न्यायपालिका राज्य के किसी अन्य अंग से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। न्यायपालिका कानून की सर्वोच्चता सुनिश्चित करती है और व्यक्तियों को शोषण और उनके अधिकारों के उल्लंघन से बचाती है। यह गारंटी देती है कि राज्य के प्रत्येक अंग को अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर काम करना चाहिए और अपनी सीमाओं से परे नहीं जाना चाहिए और सरकार के प्रत्येक अंग को उस चीज़ से आगे नहीं जाना चाहिए जिसके वे हकदार नहीं हैं। इस प्रकार, यह संवैधानिक सीमाएँ बनाती है और सरकार के प्रत्येक प्रशासनिक कार्य के लिए संवैधानिक दिशानिर्देश निर्धारित करता है। 

नागरिक शिक्षा

शिक्षा आम लोगों को सशक्त बनाती है और उन्हें यह निर्णय लेने के योग्य बनाती है कि क्या वैध है और क्या नहीं, बड़े पैमाने पर समाज के लिए क्या सही है और क्या नहीं। वे राष्ट्र के समग्र विकास को समझने में सक्षम हो गये। अत: सभी को शिक्षा प्रदान करने वाली एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण आवश्यक है। यदि लोग शिक्षित होंगे तो वे राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकेंगे। लोग शिक्षित होकर, अन्य बातों के अलावा, राजनीतिक गतिविधियों और सामाजिक गतिविधियों में क्रमिक रूप से भाग ले सकते हैं। महत्वपूर्ण रूप से, नागरिक शिक्षा सिखाती है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे के काम और प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप किए बिना नागरिकों के लिए नीतियां, नियम और कानून बनाने के लिए एक साथ कैसे कार्य करते हैं। इस प्रकार, वे जाँच और संतुलन बनाते हैं। 

लोकतंत्र के सिद्धांत

शास्त्रीय सिद्धांत

एथेंस पहला शहर-राज्य था जिसमें लोकतंत्र का अभ्यास किया गया था, जिसे लोकप्रिय रूप से शास्त्रीय/प्रत्यक्ष लोकतंत्र या एथेनियन लोकतंत्र के रूप में जाना जाता था। एथेंस ने सीधे निर्णय लेने की प्रक्रिया और कानून की प्रक्रिया में भाग लिया था। 

शास्त्रीय लोकतंत्र के मुख्य आदर्श निम्नलिखित हैं: 

  1. सभी लोगों के बीच समान अवसर और समानता;
  2. कानूनों और व्यक्तियों की स्वतंत्रता का सम्मान;
  3. नीति निर्माण एवं विधायी कार्यों में सभी लोगों की सीधी भागीदारी;
  4. एक निष्पक्ष एवं पारदर्शी मतदान प्रणाली; और
  5.  व्यक्तियों के अधिकार और विशेषाधिकार।

एक्लेसिया

एथेनियन लोकतंत्र में, तीन महत्वपूर्ण संस्थाएँ थीं। उनमें से एक थी एक्लेसिया, जिसे असेंबली के नाम से भी जाना जाता है। असेंबली में भाग लेने के लिए प्रत्येक वयस्क नागरिक का एक्लेसिया में स्वागत किया गया। असेंबली एक्रोपोलिस के पश्चिम में एक पहाड़ी सभागार में वर्ष में 40 बार आयोजित की जाती थी। 

वे नई नीतियों, कानूनों, युद्ध संबंधी निर्णयों और विदेश नीतियों पर चर्चा करते हैं और यदि उन्हें लगता है कि मौजूदा कानूनों में संशोधन की आवश्यकता है, तो वे बैठक में भाग लेने वाले सदस्यों के परामर्श से उनमें संशोधन करते हैं। समूह ने साधारण बहुमत से यह निर्णय लिया था। 

बौले

500 वयस्क नागरिकों की एक परिषद, जिसमें दस एथेनियन जनजातियों में से प्रत्येक से 50 शामिल थे, ने समिति के कार्यकारी के रूप में कार्य किया और उन्हें एक वर्ष के लिए चुना गया था। एक्लेसिया के विपरीत, समिति नौसेना के जहाजों (ट्राइरेमी) और सेना के घोड़ों पर चर्चा और निगरानी के लिए हर दिन बैठक करेगी। समिति ने अन्य शहर-राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ भी विचार-विमर्श किया था। इससे एक्लेसिया द्वारा जल्द से जल्द निर्णय लिए जाने वाले महत्वपूर्ण मामलों को तय करने में भी मदद मिली।

डिकैस्टेरिया

तीसरी महत्वपूर्ण संस्था डिकैस्टेरिया, या “जूरी” थी। जूरी सदस्यों को लॉटरी द्वारा चुना गया था और इसमें 30 से अधिक पुरुष थे। सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से, अरस्तू ने तर्क दिया कि डिकास्टेरिया ने “लोकतंत्र की मजबूती में सबसे अधिक योगदान दिया” क्योंकि जूरी के पास लगभग असीमित शक्ति थी। 

एथेंस में कोई पुलिस व्यवस्था नहीं थी। एथेंस के लोग अपने मामलों के साथ डिकैस्टेरा आ सकते थे और दोषियों पर मुकदमा चला सकते थे, और अधिकांश जूरी सदस्य मामले का फैसला करते थे। इस बात की निश्चितता थी कि डिकैस्टेरिया के सामने किस तरह का मामला लाया जा सकता है और किस तरह का मामला नहीं लाया जा सकता है। इस प्रकार, यह प्रथा बन गई कि सभी छोटे और बड़े मामलों को निर्णय के लिए लाया गया। जूरी सदस्यों को भी भुगतान मिलता था। 

सभी वयस्क लोग सरकार और विधायी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए बाध्य थे; यहाँ तक कि यदि कोई वयस्क सरकार में भाग लेने की उपेक्षा और परहेज करता था, तो ऐसे व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जाता था। नागरिकों के रूप में पहचानने और व्यवहार करने की उनकी अलग-अलग अवधारणाएँ थीं। केवल वयस्क पुरुषों को ही नागरिक माना जाता था; महिलाओं, बच्चों और दासों को नागरिक नहीं माना जाता था और इसलिए वे मत नहीं दे सकते थे। 

सभी नागरिक अपने विचार व्यक्त करने और नीतियों पर बहस करने के साथ-साथ एक व्यवस्थित तरीके से अपना मत देने के लिए स्वतंत्र थे जिसे शास्त्रीय लोकतंत्र कहा जाता है। 

सुरक्षात्मक लोकतंत्र

अधिकार आधारित लोकतंत्र के रूप में सुरक्षात्मक लोकतंत्र सत्रहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में उभरा था। 

हेवुड के अनुसार,”लोकतंत्र को एक तंत्र के रूप में कम देखा जाता था जिसके माध्यम से जनता राजनीतिक जीवन में भाग ले सकती थी, और एक उपकरण के रूप में अधिक देखा जाता था जिसके माध्यम से नागरिक खुद को सरकार के अतिक्रमण से बचा सकते थे, इस तरह यह सुरक्षात्मक लोकतंत्र है ।” 

एक सुरक्षात्मक लोकतंत्र में, लोग अपनी नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा करने का इरादा रखते हैं, या यह कहा जा सकता है कि लोगों ने एक सुरक्षात्मक लोकतंत्र के माध्यम से अपनी भलाई के लिए एक सुरक्षित और संरक्षित वातावरण बनाया है। प्लेटो का मानना था कि संरक्षक वर्ग का शासन इस उद्देश्य की उचित पूर्ति कर सकता है। लेकिन अरस्तू ने पूछा, अभिभावकों की रक्षा कौन करेगा? इन सभी विचारों से सुरक्षात्मक लोकतंत्र का उदय हुआ। 

अंग्रेज विचारक जॉन लॉक को सुरक्षात्मक लोकतंत्र के महान समर्थकों में से एक माना जाता था। उन्होंने बताया कि एक नागरिक की स्वतंत्रता और मत देने का अधिकार जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता जैसे अस्तित्व अधिकारों पर आधारित है, और जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार खुशी की खोज की गारंटी देता है। 

बेंथम, स्टुअर्ट मिल और मिल्स सभी ने सुरक्षात्मक लोकतंत्र के विचार की वकालत की थी। उपयोगितावाद की अवधारणा का प्रस्ताव है कि व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रता की किसी भी कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए क्योंकि ये लोकतंत्र के मूल सिद्धांत हैं। यह तर्क दिया गया कि लोकतंत्र सरकार का सर्वोत्तम रूप है जो मानव के इन बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा कर सकता है। 

सुरक्षात्मक लोकतंत्र की विशेषताएँ

सुरक्षात्मक लोकतंत्र की विशेषताएं हैं: 

  • सुरक्षात्मक लोकतंत्र लोकप्रिय संप्रभुता में विश्वास करता है; हालाँकि, लोग निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधे भाग नहीं ले सकते हैं; वे शासित होने के लिए प्रतिनिधि चुनते हैं।
  • लोकप्रिय संप्रभुता और प्रतिनिधि लोकतंत्र दोनों ही सरकार के वैध रूप हैं।
  • व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य इस तथ्य से असंगत है कि सरकार दृढ़ता से स्थापित करती है कि इन नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की जानी चाहिए या नहीं। 
  • विधायी प्रक्रियाओं से संबंधित हर कार्रवाई के लिए अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाता है; लोग सरकारी अधिकारियों को उनके कार्यालय आधारित कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए जिम्मेदार हैं।
  • सुरक्षात्मक लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पहलू सरकार के अंगों के बीच शक्ति का वितरण था। यह दूसरे पर अधिकार का नियंत्रण और संतुलन बनाएगा।
  • संविधान शक्ति का मुख्य स्रोत है। सभी विषयों को अपने दैनिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए संविधान के सिद्धांतों को अवश्य देना चाहिए।
  • जीवन का अधिक सामाजिक तरीका बनाने और किसी भी अधिकार के उल्लंघन के लिए आवाज उठाने के लिए लोगों के समूह का संगठन या संघ है। 
  • राजनीतिक दलों के बीच निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव प्रतिस्पर्धा।

लोकतंत्र का मार्क्सवादी सिद्धांत

लोकतंत्र पर मार्क्सवादियों के विचार वर्ग विश्लेषण की सामाजिक संरचना पर आधारित हैं। इसका मत था कि समाज दो वर्गों में विभाजित है; पूंजीपति वर्ग, जो संपत्ति का मालिक है, ‘बुर्जुआ’ और मजदूर वर्ग, जिसके पास कुछ भी नहीं है लेकिन वह हर समय श्रम करता है, ‘सर्वहारा’। सिद्धांत सुझाव देता है कि राजनीतिक शक्ति को पूंजीपति वर्ग द्वारा किए गए शोषण को चुनौती देने की स्थिति में होना चाहिए, और राजनीति का कर्तव्य है कि वह ऐसे शोषण से रक्षा करे। यह अवश्य कहता है कि बुर्जुआ लोकतंत्र शर्मनाक और नकली है क्योंकि यह लक्ष्य प्राप्त नहीं करता है; यह केवल एक विशिष्ट वर्ग के लोगों के लिए काम करता है। मार्क्सवादियों ने वकालत की कि समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना के लिए व्यक्तियों के लिए आर्थिक अधिकार हैं। 

मार्क्सवादियों के अनुसार, बुर्जुआ लोकतंत्र में, राज्य को आर्थिक अभिजात वर्ग-वित्त पूंजी द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इस वर्ग के सदस्य सत्ता संरचना की विभिन्न शाखाओं में प्रमुख पदों पर रहकर अपने वर्ग के हितों को बढ़ावा देने के लिए सरकार का उपयोग करते हैं। मार्क्सवादी सिद्धांत वर्ग के विभाजन और स्वामित्व और संपत्ति के नियंत्रण के मुख्य कारण के रूप में आर्थिक कारकों के महत्व पर जोर देता है। इसका प्रस्ताव है कि शिक्षा के माध्यम से, श्रमिक वर्ग राजनीतिक व्यक्तियों के साथ मिलकर समाजवादी समाज के लिए एक लोकतांत्रिक मार्ग बना सकता है, जो लोकतांत्रिक सरकार के भीतर वर्ग शोषण को दूर करेगा। 

मार्क्सवादी लोकतंत्र की विशेषताएँ

मार्क्सवादी लोकतंत्र की विशेषताएँ हैं: 

  • बुर्जुआ;
  • श्रमिक वर्ग;
  • समाजवादी लोकतंत्र ही इस विभाजन का समाधान है; 
  • यह उदार लोकतंत्र का विरोध करता है;
  • सफलता प्राप्त करने के साधन के रूप में शिक्षा; और
  • व्यक्तियों के आर्थिक अधिकारों पर जोर दिया जाना चाहिए। 

लोकतंत्र का अभिजात्यवादी (एलिटिस्ट) सिद्धांत

बीसवीं शताब्दी के दौरान, विचारकों ने समकालीन लोकतांत्रिक रूपों जिनका अभ्यास किया जा सकता है या अस्तित्व में हैं, उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया, जिनका अभ्यास किया जा सकता है या अस्तित्व में हैं, लेकिन सरकार के रूप में मान्यता प्राप्त होने से बहुत दूर हैं। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार ऐसे सिद्धांत सामने आए, उनके मुख्य योगदानकर्ता विल्फ्रेडो पेरेटो, गेटानो मोस्का, रॉबर्ट मिशेल्स और जेम्स बर्नहैम और सी.डब्ल्यू. मिल्स जैसे अमेरिकी लेखक थे। अभिजात वर्ग शब्द का उपयोग उन लोगों के बीच अल्पसंख्यक का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो शक्तिशाली लोगों से संबंधित होने या समुदाय के भीतर राजनीतिक मामलों में अनुपातहीन शक्ति होने जैसे कुछ कारकों के कारण उस समुदाय में लाभप्रद स्थिति में हैं। 

अभिजात वर्ग सिद्धांत बताता है कि समाज हमेशा अल्पसंख्यक समूहों द्वारा नियंत्रित और शासित होता है जो दूसरों से श्रेष्ठ होते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि दो प्रकार के लोग होते हैं: ‘विशेष चयनित’, या ‘संभ्रांत’, और ऐसे लोगों का समूह जिनमें कोई गुण नहीं होता है। अभिजात वर्ग विशेष रूप से राजनीति के माध्यम से सत्ता का आनंद लेता है और लोगों के बीच धन और अवसर के वितरण पर एकाधिकार रखता है। रॉबर्ट मिशेल्स, जिन्होंने ‘कुलीनतंत्र के लौह कानून’ के रूप में जाना जाता है, ने दावा किया कि गैर-अभिजात वर्ग को अभिजात वर्ग के अधीन होना चाहिए क्योंकि अधिकांश मनुष्य ‘उदासीन’, अकर्मण्य (इंडोलेंट), गुलाम और स्व-शासन के लिए स्थायी रूप से अक्षम हैं।

अभिजात्य लोकतंत्र की विशेषताएं

अभिजात्य लोकतंत्र की विशेषताएं हैं: 

  • लोग अपनी क्षमताओं में समान नहीं हैं और अभिजात वर्ग और गैर-अभिजात वर्ग का विकास अपरिहार्य है।
  • अपनी श्रेष्ठ क्षमताओं के कारण अभिजात वर्ग सत्ता पर नियंत्रण रख सकता है और प्रभाव पर नियंत्रण कर सकता है।
  • अभिजनों का समूह स्थिर नहीं होता तथा समूह में नए लोगों का प्रवेश तथा पुराने लोगों का बाहर जाना निरंतर होता रहता है।
  • गैर-अभिजात वर्ग का बहुसंख्यक जनसमूह उदासीन, आलसी और उदासीन है, और इसलिए नेतृत्व प्रदान करने के लिए एक सक्षम अल्पसंख्यक की आवश्यकता है।
  • आधुनिक समय में शासक अभिजात वर्ग मुख्य रूप से बुद्धिजीवी, औद्योगिक प्रबंधक या नौकरशाह हैं।

लोकतंत्र का बहुलवादी (प्लुरलिस्ट) सिद्धांत

मार्क्सवादी सिद्धांत और अभिजात वर्ग सिद्धांत, दोनों का प्रस्ताव है कि सत्ता कुछ लोगों के हाथों में निहित है और बहुमत हीन होने और स्वामित्व पर नियंत्रण न होने या किसी प्रभुत्व समूह से संबंधित होने के कारण सत्ता संभालने में सक्षम नहीं है। बहुलवादी सिद्धांत इन दोनों सिद्धांतों से भिन्न है। यह सुझाव देता है कि सत्ता किसी अल्पसंख्यक समूह में निहित नहीं है बल्कि सत्ता का वितरण है। राज्य के अंदर ऐसे संगठन और संस्था हैं जो बिजली का वितरण कर रहे हैं। ऐसे संगठन आवश्यकता पड़ने पर सरकार के निर्णयों को आकार भी देते हैं और बदलते भी हैं। ये समूह राजनीतिक रूप से सक्रिय समूह हैं जो जरूरत पड़ने पर राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं और बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को उठाते हैं। 

रॉबर्ट डाहल और लॉवेनस्टियन बहुलवादी सिद्धांत के मुख्य समर्थक हैं। आर.डाहल ने बहुलवादी लोकतंत्र का वर्णन करने के लिए ‘बहुशासन’ शब्द का इस्तेमाल किया और लॉवेनस्टीन ने बहुलवादी सिद्धांत को परिभाषित करने के लिए ‘बहुतंत्र’ शब्द का इस्तेमाल किया। 

लोकतंत्र के बहुलवादी सिद्धांत की विशेषताएँ

लोकतंत्र के बहुलवादी सिद्धांत की विशेषताएँ: 

  • समाज का आधार समूह है, व्यक्ति नहीं। यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेता है, तो वह उसमें अकेला नहीं है; ऐसे लोगों का एक समूह है जो समान राजनीतिक गतिविधि में भी भाग लेते हैं।
  • बहुलवादियों का सुझाव है कि समाज की संरचना संघीय है।
  • यह बहुदलीय प्रणाली का भी समर्थन करता है। ताकि निष्पक्ष एवं प्रतिस्पर्धी चुनावी व्यवस्था हो।
  • यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है। एक निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की कुंजी है।
  • सत्ता का विकेंद्रीकरण (डिसेंट्रालाइजेशन)।
  • यह सीमित राज्य की धारणा का समर्थन करता है।

निष्कर्ष

लोकतंत्र, या सरकार की प्रक्रिया, एक सतत, निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। लोकतंत्र की कोई सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) परिभाषा नहीं है जहां विद्वान और राजनीतिक विचारक, यहां तक कि न्यायविद भी एक बिंदु पर आते हैं और सामूहिक रूप से निष्कर्ष निकालते हैं कि यह सरकार का सबसे अच्छा रूप है। जनसंचार और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, हम आभासी लोकतंत्र भी देख रहे हैं, जो अभी शिशु अवस्था में है। अब तक सभी इस बात से सहमत हैं कि जब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती और निष्पक्ष एवं पारदर्शी विधायी कार्य नहीं होते और अपनाए नहीं जाते, तब तक इस प्रकार का शासन अच्छा है। इस प्रकार, आज के समाज में लोकतंत्र को सरकार का एक अच्छा रूप माना जाता है। 

संदर्भ

 

अनुबंध के आंशिक निष्पादन और विशिष्ट निष्पादन का सिद्धांत

यह लेख ग्राफ़िक एरा हिल यूनिवर्सिटी, देहरादून के Monesh Mehndiratta द्वारा लिखा गया है। लेख अनुबंधों के निष्पादन से संबंधित दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं की व्याख्या करता है। ये आंशिक निष्पादन (परफॉरमेंस) का सिद्धांत और अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन का सिद्धांत हैं। लेख सबसे पहले हाल के मामले के साथ-साथ आंशिक निष्पादन के सिद्धांत के अर्थ, अनुप्रयोग (एप्लीकेशन), उत्पत्ति और अनिवार्यताओं और संबंधित निर्णयों के साथ अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन की अवधारणा, इसके अर्थ, अनुप्रयोग और अन्य अनिवार्यताओं की व्याख्या करता है। इसका अनुवाद Pradyumn Singh ने किया है। 

परिचय 

A, एक व्यक्ति वचनग्रहीता (प्रॉमिसरी) ने B, एक अन्य व्यक्ति वचनकर्ता (प्रॉमिसी) से वादा किया था कि वह 50,000/- रुपये के भुगतान के बाद उसे सामान देगा और उसके साथ एक अनुबंध किया। भुगतान विधिवत किया गया था, लेकिन वचन कर्ता उक्त सामान वितरित करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप उस पर दूसरे व्यक्ति B द्वारा मुकदमा दायर कर दिया गया। आपके अनुसार वादा करने वाले पर मुकदमा करने का कारण क्या है?

हाँ, यह अनुबंध का निष्पादन है। वादाकर्ता अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप उस पर अनुबंध का पालन न करने का मुकदमा दायर किया गया।

इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि किसी अनुबंध का निष्पादन उसके आवश्यक पहलुओं में से एक है। एक बार जब पक्षों अनुबंध में प्रवेश कर लेते हैं, तो वे अपने-अपने कार्य करने और अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए बाध्य होते हैं। यदि उनमें से कोई भी ऐसा करने में विफल रहता है, तो यह अनुबंध का उल्लंघन है। यदि कोई पक्ष आंशिक रूप से अनुबंध का पालन करता है तो क्या होगा? क्या इसे अनुबंध का वैध निष्पादन माना जाएगा? इस सिद्धांत को लागू करते समय कौन सी नियमवाद शामिल हैं?

ये कुछ प्रश्न हैं जो अनुबंध के निष्पादन से संबंधित है। वर्तमान लेख आंशिक निष्पादन और अनुबंधों के विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांतों से संबंधित है। यह दोनों अवधारणाओं को अलग-अलग समझाता है। सबसे पहले, यह आंशिक निष्पादन के सिद्धांत, इसके विकास, अर्थ, अनिवार्यताओं (एसेंशियल), अनुप्रयोग और ऐतिहासिक निर्णयों की व्याख्या करता है। इसके अलावा, यह विशिष्ट निष्पादन की एक और अवधारणा को विस्तार से बताता है।

आंशिक निष्पादन का सिद्धांत

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का अर्थ 

संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम,1882 की धारा 53A के तहत भारत में आंशिक निष्पादन के सिद्धांत को मान्यता दी गई है। इस सिद्धांत का सीधा सा अर्थ है कि जहां दो लोग एक समझौते में प्रवेश करते हैं और एक पक्ष समझौते के अनुरूप कार्य करता है, यह मानते हुए कि दूसरा पक्ष भी अपने दायित्वों का पालन करेगा, इसलिए, यदि दूसरा पक्ष बाद में समझौते में उल्लिखित अपने कर्तव्यों को पूरा करने से इनकार करता है या धोखाधड़ी करता है, तो समझौते को आगे बढ़ाने में कार्य करने वाले पक्ष के हितों की रक्षा के लिए आंशिक निष्पादन का सिद्धांत लागू किया जाता है। इस प्रकार, यह सिद्धांत उन हस्तांतरितियों (ट्रांसफ़री) के हितों की रक्षा करने के लिए दिए हुए है जो संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेते हैं। लेकिन आंशिक या पूर्ण रूप से भुगतान करने के बाद स्वामित्व प्राप्त करने में सक्षम नहीं होते हैं और जहां हस्तांतरणकर्ता (ट्रांसफरर) बाद में इस तरह के समझौते से इनकार कर देता है या कब्जे के लिए उस पर मुकदमा करता है। यह सिद्धांत ऐसे मामलों को रोकता है और वास्तविक और निर्दोष हस्तांतरित (ट्रांसफ़री) लोगों को न्याय प्रदान करता है।

उदाहरण : X प्रतिफल (कंसीडरेशन) के भुगतान के तौर पर एक फ्लैट Y को स्थानांतरण करते हुए एक अनुबंध में प्रवेश करता है। अनुबंध में यह भी प्रावधान था कि प्रतिफल के आंशिक भुगतान पर, Y कब्ज़ा ले सकता है, और उसने ऐसा ही किया। बाद में, X ने यह कहते हुए संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित करने से इनकार कर दिया कि वह फ्लैट बेचना नहीं चाहता है। आंशिक निष्पादन का सिद्धांत यहां Y के हितों की रक्षा के लिए लागू किया जाएगा, या तो X को भुगतान किए गए प्रतिफल को चुकाने के लिए कहकर या अनुबंध का पालन करके और संपत्ति का स्वामित्व Y को हस्तांतरित करके।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का उद्देश्य

इस कहावत के आधार पर कि जो समता चाहता है उसे यह स्वयं समता अवश्य करनी चाहिए, सिद्धांत के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:

  • यह सुनिश्चित करता है कि अनुबंध के दोनों पक्ष, हस्तांतरणकर्ता और हस्तांतरिती अपने हिस्से का निष्पादन करें और अनुबंध में उल्लिखित अपने दायित्वों को पूरा करें।
  • यह संपत्ति के स्वामित्व के प्रति हस्तांतरिती के अधिकारों को सुरक्षित और संरक्षित करता है।
  • यह उन हस्तांतरणकर्ता के कपटपूर्ण कृत्यों को रोकता है जो निर्दोष हस्तांतरिती का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं।
  • इस सिद्धांत के आधार पर, हस्तांतरणकर्ता या उसके नाम के तहत किसी अन्य व्यक्ति को अनुबंध में उल्लिखित अधिकारों को छोड़कर हस्तांतरिती के खिलाफ उक्त संपत्ति पर किसी भी अधिकार को लागू करने से रोक दिया गया है।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का विकास

ऐसा कहा जा सकता है कि आंशिक निष्पादन की अवधारणा की उत्पत्ति अंग्रेजी कानून में समता न्यायालय के साथ हुई, जिसे न्यायालय ऑफ चांसरी भी कहा जाता है। धोखाधड़ी क़ानून, 1677, ने अनुबंधों पर कुछ प्रतिबंध लगाए और प्रावधान किया कि अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए कोई भी अनुबंध लिखित रूप में किया जाना चाहिए। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई जहां एक वास्तविक और निर्दोष हस्तांतरिती आंशिक या संपूर्ण भुगतान का भुगतान करने और समझौते के परिणामस्वरूप कब्जा लेने के बाद भी संपत्ति का मालिकाना हक प्राप्त नहीं कर सकेगा। ऐसे लोगों को नुकसान का सामना करना पड़ा और ज्यादातर समय उन्हें परेशान किया गया और इससे सुरक्षा और सहायता के लिए समता का सिद्धांत विकसित किया गया। हस्तांतरिती ने जहां अपना हिस्सा मौखिक समझौतों के आधार पर पूरा किया हो, उसे हस्तांतरण के रूप में शामिल किया गया है । 

वॉल्श बनाम लोन्सडेल (1882) के मामले में आंशिक निष्पादन के सिद्धांत के न्यायशास्त्र (जुरिस्प्रूडेंस) को विकसित करने में मदद मिली। इस मामले में, लोन्सडेल वॉल्श को एक पट्टा (लीज) देना चाहता था, जिसमें किराया अग्रिम भुगतान किया जाना चाहिए। हालाँकि, यह विलेख (डीड) में लिखा नहीं था, और जब वॉल्श ने कब्ज़ा कर लिया, तो किराए का बकाया बचा रह गया, जिसके परिणामस्वरूप लोन्सडेल द्वारा परिसर के खिलाफ एक निष्पादन जारी किया गया। इस मामले में अपील न्यायालय ने माना कि जो समता चाहता है उसे भी ऐसा करना चाहिए और समता के इरादे से संबंधित है न कि बनाने से आगे यह माना गया कि समता के नियम लागू होने चाहिए, और पट्टे को ऐसे माना गया जैसे कि यह उस समझौते की तारीख से लागू करने योग्य था जब इसे प्रदान किया गया था।

एक और मामला मैडिसन बनाम एल्डरसन (1883) जिसने इस सिद्धांत के विकास को जन्म दिया, जिसमें वादी ने एक मौखिक समझौते के आधार पर प्रतिवादी की संपत्ति का दावा किया, जहां प्रतिवादी वादी की गृह-व्यवस्था की सेवाओं के बदले में अपनी संपत्ति उसे हस्तांतरित करने के लिए सहमत हुआ। मौखिक समझौते के परिणामस्वरूप वादी ने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया। लेकिन वसीयत को अमान्य बताया गया क्योंकि वह प्रमाणित नहीं थी। इस मामले में, अंग्रेजी अपील न्यायालय ने सिद्धांत के महत्व को समझाया और माना कि प्रतिवादी, इस मामले में, अनुबंध के निष्पादन में किए गए कार्यों से उत्पन्न समता के लिए उत्तरदायी है, और यदि ऐसी समता की उपेक्षा की जाती है तो इसका परिणाम अन्याय होगा।

भारत में आंशिक निष्पादन के सिद्धांत की स्थिति

भारत में सिद्धांत के अनुप्रयोग का पता महोमेद मूसा बनाम अघोर कुमार गांगुली (1914) मामले से लगाया जा सकता है, जिसमें प्रिवी काउंसिल ने माना कि भारत का कानून और इंग्लैंड का कानून एक ही है और एक ही नियम का पालन करते हैं और इसलिए भारतीय कानून आंशिक निष्पादन के सिद्धांतों के साथ असंगत नहीं है। इस मामले में, एक लिखित समझौता विलेख था जो कि पंजीकृत नहीं किया गया था और कहा गया कि भूमि को पक्षों के बीच विभाजित किया जाना था। परन्तु विलेख को चुनौती दी गई क्योंकि यह पंजीकृत नहीं था। प्रिवी काउंसिल ने इस मामले में आंशिक निष्पादन के सिद्धांत को लागू किया और माना कि विलेख लिखित रूप में बनाया गया था, इसलिए यह एक कानूनी दस्तावेज है।

जी.एफ.सी. आरिफ बनाम राय जदुनाथ मजूमदार बहादुर (1931) के मामले में, प्रिवी काउंसिल ने उपरोक्त मामले में जो कहा गया था उसके विपरीत माना। काउंसिल को इस बात पर संदेह था कि क्या इस सिद्धांत को उन मामलों में लागू किया जाना चाहिए जिनमें स्वामित्व के निर्माण के लिए आवश्यक दस्तावेज़ के पंजीकरण की आवश्यकता होती है। यह माना गया कि सिद्धांत को वर्तमान मामले में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि मौखिक अनुबंध के कारण प्रतिवादी का मुकदमा करने का अधिकार वर्जित था। इससे भारत में सिद्धांत के अनुप्रयोग के संबंध में विवाद पैदा हो गया, जिसके परिणामस्वरूप इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए 1927 में एक विशेष समिति की स्थापना की गई, जैसा कि महादेव नाथूजी पाटिल बनाम सुरजाबाई खुशालचंद लक्कड़ (1993) मामले में उल्लेख किया गया है। समिति ने कहा कि सिद्धांत को वैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन पंजीकरण के कानून को नहीं भूलना चाहिए या उससे बचना नहीं चाहिए। सिद्धांत के अनुप्रयोग के लिए, समिति ने निम्नलिखित सिफारिशें की :

  • समझौता अवश्य लिखा होना चाहिए।
  • हस्तांतरिती ने आंशिक निष्पादन या आगे के किसी कार्य के परिणामस्वरूप संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया होगा।
  • हस्तांतरिती जो सिद्धांत का लाभ उठाना चाहता है उसे अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • जब अनुबंध आंशिक रूप से निष्पादित किया गया हो तो अधिकार और देनदारियां पक्षों के बीच लागू होने योग्य होनी चाहिए।
  • सिद्धांत को हस्तांतरिती के अधिकारों को प्रभावित नहीं करना चाहिए।

समिति ने यह भी सुझाव दिया कि सीमा अवधि की समाप्ति से हस्तांतरणकर्ता और हस्तांतरिती के बीच संबंध प्रभावित नहीं होने चाहिए और सिद्धांत द्वारा दी गई सुरक्षा पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। इसकी सिफ़ारिशों के आधार पर संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 मे धारा 53A जोड़ी गई। यह धारा आंशिक निष्पादन के सिद्धांत को मान्यता देती है, और इस तरह, सिद्धांत को भारतीय परिदृश्यों पर लागू किया गया।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत के आवश्यक तत्व

अधिनियम की धारा 53A में उल्लिखित सिद्धांत का लाभ उठाने के लिए निम्नलिखित आवश्यक तत्वों को पूरा किया जाना चाहिए:

अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए लिखित अनुबंध

अचल संपत्ति के हस्तांतरण का अनुबंध लिखित रूप में होना आवश्यक है। श्रीमती कलावती त्रिपाठी एवं अन्य बनाम श्रीमती दमयंती देवी और अन्य (1992) के मामले में, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि सिद्धांत अपने दायरे में मौखिक समझौते को शामिल नहीं करता है। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय के वी.आर. सुधाकर राव और अन्य बनाम टी.वी. कामेश्वरी (2007) मामले में माना गया कि धारा 53A वहां लागू नहीं होती जहां व्यक्ति मौखिक समझौते के आधार पर संपत्ति पर कब्जा है।

यह भी आवश्यक है कि अनुबंध एक वैध अनुबंध की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता हो और पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित हो। श्रीमती हमीदा बनाम श्रीमती ह्यूमर और अन्य (1992) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि अनुबंध की शर्तें अस्पष्ट या संदिग्ध नहीं होनी चाहिए बल्कि निश्चित और स्पष्ट रूप से व्यक्त होनी चाहिए। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि धारा 53A उन अनुबंधों पर लागू नहीं होती जो अमान्य हैं। इसका मतलब यह है कि अनुबंध का एक वैध उद्देश्य होना चाहिए, एक प्रस्ताव होना चाहिए और उस प्रस्ताव की स्वीकृति, पक्षों की स्वतंत्र सहमति, वैध प्रतिफल और कानूनी संबंध बनाने का इरादा होना चाहिए।

एक वैध प्रतिफल 

अचल संपत्ति के हस्तांतरण के अनुबंध में वैध प्रतिफल होना चाहिए। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 का धारा 10 के तहत प्रतिफल भी एक वैध अनुबंध की अनिवार्यताओं में से एक है। इसका मतलब यह है कि भारत में सिद्धांत केवल उन मामलों पर लागू होता है जहां अचल संपत्ति प्रतिफल के लिए हस्तांतरित की जाती है न कि उपहार के रूप में।

अचल संपत्ति का कब्जा

धारा स्पष्ट रूप से प्रदान करती है कि हस्तांतरिती ने अनुबंध के आंशिक निष्पादन के परिणामस्वरूप संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया होगा, कब्ज़ा जारी रखना होगा, या उसमें उल्लिखित लाभों का दावा करने के लिए आगे कोई कार्य करना होगा। ए.एम.ए. सुल्तान बनाम सेदु ज़ोहरा बीवी (1989) के मामले में भी यही दोहराया गया। 

अनुबंध का आंशिक निष्पादन

धारा 53A को लागू करने के लिए, आवश्यक तत्वों में से एक यह है कि अनुबंध को आंशिक रूप से निष्पादित किया जाना चाहिए या हस्तांतरित व्यक्ति अपना हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार है। यदि हस्तांतरिती के पास पहले से ही कब्जा है, तो इसे जारी रखा जाना चाहिए या ऐसे कब्जे को आगे बढ़ाने के लिए कोई कार्य किया जाना चाहिए। चिन्नाराज बनाम शेख दाउद नचियार (2002) के मामले में देखा गया कि जहां किसी व्यक्ति ने अनुबंध में दिए गए अपने दायित्वों को पूरा करने से इनकार कर दिया, तो धारा 53A के किसी भी लाभ का दावा नहीं किया जा सकता है।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का अनुप्रयोग

अधिनियम की धारा 53A में निहित सिद्धांत का प्राथमिक उद्देश्य हस्तांतरिती के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है। यह धारा केवल वहीं लागू होती है जहां:

