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भारतीय श्रम कानून- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948

यह लेख लॉयड लॉ कॉलेज ग्रेटर नोएडा में बीए एलएलबी के 5वें वर्ष की छात्रा Shubhangi Sharma और इक्फाई विश्वविद्यालय, देहरादून की छात्रा Anushka Ojha के द्वारा लिखा गया है। यह लेख न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 और उनके महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में चर्चा करता है। इसका अनुवाद Pradyumn singh के द्वारा किया गया है।  

परिचय

भारत में औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947, कर्मकार मुआवजा अधिनियम,1923, बोनस भुगतान अधिनियम,1965, मजदूरी भुगतान अधिनियम,1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम,1948, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 आदि अधिनियम श्रम कानूनों में शामिल हैं। श्रम कानून भारतीय संविधान में समवर्ती सूची  के अधीन है।। केंद्र और राज्य सरकार दोनों के पास इस विषय पर कानून बनाने की शक्ति है लेकिन कुछ मामले केवल केंद्र सरकार तक ही सीमित हैं। ये कानून रोजगार के अवसर पैदा करने और उच्च उत्पादन और उत्पादकता के लिए एक स्वस्थ कार्य वातावरण स्थापित करने के लिए समाज के गरीब, शोषित और वंचित वर्ग सहित श्रमिकों की सुरक्षा और लाभ के लिए बनाए गए हैं। सरकार का ध्यान कल्याणकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने और संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने पर है। इसलिए, इन उद्देश्यों को श्रम कानून बनाकर प्राप्त किया जा सकता है जो श्रमिकों की सेवा, वेतन, मुआवजा, रोजगार के नियमों और विनियमों को नियंत्रित करता है। केंद्र और राज्य सरकार दोनों के अपने अलग-अलग श्रम मंत्रालय हैं जो केंद्रीय और राज्य श्रम कानूनों द्वारा शासित होते हैं जो उनके अधीनस्थ निकायों के कामकाज को सुनिश्चित करते हैं।

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948

इतिहास

न्यूनतम मजदूरी की अवधारणा प्रारंभ में उद्योगों में श्रमिकों के पारिश्रमिक (रैम्यूनरेशन) के संदर्भ में विकसित हुई, जहां मजदूरी का स्तर अन्य उद्योगों में समान प्रकार के श्रमिकों की मजदूरी की तुलना में बहुत कम था। मजदूरी के मामले में राज्य के हस्तक्षेप से पहले, मजदूरी से संबंधित निर्णय श्रमिकों और मालिकों के बीच मुफ्त सौदेबाजी द्वारा लिया जाता था। लेकिन जब इन मामलों की जांच हुई तो पता चला कि लघु उद्योगों में महिलाओं और बच्चों का शोषण होता है। इसलिए, इस प्रकार के अनाचार से बचने के लिए विभिन्न कानून पेश किए गए। वर्ष 1943 में, स्थायी श्रम समिति और भारतीय श्रम सम्मेलन ने श्रमिकों की कामकाजी परिस्थितियों और न्यूनतम मजदूरी से संबंधित मामलों की जांच के लिए एक श्रम जांच समिति का गठन किया। घोष और नंदन स्थायी श्रम समिति के द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट, भारत की न्यूनतम मजदूरी नीति को लागू करने का आधार बनी।

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 मजदूरों के कामकाजी अधिकारों से संबंधित भारत का पहला कानून था। अधिनियम में विस्तृत प्रक्रियाएं शामिल हैं जो विभिन्न उद्योगों में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने और सूचीबद्ध करने के लिए निर्धारित की गई है। भारत में अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक विशिष्ट समय अवधि के लिए विभिन्न राज्यों में कुशल और अकुशल श्रम, कृषि और गैर-कृषि रोजगार और न्यूनतम मजदूरी के आधार पर विभिन्न अनुसूचित रोजगार के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर उपयुक्त सरकारों द्वारा मजदूरी तय की गई थी। अतः न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का उद्देश्य श्रमिक वर्ग को अधिक अधिकार प्रदान करना था।

उचित मजदूरी पर त्रिपक्षीय समिति 1948 में नियुक्त आयोग ने तीन अलग-अलग प्रकार की मजदूरी को परिभाषित किया: एक जीवित मजदूरी, उचित मजदूरी और न्यूनतम मजदूरी। जीवित मजदूरी को एक व्यक्ति को अपने और अपने परिवार के लिए एक सभ्य जीवन जीने की इजाजत देने के रूप में परिभाषित किया गया था और अन्य कारक उचित मजदूरी के बराबर उत्पादकता पर आधारित होना चाहिए। समिति ने स्वीकार किया कि सामान्य मजदूरी स्तर कम था और कहा कि कर्मचारी निर्वाह और सामान्य उत्पादकता के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। अंततः न्यूनतम मजदूरी न केवल जीवन निर्वाह के आधार पर बल्कि श्रम दक्षता के आधार पर भी थी। अधिनियम का उद्देश्य श्रमिकों को श्रम शोषण से बचाना था जो कि चंद्र भवन बोर्डिंग और लॉजिंग बैंगलोर बनाम मैसूर राज्य और अन्य मामले में न्यायालय द्वारा बोला गया था। श्रमिकों को प्रतिनिधित्व और शीघ्र मुआवजा प्रदान करके शोषण से सुरक्षा प्राप्त की जानी थी। असमान सौदेबाजी को कम करने के लिए श्रमिकों और मालिकों को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए एक सलाहकार समिति और सलाहकार बोर्ड का प्रावधान था। इस प्रकार, अधिनियम ने एक सारांश प्रक्रिया के माध्यम से श्रम विवादों का शीघ्र समाधान प्रदान किया जो दंड और फिर उल्लंघन करने वाले पक्ष के खिलाफ नागरिक मुकदमा सुनिश्चित करेगा। 

उद्देश्य

श्रमिकों के लाभ के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम पारित किया गया है। यह कुछ रोजगारों में न्यूनतम मजदूरी प्रदान करके प्रतिस्पर्धी बाजार में श्रमिकों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए अस्तित्व में आया। यह केंद्र और राज्य सरकार को मजदूरों या वंचित वर्ग के श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए कुछ रोजगारों में न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार देता है। इसके उद्देश्य है-

  1. अनुसूचित रोजगार में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना।
  2. सरकार को मजदूरी निर्धारण के संबंध में कदम उठाने और हर पांच साल में उन्हें संशोधित करने का अधिकार देता है।
  3. श्रमिकों का शोषण रोकना।
  4. मालिकों और श्रमिकों दोनों के प्रतिनिधियों की समान संख्या वाले सलाहकार समिति और बोर्डों की नियुक्ति प्रदान करना।
  5. इस कानून को संगठित क्षेत्र के बहुसंख्यक लोगों पर लागू करना।

अधिनियम का प्रयोज्यता (एप्लीकेशन) 

यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर को छोड़कर संपूर्ण भारत पर लागू होता है। यह उन क्षेत्रों पर लागू होता है जिनमें संबंधित क्षेत्र में 1000 कर्मचारी कार्यरत हैं। यह केंद्र सरकार की सहमति के बिना उन कर्मचारियों पर लागू नहीं होता है जो केंद्र सरकार या संघीय रेलवे के अधीन है। 

अधिनियम की मुख्य विशेषताएं

 अधिनियम इसका निर्धारण प्रदान करता है:

  1. मजदूरी की न्यूनतम समय दर
  2. न्यूनतम हिस्सा दर
  3. वयस्कों, किशोरों, बच्चों और प्रशिक्षुओं के लिए विभिन्न व्यवसायों या कार्य की श्रेणी के लिए ओवरटाइम दर

अधिनियम के तहत न्यूनतम मजदूरी में शामिल हो सकते हैं:

  1. मजदूरी एवं जीवन निर्वाह भत्ते की मूल दर।
  2. जीवन यापन भत्ते की लागत के साथ या उसके बिना मजदूरी की मूल दर।

अधिनियम में मजदूरी का नकद भुगतान करने की आवश्यकता है, लेकिन यह सरकार को विशेष मामलों में पूर्ण या आंशिक रूप से न्यूनतम मजदूरी के भुगतान को मंजूरी देने का अधिकार भी देता है। यह उपयुक्त सरकार को प्रतिदिन काम के घंटों की संख्या तय करने, साप्ताहिक अवकाश प्रदान करने और किसी भी अनुसूचित रोजगार के संबंध में ओवरटाइम का भुगतान करने का अधिकार देता है, जिसके संबंध में न्यूनतम मजदूरी दर का निर्धारण अधिनियम के तहत किया जाता है।

यह न्यूनतम मजदूरी दर से कम मजदूरी या आराम के दिनों के पारिश्रमिक या ओवरटाइम के ऐसे दिनों में किए गए काम से उत्पन्न होने वाले मुद्दों को सुनने और निर्णय लेने के लिए निरीक्षकों और सक्षम अधिकारियों की नियुक्ति भी प्रदान करता है। यह अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए की गई शिकायतों से निपटने और इस अधिनियम के तहत किए गए अपराधों के लिए दंड में सुधार करने का भी प्रावधान करता है।

मजदूरी की न्यूनतम दरें तय करना

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम,1948 की धारा 3 यह निर्धारित करता है कि उपयुक्त सरकार को अधिनियम में निर्धारित तरीके से न्यूनतम मजदूरी दर तय करने का अधिकार होगा। यह उस मजदूरी को तय करेगा जो अनुसूची के भाग I और भाग II के तहत रोजगार में नियोजित कर्मचारियों को भुगतान किया जाना है।

उपयुक्त सरकार के पास मजदूरी की न्यूनतम दरों की समीक्षा करने आदि और आवश्यक हो तो ऐसे अंतरालों पर, जो उचित समझे जाएं, न्यूनतम दर तय करने और संशोधित करने का अधिकार होगा। 5 वर्ष से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए। उपधारा (1-a) वर्णन करता है कि उपयुक्त सरकार किसी भी अनुसूचित रोजगार के संबंध में मजदूरी की न्यूनतम दरें तय करने से परहेज कर सकती है, जिस रोजगार में एक हजार से कम कर्मचारी शामिल हैं।

मजदूरी की न्यूनतम दरें

धारा 4 कहती है कि धारा 3 में संशोधित किसी भी न्यूनतम मजदूरी दर में सरकार द्वारा अनुसूचित (स्केड्यूल) रोजगार के संबंध में निम्नलिखित बिंदु शामिल हो सकते है: 

  • मजदूरी की मूल दर और एक विशेष भत्ते को ऐसे अंतरालों में समायोजित किया जाएगा जो उपयुक्त सरकार द्वारा निर्देशित किया जा सकता है जो जीवन निर्वाह सूचकांक की लागत के साथ बदलता रहता है।
  • जीवन निर्वाह लागत सूचकांक संख्या के आधार पर जीवन निर्वाह भत्ते की लागत के साथ या उसके बिना मजदूरी की मूल दर।
  • सभी समावेशी दरें जीवन यापन भत्ते की लागत और सामग्रियों की रियायती आपूर्ति के नकद मूल्य के साथ मजदूरी की मूल दर की अनुमति दे रही हैं।

न्यूनतम मजदूरी तय करने और संशोधित करने की प्रक्रिया

धारा 5, किसी भी अनुसूचित रोजगार के संबंध में मजदूरी की न्यूनतम दरों को तय करने और संशोधित करने या निर्धारित मजदूरी की न्यूनतम दरों को संशोधित करने की प्रक्रिया से संबंधित है, उपयुक्त सरकार या तो:

  1. ऐसे निर्धारण और संशोधन के संबंध में जांच करने और सलाह देने के लिए जितनी जरूरत हो उतनी समितियां और उप समितियां नियुक्त करें। 
  2. आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इससे प्रभावित होने की संभावना वाले व्यक्ति की जानकारी के लिए अपना प्रस्ताव प्रकाशित करें और वह तारीख जारी करें जो अधिसूचना की तारीख से दो महीने से कम नहीं होनी चाहिए, उस प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा।

सलाहकार बोर्ड

उपयुक्त सरकार धारा 7 के अनुसार निम्नलिखित उद्देश्य के लिए एक सलाहकार बोर्ड नियुक्त कर सकती है

  1. धारा 5 के अंतर्गत नियुक्त समितियों एवं उप-समितियों के कार्यों का समन्वय (कोआर्डिनेशन) करना और,
  2. न्यूनतम मजदूरी दरों के निर्धारण और संशोधन के मामले में उपयुक्त सरकार को सलाह देना।

अधिनियम के धारा 5 के अनुसार सलाहकार बोर्ड अपने कार्यों के निर्वहन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार कर सकता है। 

केंद्रीय सलाहकार बोर्ड

धारा 8 केंद्र सरकार के लिए निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए एक केंद्रीय सलाहकार बोर्ड नियुक्त करना अनिवार्य बनाता है:

  1. अधिनियम के तहत न्यूनतम मजदूरी दरों के निर्धारण और संशोधन और अन्य मामलों में केंद्र और राज्य सरकार को सलाह देना, और
  2. सलाहकार बोर्डों के काम का समन्वय करने के लिए।

धारा 8(2) में प्रावधान है कि केंद्रीय सलाहकार बोर्ड में शामिल होंगे:

  1. अनुसूचित रोजगार में नियोक्ताओं और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्र सरकार द्वारा नामित किए जाने वाले व्यक्ति, जिनकी संख्या बराबर होगी; और
  2. स्वतंत्र सदस्य इसकी कुल सदस्यों की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होंगे।

केंद्रीय बोर्ड का अध्यक्ष स्वतंत्र व्यक्तियों में से एक होगा और उसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

समितियों की संरचना

धारा 9 मे प्रावधान है कि ऐसी समितियों, उप समितियों और सलाहकार बोर्ड में उपयुक्त सरकार द्वारा नामित व्यक्ति शामिल होंगे। इन समितियों में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति अनुसूचित रोजगार में मालिक और कर्मचारियों के प्रतिनिधि होंगे और संख्या में बराबर होंगे। स्वतंत्र व्यक्तियों की संख्या ऐसे निकायों में कुल सदस्यों की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए। उपयुक्त सरकार ऐसे स्वतंत्र व्यक्तियों में से एक को अध्यक्ष नियुक्त करेगी। इस धारा में स्वतंत्र व्यक्ति की अभिव्यक्ति का अर्थ उन लोगों के अलावा कोई अन्य व्यक्ति है जो अनुसूचित रोजगार के संबंध में मालिक और कर्मचारी हैं, जिसके संबंध में न्यूनतम मजदूरी तय करने की मांग की गई है।

इस तथ्य के कारण कि समिति के स्वतंत्र सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए नामित व्यक्ति एक सरकारी अधिकारी है, ऐसे नामांकन पर कोई रोक नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी नौकरी में कार्यरत व्यक्तियों को बाहर रखा जाएगा। धारा 9 उपयुक्त सरकार को दी जाने वाली सलाह तैयार करने में उच्च सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति, जिनके पास मालिकों और कर्मचारियों की समस्याओं के बारे में वास्तविक कामकाजी ज्ञान हो सकता है, काफी मार्गदर्शन और सहायता प्रदान कर सकती है। रोजगार आयुक्त, जो रोजगार की स्थितियों से परिचित है और स्वतंत्र हित का प्रतिनिधित्व करते है, को अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति करना वैध है।

न्यूनतम मजदूरी दरों का भुगतान

धारा 12 किसी भी अनुसूचित रोजगार के संबंध में जिसके लिए धारा 5 में अधिसूचना निर्धारित की गई है, नियोक्ता अपने अधीन अनुसूचित रोजगार में लगे प्रत्येक कर्मचारी को, उस रोजगार में कर्मचारियों को उसके द्वारा निर्धारित मजदूरी की न्यूनतम दर से कम दर पर मजदूरी का भुगतान करेगा। उस रोजगार में कर्मचारियों के उस वर्ग के लिए बिना कटौती के अधिसूचना के सिवाय ऐसे समय के भीतर और ऐसी शर्तों के अधीन अधिकृत किया जा सकता है, जो निर्धारित की जा सकती हैं। इस अधिनियम की धारा 12 के प्रावधान  वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 के प्रावधानों को किसी तरह से प्रभावित नहीं करने चाहिए। 

सामान्य कामकाजी दिन के घंटे तय करना, आदि

धारा 13(1) बशर्ते कि किसी भी अनुसूचित रोजगार के संबंध में मजदूरी की न्यूनतम दरें इस अधिनियम के तहत तय की गई हैं,  उपयुक्त सरकार निम्नलिखित प्रावधान कर सकती है:

  1. काम के घंटों की संख्या तय करें जो एक या अधिक उचित अंतरालों सहित, एक सामान्य कार्य दिवस का गठन करेगा।
  2. सात दिनों की प्रत्येक अवधि में आराम के दिन का प्रावधान करें जो सभी कर्मचारियों या कर्मचारियों के किसी निश्चित वर्ग को दिया जाएगा और उसे आराम के दिन के संबंध में पारिश्रमिक का भुगतान किया जाएगा।
  3. सुनिश्चित करें कि आराम के दिन काम का भुगतान ओवरटाइम आराम से कम नहीं होना चाहिए।

धारा 13(2), के अनुसार उपधारा (1) के प्रावधान, निम्नलिखित कर्मचारी वर्गों के संबंध में केवल उस सीमा और विषय पर लागू होंगे जो संबंधित अधिनियम में निर्धारित किया जा सकता है:

  1. अति आवश्यक कार्य या किसी भी कार्य में लगे कर्मचारी, या ऐसे आपातकाल स्थिति जिसकी न तो कल्पना की जा सकती थी और न ही उसे रोका जा सकता था।
  2. कर्मचारी प्रारंभिक या पूरक कार्य की प्रकृति के काम में लगे हुए हैं उन्हें आवश्यक रूप से संबंधित रोजगार में सामान्य कामकाज के लिए निर्धारित सीमा के बाहर किया जाना चाहिए।
  3. कर्मचारी जिनका रोजगार अनिवार्य रूप से रुक-रुक कर होता है।
  4. ऐसे काम में लगे हुए कर्मचारी जो प्राकृतिक शक्तियों की अनियमित कार्रवाई पर निर्भर रहने के अलावा किसी अन्य समय तक नहीं किया जा सकता है।
  5. किसी ऐसे कार्य में संलग्न कर्मचारी जिसे तकनीकी कारणों से ड्यूटी से पहले पूरा करना हो।

रजिस्टर एवं अभिलेखों (रिकॉर्ड) का रखरखाव

प्रत्येक मालिक को निम्नलिखित विषयों के संबंध में रजिस्टर रखना होगा:

  1. प्रत्येक मालिक को ऐसे रजिस्टर और रिकॉर्ड बनाए रखना होगा, जिसमें मालिकों द्वारा नियोजित कर्मचारियों का विवरण शामिल होगा।
  2. कर्मचारियों द्वारा किए गए कार्य को अद्यतन (अपडेट) करें।
  3. कर्मचारियों को वेतन भुगतान 
  4. मालिकों द्वारा दी गई रसीदें बनाए रखें।
  5. प्रत्येक मालिकों को ऐसे कारखाने, कार्यशाला या स्थान पर नोटिस प्रदर्शित करना चाहिए जिसका उपयोग कर्मचारियों को काम देने के लिए किया जाता है।
  6. उपयुक्त सरकार अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार किसी भी अनुसूचित रोजगार में नियोजित कर्मचारियों को वेतन पुस्तिकाएं या वेतन पर्ची जारी करने का प्रावधान कर सकती है।

दावा

धारा 20(1) के अनुसार उपयुक्त सरकार को, आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी निर्धारित क्षेत्र के लिए निम्नलिखित दावों को सुनने और निर्णय लेने के लिए नियुक्त करने का अधिकार देता है:

  1.  भुगतान से सम्बन्धित कोई भी दावा, जो मजदूरी की न्यूनतम दरों से कम हो
  2. विश्राम के दिनों के पारिश्रमिक के भुगतान के संबंध में दावा।
  3. धारा 13(1) के खंड (b) या (c) के तहत आराम के दिनों में किए गए कार्य के पारिश्रमिक के भुगतान के संबंध में दावा किया जा सकता है। 
  4. ओवरटाइम दर के तहत मजदूरी का कोई भी दावा धारा 14 के तहत जो व्याख्या किया गया है, उसके अनुसार निर्णय किया जाएगा । 

प्राधिकारी (अथॉरिटी) के रूप में किसे नियुक्त किया जा सकता है?

उपरोक्त किसी भी दावे पर निर्णय लेने के लिए निम्नलिखित व्यक्तियों को प्राधिकारी नियुक्त किया जा सकता है:

  1. कोई भी आयुक्त।
  2. किसी भी क्षेत्र के लिए श्रम आयुक्त के रूप में कार्य करने वाला केंद्रीय सरकार का कोई भी अधिकारी।
  3. राज्य सरकार का कोई भी अधिकारी जो श्रम आयुक्त के पद से नीचे न हो।
  4. सिविल न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अनुभव वाला कोई अन्य अधिकारी।

दंड

धारा 22 के उपधारा (2) जुर्माने से संबंधित है जो उपधारा (2) के तहत  पिछली सरकार की मंजूरी या नोटिस के रूप मे निर्धारित प्राधिकारी के साथ नियोक्ता द्वारा उक्त कार्यों की चूक के संबंध में किसी भी नियोजित व्यक्ति पर नहीं लगाया जा सकता है। ऐसे कार्यों और चूकों को निर्दिष्ट (स्पेसिफाई) करने वाले नोटिस, ऐसे व्यक्ति के परिसर में जहां वो काम करते है ( जैसे फैक्ट्री में काम करने वाले ) या नियुक्त स्थान पर निश्चित तरीके से प्रदर्शित किए जा सकते है।  किसी नियोजित व्यक्ति के नियत स्थान या स्थानों के परिसर में तब तक जुर्माना नहीं लगाया जा सकता जब तक की वह जुर्माने का कारण न हो या जुर्माने लगाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किया जाए। 

किसी भी वेतन अवधि में किसी भी नियोजित व्यक्ति पर जुर्माने की कुल राशि उस वेतन अवधि के संबंध में उसे देय वेतन के 3% के बराबर राशि से अधिक नहीं होनी चाहिए। पंद्रह वर्ष से कम उम्र के किसी भी नौकरी पेशा व्यक्ति पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।

मनरेगा मजदूरी दर या न्यूनतम मजदूरी दर का टकराव

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम एक ऐसी योजना है जो प्रतिदिन 120 रुपये (2009 में निर्धारित) की मजदूरी दर पर 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है। ये लाभ कोई भी परिवार प्राप्त कर सकता है, चाहे वह राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे हो या ऊपर। केंद्र सरकार ने जनवरी 2009 में मनरेगा मजदूरी दरों को राज्य की सबसे कम न्यूनतम मजदूरी दरों से हटा दिया जब उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने संशोधित किया और अपनी न्यूनतम मजदूरी दरों में वृद्धि किया। इसका असर सीधे तौर पर केंद्र सरकार के बजट में मनरेगा योजना पर पड़ा। मनरेगा योजना को रोकने के कदम ने भारत के विभिन्न हिस्सों और वर्गों में संकट पैदा कर दिया क्योंकि इस कदम को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 को भंग करने वाला माना गया। मनरेगा मजदूरी दरें संबंधित राज्यों की न्यूनतम मजदूरी दरों से कम थी और वे पांच राज्यों में न्यूनतम वेतन के राष्ट्रीय स्तर से नीचे थी। 

भ्रष्टाचार, श्रमिकों के भुगतान, बुनियादी ढांचे की खराब गुणवत्ता, धन के अस्पष्ट स्रोत और गरीबी पर अनपेक्षित (अनइंटेनडेड) नकारात्मक प्रभाव के विवादों के साथ पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। जीन द्रेज की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद द्वारा की गई सिफारिशें के अनुसार, मनरेगा मजदूरी दरों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के साथ समन्वित (कॉर्डिनेटेड) किया जाना चाहिए, परन्तु केंद्र सरकार द्वारा इसे खारिज कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी केंद्र सरकार मनरेगा मजदूरी रोकने के अपने फैसले पर कायम रही। आखिरकार, प्रधान मंत्री सिफारिशों को स्वीकार करने और प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक विशेष समिति द्वारा संतोषजनक सूचकांक तैयार करने तक मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी दरों मे बदलने के लिए सहमत हुए। हालाँकि, उन्होंने राज्य-वार न्यूनतम दरों के संशोधन पर बजट में वृद्धि से बचने के लिए मनरेगा मजदूरी दरों और न्यूनतम मजदूरी दरों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखा।

अधिनियम की संवैधानिक वैधता

अधिनियम अनुचित नहीं है

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में से एक, भारत के संविधान का अनुच्छेद 43 में शामिल किया गया जो की श्रमिकों को जीवित मजदूरी देने की बात करता है, जो न केवल भौतिक निर्वाह सुनिश्चित करता है, बल्कि स्वास्थ्य और सार्वजनिक हित के लिए भी महत्वपूर्ण है। हालांकि यह सच है कि व्यक्तिगत मालिकों को अधिनियम के तहत निर्धारित न्यूनतम वेतन के आधार पर व्यवसाय करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह कानून को अनुचित घोषित करने का संपूर्ण आधार और कारण नहीं होना चाहिए।

शामराव बनाम बॉम्बे राज्य मामले में, गुल मुहम्मद तारासाहेब ने अपने मालिकों के साथ एक बीड़ी फैक्ट्री बनाई। न्यायालय द्वारा यह निर्णय लिया गया की हालांकि प्रतिबंध कुछ हद तक व्यापार या व्यवसाय की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत गारंटीकृत है, लेकिन वे उचित हैं और आम जनता के सामान्य हित पर लगाए जा रहे हैं, और अनुच्छेद 19 के खंड (6) की शर्तों द्वारा संरक्षित हैं। न्यूनतम वेतन का निर्धारण सार्वजनिक व्यवस्था के संरक्षण के लिए है, और यदि कोई न्यूनतम वेतन निर्धारित नहीं है, तो इससे मालिक मनमानी करेंगे और इससे निस्संदेह मालिक और श्रमिक के बीच टकराव होगा जो “समाज में तनाव ” पैदा करेगा।

उचिनॉय बनाम केरल राज्य के मामले में न्यायालय ने कहा कि,“न्यूनतम वेतन तय करने की प्रक्रिया के संबंध में, ‘समुचित सरकार’ को निस्संदेह बहुत बड़ी शक्तियां दी गई हैं, लेकिन उसे वेतन तय करने से पहले, आवेदन पर नियुक्त होने पर समिति की सलाह को ध्यान में रखना चाहिए। उन व्यक्तियों द्वारा दिए गए प्रस्तावों पर, जिन्हे  इससे प्रभावित होने की संभावना है, विभिन्न प्रावधान ‘उपयुक्त सरकार’ के किसी भी जल्दबाजी या मनमौजी फैसले के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। उपयुक्त मामलों में, ‘उचित सरकार’ को अधिनियम के प्रावधानों के संचालन से छूट देने की शक्ति भी दी गई है। निस्संदेह, उपयुक्त सरकार के निर्णय की आगे की समीक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन यह स्वयं अधिनियम के प्रावधानों को अनुचित नहीं बनाएगा।

संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता

अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत, सभी नागरिकों को व्यापार या व्यवसाय की स्वतंत्रता का अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार को कुछ प्रतिबंधों के अधीन किया जा सकता है, जब तक कि वे उचित और सामान्य हित में हों। धारा 3(3)(iv) के तहत, सरकार को समितियों और सलाहकार बोर्डों का गठन करने का अधिकार है। इन समितियों और बोर्डों को कानूनों और नियमों को लागू करने और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने के लिए अधिकृत किया जा सकता है। न्यायालयों ने माना है कि धारा 3(3)(iv), अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन नहीं करती है, क्योंकि यह उचित और सामान्य हित में है। यह निर्णय थाभिकुसा यामासा क्षत्रिय बनाम संगममार अकोला बीड़ी कामगार यूनियन मामले में लिया गया है। 

जैसा की सी.बी. बोर्डिंग एवं लॉजिंग के मामले में माना गया था, उसी मामले में आगे कहा गया कि, “न ही यह कारण है कि जानकारी एकत्र करने के लिए दो अलग-अलग प्रक्रियाएं प्रदान की गई हैं”

अलग-अलग क्षेत्रों के लिए न्यूनतम मजदूरी की अलग-अलग दरें तय करने की अधिसूचना भेदभावपूर्ण नहीं है

यह कहा गया था कि जहां मजदूरी दरों का निर्धारण और उनके संशोधन का पता विस्तृत सर्वेक्षण और जांच से लगाया गया था और मालिकों के एक वर्ग द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर विचार करने के बाद दरों को लागू किया गया था, उस अधिसूचना को तय के आधार पर रखना मुश्किल होगा। विभिन्न क्षेत्रों के लिए न्यूनतम मजदूरी की दरें अधिनियम के उद्देश्य के साथ तर्कसंगत विचार-विमर्श पर आधारित थीं और इस प्रकार अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया गया। 

यह मामला भारत के केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री श्री मल्लिकार्जुन द्वारा जानकारी में आया। राज्यों के बीच न्यूनतम मजदूरी में भिन्नता सामाजिक-आर्थिक और कृषि-जलवायु स्थितियों, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों, भुगतान क्षमता, उत्पादकता और मजदूरी दर को प्रभावित करने वाली स्थानीय स्थितियों में अंतर के कारण होती है। न्यूनतम मजदूरी में क्षेत्रीय असमानता इस तथ्य के कारण भी है कि केंद्र और राज्य सरकारें अधिनियम के तहत अपने संबंधित अधिकार क्षेत्र में अनुसूचित रोजगारों में न्यूनतम मजदूरी तय करने, संशोधित करने और लागू करने के लिए उपयुक्त सरकारें हैं।

उपरोक्त कथनों में कुछ भी न कहने के बावजूद, एन.एम.वाडिया चैरिटेबल अस्पताल बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में यह निर्णय लिया गया कि “संविधान और भारतीय श्रम कानूनों के तहत अलग-अलग इलाकों के लिए अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी तय करने की अनुमति है, इसलिए सवाल है कि क्या न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का कोई भी प्रावधान संविधान के प्रावधान के खिलाफ गलत है।”

भारत का संविधान एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाने की राज्य की जिम्मेदारी स्वीकार करता है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को रोजगार मिले और उसे “उचित वेतन” मिले। इससे उचित वेतन की पहचान के लिए स्पष्ट मानदंड निर्धारित करना आवश्यक हो गया। इसलिए, नवंबर 1948 के अपने पहले सत्र में, एक केंद्रीय सलाहकार परिषद ने एक त्रिपक्षीय समिति नियुक्त किया। इस समिति में नियोक्ता, कर्मचारी और सरकारी प्रतिनिधि शामिल थे। उनका काम श्रम के उचित वेतन के विषय पर पूछताछ करना और रिपोर्ट देना था।

अधिनियम की शुद्धता 

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने तीन फैसलों में यह स्पष्ट निर्णय दिया है कि न्यूनतम मजदूरी का भुगतान न करने पर “जबरन श्रम” होता है जो कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध है। ‘जबरन मजदूरी’ भूख और गरीबी, अभाव और विनाश जैसे कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है।

संजीत रॉय बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि ‘छूट अधिनियम जहां तक ​​​​की न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के उपयोग से बाहर रखा गया है। अकाल राहत कार्य में कार्यरत कर्मियों के लिए “स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 23 का उल्लंघन” है। इस प्रकार, न्यूनतम वेतन अधिनियम रोजगार प्रदान करने के एकमात्र उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक कार्य भी इसके अधीन हैं। 

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर विचार करने के बाद, आंध्र उच्च न्यायालय ने भारत सरकार की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जो प्रचलित राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के भुगतान को अनिवार्य बनाती है। यह केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद (सीईजीसी) के वेतन के कार्य समूह की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुश्री इंदिरा जयसिंह द्वारा प्रदान की गई एक कानूनी राय में उल्लिखित है, जहां उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि धारा 6(1) मनरेगा कार्यों में न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान की अनुमति देने से जबरन मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा। भारत के प्रतिष्ठित न्यायविदों और वकीलों ने भी भारत सरकार से अपनी असंवैधानिक अधिसूचना को तुरंत रद्द करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि भारत में सभी श्रमिकों को न्यूनतम वेतन का भुगतान किया जाए।

अधिनियम और निर्णय अनुच्छेद 14 के तहत प्रदान की गई समानता के पक्ष में हैं। संविधान और इंजीनियरिंग वर्कर्स यूनियन बनाम भारत संघ (1994) मामले में एक निर्णय “के तहत प्रावधान धारा 3(2)(a), कि निर्धारित रोजगार में निर्धारित या संशोधित मजदूरी की निश्चित दर उस अवधि के दौरान कर्मचारियों पर लागू नहीं होगी, जिन्होंने अनुच्छेद 14 के समानता खंड का उल्लंघन किया और  इसलिए यह धारा शून्य है।  “

भारत के संविधान का अनुच्छेद 43 के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं है कि मजदूरों को जीवन यापन योग्य वेतन मिलता है जो न केवल शारीरिक आवश्यकता सुनिश्चित करता है, बल्कि स्वास्थ्य और शालीनता भी बनाए रखता है। 

निष्कर्ष

भारत में 487 मिलियन कर्मचारी हैं, जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत में भेदभाव और बाल श्रम को रोकने के लिए कई श्रम कानून हैं। अधिनियम का उद्देश्य काम की निष्पक्ष और मानवीय स्थितियों की गारंटी देना, सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी, संगठित होने का अधिकार, ट्रेड यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी को लागू करना है। यह उन लोगों के शोषण की रक्षा करता है जो बहुसंख्यक गरीब हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित लोग हैं। इसलिए, यह आवश्यक लगता है कि ऐसे कानून न केवल कागज पर दिखाई दें बल्कि लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए शोषण से कुछ आश्वासन भी दें। सरकारें सामाजिक-आर्थिक कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य हैं, ऐसा न करना भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 उल्लंघन होगा। भारत को दुनिया में अत्यधिक नियमित और सबसे कठोर श्रम कानूनों वाला देश माना जाता है। उनके उचित कार्यान्वयन के लिए उन्हें लचीला होना चाहिए और समय-समय पर श्रम की आवश्यकता और अर्थव्यवस्था की गतिशीलता के अनुसार समीक्षा की जानी चाहिए।

औद्योगिक संबंध और श्रम कानून

यह लेख Nimisha Dublish द्वारा लिखा गया है। यह लेख औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) संबंधों और श्रम कानूनों के बीच विश्लेषण और संबंध पर चर्चा करता है। लेख का उद्देश्य औद्योगिक संबंधों और श्रम कानूनों की समझ और कुशल कार्यान्वयन (एक्सिक्यूशन) प्रदान करना है। लेख औद्योगीकरण और श्रम नीतियों के बदलते रुझानों का भी अवलोकन देता है। यह औद्योगिक क्षेत्र के इतिहास और वर्तमान विकास को भी उजागर करता है। इस लेख का अनुवाद Chitrangda Sharma के द्वारा किया गया है।

परिचय

एक संगठन अपने दो मुख्य तत्वों, यानी, प्रौद्योगिकी और मानव संसाधन के संयुक्त प्रयासों से काम करता है। व्यापक वेतन रोज़गार का एक मूलभूत गुण है जो सभी औद्योगिक सभ्यताओं द्वारा साझा किया जाता है। भारत जैसे देश में, ऐसे कई लोग हैं जो मजदूरी रोजगार और बेहतर औद्योगिक मानकों की तलाश में हैं। 

लोगों को प्रबंधित करना और उन्हें अपने संगठन के लिए काम कराना बहुत कठिन है। वर्तमान में, कार्यस्थल पर जनशक्ति और लोगों का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती और किसी संगठन को स्वस्थ रूप से चलाने का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। कर्मचारी-नियोक्ता संबंधों का कुप्रबंधन अक्सर किसी संगठन में गलतफहमी और विषाक्त कार्य संस्कृति को जन्म देता है। जिसके परिणामस्वरूप श्रम कारोबार बढ़ता है, अनुशासनहीनता बढ़ती है, उत्पादन में गिरावट देखी जाती है और उत्पादन लागत में वृद्धि बाजार में कई अन्य समस्याओं से जुड़ी होती है। औद्योगिक संबंध, व्यापक अर्थ में, विभिन्न संघों, राज्यों, नियोक्ताओं और सरकार के बीच का संबंध है। औद्योगिक कानून और श्रम कानून मिलकर रोजगार कानून बनाते हैं। रोजगार कानून कानून का वह निकाय है जो कामकाजी लोगों और उनके संगठनों से संबंधित प्रशासनिक फैसलों और उदाहरणों को नियंत्रित करता है। श्रम कानून में औद्योगिक संबंध और संबंधित चीजें शामिल हैं। 

औद्योगिक न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस)

20वीं शताब्दी के विकास के दौरान न्यायशास्त्र की एक नई शाखा उभरने लगी जिसे ‘औद्योगिक न्यायशास्त्र’ कहा जाता है। औद्योगिक संबंधों में विकास औद्योगिक क्रांति के दौरान शुरू हुआ और स्वतंत्रता के बाद की अवधि में तेजी से बढ़ा हैं। बढ़ा हुआ श्रम और औद्योगिक कानून औद्योगिक न्यायशास्त्र की वृद्धि और विकास का प्रमाण है। न्यायपालिका ने औद्योगिक संबंधों के मामलों पर निर्णय लेने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न्यायशास्त्र ने मालिक-नौकर के विश्वास को औद्योगिक संबंधों में आकार और स्थानांतरित कर दिया है। किसी कर्मचारी को हटाने के लिए नियोक्ता की एकमात्र इच्छा पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी प्रक्रिया अब कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए कई शर्तों के अधीन है। इस अवधारणा में क्रांति देखी गई है कि जो पैसा लगाता है वह मालिक नहीं रहता और जो श्रम लगाता है वह नौकर नहीं रहता है। नियोक्ता कर्मचारी को काम पर रख सकता है लेकिन केवल अपनी इच्छा पर नौकरी से नहीं निकाल सकता है। कानूनों का उद्देश्य श्रमिकों और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। उद्योग अनुबंध से स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं और स्थिति का अर्थ है राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्यायिक स्थिति। 

स्वतंत्रता के बाद ही औद्योगिक न्यायशास्त्र ने अपना आकार लिया और श्रमिक वर्ग के प्रति सरकार का रवैया बदल दिया है। औद्योगिक न्यायशास्त्र विकसित और विकासशील देश के उद्योगों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें मानवीय संबंधों और कारखानों के बड़े पैमाने पर विकास से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का विस्तृत अध्ययन शामिल है। 1954 में आजादी के बाद से ही श्रम नीति लाने की जरूरत काफी महसूस की जा रही थी। यह नीति श्रमिकों की आत्मनिर्भरता पर केंद्रित होगी। दूसरी ओर, औद्योगिक क्रांति भी हो रही थी जिसके परिणामस्वरूप कारखाना प्रणाली का विकास हुआ और श्रम प्रणाली की परिस्थितियाँ अलग-अलग हुईं।  

औद्योगिक संबंध की परिभाषा 

औद्योगिक संबंध शब्द दो अलग-अलग शब्दों अर्थात उद्योग और संबंध से मिलकर बना है। औद्योगिक संबंध किसी संगठन के कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच होते हैं। उद्योग का अर्थ है कोई भी उत्पादक गतिविधि जिसमें व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह काम में लगा हुआ हो। आर्थिक अर्थ में, उद्योग उत्पादन को प्रभावित करने वाले बाजार का द्वितीयक क्षेत्र है, अर्थात भूमि, श्रम, पूंजी, उद्यम, आदमी, सामग्री, धन और मशीनें। संबंधों का अर्थ है उद्योग के भीतर नियोक्ता और श्रमिकों के बीच संबंध और बंधन। इसलिए, किसी संगठन के कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच के संबंध को औद्योगिक संबंध के रूप में जाना जाता है। ये संबंध किसी संगठन में प्रबंधन-व्यापार संघ संबंधों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम हैं। 

आम तौर पर, यह देखा जाता है कि किसी संगठन में, कुछ संबंध उत्पन्न होते हैं, इनमें श्रमिकों और उनके नियोक्ताओं, स्वयं कर्मचारियों और स्वयं नियोक्ताओं के बीच संबंध शामिल होते हैं। यह संबंध सभी स्तरों पर संगठन के स्वस्थ विकास और विस्तार को बढ़ाने और बढ़ावा देने के लिए बनाए गए हैं। कुछ ऐसे पक्ष हैं जो औद्योगिक संबंधों के तंत्र से जुड़े हुए हैं। वे पक्ष कर्मचारी, नियोक्ता, सरकार, नियोक्ता संघ, व्यापार संघ और अदालत और अधिकरण हैं। औद्योगिक संबंध इन सभी पक्षों के लिए स्थापित नियमों और शर्तों पर पेशेवर व्यवस्था के तहत एक-दूसरे के साथ बातचीत करने के माध्यम के रूप में कार्य करता है। 

कई लेखकों ने इस शब्द को उद्योग के प्रति अपने दृष्टिकोण और विचारों के अनुसार अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है। लेकिन एक बात जो सामान्य है वह यह है कि औद्योगिक संबंधों में कार्यस्थल पर सभी प्रकार के नियोक्ता-कर्मचारी संबंध शामिल होते हैं जो सरकार और अन्य आर्थिक और सामाजिक संस्थानों से प्रभावित होते हैं। 

वी. अग्निहोत्री के अनुसार, “औद्योगिक संबंध कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच संबंधों की व्याख्या करते हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघ-नियोक्ता संबंध से उत्पन्न होते हैं।” बेथेल के अनुसार, औद्योगिक संबंध किसी संगठन के कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच संबंधों का प्रबंधन है, जो उनके बीच संभावित बातचीत और गतिशीलता को ध्यान में रखता है। 

भारत में औद्योगिक संबंधों का विकास

औद्योगिक संबंध कैसे काम करते हैं और इसका महत्व क्या है, इसके वर्तमान परिदृश्य में जाने से पहले आइए ब्रिटिश शासन से पहले और स्वतंत्रता के बाद के परिदृश्य के साथ-साथ उभरते व्यापारिक परिदृश्य और भारत में औद्योगिक संबंधों की बदलती गतिशीलता को देखते और समझते हैं।

आज़ादी से पहले का युग

भारत स्वाभाविक रूप से एक कृषि भूमि था और अपने मध्यकालीन और प्राचीन काल के दौरान, इसकी अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी। नियोक्ता-कर्मचारी के बीच का संबंध स्वामी और दास या नौकर का था। भारत में गुलामी प्रथा का बोलबाला था। उस समय के शिल्पकारों और श्रमिकों ने संघ बनाये। उनका मानना था कि यदि मनुष्य एकजुट हो जाए तो उसे कोई रोक नहीं सकता हैं।  विदेशी आक्रमण के समय भारतीय हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट) को भारी क्षति पहुँची थी। इसके कारण, कई कारीगर भाग गए और दूर-दराज के गांवों में शरण ली थी। उनकी हालत सबसे खराब हो गई और वे अपना कौशल खोने लगे और एक कारीगर और एक दास के बीच कोई अंतर नहीं रह गया। यह मुगल काल के दौरान था जब स्थिति में सुधार हुआ था। अकबर के शासन के तहत, आगरा, लाहौर, फ़तेहपुर और अहमदाबाद में उद्योग स्थापित किए गए जहाँ श्रमिक अपने कारीगर कौशल को पुनः प्राप्त कर सकते थे। 

औपनिवेशिक काल के दौरान औद्योगिक संबंध अधिकतर स्वामी-सेवक संबंध थे। सरकार ने अहस्तक्षेप की नीतियां लागू कीं और बाद में उनके द्वारा अनुबंध के उल्लंघन के लिए जुर्माना लगाया था। प्रथम विश्व युद्ध का भारत पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। यह पहली बार था कि श्रमिकों ने अपनी क्षमता देखी और महसूस किया कि यदि वे युद्ध के लिए सामान का उत्पादन करने में सक्षम नहीं हैं, तो इसे सफलतापूर्वक नहीं लड़ा जा सकता है। अन्य घटनाएँ जैसे 1917 में रूसी क्रांति, 1919 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की स्थापना, ब्रिटिश उदार विचारों का प्रभाव, 1926 के भारतीय व्यापार संघ अधिनियम का गठन, 1929 के व्यापार विवाद अधिनियम आदि ने मदद की, औपनिवेशिक काल के दौरान औद्योगिक संबंधों की गति में तेजी थी। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोहरी कार्रवाई लागू की गई थी। सबसे पहले, वैधानिक नियम: यह सुनिश्चित करने के लिए कि युद्ध परिदृश्य के दौरान वस्तुओं और सेवाओं का निर्बाध प्रवाह और संचालन का मुक्त प्रवाह बना रहे, सरकार ने कुछ नियम लागू किए। इनमें से कुछ नियमों में औद्योगिक विवादों का अनिवार्य निर्णय शामिल था, और त्रिपक्षीय विचार-विमर्श प्रणाली ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को लागू करने में मदद की थी। 

दूसरे, युद्ध के दौरान एक त्रिपक्षीय परामर्श प्रणाली स्थापित की गई। इस परामर्शी प्रणाली में दो संगठन शामिल थे, भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) और स्थायी श्रम समिति (एसएलसी)। ये सलाहकार निकाय हैं और उन मामलों की चर्चा के लिए जिम्मेदार हैं जो श्रम संबंधों में अखिल भारतीय महत्व के हैं। इस त्रिपक्षीय प्रणाली द्वारा तीन प्रमुख कानून पारित किए गए अर्थात् न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952। 

आज़ादी के बाद का युग

औद्योगिक संबंध मानदंड और तंत्र औपनिवेशिक शासकों से विरासत में मिले थे। आजादी के दौर में नेताओं ने ऐसे मानक बनाने का वादा किया और संकल्प लिया, जिससे श्रमिक का गौरव और सम्मान बहाल हो सके। औद्योगिक नीति संकल्प 1956 में बनाया गया था और यह राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर सार्वजनिक उपक्रमों के विकास पर केंद्रित था। श्रमिकों को प्रबंधन और श्रमिक संबंधों के बारे में शिक्षित करने के लिए स्वैच्छिक योजनाओं का पालन किया गया था। सरकार द्वारा किए गए पूरे प्रयास के परिणामस्वरूप, 1969 में श्रम पर पहला राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया था। 

1975 में इंदिरा गांधी के समय लगे आपातकाल का औद्योगिक संबंधों पर भारी असर पड़ा था। फिर प्रधान मंत्री ने श्रमिकों की भागीदारी प्रदान करने के लिए संविधान में कुछ संशोधन किए और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में अध्याय 5B जोड़ा था। 1970 और 1980 के दशक के अंत में अभूतपूर्व न्यायिक सक्रियता देखी गई थी। औद्योगिक संबंधों पर जबरदस्त असर पड़ा था। 

औद्योगिक संबंधों की आवश्यकता एवं महत्व

पिछले कुछ दशकों में बहुत सारे बदलाव देखने को मिले हैं। इन परिवर्तनों ने हमें संगठन के भीतर औद्योगिक संबंधों पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित किया। वैश्वीकरण ने इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और किसी संगठन या उद्यम के प्रबंधन और कार्य करने के तरीके को बदल दिया है। किसी संगठन का प्रमुख लक्ष्य उत्पादकता और गुणवत्ता रहता है। 

प्रौद्योगिकी ने कार्यस्थल संबंधों पर भी ध्यान केंद्रित किया है क्योंकि प्रौद्योगिकी का प्रबंधन लोगों और प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। प्रौद्योगिकी ने विभिन्न पारंपरिक कुशल श्रमिकों की नौकरियों को बदल दिया है और इसे संचालित करने के लिए नए अर्जित कौशल की आवश्यकता होती है। 

आर्थिक प्रगति

देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए, औद्योगिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यस्थल पर शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए, इन संबंधों को व्यवस्थित करना महत्वपूर्ण है ताकि वे किसी संगठन की उत्पादकता में बाधा न डालें। एक संगठन में विविध लोग काम करते हैं और उनमें से कई लोगों को संगठन की जटिल संरचना में बसने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। एक कर्मचारी और नियोक्ता के बीच का रिश्ता किसी संगठन में सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों में से एक है क्योंकि वे सामूहिक रूप से उद्योग के विकास में योगदान करते हैं। स्वस्थ संबंध कर्मचारियों और नियोक्ताओं के साथ-साथ उद्योग के लिए भी फायदेमंद होते हैं।

निर्बाध उत्पादन

निर्बाध उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए स्वस्थ औद्योगिक संबंध बनाए रखना आवश्यक है। इस तरीके से संसाधनों का पूरा उपयोग किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अधिकतम संभव उत्पादन होता है। संगठन के सुचारू संचालन से आय का सहज प्रवाह होता है। 

औद्योगिक विवादों में कमी

यदि कोई उद्योग अपने औद्योगिक संबंध बनाए रखेगा तो इससे विवाद कम होंगे। विवाद उन विफलताओं की संख्या को दर्शाते हैं जो किसी संगठन ने उचित उद्योग संबंधों की कमी के कारण देखी हैं। औद्योगिक विवादों में कमी से उत्पादन बढ़ाने और संगठन के भीतर अधिक सामंजस्य बनाने में मदद मिलेगी। औद्योगिक संबंधों में प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों या मुद्दों को आपसी समझौते के माध्यम से हल करने की अंतर्निहित साधन होते है। दोनों पक्ष इन निर्णयों से बाध्य हैं। 

औद्योगिक लोकतंत्र कायम रखना 

सच्चे औद्योगिक लोकतंत्र को स्थापित करने और बनाए रखने के लिए, श्रम संबंधों का एक मुख्य उद्देश्य व्यवसाय के दौरान समाजवादी दृष्टिकोण को बनाए रखना है। समाजवादी दृष्टिकोण सामूहिक संसाधन स्वामित्व और केंद्रीकृत निर्णय लेने को बनाए रखना है। इसे शेयरधारक, प्रबंधन, श्रमिक, ग्राहक, समाज आदि होने दें। यह सुनिश्चित करता है कि हितधारकों के पास इसमें शामिल सभी पक्षों को लाभ पहुंचाने के लिए कंपनी की कार्रवाई को ढालने और आकार देने की आवाज है। 

सामूहिक सौदेबाजी (कलेक्टिव बार्गेनिंग)

किसी संगठन में सामूहिक सौदेबाजी की रणनीतियों को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाए जाते हैं। ऐसा करने से प्रबंधन और श्रमिकों के बीच संबंध संतुलित और अहानिकर (अनहार्मेड) बने रहते हैं। सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से ही कार्यकर्ता को स्व-नियमन के पहलू से परिचित कराया जाता है। इससे किसी कर्मचारी के लिए अपने सुझाव और अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है कि वे कैसे कार्य करेंगे। आम आदमी के शब्दों में, सामूहिक सौदेबाजी नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच बातचीत की एक प्रक्रिया है। सामान्य तौर पर, श्रमिकों या कर्मचारियों के हितों का प्रतिनिधित्व उन व्यापार संघों  द्वारा किया जाता है जिनसे संबंधित श्रमिक या कर्मचारी संबंधित होते हैं। इसके तहत श्रमिक और कर्मचारी औद्योगिक उत्पादकता की सुरक्षा और बढ़ावा देने के लिए समझौते और समझौते करते हैं। सामूहिक सौदेबाजी का मुख्य उद्देश्य कार्यस्थल में कर्मचारियों की चिंताओं का समाधान करना है। मुद्दों में मुआवजा, काम करने की स्थिति, काम का माहौल, लाभ, कंपनी की नीतियां और प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं। 

कर्मचारियों का अनुशासन एवं मनोबल बनाये रखना

अच्छे औद्योगिक संबंध कर्मचारियों के लिए किसी उद्योग की कार्यप्रणाली के साथ-साथ उसकी कार्यप्रणाली को समझना संभव बनाते हैं। कर्मचारी अच्छा प्रदर्शन करने की बेहतर स्थिति में होते हैं जब उन्हें पता होता है कि उनसे क्या अपेक्षा की जाती है और अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन करने से उन्हें क्या लाभ मिलेगा। एक अनुशासित कार्यबल संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमेशा बेहतर परिणाम और आउटपुट देने में सक्षम होगा। इसलिए, अच्छे औद्योगिक संबंधों से मनोबल बढ़ेगा और कार्यबल प्रेरित होगा। 

बर्बादी को कम और अनुकूलित किया गया

औद्योगिक संबंध बनाए रखने से प्रत्येक विभाग के लिए सहयोग और मान्यता से भरा वातावरण बनता है। इससे सामग्री, आदमी और उत्पादन लागत की बर्बादी कम हो जाती है। इससे संगठन का कामकाज कुशल होता है और लक्ष्यों को अधिक प्रभावी ढंग से और कुशलता से प्राप्त करने में मदद मिलती है। 

मानसिक क्रांति

संगठन का उद्देश्य श्रमिकों और कर्मचारियों के मन में संपूर्ण मानसिक क्रांति लाना है। अंततः, औद्योगिक शांति कर्मचारियों और श्रमिकों के परिवर्तित और अद्यतन दृष्टिकोण में निहित है। नियोक्ता और श्रमिक के बीच साझेदारी में श्रमिकों की भूमिका को पहचाना जाना चाहिए। साथ ही, श्रमिकों को नियोक्ता के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। एक दूसरे के हितों को पहचानने से संगठन का उत्पादन असाधारण रूप से अच्छा प्रदर्शन करेगा।

औद्योगिक संबंधों का उद्देश्य

  1. श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार एवं वृद्धि करना।
  2. संगठन के भीतर शांति और सद्भाव स्थापित करना।
  3. श्रमिकों और प्रबंधन के बीच आपसी समझ हासिल करके उनके हितों की रक्षा करना।
  4. उत्पादन को विनियमित करके और सामंजस्यपूर्ण औद्योगिक संबंधों को बढ़ावा देकर उच्च कारोबार (टर्नओवर) के परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि करना। 
  5. श्रमिकों और कर्मचारियों दोनों की आर्थिक स्थिति में सुधार करना। 
  6. औद्योगिक लोकतंत्र की स्थापना करना। 
  7. श्रमिकों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों को सुरक्षित करना।
  8. पूर्ण रोजगार की स्थिति स्थापित करना और अधिकतम एवं कुशल उत्पादकता द्वारा देश की आर्थिक वृद्धि में योगदान देना।
  9. मैत्रीपूर्ण श्रम-प्रबंधन संबंध विकसित करना।
  10. श्रमिकों की ताकत में सुधार के लिए व्यापार संघों  के विकास को प्रोत्साहित करना।

औद्योगिक संबंधों की प्रकृति और दायरा

औद्योगिक संबंधों का उद्देश्य कर्मचारियों के हितों और प्रबंधन के साथ उनके संबंधों की रक्षा करना है। यह संगठन की क्षमता को कर्मचारी अपेक्षाओं, व्यापार संघों, आर्थिक समाजों और अन्य मुद्दों के बीच संतुलन बनाए रखने में सक्षम बनाता है। 

औद्योगिक संबंध शब्द एक व्यापक शब्द है जिसे विभिन्न विद्वानों द्वारा अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, औद्योगिक संबंधों में राज्य और नियोक्ताओं के बीच संबंध और व्यापार संघों और नियोक्ता संघों के बीच संबंध शामिल हैं। किसी संगठन के औद्योगिक संबंध विभाग द्वारा किए जाने वाले विभिन्न कार्य जनसंपर्क, श्रम संबंध, नीतियों और कार्यक्रमों का प्रबंधन, कर्मचारियों के रोजगार रिकॉर्ड बनाए रखना आदि हैं। 

औद्योगिक संबंधों के कार्य

औद्योगिक संबंधों के कई कार्य हैं जो संगठन को अपने लक्ष्यों को कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से प्राप्त करने में मदद करने के लिए किए जाते हैं। कुछ कार्य इस प्रकार हैं:

  1. श्रमिकों और प्रबंधन के बीच स्वस्थ और सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाना।
  2. औद्योगिक मानकों के साथ-साथ श्रमिक जुड़ाव में सुधार के लिए नवाचार, निर्माण और सहयोग को प्रोत्साहित करना।
  3. यह सुनिश्चित करना कि ट्रेड यूनियन शांतिपूर्वक विवादों के समाधान में योगदान दें और संगठन में अस्वास्थ्यकर, अनैतिक और अनुशासनहीन कामकाजी माहौल से बचें।
  4. संगठनात्मक संबंध और कुशल उत्पादकता को बनाए रखते हुए संगठनात्मक उद्देश्यों को प्राप्त करना।
  5. ऐसी नीतियां बनाना और तैयार करना जो बढ़ी हुई उत्पादकता के साथ-साथ संगठन के भीतर समझ, रचनात्मकता और सहयोग को बढ़ावा देना।
  6. बेहतर कामकाजी मानकों और संगठनात्मक गतिविधियों में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

औद्योगिक संबंध और मानवीय संबंध

क्र.सं. सामग्री औद्योगिक संबंध मानवीय संबंध
1. अर्थ औद्योगिक संगठन औद्योगिक संबंध शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक रूप से करते हैं।  यह किसी संगठन में नियोक्ताओं और कर्मचारियों या श्रमिकों के बीच संबंध को संदर्भित करता है। मानवीय संबंध व्यक्तियों के बीच पारस्परिक संबंधों और समूहों के व्यक्तिगत सदस्यों के रूप में उनके व्यवहार से अधिक चिंतित हैं।
2. संबंध इसमें नियोक्ताओं और कर्मचारियों या कानून द्वारा विनियमित श्रमिकों के बीच मानवीय संबंधों और संबंधों को शामिल किया गया है। इसका संबंध नैतिक एवं सामाजिक तत्वों के आधार पर व्यक्ति के व्यवहार से है।  वे स्वभाव से व्यक्तिगत हैं।
3. उद्देश्य औद्योगिक संबंधों का मुख्य उद्देश्य प्रभावी विवाद समाधान के साथ-साथ शांति और सद्भाव बनाए रखना है। मानवीय संबंधों का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की दक्षता में सुधार करके और उन्हें इंसानों के रूप में व्यवहार करके उनके बीच अपनेपन की भावना पैदा करना और विकसित करना है।
4. प्रयोज्यता का दायरा व्यापक संकुचित (नेरोअर)

 

औद्योगिक संबंध कितने प्रकार के होते हैं?