  • अचल संपत्ति को हस्तांतरित करने का एक लिखित अनुबंध होता है।
  • हस्तांतरिती ने-
    • आंशिक निष्पादन के परिणामस्वरूप संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया या,
    • यदि वह पहले से ही कब्जे में था, तो कब्ज़ा जारी किया,
    • उक्त अनुबंध को आगे बढ़ाने में कोई कार्य किया है।
  • हस्तांतरित व्यक्ति जानबूझकर अपना कार्य करता है या ऐसा करने को इच्छुक है।
  • अनुबंध के अनुसार हस्तांतरणकर्ता द्वारा हस्तांतरण पूरा नहीं किया गया है।

बलराजा और अन्य बनाम सैयद मसूद रोथर और अन्य (1998) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि सिद्धांत को लागू करने या धारा 53A के तहत उल्लिखित हस्तांतरिती के अधिकारों को लागू करने के लिए, आवश्यक शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए। जिसकी शर्तें निम्नलिखित हैं: 

  • यह सिद्धांत केवल कानूनी रूप से वैध और लागू करने योग्य अनुबंध पर ही लागू किया जा सकता है।
  • धारा 53A का लाभ प्राप्त करने के लिए अनुबंध को पंजीकृत किया जाना चाहिए।
  • यह धारा मौखिक समझौतों पर लागू नहीं होती।
  • धारा के आवेदन के लिए यह आवश्यक है कि आंशिक निष्पादन के परिणामस्वरूप हस्तांतरिती द्वारा कब्ज़ा ले लिया गया हो।
  • हस्तांतरिती को अनुबंध के अपने हिस्से का पालन करने या उसे आगे बढ़ाने के लिए कोई कार्य करने के लिए भी इच्छुक होना चाहिए।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का अपवाद

यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि धारा 53A उन अनुबंधों पर लागू होती है जहां हस्तांतरिती ने अनुबंध का अपना हिस्सा पूरा कर लिया है और निष्पादन के परिणामस्वरूप संपत्ति पर कब्जा कर लिया है। एक अपवाद है जो यह प्रावधान करता है कि यह सिद्धांत बाद के हस्तांतरणकर्ता जिन्हें अनुबंध या उसके आंशिक निष्पादन के बारे में कोई जानकारी नहीं है, पर लागू नहीं किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि यह प्रावधान वास्तविक हस्तांतरिती पर लागू नहीं होगा, जो अनुबंध में प्रवेश करने के बाद, अनुबंध की शर्तों और हस्तांतरणकर्ता द्वारा इसके आंशिक निष्पादन से अनजान हैं।

हेमराज बनाम रुस्तमजी (1952) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि धारा में दिए गए परंतुक का अपवाद वास्तविक हस्तांतरिती के हितों की रक्षा करता है, जिन्हें हस्तांतरणकर्ता द्वारा किए गए अनुबंध के आंशिक निष्पादन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस प्रकार यह आवश्यक है कि जो पक्ष धारा 53A के तहत बचाव करने का प्रयास करता है वह यह साबित करे कि बाद में हस्तांतरिती को अनुबंध के आंशिक निष्पादन के बारे में पता था और उसे इसके संबंध में एक नोटिस प्राप्त हुआ था।

संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53A में संशोधन के परिणाम

संशोधन से पहले, धारा 53A के लाभ और उसमें सिद्धांत मान्यता का दावा अपंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर भी किया जा सकता था। हालाँकि, पंजीकरण और अन्य संबंधित कानून (संशोधन) अधिनियम, 2001, के अधिनियमन के बाद धारा में निहित आंशिक निष्पादन के सिद्धांत के लाभों का दावा करने के लिए अपंजीकृत दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया गया था। विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) श्री यशवीर सिंह बनाम डॉ. ओ.पी. कोहली और अन्य (2015) के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मुकदमे में स्वामित्व की घोषणा के मुद्दे से निपटते हुए कहा कि 2001 के संशोधन के कारण, बेचने का समझौता वैध नहीं है और भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की अनुसूची 1 का अनुच्छेद 23A विलेख के मूल्य के अनुसार जब तक इसे पंजीकृत नहीं किया जाता है और 90% पर मुहर नहीं लगाई जाती है तब तक कोई अधिकार नहीं बनाया जा सकता है। 

सुहृद सिंह बनाम रणधीर सिंह (2010) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि किसी विक्रय विलेख का निष्पादक चाहता है कि विलेख रद्द कर दिया जाए, तो उसे इसे रद्द करने की मांग करनी होगी, लेकिन यदि कोई गैर-निष्पादक ऐसा चाहता है, तो उसे यह दिखाना होगा कि विलेख अमान्य, अवैध या गैर-बाध्यकारी है। उस पर और न्यायालय शुल्क अधिनियम, 1870 की दूसरी अनुसूची के अनुच्छेद 17(iii) के अनुसार यथामूल्य न्यायालय शुल्क का भुगतान भी करना होगा। हालाँकि, यदि ऐसा करने की मांग करने वाले गैर-निष्पादक के पास अधिकार नहीं है तो संपत्ति के न्यायालय शुल्क अधिनियम, 1870 की धारा 7(C) के हिसाब से उसे न्यायलय शुल्क चुकाना होगा। शिव कुमार सक्सेना बनाम मनीषचंद सिन्हा (2004) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा स्टाम्प शुल्क के भुगतान के संबंध में कुछ सिद्धांत निर्धारित किए गए जो निम्नलिखित है। 

  • स्टांप शुल्क केवल लिखत (इन्स्ट्रमेंट) पर लगाया जा सकता है, किसी लेनदेन पर नहीं।
  • लिखत में उल्लिखित लेन-देन का सार यह निर्धारित करता है कि कितना स्टाम्प शुल्क चुकाया जाना है।
  • किसी उपकरण के वास्तविक चरित्र का पता लगाने के लिए, पूरे दस्तावेज़ को पढ़ना और उस पर विचार करना होगा।

अमीर मिन्हाज बनाम डिएड्रे एलिजाबेथ (राइट) इस्सर (2017) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई पक्ष संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53A के प्रयोजन के लिए अचल संपत्ति में अधिकार, स्वामित्व या हित को हस्तांतरित करने के लिए किए गए अनुबंध का उपयोग करना चाहता है, तो उसे पंजीकृत होना होगा। और पंजीकरण अधिनियम, 1908 के धारा 17(1A) के तहत यदि पंजीकृत नहीं है, तो दस्तावेज़ या अनुबंध का उपयोग उक्त उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है।

पट्टा विलेख के संबंध में स्थिति

पट्टा संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 105 द्वारा शासित होता है। प्रसाद टेक्नोलॉजी पार्क प्राइवेट लिमिटेड बनाम सब रजिस्ट्रार एवं अन्य (2005),के मामले में एक पट्टे से संबंधित विवाद था। जिसमे यह माना गया कि जिस दस्तावेज़ के लिए स्टांप शुल्क का भुगतान किया जाना है, उसके निष्पादन में संपत्ति, अधिकार या दायित्व का हस्तांतरण शामिल होना चाहिए। एक बार जब यह घोषित हो जाता है कि पूरक (सप्लीमेंट्री) समझौता न तो पट्टा है और न ही बिक्री विलेख, तो ऐसी कोई स्टांप ड्यूटी का भुगतान नहीं किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि उच्च न्यायालय का यह मानना ​​गलत था कि पूरक पट्टा समझौता एक लिखत नहीं था और स्टांप शुल्क का भुगतान किया जाना था।

इसके अलावा, एगॉन जेंडर इंटरनेशनल प्राइवेट बनाम मेसर्स नामग्याल इंस्टीट्यूट (2013) के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि एक अपंजीकृत दस्तावेज़ का उपयोग पट्टेदार के पक्ष में कोई अधिकार बनाने के बजाय केवल कब्जे की प्रकृति को प्रदर्शित करने के लिए किया जा सकता है। यह भी देखा गया कि पट्टे का निर्माण संपार्श्विक (कोलैटरल) नहीं है और पंजीकरण अधिनियम, 1908 के धारा 49 के अंतर्गत ऐसा नहीं कहा जा सकता है। 

भाग निष्पादन के सिद्धांत के अंग्रेजी कानून और भारतीय कानून के बीच अंतर

अंतर का आधार अंग्रेजी कानून भारतीय कानून
सिद्धांत के आवश्यक तत्व अंग्रेजी कानून के तहत, पक्षों के बीच मौखिक अनुबंध होने पर भी सिद्धांत लागू किया जा सकता है। भारतीय कानून के तहत, सिद्धांत का लाभ लेने के लिए यह आवश्यक है कि अनुबंध लिखित रूप में हो।
सिद्धांत का दायरा अंग्रेजी कानून में सिद्धांत का दायरा भारतीय कानून की तुलना में व्यापक है। वहां कार्रवाई और बचाव दोनों है। भारतीय कानून में इस सिद्धांत को केवल बचाव के रूप में लिया जा सकता है इसलिए, इसका दायरा सीमित है।
सिद्धांत की प्रयोज्यता  अनुबंध को आगे बढ़ाने में कोई भी आचरण अंग्रेजी कानून में इस सिद्धांत को लागू करने के लिए पर्याप्त है। भारत में सिद्धांत को लागू करने के लिए, संपत्ति या उसका कोई भी हिस्सा हस्तांतरिती के कब्जे में होना चाहिए।
सिद्धांत का उल्लेख करने वाला क़ानून भारतीय कानून के विपरीत, सिद्धांत का उल्लेख किसी क़ानून में नहीं किया गया है, लेकिन यह पक्षों को न्यायसंगत अधिकार प्रदान करता है। यह सिद्धांत भारतीय कानून के तहत एक वैधानिक अधिकार प्रदान करता है क्योंकि इसका उल्लेख संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53A के तहत किया गया है।

आंशिक निष्पादन के सिद्धांत पर ऐतिहासिक निर्णय

श्रीमंत शामराव सूर्यवंशी बनाम प्रह्लाद भैरोबा सूर्यवंशी (2002)

मामले के तथ्य

मामला वर्तमान में, प्रतिवादी और वादी के बीच कृषि भूमि की बिक्री के लिए एक समझौता हुआ था। वादी ने समझौते के परिणामस्वरूप संपत्ति पर कब्जा कर लिया लेकिन बाद में पाया कि प्रतिवादी उसी भूमि के लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ बिक्री समझौते पर बातचीत कर रहा था। वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ निषेधाज्ञा (इंजंकशन) के लिए मुकदमा दायर किया और उसे इसकी अनुमति दे दी गई, लेकिन प्रतिवादी ने फिर भी संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को बेच दी। दूसरे व्यक्ति, जिसे जमीन बेची गई थी, उसने उस जमीन पर कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया, जिसका वादी ने विरोध किया। हालांकि, ट्रायल न्यायालय ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि वादी का स्वामित्व साबित नहीं हुआ है। प्रतिवादी द्वारा एकस्व (लेटर पेटेंट) अपील में, अदालत ने पाया कि वादी कब्जे का हकदार नहीं है क्योंकि बिक्री समझौते के निष्पादन के लिए मुकदमा परिसीमा से वर्जित है।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या वादी वर्तमान मामले में आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का लाभ उठाने का हकदार है यदि विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा परिसीमा द्वारा वर्जित है ?

निर्णय 

इस मामले में अदालत ने पाया कि वादी अनुबंध के अपने हिस्से का पालन करने को इच्छुक था और इसके लिए तैयार था। अदालत ने आगे कहा कि भले ही मुकदमा परिसीमा द्वारा वर्जित हो, फिर वादी अपने अधिकारों की रक्षा तभी कर सकता है, जब वह यह साबित करने में सक्षम हो कि उसने समझौते को आगे बढ़ाने में कोई कार्य किया है या ऐसा करने को तैयार है। इस प्रकार, इस मामले में अदालत ने माना कि अपीलकर्ता अधिनियम की धारा 53A में दिए गए आंशिक निष्पादन के सिद्धांत का लाभ लेने का हकदार है।

भारत संघ बनाम मेसर्स के.सी. शर्मा एंड कंपनी (2020)

मामले के तथ्य

इस मामले मे सरकार ने याचिकाकर्ताओं से कुछ भूमि अधिग्रहित (ऐक्विज़िशन) की जो उन्हें पट्टे पर दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें उतना ही मुआवजा दिया जाना चाहिए, जितनी जमीन उनके कब्जे में है। सिविल न्यायालय ने कहा कि सरकार को उन्हें 87% राशि का मुआवजा देना चाहिए और शेष राशि गांव की पंचायत को देनी चाहिए। सिविल न्यायालय के आदेश के खिलाफ कुछ पीड़ित ग्रामीणों द्वारा एक रिट याचिका दायर की गई थी, और याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जिन लोगों ने याचिका दायर की थी, वे पट्टेदार नहीं थे। उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को कार्यवाही का हिस्सा बनने के लिए कहा।

याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की कि दीवानी न्यायालय का आदेश धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया था क्योंकि भूमि के संबंध में कोई पट्टा समझौता नहीं था। इसे सत्र न्यायालय में हस्तांतरित कर दिया गया, जहां अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया गया। फैसले से व्यथित होकर, उत्तरदाता उच्च न्यायालय गए, जहां ट्रायल न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया। अंततः मामले की अपील उच्च न्यायालय में की गई।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या आंशिक निष्पादन का सिद्धांत इस मामले में लागू किया जाएगा जहां पट्टा समझौता पंजीकृत नहीं है।

निर्णय 

इस मामले में प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि वे अधिनियम की धारा 53A के तहत दिए गए लाभों के हकदार हैं, भले ही कोई पंजीकृत पट्टा समझौता नहीं था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिवादियों को जमीन का कब्जा पट्टे के परिणामस्वरूप दिया गया था, इसलिए इस स्थिति में पट्टा समझौता आवश्यक नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पक्षों के इरादे स्पष्ट है, और पट्टे को निदेशक मंडल द्वारा अनुमोदित भी किया गया था। इसके अलावा, न्यायालय ने माना कि जहां कोई वास्तविक अनुबंध है लेकिन कोई पंजीकृत दस्तावेज नहीं है, तो पक्ष अभी भी अधिनियम की धारा 53A का लाभ ले सकती हैं।

जोगिंदर तुली बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य (2022)

मामले के तथ्य

इस मामले में याचिकाकर्ता ने विचारार्थ एक दुकान की बिक्री के संबंध में मृत प्रतिवादी के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, एमओयू पंजीकृत नहीं किया गया था, उन्होंने दलील दी कि उन्हें कब्जा नहीं दिया गया क्योंकि मृतक के परिवार ने उक्त संपत्ति पर निर्माण के लिए एक बिल्डर से अनुबंध किया था। पक्षों के बीच विवाद के चलते पुलिस ने याचिकाकर्ता से जरूरी दस्तावेज पेश करने को कहा एमओयू दिखाने के बावजूद संपत्ति सील कर दी गई। कुछ समय बाद, बिल्डर ने उक्त संपत्ति की बिक्री के लिए याचिकाकर्ता के साथ बातचीत शुरू कर दी और उसे इसके लिए धमकी दी, जिसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53A का लाभ लेने के लिए पंजीकृत दस्तावेज प्रस्तुत करना आवश्यक है?

न्यायालय का फैसला

इस मामले में यह माना गया कि संपत्ति के कब्जे के संबंध में पंजीकृत दस्तावेजों या सबूतों के अभाव में अधिनियम की धारा 53A के लाभों का दावा नहीं किया जा सकता है। पंजीकरण अधिनियम की धारा 17(E)(1A) और धारा 49 में यह भी प्रावधान है कि केवल पंजीकृत दस्तावेजों को ही साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस प्रकार, याचिकाकर्ता धारा 53A के तहत दिए गए किसी भी लाभ का हकदार नहीं था क्योंकि संपत्ति के कब्जे के संबंध में उसके द्वारा कोई पंजीकृत दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया था।

अनुबंधों के विशिष्ट निष्पादन का सिद्धांत

अनुबंधों के विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांत का अर्थ

जब भी किसी अनुबंध का कोई भी पक्ष अपने दायित्वों को पूरा करने में विफल रहता है, तो इससे अनुबंध का उल्लंघन होता है। इस स्थिति में, जिस पक्ष को अनुबंध के उल्लंघन के कारण नुकसान हुआ है वह या तो क्षतिपूर्ति या अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन की मांग कर सकता है। इस प्रकार, किसी अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांत का सीधा सा मतलब है कि अनुबंध संबंधी दायित्वों को वैसे ही पूरा करना जैसे वे हैं।

उदाहरण: यदि B ने एक ही बार में पूरी राशि का भुगतान कर दिया तो A, B को 50% छूट पर सामान बेचने पर सहमत हुआ। B ने एक ही बार में पूरी राशि का भुगतान कर दिया, लेकिन A ने उसे सामान देने से इनकार कर दिया। अब, B उक्त सामान की वितरण के अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन के लिए A के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकता है।

अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन का यह उपाय विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 अध्याय 2, धारा 9-19 में निहित है। इस कानून को प्रारंभ में विशिष्ट राहत अधिनियम, 1877 के तहत संहिताबद्ध (कोडीफाइ) किया गया था। जिस पर विधि आयोग ने आगे विचार किया। आयोग ने अपने नौवीं रिपोर्ट में 1963 के मौजूदा अधिनियम को लागू करने की सिफारिश की। आंशिक निष्पादन के सिद्धांत की तरह, अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन का सिद्धांत भी एक न्यायसंगत सिद्धांत है जिसका उपयोग अनुबंध के उल्लंघन के कारण नुकसान झेलने वाले पक्ष को राहत देने के लिए किया जाता है या जहां दूसरा पक्ष अपने संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने में विफल रहता है।

विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की विशेषताएं

यह अधिनियम किसी अनुबंध के वास्तविक और निर्दोष पक्षों को अपने संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने में विफलता के कारण जो नुकसान उठाना पड़ता है उसे विशिष्ट उपचार प्रदान करने के लिए अधिनियमित किया गया है। इस अधिनियम में निम्नलिखित विशिष्ट विशेषताएं हैं:

  • यह निम्नलिखित प्रकार के उपचार प्रदान करता है:
    • अचल संपत्ति का कब्जा
    • अनुबंधों का विशिष्ट निष्पादन
    • निर्देशों का सुधार
    • अनुबंध को रद्द करना
    • लिखत को रद्द करना 
    • किसी व्यक्ति के अधिकारों या स्थिति की घोषणा करने वाले आदेश
    • निषेधाज्ञा, निरंतर निषेधाज्ञा इत्यादि जैसी राहतें
  • अधिनियम यह भी प्रदान करता है कि इसमें निहित राहत केवल व्यक्तिगत अधिकारों के लिए लागू की जा सकती है।
  • अधिनियम उस व्यक्ति को अधिकार देता है जिसे अचल संपत्ति के कब्जे से बाहर कर दिया गया है, वह अपना कब्जा वापस पाने के लिए मुकदमा दायर कर सकता है।
  • अधिनियम की धारा 15 आगे उन व्यक्तियों को सूचीबद्ध करती है जो अधिनियम के तहत राहत मांग सकते हैं। 
  • यह पंचाट के प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) से भी संबंधित है।
  • अधिनियम के धारा 20 तहत अनुबंधों के प्रतिस्थापित (सब्सीट्यूटेड) निष्पादन का भी प्रावधान है। 
  • इस अधिनियम के तहत यह उच्च न्यायालय को आधारभूत ढांचा परियोजना अनुबंधों से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने का अधिकार भी देता है।

अनुबंधों के विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांत की प्रयोज्यता 

किसी अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन की तलाश के लिए, धारा 10 के तहत निर्धारित शर्तों का पूर्ण रूप से पालन करना आवश्यक है। अधिनियम के धारा 11, 14, और 16 मे प्रावधान है कि किसी अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन के उपाय का दावा प्रावधानों के अनुसार किया जा सकता है। धारा 11 में प्रावधान है कि जब पक्षों द्वारा सहमत अधिनियम को संस्था द्वारा निष्पादित किया जाना है, तो इसे विशिष्ट निष्पादन द्वारा लागू किया जा सकता है। हालाँकि, यदि कोई अनुबंध किसी ऐसे संरक्षक द्वारा किया जाता है जिसने अपनी शक्तियों का अत्यधिक प्रयोग किया है, तो इसे विशिष्ट निष्पादन द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। लेख में आगे धारा 14 और 16 के बारे में विस्तार से बताया गया है।

राम करन बनाम गोविंद लाल (1999) के मामले में अदालत ने माना कि मुआवजा मे पैसे पर्याप्त उपाय नहीं है जहां विक्रेता खरीदार द्वारा पूर्ण भुगतान करने के बाद बिक्री विलेख निष्पादित करने से इंकार कर देता है और इस प्रकार उसे विशेष रूप से अपना हिस्सा पूरा करने का आदेश दिया जाता है।

ऐसी परिस्थितियाँ जहाँ किसी अनुबंध का विशिष्ट रूप से पालन नहीं किया जा सकता

अधिनियम का धारा 14 ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान करता है जहाँ किसी अनुबंध को विशेष रूप से निष्पादित नहीं किया जा सकता है, और इस प्रकार, विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता है:

  • अनुबंध के एक पक्ष ने अनुबंध के स्थानापन्न निष्पादन की मांग की और उसे प्राप्त कर लिया।
  • निरंतर कर्तव्य पालन से संबंधित अनुबंधों से जुड़े मामले जिनकी निगरानी अदालत द्वारा नहीं की जा सकती।
  • अनुबंध से जुड़े मामले पक्षों की व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करते हैं।
  • ऐसे मामले जहां अनुबंध को पक्षकारों द्वारा अनुबंध निर्धारित या रद्द किया जा सकता है।

धारा 14(3) कुछ अपवाद प्रदान करता है जहां अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन को लागू किया जा सकता है:

  • बंधक के निष्पादन से संबंधित मुकदमे
  • किसी ऋण के पुनर्भुगतान के लिए सुरक्षा प्रस्तुत करने से संबंधित मुकदमे, जहां उधारकर्ता इसे एक बार में चुकाने में रुचि नहीं रखता है।
  • किसी कंपनी के डिबेंचर के लिए मुकदमा।
  • साझेदारी के औपचारिक विलेख के निष्पादन के लिए मुकदमा।
  • किसी साझेदार से शेयर खरीदने के लिए मुकदमा।
  • इमारतों के निर्माण या किसी संपत्ति पर किसी अन्य कार्य के लिए मुकदमा, लेकिन जहां निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं:
    • अनुबंध में कार्य का उचित वर्णन किया गया है ताकि उसकी प्रकृति निर्धारित की जा सके।
    • वादी का अनुबंध में पर्याप्त हित होना चाहिए।
    • धन के रूप में मुआवजा पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
    • प्रतिवादियों को उस भूमि पर कब्जा करना होगा जहां निर्माण किया जाना है।

अधिनियम में 2018 के संशोधन के बाद, धारा 14 के खंड 2 और 3 को अधिनियम से हटा दिया गया है, और आगे, धारा 14A को डाला गया है, जो अदालत को अधिनियम के तहत किसी मुकदमे में विशेषज्ञों को शामिल करने का अधिकार देती है।

वे व्यक्ति जो अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन का प्रवर्तन प्राप्त कर सकते है

अधिनियम, धारा 15 के तहत, उन व्यक्तियों को सूचीबद्ध करता है जो किसी अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन प्राप्त कर सकते हैं। ये हैं:

  • अनुबंध का कोई भी पक्ष।
  • जो व्यक्ति संबद्ध हित या मूलधन का प्रतिनिधि होता है, उसे अनुबंध का विशिष्ट निष्पादन तभी मिलेगा जब उस पक्ष ने अपनी संविदा संबंधी बाध्यताओं को पूरा कर लिया हो। हालांकि, जहां कोई अनुबंध किसी सीखने के कौशल या गुण को अपने घटक के रूप में निर्दिष्ट करता है, वहां संबद्ध हित या मूलधन के प्रतिनिधि को अनुबंध का विशिष्ट निष्पादन नहीं मिलेगा। 
  • लाभार्थी के रूप में कोई भी व्यक्ति जहां अनुबंध विवाह के निपटारे या परिवार के सदस्यों के बीच समझौते से संबंधित है।
  • अनुस्मारक आदमी(रीविजनर) जहां अनुबंध किरायेदारी से संबंधित है और किरायेदार ने जीवन भर के लिए इसमें प्रवेश किया है।
  • पुनरीक्षक (रिमाइंडर मैन) जो कब्जे में है और अनुबंध के लाभ प्राप्त करने का हकदार है।
  • शेष में पुनरीक्षणकर्ता।
  • दो सीमित दायित्व साझेदारियों के एकीकरण (अमल्गमेशन) से उत्पन्न होने वाली एक सीमित दायित्व साझेदारी।
  • एकीकरण से उत्पन्न होने वाली कंपनी।
  • कंपनी जहां प्रवर्तकों (प्रोमोटर्स) ने इसके निगमन से पहले एक अनुबंध किया था। इस स्थिति में, यह आवश्यक है कि कंपनी ने अनुबंध स्वीकार कर लिया है और अनुबंध के दूसरे पक्ष को इसकी सूचना दे दी गई है।

अधिनियम की धारा 16, धारा 15 के अपवाद के रूप में कार्य करता है और उन व्यक्तियों की एक सूची प्रदान करता है जिनके पक्ष में विशिष्ट निष्पादन लागू नहीं किया जा सकता है। 

  • कोई भी व्यक्ति जो अनुबंध के उल्लंघन के लिए मुआवजे की मांग नहीं कर सकता।
  • जो व्यक्ति अनुबंध का पालन करने में सक्षम नहीं है, उल्लंघन करता है या अनुबंध के संबंध में धोखाधड़ी करता है।
  • एक व्यक्ति जो यह साबित करने में विफल रहता है कि उसने अनुबंध का पालन किया है या करने को तैयार है। इस स्थिति में, उस व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह अनुबंध संबंधी दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक है। ऐसे मामलों में जहां कोई अनुबंध पैसे के भुगतान से संबंधित है, वादी को प्रतिवादी को पैसे का भुगतान करने या उसे अदालत में जमा करने की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि ऐसा करने के लिए न कहा जाए।

अधिनियम की धारा 19 के अनुसार विशिष्ट निष्पादन की राहत निम्नलिखित के विरुद्ध लागू की जा सकती है। 

  • अनुबंध करने वाला कोई भी पक्ष।
  • कोई भी व्यक्ति जिसने अनुबंध के बाद उसके तहत स्वामित्व का दावा किया था, उस हस्तांतरिती को छोड़कर जिसने अच्छे नियत से पैसे का भुगतान किया था।
  • कोई अन्य व्यक्ति जिसने किसी स्वामित्व के तहत दावा किया हो जिसे अनुबंध से पहले प्रतिवादी द्वारा विस्थापित कर दिया गया हो।
  • दो सीमित दायित्व साझेदारियों के बीच समामेलन से उत्पन्न होने वाली सीमित दायित्व साझेदारी।
  • एकीकरण से उत्पन्न होने वाली कंपनी।
  • कंपनी जहां इसके प्रवर्तकों ने इसके निगमन से पहले एक अनुबंध किया था, इस स्थिति में, यह आवश्यक है कि कंपनी ने अनुबंध स्वीकार कर लिया है और अनुबंध के दूसरे पक्ष को इसकी सूचना दे दी गई है।

अनुबंध का प्रतिस्थापित निष्पादन

अनुबंध के विकल्प निष्पादन के उपाय को विशिष्ट निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 के माध्यम से अधिनियम में जोड़ा गया है। इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 20 के तहत किया गया है। यह प्रावधान करता है कि जहां अनुबंध का एक पक्ष अनुबंध के उल्लंघन या दूसरे पक्ष द्वारा उसके निष्पादन न किए जाने के कारण नुकसान उठाता है, जिसके कारण अनुबंध टूट जाता है, वह किसी तीसरे व्यक्ति या अपनी एजेंसी के माध्यम से अनुबंध के विकल्प निष्पादन के उपाय की मांग कर सकता है और इस तरह के उल्लंघन या निष्पादन होने के कारण हुए नुकसान या लागत की वसूली कर सकता है।

हालाँकि, ऐसा कोई उपाय तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि जिस पक्ष को अनुबंध के उल्लंघन या किसी अन्य पक्ष द्वारा उसके गैर-निष्पादन के कारण नुकसान हुआ हो, उसने दूसरे पक्ष को कम से कम 30 दिनों का नोटिस देकर उसमें उल्लिखित दायित्वों को नोटिस में निर्दिष्ट समय के भीतर अनुबंध को पूरा करने के लिए कहा हो। यदि दूसरा पक्ष ऐसा करने से इनकार करता है या ऐसा करने में विफल रहता है, तो इसे किसी तीसरे पक्ष या उसकी अपनी एजेंसी द्वारा निष्पादित किया जा सकता है, लेकिन यदि अनुबंध उनके द्वारा निष्पादित किया जाता है, तो नुकसान झेलने वाला पक्ष उस पक्ष के खिलाफ विशिष्ट निष्पादन की राहत का दावा नहीं कर सकती जिसने अनुबंध का उल्लंघन किया है। इसके अलावा, वह तब तक नुकसान या खर्च की वसूली नहीं कर सकता जब तक कि अनुबंध किसी तीसरे पक्ष या उसकी अपनी एजेंसी द्वारा निष्पादित नहीं किया जाता है। धारा में आगे प्रावधान है कि जिस पक्ष को दूसरों द्वारा अनुबंध के उल्लंघन के कारण नुकसान हुआ है, वह ऐसे पक्ष से मुआवजे का दावा कर सकता है।

अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन पर हाल के निर्णय

गोबिन्द राम बनाम गियान चंद (2000)

मामले के तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच बिक्री का एक समझौता हुआ, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी ने अपीलकर्ता को बयाना राशि का भुगतान किया। हालाँकि, बिक्री विलेख निष्पादित करने में विफलता होने पर अपीलकर्ता के खिलाफ विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा दायर किया गया था। अपीलकर्ता ने बिक्री विलेख के विशिष्ट निष्पादन के बजाय मुआवजे के निर्णय की अपील की। 

मामले में शामिल मुद्दे

क्या इस मामले में विशिष्ट निष्पादन का आदेश दिया जा सकता है ?

निर्णय 

इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि किसी अनुबंध का विशिष्ट निष्पादन अनिवार्य नहीं है और यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। विशिष्ट निष्पादन के लिए डिक्री देते समय, अदालत को इस सवाल पर गौर करना होगा कि क्या ऐसा करना उचित और न्यायसंगत है। इसके अलावा, यह माना गया कि प्रतिवादी ने अपीलकर्ता का कोई अनुचित लाभ नहीं उठाया है और निर्देशानुसार निचली अदालतों में भुगतान कर दिया है। इस प्रकार, विशिष्ट निष्पादन की डिक्री को अस्वीकार करना अनुचित होगा, और इसलिए प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की गई।

परवीन गर्ग बनाम सतपाल सिंह और अन्य (2018)

मामले के तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता, जो एक सरकारी ठेकेदार है, एक संपत्ति की तलाश में था और उसने प्रतिवादी के साथ बिक्री के लिए एक समझौता किया। अपीलकर्ता ने बयाना राशि भी अदा कर दी, समझौते के अनुसार लेनदेन 1.11.2003 तक पूरा होना था। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि पूरे समय के दौरान, उसे संपत्ति के स्वामित्व विलेख या अन्य प्रासंगिक दस्तावेज नहीं दिखाए गए। प्रतिवादी ने संपत्ति को पट्टे से मुआफी जमीन में परिवर्तित करने का प्रमाण पत्र नहीं दिया और अपीलकर्ता द्वारा पूछे जाने पर प्रतिवादी ने कहा कि अपरिहार्य (अनफॉरेसीन) परिस्थितियों के कारण परिवर्तन की अनुमति प्राप्त नहीं की जा सकी। इस प्रकार अपीलकर्ता ने समझौते के विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा दायर किया।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या इस मामले में विशिष्ट निष्पादन का आदेश दिया जा सकता है?

निर्णय 

इस मामले में अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता को विशिष्ट निष्पादन की डिक्री नहीं दी जा सकती क्योंकि वह यह साबित करने में विफल रहा कि वह मुकदमे के निपटारे तक अनुबंध दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था। इस प्रकार, विशिष्ट निष्पादन का उपाय, जो न्यायालय के विवेक पर आधारित है, प्रदान नहीं किया गया था।

(स्व.) सुरिंदर कौर (कानूनी प्रतिनिधि द्वारा) बनाम (स्व.) बहादुर सिंह (कानूनी प्रतिनिधि द्वारा) (2019)

मामले के तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच बिक्री का समझौता हुआ था। अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच प्रतिवादी को कब्जा दे दिया गया था, लेकिन उक्त संपत्ति के संबंध में एक अपील लंबित थी, इसलिए दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि बिक्री पत्र अपील में निर्णय पारित होने के एक महीने बाद निष्पादित किया जाएगा। हालाँकि, अपील पर उस तारीख से 13 साल बाद निर्णय लिया गया जब पक्षों ने बेचने का समझौता किया था। प्रतिवादी ने विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा दायर किया, लेकिन अपीलकर्ता ने यह कहते हुए अपील दायर की कि प्रतिवादी को ऐसा कोई उपाय नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि वह किराया देने में विफल रहा है।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या प्रतिवादी इस मामले में विशिष्ट निष्पादन का हकदार है?

निर्णय 

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी ने मुकदमे की तारीख तक कोई किराया नहीं दिया है और ऐसा करने से भी इनकार किया है। यह नोट किया गया कि किराए का भुगतान अनुबंध का एक अनिवार्य तत्व था और प्रतिवादी किराए का भुगतान करने में विफल रहा। आगे यह भी देखा गया कि विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 धारा 16(c) में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन के लिए पात्र होने के लिए संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने के लिए तत्परता और इच्छा साबित करनी होगी।

अदालत ने फैसला दिया कि केवल इसलिए कि वह कानूनी रूप से सही है, प्रतिवादी को ऐसा कोई राहत नहीं दिया जा सकता है, लेकिन वह यह साबित करने में विफल रहा कि वह संविदा संबंधी दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक है। यह भी देखा गया कि अधिनियम की धारा 20 के अनुसार, यदि यह असमान हो जाता है तो अदालत विशिष्ट निष्पादन के उपाय को अस्वीकार कर सकती है, और वर्तमान मामले में, इक्विटी प्रतिवादी के खिलाफ है इसलिए वह विशिष्ट निष्पादन के हकदार नहीं है। 

शेनबागम बनाम के के रठिनावेल (2022)

मामले के तथ्य

इस मामले में अपीलकर्ता, जो विशिष्ट निष्पादन के वाद में प्रतिवादी हैं, ने प्रतिवादी के साथ विवादित संपत्ति को 1,25,000 रुपये में बेचने के लिए एक समझौता किया। प्रतिवादी, जो वादी है, ने 25,000 रुपये का अग्रिम भुगतान किया और शेष राशि 6 महीने के भीतर भुगतान करने पर सहमत हुआ। शेष राशि के भुगतान पर अपीलार्थियों को विक्रय विलेख को निष्पादित करने के लिए भी कहा गया था। समझौते में यह भी कहा गया था कि यदि बिक्री पूरी नहीं होती है तो भुगतान की गई राशि जब्त कर ली जाएगी। यह भी खुलासा किया गया कि संपत्ति बंधक के अधीन थी, जिससे प्रतिवादी ने बिक्री विचार से मुक्त करने पर सहमति व्यक्त की। इसके अलावा, प्रतिवादी ने 10,000/- रुपये का भुगतान किया। अपीलार्थियों ने प्रतिवादी को समझौते के अनुसार अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए एक कानूनी नोटिस भेजा।

अपीलकर्ताओं ने यह आरोप लगाते हुए अनुबंध भी रद्द कर दिया कि प्रतिवादी अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक नहीं था। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ निषेधाज्ञा मांगने के लिए प्रधान जिला मुंसिफ, कोयंबटूर के समक्ष एक मुकदमा दायर किया, ताकि उन्हें संपत्ति पर कोई भी अतिक्रमण करने से रोका जा सके। उन्होंने विशिष्ट निष्पादन के लिए एक मुकदमा भी दायर किया जिसका फैसला उनके पक्ष में हुआ। अपीलकर्ताओं ने सत्र न्यायालय के समक्ष डिक्री के खिलाफ अपील दायर की जिसे खारिज कर दिया गया और फिर मद्रास उच्च न्यायालय में दूसरी अपील दायर की गई। उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा जिसके खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान अपील दायर की गई। 

मामले में शामिल मुद्दे

क्या प्रतिवादी समझौते में उल्लिखित अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था?

न्यायालय का फैसला

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक स्थापित कानून है कि वादी के लिए विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 16 के प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है, भले ही विपरीत पक्ष ने कोई विशिष्ट दलील न दी हो। इसके अलावा, कार्य करने की तत्परता और इच्छा पक्षों के कृत्यों या आचरण से निर्धारित की जानी चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने कहा कि यह तय करने के लिए कि क्या कोई पक्ष अनुबंध के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक है, पूरे लेन-देन के दौरान उसके आचरण का निर्धारण और मूल्यांकन करना आवश्यक है, न कि केवल अपने हिस्से को पूरा करने के लिए उसकी वित्तीय क्षमता। इसके अलावा, जिन अन्य कारकों पर विचार किया जाना चाहिए,वे हैं मुकदमे में संपत्ति की कीमत और क्या दूसरे पक्ष के पक्ष में डिक्री पारित होने पर एक पक्ष को अनुचित लाभ होगा।

अदालत ने माना कि वर्तमान मामले में वादी की ओर से पूर्ण निष्क्रियता है जिसने समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है। इसके अलावा, समझौते की तारीख और मुकदमे की तारीख के बीच कीमतों में तीन बार पर्याप्त वृद्धि हुई है। इस देरी के परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जहां वादी को विशिष्ट निष्पादन की राहत देना असमान है। अदालत ने आगे कहा कि विशिष्ट निष्पादन का उपाय ऐसी स्थिति में नहीं दिया जाना चाहिए, जहां इससे किसी ऐसे पक्ष के साथ अन्याय हो, जिसकी कोई गलती नहीं है। प्रतिवादी (वादी) के आचरण को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने उसके पक्ष में विशिष्ट निष्पादन की राहत देने से इनकार कर दिया, लेकिन प्रतिफल वापस करने का आदेश दिया।

सी. हरिदासन बनाम अनाप्पथ परक्कट्टु (2023)

मामले के तथ्य

इस मामले में, अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच एक बिक्री समझौता हुआ, जिसके तहत अपीलकर्ता ने प्रतिफल राशि के कुछ हिस्से का भी भुगतान कर दिया। शेष राशि का भुगतान दस्तावेज के शीर्षक और खरीद प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने के छह महीने के भीतर किया जाना था। अपीलकर्ता ने प्रतिवादी को विक्रय विलेख निष्पादित करने के लिए प्रतिक्रिया देने के लिए एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसे प्रतिवादी ने करने से मना कर दिया और समझौते को रद्द कर दिया। इसके बदले में, अपीलकर्ता ने विशिष्ट निष्पादन के लिए एक वाद दायर किया, जिसमें ट्रायल न्यायालय ने अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया लेकिन उसे प्रतिफल राशि में 25% अधिक भुगतान करने को कहा। आदेश से व्यथित, प्रतिवादी ने उच्च न्यायालय में अपील की, जहां ट्रायल न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया गया। इस प्रकार, वर्तमान अपील अपीलकर्ता द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई थी।

मामले में शामिल मुद्दे

क्या इस मामले में विशिष्ट निष्पादन की अनुमति दी जा सकती है?

निर्णय 

प्रतिवादी द्वारा यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता अपना हिस्सा निभाने और संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक नहीं था क्योंकि कोई और भुगतान नहीं किया गया था और जब उससे पूछा गया, तो वह ऐसा करने के लिए तैयार नहीं था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह स्पष्ट है कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता ने अपनी भूमिका निभाने के लिए अपनी तत्परता और इच्छा साबित नहीं की है।

इसके अलावा, यदि मुकदमे का फैसला अपीलकर्ता के पक्ष में सुनाया जाता है, तो उसे प्रतिवादी पर अनुचित लाभ होगा और उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, जो समानता पर आधारित उपाय के मूल उद्देश्य के विरुद्ध है। यह अनुबंध का विशिष्ट निष्पादन प्रदान करते समय विचार किए जाने वाले आवश्यक तत्वों में से एक है। इस प्रकार, इसके बदले में, सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए विशिष्ट निष्पादन के डिक्री को रद्द करने वाले उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि की गई, और अपीलकर्ता को अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन का लाभ नहीं दिया गया।

निष्कर्ष

आंशिक निष्पादन और विशिष्ट निष्पादन के सिद्धांत दोनों ही अनुबंध के उन निर्दोष पक्षों को उपचार प्रदान करते हैं जिन्हें दूसरे पक्ष द्वारा अनुबंध का पालन न करने के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। आंशिक निष्पादन के सिद्धांत की उत्पत्ति अंग्रेजी कानून में हुई है। हालांकि, भारत में जहां यह संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53A के तहत एक वैधानिक अधिकार है, यह सिद्धांत अंग्रेजी कानून में न्यायसंगत अधिकार प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत में इस सिद्धांत को लागू करने के लिए, यह आवश्यक है कि अनुबंध लिखित रूप में किए जाएं, लेकिन अंग्रेजी कानून में यह मौखिक समझौतों पर भी लागू होता है।

दूसरी ओर, विशिष्ट निष्पादन का सिद्धांत, अनुबंध के उस पक्ष के लिए एक उपाय प्रदान करता है जो संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक है, लेकिन दूसरे पक्ष के कारण नुकसान उठाता है जो इसमें निहित किसी भी कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहता है या इनकार करता है। अनुबंध विशिष्ट निष्पादन का यह उपाय विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 में निहित है, जो वे शर्तें प्रदान करता है जिनके तहत ऐसा उपाय किया जा सकता है। इस उपाय का लाभ पाने के लिए, वादी को यह साबित करना होगा कि वह अनुबंध के अपने हिस्से का पालन करने के लिए तैयार और इच्छुक है, भले ही दूसरा पक्ष ऐसा करने में विफल हो या इनकार कर दे। एक बार जब यह अदालत में साबित हो जाता है, तो केवल विशिष्ट निष्पादन की डिक्री प्रदान की जाती है। हालाँकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऐसा उपाय अनिवार्य नहीं है, बल्कि प्रकृति में विवेकाधीन है और अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या आंशिक निष्पादन का सिद्धांत न्यायसंगत सिद्धांत पर आधारित है?

हां, आंशिक निष्पादन का सिद्धांत इस कहावत पर आधारित एक न्यायसंगत सिद्धांत पर आधारित है, ”जो समता चाहता है उसे समता अवश्य करनी चाहिए”।

क्या कोई व्यक्ति अपंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर आंशिक निष्पादन के सिद्धांत के लाभ का दावा कर सकता है?

नहीं, व्यक्ति अपंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर सिद्धांत के आवेदन का दावा नहीं कर सकता है। 2001 के संशोधन से पहले, ऐसे दस्तावेज़ सिद्धांत को लागू करने के लिए स्वीकार्य थे लेकिन संशोधन के बाद, सिद्धांत को अपंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता है।

क्या दंडात्मक कानूनों या सार्वजनिक अधिकारों के लिए विशिष्ट निष्पादन का उपाय दिया जा सकता है?

नहीं, विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 4 के तहत दंडात्मक कानूनों के मामले में विशिष्ट निष्पादन का उपाय नहीं दिया जा सकता है। यह केवल लेख के तहत दिए गए व्यक्तिगत अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपलब्ध हो सकता है। 

विशिष्ट निष्पादन के लिए सीमा अवधि क्या है?

परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची 1 के अनुच्छेद 54 में दिया गया है की विशिष्ट निष्पादन के मुकदमे की सीमा अवधि निष्पादन के लिए निर्धारित तारीख से 3 वर्ष है और जहां ऐसी कोई तारीख तय नहीं है तो वह तारीख जब वादी को नोटिस प्राप्त हुआ कि निष्पादन से इनकार कर दिया गया है तब से तय होगी। 

किसी अनुबंध और निषेधाज्ञा के विशिष्ट निष्पादन के बीच क्या अंतर है?

विशिष्ट निष्पादन एक अनुबंध के उस पक्ष के लिए उपलब्ध एक उपाय है जिसे अनुबंध का उल्लंघन करने वाले दूसरे पक्ष के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। जो पक्ष अनुबंध का उल्लंघन करता है, उसे अनुबंध के नियमों और शर्तों का पालन करने और उसमें उल्लिखित दायित्व को पूरा करने के लिए कहा जाता है। दूसरी ओर निषेधाज्ञा एक अन्य उपाय है जिसमें किसी पक्ष को कोई कार्य करने से प्रतिबंधित किया जाता है। यह अस्थायी या स्थायी हो सकता है।

संदर्भ

 

श्रम कानून में छंटनी

यह लेख Upasana Sarkar द्वारा लिखा गया है। इस लेख का उद्देश्य छंटनी (रेट्रेंचमेंट) की अवधारणा की समझ प्रदान करना है। यह अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, प्रक्रिया और विभिन्न शर्तों जिन्हें छंटनी अवधि के दौरान पूरा किया जाना आवश्यक है का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है। 

परिचय

औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) विवाद अधिनियम, 1947, औद्योगिक विवादों को हल करने और नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच शांति बनाए रखने के लिए अधिनियमित किया गया था। औद्योगिक विवादों से संबंधित महत्वपूर्ण कारकों में से एक है छंटनी। यह अधिनियम कार्यस्थल पर विवादों को सुलझाने और बातचीत करने में मदद करता है। इसे नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों को शोषण से बचाने के लिए तैयार किया गया था। इसे वित्तीय (फाइनेंशियल) और व्यावसायिक कारकों के कारण श्रमिकों और कर्मचारियों की छंटनी के लिए लागू किया गया था। छंटनी नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों को विवादों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक कारणों से नौकरी से निकालने की प्रक्रिया है। सरकार की पूर्व अनुमति के बाद ही नियोक्ताओं की छंटनी की जाती है।

छँटनी का मतलब

छँटनी का अर्थ नियोक्ता द्वारा आर्थिक कारणों से कर्मचारियों या कामगारों को नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) करना है। उनकी सेवाओं की यह समाप्ति सजा या अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं बल्कि अधिशेष श्रम या व्यवसाय या कंपनी की वित्तीय स्थिति के आधार पर की जाती है। नियोक्ता द्वारा किसी कर्मचारी को काम से हटाना या बर्खास्त करना छंटनी के रूप में जाना जाता है। यह नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के अंत को दर्शाता है।

छँटनी की परिभाषा

छंटनी को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(oo) में परिभाषित किया गया है। परिभाषा के अनुसार, छंटनी का मतलब किसी नियोक्ता द्वारा अनुशासनात्मक दंड के अलावा किसी भी कारण से किसी कर्मचारी की सेवा को समाप्त करना है। कुछ ऐसे कारक हैं जो छंटनी की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • यदि कामगार या कर्मचारी स्वेच्छा से सेवानिवृत्त (रिटायर) हो जाता है।
  • यदि कामगार या कर्मचारी अपने रोजगार के समय नियोक्ता और कर्मचारी के बीच किए गए सेवानिवृत्ति से संबंधित समझौते के प्रावधान के कारण सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंचने के बाद सेवानिवृत्त हो जाता है।
  • यदि रोजगार अनुबंध के नवीनीकरण (रिन्यूअल) न होने के कारण श्रमिक या कर्मचारी की रोजगार समाप्ति हुई हो।
  • यदि रोजगार की समाप्ति कर्मचारी या कर्मचारी के लगातार खराब स्वास्थ्य के कारण होती है।

इसलिए, वित्तीय या व्यावसायिक बाधाओं, कंपनी के पुनर्गठन, प्रौद्योगिकियों की प्रगति, किसी विशिष्ट इकाई को बंद करने आदि के कारण छंटनी को कर्मचारी की सेवा की समाप्ति माना जाता है। 

श्रम कानून में छंटनी का उद्देश्य

छंटनी का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को बर्खास्त करना है जब कोई प्रतिष्ठान वित्तीय बाधाओं का सामना करता है और अपने कर्मचारियों की संख्या कम करने के लिए मजबूर होता है। कंपनियां अधिशेष श्रम के कारण और मानव संसाधन पर खर्च में कटौती करने के लिए कर्मचारियों की छँटनी करती हैं। छंटनी का उद्देश्य निम्नलिखित है:

  • बाहर जाने वाले पैसे को कम करें, या
  • व्यय में कटौती, या
  • आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बनने का प्रयास। 

छंटनी तब भी होती है जब किसी उद्योग को अपने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करने में कठिनाई होती है। उस दौरान वे कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाने का निर्णय लेते हैं।

श्रम कानून में वैध छंटनी के लिए आवश्यकताएँ

श्रम कानून में वैध छंटनी की आवश्यकताओं का उल्लेख औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25F में किया गया है। ये शर्तें तभी लागू होती हैं जब कर्मचारी ने नौकरी पर अपनी सेवा का एक वर्ष पूरा कर लिया हो। श्रम कानून में वैध छंटनी के लिए आवश्यक शर्तें इस प्रकार हैं:

  • कर्मचारियों को नोटिस: कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाने से पहले, छंटनी लागू होने से कम से कम एक महीने पहले एक लिखित नोटिस जारी करना आवश्यक है। नोटिस में छंटनी का कारण अवश्य बताना चाहिए। कर्मचारियों को नोटिस दिए जाने के बाद ही हटाया जा सकता है, उससे पहले नहीं।
  • यदि कोई समझौता पहले से ही समाप्ति की तारीख निर्दिष्ट करता है तो नोटिस की कोई आवश्यकता नहीं है: यदि कोई समझौता मौजूद है जिसमें पहले से ही कर्मचारियों के लिए रोजगार समाप्ति की तारीख का उल्लेख है, तो उनकी सेवाओं से छंटनी से पहले उन्हें नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है।
  • छंटनी के लिए मुआवजा: यदि नियोक्ता कर्मचारियों को छंटनी नोटिस भेजने में विफल रहता है, तो वह इस विफलता के लिए कर्मचारियों को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगा। मुआवज़ा इस आधार पर दिया जाना चाहिए कि यह निरंतर रोजगार के प्रत्येक वर्ष के लिए पंद्रह दिनों की कमाई या छह महीने से अधिक के किसी हिस्से के बराबर है। 
  • उपयुक्त प्राधिकारी को नोटिस देना: कर्मचारियों को उनकी नौकरी से हटाने से पहले, उपयुक्त सरकार या प्राधिकारी को सूचित करना आवश्यक है। अधिसूचना निर्धारित तरीके से दी जानी चाहिए, जैसा कि आधिकारिक राजपत्र में कहा गया है।
  • नोटिस नियमों का पालन: कर्मचारियों को जो नोटिस प्रदान किया गया है वह औद्योगिक विवाद (केंद्रीय) नियम, 1957 के नियम 76 के प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए, क्योंकि यह श्रम कानून में छंटनी के नोटिस को नियंत्रित  करता है।

कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाते समय, नियोक्ता को कानून द्वारा लगाई गई सीमाओं के भीतर कार्य करना चाहिए, जो इस प्रकार हैं:

  • इरादा नेक होना चाहिए.
  • कर्मचारियों को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।
  • नियोक्ता द्वारा लागू कानून का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।

श्रम कानून में छँटनी के अपवाद

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(oo) में छंटनी की परिभाषा के अपवाद बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति: यदि कोई श्रमिक या कर्मचारी बिना किसी अन्य कारण के स्वेच्छा से अपनी सेवा से सेवानिवृत्त होता है, तो इसे श्रम कानून के तहत छंटनी नहीं माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नियोक्ता ने उसे नौकरी से नहीं हटाया है, बल्कि कर्मचारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वेच्छा से नौकरी छोड़ी है।
  • सेवानिवृत्ति के बाद सेवा–निवर्तन: यदि कोई श्रमिक या कर्मचारी अपने रोजगार के समय नियोक्ता और कर्मचारी के बीच किए गए रोजगार समझौते में सेवा–निवर्तनखंड की उपस्थिति के कारण सेवा–निवर्तन की आयु तक पहुंचने के बाद सेवानिवृत्त हो जाता है। 
  • रोजगार समझौते का नवीनीकरण न होना: यदि नियोक्ता द्वारा श्रमिक या कर्मचारी के रोजगार समझौते का नवीनीकरण नहीं किया गया है और परिणामस्वरूप, वह अपना काम आगे जारी नहीं रख सकता है, तो इसे छंटनी नहीं माना जाता है।
  • किसी कर्मचारी के खराब स्वास्थ्य के कारण रोजगार की समाप्ति: यदि किसी श्रमिक या कर्मचारी को उसके लगातार खराब स्वास्थ्य के कारण नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है, तो इसे श्रम कानून के तहत छंटनी नहीं माना जाता है। शरीर या मन की बीमारी किसी कर्मचारी के खराब स्वास्थ्य का लक्षण मानी जाती है। यह निर्धारित करने के लिए कि कर्मचारी लगातार समय से पीड़ित है या नहीं, अनुबंध के पक्षों को अदालत में यह साबित करना होगा।

कर्मचारियों की छंटनी की प्रक्रिया

कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाने की प्रक्रिया ‘पहले आना, बाद में जाना’ और ‘बाद में आना, पहले जाना’ की अवधारणा पर आधारित है। इस सिद्धांत का उल्लेख औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25G में किया गया है। ऐसे कुछ कारक हैं जिनके आधार पर कर्मचारी प्रक्रियात्मक सुरक्षा की मांग कर सकता है, जो इस प्रकार हैं:

  • निर्धारित योग्यता: जो कर्मचारी सुरक्षा लेना चाहता है, उसके पास अधिनियम की धारा 2(s) में निर्धारित उचित योग्यता होनी चाहिए।
  • नागरिकता: कर्मचारी को भारत का नागरिक होना आवश्यक है। भारतीय नागरिकता एक महत्वपूर्ण कारक है।
  • किसी उद्योग में कर्मचारियों का रोजगार: कर्मचारी को किसी उद्योग का कर्मचारी होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उसे अधिनियम की धारा 2(j) के प्रावधानों के अनुसार किसी प्रतिष्ठान में नियोजित किया जाना चाहिए।
  • कार्यबल की विशिष्ट श्रेणी: कर्मचारी को किसी प्रतिष्ठान में किसी विशेष कार्यबल का सदस्य होना आवश्यक है।
  • छंटनी अनुबंध का न होना: जो कर्मचारी धारा 25G के तहत सुरक्षा लेना चाहता है, उसके पास उस उद्योग के नियोक्ता के साथ पूर्व छंटनी समझौता नहीं होना चाहिए।

यदि उपरोक्त शर्तें पूरी होती हैं, तो कर्मचारी को अधिनियम की इस धारा के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा मिलेगी।

श्रम कानून में छंटनी के लिए नैतिक मानक

यह नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह छंटनी को नैतिक रूप से संभाले। तो नियोक्ता इसे निम्नलिखित तरीकों से करता है:

  • कर्मचारियों की उचित छंटनी करके: यह नियोक्ता की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कर्मचारियों की छंटनी बिना किसी पक्षपात के निष्पक्ष तरीके से की जाए। कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से परिचालन आवश्यकताओं या प्रदर्शन मेट्रिक्स के अनुसार हटाया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के अनुसार।
  • इसे पारदर्शी रखकर: कर्मचारियों को छंटनी के कारणों के बारे में सूचित करना नियोक्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्हें ऐसा इस तरह करना चाहिए कि कर्मचारी लिए गए निर्णयों के पीछे के तर्क को समझ सकें। ‘पहले आओ, आखिरी जाओ’ और ‘आखिरी आओ, पहले जाओ’ के सिद्धांत का पालन करना उनका कर्तव्य है।
  • अग्रिम सूचना भेजकर: अग्रिम सूचना भेजना नियोक्ता की नैतिक जिम्मेदारी है ताकि कर्मचारियों को शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को तैयार करने के लिए उचित समय मिल सके। नियोक्ता को उनकी नौकरी के अचानक छूटने के सदमे को कम करते हुए, उन्हें सचेत करके उनका समर्थन करना चाहिए।
  • विच्छेद (सिवरेंस) और सहायता की पेशकश करके: कर्मचारियों को सहायता और विच्छेद पैकेज की पेशकश करना नियोक्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्हें परामर्श या विस्थापन (आउटप्लेसमेंट) सेवाएँ प्रदान की जानी चाहिए जो उनके संक्रमण में मदद करेंगी। नियोक्ताओं को उनकी भलाई का ध्यान रखते हुए उनका समर्थन करना चाहिए।
  • पुनः प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करके: यह नियोक्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे छंटनी किए गए कर्मचारियों को पुनः प्रशिक्षित करने या खुद को फिर से कुशल बनाने के लिए विभिन्न अवसर देकर उनकी मदद करें। वे उन्हें एक विशेष भूमिका के लिए तैयार कर सकते हैं और कर्मचारियों के भविष्य की बेहतरी में निवेश कर सकते हैं।

छंटनी, समाप्ति से भिन्न है

जैसा कि ऊपर बताया गया है, छंटनी का मतलब कर्मचारियों के लिए रोजगार की समाप्ति है। तो ऐसा लग सकता है कि छँटनी और बर्खास्तगी दोनों एक ही बात है। लेकिन वास्तव में, वे एक दूसरे से भिन्न हैं। छंटनी का अर्थ है आर्थिक स्थिति या कंपनियों के पुनर्गठन (रिस्ट्रक्चरिंग) या विलय (मर्जिंग), लागत में कटौती के उपाय, मशीनरी की विफलता, प्रौद्योगिकियों की प्रगति और अन्य जैसी वित्तीय बाधाओं के कारण कर्मचारियों को उनकी नौकरी से बर्खास्त करना। इसलिए, यह कर्मचारियों के प्रदर्शन के आधार पर नहीं बल्कि कंपनी के सामने आने वाली सामाजिक समस्याओं के आधार पर किया जाता है। दूसरी ओर, समाप्ति का अर्थ विभिन्न आधारों पर नियोक्ता-कर्मचारी संबंध का अंत है, जैसे खराब प्रदर्शन, कदाचार, या कंपनी की नीतियों का उल्लंघन। इस प्रकार, संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि छंटनी कंपनी की वित्तीय स्थिति के कारण होती है, जबकि समाप्ति कर्मचारियों के रोजगार के समय उनके प्रदर्शन या कदाचार के आधार पर होती है।

छँटनी के समय कर्मचारियों के अधिकार

कर्मचारियों को उनके नियोक्ताओं द्वारा शोषण से बचाने के लिए छंटनी प्रक्रिया के दौरान विभिन्न अधिकारों से लैस किया जाता है। वे अपने नियोक्ताओं की मनमानी कार्रवाइयों से सुरक्षित हैं। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कर्मचारियों को निम्नलिखित अधिकार दिए गए हैं:

  • पूर्व सूचना प्राप्त करना: पूर्व सूचना और नोटिस के बदले मुआवजा प्राप्त करना कर्मचारियों का अधिकार है, जो नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच किए गए रोजगार समझौते पर निर्भर करता है।
  • परामर्श और सहायता प्राप्त करना: किसी कंपनी से बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी की स्थिति में, उन्हें नौकरी लगाने के लिए परामर्श या सहायता जैसी सहायता सेवाएँ दी जानी चाहिए। 
  • विच्छेद वेतन प्राप्त करने के लिए: यदि कोई रोजगार समझौता है जहां अनुबंध की शर्तों में कहा गया है कि छंटनी किए गए कर्मचारियों को विच्छेद वेतन मिलेगा, तो कर्मचारी छंटनी मुआवजा या विच्छेद पैकेज प्राप्त करने के हकदार हैं। 
  • प्रतिनिधित्व और परामर्श: कई क्षेत्रों या इलाकों में कर्मचारियों या उनके प्रतिनिधियों को छंटनी की प्रक्रिया के संबंध में परामर्श का अधिकार है। 
  • छँटनी का कारण जानना: कर्मचारियों को अपनी छँटनी का कारण जानने का अधिकार है। उन्हें छंटनी के फैसले का औचित्य और तर्क अवश्य दिया जाना चाहिए।
  • शिकायत तंत्र तक पहुंच पाना: यदि कर्मचारियों को लगता है कि उनकी छंटनी अनुचित तरीके से की जा रही है, तो उन्हें छंटनी के फैसले को चुनौती देने का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्हें मनमाने तरीके से हटाया गया है और उनके अधिकारों का हनन किया गया है।
  • व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के बिना छँटनी: कर्मचारियों की छँटनी उचित और उचित आधार पर की जानी चाहिए। नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों की छंटनी करते समय किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या भेदभाव शामिल नहीं किया जाएगा। 
  • पुनः रोजगार के अवसर प्राप्त करना: यदि नियोक्ता किसी पद पर व्यक्तियों को नियुक्त करने के बारे में सोचते हैं, तो उन्हें छंटनी किए गए कर्मचारियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्हें कंपनी के भीतर पुनः रोजगार के अवसर या पुनः प्रशिक्षण के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

श्रम कानून में छंटनी की शर्तें

किसी श्रमिक या कर्मचारी को नियोक्ता द्वारा विभिन्न शर्तों के तहत उसकी सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं:

  • आर्थिक कठिनाइयाँ: किसी कंपनी या व्यवसाय को कभी-कभी वित्तीय बाधाओं या व्यावसायिक आय में हानि का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति के कारण कर्मचारियों को काम से छुट्टी देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। अतः आर्थिक कठिनाइयों के कारण कर्मचारियों की छँटनी हो सकती है।
  • कंपनी का पुनर्गठन: एक कंपनी को अपनी दक्षता में सुधार करने के लिए कई बार पुनर्गठन की आवश्यकता होती है। पुनर्गठन में कंपनी के किसी विशेष विभाग में संरचनात्मक (स्ट्रक्चरल) या परिचालन परिवर्तन शामिल हो सकते हैं। इससे कर्मचारियों की उनकी सेवाओं से छँटनी हो सकती है।
  • प्रौद्योगिकियों में प्रगति: एक कंपनी अपने कार्य की दक्षता में सुधार के लिए नई और उन्नत तकनीकों को अपना सकती है। नई और आधुनिक तकनीकों के आने से कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो जाती है। इसलिए, इससे कर्मचारियों की नौकरियों से छंटनी हो सकती है क्योंकि उनकी तकनीकें पुरानी और अप्रचलित हो जाती हैं। 
  • किसी विशिष्ट इकाई को बंद करना: किसी कंपनी में, किसी विशिष्ट इकाई को हटाने के कारण नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाया जा सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि कंपनी को अब उस विशिष्ट इकाई की आवश्यकता नहीं है या नई तकनीकों की स्थापना के कारण।
  • मशीनरी की विफलता: मशीन की विफलता की स्थिति में किसी कंपनी के कर्मचारियों को नौकरी से भी हटाया जा सकता है। यदि किसी कंपनी की मशीनरी ख़राब हो जाती है या खराब हो जाती है, तो इससे कर्मचारियों की छँटनी हो सकती है।

ये विभिन्न कारण हैं जो नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों की छंटनी के लिए जिम्मेदार हैं। इस प्रकार, छंटनी सामाजिक कारकों के कारण होती है, न कि कंपनी के कर्मचारियों को दंडित करने के लिए।

छंटनी किए गए कर्मचारियों का औसत वेतन

छंटनी किए गए कर्मचारियों को औसत वेतन या मुआवजे की राशि का भुगतान छंटनी की प्रकृति और रोजगार समझौते की शर्तों पर निर्भर करता है। यह मूलतः दो प्रकार का होता है, जो इस प्रकार है:

  • प्रतिष्ठान (इस्टेब्लिशमेंट) बंद होने से कर्मचारियों की छँटनी।
  • प्रतिष्ठान बंद न होने के कारण कर्मचारियों की छँटनी।

उपरोक्त दोनों स्थितियों में, नियोक्ता द्वारा छंटनी किए गए कर्मचारियों को भुगतान किया जाने वाला मुआवजा निरंतर रोजगार के प्रत्येक वर्ष या उसके किसी भी हिस्से के आधार पर तय किया जाएगा, जो छह महीने से अधिक है और पंद्रह दिनों के औसत वेतन की दर से भुगतान किया जाएगा। औसत वेतन की गणना उस उद्योग में कर्मचारी की नौकरी के अंतिम बारह महीनों में अर्जित वेतन को ध्यान में रखकर की जाती है। नियोक्ता अधिक भुगतान कर सकता है यदि उसे लगता है कि ऐसा करना उचित है, लेकिन वह अधिनियम में बताए गए मुआवजे की न्यूनतम राशि से कम भुगतान नहीं कर सकता है। 

छँटनी मुआवज़े की आवश्यक आवश्यकताएँ

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, लगातार एक वर्ष का काम पूरा करने वाले छंटनी किए गए कर्मचारियों को मुआवजा देना आवश्यक है। छंटनी मुआवजे का भुगतान करते समय नियोक्ता को निम्नलिखित आवश्यक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए:

  • छंटनी किए गए कर्मचारी को प्रतिष्ठान में उसकी निरंतर सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के लिए उनके औसत मासिक वेतन का आधा हिस्सा या उसका कोई भी हिस्सा जो छह महीने से अधिक हो, दिया जाना चाहिए।
  • नियोक्ता चाहे तो छंटनी किए गए कर्मचारियों को अतिरिक्त मुआवजा भी दे सकता है. अतिरिक्त मुआवज़ा कंपनी की प्रकृति, आकार, वित्तीय स्थिति के साथ-साथ छंटनी किए गए कर्मचारियों की संख्या पर निर्भर करेगा। यह राशि उन्हें दिए जाने वाले मूल मुआवजे से अधिक होनी चाहिए।
  • यदि नियोक्ता चाहे तो वह कर्मचारियों को बोनस, उपदान और किसी अन्य अवैतनिक वेतन या बकाया का भुगतान करके अतिरिक्त लाभ दे सकता है।

छँटनी किए गए श्रमिकों को पुनः रोजगार देना

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25H कहती है कि यदि किसी नियोक्ता को अधिशेष श्रम के आधार पर सेवा से हटा दिया जाता है, तो नियोक्ता द्वारा अतिरिक्त कर्मचारियों को नियुक्त करने का निर्णय लेने की स्थिति में उस कर्मचारी को काम पर लौटने का पहला अवसर दिया जाना चाहिए। यह धारा नियोक्ता पर एक कर्तव्य लगाती है, जो उद्योग में उत्पन्न होने वाले किसी भी रोजगार के अवसर के मामले में छंटनी किए गए कर्मचारियों को पुन: रोजगार के लिए आवेदन करने का मौका देना है। पुनः रोजगार के लिए आवेदन करने के लिए, कर्मचारियों को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा:

  • पुनः रोजगार का अवसर: यदि किसी कंपनी के कर्मचारियों को कंपनी की वित्तीय स्थिति या अधिशेष श्रम के कारण छंटनी की जाती है, तो अतिरिक्त कर्मचारियों के रोजगार की आवश्यकता होने पर छंटनी किए गए कर्मचारियों को उनकी सेवाओं में लौटने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।
  • छंटनी किए गए कर्मचारियों को नोटिस देना: यदि नियोक्ता को कोई पद खाली लगता है और वह किसी को नियुक्त करने के बारे में सोचता है, तो यह उसका कर्तव्य है कि वह छंटनी किए गए कर्मचारियों को नोटिस दे, जिनमें काम करने की क्षमता है। 
  • नागरिकता: कर्मचारी को भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
  • उसी प्रतिष्ठान में पुन: रोजगार: छंटनी किए गए कर्मचारियों के पुन: रोजगार के मामले में, उद्योग में काम का स्थान वही होना चाहिए जो उनकी छंटनी से पहले था। 
  • छंटनी किए गए कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए: जब किसी प्रतिष्ठान का नियोक्ता सेवा में नए कर्मचारियों को नियोजित करने का निर्णय लेता है, तो छंटनी किए गए कर्मचारियों को अन्य व्यक्तियों की तुलना में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

उपर्युक्त पुनर्रोजगार के अवसर केवल उन्हीं कर्मचारियों के लिए उपलब्ध हैं जिन्हें उनकी सेवाओं से हटा दिया गया था। जिन कर्मचारियों को सेवामुक्त कर दिया गया, उनकी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, या सेवानिवृत्ति के कारण सेवानिवृत्त कर दिया गया, उन्हें अधिनियम की धारा 25H के तहत लाभ का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि किसी छंटनी किए गए कर्मचारी को अपने काम पर लौटने का अवसर दिया जाता है, लेकिन वह वैध कारण के लिए अवसर लेने से इनकार करता है, तो वह धारा 25H के लाभों से वंचित हो सकता है। जब नियोक्ता नए कर्मचारियों को नियुक्त करना चाहता है, तो उसे छंटनी किए गए कर्मचारियों को दूसरों से पहले कार्यबल में फिर से शामिल होने का अवसर प्रदान करना होगा। यह अधिनियम में उल्लिखित महत्वपूर्ण मूलभूतएल सिद्धांतों में से एक है और इसका उपयोग औद्योगिक न्यायनिर्णयन (एडज्यूडिकेशन) में किया जाता है। यह खंड कर्मचारियों के समान व्यवहार और अधिकारों की सुरक्षा पर जोर देने के साथ प्राकृतिक न्याय, निष्पक्षता और समता के सिद्धांतों को चित्रित करता है।

श्रमिकों की छँटनी के लिए पूरी की जाने वाली शर्तें

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25N उन शर्तों को बताती है जिनका किसी कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले पालन किया जाना आवश्यक है। शर्तें इस प्रकार हैं:

  • कर्मचारी को नोटिस देना आवश्यक है: एक कर्मचारी जिसने कम से कम एक वर्ष की निरंतर अवधि के लिए काम किया है, उसे केवल नियोक्ता द्वारा उसकी सेवा के लिए छंटनी की जा सकती है। कर्मचारी की छंटनी करने से पहले नियोक्ता को उसकी छंटनी की तारीख से कम से कम तीन महीने पहले छंटनी का नोटिस भेजना होगा। यह सुनिश्चित करना भी नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि कर्मचारी को नोटिस अवधि से पहले उसका वार्षिक वेतन मिल जाए।
  • सरकार की मंजूरी आवश्यक है: जब किसी कंपनी का नियोक्ता किसी कर्मचारी की छंटनी करने का निर्णय लेता है, तो उसे छंटनी का नोटिस जारी करने से पहले उपयुक्त सरकार या प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेनी चाहिए।
  • अनुमोदन के लिए आवेदन जमा करना आवश्यक है: छंटनी के लिए अनुमोदन की आवश्यकता वाले आवेदन को उपयुक्त सरकार या प्राधिकरण को प्रस्तुत करना होगा, जो निर्धारित प्रारूप में किया जाना चाहिए। उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा तय किए गए अनुमोदन या इनकार की एक प्रति कर्मचारी को आधिकारिक राजपत्र के विनिर्देशों के अनुसार दी जानी है।
  • सरकार द्वारा उचित जांच: जब नियोक्ता छंटनी की मंजूरी के लिए आवेदन जमा करता है, तो उपयुक्त प्राधिकारी मामले को देखता है। वे इस संबंध में उचित जांच करते हैं। फिर नियोक्ता द्वारा इस तरह के छंटनी के फैसले के कारण पर विचार किया जाता है, और उसे अपना मामला पेश करने की अनुमति दी जाती है। उनकी बात सुनने के बाद सरकार उनकी संतुष्टि के आधार पर आवेदन को मंजूरी देगी या अस्वीकार कर देगी। 
  • निर्णयों के बारे में कर्मचारी को सूचित करना आवश्यक है: सरकार का निर्णय जो भी हो, इसके बारे में नियोक्ता के साथ-साथ कर्मचारी को भी सूचित किया जाना चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गहन जांच करे और प्राकृतिक न्याय, निष्पक्षता और समता के सिद्धांतों का पालन करते हुए आदेश पारित करे। 
  • निर्णय जारी करने के लिए एक विशिष्ट समय अवधि: सरकार को नियोक्ता से प्राधिकरण के लिए आवेदन प्राप्त होने के साठ दिनों के भीतर आदेश पारित करना होगा। यदि सरकार ऐसा करने में विफल रहती है, तो इसे सरकार द्वारा अधिकृत माना जाता है।
  • निर्णय की अंतिमता: अनुमोदन या अस्वीकृति के लिए उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा दिया गया निर्णय दोनों पक्षों पर उस तारीख से एक वर्ष की अवधि के लिए बाध्यकारी है, जिस तारीख से उन्हें सूचित किया गया था।
  • न्यायनिर्णयन के लिए न्यायाधिकरण: यदि नियोक्ता उपयुक्त प्राधिकारी के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह न्यायनिर्णयन के लिए मामले को लेकर न्यायाधिकरण के पास जा सकता है। अधिकरण को तीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय पारित करना होता है।
  • सरकार द्वारा आवेदन अस्वीकार किया जा सकता है: यदि सरकार छंटनी के आवेदन को अस्वीकार या अस्वीकार कर देती है, तो इसे गैरकानूनी माना जाएगा।