औद्योगिक संबंध चार प्रकार के होते हैं:

नियोक्ता-कर्मचारी संबंध

नियोक्ता-कर्मचारी प्रकार के औद्योगिक संबंधों में किसी संगठन के श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच कामकाजी संबंध शामिल होते हैं। संगठन के लिए लाभकारी परिणाम प्राप्त करने के लिए दोनों के बीच आपसी संबंध हैं। इन दोनों के लिए एक मजबूत रिश्ता विकसित करना बहुत महत्वपूर्ण है, ऐसा न करने पर लक्ष्य हासिल करने में असमर्थता आ जाएगी। नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के इस संबंध को रोजगार संबंध के रूप में जाना जाता है। यदि संबंध सफलतापूर्वक काम करता है तो इसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास और उत्पादकता में वृद्धि होगी। यदि किसी कर्मचारी का नियोक्ता के साथ सकारात्मक और स्वस्थ संबंध है, तो वह अधिक प्रभावी ढंग से प्रदर्शन करता है और संगठनात्मक लक्ष्यों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देता है। एक अच्छा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध होना किसी भी संगठन का मूल आधार है। यदि कर्मचारी मूल्यवान महसूस करते हैं, तो वे अपनी प्रतिभा और विशेषज्ञता का अधिकतम लाभ उठाएंगे। 

समूह संबंध

समूह संबंध विभिन्न श्रमिकों, पर्यवेक्षकों (सुपरवाइजर), तकनीकी व्यक्तियों आदि के बीच के संबंध हैं। समूह संबंध सिद्धांत परंपरा और नवीनता के परस्पर क्रिया के साथ-साथ समूहों और सामाजिक गतिशीलता के बारे में जानने का अवसर देता है। यह संगठन और उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक वातावरण के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है।

श्रमिक संबंध

औद्योगिक संबंधों का एक पहलू यह भी है जो श्रम कानून, सामूहिक सौदेबाजी, समझौतों और मध्यस्थता प्रक्रियाओं द्वारा शासित होता है। यह संघ और प्रबंधन के बीच का संबंध है जिसे श्रम प्रबंधन संबंध के रूप में भी जाना जाता है। 

जनसंपर्क

किसी संगठन का समाज और बाहरी निकायों के साथ जो संपर्क होता है उसे सार्वजनिक मामला कहा जाता है। उद्योग में लंबे समय तक टिके रहने के लिए, संगठन को जनता के साथ स्वस्थ और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहिए। तो मूल रूप से यह उद्योग और समाज के बीच का संबंध है। 

औद्योगिक संबंधों को प्रभावित करने वाले कारक

आंतरिक कारक

  • श्रमिकों और यूनियन सदस्यों के प्रति प्रबंधन का तानाशाही रवैया।
  • प्रबंधन और यूनियन सदस्यों के प्रति श्रमिकों का हीन या विद्रोही रवैया।
  • यूनियनों, श्रमिकों और नियोक्ताओं का आपस में विरोधाभासी रवैया।
  • संगठन के विभिन्न विभागों या स्तरों के बीच प्रतिद्वंद्विता (रिवालरी)।
  • प्रबंधन और श्रमिकों के बीच मतभेद और गलतफहमियाँ।
  • अधिकारियों के सामने आने वाली समस्याएं।
  • नीतियाँ और योजनाएँ-पालन और कार्यान्वयन।

बाहरी कारक

  • संघों का जुझारूपन (मिलिटेंसी), चाहे स्थानीय स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर।
  • राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर सौदेबाजी।
  • राष्ट्रीय और स्थानीय प्रक्रिया का कार्यान्वयन और प्रभावशीलता।
  • किसी संगठन के भीतर औद्योगिक संबंधों को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा। 

औद्योगिक संबंधों के विभिन्न प्रतिरूप (मॉडल) और दृष्टिकोण

औद्योगिक संबंध एक व्यापक विस्तार को शामिल करता है और अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग तरह से माने जाते हैं। एचआर को उद्योग संबंधों के प्रत्येक पहलू को समझना आवश्यक है क्योंकि वे ही हैं जिनसे प्रत्येक एचआरएम समस्या के लिए व्यवहार्य समाधान प्रदान करने की उम्मीद की जाती है। मुख्य रूप से तीन लोकप्रिय दृष्टिकोण हैं अर्थात् एकात्मक दृष्टिकोण, बहुलवादी दृष्टिकोण और मार्क्सवादी दृष्टिकोण। हालाँकि, कोई सही या गलत दृष्टिकोण नहीं है, औद्योगिक संबंधों के अभिनेताओं और खिलाड़ियों के बीच जटिल और विविध स्थितियों को समझने के लिए इन दृष्टिकोणों का उपयोग व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से किया जा सकता है। 

एकात्मक दृष्टिकोण

यह दृष्टिकोण इस अवधारणा के इर्द-गिर्द घूमता है कि अधिकार का केवल एक ही स्रोत है। प्रबंधन के अधिकार का यह स्रोत बातचीत और सौदेबाजी से संबंधित मुद्दों में निर्णय लेने को प्रभावित करने वाले कारकों को नियंत्रित करता है। कार्यस्थल पर उत्पन्न होने वाले विवादों को खराब प्रबंधन के परिणामस्वरूप देखा जाता है, उन कर्मचारियों से जो संगठन की संस्कृति के साथ अच्छा समन्वय नहीं करते हैं। नियोक्ता को नेता और एकमात्र निर्णय निर्माता माना जाता है जबकि कर्मचारी निर्णयों के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। संघ भी प्रबंधन के साथ सहयोग करती हैं और उनके प्रबंधन के अधिकार को इस अंतर्निहित धारणा के कारण स्वीकार किया जाता है कि प्रबंधन जो भी करता है वह सभी के लाभ के लिए होता है और सद्भाव को बढ़ावा मिलता है। यह दृष्टिकोण प्रतिक्रियाशील औद्योगिक संबंध रणनीति का अनुसरण करता है और कर्मचारियों के साथ सीधी बातचीत की मांग की जाती है। कई आलोचकों ने एकात्मक दृष्टिकोण को चालाकीपूर्ण और शोषणकारी बताते हुए इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह दृष्टिकोण अवास्तविक है क्योंकि यह नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच अंतर्निहित शक्ति असंतुलन को नजरअंदाज करता है। 

बहुलवादी (प्लुरलिस्ट) दृष्टिकोण

यह दृष्टिकोण प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच अंतर्निहित विवाद की पहचान करता है। यह कार्यस्थल के भीतर विचारों और दृष्टिकोणों की विविधता को पहचानता है। यह दृष्टिकोण विवाद की उत्पत्ति के बजाय उसके समाधान पर केंद्रित है। संगठन विवादों में सामाजिक वातावरण एक महत्वपूर्ण और आवश्यक कारक है। बहुलवादी दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच आपसी सम्मान और समझ को बढ़ावा देना है। नियोक्ता-कर्मचारी संबंध को एक गतिशील संबंध के रूप में देखा जाता है जो राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित होता है। हालाँकि, बहुलवादी दृष्टिकोण की कुछ आलोचनाएँ भी हैं। जहां बहुलवादी दृष्टिकोण का पालन किया जाता है वहां निर्णय लेना और आम सहमति तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। संगठन का मानना है कि प्रबंधन और श्रमिकों के बीच विवाद अपरिहार्य है और यह अपने रास्ते से भटक जाता है। यह सिद्धांत 1960 के दशक के मध्य और 1970 के दशक की शुरुआत में विकसित हुआ था। 

मार्क्सवादी दृष्टिकोण

इसे उग्र सिद्धांत (रेडिकल थ्योरी) के नाम से भी जाना जाता है।  बहुलवादियों की तरह, मार्क्सवादी भी मानते हैं कि नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच विवाद अपरिहार्य है। हालाँकि, मार्क्सवादियों का मानना है कि विवाद समाजों के बीच विभाजन के कारण नहीं बल्कि समाज और इसे प्रबंधित करने वालों के बीच विभाजन के कारण उत्पन्न होते हैं। उनका मानना है कि यदि सामाजिक परिवर्तन लाना है तो उससे पहले वर्ग विवाद होना आवश्यक है। इससे श्रमिकों की मजबूत प्रतिक्रिया होती है और संगठन/उत्पादन के मालिकों और श्रमिकों के बीच की दूरी कम हो जाती है। वे व्यापार संघों को सामाजिक परिवर्तन में क्रांति लाने के साथ-साथ पूंजी द्वारा शोषण के प्रति श्रमिक प्रतिक्रिया के हथियार के रूप में देखते हैं। व्यापार संघों का मुख्य केंद्र पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर श्रमिकों की स्थिति में सुधार करना है। मार्क्सवादियों का मानना था कि सभी हड़तालें राजनीतिक कारणों का परिणाम थीं। मार्क्सवादी विभिन्न बिंदुओं पर बहुलवादी दृष्टिकोण का खंडन करते हैं। मार्क्सवादी दृष्टिकोण का लक्ष्य रोजगार संबंधों में अधिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना है। 

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण संगठन के भीतर व्यक्ति की धारणाओं और चिंताओं पर केंद्रित है। नियोक्ता और कर्मचारी दोनों का व्यक्तिगत व्यवहार और दृष्टिकोण इस दृष्टिकोण का मुख्य आकर्षण हैं। ऐसा माना जाता है कि किसी संगठन की सफलता कर्मचारी और प्रबंधन के बीच बातचीत पर निर्भर करती है। ये अंतःक्रियाएँ लोगों की प्रेरणा, दृष्टिकोण और व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। यह तीन सिद्धांत हैं प्रेरणा सिद्धांत, व्यक्तित्व सिद्धांत और संगठनात्मक व्यवहार सिद्धांत जिनका औद्योगिक संबंधों को समझने और सुधारने के लिए अत्यधिक उपयोग किया जाता है। 

समाजशास्त्रीय (सोशियोलॉजिकल) दृष्टिकोण

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का ध्यान औद्योगिक संबंधों के भीतर सामाजिक संरचनाओं का निर्माण करना है। यह दृष्टिकोण शक्ति संबंधों और व्यापक सामाजिक कारकों पर जोर देता है जो नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच संबंधों को प्रभावित करते हैं। व्यापक सामाजिक संदर्भ की गतिशीलता को समझने के लिए, औद्योगिक संबंधों को तत्काल कार्यस्थल से परे जाना होगा। यह यह भी माना जाता है कि यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारक हैं जो औद्योगिक संबंधों को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। 

ऐसे कई सिद्धांत हैं जिनका उपयोग कार्यस्थल की गतिशीलता को बेहतर ढंग से समझने के लिए किया जाता है। ये विवाद सिद्धांत, प्रणाली सिद्धांत और संस्थागत सिद्धांत है। विवाद सिद्धांत सामूहिक सौदेबाजी और कार्यकर्ता लामबंदी के माध्यम से विवाद के समाधान पर केंद्रित है। प्रणाली सिद्धांत इस तथ्य को सीखने के महत्व पर केंद्रित है कि प्रणाली के एक हिस्से में परिवर्तन पूरे प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। यह औद्योगिक संबंधों को व्यक्तिगत अन्योन्याश्रित भागों की एक जटिल प्रणाली के रूप में मान्यता देता है। संस्थागत सिद्धांत उन परिवर्तनों को पहचानता है जो संस्थाएँ औद्योगिक संबंधों में ला सकती हैं। कुल मिलाकर, समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का ध्यान कार्यस्थल में सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सामूहिक कार्रवाई और सामाजिक गतिशीलता पर है। 

मानवीय संबंध दृष्टिकोण

मानवीय संबंध दृष्टिकोण का मुख्य केंद्र सकारात्मक कामकाजी माहौल के साथ-साथ संचार और नौकरी की संतुष्टि पर है। औद्योगिक संबंध केवल नियमों और विनियमों को लागू करने के बारे में नहीं होना चाहिए, बल्कि संगठन के भीतर एक सहायक कार्य संस्कृति बनाने के बारे में भी होना चाहिए जो कर्मचारी उत्पादकता और काम करने की प्रेरणा को बढ़ावा दे। 

यह दृष्टिकोण कर्मचारियों को कुछ भावनात्मक जरूरतों और इच्छाओं वाला मानव मानता है, न कि केवल काम पूरा करने का एक माध्यम मानता है। कार्यस्थल पर कर्मचारियों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। वे संगठन के निर्णय लेने में शामिल होंगे। उन्हें संगठन के भीतर अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों क्षेत्रों में आगे बढ़ने और विकास करने के लिए विभिन्न अवसर दिए जाएंगे।मानवीय संबंध दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के लिए स्वस्थ और सकारात्मक कार्य वातावरण को बढ़ावा देना है। इस दृष्टिकोण के माध्यम से संगठन को कर्मचारी की भलाई, उत्पादकता और नौकरी से संतुष्टि को पहचानना चाहिए। 

गिरि दृष्टिकोण

गिरि दृष्टिकोण भारतीय विद्वान डॉक्टर गिरि द्वारा पेश किया गया था और यह अहिंसा, आपसी समझ, सामाजिक न्याय और सहयोग के महत्व के गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित था। औद्योगिक संबंधों को सहयोग, आपसी समझ और सामाजिक न्याय के दायरे से देखा जाता था। औद्योगिक संबंध कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच सहयोग और आपसी सम्मान पर आधारित होने चाहिए। एक निश्चित विवाद को हल करने के लिए, संगठन को बातचीत और पराक्रम (नेगोशियेशन) की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। इससे संगठन के भीतर आपसी समझ को बढ़ावा मिलता है। औद्योगिक संबंधों में सामाजिक न्याय प्राप्त करना इस दृष्टिकोण के प्रमुख कारकों में से एक है। संगठन का ध्यान श्रमिकों के कल्याण पर होगा। 

गांधीवादी दृष्टिकोण

यह दृष्टिकोण अहिंसा, सामाजिक न्याय और आपसी सम्मान के गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। यह दृष्टिकोण भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी द्वारा अपनाया गया था। वे अहिंसक, न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष समाज के समर्थक थे। इस दृष्टिकोण से औद्योगिक संबंधों में परस्पर सम्मान और सहयोग रहेगा। विश्वास और सहयोग पर आधारित रिश्तों की नींव बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। 

विवादों को बातचीत और परक्रामण (नेगोशिएशन) के माध्यम से हल किया जाएगा। कर्मचारियों की भलाई को बढ़ावा देने के लिए एक समावेशी और स्वस्थ कार्यस्थल बनाना संगठन की सामाजिक जिम्मेदारी है। औद्योगिक प्रकृति में सामुदायिक सशक्तिकरण होगा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देकर स्थानीय उद्योगों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह दृष्टिकोण सभी के लिए एक समतापूर्ण (इक्विटेबल) समाज को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। 

औद्योगिक संबंधों के लाभ और नुकसान

लाभ

  • सकारात्मक कर्मचारी-नियोक्ता संबंधों के परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि हुई है। कर्मचारी-नियोक्ता के बीच अच्छे संबंध से उत्पादकता में वृद्धि होती है। 
  • प्रतिधारण (रिटेंशन) दर अधिक हो जाती है। लोग ऐसे संगठन में रहना और काम करना चाहेंगे जहां उन्हें महत्व दिया जाए और उनकी क्षमताओं को पहचाना जाए। 
  • जो लोग काम करते हैं वे प्रेरित होते हैं और संगठन के सामान्य लक्ष्य से प्रेरित होते हैं। यदि श्रमिकों को उनकी इच्छित तकनीक, अच्छा कार्य वातावरण, अत्यधिक प्रेरित टीम और व्यक्तिगत प्रतिक्रिया (फीडबैक) प्रदान किया जाता है, तो वे अपने लक्ष्यों को अधिक कुशलता से प्राप्त करते हैं। 
  • काम करने की प्रेरणा और इच्छा के कारण, यह कार्यस्थल से अनुपस्थिति को कम करता है।
  • अच्छे औद्योगिक संबंधों के बदले में राजस्व बढ़ाया जाता है। संगठन के भीतर कोई बड़ा विवाद नहीं है और अच्छे औद्योगिक संबंध बनाए रखने के लिए छोटे विवादों को संगठन के बातचीत तंत्र द्वारा हल किया जाता है। 

नुकसान

अगर संबंध अच्छे होंगे तो संगठन के अंदर और संगठन के बाहर भी शांति और व्यवस्था बनी रहेगी। हालाँकि, ख़राब औद्योगिक संबंध निम्नलिखित परिस्थितियों को जन्म देंगे: 

  • कुछ उद्योगों में, श्रमिकों को वेतन की हानि, शारीरिक चोटें, कड़वे संबंध, करियर पर प्रतिकूल प्रभाव आदि का सामना करना पड़ता है।
  • कुछ उद्योगों में उद्योगपतियों को कम उत्पादन, कम लाभ, खराब मानवीय संबंध, क्षतिग्रस्त मशीनें, निश्चित व्यय का बोझ आदि का सामना करना पड़ता है।
  • सरकार पर भी कुछ प्रभाव पड़ते हैं जैसे राजस्व की हानि, समाज में शांति और व्यवस्था की कमी, विभिन्न राजनीतिक दलों पर दोषारोपण (ब्लेमिंग) आदि।
  • खराब औद्योगिक संबंधों से उपभोक्ता भी प्रभावित होते हैं, जिससे ऊंची कीमतें, वस्तुओं की कमी और वस्तुओं की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और देश के आर्थिक विकास पर भारी प्रभाव पड़ता है।
  • अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता।

भारत में औद्योगिक संबंधों का अनुप्रयोग

भारत में औद्योगिक संबंध त्रिपक्षीय प्रकृति के हैं। भारत सरकार श्रम प्रशासन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। हालाँकि, आईटी उद्योग के आगमन के साथ, प्रणाली द्विदलीय प्रणाली की ओर बदल रही है। भारत में बदलती प्रणालियाँ और भारत में औद्योगिक संबंधों के अनुप्रयोग में उनकी भूमिका निम्नलिखित हैं। 

व्यापार संघ

व्यापार संघ का गठन और विकास स्वतंत्रता युग में ही शुरू हो गया था। 19वीं सदी में जब औद्योगीकरण हो रहा था, तब श्रमिकों को खराब कामकाजी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था और यहां तक कि उनके बुनियादी अधिकारों की भी रक्षा नहीं की जाती थी। इसके कारण विभिन्न कार्यस्थलों पर श्रमिकों का आंदोलन और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। भारत में पहली संगठित हड़ताल 1877 में नागपुर में एक्सप्रेस मिल की थी। 1947 में आज़ादी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र में विकास देखा गया और इससे रोज़गार में वृद्धि हुई। उस समय श्रमिक आंदोलन सरकार द्वारा नियंत्रित और निर्देशित था। जल्द ही, औद्योगिक ठहराव और अंतर-संघ प्रतिद्वंद्विता का युग आ गया, जिससे व्यापार की अनुचित शर्तें, तेल की कीमतें, रोजगार में कमी, श्रम उत्पादकता में कमी आदि हुई। इससे हड़तालों और अंतर-संघ प्रतिद्वंद्विता की संख्या में वृद्धि हुई। 

बाद में 1980 के दशक में भारत को भुगतान संतुलन में असंतुलन का सामना करना पड़ा और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से भारी ऋण लेना पड़ा। इसके बाद भारत में आर्थिक सुधार देखने को मिले। इन सुधारों से औद्योगिक संबंधों में बदलाव आया और रोजगार में अधिक लचीलापन आया तथा सरकारी हस्तक्षेप कम हुआ। 2008 में वैश्विक मंदी के समय भारी संख्या में नौकरियाँ ख़त्म होती देखी गईं। 2008 में मंदी से तृतीयक क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हुआ था। इससे व्यापार संघों  की शक्ति, एकता और प्रभाव में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी थी। 

प्रबंधन

समय बीतने के साथ, व्यापार संघों ने विकास की गति खोना शुरू कर दिया था। यही वह समय था जब प्रबंधन शक्तिशाली हो गया और कार्यस्थल प्रबंधन की कमान अपने हाथ में ले ली थी। खुले बाजार प्रणाली के आगमन के साथ प्रबंधन कार्यस्थल पर नियंत्रण पाने में बेहतर सक्षम है। कई बार प्रबंधन और व्यापार संघों ने हाथ मिलाया है और किसी व्यवसाय को लाभ पहुंचाने के लिए आपसी व्यवस्था की है। हालाँकि, इस व्यवस्था की अधिक सराहना नहीं की गई क्योंकि व्यापार संघ को ही वेतन कटौती आदि जैसी रियायतों का वहन करना पड़ता था। सभी संभावित क्रमपरिवर्तन और संयोजनों के बाद, यह पाया गया कि यह प्रबंधन ही था जो शक्ति को संतुलित करने और औद्योगिक संबंधों को बनाए रखने में सक्षम था। आकार घटाने, उपठेकेदारी और आउटसोर्सिंग ने प्रबंधन को कार्यस्थल पर अधिक नियंत्रण प्रदान किया था। बदले में इस शक्ति और अधिकार ने प्रबंधन को स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय लेने और किसी भी संघ के अनावश्यक विरोध के बिना उन्हें लागू करने में मदद की थी। 

फिर भी, ऐसे कई उद्योग हैं जो व्यापार संघों के तरीको पर काम करते हैं। कुछ स्थान ऐसे हैं जो व्यापार संघों को पसंद करते हैं और अन्य लोग प्रबंधन को प्राथमिकता देते हैं। दोनों के बीच रस्साकशी (टग ऑफ वार) आज भी जारी है। भारत में औद्योगिक व्यवस्था में प्रबंधन और व्यापार संघ के बीच संतुलन बनाए रखना बहुत जटिल है फिर भी आवश्यक है। 

सरकार

आजादी से पहले ब्रिटिश काल में श्रमिक अधिकारों की अनदेखी की गई थी। कार्यस्थल पर श्रमिकों को काफी दमन का सामना करना पड़ता था, जहां उनकी जरूरतों का भी ध्यान नहीं रखा जाता था। स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने विभिन्न कानून लाकर श्रमिकों और उनके हितों की रक्षा करने का प्रयास किया था। इन कानूनों ने बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने और वेतन, कामकाजी माहौल आदि के संबंध में उनके हितों की रक्षा करने का वादा किया था। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में भारी वृद्धि और विस्तार देखा गया था। उस समय निजी क्षेत्र को पीछे छोड़कर सरकारी क्षेत्र बाजार पर हावी होने लगा था। निजी क्षेत्र को अनुमति लेनी पड़ती थी और वह काफी हद तक सरकार पर निर्भर था। लेकिन अब, समय बीतने के साथ, सरकार की प्रमुख भूमिका को दरकिनार कर दिया गया है और द्विपक्षीयता देखी जाने लगी है। सरकार भारतीय श्रम सम्मेलनों के माध्यम से श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच स्वस्थ संबंध बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास करती रहती है। हालाँकि कार्यस्थल पर श्रमिकों के सामने आने वाले संकट से निपटने के लिए आज तक विभिन्न कानून पेश किए गए हैं, फिर भी कुछ क्षेत्र अछूते हैं। अनौपचारिक और गैर-नियमित प्रकार के रोजगार में श्रमिकों के हितों की सुरक्षा को अभी भी पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया है। 

पंचवर्षीय योजनाएँ और औद्योगिक संबंध

1947 से 2017 तक पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं और उनका जोर एकीकृत राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम लाने पर था। भारतीयों का ध्यान हर पांच साल में नए लक्ष्य पेश करके इन कार्यक्रमों की योजना और कार्यान्वयन पर केंद्रित था। ये योजनाएँ भारत के योजना आयोग (1951-2014) और नीति आयोग (2015-2017) द्वारा बनाई, क्रियान्वित (इंप्लीमेंटेड) और निगरानी की गईं। भारत अपनी आजादी के तुरंत बाद भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में अपनी पहली पंचवर्षीय योजना शुरू करने में सक्षम था। 

प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956)

प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य जोर कृषि गतिविधियों और उनके विकास पर था। सरकार का ध्यान नए उद्योग लगाने की बजाय पहले से लगे उद्योगों को बढ़ाने पर ज्यादा था। औद्योगिक क्षेत्र का लक्ष्य मौजूदा क्षमता का बेहतर उपयोग करने के लिए उद्योग का नवीनीकरण और आधुनिकीकरण करना था। 

द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-1961)

द्वितीय पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों और परिवहन का विकास और वृद्धि देखी गई थी। भारी उद्योगों को पी.सी.महालनोबिस मॉडल पर स्थापित किया जाना था। मुख्य प्रकाश लौह और स्टील उद्योग, उर्वरक (फर्टिलाइजर) उद्योग और भारी इंजीनियरिंग उद्योग पर डाला गया था। इसके साथ ही 1956 में दूसरी औद्योगिक समाधान नीति की घोषणा की गई और छत्तीसगढ़ में भिलाई स्टील प्लांट के साथ पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर स्टील प्लांट की स्थापना की गई थी। 1959 में ओडिशा में राउरकेला स्टील प्लांट भी स्थापित किया गया था। इस योजना के दौरान ही कई प्रसिद्ध स्टील प्लांट स्थापित और विस्तारित किए गए थे। 

तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-1966)

लोहा और इस्पात, बिजली आदि जैसे बुनियादी उद्योगों का प्रमुख विस्तार हैं। तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान बिजली आदि देखी गई। बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना 1964 में झारखंड में की गई थी। उस समय पूंजीगत सामान उद्योग भी सुर्खियों में थे, और उन्हें बनाने के लिए कुछ विकास किए गए थे। 

चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-1974)

पुनः चौथी पंचवर्षीय योजना में कृषि आधारित उद्योगों पर ध्यान केन्द्रित किया गया था। इनमें कपास, जूट, चीनी आदि शामिल थे। मिश्र धातु और एल्यूमीनियम क्षेत्रों में प्रगति देखी गई थी। औद्योगिक फैलाव की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए कुछ प्रयास किए गए। 1972 में भारत सरकार द्वारा कोयला क्षेत्र का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। 

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-1979)

लौह और स्टील संयंत्रों, निर्यात-उन्मुख उत्पादों और बड़े पैमाने पर उपभोग की वस्तुओं का तेजी से विकास पांचवीं पंचवर्षीय योजना का मुख्य ध्यान था। तेल शोधन, रसायन और भारी इंजीनियरिंग उद्योग लगातार प्रगति कर रहे थे।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-1985)

इस समय ग्रामीण हस्तशिल्प उत्पाद तेजी पर थे और अधिक ध्यान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार का दोहन करने पर था। छठी पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य संतुलित क्षेत्रीय विकास प्राप्त करना था। वाणिज्यिक वाहन, सीमेंट, कोयला आदि कई उद्योगों ने लक्ष्य हासिल किए थे। 

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-1990)

1985-1990 के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उद्योग मुख्य ध्यान था। इन 5-वर्षीय योजनाओं के दौरान औद्योगिक फैलाव, स्थानीय संसाधनों का दोहन, स्व-रोज़गार और उचित प्रशिक्षण को अधिक महत्व दिया गया था। निर्यात संभावनाओं के लिए घरेलू बाजारों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया था। भारत सरकार की औद्योगिक नीति में एक बड़ा बदलाव 1990-92 की वार्षिक योजना अवधि के दौरान देखा गया था। 1991 में नई औद्योगिक नीति अस्तित्व में आई जिससे औद्योगिक व्यापार और विदेशी निवेश नीतियों का उदारीकरण (लिबरलाइजेशन) हुआ था।

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-1997)

उदारीकरण नीतियों के कार्यान्वयन के बाद क्षेत्रीय असंतुलन दूर हो गया था। योजना ने छोटे क्षेत्र में रोजगार वृद्धि को प्रेरित किया था। 

नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002)

सीमेंट, कोयला, उपभोक्ता सामान, तेल, बुनियादी ढांचे और गुणवत्ता वाले इस्पात उद्योगों के विकास और स्थिर वृद्धि पर जोर दिया गया था। 

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007)

योजना का मुख्य उद्देश्य लेनदेन लागत को कम करना और निर्यात को बढ़ाना था। साथ ही, बढ़ी हुई वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और संतुलित क्षेत्रीय विकास हासिल करना है। सरकार ने 2005 में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) नीति अपनाई थी। 

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012)

योजना का ध्यान तेज विकास पर था और विकास का लाभ आबादी के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचेगा। रोजगार पैदा करने और गरीबी कम करने के लिए तेजी से औद्योगीकरण और विकास किया गया था। 

बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012- 2017)

इस योजना का विषय तेज़ और अधिक समावेशी सतत विकास था। गांवों में ढांचागत परियोजनाओं और बिजली आपूर्ति पर जोर दिया गया था। इस योजना के तहत गैर-कृषि क्षेत्रों के लिए नये अवसर पैदा किये गये। 

बारहवीं पंचवर्षीय योजना के बाद, कोई और योजना नहीं बनाई गई क्योंकि 2014 में योजना आयोग को भंग कर दिया गया था। 

औद्योगिक संबंध और श्रम कानून: भारत में वर्तमान स्थिति का एक अवलोकन 

देश के औद्योगिक क्षेत्र में विकास और विस्तार ने भारत में रोजगार कानूनों की संभावनाएं खोल दी हैं। श्रम नियमों के अस्तित्व में आने से श्रमिकों और संगठन के साथ उनके संबंधों पर आर्थिक प्रभाव पड़ता है। इन कानूनों की समझ पैदा करना कोई सीधा-सीधा सूत्र (फॉर्मूला) नहीं है। श्रम नीतियों को समझने के लिए अनुभवजन्य (एंपायरिकल) और सांख्यिकीय आंकड़ों से गुजरना होगा। प्रत्येक उद्योग के अपने विशिष्ट नियम और विनियम होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कानूनों और नीतियों का अनुपालन करने की आवश्यकता होती है। 

प्रत्येक उद्योग के अपने विशिष्ट नियम और विनियम होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कानूनों और नीतियों का अनुपालन करने की आवश्यकता होती है। सरकार ने 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1946 के औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम और व्यापार संघ 1926 अधिनियम को मिलाने का प्रयास किया था। इस संहिता का मुख्य उद्देश्य नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों को निम्नलिखित तरीके से लाभ पहुंचाना था- 

  1. विवाद समाधान के तंत्र को सुव्यवस्थित करना। इससे नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों में बाधा डाले बिना विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने में मदद मिलेगी। 
  2. उन कर्मचारियों की सुरक्षा जो एक निश्चित अवधि के लिए काम करते हैं और जिन्हें एक विशिष्ट अवधि के लिए अनुबंधित किया गया है। 
  3. यह सुनिश्चित करना कि औद्योगिक प्रतिष्ठान दिए गए स्थायी आदेशों का पालन करें। 
  4. गैर-अनुपालन से निपटने के लिए संबंधित अधिकारियों पर सख्त जुर्माना लगाया गया है। 
  5. सुचारू रूप से निर्णय लेने के लिए नियोक्ताओं के बीच व्यवसाय-अनुकूल वातावरण और अधिक लचीलेपन को बढ़ावा देना। 

भारतीय श्रम कानूनों को फिर से तैयार करना समय की मांग थी और इसमें इतने लंबे समय से देरी हो रही है। यदि संबंधित लोगों को कानूनी सहायता और सुरक्षा दी जाए तो भारत उस कगार पर खड़ा है जहां वह उद्योगों का विकास और विस्तार कर सकता है। यह देश का श्रम कानून है जो विभिन्न विदेशी ग्राहकों को भारत में उद्योग स्थापित करने से रोक रहा है। अनुपालन और नियामक बाधाओं को सुधारने और बनाए रखने की सख्त जरूरत है। 

2020 में शुरू किए गए विभिन्न श्रम सुधारों का अवलोकन

भारत में श्रम का विषय समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है। इस सूची के अंतर्गत आने वाले विषयों को कानून बनाने के लिए संसद और राज्य विधानमंडल दोनों द्वारा उठाया जा सकता है। श्रम मामलों पर 40 से अधिक केंद्रीय कानून और 100 से अधिक राज्य कानून थे। इन कानूनों को संहिताओं में संशोधित और एकीकृत करने के लिए संहिताएं पेश की गईं। श्रम पर दूसरे राष्ट्रीय आयोग (2002) ने सिफारिश की कि श्रम कानूनों को निम्नलिखित श्रेणियों के तहत एकीकृत किया जाना चाहिए- 

  1. औद्योगिक संबंध
  2. सामाजिक सुरक्षा
  3. सुरक्षा
  4. कल्याण और कामकाजी स्थितियाँ
  5. वेतन

यह सिफ़ारिश इस बात को ध्यान में रखते हुए की गई थी कि मौजूदा श्रम कानून जटिल थे और उनकी परिभाषाएँ असंगत थीं। पारदर्शिता और एकरूपता को बढ़ावा देने के लिए सरल श्रम संहिताओं की आवश्यकता थी। 

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020

औद्योगिक संबंध संहिता 2020 व्यापार संघ अधिनियम 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के समामेलन और सरलीकरण  के बाद तैयार किया गया था। संहिता का उद्देश्य श्रमिकों के संघ बनाने के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करना, कर्मचारी और नियोक्ता के बीच घर्षण (फ्रिक्शन) को कम करना और औद्योगिक विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए एक नियामक ढांचा प्रदान करना है। 

संहिता द्वारा विनियमित प्रमुख बाद के क्षेत्र इस प्रकार हैं- 

  1. व्यापार संघ पंजीकरण 
  2. व्यापार संघ रद्दीकरण
  3. व्यापार संघ नाम परिवर्तन
  4. कार्य समिति का गठन
  5. पंजीकृत व्यापार संघो का समावेश
  6. स्थायी आदेश पंजीकरण
  7. स्थायी आदेश की तैयारी
  8. औद्योगिक न्यायाधिकरण का गठन 
  9. श्रमिकों को मुआवजा
  10. छँटनी (रिट्रेंचमेंट) किये गये श्रमिकों की छँटनी और पुनः रोज़गार 
  11. मंदी (ले-ऑफ) पर रोक
  12. किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान का समापन करना और बंद करना 

संहिता का उद्देश्य सुधार और व्यापार करने में आसानी प्रदान करके नियोक्ताओं और कर्मचारियों के हितों और अधिकारों की रक्षा करना है। इसके पीछे का उद्देश्य शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना और औद्योगिक विवादों का समाधान करना है। इससे नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच मधुर संबंध बनेंगे। 

संहिता की मुख्य बातें इस प्रकार हैं- 

  1. निश्चित अवधि के कर्मचारी के लिए ग्रेच्युटी
  2. कई परिभाषाओं को संशोधित किया गया है और अधिक समावेशी बनाया गया है।
  3. निश्चित अवधि के कर्मचारियों के लिए ईएसआई, पीएफ, बोनस और वेतन जैसे कुछ वैधानिक लाभ दिए जाते हैं।
  4. सीमा सीमा को 100 श्रमिकों से बढ़ाकर 300 श्रमिकों तक कर दिया गया है।
  5. व्यापार संघ द्वारा 14 दिन की अग्रिम हड़ताल की सूचना देना अनिवार्य है।
  6. विवाद समाधान अधिकरण और एक बेहतर तंत्र पेश किया गया है। 
  7. श्रमिकों के लिए पुनः कुशल निधि (री-स्किल्ड फंड) की स्थापना। 
  8. भर्ती और नौकरी से निकालने की प्रक्रिया के लिए बेहतर प्रावधान और शर्तें।

2020 का सामाजिक सुरक्षा संहिता

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 को सामाजिक सुरक्षा से संबंधित कानूनों में संशोधन और समेकित करने के लिए लाया गया है। इस संहिता का उद्देश्य संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के सभी कर्मचारियों और श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना और उसका विस्तार करना है। संहिता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वृद्धावस्था, मातृत्व, दुर्घटना आदि के मामलों में स्वास्थ्य देखभाल और आय सुरक्षा की सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपाय किए जाएं। सामाजिक सुरक्षा संहिता बनाने के लिए 9 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिला दिया गया है। 

संहिता की मुख्य बातें इस प्रकार हैं- 

  1. कर्मचारी की परिभाषा के दायरे का विस्तार किया गया है और अब इसमें अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक, प्लेटफ़ॉर्म श्रमिक और फिल्म उद्योग के श्रमिक भी शामिल हैं।
  2. कामकाजी पत्रकारों के लिए ग्रेच्युटी अवधि 5 वर्ष से घटाकर 3 वर्ष कर दी गई है।
  3. असंगठित श्रमिकों, गिग श्रमिकों और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए संहिता के प्रावधान के तहत सामाजिक सुरक्षा कोष स्थापित किए जाते हैं। 
  4. महामारी, महामारी या राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में पीएफ या ईएसआई के लिए नियोक्ता या कर्मचारी का योगदान केंद्र सरकार द्वारा कम या स्थगित किया जा सकता है। ऐसा 3 महीने तक किया जा सकता है।
  5. योजनाएं राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड की सिफारिश पर तैयार की जाएंगी जिसे संहिता के तहत स्थापित किया गया है। केंद्र सरकार असंगठित श्रमिकों, गिग श्रमिकों और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के विभिन्न वर्गों के लिए नीतियां और योजनाएं तैयार करते समय बोर्ड से सिफारिशें और सुझाव लेगी। 

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता 2020

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 का उद्देश्य श्रमिकों की कार्य स्थितियों से संबंधित कानून को समाहित करना और उन्हें एक व्यापक संहिता में समाहित करना है। संहिता उन कानूनों को समेकित करती है जो किसी प्रतिष्ठान में कर्मचारियों की व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों को नियंत्रित करते हैं। संहिता 13 अधिनियमों को समेकित करती है जो कारखानों, खदानों, गोदी श्रमिकों, अनुबंध श्रम आदि को शामिल करते हैं। 

संहिता की मुख्य बातें इस प्रकार हैं- 

  1. कारखाने की परिभाषा का विस्तार किया गया है और इसे एक ऐसे परिसर के रूप में वर्णित किया गया है जिसमें कम से कम 20 कर्मचारी बिजली वाली प्रक्रिया के लिए काम करते हैं और 40 कर्मचारी बिना बिजली वाली प्रक्रिया के लिए काम करते हैं।
  2. दैनिक कामकाजी घंटे की सीमा अधिकतम 8 घंटे निर्धारित की गई है।
  3. खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों के लिए जनशक्ति सीमा हटा दी गई है।  ठेकेदारों के लिए 50 या अधिक श्रमिकों की भर्ती करना अनिवार्य कर दिया गया है, पहले यह संख्या 20 थी।
  4. रोजगार की औपचारिकता अनिवार्य कर दी गई है जिसमें नियोक्ता को नियुक्ति पत्र जारी करना आवश्यक है।
  5. संहिता में यात्रा भत्ता भी शामिल किया गया है। यह एकमुश्त राशि है जो श्रमिक को उसके मूल राज्य से रोजगार के राज्य तक यात्रा व्यय के लिए भुगतान की जानी है।
  6. अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों को सुवाह्यता (पोर्टेबिलिटी) लाभ दिया जाता है।

पुराने सुधार और नये सुधार

निम्नलिखित उन प्रावधानों का तुलनात्मक विश्लेषण है जिन्हें भारत में श्रम क्षेत्र की बेहतरी के लिए बदला या पेश किया गया है। पुराने सुधारों में वे सभी अधिनियम शामिल हैं जिन्हें विभिन्न संहिताओं में शामिल किया गया है। 

क्रम संख्या पुराने सुधार नये सुधार
1. कर्मचारी की परिभाषा स्पष्ट नहीं थी और इसमें निश्चित अवधि के रोजगार का दायरा शामिल नहीं था। कर्मचारी की एक नई परिभाषा, निश्चित अवधि के रोजगार को पेश किया गया है और कर्मकार शब्द का नाम बदलकर श्रमिक कर दिया गया है।
2. औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 9(c) के अनुसार, श्रमिकों को सुलह अधिकारी के पास जाने से पहले समिति के सामने अपनी शिकायतें उठाने की अनुमति नहीं थी। औद्योगिक संबंध संहिता के अनुसार, श्रमिकों के लिए शिकायत निवारण समिति का गठन करना अनिवार्य है।
3. वार्ताकार (नेगोशिएटिंग) संघ को कोई मान्यता नहीं दी गई। वार्ताकार संघ को मान्यता दी जाती है तथा प्रत्येक संगठन को मान्यता देना अनिवार्य है।
4. स्थायी आदेशों की प्रयोज्यता के लिए सीमा सीमा 100 या अधिक कर्मचारी थी। सीमा 300 श्रमिकों तक बढ़ा दी गई है।
5. कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही पूर्ण करने हेतु दी गयी समय सीमा। जांच और पूछताछ करने के लिए संहिता द्वारा निलंबन की तारीख से 90 दिनों की समय सीमा निर्धारित की गई है।
6. श्रमिक पुनः कौशल निधि की कोई अवधारणा मौजूद नहीं थी। अध्याय XI ने श्रमिक पुनः कौशल की अवधारणा पेश की और इस प्रावधान के अनुसार, नियोक्ता को प्रत्येक छंटनी किए गए श्रमिक के अंतिम आहरित वेतन के 15 दिन के बराबर राशि जमा करनी होगी।
7. दंड सख्त नहीं था और बहुत कम था। लगातार उल्लंघन के लिए जुर्माना अधिक कठोर हो गया है और 2,00,000 रुपये से लेकर 2000 रुपये प्रतिदिन तक का जुर्माना लगाया गया है।
8. पहले औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत अधिकरण का केवल एक सदस्य ही औद्योगिक विवाद को सुलझाने के लिए नियुक्त किया जाता था। अब औद्योगिक संबंध संहिता के तहत एक तंत्र बनाया गया है, जिसके अनुसार, दो सदस्य होंगे जिनमें से एक न्यायिक सदस्य होगा और दूसरा प्रशासनिक सदस्य होगा।

 

श्रम कानून सुधारों में राष्ट्रीय विधि आयोग की भूमिका

औपनिवेशिक काल श्रम कानून प्रणाली का पूर्वज है जिसका आज के युग में अधिकांश देश अनुसरण कर रहे हैं। हालाँकि, इन कानूनों में कई विसंगतियाँ मौजूद हैं। भारत में श्रमिक आंदोलनों और उनकी समान श्रम कानूनों की मांग को बढ़ाकर मांग बढ़ाने की प्रवृत्ति देखी गई है। कई दशक पहले, राष्ट्रीय विधि आयोग ने 1947 की अपनी रिपोर्ट में सुचारु रूप से काम करने वाले औद्योगिक संबंधों को प्रोत्साहित करने के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम को औद्योगिक संबंध अधिनियम में बदलने सहित अंगराग (कॉस्मेटिक) बदलावों का सुझाव दिया था। उन्होंने व्यापार संघ अधिनियम, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम और औद्योगिक विवाद अधिनियम को संकलित और समेकित करने का भी सुझाव दिया। हालाँकि, इतने वर्षों के बाद भी, कानूनों को सरल और समेकित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए। यह 1978 की बात है जब जनता पार्टी सरकार ने संसद में औद्योगिक संबंध विधेयक पेश किया था। हालाँकि, बाद में इसे संसद द्वारा हटा दिया गया था। फिर 1982 में कांग्रेस सरकार द्वारा एक और औद्योगिक संबंध विधेयक लाने का प्रयास किया गया था। एक बार फिर यह संसद में पारित नहीं हो सका। 2002 की राष्ट्रीय विधि आयोग की रिपोर्ट के बाद ही इस संहिता को लागू करने के गंभीर प्रयास किए गए। 

2002 में दूसरे राष्ट्रीय कानून आयोग द्वारा सुझाव दिया गया था कि भारत के श्रम कोड रूस, जर्मनी, हंगरी पोलैंड और कनाडा के समान आधार पर होने चाहिए। आयोग द्वारा कई बदलाव सुझाए गए, जो इस प्रकार हैं- 

  1. कानून द्वारा निर्धारित किसी प्रतिष्ठान को बंद करने या छंटनी के संबंध में कोई पूर्व अनुमति नहीं दी जाएगी।
  2. छंटनी या मंदी के मामले में, प्रतिष्ठान को 2 महीने की पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
  3. छँटनी की स्थिति में मुआवज़े की दर में बढ़ोतरी होनी चाहिए।
  4. 300 से अधिक श्रमिकों वाले कुछ प्रतिष्ठानों को सरकार से निर्धारित कार्योत्तर अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है।
  5. किसी संगठन के श्रमिकों के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए, प्रतिष्ठान को बंद करने के लिए अध्याय V-B का पालन किया जाना चाहिए। अध्याय V-B प्रतिष्ठान को बंद करने की अनुमति (300 या अधिक श्रमिकों के मामले में) से संबंधित है। 
  6. हड़तालों के लिए सख्त कानून होने चाहिए।  श्रमिकों के आवश्यक वोट लेने के लिए हड़ताल मतपत्र (स्ट्राइक बैलेट) आयोजित किया जाना चाहिए। हड़ताल का समर्थन करने वाले कम से कम 51% कर्मचारी होंगे।
  7. श्रम प्रबंधन संबंधों पर कानूनों में ‘कर्मचारी’ के बजाय लिंग-तटस्थ अभिव्यक्ति ‘श्रमिक’ को शामिल किया जाना चाहिए।
  8. कानून के दायरे में आने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर कानून एकरूपता से लागू होना चाहिए।
  9. सामूहिक बातचीत और सौदेबाजी को प्रोत्साहित किया गया।
  10. विवादों को यथासंभव लंबे समय तक मध्यस्थता के माध्यम से निपटाया जाना चाहिए और जहां निर्णय की आवश्यकता हो वहां सरकार द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
  11. श्रमिकों की ओर से बातचीत करने वाले एजेंटों की पहचान और निर्धारण करने के प्रावधान होंगे। बातचीत करने वाले एजेंट को निर्धारित करने की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त प्राधिकारियों की स्थापना की जानी चाहिए।
  12. संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों को कानूनों द्वारा शासित किया जाना चाहिए और बेहतर और सुचारू कामकाज के लिए उन्हें पर्याप्त कानून दिए जाने चाहिए।

भारत में श्रम और औद्योगिक संबंधों में न्यायिक रुझान

राष्ट्रीय विधि आयोग की सिफारिशों के बाद कई सुझावों को उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई। जिस संशोधन को चुनौती दी गई थी वह 1976 के संशोधन अधिनियम में सरकार द्वारा छंटनी की सीमा बढ़ाने को लेकर था। न्यायालयों ने भी भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत इन उल्लंघनकारी अधिकारों की गारंटी दी थी। इनसे श्रमिकों की छंटनी करने के नियोक्ता के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध लगा दिया गया और इस प्रकार इसे अमान्य करार दिया गया। ये प्रावधान नियोक्ताओं के दृष्टिकोण से भी मनमाने और असंवैधानिक थे, जैसा कि वर्कमेन बनाम मीनाक्षी मिल्स लिमिटेड (1994) के मामले में माना गया था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि छंटनी निष्पक्ष और उचित हो, उच्च न्यायपालिका द्वारा छंटनी के मामले में कई नियम निर्धारित किए गए थे। उमेश चंद्र बनाम नगर निगम, इलाहाबाद (2005) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि एक वर्ष से अधिक समय तक काम करने वाले और अपनी निरंतर सेवा देने वाले कर्मचारी की बर्खास्तगी को नोटिस या छंटनी के मामले में अवैध माना जाएगा उन्हें समय पर मुआवजा नहीं दिया जाता है। इसलिए, यह देखा गया कि कर्मचारी की छंटनी के समय मुआवजा दिया जाना चाहिए और यदि नहीं दिया जाता है तो इसे रद्द कर दिया जाएगा और अमान्य माना जाएगा। 

परमानेंट मैग्नेट लिमिटेड बनाम उमाशंकर पांडे (2005) के मामले में यह माना गया कि यदि कोई कर्मचारी जिसने 25 वर्षों तक सेवा की है और अपने कार्यकाल के दौरान अनावश्यक रूप से अनुपस्थित नहीं रहा है, तो उसे हटाया नहीं जाएगा यदि वह कुछ चिकित्सा कारणों से अपनी अनुपस्थिति के लिए उचित कारण बताता है। अनुचित आधार पर कर्मचारी को हटाने के नियोक्ता के वर्तमान निर्णय का निर्णय करने के लिए यहां अदालत कर्मचारी के पिछले कार्यकाल को देखती है। यदि किसी कर्मचारी ने बिना किसी अनुपस्थिति के इतने वर्षों तक सेवा की है और अपने कार्यकाल के दौरान उसका आचरण अच्छा रहा है तो नियोक्ता उसे नहीं हटा सकता है। उसे हटाने का उचित कारण होना चाहिए और यदि वह सचमुच किसी परेशानी में है तो उस पर विचार किया जाना चाहिए। 

नॉर्थ ईस्ट कर्नाटक आरटीसी बनाम अशप्पा (2006) के मामले में, अदालत ने कहा कि काम से लगातार अनुपस्थित रहना कोई छोटा-मोटा कदाचार नहीं है और वह भी बिना किसी उचित कारण के। कर्मचारी को इतनी लंबी अवधि के लिए काम से अनुपस्थिति को उचित ठहराने के लिए उचित आधार साबित करने में सक्षम होना चाहिए और वह भी नियोक्ता को सूचित किए बिना। ऐसे  और कई अन्य मामलों में कार्यस्थल से लगातार अनुपस्थिति के मामले में निर्णय लेने में कुछ न्यायिक बदलाव देखे गए। डीटीसी बनाम सरदार सिंह (2004) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि कोई कर्मचारी बिना स्वीकृत छुट्टी के अपने कार्यस्थल से अनुपस्थित है, तो प्रथम दृष्टया यह देखा जा सकता है कि उसे नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं है। यदि कर्मचारी ने अपने कार्यकाल में पहले ऐसा किया है तो नियोक्ता अपने पिछले अभिलेख (रिकॉर्ड) के आधार पर उसके खिलाफ कुछ कार्रवाई कर सकता है। कुख्यात (इन्फेमस) डेली रेटेड कैजुअल लेबर मामले में मजदूरों ने एक याचिका दायर कर यह मुद्दा उठाया था कि वे दस साल से अनौपचारिक (कैजुअल) मजदूरों के रूप में काम कर रहे हैं और उनकी मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं हुई है और उनकी मजदूरी भी बहुत कम है। वे डाक एवं तार विभाग के नियमित कर्मचारियों से बहुत कम थे। भारत संघ ने उनके लिए कम वेतन और उनकी आय को नियमित करने के संबंध में उनके हितों की रक्षा के लिए ऐसी कोई योजना नहीं बनाई थी। उन्होंने भारतीय संघ के नियमित कर्मचारियों के समान वेतन भत्ते की मांग की थी। अदालत ने पाया कि श्रमिकों को शत्रुतापूर्ण भेदभाव का शिकार होना पड़ा था। यह भी देखा गया कि सरकार बाजार में अपनी प्रमुख स्थिति का अनुचित लाभ नहीं उठा सकती और श्रमिकों को इतने कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। श्रमिक इतने कम वेतन पर काम करने के लिए केवल इसलिए सहमत होते हैं क्योंकि वे गरीबी से त्रस्त हैं और उनके पास आय का कोई अन्य बेहतर स्रोत नहीं है। इसके अलावा, उनका मानना है कि कुछ भी नहीं कमाने के बजाय उन्हें कम से कम अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ राशि मिल रही है।  यही कारण है कि श्रमिक इतने कम वेतन पर काम करने को राजी हो जाते हैं और संतुष्ट नहीं होते है। 

विवेका नंद सेठी बनाम जे एंड के बैंक लिमिटेड (2005) के मामले में, यह माना गया कि यदि किसी बैंक का कर्मचारी आदतन नौकरी से अनुपस्थित रहता है और लगातार नोटिस के बाद भी प्रबंधन को रिपोर्ट करने में विफल रहता है, तो प्रबंधन द्वारा यह माना जा सकता है कि उसने नौकरी छोड़ दी है। द्विपक्षीय समझौते द्वारा यह भी स्थापित किया जा सकता है कि यदि कोई कर्मचारी बिना कोई सूचना दिए 30 दिनों से अधिक समय तक अनुपस्थित रहता है तो यह माना जा सकता है कि उसे काम करने में कोई रुचि नहीं है और उसने नौकरी छोड़ दी है। 

उपर्युक्त न्यायिक प्रवृत्तियों (ट्रेंड्स) से यह देखा जा सकता है कि उदारीकरण से पहले के युग में न्यायपालिका श्रमिकों की जरूरतों और इच्छाओं के प्रति अधिक संवेदनशील थी। निर्णय भारतीय लोकतंत्र की समाजवादी प्रकृति को ध्यान में रखते हुए समता और न्याय के आधार पर दिए गए थे। श्रम कानूनों के ध्रुव सामाजिक न्याय और श्रमिकों के सामाजिक कल्याण के सिद्धांतों पर आधारित थे। यह श्रमिकों के प्रयासों, हितों और अधिकारों को स्वीकार करने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि उन्हें औद्योगिक विकास में योगदान देने के लिए पर्याप्त सुविधाएं मिलें। औद्योगिक उत्पादकता और विकास को औद्योगीकरण का मुख्य लक्ष्य माना जाता था। अदालतें श्रमिकों की भावनाओं और अच्छे मुद्दों से प्रभावित हो जाती थीं। फिर बदलती श्रम नीतियों के साथ रुझान बदलना शुरू हो गया। जो न्यायपालिका अधिक भावुक थी वह अधिक वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक हो गई थी। पहले ज्यादातर फैसले श्रमिकों के पक्ष में दिए जाते थे लेकिन बदलते रुझान के साथ उद्योगों के पक्ष में भी फैसले आने लगे थे। 

निष्कर्ष

भारतीय औद्योगिक संबंध अभी भी विकसित हो रहे हैं और त्रिपक्षीय, द्विदलीय आदि जैसे किसी विशिष्ट स्वरूप के अंतर्गत नहीं आते हैं। भारतीय औद्योगिक प्रणाली में लगभग सभी प्रणालियों की विशेषताएं मौजूद हैं। प्रारंभ में, भारत को विभिन्न आंतरिक और बाहरी कारकों का सामना करना पड़ा जिन्होंने औद्योगिक संबंधों को प्रभावित किया। लेकिन बाद में, भारत औद्योगिक संबंधों को विकसित करने और धीरे-धीरे सुधारने में कामयाब रहा। जब भी संगठन में कोई मुद्दा उठता है, तो प्रबंधन समस्या को हल करने के लिए दृष्टिकोणों में से एक या दृष्टिकोणों के संयोजन को अपनाता है। औद्योगिक संबंधों को बनाए रखना आसान नहीं है लेकिन यह प्रबंधन की एक कला है जो इन संबंधों को प्रभावी ढंग से बनाए रखने का प्रबंधन करता है। विभिन्न संगठनों में विवाद, गलतफहमियाँ और प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न होती हैं, लेकिन यह कोई मुद्दा नहीं है। लेकिन प्रबंधन इनसे कैसे निपटता है, यह खेल परिवर्तक होगा। एक संगठन औद्योगिक संबंधों में वृद्धि के साथ बढ़ता है।  खराब औद्योगिक संबंध इसके पतन या ह्रास (डेप्रिसिएशन) का एक बड़ा कारण बन सकते हैं। किसी संगठन के निर्माण में श्रमिक और श्रमिक एक आवश्यक भूमिका निभाते हैं। उनके योगदान से संगठन की वृद्धि और विस्तार होता है। समाज स्थिति से अनुबंध की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिसमें श्रमिक के अधिकार समान रूप से सुरक्षित हैं। श्रमिकों को प्राप्त करने और नियोजित करने की प्रक्रिया में विकास और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सुधार किए जा रहे हैं। जब तक हमारे पास कम कानून हैं, तब तक निगरानी करना और उनका अनुपालन करना बेहतर होगा और इससे नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों को लाभ होगा। जनता के साथ-साथ उद्योगपतियों को भी श्रम और औद्योगिक कानूनों को समझाने के लिए छोटे, संकलित और सरलीकृत कोड और नीतियां बनाना उपयुक्त है। इससे कानूनों को समझना कम बोझिल हो जाएगा और वे अधिक रोजगार-अनुकूल बन जाएंगे। एक सरल, कम बोझिल, रोजगार-अनुकूल और प्रभावी कानून भारत को वैश्विक स्तर पर औद्योगिक क्षेत्र में अधिक निवेश आकर्षित करने में मदद करेगा। इससे भारत को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिलेगा और मेक इन इंडिया योजना को भी बढ़ावा मिलेगा। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

औद्योगिक संबंधों में व्यापार संघो की क्या भूमिका है?

श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा व्यापार संघो द्वारा की जाती है। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी कर्मचारी प्रबंधन के व्यवहार का शिकार न बने। उदाहरण के लिए, आकस्मिक निलंबन, वेतन कटौती, अनुचित स्थानांतरण, आदि। 

औद्योगिक संबंध संघों की क्या भूमिका है?

औद्योगिक संबंध संघ श्रमिक संघों की तरह हैं जो कार्यस्थल पर श्रमिकों के हितों की रक्षा और उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। ये कानून, सम्मेलन और संस्थाएं हैं जो कार्यस्थल को विनियमित करने में मदद करते हैं। आर्थिक और सामाजिक मुद्दों जैसे वेतन, काम के घंटे आदि के लिए सहायता प्रदान की जाती है। 

औद्योगिक संबंधों की अवधारणा के जनक कौन हैं?

जॉन आर. कॉमन्स संस्थागत रूप से पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने सबसे पहले 1920 में विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में औद्योगिक संबंधों के लिए एक कार्यक्रम बनाया। 

औद्योगिक संबंधों के उदाहरण क्या हैं?

औद्योगिक संबंधों के सबसे बुनियादी उदाहरण संघ संगठन, सामूहिक सौदेबाजी और हड़ताल हैं।  इनमें संगठन के श्रम और प्रबंधन दोनों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है।

भारत में औद्योगिक संबंधों से संबंधित कानून क्या हैं?

कुछ महत्वपूर्ण कानून हैं 1948 का न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1961 का मातृत्व लाभ अधिनियम, 1948 का कारखाना अधिनियम, 1965 का बोनस भुगतान अधिनियम। इन कानूनों का उद्देश्य संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों और उनके हितों की रक्षा करना है। 

संदर्भ

 

अनुपस्थित मतदाताओं के लिए डाक मतपत्र सुविधाओं के माध्यम से प्रस्ताव पारित करना: कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 11

यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, नोएडा की Akshita Gupta द्वारा लिखा गया है। यह लेख किसी कंपनी में डाक मतपत्र (पोस्टल बैलेट) के प्रस्ताव पारित करने और ई-मतदान की प्रक्रिया पर चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2000 ने कंपनी अधिनियम, 1956 में धारा 192A जोड़कर डाक मतपत्र की अवधारणा पेश की थी। इस अधिनियम के पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी होने के बावजूद, एक सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनी, और ऐसे व्यवसाय से संबंधित प्रस्तावों के मामले में, जिसे केंद्र सरकार, अधिसूचना द्वारा, केवल डाक मतपत्र द्वारा संचालित करने की घोषणा कर सकती है, व्यवसाय को सामान्य बैठक में संचालित करने के बजाय, किसी भी प्रस्ताव को डाक मतपत्र द्वारा पारित कराएगी।

कंपनी अधिनियम, 2013 कॉर्पोरेट लेनदेन को डाक मतपत्र के माध्यम से संचालित करने की अनुमति देता है, हालांकि कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत प्रदान किए गए डाक मतपत्र से संबंधित नियमों में कुछ अंतर हैं। इसके अलावा, सूचीबद्ध समझौते में ऐसे कई प्रावधान हैं जो इसे संबोधित करते हैं।

इस लेख में, कंपनी अधिनियम, 2013 में उल्लिखित डाक मतपत्र से संबंधित नियम और उसको जारी करने के नियम और सूचीबद्ध समझौते के बारे में बताया गया है।

डाक मतपत्र का मतलब

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(65) के तहत डाक मतपत्र की परिभाषा का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार डाक मतपत्र का अर्थ है डाक द्वारा या किसी इलेक्ट्रिक तरीको के माध्यम से मतदान करना। आम आदमी के शब्दों में, डाक मतपत्र एक मतदान प्रणाली है जिसमें लोग व्यक्तिगत रूप से मतदान करने में असमर्थ होने पर डाक द्वारा मतदान करते हैं। यह यथासंभव अधिक से अधिक मतदाताओं की भागीदारी की अनुमति देता है। यह उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है जो सामान्य बैठक में भाग लेने में असमर्थ हैं।

डाक मतपत्र की प्रासंगिकता

डाक मतपत्र के संबंध में प्रासंगिक प्रावधानों का उल्लेख कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 110 के साथ-साथ कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 22 के तहत किया गया है। कंपनी सामान्य बैठक में लेन-देन करने के बजाय डाक मतपत्र द्वारा कोई अन्य व्यवसाय कर सकती है, सिवाय निम्नलिखित के:

  • नियमित व्यवसाय
  • कोई भी व्यवसाय जिस पर निदेशकों या लेखा परीक्षकों को किसी भी बैठक में सुनने का अधिकार है।

यदि शेयरधारकों की आवश्यक बहुमत डाक मतपत्र द्वारा किसी प्रस्ताव पर सहमत होती है, तो इसे उस उद्देश्य के लिए बुलाई गई सामान्य बैठक में विधिवत पारित माना जाता है।

डाक मतपत्र द्वारा प्रस्ताव पारित करने के लिए अनिवार्य बातें

  • व्यवसाय का कोई भी सामान जिसे डाक मतपत्र द्वारा लेन-देन करना आवश्यक है, उसे किसी कंपनी द्वारा सामान्य बैठक में धारा 108 में दिए गए तरीके से लेन-देन किया जा सकता है, जिसे सदस्यों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान करने की सुविधा प्रदान करने की आवश्यकता होती है। [धारा 110(1)]
  • यदि कंपनी सार्वजनिक रूप से कारोबार करती है, तो उसे पहले स्टॉक एक्सचेंज (जहां शेयर सूचीबद्ध हैं) को यथाशीघ्र डाक मतपत्र के बारे में सूचित करना होगा, लेकिन मतपत्र बंद होने के चौबीस घंटे के भीतर नहीं, और दो कार्य दिवसों के भीतर कंपनी की वेबसाइट पर जानकारी अद्यतन (अपडेट) करनी होगी। [सेबी (एलओडीआर) विनियम, 2015, विनियम 30 और 46(3)]
  • सभी शेयरधारकों को एक अधिसूचना भेजी जानी चाहिए, जिसमें एक मसौदा प्रस्ताव भी शामिल हो जिसमें मतदान के लिए आधार की रूपरेखा बताई गई हो और अनुरोध किया गया हो कि वे डाक मतपत्र के माध्यम से लिखित रूप में मतदान करें। [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014, नियम 22(1)]
  • तीस दिन की अवधि के भीतर समाधान के लिए शेयरधारक की सहमति या असहमति के संचार को सरल बनाने के लिए, नोटिस या तो प्रेषित किया जाएगा:
  1. पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट द्वारा,
  2. पंजीकृत ई-मेल आईडी जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग करना, या 
  3. कूरियर सेवा के माध्यम से। [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014, नियम 22(2)]।
  • वह दिन, तारीख, समय और स्थान जहां डाक मतपत्र मतदान के परिणाम सामने आएंगे, साथ ही उस वेबसाइट का लिंक जहां ऐसे परिणाम प्रस्तुत किए जाएंगे, नोटिस में निर्दिष्ट किया जाएगा। [सचिवीय मानक – 2 खंड 16.4.3]
  • डाक मतपत्र की नोटिस सदस्यों को ई-मतदान सुविधा की उपलब्धता के बारे में सूचित करेगी, यदि कोई उपलब्ध है, और उन्हें इसका उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिए प्रासंगिक जानकारी प्रदान करेगी। [सचिवीय मानक – 2 खंड 16.4.4]
  • सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनी के मामले में, डाक मतपत्र से कम से कम दो कार्य दिवस पहले स्टॉक एक्सचेंज को सूचित करें। सेबी (एलओडीआर) विनियमन, 2015 का विनियमन 29]।
  • किसी सामान्य व्यवसाय के संचालन के लिए डाक मतपत्र का उपयोग नहीं किया जाएगा। [सचिवीय मानक, खंड 16.1 – 2]
  • निम्नलिखित सामानों के लिए मंडल की मंजूरी प्राप्त करने के लिए, मंडल यह करेगा:
  1. डाक मतपत्र द्वारा लेन-देन किए जाने वाले व्यवसायों की पहचान करें।
  2. प्रस्तावित प्रस्ताव को शामिल करते हुए डाक मतपत्र की नोटिस को मंजूरी दें और उसमें एक व्याख्यात्मक विवरण कंपनी सचिव को, या कंपनी सचिव की अनुपस्थिति में कंपनी के किसी भी निदेशक को डाक मतपत्र प्रक्रिया का संचालन करने के लिए, अन्य दस्तावेजों के साथ नोटिस पर हस्ताक्षर करना होगा और भेजना होगा।
  3. डाक मतपत्र के लिए एक संवीक्षक (स्क्रूटिनाइजर) नियुक्त करें।
  4. डाक मतपत्र के लिए ई-मतदान हेतु एक एजेंसी नियुक्त करें।
  5. मतदान अधिकारों की गणना के लिए कट-ऑफ तारीख निर्धारित करें और यह निर्धारित करें कि किन सदस्यों को नोटिस और डाक मतपत्र प्राप्त होंगे [सचिवीय मानक -2 की धारा 16.3]।

डाक मतपत्र द्वारा प्रस्ताव पारित करना – प्रक्रिया

  1. शेयरधारकों को एक मसौदा प्रस्ताव के साथ सूचित किया जाना चाहिए। [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014, नियम 22(1) और 22(2)]:

जब किसी कंपनी को डाक मतपत्र के माध्यम से एक प्रस्ताव पारित करने की आवश्यकता होती है या चुनती है, तो उसे सभी शेयरधारकों को एक नोटिस भेजना होगा, साथ ही एक मसौदा प्रस्ताव के साथ ऐसा करने के कारणों को बताना होगा और अनुरोध करना होगा कि वे अपनी सहमति या असहमति डाक मतपत्र पर लिखित रूप में भेजें, क्योंकि डाक मतपत्र का तात्पर्य नोटिस भेजे जाने की तारीख से तीस दिनों के भीतर डाक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान करना है। निम्नलिखित द्वारा नोटिस भेजा जाएगा

  • पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट, या
  • इलेक्ट्रॉनिक तरीके जैसे पंजीकृत ई-मेल आईडी, या
  • कूरियर सेवा द्वारा, तीस दिन की अवधि के भीतर प्रस्ताव पर शेयरधारक की सहमति या असहमति के संचार की सुविधा के लिए,

2. भेजे गए मतपत्रों के बारे में एक नोटिस प्रकाशित करें [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 22 (3), और सचिवीय मानक – 2 के खंड 16.4.4]।

कम से कम एक बार उस जिले की प्रमुख स्थानीय भाषा में प्रकाशित एक स्थानीय समाचार पत्र में, जिसमें कंपनी का पंजीकृत कार्यालय स्थित है और उस जिले में व्यापक प्रसार होता है, और कम से कम एक बार उस जिले में प्रकाशित एक अंग्रेजी समाचार पत्र में, इसके बारे में एक विज्ञापनमतपत्र भेजना और एक बयान निर्दिष्ट करना कि व्यवसाय डाक मतपत्र द्वारा संचालित किया जाएगा, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान शामिल है; नोटिस वितरण पूरा होने की तारीख; मतदान की तारीख (डाक और ई-मतदान) में कहा गया है कि समय सीमा के बाद किसी सदस्य से प्राप्त कोई भी डाक मतपत्र अमान्य होगा, और मतदान, चाहे मेल द्वारा या इलेक्ट्रॉनिक रूप से, समय सीमा से परे अनुमति नहीं दी जाएगी;

  • इस आशय का एक कथन कि व्यवसाय का लेन-देन डाक मतपत्र द्वारा किया जाना है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान भी शामिल है।
  • नोटिस भेजने का काम पूरा होने की तारीख
  • मतदान शुरू होने की तारीख (डाक और ई-मतदान)।
  • मतदान की समाप्ति की तारीख (डाक और ई-मतदान)।
  • यह कथन कि उक्त तारीख के बाद सदस्य से प्राप्त कोई भी डाक मतपत्र वैध नहीं होगा और चाहे डाक से हो या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, उक्त तारीख के बाद मतदान की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  • इस आशय का एक कथन कि जिन सदस्यों को डाक मतपत्र प्राप्त नहीं हुए हैं, वे कंपनी में आवेदन कर सकते हैं और उसकी डुप्लिकेट प्राप्त कर सकते हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान सहित डाक मतपत्र से मतदान से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए जिम्मेदार व्यक्ति का संपर्क विवरण।
  • परिणामों की घोषणा का दिन, तारीख, समय और स्थान और वेबसाइट का लिंक जहां ऐसे परिणाम प्रदर्शित किए जाएंगे।

3. कंपनी की वेबसाइट पर डाक मतपत्र का नोटिस पोस्ट करें [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 22(4) और सचिवीय मानक – 2 के खंड 16.4.2]।

डाक मतपत्र का नोटिस सदस्यों को भेजे जाने के तुरंत बाद कंपनी की वेबसाइट पर पोस्ट किया जाएगा,और ऐसे नोटिस सदस्यों से डाक मतपत्र प्राप्त करने के अंतिम दिन तक कंपनी की वेबसाइट पर रहेगे।

4. एक संवीक्षक की नियुक्ति [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014, नियम 22(5) और 22(6)]:

निदेशक मंडल एक ऐसे संवीक्षक का चयन करेगा जो कंपनी का कर्मचारी नहीं है और जो, मंडल की राय में, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से डाक मतपत्र मतदान प्रक्रिया का संचालन कर सकता है। आवश्यक बहुमत निर्धारित करने के उद्देश्य से नियुक्त होने के लिए संवीक्षक को इच्छुक और उपलब्ध होना चाहिए।

5. संवीक्षक की रिपोर्ट प्राप्त करें [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014, नियम 22(8), 22(9), और 22(12), और सचिवीय मानक-2 का खंड 16.6.1]:

डाक मतपत्र पर शेयरधारक की लिखित सहमति या असहमति प्राप्त करने के बाद, कोई भी शेयरधारक की पहचान को विरूपित, नष्ट या उजागर नहीं करेगा। संवीक्षक को डाक मतपत्र प्राप्त करने की अंतिम तारीख के बाद यथाशीघ्र अपनी रिपोर्ट सात दिनों के भीतर प्रस्तुत करनी होगी। यदि नोटिस की तारीख से तीस दिनों के बाद कोई सहमति या असहमति प्राप्त होती है, तो इसे ऐसे माना जाएगा जैसे सदस्य ने जवाब नहीं दिया है।

6. संवीक्षक को सहमति या असहमति का रजिस्टर रखना होगा [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 का नियम 22(10)]:

संवीक्षक शेयरधारक की सहमति या असहमति को रिकॉर्ड करने के लिए मैन्युअल या इलेक्ट्रॉनिक रूप से एक रजिस्टर रखेगा, जिसमें शेयरधारक का नाम, पता, फोलियो नंबर या क्लाइंट आईडी, धारित शेयरों की संख्या, ऐसे शेयरों का नाममात्र मूल्य, क्या शेयरों में अंतर है मतदान अधिकार यदि कोई हो, और विरूपित या कटे-फटे डाक मतपत्रों का विवरण, होगा।

6. संवीक्षक की सुरक्षित अभिरक्षा और मतपत्र कंपनी को सौंपना [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 का नियम 22(11)]:

संवीक्षक डाक मतपत्र और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान सहित अन्य सभी संबंधित कागजात को तब तक सुरक्षित रखेगा जब तक कि अध्यक्ष मिनटों की समीक्षा, पुष्टि और हस्ताक्षर नहीं करता है, जिसके बाद संवीक्षक मतपत्र दस्तावेजों और अन्य संबंधित कागजात और रजिस्टर कंपनी को वापस कर देगा।

7. मतपत्र और अन्य संबंधित कागज और रजिस्टर को रखना [कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 का नियम 22(11)]:

प्रत्येक कंपनी को ऐसे मतपत्र और अन्य संबंधित कागजात, साथ ही सहमति या असहमति के रजिस्टर को एक सुरक्षित स्थान पर रखना होगा।

8. वेबसाइट पर परिणाम की घोषणा [सचिवीय मानक – 2 के 16.6.2 और कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 22(13)]

नतीजों को संवीक्षक की रिपोर्ट के साथ कंपनी की वेबसाइट पर पोस्ट करके सार्वजनिक किया जाएगा।

ई-मतदान का मतलब

शब्द “इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली” एक सुरक्षित प्रणाली को संदर्भित करता है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक मतपत्रों का प्रदर्शन, सदस्यों के वोटों की रिकॉर्डिंग और पक्ष या विपक्ष में डाले गए वोटों की संख्या शामिल है, ताकि सभी इलेक्ट्रॉनिक मतदान को पर्याप्त साइबर सुरक्षा के साथ एक केंद्रीकृत सर्वर में रिकॉर्ड और गिना जाए।

डाक मतपत्र के लिए ई-मतदान की प्रासंगिकता

अधिनियम की धारा 108 जब कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 20 के साथ जोडी जाती है, जो इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रदान करता है, तो कुछ कंपनियों को सामान्य बैठक में मतदान के मामले में ई-मतदान सुविधा प्रदान करनी होगी। विचाराधीन धारा में डाक मतपत्रों का कोई उल्लेख नहीं है।

कंपनी (प्रबंधन और प्रशासन) नियम, 2014 के नियम 20 के साथ पठित अधिनियम की धारा 110, जिसमें डाक मतपत्रों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं, में डाक मतपत्र के मामले में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदान की अनिवार्य आवश्यकता के संबंध में कोई स्पष्ट शर्त नहीं है सिवाय उसके जो नियम 20 में है।

सेबी द्वारा संशोधित सूचीबद्ध समझौते के खंड 35B के अनुसार, सभी शेयरधारक प्रस्तावों को सामान्य बैठकों में या डाक वोट द्वारा पारित करने के लिए ई-मतदान आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों और ई-मतदान सुविधाओं के मामले में आम बैठक को भौतिक रूप से बुलाने और डाक मतपत्र पद्धति के माध्यम से पारित प्रस्तावों के मामले में दोनों की पेशकश की जानी चाहिए।

ई-मतदान एवं डाक मतपत्र के संबंध में निर्णय

वडाला कमोडिटीज लिमिटेड बनाम गोदरेज इंडस्ट्रीज लिमिटेड (2014) के मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने डाक मतपत्र और ई-मतदान पर एक निर्णय जारी किया। न्यायालय ने कहा है कि डाक मतपत्र और ई-मतदान केवल अतिरिक्त विकल्प हैं जिनका उपयोग सामान्य बैठक की आवश्यकता को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता है। इस मामले में मुद्दा यह था कि क्या कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 110 के प्रावधानों और 21 मई, 2013 के सेबी परिपत्र के आलोक में, समामेलन (एमल्गमेशन) की एक योजना के अनुमोदन के लिए प्रस्ताव को अधिकांश इक्विटी शेयरधारकों द्वारा डाक मतपत्र द्वारा पारित किया जा सकता है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से मतदान, वास्तविक बैठक के लिए अपूर्ण प्रतिस्थापन शामिल है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मामले में फैसला सुनाया कि शेयरधारकों की केवल पोस्ट या ईमेल द्वारा उन्हें आपूर्ति की गई सामग्री के आधार पर मतदान देने की क्षमता सेबी परिपत्र और संशोधित सूचीबद्ध समझौते के खंड 35B और 49 के विधायी अर्थ और भावना के विपरीत प्रतीत होती है।

निष्कर्ष

कंपनी अधिनियम 2013 के डाक मतपत्र प्रावधान हितधारक जुड़ाव और सक्रियता बढ़ाने के विधायिका के अन्य प्रयासों के अनुरूप प्रतीत होते हैं। व्यवसाय के कुछ उत्पाद जिनके लिए सदस्य की मंजूरी की आवश्यकता होती है, उन्हें केवल डाक मतपत्र के माध्यम से मांगा जाना चाहिए, जबकि व्यवसाय के कुछ टुकड़े जिन्हें निदेशक या लेखा परीक्षक द्वारा सुनने के अवसर की आवश्यकता होती है, उन्हें अधिनियम के अनुसार केवल विधिवत बुलाई गई आम बैठक में ही लेन-देन किया जाना चाहिए।

सूचीबद्ध समझौते के लिए यह भी आवश्यक है कि सभी शेयरधारक प्रस्तावों के लिए ई-मतदान सुविधा प्रदान की जाए, चाहे वे डाक मतपत्र द्वारा पारित हों या सामान्य बैठक में।

संदर्भ

 

नींद का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है

यह लेख Syeda Salma Fathima द्वारा लिखा गया है। जो प्रौद्योगिकी कानून, फिनटेक विनियम और प्रौद्योगिकी अनुबंध में डिप्लोमा कर रही है,और  संपादित Shashwat Kaushik के द्वारा किया गया है । इस लेख का प्रमुख उद्देश्य मौलिक अधिकार के रूप में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के महत्व और व्यक्तिगत भलाई और सामाजिक प्रगति के लिए इसके निहितार्थ(इम्प्लीकेशन) पर कुछ प्रकाश डालना है। इसका अनुवाद Pradyumn singh ने किया है । 

परिचय 

नींद सृष्टिकर्ता (क्रीऐटर) द्वारा मानव जाति को दिए गए सबसे महान उपहारों में से एक है। सामान्य तौर पर मानव शरीर को आराम की आवश्यकता होती है, और नींद वह शांति और ताकत प्रदान करती है क्योंकि यह तनाव और कमजोरी को दूर करती है और शरीर की स्व-मरम्मत तंत्र में मदद करती है। नींद हमेशा शांति लाती है; रात में पर्याप्त नींद शारीरिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण को बढ़ावा देती है,और कुल मिलाकर, जीवन की गुणवत्ता प्रदान करती है। नींद, मानव अस्तित्व के लिए एक बुनियादी आवश्यकता होने के नाते, जीवन का अभिन्न अंग है। नींद की कमी से एकाग्रता की कमी हो जाती है और इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है। नींद, एक मूलभूत आवश्यकता होने के नाते, समाज की भलाई के लिए संरक्षित की जाएगी, क्योंकि नींद में व्यवधान वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था में व्यवधान है। यदि नागरिकों के अधिकारों पर ध्यान नहीं दिया गया तो कोई प्रगति और विकास नहीं होगा। स्वस्थ जीवन से ही महान उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ का दायरा बढ़ाते हुए गहरी नींद के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया। 

नींद की कमी पर शोध

अमेरिकन केमिकल सोसायटी के जर्नल ऑफ प्रोटेम रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नींद की कमी से मस्तिष्क के सुरक्षात्मक प्रोटीन में गिरावट आती है जिससे न्यूरॉन्स की मृत्यु हो जाती है। नींद की कमी न केवल व्यक्ति के मूड को प्रभावित करती है बल्कि मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालती है और पाचन संबंधी विकारों और न्यूरोसाइकाइट्रिक गड़बड़ी का खतरा भी बढ़ जाता है।

भारत में, हाल के वर्षों में, सोने के अधिकार ने महत्वपूर्ण ध्यान आकर्षित किया है, विशेष रूप से एक ऐतिहासिक मामले में पुनःरामलीला मैदान हादसा दिनांक. … बनाम गृह सचिव और अन्य। (2012), जब सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का धारा 144 लागू करते हुए आधी रात के दौरान रामलीला मैदान में सो रहे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया, जिससे भगदड़ फैल गई। इस प्रकरण को  सर्वोच्च न्यायालय ने सुओ मोटो स्वयं खुद के हाथ में ले लिया, क्योंकि सोती हुई भीड़ को परेशान करना मौलिक अधिकार का उल्लंघन था। इस मामले ने सर्वोच्च न्यायालय ने नींद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक रास्ता तैयार किया क्योंकि भारतीय संविधान में नींद के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिया गया है। 

नींद का अधिकार भारतीय संविधान के भाग III में शामिल है, जो इस मौलिक अधिकार की पुष्टि और सुरक्षा करता है। मौलिक अधिकार, संविधान की मूल संरचना होने के कारण, इसमें संशोधन नहीं किया जा सकता है; मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह की परिवर्तन संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होगी। भारत में मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों और यहां तक ​​कि विदेशियों दोनों के लिए उपलब्ध हैं।

मौलिक अधिकार के रूप में नींद के अधिकार की पृष्ठभूमि

नींद के अधिकार का सार अनुच्छेद 21 से समझा जा सकता है। इसका दायरा बहुत व्यापक है; कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 21 संविधान का एकमात्र ऐसा अनुच्छेद है जो संविधान बनने के बाद से कई बार व्याख्या की गया है। अनुच्छेद 21 में तीन तत्व हैं- जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाएं।

कानून द्वारा स्थापित यह अवधारणा अमेरिकी संविधान से उधार लिया गया है। किसी भी व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता बिना कानून के उचित प्रक्रिया को अपनाएं। परन्तु भारत में, हम अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर की सिफारिश पर कानून द्वारा स्थापित वाक्यांश प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, जो केवल प्रक्रियात्मक कानून और मनमानी कार्यकारी कार्रवाई पर केंद्रित है।

महत्वपूर्ण कानूनी मामले 

वर्ष 1978 तक हमें केवल मनमानी कार्यकारी कार्रवाई से ही सुरक्षा मिलती थी; फिर मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) मामले में अनुच्छेद 21 के दायरे को विस्तार से बताया गया और फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की व्यापक परिभाषा पर विचार किया गया। इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले किसी भी प्रक्रियात्मक कानून को तर्कसंगतता (रीजनेबिलिटी) की परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी और प्रक्रिया निष्पक्ष, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के व्यापक परिप्रेक्ष्य में आज तक अनुच्छेद 21 के तहत कई नए तत्वों को शामिल किया गया है, जैसे निजता, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि का अधिकार और अब सोने का अधिकार। आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 21 को निलंबित नहीं किया जा सकता है। 1978 का 44वाँ संशोधन अधिनियम में यह घोषित किया गया कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

नींद  के अधिकार का दायरा

भारतीय संविधान में सोने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत मौलिक अधिकार के रूप में शामिल है; यह प्रदान करता है कि प्रत्येक नागरिक को एक सभ्य वातावरण, शांति से रहने का अधिकार, रात में सोने का अधिकार और अवकाश का अधिकार है। रात में शांतिपूर्ण माहौल में सोने के दूसरे के अधिकार का कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता है क्योंकि सोने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में सीमित कर दिया गया है, यह पूर्ण अधिकार नहीं है; इसमें कुछ प्रतिबंध हैं। जैसे, अनुच्छेद 19, जिसमें भारत के नागरिकों के लिए विभिन्न स्वतंत्रताएं जैसे भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि शामिल हैं, पूर्ण अधिकार नहीं हैं; वे कुछ कानूनी उचित प्रतिबंधों से बंधे हैं।

सोने का अधिकार एक निहित अधिकार है; इसमें सोने की जगह, सोने का समय और सोने के तरीके जैसे कुछ प्रतिबंध हैं। कोई भी नागरिक अनुचित कार्य नहीं कर सकता, जैसे दिन में सोना, नग्न होकर सोना, सार्वजनिक स्थानों पर सोना आदि। जबकि दुनिया की अधिकांश कानूनी प्रणालियों में, सोने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है; इसके बजाय, इसे अक्सर जीवन, स्वास्थ्य और कल्याण के अधिकार जैसे मानव अधिकारों और श्रम कानून के कानूनी ढांचे के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया जाता है। इसे स्वास्थ्य और सम्मान के अधिकार के रूप में सुरक्षित रखा गया है। भारत इस संवेदनशील विषय पर नज़र डालने वाला पहला देश है क्योंकि नींद जीवन की समग्र गुणवत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ऐतिहासिक मामले जिनके कारण नींद के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में पेश किया गया

सईद मकसूद अली बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2001)

सईद मकसूद अलि बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य  मामले में, कुछ हद तक, सोने के अधिकार की अप्रत्यक्ष रूप से व्याख्या की गई।

मामले के तथ्य

सईद मकसूद अली, एक हृदय रोगी, जिसका घर डॉ. बटालिया आई हॉस्पिटल, घंटाघर, जबलपुर के पास सिंधी धर्मशाला के किनारे स्थित था। धर्मशाला में कई धार्मिक आयोजन होते थे और इसे शादी-ब्याह व अन्य समारोहों के लिए किराये पर भी दिया जाता था। जिसमे तेज आवाज में संगीत बजाने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जाता था जिससे याचिकाकर्ता को परेशानी थी। पुलिस प्राधिकरण को विभिन्न शिकायतें की गईं, क्योंकि पुलिस को ध्वनि प्रदूषण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का अधिकार पुलिस अधिनियम, 1861 के धारा 30 के तहत प्राप्त है, लेकिन इसके तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई है। अतः मामला माननीय उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश में दायर किया गया।

मामले में शामिल मुद्दे

 

याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत प्रतिवादी संख्या 7 के खिलाफ ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के प्रावधानों के तहत लाउडस्पीकर और अन्य पब्लिक एड्रेस सिस्टम के उपयोग के लिए शिकायत दर्ज की है, जिससे उसको परेशानी हुई और सार्वजनिक शांति प्रभावित हुई। यह शिकायत इसलिए दर्ज किया गया क्योंकि अत्यधिक शोर उत्पन्न करना कानूनन अनुचित है और नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अत्यधिक ध्वनि से सुरक्षा का अधिकार है। 

निर्णय

वर्ष 2017 में, उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी “प्रत्येक नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक सभ्य वातावरण में रहने का अधिकार है और रात में शांति से सोने का अधिकार है”।

रामलीला मैदान हादसा दिनांक. … बनाम गृह सचिव और अन्य (2012)

मामले के तथ्य

इस मामले मे रामलील मैदान को 1 जून से 20 जून 2011 तक योग प्रशिक्षण शिविर के लिए किराये पर दिया गया था, लेकिन 4 जून से बाबा रामदेव ने “भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक” के समर्थन के आदर्श वाक्य के साथ अपनी भूख हड़ताल शुरू कर दी। भारत के विभिन्न हिस्सों से बहुत सारे योग शिविर में भाग लेने आए और अप्रत्याशित रूप से हड़ताल में शामिल हो गए। हड़ताल पर हजारों लोग थे,पर जो चल रहा था उससे पूरी तरह अनजान थे।

मामले में शामिल मुद्दे

जब बाबा रामदेव ने सरकार से बातचीत करने से इनकार कर दिया तो देर रात करीब 12:30 बजे पुलिस ने कारवाई करते हुए सोते हुए प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और अंधाधुंध लाठियां बरसायी। पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 144 के लागू करते हुए आधी रात के दौरान रामलीला मैदान में सो रहे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया। जो किसी भी राज्य या क्षेत्र के कार्यकारी मजिस्ट्रेट को एक क्षेत्र में चार या अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगाने के आदेश का दुरुपयोग करने का अधिकार देता है। इससे कई लोग घायल हो गए और यहां तक ​​कि एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। सोती हुई भीड़ पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई उनके अधिकारों का उल्लंघन है। सोती हुई भीड़ के खिलाफ पुलिस की क्रूर कार्रवाई पर न्यायमूर्ति चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की  पीठ ने सुओं मोटों लिया तथा मामले की सुनवाई करने का फैसला किया। 

 निर्णय

न्यायालय ने निर्णय में अनुच्छेद 19(a), भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(b), बिना हथियार के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने के अधिकार उल्लंघन को पाया। जस्टिस चौहान ने कहा, “नींद जीवन की मूलभूत बुनियादी आवश्यकता है।” यदि विषम समय में नींद में खलल पड़ता है, तो मन विचलित हो जाता है, और यह ऊर्जा असंतुलन और अपच के माध्यम से स्वास्थ्य चक्र को बाधित करता है और हृदय स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। जिसके परिणामस्वरूप प्रतिकूल चयापचय (मेटाबोलिक) प्रभाव पड़ता है। अनुच्छेद 19 और 21 के तहत बल का क्रूर प्रयोग पूरी तरह से अनुचित था।

जस्टिस चौहान ने कहा  “किसी व्यक्ति को अचानक उत्तेजित करने से सदमा और सुन्नता का एहसास होता है; जो व्यक्ति नींद में है वह आधा मरा हुआ है; अचानक जागृति के दबाव के परिणामस्वरूप संवेदना लगभग शून्य हो जाती है, इसलिए इस तरह की कार्रवाई व्यक्ति के बुनियादी जीवन को प्रभावित करती है”। अमेरिकी अदालत के एक फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस चौहान ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को आराम करने, सोने, न सुनने और चुप रहने का अधिकार है। कानून के अधिकार के बिना, चाहे दिन हो या रात, दरवाजे खटखटाना पुलिस द्वारा निजता में घुसपैठ और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। बहुत सारे देशों ने पूरी तरह से रात का कर्फ्यू लगा दिया है, देर रात विमानों के लैंडिंग और उड़ानों दोनों  पर प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि नागरिकों को अच्छी नींद मे कोई बाधा न हो, अच्छी नींद अच्छे स्वास्थ्य से जुड़ी है, जो अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का एक अविभाज्य (अनडिवाइडेड) पहलू है, यह भारतीय संविधान का एक अपरिहार्य (इंसेपरेबल) अधिकार है।

जस्टिस चौहान ने “यह स्पष्ट है कि निजता का अधिकार और सोने का अधिकार हमेशा सांस लेने, खाने, पीने, पलक झपकने आदि के अधिकार की तरह मौलिक अधिकारों के रूप में माना गया है।”

निष्कर्ष

गतिशील भारत में कानूनी प्रणाली की सर्वोच्चता राष्ट्र और उसके लोगों की भलाई के लिए नए प्रावधानों को शामिल करके अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा के लिए बदलती जरूरतों के अनुसार लगातार विकसित हो रही है। अनुच्छेद 21 का आयाम निरंतर नई सीमाओं की ओर बढ़ रहा है। नींद को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार करते हुए, भारतीय संविधान ने एक बार फिर संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता को प्रदर्शित किया और साबित किया कि मानव जाति की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए संविधान आवश्यक है।

संदर्भ 

भारत में महिलाओं के अधिकार और श्रम कानून

यह लेख Kabir Jaiswal द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वह भारत में महिला अधिकारों और श्रम कानून पर चर्चा करते हैं। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है। 

परिचय

  • भारत की श्रम शक्ति जल्द ही दुनिया में सबसे बड़ी हो जाएगी। भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के कार्यालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में महिला श्रमिकों की कुल संख्या 149.8 मिलियन है और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिला श्रमिकों की संख्या क्रमशः 121.8 और 28.0 मिलियन है।
  • कुल 149.8 मिलियन महिला श्रमिकों में से 35.9 मिलियन महिलाएँ कृषक के रूप में काम कर रही हैं और अन्य 61.5 मिलियन कृषि मजदूर हैं।
  • शेष महिला श्रमिकों में से 8.5 मिलियन घरेलू उद्योग में हैं और 43.7 मिलियन को अन्य श्रमिकों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

हमारे दिवंगत प्रधान मंत्री माननीय जवाहरलाल नेहरू ने इसका अवलोकन किया था:

“लोगों को जगाने के लिए महिला को जगाना होगा, एक बार जब वह आगे बढ़ती है, तो परिवार चलता है, गांव चलता है, राष्ट्र चलता है। “

श्रमिकों का दुरुपयोग और भेदभाव किया जा रहा है और उनके मानवाधिकारों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, इसलिए उनके आश्वासन और सुरक्षा के लिए कानूनों के आदेश की आवश्यकता उत्पन्न हुई। कामकाजी महिलाएँ समाज का उल्लेखनीय हिस्सा बनाती हैं। श्रमिकों में, महिलाओं की स्थिति विशेष रूप से असहाय है, इसलिए सभी कार्य प्रस्तावों में कई प्रशासनिक अधिनियम दिए गए हैं जो काम करने वाली महिलाओं के मुद्दों को संबोधित करते हैं। महिलाओं को बुनियादी तौर पर निम्नलिखित कारणों से कुछ सुरक्षा की आवश्यकता होती है:

अजीब (पेक्यूलियर) एवं मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिकल) कारण- 

  • शारीरिक निर्माण
  • बार-बार गर्भधारण के कारण खराब तबियत
  • घर में कठिन परिश्रम
  • व्यवसाय की प्रकृति के कारण

श्रम पर दूसरा राष्ट्रीय आयोग, 2002

आयोग ने यह सिफ़ारिश करके महिलाओं के पक्ष में सुरक्षात्मक भेदभावपूर्ण कानून को भी उचित ठहराया है, कि ऐसे सभी कानून महिला श्रमिकों के लिए आवश्यक हैं।

जैसा कि हमारे माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में ठीक ही उल्लेख किया है,

“महिलाएं हमारी आबादी का 50% हिस्सा हैं और अगर वे बाहर नहीं आतीं है और काम नहीं करतीं है, तो हमारा देश उस गति से कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा जिसकी हम कल्पना करते हैं, और इसी कारण से, समय-समय पर सरकारों ने अधिनियम बनाने पर विशेष ध्यान दिया है। भारत की विकास गाथा में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कानूनों में संशोधन करना जरूरी है।”

प्राचीन काल से ही महिलाओं को पक्षपातपूर्ण परीक्षण का सामना करना पड़ा है। इस युग में भी, जैसे-जैसे युवा शिक्षित महिलाओं की बढ़ती संख्या लिपिकीय (क्लेरिकल) रोजगार में जा रही है, विभिन्न शब्द-संबंधी आयामों पर पुरुषों के क्रूर आचरण का सामना करने की उनकी संभावनाएँ बढ़ गई हैं।

श्रम क़ानूनों में महिलाओं के लिए सुरक्षा:

जबकि कई क़ानून केवल महिलाओं के लिए हैं, जैसे कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम, मातृत्व लाभ अधिनियम, आदि, कई अन्य क़ानून जो सामान्य कामकाजी आबादी के लिए हैं, उनमें महिला श्रमिकों के कल्याण के लिए भी विशेष प्रावधान हैं, अर्थात् :

महिला कर्मचारियों के लिए क्रेच सुविधा:

कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 48 के प्रावधानों के अनुसार, “30 या अधिक महिला श्रमिकों को रोजगार देने वाली किसी भी कारखाना को महिला कर्मचारियों के लिए 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के उपयोग के लिए क्रेच सुविधाएं प्रदान करना आवश्यक है।”

क्रेच का प्रावधान निम्नलिखित के अंतर्गत मौजूद है:

  1. कारखाना अधिनियम, 1948;
  2. खान अधिनियम, 1952;
  3. बागान श्रम अधिनियम, 1951;
  4. भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1996;
  5. बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम, 1966;
  6. अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970;
  7. अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1979।

सुरक्षा/ स्वास्थ्य उपाय

धारा 22 (2)  कारखाना अधिनियम, 1948 इस अधिनियम में प्रावधान है कि किसी भी महिला को प्राइम मूवर या ट्रांसमिशन मशीनरी के किसी भी हिस्से को साफ करने, चिकना करने या समायोजित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जबकि प्राइम मूवर या ट्रांसमिशन मशीनरी गति में है।
2. धारा 27  कारखाना अधिनियम, 1948 यह धारा, कपास (कॉटन) दबाने के कारखाने के किसी भी हिस्से में महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है जिसमें कपास खोलने वाला काम करता है।
3. धारा 34 कारखाना अधिनियम, 1948 कोई भी महिला कर्मचारी 30 किलोग्राम वजन की अधिकतम सीमा से अधिक किसी भी सामग्री, वस्तु, उपकरण को हाथ से या सिर पर नहीं उठाएगी या हिलाएगी नहीं।
4. धारा 46 (2) (d) कारखाना अधिनियम, 1948 कैंटीन प्रबंध समिति में कम से कम एक महिला (कार्यकर्ता) होगी।
5. धारा 41, धारा 43 अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970  अलग शौचालय और कैंटीन
6. धारा 40, धारा 41  अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1979  अलग शौचालय और कैंटीन

खतरनाक व्यवसायों में काम का निषेध

  1. कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 22(2) महिलाओं को चलती हुई या किसी भी स्थिति में मशीनरी के साथ काम करने से रोकती है।
  2. साथ ही कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 87 राज्य सरकार को खतरनाक कार्यों में महिलाओं के रोजगार पर रोक लगाने का अधिकार देती है।
  3. कारखाना अधिनियम भी कपास दबाने के काम में महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है, जहाँ कपास खोलने वाला काम करता है। इसमें प्रावधान है कि यदि कपास खोलने का फीड छोर डिलीवरी छोर से छत के विभाजन द्वारा अलग किए गए कमरे में है या ऐसी ऊंचाई पर है जैसा निरीक्षक किसी विशेष मामले में लिखित रूप में निर्दिष्ट कर सकता है, तो धारा 27 के तहत महिलाओं को इस विभाजन के किनारे जहां फ़ीड अंत स्थित है, नियोजित किया जा सकता है।
  4. धारा 34 में कहा गया है कि अधिकतम अनुमेय भार महिलाओं को भारी वजन उठाने से उत्पन्न होने वाले खतरों से बचाने के लिए, कारखाना अधिनियम उपयुक्त सरकारों को महिलाओं द्वारा उठाए जाने वाले अधिकतम भार को तय करने के लिए अधिकृत करता है। सभी राज्य सरकारों (यूपी को छोड़कर) द्वारा बनाए गए नियमों में कारखानों में कार्यरत महिलाओं के लिए निम्नलिखित अधिकतम वजन तय किए गए हैं।
वयस्क महिलाएं 65 पाउंड
2. किशोर (एडोलेसेंट) महिलाएं 55 पाउंड
3. बच्चे महिलाएं 30 पाउंड

निर्णायक मोड़ वाले मामले

  • पियर्सन बनाम बेल्जियम कंपनी लिमिटेड के मामले में, सवाल यह था कि क्या एक महिला मशीन के स्थिर हिस्सों को साफ कर सकती है यदि मशीन पूरी तरह से गति में है। न्यायालय ने माना कि यदि पूरी मशीनरी चालू है तो मशीन के स्थिर हिस्सों को भी एक महिला द्वारा साफ नहीं किया जा सकता है।
  • इसके अलावा, रिचर्ड थॉमस और बाल्डविंस लिमिटेड बनाम कमिंग्स के मामले में, न्यायालय ने कहा कि यदि मशीनरी बंद होने के दौरान किसी व्यक्ति को कोई चोट लगती है, यदि बिजली काट दी गई थी और मशीनरी की मरम्मत चल रही थी, तो वैधानिक कर्तव्य का कोई उल्लंघन नहीं होगा, क्योंकि हिस्से गति में नहीं थे बल्कि मरम्मत के उद्देश्य से हाथ से चलाये गये थे।
  • बी.एन. गामाडिया बनाम एंपरर के एक ऐतिहासिक मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि धारा के प्रावधानों का अनुपालन नहीं किया जाता है यदि दरवाजा कमरे के दो हिस्सों के बीच विभाजित है और एक महिला द्वारा खोला जाता है जब दरवाजा बंद है, लेकिन वह ताले से बंद नहीं है या यदि किसी महिला द्वारा दरवाजा खोलने से रोकने के लिए प्रभावी उपाय किए जाते हैं।

रात्रि कार्य का निषेध

धारा 66 (1) (b)  कारखाना अधिनियम, 1948 कारखाना अधिनियम, 1948 में कहा गया है कि किसी भी महिला को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच के घंटों के अलावा किसी भी कारखाने में काम करने की आवश्यकता नहीं होगी या अनुमति नहीं दी जाएगी।
2. धारा 25  बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम, 1966  बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम, 1966 में कहा गया है कि किसी भी महिला को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच के अलावा किसी भी औद्योगिक परिसर में काम करने की आवश्यकता नहीं होगी या अनुमति नहीं दी जाएगी।
3. धारा 46 (1) (b)  खान अधिनियम, 1952  सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच को छोड़कर जमीन के ऊपर किसी भी खदान में महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है।
4. दुकानें और प्रतिष्ठान अधिनियम (शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट), 1953 किसी भी महिला को रात 9:30 बजे के बाद किसी भी प्रतिष्ठान में काम करने की आवश्यकता नहीं होगी या अनुमति नहीं दी जाएगी।
5. धारा 25 बागान श्रम अधिनियम, 1951 राज्य सरकार की अनुमति के अलावा, किसी भी महिला या बाल श्रमिक को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के अलावा किसी भी बागान में नियोजित नहीं किया जाएगा: बशर्ते कि इस धारा की कोई भी बात किसी बागान में कार्यरत दाइयों और नर्सों पर लागू नहीं मानी जाएगी।
6. अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1979 किसी भी महिला को रात 9:30 बजे के बाद किसी भी प्रतिष्ठान में काम करने की आवश्यकता नहीं होगी या अनुमति नहीं दी जाएगी।

त्रिवेणी के.एस. और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में धारा 66(1)(b) की संवैधानिकता को भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने माना कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा और कल्याण के लिए रात के समय भी नियोजित नहीं किया जाना चाहिए, यह एक तत्कालीन युग की विचारधारा थी जो समानता के लिए आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थी, खासकर लिंगों के बीच। मछली पकड़ने और डिब्बाबंदी उद्योग को प्रदान किए गए अपवाद के संबंध में, यह माना गया कि यह एक हास्यास्पद दावा प्रतीत होगा कि इन क्षेत्रों में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित होंगी लेकिन कपड़ा उद्योग में अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। नतीजतन, अधिनियम की धारा 66(1)(b) को उच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक करार दिया गया और घोषणा की गई कि मछली पकड़ने के उद्योग में महिलाओं को भी कमोबेश वही सुरक्षा दी जानी चाहिए जो कुछ प्रदान की गई है।

अलग शौचालय और मूत्रालय के लिए प्रावधान

धारा 19  कारखाना अधिनियम 1948 
2. धारा 20 खान अधिनियम  1952
3. धारा 9  बागान श्रम अधिनियम  1951
4. नियम 42 अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (आरईसीएस) केंद्रीय नियम ( द इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमन (आरईसीएस) सेंट्रल रूल्स) 1980
5. धारा 53 संविदा श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम  1970
6. भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम  1996
7. बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम  1966

शौचालय और मूत्रालय सुविधाएँ कारखाना अधिनियम, 1948 में महिला श्रमिकों को अलग से सफाई सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं

  • कारखाना अधिनियम, 1948 प्रत्येक कारखाना के लिए पुरुष और महिला श्रमिकों के लिए अलग-अलग निर्धारित प्रकार के शौचालय और मूत्रालयों की पर्याप्त संख्या बनाए रखना अनिवार्य बनाता है।
  • ऐसी सुविधाएं सुविधाजनक रूप से स्थित होनी चाहिए और कारखाने में रहने के दौरान श्रमिकों के लिए हर समय सुलभ होनी चाहिए।
  • प्रत्येक शौचालय को गुप्त रूप से और इस प्रकार विभाजित किया जाना आवश्यक है ताकि गोपनीयता सुरक्षित रहे और उसमें उचित दरवाजा और बन्धन हो।
  • शौचालयों, मूत्रालयों और कपड़े धोने के स्थानों को साफ रखने के लिए सफाईकर्मियों को नियुक्त करना आवश्यक है।
  • निर्माण के मानक और पुरुष और महिला श्रमिकों के लिए प्रदान किए जाने वाले शौचालय आवास का पैमाना संबंधित राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में निहित है।

अलग धुलाई सुविधाओं के लिए प्रावधान:

धारा 42 कारखाना अधिनियम 1948 
2. धारा 43, धारा 41(4), धारा 41(9)(ii) अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (आरईसीएस) अधिनियम  1979
3. धारा 57, धारा 44 अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम  1970
4. धारा 34 भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम 1996

कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 42 (1)(b) के अनुसार पुरुष और महिला श्रमिकों के उपयोग के लिए अलग-अलग और पर्याप्त रूप से स्क्रीन वाली धुलाई सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। ऐसी सुविधाएं सुविधाजनक रूप से सुलभ होंगी और साफ-सुथरी रखी जाएंगी। हालाँकि, राज्य सरकार को धुलाई के लिए पर्याप्त और उपयुक्त सुविधाओं के मानक निर्धारित करने का अधिकार है।

अत्यधिक वजन

धारा 34 संबंधित राज्य सरकार को अधिकतम वजन सीमा के बारे में नियम बनाने के लिए कुछ शक्तियां प्रदान करती है जिसे कारखानों में महिलाओं, पुरुषों और युवा लोगों द्वारा उठाया जाएगा। यह स्पष्ट रूप से दिया गया है कि किसी को भी नियोजित नहीं किया जा सकता है या ऐसा वजन उठाने के लिए नहीं कहा जा सकता है जो उन्हें नुकसान या चोट पहुंचा सकता है।

भूमिगत (सब- टेरेन) कार्य का निषेध

खान अधिनियम, 1952 की धारा 46(1)(b) जमीन के नीचे खदान के किसी भी हिस्से में महिलाओं के रोजगार पर रोक लगाती है।

कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत सूचना केंद्र के प्रावधान

प्रत्येक कारखाना महिला श्रमिकों के लिए एक सूचना केंद्र स्थापित करेगी ताकि उन्हें कानून और नियमों के अनुसार सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी प्रदान की जा सके।

कारखाना अधिनियम, 1948

अधिनियम का उद्देश्य:

श्रमिकों के हितों की रक्षा करने और उन्हें शोषण से बचाने के लिए, अधिनियम अन्य प्रावधानों के अलावा, श्रमिकों की सुरक्षा, कल्याण और काम के घंटों के संबंध में कुछ मानक निर्धारित करता है। कारखाना अधिनियम का उद्देश्य कारखानों में कार्यरत श्रमिकों को उनके नियोक्ताओं द्वारा अनुचित शोषण से बचाना है। उचित कामकाजी परिस्थितियों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण, उचित काम के घंटे, छुट्टी और अन्य लाभ सुनिश्चित करना शामिल है।

महिला श्रमिकों के लिए विशेष प्रावधान

  • कारखाने के श्रमिकों को कई अन्य सुविधाएं भी दी जाती हैं, जैसे महिलाओं के लिए कपड़े धोने और नहाने की सुविधाएं, शौचालय (महिलाओं के लिए अलग शौचालय और मूत्रालय), और कैंटीन। कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए सार्वजनिक उपयोगिता सुविधाएं अलग से पेश की जाएंगी।
  • एक महिला कर्मचारी की शिफ्ट के समय में साप्ताहिक अवकाश या बिल्कुल अलग अवकाश के अलावा बदलाव की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार, कर्मचारियों (महिला) को अब शिफ्ट समय में बदलाव के लिए कम से कम 24 घंटे का नोटिस प्राप्त करने का अधिकार है।
  • महिला श्रमिकों को खतरनाक व्यवसाय में काम करने से, जहां कपास खोलने वाला काम होता है वहां कपास दबाने से और अधिकतम स्वीकार्य भार को सीमित करने से प्रतिबंधित किया जाता है।
  • कारखाना अधिनियम 30 या अधिक महिला श्रमिकों को नियोजित करने वाले नियोक्ताओं को महिला श्रमिकों के 6 वर्ष और उससे कम आयु के बच्चों के लिए क्रेच प्रदान करने के लिए भी बाध्य करता है।
  • किसी भी महिला श्रमिक को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच के अलावा किसी कारखाने में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। राज्य सरकारें अधिसूचना द्वारा इस बिंदु पर निर्धारित सीमा में बदलाव कर सकती हैं, लेकिन किसी भी परिस्थिति में महिला कर्मचारियों को रात 10 बजे से सुबह 5 बजे के बीच काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

1987 में, खतरनाक उद्योगों की स्थापना के लिए खतरनाक सामग्रियों और प्रोटोकॉल के उपयोग और प्रबंधन के खिलाफ सुरक्षा उपायों की स्थापना करते हुए अधिनियम में संशोधन किया गया था।

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976

यहां फिर से, हमें वेतन भेदभाव की चर्चाएं और मामले मिलते हैं, जिसमें महिला श्रमिकों को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है। यह कहानी पूरी दुनिया में है, यहाँ तक कि विकसित देशों में भी।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 39 निर्देश देता है कि “राज्यों को, विशेष रूप से, पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने की नीतियां बनानी होंगी।”

समान पारिश्रमिक अधिनियम के तहत:

  • नियोक्ता समान कार्य करने वाले पुरुष और महिला को समान वेतन देंगे।
  • नियोक्ता भर्ती प्रक्रिया में पुरुषों और महिलाओं के बीच कानूनी रूप से भेदभाव नहीं कर सकते जब तक कि कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के रोजगार की कोई कानूनी सीमा न हो।

आईएलओ सम्मेलन और संविधान

1919 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन) की स्थापना ने इस क्षेत्र में राज्य की गतिविधियों को काफी प्रभावित किया। इनमें से अधिकांश कानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा अपनाए गए सम्मेलनों और सिफारिशों से प्रेरित होते हैं।

भेदभाव की रोकथाम के विपरीत, रोजगार में समानता को बढ़ावा देना सकारात्मक प्रवर्तन है, जो एक प्रकार का नकारात्मक अधिकार या नकारात्मक समानता है। इसमें क्षैतिज (होराइजंटल) और ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) दोनों व्यावसायिक अलगाव को तोड़ना शामिल है।

1919 का आईएलओ संविधान, और समान पारिश्रमिक पर आईएलओ सम्मेलन 1951, दोनों “समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन” के सिद्धांत को मान्यता देते हैं। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के साथ-साथ 1976 के समान पारिश्रमिक अधिनियम में भी निहित है। ऐसी मान्यता के बावजूद अक्सर महिला श्रमिकों के लिए समान वेतन का मुद्दा ट्रेड यूनियनों द्वारा भी अप्रासंगिक हो जाता है, जैसा कि वे अक्सर करते हैं इसे एक ऐसी समस्या के रूप में न देखें जो समग्र रूप से श्रमिकों को प्रभावित करती है।

आय में असमानता का एक अन्य कारण यह है कि अधिकांश सक्रिय महिला कार्यबल कृषि और घरेलू कार्य जैसे अनौपचारिक क्षेत्र में शामिल है, जिसमें पारिश्रमिक और सामाजिक सुरक्षा के संदर्भ में बहुत कम नियम हैं।

अन्य अधिनियम

उपर्युक्त कानूनों के अलावा, महिला कारखाना श्रमिकों के कल्याण और सुरक्षा के लिए कुछ अन्य कानून भी हैं। इसके अलावा, महिला श्रमिकों को उनके लिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाले विभिन्न अधिनियमों के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए:

  • कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952;
  • कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948;
  • उपदान भुगतान अधिनियम, 1972;
  • बोनस भुगतान अधिनियम, 1965, आदि।

महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा की क्या आवश्यकता है?