उल्लंघन के लिए दंड

नियोक्ता को कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाते समय औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। यदि वह प्रावधानों का पालन नहीं करता है और इसके विपरीत कुछ करता है तो उसे अधिनियम की धारा 25Q के प्रावधानों के अनुसार दंडित किया जाएगा। उसे एक महीने की कैद या अधिकतम एक हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

श्रम कानून में मंदी और छंटनी के बीच अंतर

अधिनियम में ‘मंदी’ और ‘छंटनी’ दोनों शब्दों को परिभाषित किया गया है। ले-ऑफ का अर्थ है किसी कर्मचारी को उसकी सेवा से अस्थायी रूप से निलंबित करना। यह तब होता है जब नियोक्ता किसी कर्मचारी को अस्थायी रूप से काम से दूर रखता है, लेकिन उनका नियोक्ता-कर्मचारी संबंध समाप्त नहीं होता है। छंटनी के विपरीत, मंदी का मतलब कर्मचारियों के रोजगार की समाप्ति नहीं है। मंदी और छँटनी के बीच अंतर के कुछ बिंदुओं को सारणीबद्ध रूप में दर्शाया गया है:

क्रमांक संख्या मंदी  छटनी 
1. मंदी को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(kkk) में परिभाषित किया गया है। छंटनी को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(oo) में परिभाषित किया गया है।
2. किसी विशेष अवधि के लिए काम की अस्थायी समाप्ति। कर्मचारियों के रोजगार की स्थायी समाप्ति।
3. यह कंपनी की किसी विशिष्ट इकाई में काम की कमी या व्यवसाय में मंदी आने के कारण होता है। यह वित्तीय बाधाओं या कंपनी के पुनर्गठन के कारण होता है।
4. मंदी अवधि के दौरान, कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से बर्खास्त नहीं किया जाता है। छंटनी के दौरान कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से बर्खास्त कर दिया जाता है।
5. व्यवसाय की स्थिति में सुधार होने या नया काम आने पर आमतौर पर कर्मचारियों को दोबारा काम पर रखा जाता है। कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर नहीं रखा जाता क्योंकि उन्हें उनकी नौकरी से स्थायी रूप से बर्खास्त कर दिया जाता है।
6. जब कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जाता है, तो उन्हें बेरोजगारी लाभ दिया जा सकता है। जब कर्मचारियों की छंटनी की जाती है, तो उन्हें विच्छेद वेतन और अन्य मुआवजा दिया जाता है।
7. यह आमतौर पर उद्योग की किसी विशेष इकाई या स्थान के कर्मचारियों को प्रभावित करता है। इसका प्रभाव केवल एक विशेष विभाग पर ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उद्योग के कर्मचारियों पर पड़ सकता है।
8. मंदी तब होती है जब नियोक्ता कोयले, कच्चे माल, बिजली की कमी, या प्राकृतिक आपदा, या स्टॉक जमा होने या मशीनरी के खराब होने, या ऐसे किसी भी कारण से कर्मचारियों को रोजगार प्रदान करने में विफल रहता है। छंटनी तब होती है जब नियोक्ता वित्तीय स्थिति, तकनीकी प्रगति, आर्थिक कठिनाइयों, कंपनी के पुनर्गठन, किसी विशिष्ट इकाई को बंद करने और ऐसे किसी भी कारण से किसी कर्मचारी को सेवा से निकाल देता है। 
9. नियोक्ता-कर्मचारी संबंध समाप्त हो जाता है लेकिन कुछ समय के लिए निलंबित रहता है। नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थायी रूप से समाप्त हो जाता है।
10. मंदी में कार्यरत कर्मचारियों की स्थिति। छंटनी में कर्मचारियों की स्थिति बेरोजगार वाली है.
11. मंदी के लिए नोटिस अवधि आवश्यक नहीं है। छंटनी के लिए नोटिस अवधि एक अनिवार्य आवश्यकता है।
12. मंदी अवधि के दौरान प्रतिष्ठान का संचालन या कामकाज अस्थायी रूप से बंद हो सकता है। छंटनी की घोषणा के बाद भी प्रतिष्ठान का संचालन या कामकाज जारी रहता है।

छँटनी और समापन के बीच अंतर

‘समापन’ शब्द को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(oo) में परिभाषित किया गया है, जो किसी प्रतिष्ठान को स्थायी रूप से बंद करने को संदर्भित करता है। यह नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के अंत का प्रतीक है। छंटनी और समापन बीच अंतर के कुछ बिंदुओं को सारणीबद्ध रूप में दर्शाया गया है:

क्रमांक संख्या  छटनी  समापन 
1. इसका अर्थ है नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों के रोजगार को समाप्त करना। इसका अर्थ है किसी प्रतिष्ठान को बंद करना, जिससे रोजगार समाप्त हो जाता है।
2. छँटनी में केवल वही कर्मचारी प्रभावित होते हैं जिन्हें उनकी नौकरी से हटा दिया जाता है। बंदी में, किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले सभी कर्मचारी प्रभावित होते हैं क्योंकि इसका मतलब है काम का पूर्ण रूप से बंद होना।
3. कर्मचारियों को मुख्यतः अधिशेष श्रम के कारण निकाला जाता है। व्यापारिक कारणों से व्यवसाय बंद होने के कारण कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।
4. छँटनी का प्रभाव केवल कर्मचारियों पर पड़ता है, नियोक्ताओं पर नहीं। बंद होने से नियोक्ता और कर्मचारी दोनों प्रभावित होते हैं क्योंकि इससे रोजगार का स्थान स्थायी रूप से बंद हो जाता है।
5. छँटनी का अर्थ है किसी प्रतिष्ठान से कर्मचारियों को हटाना। व्यवसाय संचालन समाप्त नहीं होता है.  समापन का अर्थ है व्यापार कारणों से व्यावसायिक परिचालन की अंतिम और अपरिवर्तनीय समाप्ति।
6. जब छंटनी की प्रक्रिया चल रही हो तो प्रतिष्ठान काम करना बंद नहीं करता. छंटनी प्रक्रिया के बावजूद यह अपना काम जारी रखता है।  जब कोई प्रतिष्ठान बंद हो जाता है तो इसका मतलब है कि उस उद्योग का कामकाज स्वतः ही समाप्त हो जाता है। आगे कोई काम नहीं होगा।
7. यदि प्रतिष्ठान नए कर्मचारियों को नियुक्त करने का निर्णय लेता है तो छंटनी किए गए कर्मचारियों को फिर से नियोजित किया जा सकता है।  कोई पुनर्नियोजन नहीं हो सकता क्योंकि प्रतिष्ठान पहले ही स्थायी रूप से बंद हो चुका है।
8. छँटनी में, छँटनी किए गए कर्मचारियों को छँटनी मुआवजा दिया जाता है यदि उन्होंने उस प्रतिष्ठान में लगातार एक वर्ष का काम पूरा कर लिया हो। बंदी में ऐसी स्थिति नहीं बनती क्योंकि व्यापारिक स्थिति खराब होने के कारण प्रतिष्ठान बंद किया गया है। इसलिए नियोक्ता के पास कर्मचारियों को मुआवजा देने के लिए पैसे नहीं हैं।

श्रम कानून में छंटनी पर ऐतिहासिक मामले

  • लक्ष्मी देवी शुगर मिल्स लिमिटेड बनाम राम सागर पांडे (1957) के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ शर्तों का उल्लेख किया है जिनका कर्मचारियों की छंटनी करते समय पालन किया जाना आवश्यक है। छंटनी के लिए निम्नलिखित शर्तें मान्य मानी जाएंगी:
    1. यह साबित करना नियोक्ता की ज़िम्मेदारी है कि छंटनी वित्तीय मुद्दों जैसे व्यापार कारणों से व्यवसाय में गिरावट या अधिशेष श्रम के कारण हो रही है। अन्य कोई भी कारण वैध नहीं माना जायेगा।
    2. छंटनी से पहले, नियोक्ता को उन कर्मचारियों को एक नोटिस भेजना होगा जिनकी छंटनी की जाएगी, और उन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25F के अनुसार छंटनी मुआवजा का भुगतान करना होगा।
    3. कर्मचारियों की छंटनी करते समय नियोक्ता को ‘आखिरी आओ, पहले जाओ’ के सिद्धांत का पालन करना होगा। इसका मतलब यह है कि जो अन्य सभी कर्मचारियों के बीच सबसे बाद में कार्यरत थे, उनकी छंटनी सबसे पहले की जाएगी।
    4. न्यायालय द्वारा बताई गई एक अन्य शर्त यह थी कि नियोक्ताओं को यह साबित करना होगा कि छंटनी के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं हैं, जैसे कर्मचारियों को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करना या फिर से तैनात करना, या किसी अन्य विकल्प की उपस्थिति।

ये वे आधार हैं जिनका किसी प्रतिष्ठान के नियोक्ताओं को कर्मचारियों को उनकी सेवाओं से हटाने से पहले पालन करना होता है।

  • मीनाक्षी मिल्स लिमिटेड के कामगार बनाम मीनाक्षी मिल्स लिमिटेड और अन्य (1992) ,  के मामले में वादी ने धारा 25N की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए एक मुकदमा दायर किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस अधिनियम की धारा 25N भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(g), और अनुच्छेद 19(6) के तहत कर्मचारियों के समानता और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। वादी द्वारा यह तर्क दिया गया कि नियोक्ता उन्हें प्रतिष्ठान से वापस नहीं निकाल सकते क्योंकि उनके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि धारा 25N असंवैधानिक नहीं है। नियोक्ता कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं, लेकिन केवल उन कुछ शर्तों के तहत जो उन पर लगाई गई हैं। धारा 25N के प्रावधानों के अनुसार कर्मचारियों की छंटनी करने में नियोक्ताओं की विफलता औद्योगिक विवादों को जन्म दे सकती है। इसलिए अदालत ने प्रबंधन और कर्मचारियों दोनों के साथ औद्योगिक विवाद उठाने की शक्ति दे दी। दोनों को छंटनी की मंजूरी या इनकार के लिए अदालत में जाने का अधिकार दिया गया। 
  • कर्नाटक हथकरघा विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक बनाम श्री महादेव लक्ष्मण रावल (2006) के मामले में, प्रतिवादी ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(oo) के तहत सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया। उन्हें कुछ विशिष्ट घंटों और अंतरालों के लिए अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था। इसलिए वह अवधि ख़त्म होते ही उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। यही कारण था कि प्रतिवादी ने औद्योगिक विवाद खड़ा कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि उनके रोजगार की समाप्ति को छंटनी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अनुबंध में पहले से ही उल्लेख किया गया था कि वह केवल एक विशिष्ट समय अंतराल के लिए प्रतिष्ठान में कार्यरत थे। इसके बाद उनकी सेवा स्वत: समाप्त हो जायेगी. चूंकि वह उस प्रतिष्ठान का नियमित कर्मचारी नहीं था, इसलिए उसका निष्कासन छंटनी नहीं था।

श्रम कानून में छंटनी पर हालिया न्यायिक घोषणाएँ

  • बराड़ा कोऑपरेटिव मार्केटिंग के प्रबंधन एंड प्रोसेसिंग सोसाइटी लिमिटेड बनाम वर्कमैन प्रताप सिंह (2019)  के मामले में, एक कर्मचारी को गैरकानूनी रूप से उसकी नौकरी से हटा दिया गया था। प्रतिवादी ने उस मुआवजे को स्वीकार कर लिया था जो उसके रोजगार की अवैध समाप्ति के कारण उसे दिया गया था। जब प्रतिवादी ने देखा कि अपीलकर्ता की कंपनी ने दो चपरासियों के रोजगार को नियमित कर दिया है, तो उसने तर्क दिया कि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25(H) के अनुसार पुन: रोजगार के लिए भी पात्र था। सर्वोच्च न्यायालय ने दावे को खारिज कर दिया और कहा कि वह धारा 25(H) के प्रावधानों के अनुसार पुन: रोजगार का हकदार नहीं था। यह कहा गया था कि उसने अपने रोजगार की अवैध समाप्ति के कारण उसे दिया गया मुआवजा पहले ही ले लिया था। अब उन्हें पुन: रोजगार का दावा करने के लिए अन्य कर्मचारियों के मामले का हवाला देने की अनुमति नहीं है जो पहले से ही कार्यरत हैं और जिनकी सेवा अपीलकर्ता ने केवल उनकी सेवाओं के आधार पर नियमित की थी। इसलिए शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

  • अशोक गुप्ता बनाम मोदी रबर लिमिटेड (2021) के मामले में, वादी ने उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दायर किया जिसने उसे अपनी कंपनी में कानून अधिकारी के रूप में नियुक्त किया था। हालाँकि उनकी सेवाओं को प्रतिवादी द्वारा सत्यापित किया गया था, लेकिन उन्हें कंपनी परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। उन्हें सूचित किया गया कि उनका रोजगार तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। उनके रोजगार की समाप्ति का कारण व्यावसायिक आपात्कालीन और प्रशासनिक कारण बताया गया था, सज़ा के रूप में नहीं। नई दिल्ली के विचारण न्यायालय ने कहा कि छंटनी के माध्यम से रोजगार की समाप्ति किसी भी कारण से हो सकती है। लेकिन इस मामले में, इसे छंटनी नहीं माना जा सकता क्योंकि वादी को छंटनी का नोटिस नहीं दिया गया था। इसलिए यह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25 (F) के अनुसार मान्य नहीं था। इसलिए यह मामला औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है, हालांकि उसे भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 73 और धारा 74 के अनुसार मुआवजा मिलेगा।

निष्कर्ष

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच उत्पन्न होने वाली सभी समस्याओं को हल करने के लिए बनाया गया था। छंटनी इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो कर्मचारियों को बिना किसी अराजकता या दंगे के छुट्टी देने में मदद करता है, क्योंकि यह कानूनी है। छंटनी की प्रक्रिया को कमी या कटौती की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है। यह किसी कंपनी को अतिरिक्त व्यय में कटौती करके अपने संसाधनों और संरचनाओं को ठीक से व्यवस्थित करने में मदद करता है। जब भी कंपनियां या व्यवसाय वित्तीय कठिनाइयों का सामना करते हैं तो वे अपने अधिशेष कर्मचारियों को कम कर सकते हैं। लेकिन कर्मचारियों को नौकरी से निकालने से पहले उन्हें एक प्रक्रिया का पालन करना होगा, जो अधिनियम में बताया गया है। यह कर्मचारियों को नियोक्ता के फैसले को चुनौती देने में भी मदद करता है यदि कोई कर्मचारी सोचता है कि उसे अन्यायपूर्ण तरीके से हटाया जा रहा है। फिर वह अधिकरण में जाकर फैसले को चुनौती दे सकता है। इस प्रकार, यह नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों के लिए सहायक है, क्योंकि यह औद्योगिक प्रतिष्ठान के भीतर शांति और सद्भाव सुनिश्चित करता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू) 

वे कौन सी चीजें हैं जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत छंटनी मुआवजा नहीं माना जाता है?

कुछ ऐसे भुगतान हैं जो छंटनी मुआवजे के अंतर्गत नहीं आते हैं। कर्मचारी को प्रतिष्ठान में उसके काम के वर्षों और उसे मिलने वाली मजदूरी के आधार पर मुआवजा प्रदान किया जाता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25F, छंटनी मुआवजे की गणना से निम्नलिखित राशियों को बाहर करती है:

  • वह राशि जो कर्मचारी को उपदान के रूप में भुगतान की जाती है जो उपदान भुगतान अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के अनुसार उसकी सेवा की समाप्ति के लिए देय है ।
  • वह राशि जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को उसकी सेवा से बर्खास्त होने पर बेरोजगारी की घटनाओं को कम करने के लिए भुगतान की जाती है।
  • एक राशि जो कर्मचारी को उचित सरकार या प्राधिकारी द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

ये वे रकमें हैं जिन्हें छंटनी मुआवजा नहीं माना जाता है। 

छंटनी मुआवजे के संबंध में इस अधिनियम के तहत क्या छूट की अनुमति है?

आयकर अधिनियम, 1961 के तहत छंटनी मुआवजे को कर योग्य आय माना जाता है। यह आय के पांच प्रमुखों में से एक में शामिल है और ‘वेतन से आय’ शीर्षक के अंतर्गत आता है। हालाँकि, यह अधिनियम कुछ छंटनी मुआवजे से छूट देता है। नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों को दिया गया छंटनी मुआवजा आयकर अधिनियम की धारा 10(10B) के तहत निम्नलिखित सीमा तक कर से मुक्त है:

  • वह राशि जिसकी गणना औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के अनुसार छंटनी मुआवजे के भुगतान के लिए की जाती है।
  • कर्मचारी को पांच लाख रुपये की राशि दी जाती है, क्योंकि वह उसका औसत वेतन है। 
  • छंटनी मुआवजे के रूप में कर्मचारी को भुगतान की गई वास्तविक राशि।
  • इस धारा के तहत, कर-मुक्त राशि कर्मचारी को उसकी सेवा से छंटनी के परिणामस्वरूप भुगतान की जाने वाली मुआवजे की राशि तक सीमित है।

इस धारा के तहत ध्यान देने योग्य एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह छूट केवल छंटनी मुआवजे के मामलों में लागू होती है, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या इस्तीफे के लिए नहीं। आयकर अधिनियम की धारा 10(10B) में कहा गया है कि इस छूट का उपयोग केवल कर्मचारी ही कर सकते हैं, किसी कंपनी के शेयरधारक या किसी फर्म के भागीदार नहीं।

उचित छंटनी प्रक्रिया क्या है?

निष्पक्ष छंटनी सुनिश्चित करने के लिए नियोक्ता द्वारा कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • कर्मचारियों की छंटनी करने से पहले नियोक्ता को उन लोगों से परामर्श करना होगा जो छंटनी से प्रभावित होंगे। उसे कर्मचारियों के पंजीकृत या निर्वाचित (इलेक्टेड) प्रतिनिधियों, उनके कार्यस्थल मंच, या कर्मचारियों द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति से परामर्श करना चाहिए। उन्हें ‘परामर्शदाता कर्मचारी’ के रूप में जाना जाता है।
  • छंटनी का नोटिस नियोक्ता द्वारा परामर्शदाता कर्मचारियों से पूर्व परामर्श के बाद ही जारी किया जाना चाहिए। उसे स्थिति और ऐसी छँटनी के कारणों से अवगत कराया जाना चाहिए।
  • छंटनी के मामले और नोटिस में बताई गई बातों पर नियोक्ता और परामर्श देने वाले कर्मचारियों दोनों की सहमति होना जरूरी है।
  • नोटिस के साथ-साथ कर्मचारियों की प्रस्तावित छंटनी के संबंध में नियोक्ता द्वारा परामर्श देने वाले कर्मचारियों के अभ्यावेदन पर विचार किया जाना चाहिए।
  • परामर्शदाता कर्मचारियों द्वारा दिए गए सुझावों का जवाब देना नियोक्ता की जिम्मेदारी है। उसे बताना होगा कि वह परामर्शदाता कर्मचारियों के सुझावों से सहमत है या असहमत। यदि वह छंटनी से संबंधित किसी मामले पर असहमत है तो उसे असहमत होने का कारण बताना होगा।
  • कर्मचारियों की छंटनी करते समय किन मानदंडों का पालन किया जाएगा, यह तय करना नियोक्ता की जिम्मेदारी है। उसे परामर्शदाता कर्मचारियों से परामर्श करना चाहिए और निष्पक्ष एवं उचित तरीके से कर्मचारियों की छंटनी करनी चाहिए।
  • परामर्शदाता कर्मचारियों से परामर्श करने के बाद, नियोक्ता को छंटनी के संबंध में निर्णय लेना चाहिए, और उन कर्मचारियों को एक नोटिस देना चाहिए जिन्हें उनकी नौकरी से हटा दिया जाएगा।

छंटनी की इस प्रक्रिया का हर नियोक्ता द्वारा पालन करना आवश्यक नहीं है। इसका पालन उन कर्मचारियों को करना होगा जिनके अधीन किसी प्रतिष्ठान  में पचास से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। इसे छंटनी के लिए एक उचित प्रक्रिया माना जाता है।

संदर्भ

 

अंतर्राष्ट्रीय और नगरपालिका कानून: एक अंतिम मार्गदर्शिका

यह लेख इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ निरमा यूनिवर्सिटी से बी.कॉम एलएलबी (ऑनर्स) कर रहे Vishwas Chitwar द्वारा लिखा गया है। यह एक विस्तृत लेख है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

अंतर्राष्ट्रीय कानून में किसी राज्य के नगरपालिका कानून के साथ अपने संबंधों की व्यापक समझ रखने से अधिक आवश्यक कुछ भी नहीं है। 

यह लेख केवल नगरपालिका कानून पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के सैद्धांतिक पहलू के बारे में बात करेगा, हालाँकि, संधियों के नगरपालिका अनुप्रयोग से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय कानून के दो शासी सिद्धांत हैं, और वे हैं: 

संधि के निष्पादन के प्रति गैर दायित्व के औचित्य के रूप में राज्यों को अपने नगरपालिका कानून को लागू करने से रोकता है। 

प्रत्येक व्यक्ति को संविधान या किसी अन्य कानून द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए सुनवाई के लिए सक्षम अधिकरण (ट्रिब्युनल) द्वारा प्रभावी उपचार का अधिकार प्राप्त है। 

इस विषय के सैद्धांतिक (थ्योरेटिकल) पहलू के महत्व को कभी भी कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून और किसी राज्य के नगरपालिका कानून के बीच की सीमाओं पर विचार करने के सवाल पर आमतौर पर उन लोगों के बीच बहस होती है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का अभ्यास करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध के सैद्धांतिक पहलू के अलावा, किसी राज्य की नगरपालिका अदालतों में एक व्यावहारिक समस्या मौजूद है कि, किसी देश की नगरपालिका अदालतें किस हद तक अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियमों और सिद्धांतों को अपने अधिकार क्षेत्र में लागू करती हैं,  दोनों जहां नियम और सिद्धांत नगरपालिका कानून के विरोध में हैं और नगरपालिका कानून के विरोध में नहीं हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध पर सिद्धांत

अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध के दो प्रमुख सिद्धांतों को अद्वैतवाद (मोनिज्म) और द्वैतवाद (ड्यूलिज्म) के रूप में जाना जाता है। अद्वैतवाद की मान्यताओं के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय कानून और राज्य का नगरपालिका कानून दो घटक हैं लेकिन एक ही प्रणाली के पूरक पहलू हैं। द्वैतवाद के अनुसार, वे अपने आप में पूरी तरह से अलग कानूनी प्रणालियाँ हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानून का चरित्र राज्य के कानून से आंतरिक रूप से भिन्न होता है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून में बड़ी संख्या में राज्य की कानूनी प्रणाली शामिल होती है, द्वैतवादी सिद्धांत को कभी-कभी बहुलवादी (प्लुरलिस्ट) सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। 

Lawshikho

अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध जानने के लिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों कानून वास्तव में क्या हैं। राज्यों के आचरण से संबंधित नियमों और विनियमों को अंतर्राष्ट्रीय कानून के रूप में जाना जाता है। सरल बनाने के लिए हम कह सकते हैं, सिद्धांतों का समूह जिसे राज्य अन्य राज्यों या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ व्यवहार करते समय लागू या लागू कर सकते हैं। इसी आधार पर इसे “राष्ट्रों का कानून” भी कहा जाता है। दूसरी ओर, नगरपालिका कानून को भूमि के आंतरिक कानून के रूप में जाना जाता है। 

अद्वैतवादी सिद्धांत

अंतर्राष्ट्रीय कानून केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संचालित होता है और नगरपालिका कानून केवल अपनी स्थानीय न्यायिक सीमाओं पर संचालित होता है। हालाँकि, प्राकृतिक कानून के पैरोकारों का मानना है कि नगरपालिका और अंतर्राष्ट्रीय कानून एक एकल कानूनी प्रणाली बनाते हैं, इस दृष्टिकोण को आमतौर पर अद्वैतवाद के रूप में जाना जाता है। 

इस विषय को बेहतर ढंग से समझने के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्राकृतिक कानून क्या है;  प्राकृतिक कानून एक ऐसी चीज़ है जो सकारात्मक कानून के साथ अलगाव में मौजूद है। जैसा कि नाम से पता चलता है, यह प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है, प्रकृति का नियम वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) और सार्वभौमिक है। स्थापना के समय से, प्राकृतिक कानून को प्रकृति से नैतिक व्यवहार निकालने के लिए मानव स्वभाव का विश्लेषण करने के लिए संदर्भित किया जाता है। 

एक अद्वैतवादी की ओर से तर्क बहुत सरल है, उनका मानना है कि नगरपालिका कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून को एक साथ देखा जाए तो यह एक ही प्रणाली के अलावा और कुछ नहीं है। आधुनिक लेखक, जो अद्वैतवादी दृष्टिकोण के पक्षधर हैं, प्रयास करते हैं कि उनके विचारों का एक बड़ा हिस्सा कानूनी प्रणालियों की नगरपालिका संरचना के कड़ाई से वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित हो। 

एक सच्चे अद्वैतवादी देश में, अंतर्राष्ट्रीय कानून का नगरपालिका कानून में अनुवाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक बार जब राज्य संधि पर सहमति दे देता है, तो यह स्वचालित रूप से उसके नगरपालिका कानून में शामिल हो जाता है। किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि या दायित्व को सहमति देने का यह कार्य राज्यों के नगरपालिका कानून में अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों को तुरंत शामिल कर देगा, (इसमें प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून भी शामिल है)। 

अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है, और नागरिकों द्वारा लागू किया जा सकता है, यह इस तथ्य पर निर्भर करता है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्य के नगरपालिका कानून में अनुवादित है। यदि कोई कानून अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों के विपरीत है तो एक नगरपालिका अदालत किसी कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। 

एक सच्चे अद्वैतवादी राज्य में, यदि कोई राष्ट्रीय कानून अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करता है तो वह अमान्य हो जाता है, चाहे वह संवैधानिक प्रकृति का हो या नहीं। उदाहरण के लिए, एक राज्य विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन को सहमति देता है, हालांकि, इसके कुछ राष्ट्रीय कानून विकलांगता से पीड़ित व्यक्तियों के कन्वेंशन अधिकारों के साथ विरोधाभास में हैं। फिर, उस देश का नागरिक, जो संधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों से वंचित नहीं हो रहा है, राष्ट्रीय अदालतों से संधि को लागू करने के लिए कह सकता है। 

एक अद्वैतवादी राज्य में, अंतर्राष्ट्रीय कानून स्वचालित रूप से स्वीकार हो जाता है और जिस क्षण राज्य संधि की पुष्टि करता है, विरोधाभासी भाग स्वचालित रूप से दूर हो जाता है। 

केल्सन: ग्रंडनॉर्म सिद्धांत

केल्सन के लिए, अंतर्राष्ट्रीय और नगरपालिका कानून “कानून की एक इकाई की अभिव्यक्ति” के अलावा और कुछ नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय कानून की सर्वोच्चता में केल्सन का विश्वास उनके “बुनियादी मानदंड” का परिणाम है, जिसमें कहा गया है कि: ‘राज्यों को वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वे परंपरागत रूप से व्यवहार करते हैं।’ 

अंतर्राष्ट्रीय कानून प्रकृति में सर्वोच्च है क्योंकि यह एक कानूनी आदेश का प्रतिनिधित्व करता है जो नगरपालिका कानूनों से अधिक है, ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्य के अभ्यास से प्राप्त होता है, दूसरी ओर नगरपालिका कानून राज्य के आंतरिक मामलों से अपनी शक्ति प्राप्त करता है। 

एक बार जब यह स्वीकार कर लिया जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून कानूनी चरित्र के नियमों की एक प्रणाली है, तो केल्सन के अनुसार इस बात से इनकार करना असंभव हो जाता है कि दोनों प्रणालियाँ एक ही प्रणाली के रूप में बनती हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय कानून और अद्वैतवाद के सिद्धांत में कोई आधा रास्ता नहीं है। केल्सन ने प्राकृतिक कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून को एक एकल और सुसंगत प्रणाली के रूप में देखा। उनके अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय कानून को पिरामिड के शीर्ष पर रखा गया है (उनकी ग्रंडनॉर्म परिकल्पना के अनुसार)। 

द्वैतवादी सिद्धांत

अद्वैतवादियों के विपरीत, द्वैतवादियों ने अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच अंतर पर जोर दिया है और राज्य के नगरपालिका कानून में अंतर्राष्ट्रीय संधियों को अपनाने का तर्क दिया है। द्वैतवादियों के अनुसार, राज्य द्वारा इसे अपनाने के अभाव में अंतर्राष्ट्रीय कानून एक कानून के रूप में अस्तित्व में नहीं रहेगा। 

द्वैतवादियों का यह दृष्टिकोण इसलिए है क्योंकि उनका मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून कानून के दो अलग-अलग पहलू हैं और दोनों को एक रूप में लेना अनुचित होगा। उनकी मान्यता के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून अपने आप में दो अलग और स्वतंत्र प्रणालियाँ हैं। 

एक द्वैतवादी राज्य में, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून को प्रभावी बनाने के लिए उसके नगरपालिका कानून में इसका मसौदा तैयार किया जायेगा। मसौदा तैयार करने के अलावा यह राज्य का कर्तव्य है कि वह उन कानूनों को छोड़ दे जो नए अपनाए गए अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करते हैं। 

यदि कोई द्वैतवादी राज्य किसी संधि या सम्मेलन की पुष्टि करता है, लेकिन संधि को स्पष्ट रूप से शामिल करने वाला कोई कानून नहीं बनाता है, तो उनका गैर-निगमन का कार्य अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करता है। यदि राज्य ने अपने स्थानीय कानूनों के अनुसार किसी संधि के सिद्धांतों को शामिल नहीं किया है, जिसे उसने पहले अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अनुमोदित किया है, तो, न तो उस देश के नागरिक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सहारा ले सकते हैं और न ही अदालतें उस संधि के सिद्धांतों के आधार पर अपने फैसले दे सकती हैं। 

यूनाइटेड किंगडम एक ऐसा देश है जहाँ द्वैतवादी दृष्टिकोण हावी है। अंतर्राष्ट्रीय कानून यूके में राष्ट्रीय कानून तभी बनता है जब इसका अनुवाद किया जाता है।  

द्वैतवाद पर हर्श लॉटरपैक्ट

न्यायाधीश लॉटरपैच प्राकृतिक कानून के समर्थक थे, उन्होंने स्वीकार किया कि अंतर्राष्ट्रीय कानून प्राकृतिक कानून के नियमों का पालन करता है। लॉटरपैच के लिए, अंतर्राष्ट्रीय कानून नगरपालिका कानून से अधिक श्रेष्ठ है, इस दृष्टिकोण के पीछे तर्क यह है कि यह व्यक्तियों को गारंटी अधिकार प्रदान करता है, भले ही वह किसी भी राज्य से हो। लॉटरपैक्ट के अनुसार कानूनी आदेशों का पदानुक्रम था: 

  1. प्राकृतिक कानून
  2. अंतर्राष्ट्रीय कानून
  3. नगरपालिका कानून

उनके लिए चाहे वह अंतर्राष्ट्रीय कानून हो या नगरपालिका कानून, वह व्यक्ति ही है जो सभी कानूनों की निर्णायक इकाई है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कानून की अवधारणा और उत्पत्ति के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय कानून दर्शन के कुछ बुनियादी सवालों के जवाब दिए है। 

उन्होंने हेनरिक ट्राइपेल के अंतर्राष्ट्रीय कानूनी दायित्व के सिद्धांत की आलोचना की, इस बीच केल्सन से सहमत हुए कि कानून की बाध्यकारी शक्ति राज्यों की व्यक्तिगत या सामान्य इच्छा से प्राप्त नहीं की जा सकती है। 

लॉटरपैक्ट के लिए, अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्यों के लिए है, सरकारों के लिए नहीं।  उनके लिए, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय व्यक्तियों का एक समुदाय था, जिसकी इच्छा राज्यों द्वारा व्यक्त की जाती है। 

द्वैतवाद पर त्रिपेल

ट्रिपेल ने राज्य कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून की दो प्रणालियों को प्रकृति में पूरी तरह से अलग माना था। उनके लिए अंतर्राष्ट्रीय और नगरपालिका कानून दो अलग, अलग सेटों के रूप में मौजूद हैं। 

ट्राइपेल ने अंतर्राष्ट्रीय कानून और राज्य कानून के बीच संबंधों पर निम्नलिखित तर्क दिए: 

  • सबसे पहले उन्होंने तर्क दिया कि, अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून उन विशेष सामाजिक संबंधों में भिन्न हैं जिन्हें वे नियंत्रित करते हैं;  राज्य का कानून व्यक्तियों से संबंधित है और अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है।
  • दूसरे, उनका तर्क है कि उनकी न्यायिक उत्पत्ति अलग-अलग है;  नगरपालिका कानून का स्रोत स्वयं राज्य की इच्छा है, अंतर्राष्ट्रीय कानून का स्रोत राज्यों की सामान्य इच्छा है।
  • इसमें अंतर मौजूद हैं: विषय, स्रोत और सामग्री, साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका अधिकारियों पर बाध्यकारी बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका कानून में ‘परिवर्तन’ की आवश्यकता है। 

ट्राइपेल ने स्वीकार किया कि राज्यों की मूल इच्छा अंतर्राष्ट्रीय कानून की वैधता का आधार थी; उन्होंने यह भी बताया कि यह राज्यों के बीच समझौतों पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसमें न केवल संधियाँ बल्कि रीति-रिवाज भी शामिल हैं और आम इच्छा अंतर्राष्ट्रीय कानून का सबसे महत्वपूर्ण और आविष्कारशील (इन्वेंटिव) स्रोत है।  

“लेक्स पोस्टीरियर” की समस्या

एक द्वैतवादी देश में, अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका कानून में अनुवादित किया जाना चाहिए, और मौजूदा नगरपालिका कानून, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करता है, को “अनुवादित” किया जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप होने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका कानून में अनुवादित किया जाना चाहिए। हालाँकि, अनुवाद की आवश्यकता नगरपालिका कानूनों के संबंध में एक समस्या पैदा करती है जो अनुवाद के बाद विकसित होते हैं। 

एक अद्वैतवादी देश में, अंतर्राष्ट्रीय कानून को स्वीकार किए जाने के बाद एक कानून सामने आता है और यदि यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करता है, तो यह स्वचालित रूप से अमान्य हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय नियम कायम रहेगा। 