  • हालाँकि भारत में उपलब्ध कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा महिलाएँ हैं, फिर भी उनमें कार्य भागीदारी (रोज़गार महिलाओं का प्रतिशत अभी भी कम है) और साथ ही रोज़गार की गुणवत्ता में कमी है।
  • इस महिला श्रम भागीदारी की कमी का एक कारण प्रस्ताव पर उपयुक्त नौकरियों की कमी है, यानी वे क्या कर सकती हैं और उनके लिए क्या उपलब्ध है, के बीच असमानता है।
  • रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की कम भागीदारी का एक अन्य कारण सुरक्षा का सवाल भी है। अगर महिलाओं में सुरक्षा की भावना को बढ़ाना है और इस तरह अधिक महिलाओं को नौकरियां लेने के लिए प्रोत्साहित करना है तो सुशासन और कानून प्रवर्तन बहुत जरूरी है।
  • एक और समस्या यह है कि जिन क्षेत्रों में महिलाएं कार्यरत हैं जैसे “घरेलू कार्य” वे “असंगठित क्षेत्र” के अंतर्गत आते हैं और यह इस अर्थ में समस्याग्रस्त है कि कार्यस्थल नियमों का कोई मजबूत सेट नहीं है; यह फिर से एक ऐसा कारक है जो सक्रिय कार्यबल में महिलाओं की कमी का कारण बनता है, क्योंकि करियर बनाना तो दूर, नौकरी बनाए रखना भी अविश्वसनीय रूप से कठिन है।
  • प्रतिकूल परिस्थितियों के मामले में महिलाओं की यह कमजोर स्थिति उद्योग पर किसी भी संभावित अचानक नकारात्मक प्रभाव से और खराब हो गई है क्योंकि वे पहले से ही असमान आंतरिक स्थितियों से जूझ रही हैं।
  • उन्हें प्रसव (चाइल्डबर्थ) और संबंधित मुद्दों से निपटना पड़ता है, उन्हें घरेलू ज़िम्मेदारी से भी निपटना पड़ता है, जो पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों के लिए ज्यादा चिंता का विषय नहीं है, आदि।

निष्कर्ष

महिलाओं के कल्याण के लिए बनाए गए कई विशेष प्रावधानों से यह देखा जा सकता है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर, श्रम कानून में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक आंदोलन हुआ है। भारत गणराज्य में समान वेतन, अवसर तक समान पहुंच, उत्पीड़न के निवारण और मातृत्व लाभ के प्रावधान को वास्तविकता बनाने की दिशा में एक पारदर्शी कदम उठाया गया है। वास्तव में, महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानों के संबंध में अधिकांश कानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन सम्मेलनों के आधार पर बनाए गए हैं।

कारखानों में महिलाओं को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, एक समय था जब उन्हें नौकरियों से वंचित कर दिया गया था या उन्हें निम्न परिस्थितियों और औसत मजदूरी से कम वेतन के साथ नौकरी दी गई थी, जो उन्हें अभी भी लेना पड़ा क्योंकि वे हताश थीं। यह इस बिंदु तक सुधार हुआ कि उनकी सहायता के लिए कानून लागू किया गया था लेकिन लाभ केवल कागज पर थे और व्यावहारिक रूप से नहीं। अब, अंत में, व्यवहार में लाभ दिखाई दे रहे हैं, विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र कल्याण योजनाओं के साथ-साथ सरकार द्वारा स्थापित हमारी महिला देखभाल निकायों की मदद से, कारखानों में महिलाओं को आखिरकार वह मिल रहा है जिसकी वे विधिवत हकदार हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का संस्थापक सदस्य होने के नाते भारत ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा प्रदान किए गए मानकों पर टिके रहने के लिए बहुत कठिन प्रयास किया है: विभिन्न श्रम कानूनों (यानी कारखाना अधिनियम, 1948, खान अधिनियम, 1952), बागान श्रम अधिनियम, 1951, भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1996, बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम, 1966, अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम , 1970, अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1979, मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948, कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952, उपदान भुगतान अधिनियम, 1972, और श्रमिक मुआवजा अधिनियम, 1923, न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948, वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 और समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976) इसका प्रमाण हैं, और इन अधिनियमों में महिलाओं को विशेष अधिकार प्रदान किए गए है।

हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इनमें से कुछ सुरक्षात्मक कानून उलटे पड़ गए हैं और प्रकृति में प्रतिकूल साबित हुए हैं। ऐसे मुद्दों को कानूनी के बजाय सामाजिक रूप से हल करने का एकमात्र तरीका, यानी सामाजिक हस्तक्षेप के माध्यम से काम के माहौल को सुरक्षित बनाकर, पैतृक प्रकृति के कानूनी नियमों में ढील दी जा सकती है। भारत को अगले स्तर का प्रयास प्रभावी कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) और निवारण तंत्र विकसित करना है। इन प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन और किसी भी शिकायत के निवारण को सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीका जमीनी स्तर पर, यानी व्यक्तिगत उद्यमों (एंटरप्राइज) और नियोक्ताओं के स्तर पर कार्यान्वयन शुरू करना है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कार्रवाई अधिक विशिष्ट प्रकृति की होगी और इससे अधिक ठोस परिणाम भी सामने आएंगे।

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष

यह लेख Rachna Kumari द्वारा लिखा गया है। यह लेख मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की उत्पत्ति, प्रकृति, उद्देश्य, दायरे और ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा करके मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष का गहन विश्लेषण प्रदान करता है। इस लेख का अनुवाद Vanshika Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत का संविधान एक लोकतांत्रिक राजनीति (डेमोक्रेटिक पॉलिटी) में नागरिक जीवन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्राप्त करता है। संविधान में कुछ अधिकारों की गारंटी दी गई है, जिन्हें मौलिक अधिकारों के रूप में जाना जाता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) को मजबूत करता है और उन्हें न्यायसंगत (जस्टिसएबल) बनाता है, जो नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में अदालत का रुख करने का अधिकार देता है।

दूसरी ओर, संविधान में राज्य के नीति के कुछ निर्देशक सिद्धांत भी शामिल हैं जिनका उद्देश्य हमारे संविधान की प्रस्तावना के तहत निहित न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता (जस्टिस, लिबर्टी, फ्रटर्निटी, एंड इक्वलिटी) के उच्च आदर्शों को साकार करना है। वे एक ‘कल्याणकारी राज्य’ (‘वेलफेयर स्टेट’) की अवधारणा को मूर्त रूप देते हैं जो देश में न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करना चाहता है। डीपीएसपी को इसलिए तैयार किया गया था क्योंकि संविधान निर्माताओं ने हमारे देश को अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाने की आकांक्षा की थी।। जैसे-जैसे हमारा समाज आगे बढ़ा, डीपीएसपी और एफआर की श्रेष्ठता के संबंध में संघर्ष उत्पन्न होने लगे। यह अदालत को तय करना था कि दोनों में से कौन एक-दूसरे पर भारी पड़ता है। हम ऐतिहासिक निर्णयों और हाल के मामलों के कानूनों की मदद से इसे विस्तार से समझेंगे। 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष

मतलब

मौलिक अधिकार और डीपीएसपी नागरिकों की स्वतंत्रताएं हैं और व्यक्तिगत अधिकारों के हितों की रक्षा के लिए राज्य को दिए गए निर्देश हैं। मौलिक अधिकार राज्य के अनुचित कार्यों के खिलाफ एक ढाल के रूप में कार्य करते हैं, जबकि डीपीएसपी यह सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में कार्य करता है कि राज्य देश को अपने मूल से मजबूत करने के लिए हमारे पूर्वजों के दृष्टिकोण के अनुसार कार्य कर रहा है। 

मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकार आवश्यक, बुनियादी, प्राकृतिक और अपरिहार्य अधिकारों (बेसिक, नेचुरल एंड इनलिइनेब्ल राइट्स) का एक समूह है जो सभी मनुष्यों के पास लिंग, जाति, नस्ल, धर्म आदि के बावजूद है, और उन्हें सार्वभौमिक और पवित्र माना जाता है। 

प्राकृतिक कानून दार्शनिक (नेचुरल लॉ फिलोसोफर) जॉन लोक के अनुसार, मनुष्य “पूर्ण स्वतंत्रता के शीर्षक और प्रकृति के कानून के सभी अधिकारों और विशेषाधिकारों के अनियंत्रित आनंद के साथ पैदा होता है” और उसके पास प्रकृति द्वारा “अपनी संपत्ति, यानी अपने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को अन्य पुरुषों की चोटों और प्रयासों के खिलाफ संरक्षित करने” की शक्ति होती है। 

ब्रिटिश शासन के दौरान, भारतीयों के मूल मौलिक अधिकारों को अमानवीय हद तक खतरे में डाल दिया गया था, जिसके कारण भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल करने की चर्चा हुई। मौलिक अधिकारों की आवश्यकता को संविधान सभा के प्रत्येक सदस्य द्वारा स्वीकार किया गया था। इस सवाल पर विचार भी नहीं किया गया कि मौलिक अधिकारों को संविधान में शामिल किया जाए या नहीं; इसके बजाय, बहस उन पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को कम करने के लिए थी। प्रयास यह था कि मौलिक अधिकारों को यथासंभव व्यापक रखा जाए। ब्रिटिश काल के दौरान अधिकारों से इनकार के कारण अनुच्छेद 12 से 35 के तहत संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया। मौलिक अधिकारों की अवधारणा संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से उधार ली गई थी। 

डीपीएसपी

डीपीएसपी भारत के संविधान में उल्लिखित दिशानिर्देशों और सिद्धांतों का एक समूह है जो राज्य की ओर से इस तरह से कार्य करने का दायित्व बनाता है कि यह नागरिकों के पक्ष में हो। ये विधायी, कार्यकारी और प्रशासनिक (लेजिस्लेटिव, एग्जीक्यूटिव एंड एडमिनिस्ट्रेटिव) मामलों में राज्य को दी गई संवैधानिक सिफारिशें हैं। डीपीएसपी भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत निर्दिष्ट ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ इंस्ट्रक्शन’ जैसा दिखता है। डीपीएसपी एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य के लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सिफारिशों की एक बहुत ही व्यापक सूची का गठन करता है। उनका उद्देश्य हमारे संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को प्राप्त करना है। वे एक ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा को शामिल करते हैं, जो न केवल सामाजिक, और राजनीतिक बल्कि आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित करता है।

ग्रैनविले ऑस्टिन के शब्दों में, डीपीएसपी का उद्देश्य सामाजिक क्रांति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाना या अपनी उपलब्धियों के लिए आवश्यक स्थितियों को स्थापित करके क्रांति को बढ़ावा देना है। संविधान सभा की बहसों में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने कहा था कि “इस सभा की यह मंशा है कि भविष्य में विधायिका और कार्यपालिका दोनों को इस भाग में अधिनियमित इन सिद्धांतों पर केवल दिखावा नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें देश के शासन के मामले में इसके बाद की जाने वाली सभी कार्यकारी और विधायी कार्रवाई का आधार बनाया जाना चाहिए। 

चरण सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (1974) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 46 और निर्देशक सिद्धांतों, विशेष रूप से अनुच्छेद 38 और 39 (b) और संविधान की प्रस्तावना, समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय की मांग करती है, और उन्हें सामाजिक अन्याय से रोकती है और सभी प्रकार के शोषण की रोकथाम।

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की अवधारणाओं की उत्पत्ति

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की उत्पत्ति का पता विभिन्न स्रोतों, ऐतिहासिक प्रभावों और अनुभवों (हिस्टोरिकल इन्फ्लुएंसेस एंड एक्सपेरिएंसेस) से लगाया जा सकता है, जिनसे हमारा देश गुजरा है। मौलिक अधिकारों को अपनाने के लिए सबसे प्रभावशाली दस्तावेजों में से एक अमेरिकी संविधान है। इसके अलावा, औपनिवेशिक काल (कोलोनियल पीरियड) के दौरान भारत पर शासन करने वाली ब्रिटिश कानूनी प्रणाली ने संविधान निर्माताओं को कानून के शासन और व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण जैसी अवधारणाओं को अपनाने के लिए प्रभावित किया। डीपीएसपी की अवधारणा आयरिश संविधान से अपनाई गई थी। इसने सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए एक रूपरेखा प्रदान की, जो स्वतंत्रता के बाद के भारत में सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को संबोधित करने के लिए महत्वपूर्ण थी। 

मौलिक अधिकार

इंग्लैंड के राजा, जॉन, अपने शासनकाल के दौरान महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहे थे। अपने मनमाने फैसलों और अपने बैरन और प्रजा पर भारी कर लगाने के कारण, राजा को बैरन से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ा। गृह युद्ध के डर से, राजा ने 1215 में मैग्ना कार्टा जारी किया, जिसे “ग्रेट चार्टर” के रूप में भी जाना जाता है। व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के संबंध में इसकी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उत्पत्ति है, क्योंकि इसने इस सिद्धांत को निर्धारित किया कि यहां तक कि राजा भी कानून से ऊपर नहीं था और उसका अधिकार भी कानून के शासन द्वारा सीमित था। यह संवैधानिक सिद्धांतों के विकास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था जो व्यक्तियों के अधिकारों और कानून के शासन की हालिया अवधारणाओं को प्रभावित करना जारी रखता है। मौलिक अधिकारों की नींव रखने वाले कुछ प्रमुख प्रावधानों में मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षा, संपत्ति के अधिकारों की मान्यता और संरक्षण, व्यक्तियों पर राजा के अधिकार की सीमा, न्याय तक पहुंच आदि शामिल हैं। 

यद्यपि मैग्ना कार्टा मीडियावाल सामंती (फ्यूडल) समाज का एक उत्पाद था, लेकिन इसके सिद्धांतों का संवैधानिक कानून के विकास पर स्थायी प्रभाव पड़ा है। मैग्ना कार्टा के सिद्धांतों ने व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा की स्वीकृति में भविष्य के विकास के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य किया, उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान और मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स)। 

अमेरिकी संविधान का निर्माण भारतीय संविधान के लिए एक स्रोत के रूप में भी कार्य करता है। हालांकि अपने संविधान के प्रारंभ में, अमेरिका में अधिकारों का एक विशिष्ट बिल शामिल नहीं था, बाद में, व्यक्तिगत अधिकारों को शामिल करने के लिए संशोधनों की एक श्रृंखला बनाई गई, जिसे बिल ऑफ राइट्स के रूप में जाना जाता है। ये संशोधन सरकार के खिलाफ अमेरिकियों के अधिकारों की गणना करते हैं। यह व्यक्तियों को नागरिक स्वतंत्रता और अधिकारों की गारंटी देता है जैसे कि भाषण, प्रेस और धर्म की स्वतंत्रता, हथियार रखने और धारण करने का अधिकार, अनुचित खोज और जब्ती के खिलाफ अधिकार, आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार (राइट अगेंस्ट सेल्फ-इन्क्रिमिनाशन) (अमेरिकी नाटकों में, कई बार हम आरोपी को यह कहते हुए देखते हैं, “मैं पांचवें का आह्वान करता हूं!” यह “पांचवां” पांचवें संशोधन को संदर्भित करता है, जिसमें कहा गया है कि लोगों को आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार है और कानून की उचित प्रक्रिया (निष्पक्ष प्रक्रियाओं और परीक्षणों) के बिना कैद नहीं किया जा सकता है। अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, संविधान निर्माताओं ने जल्द ही व्यक्तियों के लिए कुछ अधिकारों को सुरक्षित करने के महत्व को महसूस किया, जिसे राज्य भी छीन नहीं सकता है। नतीजतन, बिल ऑफ राइट्स और मैग्ना कार्टा का भारत के संविधान पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, जो संविधान के भाग III के रूप में स्पष्ट है, जो भारत के नागरिकों को मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। 

डीपीएसपी

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51 के तहत किया गया है। डीपीएसपी का विचार आयरिश संविधान से उधार लिया गया है। हमारे संविधान निर्माताओं ने शुरुआती चरण में ही महसूस कर लिया था कि आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र का कोई फायदा नहीं है। उस दृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए, कुछ निर्देशक सिद्धांत बनाए गए थे जो लोगों की समृद्धि और कल्याण को बढ़ावा देते हैं। डीपीएसपी कुछ सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को निर्धारित करके एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूत और बढ़ावा देता है जिसे सरकार प्राप्त करने का प्रयास करती है। मोटे तौर पर, हम कह सकते हैं कि डीपीएसपी हॉब्स, सालस पॉपुली सुप्रेमा लेक्स द्वारा समर्थित मैक्सिम पर आधारित है, जिसका शाब्दिक अर्थ है कि लोगों का कल्याण सर्वोच्च कानून है और कानून के विचार को प्रतिपादित (सुप्रीम लॉ एंड ऐनुनसिएट्स आईडिया ऑफ़ लॉ) करता है। भारत के संविधान में डीपीएसपी की अवधारणा काफी हद तक आयरिश संविधान से प्रभावित है, जिसने स्पेनिश संविधान से इसे अपनाया है।

मौलिक अधिकारों की प्रकृति और डीपीएसपी

डीपीएसपी और मौलिक अधिकार हमारे संविधान के दो महत्वपूर्ण घटक हैं जो व्यक्तियों के अधिकारों और राज्य के दायित्वों को रेखांकित (आउटलाइन) करते हैं। मौलिक अधिकारों की न्यायसंगत प्रकृति और डीपीएसपी की गैर-न्यायसंगत प्रकृति ऐसे पहलू हैं जो दोनों को अलग करते हैं। न्यायसंगत का अर्थ है कि ये अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित हैं और अदालतों से संपर्क करके लागू किए जा सकते हैं।

मौलिक अधिकार 

मौलिक अधिकार प्रकृति में न्यायसंगत हैं, जिसका अर्थ है कि वे कानून की अदालत में लागू करने योग्य हैं। ऐसे मामलों में जहां राज्य या सरकारी प्राधिकरण के कार्यों से किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन होता है, व्यक्ति को राहत के लिए न्यायपालिका से संपर्क करने का अधिकार है। मौलिक अधिकार नागरिकों को राज्य के मनमाने कार्यों से बचाते हैं। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करती है और किसी भी सरकारी कार्रवाई को रद्द करने का अधिकार रखती है जो किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करती है। संक्षेप में, मौलिक अधिकारों की न्यायसंगतता का मतलब है कि ये अधिकार अदालतों में कानूनी रूप से बाध्यकारी और लागू करने योग्य हैं। 

उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (स्पीच एंड एक्सप्रेशन) एक मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद, भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार से समझौता किया गया था क्योंकि कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई थीं। छह महीने के लिए 4जी इंटरनेट पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। बाद में कुछ व्हाइटलिस्टेड साइटों पर 2जी सेवाओं की अनुमति दी गई। 4 अगस्त, 2019 को, 18 महीने तक 4 जी सेवाओं पर शटडाउन की अवधि के बाद, प्रशासन ने कहा कि 5 फरवरी, 2021 को 4 जी इंटरनेट बहाल (रीस्टोरेड) किया गया थाअनुराधा भसीन बनाम भारत भारत संघ (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की कि इंटरनेट तक पहुंच एक मौलिक अधिकार है और सरकार संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित कुछ शर्तों को छोड़कर नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं कर सकती है। 

इसी तरह, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार संविधान का एक अभिन्न अंग (इंटीग्रल पार्ट) है। डी.के. बसु बनाम डी.के. पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में हिरासत में हिंसा और मृत्यु के कई मामले सूचित किए गए थे। भले ही मुआवजा प्रदान किया गया था, लेकिन पुलिस को जवाबदेह ठहराने के लिए कोई तंत्र नहीं था। माननीय न्यायालय ने गिरफ्तारी को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए और पुलिस द्वारा पालन करने के लिए आवश्यक हिरासत प्रक्रियाओं को निर्दिष्ट किया। 

डीपीएसपी

जबकि मौलिक अधिकार राज्य पर नकारात्मक दायित्व पैदा करते हैं, यानी, राज्य कुछ करने से बचने के लिए बाध्य है, डीपीएसपी राज्य पर सकारात्मक दायित्व बनाता है, और राज्य डीपीएसपी के अनुसार कार्य नहीं करने के लिए अदालत में जवाबदेह नहीं है। डीपीएसपी की गैर-न्यायसंगत प्रकृति का सीधा सा मतलब है कि यह इसके उल्लंघन के लिए अदालतों द्वारा कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है। इसलिए, सरकार को उन्हें लागू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। हालांकि, संविधान का अनुच्छेद 37 स्वयं कहता है कि ये सिद्धांत देश के शासन में मौलिक हैं, और कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। 

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का अधिनियमन छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए डीपीएसपी को लागू करने का एक ठोस उदाहरण है। अधिनियमन से पहले, डीपीएसपी के अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 39 (f) में राज्य वित्त पोषित के साथ-साथ न्यायसंगत और सुलभ शिक्षा का प्रावधान था। 2002 में 86 वें संवैधानिक संशोधन ने संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किया। 
  • मध्याह्न भोजन योजना (मिड-डे मील स्कीम) व्यक्तियों के पोषण के स्तर में सुधार के लिए अनुच्छेद 47 के तहत डीपीएसपी के कार्यान्वयन (एक्सिक्यूशन) का एक और उदाहरण (लेवल ऑफ़ नुट्रिशन ऑफ़ इंडिवीडुअल्स) है। 
  • इसके अलावा, मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाएं कल्याणकारी योजनाओं के रूप में कार्यान्वित की जा रही डीपीएसपी के उदाहरण हैं। अनुच्छेद 41 डीपीएसपी के तहत काम करने का अधिकार प्रदान करता है। 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी का उद्देश्य

मौलिक अधिकार और डीपीएसपी भारतीय संविधान का हिस्सा हैं। लेकिन उन्हें विभिन्न उद्देश्यों के लिए शामिल किया गया है, जैसा कि नीचे बताया गया है। इससे पहले, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि विभिन्न उद्देश्यों के आधार पर संघर्ष होने के बावजूद, उन्होंने प्राप्त करने की मांग की, उनके पास नागरिकों के कल्याण को प्राप्त करने का एक सामान्य उद्देश्य है क्योंकि भारत एक कल्याणकारी राज्य है।

मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकार प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र के संविधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मौलिक अधिकारों का उद्देश्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता, गरिमा और समानता की रक्षा करना है, जो एक न्यायसंगत और सामंजस्यपूर्ण समाज (जस्ट एंड हॉर्मोनियस सोसाइटी) को बढ़ावा देता है। मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की है और दोहराया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने के बारे में नहीं है; यह केवल जानवरों के अस्तित्व से परे फैला हुआ है। मौलिक अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि लोगों के साथ समाज में समान, निष्पक्ष और सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। वे हमें राज्य या व्यक्तियों द्वारा अनुचित हस्तक्षेप (इंटरवेंशन) के बिना खुद को व्यक्त करने और हमारे विश्वासों का अभ्यास करने की स्वतंत्रता देते हैं। एफआर हर किसी को अपनी पूरी सीमा तक समुदाय में योगदान करने का मौका देता है। 

डीपीएसपी

डीपीएसपी मार्गदर्शक सिद्धांत हैं जिनका उद्देश्य सरकार को अपनी नीति निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन करना है। डीपीएसपी का मूल उद्देश्य एक उचित एवं न्यायसंगत समाज के लिए एक ढांचा तैयार करना है। डीपीएसपी असमानताओं को कम करने और समाज के हर वर्ग को अवसर प्रदान करने की दिशा में काम करने के लिए सरकार का मार्गदर्शन करते हैं। 

अपनी पुस्तक, ‘एन एंबेसडर स्पीक्स’ में डीपीएसपी एमसी छागला (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) की प्रयोज्यता के बारे में बात करते हुए, उन्होंने कहा कि “यदि इन सभी सिद्धांतों को पूरी तरह से लागू किया जाता है, तो हमारा देश वास्तव में पृथ्वी पर स्वर्ग होगा। तब भारत न केवल राजनीतिक अर्थों में एक लोकतंत्र होगा, बल्कि अपने नागरिकों के कल्याण की देखभाल करने वाला एक कल्याणकारी राज्य भी होगा। ये सिद्धांत सत्ता में पार्टी में परिवर्तन के बावजूद राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में घरेलू और विदेशी नीतियों में स्थिरता और निरंतरता की सुविधा प्रदान करते हैं। वे सरकार के प्रदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में भी काम करते हैं। नागरिक डीपीएसपी को ध्यान में रखते हुए सरकार की नीतियों की जांच कर सकते हैं। 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी का दायरा 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी का दायरा उनकी सीमा और प्रयोज्यता (क्सटेंट एंड ऍप्लिकेबिलिटी) को परिभाषित करता है। मौलिक अधिकारों का दायरा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण पर केंद्रित है, जबकि डीपीएसपी का दायरा व्यापक है क्योंकि यह सामाजिक और आर्थिक कल्याण पर केंद्रित है और समाज के कल्याण की दिशा में लगातार काम करने के लिए राज्य पर दायित्व डालता है। 

मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। वे जीवन, स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार को शामिल करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हर कोई राज्य के मनमाने कार्यों से सुरक्षित है। ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों के दायरे के बारे में एक संकीर्ण व्याख्या (नैरो इंटरप्रिटेशन) की और केवल नागरिकों की भौतिक स्वतंत्रता (फिजिकल लिबर्टी ऑफ़ सिटीजन्स) पर ध्यान केंद्रित किया, एक सार्थक जीवन में योगदान देने वाले अन्य पहलुओं की अनदेखी की, जैसे कि गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, (डिग्निफ़िएड लाइफ, राइट टू प्राइवेसी, फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन), आदि। इस मामले ने शाब्दिक व्याख्या से परे मौलिक अधिकारों के दायरे को व्यापक बनाने और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या को विकसित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। 

इसके अलावा, , के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने बुनियादी संरचना के सिद्धांत को मजबूत किया और कहा कि हालांकि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन ऐसा करते समय, मूल संरचना को बदला नहीं जा सकता है। इस मामले ने यह भी पुष्टि की कि मौलिक अधिकार बुनियादी ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। इसके आलावा, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों के दायरे को महत्वपूर्ण रूप से विस्तारित किया, और माननीय न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 को केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है। मित नहीं हो सकता है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है। 

इसके अलावा,केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी ढांचे के सिद्धांत को मजबूत किया और माना कि हालांकि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन ऐसा करते समय बुनियादी ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। इस मामले ने यह भी पुष्टि की कि मौलिक अधिकार बुनियादी ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। इसके अलावा, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों के दायरे को महत्वपूर्ण रूप से विस्तारित किया, और माननीय न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 को केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसमें जीने का अधिकार भी शामिल है। आत्म – सम्मान के साथ।

न्यायमूर्ति केएस पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (2018) के हालिया फैसले में, अदालत ने अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया और कहा कि निजता का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का एक आंतरिक हिस्सा है। कौशल किशोर बनाम भारत उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाकर एफआर के दायरे को और बढ़ा दिया कि अनुच्छेद 19 और 21 अधिकारों को निजी व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ भी लागू किया जा सकता है। 

ये मामले दोहराते हैं कि संविधान प्रकृति में गतिशील है और इसकी व्याख्या समकालीन समय (कंटेम्पररी टाइम्स) के साथ विकसित होती है। हाल के फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया गया विस्तारित दृष्टिकोण यह आश्वासन देता है कि मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप से कम नहीं किया जा सकता है।

डीपीएसपी

डीपीएसपी के दायरे में कई आयाम शामिल हैं, जैसे कि समाजवादी सिद्धांत जो समाजवाद की विचारधारा (सोशलिस्टिक प्रिंसिपल्स तहत रिफ्लेक्ट आइडियोलॉजी ऑफ़ सोशलिज्म) को दर्शाते हैं। वे राज्य को न्याय द्वारा व्याप्त सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करके और असमानताओं को कम करके समाज के कल्याण को बढ़ावा देने का निर्देश देते हैं। सभी नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए (अनुच्छेद 43), धन के केंद्रीकरण को रोकना [अनुच्छेद 39 (c)], पुरुषों और महिलाओं के लिए समान काम के लिए समान वेतन [अनुच्छेद 39 (d)], समान न्याय को बढ़ावा देना और गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना (अनुच्छेद 39-A) 42 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा सम्मिलित शामिल किया गया, ताकि काम की उचित और मानवीय स्थितियों और मातृत्व राहत (अनुच्छेद 42) के प्रावधान किए जा सकें, ये सभी विस्तारित दायरे के उदाहरण हैं।

ये मार्गदर्शक सिद्धांत गांधीवादी विचारधारा से भी प्रेरणा लेते हैं। ग्राम पंचायतों को संगठित (ऑर्गॅनिशिंग विलेज पंचायत) करना और उन्हें आवश्यक शक्तियां प्रदान करना (अनुच्छेद 40), अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के अन्य वंचित वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना आदि (अनुच्छेद 46), अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान गांधी द्वारा प्रतिपादित कार्यक्रमों के प्रतिनिधि हैं। इसके अलावा, डीपीएसपी उदार सिद्धांतों को भी विकसित करते हैं जैसे कि पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44), छह साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा प्रदान करना (अनुच्छेद 45) (86 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002) द्वारा प्रतिस्थापित करना, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंधों को बनाए रखना, आदि (अनुच्छेद 51)। 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी का वर्गीकरण

मौलिक अधिकार व्यक्तियों को नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (सिविल, पोलिटिकल, सोशल, इकनोमिक, कल्चरल एंड एजुकेशनल राइट्स टू इंडिवीडुअल्स) प्रदान करते हैं, जबकि डीपीएसपी राज्य को देश के लोगों के सामाजिक, लोकतांत्रिक और आर्थिक कल्याण की दिशा में काम करने के लिए बाध्य करता है। 

मौलिक अधिकार 

संविधान भारत के नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जो इस प्रकार हैं: –

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 1418): समानता का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं। यह धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। इसमें सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का अधिकार और अस्पृश्यता (पब्लिक एम्प्लॉयमेंट एंड अबोलिशन ऑफ़ अनटचेबिलिटी) का उन्मूलन शामिल है। 
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22): इस अधिकार में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा और संघ की स्वतंत्रता (फ्रीडम ऑफ़ असेंबली एंड एसोसिएशन), भारत के पूरे क्षेत्र में घूमने की स्वतंत्रता और देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार शामिल है। 
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24): इस अधिकार का उद्देश्य समाज के कमजोर समूहों/ वर्गों, जैसे बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों आदि के शोषण को रोकना है। यह मानव तस्करी, जबरन श्रम (ह्यूमन ट्रैफिकिंग, फोर्स्ड लेबर) और खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। 
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28): यह अधिकार विवेक (कन्साइंस) की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने के अधिकार की गारंटी देता है। यह राज्य के हस्तक्षेप (इंटरवेंशन) के बिना अपने स्वयं के मामलों का प्रबंधन करने के लिए धार्मिक संप्रदायों के अधिकार की भी रक्षा करता है। हालांकि, राज्य को कुछ धार्मिक प्रथाओं को विनियमित या प्रतिबंधित करने का अधिकार है जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को बाधित करते हैं। 
  5. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30): ये अधिकार अल्पसंख्यकों (माइनॉरिटीज) को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति (स्क्रिप्ट एंड कल्चर) के संरक्षण की अनुमति देकर उनके हितों की रक्षा करते हैं।
  6. संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनुच्छेद 32): इस अधिकार को “भारतीय संविधान के दिल और आत्मा” के रूप में संदर्भित किया जाता है क्योंकि यह नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देता है। न्यायालय को इन अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी करने का अधिकार है। 

यहां यह ध्यान रखना उचित है कि 1978 से पहले संपत्ति का अधिकार इन्हीं मौलिक अधिकारों में से एक था, लेकिन 44वें संशोधन के बाद इस अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत इसे संवैधानिक अधिकार बना दिया गया।

डीपीएसपी

भारत के संविधान में निर्देशक सिद्धांतों के संबंध में कोई वर्गीकरण नहीं है। हालांकि, उनकी सामग्री और दिशा के आधार पर, उन्हें मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे समाजवादी, गांधीवादी और उदारवादी-बौद्धिक (सोशलिस्टिक, गांधियन एंड लिबरल-इंटेलेक्चुअल)। 

समाजवादी सिद्धांत

ये सिद्धांत समाजवाद की विचारधारा को दर्शाते हैं। वे एक लोकतांत्रिक समाजवादी राज्य का विचार रखते हैं जिसका उद्देश्य अपने नागरिकों को सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करना है और एक कल्याणकारी राज्य की ओर मार्ग निर्धारित करना है। संविधान के भाग IV के तहत निहित इन सिद्धांतों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं: –

  • अनुच्छेद 38 – यह अनुच्छेद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय-से व्याप्त सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करके लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने और आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करने के लिए शामिल किया गया है। 
  • अनुच्छेद 39- सभी नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों के अधिकार को सुरक्षित करना, सामान्य भलाई के लिए समुदाय के भौतिक संसाधनों का समान वितरण, धन और उत्पादन के साधनों के केंद्रण की रोकथाम (एकिटबल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ़ मटेरियल रिसोर्सेज ऑफ़ कम्युनिटी फॉर कॉमन गुड, प्रिवेंशन ऑफ़ कंसंट्रेशन ऑफ़ वेल्थ एंड मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शन), समान काम के लिए समान वेतन (पेय), आदि। 
  • अनुच्छेद 39A – समान न्याय को बढ़ावा देना और गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना। 
  • अनुच्छेद 41 – बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता (डिसेबिलिटी) के मामलों में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करना। 
  • अनुच्छेद 42 – काम की उचित और मानवीय स्थितियों और मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करना। 

गांधीवादी सिद्धांत

  • अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों को संगठित करना और उन्हें आवश्यक शक्तियां और अधिकार प्रदान करना ताकि वे स्वशासन की इकाइयों के रूप (यूनिट्स ऑफ़ सेल्फ-गवर्नमेंट) में कार्य कर सकें। 
  • अनुच्छेद 43 – ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना। 
  • अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना ताकि उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण (सोशल इनजस्टिस एंड एक्सप्लोइटेशन) से बचाया जा सके। 
  • अनुच्छेद 47 – नशीली (इंटोक्सिकेटिंग) शराब और नशीली दवाओं के सेवन को प्रतिबंधित करना जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 

उदार-बौद्धिक सिद्धांत

  • अनुच्छेद 44 – सभी नागरिकों के लिए पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करना।
  • अनुच्छेद 45 – सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा प्रदान करना जब तक कि वे छह साल की उम्र पूरी नहीं कर लेते।
  • अनुच्छेद 48 – कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक तर्ज पर संगठित करना। 
  • अनुच्छेद 48A – पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने के लिए 
  • अनुच्छेद 49 – कलात्मक या ऐतिहासिक रुचि के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं की रक्षा करना जो राष्ट्रीय महत्व के घोषित किए गए हैं जैसे कि ताजमहल, लाल किला, अजंता गुफाएं आदि। 
  • अनुच्छेद 50 – राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना। 
  • अनुच्छेद 51 – अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना और राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंधों को बनाए रखना, अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि दायित्वों के लिए सम्मान को बढ़ावा देना और मध्यस्थता द्वारा विवादों के निपटान को प्रोत्साहित करना। 

आपातकाल (एमर्जेन्सी) के दौरान मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की स्थिति 

आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की स्थिति एक महत्वपूर्ण पहलू है। आपातकाल के दौरान, कुछ मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है, जबकि संविधान आपातकाल के दौरान भी डीपीएसपी के निलंबन का प्रावधान नहीं करता है। राज्य को कानून और व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने का लक्ष्य रखना चाहिए अर्थात सामाजिक-आर्थिक (सोशिओ-इकनोमिक) आदर्शों को बनाए रखना चाहिए। 

मौलिक अधिकार

संविधान का अभिन्न अंग होने के नाते मौलिक अधिकारों को आसानी से छीना नहीं जा सकता है। हालांकि, अभूतपूर्व समय के दौरान, भारत के राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा पर मौलिक अधिकारों को निलंबित कर सकते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 359 के तहत, राष्ट्रपति के पास आंतरिक और बाहरी आपात स्थिति के दौरान एफआर को निलंबित करने की शक्ति है। आपातकाल के दौरान, अनुच्छेद 19 के तहत उल्लिखित एफआर स्वचालित रूप से निलंबित हो जाते हैं, लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 को आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है। 

व्यक्तियों के एफआर में कटौती के कुछ उदाहरण हैं: –

  • कोविड-19: कोरोना वायरस के प्रसार से बचने के लिए कोविड-19 के दौरान स्वतंत्र रूप से घूमने के अधिकार से समझौता किया गया। 
  • अनुच्छेद 370 को निरस्त (अबरोगेशन) करना: जब अनुच्छेद 370 को निलंबित कर दिया गया था, तो राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित किया गया था, और इसलिए भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से समझौता किया गया था। 

दूरसंचार सेवाओं (टेलीकम्यूनिकेशन सर्विसेस) को अक्सर उन क्षेत्रों में अस्थायी (टेम्पोरेरीली) रूप से समाप्त कर दिया जाता है जहां आंतरिक अशांति और आक्रामकता की स्थिति उत्पन्न होती है, जैसे कि मणिपुर हिंसा, नूंह हिंसा, आदि।

डीपीएसपी

भले ही डीपीएसपी कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं हैं, लेकिन उन्हें हमारे देश के समग्र विकास के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए। सरकार द्वारा डीपीएसपी की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कुछ कदमों में विभिन्न नीतियों की समीक्षा करने और उनके कार्यान्वयन पर नज़र रखने में सक्रिय कदम उठाना शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत घोषित आपातकाल के दौरान, डीपीएसपी काफी प्रभावित होता है। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, राष्ट्रपति के पास संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत कुछ मौलिक अधिकारों को निलंबित करने का अधिकार है। हालांकि, आपात स्थिति के दौरान डीपीएसपी स्वचालित रूप से निलंबित नहीं होता है। क्यूंकि, आपातकाल के दौरान, सरकार का ध्यान कानून और व्यवस्था बनाए रखने और राष्ट्र की सुरक्षा की रक्षा करने पर अधिक होता है, इसलिए यह संभावना है कि डीपीएसपी प्रभावित हो सकता है। 

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की प्रवर्तनीयता

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी की प्रवर्तनीयता में काफी अंतर है। मौलिक अधिकार कानूनी रूप से लागू करने योग्य हैं और उल्लंघन होने पर व्यक्तियों को राहत प्रदान करने में सक्षम हैं। दूसरी ओर, डीपीएसपी नैतिक और राजनीतिक मार्गदर्शक सिद्धांत हैं जो अदालत में लागू करने योग्य नहीं हैं। 

मौलिक अधिकार

क्यूंकि एफआर अदालत में कानूनी रूप से लागू करने योग्य हैं, इसलिए जिन व्यक्तियों के एफआर का उल्लंघन किया जाता है, वे राज्य के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों में से एक अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार का अधिकार है। यह अधिकार नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाने में सक्षम बनाता है। अनुच्छेद 32 नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर संवैधानिक उपचार के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय अधिकारियों से पूछताछ करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कार्पस), सर्टिओरारी, निषेध (प्रोहिबिशन), परमादेश (मैनडमस) और यथास्थिति वारंट (क्वो वर्रांटों) जैसी रिट जारी कर सकता है। उल्लंघन के मामलों में, अदालतें मुआवजे के आदेश दे सकती हैं। 

विशेष रूप से, अनुच्छेद 226 (मौलिक अधिकार नहीं) उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार देता है। यह अनुच्छेद भारत के उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों या कानूनी अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में विभिन्न रिट जारी करने की समान शक्ति देता है। 

सचिव, रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया और अन्य (2020) के मामले में, महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव किया जा रहा था क्योंकि उन्हें केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से सेना में शामिल किया गया था, जिससे उन्हें पेंशन और पदोन्नति जैसे लाभों से वंचित कर दिया गया था, जो पुरुष अधिकारियों को स्थायी कमीशन के माध्यम से शामिल किए जाने के कारण मिलते थे। राज्य ने तर्क दिया कि स्थायी कमीशन देने से कुप्रबंधन हो सकता है, क्योंकि महिलाएं मातृत्व अवकाश आदि के लिए दावा करेंगी। अदालत ने राज्य की दलील को खारिज कर दिया और कहा कि राज्य की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और उसने राज्य को महिला अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन देने का निर्देश दिया। 

यंग लॉयर्स एसोसिएशन और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2018), के मामले में, जिसे सबरीमाला मंदिर मामले के रूप में जाना जाता है, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करना असंवैधानिक और अनुच्छेद 14, 15, 19 (1), 21 और 25 का उल्लंघन है। न्यायालय ने हर आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी। 

डीपीएसपी

डीपीएसपी गैर-न्यायसंगत सिद्धांतों का एक सेट है, जिसका अर्थ है कि वे उल्लंघन या गैर-पूर्ति के मामलों में अदालतों द्वारा कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं हैं। यूबीएसई बोर्ड बनाम हरि शंकर (1979) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि डीपीएसपी अदालतों में लागू करने योग्य नहीं हैं क्योंकि वे किसी भी व्यक्ति के पक्ष में कोई उचित अधिकार नहीं बनाते हैं। 

संविधान के अनुच्छेद 37 में कहा गया है कि भारतीय संविधान के भाग IV में निहित प्रावधान किसी भी अदालत द्वारा लागू करने योग्य नहीं होंगे, लेकिन जो सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं वे देश में सुशासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, और देश के लिए कानून बनाते समय दिए गए सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। संविधान सभा की बहस में, डीपीएसपी के महत्व के बारे में बात करते हुए, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि “एक सरकार जो लोकप्रिय वोट पर टिकी हुई है, वह अपनी नीति को आकार देते समय शायद ही निर्देशक सिद्धांतों की अनदेखी कर सकती है। अगर कोई सरकार उनकी अनदेखी करती है, तो उसे निश्चित रूप से चुनाव के समय मतदाताओं के सामने इसका जवाब देना होगा।”

क्यूंकि डीपीएसपी गैर-न्यायोचित हैं, इसलिए संविधान यह स्पष्ट करता है कि ‘ये सिद्धांत देश के शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा’। इस प्रकार, वे अपने कार्यान्वयन के लिए राज्य पर एक नैतिक दायित्व लगाते हैं। 

भले ही डीपीएसपी गैर-प्रवर्तनीय हैं, राज्य इन गैर-प्रवर्तनीय सिद्धांतों को कानून में परिवर्तित करके लागू करने योग्य कानून बनाने का प्रयास कर सकता है। कानून में शामिल किए गए कुछ निर्देशक सिद्धांत इस प्रकार हैं:-

  1. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (लीगल सर्विसेज अथॉरिटी एक्ट),1987 के तहत नि:शुल्क विधिक सहायता (फ्री लीगल ऐड) (अनुच्छेद 39A) को अनिवार्य कर दिया गया है। 
  2. नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा (अनुच्छेद 45) शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 द्वारा प्रभावी किया गया है।
  3. काम और मातृत्व राहत (जस्ट एंड ह्यूमेन कंडीशंस) (अनुच्छेद 42) की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियों को औद्योगिक संबंध संहिता, (इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड) 2020, वेतन संहिता, (कोड ऑन वेजिस) 2019, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति, (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस) 2020, मातृत्व लाभ अधिनियम, (मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट) 1961 में शामिल किया गया है।
  4. वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा के लिए क्रमशः वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार और वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा (अनुच्छेद 48 A) का अनुपालन किया गया है।
  5. राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं की सुरक्षा (अनुच्छेद 49) को प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम (अन्सिएंट एंड हिस्टोरिकल मोन्यूमेंट एंड आर्कियोलॉजिकल साइट्स एंड रिमेंस एक्ट), 1951 के अधिनियमन द्वारा सुरक्षित किया गया है।

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच अंतर का सारांश

क्रम संख्या अंतर का आधार  मौलिक अधिकार डीपीएसपी
परिभाषा संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए अधिकार एक व्यक्ति और अधिकारों के अन्य बंडल को स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। देश के लिए कानून बनाते समय सरकार के लिए सिद्धांत और दिशा-निर्देश।
2. संवैधानिक प्रावधान संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) के तहत एफआर की गारंटी दी गई है।  डीपीएसपी संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 36-51) के तहत निहित है।
3. प्रकृति एफआर प्रकृति में नकारात्मक (नेगेटिव) हैं क्योंकि वे राज्य को कुछ कार्रवाई करने से रोकते हैं। डीपीएसपी प्रकृति में सकारात्मक (पोसिटिव) हैं क्योंकि उन्हें राज्य से कुछ कार्रवाई करने की आवश्यकता होती है।
4. न्यायसंगतता (जस्टिसएबिलिटी) वे न्याययोग्य हैं। उल्लंघन की स्थिति में व्यक्ति सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। वे गैर-न्यायसंगत हैं जिसका अर्थ है कि उल्लंघन के मामले में, वे अदालतों द्वारा कानूनी रूप से लागू नहीं किए जा सकते हैं।
5. उद्देश्य उनका लक्ष्य देश में राजनीतिक लोकतंत्र स्थापित करना है। उनका लक्ष्य देश में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करना है।
6. प्रतिबंध (सैंक्शंस) उनके पास कानूनी प्रतिबंध हैं।  उनके पास राजनीतिक और नैतिक प्रतिबंध हैं।
7. दायरा  चूंकि वे किसी व्यक्ति के कल्याण को बढ़ावा देते हैं; उन्हें व्यक्तिगत और व्यक्तिवादी माना जाता है।  चूँकि वे पूरे समाज के कल्याण को बढ़ावा देते हैं; उन्हें सांप्रदायिक और समाजवादी माना जाता है।]
8. कार्यान्वयन

(इम्प्लीमेंटेशन)

वे स्वचालित रूप से लागू होते हैं और उनके कार्यान्वयन के लिए किसी अलग कानून की आवश्यकता नहीं होती है।  वे स्वचालित रूप से लागू नहीं होते हैं और उनके कार्यान्वयन के लिए कानून की आवश्यकता होती है।
9. न्यायपालिका की भूमिका यदि कोई कानून किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो अदालतें उस कानून को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने के लिए बाध्य हैं। यदि कोई कानून किसी निर्देशक सिद्धांत का उल्लंघन करता है तो अदालतें उस कानून को असंवैधानिक और शून्य घोषित नहीं कर सकतीं। हालाँकि, वे किसी कानून की वैधता को इस आधार पर बरकरार रख सकते हैं कि इसे एक निर्देशक सिद्धांत को प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया था।
10. अभिग्रहण एक विशेषता के रूप में एफआर को अमेरिकी संविधान से उधार लिया गया था। एक सुविधा के रूप में डीपीएसपी को आयरलैंड के संविधान से उधार लिया गया था।
11. उदाहरण जैसे समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार। ग्राम पंचायतों का संगठन, सहकारी समितियों को बढ़ावा देना आदि।

मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय

चंपाकम दुरईराजन मामला

मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपाकम (1951) एक ऐतिहासिक मामला है जो भारत में आरक्षण से संबंधित है। इस मामले में फैसले ने संसद को पहली बार भारत के संविधान में संशोधन करने के लिए प्रेरित किया। इस मामले ने हमारे समाज के हाशिए के वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थानों, रोजगार आदि में आरक्षण शुरू करने की चर्चा शुरू की। इस मामले ने यह भी प्रदर्शित किया कि जबकि मौलिक अधिकार और डीपीएसपी दोनों संविधान के अभिन्न अंग हैं, प्रावधानों की एक सामंजस्यपूर्ण व्याख्या (हॉर्मोनियस इंटरप्रिटेशन) यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए राज्य के प्रयास व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन न करें। 

तथ्यों

1927 में, मद्रास प्रांत ने एक सरकारी आदेश ‘सांप्रदायिक जीओ’ जारी किया, जिसने विभिन्न जातियों के लिए राज्य के चार मेडिकल कॉलेजों में सीटें आरक्षित कीं। उन चार कॉलेजों में छात्रों के लिए कुल 330 सीटें उपलब्ध थीं। सीटों का वितरण इस तरह था कि छह सीटें गैर-ब्राह्मण हिंदुओं के लिए, दो पिछड़े हिंदुओं के लिए, दो ब्राह्मणों के लिए, दो हरिजनों के लिए, एक एंग्लो-इंडियन ईसाइयों के लिए और एक सीट मुसलमानों के लिए आरक्षित थी। 

1950 में, एक ब्राह्मण महिला चंपाकम दोराईराजन ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मद्रास उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 15 (1) और 29 (2) के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है। अनुच्छेद 15 (1) में कहा गया है कि ‘राज्य किसी भी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या उनमें से किसी के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा’। अनुच्छेद 29 (2) में कहा गया है कि ‘किसी भी नागरिक को केवल धर्म, नस्ल, जाति, भाषा या उनमें से किसी के आधार पर राज्य द्वारा बनाए गए किसी भी शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश या राज्य निधि से सहायता प्राप्त करने से इनकार नहीं किया जाएगा।’

समस्या

क्या 1927 का सांप्रदायिक सरकारी आदेश जो जाति, धर्म, नस्ल आदि के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों (एजुकेशनल इंस्टीटूशन्स) में प्रवेश के लिए सीटें आरक्षित करता है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 (1) और 29 (2) के तहत नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था। 

निर्णय

मद्रास के तत्कालीन महाधिवक्ता (एडवोकेट-जनरल) के. कुट्टीकृष्णा ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 46 के अनुसार, राज्य का कर्तव्य है कि वह समाज के वंचित वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा दे। उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 46 राज्य की नीतियों के निर्देशक सिद्धांतों का एक हिस्सा है, जो देश में सुशासन के लिए मौलिक हैं। 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सांप्रदायिक जीओ जाति, धर्म और नस्ल पर आधारित है, जो प्रकृति में भेदभावपूर्ण है और संविधान के भाग III द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। धर्म, नस्ल या जाति के आधार पर व्यक्तियों के लिए सीटें आरक्षित करना संविधान के खिलाफ है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि डीपीएसपी अदालत में लागू करने योग्य नहीं हैं। भाग IV को संविधान के भाग III की सहायक के रूप में चलाना होगा। किसी भी संघर्ष के मामले में, मौलिक अधिकार डीपीएसपी पर हावी होंगे। 

गोलकनाथ मामला

ब्रिटिश शासन से भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, नवगठित संविधान सभा ने भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया। 1950 और 1960 के दशक में, भारत के कई राज्यों ने बड़े जमींदारों से छोटे भूमिहीन किसानों को कृषि भूमि के पुनर्वितरण (रेडिस्ट्रीब्यूशन) के लिए भूमि सुधारों को लागू करना शुरू कर दिया। इन भूमि सुधारों ने अक्सर एक व्यक्ति के स्वामित्व वाली अधिकतम भूमि पर एक सीमा रखी। आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) भारत के कानूनी और संवैधानिक इतिहास में काफी महत्वपूर्ण है। यह एक महत्वपूर्ण सवाल से संबंधित था कि क्या संसद के पास भारत के संविधान के भाग 3 के तहत गारंटीकृत एफआर में संशोधन करने की शक्ति है। 

तथ्यों

वॉन हेनरी और विलियम गोलकनाथ के पास जालंधर, पंजाब में पांच सौ एकड़ जमीन थी। पंजाब सरकार ने पंजाब सुरक्षा और भूमि कार्यकाल अधिनियम (पंजाब सिक्योरिटी एंड लैंड टेन्योर्स एक्ट), 1953 (इसके बाद पीएसएलटीए, 1953 के रूप में संदर्भित) पारित किया। अधिनियम के अनुसार, एक व्यक्ति केवल 30 मानक एकड़ (या 60 साधारण एकड़) भूमि का मालिक हो सकता है। नतीजतन, गोलकनाथ भाइयों को उनके स्वामित्व वाली अधिशेष भूमि को छोड़ने के लिए कहा गया। उन्होंने पीएसएलटीए, 1953 की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि यह अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 (1) (f) का उल्लंघन है और उन्हें संपत्ति रखने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित करता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अदालत से 17 वें संवैधानिक संशोधन, 1964 (जिसने पीएसएलटीए, 1953 को नौवीं अनुसूची में रखा) कोअसंवैधानिक और अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित करने का आग्रह किया। मूल रूप से, 17 वें संवैधानिक संशोधन ने अनुच्छेद 31 A में संशोधन किया और रैयतवाड़ी और कृषि भूमि को शामिल करने के लिए ‘संपत्ति’ की परिभाषा का विस्तार किया। इसके अलावा, मैसूर भूमि सुधार अधिनियम, 1961 और पंजाब भूमि किरायेदारी सुरक्षा अधिनियम, 1953 को सम्मिलित करके नौवीं अनुसूची में भी संशोधन किया गया था। इस संशोधन ने दोनों अधिनियमों को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित होने से बचा लिया कि वे संविधान के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 13, 14 या 31) के साथ असंगत हैं।

समस्या

क्या संसद के पास भारत के संविधान के भाग III द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की अंतिम शक्ति है?