एक द्वैतवादी प्रणाली में, जब अंतर्राष्ट्रीय कानून जिसे राष्ट्रीय कानून में अनुवादित किया जाता है, उसे “लेक्स पोस्टीरियर डेरोगेट लीगी प्रायोरी” के सिद्धांत पर किसी अन्य राष्ट्रीय कानून द्वारा ओवरराइड किया जा सकता है, जिसका अर्थ है: बाद वाला कानून पहले वाले की जगह लेता है। 

इसका मतलब यह है कि एक द्वैतवादी राज्य स्वेच्छा से या अनिच्छा से अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर सकता है। एक द्वैतवादी प्रणाली को पहले के अंतर्राष्ट्रीय कानून के साथ संभावित असंगति के लिए सभी बाद के राष्ट्रीय कानूनों की निरंतर जांच की आवश्यकता होती है। 

अद्वैतवाद सिद्धांत और द्वैतवादी सिद्धांत में अंतर

अद्वैतवाद

  1. प्राकृतिक कानून के अधिवक्ताओं के अनुसार, नगरपालिका कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून एक एकल कानूनी प्रणाली बनाते हैं।
  2. प्राकृतिक कानून के अधिवक्ता द्वारा अद्वैतवाद का समर्थन किया जाता है। 
  3. अद्वैतवाद में इसे प्रभाव देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय के नगरपालिका कानून में अनुवाद की कोई आवश्यकता नहीं है। 
  4. एक सच्चे अद्वैतवादी देश में यदि कोई राष्ट्रीय कानून अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करता है तो वह अमान्य हो जाता है। 
  5. यदि कोई अद्वैतवादी राज्य किसी संधि या सम्मेलन की पुष्टि करता है, और संधि को स्पष्ट रूप से शामिल करने वाला कोई कानून नहीं बनाता है तो गैर-निगमन का उनका कार्य अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं करेगा। 
  6. एक अद्वैतवादी राज्य में अंतर्राष्ट्रीय कानून स्वचालित रूप से नगरपालिका कानून में अंतर्निहित हो जाता है और विरोधाभासी भाग स्वचालित रूप से अनुवादित हो जाता है।
  7. अद्वैतवाद के समर्थक: केल्सन।
  8. अद्वैतवादी दृष्टिकोण अपनाने वाला राज्य: जर्मनी। 

द्वैतवाद

  1. नगरपालिका कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून दो अलग और विशिष्ट कानूनी प्रणालियाँ हैं।
  2. इसे सकारात्मक कानून के अधिवक्ता का समर्थन प्राप्त है।
  3. एक द्वैतवादी देश में इसे प्रभावी बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय को नगरपालिका कानून में अनुवाद करने की आवश्यकता है। 
  4. एक सच्चे द्वैतवादी देश में, यदि कोई राष्ट्रीय कानून अंतर्राष्ट्रीय कानून का खंडन करता है तो वह तब तक अमान्य नहीं होता, जब तक कि वह पहले से ही उसके नगरपालिका कानून में अनुवादित न हो।
  5. यदि कोई द्वैतवादी राज्य किसी संधि या सम्मेलन की पुष्टि करता है, लेकिन संधि को स्पष्ट रूप से शामिल करने वाला कोई कानून नहीं बनाता है, तो उनका गैर-निगमन का कार्य अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करता है।
  6. अंतर्राष्ट्रीय कानून स्वचालित रूप से नगरपालिका कानून में अंतर्निहित नहीं होता है।
  7. नगरपालिका कानून के विरोधाभासी हिस्सों को राज्य द्वारा संशोधित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह द्वैतवादी देश में स्वचालित रूप से अनुवादित नहीं होता है।
  8. अंतर्राष्ट्रीय कानून का नगरपालिका कानून में अनुवाद के अभाव में अंतर्राष्ट्रीय कानून एक कानून के रूप में अस्तित्व में नहीं रहेगा।
  9. समर्थक: हर्श लॉटरपैच, ट्राइपेल।
  10. निम्नलिखित देश: यूनाइटेड किंगडम।

संधियों को लागू करने के तरीके

कुछ सैद्धांतिक तरीके हैं जिनके द्वारा राज्य संधियों को लागू करते हैं और उनमें से कुछ;  अंगीकरण (एडॉप्शन), निगमन और परिवर्तन है।

अंगीकरण

अद्वैतवादी सिद्धांत के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय कानून को नगरपालिका कानून के रूप में अपनाया जाता है, तो संधि स्वचालित रूप से नगरपालिका कानून में लागू होती है। हालाँकि, कुछ राज्यों को संधियों को लागू करने के लिए विधायिका से “अनुवाद” की आवश्यकता होती है और वे हैं;  फ़्रांस, स्पेन, बेल्जियम, नीदरलैंड, अमेरिका। जर्मनी और इटली जैसे अन्य देशों को अनुसमर्थन (पूर्व विधायी सहमति) से पहले निष्पादन के आदेश की आवश्यकता होती है। इसे आमतौर पर अर्ध-स्वचालित निगमन कहा जाता है, जो सरकार को संधि के दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध होने और संधि को नगरपालिका कानूनी क्षेत्र में शामिल करने के लिए अधिकृत करता है। 

निगमन और परिवर्तन 

यह सिद्धांत आमतौर पर द्वैतवादी राज्यों द्वारा प्रचलित है।  निगमन के सिद्धांत में कानून बनाना और लागू करना शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय संधियों को नगरपालिका कानून (हालांकि संविधान से अधिक नहीं) की तुलना में उच्च दर्जा प्राप्त है। 

एक निगमित संधि और एक अपनाई गई संधि के बीच मुख्य अंतर, नगरपालिका कानून में इसका स्वरूप है। इस प्रकार अंगीकरण नगरपालिका अदालतों के रवैये पर बहुत अधिक निर्भर है। तर्क की एक ही पंक्ति पर, निगमन और परिवर्तन जो कानून के अधिनियमन की ओर ले जाता है, जरूरी नहीं कि बिना किसी बाधा के हो, क्योंकि यह अदालत के विवेक पर है कि संधि के सिद्धांतों को लागू करना है या नहीं। 

अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध पर न्यायिक निर्णय 

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम केसोराम इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अन्य

इस मामले में, उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने माना कि भारत में द्वैतवाद का सिद्धांत लागू है, न कि अद्वैतवाद का सिद्धांत, हालांकि यदि नगरपालिका कानून, क़ानून की सीमा को सीमित नहीं कर रहा है, तो, भले ही भारत एक हस्ताक्षरकर्ता नहीं है संधि के लिए, उच्चतम न्यायालय क़ानून की व्याख्या कर सकता है। 

सिविल राइट विजिलेंस कमिटी  एस.एल.आर.सी. कॉलेज ऑफ लॉ बैंगलोर बनाम भारत संघ और अन्य

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस मामले का फैसला करते हुए, अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून के बीच संबंध को परिभाषित करते हुए कहा कि, वैश्विक और नगरपालिका परिदृश्य पर अंतर्राष्ट्रीय कानून की बढ़ती प्रासंगिकता के रूप में, दोनों के संबंध को लेकर कई अनोखे और नवीन सवाल उठने लगे हैं। 

निष्कर्ष

अद्वैतवाद और द्वैतवाद की कल्पना आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय कानून और नगरपालिका कानून संबंध के दो विरोधी सिद्धांतों के रूप में की जाती है। कई आधुनिक विद्वानों द्वारा अद्वैतवाद और द्वैतवाद को सीमित व्याख्यात्मक शक्ति वाले सिद्धांतों के रूप में माना जाता है क्योंकि वे यह समझने में विफल रहते हैं कि राज्यों के भीतर अंतर्राष्ट्रीय कानून कैसे काम करता है। 

किसी भी चीज़ के होने के बावजूद, अद्वैतवाद और द्वैतवाद विश्लेषणात्मक उपकरण के रूप में शक्ति रखते हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय और नगरपालिका कानून के बीच संबंधों की जांच के लिए पूर्वानुमानित शुरुआती चरणों के रूप में कार्य करते हैं। नगर निगम अदालतों में देर से आए विभिन्न विकल्पों में कुछ शोधकर्ताओं ने अंतर्राष्ट्रीय कानून पर नगर निगम की कानूनी सोच को समझने के लिए संभावित दृष्टिकोण के रूप में अद्वैतवाद और द्वैतवाद को पाया है। 

 

भारत में ग्रंडनॉर्म की प्रयोज्यता

यह लेख अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विधि संकाय की छात्रा Zainab Arif Khan द्वारा लिखा गया है। इस लेख में भारत में ग्रंडनॉर्म के प्रयोज्यता (एप्लिकेशन) पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

परिचय

हंस केल्सन (1881 – 1973) एक ऑस्ट्रियाई कानूनी और राजनीतिक दोनों, न्यायविद् और दार्शनिक थे। उन्हें 20वीं सदी के प्रमुख और बहुत महत्वपूर्ण न्यायविदों  में से एक माना जाता है; न्यायशास्त्रीय और सार्वजनिक कानून के विद्वानों पर अत्यधिक प्रभावशाली प्रभाव के साथ। उन्हें 20वीं सदी में अपने ‘कानून के शुद्ध सिद्धांत’ के साथ मूल विश्लेषणात्मक सिद्धांत को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया गया था। वह 1920 के ऑस्ट्रियाई संविधान के लेखक थे, जो काफी हद तक आज तक मान्य है। केल्सन वियना विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर भी थे। उनकी पुस्तक रेइन रेचत्सलेह्रे (कानून का शुद्ध सिद्धांत) दो संस्करणों (वर्जन) में प्रकाशित हुई थी; पहला 1934 में यूरोप में, और दूसरा, जो विस्तारित संस्करण था, 1960 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एक संकाय के रूप में शामिल होने के बाद प्रकाशित हुआ था। उनके विचार के स्कूल को वियना स्कूल या न्यायशास्त्र के कार्यात्मक स्कूल के रूप में भी जाना जाता है।

कानून का शुद्ध सिद्धांत

केल्सन द्वारा कानून के अध्ययन के दायरे को उसके शुद्धतम रूप तक सीमित करने पर सख्ती से जोर दिया गया था। वह राजनीति, समाजशास्त्र, तत्वमीमांसा (मेटाफिजिक्स) और अन्य अतिरिक्त-कानूनी अंतःविषय विषयों जैसे सामाजिक विज्ञानों के साथ सह-संबंध बनाकर न्यायशास्त्र के दायरे को व्यापक बनाने के खिलाफ थे। इतिहास, राजनीति, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र आदि सामाजिक विषयों का विचारक द्वारा अवमूल्यन (डिइवैल्यूड) नहीं किया गया, और इसे केवल कानून के रूप में पृथक किया गया। इसका उद्देश्य अराजकता को कम करना था। यह सिद्धांत इस बात से संबंधित था कि कानून ‘क्या है’ और यह नहीं कि इसे ‘क्या होना चाहिए’। यह सिद्धांत मानदंडों के सिद्धांत से संबंधित है, न कि कानूनी मानदंडों की प्रभावशीलता से। केल्सन कानून को सभी नैतिक, सामाजिक, आदर्श या नैतिक तत्वों से अलग करना चाहते थे और कानून का ‘शुद्ध’ विज्ञान बनाना चाहते थे जो सभी नैतिक और समाजशास्त्रीय विचारों को अलग कर दे।

केल्सन का कानून का शुद्ध सिद्धांत सकारात्मक कानून में से एक है जो सभी अतिरिक्त-कानूनी और गैर-कानूनी तत्वों को हटाकर मानक आदेश पर आधारित है। इसे ‘व्याख्या के सिद्धांत’ के रूप में भी जाना जाता है, यह उस दुष्ट विचारधारा के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के रूप में उभरा जो एक अधिनायकवादी (टोटालिटेरियन) राज्य के न्यायशास्त्र और कानूनी सिद्धांत को नष्ट कर रहा था।

केल्सन का मानना ​​है कि राज्य और कानून अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही चीज हैं और सार्वजनिक तथा निजी कानून में कोई अंतर नहीं है। केल्सन का कानून का शुद्ध सिद्धांत मूल मानदंड पर आधारित है जिसे उन्होंने ‘ग्रंडनॉर्म’ कहा है।

द ग्रंडनॉर्म

केल्सन के कानून के शुद्ध सिद्धांत में ग्रंडनॉर्म के मूल मानदंड के आधार पर पदानुक्रम की पिरामिडीय संरचना है। ‘ग्रंडनॉर्म’ शब्द एक जर्मन शब्द है जिसका अर्थ मौलिक मानदंड है। उन्होंने इसे ‘निर्धारित अंतिम नियम’ के रूप में परिभाषित किया है जिसके अनुसार इस आदेश के मानदंड स्थापित और रद्द किए जाते हैं, अपनी वैधता प्राप्त करते हैं या खो देते हैं। यह ग्रंडनॉर्म है जो सामग्री को निर्धारित करता है और इससे प्राप्त अन्य मानदंडों को मान्य करता है। लेकिन यह अपनी वैधता कहां से प्राप्त करता है, यह एक ऐसा प्रश्न था जिसका केल्सन ने उत्तर नहीं दिया, और कहा कि यह एक आध्यात्मिक प्रश्न है। ग्रंडनॉर्म न्यायविद द्वारा प्रस्तावित एक परिकल्पना के बजाय एक कल्पना है।

ग्रंडनॉर्म एक कानूनी प्रणाली में और इस आधार से शुरुआती बिंदु है; एक कानूनी प्रणाली जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, क्रमिक रूप से विस्तृत होती जाती है और अधिक विस्तृत तथा विशिष्ट होती जाती है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है। पिरामिड के शीर्ष पर ग्रंडनॉर्म है, जो स्वतंत्र है। अधीनस्थ मानदंडों को पदानुक्रमित क्रम में उनसे बेहतर मानदंडों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। मानदंडों की प्रणाली नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है और अंत में ग्रंडनॉर्म पर बंद हो जाती है।

कानून की गतिशीलता का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि कानून अपनी रचना को स्वयं नियंत्रित करता है और केल्सन के सिद्धांत में यह शामिल है। इस प्रकार, केल्सन के अनुसार प्रत्येक कानूनी आदेश में हमेशा किसी न किसी प्रकार का ग्रंडनॉर्म होगा।

भारत में ग्रंडनॉर्म के सिद्धांत की प्रयोज्यता

ग्रंडनॉर्म, जैसा कि केल्सन द्वारा परिभाषित किया गया है, का उपयोग बुनियादी मानदंड, आदेश या नियम को दर्शाने के लिए किया जाता है जो किसी भी और हर कानूनी प्रणाली के लिए आधार बनता है। इसे उस कानूनी व्यवस्था के सकारात्मक कानून की वैधता का स्रोत माना जा सकता है।

भारतीय संविधान हमारे देश में कानून का सर्वोपरि (पैरामाउंट) स्रोत है। ग्रंडनॉर्म, कानूनी प्रणाली का आधार संविधान को मान्य करने का कारण है और यह दर्शाता है कि संविधान कानूनी प्रणाली द्वारा स्वीकार किया जाता है। यह आगे देखा जाएगा कि संविधान को किस प्रकार ग्रंडनॉर्म कहा जा सकता है।

एक मान्यता और नियम है कि संविधान का पालन करना चाहिए। संविधान कानून का सर्वोपरि स्रोत है। बनाए गए सभी कानून संविधान में निहित सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। ग्रंडनॉर्म केवल संविधान और उससे प्राप्त मानदंडों को मान्य करता है। हालाँकि, यह यह तय नहीं करता कि संविधान में क्या होना चाहिए और क्या नहीं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि राजनीतिक क्रांति के कारण ही ग्रंडनॉर्म में बदलाव आ सकता है।

भारतीय कानून के स्रोत प्राचीन काल से पहले के हो सकते हैं। यह कोई अज्ञात तथ्य नहीं है कि भारत का इतिहास बहुत समृद्ध संस्कृति और विरासत को समेटे हुए है। भारत की परंपरा अपराजेय है। प्राचीन काल में, यह धर्म का दिव्य सिद्धांत था जो समुदाय और समाज के सभी व्यक्तियों की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता था। धर्म की अवधारणा को आचार संहिता के रूप में समझा और स्वीकार किया जा सकता है जिसका पालन सभी को करना होता है। राजा धर्म का संरक्षक था। उसे धर्म का पालन करना था और यह सुनिश्चित करना था कि उसमें निहित नियमों का पालन किया जाए। ऐसे धर्मग्रंथ थे जो राजा के लिए आदेशित थे। उसका कर्तव्य केवल धर्म के नियमों के अनुसार शासन करना और न्याय करना था। धर्म के नियमों का पालन न करने की स्थिति में, राजा का कर्तव्य था कि वह प्रतिबंध लगाए। इस प्रकार, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा भी, दूसरों के साथ, धर्म के अधीन था। समाज के अस्तित्व के लिए इस व्यवस्था को सभी ने स्वीकार किया और इसका पालन किया। यहाँ, ग्रंडनॉर्म के सिद्धांत को अपना स्थान मिल सकता है, यह मानते हुए कि प्राचीन भारत में धर्म भूमि का सर्वोच्च कानून था।

भारतीय इतिहास के मध्यकालीन और आधुनिक काल में भारत की राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था में बदलाव देखा गया। भारत में ब्रिटिश शासन के आगमन से कानूनी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन आये। वे भारतीय धरती पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की स्थापना करना चाहते थे। ब्रिटिश अधिकारियों और सत्ता में बैठे लोगों ने धर्म की अवधारणा पर आधारित कानून के प्राचीन भारतीय सिद्धांतों को खारिज कर दिया। ब्रिटिश न्यायशास्त्र की धारणाओं ने धीरे-धीरे मार्ग प्रशस्त किया और समानता, न्याय और अच्छे विवेक के सिद्धांतों के माध्यम से भारतीय कानूनी प्रणाली में शामिल हो गए, और विभिन्न कानूनों का संहिताकरण किया।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जीने का प्रमुख संघर्ष अभी शुरू ही हुआ था। देश को न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के विचारों के आधार पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में गठित किया जाना था। तभी देश का एक बुनियादी और सर्वोच्च कानून बनाने की जरूरत महसूस हुई। तभी संविधान बनाया गया और अपनाया गया था। यह 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया।

संविधान की प्रस्तावना (प्रिएंबल) में शुरुआती शब्द हैं, ‘हम, भारत के लोग…’, स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करता है कि यह हम भारत के लोग हैं, जिन्होंने इस संविधान को ‘अपनाने, अधिनियमित करने और खुद को देने’ का संकल्प लिया है; इसलिए, संविधान का बहुत महत्व है। लोग बिना किसी अपवाद के इससे बंधे होने की घोषणा करते हैं। इस प्रकार, यहां यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, कि भारतीय इतिहास के स्वतंत्रता-पश्चात काल में भी ग्रुंडनॉर्म ने अपना स्थान पाया है, क्योंकि सिद्धांत द्वारा मांग की गई पूर्व-धारणा के परीक्षण को विधिवत संतुष्ट किया गया है।

भारत में संविधान को देश का बुनियादी कानून माना जाता है। ऐसा इसे मिलने वाली सामाजिक स्वीकृति और मान्यता के कारण कहा जा सकता है। अन्य कानून वैधता मानते हैं क्योंकि वे संविधान के अनुरूप हैं। संविधान के तहत स्थापित संस्थाएं, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं, वास्तव में संविधान के अधीन हैं और उन्हें संविधान के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करना होता है। संसद और राज्य विधानमंडल की विधायी शक्तियाँ कुछ सीमाओं के अधीन हैं। कानून बनाने की शक्ति अनुच्छेद 245 और 246 से प्राप्त होती है, और इसका प्रयोग संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत उल्लिखित सीमाओं के भीतर किया जाना चाहिए। इस प्रकार, लागू किए गए सभी कानूनों के लिए कानूनी प्रणाली स्थापित की जाती है जो उनकी वैधता का पता एक ही स्रोत से लगाती है, जो कि कानून का सर्वोपरि स्रोत, संविधान है। यहां ग्रंडनॉर्म का सिद्धांत फिर से लागू होता है, क्योंकि सरकार के अंग, अर्थात् विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका, मूल कानून, संविधान के उप-मानदंड हैं।

संविधान में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन इसमें संशोधन की प्रक्रिया लंबी और तकनीकी है। यदि यह बहुत आसान होता, तो क्रांति का लगातार गंभीर ख़तरा बना रहता और यह संविधान के अधिकार के लिए अपमानजनक होगा। यदि संशोधन के प्रावधान नहीं होते तो यह फिर से लोकतांत्रिक नहीं होता। इसलिए, दोनों ध्रुवों के बीच उचित संतुलन है। और केशव नंद भारती के मामले में ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि अनुच्छेद 368 के तहत किए गए संशोधन भी संविधान की ‘बुनियादी संरचना’ को नहीं बदल सकते हैं। संविधान की पहचान बदलने की हद तक उसके ढांचे और बुनियादी ढांचे में बदलाव के लिए संशोधन नहीं किए जा सकते। यह तथ्य स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि ग्रंडनॉर्म के सिद्धांत को लागू किया जा सकता है।

संविधान में स्वयं ऐसे प्रावधान हैं जो स्पष्ट रूप से प्रदान करते हैं कि कोई भी कानून जो इसके प्रावधानों का उल्लंघन करता है वह गैरकानूनी है और रद्द किए जाने योग्य है। जैसा कि अनुच्छेद 13 में निहित है, जो यह प्रावधान करता है कि सभी कानून जो या तो संविधान के प्रारंभ होने से पहले बनाए गए थे, या इसके बाद किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा बनाए गए हैं, जो संविधान में निहित मौलिक अधिकारों के साथ असंगत हैं। यह फिर से ग्रंडनॉर्म के सिद्धांत का खुलासा करता है जो कहता है कि एक बुनियादी नियम होना चाहिए। संविधान कानून का मूल और अंतिम स्रोत है।

संविधान में कानून के शासन का सिद्धांत स्पष्ट रूप से निहित है। जैसा कि अनुच्छेद 14 द्वारा सुनिश्चित किया गया है, सभी नागरिक समान हैं और किसी के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। सरकार के तीनों अंगों के बीच शक्ति का पृथक्करण है और न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के किसी भी प्रभाव से मुक्त है। संविधान में निर्धारित बुनियादी अंतर्निहित सिद्धांत और कानूनों की अंतिमता भारतीय संविधान में ग्रंडनॉर्म की अवधारणा के प्रयोज्यता के एक और पहलू का खुलासा करती है।

अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए एक और प्रावधान देता है। इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी मामले में उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।

ग्रंडनॉर्म के सिद्धांत को भारतीय अदालतों में कई मामलों में मान्यता दी गई है और इसका उल्लेख भी किया गया है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।

स्क्वाड्रन लीडर एच.एस. कुलश्रेष्ठ बनाम भारत संघ के मामले में, अदालत ने कहा कि ‘प्रख्यात न्यायविद् केल्सन के सिद्धांत के अनुसार, हर देश में कानूनों का एक पदानुक्रम होता है, और सर्वोच्च कानून को कानून के आधार के रूप में जाना जाता है, जो हमारे देश में सर्वोपरि संविधान है।’

अब्दुर सुकुर और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य के एक अन्य मामले में, ‘…भारत के संविधान में निहित है, जो सभी भारतीय क़ानूनों का आधार है।’

ओम प्रकाश गुप्ता बनाम हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य के एक अन्य मामले में, यह फिर से माना गया कि ‘चूंकि सीमाएं संविधान द्वारा परिभाषित की गई हैं, वे न्यायशास्त्रीय शब्दावली में, ‘ग्रंडनॉर्म’ हैं।’

सुनील बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य के एक अन्य मामले में, यह फिर से उल्लेख किया गया था कि, ‘भारत का संविधान देश का सर्वोपरि कानून है। अन्य सभी कानून अपनी उत्पत्ति से उत्पन्न होते हैं और संविधान में निर्धारित सिद्धांतों के पूरक (सप्लीमेंट्री) और प्रासंगिक हैं।’

आंध्र प्रदेश सरकार और अन्य बनाम श्रीमती पी. लक्ष्मी देवी के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘केल्सन के अनुसार, हर देश में कानूनी मानदंडों का एक पदानुक्रम होता है, जिसे वह ‘ग्रंडनॉर्म’ कहते हैं। यदि इस पदानुक्रम की उच्च परत में एक कानूनी मानदंड निचली परत में एक कानूनी मानदंड के साथ विवाद करता है तो पूर्व मान्य होगा। भारत में ग्रंडनॉर्म भारतीय संविधान है।’

निष्कर्ष

न्यायशास्त्र और कानूनी सिद्धांत अध्ययन के निरंतर बदलते क्षेत्र हैं। वे गतिशील हैं और वे नई और बदलती जरूरतों के अनुरूप ढलने के लिए समाज में होने वाले परिवर्तनों के साथ लगातार बदलते रहते हैं। प्रत्यक्षवादियों के सिद्धांत का उद्भव वास्तव में ऐसे परिवर्तनों का परिणाम है। समकालीन विज्ञान के क्षेत्र में बढ़ते विकास के साथ, केल्सन जैसे कानूनी विचारकों को कानून को उसके शुद्धतम रूप में सीखने और अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया गया, जो कि आध्यात्मिक और अतिरिक्त-कानूनी बहु-विषयक विषयों से रहित है और कानून और कानूनी तंत्र पर उनका प्रभाव है। केल्सन ने इस पद्धति का प्रयोग किया और इसे ‘कानून का शुद्ध सिद्धांत’ कहा। उन्होंने कानून का अध्ययन करने के लिए इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था और नैतिकता के सामाजिक विषयों के प्रभावों को शामिल करने से इनकार कर दिया। हालाँकि उन्होंने उनके अस्तित्व और महत्व से इनकार नहीं किया, वह केवल कानून के अध्ययन पर उनके प्रभाव को शामिल नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कानून को बहुत सरल रखा।

केल्सन ने कानून के अपने शुद्ध सिद्धांत को ग्रंडनॉर्म की अवधारणा के आधार पर आधारित किया, जिसे उन्होंने फिर से पेश किया। ग्रंडनॉर्म सभी कानूनों और नियमों का आधार है। यह सभी कानूनों का स्रोत है, लेकिन इस तरह के ग्रंडनॉर्म के स्रोत के बारे में सवाल करना एक आध्यात्मिक प्रश्न था, जिसका निपटारा नहीं किया जाना था।

ग्रंडनॉर्म की अवधारणा का प्रयोज्यता भारतीय संदर्भ में काफी हद तक उपलब्ध है। प्राचीन काल से शुरू होकर, जब धर्म देश का सर्वोच्च कानून था, आधुनिक संविधान तक जा रहा है, जो फिर से कानून का सर्वोपरि स्रोत है। स्वतंत्रता के बाद के युग में संविधान का सुंदर उदय हुआ जो भारतीय कानूनों और मानदंडों का आधार है। ग्रंडनॉर्म की अवधारणा को भारतीय कानूनी प्रणाली में बहुत अच्छी तरह से मान्यता और स्वीकार किया गया है, जिसके लिए, भारतीय न्यायिक अदालतों द्वारा सुनाए गए विचारों और निर्णयों से उचित साक्ष्य मांगा जाता है।

इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श सिद्धांतों पर आधारित है, जैसा कि संविधान की प्रस्तावना में निर्धारित किया गया है। यह लोगों को अपने ही द्वारा दिया गया है। संविधान को कानून का सर्वोपरि स्रोत माना जाता है, और अन्य सभी कानून अपनी वैधता और प्रयोज्यता इसी से प्राप्त करते हैं, जो इसे सर्वोपरि होने का संकेत देता है।

संदर्भ

  • Dr. N. V. Paranjape, Studies in Jurisprudence and Legal Theory (Central Law Agency, Allahabad, 9th edn., 2019). 
  • Prantik Roy, “Application of Kelson’s Theory in India” IRJCL Vol. 7 Issue 1 (2019)
  • Constitution of India
  • Cases from https://www.casemine.com/.

ट्रेडमार्क की भ्रामक समानता

यह लेख Tannu Gogia द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून में डिप्लोमा कर रही है। इसे Shashwat Kaushik के द्वारा संपादित किया गया है, और इसका अनुवाद Pradyumn Singh के द्वारा किया गया है। यह लेख व्यापार चिह्नों में पाई जाने वाली भ्रामक समानता से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेगा जिससे पाठक को ट्रेडमार्क के संबंध में होने वाले किसी भी भ्रम से बचने के लिए एक उचित विवेकपूर्ण ज्ञान मिलेगा। 

परिचय 

ट्रेडमार्क बाजार में कंपनी की पहचान और उसकी व्यक्तित्व है”

– डॉ. कल्याण सी. कंकनाला

ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999, विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया था। मुझे भ्रामक समानता के लिए दो उद्देश्य बहुत प्रासंगिक (रिलेवेंट) लगते हैं। एक, ट्रेडमार्क को प्रभावी सुरक्षा प्रदान करना, और दूसरा, चिह्नों के धोखाधड़ीपूर्ण (फ्रॉडुलेंट) उपयोग को रोकना। चिह्नों के कपटपूर्ण उपयोग का सबसे अच्छा उदाहरण आर्थिक लाभ के लिए अपने ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क बनाना है। हाल के मामले हमदर्द नेशनल फाउंडेशन (इंडिया) बनाम सदर लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड (2022) में, या इस मामले को हर घर से जोड़ने के लिए हम इसे कह सकते हैं ‘रूह अफ़ज़ा बनाम दिल अफ़ज़ा’, इस मामले में, यह आरोप लगाया गया था कि वादी (प्लैनटिफ) के मार्क ‘शरबत रूह अफ़ज़ा’ का प्रतिवादी (डिफेंडेंट) के भ्रामक समान मार्क ‘शरबत दिल अफ़ज़ा’ द्वारा उल्लंघन किया गया था। जनवरी 2022 में, दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने अंतरिम निषेधाज्ञा (इंजक्शन) अनुमति देने से इनकार कर दिया था। लेकिन जनवरी 2023 में, खंडपीठ ने एकल-न्यायाधीश के फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि ‘रूह अफ़ज़ा’ चिह्न 1907 से अपीलकर्ता के उत्पादों की पहचानकर्ता के रूप में कार्य कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप यह चिह्न उच्च स्थान रखता है। महत्व की डिग्री और वादी/अपीलकर्ता को यह कहते हुए निषेधाज्ञा दी कि यदि प्रतिवादी को ‘शरबत दिल अफ़ज़ा’ चिह्न का उपयोग जारी रखने की अनुमति दी गई तो उसे अनुचित लाभ मिलेगा।

यह लेख व्यापार चिह्नों में पाई जाने वाली भ्रामक समानता से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेगा:

  1. अर्थ और दायरा। 
  2. ट्रेडमार्क अधिनियम और अन्य कानून या संधियों (ट्रीटीज) में प्रावधान। 
  3. भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क बनाने के परिणाम क्या होंगे। 
  4. क्या ऐसी कोई परिस्थिति है जहां कोई ट्रेडमार्क, जो भ्रामक रूप से समान चिह्न है, पंजीकृत किया जा सकता है। 
  5. उपाय
  6. किसी ट्रेडमार्क को भ्रामक रूप से समान होने से कैसे बचाया जाए और कुछ हालिया और महत्वपूर्ण मामले।

अर्थ और दायरा

ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 की धारा 2(zb) में ट्रेडमार्क शब्द को एक ऐसे चिह्न के रूप में परिभाषित किया गया है जो एक व्यक्ति द्वारा प्रदान की गई वस्तुओं और सेवाओं को दूसरे व्यक्ति से अलग करने में सक्षम है। दूसरे शब्दों में, एक ट्रेडमार्क एक पहचानकर्ता के रूप में काम करता है, जिसका अर्थ है, उदाहरण के लिए, जब आप किसी उत्पाद को देखते हैं, तो आप उसके मूल या ऐसे उत्पादों का निर्माण करने वाले व्यक्ति/कंपनी का पता लगाने में सक्षम होंगे, ताकि कोई भी पहचान सके ऐसे उत्पाद या सेवा के लिए जिम्मेदार व्यक्तिो को, सामान्य तौर पर, ट्रेडमार्क रखने का उद्देश्य उत्पाद या सेवा को आसानी से पहचानना या अन्य निर्माताओं या सेवा प्रदाताओं (प्रोवाइडर) के समूह से अलग दिखना है।

लेकिन किसी ट्रेडमार्क का प्रबंधन करना और उसकी सुरक्षा करना बहुत कठिन साबित होता है, जितना अधिक कोई उत्पाद या सेवा या उससे संबंधित ट्रेडमार्क प्रमुख और प्रसिद्ध होता है, उसकी नकल किए जाने की संभावना या जोखिम उतना ही अधिक होता है, इसलिए ट्रेडमार्क का अन्य व्यक्तियों द्वारा दुरुपयोग होने का खतरा होता है। ऐसा ही एक दुरुपयोग भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क बनाना है और इस प्रकार आर्थिक लाभ के लिए प्रसिद्ध ट्रेडमार्क के नाम और सद्भावना का शोषण (एक्सप्लॉइटिंग) करना है।

ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 की धारा 2(h) भ्रामक रूप से समान को परिभाषित करती है और सरल शब्दों में, इसका मतलब है कि एक चिह्न को दूसरे के समान कहे जाने के लिए समान होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि यह लगभग दूसरे चिन्ह जैसा दिखता है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि यह आम जनता को धोखा देगा या उनके मन में भ्रम पैदा करेगा।

ट्रेडमार्क में धोखे की प्रकृति

  • सामान के संबंध में धोखा: जब किसी ऐसे सामान पर भ्रामक रूप से समान चिह्न लगाया जाता है जो पंजीकृत ट्रेडमार्क स्वामी का नहीं है, तो कोई व्यक्ति यह सोचकर ऐसा सामान खरीद सकता है कि यह उस ब्रांड का है जो सामान खरीदते समय उसके मन में था।
  • व्यापार उत्पत्ति के बारे में धोखा: इसके तहत, कोई व्यक्ति निशान को पहचानने के बाद सामान खरीद सकता है, यह सोचकर कि उनका स्रोत समान निशान वाले कुछ अन्य सामानों के समान है, जिससे वह परिचित है। 
  • व्यापार संबंध को लेकर धोखा: इसके तहत, निशान वाले सामान समान नहीं हो सकते हैं, लेकिन वे अलग-अलग सामान वाले निशान के साथ समान समानता साझा करते हैं। यहां, सामान खरीदने वाला व्यक्ति यह नहीं सोच सकता है कि सामान उसी ब्रांड का है जो उसके मन में था, लेकिन निशानों के बीच समानता के कारण, वह यह मान सकता है कि दोनों निशान किसी तरह से जुड़े हुए हैं या उनमें किसी तरह का कोई समान निशान है जिनका एक दूसरे के साथ जुड़ाव है। 

निशानों में अलग-अलग तरह की समानताएं पाई गईं

  • दृश्य समानता: पहली समानता जिसे चिह्नों के बीच तुलना के लिए माना जाता है, वह दृश्य समानता है और इसके अंतर्गत चिह्न के किसी भी सामान्य शब्दांश, प्रत्यय (प्रीफिक्स), उपसर्ग (सफिक्स), आकार, लंबाई आदि जैसे सभी दृश्य पहलुओं की तुलना दूसरे चिह्न से की जाती है। 
  • ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) समानता: यह निर्धारित करने के लिए कि क्या दो ट्रेडमार्क के बीच किसी प्रकार की समानता है, ध्वनि में ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) समानता विचार करने के लिए प्रासंगिक कारकों में से एक है, क्योंकि ध्वन्यात्मक समान ट्रेडमार्क जनता के मन में भ्रम पैदा कर सकते हैं। ध्वन्यात्मक समानता को समझने के लिए, आइए कुछ उदाहरणों पर विचार करें: ज़ेग्ना (ज़ेन-याह के रूप में उच्चारित एक इतालवी ब्रांड है) और ज़ेन्या; फेविक्विक और क्विकहील; एकसीड और एक्ससीड। 
  • वैचारिक समानता: इसमें समानता का आकलन उस संदेश के आधार पर किया जाता है जो कोई चिह्न व्यक्त करना चाह रहा है, और इस प्रकार की समानता ध्वन्यात्मक और दृश्य समानता दोनों के अंतर्गत आती है, क्योंकि यह आंखों के साथ-साथ कानों के शीर्ष को भी संदर्भित करती है, उदाहरण के लिए, ग्लुविटा और ग्लूकोविटा या लक्मे और लाइकमे।

ट्रेडमार्क कानून के ऐतिहासिक पहलू

ट्रेडमार्क अधिनियम 1940 भारत में पहला ट्रेडमार्क कानून था। इस कानून से पहले, भारत में ट्रेडमार्क से संबंधित कोई कानून नहीं था और पंजीकृत और अपंजीकृत ट्रेडमार्क के उल्लंघन के कार्यों से संबंधित कानूनी शून्यता को भरने के लिए की गई। विशिष्ट राहत अधिनियम,1877 के धारा 54 और पंजीकरण हेतु संबंधित पहलुओं का समाधान के लिए पंजीकरण अधिनियम 1908 से सहायता ली गई । इसलिए, ऐसे महत्वपूर्ण मामलों के लिए अन्य कानूनों से सहायता प्राप्त करने के कड़े संघर्ष के बाद, ट्रेडमार्क अधिनियम 1940 लागू किया गया। 1940 का अधिनियम पारित होने के बाद, जैसे-जैसे व्यापार और वाणिज्य बढ़ा, ट्रेडमार्क संरक्षण की मांग भी बढ़ती गई। व्यापार और पण्य (मर्चेन्डाइस) अधिनियम 1958 भारत की आजादी के बाद पारित किया गया, जिसने ट्रेडमार्क अधिनियम 1940 का स्थान ले लिया है। 

विश्व अर्थव्यवस्था के साथ व्यापार, वाणिज्य और संपर्क के विस्तार से वैश्वीकरण (ग्लोबलिज़ैशन) का आगमन हुआ और वैश्वीकरण के साथ बौद्धिक संपदा को विश्व-स्तरीय मान्यता प्राप्त हुई, जिसने समान मानक कानूनों, नीतियों और नियमों की आवश्यकता को जन्म दिया, जिससे ट्रेडमार्क का संरक्षण और प्रवर्तन विश्व स्तर पर स्वीकार किए जाते हैं। यह सब ट्रिप्स समझौते के लिए रास्ता तय करता है। वर्ष 1958 का यह कानून समाप्त हो गया और 1999 का ट्रेडमार्क अधिनियम लागू किया गया, जो ट्रिप्स समझौते के दायित्वों के अनुरूप था।

इसके अलावा, 1940 और 1958 के ट्रेडमार्क अधिनियम में भ्रामक समानता की अवधारणा से गुजरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे ट्रिप्स में निर्धारित आवश्यकताओं का पालन करते हैं, इसलिए, 1999 का अधिनियम भ्रामक समानता के उसी परिभाषा पर अड़ा रहा।

ट्रेडमार्क नियम 2017 भी प्रभाव में आया, जिसने 2002 के पहले के ट्रेड मार्क्स नियमों को निरस्त कर दिया। इसलिए,  ट्रेडमार्क अधिनियम 1999 और 2017 के ट्रेड मार्क्स नियम वर्तमान में प्रभावी हैं और भारत में ट्रेडमार्क कानून को विनियमित (रेगुलेट) करते हैं।

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  • ट्रिप्स समझौता: अनुच्छेद 16.1, यह अनुच्छेद यह निर्दिष्ट (स्पेसिफाइ) नहीं करता है कि पंजीकृत ट्रेडमार्क के मालिक को ट्रेडमार्क के संबंध में क्या अधिकार प्राप्त हैं, बल्कि यह उल्लेख करता है कि वह इसकी सुरक्षा कैसे कर पाएगा। यह मालिक को एक विशेष अधिकार प्रदान करता है कि तीसरे पक्ष, जिनके पास मालिक की सहमति नहीं है, उन ट्रेडमार्क के संबंध में समान या समान वस्तुओं या सेवाओं पर समान या समान संकेतों का उपयोग नहीं कर पाएंगे। एसे ट्रेडमार्क को पंजीकृत करें यदि उसके उपयोग से भ्रम की संभावना हो।

आइए इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझें, यदि संकेत और उत्पाद समान हैं, तो भ्रम की संभावना के अस्तित्व का अनुमान है, लेकिन यदि संकेत और उत्पाद समान हैं, तो भ्रम की संभावना मामले-दर-मामले पर, आधार पर और व्यक्तिगत बाज़ार स्थितियों के आधार पर तय की जाएगी।

  • ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999: धारा 2(h) और 2(zb), जो भ्रामक समानता और ट्रेडमार्क को परिभाषित करते हैं, का अर्थ और दायरा अनुभाग में ऊपर उल्लेख किया गया है। आइए अब दो प्रावधानों को समझने की कोशिश करें जहां भ्रामक समानता ट्रेडमार्क पंजीकृत करने से इनकार करने का एक आधार है।

ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 11 पंजीकरण से इनकार करने के लिए कुछ सापेक्ष आधार निर्दिष्ट करती है और ट्रेडमार्क अधिनियम 1999 की धारा 11(1)(a) और (b) के अनुसार – एक ट्रेडमार्क पंजीकृत नहीं किया जाएगा यदि, उसकी पहचान के कारण या पहले के ट्रेडमार्क के साथ समानता और ऐसे ट्रेडमार्क के अंतर्गत आने वाली वस्तुओं या सेवाओं की पहचान या समानता के कारण, जनता की ओर से भ्रम की संभावना मौजूद है, जिसमें पहले के ट्रेडमार्क के साथ जुड़ाव की संभावना भी शामिल है।

चिह्नों की समानता: ट्रेडमार्क की समानता शब्द की व्याख्या “भ्रामक रूप से समान” के रूप में की जानी है और इस अभिव्यक्ति को ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 2 (h) में परिभाषित किया गया है- “दूसरे निशान से इतना मिलता-जुलता कि धोखा देने या भ्रम पैदा करने की संभावना हो।”

भ्रम की संभावना: भ्रम की संभावना मौजूद रहने के लिए, यह संभावित होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि जनता के मन में वास्तविक भ्रम उत्पन्न हुआ हो।

  • ट्रेडमार्क नियम 2017: नियम 33 – इस नियम में उल्लेख है कि रजिस्ट्रार ट्रेडमार्क के पंजीकरण के लिए आवेदन की जांच करने के लिए उत्तरदायी होगा, और इस उद्देश्य के लिए, रजिस्ट्रार पहले के ट्रेडमार्क की खोज करेगा, चाहे वह पंजीकृत हो या पंजीकरण के लिए आवेदन किया गया हो; दोनों को जांच के लिए विचार किया जाएगा। इस तरह की गहन जांच करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्या रिकॉर्ड पर कोई ट्रेडमार्क है जो समान या समान वस्तुओं या सेवाओं के संबंध में लागू ट्रेडमार्क के समान या भ्रामक रूप से समान है। लेकिन किसी को इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि यह नियम इस बारे में चुप है कि ट्रेडमार्क के आवेदन की जांच करते समय किस प्रकार की खोज या रजिस्ट्री को क्या ध्यान में रखना चाहिए, और यह शून्य या चूक, चाहे इरादा हो या नहीं, ट्रेडमार्क आवेदक के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। 
  • ट्रेडमार्क मैनुअल: ट्रेडमार्क मैनुअल पर एक नजर डालें, क्योंकि इसमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु है जो किसी भी ऐसे चिह्न के पंजीकरण से बचने में मदद करता है जो भ्रामक रूप से पहले के ट्रेडमार्क के समान है। हालाँकि ट्रेडमार्क अधिनियम और नियम उन खोजों की सटीक प्रकृति को निर्दिष्ट नहीं करते हैं जो रजिस्ट्री को परीक्षा उद्देश्यों के लिए करनी चाहिए, ये चीजें यह निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि क्या कोई ट्रेडमार्क पहले से ज्ञात ट्रेडमार्क के समान भ्रामक है, लेकिन ट्रेडमार्क मैनुअल अध्याय II, बिंदु 11.1 के तहत इसका उल्लेख है की “समान ट्रेडमार्क की खोज ट्रेड मार्क्स सिस्टम के माध्यम से की जाती है। इस प्रणाली की मदद से परीक्षक तीन मोड-शब्द चिन्ह खोज, ध्वन्यात्मक खोज और डिवाइस चिह्न खोज के साथ खोज करने में सक्षम होंगे। लेकिन बाधा यह है कि यद्यपि ट्रेडमार्क मैनुअल ट्रेडमार्क कानूनों के अनुरूप है, लेकिन यह समान कानूनी स्थिति नहीं रखता है। संक्षेप में कहें तो, ट्रेडमार्क मैनुअल स्थापित करने की आवश्यकता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन किसी भी भ्रम और अनावश्यक उल्लंघन के मुकदमों से बचने के लिए इसका पालन करने की अत्यधिक अनुशंसा की जाती है।

किसी ट्रेडमार्क को कब भ्रामक रूप से समान माना जा सकता है?

दोनों चिह्नों के बीच भ्रामक समानता निर्धारित करने के कारक कई मामलों में दिए गए हैं, लेकिन ये सभी कारक पियानोवादक मामले में जस्टिस पार्कर के अंग्रेजी मामले पर आधारित है। ऐसा ही एक मामला कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड बनाम कैडिला फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (2001) है जहां ऐसे कारक प्रदान किए जाते हैं, और कुछ महत्वपूर्ण बिंदु नीचे दिए गए हैं:

  • चिन्हों की प्रकृति और प्रकार। 
  • समानता की डिग्री या समानता  उदाहरण के लिए, चिह्नों के बीच ध्वन्यात्मक, दृश्य या वैचारिक समानता। 
  • माल का प्रकार या वर्ग जिसके लिए व्यापार चिह्न का उपयोग किया गया है। 
  • विभिन्न वर्ग या प्रकार के क्रेता जो सामान खरीदने की संभावना रखते हैं, उनकी शैक्षिक योग्यता, बौद्धिक संपदा का उपयोग, या सामान या सेवाओं को खरीदने में देखभाल। 
  • उत्पादों या सेवाओं को खरीदने या प्राप्त करने का तरीका। 
  • प्रतिद्वंद्वियों के माल की प्रकृति, प्रदर्शन और चरित्र में समानता।

इस मामले ने एंटी के नियम को भी निर्धारित किया, जो किसी चिह्न को तुलना के लिए भागों में जोड़ने के बजाय समग्र संपूर्ण के रूप में आंकने की आवश्यकता पर जोर देता है। इस नियम का औचित्य इस धारणा पर आधारित है कि औसत उपभोक्ता निशान को उसकी समग्रता में आंकेगा, न कि भागों में।

कॉर्न प्रोडक्ट्स रिफाइनिंग कंपनी बनाम शंग्रीला फूड प्रोडक्ट्स लिमिटेड (1959) के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और विचार की गई सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, दो निशानों के बीच समानता का पता लगाने के लिए एक परीक्षण किया: i) किसी निशान को अलग करने और तुलना करने के बजाय समग्र रूप से दूसरे चिह्न के साथ प्रत्येक भाग का प्रत्येक भाग दूसरे चिह्न के साथ मूल्यांकन करना; ii) आम जनता की सामान्य बुद्धि को ध्यान में रखना; iii) दोनों चिह्नों को एक साथ रखकर तुलना करने के बजाय पिछली घटनाओं की अपूर्ण स्मृति।

उपरोक्त सभी बिंदु व्यापक हैं और इसे संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिए अंकों के बीच समानता निर्धारित करने के लिए आवश्यक विशेषताएं मानी जाती हैं, अंकों को एक साथ रखकर तुलना करना और यह तय करना आवश्यक नहीं है कि कोई व्यक्ति दोनों के बीच अंतर और समानताएं बता सकता है या नहीं। यह परीक्षण सही और उचित नहीं है क्योंकि किसी व्यक्ति के पास समान चिह्न वाले उत्पाद से तुलना करने के लिए उत्पाद नहीं हो सकता है। विवेकपूर्ण बात यह है कि अपनी पिछली यादों से यह निर्धारित करना है कि क्या कोई व्यक्ति भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क को पहले के वास्तविक ट्रेडमार्क के साथ भ्रमित कर सकता है।

भ्रामक समानता और इरादा

धोखा देने का इरादा यह जानने के लिए निर्णायक या मार्गदर्शक कारक नहीं है कि क्या कोई चिह्न सामान्य प्रकाशन को भ्रमित या धोखा दे सकता है, चाहे वह सामान, उत्पत्ति या व्यापार संबंध से संबंधित धोखा हो। मायने यह रखता है कि निशान ऐसा है जो भ्रमित कर सकता है। यह अप्रासंगिक है कि कोई व्यक्ति गुमराह करना चाहता है या नहीं; यह साबित करने के लिए कि उसका धोखा देने का कोई इरादा नहीं था, प्रतिवादी के पक्ष में काम नहीं करेगा, इसलिए इसे साबित करने की आवश्यकता नहीं है।

किर्लोस्कर डीजल रिकॉन प्राइवेट लिमिटेड बनाम किर्लोस्कर प्रोप्राइटरी लिमिटेड और… (1995) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि वादी द्वारा प्रतिवादी के कपटपूर्ण उद्देश्यों को साबित करना एक निरर्थक कार्य है, क्योंकि एक बार वादी की प्रतिष्ठा और सद्भावना स्थापित हो जाने के बाद, इरादा अपना उद्देश्य खो देता है। महेंद्र एंड महेंद्र पेपर मिल्स लिमिटेड बनाम महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड (2001) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय    ने इस परीक्षण के इरादे को महत्वहीन लगने से पहले संभावित धोखे को साबित करने की आवश्यकता पर बार-बार प्रकाश डाला है। इसलिए, सख्ती से कहें तो, यह संभावित धोखे को स्थापित करने और इरादे का खुलासा नहीं करने के लिए पर्याप्त है।

के. आर. चिन्ना कृष्णा चेट्टियार बनाम श्री अंबल एंड कंपनी, मद्रास और अन्य (1970) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया कि यह पता लगाने के लिए कि ट्रेडमार्क भ्रामक रूप से दूसरे के समान पाया जा सकता है, इसका उद्देश्य धोखा देना या भ्रम पैदा करना नहीं है। यह सामान्य प्रकार के ग्राहक पर संभावित प्रभाव है जिसे किसी को साबित करना होगा।

कोई ट्रेडमार्क भ्रामक रूप से समान क्यों नहीं होना चाहिए?

ट्रेडमार्क अधिनियम उपभोक्ता अनुकूल है क्योंकि यह जनता के हितों को ध्यान में रखता है और पंजीकृत ट्रेडमार्क स्वामी के हितों की रक्षा पर भी ध्यान केंद्रित करता है। दूसरे शब्दों में, ट्रेडमार्क अधिनियम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आम जनता को भ्रामक समान ट्रेडमार्क बनाने के कारण होने वाले भ्रम और धोखे से बचाना है, क्योंकि ट्रेडमार्क की अंतर्निहित प्रकृति एक पहचानकर्ता के रूप में काम करना है, अर्थात बताना है। जनता को यह पता चला कि ढेर सारे उत्पादों में से यह विशेष उत्पाद ट्रेडमार्क स्वामी का है। लेकिन यदि भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क बनाने की प्रथा बंद नहीं की गई, तो ट्रेडमार्क अपनी प्रकृति खो देगा और दूसरा उद्देश्य ट्रेडमार्क स्वामी के व्यापार और उसकी सद्भावना को चोरी होने से बचाना है जो ट्रेडमार्क से जुड़ा हुआ है।

कैडबरी इंडिया लिमिटेड और अन्य बनाम नीरज फ़ूड प्रोडक्ट्स (2007) के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि ट्रेडमार्क का सही अर्थ और इरादा उपभोक्ता और व्यापारी को प्रतिष्ठा और सद्भावना को ठेस पहुंचाने  के इरादे से समान ट्रेडमार्क अपनाने या भ्रामक रूप से समान ट्रेडमार्क बनाने की गलत और धोखेबाज गतिविधि से जनता से परिचित ट्रेडमार्क को  बचाना है। 

ट्रेडमार्क अधिनियम के प्रावधानों के परिणाम

  • धारा 29(2) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति/इकाई पंजीकृत ट्रेडमार्क स्वामी की सहमति के बिना, व्यापार के दौरान, ऐसे चिह्न के समान या समान चिह्न या ऐसे चिह्न के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करता है, जो पंजीकृत ट्रेडमार्क द्वारा शामिल किया गया है, और इसका परिणाम यह है कि इससे जनता या ऐसे लोगों के दिमाग में भ्रमित होने की संभावना है जो गलत तरीके से ऐसे चिह्न या वस्तुओं या सेवाओं को पंजीकृत ट्रेडमार्क के मालिक के साथ जोड़ते हैं जो उनके समान हैं, तो इसे एक पंजीकृत चिह्न का उल्लंघन माना जाएगा। 
  • धारा 28(1) ट्रेडमार्क के पंजीकृत मालिक को वस्तुओं और सेवाओं से संबंधित ट्रेडमार्क का उपयोग करने का विशेष अधिकार देता है और वह ऐसे विशेष अधिकार के उल्लंघन के संबंध में उपचार प्राप्त कर सकता है।
  • धारा 102(1)(a) और (b) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी वास्तविक ट्रेडमार्क में कोई जोड़, परिवर्तन या अन्यथा कोई ट्रेडमार्क बनाता है या वह ट्रेडमार्क बनाता है जो कि सहमति के बिना समान या भ्रामक रूप से समान है, तो उसे ट्रेडमार्क को गलत साबित करने वाला माना जाएगा। ट्रेडमार्क स्वामी, और यदि ऐसा व्यक्ति वस्तुओं या सेवाओं या सामान वाले किसी पैकेज पर ऐसा ट्रेडमार्क (समान या भ्रामक रूप से समान) लागू करता है, तो उसे वस्तुओं या सेवाओं पर किसी भी ट्रेडमार्क को गलत तरीके से लागू करने के लिए उत्तरदायी माना जाएगा।
  • धारा 103 के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो किसी ट्रेडमार्क का गलत इस्तेमाल करता है या वस्तुओं या सेवाओं पर गलत तरीके से कोई ट्रेडमार्क लागू करता है या कोई अन्य कार्य करता है जो जनता की आंखों को भ्रमित करता है, उसे कम से कम 6 महीने की कैद की सजा दी जाएगी, जिसे 3 साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना 50,000 रुपये से कम नहीं जिसे रु.2,00,000 तक भी बढ़ाया जा सकता है। 

उपचार

ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 134 किसी व्यक्ति को, पंजीकृत चिह्न के उल्लंघन के मामले में या यदि पंजीकृत चिह्न में अधिकार के संबंध में कोई विवाद है या किसी अपंजीकृत चिह्न के संबंध में विवाद है जो लुप्त हो रहा है, तो जिला न्यायालय के नीचे अदालत में मुकदमा दायर करने के लिए अधिकृत करता है।

ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 135 उन राहतों या उपायों के बारे में बात करता है जो अदालत उल्लंघन के मुकदमे में और पारित करने की कार्रवाई में दे सकती है, जैसे i) निषेधाज्ञा, ii) क्षति या लाभ के लिए खाता (माल बेचने/प्रदान करने से प्राप्त लाभ या) भ्रामक रूप से समान चिह्न का उपयोग करने वाली सेवाएं), iii) माल को नष्ट करने का आदेश, और iv) अदालत प्रतिवादी को कार्यवाही की लागत को शामिल करने का भी आदेश दे सकती है।

भ्रामक रूप से समान चिह्न रखने का अपवाद

ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 11 हमें ऐसे ट्रेडमार्क को पंजीकृत करने से इनकार करने के लिए सापेक्ष आधार देती है जो पंजीकृत ट्रेडमार्क के समान है या जिसके सामान या सेवाएं पहले पंजीकृत ट्रेडमार्क द्वारा शामिल की गई हैं। कभी-कभी प्रावधान उनके व्यक्त रूप में प्रदान किए जाते हैं और कभी-कभी, जब किसी कानूनी स्थिति से निपटने की आवश्यकता होती है, तो समाधान खोजने के लिए हमें क़ानून के अन्य प्रावधानों को बारीकी से देखना पड़ता है। ऐसा ही एक उदाहरण धारा 11 है, भले ही यह प्रावधान जिन आधारों पर पंजीकरण से इनकार किया जा सकता है प्रदान करता है, लेकिन यदि हम धारा 11(1) का विश्लेषण करें, “इसकी पहचान या पहले के ट्रेड मार्क के साथ समानता और ट्रेड मार्क के अंतर्गत आने वाली वस्तुओं या सेवाओं की पहचान या समानता”, हम पाते हैं कि इसमें 2 भाग हैं जो संयोजन ‘और’ से जुड़े हुए हैं, इसलिए दोनों शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। एक चिह्न पहले से ही पंजीकृत है और दूसरा लागू किया जा चुका है, समान या समरूप होना चाहिए और दोनों चिह्न समान वस्तुओं या सेवाओं को शामिल करने चाहिए। लेकिन यदि एक शर्त पूरी नहीं होती है, मान लीजिए कि दोनों चिह्न अलग-अलग वस्तुओं या अलग-अलग सेवाओं को शामिल करते हैं या एक चिह्न वस्तुओं को शामिल करता है या दूसरा चिह्न सेवाओं को शामिल करता है, तो इसे रजिस्ट्रार द्वारा लगाई गई शर्तों, के अनुसार पंजीकृत किया जा सकता है।

हम उपरोक्त अपवाद को एक उदाहरण की सहायता से समझ सकते हैं, खेल के सामान के लिए पहले से पंजीकृत ट्रेडमार्क ‘प्यूमा’ है, और अब मान लें कि एक और निशान ‘ट्यूमा’ है जो खेल के सामान में भी काम करता है; तो इसे ‘भ्रामक रूप से समान’ चिह्न कहा जाएगा। लेकिन यदि ‘ट्यूमा’ किसी अन्य श्रेणी के सामान से संबंधित है, मान लीजिए ट्यूना मछली रेस्तरां सेवाएं, तो इसे ‘प्यूमा’ के समान भ्रामक चिह्न नहीं माना जा सकता है।

किसी ट्रेडमार्क को भ्रामक रूप से समान होने से कैसे बचाएं

ट्रेडमार्क बनाते समय व्यक्ति को ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 9 और धारा 11 में उल्लिखित पंजीकरण से इनकार करने के आधारों को ध्यान में रखना चाहिए और उन सभी चीजों से बचना चाहिए जो ट्रेडमार्क के पंजीकरण में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

व्यापार मालिकों, व्यक्तियों या संस्थाओं को बाजार अनुसंधान करना चाहिए कि किस प्रकार के ट्रेडमार्क को प्रसिद्ध माना जाता है और क्यों? उन्हें आम जनता द्वारा कैसे माना जाता है, क्या लोग बाजार में उपलब्ध अन्य चिह्नों से किसी विशेष चिह्न को अलग कर सकते हैं? वे क्या सोचते हैं? भ्रमित करने वाले या भ्रामक रूप से समान चिह्नों के बारे में, पहले से उपलब्ध ट्रेडमार्क को याद रखने की उनकी क्षमता कितनी मजबूत है। और क्या उनकी बुद्धिमत्ता या शैक्षणिक योग्यता किसी चिह्न को अन्य चिह्नों से पहचानने और अलग करने में कोई भूमिका निभाती है?

ट्रेडमार्क डिज़ाइन करते समय, किसी व्यक्ति को अपने प्रतिद्वंद्वियों या प्रतिस्पर्धियों के चिह्नों और उनके चिह्नों के अंतर्गत आने वाली वस्तुओं या सेवाओं के प्रकार या वर्ग के बारे में पता होना चाहिए। उन्हें सभी पंजीकृत या अपंजीकृत ट्रेडमार्क की गहन जांच करनी चाहिए और उनके निशान और पहले से पंजीकृत या प्रसिद्ध ट्रेडमार्क के बीच किसी भी ध्वन्यात्मक, दृश्य या वैचारिक समानता की पहचान करनी चाहिए।

इन उपर्युक्त गतिविधियों पर विचार करके या प्रारंभिक शोध करके, कोई व्यक्ति पंजीकरण से इनकार करने, उल्लंघन के मुकदमों या पारित होने की कार्रवाई से बचकर समय, ऊर्जा और संसाधनों की बचत कर सकता है।

निष्कर्ष

ट्रेडमार्क अधिनियम का उद्देश्य ट्रेडमार्क मालिकों और उपभोक्ताओं को धोखे और भ्रम से बचाना है, लेकिन बाजार में भ्रामक रूप से समान निशान इन उद्देश्यों को विफल करते हैं, इसलिए लोगों को ऐसी गतिविधियों को करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे आम जनता के बीच भ्रम, उल्लंघन जैसे गंभीर परिणाम होते हैं। ट्रेडमार्क का, व्यापारियों को आर्थिक या वित्तीय नुकसान, उल्लंघनकर्ताओं को अनुचित लाभ, और बाजार की अखंडता के लिए जोखिम है। इस प्रथा को समाप्त करने के लिए, किसी को बाजार पर गहन शोध करना चाहिए, प्रसिद्ध ट्रेडमार्क का अध्ययन करना चाहिए, कॉर्पोरेट नैतिकता समझना चाहिए कि आम जनता एक निशान को दूसरे से कैसे अलग करती है, अपने प्रतिद्वंद्वियों के निशान का विश्लेषण करें और अंत में, अपने प्रति सच्चे रहें।

इस लेख को पढ़ते समय, आप महसूस कर सकते हैं कि भले ही ट्रेडमार्क अधिनियम और ट्रेडमार्क नियम बाध्यकारी हैं, वे केवल निशानों की जांच करने के लिए रजिस्ट्रार के कर्तव्य का उल्लेख करते हैं, लेकिन रजिस्ट्रार को किस प्रकार की खोजों को पूरा करने की आवश्यकता है, इसके बारे में वे चुप हैं। ट्रेडमार्क मैनुअल को छोड़कर, जिसमें रजिस्ट्रार द्वारा की जा सकने वाली विभिन्न प्रकार की खोजों का उल्लेख है, फिर भी यह गैर-बाध्यकारी है, जिसका अर्थ है कि रजिस्ट्रार उनका पालन करने के लिए बाध्य नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि रजिस्ट्री कभी-कभी केवल कार्य चिह्न खोज या दृश्य खोज पर विचार करती है, लेकिन ध्वन्यात्मक खोज पर नहीं, जिससे उन चिह्नों का पंजीकरण होता है जो भ्रामक रूप से पहले पंजीकृत/अपंजीकृत ट्रेडमार्क और बाद में उल्लंघन के मुकदमों के समान होते हैं, जो केवल न्यायपालिका पर बोझ डालते हैं। इसलिए, विधायिका को संबंधित प्रावधानों में संशोधन करना चाहिए, क्योंकि कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड मामले जैसे प्रचुर उदाहरण हैं, जो दो समान चिह्नों की तुलना करते समय ध्वन्यात्मक समानता पर जोर देते हैं। जैसा कि प्रिमो एंजेली ने कहा “एक महान ट्रेडमार्क उपयुक्त, गतिशील, विशिष्ट, यादगार और अद्वितीय होता है”, इसलिए किसी को ट्रेडमार्क की बेहतर सुरक्षा और चिह्न के धोखाधड़ी वाले उपयोग को रोकने का प्रयास करना चाहिए।

संदर्भ

  • फ़ाइल: ///C:/Users/shant/Downloads/SSRN-id3902406.pdf

 

भारत में बलात्कार के लिए सज़ा

यह लेख  Diksha Paliwal द्वारा लिखा गया है। लेख में बलात्कार की सजा के लिए भारतीय आपराधिक कानून में बताए गए कानूनी ढांचे और न्यायशास्त्र पर विस्तार से चर्चा की गई है। यह बलात्कार से संबंधित प्रासंगिक प्रावधानों और बलात्कार के लिए सजा देते समय ध्यान में रखे जाने वाले महत्वपूर्ण कारकों का एक व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है। इसके अलावा, यह हाल के विधायी संशोधनों और उन कमियों से संबंधित है जो बलात्कार के पीड़ितों को न्याय देने में बाधा बन रही हैं। अंत में, यह आपराधिक न्यायशास्त्र में बलात्कार से संबंधित कानूनों की प्रभावशीलता और कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) को बढ़ाने के लिए कुछ सुझावात्मक उपायों से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Himanshi Deswal द्वारा किया गया है।

परिचय

जैसा कि न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने कहा था और मैं उद्धृत करता हूं, कि “जब एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है तो वह केवल शारीरिक चोट नहीं होती है, बल्कि ‘कुछ शर्म की गहरी भावना’ होती है।” हालाँकि इस आधुनिक दुनिया में सभी क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों का जश्न बढ़ा है, लेकिन उनकी गरिमा और सम्मान की रक्षा की चिंता कम होती दिख रही है। बलात्कार सिर्फ एक अपराध नहीं है जो शारीरिक चोट पहुँचाता है, बल्कि महिलाओं को अंदर से पूरी तरह से तोड़ देता है, एक ऐसा घाव छोड़ जाता है जो कभी नहीं भर सकता और एक खालीपन है जिसे कोई भी कभी नहीं भर पाएगा।

जैसा कि डोनाल्ड ए एंड्रेस और जेम्स बोंटा की ‘द फिलॉसफी ऑफ क्रिमिनल कंडक्ट’ नामक पुस्तक में लिखा गया है, “बलात्कार, जैसा कि आम तौर पर परिभाषित किया गया है, किसी पुरुष का किसी महिला या अन्य पुरुष के प्रति एक अप्रिय, अवांछित और गैर-सहमति वाला यौन कार्य या व्यवहार है।” किसी के शरीर की स्वायत्तता (ऑटानमी) का घोर उल्लंघन बलात्कार जैसा जघन्य अपराध है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ती अपराध दर भारत में महिलाओं की सुरक्षा की खराब स्थिति को प्रमाणित करती है। पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराध में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2021 में अपराध के लगभग 4.38 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2021 की तुलना में मामलों में 15.3% की भयावह और चिंताजनक वृद्धि को दर्शाता है।

यहां यह ध्यान रखना उचित है कि लेखक किसी भी तरह से यह संकेत नहीं देता है कि महिलाएं ही बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की एकमात्र शिकार हैं। पिछले कुछ वर्षों में पुरुषों के खिलाफ भी बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं और कई महिलाओं को पुरुषों की यौन स्वायत्तता का उल्लंघन करने का दोषी पाया गया है। एक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि बलात्कार के लगभग 14% पीड़ित पुरुष हैं। हालाँकि, हमारे देश में प्रचलित कानून अभी भी लिंग-तटस्थ (जेन्डर-न्यूट्रल) नहीं हैं। निस्संदेह, पीड़ितों को लिंग की परवाह किए बिना समान सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

बलात्कार के पुरुष पीड़ितों से संबंधित कानूनों और ऐसे अपराधों के प्रति अदालतों के दृष्टिकोण के बारे में अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

बलात्कार का अपराध

भारत में, बलात्कार के अपराध को पहली बार भारतीय दंड संहिता, 1860 (इसके बाद आईपीसी के रूप में संदर्भित) द्वारा अपराध घोषित किया गया था। लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में हमारे देश का पहला कानून आयोग बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः आईपीसी लागू हुआ।

इतने जघन्य और बर्बर प्रकृति के अपराध को अपराध घोषित करने में कई वर्षों का संघर्ष लगा। बलात्कार से संबंधित कानूनों को महत्वपूर्ण रूप से विकसित किया गया है; हालाँकि, शुरुआती दिनों में, न्याय पाना और अभियुक्त को दोषी साबित करना पीड़ित पर निर्भर था। हमेशा यह धारणा रही है कि महिलाएं आरोपों और ऐसे अपराध के घटित होने के बारे में झूठ बोल रही थीं। सत्रहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध न्यायविद् सर मैथ्यू हेल का एक उद्धरण बलात्कार पर ब्रिटिश भारत की अदालतों की पूर्वाग्रहपूर्ण और भेदभावपूर्ण सोच को दर्शाता है; इसमें कहा गया है कि “एक आरोप आसानी से लगाया जा सकता है और इसे साबित करना कठिन होता है, और अभियुक्त पक्ष द्वारा इसका बचाव करना कठिन होता है, हालांकि यह इतना निर्दोष नहीं होता”। हालाँकि, समय के साथ, हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में कई विकास हुए हैं, और बलात्कार से संबंधित कानूनों में भी काफी विकास हुआ है। बलात्कार विरोधी कानून सख्त हो गए हैं, खासकर पिछले कुछ वर्षों में हुई कुछ भयावह और परेशान करने वाली घटनाओं के बाद।

बलात्कार अत्यधिक शारीरिक और मानसिक यातना का कार्य है, एक निंदनीय अपराध है जो पीड़ित को विनाशकारी रूप से प्रभावित करता है। यह केवल शारीरिक हिंसा का कार्य नहीं है; लेकिन यह पीड़ित के मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को भी पूरी तरह से नष्ट कर देता है। एक कठोर आपराधिक न्याय प्रशासन प्रणाली का होना जो ऐसे अपराधों से सख्ती से निपट सके और अपराधियों को सख्त सजा दे, बहुत महत्वपूर्ण है।

आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार के अपराध को परिभाषित किया गया है। इसमें इस प्रकार बताया गया है:

कहा जाता है कि एक व्यक्ति ने निम्नलिखित परिस्थितियों में बलात्कार का अपराध किया है;

  • खंड (a) – यदि वह किसी भी हद तक अपना लिंग किसी महिला की योनि (वजाइना), मुंह, गुदा या मूत्रमार्ग (यूरेथ्र) में डालता है, या यदि वह किसी भी तरह से किसी महिला को उसके या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा कुछ करने के लिए मजबूर करता है; या
  • खंड (b) – यदि वह किसी भी वस्तु या अपने शरीर का कोई हिस्सा (लिंग नहीं) योनि, गुदा या मूत्रमार्ग में किसी भी हद तक डालता है, या किसी महिला को उसके या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए मजबूर करता है; या
  • खंड (c) – यदि कोई पुरुष किसी महिला के शरीर के किसी भी हिस्से में योनि, गुदा या मूत्रमार्ग में प्रवेश करने के लिए किसी भी तरह से छेड़छाड़ करता है, या किसी महिला को उसके या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए मजबूर करता है; या
  • खंड (d) – किसी महिला की योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगाता है या जबरदस्ती करता है, या किसी महिला को उसके या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए मजबूर करता है,

इस धारा के तहत इन कार्य को बलात्कार का अपराध मानने के लिए, किसी पुरुष द्वारा किए गए उपरोक्त कार्य नीचे दिए गए किसी भी विवरण के अंतर्गत आने चाहिए:

  • पहला- महिला की इच्छा के विरुद्ध

दिलीप सिंह बनाम बिहार राज्य (2005) के मामले में, पीड़िता ने कहा कि पहली बार जब अभियुक्त ने उसके साथ यौन संबंध बनाया, तो उसके विरोध के बावजूद ऐसा किया गया; हालाँकि, बाद में, वह एक सहमति देने वाली पक्ष बन गई। लड़की ने अपनी सहमति के पीछे का कारण बताया कि उसने यह सहमति अभियुक्त के शादी के झूठे वादों के कारण दी थी। यह माना गया कि लड़की जो बयान दे रही है या उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, और इस प्रकार आदमी के खिलाफ आरोप कायम नहीं रह सकते हैं। (यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह मामला 2013 के आपराधिक संशोधन अधिनियम से पहले तय किया गया था)।

  • दूसरा- महिला की सहमति के अभाव में

सोहन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1998) के मामले में, राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा कि हिरासत में बलात्कार के मामले में, यदि पीड़िता ने कहा है कि उसने इस कार्य के लिए अपनी सहमति नहीं दी है, तो अदालत को यह मानना होगा इस पर विचार करें और यह मान लें कि पीड़िता द्वारा सहमति नहीं  दी गई थी।

  • तीसरा- महिला को या उससे जुड़े किसी अन्य व्यक्ति को खतरे में डालकर या उसे या उसमें रुचि रखने वाले किसी व्यक्ति को मौत का डर दिखाकर उसकी सहमति प्राप्त करना।