निर्णय

6:5 के अनुपात (रेश्यो) के साथ, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति सुब्बा राव के अनुसार, 17 वें संशोधन ने भूमि अधिग्रहण करने और किसी भी कानूनी पेशे में संलग्न होने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया। हालांकि, क्योंकि संभावित फैसले (प्रोस्पेक्टिव रूलिंग) का सिद्धांत लागू किया गया था, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का 17 वें संशोधन या 1953 के पीएसएलटीए की संवैधानिकता पर कोई असर नहीं पड़ा। न्यायमूर्ति सुब्बा राव ने इस बात पर जोर दिया कि संसद के पास संविधान के भाग तीन में संशोधन करने की शक्ति नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के कारण 1971 में 24वां संविधान संशोधन हुआ। इस संशोधन ने संसद को भाग III सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति प्रदान की, जिसे केशवानंद भारती मामले में आगे चुनौती दी गई थी। 

केशवानंद भारती मामला

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) भारत के संवैधानिक इतिहास में सबसे ऐतिहासिक और परिणामी मामलों में से एक है। यह मामला अपने आप में उल्लेखनीय है क्योंकि यह संसदीय प्राधिकरण के दायरे के बीच टकराव को दर्शाता है, अर्थात भारत के संविधान द्वारा नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा। 

तथ्यों

केशवानंद भारती (इसके बाद याचिकाकर्ता के रूप में संदर्भित) एडनीर मठ के एक धार्मिक संप्रदाय के प्रमुख पुजारी थे, जिसका मुख्य कार्यालय केरल के कासरगोड में था। याचिकाकर्ता के नाम पर संप्रदाय के कुछ भूमि क्षेत्र पंजीकृत थे। भूमि के स्वामित्व को लेकर राज्य सरकार और संप्रदाय के सदस्यों के बीच कुछ असहमतियां चल रही थीं। केरल की राज्य सरकार ने भूमि सुधार संशोधन अधिनियम (लैंड रिफॉर्म्स अमेंडमेंट एक्ट), 1969 पेश किया, जो सरकार को संप्रदाय की भूमि का अधिग्रहण करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अनुच्छेद 14 के तहत अपने मौलिक अधिकारों यानी समानता का अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(एफ) यानी संपत्ति अर्जित करने की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया; अनुच्छेद 25 यानी धर्म का पालन और प्रचार करने का अधिकार, अनुच्छेद 26 यानी धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार और अनुच्छेद 31 यानी संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण।

जैसे ही अदालत ने याचिका पर विचार किया, केरल सरकार ने भूमि सुधार संशोधन अधिनियम, 1971 पेश किया। आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) के मामले के बाद, सरकार ने कई संशोधन किए, जैसे 

  • 24 वें संवैधानिक संशोधन (1971) ने संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की शक्ति दी।
  • 25 वें संवैधानिक संशोधन (1972) ने निर्दिष्ट किया कि राज्य सरकार संपत्ति के मालिक को समान रूप से मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं है यदि उसकी निजी संपत्ति सरकार द्वारा ली जाती है, और 
  • 29 वां संवैधानिक संशोधन (1972) – केरल भूमि सुधार अधिनियम (इसके बाद ‘अधिनियम’ के रूप में संदर्भित) को 9 वीं अनुसूची में डाला गया, जिसने केरल भूमि सुधार अधिनियम से संबंधित मामलों को न्यायपालिका के दायरे से बाहर लाया, 

24वें, 25वें और 29वें संशोधन के साथ ‘अधिनियम’ के प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी गई थी। 

समस्या

  1. 24वां संशोधन संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं।
  2. 25वां संशोधन संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं।
  3. संसद संविधान में संशोधन कर सकती है या नहीं।

निर्णय

इस निर्णायक प्रश्न का उत्तर माननीय उच्चतम न्यायालय ने 7:6 के बहुमत से दिया था। माननीय न्यायालय ने कहा कि संसद वास्तव में संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है, बशर्ते कि संशोधन संविधान के ‘मूल ढांचे’ को नहीं बदलेगा। अदालत ने 24 वें संशोधन अधिनियम की संवैधानिकता को बरकरार रखा। दूसरे मुद्दे के बारे में, अदालत ने 25 वें संशोधन के दूसरे भाग को अधिकार से परे (कानूनी शक्ति / प्राधिकरण के दायरे से परे) पाया। यह माना गया था कि संविधान में संशोधन करते समय संसद द्वारा ‘बुनियादी संरचना’ के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए।

मिनर्वा मिल्स मामला

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसने संविधान के ‘मौलिक ढांचे’ की रक्षा की, जिसे संसद द्वारा संशोधित किया गया था। यह मामला उस संतुलन पर भी प्रकाश डालता है जिसे संसदीय प्राधिकरण और व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के बीच बनाए रखा जाना है। 

तथ्यों

आम जनता के हितों को पूरा करने के लिए, संसद एक योजना के साथ आई जिसमें उन कंपनियों / उद्यमों की खराब परिसंपत्तियों का पुनर्निर्माण शामिल था जो सार्वजनिक महत्व के हैं। नतीजतन, संसद ने उद्यमों को सुरक्षित करने के अपने लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए रुग्ण वस्त्र उपक्रम (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1974 पारित किया। 

मिनर्वा मिल्स कर्नाटक की एक कपड़ा कंपनी थी जो रेशम के कपड़े बनाती थी। सरकार की राय थी कि मिनर्वा मिल्स एक बीमार कंपनी है (एक ऐसी कंपनी जिसे किसी भी वित्तीय वर्ष के अंत में अपने पूरे शुद्ध मूल्य के बराबर या उससे अधिक नुकसान का सामना करना पड़ा है) और इसके मामलों में हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इसलिए, सरकार ने उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 की धारा 15 के तहत एक समिति का गठन किया और कंपनी के मामलों का प्रबंधन करने के लिए राष्ट्रीय वस्त्र निगम लिमिटेड को अधिकृत किया। 

39वें संविधान संशोधन, 1975 के माध्यम से राष्ट्रीयकरण को 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर था। इसके बाद, रुग्ण वस्त्र उपक्रम (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1974 के प्रावधानों के अनुसार कंपनी का अधिग्रहण कर लिया गया। इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) के मामले के बाद, ऊपरी हाथ और अंतिम शक्ति हासिल करने के लिए, संसद ने 42 वां संशोधन पारित किया, जिसने अनुच्छेद 31 C में संशोधन किया। सके अतिरिक्त, 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 55, जिसमें कहा गया है कि “संविधान में कोई भी संशोधन (भाग III के प्रावधानों सहित) इस अनुच्छेद के तहत नहीं किया गया है या किया जाना प्रस्तावित है, चाहे धारा 55 के प्रारंभ होने से पहले या बाद में।” संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976] को किसी भी आधार पर किसी भी अदालत में प्रश्न में बुलाया जाएगा” संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन किया गया है। अनुच्छेद 31 C में उक्त संशोधन में कहा गया है कि डीपीएसपी को प्रभावी करने वाले किसी भी कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता है और अदालत द्वारा इस आधार पर रद्द किया जा सकता है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करता है।  केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में दिए गए निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए, संसद ने अनुच्छेद 368 में दो खंड जोड़कर एक संशोधन किया, जिसमें घोषित किया गया कि अनुच्छेद 368 के तहत कोई भी संशोधन (भाग III सहित), चाहे धारा 55 के अधिनियमन से पहले या बाद में किया गया हो। संशोधन अधिनियम, 1976 पर किसी भी आधार पर किसी भी अदालत में सवाल नहीं उठाया जाएगा, और संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर कोई सीमा नहीं होगी।

इयाचिकाकर्ताओं ने राष्ट्रीयकरण अधिनियम, 1974 के विभिन्न प्रावधानों, संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 4 और 55, मिनर्वा मिल्स के राष्ट्रीयकरण के लिए सरकार के आदेश और एफआर पर डीपीएसपी को दी गई प्राथमिकता को चुनौती दी। 

समस्या

  1. अनुच्छेद 31C और 368 में संशोधन संवैधानिक हैं या नहीं।
  2. क्या डीपीएसपी को एफआर पर प्राथमिकता दी जा सकती है या नहीं।

निर्णय 

माननीय न्यायालय ने 41 के अनुपात के साथ अपना निर्णय लिया। अदालत ने कहा कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे में संशोधन नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 368 में किए गए संशोधनों को असंवैधानिक ठहराया गया क्योंकि उन्होंने बुनियादी ढांचे को बाधित किया और अदालत को न्यायिक समीक्षा की शक्ति से भी रोक दिया, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। 

अनुच्छेद 31C के संबंध में, अदालत ने कहा कि भाग 3 पर भाग 4 को प्राथमिकता देने से मूल संरचना नष्ट हो जाएगी। समानता का अधिकार और बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे बहुत ही बुनियादी और मौलिक अधिकार भेद्यता के अधीन हैं, जो बहुत समस्याग्रस्त है। अदालत ने स्वर्ण त्रिभुज, यानी अनुच्छेद 14, 19 और 21 के महत्व पर भी भरोसा किया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 31 C ने इस त्रिकोण के दो पक्षों को लूट लिया। 

संघर्ष के मामले में, कौन सा प्रबल होगा

एफआर की न्यायसंगत प्रकृति और डीपीएसपी की गैर-न्यायसंगत प्रकृति ने संविधान की स्थापना के बाद से दोनों के बीच संघर्ष पैदा किया है। मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपाकम (1951) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले तक, एफआर और डीपीएसपी के बीच लगातार संघर्ष था कि उनमें से कौन दूसरे पर हावी होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में इस सवाल का निपटारा करते हुए फैसला सुनाया कि एफआर और डीपीएसपी के बीच संघर्ष के मामलों में, एफआर प्रबल होंगे। यह माना गया कि डीपीएसपी को एफआर का अनुपालन करना होगा और उनके लिए सहायक कंपनियां चलानी होंगी। 

इसके अलावा, मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980), में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मौलिक अधिकार “अपने आप में एक अंत नहीं हैं, बल्कि अंत का साधन हैं। अंतिम लक्ष्य का उल्लेख डीपीएसपी में किया गया है। यह भी माना गया कि एफआर और डीपीएसपी एक साथ “सामाजिक क्रांति के प्रति प्रतिबद्धता के मूल का गठन करते हैं और वे, एक साथ, संविधान की अंतरात्मा हैं”। भारत का संविधान एफआर और डीपीएसपी के बीच संतुलन के आधार पर स्थापित किया गया है। वे एक रथ के दो पहियों के समान हैं जो एक सुचारू यात्रा के लिए एक साथ जाएंगे। एक को दूसरे पर श्रेष्ठता देने से संविधान का उद्देश्य बाधित होगा। दोनों के बीच संतुलन हमारे संविधान की मूल संरचना का एक अनिवार्य तत्व है। 

केरल राज्य बनाम एनएम थॉमस (1975) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि डीपीएसपी और एफआर को एक-दूसरे के साथ सद्भाव में माना जाना चाहिए और दोनों के बीच किसी भी स्पष्ट असंगति को हल करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। 

गुजरात मजदूर सभा बनाम गुजरात राज्य (2020) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि संविधान एक चार्टर है जो सत्ता के हस्तांतरण को गंभीर बनाता है। हालांकि, स्वराज्य की संवैधानिक दृष्टि राजनीतिक शक्ति के हस्तांतरण से परे है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धांत एक कल्याणकारी राज्य की एक सुसंगत दृष्टि प्रस्तुत करते हैं जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय पर विचार करता है। ग्रानविले ऑस्टिन ने भारत के संविधान पर अपने मौलिक कार्य में एफआर और डीपीएसपी को “संविधान की अंतरात्मा” के रूप में वर्णित किया है जो भारत में सामाजिक क्रांति की खोज को ताकत देकर भारत के भविष्य, वर्तमान और अतीत को जोड़ता है। 

निष्कर्ष और आगे का रास्ता 

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज के सामूहिक कल्याण के बीच तनाव के कारण मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष उत्पन्न हो सकता है। एक सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए, उनके बीच संतुलन खोजना आवश्यक है। जब एफआर और डीपीएसपी के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है तो अदालतों को उद्देश्यपूर्ण व्याख्या का दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है। सरकार को इस तरह से नीतियां बनानी चाहिए कि एफआर और डीपीएसपी के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके और संघर्ष को कम से कम किया जा सके। 

वर्षों से, सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्य को दोहराया है कि मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत साथ-साथ चलने चाहिए और दोनों को सामंजस्यपूर्ण रूप से सह-अस्तित्व में रहना चाहिए। व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों से समझौता किए बिना डीपीएसपी में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा प्रयास किए जाने चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने आईआर कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) के मामले में एफआर और डीपीएसपी के बीच संतुलन के महत्व को फिर से परिभाषित किया है। माननीय न्यायालय ने कहा कि क्यूंकि डीपीएसपी राज्य पर नकारात्मक और सकारात्मक दायित्व हैं, इसलिए संविधान सभा ने सरकार पर नागरिकों की स्वतंत्रता और लोगों के कल्याण के बीच एक बीच का रास्ता अपनाने का कर्तव्य लगाया है। एफआर और डीपीएसपी को जनता की भलाई के प्रति झुकाव के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। हालांकि, इस संतुलन को व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों पर वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। 

संदर्भ

  • Lexis Nexis’s Indian Constitutional Law by M P Jain
  • Indian Polity by M. Laxmikanth 

 

प्रथागत नियमों सहित अंतर्राष्ट्रीय कानून की उत्पत्ति, स्रोत

यह लेख Tanya Agarwal द्वारा लिखा गया है जो एमिटी लॉ स्कूल, दिल्ली (जीजीएसआईपीयू) में बीए एलएलबी (ऑनर्स) की तृतीय वर्ष की छात्रा है। निम्नलिखित लेख अंतर्राष्ट्रीय कानून की उत्पत्ति और स्रोतों की व्याख्या करता है उन स्थानों के माध्यम से जहां से यह राज्यों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में इसके अनुप्रयोग के साथ विकसित हुआ है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

अंतर्राष्ट्रीय कानून प्रकृति में व्यापक है और इसके कारण यह विभिन्न स्रोतों का एक समामेलन है, कानूनों की कोई एकल प्रणाली मौजूद नहीं है जो कानून की व्याख्या और विस्तार कर सके लेकिन अंतर्राष्ट्रीय कानून अभी भी मौजूद है और इसे सुनिश्चित किया जा सकता है।

ऐसे ‘स्रोत’ उपलब्ध हैं जिनसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियम निकाले और उनका विश्लेषण किया जा सकता है। लॉरेंस के अनुसार, यदि हम कानून के उस स्रोत को लेते हैं जिसमें उसे बाध्यकारी बल देने के लिए आवश्यक सभी अधिकार हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के संबंध में कानून का एक स्रोत है और वह है राष्ट्रों की सहमति। यह सहमति या तो मौन (प्रथागत) या व्यक्त (संधि) हो सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय कानून के पारंपरिक स्रोत बनाने वाले प्रमुख स्रोतों में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और संधियाँ शामिल हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्रोतों को प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों में विभाजित किया जा सकता है जिन्हें नीचे समझाया गया है।

प्राथमिक स्रोत

अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्राथमिक स्रोत औपचारिक प्रकृति के माने जाते हैं। वे आधिकारिक निकायों से आते हैं जिनमें संधियाँ, प्रथाओं और कानून के सिद्धांत शामिल हैं। आईसीजे क़ानून के अनुच्छेद 38(1)(a-c) को व्यापक रूप से अंतर्राष्ट्रीय कानून के औपचारिक स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त है जो बहुत महत्वपूर्ण है। इसे आम तौर पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्रोतों का एक आधिकारिक बयान माना जाता है। हेग में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के क़ानून के अनुच्छेद 38 को अंतर्राष्ट्रीय कानूनी स्रोतों की एक सुविधाजनक सूची के रूप में माना गया है।

आईसीजे क़ानून का अनुच्छेद 38:

आईसीजे के अनुच्छेद 38(1)(a-c) को अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थायी न्यायालय के क़ानून के उसी प्रावधान द्वारा अपनाया गया था जो 1920 में लीग ऑफ नेशंस के तत्वावधान (आस्पिसेज)/समर्थन के तहत संचालित होता था। लेख अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्राथमिक स्रोतों को संदर्भित करता है जो नीचे सूचीबद्ध हैं:

अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्रोत के रूप में प्रथा

कानून का मूल एवं प्राचीनतम स्रोत प्रथा के नाम से जाना जाता है। प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियमों में एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया शामिल थी जिसे पूरे समुदाय द्वारा मान्यता प्राप्त हुई। प्रथागत नियमों की उपस्थिति का अनुमान राज्य के अभ्यास और व्यवहार से लगाया जा सकता है क्योंकि यह कानून का लिखित स्रोत नहीं है। कहा जाता है कि प्रथागत कानून के नियम में दो तत्व होते हैं:

  • सबसे पहले, व्यापक और सुसंगत राज्य अभ्यास होना चाहिए।
  • दूसरे, “ओपिनियो ज्यूरिस” होना चाहिए, एक लैटिन शब्द जिसका अर्थ है ऐसे कानून के अस्तित्व में विश्वास करना कानूनी दायित्व है।

प्रथागत कानून की विशेषताएं

एकरूप और सामान्य

प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून के बाध्यकारी नियमों को जन्म देने के लिए राज्य अभ्यास, यह अभ्यास समान, सुसंगत और सामान्य होना चाहिए और इस विश्वास के साथ जोड़ा जाना चाहिए कि अभ्यास आदतन के बजाय अनिवार्य है। एसाइलम मामले में, अदालत ने घोषणा की कि एक प्रथागत नियम का पूरे इतिहास में लगातार और समान रूप से उपयोग किया जाना चाहिए जिसे राज्य अभ्यास के माध्यम से पता लगाया जा सकता है।

अवधि

किसी आचरण विशेष का निरंतर एवं नियमित प्रयोग प्रथागत कानून का नियम माना जाता है। उत्तरी सागर महाद्वीपीय शेल्फ मामलों में, आईसीजे ने कहा कि समय की कोई सटीक अवधि नहीं है जिसके दौरान अभ्यास मौजूद होना चाहिए। बात बस इतनी है कि इसका लंबे समय तक पालन किया जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि प्रथा की अन्य आवश्यकताएं संतोषजनक हैं।

कानून की एक राय

प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून का दर्जा प्राप्त करने के लिए विचाराधीन नियम को राज्य द्वारा कानून में बाध्यकारी माना जाना चाहिए यानी राज्यों को इस प्रथा का पालन करने के लिए खुद को कानूनी दायित्व के तहत मानना ​​चाहिए। लोटस मामले में, ओपिनियो ज्यूरिस को प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून के एक आवश्यक तत्व के रूप में देखा गया था और उत्तरी सागर महाद्वीपीय शेल्फ मामलों में भी इसकी पुष्टि की गई थी।

अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्रोत के रूप में सम्मेलन

संधियाँ और सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय कानून के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक हैं। ये सम्मेलन बहुपक्षीय या द्विपक्षीय हो सकते हैं। बहुपक्षीय सम्मेलन उन संधियों से संबंधित हैं जो कानून के सार्वभौमिक या सामान्य अनुप्रयोग को तैयार करते हैं। दूसरी ओर, द्विपक्षीय सम्मेलन वे होते हैं जो विशेष रूप से दो राज्यों द्वारा इन राज्यों से संबंधित किसी विशेष मामले से निपटने के लिए बनाए जाते हैं।

संधि के कानून पर वियना सम्मेलन 1969, संधियों के अनुबंध के लिए संहिताबद्ध कानून, परिभाषा देता है की “एक संधि एक समझौता है जिसके तहत दो या दो से अधिक राज्य अंतर्राष्ट्रीय कानून द्वारा शासित होते है और उनके बीच संबंध स्थापित करते हैं या स्थापित करना चाहते हैं।” संधियाँ राज्यों के लिए अधिकारों और दायित्वों के प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में कार्य करती हैं, वे कानून के मौजूदा पारंपरिक स्रोत को संहिताबद्ध करती हैं।

वे स्वैच्छिक हैं और गैर-हस्ताक्षरकर्ता को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं, हालांकि, इसके कुछ अपवाद हैं, यानी यदि कोई नियम जस कॉजेंस मानदंड का हिस्सा बनता है क्योंकि वे अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्वीकृत सिद्धांतों का हिस्सा हैं और प्रत्येक राज्य का एक अनिवार्य कर्तव्य है अपने सर्वव्यापी दायित्वों के कारण इनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। (पूरे विश्व का ऋणी)

अंतर्राष्ट्रीय कानून का सामान्य सिद्धांत

अधिकांश आधुनिक न्यायविद कानून के सामान्य सिद्धांतों को सभी राष्ट्रीय कानूनी प्रणालियों के लिए सामान्य मानते हैं, जहां तक ​​वे राज्यों के संबंधों पर लागू होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानून में नगरपालिका प्रणाली की तुलना में कम निर्णय लिए गए मामले हैं और नई स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए नियम प्रदान करने के लिए कानून बनाने की कोई विधि नहीं है। इसी कारण से ‘सभ्य राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त कानून के सामान्य सिद्धांतों’ का प्रावधान कानून के स्रोत के रूप में अनुच्छेद 38 में डाला गया था।

सामान्य सिद्धांतों के कुछ उदाहरणों में शामिल हैं:

  • रेस ज्यूडिकाटा का नियम, जिसे नरसंहार (जेनोसाइड) सम्मेलन बोस्निया और हर्जेगोविना बनाम सर्बिया और मोंटेनेग्रो के मामले में अदालत द्वारा पुष्टि की गई है,
  • पैक्टा संट सर्वंडा के नियम को लागू करना,
  • गलती से हुई क्षति की भरपाई की जानी चाहिए, 
  • किसी स्पष्ट और वर्तमान खतरे के विरुद्ध अपने व्यक्ति, परिवार या समुदाय पर हमले के विरुद्ध व्यक्ति के लिए आत्मरक्षा का अधिकार,
  • अपने स्वयं के कारण के लिए कोई भी न्यायाधीश नहीं हो सकता है और न्यायाधीश को दोनों पक्षों को सुनना होगा।

द्वितीयक स्रोत (अंतर्राष्ट्रीय कानून का साक्ष्य)

अनुच्छेद 38(1)(d) अंतर्राष्ट्रीय कानून के भौतिक स्रोत का हिस्सा है जिसे द्वितीयक स्रोत के रूप में भी जाना जाता है। इसमें कहा गया है कि न्यायिक निर्णय और विभिन्न राष्ट्रों के सबसे उच्च योग्य प्रचारकों (पब्लिसिस्ट) की शिक्षाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय कानून के निर्माण में मार्गदर्शन करने में मदद करती हैं, हालाँकि वे बाध्यकारी नहीं हैं बल्कि प्रकृति में केवल सलाहकार हैं। 

न्यायिक निर्णय

इसके तहत, अदालत को अदालत के पिछले निर्णयों को लागू करने का अधिकार है, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून के साक्ष्य के रूप में भी जाना जाता है, हालांकि, यह क़ानून के अनुच्छेद 59 के तहत बताए गए अपवाद के अधीन है, जिसमें कहा गया है कि न्यायालय का पिछला निर्णय केवल न्यायालय का मार्गदर्शन कर सकता है, वह न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं है।

यह लेख न्यायालय को एक नियम प्रदान करता है कि इसे उदाहरणों से बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले को कानूनी स्थिति के आधिकारिक साक्ष्य के रूप में प्रमाणित करने के लिए न्यायालय द्वारा अपने पिछले निर्णय के न्यायिक और सलाहकारी राय का सहारा लिया जा सकता है।

आईसीजे अपनी सलाहकारी राय, निर्णयों और न्यायाधीश के शासन के माध्यम से कानून बनाने की प्रक्रिया में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। इसके प्रमुख उदाहरणों में से एक में निकारागुआ बनाम यूएसए का मामला है जिसमे अदालत द्वारा निर्धारित बल के उपयोग या धमकी के खिलाफ निषेध का सिद्धांत शामिल है जिसे अब प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक हिस्सा माना जाता है। 

अदालत के न्यायिक निर्णय में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थ पंचाट (आर्बिट्रेशन अवार्ड) और राष्ट्रीय अदालतों के फैसले भी शामिल होते हैं। एक प्रमुख उदाहरण अलबामा दावा मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) है, जिसने अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में एक नए युग की शुरुआत को चिह्नित किया, जिसमें विवादो को सुलझाने में न्यायिक और मध्यस्थता तरीकों का बढ़ता उपयोग किया गया था।

मध्यस्थ पंचाटों के प्रभाव का एक और उदाहरण पालमास द्वीप का मामला है जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि सर्वसम्मत, या लगभग सर्वसम्मत, निर्णय कानून के प्रगतिशील विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मौजूदा मुद्दे की व्याख्या के लिए एक एकल दृष्टिकोण प्रदान करने में मदद करता है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के विकास के दौरान विवाद से बचने में मदद करता है।

न्यायिक लेख और शिक्षाएँ

इस स्रोत के अन्य प्रमुख भागों में जेंटिली, ग्रोटियस और वेटेल जिन्हें 16वीं से 18वीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय कानून के सर्वोच्च प्राधिकारी माना जाता था जैसे उच्च योग्य लेखकों की शिक्षाएँ भी शामिल हैं।

पाठ्यपुस्तकों का उपयोग वास्तविक नियमों के स्रोत के बजाय किसी विशेष बिंदु पर कानून क्या है, इसकी खोज करने की एक विधि के रूप में किया जाता है, और यहां तक ​​कि सबसे सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय वकीलों के लेखन भी कानून नहीं बना सकते हैं। इन्हें कानून का एक साक्ष्य स्रोत माना जाता है क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों की व्याख्या और समझ प्रदान करते हैं। ये एक आवश्यक मूल्य रखते हैं क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय कानून के उन अस्पष्ट क्षेत्रों को भरने का काम करते हैं जहां संधियाँ या प्रथा मौजूद नहीं हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्य स्रोत

अंतर्राष्ट्रीय कानून नियमों के एक सेट पर आधारित नहीं है और इसलिए अनुच्छेद 38 संपूर्ण नहीं है। ऐसे कई अन्य कारक हैं जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के उपयोग को विकसित करते हैं जिनमें सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की घोषणाएं, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाई गई सिफारिशें, अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता और समानता आदि शामिल हैं।

दुनिया लगातार विकसित हो रही है और समस्याएं अधिक जटिल होती जा रही हैं, महासभा द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव और घोषणाएं आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून द्वारा अपनाई गई दिशा पर अपरिहार्य (इनएविटेबल) प्रभाव डालती हैं। जिस तरह से राज्य महासभा में मतदान करते हैं और ऐसे अवसरों पर दिए गए स्पष्टीकरण राज्य के अभ्यास और कानून के बारे में राज्य की समझ का प्रमाण बनते हैं।

उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम निकारागुआ के मामले में, महासभा ने अदालत से इस प्रश्न पर एक सलाहकारी राय मांगी थी: “क्या अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियारों के खतरे या उपयोग की अनुमति है?” संबंधित अंतर्राष्ट्रीय कानूनी दस्तावेज़ के साथ-साथ सुरक्षा परिषदों की महासभा के मामलों की समीक्षा के बाद अदालत इस प्रस्ताव पर पहुंची कि परमाणु हथियारों का खतरा या उपयोग आम तौर पर सशस्त्र विवादो और विशेष रूप से मानवीय कानून के सिद्धांत और नियम पर लागू अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियमों के विपरीत होगा। 

समानता की अवधारणा का उल्लेख कई मामलों में किया गया है। 1968 में भारत और पाकिस्तान के बीच कच्छ के रण मध्यस्था में, न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने सहमति व्यक्त की कि समानता अंतर्राष्ट्रीय कानून का हिस्सा है और तदनुसार, पक्ष अपने मामलों की प्रस्तुति में ऐसे सिद्धांतों पर भरोसा कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्य स्रोतों के सटीक प्रतिबिंब माने जाने वाले अंतर के लिए एक सच्ची प्रशंसा प्रदान की है और इसकी गतिविधियों ने सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों और महासभा के 191 सदस्यों द्वारा, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग द्वारा संहिताबद्ध अंतर्राष्ट्रीय कानून के तेजी से विकास के लिए अधिक आवश्यकताएं उत्पन्न होती हैं।

राज्य और अंतर्राष्ट्रीय संगठन

अंतर्राष्ट्रीय कानून एक कानूनी प्रणाली को दिए गए अधिकारों और कर्तव्यों की एक प्रणाली है ताकि वे वैश्विक स्तर पर उनका प्रयोग कर सकें। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय निकाय हैं जो प्रथागत कानून के तहत ऐसे अधिकारों के कब्जे के अधीन हैं और इसलिए यदि उनके अधिकारों का उल्लंघन होता है तो उन्हें कोई भी दावा लाने का विशेषाधिकार भी है।

इन निकायों के व्यक्तित्व का निर्धारण मुख्य रूप से विशिष्ट अधिकारों और कर्तव्यों की प्रकृति और सीमा पर निर्भर करता है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के विकास के साथ, इन निकायों के बीच अंतर-संबंध और उनके अधिकारों और कर्तव्यों के अनुसार दावों को लागू करने की उनकी क्षमता को निर्धारित करना आवश्यक है। इन निकायों में राज्य, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, क्षेत्रीय संगठन, गैर-सरकारी संगठन और व्यक्ति शामिल हो सकते हैं।

राज्य

राज्यों के पास पूर्ण सीमा तक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व है। वे सबसे महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में से एक हैं क्योंकि वे सभ्यता की सामाजिक गतिविधियों के संग्रह के लिए प्राथमिक केंद्र बनाते हैं।

मान्यता का सिद्धांत – राज्य का निर्माण

राज्य की मान्यता एक अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा है जिसमें एक नए राज्य या मौजूदा राज्य को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का सदस्य होने की औपचारिक स्वीकृति दी जाती है। राज्यों के अधिकारों और कर्तव्यों पर मोंटेवीडियो सम्मेलन, 1933 के अनुच्छेद 1 और ओपेनहेम के अनुसार, किसी राज्य की इकाई तब बनाई जा सकती है जब उसमें निम्नलिखित विशेषताएं हों:

  1. परिभाषित क्षेत्र
  2. जनसंख्या
  3. सरकार
  4. दूसरे राज्य के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता

हालाँकि, अब तक ऐसा कोई निर्धारित पैटर्न मान्यता प्राप्त नहीं है जो उपरोक्त मानदंडों के अनुसार राज्य की मान्यता के लिए एक विशेष आधार बनाता हो। ऐसे प्रावधान न तो संपूर्ण हैं और न ही अपरिवर्तनीय हैं। किसी राज्य की मान्यता अधिकारों, कर्तव्यों और प्रतिरक्षा के रूप में कुछ विशेषाधिकार प्रदान करती है जिसमें किसी अन्य राज्य के साथ विदेशी संबंध में प्रवेश करने का अधिकार, एक संधि का हिस्सा बनना, उत्तराधिकार से गुजरने का अधिकार और संयुक्त राज्य का सदस्य बनने का अधिकार शामिल है। मान्यता पर दो सिद्धांत हैं जो निम्नलिखित हैं:

घोषणात्मक सिद्धांत

यह सिद्धांत फिशर और ब्रियर्ली जैसे प्रख्यात न्यायविदों द्वारा प्रतिपादित किया गया था, इस सिद्धांत के तहत एक नए राज्य की स्वतंत्रता अन्य राज्यों द्वारा इसकी स्वीकृति को ध्यान में नहीं रखती है। यह सिद्धांत मोंटेवीडियो सम्मेलन के अनुच्छेद 3 में दिया गया है जहां यह माना जाता है कि एक नए राज्य का अस्तित्व मौजूदा राज्य की सहमति पर निर्भर नहीं करता है।

अविच्छिन्न (कंजिक्यूटिव) सिद्धांत

ओपेनहेम ने इस सिद्धांत का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि किसी राज्य को अंतर्राष्ट्रीय इकाई मानने के लिए, उसे अन्य संप्रभु राज्यों द्वारा मान्यता प्राप्त होना आवश्यक है ताकि वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों का आनंद ले सके। यह सिद्धांत किसी राज्य की गैर-अस्तित्व का प्रस्ताव नहीं करता है, बल्कि यह एक राज्य को अपने विशेष अधिकारों का आनंद लेने के लिए अन्य राज्यों द्वारा स्वीकृति पर जोर देता है।

राज्यों की मान्यता

राज्यों की मान्यता के दो तरीके हैं जो इस प्रकार हैं:

वास्तविक मान्यता कानूनी मान्यता
यह राज्य के दर्जे की अनंतिम और तथ्यात्मक मान्यता है। यह मौजूदा राज्यों द्वारा राज्य के दर्जे की कानूनी मान्यता है
यह राज्य की कानूनी मान्यता से पहले प्राथमिक कदम है। इसे वास्तविक मान्यता के साथ या उसके बिना भी प्रदान किया जा सकता है।
यह प्रकृति में प्रतिसंहरणीय (रिवोकेबल), सशर्त या गैर-सशर्त है। यह प्रकृति में गैर-प्रतिसंहरणीय और गैर-सशर्त है।
ये राज्य के उत्तराधिकार से नहीं गुजर सकते और इसलिए उन्हें पूर्ण राजनयिक छूट प्राप्त नहीं है। ये राज्य के उत्तराधिकार से गुजर सकते हैं और इसलिए पूर्ण राजनयिक प्रतिरक्षा का आनंद लेते हैं।
इसकी मान्यता राज्यत्व की आवश्यक शर्तें पूरी होने पर दी जाती है। इसकी मान्यता तब मिलती है जब राज्य पर्याप्त नियंत्रण और स्थायित्व के साथ-साथ राज्यों की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है

जब किसी राज्य को मान्यता दी जाती है, तो उसे दो तरीकों से घोषित किया जा सकता है:

व्यक्त मान्यता

व्यक्त मान्यता एक मौजूदा राज्य द्वारा नवगठित राज्य की उपस्थिति को मान्यता देने वाली आधिकारिक अधिसूचना या घोषणा के माध्यम से की जाती है। यह श्रेणी आम तौर पर मान्यता के कानूनी रूप को मान्यता देती है जब तक कि मान्यता प्राप्त राज्य द्वारा इसे किसी अन्य फॉर्म के तहत विचार करने के लिए घोषणा में अन्यथा प्रदान नहीं किया जाता है।

निहित मान्यता

किसी मौजूदा कार्य की अंतर्निहित रूप से की गई कार्रवाई जो एक अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति के रूप में एक नए कार्य की स्वीकृति का संकेत देती है, उसे निहित मान्यता का एक रूप माना जाता है। उदाहरण के लिए भाषण, घोषणा आदि के लिए कई निहित कार्रवाइयां हो सकती हैं। यह मामला-दर-मामला आधार पर निर्भर करता है।

सरकार की मान्यता

किसी सरकार की मान्यता के लिए निर्धारित मानदंड किसी राज्य की मान्यता के मानदंड से भिन्न होते हैं। नवगठित सरकार के मामले में, उसकी वैध मान्यता सुनिश्चित करने के लिए सरकार की संवैधानिकता की जाँच करना आवश्यक है। जब कोई नया राज्य अस्तित्व में आता है तो अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नई सरकार की संरचना की जांच करना आवश्यक हो जाता है।

नवगठित सरकार को मान्यता देने के लिए निम्नलिखित मानदंडों की जाँच की जानी चाहिए:

  1. अपनी जनसंख्या पर सरकार का पर्याप्त नियंत्रण एवं शक्ति होना।
  2. नई सरकार की अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा करने की क्षमता।

ऐसे कई सिद्धांत हैं जिन्हें सरकार को मान्यता देने के लिए स्वीकार किया गया है लेकिन उनमें से सबसे प्रमुख वैधता का तथाकथित सिद्धांत है, इसका उपयोग शुरुआत में मध्य अमेरिका के संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे इस सिद्धांत में गिरावट आई।

संयुक्त राज्य अमेरिका के अनुसार मान्यता अभ्यास

संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल एक मान्यता प्राप्त राज्य ही मुकदमा कर सकता है, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा मान्यता की प्रथा पर कई कानूनी मिसालें हैं, उदाहरण के लिए सलीमॉफ मामले में प्रमाण पत्र की शर्तों ने अदालत को सोवियत सरकार को मान्यता प्राप्त मानने के लिए प्रोत्साहित किया। दूसरी ओर, सरकार, मारेट के मामले में सोवियत गणराज्य एस्टोनिया पर कार्यकारी के बयान का स्वर निश्चित रूप से उसके आदेशों की मान्यता या प्रवर्तन की किसी भी धारणा के प्रति प्रतिकूल था।

1977 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने घोषणा की कि सरकार में बदलाव पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्हें राजनयिक संबंधों की आवश्यकता को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए और यदि प्रशासन अन्य सरकारों को शामिल करने और व्यापार करने के लिए तैयार है।

इसलिए, अमेरिका सरकार को मान्यता देने के लिए राजनयिक संबंध शुरू करना पसंद करता है। यह देखा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका आम तौर पर मान्यता में आगे बढ़ने से बचता है, नई सरकार को वैधता प्रदान करने का निर्णय लेने से पहले घरेलू राजनीति शुरू होने या अमेरिकी राज्यों के संगठन जैसे क्षेत्रीय निकायों द्वारा संकट को हल करने की प्रतीक्षा करता है। उदाहरण के लिए, होंडुरास के मामले में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ज़ेलया के निष्कासन को अवैध मानने में अन्य लैटिन अमेरिकी देशों का अनुसरण किया।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन (आईओ)

अर्थ एवं प्रकृति

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय विभिन्न आवाजों और विचारों का एक समामेलन है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की बढ़ती आवश्यकता के साथ और इस समुदाय में शांति सुनिश्चित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन उभरे हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन को बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संगठनों पर आधारित संप्रभु राज्यों के सहयोग के रूप में परिभाषित किया गया है और इसमें प्रतिभागियों की अपेक्षाकृत स्थिर श्रृंखला शामिल है, जिसकी मूलभूत विशेषता सामान्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कार्य करने वाली निश्चित क्षमताओं और शक्तियों वाले स्थायी संस्थाओं का अस्तित्व है।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन का वर्णन करने वाले आवश्यक तत्वों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  1. बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय समझौता
  2. संस्था का व्यक्तिगत व्यक्तित्व
  3. स्थायी संस्था अपना कार्य करते हैं

अंतर्राष्ट्रीय संगठन आमतौर पर राज्यों के बीच या उनके विधिवत अधिकृत प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाते हैं, हालांकि, इस पर कोई समान नियम नहीं है, राज्य कभी-कभी किसी संधि के आधार पर कानूनी इकाई बनाते हैं, हालांकि यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय जैसी संधि के सिद्धांतों को लागू करने और बनाए रखने के लिए होते हैं लेकिन उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संगठन नहीं माना जाता है।

एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन एक संधि के गठन से या किसी मौजूदा संगठन के माध्यम से एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने के लिए कुछ शक्तियां प्रदान करके अस्तित्व में आ सकता है। यूनिसेफ एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसका गठन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा किया गया था। 

अंतर्राष्ट्रीय संगठन का ऐतिहासिक विकास

आईओ के विकास का पता विश्व सरकार की मनोवैज्ञानिक धारणा स्थापित करने की आवश्यकता से लगाया जा सकता है। 19वीं शताब्दी में ही प्रमुख आईओ का उदय हुआ था, इससे पहले छोटी परिषदें थीं जैसे हैन्सियाटिक लीग या स्विस परिसंघ और नीदरलैंड के संयुक्त प्रांत आदि।

द्विपक्षीय आवश्यकताओं को स्थापित करने वाले दूतावास दो से अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाली समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त नहीं थे, एक रास्ता खोजने की आवश्यकता थी ताकि सभी राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व किया जा सके इसलिए कई राज्यों के सभी प्रतिनिधियों का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसे 1648 में वेस्टफेलिया की शांति के प्रमुख प्रवर्तक आईओ के रूप में जाना गया, जिसने मध्य यूरोप के तीस साल के धार्मिक विवाद को समाप्त कर दिया और औपचारिक रूप से यूरोपीय राजनीति की आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य व्यवस्था की स्थापना की।

प्रथम विश्व युद्ध तक, प्रमुख मुद्दों को सम्मेलनों के माध्यम से खोजा जाता था, उदाहरण के लिए, 1815 में वियना की कांग्रेस ने नियमित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय मामलों को विनियमित करने का पहला व्यवस्थित प्रयास किया।

इन सम्मेलनों की तदर्थ (एड हॉक) प्रकृति में कई विसंगतियों के कारण, क्योंकि वे प्रकृति में केवल राज्य-विशिष्ट थे और केवल इच्छुक राज्यों, अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों और रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति जैसे सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय संघों की पहल से ही बुलाए जा सकते थे और 19 वीं शताब्दी के दौरान राइन और डेन्यूब नदियों जैसी संचार की महत्वपूर्ण धमनियों के कुशल कामकाज के लिए अंतर-सरकारी संघ उभरे।

समाज के निरंतर विकास के साथ, यह देखा गया कि आईओ का एक कुशल निकाय स्थापित किया जा सकता है, और राष्ट्र संघ पहला अंतर्राष्ट्रीय संगठन था जिसे न केवल उन क्षेत्रों में राज्यों के बीच संगठन संचालन के लिए डिज़ाइन किया गया था जिन्हें कुछ लोगों ने कहा है ‘निम्न राजनीति’, जैसे परिवहन और संचार, या अधिक सांसारिक पहलू। हालाँकि, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, राष्ट्र की लीग को इसकी अक्षमता के कारण भंग कर दिया गया और 1919 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई।

निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय कानून विभिन्न स्रोतों के माध्यम से उभरा है जिन्हें आईसीजे क़ानून के अनुच्छेद 38 में संहिताबद्ध किया गया है जो प्रथाओं, संधियों और सामान्य सिद्धांतों को अंतर्राष्ट्रीय कानून के औपचारिक स्रोतों के रूप में पहचानता है। हालाँकि, विश्व न्यायालय द्वारा दिए गए न्यायिक निर्णय अंतर्राष्ट्रीय कानून के विकास के मार्गदर्शन में सलाहकार राय के रूप में भी कार्य करते हैं।

विभिन्न दार्शनिकों और न्यायवादी सिद्धांतकारों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय कानून के दर्शन को भी प्रबुद्ध किया है। अंतर्राष्ट्रीय कानून विभिन्न माध्यमों से राज्यों को विश्व समुदाय की एक इकाई के रूप में पहचानने में मदद करता है ताकि उन्हें अधिकार और कर्तव्य प्रदान किए जा सकें। राष्ट्र-राज्यों के बीच शांति और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए, अंतर्राष्ट्रीय संगठन सहयोग बढ़ाने और विभिन्न स्रोतों से उभरे अंतर्राष्ट्रीय कानून को बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

संदर्भ

  • Bowett’s International Institutions, pp. 6–9.
  • El Erian, ‘Legal Organization’, p. 58.
  • 145 F.2d 431 (1944); 12 AD, p. 29. 
  • Sources of International law In the light of Article 38 of the International Court of Justice By Shagufta Oma.
  • Peter Malanczuk & Akehurst’s Modern Introduction to International Law, (London: George Allen & Unwin, 1997); 49.
  • The additional clause relating to recognition by ‘civilised nations’ is regarded today as redundant: see e.g. Pellet, ‘Article 38’, p. 769.
  •  Israr Khan, Article 38 of the Statute of the International Court of Justice: A Complete Reference Point for the Sources of International Law, THE NEW JURIST, 5th April 2019.

 

पवित्र दायित्व का सिद्धांत

यह लेख Abha Singhal द्वारा लिखा गया है। इस लेख में लेखक ने पवित्र दायित्व के सिद्धांत की उत्पत्ति और विकास को समझाने का प्रयास किया है। आगे बढ़ते हुए, लेखक ने वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता को समझाने की कोशिश की है और ऐतिहासिक निर्णयों की मदद से इस अवधारणा को और स्पष्ट किया है। इस लेख का अनुवाद Shubham Choube द्वारा किया गया है।

परिचय

हिंदू कानूनी प्रणाली और पौराणिक कथाओं में, मृत्यु से पहले सभी ऋणों को चुकाना आवश्यक माना जाता है, और यदि मृतक अपनी मृत्यु से पहले ऐसा करने में सक्षम नहीं होता तो हिंदू कानून के अनुसार, इसका दायित्व बेटे पर आ जाता है कि वह कर्ज चुकाए ताकि मृतक को स्वर्ग का रास्ता मिल सके। बृहस्पति के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति कर्ज चुकाए बिना मर जाता है, तो वह ऋणदाता के घर में नौकर, दास, स्त्री या चतुर्भुज के रूप में जन्म लेगा। पवित्र दायित्व का सिद्धांत प्राचीन ग्रंथों, रीति-रिवाजों और हिंदू कानून के उपयोगों से उत्पन्न हुआ है, जो इस बात पर जोर देता है कि पुत्र क दायित्व है कि वह आत्मा को ऋणग्रस्तता (इंडेब्टेडनेस) से मुक्त करे और इसे स्वर्गीय शक्तियों को सौंप दे। पवित्र दायित्व का सिद्धांत उन ऋणों को शामिल करता है जो कानूनी और नैतिक उद्देश्यों के लिए किए जाते हैं, न कि किसी ऐसी चीज़ के लिए जिसे कानून और समाज की नज़र में अवैध और अनैतिक माना जाता है। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 में संशोधन के बाद, बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार दिया गया, जिसने 2005 के बाद के परिदृश्य में पवित्र दायित्व के सिद्धांत की प्रासंगिकता और प्रयोज्यता (ऍप्लिकेबिलिटी) पर सवाल उठाया। 

पवित्र दायित्व के सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अर्थ

पवित्र दायित्व का सिद्धांत हिंदू कानून के तहत पवित्रता और धर्म के विचार पर आधारित है। शास्त्रों के अनुसार, यह पवित्र माना जाता है कि बेटा, पोता और परपोता अपने पिता के ऋण का भुगतान करते हैं, और यह धार्मिक दायित्व इस तथ्य से आता है कि वे सभी पारिवारिक संपत्ति में सहदायिक (कोपार्सनर्स) हैं।

हिंदू परंपरा के अनुसार, यदि कोई हिंदू अपने सभी ऋणों का भुगतान किए बिना मर जाता है, तो उन्हें उसके बाद के जीवन में इसके नकारात्मक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं और उक्त कार्य को पाप माना जाएगा जो कोई भी सभी ऋणों का भुगतान किए बिना मर जाएगा, वह स्वर्ग नहीं जा सकेगा। इस संबंध में प्राचीन विद्वान बृहस्पति ने कहा है कि जो कोई धन या संपत्ति प्राप्त करने के बाद उसे मालिक को चुकाने में विफल रहता है, वह ऋणदाता के घर में दास, दासी, स्त्री या चतुर्भुज के रूप में जन्म लेगा। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इस सिद्धांत का उद्देश्य मृतक को दंडित करना या ऋणदाता को लाभ पहुंचाना नहीं है, बल्कि मृत्यु के बाद मृतक की भलाई सुनिश्चित करना है।

एंथनीस्वामी बनाम एम.आर. चिन्नास्वामी (1969) के मामले में, पवित्र दायित्व की धारणा को स्वतंत्र आवश्यकता के बजाय संपत्ति पर बेटे के दावे के प्रति संतुलन माना गया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र दायित्व का सिद्धांत जो न्याय, समता और अच्छे विवेक के विचारों पर आधारित है, केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं है बल्कि अब यह कानून के दायरे में आ गया है। इसे स्पष्ट करने के लिए, पवित्र दायित्व का सिद्धांत हिंदू कानून के मिताक्षरा विचारधारा का एक अभिन्न अंग बन गया है, जिसमें एक बेटे को पैदा होते ही अपने पिता के साथ, पारिवारिक संपत्ति का अधिकार मिल जाता है।

धर्मशास्त्र के अनुसार ऋण चुकौती महत्वपूर्ण है। यदि किसी मनुष्य को अपना और अपने पिता दोनों का कर्ज़ चुकाना हो, तो पहले उसका कर्ज़ चुकाना होगा। इसके अलावा, पहले दादा का कर्ज चुकाना चाहिए, उसके बाद पिता का कर्ज चुकाना चाहिए। इससे पता चलता है कि ऋण चुकाना केवल एक धार्मिक दायित्व नहीं है, बल्कि भारतीय कानूनी साहित्य में सदियों से मान्यता प्राप्त एक सामाजिक दायित्व भी है।

पवित्र दायित्व का अर्थ

पवित्र का मतलब कुछ धार्मिक और भक्तिमय होता है। यहां दायित्व का तात्पर्य एक हिंदू व्यक्ति के कर्तव्य या कर्म से है। पवित्र दायित्व अनिवार्य रूप से एक हिंदू व्यक्ति का भगवान के प्रति एक दायित्व है ताकि पूर्वजों की आध्यात्मिक मुक्ति सुनिश्चित हो सके। पवित्र दायित्व के सिद्धांत का अर्थ एक नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है जो बेटे पर उसके मृत और कर्ज में डूबे पिता, दादा या परदादा के ऋण को चुकाने के लिए लगाया जाता है।

‘पवित्र’ शब्द का अर्थ कुछ धार्मिक है, और ‘कर्तव्य’ का अर्थ कार्य है। पवित्र दायित्व का सिद्धांत हिंदू कानून के तहत एक मौलिक अवधारणा है जिसे प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में खोजा जा सकता है, जिसके अनुसार, किसी व्यक्ति का ऋण, चाहे वह नैतिक हो या/और वित्तीय, चुकाया जाना चाहिए। पवित्र दायित्व का सिद्धांत धार्मिक प्रकृति की लंबे समय से चली आ रही परंपरा की व्याख्या करता है, जिसमें बेटे को अपने पिता के ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। यहां ऋण केवल व्यवहारिक ऋण का उल्लेख करते हैं, यानी, वे ऋण जो केवल कानूनी उद्देश्यों के लिए हैं और जो अव्यवहारिक ऋण को बाहर रखते हैं, जो अनैतिक और अनैतिक उद्देश्यों के लिए लिए गए ऋण हैं। यह इस विश्वास पर आधारित है कि जब पिता द्वारा लिया गया ऋण उसके जीवनकाल के दौरान नहीं चुकाया जाता है, तो उसकी मृत्यु के बाद, उसके अपने बेटे को इसकी भरपाई करनी चाहिए।

सत नारायण बनाम राय बहादुर श्री किशन दास (1936) के मामले में, यह देखा गया कि पवित्र दायित्व का विचार तीसरे पक्ष की सुरक्षा की आवश्यकता के बजाय, अपने पिता के दायित्वों को चुकाने के बेटों के पवित्र दायित्व पर आधारित है।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत में दायित्व का दायरा

ऋण चुकाने का पुत्र का दायित्व

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत दायित्व प्रकृति में व्यक्तिगत नहीं है, क्योंकि यह पैतृक संपत्ति में प्राप्त हिस्से की राशि तक ही सीमित है। मिताक्षरा विचारधारा के अनुसार, बेटे, पोतेऔर परपोते को उनके जन्म के बाद पारिवारिक संपत्ति पर अधिकार होता है, जिसे मूल रूप से मिताक्षरा सहदायिकी के रूप में जाना जाता है, जो तीन पीढ़ियों से बनी होती है जो पैतृक संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए पात्र होती हैं। इस प्रकार, पुरुष वंशजों की ये तीन पीढ़ियाँ पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत उत्तरदायी हैं। इसके अलावा, पिता, दादा या परदादा का भुगतान करने का दायित्व केवल मूल राशि तक ही सीमित है, उस पर ब्याज के लिए नहीं। ब्रिटिश काल से पहले, बेटे और पोते का ऋण चुकाने का व्यक्तिगत कर्तव्य था, जबकि परपोते का दायित्व संयुक्त परिवार की विरासत के उसके हिस्से तक ही सीमित था। ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान, एक बेटे, पोते या परपोते की ज़िम्मेदारी संयुक्त परिवार की संपत्ति के उसके हिस्से तक ही सीमित थी। परिणामस्वरूप, भले ही बेटे के पास कुछ निजी संपत्ति हो, वह पिता का ऋण चुकाने के लिए बाध्य नहीं है।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के लिए पुत्रों को प्राथमिकता क्यों दी जाती है?