हरिशंकर बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1997) 11 एससीसी 191 के मामले में, अभियुक्त अपीलकर्ता की सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा था, जिसमें अदालत ने कहा था कि जिन परिस्थितियों में पीड़िता फंस गई थी उसमे उसके लिए डर का अलार्म बजाना संभव नहीं था, और इसलिए अभियुक्त का यह बचाव कि पीड़िता चिल्लाई नहीं, टिकाऊ नहीं है। लिए गए बयानों से यह बहुत स्पष्ट था कि पीड़िता को साइकिल बार पर बैठाया गया था और कोई भी हरकत या शोर मचाने पर उसके मुंह पर जोरदार तमाचा मारा गया था। इसके अलावा, ऐसी अन्य परिस्थितियाँ भी थीं जिनमें पीड़िता के लिए कोई भी अलार्म बजाना मुश्किल था।

  • चौथा – महिला के वैध रूप से विवाहित पति का रूप धारण करके, या यदि पुरुष महिला को यह विश्वास दिलाकर कि वह उसका पति है, उसकी सहमति लेता है।

दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य (2013) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर जोर दिया कि यह महत्वपूर्ण है कि अदालतें इस बात पर ध्यान से गौर करें कि क्या अभियुक्त वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या क्या पीड़िता से शादी करने के वादे के पीछे अभियुक्त के कोई गलत इरादे थे।

  • पांचवां- उसकी सहमति तब लेना जब वह ऐसी सहमति देने में सक्षम नहीं है, यानी या तो वह नशे में है या मानसिक रूप से अस्वस्थ है, या वह ऐसे कार्य की प्रकृति और परिणाम को समझने की स्थिति में नहीं है। 

अज़ीज़ उस्मान शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य (1999), के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने धारा 375 के उपरोक्त खंड पर उचित विचार करते हुए एक व्यक्ति को बलात्कार का दोषी ठहराया। वर्तमान मामले में, पीड़िता मानसिक रूप से अस्वस्थ थी।

  • छठा- यदि सहमति देने वाली महिला की उम्र 18 वर्ष से कम है (यह तथ्य महत्वहीन है कि महिला ने अपनी सहमति दी है या नहीं)।

अमीरुल गाज़ी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2022) के मामले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति को बलात्कार के अपराध के लिए दोषी ठहराया, जिसमें कहा गया कि 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की द्वारा दी गई सहमति महत्वहीन है और निश्चित रूप से संभोग के कार्य के लिए वैध सहमति नहीं मानी जाएगी।

  • सातवीं- ऐसी स्थिति में जहां वह अपनी सहमति देने में असमर्थ हो।

यह खंड आगे दो स्पष्टीकरण प्रदान करता है, ताकि प्रावधान की व्याख्या करते समय रास्ते में आने वाली किसी भी अस्पष्टता को दूर किया जा सके।

स्पष्टीकरण 1 में प्रावधान है कि ‘योनि’ शब्द में लेबिया मेजोरा भी शामिल होगा।

स्पष्टीकरण 2 इस धारा के संदर्भ में सहमति शब्द की स्पष्ट समझ प्रदान करता है। ऐसा कहा जाता है कि यह महिला द्वारा किसी भी यौन कार्य में शामिल होने के लिए एक स्पष्ट स्वैच्छिक समझौता है, जिसे शब्दों, इशारों या मौखिक या गैर-मौखिक संचार के किसी अन्य रूप के माध्यम से प्रस्तुत या संप्रेषित किया जा सकता है।

उपरोक्त स्पष्टीकरण आगे एक प्रावधान प्रदान करता है, अर्थात, यदि ऐसी स्थिति में जहां पीड़िता द्वारा प्रतिरोध का कोई कार्य नहीं दिखाया गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि जबरदस्ती संभोग का कार्य बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा, जैसा कि भारतीय दंड संहिता में प्रावधान है।

इसके अलावा, यह धारा दो अपवादों का प्रावधान करती है, अर्थात्, चिकित्सा परीक्षण और किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग करना क्रमशः बलात्कार के अपराध के अंतर्गत नहीं आएगा।

धारा 375 में खंडों की विस्तृत व्याख्या को पढ़ने और समझने के लिए, इस लेख को देखें

भूपिंदर शर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2003) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि “बलात्कार का अपराध अपने सरलतम अर्थ में “एक महिला का उसकी सहमति के बिना, बलपूर्वक, भय या धोखाधड़ी से बलात्कार करना है या “किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक उसके शारीरिक संबंध बनाना” है। “बलात्कार” या “रैप्टस” तब होता है जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ जबरदस्ती और उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाता है; या, जैसा कि अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है, “बलात्कार किसी भी महिला का, उसकी इच्छा के विरुद्ध, विशेष वर्ष से अधिक आयु का शारीरिक संबंध है; या किसी महिला बच्चे की, उस उम्र से कम उम्र की, उसकी इच्छा से या उसके विरुद्ध” बलात्कार के अभियोग में आवश्यक शब्द हैं रेपुइट और कार्नालिटर कॉग्नोविट; लेकिन कार्नलिटर कॉग्नोविट, और न ही रैपुइट शब्द के बिना कोई अन्य शिकायत, बलात्कार को व्यक्त करने के लिए कानूनी अर्थ में पर्याप्त नहीं है। बलात्कार के अपराध में, “शारीरिक ज्ञान” का अर्थ है पीढ़ी के पुरुष अंग द्वारा कथित तौर पर ज्ञात अंग की थोड़ी सी भी पहुंच। यह एक महिला के निजी व्यक्तित्व का हिंसा के साथ उल्लंघन है – हर तरह से एक आक्रोश। अपराध की प्रकृति से ही यह सर्वोच्च कोटि का घृणित कार्य है।”

भारत में बलात्कार के लिए सज़ा

बलात्कार सबसे जघन्य अपराध है जिसे कोई व्यक्ति कर सकता है और यह कानून का सबसे गंभीर उल्लंघन है जिसे कोई व्यक्ति कर सकता है। यह एक ऐसा अपराध है जो पीड़ित के अस्तित्व को पूरी तरह से बाधित कर देता है, जैसा कि विभिन्न मामलों में अदालतों ने भी कहा है। बलात्कार न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण और घिनौनी सच्चाई है। यह कार्य अपने आप में इस भयावह वास्तविकता को दर्शाता है कि महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है और उन्हें पुरुषों से कमतर माना जाता है। यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को जिस आघात का सामना करना पड़ता है, वह उसे पूरी तरह से तोड़ देता है – एक ऐसी स्थिति या परिस्थिति जो असहनीय और अपमानजनक दोनों होती है।

जैसा कि जेनिसन बनाम बेकर, (1972) 2 क्यूबी 52 के मामले में कहा गया है और आगे गृह मंत्रालय की आपराधिक न्याय प्रणाली के सुधार समिति द्वारा उद्धृत किया गया है, “कानून को तब चुपचाप नहीं बैठना चाहिए; जब जो लोग इसकी अवहेलना करते हैं वे स्वतंत्र हो जाते हैं और जो लोग इसकी सुरक्षा चाहते हैं वे आशा खो देते हैं।” कुछ परिस्थितियों में कानून की अवहेलना करने वालों को सजा देना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। विधायिका ने विभिन्न कानून और प्रावधान बनाए हैं जो पीड़ित को ऐसे अमानवीय कार्यों से बचाते हैं और उन दंडों का भी प्रावधान करते हैं जो किसी व्यक्ति पर बलात्कार का अपराध करने पर लगाए जाएंगे। आइए उन प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण करें जो भारत में बलात्कार की सजा का प्रावधान करते हैं।

आईपीसी की धारा 376 

बलात्कार के अपराध के लिए दी जाने वाली सज़ा से संबंधित पहला प्रावधान आईपीसी की धारा 376 है। धारा 376(1) में प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बलात्कार का अपराध करता है, उसे कारावास की अवधि से दंडित किया जा सकता है, जो 10 वर्ष से कम नहीं होगी; हालाँकि, यह आजीवन कारावास की सज़ा तक हो सकती है। साथ ही, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि बलात्कार के अपराध के लिए इस धारा के तहत कारावास का प्रकार कठोर कारावास है। इसके अलावा, यह प्रावधान है कि यह धारा 376 की उपधारा 2 के तहत प्रदान किए गए मामलों पर लागू नहीं होगा।

धारा 376(2) में, किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो नीचे दी गई श्रेणी के अंतर्गत आता है और नीचे दी गई श्रेणी की परिस्थिती में बलात्कार का अपराध करता है को सजा दी  जाएगी जो 10 साल से कम नहीं होगी और जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है:-

  • यदि कोई पुलिस अधिकारी पुलिस स्टेशन परिसर में या हिरासत में मौजूद किसी महिला से बलात्कार का अपराध करता है;
  • यदि कोई लोक सेवक अपनी ड्यूटी के दौरान किसी ऐसी महिला के साथ बलात्कार करता है जो ऐसे लोक सेवक की हिरासत में है या उसके किसी अधीनस्थ की हिरासत में है;
  • यदि सशस्त्र बलों में कोई व्यक्ति उस क्षेत्र में बलात्कार करता है जहां वह तैनात है;
  • यदि कोई व्यक्ति जो किसी जेल, रिमांड होम, किसी महिला संस्था के प्रबंधन में है, अपने पद का लाभ उठाकर किसी महिला (जो ऐसे किसी उपरोक्त स्थान की कैदी है) पर बलात्कार का अपराध करता है;
  • यदि किसी अस्पताल में काम करने वाला व्यक्ति जिस अस्पताल में काम कर रहा है, उसी अस्पताल में बलात्कार करता है;
  • यदि कोई व्यक्ति, जो किसी महिला का रिश्तेदार, अभिभावक या शिक्षक है, या उसके प्रति विश्वास या अधिकार की स्थिति में है, उसके साथ बलात्कार का कार्य करता है।
  • यदि कोई व्यक्ति सांप्रदायिक (कम्यूनल) हिंसा के दौरान किसी महिला के साथ बलात्कार का अपराध करता है;
  • यदि कोई व्यक्ति किसी गर्भवती महिला के साथ बलात्कार करता है (उसकी गर्भावस्था के बारे में जानकारी होने के बावजूद);
  • यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी महिला के साथ बलात्कार करता है जो अपनी सहमति देने में सक्षम नहीं है;
  • यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी महिला के साथ बलात्कार करता है जिस पर उसका नियंत्रण या प्रभुत्व की स्थिति है;
  • यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी महिला के साथ बलात्कार करता है जो मानसिक या शारीरिक रूप से अस्वस्थ है;
  • यदि कोई व्यक्ति बलात्कार का अपराध करते समय किसी महिला को गंभीर रूप से घायल करता है या गंभीर रूप से चोट पहुंचाता है, अपंग करता है, विकृत करता है या उसके जीवन को खतरे में डालता है;
  • यदि कोई व्यक्ति एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्कार करता है।

इसके अलावा, यह ध्यान रखना उचित है कि दोषी व्यक्ति को कठोर कारावास से दंडित किया जाता है, और इसके अलावा, ‘आजीवन कारावास’ शब्द में दोषी व्यक्ति के शेष जीवन की सजा भी शामिल होगी।

यह धारा उपरोक्त उपधारा में प्रयुक्त कुछ शब्दों के लिए धारा 376 की उपधारा 2 के लिए एक स्पष्टीकरण प्रदान करती है, जिसमें यह ‘सशस्त्र बल’, ‘अस्पताल’, ‘पुलिस अधिकारी’ और ‘महिलाओं या बच्चों की संस्थान’ जैसे शब्दों को परिभाषित करती है। 

धारा 376(3) (आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ी गई) उस अभियुक्त को सजा प्रदान करती है जिसने 16 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ बलात्कार का जघन्य अपराध किया है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्त व्यक्ति को कम से कम 20 साल की अवधि के लिए कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे आजीवन कारावास (अभियुक्त के जीवन की शेष अवधि) तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, व्यक्ति उस पर लगाए गए जुर्माने की राशि का भुगतान करने के लिए भी उत्तरदायी होगा, जो पीड़ित के चिकित्सा व्यय और पुनर्वास खर्चों को पूरा करने के लिए उचित होगी।

धारा 376 की विस्तृत समझ के लिए, धारा 376 के तहत सज़ा पर यह लेख देखें

आईपीसी की धारा 376A 

उपरोक्त धारा (वर्ष 2013 में हुआ संशोधन, 2013 का अधिनियम 13– 03.02.2013 से प्रभावी) बलात्कार का अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए धारा 376(1) और (2) के तहत निर्धारित सजा का प्रावधान करती है, जिसमें व्यक्ति के उपरोक्त कार्यों से पीड़ित की मृत्यु हो जाती है या जो पीड़ित को लगातार निष्क्रिय अवस्था में छोड़ देता है। इसमें प्रावधान है कि अभियुक्त व्यक्ति को कम से कम 20 वर्ष की अवधि के लिए कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे आजीवन कारावास (अभियुक्त के जीवन की शेष अवधि) तक बढ़ाया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 376 AB

उपरोक्त धारा 12 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले अभियुक्त को सजा का प्रावधान करती है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्त व्यक्ति को कम से कम 20 साल की अवधि के लिए कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे आजीवन कारावास (अभियुक्त के जीवन की शेष अवधि) तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, व्यक्ति उस पर लगाए गए जुर्माने की राशि का भुगतान करने के लिए भी उत्तरदायी होगा, जो पीड़ित के चिकित्सा व्यय और पुनर्वास खर्चों को पूरा करने के लिए उचित होगी।

आईपीसी की धारा 376B 

हालाँकि भारत में अभी तक वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना गया है, लेकिन उपरोक्त प्रावधान उस पति को सज़ा का प्रावधान करता है जो अपनी पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करता है या जो अपनी पत्नी को उसके साथ संभोग करने के लिए मजबूर करता है। हालाँकि, किसी को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह प्रावधान उन मामलों के लिए है जिनमें पत्नी अलग रह रही है (चाहे वह अलग होने की डिक्री के तहत हो या अन्यथा, पत्नी की सहमति के अभाव में) और जुर्माने के साथ कम से कम 2 साल की कैद की सजा दी जाएगी, लेकिन इसे 7 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 376C 

यह धारा अपने पद का दुरुपयोग करके किसी महिला के साथ यौन संबंध बनाने वाले व्यक्ति को सजा का प्रावधान करती है। यदि कोई प्राधिकारी व्यक्ति किसी महिला को अपने साथ यौन संबंध बनाने के लिए बहकाता है तो वह इस धारा के तहत दंडनीय अपराध है। यदि कोई प्राधिकारी व्यक्ति, प्रत्ययी (फिडूशियरी) संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति, या कोई लोक सेवक, या जेल, रिमांड होम या ऐसे किसी अन्य संस्थान में अधीक्षक या प्रबंधक, या अस्पताल प्रबंधन में कोई व्यक्ति या अस्पताल का स्टाफ अपने पद का दुरुपयोग करता है, तो इस प्रकार यदि वह किसी महिला के साथ यौन संबंध बनाता है, तो उसे कम से कम 5 वर्ष की अवधि के लिए कठोर कारावास की सजा दी जाएगी, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जाएगा।

ध्यान दें: यह ध्यान रखना उचित है कि किसी पुरुष द्वारा संभोग का यह कार्य बलात्कार की श्रेणी में नहीं आएगा और आईपीसी की धारा 375 द्वारा प्रदान की गई परिभाषा की श्रेणी में नहीं आएगा।

आईपीसी की धारा 376 D 

उपरोक्त धारा सामूहिक बलात्कार के अपराध के लिए सजा का प्रावधान करती है। इसमें प्रावधान है कि यदि बलात्कार का अपराध किसी महिला के विरुद्ध सामूहिक समूह के रूप में कार्य करने वाले या समान इरादे वाले एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तो ऐसी स्थिति में उस कार्य में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को बलात्कार का कार्य किया हुआ माना जाएगा। इसके अलावा, इसमें प्रावधान है कि ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 20 वर्ष की अवधि के लिए कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे आजीवन कारावास (अभियुक्त के जीवन की शेष अवधि) तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, व्यक्ति उस पर लगाए गए जुर्माने की राशि का भुगतान करने के लिए भी उत्तरदायी होगा, जो पीड़ित के चिकित्सा व्यय और पुनर्वास खर्चों को पूरा करने के लिए उचित और उचित होगा।

आईपीसी की धारा 376 DA और धारा 376 DB

धारा 376 DA 16 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार के अपराध के अभियुक्त व्यक्तियों को सजा प्रदान करती है, जबकि धारा 376 DB 12 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार के अपराध के अभियुक्त व्यक्तियों को सजा प्रदान करता है। दोनों धाराओं में जुर्माने के साथ आजीवन कारावास (कठोर प्रकृति) की सजा का प्रावधान है। साथ ही, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीड़ित के चिकित्सा खर्च और पुनर्वास खर्च को पूरा करने के लिए ऐसा जुर्माना उचित और उचित होगा।

आईपीसी की धारा 376 E 

यह धारा बार-बार अपराध करने वालों के लिए सजा का प्रावधान करती है, जिन्हें धारा 376 या 376A या 376AB या 376D या 376 DA या धारा 376DB के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है, और उसके बाद, व्यक्ति को उपरोक्त किसी भी धारा के तहत फिर से दोषी ठहराया जाता है। इसमें आजीवन कारावास (किसी व्यक्ति के जीवन की शेष अवधि के लिए) की सजा का प्रावधान है।

पॉक्सो अधिनियम, 2012 और आईपीसी

  • भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो अधिनियम) का पारित होना एक उल्लेखनीय दिन है। पॉक्सो अधिनियम बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के मुद्दे को संबोधित करता है और ऐसे अपराध करने वाले व्यक्तियों के लिए दंडात्मक प्रावधान प्रदान करता है।
  • सबसे पहले, प्रवेशन यौन उत्पीड़न (जैसा कि धारा 3 के तहत परिभाषित है) के लिए सजा धारा 4 के तहत प्रदान की जाती है। यह अपराधी को न्यूनतम दस साल के कारावास से दंडित करता है, जिसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ उपरोक्त अपराध करता है, तो उसे न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास (अपराधी के जीवन की शेष अवधि के लिए) तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, लगाया गया जुर्माना खर्चों को पूरा करने के लिए उचित होना चाहिए।
  • धारा 7 के तहत परिभाषित यौन उत्पीड़न धारा 8 के तहत कम से कम 3 साल की कैद की सजा से दंडनीय है, जिसे जुर्माने के साथ 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है।
  • गंभीर यौन हमला, जैसा कि धारा 9 के तहत परिभाषित है, धारा 10 के तहत दंडनीय है। इसमें जुर्माने के साथ कम से कम 5 साल की कैद की सजा का प्रावधान है, जिसे 7 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

भारत में बलात्कार कानूनों और कानूनों के ऐतिहासिक विकास के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए, इस लेख को देखें – भारत में बलात्कार कानून

महत्वपूर्ण मामले 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में यौन हिंसा से संबंधित भयावह और निराशाजनक डेटा सामने आया कि 2021 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,49,404 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 53,874 मामले, जो कुल का 36.05% हैं, पॉक्सो अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

आइए उपरोक्त अधिनियम के तहत अपराधों से संबंधित कुछ मामलों पर एक नजर डालें।

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम बासुदेब @ बासु मंडल एवं अन्य (2021)

वर्तमान मामले में, चार लोगों ने 16 साल की एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसे एक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया, जिसे उन्होंने नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न करते समय अपने एक मोबाइल फोन से बनाया था। अभियुक्त लड़की को धमका रहे थे और बार-बार चेतावनी दे रहे थे कि अगर उसने अपराध के बारे में बताने की हिम्मत की तो वे उसका वीडियो लीक कर देंगे। हालाँकि, वीडियो अंततः लीक हो गया और लड़की ने साहस जुटाया और अंततः एफआईआर दर्ज की गई। अभियुक्त व्यक्ति के खिलाफ आरोप पॉक्सो अधिनियम की धारा 6, 14 और 15, आईपीसी की धारा 376DA, 506, और 34 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67B के तहत थे।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उन्होंने कोई भी कथित अपराध नहीं किया है और वे पूरी तरह से निर्दोष हैं। पक्षों को सुनने के बाद, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, प्रथम, लालबाग, मुर्शिदाबाद के समक्ष दो मुद्दे यह थे कि क्या अभियुक्त व्यक्तियों ने बताए गए अपराध किए हैं और यदि हां, तो बनाए गए अपराधों के अनुसार सजा की मात्रा क्या होगी।

ज्यूसिटिया एट लिबरेट प्रायर (न्याय सर्वोच्च स्थान रखता है और स्वतंत्रता से पहले आता है) के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने देखा कि पीड़िता अपने प्रेमी और उसके प्रेमी के अन्य दोस्तों की वासना का शिकार हो गई। उन्होंने उसके साथ बेरहमी से बलात्कार किया और साथ ही उसका वीडियो भी बनाया। यह कहते हुए कि शमन करने वाली परिस्थितियाँ बहुत कम हैं और गंभीर परिस्थितियाँ बहुत अधिक हैं, अदालत ने सभी अभियुक्तों को पॉक्सो अधिनियम के उपरोक्त अपराधों और आईपीसी और आईटी अधिनियम के तहत सामूहिक बलात्कार के तहत दोषी ठहराया औरप्रत्येक आरोपी को 2 लाख रुपये के जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने राज्य को पीड़िता को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।

शांतनु बनाम राज्य (2023)

वर्तमान मामले में, अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए विचारण न्यायालय द्वारा दोषी पाया गया था। उपरोक्त अपराधों के लिए, अभियुक्त को 10 साल की अवधि के लिए जेल भेज दिया गया और पीड़िता को 5000/- रुपये का जुर्माना भी देने को कहा गया। इसके अलावा, पॉक्सो अधिनियम की धारा 42 पर विचार करने के बाद उसे आईपीसी की धारा 376 के तहत सजा नहीं सुनाई गई।

अपीलकर्ता ने उपरोक्त दोषसिद्धि को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। अपीलकर्ता ने प्रस्तुत किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए भौतिक साक्ष्यों में कई विसंगतियां थीं, और इसके अलावा, पीड़ित द्वारा दी गई गवाही या बयानों में भी सुधार हुए थे। उच्च न्यायालय ने पीड़िता की छह साल की नाबालिग उम्र को ध्यान में रखते हुए कहा कि संभावना हो सकती है कि पीड़िता की बेगुनाही के कारण बयान में कुछ बदलाव हुए हों; हालाँकि, कथन में सुधारों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि चूंकि वर्तमान घटना में, कोई स्वतंत्र गवाह या कोई अन्य चिकित्सा साक्ष्य नहीं था, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि पीड़िता द्वारा दी गई गवाही उत्तम गुणवत्ता की हो क्योंकि यहां केवल अभियोजक की गवाही की ही जांच की जाएगी। इसमें आगे कहा गया है कि “पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 (c) के अवलोकन से पता चलता है कि किसी कार्य को प्रवेशन यौन हमला मानने के लिए, अभियुक्त को बच्चे के शरीर के किसी भी हिस्से में हेरफेर करना होगा ताकि प्रवेश हो सके। वर्तमान मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि पीड़िता के शरीर के किसी भी हिस्से में प्रवेश के लिए कोई छेड़छाड़ की गई थी।”

इस प्रकार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि उसे पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 (c) के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है और वर्तमान मामले में, ऐसा कोई सबूत नहीं दिखाया जा सकता जो यह साबित करता हो कि प्रवेश के लिए पीड़िता के शरीर के किसी भी हिस्से पर किसी प्रकार का हेरफेर किया गया था। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट किया गया कि साधारण स्पर्श को पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रवेशन यौन उत्पीड़न के लिए हेरफेर नहीं माना जाएगा।

भारत के अटॉर्नी जनरल बनाम सतीश और अन्य (2023)

वर्तमान मामले में, सतीश रगड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता को पॉक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत बरी कर दिया और उसे आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया, जिससे उसे एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने क़ानून की व्याख्या के “शरारत नियम” के सिद्धांत पर भरोसा करते हुए कहा कि कानून की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए जो नुकसान को रोकती है और उपचार को बढ़ावा देती है। इसमें आगे कहा गया है कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्पर्श दोनों को शामिल करती है।

वैवाहिक बलात्कार

सरल शब्दों में, ‘वैवाहिक बलात्कार’ शब्द दोनों पक्षों की सहमति के अभाव में पति और पत्नी के बीच जबरन यौन संबंध को दर्शाता है। धारा 375 में दिए गए अपवाद 2 के तहत वैवाहिक बलात्कार के कार्य को परिभाषित किया गया है। धारा के तहत दिए गए अपवाद में स्पष्ट किया गया है कि यदि पत्नी की उम्र 15 वर्ष से अधिक है तो यह बलात्कार नहीं माना जाएगा। अब, भारत में लड़कियों की शादी की कानूनी उम्र 18 साल है, इसलिए किसी भी परिस्थिति में वैवाहिक बलात्कार में पत्नी की उम्र 15 साल से कम नहीं होगी। इसलिए, प्रचलित कानूनों के अनुसार, भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इस प्रकार, आईपीसी की धारा 375 के अनुसार, भारत में वैवाहिक बलात्कार के लिए कोई सजा नहीं है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) द्वारा किए गए एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 3 में से 1 (18-49 वर्ष की आयु) महिलाएं पति-पत्नी के दुर्व्यवहार का शिकार हुई हैं, और 6% महिलाओं को यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है। महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता और महिलाओं के लिए अन्य सहायता समूह पिछले कुछ वर्षों से वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, भारत में वैवाहिक बलात्कार अभी भी वर्जित है, इस पर कम ही चर्चा होती है और इसे आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है। भारत में, विवाह में निहित सहमति की अवधारणा का व्यापक रूप से पालन किया जाता है, और इसलिए वैवाहिक बलात्कार कोई अपराध नहीं है।

मामले

उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना गया है; हालाँकि, ऐसे कुछ मामले थे जिनमें वैवाहिक बलात्कार के मुद्दे से निपटा गया था। आइए उन पर एक नजर डालें।

इंडिपेंडेंट थॉट  बनाम भारत संघ (2013)

इंडिपेंडेंट थॉट  बनाम भारत संघ (2013) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में, इसने एक लड़की की शारीरिक स्वायत्तता को मान्यता दी और बाल विवाह या कम उम्र की लड़कियों के पतियों द्वारा विवाह में बलात्कार को अपराध घोषित कर दिया।

अनुजा कपूर बनाम भारत संघ (2019)

इस मामले में, वर्तमान याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने वैवाहिक बलात्कार को तलाक के आधार के रूप में शामिल करने और बनाए गए कानूनों के उल्लंघन के लिए सजा के लिए दिशानिर्देश, उप-नियम और उचित नियम तैयार करने के लिए उत्तरदाताओं को परमादेश (मैंडेमस) जारी करने की प्रार्थना की। न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि कानून बनाना विधायिका का काम है, अदालतों का नहीं। 

धारा 375 के अपवाद II को चुनौती

हृषिकेश साहू बनाम कर्नाटक राज्य (2018) (मार्च 2022 में सुनाया गया फैसला) के मामले में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 375 (वैवाहिक बलात्कार, बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता) का अपवाद II पूर्ण नहीं है और समानता के सिद्धांत के विपरीत है। इसमें कहा गया कि यह अपवाद प्रतिगामी है और इस प्रकार पति द्वारा दिए गए तर्कों को खारिज कर दिया गया, जिसमें कहा गया कि पति के खिलाफ आरोप तय नहीं किए जा सकते क्योंकि अपवाद में ऐसा प्रावधान है। पति ने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है और वर्तमान में उसने अपने पक्ष में दोषसिद्धि के खिलाफ स्थगन प्राप्त कर लिया है। दिलचस्प बात यह है कि कर्नाटक सरकार ने भी वर्तमान मामले में पति के खिलाफ मुकदमा चलाने का समर्थन किया है।

वर्तमान में, मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है।

धारा 375 के अपवाद खंड को चुनौती देने का समर्थन करने वाले कारणों के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया इस लेख को देखें

भारत में वैवाहिक बलात्कार के लिए सुझावात्मक प्रावधान: लेखक की राय

प्रकृति में महिला-केंद्रित कानून बनाने से निश्चित रूप से समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा; उदाहरण के लिए, महिलाएं इसे अपने पतियों को ब्लैकमेल करने के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकती हैं, या ऐसी परिस्थितियों में निर्दोषता का सबूत बहुत मुश्किल होगा। इससे तलाक की दर में भी वृद्धि हो सकती है, जो विवाह की पवित्र संस्था को परेशान करेगी। इसके अलावा, यह भारत के संविधान, 1949 के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के मौलिक अधिकार का भी स्पष्ट उल्लंघन होगा।

इसलिए, लेखक के विश्लेषण के अनुसार, वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण और इसके लिए सजा के लिए कोई कानून या अलग प्रावधान बनाते समय नीचे उल्लिखित कुछ बिंदुओं को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।

  • लिंग-तटस्थ- यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भविष्य में वैवाहिक बलात्कार की इस बुराई को खत्म करने के लिए कानून, यदि कोई हो, बनाए जाएं; उन्हें लिंग-तटस्थ बनाया जाना चाहिए।
  • आरोपों को साबित करने या अभियुक्त को बेगुनाही साबित करने से संबंधित साक्ष्य- यह महत्वपूर्ण है कि कानून कुछ मानदंड प्रदान करे कि वैवाहिक बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए क्या आवश्यक होगा या अभियुक्त अपनी बेगुनाही कैसे साबित करेगा।
  • व्यक्तिगत कानूनों को ध्यान में रखते हुए- अब तक, हमारे देश ने समान नागरिक संहिता लागू नहीं की है, हमारे पास अभी भी विवाह, भरण-पोषण, उत्तराधिकार आदि को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानून हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि जो भी कानून बनाए जाएं, वे यह सुनिश्चित करने के बाद बनाए जाएं कि वे व्यक्तिगत कानूनों का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं।
  • तलाक और भरण-पोषण के लिए अलग प्रावधान- तैयार किए गए कानूनों में पति-पत्नी के बीच समानता बनाए रखने के लिए तलाक और भरण-पोषण के लिए अलग प्रावधान होना चाहिए।
  • झूठे आरोपों के लिए महिलाओं को सजा- तैयार अधिनियम में उन महिलाओं को दंडित करने के लिए आवश्यक रूप से विशेष प्रावधान होने चाहिए जो कानून का दुरुपयोग कर रही हैं और झूठे आरोप लगा रही हैं।
  • भरण-पोषण- वैवाहिक बलात्कार के अपराध का शिकार होने पर यदि पत्नी अपने लिए कमाने में सक्षम नहीं है तो उसके लिए भरण-पोषण का एक अलग प्रावधान होना चाहिए।
  • बच्चे की अभिरक्षा के लिए प्रावधान- अगर पति-पत्नी अलग-अलग रहना चाहते हैं तो बच्चे की अभिरक्षा कैसे तय की जाएगी और बच्चे की अभिरक्षा हस्तांतरित करने की प्रक्रिया के बारे में अलग-अलग प्रावधान होने चाहिए।
  • विशेष अदालतें- ऐसे महत्वपूर्ण मामलों में त्वरित सुनवाई और न्याय देने के लिए एक विशेष अदालत होनी चाहिए।
  • पूछताछ के लिए विशिष्ट अवधि- ऐसे विशेष प्रावधान होने चाहिए जो सीमित समय में जांच पूरी करने के लिए एक विशिष्ट समय निर्धारित करें।

जीवनसाथी को ‘नहीं’ कहने का अधिकार है, शादी जबरदस्ती यौन संबंध बनाने का लाइसेंस नहीं है। वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की तत्काल आवश्यकता है। मौजूदा और निरस्त कानूनों से यह स्पष्ट है कि, प्राचीन काल से, वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार के खिलाफ किसी भी कानूनी प्रतिबंध से बाहर रखा गया है। 1600 ई. में सर मैथ्यू हेल ने कहा कि, किसी भी विवाह में, कोई भी यौन कार्य सहमति से होता है, क्योंकि विवाह का कार्य या पत्नी की इच्छा स्वयं संभोग के लिए महिलाओं की सहमति को दर्शाती है। उन्होंने आगे कहा कि शादी के बाद दी गई सहमति अपरिवर्तनीय है। यह विचारधारा केवल उनके द्वारा प्रतिपादित नहीं थी; यह उचित था और पूरी दुनिया में इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया गया। हालाँकि, समय के साथ, वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के संबंध में सुधार हुए हैं। वर्तमान में, दुनिया के केवल 36 देशों ने वैवाहिक बलात्कार के अपराध को अपराध घोषित नहीं किया है, जिसमें भारत भी शामिल है।

बलात्कार के मामलों में अग्रिम जमानत

बलात्कार के अपराध के मामले में, चाहे वह पॉक्सो अधिनियम या सीआरपीसी के तहत हो, अभियुक्त को अग्रिम जमानत देने पर ऐसी कोई पूर्ण रोक नहीं है। आइए विभिन्न मामलों के माध्यम से भारत की अदालतों के परिप्रेक्ष्य को समझें जिनमें अभियुक्त ने बलात्कार के मामलों में अग्रिम जमानत मांगी है।

दीपक प्रकाश सिंह @ दीपक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2023)

वर्तमान मामले में, अभियुक्त के खिलाफ आईपीसी की धारा 354, 376, पॉक्सो अधिनियम की धारा 7/8 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(VA), के तहत थाना जाफराबाद, जिला जौनपुर में एफआईआर दर्ज करायी गयी थी। अभियुक्त ने सत्र न्यायालय, जौनपुर के समक्ष अग्रिम जमानत देने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके अलावा, उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने के खिलाफ याचिका दायर की। पेशे से शिक्षक अभियुक्त पर करीब 14 साल की नाबालिग लड़की से दुष्कर्म का आरोप था। सबसे बुरी बात यह थी कि लड़की मानसिक रूप से विक्षिप्त थी। राज्य की ओर से दलील दी गई कि अग्रिम जमानत देने का आवेदन विचारणीय नहीं है, क्योंकि अभियुक्त के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी अपराध दर्ज किया जाता है और एससी/एसटी अधिनियम के अपराधों के तहत अग्रिम जमानत देने का कोई प्रावधान नहीं है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि जब किसी व्यक्ति पर एससी/एसटी अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम के तहत आरोप लगाया जाता है, तो पॉक्सो अधिनियम के तहत एक विशेष अदालत को जमानत याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार होगा। इसलिए, न्यायालय ने वर्तमान अग्रिम जमानत आवेदन की स्थिरता पर राज्य की आपत्ति को खारिज कर दिया।

हालाँकि, अदालत ने उस स्थिति पर जोर दिया जो एक शिक्षक समाज में रखता है, और आगे, वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उसने टिप्पणी की कि “हमारे समाज में एक शिक्षक अपने छात्रों के भविष्य को आकार देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और शिक्षक के इस तरह के आचरण से निश्चित रूप से समाज में लोगों के मन में डर का माहौल पैदा होगा, और ऐसे अपराधियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कानून की अदालतों से उचित सजा मिलनी चाहिए। ”

मामले के तथ्यों और परिस्थितियों और अभियुक्त के खिलाफ आरोपों की गंभीरता और प्रकृति, चिकित्सीय रिपोर्ट और सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत बयानों पर उचित विचार करने के बाद, उच्च न्यायालय ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देने या अपनी विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करने के लिए कोई मामला नहीं बनता है।

XXXX बनाम केरल राज्य (2023)

वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 452, 354, 354A(1)(i), 354B, 376(2)(f), 376(2)(I), और धारा 376(2)(n) और विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 92(B) के तहत कथित अपराध के लिए मामला दर्ज किया गया है। 

यह आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता गैरकानूनी रूप से पीड़िता के आवास में प्रवेश करता था और मार्च 2022 और अक्टूबर 2022 के बीच उसके साथ बार-बार बलात्कार करता था। अभियुक्त ने अग्रिम जमानत के लिए सत्र न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की; हालाँकि, इसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद वह अग्रिम जमानत की मांग करते हुए केरल उच्च न्यायालय में चले गए।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि घटना के समय वह केवल 18 साल का था। इसके अलावा, उनके वकील ने यह भी कहा कि पीड़िता द्वारा देर से एफआईआर दर्ज कराने का तथ्य संदिग्ध है। पीड़िता के साथ पहली बार मार्च में बलात्कार हुआ था; हालाँकि, एफआईआर अक्टूबर में दर्ज की गई थी। साथ ही, यह भी कहा गया कि चूंकि अभियुक्त की चिकित्सीय जांच हो चुकी है, इसलिए उसे अब हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है।

केरल उच्च न्यायालय की एर्नाकुलम पीठ ने कहा कि केवल इसलिए कि अपराध के समय अभियुक्त 18 वर्ष का था, उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने कहा कि अपराध की प्रकृति की गंभीरता को देखते हुए केवल यह तथ्य अग्रिम जमानत देने का आधार नहीं बन सकता। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि याचिकाकर्ता और पीड़ित पड़ोसी घरों में रहते हैं और पीड़ित, जिसे विकलांग बताया गया है, उसने स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता की पहचान अपराध करने वाले के रूप में की है, अदालत ने अभियुक्त को जमानत देने की अपनी शक्ति का प्रयोग करने से इनकार कर दिया।

XXXX बनाम केरल राज्य (2023)

वर्तमान मामले में, अभियुक्त पीड़िता जो नाबालिग थी, का सौतेला पिता था। अग्रिम जमानत की मांग के लिए यह अर्जी पीड़िता की मां (दूसरी अभियुक्त) ने दायर की थी। सौतेले पिता और मां के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (2)(n), 376(3), पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 को 3(a) सहपठित, 6, को धारा 5 (l) (m) और (p), 11 (i) (ii) और (iv)  के साथ पढ़ें धारा 12 और 16 के साथ पठित 17 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 75 के साथ पठित के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पीड़िता की मां पर बलात्कार और यौन उत्पीड़न के अपराध को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी. गोपीनाथ ने अभियुक्त मां की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अगर मां पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि हो गई तो यह मातृत्व का अपमान होगा। आगे यह देखा गया कि चूंकि आवेदक की मां को पीड़िता की जैविक मां के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, इसलिए वह अपने सौतेले पिता और उसकी मां दोनों के पक्ष में साक्ष्य प्रदान करने के लिए नाबालिग बच्चे को संभावित रूप से प्रभावित या डरा सकती है।

सहमति की उम्र कम करना

देश के प्रचलित कानूनों के अनुसार, सहमति की उम्र 18 वर्ष है। पॉक्सो अधिनियम लागू होने से पहले सहमति की उम्र 16 साल थी। यह उपरोक्त अधिनियम था जिसने सहमति की आयु 16 से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी। सहमति की उम्र, यानी, वह उम्र जिस पर कोई कानूनी तौर पर यौन गतिविधियों के लिए सहमति दे सकता है, बहुत महत्वपूर्ण है, इसका कारण यह है कि यह मूल रूप से शामिल रिश्ते की समझ को आकार देता है। इस प्रकार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ यौन संबंध, भले ही सहमति से बनाया गया हो, एक दंडनीय अपराध है (जैसा कि उपरोक्त पैराग्राफ में चर्चा की गई है)।

पॉक्सो अधिनियम, 2012, नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिससे बच्चों के खिलाफ ऐसे अपराध करने के दोषी पाए गए किसी भी व्यक्ति पर उपरोक्त अधिनियम के अनुसार सख्त दंड लगाया जा सके। पॉक्सो अधिनियम की धारा 2(d) के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति ‘बच्चा’ है। इस प्रकार, किसी भी यौन गतिविधि के लिए बच्चे द्वारा दी गई सहमति अप्रासंगिक मानी जाती है, और किशोरों से जुड़ी या उनके बीच सहमति से की गई यौन गतिविधि को बलात्कार के बराबर माना जाता है।

हालाँकि, हाल के वर्षों में, विधायिका द्वारा प्रदान की गई सहमति की आयु कम करने के बारे में बहस चल रही है। इसके पीछे मुख्य कारण 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग में यौन अपराध के मामलों में अधिक वृद्धि है। कई विशेषज्ञों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि इस वृद्धि के पीछे का कारण मुख्य रूप से यह तथ्य है कि 18 वर्ष की आयु बहुत अधिक है और यह कानून किशोर संबंधों की जटिलताओं पर विचार करने में विफल है। ज्यादातर मामले किसी लड़के के साथ यौन संबंध बनाने वाली लड़की के परिवार वाले सिर्फ उसे सजा दिलाने के लिए दर्ज करा रहे हैं। यहां तक कि भारत की अदालतों ने भी सहमति की उम्र कम करने की आवश्यकता व्यक्त की है और विधायिका से समाज के वर्तमान परिदृश्य के अनुसार सहमति की उम्र पर पुनर्विचार और संशोधन करने को कहा है। हाल ही में, बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति भारती डांगरे ने कहा कि अब समय आ गया है कि विधायिका वैश्विक परिदृश्य पर ध्यान दे और पॉक्सो अधिनियम के तहत सहमति की उम्र पर पुनर्विचार करे।

पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज अधिकांश मामलों में यह पाया गया है कि पीड़िता नहीं, बल्कि ऐसे रोमांटिक रिश्तों में शामिल लड़की के परिवार वाले अभियुक्त के खिलाफ मामला दर्ज कराते हैं। अक्सर, लड़की द्वारा यह तथ्य कबूल करने के बाद भी कि उसने अपनी सहमति दी थी, अभियुक्त को केवल पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रदान की गई उम्र की बाधा के कारण दोषी ठहराया जाता है।

अधिक पढ़ने के लिए, “पॉक्सो अधिनियम के तहत सहमति की आयु” पर यह लेख देखें।

महीन अली बनाम केरल राज्य (2023)

वर्तमान मामले  में, आवेदक पर भारतीय दंड संहिता की धारा 342, 354, 363, और 376(2)(n) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(l), 6, 7, और 8 के तहत मामला दर्ज किया गया था। वर्तमान मामले में आवेदक (लगभग 18 वर्ष की आयु) पीड़िता (लगभग 17 वर्ष की आयु) के साथ लगभग दो वर्षों से रिश्ते में थे। पीड़िता और अभियुक्त इंस्टाग्राम पर मिले थे और एक-दूसरे के साथ रोमांटिक रिश्ते में थे। अभियोजन पक्ष की कहानी को अनुसार, यह कहा गया था कि अभियुक्त ने लड़की का अपहरण कर लिया और फिर उसके साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाए। हालाँकि, अदालत ने पीड़िता के बयानों और अन्य सबूतों पर उचित विचार करने के बाद पाया कि लड़की स्वेच्छा से अभियुक्त के साथ उसके दोस्त के घर गई थी।

केरल उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर उचित विचार करने के बाद, लगभग 18 वर्ष की आयु के अभियुक्त को अग्रिम जमानत दे दी, इस तथ्य के कारण कि पीड़िता और अभियुक्त एक-दूसरे के साथ सहमति से रिश्ते में थे।

प्रोभत पुरकैत @ प्रोभत बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2023)

वर्तमान मामले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों के खिलाफ सभी मामले रद्द कर दिए, जिन पर आईपीसी की धारा 363 और 366 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। निचली अदालत ने अभियुक्त को उपरोक्त धाराओं के तहत दोषी ठहराया था, जिसके खिलाफ आवेदक ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। अदालत ने सभी सबूतों और बयानों पर विचार किया और अदालत ने पाया कि लड़की और अभियुक्त दोनों आपसी सहमति से रिश्ते में थे।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि “पीड़िता ने हमारे सामने कहा कि वह और उसका पति एक ग्रामीण इलाके से हैं और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि उनका रिश्ता और शादी एक अपराध है। सहमति से किए गए और गैर-शोषणकारी यौन कार्यों को बलात्कार और (गंभीर) प्रवेशन यौन हमले के बराबर करके, कानून किशोरों की शारीरिक अखंडता और गरिमा को कमजोर करता है। जबकि प्रत्यक्ष उद्देश्य 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को यौन शोषण से बचाना हो सकता है, कानून का अनपेक्षित प्रभाव सहमति से संबंधों में युवाओं की स्वतंत्रता से वंचित करना रहा है। पॉक्सो अधिनियम 18 वर्ष से कम उम्र के सभी व्यक्तियों को उनकी बढ़ती कामुकता, विकसित होती क्षमता और उनके सर्वोत्तम हितों पर इस तरह के अपराधीकरण के प्रभाव पर विचार किए बिना एक साथ रखता है।

विधि आयोग की 283वीं रिपोर्ट

भारत के विधि आयोग ने अपनी 283वीं रिपोर्ट में सहमति की आयु 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने के लिए विभिन्न न्यायालयों द्वारा की गई टिप्पणियों को अस्वीकार कर दिया था। आयोग को भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए विचारों के बाद सहमति की आयु कम करने के उपरोक्त विषय पर अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था। अदालतों द्वारा कहा गया था कि लगभग 16 वर्ष और उससे अधिक उम्र की नाबालिग लड़कियों से संबंधित मामलों में वृद्धि के कारण सहमति की उम्र पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हालाँकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि झूठे बलात्कार के आरोपों या 16-18 वर्ष के आयु समूहों के बीच सहमति से यौन संबंधों के मामलों में वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए पॉक्सो अधिनियम में निश्चित रूप से कुछ आवश्यक संशोधनों की आवश्यकता है।

सहमति की उम्र कम न करने के लिए विधि आयोग द्वारा दिए गए कारणों में से एक यह संभावना थी कि इसके परिणामस्वरूप बाल विवाह में वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “सहमति की उम्र में कोई भी कमी माता-पिता को नाबालिग लड़कियों की शादी करने का अवसर प्रदान करके बाल विवाह के खिलाफ सदियों पुरानी लड़ाई पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी। पीसीएमए सहमति की उम्र और नाबालिग के साथ यौन संबंधों पर चुप है, पॉक्सो अधिनियम इस कमी को पूरा करता है। खासकर आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को 2017 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पढ़े जाने के बाद। संसद पहले से ही लड़कियों की शादी की उम्र लड़कों के बराबर 21 साल तक बढ़ाने पर विचार कर रही है, औरइस प्रकार सहमति की उम्र में कोई भी कमी तर्कसंगत परिवर्तन की धारा के विरुद्ध होगी।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2011 में पॉक्सो विधेयक पेश होने के बाद संसद में हुई चर्चा और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों से यह बिल्कुल स्पष्ट था कि कानून को सख्ती से लागू किया जाएगा और बच्चे की सहमति महत्वहीन है और इसकी कोई भूमिका नहीं है, सहमति के पीछे चाहे जो भी कारण हो। रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि पीड़िता की सहमति उस स्थिति में निरर्थक है जब वह एक बच्ची है।

गौरतलब है कि विधि आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर), पूर्व न्यायाधीशों, वकीलों, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संगठनों और क्षेत्र के अकादमिक विशेषज्ञों से परामर्श के बाद प्रस्तुत की है। आयोग ने उच्च न्यायालयों (पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों से संबंधित लंबित और न्यायनिर्णित मामले) और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से आवश्यक डेटा का भी अनुरोध किया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस मामले से जुड़ी कई दलीलें और मौजूदा स्थितियों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है और उन पर समुचित विचार करने के बाद ही अपनी रिपोर्ट में यह बताया है कि पॉक्सो अधिनियम के तहत सहमति की उम्र से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पॉक्सो अधिनियम बाल तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति की बुराइयों से निपटने में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है। उपरोक्त अधिनियम के तहत “बच्चे” की परिभाषा में परिवर्तन या संशोधन संभावित रूप से इसकी प्रभावशीलता को कम कर सकता है।

अंत में, रिपोर्ट में कहा गया कि पॉक्सो अधिनियम कभी भी नाबालिगों के बीच सहमति से बनाए गए रोमांटिक संबंधों को दंडित करने के लिए नहीं बनाया गया था। हालाँकि, यह दृढ़ता से बताया गया था कि यह तथ्य कि नाबालिगों के बीच रोमांटिक रिश्ते मौजूद हैं, अधिनियम के तहत प्रदान की गई सुरक्षा को कम करके बच्चों को संभावित रूप से शोषण के लिए उजागर करने का एकमात्र कारण नहीं हो सकता है। अधिनियम के सख्त प्रावधान हजारों बच्चों को बाल तस्करी और अन्य संबंधित अमानवीय अपराधों से बचाने के लिए थे, और उम्र कम करने से अपराधियों के लिए नाबालिगों से सहमति का बचाव करके खुलेआम निर्दोष बच्चों का शोषण करने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।

महत्वपूर्ण मामले

दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य (2013)

वर्तमान मामले में, अपीलकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अपील दायर की, जिसकी पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पुष्टि की, जिसमें अपीलकर्ता को धारा 365 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया था। इस मामले में पीड़िता एक लड़की है वह 19 साल की थी और अपीलकर्ता उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करने के इरादे से उससे संपर्क करता था। एक दिन, अभियुक्त ने उससे शादी करने के लिए कहा और फिर उसे अपने मूल स्थान से दूर ले गया, जहां, कुरुक्षेत्र के रास्ते में, उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ बलात्कार किया।

इस मामले में, सबसे पहले, सहमति के बिना संभोग शब्द के अर्थ की व्याख्या तथ्य की गलत धारणा के तहत दी गई सहमति को शामिल करने के लिए की गई थी। सीधे शब्दों में कहें तो सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति तथ्यों की गलत धारणा के तहत किसी महिला से सहमति लेता है और फिर उसके साथ यौन संबंध बनाता है, तो ऐसा कार्य बलात्कार माना जाएगा। उसका मानना था कि तथ्यों की तत्काल प्रासंगिकता होनी चाहिए। जहां तक इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का सवाल है, यह माना गया कि लड़की से शादी करने के झूठे वादे के तहत प्राप्त सहमति तथ्यों की गलत धारणा के तहत दी गई सहमति है। न्यायालय ने अभियुक्त द्वारा बेईमानी से वादा पूरा न करने और कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण वादे के साधारण उल्लंघन के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

गौरतलब है कि मौजूदा मामले में अभियुक्त की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया था।

निपुण सक्सैना एवं अन्य बनाम भारत संघ (2019)

वर्तमान मामले में, मामले के तथ्य यह थे कि अभियुक्त ने एक महिला के साथ बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर दी। फिर उन्हें बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड दिया गया। इसके बाद यह खबर मीडिया तक पहुंच गई और उन्होंने पीड़िता की पहचान छिपाए बिना इसे प्रकाशित कर दिया।

इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दे इस प्रकार थे;

  1. अदालतों को किस प्रकार पीड़ित की पहचान की रक्षा करनी चाहिए?
  2. किन परिस्थितियों में पीड़ित की पहचान उजागर की जा सकती है?
  3. क्या ऐसी परिस्थितियाँ पॉक्सो अधिनियम पर भी लागू होती हैं?
  4. रिपोर्टिंग और जांच के दौरान बलात्कार पीड़ितों को होने वाली कठिनाइयों को कम करने के लिए क्या सुरक्षात्मक उपाय किए जा सकते हैं?

उपरोक्त मुद्दों का जवाब देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ दिशानिर्देश तैयार किये, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है।

  1. पीड़िता की पहचान किसी भी तरह से आम जनता के सामने उजागर नहीं की जाएगी।
  2. ऐसे मामलों में जहां पीड़िता स्वस्थ दिमाग की नहीं है, नाबालिग है या मृत है, ऐसी परिस्थितियों में, उसके अभिभावक से किसी भी प्रकार की अनुमति लेने के बाद भी पीड़िता की पहचान का खुलासा नहीं किया जाना चाहिए।
  3. इनमें से किसी भी धारा के तहत दर्ज की गई एफआईआर, अर्थात् आईपीसी की धारा 376, 376A, 376AB, 376B, 376C, 376D, 376DA, 376 DB या 376E और पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध, सार्वजनिक डोमेन में प्रकट नहीं की जाएगी।
  4. यदि अभियुक्त द्वारा सीआरपीसी की धारा 372 के तहत अपील दायर की जाती है, तो पीड़ित की पहचान का खुलासा करना आवश्यक नहीं है।
  5. पीड़ित की पहचान से संबंधित दस्तावेज़ और अन्य सभी प्रासंगिक दस्तावेज़ पुलिस अधिकारियों द्वारा सीलबंद लिफाफे में रखे जाने चाहिए।
  6. जांच एजेंसी या अदालत से पीड़ित का नाम प्राप्त करने वाला प्रत्येक प्राधिकारी पीड़ित के नाम और पहचान की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बाध्य है। उन्हें किसी भी तरह से इसका खुलासा नहीं करना चाहिए, सिवाय एक रिपोर्ट के, जिसे विशेष रूप से सीलबंद लिफाफे में जांच एजेंसी या अदालत को भेजा जाना चाहिए।
  7. पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों के मामलों में, पीड़ित की पहचान का खुलासा केवल विशेष अदालत द्वारा ही किया जा सकता है, और केवल तभी जब ऐसा खुलासा बच्चे के हित में हो।
  8. आईपीसी की धारा 228 A(2)(C) के तहत मृतक या मानसिक रूप से अस्थिर पीड़ित की पहचान का खुलासा करने की अनुमति देने के लिए अभिभावकों या किसी अन्य करीबी रिश्तेदार का अनुरोध विशेष रूप से संबंधित सत्र न्यायाधीश को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। ऐसा तब तक होना चाहिए जब तक कि सरकार, धारा 228A(1) के तहत, उपयुक्त सामाजिक कल्याण संस्थानों या संगठनों की पहचान के लिए इस मामले में दिए गए निर्देशों के अनुसार कुछ मानदंड या दिशानिर्देश स्थापित नहीं कर देती।

नफे सिंह बनाम हरियाणा राज्य (1971)

वर्तमान मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अपरिहार्य घटनाओं के सामने बलात्कार के मामलों में पीड़िता द्वारा इस्तीफा देना और कोई प्रतिरोध न करना, इसे कम करने वाली परिस्थिति नहीं माना जाएगा। वर्तमान मामले में, अभियुक्त को आईपीसी की धारा 366 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया और 7 साल की अवधि (कठोर कारावास) के लिए जेल भेज दिया गया।

बिलकिस बानो मामला

वर्तमान मामला 2 मार्च 2002 के दिन घटी एक भयावह घटना से संबंधित है, जब गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों के दौरान गुजरात के दाहोद जिले में 21 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। लगभग 6 वर्षों की लंबी लड़ाई के बाद, सभी अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 149  इसके अलावा, उन्हें महाराष्ट्र के सत्र न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस मामले के 11 दोषियों की यही सजा बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बरकरार रखी थी।

करीब 15 साल बीतने के बाद एक दोषी ने अपनी सजा माफ करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हालाँकि, इसके लिए याचिका को गुजरात उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इसका कारण क्षेत्राधिकार की कमी थी। अदालत ने कहा कि इसका अधिकार क्षेत्र महाराष्ट्र सरकार के पास है। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया, जहां यह माना गया कि सजा माफ करने की शक्ति और अधिकार क्षेत्र गुजरात सरकार के पास है, भले ही मामला किसी भी कारण से निर्णय के लिए दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया हो।

प्रचलित छूट नीति के अनुसार जो उनकी सजा के दौरान सक्रिय थी, बिलकिस बानो मामले के दोषियों को वर्ष 2022 में गुजरात राज्य सरकार द्वारा मुक्त कर दिया गया था। इस फैसले से सार्वजनिक आक्रोश और प्रदर्शनों की लहर फैल गई। इसके परिणामस्वरूप गुजरात सरकार द्वारा दोषियों की शीघ्र रिहाई को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कई याचिकाएँ दायर की गईं।

फिलहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर फैसला सुना दिया है और फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया है।

मामले और उससे संबंधित घटनाओं का व्यापक विश्लेषण पढ़ने और प्राप्त करने के लिए, इस लेख को देखें- बिलकिस बानो मामला

निष्कर्ष

निष्कर्ष में, यह स्पष्ट है कि सहमति के अभाव या धोखाधड़ी, धोखे या डर से प्राप्त सहमति  में संभोग बलात्कार के समान है। बलात्कार और अन्य बलात्कार विरोधी कानूनों के लिए अभियुक्तों को दंडित करने वाले कई दंडात्मक कानून होने के बावजूद, हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली अभी भी इस मुद्दे को ठीक से संबोधित करने में विफल रही है और इस बर्बरता का शिकार होने वाले पीड़ितों को सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करने में पूरी तरह से विफल रही है। कुछ विवादित मुद्दे, जैसे वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण, लिंग तटस्थ कानून इत्यादि, अभी भी विधायिका द्वारा उचित रूप से संबोधित नहीं किए गए हैं। वर्तमान कानूनों में अस्पष्टता के कारण न्यायालयों के निर्णय भी स्पष्टतः अस्पष्ट एवं असंगत प्रतीत होते हैं। वर्तमान में, हमारे देश के वास्तविक बलात्कार कानून उन विभिन्न मुद्दों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हैं, जिनका सामना करना पड़ रहा है, जैसे कि बलात्कार के अपराध में पति या पत्नी को दोषी ठहराना, बलात्कार कानूनों की लिंग तटस्थता, झूठे बलात्कार के मामले दर्ज करने वाली महिलाओं के लिए सजा आदि। बलात्कार कानूनों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है जो इस अस्पष्टता को दूर करे और इस बुराई को रोकने के लिए सख्त दंड के साथ-साथ कुछ निश्चितता लाए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या सामूहिक बलात्कार को बढ़ावा देने वाली महिला पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 D के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है?

हाँ, सुनीता पांडे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य(2023), के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि एक महिला जो किसी भी तरह से सामूहिक बलात्कार के जघन्य अपराध को अंजाम देने में मदद कर रही है, उस पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (धारा 376 D) में दिए गए सामूहिक बलात्कार के प्रावधान के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।

क्या यदि अभियुक्त पीड़िता से शादी कर लेता है तो क्या पॉक्सो अधिनियम के अपराधों के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप रद्द कर दिए जाएंगे?

रणजीत कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2023) के मामले में, उपरोक्त मुद्दा हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय के समक्ष आया, और इसे उसी अदालत की एक बड़ी पीठ को भेजा गया है। इस प्रकार, वर्तमान में, यह मुद्दा निर्णयाधीन है।

यदि अभियुक्त पर एससी एसटी अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम दोनों के तहत आरोप है तो क्या अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य है?

दीपक प्रकाश सिंह उर्फ दीपक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य (2023) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि यदि किसी अभियुक्त पर पॉक्सो अधिनियम के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, (एससी/एसटी अधिनियम) के तहत मामला दर्ज किया गया है या आरोप लगाया गया है तो एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान पॉक्सो अधिनियम पर लागू होंगे, और इसलिए, अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका कानून की नजर में स्वीकार्य होगी।

पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत आने वाले मामलों में नाबालिग की उम्र की व्याख्या करते समय किस पद्धति पर विचार किया जा सकता है?

जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2013) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम के अपराधों से जुड़े मामलों में, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) नियम, 2007 में प्रदान की गई प्रक्रिया और कानून का पालन किया जाना है।

संदर्भ

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत क्षेत्राधिकार

यह लेख लॉसिखो से कंज्यूमर लिटिगेशन में सर्टिफिकेट कोर्स कर रही Kriti Saxena द्वारा लिखा गया है। लेख को Prashant Baviskar (एसोसिएट, लॉसिखो) और Smriti Katiyar (एसोसिएट, लॉसिखो) द्वारा संपादित किया गया है। इस लेख मे उपभोक्ता, उपभोक्ता अदालत, उपभोक्ता निवारण मंच के बारे मे चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है। 

परिचय

कोई भी व्यक्ति जो स्वयं उपभोग के लिए कुछ वस्तुओं या सेवाओं का उपयोग करता है, उपभोक्ता है। “उपभोक्ताओं” में ऐसा कोई भी शामिल नहीं है, जो मुफ्त में सामान या सेवा का लाभ उठाता है, वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए खरीदारी करता है, या कोई ऐसा व्यक्ति जो सेवा के अनुबंध के तहत नियोक्ता के रूप में सेवा का लाभ उठाता है। विकासशील प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों और आपूर्ति के विभिन्न स्रोतों के साथ, उपभोक्ता ई-कॉमर्स और डिजिटलीकरण पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। लगातार बढ़ती माँगों और विकल्पों ने धोखाधड़ी, अनुचित व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ताओं के लिए सेवाओं की कमी के द्वार खोल दिए हैं। इस प्रकार, उपभोक्ताओं को ऐसे कार्यों से बचाने के लिए, सरकार द्वारा कुछ कानून बनाए गए थे। इनमें से, निर्दोष उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण अधिनियम “उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986” है। इस अधिनियम में ई-कॉमर्स से संबंधित लेनदेन शामिल नहीं थे, लेकिन इन प्लेटफार्मों की वृद्धि के कारण, नया अधिनियम  उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019  तैयार किया गया जो 20 जुलाई, 2020 को लागू हुआ। 

नए अधिनियम की धारा 10 केंद्र सरकार को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) को शामिल करने का अधिकार प्रदान करती है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी, अनुचित व्यापार प्रथाओं, भ्रामक विज्ञापनों और एक उपभोक्ता के रूप में उनके अधिकारों के उल्लंघन से बचाना है। सीसीपीए किसी उपभोक्ता की शिकायत का संज्ञान (कॉग्निजेंस) या तो स्वयं यानी स्वत: संज्ञान ले सकता है, या केंद्र सरकार द्वारा निर्देशित होने पर या सीसीपीए उपभोक्ता द्वारा शिकायत प्राप्त होने पर ले सकता है। 

नया अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि उपभोक्ताओं की बात सुनी जाए और उनकी शिकायतों का उचित मंच पर उचित समाधान किया जाए। उपभोक्ता या तो स्वयं या कानूनी प्रतिनिधि के माध्यम से शिकायत दर्ज कर सकता है। 

उपभोक्ता अदालतें क्या हैं?

यद्यपि उपभोक्ता व्यापार और वाणिज्य के मुख्य चालक हैं। उपभोक्ता के साथ धोखाधड़ी कोई नई बात नहीं है। ऐसे अन्य कानून और अधिनियम हैं जो निर्दोष उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करते हैं जैसे, भारतीय अनुबंध अधिनियम, माल की बिक्री अधिनियम, सिविल प्रक्रिया संहिता,आदि। हालाँकि, उनका निष्पादन उचित तरीके से नहीं किया जाता है जिससे ग्राहक शिकायत दर्ज करने में झिझकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986, इस आशय की सरकार की ओर से एक अद्भुत उपलब्धि थी। यह अधिनियम उपभोक्ताओं के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए पारित किया गया था। अधिनियम विशेष रूप से उपभोक्ताओं द्वारा दायर मुकदमों से निपटने के लिए उपभोक्ता न्यायालयों के रूप में जाने जाने वाले वैधानिक निकायों के गठन का निर्देश देता है। उचित निवारण चाहने वाले उपभोक्ता पर खर्च, समय और बोझ को कम करने के लिए, इस अधिनियम के तहत यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इस उद्देश्य के लिए, उपभोक्ता अदालतें तीन स्तरों यानी जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की जाती हैं। 

कानून व्यापारियों या विक्रेताओं के बेईमान कार्यों के खिलाफ उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने और शिक्षित करने के लिए परिषदों की स्थापना का प्रावधान करता है। 

अनुचित व्यापार प्रथाएं, प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाएं और अनुचित अनुबंध, व्यापारी द्वारा अधिक कीमत वसूलना, जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक सामान मानकों का पालन किए बिना बेचा जाना आदि मामलों में अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज की जा सकती है। 

उपभोक्ता निवारण मंच

क्षेत्राधिकार

बदलते परिवेश के अनुकूल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने 1986 के अधिनियम को प्रतिस्थापित कर दिया। नए अधिनियम के दायरे में ई-कॉमर्स लेनदेन भी शामिल है। अधिनियम ने शिकायतकर्ता की परिभाषा को भी संशोधित किया है ताकि शिकायतकर्ता के नाबालिग होने की स्थिति में माता-पिता या कानूनी अभिभावक को इसमें शामिल किया जा सके। 

उपभोक्ता निवारण मंचों के संबंध में भी 2019 अधिनियम द्वारा कुछ महत्वपूर्ण संशोधन लाए गए हैं। ये निम्नलिखित हैं:- 

  1. प्रादेशिक क्षेत्राधिकार – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 अब यह प्रदान करता है कि उपभोक्ता अपनी शिकायतें ऐसे स्थान पर दर्ज कर सकते हैं जहां सभी या एक विरोधी पक्ष रहता है या व्यवसाय करता है, या कार्रवाई के कारण का स्थान है या जहां शिकायतकर्ता रहता है या 1986 के अधिनियम के विपरीत लाभ के लिए काम करता है (जिसमें शिकायतकर्ता द्वारा केवल प्रतिवादी के निवास स्थान या व्यवसाय स्थान पर शिकायत दर्ज करना अनिवार्य था), इस प्रकार प्रादेशिक क्षेत्राधिकार का दायरा बढ़ गया। इसके पीछे अंतिम उद्देश्य उपभोक्ताओं को व्यवसायों के खिलाफ निवारण की मांग करने में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं को दूर करना है। 

शिकायतें आर्थिक क्षेत्राधिकार की सीमा के आधार पर उचित मंचों पर दर्ज की जाती हैं।

2. आर्थिक क्षेत्राधिकार – 2019 के अधिनियम द्वारा क्रमशः सभी मंचों यानी जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोगों के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन लाए गए हैं:

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 34 के अनुसार जिला आयोग के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार की ऊपरी सीमा 20,00,000 रुपये से बढ़ाकर 100,00,000 रुपये कर दी गई है।  
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 47 के अनुसार राज्य आयोग के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार की सीमा 100,00,000 रुपये से बढ़ाकर 10,00,00,000 रुपये कर दी गई है। 
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 58 के अनुसार राष्ट्रीय आयोग के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार की सीमा 10,00,00,000 रुपये से बढ़ाकर 10,00,00,000 रुपये से अधिक कर दी गई है।

इन संशोधनों ने आर्थिक क्षेत्राधिकार के दायरे को काफी हद तक बढ़ा दिया है। उपर्युक्त परिवर्तनों के साथ, 2019 अधिनियम ने प्रतिफल (कंसीडरेशन) के रूप में देय वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यांकन के आधार पर आर्थिक क्षेत्राधिकार के निर्धारण के साधनों को भी बदल दिया है,1986 के अधिनियम के विपरीत, जहां आर्थिक क्षेत्राधिकार वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य के साथ-साथ मांगे गए मुआवजे से निर्धारित होता था, इसलिए शिकायत को राज्य या राष्ट्रीय आयोग के आर्थिक अधिकार क्षेत्र में लाने के लिए दावा की गई मुआवज़े की राशि में वृद्धि नहीं की जाएगी। 

शिकायत का मूल्य निर्धारित करने के लिए, वस्तुओं या सेवाओं का कुल मूल्य और शिकायतकर्ता द्वारा दावा किया गया मुआवजा देखना होगा। यह “मैसर्स प्यारीदेवी छविराज स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम नेशनल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड” के मामले में आयोजित किया गया था। 

  1. वैकल्पिक विवाद समाधान- 2019 अधिनियम द्वारा शामिल एक अन्य महत्वपूर्ण निवारण तंत्र, मध्यस्थता के रूप में वैकल्पिक विवाद समाधान है। यह विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है और यह कम खर्चीला है। 2019 अधिनियम के अनुसार, शिकायत स्वीकार होने के बाद या पहली सुनवाई में या विवाद हल होने से पहले किसी भी समय शिकायत को मध्यस्थता (मिडिएशन) के लिए भेजा जा सकता है। मंच 5 दिनों के भीतर दोनों पक्षों की लिखित सहमति से मामले को मध्यस्थता के लिए भेज देगा। 

इस आशय के लिए, नए अधिनियम में प्रत्येक जिले और राज्य में संबंधित राज्य सरकार द्वारा एक उपभोक्ता मध्यस्थता सेल की स्थापना के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आयोग की स्थापना है और मंचों से जुड़ा होना शामिल है। 

यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। 

2. ई-शिकायतें– 2019 अधिनियम में इलेक्ट्रॉनिक रूप से जिला मंचों के समक्ष शिकायतें दर्ज करना भी शामिल है। इससे संबंधित नियम अभी सरकार द्वारा निर्धारित नहीं किये गये हैं। ऐसा डिजिटलीकरण में वृद्धि से संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए किया गया था। 

संघटन

  1. जिला उपभोक्ता विवाद निवारण मंच

प्रत्येक जिला मंच (फोरम) में निम्नलिखित शामिल होंगे:

  • एक राष्ट्रपति जो जिला न्यायाधीश बनने के लिए योग्य है, या रह चुका हो, और 
  • दो अन्य सदस्य, जिनके पास योग्यता, निष्ठा और प्रतिष्ठा है और जिनके पास अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य आदि से संबंधित समस्याओं से निपटने का ज्ञान और अनुभव है और जिनमें से एक महिला होगी।

2. राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण मंच

प्रत्येक राज्य में स्थापित राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण मंच में निम्नलिखित शामिल होने चाहिए:

  • एक राष्ट्रपति, जो या वह व्यक्ति जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो और संबंधित राज्य की सरकार द्वारा नियुक्त किया गया हो। ये नियुक्तियाँ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद ही की जाती हैं, और 
  • दो अन्य सदस्यों में योग्यता, निष्ठा और प्रतिष्ठा है और उनके पास अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य, सार्वजनिक मामलों, प्रशासन आदि से संबंधित समस्याओं से निपटने का ज्ञान और अनुभव भी है और जिनमें से एक महिला होगी। जैसा कि उल्लेख किया गया है, ये नियुक्तियाँ अनिवार्य रूप से चयन समिति के परामर्श और सिफारिश के बाद ही की जाएंगी। जिसमे निम्नलिखित लोग होगे: 
  • राज्य आयोग के अध्यक्ष,
  • राज्य के विधि विभाग के सचिव
  • संबंधित राज्य में उपभोक्ता मामलों से संबंधित विभाग के   प्रभारी सचिव।

3. राष्ट्र उपभोक्ता विवाद निवारण मंच

राज्य उपभोक्ता मंच के अलावा और ऊपर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण मंच है। अधिनियम के अनुसार, मंच में निम्नलिखित शामिल होंगे:

  • केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राष्ट्रपति, जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका होता है और ये नियुक्तियाँ अनिवार्य रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती हैं।
  • चार अन्य सदस्यों में योग्यता, निष्ठा और प्रतिष्ठा है और उनके पास अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य, सार्वजनिक मामलों, प्रशासन आदि से संबंधित समस्याओं से निपटने का ज्ञान और अनुभव भी है और जिनमें से एक महिला होगी। 

अधिनियम में प्रावधान है कि ये नियुक्तियाँ केंद्र सरकार द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जानी चाहिए। जिसमे निम्नलिखित लोग होगे:

  1. एक व्यक्ति जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, उसे भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किया जाता है।
  2. भारत सरकार में कानूनी मामलों के विभाग में सचिव।
  3. भारत सरकार में उपभोक्ता मामले देखने वाले विभाग के सचिव। 

निष्कर्ष

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने वाला कानून है। यह अधिनियम देश भर की उपभोक्ता अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित उपभोक्ता शिकायतों को हल करने के लिए महत्वपूर्ण था। इसके पास उपभोक्ता शिकायतों को तेजी से हल करने के तरीके और साधन हैं। 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं के विवादों के समय पर और प्रभावी प्रशासन और निपटान के लिए प्राधिकरणों की स्थापना करके उपभोक्ताओं के अधिकारों को बचाना है। 

संदर्भ