पारंपरिक हिंदू समाजों में, महिला वंशजों को अपने पूर्वजों के ऋण को चुकाने के लिए किसी दायित्व का सामना नहीं करना पड़ता था। ऐसा इसलिए है क्योंकि महिलाओं को अक्सर ऐसी ज़िम्मेदारियाँ लेने में असमर्थ माना जाता था और उन्हें किसी पुरुष की संपत्ति या भूसंपत्ति का विस्तार माना जाता था। यह उस समय समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक मानसिकता और रूढ़िवादिता को दर्शाता है। ऐसी अन्यायपूर्ण धारणाओं और दृढ़ विश्वासों के कारण, पुत्रों या पुरुष वंशजों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने के योग्य माना जाता था और पूर्वजों के ऋणों को चुकाने या चुकाने का दायित्व उन्हें पैतृक संपत्ति में प्राप्त अधिकार का एक परिणाम है। बेटे की तुलना में संपत्ति में पिता की श्रेष्ठ रुचि बेटे के पवित्र कर्तव्य को उस बेटे के लिए कानूनी कर्त्तव्य में बदल देती है जो भविष्य में ऐसी संपत्ति में सफल होता है।

दायित्व धार्मिक ऋणों तक ही सीमित है

इसके अलावा, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह सिद्धांत केवल उन ऋणों पर लागू होता है जिन्हें धार्मिक प्रकृति का माना जाता है। जो ऋण अधार्मिक हैं वे इस सिद्धांत के अंतर्गत नहीं आते हैं। पुत्र द्वारा चुकाया गया अधार्मिक ऋण न मानने के दो कारण हैं। सबसे पहले, जैसे हमारे पास धार्मिक अधिकार हैं जो बेटे पर अपने पिता के धार्मिक ऋण चुकाने का दायित्व थोपते हैं, जो धार्मिक प्रकृति के हैं, उसी प्रकार हमारे पास ऐसे अधिकार भी हैं जो बेटे को उसके पिता के उन ऋणों को चुकाने से मुक्त कर देते हैं जो अधार्मिक या अनैतिक हैं। दूसरे, यदि पुत्र अपने पिता के अधार्मिक ऋणों को चुकाता है, तो यह माना जाता है कि वह अपने पिता के अधार्मिक कार्यों में योगदान दे रहा है।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के अंतर्गत ऋण का प्रकार 

पवित्र दायित्व के इस सिद्धांत पर चर्चा करते समय, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऋण दो प्रकार के होते हैं: व्यवहारिक ऋण और अव्यवहारिक ऋण। पवित्र दायित्व का सिद्धांत केवल व्यवहारिक ऋण पर लागू होता है, जो कानूनी उद्देश्य के लिए लिया गया ऋण है। दूसरी ओर, अव्यवाहरिक ऋण वे ऋण हैं जो धार्मिक सिद्धांतों द्वारा उचित नहीं हैं और इसलिए पुत्रों के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।अधिकार

व्यवहारिक दायित्वों के मामले में, एक पिता को उचित दायित्वों या सिर्फ ऋणों का भुगतान करने के लिए पारिवारिक भूमि को अलग करना होगा, लेकिन उसके बेटों को ऐसा नहीं करना चाहिए। न्यायपूर्ण दायित्व या न्यायपूर्ण ऋण शब्द का तात्पर्य उन ऋणों से है जो किए गए हैं लेकिन अनैतिक, अवैध या कानून के शासन या सार्वजनिक नीति का उल्लंघन नहीं हैं। किसी मुकदमे में अपना बचाव करने, व्यवसाय चलाने या अन्य स्वीकार्य कारणों से किया गया ऋण पुत्र पर बाध्यकारी होता है। पुत्र विलासिता (लक्ज़री) के लिए, या आपराधिक आनंद के लिए मूर्खतापूर्ण ढंग से लिए गए ऋण से बंधे नहीं हैं। हालाँकि, ऐसे उदाहरण हैं जब बेटे को भुगतान करने की आवश्यकता होती है और कई बार ऐसा नहीं होता है। यदि विभाजन से पहले ऋण का अनुबंध किया गया था तो एक बेटा अपने पिता की ज़िम्मेदारियों का भुगतान करने के लिए बाध्य है। फिर भी, पुनर्भुगतान विभाजन के बाद उत्पन्न हुआ या यदि ऋण का अनुबंध विभाजन से पहले किया गया था, लेकिन पुनर्भुगतान विभाजन के बाद सामने आया। दूसरी ओर, यदि संयुक्त परिवार की संपत्ति के बंटवारे के बाद पिता द्वारा ऋण का अनुबंध किया गया था, तो बेटे को भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है, क्योंकि बेटे ने अलग होकर अपना हिस्सा जब्त कर लिया होगा, जो अब उसकी निजी संपत्ति है और इस प्रकार है अपने पिता का कर्ज़ चुकाने के लिए बाध्य नहीं।

अव्यवाहरिक ऋण के तहत, एक पुत्र अपने पिता, दादा या परदादा के ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि ये ऋण धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार या कानूनी उद्देश्य के लिए नहीं हैं। इसके अलावा, ऐसे ऋण प्रकृति में आध्यात्मिक नहीं होते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रारंभ में, बेटे यह कहकर ऋण चुकाने की अपनी ज़िम्मेदारी से आसानी से बचने में सक्षम थे कि ऋण अव्यवाहरिक था, और इसके परिणामस्वरूप लेनदारों को अनुचित नुकसान हुआ। नतीजतन, यह दिखाने के लिए सबूत का बोझ बेटों पर डाल दिया गया कि लेनदार से लिया गया ऋण प्रकृति में अव्यवाहरिक है। लुहार अमृत बनाम दोषी के मामले के अनुसार, पवित्र दायित्व का सिद्धांत बताता है कि मृत पिता को मोक्ष दिलाने के लिए पिता का ऋण पुत्र को चुकाना होगा। इसके लिए, ऋण कानूनी और नैतिक उद्देश्यों के लिए, और कुछ अवैध और अनैतिक प्रकृति के लिए होना चाहिए। यदि ऋण अव्यवहारिक अर्थात अवैध और अनैतिक हैं तो पवित्र दायित्व का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। अव्यवहारिक अभिव्यक्ति उषांस के पाठ पर आधारित है, जिसे मिताक्षरा संप्रदाय ने याज्ववल्क्य स्मृति के पाठ में उद्धृत (कोट) किया है। उषांस के अनुसार यदि ऋण व्यवहारिक नहीं है तो पुत्र द्वारा नहीं चुकाया जाता।

पवित्र दायित्व का सिद्धांत: एक आधुनिक परिप्रेक्ष्य

ऐसा माना जाता है कि पवित्र दायित्व का सिद्धांत पितृसत्तात्मक (पैट्रिअरिकल) मानसिकता और लैंगिक पूर्वाग्रह (बायस) को दर्शाता है और इसे एक ऐसा दायित्व माना जाता है जो समाज में असमानता पैदा करता है। पुराने हिंदू समाज में, महिला वंशज अपने पूर्वजों का ऋण चुकाने के लिए बाध्य नहीं थीं। इसके अलावा, महिलाओं को अक्सर ऋण चुकाने जैसे कार्यों को वहन करने में असमर्थ माना जाता था और उन्हें पुरुष की संपत्ति और संपत्ति के विस्तार के रूप में देखा जाता था।

हिंदू साहित्य के अनुसार, बेटियों या अन्य कन्या संतानों पर अपने पूर्वजों का ऋण चुकाने का कोई दायित्व नहीं था। 20वीं सदी के नारीवादी आंदोलनों ने विभिन्न व्यवसायों में भेदभावपूर्ण यथास्थिति को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नारीवादी कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने कानूनी क्षेत्र में, विशेष रूप से संपत्ति और विरासत नियमों में, कानूनी प्रणाली में लिंग-आधारित पूर्वाग्रहों के उन्मूलन की वकालत की है।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत का उन्मूलन (अबोलिशन)

2005 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद, केवल बेटों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता समाप्त कर दी गई क्योंकि बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिया गया था। इसे विस्तार से बताने के लिए सवाल किया गया कि जब बेटियों को भी अब पैतृक संपत्ति में अधिकार है, तो अपने पूर्वजों का कर्ज चुकाने के लिए बेटों को ही जिम्मेदार क्यों ठहराया जाना चाहिए, बेटियों को नहीं? इस कानून की धारा 6 सहदायिक संपत्ति में हित के हस्तांतरण का प्रावधान करती है, जिसमें बताया गया है कि 2005 के हिंदू उत्तराधिकार कानून की शुरुआत से एक बेटी, जन्म से, अपने आप में एक सहदायिक बन जाएगी। बेटी का संपत्ति पर वही अधिकार होगा जैसे कि वह परिवार का बेटा हो। इस कानून की धारा 6(4) के तहत, कोई भी न्यायालय केवल हिंदू कानून के तहत पवित्र दायित्व के सिद्धांत के आधार पर ऋण की वसूली या पुनर्भुगतान के लिए बेटे, पोते या परपोते के खिलाफ किसी भी अधिकार को मान्यता नहीं देगी। हालाँकि, यदि ऋण वर्ष 2005 से पहले लिया गया था, तो उन्हें पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत उत्तरदायी माना जाएगा।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत की न्यायिक व्याख्या 

लुहार अमृत लाल नागजी बनाम दोषी जयंतीलाल जेठालाल (1960)

तथ्य

इस मामले में, याचिकाकर्ता को सोने और चांदी में निवेश के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण नुकसान हुआ, और उसने बंधक ऋण लेकर दायित्व चुकाने का प्रयास किया। गिरवीदार ने न्यायालय से एक डिक्री प्राप्त की और गिरवी रखी गई संपत्ति की बिक्री के द्वारा इसे निष्पादित करने की मांग की। याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद, बेटों और पत्नी ने डिक्री के निष्पादन के लिए गिरवीदार पर मुकदमा दायर किया और कहा कि डिक्री बाध्यकारी नहीं थी क्योंकि ऋण प्रकृति में अनैतिक और अवैध था, और इसलिए पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत नहीं आएगा। निचली अदालत ने मामले को याचिकाकर्ता के पक्ष में पाया और जिला न्यायालय ने अपील के माध्यम से इसकी पुष्टि की। हालाँकि, दूसरी अपील पर, जब यह मामला उच्च न्यायालय में गया, जिसने उत्तरदाताओं का पक्ष लिया, तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसकी पुष्टि की।

मुद्दा

क्या याचिकाकर्ता के बेटे को इस ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है?

निर्णय

निचली अदालत ने बेटों और पत्नी के पक्ष में आदेश दिया कि ऋण प्रकृति में अनैतिक था, और अपील पर, जिला न्यायाधीश ने अपने फैसले की पुष्टि की। इसके अलावा, दूसरी अपील पर, पूर्व सौराष्ट्र उच्च न्यायालय ने माना कि यह साबित करना वादी का काम है कि लिया गया कर्ज अनैतिक (अव्यवाहरिक) था, लेकिन चूंकि उनके पास इसे साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था, इसलिए उन्हें इस डिक्री का हकदार नहीं माना गया। चूँकि उनके पास उस जिम्मेदारी को निभाने के लिए कोई सबूत नहीं था, इसलिए वे डिक्री के हकदार नहीं थे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को बरकरार रखा और अपील को खारिज कर दिया गया।

वेंकटेश धोंडदेव देशपांडे बनाम सौ. कुसुम दत्तात्रय कुलकर्णी (1978)

तथ्य

इस मामले में, वादी 1 के पति और वादी 2 के पिता, दत्तात्रय कुलकर्णी ने कुओं के निर्माण के लिए टैगाई ऋण उधार लिया था। ऋण के लिए सुरक्षा के रूप में जमीन का एक टुकड़ा दिया गया था। ऋण अग्रिम दिया गया था, लेकिन ऋण लेने वाला नियम और शर्तों के अनुसार समय चुकाने में विफल रहा। राजस्व (रेवेन्यू) वसूली की कार्यवाही शुरू हुई, और बिक्री के लिए नीलामी जारी की गई, परिणामस्वरूप, इसे प्रतिवादी द्वारा खरीदा गया और बिक्री की पुष्टि की गई। फिर ज़मीन पर कब्ज़ा वापस पाने के लिए एक मुकदमा दायर किया गया, जिसमें कहा गया कि बिक्री अवैध थी क्योंकि ज़मीन टैगाई ऋण के लिए उत्तरदायी नहीं थी क्योंकि यह कोई ऋण नहीं है जो हिंदू कानून के तहत आता है और इसलिए उत्तरदाता अपने पिता का ऋण चुकाने के लिए बाध्य नहीं थे।

मुद्दा

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य मुद्दा यह था कि क्या पवित्र दायित्व का सिद्धांत टैगाई ऋण पर लागू होता है?

निर्णय

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पवित्र दायित्व का सिद्धांत टैगाई ऋण पर लागू नहीं होता क्योंकि यह सिद्धांत हिंदू कानून का सिद्धांत था और केवल हिंदू पिता द्वारा अपने लाभ के लिए अनुबंधित ऋण पर लागू होता था, न कि किसी अवैध या अनैतिक उद्देश्य के लिए। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी माना कि टैगाई ऋण हिंदू कानून के तहत ऋण नहीं था, बल्कि प्रतिवादी और सरकार के बीच एक अनुबंध से उत्पन्न एक वैधानिक दायित्व था, जो भूमि सुधार ऋण अधिनियम 1883 के प्रावधानों द्वारा शासित होता है, इसलिए यह लागू नहीं होगा।

केशव नंदन सहाय बनाम बैंक ऑफ बिहार (1976)

तथ्य

इस मामले में, बैंक ऑफ बिहार ने देवनंदन सहाय के खिलाफ धन मनी डिक्री प्राप्त की, जिनकी वर्ष 1962 में मृत्यु हो गई थी। बैंक ऑफ बिहार ने उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के खिलाफ निष्पादन मामले दायर किए, जिनमें उनकी पत्नी, बेटे और बेटियां भी शामिल हैं। तब बेटों ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47 और 60 और बिहार साहूकार अधिनियम की धारा 14 और 15 के तहत याचिका दायर की, जिसमें पवित्र दायित्व के सिद्धांत के आधार पर उनकी पैतृक संपत्ति के खिलाफ उक्त डिक्री के निष्पादन को चुनौती दी गई। 

मुद्दा

मुद्दा यह है कि क्या देवनंदन सहाय के बेटों को पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत अपने पिता के ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए, और यह भी कि क्या पैतृक संपत्ति जो उनके हाथ में है, उसे कुर्क (अटैच्ड) किया जाना चाहिए और शासनादेशों के निष्पादन और संतुष्टि के लिए बेचा जाना चाहिए ।

निर्णय

इस मामले में, माननीय पटना उच्च न्यायालय ने माना कि देवनंदन सहाय के पुत्रों को पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत ऋण चुकाने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए क्योंकि लिया गया ऋण किसी अनैतिक या अवैध उद्देश्य के लिए नहीं था, और हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के अधिनियमन से पहले लिया गया था। इसके अतिरिक्त, माननीय न्यायालय ने यह भी माना कि उनके पास मौजूद पैतृक संपत्ति डिक्री के निष्पादन और संतुष्टि के लिए कुर्क करने और बेची जाने योग्य थी, क्योंकि बिहार साहूकार अधिनियम द्वारा पवित्र दायित्व के सिद्धांत को समाप्त नहीं किया गया था। हालाँकि, माननीय न्यायालय ने यह भी माना कि पवित्र दायित्व का सिद्धांत देवनंदन सहाय की महिला उत्तराधिकारियों पर लागू नहीं होता है, और उन्हें अपने पिता के ऋण का भुगतान करने या पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

निष्कर्ष

पवित्र दायित्व का सिद्धांत एक पारंपरिक अवधारणा है जिसका हिंदू कानून के तहत वर्षों से अभ्यास किया जाता रहा है। यह सिद्धांत अनिवार्य रूप से एक बेटे, पोते, या परपोते के अपने मृत और कर्ज में डूबे पिता, दादा, या परदादा के ऋण को चुकाने के नैतिक और धार्मिक कर्तव्य पर आधारित है, जब तक कि जो ऋण लिया गया है वह किसी अनैतिक या अवैध उद्देश्य के लिए न हो। इसके अलावा, यह सिद्धांत उस समय समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक धारणाओं को दर्शाता है, और जिसने समाज में लैंगिक पूर्वाग्रह और असमानता के मुद्दे में बहुत बड़ा योगदान दिया है। सिद्धांत का यह भी तात्पर्य है कि अपने पिता के ऋणों को चुकाना बेटे का दायित्व है जो पैतृक संपत्ति से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह संपत्ति में हिस्सेदारी के अधिकार के साथ पैदा हुआ है।

हालाँकि, निरंतर विकास के कारण, आधुनिक युग में पवित्र दायित्व के सिद्धांत में महत्वपूर्ण चुनौतियाँ और परिवर्तन आए हैं। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने यह प्रावधान करके पवित्र दायित्व के सिद्धांत को समाप्त कर दिया है कि किसी भी बेटे को केवल मृतक का उत्तराधिकारी होने के कारण अपने पिता के किसी भी ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा। इसके अतिरिक्त, इस संशोधन ने अनिवार्य रूप से बेटियों को भी कर्ज चुकाने और पैतृक संपत्ति में बराबर हिस्सा देने के समान अधिकार देकर पिता के ऋण को चुकाने के लिए अकेले बेटे के दायित्व को हटा दिया है। इससे समाज में लैंगिक भेदभाव को दूर करने में भी मदद मिली है। पवित्र दायित्व के सिद्धांत का उन्मूलन भारतीय समाज में लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय प्राप्त करने की दिशा में एक प्रगतिशील अवधारणा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

पवित्र दायित्व के सिद्धांत का मूल क्या है?

पवित्र दायित्व का सिद्धांत धर्मपरायणता और धर्म की अवधारणाओं पर आधारित है। हिंदू धर्म के अनुसार, जब किसी हिंदू की मृत्यु हो जाती है और उसकी आत्मा कर्जदार हो जाती है, तो मृतक को बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। पवित्र दायित्व का सिद्धांत हिंदू कानून के तहत रीति-रिवाजों और प्राचीन ग्रंथों से उत्पन्न हुआ है, जो अपने पिता की आत्मा को ऋण से मुक्त करने और आत्मा को स्वर्ग के लिए प्रस्थान करने के लिए बेटे, पोते या परपोते की जिम्मेदारी को मान्यता देता है।

अव्यवाहरिक ऋण क्या है?

अन्यवाहरिका ऋण अनैतिक या अवैध उद्देश्यों के लिए किया गया ऋण है जिसे पवित्र धर्म के सिद्धांत के तहत वापस नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि यह सिद्धांत केवल उन ऋणों से संबंधित है जो प्रकृति में नैतिक और कानूनी हैं।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत संयुक्त संपत्ति के विभाजन का दायित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत दायित्व संयुक्त परिवार की संपत्ति के विभाजन से प्रभावित नहीं होता है।

हिंदू कानून के तहत पवित्र दायित्व के सिद्धांत का दायरा क्या है?

पवित्र दायित्व का सिद्धांत एक परिवार में बेटे, पोते और परपोते पर लागू होता है, क्योंकि वे हिंदू अविभाजित परिवार में जन्म के आधार पर सहदायिक होते हैं। इस सिद्धांत के तहत, बेटे का दायित्व केवल ऋण की मूल राशि तक ही सीमित है, न कि उस पर होने वाले ऋण तक। इसके अतिरिक्त, पवित्र दायित्व के इस सिद्धांत के तहत, बेटे का दायित्व भी केवल संयुक्त परिवार की संपत्ति में उसके हिस्से तक ही सीमित है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पवित्र दायित्व का सिद्धांत बेटी, बेटी के बेटे या विधवा पर लागू नहीं होता है।

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के अंतर्गत किस प्रकार के ऋण आते हैं?

पवित्र दायित्व के सिद्धांत के अंतर्गत दो प्रकार के ऋण आते हैं, अर्थात् व्यवहारिक, और अव्यवहारिक। व्यवहारिक ऋण वे ऋण हैं जो कानूनी और नैतिक उद्देश्यों के लिए लिए जाते हैं। दूसरी ओर, अव्यवाहरिक ऋण पवित्र दायित्व के सिद्धांत के अंतर्गत शामिल नहीं हैं और यह उन ऋणों को शामिल करता है जो वेश्यावृत्ति (प्रोस्टीटूशन), जुआ और कई अन्य जैसे अनैतिक या अवैध उद्देश्यों के लिए लिए जाते हैं।

हिंदू कानून के तहत पवित्र दायित्व के सिद्धांत के क्या अपवाद हैं?

पवित्र दायित्व का सिद्धांत निम्नलिखित स्थितियों और परिस्थितियों पर लागू नहीं होता है:

  • यदि बेटे के जन्म से पहले कर्ज लिया गया है, तो बेटा उसे चुकाने के लिए उत्तरदायी नहीं है, जब तक कि कर्ज परिवार के लाभ के लिए न उठाया जाए।
  • यदि पुत्र का पिता जीवित है और दिवालिया (इनसॉल्वेंट) नहीं है, तो पुत्र पवित्र दायित्व के सिद्धांत के तहत ऋण चुकाने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
  • यदि परिसीमा (लिमिटेशन) के कानून ऋण लेने से रोकते हैं, तो पुत्र उसका भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है, जब तक कि पुत्र ने ऋण स्वीकार नहीं किया हो या उस पर ब्याज का भुगतान नहीं किया हो।
  • यदि पारिवारिक संपत्ति के विभाजन के बाद कर्ज लिया गया है, तो बेटे को उसे चुकाने के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि वह उक्त संयुक्त परिवार की संपत्ति के विभाजन में एक पक्ष न हो।

हिंदू कानून के तहत पवित्र दायित्व के सिद्धांत की कानूनी स्थिति या वैधता क्या है?

पवित्र दायित्व का सिद्धांत, हालांकि विभिन्न निर्णयों में न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त और स्वीकृत है, फिर भी यह एक संहिताबद्ध (कोडिफाइड) कानून नहीं है। हालाँकि, पवित्र दायित्व के इस सिद्धांत को 2005 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा समाप्त कर दिया गया है और अवैध माना गया है, जो बताता है कि कोई भी न्यायालय इस बात का संज्ञान (काग्निजेन्स) नहीं लेगी या यह नहीं मानेगी कि बेटे, पोते या परपोते को उत्तरदायी ठहराया जाएगा। केवल हिंदू कानून के तहत पवित्र दायित्व के आधार पर संयुक्त परिवार की संपत्ति के ऋण का भुगतान करना। पवित्र दायित्व का सिद्धांत प्रकृति में संभावित है, और वर्ष 2005 से पहले किए गए ऋणों को प्रभावित नहीं करता है।

संदर्भ

The Doctrine of Pious Obligation and its Relevance under Hindu Law in the Present Time-Available tHe Onlinehttps://heinonline.org/HOL/Page?handle=hein.journals/lgllckjnl2&div=23&g_sent=1&casa_token=&collection=journals 

भारत में लिंग निष्पक्ष कानून

इस लेख को Debapriya Biswas द्वारा लिखा गया है। यह लेख वर्तमान कानूनी परिदृश्य पर लिंग निष्पक्षता के प्रभाव और क्या भारत में अब तक ऐसे कोई लिंग-निष्पक्ष कानूनी प्रावधान हैं पर विचार करने से पहले इसके अर्थ और प्रासंगिकता पर चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Shubham Choube द्वारा किया गया है।

परिचय

हालांकि कानून के शासन का सिद्धांत यह स्थापित करता है कि कानून के समक्ष हर कोई समान होगा, लेकिन व्यावहारिकता में ऐसा नहीं है। चूंकि समाज स्वयं काफी पक्षपाती है, इसलिए कई समुदाय सदियों से हाशिए पर हैं। उन्हें आगे के नुकसान से बचाने के लिए उनके पक्ष में कानूनी प्रावधानों को लागू किया गया और साथ ही उन्हें हर क्षेत्र को समानता की दिशा में बढ़ाके अन्य समुदायों के साथ बराबरी का दर्जा दिया गया। इसे महिलाओं के मामले में देखा जा सकता है, जिनके लिए दुनिया भर के लगभग सभी देशों में लिंग-विशिष्ट कानून बनाए गए हैं।

हालाँकि, बदलते समय के साथ, लिंग-विशिष्ट कानून अधिक से अधिक प्रतिबंधात्मक होते जा रहे हैं। इस प्रकार, इसका मुकाबला करने के लिए, आगे समानता को बढ़ावा देने के लिए लिंग निष्पक्षता की आवश्यकता है।

लिंग-पक्षपाती कानूनों की उत्पत्ति

कानून की उत्पत्ति प्राचीन सभ्यताओं में सामाजिक प्रथागत प्रथाओं में निहित है। ये प्रथाएँ जल्द ही देश के कानूनों में विकसित होने से पहले समुदाय के भीतर लोगों को विनियमित करने के लिए सख्त नियमों में बदल गईं, जो उनका पालन न करने वालों के लिए दंड निर्धारित करती थीं। विवाह से संबंधित कई व्यक्तिगत कानून महज रीति-रिवाजों और परंपराओं के रूप में शुरू हुए, जिनका पालन कानूनी प्रावधानों के रूप में स्वीकार किए जाने और पालन किए जाने से पहले कुछ समुदायों द्वारा वर्षों तक किया जाता रहा। इस बीच, समाज और उसके लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार सती प्रथा और जाति व्यवस्था के रीति-रिवाजों के खिलाफ कानूनी प्रावधान तैयार किए गए।

संक्षेप में, कोई कह सकता है कि कानूनों की काफी सामाजिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है, जो सच है। यह भी मुख्य कारणों में से एक है कि क्यों कई कानूनी प्रावधान लिंग-पक्षपाती हैं- खासकर भारत में।

भारत के रीति-रिवाजों और परंपराओं के भीतर अभी भी पितृसत्तात्मक (पैट्रियार्कल) मानसिकता व्याप्त होने के कारण, कई अपराध किसी भी अन्य लिंग की तुलना में महिलाओं के प्रति अधिक लक्षित होते हैं। इस प्रकार, ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए, भारत में कई कानूनी प्रावधान इस तरह से तैयार किए गए हैं जो हाशिए पर मौजूद लिंग का उत्थान कर सकें।

ये कानूनी प्रावधान और नीतियां, हालांकि भेदभावपूर्ण प्रकृति की हैं, लेकिन यह उन लिंगों की रक्षा के लिए रखी गई हैं जो ऐसे अपराधों और सामाजिक अन्याय के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं; इस प्रकार, उन्हें ‘सुरक्षात्मक भेदभाव’ कहा जाता है। ऐसी नीतियों को आमतौर पर आरक्षण के साथ-साथ अन्य अधिक ‘पक्षपाती’ कानूनों के रूप में देखा जा सकता है, जैसे 2005 का घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, मातृत्व लाभ अधिनियम ,1961 और 1961 का दहेज निषेध अधिनियम, आदि।

हालाँकि, बदलते समय के साथ समाज की ज़रूरतें भी बदल रही हैं; जो पहले सुरक्षात्मक था वह अब धीरे-धीरे प्रतिबंधात्मक होता जा रहा है क्योंकि ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो ऐसे लिंग-विशिष्ट कानूनों के पीछे की अवधारणा को चुनौती देते हैं।

इस प्रकार, ऐसे प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए, कानूनों को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि वे प्रकृति में लिंग-निष्पक्ष हों और पीड़ित या अपराधी के खिलाफ पूर्वाग्रह (बायस) पैदा किए बिना किसी भी व्यक्तिगत मामले में अनुकूलित किया जा सके क्योंकि वे एक विशिष्ट लिंग के हैं।

लिंग निष्पक्षता का अर्थ

लिंग निष्पक्षता की अवधारणा को बेहतर ढंग से समझने के लिए, आइए सबसे पहले लिंग की अवधारणा और वास्तव में इसका क्या अर्थ है पर गौर करें।

हालांकि कोई सोच सकता है कि लिंग का अर्थ उनके जैविक (बायोलॉजिकल) लिंग के बराबर है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। लिंग, या लिंग पहचान, जैसा कि इसे कई लोग कहते हैं, एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग यह पहचानने के लिए किया जाता है कि कोई व्यक्ति खुद को कैसे व्यक्त करता है, जो उनके जैविक लिंग से भिन्न हो सकता है।

जैविक लिंग को आमतौर पर जन्म के समय निर्दिष्ट लिंग के रूप में जाना जाता है, जो पुरुष, महिला या मध्यलिंगी हो सकता है। हालाँकि, लिंग पहचान, या लिंग, वह तरीका है जिससे कोई व्यक्ति लिंग के बारे में अपनी व्यक्तिगत भावना व्यक्त करता है, जो उनके जैविक लिंग पर निर्भर नहीं है।

वास्तव में, लिंग को अक्सर एक जैविक तथ्य के बजाय एक सामाजिक निर्माण या एक लेबल के रूप में संदर्भित किया जाता है; जैसे नीला लड़कों का रंग है जबकि केवल लड़कियाँ गुलाबी रंग पहनेंगी। या केवल लड़कियां ही लंबे बाल रख सकती हैं, जबकि लड़के केवल छोटे बालों में ही अच्छे लगते हैं। सूची लंबी होती जा रही है, और हर किसी का सामना कम से कम एक ऐसी रूढ़िवादिता (स्टीरीओटाइप) या सामाजिक संरचना से हुआ होगा जिसे समाज आमतौर पर कुछ लिंगों पर लागू करता है।

ऐसी सामाजिक संरचनाओं के आधार पर, कुछ लोग गुलाबी भाग से जुड़ते हैं, जबकि अन्य नीले भाग से जुड़ते हैं। फिर कुछ ऐसे भी हैं जो अपने स्वयं के बिल्कुल अलग रंग से जुड़ते हैं, जैसे नारंगी, पीला, या लाल। चूँकि हर किसी की लिंग के प्रति व्यक्तिगत भावना और उसकी अभिव्यक्ति एक दूसरे से भिन्न हो सकती है, लिंग पहचान की अवधारणा एक ऐसे विस्तार पर आधारित है जो केवल पुरुषों और महिलाओं तक ही सीमित नहीं है।

नॉन-बाइनरी शब्द का उपयोग केवल पुरुषों या महिलाओं की तुलना में भिन्न लिंग पहचान वाले लोगों को दर्शाने के लिए किया जाता है, ट्रांसजेंडर समुदाय इस शब्द का एक हिस्सा है, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो एक ऐसे लिंग से पहचान करते हैं जो अक्सर उनके जैविक लिंग के विपरीत होता है।

दूसरी ओर, लिंग निष्पक्षता शब्द का तात्पर्य उन शब्दों के उपयोग की प्रथा से है जो किसी की लिंग पहचान या लिंग के आधार पर अंतर नहीं करते हैं। सरल शब्दों में, यह पहले से ही बने पूर्वाग्रह या पूर्वधारणा वाले किसी भी व्यक्ति की लिंग पहचान या लिंग के आधार पर भाषा, गतिविधियों, कानूनों, नीतियों आदि के भेद से बचने का शिष्टाचार है।

संक्षेप में, यह शब्द और इससे जुड़ा आंदोलन एक ऐसी प्रणाली स्थापित करने का प्रयास करता है जो किसी व्यक्ति को केवल उसके लिंग के आधार पर प्रतिबंधित नहीं करता है। कई अकादमिक पत्रों और लेखों में ‘पुरुष’ और ‘महिला’ के स्थान पर ‘लोग’ और ‘अन्य व्यक्ति’ जैसे लिंग-निष्पक्ष शब्दों का उपयोग इसका सबसे आम उदाहरण है।

ऐसी लिंग-निष्पक्ष भाषा विभिन्न लिंग पहचान और यौन रुझान वाले लोगों का प्रतिनिधित्व करने में मदद कर सकती है, साथ ही कानूनी प्रावधानों में लिंग समावेशिता ला सकती है जो वर्तमान समय में काफी आवश्यक है।

ऐसी लिंग-निष्पक्ष भाषा का उपयोग बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी लिंगों के बीच समानता को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है या ऐसा करने के लिए कानूनी प्रावधानों को अलग से पेश किया जा सकता है। भारत जैसे देशों में, जहां समानता अभी भी प्रगति पर है, इसके कानूनी प्रावधानों में लिंग-निष्पक्ष भाषा काफी फायदेमंद हो सकती है, जैसा कि लेख के अगले कुछ खंडों में चर्चा की जाएगी।

भारत में लैंगिक निष्पक्षता की आवश्यकता

जैसा कि पहले बताया गया है, लिंग निष्पक्षता एक अवधारणा है जो किसी भी देश की कानूनी प्रणाली के लिए फायदेमंद हो सकती है क्योंकि इसका उद्देश्य पूर्वाग्रह या पूर्व धारणाओं के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सभी लिंगों को समान सुरक्षा प्रदान करना है। केवल लिंग-निष्पक्ष कानून लागू करने से कानून के अनुप्रयोग और व्याख्या में बहुत बदलाव आ सकता है। वर्तमान में, जबकि अधिकांश भारतीय कानूनी प्रावधान सभी लिंगों पर लागू होते हैं, ऐसे कई प्रावधान हैं जो विशेष रूप से पीड़ित के साथ-साथ अपराधी के लिंग को मानने के लिए बनाए गए हैं।

ये लिंग-विशिष्ट कानून, चाहे वह यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज हत्या आदि पर कानून हों, एक लिंग, यानी महिलाओं के लिए सुरक्षात्मक हैं। उन्हें समय की आवश्यकता से निपटने के लिए तैयार किया गया था, और जबकि आवश्यकता अभी भी बनी हुई है, उनके लिंग-विशिष्ट निर्धारण के कारण जो मुद्दा उठता है वह यह है कि कानून की सुरक्षा का दायरा ही कम हो जाता है।

सरल शब्दों में, पीड़ित और अपराध करने वाले के लिंग को पहले से मानकर, कानून यह तय करके अपने दायरे को सीमित कर रहा है कि अपराध कौन कर सकता है। इस तरह की सीमाओं के परिणामस्वरूप समान प्रकृति के कई मामलों को अनदेखा किया जा सकता है और केवल इसलिए रिपोर्ट नहीं किया जा सकता है क्योंकि पीड़ित, अपराधी या दोनों का लिंग कानूनी प्रावधानों से भिन्न होता है।

इसके अलावा, ऐसे लिंग-विशिष्ट कानून यह गलत धारणा भी पैदा करते हैं कि पीड़ित हमेशा एक महिला होती है, जिसके कारण उनका व्यापक दुरुपयोग होता है। पुरुष और उसके परिवार के खिलाफ घरेलू हिंसा या दहेज के कई झूठे मामले दर्ज किए जाने की सूचना मिली है, जिसके परिणामस्वरूप दुर्भावनापूर्ण मुकदमे चले जो वर्षों नहीं तो कई महीनों तक चले। के. श्रीनिवास बनाम के. सुनीता (2014) और ममता बनाम प्रदीप कुमार (2023) को ऐसे मामलों के उदाहरण के रूप में रखा जा सकता है, जहां दोनों मामलों में,यह पाया गया कि पत्नी बिना किसी वैध सबूत के घरेलू दुर्व्यवहार की झूठी शिकायतों के साथ पति और उसके परिवार को परेशान कर रही थी। इस तरह के उत्पीड़न के आधार पर, पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए दायर किया था, जिसे दोनों मामलों में पति के पक्ष में अनुमति दी गई और फैसला किया गया।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य

चूँकि पितृसत्ता अभी भी भारत की जड़ों में गहराई तक व्याप्त है, ऐसे में पुरुषों की महिलाओं की तुलना में अधिक मजबूत होने जैसी पूर्वधारणाएँ आम हैं। इस तरह की पूर्वकल्पित धारणा इस विश्वास को जन्म देती है कि पुरुष यौन उत्पीड़न या उत्पीड़न का शिकार नहीं हो सकते हैं, जिससे ऐसे मामलों की आधिकारिक रिपोर्टिंग में हतोत्साहित होना पड़ता है जहां ऐसा होता है। यहां तक कि जब पुरुष पीड़ितों के मामले सामने आते हैं, तब भी उन पर कम विश्वास किया जाता है या उनकी जांच भी नहीं की जाती है, खासकर वयस्क (ऐडल्ट) पुरुष पीड़ितों के मामलों में।

यदि अपराधी कोई महिला हो तो स्थिति और भी जटिल हो जाती है। ऐसे परिदृश्य में, न केवल पुरुष पीड़ित को उनके लिंग के आधार पर बदनाम किया जाता है, बल्कि ‘स्त्रैण’ (फेमिनिज्म) तरीके से व्यवहार करने या ध्यान आकर्षित करने के लिए झूठ बोलने के लिए भी उपहास किया जाता है, इस धारणा के साथ कि पीड़ित को महिला अपराधी द्वारा हमला या परेशान किए जाने का आनंद मिला। वास्तव में, पुरुषों द्वारा महिलाओं द्वारा बलात्कार या उत्पीड़न किए जाने की अवधारणा के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञता (अनअवेयर्नेस) इतनी व्यापक है कि पीड़ित को स्वयं स्थिति का एहसास नहीं हो सकता है। और यदि वे ऐसा करते हैं, तो इस तरह की उपेक्षा से उन्हें खुद पर संदेह भी हो सकता है।

इसके अलावा, कुछ वर्षों तक अपराध की श्रेणी से बाहर रहने के बावजूद, समलैंगिकता (होमोसेक्शवैलटी) को अभी भी जनता के बीच वर्जित माना जाता है। यदि किसी पुरुष का किसी अन्य पुरुष द्वारा यौन उत्पीड़न या हमला किया जाता है, तो इसे उसके समलैंगिक होने के रूप में गलत तरीके से समझा जा सकता है और इसके परिणामस्वरूप पीड़ित का बहिष्कार हो सकता है, साथ ही अनुचित उपहास और शर्मिंदगी भी हो सकती है। इसका परिणाम यह होता है कि पुरुष पीड़ित अपनी शिकायतें किसी के सामने बताने में झिझकते हैं, न्याय पाने का प्रयास करना तो दूर की बात है।

दूसरी ओर, भले ही हम पीड़ित और अपराधी दोनों के महिला होने का मामला लें, फिर भी ऐसे अपराधों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा या बलात्कार की ‘पारंपरिक’ परिभाषा और धारणा से भिन्न होने के कारण ऐसे मामलों का पता नहीं चल पाएगा, जो मानता है कि बलात्कार केवल बलपूर्वक लिंग-योनि संभोग के माध्यम से ही किया जा सकता है। इस पक्षपातपूर्ण धारणा के कारण, ऐसी स्थितियों के पीड़ितों पर विश्वास नहीं किया जाएगा और उनका उपहास भी किया जा सकता है या उन्हें अपने मन पर संदेह करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

इस प्रकार, लिंग निष्पक्षता की कमी के कारण न केवल पुरुष पीड़ित, बल्कि महिला पीड़ित भी इस तरह की उपेक्षा और जांच से पीड़ित होती हैं। कानूनी प्रावधानों को अधिक लिंग-निष्पक्ष तरीके से तैयार करना ट्रांसजेंडर लोगों सहित सभी लिंगों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

कानूनी परिप्रेक्ष्य

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है, फिर भी ऐसे कई मुद्दे हैं जो केवल एक लिंग की रक्षा के लिए प्रावधान बनाकर हल नहीं किए जा सकते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सुरक्षात्मक भेदभाव की अवधारणा ने समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों के उत्थान में बहुत मदद की है, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने कानूनों को अधिक लिंग-निष्पक्ष तरीके से बनाकर लैंगिक समानता की दिशा में अगला कदम उठाएं।

हालांकि कुछ रीति-रिवाज और कानून अभी भी लिंग-विशिष्ट बने रह सकते हैं, जैसे सती प्रथा या दहेज प्रथा के खिलाफ प्रावधान, पारिवारिक कानून, नागरिक कानून और आपराधिक कानून जैसे अन्य कानूनों को अधिक लिंग-निष्पक्ष रुख से बहुत लाभ हो सकता है। यह न केवल भारतीय कानूनी प्रावधानों को सभी प्रकार की लिंग पहचान के लिए लिंग समावेशी बनाएगा, बल्कि लिंग सर्वनाम के उपयोग के कारण होने वाले पूर्वाग्रह से भी बचाएगा।

आपराधिक और पारिवारिक कानूनों में ‘दोष’ लिंग की प्रणाली एक सामान्यीकरण बनाकर आवेदन के दायरे को सीमित करती है। बदले में, इस सामान्यीकरण के परिणामस्वरूप उन लोगों को नुकसान होता है जो कानून और उदाहरणों के तहत उल्लिखित ‘मानदंड’ से भिन्न मामलों के पीड़ित हैं। इस प्रकार, इस तरह के सामान्यीकरण का मुकाबला करने के लिए, उन शब्दों के माध्यम से संबोधित करने की आवश्यकता है जो लिंग भेद नहीं करते हैं; जैसे सर्वनाम ‘वे’ का उपयोग, साथ ही लिंग-विशिष्ट शब्दों के बजाय ‘लोग’ और ‘अन्य व्यक्ति’ जैसे शब्दों का उपयोग।

ऐसी शब्दावली का उपयोग, विशेष रूप से आपराधिक कानूनी प्रावधानों में, केवल शामिल पक्षों के लिंग के आधार पर बहुत सारे अपराधों की उपेक्षा को रोका जा सकता है। विशेष रूप से, यौन उत्पीड़न और हमले के मामलों में, जहां अपराधी और पीड़ित को दोष रूप से क्रमशः पुरुष और महिला माना जाता है। इस प्रकार, हम उन ट्रांसजेंडरों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहे हैं जो अन्य सर्वनामों के साथ-साथ पुरुष पीड़ितों और महिला अपराधियों की पहचान करते हैं।

वर्तमान में, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 (इसके बाद ‘आईपीसी’ के रूप में संदर्भित) बलात्कार या यौन उत्पीड़न की परिभाषा बताती है,जिसमें ‘बलात्कार’ के रूप में पहचानी जाने वाली चीजों को शामिल करने के लिए कई संशोधन किए गए हैं। हालाँकि, बदलते समय और उसकी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए परिभाषा तैयार की गई है,’एक पुरुष को बलात्कार करने के लिए कहा जाता है…’ जैसी कठोर लिंग-विशिष्ट भाषा के कारण यह अभी भी महिला पीड़ितों के अलावा किसी को भी और केवल पुरुष अपराधियों से बचाने में विफल रहा है।

नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) मामले के बाद समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिए जाने के बावजूद, आईपीसी की धारा 375 की शाब्दिक व्याख्या के अनुसार, समान लिंग अपराधी द्वारा यौन उत्पीड़न या बलात्कार की अवधारणा अभी भी एक विदेशी अवधारणा प्रतीत होती है। विडंबना यह है कि जहां आईपीसी बलात्कार को लिंग-विशिष्ट बनाता है, वहीं पॉक्सो अधिनियम बच्चों को उनके लिंग की परवाह किए बिना यौन शोषण से बचाता है। संक्षेप में, भारतीय कानूनी व्यवस्था के तहत एक नाबालिग पुरुष बलात्कार पीड़ित को न्याय मिल सकता है, लेकिन एक वयस्क को नहीं।

इसके अलावा, भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने का कोई प्रावधान नहीं है, केवल इस तथ्य के कारण कि बलात्कार का अपराधी पीड़िता का पति है। हालाँकि इसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक के लिए एक आधार के रूप में रखा जा सकता है, लेकिन ऐसे जघन्य अपराध के लिए तलाक से परे कोई वास्तविक उपाय नहीं है। वास्तव में, वैवाहिक बलात्कार के एकमात्र उपाय के रूप में तलाक के बावजूद, इसे केवल महिलाएं ही तलाक के लिए आधार के रूप में चुन सकती हैं क्योंकि यह पूर्वाग्रह अभी भी कायम है कि वैवाहिक बलात्कार का शिकार केवल पत्नी हो सकती है, पति नहीं।

इस बीच, पारिवारिक कानून में, विवाह, तलाक और गोद लेने पर कई व्यक्तिगत कानून अभी भी पुरानी मान्यताओं पर आधारित हैं जो अक्सर प्रकृति में भेदभावपूर्ण होते हैं। इसमें यह विश्वास शामिल है कि विवाह को केवल ‘जैविक’ पुरुष और ‘जैविक’ महिला के बीच ही वैध किया जा सकता है, जो न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय बल्कि समलिंगी समलैंगिक जोड़ों की भी पूरी तरह से उपेक्षा करता है।

इसके अलावा, उत्तराधिकार और विरासत से संबंधित कई कानूनी प्रावधान, जैसे कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, पुरुष उत्तराधिकारियों के प्रति स्पष्ट पूर्वाग्रह दिखाते हैं। यहां तक कि पत्नी की विरासत के मामले में भी, पहले उल्लिखित अधिनियम की धारा 16 के अनुसार, पति के कानूनी उत्तराधिकारियों को मृत पत्नी के मायके परिवार से पहले तरजीह दी जाती है। यही मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ का भी है जो मुस्लिम निजीकानून (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 द्वारा शासित होता है, क्योंकि यह भी रीति-रिवाजों और परंपराओं के नाम पर महिलाओं के खिलाफ भारी भेदभाव करता है।

ऐसे पक्षपातपूर्ण कानूनों और विषम सामाजिक मानदंडों के साथ, लिंग-पक्षपाती व्यवहार से पीड़ित लोगों की न केवल रक्षा करने के लिए बल्कि आम जनता को इसके बारे में शिक्षित करने के लिए लिंग-निष्पक्ष कानूनों की शुरूआत की आवश्यकता है।

लैंगिक निष्पक्षता पर न्यायिक दृष्टिकोण

भारतीय न्यायपालिका ने पिछले कुछ वर्षों से लैंगिक निष्पक्षता के सबसे सक्रिय समर्थक और आलोचक के रूप में काम किया है। संवैधानिक दर्शन की अपनी प्रगतिशील व्याख्याओं के साथ, कई निर्णय जैसे राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (2014), जहां ट्रांसजेंडर के अधिकारों को तीसरे और अलग लिंग के रूप में स्वीकार किया गया, साथ ही नवतेज सिंह जौहर मामला, जहां 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है।

हालाँकि यह पहला उदाहरण नहीं था जहाँ न्यायपालिका ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए कदम बढ़ाया, यह उन अधिक महत्वपूर्ण मामलों में से एक है जिसने भारतीय कानूनी प्रणाली में एक पूरी तरह से नया क्षेत्र खोल दिया, जहाँ पहले लिंग की अवधारणा या उनके बीच प्रेम की अवधारणा एक पुरुष और महिला के एक साथ होने से आगे नहीं बढ़ती थी। इस विकास के बाद लिंग निष्पक्षता की अवधारणा को और भी अधिक बढ़ावा दिया गया, यह देखते हुए कि कितने व्यक्तिगत और पारिवारिक कानून भागीदारों के लिंग के आधार पर प्रतिष्ठित हैं, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है।

विवाह के लिए कानूनी प्रावधानों में लिंग निष्पक्षता

इस लिंग-आधारित भेद से निपटने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने सुप्रियो बनाम भारत संघ (2023) मामले में समलैंगिक विवाह को वैध बनाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के लिए एक संवैधानिक पीठ भी बनाई। इसके खिलाफ उठाए गए मुख्य तर्क, सामाजिक अस्थिरता का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत अभी ऐसे कानूनों के लिए तैयार नहीं है और यह उस संस्कृति के खिलाफ हो सकता है जिसके लिए भारत खड़ा है।

दूसरी ओर, समलैंगिक विवाह के पक्ष में तर्क दिया गया कि इस तरह के विवाह की अनुमति न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के साथ-साथ शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) जैसे कई अन्य उदाहरणों के खिलाफ है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक वयस्क को यह चुनने का बुनियादी अधिकार है कि वह जिससे शादी करना चाहता है।

इस बात पर भी कई विचार हुए कि क्या समलैंगिक विवाहों के लिए एक बिल्कुल नया और लिंग-निष्पक्ष प्रावधान पेश किया जाना चाहिए। कई लोगों ने यह भी तर्क दिया कि यदि अधिक लिंग समावेशी होने के लिए संशोधन किया जाए तो शायद समान-लिंग विवाह को 1954 के विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों, जैसे कि धारा 4, के तहत वैध बनाया जा सकता है।

हालाँकि, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 17 अक्टूबर 2023 को अपने हालिया फैसले में कहा था, समलैंगिक विवाह को वैध बनाना न्यायपालिका के हाथ में नहीं है क्योंकि वे विधायिका के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। न्यायपालिका अपनी मंशा से अलग कानून नहीं बना सकती या उसकी शब्दावली अलग नहीं पढ़ सकती। यह केवल कानून की व्याख्या कर सकता है, कानून नहीं बना सकता। जबकि न्यायालय ने माना कि विवाह करने या संघ में प्रवेश करने का अधिकार यौन अभिविन्यास (ऑरीएन्टेशन) के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है, न्यायपालिका अपने शब्दों से परे कानून की व्याख्या नहीं कर सकती है। इस प्रकार, समान-लिंग विवाहों को शामिल करने के लिए विशेष विवाह अधिनियम की व्यापक व्याख्या न्यायपालिका की शक्ति के दायरे से बाहर है।

न्यायालय ने केंद्र से समान-लिंग वाले जोड़ों की चिंताओं को दूर करने के लिए एक समिति बनाने का आग्रह किया और कहा कि विधानमंडल को विवाहों में लैंगिक समानता को संबोधित करने के लिए समान-लिंग विवाह के संबंध में एक कानून बनाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि अविवाहित जोड़े, जिनमें समलैंगिक जोड़े भी शामिल हैं, बच्चों को गोद नहीं ले सकते। यह निर्णय इस दृष्टिकोण पर दिया गया था कि बिना किसी वैध विवाह के संयुक्त गोद लेना निर्धारित कानूनों के विरुद्ध है।

इस प्रकार, संक्षेप में, न्यायपालिका द्वारा विचारधारा का समर्थन करने लेकिन शब्दों के पीछे कोई कार्रवाई न करने के बावजूद भारत अभी भी समलैंगिक विवाह को वैध बनाने से काफी दूर है।

बलात्कार कानूनों में लिंग निष्पक्षता

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, यह पहला मामला नहीं था जहां न्यायपालिका ने लैंगिक समानता और निष्पक्षता के बारे में बात की थी। सबसे पहले मामलों में से एक जहां लिंग निष्पक्षता और अन्य लिंगों की समावेशिता को सामने लाया गया वह श्रीमती का मामला था। सुदेश झाकू बनाम के.सी.जे. (1996), जहां दिल्ली उच्च न्यायालय ने आईपीसी के तहत पुरुष बलात्कार पीड़ितों की सुरक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। न्यायालय ने दोहराया कि पुरुष पीड़ितों को एक ही अपराध के लिए महिला पीड़ितों के समान अधिकार और सुरक्षा प्राप्त है, बिना उनके लिंग के आधार पर कोई भेदभाव किए।

हालाँकि, अनुज गर्ग बनाम भारतीय होटल संघ (2008) जैसे मामले भी थे, जहां न्यायपालिका ने लिंग निष्पक्षता की विचारधारा के खिलाफ कदम उठाया था। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि कोई महिला यौन उत्पीड़न नहीं कर सकती या उस पर आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उस समय इसकी कानूनी परिभाषा केवल पुरुषों को अपराधी के रूप में दोषी ठहराए जाने तक ही सीमित थी। 2013 तक ऐसा नहीं हुआ था कि यौन उत्पीड़न की परिभाषा को अधिक लिंग-निष्पक्ष बना दिया गया था, जिससे इसका दायरा पीड़ित महिला होने और अपराधी पुरुष होने से आगे बढ़ गया था।

इसी तरह, प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2006) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आईपीसी की धारा 375 के दायरे में, केवल पुरुष ही बलात्कार कर सकता है, महिला नहीं। इस प्रकार, जैसा कि वर्तमान मामले में था, इस धारा के तहत किसी महिला को सामूहिक बलात्कार के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भले ही उसका योगदान ऐसे जघन्य अपराध में कितना भी हो।

निर्णयों के बीच स्पष्ट रूप से विरोधाभास (कॉन्ट्रास्ट) देखा जा सकता है, जहां एक पुरुष पीड़ितों की सुरक्षा के लिए लिंग निष्पक्षता की बात करता है जबकि दूसरा पारंपरिक विचारधारा को पुष्ट करता है कि केवल एक पुरुष ही बलात्कार या उत्पीड़न कर सकता है, महिला नहीं। बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे कुछ लिंग-विशिष्ट कानूनों की परिभाषा में संशोधन की आवश्यकता है, ताकि उन्हें पीड़ितों की सुरक्षा के लिए और अधिक समावेशी बनाया जा सके और साथ ही प्रत्येक अपराधी को जवाबदेह ठहराया जा सके।

वास्तव में, बलात्कार की परिभाषा में पहले भी कई बार संशोधन किया गया है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण 2013 का आपराधिक (संशोधन) अधिनियम है, जिसमें सभी प्रकार के प्रवेश को वर्गीकृत किया गया है, चाहे वह योनि, मौखिक, गुदा आदि हो। , यौन उत्पीड़न के रूप में। पहले केवल लिंग-योनि प्रवेश को ही बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता था। यह संशोधन मुकेश बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (2012), या निर्भया मामले के ऐतिहासिक फैसले के बाद लाया गया था। इसी तरह, भारतीय आपराधिक कानूनों में लिंग-निष्पक्ष भाषा शुरू करने के लिए एक और संशोधन की आवश्यकता है।

एक अन्य मामले में, साक्षी बनाम भारत संघ (1997), सर्वोच्च न्यायालय ने पुरुष बलात्कार पीड़ितों और कानूनों के लिंग-निष्पक्ष अनुप्रयोग से संबंधित मामले को विधि आयोग को भेजा, जिसे बाद में विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट में शामिल किया गया। इसने अंततः लोकसभा में 2012 के आपराधिक कानून संशोधन विधेयक को पेश किया, जिसे भारत में लिंग-निष्पक्षता के लिए एक महत्वपूर्ण विकास के रूप में चिह्नित किया गया था। इस विधेयक में बलात्कार, यौन उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जैसे लिंग-विशिष्ट कानूनों के लिए अधिक लिंग-निष्पक्ष भाषा बनाने की योजना बनाई गई थी, लेकिन विभिन्न मुद्दों के कारण इसे उस स्तर पर रोक दिया गया था।

समान कार्यसूची (एजेंडा) और लक्ष्यों के साथ, 2019 के आपराधिक कानून संशोधन विधेयक को भी ट्रांसजेंडर और पुरुष यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को स्वीकार करने और सहानुभूति देने के उद्देश्य से अधिनियमित करने का प्रयास किया गया था। हम लेख के आगामी भाग में ऐसे लिंग-निष्पक्ष विधेयकों और नीतियों पर चर्चा करेंगे।

लिंग निष्पक्षता पर वर्तमान भारतीय प्रावधान

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत के पास कोई निर्दिष्ट या विशिष्ट लिंग निष्पक्षता विधेयक नहीं है। हालाँकि, इसके बावजूद, अधिकांश भारतीय कानूनी प्रावधान सभी लिंगों पर लागू होते हैं, और लैंगिक समानता के साथ-साथ निष्पक्षता की वकालत करने वाले कई कानूनी प्रावधान और नीतियां हैं। इनमें से कुछ प्रावधानों में शामिल हैं:

भारत का संविधान

भारत का संविधान (1950), लिंग निष्पक्षता के लिए स्पष्ट रूप से प्रावधान नहीं करते हुए, कई ऐसे प्रावधानों को शामिल करता है जो धर्म, नस्ल, जाति, जन्म स्थान, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर किसी भी भेदभाव को खत्म करने का प्रयास करते हुए समानता को बढ़ावा देते हैं। हालाँकि, भारतीय संविधान के तहत ऐसे प्रावधान भी हैं जो हाशिए पर मौजूद लिंगों के उत्थान के लिए लिंग-विशिष्ट नीतियां बनाने की अनुमति देते हैं।

मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का प्रावधान करता है, जो कानून के शासन के सिद्धांत पर आधारित है। इस अनुच्छेद के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति कानून की नजर में समान है और भारत के क्षेत्र के भीतर ऐसे कानून के तहत उसे समान सुरक्षा मिलेगी। इस मौलिक अधिकार का उपयोग भारतीय क्षेत्र के भीतर कोई भी व्यक्ति कर सकता है, भले ही वह नागरिक हो या नहीं। हालाँकि, तर्कसंगत सांठगांठ (रेशनल नेक्सस) और समझदार अंतर के आधार पर उचित वर्गीकरण की अनुमति है। सरल शब्दों में, ऐसे वर्गीकरणों के पीछे तर्कसंगत स्पष्टीकरण के साथ उचित और उचित आधार पर कोई भी भेदभाव कानूनी और संवैधानिक माना जाएगा।

इसके अलावा, चूंकि अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता और ऐसे कानूनों के तहत समान सुरक्षा के बारे में बात करता है, इसलिए इसकी व्याख्या व्यक्ति के लिंग या यौन अभिविन्यास की परवाह किए बिना समान स्थितियों में समान व्यवहार के अधिकार की वकालत करने के लिए की जा सकती है। यह प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के लिए लगाया जाएगा।

नालसा मामले के ऐतिहासिक फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने लिंग की पहचान न होने के कारण ट्रांसजेंडर समुदाय को होने वाली कठिनाइयों को मान्यता दी। न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे लिंग के आधार पर यह भेदभाव और पूर्वाग्रह अनुच्छेद 14 के साथ-साथ अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है क्योंकि यह सीधे तौर पर उनकी गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

न्यायालय ने माना कि भारतीय नीतियों और कानूनी प्रावधानों से ट्रांसजेंडरों का बहिष्कार उन्हें कानून के समक्ष समानता और अन्य लिंगों को दिए गए कानून के समान संरक्षण से वंचित करता है। इस तरह के बहिष्कार के परिणामस्वरूप ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ व्यापक भेदभाव होता है, जिसे केवल लिंग-समावेशी भाषा के माध्यम से कानून में उचित समायोजन द्वारा ही हल किया जा सकता है।

दूसरी ओर, संविधान का अनुच्छेद 15 किसी भी तरह से भेदभाव पर रोक लगाता है, चाहे वह धर्म, नस्ल, जाति, जन्म स्थान, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर हो। हालाँकि, यह खंड (3) के तहत राज्य को महिलाओं सहित समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए विशेष नीतियां और प्रावधान बनाने का अधिकार भी देता है।

किसी को आश्चर्य हो सकता है कि क्या यह समानता है जब राज्य को समाज के कुछ वर्गों के लिए विशेष रूप से अनुकूल कानून बनाने का अधिकार है। कई तर्क भी उठाए गए, जिसमें सवाल उठाया गया कि क्या अनुच्छेद 15(3) कानून के समक्ष समानता के खिलाफ है।

इस प्रश्न का उत्तर कई न्यायिक उदाहरणों के माध्यम से दिया गया था, जिनमें से सबसे हालिया उदाहरण परमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2009) है, जिसमें यह माना गया कि समाज के एक निश्चित लिंग या उत्पीड़ित वर्ग के उत्थान और संरक्षण के लिए नीतियां समाज के बाकी हिस्सों के खिलाफ भेदभावपूर्ण नहीं हैं। वे बस उन लोगों के हितों की रक्षा करते हैं जिनके साथ बहुत लंबे समय से भेदभाव किया गया है और उन पर अत्याचार किया गया है।

हालाँकि, जैसा कि एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1963) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, समाज के कमजोर और हाशिये पर पड़े वर्गों के हितों को भी समाज के बाकी हिस्सों के साथ समायोजित किया जाना चाहिए। सुरक्षात्मक भेदभाव का विस्तार अधिमान्य उपचार तक नहीं होना चाहिए।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 रोजगार के संदर्भ में समानता के मौलिक अधिकार से संबंधित है। यह प्रावधान विशेष रूप से सार्वजनिक रोजगार से संबंधित है, जो राज्य को अपने अधीन किसी भी कार्यालय में नियुक्ति या रोजगार के लिए प्रत्येक नागरिक को कार्यालय या पद के लिए आवश्यक योग्यताओं को छोड़कर बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान करने का आदेश देता है। चयन योग्यता के आधार पर किया जा सकता है, लेकिन धर्म, वंश, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान आदि के आधार पर नहीं।

लिंग निष्पक्षता से सीधे तौर पर निपटते हुए नहीं, अनुच्छेद 16 अभी भी यह सुनिश्चित करता है कि केवल किसी की लिंग पहचान या यौन अभिविन्यास के कारण सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के संबंध में कोई भेदभाव नहीं है। यह प्रावधान को लैंगिक रूप से समावेशी बनाता है।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

इस बीच, संविधान के अनुच्छेद 39 (a) में कहा गया है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को, लिंग की परवाह किए बिना, आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को समान या समान कार्य के लिए समान वेतन पाने का अधिकार है। इस अनुच्छेद के आधार पर, लैंगिक समानता के साथ-साथ सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, विशेषकर आजीविका और रोजगार के संदर्भ में, कई कानून बनाए गए हैं। इनमें से कुछ प्रावधानों में शामिल हैं:

अंत में, संविधान का अनुच्छेद 42 राज्य को मातृत्व के दौरान महिलाओं के लिए उचित कामकाजी माहौल और स्थितियां सुरक्षित करने के लिए कानूनी प्रावधान करने का अधिकार देता है। इस निदेशक सिद्धांत के आधार पर, 1961 का मातृत्व लाभ अधिनियम लागू किया गया था।

इसके अलावा, कोई भी स्थिति या परिस्थिति जो उपर्युक्त अनुच्छेदों में शामिल नहीं है, उसकी अनुच्छेद 14 के आलोक में जांच की जाएगी।

ट्रांसजेंडर अधिनियम, 2019

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019, या ‘ट्रांसजेंडर अधिनियम’, कानून का एक हिस्सा है जिसे ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को मान्यता देने और उनके खिलाफ भेदभाव को रोकने वाले प्रावधानों को स्थापित करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम का उद्देश्य धारा 16 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद की स्थापना करना भी है, जो ट्रांसजेंडर मुद्दों को संबोधित करते हुए नीतियां या योजनाएं तैयार करते समय सरकार के लिए सलाहकार के रूप में कार्य करेगा।

ट्रांसजेंडर अधिनियम को ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ भेदभाव पर रोक लगाकर और उन्हें अन्य लिंगों के समान अवसर प्रदान करके लैंगिक समानता लाने के इरादे से पारित किया गया था। हालाँकि, अधिनियम शायद ही उस इरादे को प्रभावी ढंग से लागू करने में सक्षम था।

हालाँकि यह अधिनियम एक अच्छे प्रयास के रूप में दावा किया जा सकता है, फिर भी यह ट्रांसजेंडर लोगों द्वारा सामना किए जाने वाले सामाजिक-कानूनी मुद्दों को पहचानने और संबोधित करने में विफल रहा, जो सिर्फ भेदभाव से परे थे। अधिनियम में निर्दिष्ट किया गया है कि लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी के प्रमाण के पंजीकरण के बाद ही कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति कानूनी रूप से अपनी पहचान बदल सकता है, जो उन मामलों में काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है जहां ट्रांसजेंडर लोगों के पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त आय नहीं है। यह पहचानने में भी विफल रहता है कि सभी लोग जो खुद को दूसरे लिंग के साथ पहचानते हैं, वे अपने शरीर पर ऐसी अनुचित सर्जरी नहीं चाहते हैं।

इसके अलावा, जबकि अधिनियम राज्य को ट्रांसजेंडर लोगों के लिए कल्याणकारी नीतियां बनाने का अधिकार देता है, लेकिन ऐसी नीतियों को कैसे लागू किया जाएगा, इस संबंध में ऐसा कोई अधिनियम या स्पष्टता नहीं है।

इसके अलावा, ट्रांसजेंडर अधिनियम अपने प्रावधानों के तहत ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ भेदभाव के लिए दंड की रूपरेखा तैयार करने में भी विफल रहता है, बावजूद इसके कि यह अधिनियम के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। वास्तव में, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में भी, जुर्माना छह महीने से कम के कारावास के रूप में दिया जाता है, जिसे अधिकतम दो साल तक बढ़ाया जा सकता है। जुर्माने में न्यायालय द्वारा निर्धारित अतिरिक्त जुर्माना भी शामिल किया जा सकता है।

आईपीसी के तहत महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न के प्रावधानों की तुलना में यह जुर्माना काफी कम है। आईपीसी की धारा 375 में बलात्कार के लिए कम से कम सात साल की कैद की सजा का प्रावधान है, जिसे भारी जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।

जैसा कि पहले कहा गया है, जबकि ट्रांसजेंडर अधिनियम के साथ एक प्रयास किया गया था, लिंगों के बीच स्पष्ट असमानता को सुधारने के लिए अभी भी बहुत कुछ काम करने की जरूरत है, जिसे कानूनी प्रावधान भी कई बार प्रदर्शित करते हैं।

पॉश अधिनियम, 2013

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, या ‘पॉश’ अधिनियम, एक कानून है जिसे विशेष रूप से महिला कर्मचारियों द्वारा अपने कार्यस्थल में सामना किए जाने वाले मुद्दों को संबोधित करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था – विशेष रूप से यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार का मुद्दा।

यह अधिनियम विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ‘विशाखा दिशानिर्देशों’ के आधार पर बनाया गया था,, जो कार्यस्थलों पर महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों और इस तरह के उत्पीड़न के खिलाफ उपाय की कमी को उजागर करने वाला पहला मामला था। ये दिशानिर्देश, साथ ही परिणामी अधिनियम, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत दिए गए समानता के सिद्धांतों के साथ-साथ महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर सम्मेलन (सीईडीएडब्ल्यू) जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों जिसका भारत एक हिस्सा है पर तैयार किए गए थे।

जिन सिद्धांतों और दिशानिर्देशों पर यह आधारित है, उनके अनुसार पॉश अधिनियम कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न शब्द को परिभाषित करता है और इसे अपराध भी बनाता है। अधिनियम आंतरिक शिकायत समितियों (आईसीसी) की स्थापना का भी प्रावधान करता है जो ऐसे मामलों को नाजुक और ईमानदारी से संभाल सकती है।

हालाँकि, जबकि यह अधिनियम महिला कर्मचारियों द्वारा सामना किए जाने वाले उत्पीड़न पर भारी जोर देने के साथ अधिक लिंग-विशिष्ट प्रतीत हो सकता है, पॉश अधिनियम के तहत कई प्रावधान अपने आवेदन में लिंग-निष्पक्ष हैं और कर्मचारियों के लिए उनके लिंग की परवाह किए बिना इसकी व्याख्या की जा सकती है।

पॉश अधिनियम के तहत कई प्रावधान, जैसे कि धारा 14, जो झूठे साक्ष्य और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की सजा से संबंधित है, अपनी शब्दावली में लिंग-निष्पक्ष हैं और पार्टी को गलत तरीके से फंसाए जाने से बचाते हैं। यह कार्यस्थल पर उत्पीड़न को प्रतिबंधित करने और पता चलने पर इसे आगे होने से रोकने के नियोक्ता के दायित्व पर भी जोर देता है।

अधिनियम इसमें शामिल सभी पक्षों के लिए निष्पक्ष सुनवाई और सुनवाई प्रदान करने के लिए एक स्पष्ट शिकायत तंत्र भी स्थापित करता है। इसके प्रावधानों का अनुपालन न करने पर नियोक्ता को पीड़ितों को हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी और, सबसे खराब स्थिति में, उनका व्यवसाय लाइसेंस रद्द करना होगा।

पॉक्सो अधिनियम, 2012

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012, या ‘पॉक्सो’ अधिनियम, वयस्कता से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया एक कानून है। इसके प्रावधान बलात्कार, अश्लील साहित्य, उत्पीड़न और हमले सहित विभिन्न प्रकार के अपराधों को कवर करते हैं।

अधिनियम की भाषा लिंग समावेशी है, क्योंकि इसका उद्देश्य बच्चों को उनकी लिंग पहचान या यौन अभिविन्यास की परवाह किए बिना शोषण से बचाना है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 2(1)(d) ‘बच्चे’ शब्द को लिंग-निष्पक्ष रुख के साथ परिभाषित करती है, जिससे नाबालिग पुरुषों को भी यौन उत्पीड़न और उत्पीड़न से सुरक्षा मिलती है, जिसके लिए वयस्क पुरुषों के पास भी स्पष्ट उपाय नहीं हैं।

जैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने राकेश बनाम एनसीटी दिल्ली राज्य (2023) के मामले में कहा था, पॉक्सो अधिनियम सभी लिंग के बच्चों पर लागू है, और यह दावा करना कि इसकी लिंग-समावेशी शब्दावली के कारण इसका दुरुपयोग किया जा रहा है, भ्रामक है। वर्तमान मामले में, आवेदक पर एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी का आरोप लगाया गया था, जो अपराध के समय केवल सात वर्ष की थी। आवेदक ने तर्क दिया कि उसने केवल पीड़िता (शिकायतकर्ता) के पिता पर दबाव डालकर और उसकी नाबालिग बेटी के कंधे पर बंदूक रखकर अपने पैसे वापस पाने का प्रयास किया था। उन्होंने अदालत के समक्ष दोबारा गवाही कराए जाने की दलील दी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका की शब्दावली को असंवेदनशील पाया और पीड़िता से गवाह के रूप में दोबारा पूछताछ की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह न केवल नाबालिग लड़की के लिए एक दर्दनाक स्मृति होगी बल्कि इसकी आवश्यकता भी नहीं है।

आपराधिक कानून संशोधन विधेयक, 2019

2019 का आपराधिक संशोधन विधेयक आपराधिक कानून में लिंग-निष्पक्ष भाषा को पेश करने के सबसे प्रमुख प्रयासों में से एक है। हालाँकि यह प्रयास करने वाला यह पहला विधेयक नहीं है, यह पुरुष और ट्रांसजेंडर पीड़ितों सहित सभी लिंगों के अधिकारों और मुद्दों को स्वीकार करने और संबोधित करने वाला पहला विधेयक है।

विधेयक का उद्देश्य न केवल यौन उत्पीड़न के प्रावधानों को लिंग-निष्पक्ष बनाना है, बल्कि यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, पीछा करना, घरेलू हिंसा और ताक-झांक जैसे अन्य अपराधों को भी लिंग-निष्पक्ष बनाना है। इनके अलावा, विधेयक के माध्यम से अन्य चूक और संशोधन किए जाने की बात कही गई थी।

यह विधेयक क्रिमिनल जस्टिस सोसाइटी ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के मामले में निर्धारित सिद्धांत पर आधारित था, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार के साथ-साथ अन्य अपराधों के लिए लिंग-निष्पक्ष कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता पर चर्चा की थी और इसके लिए कहा था सरकार इस पर एक बार विचार करे।

यह विधेयक मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा, 1948 जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों पर भी आधारित है, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता और समानता से संबंधित सभी मानव अधिकारों को संरक्षित करना है। अपने उधार सिद्धांत के साथ, विधेयक का लक्ष्य भारतीय आपराधिक कानूनों को अधिक लैंगिक समावेशी और लचीला बनाना है ताकि दुर्लभतम अपवादों को भी न्याय मिल सके।

भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023

भारतीय न्याय संहिता विधेयक 2023, एक सदी से भी अधिक पुराने आईपीसी के प्रतिस्थापन के लिए पेश की गई नई और संशोधित दंड संहिता है। इसके साथ ही, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023, वर्तमान आपराधिक प्रक्रिया संहिता का स्थान लेगा और भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 इसके लागू होने पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान लेगा।

इस तरह के सुधार का उद्देश्य देश के आपराधिक कानूनों को वर्तमान समय के अनुसार संशोधित करना था। प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास के बाद से अपराध का दायरा भौतिक साधनों से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह विधेयक ऐसे ई-अपराधों को पहचानता है और अपने प्रावधानों के अंतर्गत उनका समाधान करता है।

इसके अलावा, विधेयक का लक्ष्य अपने सभी प्रावधानों को अधिक लैंगिक समावेशी बनाना है और साथ ही उन अपराधों के लिए नए लिंग-निष्पक्ष प्रावधानों को पेश करना है जिन पर पहले 2019 के आपराधिक संशोधन विधेयक में चर्चा की गई थी। वर्तमान में, सभी तीन विधेयक केवल पेश किए गए हैं और हैं अभी भी चर्चा और अधिनियमित होना बाकी है।

यूसीसी

भारत में, सभी पारिवारिक और उत्तराधिकार कानून व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं जो उनके धर्म के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। हालाँकि, इनमें से अधिकांश कानून, जैसा कि लेख में पहले बताया गया है, प्रकृति में लिंग-निष्पक्ष नहीं हैं। वास्तव में, इनमें से कई कानून अपने प्रावधानों के आधार पर एक लिंग या दूसरे लिंग के प्रति अधिमान्य प्रतीत होते हैं, जबकि अधिकांश स्थानों पर ट्रांसजेंडर या समलैंगिक लोगों को बाहर रखा जाता है।

इस प्रकार, इसे संबोधित करने के लिए, सरकार ने व्यक्तिगत नागरिक कानूनों की मौजूदा प्रणाली को बदलने और धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव न करते हुए नागरिकों के बीच एकरूपता लाने के लिए समान नागरिक संहिता (इसके बाद ‘यूसीसी’ के रूप में संदर्भित) का प्रस्ताव दिया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को धर्म के प्रभाव से वंचित लोगों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए यूसीसी अधिनियमित करने का अधिकार भी देता है। हालाँकि, अभी तक, यूसीसी को पारित या अधिनियमित किया जाना बाकी है लेकिन इसे पहले ही एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में संसद में पेश किया जा चुका है।

मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों के साथ सबसे ज्वलंत मुद्दा यह है कि उनमें से अधिकांश अपने रूढ़िवादी प्रावधानों के कारण बिल्कुल भी समान-लिंग या समलैंगिक जोड़ों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, जो सीधे परंपराओं और रीति-रिवाजों पर आधारित हैं। यूसीसी के अधिनियमन से समान-लिंग वाले जोड़ों के आवास के साथ-साथ उनकी शादी, तलाक और बच्चों को गोद लेने को वैध बनाने का आसान तरीका मिल सकता है। ऐसे परिवर्तनों से ट्रांसजेंडर समुदायों को भी लाभ होगा, खासकर यदि यूसीसी अधिक लिंग-समावेशी भाषा का उपयोग करता है।

अन्य नीतियाँ एवं प्रावधान

ऊपर उल्लिखित प्रावधानों के अलावा, भारत में अन्य कानून भी हैं जो प्रकृति में लिंग-समावेशी हैं। जैसे कि 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम, जिसके तहत पत्नी के साथ-साथ पति भी रखरखाव और स्थायी गुजारा भत्ता के लिए दावा कर सकता है यदि वे तलाक के बाद या उसके दौरान खुद को बनाए रखने में असमर्थ हैं। धारा 25 गुजारा भत्ता और रखरखाव भाग के बारे में बात करती है, जबकि धारा 24 तलाक की कार्यवाही की फीस के रखरखाव का प्रावधान करती है, जिसे पति-पत्नी में से किसी एक द्वारा चुना जा सकता है।

इसके अलावा, भारत ने राजनीतिक और शैक्षिक निकायों की संरचना में देखी गई लैंगिक असमानता के कारण उत्पन्न अंतर को भरने में मदद के लिए आरक्षण नीतियां भी लागू की हैं। महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए सीटें आरक्षित करके, ऐसी नीतियों का लक्ष्य एक-एक करके अंतर को भरना है और साथ ही इन हाशिए पर रहने वाले समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करना है ताकि उन्हें अपने विचारों और मुद्दों को उठाने का साधन मिल सके।

सार्वजनिक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण से लेकर पंचायत, लोकसभा और अन्य राजनीतिक निकायों में महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के आरक्षण तक,ये सभी प्रयास अन्य लिंगों और उनके हितों को समाज के हितों के साथ समायोजित करते हुए उनके उत्थान के लिए किए जाते हैं।

लिंग निष्पक्ष कानूनों वाले अन्य देश

वैश्वीकरण के साथ, लैंगिक निष्पक्षता और नारीवाद जैसी कई अवधारणाएँ दुनिया के सुदूर कोनों तक पहुँच गई हैं, जिससे ऐसी अवधारणाओं की आवश्यकता के साथ-साथ एक राष्ट्र के कानूनी प्रावधानों के माध्यम से उनके अनुप्रयोग के बारे में जागरूकता फैल रही है। अब भी, दुनिया के कई देश अपने नागरिकों के बीच अधिक लिंग समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए अधिक लिंग-निष्पक्ष कानूनों और भाषा का विकल्प चुन रहे हैं।

यूके, कनाडा, जर्मनी, फिनलैंड, आयरलैंड और आइसलैंड जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अधिकांश देशों सहित तिरसठ से अधिक देशों ने लिंग-निष्पक्ष कानून बनाए हैं। यहां तक कि दक्षिण कोरिया, भूटान और कजाकिस्तान जैसे कई एशियाई देशों ने भी अपने आपराधिक कानूनों को अधिक लिंग-समावेशी तरीके से संशोधित किया है। इनमें से कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र के तहत अनुमोदित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए ऐसा किया है, जिसका भारत भी लंबे समय से हिस्सा रहा है।

हालाँकि, भारत की तरह, अभी भी कई देश हैं जिन्होंने अभी तक अपने सभी कानूनी प्रावधानों में लिंग निष्पक्षता का विकल्प नहीं चुना है। जबकि दुनिया भर में कई कानून लिंग-निष्पक्ष हैं, कुछ कानून जो विशेष रूप से महिलाओं या ट्रांसजेंडर लोगों के लिए बनाए गए हैं,चाहे उनके उत्थान के लिए हो या सुरक्षा के लिए, इन राष्ट्रों में कई ऐसे लैंगिकों के बीच चमकदार अंतर के कारण उन्हें अभी भी वैसे ही खड़े रहने की आवश्यकता है।

हालांकि यह भी सच है कि कई देशों में लिंग-विशिष्ट कानून हैं जो सुरक्षात्मक की तुलना में प्रकृति में अधिक भेदभावपूर्ण हैं, जैसे कि समलैंगिकता का अपराधीकरण या लिंग पुनर्निर्धारण, जिन देशों में ऐसे कानून हैं वे लैंगिक निष्पक्षता को छोड़कर, लिंग समानता के विचार से बहुत दूर हैं।

इस प्रकार, लिंग निष्पक्षता न केवल भारत बल्कि अन्य विदेशी देशों के लिए भी प्रगति पर है।

लिंग निष्पक्ष कानूनों पर विभिन्न दृष्टिकोण

किसी भी अवधारणा की तरह, लिंग निष्पक्षता में भी कुछ लोग इसकी वकालत करते हैं जबकि अन्य इसकी आलोचना करते हैं। आइए हम लिंग-निष्पक्ष कानूनों के पक्ष और विपक्ष में तर्कों पर गौर करें ताकि उनके आसपास की जनता की राय को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

पक्ष 

पहला तर्क जो हमेशा लिंग-निष्पक्ष कानूनों के पक्ष में उजागर किया जाता है, वह यह है कि ये कानून लैंगिक समानता के लिए अगला कदम कैसे हैं और वे सभी लिंगों के लिए समानता और समावेशिता की बेहतर भावना कैसे ला सकते हैं।

जबकि लिंग-विशिष्ट कानूनों ने भी उत्पीड़ित लिंगों के प्रचार और उत्थान में काफी मदद की है, ऐसे कानूनों के कारण लिंग और लिंग पर आधारित भेदभाव का सामान्यीकरण हुआ है जिससे काफी नुकसान हुआ है। इसके अलावा, इन सामान्यीकृत कानूनों के कारण पूर्वाग्रह और पूर्वधारणा ने कई मामलों को केवल इसलिए दबा दिया है क्योंकि इसमें शामिल पक्षों के लिंग कानून के तहत मान्यता प्राप्त ‘दोष’ लिंग से भिन्न हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बलात्कार कानून हैं, जिन्होंने सभी बलात्कार पीड़ितों को केवल महिलाओं और अपराधियों को पुरुषों तक सीमित कर दिया है।

जागरूकता की कमी के कारण, बहुत से लोग यह समझने में असफल होते हैं कि भले ही किसी समस्या के बारे में मुख्यधारा के मीडिया में बात नहीं की जा रही हो या उसे प्रदर्शित नहीं किया जा रहा हो, इसका मतलब यह नहीं है कि समस्या का अस्तित्व समाप्त हो गया है। उदाहरण के लिए, महिलाओं द्वारा पुरुषों पर यौन हमला, जबकि इसके विपरीत दुर्लभ है, खुले तौर पर चर्चा नहीं होने के बावजूद अभी भी मौजूद है।

दूसरा तर्क जो अक्सर लिंग निष्पक्षता के पक्ष में दिया जाता है वह यह है कि ऐसे लिंग-समावेशी कानून लिंग पहचान और यौन अभिविन्यास की अवधारणाओं के प्रति जागरूकता कैसे ला सकते हैं। चूँकि ये अवधारणाएँ भारत सहित कई देशों में अभी भी काफी नई हैं, लिंग-निष्पक्ष कानून उन पर अधिक प्रकाश डाल सकते हैं और ऐसी अवधारणाओं के बारे में आम जनता के बीच अधिक समझ बनाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि लिंग-निष्पक्ष कानूनी प्रावधानों के सामाजिक पहलुओं को समझना जटिल हो सकता है, लेकिन पर्याप्त समय और धैर्य के साथ उन्हें सरल बनाया जा सकता है।

किसी राज्य के कानूनी प्रावधानों के लिए लिंग-निष्पक्ष भाषा के उपयोग के पक्ष में तीसरा तर्क यह है कि यह न केवल लिंग और लिंग के आधार पर सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करता है, बल्कि उनमें से किसी की भी उपेक्षा किए बिना सभी लिंगों के सामने आने वाले मुद्दों को भी संबोधित करता है। इनमें से कुछ मुद्दों में महिला श्रमिकों का असमान वेतन, उत्पीड़न के लिए पुरुषों पर गलत आरोप, चिकित्सा उपचार और प्रक्रियाओं के दौरान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों द्वारा सामना किया जाने वाला भेदभाव आदि शामिल हैं।

पक्षों के लिंग को निर्दिष्ट करके उनके आवेदन के दायरे को प्रतिबंधित करने वाले सभी कानूनी प्रावधानों को हटाकर, हम एक अधिक लिंग-समावेशी और समझदार समाज बना सकते हैं जहां किसी को भी उनके साथ हो रहे अन्याय की उपेक्षा नहीं करनी होगी केवल इसलिए क्योंकि उनका लिंग पारंपरिक रूप से नहीं है उन्हें पीड़ित के बजाय अपराध का अपराधी माना जाता है।

विपक्ष

जिस तरह लिंग निष्पक्षता के पक्ष में तर्क हैं, उसी तरह इसके विरोध में भी तर्क हैं। इसके ख़िलाफ़ सबसे आम तर्क यह है कि लिंग-निष्पक्ष कानूनों को लागू करने से महिलाओं की रक्षा करने वाले कानूनों को हटाया जा सकता है, खासकर जब भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक जड़ें अभी भी बहुत स्पष्ट हैं।

2012 में निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के बाद कई महिला कार्यकर्ताओं और संगठनों द्वारा ‘लिंग न्यायपूर्ण, लिंग-संवेदनशील लेकिन लिंग-निष्पक्ष बलात्कार कानून नहीं’ का नारा लगाया गया था। यह लगभग उसी समय हुआ जब 2012 का आपराधिक संशोधन विधेयक संसद प्रणाली में पेश किया जा रहा था।

इस डर के कारण कि लिंग निष्पक्षता के कारण अभी भी कायम लिंग अंतर बढ़ सकता है, बहुत सारे विरोध प्रदर्शन हुए। कई प्रदर्शनकारियों ने इस तथ्य के साथ अपनी बात को उचित ठहराया कि लिंग-निष्पक्ष कानूनी प्रावधानों वाले अधिकांश देशों में गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक सोच नहीं है जो अभी भी भारतीय समाज में पाई जा सकती है।

ऐसे परिदृश्य में, यदि लिंग-निष्पक्ष कानून पेश किए जाते हैं, तो पुरुष अपराधी या उनके संबंध ऐसे कानूनों का उपयोग पीड़ितों पर अपनी शिकायतें वापस लेने के लिए दबाव डालने के लिए जवाबी शिकायत दर्ज करने के लिए कर सकते हैं। और दो मुकदमे लड़ना उन परिवारों के लिए बहुत अधिक हो सकता है जो एक वकील की फीस का भुगतान भी नहीं कर सकते। इस प्रकार, ऐसे लिंग-निष्पक्ष कानूनों से फायदे की बजाय नुकसान अधिक हो सकता है।

अधिकांश कार्यकर्ताओं ने सकारात्मक भेदभाव के विचार का समर्थन करते हुए कहा कि यह महिलाओं पर सदियों से चले आ रहे उत्पीड़न के कारण उत्पन्न सामाजिक और वित्तीय पिछड़ेपन को दूर करने में मदद करता है। भारत अभी भी पूरी तरह से लिंग-निष्पक्ष होने से काफी दूर है, खासकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि देश में महिलाओं पर अभी भी अत्याचार किया जाता है और उनका शिकार बनाया जाता है। यदि ऐसे समय में लिंग-निष्पक्ष कानूनों का उपयोग किया जाता है, तो इससे अपराधी को लाभ देकर दुरुपयोग ही होगा और महिलाओं जैसे हाशिए पर पड़े लिंगों को झूठी जवाबी शिकायतों के माध्यम से ब्लैकमेल करके फिर से दबाया जाएगा।

दूसरा तर्क जो अक्सर कानूनी प्रावधानों के लिंग-निष्पक्ष दृष्टिकोण के खिलाफ लाया जाता है, वह यह है कि यह कई लोगों की परंपरा और संस्कृति के खिलाफ है, खासकर जब पारिवारिक कानूनों के संदर्भ में दिया जाता है जो भारत में व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं। विवाह, तलाक और विरासत कानूनों में लिंग-निष्पक्ष शब्दावली का परिचय कई धर्मों के पारंपरिक रीति-रिवाजों को चुनौती देने के रूप में देखा जा सकता है, खासकर जब मुस्लिम कानून जैसे धर्मों के संदर्भ में लिया जाता है, जिनमें विश्वास करने वाले अपने रीति-रिवाजों के बारे में काफी विशिष्ट हैं।

भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से द्वारा रखे गए इन कठोर रूढ़िवादी या पारंपरिक विचारों के कारण लिंग निष्पक्षता को इसकी अवधारणा के सरल उल्लेख पर भी बहुत अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इसमें उन लोगों द्वारा और भी बाधा उत्पन्न की जाती है जो पुरुषों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों से अनजान हैं, जिसके परिणामस्वरूप लिंग-निष्पक्ष कानूनों के कार्यान्वयन (इम्प्लिमेन्टेशन) में कठिनाई होती है।

आख़िरकार, अगर लोगों को यह पता ही नहीं है कि पुरुष भी बलात्कार का शिकार हो सकते हैं और महिलाएँ भी यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकती हैं, तो ऐसे कार्यों को अपराध के रूप में मान्यता कैसे दी जा सकती है, मुकदमा चलाना और न्याय पाना तो दूर की बात है? यह कई आलोचकों द्वारा दिया गया तीसरा तर्क भी है, जिसमें कहा गया है कि भारत की आम जनता को लैंगिक पहचान या उसकी समानता के बारे में भी जानकारी नहीं है। ऐसे परिदृश्य में, लिंग-निष्पक्ष कानूनों का कार्यान्वयन कैसे प्रभावी या उपयोगी हो सकता है?

जैसा कि लिंग-निष्पक्ष कानूनों का विरोध करने वालों द्वारा तर्क दिया गया है, एक अनजान जनता के साथ जिसमें अभी भी पितृसत्तात्मक मान्यताएं गहरी जड़ें जमा चुकी हैं, बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे कानूनी प्रावधानों के प्रति एक लिंग-निष्पक्ष दृष्टिकोण सबसे अच्छे रूप में अप्रभावी और सबसे खराब स्थिति में हानिकारक होगा।

लिंग निष्पक्षता और लैंगिक समानता का विश्लेषण

वर्तमान स्तर पर, कुछ आपराधिक प्रावधानों और पारिवारिक कानूनों को छोड़कर, अधिकांश भारतीय कानूनी प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर लागू होते हैं, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो। कुछ प्रावधान और कानून लिंग-विशिष्ट हैं, लेकिन उन्हें वर्षों के उत्पीड़न और वस्तुकरण के बाद महिलाओं के उत्थान में मदद करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3) के अनुसार अधिनियमित किया गया है।

जबकि वर्तमान समय वास्तव में तेजी से बदल रहा है, इसके पीछे की सच्चाई यह है कि हम अभी भी लिंग-निष्पक्ष दुनिया से काफी दूर हैं क्योंकि जिस समाज में हम रहते हैं वह अभी भी मूल रूप से काफी लिंग आधारित है। ऐसे परिदृश्य में, सभी लिंगों के लिए पूर्ण समानता एक प्रकार के अन्याय के रूप में सामने आ सकती है, खासकर जब महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों जैसे लिंग अभी भी हाशिए पर हैं।

हालांकि कोई यह तर्क दे सकता है कि लिंग निष्पक्षता दोनों हाशिए पर मौजूद लिंगों के मुद्दों को हल कर सकती है, साथ ही पुरुष पीड़ितों के मुद्दों को भी संबोधित कर सकती है, लेकिन इसके दुरुपयोग का खतरा इसके वास्तविक उपयोग से कहीं अधिक है। हालाँकि, यह भी तर्क दिया जा सकता है कि वर्तमान में लागू किए गए लिंग-विशिष्ट कानूनों का भी दुरुपयोग किया जाता है, जैसे हमें डर है कि लिंग-निष्पक्ष कानूनों का भी वैसा ही किया जाएगा।

यह सच है कि भारतीय कानूनी प्रावधानों में लिंग-निष्पक्ष दृष्टिकोण लाने से महिला पीड़ितों के अधिकार कम नहीं होंगे, बल्कि समान अनुभव वाले अन्य लिंगों को सुरक्षा और उपचार मिलेगा। हालाँकि, यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या लैंगिक निष्पक्षता के माध्यम से पूर्ण लैंगिक समानता उचित है जब लैंगिक समानता भी पूरी तरह से हासिल नहीं की गई है।

अब भी, भारत में होने वाले अपराधों का एक उच्च अनुपात महिलाओं के खिलाफ है, जिनमें से जघन्य अपराधों की एक बड़ी संख्या महिलाओं के खिलाफ है। ऐसे स्तर पर, क्या लिंग-निष्पक्ष कानून लैंगिक समानता के लिए सही दृष्टिकोण है?

हालाँकि, अगर हम यह मान लें कि भारत अभी लिंग-निष्पक्ष कानूनों के लिए तैयार नहीं है, तो उन पीड़ितों का क्या होगा जो समान अपराधों से पीड़ित हैं, लेकिन इसके प्रावधानों के तहत केवल इसलिए संरक्षित नहीं हैं क्योंकि उनका लिंग कानून में उल्लिखित लिंग से भिन्न है ? भले ही ऐसे मामले उनके समकक्षों की तुलना में काफी कम हों, क्या उन्हें केवल उस साधारण तथ्य के आधार पर नजरअंदाज कर दिया जाएगा?

जैसा कि राकेश बनाम भारत संघ के हालिया मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा था, सभी कानूनों का ‘दुरुपयोग होने की संभावना’ है, चाहे वे लिंग-विशिष्ट कानून हों या पॉक्सो अधिनियम जैसे लिंग-निष्पक्ष कानून हों। ये ‘दुरुपयोग’ दुर्भावनापूर्ण अभियोजन, ब्लैकमेल, धमकी आदि के रूप में हो सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि विधायिका को ऐसे कानून बनाना बंद कर देना चाहिए। सभी कानून समाज के व्यापक हितों को संबोधित करने और ऐसे अपराधों के कारण पीड़ित लोगों को न्याय देने के लिए बनाए गए हैं।

हालाँकि सदियों से चले आ रहे उत्पीड़न और हाशिए पर रखे जाने के कारण अभी भी लिंगों के बीच भारी शक्ति असंतुलन है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लिंग निष्पक्षता लागू नहीं की जा सकती। यह सच है कि ऐसे चरण में जहां लिंग के बीच अंतर अभी भी मौजूद है, कानूनी क्षेत्र को लिंग-निष्पक्ष बनाकर समतल करना काफी अन्यायपूर्ण लग सकता है। हालाँकि, ऐसा न करने से उन लोगों के साथ अन्याय और अनभिज्ञता हो सकती है जो लैंगिक समावेशिता की कमी के कारण पीड़ित हैं।

ऐसी स्थिति से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है कि पहले दोनों पक्षों की दलीलों को स्वीकार किया जाए और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों के बारे में जागरूकता फैलाई जाए। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, सामान्य आबादी की अनभिज्ञता ऐसे कानूनी प्रावधानों के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है। इस प्रकार, शुरुआत करने के लिए सबसे अच्छी जगह जनता को उन अपराधों के बारे में शिक्षित करना है जो लिंग-निष्पक्ष भी हो सकते हैं।

इस तरह के जागरूकता अभियान लैंगिक समानता में अगले कदम के लिए मंच तैयार करने में बहुत मदद कर सकते हैं।

निष्कर्ष

समय की प्रगति के साथ-साथ लोगों की ज़रूरतें भी विकसित और बदल रही हैं। ऐसी स्थिति में, किसी राष्ट्र के कानूनी प्रावधानों को भी जनता की आवश्यकताओं के अनुसार बदलने और संशोधित करने की आवश्यकता होती है। वर्तमान स्थिति में, भारत ने अपने कानूनी प्रावधानों के माध्यम से हाशिए पर मौजूद लिंगों के उत्थान में भारी सुधार किया है। अब, लैंगिक समानता की दिशा में हमारे लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक अगला कदम हमारे प्रावधानों में लिंग-निष्पक्ष भाषा को शामिल करना है ताकि उन्हें बिना किसी सामान्यीकरण या पूर्वाग्रह के समावेशी बनाया जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

1. लिंग पहचान और यौन रुझान के बीच क्या अंतर है?

लिंग पहचान एक शब्द है जिसका उपयोग यह पहचानने के लिए किया जाता है कि कोई व्यक्ति लिंग के बारे में अपनी व्यक्तिगत भावना को कैसे व्यक्त करता है, जो कि उनके जैविक लिंग पर निर्भर नहीं है। चूँकि लिंग एक सामाजिक संरचना है, कोई भी व्यक्ति जिस संरचना से अधिक पहचान रखता है वही उसकी लैंगिक पहचान होगी। दूसरी ओर, यौन रुझान इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति किस लिंग के प्रति आकर्षित है। अगर कोई पुरुष किसी महिला की ओर आकर्षित होता है तो वह सीधा होता है। यदि वह किसी पुरुष के प्रति आकर्षित होता है, तो वह समलैंगिक है, और यदि वह पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति आकर्षित होता है, तो वह उभयलिंगी है। इसी तरह, कई अन्य यौन रुझान भी हैं, जैसे कई अन्य लिंग हैं।

2. लिंग-विशिष्ट कानूनों की क्या आवश्यकता है?

लिंग-विशिष्ट कानून, हालांकि भेदभावपूर्ण प्रकृति के हैं, उन लिंगों की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं जो ऐसे अपराधों और सामाजिक अन्याय के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। वे महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों जैसे हाशिए पर मौजूद लिंगों का उत्थान करके लैंगिक समानता को बढ़ावा देते हैं। वे वर्षों से उत्पीड़ित लिंगों के लिए क्षेत्र को समानता की दिशा में बढ़ाने के लिए एक कदम के रूप में कार्य करते हैं।

3. लिंग-विशिष्ट कानूनों की कमियाँ क्या हैं?

जबकि लिंग-विशिष्ट कानून हाशिए पर मौजूद लिंगों के लिए सुरक्षात्मक प्रावधानों के रूप में कार्य करते हैं, कई लोग उनका दुरुपयोग और दुरुपयोग करने का भी प्रयास करते हैं। यह इन प्रावधानों का उपयोग दूसरों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दर्ज करने और यहां तक कि दूसरों की मांगों का अनुपालन नहीं करने पर ऐसी शिकायतें दर्ज करने के लिए ब्लैकमेल करने के रूप में भी हो सकता है। इसके अलावा, ये लिंग-विशिष्ट कानून अक्सर उन लिंगों के अनुभवों को दबा सकते हैं जिनका उनके प्रावधानों के तहत उल्लेख नहीं किया गया है, जैसे कि आईपीसी की धारा 375 के तहत पुरुष और ट्रांसजेंडर बलात्कार पीड़ित।

संदर्भ

  • एम. सीरवई, भारत का संवैधानिक कानून, यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कंपनी, पुनर्मुद्रण 2013।
  • एम. बख्शी, द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया, यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कंपनी, 2014।
  • डॉ. जे.एन. पांडे, भारत का संवैधानिक कानून, केंद्रीय कानून एजेंसी, इलाहाबाद, 37वां संस्करण, 2001।

शेयर क्या है

यह लेख Prerna और Nimisha Dublis द्वारा लिखा गया है। इस लेख में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि शेयर क्या है और यह व्यवसायों को जनता से धन जुटाने में कैसे मदद करता है। यह लेख निवेशकों द्वारा पैसा बनाने के लिए इस शेयर के उपयोग से भी संबंधित है और इसमें शुरुआती लोगों जो शेयर बाजार में निवेश करने में रुचि रखते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि कहां से शुरू करें, के लिए एक प्रारंभक मार्गदर्शिका भी शामिल है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं और बदल रही हैं। ऐसे युग में जहां वित्त का प्रबंधन करना थोड़ा मुश्किल है, कोई भी व्यक्ति अपने वित्त को बढ़ावा देने के लिए बड़ी कंपनियों में शेयर ले सकता है। जैसा कि हम जानते हैं और कंपनी कानून में पढ़ा है, शेयर का मालिक होने का मतलब कंपनी के प्रमुख निर्णयों में अपनी राय रखना है। लेकिन मैं आपको यह बता दूं। यह इतना सीधा या आसान नहीं है। शेयरों की खरीद और बिक्री को नियंत्रित करने के लिए कई नियम और कानून हैं जिनका पालन करना पड़ता है। आजकल, निवेश कैसे करें, कहां निवेश करें आदि के बारे में मार्गदर्शन करने के लिए कई ट्रेडिंग ऐप्स उपलब्ध हैं, लेकिन व्यक्ति को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि वह किसके साथ काम कर रहा है। इसलिए शेयरों के बारे में आपके ज्ञान को बढ़ाने और उन्नत करने के लिए, यह लेख परिभाषाओं, प्रकारों, कानूनो, निवेश रणनीतियों और बहुत कुछ से निपटेगा। किसी व्यक्ति के लिए अपने पैसे को रणनीतिक रूप से प्रबंधित करने के लिए शेयर के विकास को समझना महत्वपूर्ण है। साथ ही, व्यक्ति को इसके कानूनी निहितार्थों के बारे में भी अत्यधिक जानकारी होनी चाहिए। 

शेयर क्या है?

शेयर किसी कंपनी में किसी व्यक्ति यानी शेयरधारक की हिस्सेदारी है। यह किसी कंपनी के सदस्य के हित का प्रतिनिधित्व करता है। यह किसी कंपनी में शेयरधारक के हितों से संबंधित है और प्रत्येक शेयरधारक को दिए जाने वाले लाभांश मूल्य की गणना करने में मदद करता है। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(84) एक शेयर को किसी कंपनी की शेयर पूंजी में एक हिस्से के रूप में परिभाषित करती है, और इसमें स्टॉक भी शामिल है। जबकि एक शेयर निवेशक द्वारा किसी कंपनी में स्वामित्व की इकाई का प्रतिनिधित्व करता है, सामान्य स्टॉक शेयर मतदान अधिकार में सक्षम करते हैं। निवेशक इन इकाइयों के बदले में पूंजी का आदान-प्रदान करता है। एक शेयर से विभिन्न अधिकार और देनदारियाँ जुड़ी होती हैं। शेयर चल संपत्ति हैं और आम तौर पर किसी कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) में निर्धारित तरीके से हस्तांतरणीय (ट्रांसफरेबल) प्रकृति के होते हैं।  

शेयर और स्टॉक शब्द अक्सर आम आदमी द्वारा परस्पर विनिमय (इंटरचैंजेबली) के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन कंपनी की शेयर पूंजी के प्रतिनिधित्व में उनकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। यह शुरू में भ्रमित करने वाला लग सकता है, लेकिन एक उदाहरण का उपयोग करके कोई भी इसे आसानी से समझ सकता है। उदाहरण के लिए, ABC कंपनी ने सार्वजनिक रूप से स्टॉक जारी किया, और श्री X ने इसके 10 शेयर खरीदे। अब, यदि प्रत्येक शेयर किसी कंपनी के 1% का प्रतिनिधित्व करता है, तो इस मामले में श्री X कंपनी के 10% का मालिक है। संक्षेप में, कंपनी ने स्टॉक जारी किया, और श्री X ने इसका एक शेयर खरीदा। आम आदमी, कंपनी द्वारा जारी किए जाने वाले वित्तीय लिखत (इंस्ट्रूमेंट) को संदर्भित करने के लिए स्टॉक शब्द का उपयोग करता है, जबकि शेयर वह हैं जो एक व्यक्ति वास्तव में खरीदता है। 

व्यवसाय शेयर क्यों जारी करते हैं?

जब कोई व्यवसाय एक निगम के रूप में स्थापित हो जाता है, तो मालिक शेयर जारी करके पूंजी जुटाने का विकल्प चुन सकते हैं। किसी कंपनी के स्टॉक को निवेशकों को बेचने योग्य बनाने के लिए शेयरों में विभाजित किया जाता है। कंपनियाँ शेयर जारी करती हैं क्योंकि वे स्वामित्व के बराबर होते हैं, ऋण के नहीं। इसलिए, यदि व्यवसाय को कुछ होता है तो शेयरधारकों को प्रतिपूर्ति (रिंबर्स) करने के लिए कंपनी पर कोई कानूनी निहितार्थ या दायित्व नहीं होगा। निजी तौर पर आयोजित कंपनियों में, संस्थापकों, साझेदारों और अधिकारियों के पास शेयर होते हैं। वे आम तौर पर कंपनी स्टॉक विकल्प के माध्यम से या कर्मचारियों को अन्य प्रोत्साहन के रूप में शेयर जारी करते हैं। ये भी विनियमित हैं, लेकिन भारतीय प्रतिभूति (सिक्योरिटी) और विनिमय (एक्सचेंज) मंडल की कठोर जांच से बाहर हैं । 

ये कंपनियाँ शेयर कैसे जारी करती हैं और उनका नियमन कैसे करती हैं

किसी कंपनी के निदेशक मंडल को शेयरों की एक विशिष्ट संख्या दी जाती है जिन्हें जारी किया जा सकता है। इन्हें अधिकृत शेयर पूँजी कहा जाता है। शेयर इस अधिकृत शेयर पूंजी से जारी किए जाते हैं और जारी किए गए शेयर कहलाते हैं। इसका मतलब यह है कि कंपनी के पास अधिकृत शेयर पूंजी के रूप में 10 लाख रुपये हो सकते हैं लेकिन फिर भी वह 8 लाख रुपये मूल्य के शेयर जारी करना चुनती है। इस अधिकृत पूंजी को बढ़ाने के लिए, कंपनी के आर्टिकल्स में संशोधन करने के लिए मंडल बैठकें और अन्य बैठकें आयोजित की जाती हैं। सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर आई.पी.ओ. (आरंभिक सार्वजनिक पेशकश) के माध्यम से स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध होते हैं। इस मामले में, कंपनी नियामकों द्वारा उच्च स्तर की जांच से गुजरती है और महंगी और समय लेने वाली दोनों है। इस पर लेख में आगे चर्चा की जाएगी।

स्टॉक क्या है

स्टॉक, जिसे आमतौर पर इक्विटी कहा जाता है, एक प्रकार की प्रतिभूति है जो कंपनी के स्वामित्व के एक छोटे हिस्से को दर्शाती है। जब आप किसी निगम से स्टॉक खरीदते हैं तो शेयर वह छोटा सा हिस्सा होता है जो आपके पास होता है; जब आप ऐसा करते हैं तो आप शेयरधारक बन जाते हैं।

शेयर पूंजी की श्रेणियां

कंपनी अधिनियम की धारा 43 के अनुसार, शेयरों द्वारा सीमित कंपनी की शेयर पूंजी दो प्रकार की होगी, अर्थात् इक्विटी शेयर पूंजी और वरीयता (प्रेफरेंस) शेयर पूंजी, जब तक कि किसी निजी कंपनी के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन या आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन में अन्यथा निर्दिष्ट न किया गया हो।

वरीयता शेयर पूंजी

वरीयता शेयर पूंजी का क्या मतलब है?

वरीयता शेयर, जिन्हें वरीयता स्टॉक के रूप में भी जाना जाता है, किसी कंपनी के स्टॉक के शेयर होते हैं जो नियमित स्टॉक पर लाभांश से पहले शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान करते हैं। वरीयता शेयरधारकों को एक निर्धारित राशि के रूप में लाभांश मिल सकता है। जब लाभांश प्राप्त करने की बात आती है तो वरीयता शेयरधारकों को इक्विटी शेयरधारकों पर “प्राथमिकता” दी जाती है। वरीयता शेयरधारक आम शेयरधारक से पहले कॉर्पोरेट परिसंपत्तियों (एसेट) से भुगतान प्राप्त करने के हकदार हैं और कंपनी के वरीयता शेयरों का एक निश्चित लाभांश होता है, जबकि आम इक्विटी में अक्सर ऐसा नहीं होता है। आम शेयरधारकों के विपरीत, वरीयता स्टॉकधारकों के पास आमतौर पर मतदान का अधिकार नहीं होता है। एकमात्र संकल्प जिन पर वरीयता शेयरधारक मतदान कर सकते हैं वे वे हैं जो सीधे तौर पर वरीयता शेयरों के रूप में उनके अधिकारों को प्रभावित करते हैं और वे जो व्यवसाय के परिसमापन (लिक्विडेशन) या पुनर्भुगतान के लिए कहते हैं।

वरीयता शेयरों के प्रकार

परिवर्तनीय वरीयता शेयर

परिवर्तनीय वरीयता स्टॉक के शेयर वे होते हैं जो आसानी से इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय होते हैं।

शेयरों को पहले से निर्धारित अवधि के बाद और कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुसार इक्विटी शेयरों में परिवर्तित किया जा सकता है। परिवर्तन की प्रक्रिया कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत दी गई होती है। 

गैर-परिवर्तनीय वरीयता शेयर

गैर-परिवर्तनीय सुविधा वाले वरीयता शेयरों को इक्विटी शेयरों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।

इन शेयरों को इक्विटी शेयरों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। इनमें लाभांश की एक निश्चित दर होती है, और धारकों को परिसमापन के समय परिसंपत्तियों पर पूर्व अधिकार होता है। 

प्रतिदेय (रिडीमेबल) वरीयता शेयर

वे शेयर जिन्हें जारी करने वाला व्यवसाय एक निर्धारित मूल्य और समय पर उन्हे वापस खरीद सकता है या प्रतिदेय कर सकता है, प्रतिदेय वरीयता शेयरों के रूप में जाने जाते हैं। ये शेयर मुद्रास्फीति (इनफ्लेशन) के खिलाफ एक कुशन के रूप में कार्य करके व्यवसाय को लाभ पहुंचाते हैं।

कीमत और शर्तों के साथ प्रतिदेय की प्रक्रिया का उल्लेख कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में किया गया है। वरीयता शेयरों के प्रतिदेय होने के बाद, कंपनी प्रतिदेय किए गए शेयरों की नाममात्र राशि तक शेयर जारी कर सकती है जैसे कि वे पहले कभी जारी नहीं किए गए थे। 

गैर प्रतिदेय वरीयता शेयर

गैर-प्रतिदेय वरीयता शेयर वे होते हैं जिन्हें जारी करने वाला निगम एक निश्चित तिथि पर प्रतिदेय या पुनर्खरीद नहीं कर सकता है। गैर-प्रतिदेय वरीयता शेयर मुद्रास्फीति की अवधि के दौरान व्यवसायों के लिए जीवनरक्षक हैं।

इन्हें सतत (परपेचुअल) वरीयता शेयरों के रूप में भी जाना जाता है। वे अपने साथ परिपक्वता (मैच्योरिटी) तिथि नहीं रखते हैं। उन्हें कंपनी के समापन के समय भुगतान किया जाता है। 

भागीदार वरीयता शेयर

जब कंपनी का परिसमापन हो जाता है और लाभांश अन्य शेयरधारकों को वितरित कर दिया जाता है, तो भागीदार वरीयता शेयर शेयरधारकों को बचे हुए लाभ का एक हिस्सा प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं।

हालाँकि, इक्विटी शेयरधारकों के साथ, इन शेयरधारकों को निर्धारित लाभांश और कंपनी के अधिशेष मुनाफे का एक हिस्सा भी मिलता है।

गैर-भागीदार वरीयता शेयर

ये शेयर शेयरधारकों को फर्म के अतिरिक्त मुनाफे से लाभांश प्राप्त करने का अतिरिक्त विकल्प प्रदान नहीं करते हैं; इसके बजाय, उन्हें कंपनी द्वारा दिया जाने वाला निश्चित लाभांश मिलता है।

संचयी (कम्युलेटिव) वरीयता शेयर

संचयी वरीयता शेयरों के रूप में जाने जाने वाले शेयर शेयरधारकों को पैसे खोने पर भी कंपनी से संचयी लाभांश भुगतान प्राप्त करने का अधिकार देते हैं।

जब कंपनी लाभ नहीं कमा रही होती है, तो इन लाभांश को बकाया के रूप में दर्ज किया जाता है और अगले वर्ष जब कंपनी लाभदायक होती है तो संचयी रूप से भुगतान किया जाता है।

गैर-संचयी वरीयता शेयर

गैर-संचयी वरीयता लाभांश का भुगतान शेयरों के बकाया के रूप में नहीं किया जाता है। इन शेयरों का लाभांश भुगतान कंपनी के चालू वर्ष के मुनाफे से किया जाता है।

समायोज्य (एडजस्टेबल) वरीयता शेयर

समायोज्य वरीयता शेयरों के लिए लाभांश दर परिवर्तनशील है और मौजूदा बाजार दरों से प्रभावित होती है।

ऐसे शेयरों पर लाभांश किसी कंपनी के वित्तीय कारकों पर निर्भर होता है, जैसे मुनाफा, प्रति शेयर आय, आदि। कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन के अनुसार लाभांश दरों में उतार-चढ़ाव होता है। इससे शेयरधारकों को समृद्ध समय में अधिक रिटर्न पाने का मौका मिलता है।

कंपनी को ऐसे शेयरों से निपटने में अधिक लचीलापन मिलता है क्योंकि वे सुचारू नकदी प्रवाह प्रदान करते हैं और लाभ वितरण उस वर्ष कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन के अनुसार किया जाता है।

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वरीयता शेयरों की विशेषताएं

वरीयता शेयर कई लाभ प्रदान करते हैं जिससे नियमित निवेशकों को धीमी आर्थिक विकास अवधि के दौरान भी उनसे बेहतर प्रदर्शन करने की अनुमति मिलती है। वरीयता शेयर लाभों की निम्नलिखित सूची सबसे आकर्षक है:

वे सामान्य स्टॉक में परिवर्तित हो जाते हैं

वरीयता शेयरों को साधारण स्टॉक में परिवर्तित करना सरल है। यदि कोई शेयरधारक अपनी होल्डिंग स्थिति को संशोधित करना चाहता है तो उसके शेयरों को वरीयता शेयरों की एक निर्धारित संख्या में बदल दिया जाता है।

निवेशकों को सूचित किया जाता है कि कुछ वरीयता शेयरों को एक निश्चित तिथि के बाद किसी भी समय परिवर्तित किया जा सकता है, जबकि अन्य शेयरों को परिवर्तित करने के लिए निदेशक मंडल की सहमति की आवश्यकता हो सकती है।

लाभांश भुगतान

वरीयता शेयरों के साथ, शेयरधारक लाभांश भुगतान प्राप्त कर सकते हैं जब अन्य शेयरधारक बाद में लाभांश प्राप्त नहीं करेंगे या प्राप्त कर सकते हैं।

लाभांश की प्राथमिकता

इक्विटी और अन्य शेयरधारकों के विपरीत, वरीयता शेयरधारकों को पहले लाभांश प्राप्त करने का महत्वपूर्ण लाभ होता है।

असामान्य परिस्थितियों की स्थिति में, मतदान अधिकार वरीयता वाले शेयरधारक वोट देने की क्षमता रखते हैं। हालाँकि, यह शायद ही कभी-कभार होने वाली घटना है। आम तौर पर, किसी फर्म में शेयर खरीदने से आपको कंपनी के प्रबंधन में मतदान का विशेषाधिकार नहीं मिलता है।

मतदान अधिकार

असाधारण घटनाओं की स्थिति में, वरीयता शेयरधारक वोट देने के अवसर के हकदार हैं। हालाँकि, ऐसा कभी-कभार ही होता है। आम तौर पर, किसी फर्म में शेयर खरीदने से आपको कंपनी के प्रबंधन में मतदान का विशेषाधिकार नहीं मिलता है।

परिसंपत्ति पर वरीयता

परिसमापन की स्थिति में किसी कंपनी की परिसंपत्ति पर चर्चा करते समय वरीयता शेयरधारकों को गैर-वरीयता शेयरधारकों पर प्राथमिकता दी जाती है।

इक्विटी शेयर पूंजी

निवेशकों के लिए एक आम निवेश विकल्प इक्विटी शेयर है। निगम का एक हिस्सा इक्विटी शेयरों के रूप में उपलब्ध है। परिणामस्वरूप, इक्विटी स्टॉकधारकों को स्वामित्व समूह का एक हिस्सा माना जाता है। आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) का उपयोग पहले आम जनता (आई.पी.ओ.) को इक्विटी शेयर जारी करने के लिए किया जाता है। सूचीबद्ध होने के बाद इक्विटी शेयरों का कारोबार शुरू हो जाता है। इस लेख में इक्विटी शेयरों की विशेषताओं और प्रकारों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

इक्विटी शेयर

इक्विटी शेयर पूंजी में सभी शेयर पूंजी शामिल होती है, जो वरीयता शेयर पूंजी नहीं है। इक्विटी शेयरों को साधारण शेयरों के रूप में भी जाना जाता है और ये कंपनी में स्वामित्व के मूल रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन शेयरों के पास कुछ अधिकार होते हैं, जैसे लाभांश, मतदान अधिकार, परिसमापन (लिक्विडेशन) के समय कंपनी की संपत्ति में हिस्सेदारी, आदि। 

कंपनी का एक शेयर हासिल करने के लिए, निवेशक इक्विटी शेयर खरीदना चाहते हैं। उन्हें कंपनी के इक्विटी भाग में शेयर मिलता है। दूसरे अर्थ में हम कह सकते हैं कि इन शेयरों को रखने से वे कंपनी के मालिक बन जाते हैं। कंपनी के विस्तार और विकास के लिए धन जुटाने के इरादे से इक्विटी शेयर जारी किए जाते हैं। कंपनी इन शेयरों को आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) के जरिए यानी आम जनता और निवेशकों के लिए जारी करती है। जैसे ही स्टॉक आवंटित और स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हो जाते हैं, आप आसानी से उनका व्यापार कर सकते हैं। भारत में लोकप्रिय स्टॉक एक्सचेंजों में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एन.एस.ई.) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बी.एस.ई.) शामिल हैं। कंपनी का मूल्य इक्विटी शेयर के अंकित मूल्य या बुक मूल्य से निर्धारित होता है। खरीद बढ़ने से शेयर की कीमत बढ़ जाती है। बाजार में, इन शेयरों का व्यापार करते समय, कीमतें बाजार की ताकतों, यानी मांग और आपूर्ति द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

एक निवेशक कंपनी में पूंजी वृद्धि से लाभ पाने के लिए निवेश करता है यदि उसकी विकास संभावनाएं मजबूत हैं, और इसी तरह जैसे ही कंपनी का प्रदर्शन गिरता है तो वह शेयर वापस ले लेता है। बाज़ार को समझने के लिए, किसी को बाज़ार और कंपनी के वित्तीय विवरणों का बुनियादी ज्ञान होना चाहिए। यह निर्धारित करने के लिए कि यह एक निवेश योग्य उद्यम (वेंचर) है या नहीं, कंपनी के प्रदर्शन की सराहना करने में सक्षम होना चाहिए।

इक्विटी शेयर के प्रकार

इक्विटी शेयर कई प्रकार के होते हैं:

साधारण शेयर

लंबी अवधि के खर्चों को पूरा करने के लिए धन जुटाने के लिए एक फर्म जो शेयर जारी करती है, उन्हें साधारण शेयर के रूप में जाना जाता है। निवेशकों को कंपनी का एक शेयर प्राप्त होता है। यह राशि उस समय रखे गए शेयरों की संख्या को संदर्भित करती है। मतदान का विशेषाधिकार साधारण शेयरधारकों को उपलब्ध होता है।

वरीयता शेयर

वरीयता इक्विटी शेयर गारंटी देते हैं कि निवेशकों को आम शेयरधारकों से पहले संचयी (कम्युलेटिव) लाभांश प्राप्त होगा। दूसरी ओर, वरीयता शेयरधारकों के पास नियमित शेयरधारकों के समान सदस्यता और मतदान विशेषाधिकार नहीं होते हैं।

वरीयता शेयर दो प्रकार के होते हैं: भागीदार और गैर-भागीदार। जो निवेशक भागीदारी वरीयता शेयर खरीदते हैं वे पूर्व निर्धारित लाभ के साथ-साथ बोनस रिटर्न के भी हकदार होते हैं। ये पुरस्कार किसी विशेष वित्तीय वर्ष के दौरान कंपनी के प्रदर्शन पर निर्भर होते हैं। जो इक्विटी शेयरधारक गैर-भागीदार होते हैं उन्हें यह लाभ नहीं मिलता है।

इसके अलावा, जब कोई निगम विघटित हो जाता है या परिचालन (ऑपरेशन) बंद कर देता है, तो वरीयता मालिकों को उनकी पूंजी वापस मिल जाती है।

बोनस स्टॉक 

किसी निगम द्वारा अपनी रखी गई कमाई से जारी किए गए एक प्रकार के इक्विटी शेयर को बोनस शेयर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, एक निगम अपनी कमाई को वितरित करने के तरीके के रूप में बोनस शेयर जारी करता है। हालाँकि, अन्य स्टॉक शेयरों के विपरीत, इससे कंपनी का बाज़ार पूंजीकरण नहीं बढ़ता है।

शेयर ऑफ राइट 

हर कोई राइट शेयरों के लिए उपयुक्त नहीं है। निगम ये शेयर केवल कुछ उच्च-स्तरीय निवेशकों को जारी करता है। परिणामस्वरूप ऐसे धारकों की इक्विटी शेयर बढ़ जाती है। राइट्स कम लागत पर जारी हो जाता है। इसका लक्ष्य वित्त पोषण (फंडिंग) की जरूरतों को पूरा करने के लिए धन जुटाना है।

स्वेट इक्विटी

स्वेट इक्विटी शेयर किसी कंपनी के निदेशकों और कर्मचारियों को दिए जाते हैं। कंपनी को बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) अधिकार, जानकारी या मूल्य सुधार प्रदान करने में उनके अच्छे काम के लिए, उन्हें छूट पर शेयर प्राप्त होते हैं।

कर्मचारी स्टॉक विकल्प (ई.एस.ओ.पी.)

ई.एस.ओ.पी. एक निगम द्वारा अपने कर्मचारियों को प्रतिधारण (रिटेंशन) रणनीति और इनाम के रूप में प्रदान किए जाते हैं। ई.एस.ओ.पी. के नियमों के तहत, कर्मचारियों को बाद की अवधि में पूर्व निर्धारित मूल्य पर शेयर खरीदने का विकल्प दिया जाता है।

इक्विटी शेयरों की विशेषताएं

ये इक्विटी शेयरों की मुख्य विशेषताएं हैं:

सतत शेयर 

इक्विटी शेयर सतत प्रकृति के होते हैं। शेयर किसी कंपनी की दीर्घकालिक संपत्ति होते हैं और व्यवसाय बंद होने पर ही वापस मिलते हैं।

महत्वपूर्ण मुनाफ़ा

इक्विटी शेयरों में शेयरधारकों को महत्वपूर्ण रिटर्न प्रदान करने की क्षमता होती है। हालाँकि, ये खतरनाक निवेश संभावनाएँ हैं। इसलिए इक्विटी शेयर बहुत अस्थिर होते हैं। मूल्य परिवर्तन अचानक हो सकते हैं और विभिन्न आंतरिक और बाहरी कारकों से प्रभावित होते हैं। जिन निवेशकों के पास जोखिम सहन करने का उचित स्तर है, उन्हें ही इनमें निवेश के बारे में सोचना चाहिए।

लाभांश 

एक इक्विटी शेयरधारक को कंपनी के मुनाफे का एक हिस्सा प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, कोई व्यवसाय अपने शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान करने के लिए अपने वार्षिक मुनाफे का उपयोग कर सकता है। हालाँकि, किसी व्यवसाय को लाभांश का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई निगम अच्छा मुनाफा नहीं कमाता है और उसके पास अतिरिक्त नकदी प्रवाह नहीं है तो वह अपने शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान नहीं करने का निर्णय ले सकता है।

मतदान अधिकार 

मतदान अधिकार अक्सर इक्विटी शेयरधारकों को उपलब्ध होते हैं। इससे वे चुन सकते हैं कि व्यवसाय कौन चलाएगा। सक्षम प्रबंधकों का चयन करके व्यवसाय अपना वार्षिक कारोबार बढ़ा सकता है। इसलिए निवेशकों को उच्चतर औसत लाभांश आय देखने की उम्मीद करनी चाहिए।

अतिरिक्त कमाई

निगम द्वारा किया गया कोई भी अतिरिक्त लाभ इक्विटी शेयरधारकों में वितरित किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, निवेशक की संपत्ति बढ़ती है।

चलनिधि (लिक्विडिटी) 

इक्विटी शेयर अत्यंत नकदी निवेश हैं। स्टॉक एक्सचेंजों पर शेयरों का कारोबार होता है। इसलिए, आप बाजार समय के दौरान किसी भी समय शेयर खरीद और बेच सकते हैं। परिणामस्वरूप, किसी को अपना स्टॉक बेचने के बारे में चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।

सीमित दायित्व

किसी कंपनी के घाटे से आम शेयरधारक प्रभावित नहीं होते हैं। दूसरे शब्दों में, शेयरधारक व्यवसाय के ऋण दायित्वों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। इक्विटी की कीमत नीचे है, और यही एकमात्र प्रभाव है। इससे शेयरधारक के निवेश पर रिटर्न पर असर पड़ेगा।

इक्विटी शेयर और वरीयता शेयर के बीच अंतर

क्र.सं. अंतर के आधार इक्विटी शेयर  वरीयता शेयर 
1 अर्थ ये कंपनी के साधारण शेयर हैं जो कंपनी के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वे शेयर हैं जो लाभांश भुगतान और पूंजी के पुनर्भुगतान के संबंध में उन पर वरीयता अधिकार रखते हैं।
2 लाभांश की दर लाभ की उपलब्धता के आधार पर यह साल-दर-साल भिन्न हो सकता है। लाभांश का भुगतान एक निश्चित दर पर किया जाता है।
3 लाभांश का बकाया पिछले लाभांश के लिए कोई बकाया नहीं दिया जाता है। संचयी वरीयता वाले शेयरधारकों को पहले से भुगतान न किए गए लाभांश पर बकाया मिल सकता है।
4 प्रतिदेय  उन्हें प्रतिदेय नहीं किया जा सकता। शेयर पूंजी में कटौती की छूट है, जिसके तहत उन्हें प्रतिदेय किया जा सकता है। इन्हें आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के नियमों और शर्तों के अनुसार प्रतिदेय किया जा सकता है।
5 मतदान उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त है। उन्हें मतदान सहित कंपनी की प्रबंधन गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार नहीं है।
6 लाभांश का भुगतान लाभांश का भुगतान वरीयता शेयरधारकों को भुगतान करने के बाद ही किया जाता है। उन्हें इक्विटी शेयरधारकों से पहले लाभांश पर वरीयता अधिकार प्राप्त है।

निजी कंपनियों द्वारा शेयर जारी करना

एक निजी कंपनी शेयर जारी कर सकती है और शेयरधारकों को इसके सदस्यों और मालिकों के रूप में रख सकती है लेकिन शेयरों का सार्वजनिक एक्सचेंजों पर कारोबार नहीं किया जा सकता है। निजी कंपनियों के मामले में, शेयर आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) के माध्यम से जारी नहीं किए जाते हैं। सार्वजनिक कंपनियों और सार्वजनिक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध शेयरों की तुलना में, निजी कंपनी के शेयर कम नकद प्रकृति के होते हैं। इसका कारण यह है कि इनमें केवल कुछ करीबी निवेशकों के बीच ही कारोबार होता है और खुली सार्वजनिक भागीदारी की अनुमति नहीं है। सार्वजनिक कंपनी की तुलना में निजी कंपनी के शेयरों का बाजार मूल्य निर्धारित करना संभव नहीं है। 

प्राइवेट प्लेसमेंट

जैसा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 42 के तहत उल्लिखित है, कंपनियां प्राइवेट प्लेसमेंट के माध्यम से शेयर जारी कर सकती हैं। एक कंपनी केवल चुनिंदा व्यक्तियों को प्रतिभूतियां खरीदने के लिए बोली या निमंत्रण देती है। यह प्राइवेट प्लेसमेंट के लिए एक सेवा अनुबंध की पेशकश के द्वारा किया जाता है। प्रक्रिया को अधिनियम की धारा 42 में बताई गई सभी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। वित्तीय वर्ष के दौरान कुल मिलाकर अधिकतम 200 लोगों को यह निमंत्रण दिया जा सकता है। कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ई.एस.ओ.पी.) योजना के तहत कर्मचारियों को इस 200 के आंकड़े से बाहर रखा गया है। योग्य संस्थागत खरीदार भी शामिल नहीं हैं। प्राइवेट प्लेसमेंट पत्र प्रस्तावित होने से पहले एक ऑनलाइन आवेदन किया जाना चाहिए। ऑनलाइन आवेदन स्पष्ट रूप से उस व्यक्ति को संबोधित होना चाहिए जिसे प्रस्ताव दिया जा रहा है और इसे कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उस व्यक्ति के नाम के पंजीकरण की तारीख से 30 दिनों के भीतर जमा करना होगा। 

बोली लगाने वाले व्यक्तियों को सीधे बैंक खाते से प्रतिभूतियां खरीदनी चाहिए और लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड कंपनी द्वारा रखा जाना चाहिए। आवेदन से धन प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर शेयर आवंटित किए जाएंगे। 

स्वेट इक्विटी शेयर जारी करना

अधिनियम की धारा 54 के अनुसार स्वेट इक्विटी शेयर कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों को दिए जा सकते हैं। स्वेट इक्विटी शेयरों के आवंटन के लिए एक विशेष प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। यह इसके पारित होने की तारीख से 12 महीने की अवधि के लिए प्रभावी होगा। वे आवंटन की तारीख से कम से कम 3 वर्ष की अवधि के लिए बंद और गैर हस्तांतरणीय हो जाते हैं। कीमतें लाइसेंस प्राप्त मूल्यांकनकर्ता द्वारा उद्योग के मानकों के अनुसार और उचित रूप से तय की जाती हैं। 

बोनस शेयर जारी करना 

कंपनी के शेयरधारकों को धारा 63 के तहत बोनस शेयर जारी किए जाते हैं। अतिरिक्त पूंजी निवेश किए बिना बोनस शेयर दिए जाते हैं। ये शेयरधारकों के मौजूदा शेयर के अनुसार जारी किए जाते हैं। ये कंपनी के मुक्त भंडार, प्रीमियम प्रतिभूति खाते और पूंजी प्रतिदेय खाते से जारी किए जाते हैं। 

राइट्स इश्यू

कंपनी अधिनियम की धारा 62 राइट्स इश्यू की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है और शेयरधारकों को इस प्रकार के शेयरों की सदस्यता लेने का पूर्व-अधिकार भी देती है। यह कंपनी की ओर से अपने मौजूदा शेयरधारकों को कंपनी में निवेश करने और अतिरिक्त शेयर खरीदने के लिए एक औपचारिक निमंत्रण है। कंपनी अभिदत्त (सब्सक्राइब) पूंजी जुटाने के लिए शेयरधारकों की शेयरधारिता के अनुपात में ये शेयर जारी करती है। आम तौर पर, इन्हें शेयरों के मौजूदा बाजार मूल्य से कम कीमत पर पेश किया जाता है। यह उस कंपनी के लिए सबसे उपयुक्त प्रकार का शेयर है जो बिना किसी अतिरिक्त लागत के अधिक धन जुटाना चाहती है। बैंकों या वित्तीय संस्थानों से पैसा उधार लेने के बजाय यह अधिक व्यवहार्य विकल्प प्रतीत होता है। इससे दस्तावेज़ीकरण और अनुपालन आवश्यकताओं को कम करने में मदद मिलती है। 

ऋण में परिवर्तन

एक निजी कंपनी जारी किए गए डिबेंचर से लिए गए ऋण को कंपनी के शेयरों में परिवर्तित करती है। ऐसा कंपनी के सदस्यों और शेयरधारकों द्वारा एक विशेष प्रस्ताव पारित करने के बाद ही हो सकता है। समझौते की शर्तों के साथ-साथ आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में भी यह खंड होना चाहिए तभी यह मान्य होगा।

आई.पी.ओ. प्रक्रिया के माध्यम से सार्वजनिक कंपनी द्वारा शेयर जारी करना

निवेश बैंकरों और निम्नांकक (अंडरराइटर) की नियुक्ति

निवेश बैंकर और निम्नांकक वे विशेषज्ञ होते हैं जो अपनी ओर से किसी कंपनी के लिए आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) की पूरी प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। ये कंपनी और निवेशकों के बीच मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) हैं।

पंजीकरण

कंपनी और निवेश बैंक द्वारा एक पंजीकरण विवरण तैयार किया जाता है। रेड हेरिंग संकल्प (प्रॉस्पेक्टस) (आरएचपी) के रूप में जाना जाने वाला एक प्रारूप संकल्प भी तैयार किया जाता है और यह खुदरा (रिटेल) विक्रेता के लिए प्रस्ताव का मूल्यांकन करने के लिए सबसे आवश्यक दस्तावेज है। इसमें शेयरों की कीमत और मात्रा को छोड़कर कंपनी के सभी विवरण शामिल हैं। इन्हें कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 32 के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है।

बोली लगाने के लिए प्रस्ताव को जनता के लिए खोलने से कम से कम 3 दिन पहले आरएचपी को आरओसी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। संकल्प में किसी भी बदलाव को आरओसी और सेबी दोनों द्वारा उजागर और अनुमोदित किया जाना चाहिए। एक बार बोली बंद होने के बाद, कंपनी आरओसी और सेबी दोनों को अंतिम संकल्प जमा कर देगी। 

कूलिंग ऑफ की अवधि

सेबी और आरओसी के पास संकल्प दाखिल करने के बाद, कूलिंग ऑफ अवधि आती है जिसमें सेबी जारी करने के दौरान कंपनी द्वारा बताए गए तथ्यों और विवरणों की पुष्टि करता है। इसकी किसी भी त्रुटि, चूक और विसंगतियों को इंगित किया जाता है। सेबी द्वारा आवेदन को मंजूरी दिए जाने के बाद कंपनी आरंभिक सार्वजनिक पेशकश के लिए तारीख तय कर सकती है।

स्टॉक एक्सचेंज के लिए आवेदन

आरंभिक जारी करने के लिए स्टॉक एक्सचेंज में एक आवेदन दायर किया जाता है। 

चर्चा करना

भव्य आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) के लिए चर्चा होती है और पूरे निवेशक मंडल में उत्साह होता है। आई.पी.ओ. की मंजूरी के बाद, निवेश बैंकर और निम्नांकक कार्रवाई में लग जाते हैं। उन पर आई.पी.ओ. के बारे में प्रचार-प्रसार करने की जिम्मेदारी होती है। संभावित निवेशक आश्वस्त होते हैं। कंपनी व्यवसाय की विकास संभावनाओं और बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के अपने लक्ष्य पर प्रकाश डालती है। कई कंपनियां काम पूरा करने के लिए व्यवसाय विश्लेषकों और वित्त प्रबंधकों को नियुक्त करती हैं। कंपनियां प्लवमान (फ्लोटिंग) से कुछ दिन पहले निवेशकों के प्रश्नों के लिए छोटी समूह बैठकें भी आयोजित करती हैं। 

प्रमोशन पूर्व (प्री-लॉन्च) आवश्यकताएँ

कंपनियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि कंपनी के अंदरूनी सूत्र आरंभिक सार्वजनिक पेशकश की जानकारी और विवरणों का व्यापार न करें जो गोपनीय हैं क्योंकि यह भ्रष्ट अधिकारियों को सामान्य खरीदारों की कीमत पर अधिक कीमत वाले शेयरों को गिरवी रखने से रोकता है। यह बाज़ार को बहुत सारे शेयरों से भर जाने से बचाता है जो प्राकृतिक मांग-आपूर्ति (डिमांड -सप्लाई) संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। 

आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) का प्लवमान

अंत में, जारी किए गए को प्राथमिक बाज़ार में प्लवमान किया जाता है और निवेशकों से पैसा जुटाया जाता है। बोली की अवधि आमतौर पर 5 दिन (व्यावसायिक कार्य दिवस) होती है। 

आई.पी.ओ. शेयर बोली के आखिरी दिन के 10 दिनों के भीतर आवंटित किए जाते हैं। ओवरसब्सक्रिप्शन के मामले में, शेयरों को अनुपात में आवंटित किया जाता है। 

यह सब एक महीने लंबी प्रक्रिया है और कंपनी को प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आई.पी.ओ.) जारी करने के प्रावधानों का पालन करने के लिए सभी कागजी कार्रवाई और अंतहीन कानूनी काम करने की आवश्यकता होती है। 

शेयर वापस खरीदना 

अभी तक हमने देखा कि कोई कंपनी शेयर कैसे जारी करती है और उनके प्रकार क्या होते हैं। अब, जब कोई कंपनी बाज़ार से अपने शेयर वापस लेना चाहती है और बाज़ार से अपने शेयर वापस खरीदती है तो उसे शेयरों की वापस खरीदना कहा जाता है। कंपनी शेयरधारकों को शेयरों का बाजार मूल्य भुगतान करती है। स्टॉक को वापिस खरीदना किसी कंपनी के लिए अपने आप में पुनर्निवेश करने का एक तरीका है। 

वापिस खरीदना मुख्य रूप से अधिशेष (सरप्लस) नकदी जवाबदेही, कंपनी के शेयर मूल्य में वृद्धि और अधिग्रहण बोलियों को हतोत्साहित करने के उद्देश्यों के लिए किया जाता है। 

अब, शेयरों को वापस खरीदने के लिए उपयोग की जाने वाली नकदी या धन को कंपनी की नियमित कमाई से नहीं निकाला जाता है। इसे फ्री रिज़र्व, प्रतिभूतियो प्रीमियम खाते और किसी भी इश्यू की आय से निकालना होगा। आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में वापस खरीदने की अनुमति होनी चाहिए, और अधिकतम वापस खरीद चुकता शेयर पूंजी और फ्री रिजर्व का 25% हो सकता है। बैठक में शेयरधारकों द्वारा एक विशेष प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव के साथ, ऋण चुकाने की क्षमता के एक बयान पर दो निदेशकों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। उनमें से एक प्रबंध निदेशक होना चाहिए। साथ ही, शेयर की वापिस खरीद केवल मौजूदा शेयरधारकों से ही हो सकती है। 

प्रीमियम और छूट पर शेयर जारी करना

प्रीमियम पर शेयर जारी करना

आम तौर पर, कंपनी द्वारा शेयर के बराबर या अंकित मूल्य पर शेयर जारी किए जाते हैं। पर यह मामला हमेशा नहीं होता। कभी-कभी, शेयर उस मूल्य पर जारी किए जाते हैं जो शेयर के नाममात्र मूल्य से अधिक होता है, जिसे प्रीमियम में लापता शेयर के रूप में जाना जाता है। कंपनी अधिनियम की धारा 52 में प्रीमियम शेयर के प्रावधान शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि प्रीमियम पर शेयर जारी करने से जो भी प्रीमियम प्राप्त होगा उसे एक अलग प्रतिभूति प्रीमियम खाते में हस्तांतरित कर दिया जाएगा

छूट पर शेयर

अधिनियम की धारा 53 के अनुसार, छूट पर शेयर जारी करना निषिद्ध है। यदि कोई कंपनी या अधिकारी ऐसा करता है तो इस धारा में जुर्माने का भी प्रावधान है। कंपनी उस व्यक्ति को, जिसे ऐसे शेयर जारी किए गए हैं, ऐसे शेयरों को जारी करने की तारीख से 12% प्रति वर्ष ब्याज के साथ वापस करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। हालाँकि, अधिनियम की धारा 54 में एक अपवाद है जो है: स्वेट इक्विटी शेयर, लेनदारों को शेयर जारी करना, छूट पर राइट्स इश्यू और बिक्री की पेशकश है। 

शेयर का हस्तांतरण और प्रसारण (ट्रांसमिशन) 

शेयरों का हस्तांतरण

किसी परिसंपत्ति की भौतिक गतिविधि को हस्तांतरण के रूप में जाना जाता है। शेयरों के मामले में यह गतिविधि स्वैच्छिक या कानून द्वारा परिचालनात्मक (ऑपरेशनल) हो सकती है। शेयरों का हस्तांतरण शेयरों के मालिक/धारक द्वारा स्वेच्छा से होता है। यह कार्य अनुबंध के माध्यम से किया जाता है। शेयरों का हस्तांतरण किसी शेयर के स्वामित्व का जानबूझकर किया गया हस्तांतरण है। लेन-देन हस्तांतरणकर्ता (ट्रांसफेरर) और हस्तांतरिती (ट्रांसफरी) (जो शीर्षक प्राप्त करता है) के बीच होता है। किसी निजी कंपनी के शेयर कुछ शर्तों को छोड़कर प्रकृति में हस्तांतरणीय नहीं होते हैं। जबकि किसी सार्वजनिक कंपनी के शेयर स्वतंत्र रूप से हस्तांतरणीय होते हैं जब तक कि कंपनी द्वारा उचित औचित्य के साथ अनुमति न दी जाए। शेयरों के हस्तांतरण के लिए एक हस्तांतरण विलेख (डीड) निष्पादित करना होता है। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 56 के साथ कंपनी (शेयर पूंजी और डिबेंचर) नियम, 2014 के नियम 11 के अनुसार, शेयरों के हस्तांतरण के लिए किसी को एक विशेष फॉर्म एसएच-4 दाखिल करना होगा। फॉर्म पर विधिवत मुहर लगी होनी चाहिए, सही ढंग से भरा जाना चाहिए और लेनदेन में शामिल दोनों व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए। फॉर्म हस्ताक्षर करने की तारीख से 60 दिनों के भीतर कंपनी को जमा करना होगा। यदि हस्तांतरित शेयरों का पूरा भुगतान नहीं किया गया है तो फॉर्म एसएच-5 के तहत एक आवेदन प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसके बाद कंपनी उस व्यक्ति को इस बारे में सूचित करती है जिसे शेयर हस्तांतरण किए जा रहे हैं। अब हस्तांतरणकर्ता के पास हस्तांतरण को मंजूरी देने के लिए 2 सप्ताह की समयावधि होती है। कंपनी को आवेदन की प्राप्ति या आवेदन की तारीख से 1 महीने के भीतर प्रमाण पत्र वितरित करना आवश्यक है, जब तक कि कानून के किसी प्रावधान या अदालत/न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा निषिद्ध न हो।

शेयरों का प्रसारण

शेयरों का प्रसारण कानून के संचालन के कारण होता है। ऐसा शेयर धारक की मृत्यु होने पर या धारक के दिवालिया या पागल हो जाने की स्थिति में होता है। ऐसा तब भी हो सकता है जब धारक एक ऐसी कंपनी हो जिसका समापन हो चुका हो। किसी व्यक्ति की मृत्यु के मामले में शेयर कानूनी प्रतिनिधि के नाम पर हस्तांतरित हो जाते हैं और दिवालिया होने की स्थिति में यह आधिकारिक समनुदेशिती (असाइनी) के नाम पर हस्तांतरित हो जाते हैं। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 56, कंपनी (शेयर पूंजी और डिबेंचर) नियम, 2014 के नियम 11 के साथ पठित, आवेदन प्रक्रिया से संबंधित है। प्रसारण तब होगा जब दायर किए गए प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ शेयरों के प्रसारण का आवेदन वैध होगा। इस मामले में, निष्पादन विलेख की आवश्यकता नहीं है। आवश्यक दस्तावेज़ इस प्रकार हैं- 

  1. शेयरों के धारक/मालिक के मृत्यु प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति
  2. पैन की स्वप्रमाणित प्रति
  3. न्यायालय का आदेश (यदि लागू हो)
  4. उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (यदि लागू हो)
  5. वसीयत का प्रोबेट (यदि लागू हो)
  6. वसीयत (यदि लागू हो)
  7. प्रशासन पत्र (यदि लागू हो)
  8. उत्तराधिकारी के हस्ताक्षर का नमूना

कंपनी को आवेदन की प्राप्ति या आवेदन की तारीख से 1 महीने के भीतर प्रमाणपत्र वितरित करना आवश्यक है, जब तक कि कानून के किसी प्रावधान या अदालत/न्यायाधिकरण द्वारा निषिद्ध न हो।

शेयरों के हस्तांतरण और शेयरों के प्रसारण के बीच अंतर

क्र.सं. अंतर के आधार शेयरों का हस्तांतरण शेयरों का प्रसारण
1 परिभाषा यह शेयरों के स्वामित्व शीर्षक को किसी अन्य व्यक्ति (हस्तांतरिती) को हस्तांतरित करने का एक भौतिक और स्वैच्छिक कार्य है शेयरों को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित करने के लिए यह कानून द्वारा क्रियाशील है।
2 प्रकृति स्वैच्छिक कार्य कानून द्वारा परिचालन
3 आरंभकर्ताओं हस्तांतरणकर्ता और हस्तांतरिती कानूनी उत्तराधिकारी और प्राप्तकर्ता
4 यह कैसे होता है यह पक्षों का जानबूझकर किया गया कार्य है। यह दिवालियेपन, पागलपन, मृत्यु, परिसमापन या विरासत के कारण होता है।
5 प्रतिफल (कंसीडरेशन) हां, प्रतिफल तो होना ही चाहिए। नहीं
6 हस्तांतरण विलेख अनिवार्य है। यह अनिवार्य नहीं है।
7 स्टाम्प शुल्क स्टांप शुल्क शेयरों के बाजार मूल्य पर देय है। स्टाम्प शुल्क देय नहीं है।

शेयरों की जब्ती और समर्पण (सरेंडर)

शेयर की जब्ती

यदि कोई शेयरधारक आवंटन राशि या कॉल मनी या उसके द्वारा रखे गए शेयरों पर देय किसी भी हिस्से का भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसके शेयर जब्त किए जा सकते हैं और एक प्रस्ताव पारित करके निदेशक मंडल ऐसा कर सकता है। कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन को उन्हें ऐसा करने के लिए सशक्त बनाना चाहिए। इस प्रकार, ज़ब्ती का मतलब शेयरों को जब्त करना है यदि कोई शेयरधारक आवंटन या कॉल मनी का भुगतान करने में चूक करता है। इस मामले में, भुगतान की गई आंशिक राशि शेयरधारक को वापस नहीं की जाती है और उसका नाम सदस्यों के रजिस्टर से हटा दिया जाता है। ज़ब्ती केवल तभी मान्य होगी जब यह कंपनी के आर्टिकल्स में हो, चूक कर रहे शेयरधारक को ज़ब्ती का नोटिस दिया गया हो, मंडल का एक प्रस्ताव पारित किया गया हो और इरादे सच्चे हों। 

शेयरों का समर्पण

यह कंपनी को शेयर लौटाने की एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है। यह आमतौर पर तब होता है जब शेयरधारक को पता चलता है कि वह शेयरों पर भविष्य की कॉल का भुगतान करने में असमर्थ होगा। इस प्रक्रिया का सार ज़ब्ती के समान है, लेकिन कंपनी द्वारा शेयरधारक के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, शेयरधारक स्वयं प्रक्रिया शुरू करता है। हालाँकि, कोई कंपनी सर्वसम्मति से समर्पण स्वीकार नहीं कर सकती। इसके लिए कुछ शर्तें और प्रतिबंध हैं। उदाहरण के लिए, इसे आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत अधिकृत किया जाना चाहिए। यदि समर्पण को अवैध माना जाता है, तो अदालत सदस्यों के रजिस्टर में शेयरधारक का नाम बहाल करने का आदेश दे सकती है। 

शेयरों की जब्ती और शेयरों के समर्पण के बीच अंतर है। ज़ब्ती तब होती है जब शेयरधारक किस्तों का भुगतान करने में विफल रहता है जिसके परिणामस्वरूप अंततः उसका शेयर आवंटन रद्द हो जाता है। जबकि, शेयरों का समर्पण तब होता है जब शेयरधारक अपने शेयरों को रद्दीकरण के लिए स्वयं वापस कर देते हैं। शेयरों की जब्ती को रोकने के लिए कोई व्यक्ति अपने शेयर का समर्पण कर सकता है। समर्पण को पूंजी की कमी माना जाता है। समर्पण को कंपनी अधिनियम द्वारा मान्यता नहीं दी गई है, जबकि जब्ती को मान्यता दी गई है। संक्षेप में, शेयरों की जब्ती के लिए समर्पण एक वैकल्पिक समाधान है। शेयरों को ज़ब्त होने से पहले समर्पण करने से प्रतिष्ठा और दस्तावेज़ीकरण भी बचाया जा सकता है।

शेयरों की जब्ती और शेयरों के समर्पण के बीच अंतर

क्र.सं. अंतर के आधार शेयरों की जब्ती शेयरों का समर्पण
1 परिभाषा यह कंपनी द्वारा किसी शेयरधारक के शेयरों को रद्द करना है यदि वह कंपनी को आवंटन या कॉल मनी का भुगतान करने में विफल रहता है। यह व्यक्तिगत शेयरधारक का एक स्वैच्छिक कार्य है, जिसे लगता है कि वह भविष्य की कॉल मनी का भुगतान नहीं कर पाएगा और इस कारण से वह कंपनी के शेयरों का खुद ही समर्पण कर देता है। 
2 कार्यवाही शुरू होना यदि शेयरधारक कॉल मनी का भुगतान करने में विफल रहता है तो कंपनी कार्यवाही शुरू करती है। शेयरधारक स्वयं कार्यवाही शुरू करता है।
3 कार्य का प्रकार यह एक अनिवार्य कार्य है। यह एक स्वैच्छिक कार्य है।
4 कितना समय लगता है समझौता होने में काफी समय लग जाता है। कंपनी द्वारा शेयरों को जब्त करने की तुलना में यह एक तेज़ प्रक्रिया है।
5 प्रभाव इससे संबंधित पक्ष की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है। चूँकि यह एक स्वैच्छिक कार्य है, इससे किसी भी प्रकार से प्रतिष्ठा को ठेस नहीं पहुँचती है।

शेयर पूंजी: यह क्या है?

शेयर पूंजी, जिसमें सामान्य और वरीयता दोनों स्टॉक शामिल हैं, वह धनराशि है जिसे कोई व्यवसाय शेयरों की बिक्री के माध्यम से वैध रूप से जुटा सकता है। अधिकांश समय, ताजा सार्वजनिक पेशकशों का उपयोग शेयर पूंजी जुटाने के लिए किया जाता है।

सार्वजनिक पेशकश में एक निगम जो अधिकतम राशि जुटा सकता है वह उसकी अधिकृत शेयर पूंजी है, हालांकि यह अधिक शेयर उपलब्ध कराकर अधिक धन जुटा सकता है। इन बिक्री के राजस्व (रेवेन्यू) को “अतिरिक्त भुगतान की गई पूंजी” के रूप में गिना जाता है। उपरोक्त राशि शेयरों के लिए भुगतान की गई वास्तविक कीमत को दर्शाती है।

शेयर पूंजी के दो सबसे लोकप्रिय प्रकार पंजीकृत और अधिकृत शेयर पूंजी हैं, हालांकि कई अन्य प्रकार भी हैं।

शेयर पूंजी के प्रकार

शेयर पूँजी के कई प्रकार इस प्रकार हैं:

अधिकृत शेयर पूंजी

सभी व्यवसायों को अपने मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन में बताना होगा कि वे कितनी पूंजी पंजीकृत करना चाहते हैं। पंजीकृत, अनुमोदित, या काल्पनिक पूंजी इस प्रकार निर्दिष्ट राशि है। सरल शब्दों में कहें तो यह वह धनराशि है जो कोई व्यवसाय सार्वजनिक सदस्यता के माध्यम से जुटा सकता है।

जारी की गयी शेयर पूंजी

नाममात्र पूंजी का वह प्रतिशत जिसे आम जनता द्वारा शेयरों के रूप में अभिदत्त किया जा सकता है, जारी शेयर पूंजी के रूप में जाना जाता है। हालाँकि, किसी संगठन को अपनी सभी पंजीकृत पूंजी एक ही बार में जारी करने की आवश्यकता नहीं है। इसे अतिरिक्त समस्याएं भी हो सकती हैं। परिणामस्वरूप, यह कंपनी की वित्तीय आवश्यकताओं पर निर्भर है।

किसी भी परिस्थिति में जारी पूंजी अनुमत पूंजी से अधिक नहीं हो सकती। यह आम तौर पर प्रत्येक शेयर को संदर्भित करता है जो मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन के हस्ताक्षरकर्ताओं, जनता के सदस्यों, विक्रेताओं आदि के पास होता है।

जारी न की गयी शेयर पूंजी

अधिकृत पूंजी का वह प्रतिशत जो अभी तक जारी नहीं किया गया है, उसे जारी न की गयी शेयर पूंजी के रूप में जाना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अधिकृत शेयर पूंजी और जारी शेयर पूंजी के बीच विसंगति है।

अभिदत्त शेयर पूंजी

आम जनता हमेशा कुल जारी पूंजी को अभिदत्त नहीं करती है। जारी पूंजी का केवल एक शेयर जिसे आम जनता अभिदत्त करती है वह अभिदत्त पूंजी है। परिणामस्वरूप, अभिदत्त पूंजी और जारी पूंजी आवश्यक रूप से समान नहीं हैं।

कॉल-अप पूंजी

शेयरधारक आम तौर पर अपने शेयरों की कीमत के लिए किस्त भुगतान करते हैं। उदाहरण के लिए, आवेदन वितरण, पहली कॉल, अंतिम कॉल इत्यादि। नतीजतन, कॉल अप पूंजी अभिदत्त पूंजी के उस हिस्से को संदर्भित करती है जिसे कंपनी शेयरधारकों से मांगती है या उसकी आवश्यकता होती है।

अनकॉल्ड पूंजी

जारी की गई पूंजी का वह अंश जिसका अभी तक भुगतान नहीं किया गया है लेकिन प्राप्ति पर अभिदत्त पूंजी के रूप में माना जाएगा, अनकॉल्ड  पूंजी के रूप में जाना जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो ये शेयर वे हैं जो जारी किए गए हैं लेकिन अभी तक दावा नहीं किया गया है। ये शेयर अभिदत्त पूंजी में तब तक शामिल नहीं किए जाएंगे जब तक आपको इनके बदले भुगतान नहीं मिल जाता।

चुकता पूंजी

कॉल्ड अप पूंजी का एक भाग चुकता पूंजी है। जब कोई फर्म कॉल जारी करती है, तो यह उस धनराशि को संदर्भित करती है जो शेयरधारक प्रतिक्रिया में भुगतान करते हैं। किसी कंपनी की भुगतान की गई पूंजी का निर्धारण करने की सामान्य विधि बकाया कॉलों से कॉल-अप पूंजी को घटाना है।

तय पूंजी

तय पूंजी में कंपनी की वर्तमान परिसंपत्तियां शामिल होती हैं। उदाहरण के लिए, संरचनाएं, भूमि, साज-सामान, उपकरण, बौद्धिक संपदा अधिकार, पौधे आदि।

आरक्षित पूंजी

जब तक कोई निगम परिसमापन या समापन नहीं कर रहा है, तब तक वह आरक्षित धन का उपयोग नहीं कर सकता है। एक निगम केवल 3/4 शेयरधारकों द्वारा अनुमोदित एक विशेष प्रस्ताव द्वारा आरक्षित पूंजी स्थापित कर सकता है। आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन बनने के बाद किसी भी समय आरक्षित दायित्व उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। निगम को ऐसी निधियों को ऋण संपार्श्विक (कोलेटरल) के रूप में उपयोग करने से भी प्रतिबंधित किया गया है।

इसे सामान्य पूंजी में परिवर्तित करने के लिए अदालत के आदेश की भी आवश्यकता होती है, और लेनदार केवल व्यवसाय बंद होने की स्थिति में ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

परिसंचारी (सर्कुलेटिंग) पूंजी

किसी कंपनी की अभिदत्त पूंजी का एक घटक परिसंचारी पूंजी है। परिसंचारी पूंजी में संचालन में उपयोग की जाने वाली परिसंपत्तियां शामिल होती हैं जैसे प्राप्य (रिसीवेबल) खाते, बही ऋण, बैंक में आरक्षित राशि आदि। यह वह पूंजी भी है जिसका उपयोग व्यवसाय अपने मुख्य कार्यों के लिए करता है।

शेयर प्रमाणपत्र

शेयर प्रमाणपत्र कंपनी द्वारा कंपनी में शेयर रखने वाले व्यक्ति के नाम पर दिया गया एक दस्तावेज है। धारा 46 शेयर प्रमाणपत्र जारी करने से संबंधित प्रावधानों को नियंत्रित करती है। प्रमाणपत्र उस व्यक्ति के पास मौजूद शेयरों को बताता है। निगमन के बाद कंपनियों के लिए शेयर प्रमाणपत्र जारी करना अनिवार्य है। 

शेयर प्रमाणपत्र में निम्नलिखित विवरण अवश्य उल्लिखित होना चाहिए-

  1. प्रमाणपत्र जारी करने वाली कंपनी का नाम
  2. कंपनी की कॉर्पोरेट पहचान संख्या (सी.आई.एन)।
  3. कंपनी के पंजीकृत कार्यालय का पता
  4. शेयरों के मालिकों के नाम
  5. सदस्य का फोलियो नंबर
  6. व्यक्ति को जारी किए गए शेयरों की संख्या या उस शेयर प्रमाणपत्र द्वारा दर्शाई गई संख्या
  7. ऐसे शेयरों पर भुगतान की गई राशि
  8. शेयरों की विशिष्ट संख्या

शेयर प्रमाणपत्र निगमन तिथि के 2 महीने के भीतर जारी किया जाना चाहिए और यदि अतिरिक्त शेयर जारी किए जाते हैं तो आवंटन तिथि से 2 महीने के भीतर प्रमाणपत्र जारी किया जाना चाहिए। 

शेयर प्रमाणपत्र आवंटन की प्रक्रिया

एक बार शेयर आवंटित हो जाने के बाद, अगला चरण शेयर प्रमाणपत्र जारी करने का होता है। 

मंडल की बैठक

शेयरों के आवंटन के बारे में निर्णय लेने के लिए मंडल की बैठक बुलाई जाती है। निदेशकों की एक समिति नियुक्त की जाती है, जिसे आवंटन समिति के रूप में जाना जाता है। वे शेयरों के आवंटन के बारे में निर्णय लेते हैं। एक बार जब उनके द्वारा रिपोर्ट उपलब्ध करा दी जाती है, तो मंडल ऐसी रिपोर्ट को मंजूरी दे देता है, और फिर यह संबंधित आवेदकों को शेयरों के आवंटन के लिए प्रस्ताव पारित करता है। इसके बाद कंपनी सचिव अपने संबंधित सदस्यों को संबंधित आवंटन पत्र भेजता है। पत्र आवेदक को सूचित करता है कि कंपनी ने उसके नाम पर एक निश्चित संख्या में शेयर आवंटित किए हैं। 

सदस्यों का रजिस्टर

सी.एस. प्राप्त आवेदनों की सूची से सदस्यों का एक रजिस्टर तैयार करता है। रजिस्टर में शेयरधारक के नाम, पते आदि के बारे में सभी विवरण और जानकारी होती है।

शेयर प्रमाणपत्र तैयार करना

सीएस को आवेदन रजिस्टर और आवंटन पत्रक का हवाला देकर शेयर प्रमाणपत्र में सभी विवरण भरने की आवश्यकता होती है। सीएस को यह सुनिश्चित करना होगा कि शेयर प्रमाणपत्र पर कंपनी के 2 निदेशकों द्वारा हस्ताक्षर किए गए हों। इसके बाद सीएस को शेयर प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर भी करना होता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रमाणपत्र पर कंपनी की मुहर और राजस्व टिकट हो। 

शेयर प्रमाणपत्रों का प्रेषण (डिस्पैच)

शेयरधारकों को सूचित किया जाना चाहिए कि शेयर प्रमाणपत्र प्रेषण के लिए तैयार हैं। आम जनता को सूचित करने के लिए एक सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी। शेयर प्रमाणपत्र प्रेषण के लिए नियुक्त एजेंसी से या व्यक्तिगत रूप से कंपनी के पंजीकृत कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है। 

दंड

यदि कंपनी शेयर प्रमाणपत्र जारी करने से संबंधित प्रावधानों का पालन करने में विफल रहती है तो उसे रु.25000- रु.500000 जुर्माना और प्रत्येक दोषी अधिकारी रु.10000- रु.100000 के जुर्माने से दंडनीय होगा। 

शेयरों में निवेश कैसे करें, इस पर एक प्रारंभिक मार्गदर्शिका

बहुत से लोग शेयरों में निवेश करके अधिक कमाई करना चाहते हैं, और हाँ, यह समय के साथ आपके वित्त को बढ़ाने का एक आकर्षक तरीका है। लेकिन निवेश करने से पहले किसी व्यक्ति के लिए यह जानना और अध्ययन करना बहुत जरूरी है कि कहां से शुरुआत करें। यहां उन शुरुआती लोगों के लिए चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका दी गई है जो यह जानने में रुचि रखते हैं कि कहां से शुरू करें:

  1. आप जीवन में जो कुछ भी करना चाहते हैं उसे शुरू करने से पहले सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप इसके बारे में खुद को शिक्षित करें। निवेश करने से पहले, किसी को यह पता होना चाहिए कि वह क्या कर रहा है। कोई भी व्यक्ति शेयर बाजार की मूल बातें जानकर, बाजार की ताकतें कैसे काम करती हैं, विभिन्न प्रकार के शेयर क्या हैं, शेयर की कीमत को प्रभावित करने वाले कारक आदि जानकर शुरुआत कर सकता है। कोई पॉडकास्ट, ई-पुस्तकें जैसे ऑनलाइन स्रोतों का उल्लेख कर सकता है। ज्ञान का विस्तार करने के लिए कोई पॉडकास्ट, ई-पुस्तकें, यूट्यूब वीडियो, सत्यापित ब्लॉग और पाठ्यक्रम जैसे ऑनलाइन स्रोतों का उल्लेख कर सकता है। कुछ अच्छी किताबें जिनका कोई उल्लेख कर सकता है, वे हैं मॉर्गन हाउसेल की द साइकोलॉजी ऑफ मनी, बेंजामिन ग्राहम की द इंटेलिजेंट इन्वेस्टर, और मैथ्यू आर क्रेटर की ए बिगिनर्स गाइड टू द स्टॉक मार्केट। निवेश के पीछे के मनोविज्ञान को समझने और एक अच्छा निवेशक बनने के लिए कोई भी इन पुस्तकों का संदर्भ ले सकता है।  
  2. सभी आवश्यक ज्ञान एकत्र करने के बाद, यहां निवेश लक्ष्य निर्धारित करना आता है। जब वित्त की बात आती है, तो किसी के पास जो कुछ भी है, उसमें सबकुछ नहीं लगाया जा सकता। आपको अपनी जोखिम सहनशीलता, वह समय अवधि जिसके लिए आप निवेश कर रहे हैं, और वह सुरक्षित राशि जो आप निवेश कर सकते हैं, निर्धारित करने की आवश्यकता है। आपको यह तय करना होगा कि आप दीर्घकालिक लाभ, अल्पकालिक लाभ, या इन दोनों का संयोजन चाहते हैं। 
  3. सीमा निर्धारित करने के बाद, आपको केवल एक क्षेत्र में निवेश करने के बजाय विभिन्न उद्योगों में निवेश करने का लक्ष्य रखना चाहिए। इससे विविधता लाने और इसमें शामिल जोखिम को कम करने में मदद मिलती है। एक बार जब आप विभिन्न उद्योगों में निवेश करना शुरू कर देते हैं, तो यह आपको बाजार में पर्याप्त अनुभव देता है और यह निर्णय लेने के लिए एक खुला क्षेत्र देता है कि किस क्षेत्र में निवेश करना सबसे अच्छा है।   
  4. अब, आप निवेश यात्रा का सबसे व्यावहारिक और दिलचस्प हिस्सा करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस बिंदु पर, आपको कंपनी के वित्तीय स्वास्थ्य, प्रदर्शन और विकास की संभावनाओं का विश्लेषण करना चाहिए। कंपनी की दीर्घकालिक वृद्धि का अंदाजा लगाने के लिए कमाई, राजस्व, व्यय और बाजार की स्थिति का विश्लेषण करें।
  5. विभिन्न शेयर बाजार तकनीकी विश्लेषणों की मदद से, शेयर खरीदने और बेचने का सबसे अच्छा समय क्या है, यह जानने के लिए रुझानों और पैटर्न की व्याख्या करने का प्रयास करें। इससे आपको बाज़ार के रुझान और कीमत में उतार-चढ़ाव के आधार पर सूचित निर्णय लेने में मदद मिलेगी।
  6. काम अभी पूरा नहीं हुआ है। आपको कंपनी के बाजार और वित्तीय स्थिति के बारे में जानकारी रखनी चाहिए। पता लगाएँ कि क्या कंपनी कोई आगामी घोषणा करने की योजना बना रही है जिसके परिणामस्वरूप शेयरों की कीमत में उतार-चढ़ाव होगा। पोर्टफोलियो के प्रदर्शन की नियमित रूप से निगरानी करें और अपने निर्धारित निवेश लक्ष्य के अनुसार निवेश पैटर्न में आवश्यक बदलाव करें। 
  7. आप वित्तीय सलाहकारों से भी सलाह ले सकते हैं, जो आपको उन रणनीतियों को जानने में मदद कर सकते हैं जिन्हें आपको अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अपनाना चाहिए। वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और आपकी वित्तीय स्थिति पर आपको सलाह दे सकते हैं।
  8. अंत में, हमेशा छोटे निवेश से शुरुआत करें। जैसे-जैसे आप अधिक लाभ प्राप्त करते हैं और निवेश पैटर्न के साथ अधिक सहज होते जाते हैं, उन्हें धीरे-धीरे बढ़ाएं। शुरुआत में एक बार में बहुत अधिक निवेश करना अच्छा विचार नहीं है क्योंकि आप नौसिखिया हैं और बाजार के रुझान और उनके फायदे और नुकसान के बारे में नहीं जानते हैं।

निष्कर्ष

शेयर बाजार में व्यापार की कला में महारत हासिल करने के लिए, व्यक्ति को कानूनी और वित्तीय गतिशीलता की गहरी समझ होनी चाहिए। किसी भी कॉर्पोरेट संगठन को संचालन और विकास के लिए धन की आवश्यकता होती है। इसमें आंतरिक या बाहरी स्रोतों से धन जुटाने का विकल्प होता है। शेयरों को जारी करना और नकदी जुटाना किसी भी व्यवसाय या फर्म के आवश्यक घटकों के रूप में अनुमान लगाया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि जब कोई व्यवसाय अच्छी स्थिति में होता है, तो वह अपने निदेशकों, शेयरधारकों और कर्मचारियों का ख्याल रख सकता है और साथ ही उन्हें कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित भी कर सकता है। लेख ने हमें यह समझ दी कि शेयर क्या है और एक कंपनी और निवेशक अपने लाभ के लिए  इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

साधारण आदमी के शब्दों में शेयर क्या है?

एक शेयर व्यवसाय में स्वामित्व की इकाई का प्रतिनिधित्व करता है। शेयर एक ऐसी चीज़ है जिससे आपको मुनाफ़ा हो सकता है। जो कोई शेयर में निवेश करता है उसे मुनाफा कमाने का अवसर मिलता है और जिस कंपनी में वह निवेश करता है उसमें उसकी स्वामित्व हिस्सेदारी होती है।

क्या कोई व्यक्ति शेयरों से पैसा कमा सकता है?

हां, कोई पूंजीगत लाभ, लाभांश या शेयर के वापिस खरीद के माध्यम से शेयरों से पैसा कमा सकता है। हालाँकि यह काफी अप्रत्याशित है अगर कोई विवेकपूर्ण तरीके से पैसा निवेश नहीं करता है, और यह आपको हमेशा लाभ नहीं देता है, कभी-कभी कोई नुकसान में भी जा सकता है। 

किस प्रकार के शेयरों में निवेश करना सर्वोत्तम है?

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएँ और आवश्यकताएँ होती हैं और उसी के अनुसार, व्यक्ति यह निर्णय लेता है कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है। सामान्य तौर पर, वरीयता स्टॉक उन निवेशकों के लिए सर्वोत्तम है जो दीर्घकालिक विकास चाहते हैं। दीर्घकालिक में रिटर्न मिलने की प्रबल संभावना है।

शेयरों की प्रकृति क्या है?

शेयर किसी कंपनी की चल संपत्ति हैं और इन्हें आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में दिए गए तरीके के अनुसार हस्तांतरित किया जा सकता है। 

शेयर जारी करने की प्रक्रिया में तीन प्रमुख बुनियादी बातें क्या हैं?

तीन प्रमुख बुनियादी बातें हैं संकल्प जारी करना, आवेदन प्राप्त करना (न्यूनतम सदस्यता आवश्यकता), और शेयरों का आवंटन।

क्या शेयर जारी करना एक परिसंपत्ति है?

एक बार जब कोई कंपनी एक सामान्य स्टॉक जारी करती है, तो यह पूंजी के बदले निवेशकों को कंपनी के स्वामित्व की बिक्री का प्रतिनिधित्व करती है। कंपनी को अपने सामान्य स्टॉक की बिक्री से जो आय प्राप्त होती है वह एक परिसंपत्ति है। सामान्य स्टॉक को कंपनी के वित्तीय विवरणों में एक परिसंपत्ति के रूप में दर्ज किया जाता है। 

संदर्भ